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स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)

Spanda Nirnaya of Acharya Kshemaraja with Hindi Commentary

आचार्य वसुगुप्त / क्षेमराज द्वारा

DevanagariHindipublished519 पृष्ठ

१६० स्पन्दकारिका 'माया' के पुत्र— १) जीव २) ईश्वर (पंचदशी : विद्यारण्य) (मायाख्यायाः कामधेनोर्वत्सौ जीवेश्वरौ उभौ ।।' (पंचदशी) 'ईश्वर' = मायाबिम्बो वशीकृत्य तां स्यात् सर्वज्ञ ईश्वर । 'जीव' = चैतन्यं यदधिष्ठानं लिंगदेहश्च यः पुनः । चिच्छाया लिंगदेहस्था तत्संघो जीव उच्यते ।। (पंचदशी) जीव— १) लिंगदेह का आधाराधिष्ठान चैतन्य । २) लिंगदेह ३) लिंगदेह में अवस्थित चिदाभास इन तीनों का संघ = 'जीव' १) कूटस्थ में बुद्धि कल्पित है । २) उस बुद्धि में जो चेतन का प्रतिबिम्ब है वह जब प्राणों को धारण कर लेता है वही 'जीव' है । १) विज्ञानमयकोशोऽयं 'जीव' इत्यागमा जगुः ।। (पंचदशी) २) अन्तःकरण संभिन्नो बोधो जीवोऽपरोक्षताम् । (पंचदशी) 'परमात्मा' की चार अवस्थायें हैं (पंचदशी)— 'चित्' 'अन्तर्यामी' 'सूत्रात्मा' 'विराट्' (धौत) (घट्टित) (लांछित) (रंजित) पट के समान ।। चैतन्य के चार भेद (पंचदशी)— कूटस्थ ब्रह्म जीव ईश्वर 'कूटस्थो ब्रह्म जीवेशावित्येवं चिच्चतुर्विधा ।।' 'ईश्वर' = 'चित्सन्निधौ प्रवृत्तायाः प्रकृतेर्हि नियामकम् । ईश्वरं ब्रुवते योगाः स जीवेभ्यो परः श्रुतः ।।' चिदाभास की अवस्थायें— अज्ञान आवरण विक्षेप परोक्षज्ञान अपरोक्षज्ञान शोकराहित्य निरंकुश तृप्ति अज्ञान की शक्ति असत्त्वापादक अभानापादक (वह नहीं है) (वह मुझे प्रतीत नहीं होता) असत्वा- अभानावणा की शक्ति (विद्याख्य) वरण की शक्ति (अपरोक्षज्ञान से (परोक्ष ज्ञान से निवृत्ति) निवृत्त)

प्रथमः निष्यन्दः १६१ उपादान जीव (चैतन्य) (चैतन्य के स्थान) ┌───┼───┐ ┌───┬───┬───┐ विवर्त परिणाम आरंभ नेत्र में कण्ठ में हृदय में ब्रह्म में (जाग्रति) (स्वप्न) (सुषुप्ति) (तुरीय) 'जीव' = अन्तःकरण का साहित्य ॥ 'ईश्वर' = अन्तःकरण का साहित्य ॥ परमपद परम पद का स्वरूप क्या है?—'स्यात् परमं पदम्'— १) यजुर्वेद—तत्त्वद्रष्टा ऋषिमूनि विष्णु के परम पद का सर्वदा साक्षात्कार करते हैं—ओ३म् तद्विष्णोः परमं पदं सदा पश्यन्ति सूरयः । दिवीव चक्षुराततम् ॥' २) परमाकाश परम व्योम का ही अभिधानान्तर 'परमपद' है । ३) मन्त्रलयोपरान्त सुषुम्ना में नादात्मक प्रणवानुभूति या अनवरत नादश्रवण से उत्पन्न होने वाला विराट् या परमाकाश ही 'परमपद' है । ४) निरालम्बोपनिषद् में कहा गया है कि—'प्राण' इन्द्रिय आदि एवं अन्तः- करण के गुणादिक के परे सच्चिदानन्दन्य नित्य, मुक्त परब्रह्म ध्यान ही 'परमपद' है— 'परमंपदमिति च प्राणेन्द्रियाद्यन्तः करणगुणादेः परतरे सच्चिदानन्दमयं नित्यमुक्तब्रह्मस्थानं परमं पदम् ॥ ५) ध्यानबिन्दूपनिषद् के मतानुसार—'शब्द के साथ अक्षर नाद के क्षोभ होने पर उत्पन्न शब्द शून्यावस्था की स्थिति ही 'परमपद' है— 'बीजाक्षरं परं बिन्दुं नादं तस्योपरि स्थितम् । सशब्दं चाक्षरे क्षीणे निःशब्दं परमं पदम् ॥' ६) मैत्रायणी उपनिषद् के अनुसार 'लय विक्षेप-शून्य मन को सम्यक् रूप से स्थिर करके जो अमनी भाव का उदय होता है वही 'परमपद' है—लय विक्षेपरहितं मनः कृत्वा सुनिश्चितम् । यदा यात्यमनीभावं तदा तत्परमं पदम् ॥ (मैत्रायणी उप० ६-३४) ७) तेजोबिन्दूपनिषद् में कहा गया है कि परम गोपनीय अस्तन्द्र निराश्रय सोमरूप सूक्ष्मा कला ही विष्णु का 'परमपद' है— परमं गुह्यतमं विद्धि ह्यस्तन्द्रो निराश्रयः । सोमरूपकला सूक्ष्मा विष्णोस्तत्परमं पदम् ॥ (१.५) ८) श्रीमद्भागवत पुराण में कहा गया है कि— क) निश्चल चित्त से एक-एक अवयव का ध्यान करना चाहिए । ख) मन को विषय-शून्य बनाकर विषय-शून्य मन का उससे योग करना चाहिए । स्पं० ११

१६२ स्पन्दकारिका ग) तदुपरान्त चित्त में किसी भी विषय का चिन्तन या अनुस्मरण नहीं करना चाहिए। घ) वही आन्तर स्थिति विष्णु का परमपद है जहाँ पहुँचकर मन अत्यन्त आह्लादित हो उठता है— तत्रैकावयवं ध्यायेदव्युच्छिन्नेन चेतसा। मनो निर्विषयं युक्त्वा ततः किञ्चन न स्मरेत् ॥ पदं तत्परमं विष्णोर्मनो यत्र प्रसीदति ॥ (भागवत २-१-१९) ९) ध्यानबिन्दूपनिषद् में कहा गया है कि 'जो मन प्रपञ्च की सृष्टि' स्थिति एवं लय का विधान करता है उस मन का जहाँ विलय होता है वही विष्णु का परम पद है। 'यन्मनस्त्रिजगत् सृष्टिस्थितिव्यसनकर्मकृत् । तन्मनो विलयं याति तद्विष्णोः परमं पदम् ॥ (ध्यान० २५) १०) 'हठयोगप्रदीपिका' में कहा गया है कि गंगा एवं यमुना इड़ा पिंगला के मध्य में स्थित बालखण्डा तपस्विनी का बलात्कारपूर्वक ग्रहण भी विष्णु का 'परमपद' है— गंगा यमुनोर्मध्ये बालखण्डां तपस्विनीम् । बलात्कारेण गृह्णीयात् तद्विष्णोः परमं पदम् ॥ ११) 'घेरण्डसंहिता' में कहा गया है कि—'अनाहत शब्द की जो विशिष्ट ध्वनि होती है उस ध्वनि के अन्तर्गत ज्योति है। उस ज्योति के अंतर्गत जो मन है वह मन जहाँ विजय प्राप्त करता है वह आस्पद ही विष्णु का 'परमपद' है— अनाहतस्य शब्दस्य तस्य शब्दस्य यो ध्वनिः । ध्वनेरन्तर्गतं ज्योति ज्योतिरन्तर्गतं मनः । तन्मनो विलयं याति तद्विष्णोः परमं पदम् ॥ आचार्य जयरथ तन्त्रालोक की टीका 'विवेक' में कहते हैं— 'अन्तर्लक्ष्यो बहिर्दृष्टिः परमं पदमश्नुते ॥' अन्तर्लक्ष्य एवं बहिर्दृष्टि रखने वाले योगी 'परमपद' प्राप्त करते हैं। वे व्यवहार- परायण रहकर भी स्वात्ममात्र में विश्रान्ति सुख की अनुभूति प्राप्त करते हैं अतः स्पष्ट है कि योगी भेदावस्था में भी अभेद भावना-स्वरूपात्मक स्थिति-प्राप्त करता है— बहिस्तत्तद्व्यवहारपरत्वेऽपि स्वात्ममात्रविश्रान्त्या परं परं चमत्कारातिशयमनु- भवन्ति ॥१ परम पद—'अन्तः अहंपरामर्शात्मनि संवित्त्वे सावधानो बाह्यविषयासंगेऽपि स्वरूपपरामर्शपरत्वात् भैरवमुद्रानुपविष्टो योगी 'परं पदमश्नुते' विमर्शदशामधिशेते ॥'२ भैरवमुद्रानुपविष्ट योगी परमपद या विमर्श दशा प्राप्त करता है। १. जयरथ-'विवेक' (तन्त्रालोक की टीका) (आ०५)। २. तन्त्रालोक (आ०५)—'विवेक' श्लोक ८० ।

