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स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)

Spanda Nirnaya of Acharya Kshemaraja with Hindi Commentary

आचार्य वसुगुप्त / क्षेमराज द्वारा

DevanagariHindipublished519 पृष्ठ

[२] सूत्रों की अनुक्रमणिका संख्या सूत्रार्थ १. अगाधसंशयाम्भोधि समुत्तरणतारिणीम् ॥ २. अतस्तत्कृत्रिमं ज्ञेयं सौषुप्तपदवत्सदा ॥ ३. अतिक्रुद्धः प्रहृष्टो वा किं करोमीति वा मृशन् ॥ ४. अतो बिन्दुरतो नादोरूपमस्मादतो रसः ॥ ५. अतः सततमुद्युक्तः स्पन्दतत्त्वविविक्तये ॥ ६. अनेनाधिष्ठिते देहे यथा सर्वज्ञतादयः ॥ ७. अन्यथा तु स्वतन्त्रा स्यात्सृष्टिस्तद्धर्मकत्वतः ॥ ८. अप्रबुद्धधियस्त्वेते स्वस्थितिस्थगनोद्यताः ॥ ९. अयमेवोदयस्तस्य ध्येयस्य ध्यायिचेतसि ॥ १०. अवस्थायुगलञ्चात्र कार्यकर्तृत्वशब्दितम् ॥ ११. अहं सुखी च दुःखी च रक्तश्चेत्यादि संविदः ॥ १२. इति वा यस्य संवित्तिः क्रीडात्वेनाखिलं जगत् ॥ १३. इयमेवाप्राप्तिरयमेवात्मनो ग्रहः । १४. एक चिन्ता प्रसक्तस्य यतः स्यादपरोदयः ॥ १५. कार्योन्मुखः प्रयत्नो यः केवलं सोऽत्र लुप्यते ॥ १६. गुणादिस्पन्दनिष्यन्दाः सामान्यस्पन्द संश्रयात् ॥ १७. ग्लानिर्विलुम्पिका देहे तस्याश्चाज्ञानतः सृतिः ॥ १८. जाग्रदादि विभेदे तदभिन्ने प्रसर्पति । १९. तत्रैव संप्रलीयन्ते शान्तरूपा निरंजनाः ॥ २०. तथा यत्परमार्थेन यदा यत्र यथास्थितम् ॥ २१. तथा स्वप्नेऽप्यभीष्टार्थान् प्रणयस्यानतिक्रमात् ॥ २२. तदाक्रम्य बलं मन्त्राः सर्वज्ञबलशालिनः ॥ २३. तदा तस्मिन्महाव्योम्नि प्रलीनशशिभास्करे ॥ २४. तदास्याकृत्रिमो धर्मो ज्ञत्वकर्तृत्वलक्षणः । २५. तन्मात्रोदयरूपेण मनोऽहंबुद्धिवर्तिना ॥ २६. तमधिष्ठातृभावेन स्वभावमवलोकयन् ॥ २७. तस्योपलब्धिः सततं त्रिपदाव्यभिचारिणी ॥ २८. तामाश्रित्योर्ध्वमार्गेण सोमसूर्यावुभावपि ॥

४ स्पन्दकारिका २९. तेन शब्दार्थचिन्तासु न सावस्था न यः शिवः ॥ ३०. दिदृक्षयेव सर्वार्थान् यदा व्याप्यावतिष्ठते ॥ ३१. दुर्बलोऽपि तदाक्रम्य यतः कार्ये प्रवर्तते । ३२. न तु योऽन्तर्मुखो भावः सर्वज्ञत्वगुणास्पन्दम् ॥ ३३. न दुःखं न सुखं यत्र न ग्राह्यो ग्राहको न च ॥ ३४. न हीच्छादनोदनस्यायं प्रेरकत्वेन वर्तते ॥ ३५. नाभावो भाव्यतामेति न च तत्रास्त्यमूढता ॥ ३६. निजाशुद्ध्यासामर्थ्यस्य कर्तव्येष्वभिलाषिणः ॥ ३७. परामृतरसापायस्तस्य यः प्रत्ययोद्भवः ॥ ३८. प्रबुद्धः सर्वदा तिष्ठेत् ज्ञानेनालोच्य गोचरम् ॥ ३९. भुंक्ते परवशो भोगं तद्भावात्संसरत्यतः ॥ ४०. यत्र स्थितमिदं सर्वं कार्यं यस्माच्च निर्गतम् ॥ ४१. यतः करणवर्गोऽयं विमूढोऽमूढवत् स्वयम् ॥ ४२. यथा ह्यर्थोऽस्फुटो दृष्टः सावधानेऽपि चेतसि ॥ ४३. यथेच्छाभ्यर्थितो धाता जाग्रतोऽर्थान् हृदि स्थितान् ॥ ४४. यदा त्वेकत्र संरूढस्तदा तस्य लयोद्भवौ ॥ ४५. यस्मात्सर्वमयो जीवः सर्वभावसमुद्भवात् ॥ ४६. यस्योन्मेषनिमेषाभ्यां जगतः प्रलयोदयौ ॥ ४७. यामवस्थां समालम्ब्य यदयं मम वक्ष्यति ॥ ४८. लभते तत्प्रयत्नेन परीक्ष्यं तत्त्वमादरात् ॥ ४९. शब्दराशिसमुत्थस्य शक्तिवर्गस्य भोग्यताम् ॥ ५०. स्वरूपावरणे चास्य शक्तयः सततोत्थिताः ॥ ५१. सेयं क्रियात्मिका शक्तिः शिवस्य पशुवर्तिनी ॥ ५२. ज्ञानज्ञेयस्वरूपिण्या शक्त्या परमया युतः ॥

[३] विशेष ध्यातव्य

कतिपय ऐसी स्पन्दकारिकायें भी हैं जो कि भट्टकल्लट के 'स्पन्दसर्वस्व' में तो नहीं हैं किन्तु अन्य ग्रन्थों में हैं; यथा—

कारिकावह ग्रन्थ जिसमें यह कारिका उद्धृत की गई है—
१. 'लब्ध्वाप्यलभ्यमेतज्ज्ञानधनं, हृद्गुहान्तकृतनिहितेः ।<br>वसुगुप्तवच्छिवाय हि, भवति सदा सर्वलोकस्य ॥'<br>— 'स्वोपज्ञपरिमल' में उद्धृत ॥'महार्थमंजरी' की 'स्वोपज्ञ<br>'परिमल' टीका श्लोक<br>क्रमाङ्क १
२. वसुगुप्तादवाप्येदं गुरोस्तत्त्वार्थदर्शिनः ।<br>रहस्यं श्लोकयामास सम्यक् श्रीभट्टकल्लटः ॥<br>— 'स्पन्दप्रदीपिका' (का० ५३)<br>(यह कारिका 'स्पन्दकारिकाविवृति' में नहीं है ।)<br>उपर्युक्त कारिका (क्र० २) उत्पलाचार्य की टीका<br>'स्पन्दप्रदीपिका' में है, तो उनके परवर्ती ग्रन्थकार<br>रामकण्ठाचार्य की 'स्पन्दकारिकाविवृति' में भी होनी<br>चाहिए थी किन्तु वहाँ उल्लिखित नहीं है ।'स्पन्दप्रदीपिका' में तो है<br>किन्तु 'स्पन्दसर्वस्व'<br>(कल्लट की टीका) में नहीं<br>है । 'स्पन्दसर्वस्व' में मात्र<br>५२ कारिकायें हैं ।
३. अन्तिम कारिका (विभिन्न टीकाओं में)—<br>(क) 'अगाधसंशयाम्भोधि समुत्तरणतारिणीम् ॥'<br>— 'स्पन्दसर्वस्व' (५२)<br>— 'स्पन्दकारिकाविवृति (५२)<br>(ख) 'वसुगुप्तादवाप्येदं गुरोस्तत्त्वार्थदर्शिनः'<br>— 'स्पन्दप्रदीपिका' (५३)
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[४] प्रथमो निष्यन्दः स्वरूपस्पन्दनिष्यन्दः ‘स्पन्दकारिका’ के प्रथम निष्यन्द का नाम ‘स्वरूपस्पन्द’ रखा गया है । प्रत्येक अध्याय के साथ ‘निष्यन्द’ शब्द का प्रयोग किया गया है यथा—‘प्रथमनिष्यन्द— ‘स्वरूपस्पन्द’ ‘द्वितीयनिष्यन्द’—‘सहजविद्योदयनिष्यन्द’ । ‘निस्यन्द’ या ‘निःष्यन्द’ (नि