प्रथमः निष्पन्दः १६३ ‘नेत्रतन्त्र’ (प्रथमपटल) में शिव कहते हैं— स्वं स्ववीर्यं स्वसंवेद्यं ममैव परमं पदम् ।१ तद्वीर्यं सर्ववीर्याणां तद्द्रैबलवतां बलम् ॥ (नेत्रतन्त्रः १।२४) बौद्धों का परमपद—बुद्धितत्त्व में स्वामित्व की भूमिका का निर्वाह ब्रह्मा करते हैं—बौद्धों का यही मोक्ष है—यही परम पद है— ब्रह्मा तत्राधिपत्येन बुद्धितत्त्वे व्यवस्थितः । सर्वज्ञ च तमेवाहुर्बौद्धानां परमं पदम् ॥२ १. योगशास्त्र में छब्बीसवाँ तत्त्व ही परम पद है— षड्विंशकं तु देवेशि योगशास्त्रे परं पदम् ॥३ २. पाशुपत व्रत में ईश्वर ही ‘परमपद’ है—‘व्रते पाशुपते प्रोक्तमैश्वरं परमं पदम् ॥’४ ३. शैवों का परमपद—समस्त अध्वाओं की सीमायें पार करके जो पद या अवस्था आती है वही शैवों का परमपद है। सर्वाध्वनो विनिष्क्रान्तं शैवानां तु परं पदम् । त्रिक मत के अनुसार—इदन्ता परामर्श का लेश मात्र न रह जाना तथा सर्वत्र पराहन्तापरामर्श का प्रकाश उल्लसित होना ही मुक्तिप्रद ज्ञान है—‘सर्वप्रकारं वासनामात्रे- णापि यत् उज्झितं पराहन्ता परामर्शसारम ॥’५ देवी के द्वारा ‘परमज्ञान’ एवं ‘परमपद’ के विषय में संपृष्ट प्रश्न के विषय में शिव उत्तर देते हुए कहते हैं— परमपद शक्ति गर्भ है—‘शक्त्या गर्भान्तर्वर्तिन्या शक्तिगर्भं परं पदम्’ स्वातन्त्र्य और विमर्श रूपा शक्ति ही गर्भ है । (गर्भ = सार । रहस्य) ‘तन्त्रसार’ में इसे ‘परनाद गर्म आमर्श’ कहा गया है । प्रमात्रैकात्म्य की अन्तर्वर्तिनी पराकाष्ठामयी शक्ति के स्वभाव से यह परम पद उपलक्षित है । अवभास का स्वभाव ही विमर्श है । शक्ति में स्वातन्त्र्य एवं विमर्शात्मक ‘स्व’ भाव शाश्वतिक है । अहं प्रत्यवमर्श ही स्वातन्त्र्य शक्ति है । ‘स्वभावमवभासस्य विमर्शं विदुरन्यथा ।’ १२) ‘योगतत्त्वोपनिषद्’ (१२४-१३६) के अनुसार— तीन लोक, तीन वेद, तीन संध्या, तीन स्वर, तीन अग्नि, एवं तीन गुण—ये सभी प्रणव के त्र्याक्षरों में स्थित हैं। इन तीनों अक्षरों के मध्य जो अर्द्ध मात्रा स्थित है उसके

१. नेत्रतन्त्र । २. तन्त्रालोक-विवेक (१आ०पृ०७९)। ३. तन्त्रालोक-विवेक । ४. तन्त्रालोक-विवेक । ५. तन्त्रालोक-विवेक ।

१६४ स्पन्दकारिका द्वारा सभी आच्छादित हैं। वही सत्य एवं 'परमपद' हैं— 'त्रयो लोकास्त्रयो वेदास्तिस्रः संध्यास्त्रयः स्वराः । त्रयोऽग्नय त्रिगुणा स्थिताः सर्वे त्रयाक्षरे ॥ त्रयाणामक्षराणां च योऽधीतेऽत्यर्द्धमक्षरम् ॥ तेन सर्वमिदं प्रोक्तं तत्सत्यं तत्परं पदम् ॥ (योग० १३४, १३६) १३) क) प्रणव की मात्रा 'अकार' में कमल का रेचक होता है। ख) प्रणव की मात्रा 'उकार' में कमल प्रस्फुटित होता है। ग) प्रणव की मात्रा 'मकार' में नाद की प्राप्ति होती है। घ) प्रणव की मात्रा 'अर्द्धमात्रा' निश्चला होती है। ङ) वह मल-शून्य शुद्ध स्फटिक के समान निर्मल एवं पापनाशक है। च) योग युक्तात्मा पुरुष परम पद प्राप्त करते हैं— परमपद का स्वरूप—अकारे रेचितं पद्ममुकारेणैव विद्यते । मकारे लभते नादमर्द्धमात्रा सुनिश्चला ॥ शुद्धस्फटिकसंकाशं निष्कलं पापनाशनम् । लभते योगमुक्तात्मा पुरुषस्तत्परं पदम् ॥ ('योगतत्त्वोपनिषद् १३८-१४०) १४) शाण्डिल्योपनिषद् में कहा गया है कि— 'यदि वह कुण्डलिनी शक्ति कण्ठ के ऊर्ध्व भाग में प्रसुप्त रहती हो वह योगियों को मुक्ति प्रदान करती है और शरीर के अधोभाग में प्रसुप्तावस्था में स्थित रहने पर वह प्राणियों के लिए बन्धन का कारण बनती है। निद्रा भंग के उपरान्त वह इड़ा—पिंगला मार्गद्वय का त्याग करके सुषुम्ना मार्ग से अग्रगमन करती है यही विष्णु का 'परमपद' है—'सा कुण्डलिनी कण्ठोर्ध्वभागे सुप्ता चेद्योगिनां मुक्तये भवति । बन्धनाधो मूढानाम् । इडादिमार्गद्वयं विहाय सुषुम्नामार्गेण गच्छेद्विष्णोः परमं पदम् ॥' (शाण्डिल्योपनिषद् १.३७) १५) ब्रह्मबिन्दूपनिषद्—संकल्प शून्यता रूप उन्मनी भाव ही 'परमपद' है। विषय भोग की लालसा नष्ट हो जाने पर मन हृदय में पूर्णतया निरुद्ध हो जाता है और वह उन्मनीभाव प्राप्त कर लेता है। यही उन्मनी भाव 'परमपद' कहलाता है— निरस्तविषयासंगं संनिरुद्धं मनो हृदि । यदा यात्युन्मनीभावं तदा तत्परमं पदम् ॥ (ब्र०उप० ४) १६) विष्णु पुराण में कहा गया है कि—आध्यात्मिक साधना में सतत निरत ध्यान में दक्ष योगीगण पुण्य-पाप के क्षय होने पर ॐ में ध्येय विष्णु के उस अक्षय परम पद को देखते हैं— यद योगिनः सदोद्युक्ताः पुण्यपापक्षयेऽक्षयम् । पश्यन्ति प्रणवे चिन्मयं तद्विष्णोः परमं पदम् ॥ (वि०पु०)

प्रथमः निष्यन्दः १६५ १७) ब्रह्मपुराण में कहा गया है—'जिससे समस्त विश्व की (१।९।५४) सृष्टि हुई है वही विष्णु परब्रह्म है। जो जगत् रूप है, जिसमें जगत् है और जिसमें जगत् का प्रलय हो जाता है वही परब्रह्म परमधाम एवं सदसत 'परमपद' है— स च विष्णुः परं ब्रह्म यतः सर्वमिदं जगत्। जगच्च यो यत्र चेद यस्मिन् विलयमेष्यति। तद् ब्रह्म परमं धाम सदसत परमं पदम्॥ (ब्र०पु० २३४।४१-४२) १८) मार्कण्डेयपुराण में कहा गया है कि— क) प्रथम मात्रा अकार (पृथ्वी, अग्नि ब्रह्मा आदि) व्यक्त है। ख) द्वितीय मात्रा उकार (अन्तरिक्ष, विष्णु आदि) अव्यक्त है। ग) तृतीय मात्रा मकार (द्यौ, शिव) चिच्छक्ति हैं। घ) चतुर्थ मात्रा 'अर्द्धमात्रा' परम पद है— व्यक्ता तु प्रथमा मात्रा, द्वितीयाव्यक्तसंज्ञका। मात्रा तृतीया चिच्छक्तिरर्द्धमात्रा परमं पदम्॥ १९) विष्णुपुराण में कहा गया है कि—जो अविकार, अज, शुद्ध, निर्गुण, निरञ्जन परमपद है उस परब्रह्म के प्रति हम नत होते हैं— अविकारजं शुद्धं निर्गुणं यन्निरञ्जनम्। नताः स्म तत्परं ब्रह्म विष्णोर्यत्परमं पदम्॥ (१।१४।३८) २०) कठोपनिषद् में कहा गया है कि जो विज्ञानवान्, अनुभवयुक्त, मननशील एव नित्य शुचि है वही परमपद प्राप्त करता है उसको फिर जन्म नहीं लेना पड़ता— यस्तु विज्ञानवान् भवति समनस्कः सदा शुचिः। स तु तत्पदमाप्नोति यस्माद् भूयो न जायते। २१) परमपद का स्वरूप—कूर्मपुराण में कहा गया है कि— क) यह माहेश्वरी देवी मेरी निरञ्जना शक्ति है। यह शान्ता, सत्या एवं सदानन्दा हैं। वेद इन्हें ही 'परमपद' कहता है। ख) 'इन निरञ्जना शक्तिरूपा, परमपद स्वरूपिणी माहेश्वरी देवी से ही समस्त जगत् उत्पन्न होता है और अन्त में इनमें ही समस्त जगत् लीन हो जाएगा॥ ग) यही माहेश्वरी शक्ति परमपद समस्त प्राणियों की गतियों में सर्वोत्तम गति है— एषा माहेश्वरी देवी मम शक्तिनिरञ्जना। शान्ता सदानन्दा परं पदमिति श्रुतिः॥ अस्याः सर्वमिदं जातमत्रैव लयमेष्यति। एषैव सर्वभूतानां गतीनामुत्तमा गतिः॥ (कूर्मपुराण) २२) श्रीमद्भगवद्गीता में परमागति का विवेचन करते हुए भगवान् श्रीकृष्ण ने कहा है—(क) सर्व द्वाराणि संयम्य (ख) मनो हृदि निरुध्य च।

१६६ स्पन्दकारिका (ग) मूर्ध्न्याधायात्मनः प्राणमास्थितो योगधारणाम् । (घ) ओमित्येकाक्षरं ब्रह्म व्याहरन् । (ङ) मामनुस्मरन् (च) यः प्रयाति त्यजन्देहं स याति परमां गतिम् ।। (गीता ८।१२-१३) २३) ऋग्वेद में कहा है विष्णु के परमपद में मधु का उत्स (झरना) है— 'विष्णोः पदे परमे मध्व उत्सः ॥' (ऋग्वेद १।१५४।५) 'ता वां वास्तून्युश्मसि गमध्यै यत्र गावो भूरिश्रृंगाः अयासः । अत्राह तदुरुगायस्य विष्णोः परम् पदम् व भाति भूरि । (ऋग्वेद १।१५४।६) उस परमपद में प्रभूत शृंगों से युक्त (भूरिश्रृंगा) तथा शीघ्रगामी धेनुओं का निवास है । वह नित्य अति द्युतिमान लोक है जोकि इस लोक पर सदैव चमकता है । २४) 'परिमल' (महार्थमञ्जरी की टीका) में 'परमपद' का स्वरूप इस प्रकार है— 'तस्या भोक्त्याः स्वतन्त्राया भोग्यैकीकार एष यः । स एव भोगः सा मुक्तिः स एव परमं पदम् ॥ क्षोभ के विलीन हो जाने पर मितात्मा का सर्वज्ञातृत्व-सर्वकर्तृत्व— तदाऽस्याऽकृत्रिमो धर्मो ज्ञत्वकर्तृत्वलक्षणः । यतस्तदीप्सितं सर्वं जानाति च करोति च ॥ १० ॥ तब (क्षोभ के विलीन हो जाने पर) इसका (मितप्रमाता का) सहज (स्वभावसिद्ध) ज्ञातृता एवं कर्तृता रूप धर्म अनावृत रूप में प्रकाशित हो उठता है जिससे कि वह अपने समस्त आकांक्षित विषयों को (स्वातन्त्र्यपूर्वक) जानने भी लगता है और (यथाकांक्षित कार्यों को निरापद रूप में) निष्पादित भी करने लगता है ॥ १० ॥

  • सरोजिनी * मितप्रमाता का स्वभावसिद्ध धर्म सर्वज्ञातृता एवं सर्वकर्तृता है । यही उसका अकृत्रिम (सहज = स्वाभाविक) धर्म है । तदा = तब उपदेश की अपेक्षा से । क्षोभ के उपशमनोपरान्त । अकृत्रिम = सहज । (भट्टकल्लट = 'अकृत्रिम' = सहज) । धर्म—आत्मनिहित स्वभाव या गुण । 'प्राङ्निर्दिष्ट स्वातन्त्रारूपः परमेश्वरः स्वभावो ज्ञत्वकर्तृत्वे सामरस्यावस्थितप्रकाशानन्दात्मनी ज्ञानक्रिये लक्षणं अव्यभिचारिस्वरूपं यस्य तादृक् । अस्य = इस पुरुष का । ज्ञत्वकर्तृत्व = सब कुछ जानने एवं सब कुछ कर सकने की क्षमता । यत = जिसके कारण

प्रथमः निष्यन्दः १६७ ईप्सित = अभीष्ट ॥ तदा = तब१ च + च = यौगपद्य । (ज्ञान-क्रिया में ऐकात्म्य सूचित करने के लिए यहाँ दो चकार प्रयुक्त हुए हैं ।) अकृत्रिम—१) स्वरूपभूत २) साधना से प्राप्त नई उपलब्धि या नव्य सम्प्राप्ति नहीं प्रत्युत् पहले से ही विद्यमान किन्तु मलों के कारण आवृत (माया के कारण सावरण) आत्मधर्म रूपसर्वज्ञत्व एवं सर्वकर्तृत्व रूप शक्ति । जब प्रकृति का ‘क्षोभ’ (आत्म प्रत्यभिज्ञा का ससीम पदार्थों के साथ ऐकात्म्य) शान्त हो जाता है तब समस्त क्रियायें अवरुद्ध हो जाती हैं—यथा निस्तरंग समुद्र की । इस संदर्भ में समुत्थित शंका के निवारण के लिए यह—'तदा... करोति च' श्लोक कहा गया है ।२ उस समय उस योगी का, सर्वज्ञत्व एवं सर्वकर्तृत्व लक्षण वाला सहज धर्म अपने समस्त जिज्ञास्य एवं यथाभीष्ट विषयों को जान लेता है तथा उन कार्यों को निष्पादित कर डालता है ।३ जब ‘क्षोभ’ का लय हो जाता है तब आत्मा स्वरूपस्थ हो जाती है और उसका सहज स्वभाव हो जाता है । सहजस्वभाव क्या है?४ ‘सर्वज्ञता’ और ‘सर्वकर्तृत्ता’ । वह जो जानना चाहे’ जान सकता है, जो करना चाहे कर सकता है—अपने लिए भी एवं अन्य लोगों के लिए भी ।५ ‘पंचरात्र’ में यह सहज धर्म—‘विवेकज ज्ञान’ के नाम से कहा गया है । जब उसका प्रादुर्भाव होता है, तब क्या होता है ? यह आत्मा सर्वज्ञ, सर्वदर्शी' सर्वेश्वर एवं सर्वशक्ति सम्पन्न हो जाता है । यह बिना इन्द्रियों के भी होता है । जैसे अग्नि दाह्य क्या है—इसका विचार नहीं करती । वैसे ही आत्मा ‘ज्ञेय क्या है?’— इसका विचार नहीं करता क्योंकि वह स्वयं बोधस्वरूप है ।६ ‘षाड्गुण्यविवेक’ में भी कहा गया है कि—बोध विचित्र पदार्थों के निर्माण के लिए किसी दूसरे सहकारी कारण की अपेक्षा नहीं रखता । वह ‘स्वयं संकल्प से ही सहस्रों रूपों की सृष्टि कर लेता है— ‘नहि बोधो विचित्रार्थनिर्माणेऽन्यमपेक्षते । संकल्पादेव यो रूपसहस्राणि सृजत्यजः ॥’७ किसी-किसी का ऐसा भी कहना है कि आत्मा में ज्ञातृत्व और कर्तृत्व आदि किसी दूसरे परतत्त्व से आते हैं, वे वस्तुतः आत्मा को अनीश्वर ही मानते हैं ।८ ‘आगमरहस्य’ में कहा गया है—‘जो ईश्वर की क्रिया को किसी सहकारी कारण से की हुई मानते हैं उन्होंने ईश्वरता को ही तिलाञ्जलि दे दी । वे तो ऐसा कहते हैं मानो परस्त्री के अधीन पुरुष का नाम कम कामीश्वर रख दिया गया हो ।’— ‘येऽपीश्वरं व्यपदिश्यन्ति निमित्तहेतु, तैरर्पितः स्थलजलाञ्जलिरीशितायै । १-३. क्षेमराज = स्पन्दनिर्णय । ४-८. स्पन्दप्रदीपिका ।