  • स्यन्द + घञ्, षत्व) का अर्थ है—चूना, टपकना, बहना, रस, बहाव या प्रवाह । निस्रव एवं निस्राव भी इसी के समानार्थक हैं । तुलना कीजिए : ‘शिवसूत्र’ एवं ‘स्पन्दसूत्र’— | (क) स्पन्दसूत्र—<br>(अध्यायीकरण) | (ख) शिवसूत्र—<br>(अध्यायीकरण) | | :--- | :--- | | १. स्वरूपस्पन्दः प्रथम ‘निःष्यन्द’ । | १. ‘शांभवोपाय’ = प्रथम ‘उन्मेष’ । | | २. सहजविद्योदयः द्वितीय ‘निःष्यन्द’। | २. ‘शाक्तोपाय’ = द्वितीय ‘उन्मेष’ । | | ३. विभूतिस्पन्दः तृतीय ‘निःष्यन्द’ । | ३. ‘आणवोपाय’ = तृतीय ‘उन्मेष’ । | ‘उन्मेष’ (उद्+मिष्+घञ्) (उद्+मिष्+ल्युट्) = ‘उन्मेषण’ ॥ अर्थ—आँख का खुलना, खिलना । स्फुरण । प्रकाश ॥ ‘उन्मिषित’ = खिला हुआ, खुला हुआ, दृष्टि, नजर, निगाह ॥ उन्मीलन = आँख खुलना ॥ (ग) योगशास्त्र : अध्यायीकरण—१. ‘समाधिपाद’ २. ‘साधनपाद’ ३. विभूति- पाद, ४. कैवल्यपाद । ‘स्पन्दशास्त्र’ में ‘उन्मेष’ का अर्थ— १. एकचिन्ताप्रसक्तस्य यतः स्यादपरोदयः । उन्मेषः स तु विज्ञेयः स्वयं तमुपलक्षयेत् ॥ ४१ ॥ (स्पन्दकारिका) २. ग्लानिर्विलुण्ठिका देहे तस्याश्चाज्ञानतः सृतिः । तदुन्मेष विलुप्तं चेत् कुतः सा स्यादहेतुका ॥ ४० ॥ (स्पन्दकारिका) ३. यस्योन्मेषनिमेषाभ्यां जगतः प्रलयोदयौ ॥ १ ॥ ‘स्पन्द’ का अर्थ— १. अतिक्रुद्धः प्रहृष्टो वा किं करोमीति वा मृशन् । धावन्वा यत् पदं गच्छेत्तत्र स्पन्दः प्रतिष्ठितः ॥ २२ ॥

प्रथमः निष्यन्दः ७ २. 'गुणादिस्पन्दनिष्यन्दाः सामान्यस्पन्दसंश्रयात् । (१९) (स्पन्द०) ३. 'अतः सततमुद्युक्तः स्पन्दतत्त्वविविक्तये । जाग्रदेव निजं भावमचिरेणाधिगच्छति ।। २१ ।। (स्पन्द०) 'स्पन्द के निष्यन्द'— रामकण्ठाचार्य = 'उन्मेष-निमेष' = 'शक्तिप्रसर प्रलय' । रामकण्ठाचार्य का तर्क—भगवान् शंकर तो नित्य हैं, 'अव्यभिचरदेकस्वभाव' एवं 'एकमात्र पदार्थ' एवं परमार्थ पदार्थ हैं फिर उनके साथ अनित्य निमेषोन्मेष नामक परस्पर विरुद्ध अवस्थाद्वय का संबंध कैसे दिखाया गया ? यह हो सकता है कि—'कर्तृ- प्रथया हि अनया एवं प्रतिपाद्यते शंकर उन्मिषति निमिषन्ति इति ।।' (रामकण्ठ) किन्तु— नित्य भगवान् में 'अनित्यावस्था योगित्वं' अनुपपन्न है। फिर 'यस्योन्मेषनिमेषाभ्यां' क्यों कहा गया ? (रामकण्ठाचार्य) ।। पूर्वपक्ष के उपरान्त रामकण्ठ उत्तरपक्ष में कहते हैं कि—(१) 'उन्मेष' एवं 'निमेष' दोनों शब्द शांकरी इच्छा के द्योतक हैं और यह 'इच्छा' उनका स्वरूपभूत नित्य धर्म है—१. 'उन्मेष-निमेषशब्दाभ्यां तदुपचरितवृत्तिभ्याम् इच्छामात्रमेकं शंकर संबंधि प्रति- पाद्यते । स च तस्य नित्यो धर्मः स्वभावभूतः । २. उन्मेष-निमेष का द्वित्व मात्र उपचारवश है—'तस्य उन्मेष-निमेषशब्दवाच्यत्वं द्वित्वं च उपचारात् ।' इच्छाशक्ति या परमात्मा की संकल्प शक्ति को व्यक्त करने के लिए 'उन्मेष' एवं 'निमेष' दो शब्द का प्रयोग औपचारिक मात्र है क्योंकि ये दोनों शब्द परमात्मा के संकल्प या इच्छामात्र के द्योतक हैं—संकल्पात्मक गतिमयता या इच्छा ही दोनों का अर्थ है—इससे पृथक् कुछ नहीं है ।१ इच्छा सृष्टिवाद— तर्क यह है कि जगत् पारमेश्वरी मायाशक्ति के द्वारा उद्भावित होने के कारण (कार्य होने के कारण, अनित्य होने के कारण) अनित्यात्मक प्रलयोदय से तो प्रभावित होते ही हैं अतः निमेषोन्मेष तो होंगे ही किन्तु ये ईश्वरेच्छाप्रसूत मात्र ही हैं— 'निमेषोन्मेषौ वस्तुतः संभवतः । तौ च ईश्वरेच्छामात्रनिमित्तकौ ।' अतः—'उन्मेष' उदयात्मक होने के कारण यह ईश्वरेच्छा मात्र का ही द्योतक है—'उदयात्मकोन्मेषहेतु- त्वात् ईश्वरेच्छैव उन्मेष शब्देन ।' इसी प्रकार 'निमेष' शब्द प्रलयवाचक है । प्रलयवाची 'निमेष' भी इसी ईश्वरेच्छा का औपचारिक अर्थ द्योतित करता है जिस प्रकार कि आयु- प्रदायक घृत भी आयु कहा जाता है ।२ उन्मेष-निमेष भी शंकर की अव्यतिरिक्ता शक्ति हैं—'सा च अव्यतिरिक्ता शंकरस्य शक्तिः ।' उसका ज्ञान आत्मैश्वर्यप्रत्यभिज्ञालक्षण की सिद्धि का प्रतिपादक है । परमात्मा के अवगमार्थ ही 'इच्छा' शब्द को भी प्रयुक्त किया गया है । जिस प्रकार पुरुष १ - २. स्पन्दकारिकाविवृति ।

८ स्पन्दकारिका की इच्छावस्था में इष्यमाण पदार्थ उसके स्वरूप से व्यतिरिक्त नहीं होता उसी प्रकार ‘अनन्तावभासात्मक एवं अनन्तवैचित्र्यात्मक जगत् भगवान् की शक्ति से रंचमात्र भी व्यतिरिक्त नहीं है—१ ‘भगवतः शक्तौ अनन्तावभासविशेषचित्रं जगत् मनागपि । अनुपजातविशेषात् स्वरूपात् अव्यतिरेकेणैव अवतिष्ठते ॥' यह नश्वर नहीं शिवदशा है इसीलिए इसकी स्तुति की गई है—‘सेयं परमार्थ सती शिवदशा'— सदा सृष्टि विनोदाय सदा स्थितिसुखासिने । सदा त्रिभुवनाहारतृप्ताय स्वामिने नमः ॥ ईश्वरप्रत्यभिज्ञा में भी कहा गया है— सा चैषा प्रतिभा तत्तत्पदार्थक्रमरूपिता । अक्रमानन्तचिद्रूपः प्रमाता स महेश्वरः ॥ परमात्मा की मात्र एक ही शक्ति है किन्तु उसके लिए—इच्छा ज्ञान क्रिया रूप में भिन्न-भिन्न प्रयोग किया जाता है—‘एकस्या एव पारमेश्वर्याः शक्तेः इच्छा-ज्ञान-क्रिया व्यपदेशः और उसे मायावश इदन्तोन्मिषित रूप में देखा जाता है । इसी प्रकार एक ही शिवतत्त्व में सदाशिवादि तत्त्वान्त अनेक व्यपदेश हुए हैं । इसीलिए पारमेश्वरी शक्ति स्वलीलोल्लासित जगत् की दो अवस्थाओं में वर्तमानता के कारण, दो प्रकार भी कही गई है । ‘यस्योन्मेषनिमेषाभ्यां जगतः प्रलयोदयौ' का अर्थ यह होगा—‘यस्य इच्छामात्रेण जगतः प्रलयोदयौ तं स्तुमः ॥' संकल्पसृष्टिवाद— उन्मेष-निमेष दो शब्द अवश्य प्रयुक्त हुए हैं किन्तु दोनों का अर्थ एक है—इसका अर्थ है—‘परमेश्वरेच्छा' उन्मेषेण उदयो, निमेषेण प्रलयः—इति तु अर्थसंख्या समवैति । इच्छामात्रम् उन्मेषनिमेषौ ॥ इसीलिए तो भट्टकल्लट ने 'उन्मेषनिमेष' की व्याख्या 'संकल्प' शब्द से की है—‘संकल्पमात्रेण' (भट्टकल्लट) ।२ आचार्य रामकण्ठ यह भी कहते हैं कि—१. जिन व्याख्याकारों ने यथासंख्य समर्थनानुरोध के कारण जिसके 'उन्मेष' में क्रियाशक्ति के प्रतिसंहार के कारण स्वरूप विकास में जगत् के प्रलय को विनाश के रूप में तथा २. 'निमेष' में क्रियाशक्ति के प्रसृत होने से स्वरूपसंकोच रूप में जगत् का उदय या उद्भव स्वीकार किया है और जो उन्मेष निमेष को शंकर का पारमार्थिक धर्म प्रतिपादित करते हैं उनकी व्याख्या काल्पनिक है और उन्होंने इस दर्शन को ठीक से हृदयंगम नहीं किया हैं—‘ते च काल्पनिकमेव अर्थ- परमार्थत्वेन प्रतिपद्यमानाः तथा दर्शनस्य अस्य अन्तरं नमु प्रविष्टाः । इति नमस्तेभ्यः ॥'३ अनेकात्मकता एवं एकात्मकता में सामरस्य—नित्याव्यभिचरदेकस्वभाव भगवान् की शक्ति भी इसी प्रकार एक है और परमात्मा से अभिन्न है । फिर ‘शक्तिचक्र' की बात १-३. स्पन्दकारिकाविवृति ।