१६८ स्पन्दकारिका अन्याङ्गेनोपगमनेन वशीकृतस्य, कामीश्वरस्थितममी बत संगिरन्ते ॥'१ नवें श्लोक में, देहादिक अनात्म तत्त्वों में अहं प्रत्ययस्वरूप क्षोभ के विगलित हो जाने पर, निवात-निश्चल-जलधि के समान सुप्रशान्त स्थिति में अवस्थित आत्मतत्त्व को 'परमपद' शब्द द्वारा प्रतिपादित किया गया था। फिर उसके बल के स्पर्श से पुरुष उससे विलक्षण (भिन्न) क्षोभात्मक धर्म कैसे प्राप्त कर लेता है कि जिसके कारण इन्द्रिय समूह को उनके व्यापार में संलग्न करते हुए 'मैं करता हूँ' 'मैं जानता हूँ'—इत्यादि अपने ऐन्द्रिय विषयों को प्राप्त करके क्षुभित हो उठता है?—इन शंकाओं का निराकरण करने हेतु एवं अनात्मज्ञानियों के मति भ्रम को दूर करने के उद्देश्य से १०वीं कारिका कही गई ॥ तदा = तब ॥ उस यथोक्त क्षोभपरिक्षयोपलक्षित काल में । अस्य—इसका इस आत्मा का । अकृत्रिम = सहजसिद्ध । सतत अव्यतिरिक्त । ज्ञातृत्वकर्तृत्वलक्षणः = ज्ञातृत्व-कर्तृत्व के लक्षण वाला । यतो = जिसके कारण । जिस अव्यभिचारी एवं कारणभूत गुण से । सर्वम् = अखिल । ईप्सितं = ज्ञेय एवं कार्य के रूप में प्राप्त करने हेतु वाञ्छित वस्तु । उस समय । सत्यस्वभाव संबन्धलक्षणयोगात्मिका उस दशा में । (न कि देहादिक आलम्बन में अहं प्रतीति से परिप्लुत सांसारिक पुरुषदशा में) । जानाति च करोति च = जानता है और करता है । ऐसा क्यों कहा गया ? सर्वज्ञातृत्व' उपलब्धृत्व, कर्तृत्व आदि तो आत्मा के अव्यतिरिक्त सहज धर्म हैं । वस्तुतः एक ही ईश्वर की स्वभावप्रत्यवमर्शरूपा एक ही शक्ति है । वही संवेदन के रूप में 'ज्ञान' तथा कार्यसंरंभरूप से 'क्रिया' शब्द द्वारा पुकारी जाती है— 'वस्तुतः एकैव ईश्वरस्य स्वभावप्रत्यवमर्शरूपा शक्तिः, सा संवेदनरूपत्वात् ज्ञान शब्देन उच्यते, लावणमात्रसंरंभरूपत्वात् क्रियाशब्देन च उद्घोष्यते ।' 'इदन्तावसेयस्य वस्तुतो ज्ञेयतया कार्यतया च द्वैविध्यात् द्वित्वेन उपचर्यते ॥' वेद्यत्वप्रतीति के उपप्लव से संस्पृष्ट वेदकैकलक्षण स्वभाव में स्थित उस आत्मा का वह धर्म सर्वज्ञातृत्व एवं सर्वकर्तृत्व के रूप में विजृंभित (प्रकट) होता है । आत्मा की ज्ञातृ—कर्तृत्वलक्षण अव्यतिरिक्तधर्मता उसका स्वभाव है न कि उसकी क्षोभावस्था । अपने इस स्वभाव के प्रत्यवमर्श के अभाव से वेद्य देहादिक में वेदक प्रत्यय का निबन्धनात्मक ज्ञातृत्व एवं कर्तृत्व आत्मा का कृत्रिम एवं परिमित विषय है न कि स्वाभाविक । स्वाभाविक धर्म तो सर्वज्ञातृत्व एवं सर्वकर्तृत्व है ।२ ज्ञातृत्व एवं कर्तृत्व का विकास पूर्वकारिका (९वीं) में कहा गया है कि 'क्षोभ' के विलीन हो जाने पर मितप्रमाता १. स्पन्दप्रदीपिका । २. रामकण्ठाचार्य—'स्पन्दकारिकाविवृति' ।

प्रथमः निष्यन्दः १६९ शिवभाव में प्रतिष्ठित हो जाता है । इस अवस्था विशेष में किसी भी प्रकार की स्फुरणा नहीं होती तथा वह तरंग-हीन समुद्र की भाँति प्रशान्त एवं निस्पन्द है । सूत्रकार का कथन है कि क्षोभ के विलीन हो जाने पर इसका मितप्रमाता स्वभावसिद्ध ज्ञातृत्व एवं कर्तृत्व धर्म को निरावृत रूप में प्रकट होता है जिससे कि यह प्रमाता आकांक्षित विषयों को स्वातन्त्र्यपूर्वक जानता भी है तथा अभीष्ट कार्यों का निष्पादन भी करता है । वृत्तिकार भट्टकल्लट कहते हैं— यदि क्षोभ का ग्रहण अस्त हो जाता है तो ज्ञातृत्व एवं कर्तृत्व, (जो कि आत्मा का स्वाभाविक धर्म है) के ऊपर से मितज्ञातृत्व एवं मितकर्तृत्व का प्रतिबन्धक अवरोध हट जाता है और आत्मा अपने सर्वज्ञातृत्व एवं सर्वकर्तृत्व की अपनी अमित शक्ति के साथ प्रोज्ज्वलित हो उठता है । इस अवस्था में मितप्रमाता की संकुचित सीमाओं की प्राचीर को भंग करके वह सब कुछ जान लेता है और सब कुछ कर सकने की क्षमता प्राप्त कर लेता है 'यतः तस्मिन् प्रलीनक्षोभात्मके काले अकृत्रिमः सहजो ज्ञत्वकर्तृत्व- भावरूपो धर्मो यस्मात्, तस्मिन् एवं प्राप्तयोगात्मके काले यत् तद् ज्ञातुम् इच्छति तत् तत् जानाति च करोति च, नान्यथा संसार्यावस्थायाम् ।।'१ 'शान्तब्रह्मवाद' और पञ्चकृत्यकारी शिव का सर्वकर्तृत्ववाद— १. 'माण्डूक्योपनिषद्'—में परमात्मा को 'शान्त' कहा है और उसके अनेक लक्षणों की ओर इंगित किया है । यथा—अदृष्ट, अव्यवहार्य, अग्राह्य, अलक्षण, अचिन्त्य, अव्यपदेश्य, एकात्मप्रत्ययसार, प्रपञ्चोपशम, शान्त, शिव एवं अद्वैत-'अदृष्ट- मव्यवहार्यमग्राह्यमलक्षणमचिन्त्यमव्यपदेश्यमेकात्मप्रत्ययसारं प्रपञ्चोपशमं शान्तं शिवम- द्वैतं चतुर्थं मन्यन्ते स आत्मा स विज्ञेयः ॥' आचार्य शङ्कर ने (शाङ्कर भाष्य) में 'शान्त' का अर्थ—यह स्वीकार किया है कि परमात्मा—जाग्रदादि अवस्थाओं के धर्म से रहित है—'प्रपञ्चोपशममिति जाग्रदादिस्थान- धर्माभाव उच्यते । अतएव शान्तमविक्रियम्'२ 'शान्त'—१) जाग्रदादि अवस्थाओं के धर्मों से रहित । २) अविकारी-'अविक्रिय' । इस दृष्टि से तो शाङ्कर मत के विरोध का प्रश्न ही नहीं उठता किन्तु यदि 'शान्त' का अर्थ—'निष्क्रिय' 'निस्पन्द' माना जाय तब अवश्य इसे 'शान्तब्रह्मवाद' से सम्बद्ध मानकर इसका शैव दर्शन विरोध करता है । 'परमार्थचर्चा' के 'विवरण' में हरभट्ट ने 'शान्तब्रह्मवाद' के विरुद्ध अनेक प्रश्न उठाये हैं— १) शान्त ब्रह्मवादी परमात्मा को उदासीन (क्रियाशून्य) मानते हैं तो वे यह बताएँ कि फिर ऐसा उदासीन परमात्मा विश्व को आभासित कैसे करेगा? १. भट्टकल्लट : 'स्पन्दसर्वस्व' । २. शांकरभाष्य (माण्डूक्योपनिषद) ।