प्रथमः निष्यन्दः ९ क्यों कही गई ? वस्तुतः इसके द्वारा ईश्वर के निरतिशय ऐश्वर्य को द्योतित किया गया है। जो समस्त अनन्तरूपात्मक जगत् को 'अहं' के रूप में एकात्मक एवं अहमात्मक मानता है वह ईश्वर अपने एकात्मक नित्य स्वभाव एवं स्वरूपपरामर्श से अव्यभिचरित रहता हुआ भी 'निरवधि-विजृंभमाण विचित्रावभास खचित त्रैलोक्यालेख्य' को 'इदम्' के रूप में उल्लिखित करके भी परमार्थतः अपने परामृश्यमान एकात्मक स्वस्वरूप से यत्किंचित् भी भिन्न नहीं हो पाता। कहा भी गया है— 'लिखते जगतत्रितयचित्रमद्भुतं, प्रतिमा परिस्फुरितशंसि ते नमः । सुसितैकसूक्ष्मनिजशक्तिवर्तिका, रचितावभास शतशोभि शंभवे ॥ परमेश्वरता जयत्यपूर्वा, तव सर्वेश यदीशितव्यशून्या । अपरापि तथैव ते ययेदं, जगदाभाति यथा तथा न भाति ॥'१ सुप्रबुद्ध महात्माओं ने इस प्रकार के शांकर ऐश्वर्य को अनुग्रह स्वीकार किया है। चित् एवं अचित् के रूप में जो जगत् को द्विविध स्वीकार किया गया है, वह मात्र मायावश है किन्तु वे परमेश्वर की स्वरूपशक्ति से अभिन्न हैं। जडचेतन अभेदवाद— 'शंकरस्य पारमैश्वर्ये या इमाः परमाद्भुतमायाशक्तिवशात् चिदचिद्भेदेन द्विविधा अपि अपर्यन्ताभावव्यक्तयः सा परमेश्वरस्य स्वरूपात् अभिन्ना शक्तिरेकैव तात्त्विकी ॥'२ शक्तिशक्तिमान में अभेदात्मकता—'शक्तीनां चक्रं' कहकर परमात्मा की अनेक शक्तियों की बात नहीं कही गई है क्योंकि परमात्मा की मुख्य शक्ति—'स्वातन्त्र्यशक्ति' तो एक ही है। 'इदम्' रूप में परामर्शभेद होने के कारण ही एक ही शक्ति नाना- नामरूपात्मक रूप में अवभासित होकर 'शक्तीनां चक्रम्' कहकर बहुत्व रूप में व्यपदिष्ट हुई है किन्तु परमार्थतः शक्ति केवल एक है। शक्ति एवं शक्तिमान में अभिन्नता दिखाने हेतु ही 'शक्ति' शब्द का पृथक् प्रयोग किया गया है। यह ईश्वर का 'विभव' (ऐश्वर्य) है। वस्तुतः दोनों एवं विश्व (नानात्मक भेद) एकात्मक हैं—दो पदार्थ हैं फिर भी एक हैं— शक्तिश्च शक्तिमांश्चैव पदार्थद्वयमुच्यते । शक्तयोऽस्य जगत्कृत्स्नं शक्तिमांश्च महेश्वरः ॥३ 'शक्तिचक्रविभवप्रभवं' में 'प्रभव' उत्पत्तिकारण का सूचक है इसके 'स्वशक्ति- भूतविभव का प्रभव' सूचित करता है कि सारे वैभव कहीं अन्यत्र (परमात्मा से भिन्न) से नहीं आए और न तो वे स्वरूपव्यतिरिक्त ही हैं। 'यस्य' शब्द शंकर के जगतकारणत्व का प्रतिपादक है। १-३. स्पन्दकारिकाविवृति ।

१० स्पन्दकारिका 'शंकर' शब्द = श्रेयकर्ता का द्योतक है। 'प्रलयोदयौ' = विनाश प्रादुर्भाव के द्योतक हैं। 'उन्मेषनिमेष'—शक्ति के प्रसार एवं प्रलय के द्योतक हैं। 'चक्र' = समूह। 'प्रभव' = कारण के द्योतक हैं। शक्तिचक्रात्मकस्वैश्वर्यभूत जगत् का प्रभव 'इदम्' का प्रत्यायक होते हुए भी 'अहं' से पृथक् नहीं है। वृत्तिकार भट्टकल्लट ने 'विज्ञानदेहात्मकस्य शक्तिचक्रैश्वर्यस्य उत्पत्तिहेतुत्वम्' व्याख्या की है। 'विज्ञानदेहो' = विशुद्ध संविन्मात्रमूर्ति महेश्वर। वही 'आत्मा' है—अर्थात् यही उसका स्वभाव है। 'शक्तिचक्रात्मन ऐश्वर्यस्य'—यही इसका अर्थ है। सर्वात्मवाद— शंकर = आत्मा ॥ 'शंकर शब्देन इह प्रतिपादितः। स च आत्मैव नान्यः ॥ वृत्तिकार भी कहते हैं—'अनेन स्वस्वभावस्यैव शिवात्मकस्य' ॥ 'स्वस्य' = आत्मा के। 'स्व' = आत्मीय भाव। 'भाव' = स्वरूप, स्वस्वभाव ॥ सारांश—१. इच्छासृष्टिवाद २. इच्छाप्रलयवाद ३. नानात्व में एकत्व— रामकण्ठ कहते हैं— (क) 'परमेश्वरः इच्छामात्रेण जगतः प्रलयोदयौ विदधाति। (ख) 'लब्धस्थितिकमपि जगत् तच्छक्तिविभूतिरेकैव माया वशात् तु नानात्वेन अवभासते ॥' (ग) 'इदमेव अर्थद्वयम् अत्र प्रकरणे विस्तार्यते।' आचार्य रामकण्ठ कहते हैं कि 'स्पन्दकारिका' के चारों निष्यन्द इसी प्रथम श्लोक के स्पन्दसिद्धान्त में आसूत्रित हैं। सारांश यह कि—(क) परमात्मा माया के कारण (स्वरूपप्रत्यवमर्श के अनुल्लास के कारण) वेद्य देहादिक से अव्यतिरिक्त प्रतिभासमान आत्मा का व्यतिरेक प्रदर्शित किया गया है। इस ग्रन्थ की सिद्धान्तता—(ख) इसके अनन्तर, वेदक के द्वारा ही वेद्य का अस्तित्व होने का भान होने से वेदक एवं वेद्य में एवं उन दोनों का शक्ति से अव्यतिरिक्तत्व सिद्ध होता है।—ये दो अर्थ हैं जिनका चारों निष्यन्दों में प्रतिपादन किया गया है। यही इसका सिद्धान्त (सिद्ध का अन्त = सिद्ध की निष्ठा, निश्चय) है। इसकी यह भी सिद्धान्तता संभव है कि—१. 'ज्ञान' २. 'क्रिया' ३. 'योग' एवं ४. 'चर्या' रूप चतुष्टयपूर्ण यह स्पन्दविज्ञान ही साफल्य-प्रापक है। 'शंकरं स्तुमः' का प्रयोग इस ग्रन्थ की निर्विघ्न समाप्ति को उद्देश्य में रखकर भी किया गया है। 'शंकरं स्तुमः' में 'शंकर' शब्द का अर्थ— (क) उपायलक्षण—श्रेयस्कर स्पन्दशास्त्र। (ख) उपेयलक्षण—आत्मैश्वर्य प्रत्यभिज्ञा। 'शम्' (शंकर = शम्कारक) का अर्थ है। शंकर = परमेश्वर, श्रेयकर्ता ईश्वर ॥

प्रथमः निष्यन्दः ११ १. संबंध—ईश्वर एवं शास्त्र का कर्तृकार्यलक्षण संबंध है। शास्त्राभिधेय प्रतिपाद्य- प्रतिपादकभावलक्षण ही संबंध है। 'स्तुमः' = स्तवन करते हैं। उपादेय वस्तुस्वरूप का प्रतिपादन ही स्तुति का अर्थ है। २. प्रयोजन क्या है? 'प्रयोजनं च आत्मैश्वर्य प्रत्यभिज्ञात्मक शंकर पदादेव अवसीयते ।।' अभिधेय-प्रयोजन में उपायोपेयभावलक्षणरूप संबंध है। इस शास्त्र का अभिधान है—'स्पन्द' क्योंकि स्पन्दका० में 'स्पन्दतत्त्वविविक्तये' (१ नि० २१ का० २ पा०) कहा गया है। स्पन्द का अर्थ क्या है?—'स्पन्द' का क्या अर्थ है? 'स्वस्वभावपरामर्शमात्र, नित्य, शून्यताव्यतिरेचनकारणभूत, तावन्मात्रसंरभात्मा 'शक्ति' नामवाली पारमेश्वरधर्म का किंचिच्चलन ही 'स्पन्द' कहलाता है—'स्पन्दशब्दश्च अयं स्वस्वभाव परामर्शमात्रस्य, नित्यस्य, शून्यताव्यतिरेचनकारणभूतस्य, तावन्मात्रसंरंभात्मनः शक्त्यपराभिधानस्य पारमे- श्वरस्य धर्मस्य किंचिच्चलनात् 'स्पन्द' इति अर्थानुगमात् वाचकत्वेन व्यपदिष्टः ।।' 'स्पन्द' शास्त्र नाम क्यों पड़ा?—इसी स्पन्द तत्त्व के प्रतिपादन के कारण इस शास्त्र का नाम 'स्पन्द' शब्द द्वारा व्यपदिष्ट है 'तत्प्रतिपादनहेतुत्वात् शास्त्रमपि इदं स्पन्द- शब्देन अभिधीयते ।।' स्पन्दशास्त्र का विषय क्या है?—यहाँ स्पन्दशास्त्र का विषय क्या है? 'विशुद्ध- श्रद्धा भक्ति प्रकर्ष पिशुनित परमेश्वर-परशक्तिपात-प्रोन्मील्यमानस्वभावालोक तिरस्कृत सकलसंदेहान्धकारत्वात् प्रबुद्धः सम्यगुपनत दीक्षादिसंस्कारो गुरुवचनचोदनामात्रावशेष- स्वात्मैश्वर्योपलब्धिः'—यहाँ 'विषय' शब्द अधिकारी के अर्थ में प्रयुक्त किया गया है न कि प्रतिपाद्यविषय के अर्थ में। 'शंकर ही हमारी आत्मा है'—'स कथं शंकरो ममैव आत्मा ?' इसका उत्तर द्वितीय कारिका में दिया गया है। स्पन्दशास्त्र के ज्ञान का पात्र कौन है?—स्पन्दशास्त्र के उपदेश का पात्र कोई विरला विवेकी व्यक्ति ही संभव है— 'किंत्वेतेऽद्य विवेकिनः कतिपये सन्त्यत्र पात्रं सताम्' ।। (रामकण्ठ)। 'स्पन्द' शाक्ततत्त्व है जो कि शंभु का स्वभावभूत आत्मधर्म है— 'निजो धर्मः शंभोरनुपमचमत्कार सरसः । परं शाक्तं तत्त्वं जगति जयति स्पन्द इति तत् ।। (रामकण्ठ)। 'स्वरूपस्पन्द' शब्द की सोद्देश्यता—प्रथम निष्यन्द को 'स्वरूप स्पन्द' क्यों कहा गया? कारण निम्नांकित हैं—१. 'स्पन्दकारिका' शिवसूत्र की ही व्याख्या होने के कारण शिवसूत्र के मुख्य प्रतिपाद्य विषय ('आत्मा') की ही प्रतिपादक होनी चाहिए क्योंकि तभी इसका उद्देश्य पूर्ण हो सकता है। २. 'स्पन्दकारिका' सर्वात्मवाद, सर्व- स्पन्दवाद, सर्वशिववाद एवं सर्वशक्तिवाद का पोषक होने के कारण भी 'स्वरूप' (आत्मा या शिव या चैतन्य) का प्रधानतया प्रतिपादन करता है। ३. स्पन्दशास्त्र मुख्यतः 'शक्ति' को प्राधान्य देता है—'स्पन्द' को प्रामुख्य प्रदान करता है और 'स्पन्द' स्वातंत्र्य शक्ति

१२ स्पन्दकारिका (इच्छाशक्ति) परमात्मा की विमर्शशक्ति या उसके परमाद्भुत एवं परमचमत्कार ऐश्वर्य (स्पन्द = आत्मस्वभाव = 'स्वस्वरूप') का अभिधानान्तर है । ४. 'स्पन्दशास्त्र' उद्भव- स्थितिप्रलयकारिणी महामाया को शंकराचार्य की भाँति मिथ्या नहीं प्रत्युत् शिवकी आत्म- भूता, हृदयरूपा, आत्मसाररूपा 'शैवीमुख' एवं शिव से अभिन्न उनका नित्यस्वभाव, नित्यधर्म, एवं उनकी स्वसमवायिनी परमाशक्ति मानता है । वह नित्य है, सृष्टिरूपा है, शिवात्मिका है, आत्मरूपा है, चैतन्यविग्रहा है और शिव उसके बिना 'शव' है क्योंकि 'शिव' के 'श' का इकार वही है और उसके बिना 'शिव' शव बन जाता है ।—इस सिद्धान्त का प्रतिपादन भी स्पन्दशास्त्र का लक्ष्य है और वह शक्ति 'स्वरूपस्पन्द' ही है । ५. शंकर की आत्मा एवं परमात्मा शक्तिरहित एवं निष्क्रिय है— 'निष्कले निष्क्रिये शान्ते निरवद्ये निरंजने ।।' (वि०चूड़ा०) 'निष्क्रयोऽस्म्यविकारोस्मि निष्कलोऽस्मि निराकृतिः ।। (वि०चूड़ा०) 'कर्तापि वा कारयितापि नाहं, भोक्तापि वा भोजयितापि नाहम् । (वि०चू०) 'अकर्ताहमभोक्ताहमविकारोऽहमक्रियः ।' (वि०चू०) 'स्पन्दशास्त्र' का स्पन्द एवं स्पन्दवान दोनों सक्रिय हैं और स्पन्दवान की सक्रियता इसी 'स्वरूपस्पन्द' (स्वातंत्र्यशक्ति, विमर्शशक्ति, स्पन्द) पर आधृत है क्योंकि उसके बिना तो शिव हिल भी नहीं सकते— १. 'शिवः शक्त्या युक्तो यदि भवति शक्तः प्रभवितुं, न चेदेवं देवो न खलु कुशलः स्पन्दितुमपि ।' (सौन्दर्यलहरी) तथा—२. परोऽपि शक्तिरहितः शक्त्या युक्तो भवेद्यदि । सृष्टिस्थितिलयान् कर्तुमशक्तः शक्त एव हि ।। (वामकेश्वरमहातन्त्र) 'स्पन्दसूत्र' ('शिवसूत्रविमर्शिनी में स्पन्द का० को 'स्पन्दसूत्र' कहा गया है) शिव को विश्वोत्तीर्ण मानते हुए भी विश्वमय एवं पञ्चकृत्यकारी मानता है— 'स्वरूपस्पन्द' नामकरण की सार्थकता—'परमेश्वरः पञ्चकृत्यमयः सततम् अनुग्रहमय्या परारूपया शक्त्या आक्रान्तो वस्तुतोऽनुग्रहैकात्मैव, नहि शक्तिः शिवात् भेद- मामर्शयेत् ।।' (अभिनवगुप्त) 'परात्रिंशिकाविवृति' उसकी पाँच शक्तियाँ हैं— १. प्रकाशरूपता चिच्छक्तिः । (तन्त्रसार, अ०१) २. प्रकाशश्च अनन्योन्मुख विमर्शः अहमिति । (प्रत्यभिज्ञा विमर्शिनी) ३. स्वातंत्र्यं आनन्द शक्तिः । (तं०सार) ४. तच्चमत्कार इच्छाशक्तिः । (तं०सार) ५. आमर्शात्मकता ज्ञानशक्तिः । ('आमर्शश्च ईषत्तया वेद्योन्मुखता) । ६. सर्वकारयोगित्वं क्रियाशक्तिः । (तं०सार) 'सृष्टिसंहारकर्तारं विलयस्थितिकारकम् । अनुग्रहकरं देवं प्रणतार्तिविनाशनम् ।। (स्वच्छन्दतन्त्र । पटल १)