१७० स्पन्दकारिका २) ऐसा परमात्मा उसका विश्रान्ति-स्थान कैसे बन सकेगा— 'शान्तब्रह्मवदौदसीन्यमवलम्बमाना कथं विश्वमाभासयेत्? कथं च तद्विश्रान्तिस्थानं भवितुमहर्हा?१ २. दार्शनिक स्पिनोजा (Spinoza: 1632-1677) का कथन है कि विश्व परमात्मा से पृथक् नहीं है प्रत्युत्—'विश्वम् ईश्वरः । ईश्वरश्च तद् विश्वम्' = सब ईश्वर है और ईश्वर ही सब है यही है स्पिनोजा का 'सर्वेश्वरवाद' । शङ्कराचार्य भी 'सर्वब्रह्मवाद' के समर्थक हैं किन्तु उनकी मान्यता में—१) 'ब्रह्मसत्यम्'—तो ठीक है और 'जीव ब्रह्मैव नापरः' भी ठीक है किन्तु उनका 'जगन्मिथ्या' कथन ठीक नहीं है। यह Spinoza को भी मान्य नहीं है, सांख्यदर्शन को भी मान्य नहीं है—रामानुजीय वेदान्त दर्शन को भी मान्य नहीं है तथा 'प्रत्यभिज्ञा' 'स्पन्द' 'क्रम' आदि अद्वैतवादी शैव दर्शनों को भी मान्य नहीं है। स्पिनोजा भी परमात्मा को स्थितिशील नहीं गतिशील मानता है। स्पिनोजा का मूल सत्व निर्गुण है जबकि स्पन्द या प्रत्यभिज्ञा का मूल तत्त्व सगुण, निर्गुण, विश्वमय एवं विश्वातीत दोनों हैं। वेदान्ती शान्त ब्रह्मवादी भी हैं। इस ब्रह्म का स्वरूप शान्त एवं निस्पन्द है। उसमें विमर्श का पूर्णतः अभाव है। वह 'निस्तरंग महोदधि कल्प' है—तरंग शून्य महासमुद्र है। इसके कारण उसमें—ज्ञान, एवं क्रिया की शक्ति एवं संवेदना भी नहीं है। ये ब्रह्मवादी ब्रह्म को चेतन तो मानते हैं किन्तु 'निस्तरंग जलनिधि' कहने से वे उसे उदासीन एवं शक्तिहीन भी मानते हैं। स्पन्द सूत्र ऐसे शक्तिहीन—ज्ञान-क्रिया-हीन, एवं निष्क्रिय ब्रह्म में विश्वास नहीं रखता। शैव दार्शनिक कहते हैं कि जो निरपेक्षतः पूर्ण स्वतन्त्र है (जिसकी स्वभावगत शक्ति 'स्वातन्त्र्य शक्ति' हों) ऐसा ब्रह्म एक साथ निस्तरंग एवं तरंगित दोनों रह सकता है। 'शिवदृष्टि' में सोमान्दपाद कहते हैं कि—शैवदर्शन में निस्तरंगता शिव की शक्तिहीनता का प्रतीक नहीं है प्रत्युत् इच्छा-ज्ञान-क्रिया शक्तियों का सूक्ष्म सामरस्य या अभेदात्मकता संकेतित है। शैवदार्शनिकों के मत में चैतन्य एवं प्रसरणशीलता—स्वरूप प्रथन एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। शिव विश्वरूप में अवभासमान है। चूँकि विश्व शिवमय, शिवस्वरूप है अतः गर्हित एवं मिथ्या भी नहीं है। निन्दनीय (गर्हित) तो यह है कि विश्व को शिवस्वरूप माना ही न जाय। आत्म चैतन्य से विश्व की पृथकता ही गर्हित है। ज्ञातृत्व एवं कर्तृत्व शिव का स्वभाव है और स्वभाव का त्याग संभव नहीं है अतः शिव से इन शक्तियों की पृथकता भी संभव नहीं है। 'शिवदृष्टि' में सूक्ष्मता का अर्थ शिव का शक्तिराहित्य नहीं है प्रत्युत् अभेदता है— सुसूक्ष्मशक्तित्रितयसामरस्येन वर्तते। चिद्रूपाह्लाद परमो निर्विभागः परस्तदा ॥२ उसका रूपप्रसार गर्हित नहीं है—'रूपप्रसाररसतो गर्हितत्वमयुक्तितमत (शिव- १. 'परमार्थचर्चाविवरण' (हरभट्ट) । २. शिवदृष्टि (१.४) ।

प्रथमः निष्यन्दः १७१ दृष्टि १४) सोमानन्दपाद ठीक ही कहते हैं कि शक्ति का शक्तिमान से पार्थक्य संभव नहीं है—'एवं न जातु चित्तस्य वियोगस्त्रितयात्मना ॥' परमात्मा 'विश्वोत्तीर्ण' है—इसका अर्थ यह है कि वह सुख दुःख, भय, शोक, अभाव, एवं अनेक द्वन्द्वों ममत्व, अभिमान आदि से उत्तीर्ण है—इन क्षोभों से अतीत है। शान्तब्रह्मवादियों के संवेदन-शून्य ब्रह्म को शैव दार्शनिक जड़ मानते हैं—'संवित्ति शून्यं ब्रह्मत्ववादिनां जड़तैव सा ।'१ (सोमानन्दाचार्य) ॥ अभिनवगुप्तपादाचार्य 'तन्त्रालोक' में कहते हैं कि 'हृदय' (अहं प्रत्यवमर्शात्मक बोध) में विमर्श की तरंगें उठती रहती हैं। 'विमर्श' चेतन स्पन्द है। विश्व का 'द्रावण' (जगत् का इदं रूप में बाह्यावभासन या विश्व-प्रसारण) और उसका प्रसृत भाव जगत् का आन्तर अहंप्रत्यय में लय करने की क्रियाशीलता विमर्श ही है। 'स्पन्द' के प्रसार की दिशायें दो हैं—१) 'बहिर्मुख प्रसार' २) 'अन्तर्मुख प्रसार' । 'बहिर्मुख प्रसार' = विश्वात्मक = विश्व विकास । 'अन्तर्मुख प्रसार' ।। स्वात्म- सङ्कोच । प्रसारित विश्वात्मकता को मूल केन्द्र में समेटना ॥ 'स्पन्द' की यही द्विमुखी क्रियाशीलता है जिसे कि—१. 'स्वरूपोच्छलन' २. 'किंचिच्चलन' कहा जाता है। क) हृदये स्वविमर्शोऽसौ द्राविताशेषविश्वकः । भावग्रहादिपर्यन्तभावी सामान्यसंज्ञकः ॥ स्पन्दः स कथ्यते शास्त्रे स्वात्मन्युच्छलनात्मकः ॥२ ख) किंचिच्चलनमेतावदन्यस्फुरणं हि यत् । ऊर्मि रेषाविबोधाब्धेर्न संविदनया विना ॥३ किंचिच्चलनात्मक स्फुरणा का स्वरूप—'स्पन्द' किंचिच्चलनात्मक है। इसका स्वरूप निम्नांकित है—और इसके दो रूप हैं—१. 'सामान्य स्वरूप' २. विशिष्ट स्पन्द । क) सामान्यस्पन्द—विश्व-प्रसृत धर्म । 'राम' मानव है । मानवता उसका 'सामान्य' एवं 'रामत्व' (सामान्य का) विशिष्ट स्वरूप है। एक जातिगत धर्म है और दूसरा व्यष्टिगत विशिष्ट धर्म है किंचिच्चलनात्मक स्फुरण विश्व के स्थूल-विकास (जगत् की सृष्टि = आदि सर्ग) और प्रलय (अन्त में संहार काल) इन दोनों स्थितियों में सामान्य रूप से प्रसृत होती है अतः उसे 'सामान्य स्पंद' कहते हैं। इसकी गति अनवरुद्ध रूप में अग्रपद होती रहती है। इस अवस्था में प्रवहमान स्पन्द शक्ति घट, पट, नील, रक्त, आदि विकल्पों में विभाजित नहीं रहती। ख) विशिष्टस्पन्द—जगत् की जो स्थिति का काल होता है उसमें ही सामान्य स्पन्द विकल्पों का विशिष्ट रूप ग्रहण करके (देह, प्राण, नील, सुख आदि बनकर) विश्व के अनेकात्मक अनन्त रूपों में विश्ववैचित्य का अवभासन करते हुए विशेषरूपता का भी उच्छलन (किंचिच्चलन) करता है।' १. सोमानन्दपादः 'शिवदृष्टि' (६.२९) । २. तन्त्रालोक (९.१०२-३) । ३. तन्त्रालोक (९.१८४) ।