प्रथमः निष्यन्दः १३ १. आभासन २. रक्ति ३. विमर्शन ४. जीवावस्थापन ५. विलापन । १. सृष्टि २. स्थिति ३. संहार ४. विलय (निग्रह) ५. अनुग्रह ॥ 'नमः शिवाय सततं पञ्चकृत्यविधायिने । (प्र०हृ०) आभासनरक्तिविमर्शनबीजावस्थापनविलापनतस्तानि (प्र०हृ० ११) 'तथापि तद्वत् पञ्चकृत्यानि करोति' (प्र०हृ०सू० १०) । 'इह ईश्वराद्वयदर्शनस्य ब्रह्मवादिभ्य' अयमेव विशेषः । (क्षेमराज) आचार्य क्षेमराज ने 'प्रत्यभिज्ञाहृदयम्' में भी शक्ति को प्राधान्य देते हुए प्राथमिक सूत्रों में शक्ति विषयक सूत्र ही लिखें हैं यथा— १. चितिः स्वतन्त्रा विश्वसिद्धिहेतुः । (सूत्र १) २. स्वेच्छया स्वभित्तौ विश्वमुन्मीलयति ॥ (सूत्र २) ३. चितिरेव चेतनपदावरूढा चेत्यसंकोचिनी चित्तम् । (५) ४. स चैको द्विरूपस्त्रिमयश्चतुरात्मा सप्त पञ्चस्वभावः (सू० ७) ५. तद्भूूमिकाः सर्वदर्शनस्थितयः । (सू० ८) प्रत्यभिज्ञादर्शन के उद्भावक सोमानन्दपाद ने भी सर्वात्मवाद का प्रतिपादन किया है—(स्वरूपस्पन्द या आत्मा) का प्रामुख्य प्रतिपादित किया है) 'आत्मैव सर्वभावेषु स्फुरन निवृत्तचिद्विभुः । अनिरुद्धेच्छाप्रसर प्रसरद् दृक्क्रियः शिवः ।।' (शिवदृष्टि) यही आत्मा या चितिशक्ति 'स्वरूपस्पन्द' है और स्पन्दसूत्रों के प्राथमिक निष्यन्द में इसी स्वरूपस्पन्द एवं विशेष स्पन्द की प्रमुखता से विवेचना की जाने के कारण इस निष्यन्द को 'स्वरूपस्पन्द' कहा गया है । 'विशेष स्पन्द' लक्ष्य नहीं है लक्ष्य है— 'स्वरूपस्पन्द' । इसी उद्देश्य से 'स्वरूपस्पन्द' प्रथम निष्यन्द की संख्या है । स्पन्द शास्त्र का सारा प्रयत्न है—'अतः सततमुद्युक्तः स्पन्दतत्त्वविविक्तये (१।२१)। शिव ही 'विश्वात्मा' या 'स्वरूपस्पन्द' है । 'स्वरूपस्पन्द' कहकर जिस आत्मा की ओर इंगित किया गया है वह मात्र 'शक्ति' ही नहीं शिव भी है—अतः यदि 'स्पन्दसूत्र' के प्रारंभ में 'शंकरं स्तुमः' कहा गया है तो वह शंकर भी विश्वात्मा ही है । शिवसूत्रवार्तिक, में वरदराज ने कहा है— १. चित्क्रियात्मकचैतन्यमूर्त्तिर्जीवजडात्मनः । परमः शिव एवात्मा प्रपञ्चस्येति कथ्यते ॥ (१।७) २. चैतन्यमेव विश्वस्य स्वरूपं पारमार्थिकम् (१।१३) (चैतन्य = आत्मा) ३. चैतन्य चित्क्रियारूपं शिवस्य परमस्य यत् । स्वातन्त्र्यमेतदेवात्मा ततोऽसौ परमः शिवः ॥ (१।८) ४. नात्मा देहो न च प्राणो न मनः खं न शून्यभूः । किन्तु चैतन्यमेवात्मेत्यादिष्टं परमेष्ठिना ॥ (१।१०)

१४ स्पन्दकारिका सर्वचैतन्यवाद एवं सर्वात्मवाद— आचार्य क्षेमराज ने भी 'शिवसूत्रविमर्शिनी' में इसी तथ्य की पुष्टि की है— १. चैतन्यपरमार्थतः शिव एव विश्वस्य आत्मा इति आदिशति—‘चैतन्यमात्मा’। २. न शरीर-प्राण-बुद्धि-शून्यानि लौकिक चार्वाक-वैदिक-योगाचार माध्यमिका- द्यभ्युपगतानि आत्मा अपितु यथोक्तं चैतन्यमेव ॥ ३. मृत्युजित्भट्टारक (नेत्रतन्त्र) में भी कहा गया है कि— परमात्मस्वरूपं तु सर्वोपाधिविवर्जितम् । चैतन्यमात्मनो रूपं सर्वशास्त्रेषु पठ्यते ॥ (नेत्रतन्त्र) ४. ‘चैतन्यम् उक्तं स एव आत्मा स्वभाव... भावाभावरूपस्य विश्वस्य जगतः ॥’ ५. जीवजडात्मनो विश्वस्य परमशिवरूपं चैतन्यमेव स्वभावः ॥ ६. चैतन्यं विश्वस्य स्वभावः । ७. चेत्यमानस्तु स्वप्रकाशचिदेकीभूतत्वात् चैतन्यमात्मैव ॥ ८. शङ्करात्मक स्पन्दतत्त्वरूपं चैतन्यं सर्वदा स्वप्रकाश परमार्थ सत् अस्ति ॥ भट्टकल्लट ने शिव को ‘स्वस्वभाव’ कहा है और सृष्टि को उसी का ‘संकल्प’ माना है—‘अनेन स्वस्वभावस्यैव शिवात्मकस्य संकल्पमात्रेण जगदुत्पत्तिसंहारयोः कारणत्वम् ॥’ (का० ११) ‘स्वस्वरूप’—शिव है—स्पन्द है—अपनी प्रत्यगात्मा है—संवित् है । ‘कथं पुनः स्वस्वभावस्यैव संसारिणः शिवत्वेन निर्देशः ?’ कहकर कल्लट ने पुनः आत्मारूप शिव को ‘स्वस्वभाव’ कहा है । (स्पन्द० का० २) पशुदशा में भी मितप्रमाता ‘स्वभाव’ से च्युत नहीं होता— १. न तस्य स्वरूपम् आव्रियते । न तस्य स्वरूपान्यथाभावः । २. निवर्तते निजाग्नैव स्वभावादुपलब्धतः ॥ (स्पं० का० ३) ३. स स्वभावः परं स्मृतः ॥ ४. स्वतन्त्रता की शक्ति भी स्वस्वभाव है— ‘स्वातन्त्र्यस्य स्वस्वभावभूतस्य’ । (स्पन्द का० कल्लटः ७) ५. आत्मबल स्पर्श से स्वस्वरूप में स्थिति होती है— ‘अपितु स्वस्वरूपे स्थित्वा’ । (कल्लट) ६. तमधिष्ठातृभावेन स्वभावमवलोकयन् । (स्पन्द० सर्वस्व) स्वभावभूत ही स्पन्दरूपता है । यह सर्वानुस्यूत, सर्वसामर्थ्ययुक्त है—‘सर्वानुस्यूतः सर्वसामर्थ्ययुक्तश्च आत्मस्वभावः (‘स्पन्दसर्वस्व’) ‘सर्वाव्यापकत्वेन स्वभावं पश्यन्’— स्वभाव एवं सर्वव्यापक है । यह चिद्रूप है—‘यस्मात् चिद्रूपत्वं आत्मनः स्वरूपं’ (वृत्तिः

प्रथमः निष्यन्दः १५ का० १३) । 'स्वभाव' विलुप्त नहीं होता क्योंकि 'स्वभावो में विलुप्त' इति अबुधो जानाति ।। (कल्लटः १५) । आत्मा—'अन्तश्चक्रारूढस्वभाव एवं सर्वज्ञत्वादिगुणाश्रय है । (भट्टकल्लटः स्पन्द सर्वस्व) ।। स्वस्वभाव सर्वगत एवं चिद्रूप है—'तस्य चिद्रूपस्य सर्वगतस्य स्वस्वभावस्य उपलब्धिः (स्पं० स०—कल्लट) ।। 'स्पन्दतत्त्व' स्वस्वरूप ही है—स्पन्दतत्त्वस्य स्वरूपाभिव्यक्त्यर्थ' ('स्पन्दतत्त्व विविक्तये' की व्याख्या-कल्लट) कारिका २५ में कल्लट कहते हैं—प्रत्यस्तमिते शशि- भास्करे यस्य स्वस्वभावाभिव्यक्ति न सम्यक् वृत्ता ।। (का० २५) (कल्लट) 'स्व- स्वभावव्योम्नि निवृत्ताधिकाराः प्रलीयन्ते' (का० २७) (कल्लट) । 'तेन तथाविधेन सर्वात्मकेन स्वभावेन' (स्पन्दसर्वस्वः का २९) । 'एवं स्वभावं यस्य चित्तं यथा—मन्मयमेव जगत् सर्वम् (स्पन्दसर्वस्व का० ३०) 'तादात्म्यं' तत्स्वभावत्वप्राप्तिः मन्त्रदेवतया सह साधकस्य (स्पं० वृत्तिः कल्लटः का० ३१) 'यथास्यानभिव्यक्तस्वरूपस्य योगिनो (स्पन्द० वृत्तिः कल्लटः का० ३३) 'स्वरूप- स्थित्यभावे स्वतन्त्रा स्यात् स्वप्ने आलबिड़ाल दर्शनरूपा सृष्टिः' (वृत्ति-कल्लटः का० ३५) 'स्वबलं स्वस्वरूपमाश्रित्यस्याचिरेणैव कालेन प्रतिभाति (स्पन्दवृत्ति—कल्लटः का० ३७) 'उद्योगबलेन तथानेन स्वभावानुशीलनेन' (वृत्तिः कल्लटः का० ३८) 'अनेन आत्मस्वभावेन अधिष्ठिते' (वृत्तिः कल्लटः का० ३९) 'यस्मात् स्वभावात् झगित्यन्या चिन्तोत्पद्यते, (वृत्तिः कल्लटः का ४१) ककाराद्यक्षरैर्विलुप्तविभवस्वभावात् प्रच्यवितः पशुरुच्यते' (का० ४५: वृत्तिः कल्लट) 'परामृतरसात् स्वरूपात् अपायः प्रच्युतिः (वृत्तिः कल्लट का० ४६)— स्वरूपावरणे चास्य शक्तय सततोत्थिताः । यतः शब्दानुवेधेन न विना प्रत्ययोद्भवः ।। (का० ४७) 'स्वरूपस्य स्वभावस्याच्छादने चास्य पुरुषस्य' (वृत्तिकल्लट का० ४७) 'निरावरण- स्वस्वरूप संवित्तिः' (वृत्ति का० ३२)—भट्टकल्लट के स्पन्दसर्वस्व ('वृत्ति') से दिये गए उदाहरणों से स्पष्ट है कि भट्टकल्लट ने 'स्वरूपस्पन्द' में प्रयुक्त 'स्वरूप' शब्द को स्वभाव, स्वस्वभाव, संवित्, शिव एवं आत्मा के अर्थ में ही प्रयुक्त किया है। चूँकि प्रथम निष्यन्द इसी स्वस्वरूपभूत आत्मचैतन्य का प्रतिपादक है अतः इसका नामकरण भी 'स्वरूपस्पन्द' किया गया ।। (उन्मेष-निमेष एवं निष्पंद शब्दों का प्रयोग—का० क्र० १, उन्मेष (का० ४०) (उन्मेषेण आत्मस्वभावेन'—वृत्ति का० ४०); का० ४२ (उन्मेषात् अनुशीलयमानात्ः वृत्तिः का० ४२) 'निष्यन्दाः प्रवाहाः' (का० १९) ।। प्रथम निष्यन्द स्वरूपस्पन्द का निष्यन्द (प्रवाह) है । स्वरूपस्पन्द—स्पन्द के दो रूप है—१. सामान्य २. विशेष ।