१७२ स्पन्दकारिका स्वात्मोच्छलनात्मक स्फुरणा ही चैतन्य का शाश्वत स्वस्वभाव है। चाहे पति प्रमाता हो चाहे पशुप्रमाता दोनों का प्रमातृत्व इसका ऋणी है। सर्वज्ञ, सर्वकर्ता अनुत्तर तत्त्व अपनी 'स्वातन्त्र्य शक्ति' की सामर्थ्य से सब कुछ जानता भी है और सब कुछ करता भी है उदासीन, निरपेक्ष साक्षी मात्र बनकर नहीं रहता। संवित् का यथार्थ स्वरूप अहंविमर्शात्मक स्फुरणा है। स्वतन्त्र कर्ता संविदात्मक है। विश्वात्मक ज्ञातृत्व एवं कर्तृत्व की अहंविमर्शमयी स्फुरणा ही संवित् का अकृत्रिम स्वभाव है। प्रमाताओं की मुख्यतः दो श्रेणियाँ हैं—(१) पतिप्रमाता, (२) पशुप्रमाता । कार्यों के कारणसमूह का संयोजन—वियोजन करने में स्वतंत्र कर्ता तो मात्र शिव ही है क्योंकि विश्वात्मक ज्ञातृत्व एवं कर्तृत्व की अहं विमर्शमयी स्फुरणा का वह स्वामी है किन्तु मितप्रमाता (पशु) भी अपनी पशु भूमिका में संयोजन-वियोजन की क्षमता रखता है क्योंकि संवित् सक्रिय है और वह संवित् पशुओं में भी है अतः ज्ञाता-कर्ता के व्यापार की क्रिया में दोनों में कोई भेद नहीं है हाँ अन्तर है तो उसकी मात्रा में यथा— १) पतिभूमिका—सर्वकर्तृत्व, सर्वज्ञातृत्व' पूर्ण तृप्ति आदि ॥ २) पशुभूमिका—सर्वकर्तृत्व, किंचिद् ज्ञातृत्व, किंचिद् तृप्ति आदि ॥ पशु अपने संविदात्मक स्वरूप को विस्मृत कर देने के कारण 'पति' से 'पशु' बन जाता है किन्तु देहादिक में अहंभाव का त्याग करने एवं 'संवित्स्वरूपोऽहं, विश्वविभ- वोऽहं, सर्वज्ञातृत्व-कर्तृत्व शक्ति संपन्नोऽहं, शिवोऽहं' की प्रत्यभिज्ञा होते ही उसके समस्त पाशों का उच्छेद हो जाता है और वह 'पशु' से 'पशुपति' बन जाता है। इस मितप्रमातृत्व के स्थान पर अमितप्रमातृत्व की प्राप्ति ही 'आत्मबल का स्पर्श' कहलाता है। पशु एवं पति मूलतः अभिन्न हैं— १) तथा च तेषां हेतूनां संयोजनवियोजने । नियते शिव एवैकः स्वतन्त्रः कर्तृतामियात् ॥ (तं०९।३५) २) तस्मादेकैकनिर्माणे शिवो विश्वैकविग्रह । कर्तेति पुंसः कर्तृत्वाभिमानोऽपि विभो कृतिः ॥ (तं० ९।३६) पशु की मित पदार्थों में ममता, अहंकार, उनके साथ एकात्मता आदि भी विश्व- शरीरी की ही स्फुरणा है। सर्वज्ञ शिव ही विराजमान है— 'ना सावस्था न यः शिवः ॥' 'विज्ञानभैरव' (धारण ८४) में कहा गया है— सर्वज्ञः सर्वकर्ता च व्यापकः परमेश्वरः । स एवाहं शैवधर्मा इति दाढर्याच्छिवो भवेत् ॥ १०७ ॥ प्रथम प्रत्यभिज्ञा—'मै शुद्धबुद्ध स्वरूप हूँ' द्वितीय प्रत्यभिज्ञा—'निखिल जगत् मेरा ही अपना विस्तार है'

प्रथमः निष्यन्दः १७३ विहाय निजदेहास्थां सर्वत्रास्मीति भावयन् (वि०भै० १०२) प्रसार्य भैरवं रूपं भावयन्तस्तन्मयो भवेत् (वि०भै० ८६) तैमिरं भावयन् रूपं भैरवं रूपमेष्यति (वि०भै० ८५) लीनं मूर्ध्नि वियत्सर्वं भैरवत्वेन भावयेत् । तत्सर्वं भैरवाकारं तेजस्तत्त्वं समाविशेत् ॥ ८३ ॥ न व्रजेन्न विशेच्छक्तिर्मरूरूपा विकासिते । निर्विकल्पतया मध्ये तया भैरवरूपता ॥ २६ ॥ 'तदास्याऽकृत्रिमो धर्मो'—इसकी व्याख्या 'प्रत्यभिज्ञाहृदयम्' के सूत्र 'तथापि तद्वत् पंचकृत्य करोति' (प्र० हृ० १०) के प्रकाश में ही संभव है। क्षेमराज कहते हैं कि शिव का अकृत्रिम धर्म भी वही है क्योंकि परमात्मा में भी वही धर्म स्वात्मस्वरूप के रूप में अवस्थित हैं जो जीवों में है— 'सृष्टिसंहारकर्तारं विलस्थितिकारकम् । अनुग्रहकरं देवं प्रणतार्तविनाशनम् ॥' 'पंचविधकृत्यकारित्वं चिदात्मनोभगवतः ॥ 'स्वच्छन्द तन्त्र' में भी कहा गया है कि चिदात्मा भगवान् में सदैव पंचविधकारिता स्थित है । यथा भगवान् अशुद्धाध्वा के विकास क्रम से स्वरूपविकासात्मक सृष्ट्यादि की रचना करतें हैं उसी प्रकार चित् शक्ति के संकुचित होने पर संसारभूमिका में पंचकृत्य करते हैं— 'यथा च भगवान् शुद्धेतराध्वस्फारक्रमेण ... तथा संकुचितचिच्छक्तित्वेन संसार- भूमिकायां पंचकृत्यानि विधत्ते ॥ स्वस्वभाव की सर्वव्यापकता के साक्षात्कार के कारण योगी की संसरण से मुक्ति— तमधिष्ठातृभावेन स्वभावमवलोकयन् । स्मयमान इवास्ते यस्तस्येयं कुसृतिः कुतः ॥ ११ ॥ जो (साधक) 'स्वभाव' (स्पन्द स्वरूप आत्मा) को (जगत् के प्रत्येक कण में) सर्वव्याप्त देखता हुआ विस्मयाविष्ट की भाँति अवस्थित रहता है भला उसके लिए यह कुत्सित संसरण कहाँ हैं? ॥ ११ ॥

  • सरोजिनी * तुरीयावस्था या शाक्तभूमिका में अवस्थित योगी जब जगत् के कण-कण में सर्वत्र एक ही चिदात्मा की व्यापकता, अवस्थान एवं उनमें उसकी सर्वव्यापक अनु-स्यूतता का साक्षात्कार करने लगता है तब उसके कुत्सित आवागमन-चक्र का कोई भय नहीं रह जाता । कारिकाकार ने 'स्पन्द' 'आत्मा' 'चिति' 'शिव' 'विमर्श' 'स्वातन्त्र्य' 'शक्ति' आदि शब्दों का प्रयोग न करके 'स्वभाव' का प्रयोग क्यों किया? कारिकाकार यह