१६ स्पन्दकारिका 'गुणादिस्पन्दनिष्यन्दः सामान्यस्पन्दसंश्रयात्' । (का० १९) १. प्रतिष्ठित स्पन्द २. अप्रतिष्ठित स्पन्द ॥ (प्रतिष्ठित स्पन्द सामान्य, अप्र० = विशेष) । (क) अप्रतिष्ठित स्पन्द—एकत्व में अवभासित अनन्त वैचित्र्यात्मक पदार्थ एवं पदार्थाक जगत् ॥ (माया तत्त्व से पृथ्वी तत्त्व पर्यन्त प्रसृत ।) एकत्व से निःसृत अनेकत्व । 'सामान्य स्पन्द' प्रतिष्ठित एवं 'विशेष स्पन्द' 'अप्रतिष्ठित स्पन्द' कहलाते हैं। नानात्मक विश्ववैचित्य में जो एकता की इकाई है वही सामान्य स्पन्द है। 'गुणादिस्पन्द' = 'विशेष स्पन्द' हैं। 'सामान्य स्पन्द' से विशेष स्पन्द = गुणादि स्पन्द का प्रादुर्भाव ॥ 'स्पन्दनिष्यन्द' क्या हैं? नानारूपात्मक एवं प्रवहमान स्पन्द धारायें ही स्पन्द के निष्यन्द हैं। 'स्पन्द' समुद्र है और निष्यन्द उसकी अनन्त ऊर्मियाँ हैं। जड़चेतन विश्व का प्रत्येक पदार्थ एक सर्वव्यापी एवं नित्य स्पन्दशक्ति का एक प्रवाह है। शाश्वतस्पन्दनशीला- पारमेश्वरी सामान्यस्पन्द का रत्नाकरविशेष स्पन्दों के निष्यन्द (या स्पन्द-प्रवाह) गुणत्रय के स्पन्दों के असंख्य प्रवाहों का मूल सामान्यस्पन्द है। (का० १९)। विशेष स्पन्द—प्रतिक्षण पशुओं के अन्तस् में विद्यमान चिन्मात्रता पर आवरण डालते रहते हैं (का० २०)। भावों की उत्तरोत्तर सर्जना करते रहना स्पन्द शक्ति का स्व- भाव है। विश्व के सारे रूप शक्ति या स्पन्द के ही रूप हैं। शक्ति की सामान्यभूमिका (पशुपति की दशा में)—चित्, आनन्द, इच्छा, ज्ञान, क्रिया। शक्ति की पशुदशा—(विशेष भूमिका) : अन्तःकरण, इन्द्रियाँ, एवं अनन्त प्रमेयों के रूप में प्रवाहित। स्वातंत्र्य शक्ति—प्रपञ्च। एक ही पारमेश्वरी स्पन्द शक्ति है किन्तु स्वातंत्र्यशक्ति के द्वारा इच्छा, ज्ञान, क्रिया एवं अनन्त प्रमेयों, प्रमाताओं के रूप में तथा विराट् प्रपञ्च के रूप में प्रवहमान है। 'स्पन्द' किंचित् चलन = स्वतन्त्ररूप में निरपेक्ष स्फुरण। स्पन्द या स्फुरण न हो तो सब कुछ जड़ हो जाय। विमर्शात्मक स्फुरण ही सब का मूल केन्द्र है। विमर्शात्मक स्पन्द के प्रसार के भेद 'स्पन्द तत्त्व' की अवस्थायें स्पन्द के दो रूप स्पन्दतत्त्व [ कर्ता, भोक्ता, द्रष्टा, वेदक ] [ कार्य, भोग्य, दृश्य, वेद्य ] [ सामान्य स्पन्द प्रतिष्ठित स्पन्द ] [ विशेष स्पन्द अप्रतिष्ठित स्पन्द ] स्पन्द शक्ति की द्विमुखी गतिमयता अन्तर्मुख स्पन्द बहिर्मुख स्पन्द

प्रथमः निष्यन्दः १७ स्पन्द तत्त्व के विभिन्न पक्ष एवं स्वरूप [ शिव तत्त्व ] [ विमर्शात्मिका शक्ति स्वात्मोच्छलन नित्य कम्पनशीलता ] [ अनुत्तर तत्त्व की सृष्टि हेतु सकलात्मक चलता, गतिमयता, (स्फुरण) ] [ शिव का 'अहं प्रत्यविमर्श' = 'पूर्ण अहं विमर्श' ] [ किंचित् चलता सिसृक्षा की दिशा में संकल्पात्मक स्फुरण या उन्मुखता ] [ संवित् के समुद्र की तरंग अहं विमर्शात्मक स्फुरण ] स्पन्दनं—निस्तरंगस्यास्य तावत् परमात्मनः युगपन्निर्विकल्पा या सर्वत्रौन्मुख्य- वृत्तिता ॥—उत्पलाचार्य । यत् परापरभूपस्पर्शि यत्संकल्पाल्ल्योदयौ । स्पन्दसंज्ञं झरूपं तत् शक्तीशं स्वलं नुमः ॥ —उत्पलाचार्य । १. अनुत्तर मूर्ति शिव में, अपनी इच्छाशक्ति द्वारा, जगत् का सृजन करने की जो इच्छा उत्पन्न होती है उससे समुत्पन्न कम्पन ही 'स्पन्द' है— 'यदयमनुत्तरमूर्तिर्निजेच्छया जगदिदं स्रष्टुम् । पस्पन्दे स स्पन्दः .... .... .... ॥ (ष०ल०सं०) शिव के सिसृक्षा का संकल्पात्मक कम्पन = 'स्पन्द' है। निस्तरंग परमात्मा में जो एक साथ सर्वरूप से उन्मुख होने की योग्यता है वही किंचित् चलन है। 'स्पदि किंचिच्चलने' धातु से 'स्पन्द' शब्द निष्पन्न हुआ है। 'स्पन्द शक्ति' उच्छलनात्मक है। २. 'स्पन्दकारिका'—'अतिक्रुद्धः प्रहृष्टो वा किं करोमीति वा मृशन् । धावन्वा यत् पदं गच्छेत्तत्र 'स्पन्दः' प्रतिष्ठितः ॥ २२ ॥ ३. 'स्पन्द' और 'निष्यन्द'—सतोगुण, रजोगुण एवं तमोगुण, महत्तत्व, अहंकार के जो स्पन्द हैं उन्हीं के निष्यन्द (प्रवाह) हैं—सुख, दुःख, मोह आदि की तरंगे । 'गुणादिस्पन्दनिष्यन्दाः सामान्यस्पन्दसंश्रयात् ॥ १९ ॥ ४. भट्टकल्लट—अत्यन्त क्रोधी होने, हर्षित होने, अकस्मात् दौड़ पड़ने, अकस्मात् 'मैं क्या करूँ?' इस प्रकार की चिन्ता में पड़ जाने पर जब किसी व्यक्ति के अन्तस् में शक्तिप्रत्यस्तमित दशा का उदय हो जाता है तब उस क्षणिक अवधान में स्पन्द तत्त्व का स्पष्ट रूप में उदय हो जाता है— 'तस्य च स्पन्दतत्त्वस्य अतिक्रुद्घे प्रहृष्टे धावमाने च किं करोमि इत्येवं चिन्ता- विशिष्टे यदा शक्तिप्रत्यस्तमयः तदा स्पन्दतत्त्वस्य स्फुट एवोदयो ।' १. परतत्त्व में विश्वात्मक चेतना के रूप में नित्यावस्थित शक्ति ही—'स्पन्द शक्ति' है । २. अहं विमर्शात्मिका शक्ति ही स्पन्द है । स्पं० २

१८ स्पन्दकारिका ३. 'विमर्श' प्रकाश का स्पन्दन है। 'प्रकाश' में स्पन्दन (प्राणभूत तत्त्व) न हो तो प्रकाश की सत्ता ही नष्ट हो जाएगी। 'स्पन्दन' ही शिव की 'स्वातन्त्र्य शक्ति' है। 'स्पन्द शक्ति' की द्विमुखी गतिमयता अन्तर्मुख स्पन्द बहिर्मुख स्पन्द त्रिक् दर्शन [प्रत्यभिज्ञादर्शन प्रकाश पक्ष पर बल] [स्पन्ददर्शन पर तत्त्व के विमर्श पक्ष पर बल] १. पर तत्त्व के प्रकाश पक्ष का १. विश्वमयता में ही परतत्त्व के प्राधान्य विश्वातीत रूप में पूर्णतमा का दर्शन। परतत्त्व का प्रकाशन। २. प्रत्यभिज्ञा दर्शन। २. स्पन्ददर्शन। ३. सोमानन्द। ३. भट्टकल्लट। शक्ति-विशिष्ट शङ्कर की वन्दना यस्योन्मेषनिमेषाभ्यां जगतः प्रलयोदयौ। तं शक्तिचक्रविभवप्रभवं शङ्करं स्तुमः ॥ १ ॥ जिनके उन्मेष एवं निमेष से प्रलय एवं सृष्टि हुआ करते हैं (हम) उस शक्ति-समूह के वैभव के आदि कारणभूत (स्रष्टा) शङ्कर की स्तुति करते हैं। ❉ सरोजिनी ❉ 'यस्य'—जिसके। अर्थात् जिस विश्व-स्रष्टा एवं विश्व-संहर्ता शिव के। 'उन्मेष' = नेत्रोन्मीलन। 'निमेष'—नेत्र-निमीलन॥ 'जगतः'—विश्व का। 'प्रलयोदयौ' = विश्व-संहार रूप प्रलय एवं उदयरूप विश्व-सृष्टि। 'तं' = उनको। 'शक्तिचक्रविभव- प्रभवं' = शक्तिसमूह के वैभव को उत्पन्न करने वाले (शिव) को॥ 'शङ्करं' = कल्याण करने वाले, भगवान् शिव को। 'स्तुमः'—स्तवन करते हैं। विशेषार्थ—'उन्मेष' एवं 'निमेष'—भगवान् शिव का चक्षु उन्मीलन ही 'सृष्टि' है एवं उनका नेत्रोन्मीलन ही 'प्रलय' है। नेत्रोन्मीलन ही 'उन्मेष' है और 'निमीलन' ही प्रलय है।

प्रथमः निष्यन्दः १९ १. सांख्यदर्शन का मत है कि 'पुरुष के दर्शन एवं प्रधान के कैवल्य के लिए पंगु एवं अंधे (पुरुष-प्रकृति) का संयोग होने से जो क्रिया होती है उसी का नाम सृष्टि है।'—अर्थात् पंग्वंध-सम्बन्ध-जन्य व्यापार ही सृष्टि है । 'पुरुषस्य दर्शनार्थं कैवल्यार्थं तथा प्रधानस्य । पंग्वंधवदुभयोरपि संयोगस्तत्कृतः सर्गः ॥'१ २. 'अजातिवाद'—आचार्य गौड़पाद तो यह मानते हैं कि—'कोई जीव उत्पन्न ही नहीं होता । उसके जन्म की संभावना ही नहीं है । उत्तम सत्य तो यही है कि जिसमें किसी वस्तु की उत्पत्ति ही नहीं होती । 'न कश्चिज्जायते जीवः संभवोऽस्य न विद्यते । एतत्तदुत्तमं सत्यं यत्र किंचिन्न जायते ॥'२ आचार्य शङ्कर भी कहते हैं कि—'व्यवहारतः तो जीवों का जन्ममरण तो है किन्तु वह स्वप्नवत है किन्तु परमार्थतः किसी भी जीव की उत्पत्ति नहीं होती—'व्यवहार- सत्यविषये जीवानां जन्ममरणादि स्वप्नादिजीववदित्युक्तम् । उत्तमं तु परमार्थसत्यं न कश्चिज्जायते जीव इति ।'३ ३. न्यायशास्त्र का मत है कि परमेश्वर की सिसृक्षा के अनुसार लब्धवृत्तिक अदृष्टवाली आत्मा के संयोग से परमाणुओं में क्रिया होने पर दो परमाणुओं में परस्पर- संयोग से 'द्वयणुक' उत्पन्न होता है, तीन द्वयाणुकों से 'त्र्यणुक', चार त्र्यणुकों से 'चतुर- णुक', पाँच चतुरणुकों के संयोग से 'पञ्चाणुक' छः पञ्चाणुकों के संयोग से 'षडणुक' उत्पन्न होते हैं । इस प्रकार अवयवों के संयोग से अवयावियों का उत्पाद होते-होते पृथ्वी, जल, तेज, वायु आदि पञ्चभूत एवं पञ्चभूतों से समस्त जगत् की उत्पत्ति होती है ।४ ४ 'सृष्टि' = 'सृष्टि' भगवान् की विभूति है—विभूतिं प्रसवं मन्दे । ५. 'सृष्टि' = सृष्टि स्वप्न या माया है— स्वप्नमायास्रूपेति सृष्टिरन्यैर्विकल्पिताः॥ ६. 'सृष्टि' 'सृष्टि' परमात्मा की इच्छामात्र है । 'इच्छामात्रं प्रभोःसृष्टिरिति सृष्टौ विनिश्चिताः ॥' ७. 'सृष्टि' = 'सृष्टि' काल की प्रसूति है । 'कालात्प्रसूतिं भूतानां मन्यन्ते काल चिन्तकाः ॥' ८. 'सृष्टि' = 'सृष्टि' भोग है क्योंकि 'भोगार्थं सृष्टिरित्यन्ये' । ९. 'सृष्टि' = 'सृष्टि' क्रीड़ा है—'क्रीडार्थमिति चापरे' ॥ १०. 'सृष्टि' = 'सृष्टि' आप्तकाम देव का 'स्वभाव' है ।५ १. सांख्यकारिका । २. माण्डूक्योपनिषद् (अलातशान्तिप्रकरण)। ३. माण्डूक्योपनिषद् (माण्डूक्यकारिका शां० भाष्य का० ७१)। ४. तर्कभाषा । ५. आगमप्रकरण (माण्डूक्यकारिका) : गौड़पादाचार्य ।

२० स्पन्दकारिका ११. 'सृष्टि' = 'सृष्टि' ब्रह्म का परिणाम है । (रामानुजाचार्य)१ १२. 'सृष्टि' = 'सृष्टि' ब्रह्म का 'विवर्त' है (आचार्य शङ्कर)२ १३. 'सृष्टि' = 'सृष्टि' शक्ति एवं शक्तिमान का 'आभास' है ।३ १४. 'सृष्टि' = 'सृष्टि' परमात्मा का 'प्रतिबिम्ब' है ।४ (क) संकुचित रूप से प्रकाशन ही 'आभास' है—'आभासनं—आ ईषत् संकोचेन भासनं प्रकाशना' ।५ (ख) प्रतिबिम्ब ही आभास है—'भासनसारतैव हि प्रतिबिम्बता'६ विमर्शात्मक प्रकाशरूपी दर्पण में अनतिरिक्त होते हुए भी अतिरिक्त के समान जड़चेतन समग्र जगत् का प्रतिबिम्बन 'आभास' है । विमर्शात्मक प्रकाशपुरुष का अपूर्ण आत्मप्रकाशन ही आभास है । १५. 'सृष्टि' = सृष्टि 'स्वातन्त्र्य' का विजृंभण है । परमात्मा की इच्छा का अनभिहत प्रसार ही उसका 'स्वातन्त्र्य' है—'स्वातन्त्र्यं च नाम यथेच्छं तत्रेच्छाप्रसरस्य अविघातः ।।'७ १६. 'सृष्टि' = सृष्टि भगवती चिति शक्ति का रूपान्तर है, स्फार है, क्योंकि वह उनसे किंचिन्मात्र भिन्न नहीं है—'ननु जगदपि चितो भिन्नं नैव किंचित' क्योंकि भगवती चित् शक्ति ही जगत् के रूप में स्फुरित होती है—'चिदेव भगवती स्वच्छस्वतन्त्ररूपा तत्तदनन्त जगदात्मना स्फुरति ।'८ १७. 'सृष्टि' = शिवादि धरण्यन्त यह निःशेष सृष्टि शिव से अभिन्न है और शिव इसी अनन्त एवं विराट् विश्व के रूप में ही स्फुरित हुआ करते हैं—'श्रीमत्परमशिवस्य पुनः विश्वोत्तीर्ण विश्वात्मक परमानन्दमय प्रकाशैकघनस्य एवंविधमेव शिवादि धरण्यन्तं अखिलं अभेदेनैव स्फुरति न तु वस्तुतः अन्यत् किंचित ग्राह्यं ग्राहकं वा ।।९ इसीलिए भगवान् को 'विश्वशरीर' कहा गया है—'एवं भगवान् विश्व शरीरः', 'विश्वशरीरः शिव- भट्टारक एव' क्योंकि विश्व एवं शिव में—एकात्म्य है—तादात्म्य है दोनों में स्वात्मैक्य है—'श्री परमशिवः स्वात्मैक्येन स्थित विश्व (प्र०हृ०)। १८. 'यस्योन्मेषनिमेषाभ्यां' 'जगतः प्रलयोदयौ'— (क) 'उन्मेष' = उदय । 'निमेष' = प्रलय । (ख) उन्मेष = सृष्टि (ख) 'निमेष' = प्रलय । (क) 'उन्मेष' = उन्मीलन (ख) 'निमेष' = निमीलन ।। प्रश्न उठता है कि कारिकाकार ने 'सृष्टि' एवं 'प्रलय' शब्द का प्रयोग न करके उन्मेष-निमेष, उदय- प्रलय का प्रयोग क्यों किया ? १. रामानुजाचार्य—'श्रीभाष्य' । २. शंकराचार्य—'शारीरकभाष्य' । ३. त्रिकदर्शन । ४. वेदान्ती एवं अद्वैतवादी शैव-शाक्त । ५. ईश्वरप्रत्यभिज्ञाविमर्शिनी । ६. अभिनवगुप्तपादाचार्य । ७. ई०प्र०वि० । ८. प्रत्यभिज्ञाहृदयम्, (क्षेमराजाचार्य) । ९. प्रत्यभिज्ञाहृदयम् ।