१७४ स्पन्दकारिका संदेश देना चाहते हैं सर्वानुस्यूतता, सर्वव्यापकता आदि पारमात्मिक वैभव मात्र परमात्मा में ही नहीं प्रत्युत् प्रत्येक आत्मा में है और वह वैभव (शक्ति या धर्म) उसका आगन्तुक, क्षणिक या कृत्रिम धर्म नहीं है प्रत्युत् वह उसका 'स्वभाव' (आत्मधर्म) है। कुसृतिः—'कुत्सिता जन्ममरणादि प्रबन्धरूपा सृतिः प्रवृत्तिः।' स्मयमान = विस्मयाविष्ट। ब्रह्माण्ड के प्रत्येक कण में, वैचित्य एवं अनन्त, वैभिन्यों में एक ही अभेदात्मक सत्ता को देखकर एवं भेदात्मक विश्व में मात्र अद्वैत, अभेद को ही पारमार्थिक सत्य के रूप में साक्षात्कृत करके ऐसा योगी आश्चर्य से भर जाता है। 'तमधिष्ठातृभावेन' = 'सर्वव्यापकत्वेन'—भट्टकल्लट ॥ जो साधक ध्यान एवं ध्यानाभाव में, अपनी स्पंद शक्ति के द्वारा, ऐकात्म्य या सामञ्जस्य स्थापित कर लेता है उसके लिए यह जीवन एवं मृत्यु का संसार अस्तित्व में नहीं रहता। व्युत्थान के समय भी योगी, स्पंदतत्व से एकीभूत एवं अभिन्न अपने स्वभाव को दृढ़ता से देखता है। योगी अपने स्पन्दतत्त्वात्मक स्वभाव को व्युत्थान दशा में भी अधिष्ठातृभाव पूर्वक देखता है।१ 'न व्रजेन्न विशेच्छक्तिर्मरुद्रूपा विकसिते। निर्विकल्पतया मध्ये तया भैरवरूपधृक्॥' (वि०भै० २६) कक्ष्यास्तोत्र में कहा गया है— 'सर्वाः शक्तीश्चेतसा दर्शनाद्याः, स्वे स्वे यौगपद्येन विष्वक्। क्षिप्त्वा मध्ये हाटकास्तंभभूत-, स्तिष्ठन्विश्वाकार एकोऽवभासि॥' 'विज्ञानभैरव' एवं 'कक्ष्यास्तोत्र' द्वारा कथित इन श्लोकों से निर्दिष्ट इस संप्रदाय- संमत निमीलन-उन्मीलन समाधि द्वारा एक साथ व्यापक मध्य भूमि के अवष्टंभ से अध्य- सित, दोनों विसर्ग-अरणि से विगलित विकल्प उपक्रम से इन्द्रिय समूह स्फारित हैं।२ अन्तर्लक्ष्य बहिर्दृष्टिर्निमेषोन्मेषवर्जितः। इयं सा भैरवी मुद्रा सर्वतन्त्रेषु गोपिता॥ इस साधना का आश्रय लेकर (इसी भैरवी मुद्रा को साधकर), दर्पण में उन्म- ज्जित, निमज्जित, प्रादुर्भूत एवं तिरोहित होने वाले नाना प्रतिबिम्ब-कदम्बकों की भाँति चिदाकाश में भी प्रादुर्भूत एवं तिरोहित होने वाले जगत, जगत् के विभिन्न रूप एवं सुख- दुःख, नील-पीत की अयथार्थता का पारमार्थिक साक्षात्कार करते हुए योगी सहस्रों जन्मों को एक साथ देखकर एवं अपने स्वस्वरूप की प्रत्यभिज्ञा करके विस्मयाविष्ट हो उठता है।३ ऐसी स्थिति में जन्ममरणकारिणी कुत्सिता प्रवृत्ति भला कैसे प्रादुर्भूत हो सकती है? उस पर तो विष का भी प्रभाव नहीं पड़ता— १-३. स्पन्दनिर्णय।

प्रथमः निष्यन्दः १७५ तत्त्वे निश्चलचित्तस्तु भुंजानो विषयानपि । नैव संस्पृश्यते दोषैः पद्मपत्रमिवांभसा ॥ विषा पहारिमन्त्रादिसन्नद्धो भक्षयन्नपि । विषं न मुह्यते तेन तद्वद्योगी महामतिः ॥ (भा०वि०)१ जो शुद्ध आत्म स्वभाव को अर्थात् अधिष्ठातृभाव से अपने को स्वयं प्रकाश चिद्रूप से सर्वव्यापक रूप से देखता है वह मुस्कराता हुआ, विस्मयाविष्ट सा, खिलते हुए फूल सा रहता है । अविद्या का विलय हो जाने के कारण उसके लिए यह क्षुब्ध संसार कहाँ है? यह योगी की एक उच्च भूमिका है । इसकी दृष्टि द्रष्टा रूप से सभी का अनुभव है । इष्टोपदेश नामक ग्रन्थ में कहा गया है कि—‘वत्स! तुम्हारी दृष्टि से यह जो कुछ दृष्टिगत हो रहा है, उसका आग्रह छोड़ दो । जिससे देखते हो, उसको देखो । उसको देख लेने पर सब कुछ देख लोगे ।।' यदिदं दृश्यते दृष्ट्या ग्रहं पुत्राऽत्र सन्त्यज । येन पश्यति तं पश्य यं दृष्ट्वा पश्यसेऽखिलम् ॥२ ऐसी स्थिति में विकल्प की कारीगरी के अधीन होकर कुमार्ग में चलना नहीं होता, सदा अपने स्वरूप में स्थिति हो जाती हे । वही सत्यसंकल्प ईश्वर है । अभ्यास और भावना से समस्त दुःख मिट जाते हैं । रसायन आस्वादन के बिना केवल ज्ञानमात्र से भी सिद्धि देता है । कहा भी गया है— ‘यो जगु पश्वि एषु किंनु वीक्षोमाइत्य करो । विषयालविलुच्छि एसे पत्तापत्त रावीक्षोअपलइयद अस्त्युबुद्धि ।।' ‘वैसे तो प्रभो! आपको चरवाहे, बच्चे और स्त्रियाँ भी जानती हैं किन्तु साधन या युक्ति के न होने से आप उन्हें मुक्त नहीं करते । गाय में स्थित दूध भूख प्यास नहीं मिटाता । पान करने पर ही वह दूध भूख-प्यास मिटाता है ।' मुनि ने भी कहा है— ‘यदि वाचनिकाज्ज्ञानान्मुक्तिः स्याद् भवनां विना । ‘शारीरमानसैर्दुःखैर्मुच्येरन् सर्वजन्तवः ॥’ ‘रसायनं विनास्वादात् सूचितं ह्यपि सिद्धिदम्'३ भले ही रसायन का आस्वादन न किया जाय और मात्र उसके गुणों को सूचित ही किया जाय फिर भी सिद्धि प्रदान करता है । दूसरे स्थल पर भी कहा गया है कि— आगोपालबालवनितं भगवंस्त्वमित्थं, ज्ञातोऽप्युपायविरहान्न तु मोक्षदोऽसि । नान्तः स्थितं भवति धनेषु तृड्विहर्तृ, क्षीरं तदेव पुनरभ्यवहारतः स्यात् ॥४ १-४. उत्पलदेवाचार्यः ‘स्पन्दप्रदीपिका' ।