प्रथमः निष्यन्दः २१ 'त्रिक दर्शन' की मान्यता यह है कि 'सृष्टि' तो किसी ऐसी वस्तु की हो सकती है जो कभी पूर्व में अस्तित्व में न रही हो । सृष्टि का अर्थ है—किसी नव्य वस्तु का जन्म । चूँकि 'शिव' एवं शक्ति से पृथक् कोई भी नव्य वस्तु कल्पित ही नहीं की जा सकती क्योंकि शिव एवं शक्ति के अतिरिक्त अन्य की सत्ता ही नहीं है । अतः किसी भी पदार्थ का जन्म संभव नहीं है । इसी दृष्टि से कारिकाकार ने सृष्टि एवं प्रलय को 'उन्मेष' एवं 'निमेष' कहा तथा 'सृष्टि' को सृष्टि न कहकर 'उदय' कहा । सूर्य का प्रतिदिन उदय तो होता है किन्तु इस उदय को सूर्य का जन्म कोई नहीं कहता । किसी पूर्व विद्यमान किन्तु तिरोहित वस्तु का प्रकाश में पुनः आना ही 'उदय' है । कारिकाकार ने 'संहार' न कहकर 'प्रलय' कहा क्योंकि 'संहार' विनाश का सूचक है । चूँकि 'शिव' एवं 'शक्ति' का संहार संभव नहीं है अतः उनसे अभिन्न जगत् का भी संहार (विध्वंस । विनाश । सत्ता का मूलोच्छेद) भी कभी संभव नहीं है । इन्हीं कारणों से कारिकाकार ने यहाँ 'प्रलय' शब्द का प्रयोग किया जिसका अर्थ है—'प्रकृष्टेन लयः' 'कार्य' का 'कारण' में लय अर्थात् वस्तु का बीजात्मना अवस्थन 'संहार' तो नहीं है किन्तु 'प्रलय' हो सकता है । 'प्रलय' संहार एवं विनाश नहीं है प्रत्युत् अपने मूल में अवस्थान है । आचार्य क्षेमराज कहते हैं कि कतिपय विद्वान् 'यस्योन्मेषनिमेषाभ्यां' पदों की व्याख्या इस प्रकार करते हैं— (१) स्वस्वरूप-प्रकाशन = 'उन्मेष' : जगत् की सृष्टि (२) स्वरूप-गोपन = 'निमेष' : जगत् का विनाश अन्य विद्वान् (क्षेमराज के कथनानुसार) 'उन्मेष' एवं 'निमेष' को कादाचित्क मानते हैं । वे कहते हैं कि 'उन्मेष-निमेष' की प्रथम व्याख्या संगत नहीं है क्योंकि कादाचित्क जगत् के उदय एवं नाश के हेतु नित्य भगवान् में कैसे रह सकते हैं? अतः जगत् के कारण के उन्मेष एवं निमेष धर्मक होने के कारण एक ही भगवच्छक्ति उन्मेष- निमेष शब्दद्वय द्वारा व्यवहृत की जा सकती है । 'उन्मेष निमेष' = भगवच्छक्ति । अतः उस शक्ति के 'उन्मेष' से जगत् का 'उदय' होता है एवं उस शक्ति के निमेष से प्रलय होता है— १. पराशक्ति का उन्मेष—जगत् का उदय । २. पराशक्ति का निमेष—जगत् का प्रलय । 'स्पन्दसन्दोह' में क्षेमराज कहते हैं कि 'यह विभागरहित, एकात्मिका विमर्श भूमि उन्मेषनिमेषामयी है और इसे उन्मेष-निमेष के नामों से पुकारा जाता है—'एवं इयं एका एव अविभगा विमर्शभूमिः उन्मेषनिमेषमयी उन्मेषनिमेषशब्दाभ्यामभिधीयत ॥१ यहाँ 'उन्मेष' एवं निमेषमय की, निमेष एवं उन्मेषम की—प्राधान्येतरताविभक्त धरणी आदि सदाशिवान्त जगत् के प्रति प्रलयोदय हेतुत्व की व्याख्या की गई है ।२ 'प्रलयोदयौ' = 'प्रलयौ च उदयौ च प्रलयोदयौ' २ ॥ नीलादिक की बहिरूपता जो १. क्षेमराज—'स्पन्दनिर्णय' । २. 'स्पन्दसन्दोह' ।

२२ स्पन्दकारिका 'उदय' है वही अहन्तारूपता का 'प्रलय' है और जो बहीरूपता का प्रलय है वही अहन्तारूपता का 'उदय' है अतः 'प्रलयोऽपि उदयरूपः उदयोऽपि प्रलयपरमार्थः' इस विषय में 'भेदाभेद प्राधान्येतरता कृतस्तु अत्र विवेकः ।' १ वस्तुतः चिदात्मा ही उस प्रकार प्रकाशित होती है । यहाँ अक्रमता की बात कही गई है । २ 'स्पन्दनिर्णय' में आचार्य क्षेमराज ने निमेष-उन्मेष की इस प्रकार व्याख्या की है—'चिदानन्दघनस्य उन्मेषनिमेषाभ्यां स्वरूपोन्मीलननिमीलनाभ्यां मज्जनोन्मज्जने ।' ३ 'उन्मेष-निमेष'—'उन्मीलन'-'निमीलन', मज्जन उन्मज्जन ।' 'स्पन्दसंदोह' में कहा गया है कि सदाशिवादिक्षितिपर्यन्त प्राक्सृष्ट तत्त्वग्राम की सत्ता संहारापेक्षा में 'निमेष' एवं सिसृक्षा की अपेक्षा से 'उन्मेष' कही जाती है—'सदा- शिवादि क्षितिपर्यन्तस्य तत्त्वग्रामस्य प्राक्सृष्टस्य या संहारापेक्षया निमेषभूः सैव स्रक्ष्य- माणभेदापेक्षया उन्मेषदशा ॥' ४ प्राक्सृष्ट तत्त्वग्राम की भेदसंहाररूपा जो 'निमेष' दशा है वही चिदभेदप्रथा 'उन्मेष' कहलाती है 'प्राक्सृष्ट भेदसंहररूपा च या निमेषदशा सैव चिदभेदप्रथाया उन्मेषभूः ।' ५ 'भेदासूत्रण रूप जो 'उन्मेष दशा' है वही चिदभेद प्रथा की 'निमेष दशा' है—भेदा- सूत्रणरूपा च या उन्मेषदशा सैव चिदभेदप्रथाया निमेषभूः ॥' ६ भेदासूत्रणात्मक दशा 'उन्मेष' है और चित्तत्व से अभिन्न दशा 'निमेष' है । आचार्य क्षेमराज का कथन है कि 'यस्योन्मेषनिमेषाभ्यां...स्तुमः' श्लोक में वसुगुप्त ने शिव के प्रथम सूत्र 'चैतन्यमात्मा' (१।१) की व्याख्या की है—क्षेमराज कहते हैं—'तत्र आद्यमेव सूत्रं विमृश्यते ।' वे कहते हैं—परमाद्वय प्रकाशानन्दमय महेश्वर स्वरूप प्रत्यभिज्ञापनाय—समस्त शास्त्रगर्भा समुचितां-स्तुतिम् इमाम् उपदिदेश श्रीमान् वसुगुप्त गुरुः—'यस्योन्मेष... स्तुमः ।' आचार्य क्षेमराज के उपर्युक्त कथन से यह भी सिद्ध होता है कि 'स्पन्दकारिका' का प्रथम श्लोक वसुगुप्त-प्रणीत है अतः 'स्पन्दकारिका' का प्रणयन वसुगुप्त ने ही किया है । 'स्पन्दनिर्णय' में क्षेमराज कहते हैं कि वसुगुप्ताचार्य ने शिवसूत्रों की सामग्री के आधार पर ही 'स्पन्दकारिका' का प्रणयन किया । इससे यह भी सिद्ध होता है कि काश्मीरीय त्रिकनय में 'स्पन्ददर्शन' ही केन्द्र में है एवं 'स्पन्ददर्शन' का मूल ग्रन्थ 'शिवसूत्र' है तथा उसके अनन्तर स्पन्दशास्त्र का आद्यग्रन्थ 'स्पन्दकारिका' है । 'शिवसूत्र' का प्रथम सूत्र—'चैतन्यमत्मा' । ७ 'स्पन्दकारिका' का प्रथम श्लोक— 'यस्योन्मेषनिमेषाभ्यां जगतः प्रलयोदयौ । तं शक्तिचक्रविभवप्रभवं शङ्करं स्तुमः ॥' ८ १-२. स्पन्दसन्दोह । ३. क्षेमराज—'स्पन्दनिर्णय' । ४-६. स्पन्दसन्दोह । ७. शिवसूत्र । ८. स्पन्दकारिका ।