१७६ स्पन्दकारिका

तम् = स्वस्वभाव आत्मा को । अधिष्ठातृभावेन = समस्त शरीरों में समस्त अवस्थाओं में, सर्वदा, सर्वत्र मात्र अनुभविता के रूप में सभी में व्याप्त होकर, सभी में अवस्थित होकर, 'मैं ही एक (अद्वैत) एवं स्वतन्त्र परमेश्वर अधिष्ठाता हूँ'—इस प्रकार के परामर्शस्वरूप अधिष्ठातृ भाव से ॥ अवलोकयन् = देखते हुए । पूर्वोक्त उपपत्ति की दृष्टि से, उपलब्धि की दृष्टि से देखते हुए ('प्रत्यभिज्ञानन्' अपने को पहचानते हुए) । स्मयमान इव = अपने परप्रमाता आत्मतत्त्व की प्रत्यभिज्ञा होने पर और अपने मायिक प्रमातृत्व की मिथ्या समझते हुए आश्चर्यचकित होकर ॥ य आस्ते = जो अवस्थित है, जो स्थित है । अर्थात् जो निर्विप्लवा स्थिति का अनुभव करता है । तस्य = इस प्रकार के लक्षण वाले उस योगी का । इयं = यह इस प्रकार सुप्रख्यात, देहादिक में अहं प्रतीतिमूला । कुसृतिः = कुमार्ग । जन्म जरामरणादि के द्वन्द्वयोग से कुत्सिता या गर्हिता सृति (सरण) । अर्थात् अनेक योनियों में जन्ममरणादि चक्र का मार्ग—आवागमन मार्ग ॥१ प्रस्तुत कारिका का सारांश—(१) अपने आत्मस्वरूप 'स्वभाव' की जगत् के प्रत्येक कण में व्यापकता को देखकर योगी आश्चर्यचकित हो जाता है । (२) जगत् के कण-कण में अपना ही साक्षात्कार (स्वभाव का दर्शन) करने लगता है । (३) ऐसे योगियों के लिए आवागमन का कोई मूल्य नहीं होता और वे इस संसरण-चक्र से मुक्त हो जाते हैं । अभ्यासोपरान्त स्पन्दशक्ति की आन्तरिक अनुभूति स्पन्द का सार्वभौम अधिष्ठातृत्वभाव—'तमधिष्ठातृत्वभावेन स्वभावमवलोक- यन्'—सूत्रकार का कथन है कि जो कोई साधक स्वभाव (स्पन्दस्वरूप आत्म तत्त्व) की जगत् के प्रत्येक कण में विद्यमानता अनुभव करता है और इस आश्चर्यात्मक सर्वानुस्यूतता का साक्षात्कार करके विस्मय विमुग्ध हो जाता है तब वह साधक इस तिरस्कार-पूर्ण और विगर्हणीय आवागमन-चक्र से मुक्त हो जाता है । भट्ट कल्लट ने 'स्पन्दसर्वस्व' में कहा है— (१) आत्मस्वभाव (सामान्य स्पन्द तत्त्व) विश्व के प्रत्येक पदार्थ में अन्तः स्थित और प्रत्येक प्रकार की शक्ति से युक्त है । (२) यदि कोई योगी उसी विभु 'स्वभाव' (सामान्य स्पन्द) को अधिष्ठाता के रूप में (एवं सर्व व्याप्त रूप में) अवस्थित देखता है तो वह आवागमन-चक्र (सृति) से मुक्त हो जाता है— १. स्पन्दकारिकाविवृति : रामकण्ठाचार्य ।

प्रथमः निष्यन्दः १७७ 'तदेवम्, यतः सर्वानुस्यूतः सर्वसामर्थ्ययुक्तश्च आत्मस्वभावः यस्मात् तम् अधि- 'ष्ठातृभावेन सर्वव्यापकत्वेन स्वभावं पश्यन् विस्मयाविष्ट इव यस्तिष्ठति, तस्य कुत्सिता सृतिः सरणं न भवति ॥' अधिष्ठातृभाव एवं स्वभावावलोकन—नित्योदित समाधि—अन्तर्मुख एवं बहिर्मुख दोनों विरोधी भाव जिस अवस्था में समरस हो जाते हैं—जहाँ समाधि एवं व्युत्थान दोनों में अभेद का अनुभव होता है—उसी नित्योदित समाधि की अवस्था को नित्योदित समाधि कहते हैं । शैव साधक 'स्वभाव' का साक्षात्कार करके इसी स्मयमानावस्था में पहुँचता है । तुरीयावस्था या 'शाक्त भूमिका' में प्रविष्ट योगी समस्त सांसारिक व्यवहारों का निष्पादन करते हुए भी जगत् के निःसार से निःसार वस्तुओं को भी स्वस्वभावात्मक स्पन्दतत्त्व से युक्त देखकर, शरीरादिक तुच्छ पदार्थों में आत्माभिमान का त्याग करके, विश्वात्मभाव की भूमिका पर आरूढ़ होकर, (भैरव भूमिका प्राप्त करके) चतुर्दिक स्वातन्त्र्य शक्ति के प्रसार का अनुभव करते हुए, प्रत्येक अवस्था एवं प्रत्येक स्थल में अपने चित् तत्त्व की अधिष्ठातृत्ता का अनुभव करते हुए, सूर्य के ऊपर क्षणिक रूप में दृश्यमान (प्रकाशाच्छा- दक) घनों के रूप में चिद्रूप आत्मतत्त्व पर माया के क्षणिक घनों के आवरण को देखता हुआ, तुरीय भूमिका पर स्थायी अवस्थान द्वारा तुरीयावस्था प्राप्त करके शिवभाव प्राप्त कर लेता है । उच्च भूमिका में प्रविष्ट योगी यह अनुभव करता है कि उसके चारों ओर उसकी 'स्वातन्त्र्य शक्ति' ही प्रसृत है और वह तुरीयावस्था स्वरूप स्वच्छन्द भूमिका मेंप्रवेश कर रहा है— 'योगी स्वच्छन्दयोगेन स्वच्छन्दगतिचारिणा । स्वस्वच्छन्दपदे युक्तः स्वच्छन्दसमतां व्रजेत् ॥'१ ऐसे योगी को ऐसा अनुभव होता है कि जैसे जलाशय में उत्थित तरंगें, अग्नि से ऊर्ध्वोत्थित लपटें एवं सौरमण्डल से निःसृत प्रकाश पुञ्ज क्रमशः जलाशय, अग्नि एवं सौरमण्डल से अभिन्न ही है उसी प्रकार विश्व की निःशेष भंगियाँ 'स्वस्वरूप' के बहिर्मुखी विकास से अभिन्न हैं—जलस्येवोर्मयो वह्नेर्ज्वालभंग्यो यथा खेः । ममैव भैरवस्यैता विश्वभंग्यो विनिर्गताः ॥२ शाक्तभूमिका का साक्षात्कार योगी को तुरीयावस्था एवं उसके अनन्तर तुरीया- तीतावस्था में पहुँचा देता है । 'स्मयमान इवास्ते'—विस्मय-संभरित होकर, अर्थात् आश्चर्याविष्ट होकर अवस्थित रहता है । 'स्मय' या 'विस्मय' क्या है? 'विस्मय' शैव दर्शन में योग की एक उच्चावस्था है—'विस्मयो योगभूमिकाः' (शि०सू० १.१२)३ १. स्वच्छन्दतन्त्र (७-२५७-८) । २. विज्ञानभैरव (११०) । ३. शिवसूत्र (१.१२) । स्पं० १२

१७८ स्पन्दकारिका ‘शिवसूत्रवार्तिक’ (वरदराज) में कहा गया है— यथा सातिशयानन्दे कस्यचिद्विस्मयो भवेत् ॥ ६३ ॥ तथास्य योगिनो नित्यं तत्तद्ध्येयावलोकने । निःसामान्यपरानन्दानुभूतिस्तिमितेन्द्रिये ॥ ६४ ॥ परे स्वात्मन्यतृप्त्यैव यदाश्चर्यं स विस्मयः । स एव खलु योगस्य परतत्त्वैक्यरूपिणः ॥ ६५ ॥ भूमिकास्तत्क्रमारोह परविश्रान्तिसूचिकाः ॥१ श्री कुलयुक्ति में कहा गया है— विस्मय क्या है?— ‘आत्मा चैवात्मना ज्ञातो यदा भवति साधकैः । तदा विस्मयमात्मा वै आत्मन्येव पश्यति ॥’२ शिवसूत्रविमर्शिनी में कहा है कि— ‘यथा सातिशयवस्तुदर्शने कस्यचित् विस्मयो भवति तथा अस्य महा योगिनो नित्यं तत्तद्ध्येयावभासामर्शाभोगेषु निःसामान्यातिशय नव नव चमत्कार चिद्धन स्वात्मा वेशवशात् स्मेर स्मेर स्तिमित विकसित समस्त करणचक्रस्य यो विस्मयोऽनवच्छिन्नान्दे स्वात्मनि अपरितृप्तत्वेन मुहुर्मुहुराश्चर्यमाणता, सा एव योगस्य परतत्त्वैक्यस्य संबन्धिन्यो भूमिका ॥’३ शैव दर्शन में ‘विस्मय’ एक पारिभाषिक शब्द है अतः अपना विशिष्ट अर्थ रखता है । यह साधना की अनिर्वाच्य एवं स्वसंवेद्य आश्चर्यकारी भूमिका है । यह अणिमादिक योग भूमियों से (जो कि परसंवेद्य हैं) उच्चतर है और आत्मानुभव की विस्मयोत्पादिका भूमिका है । योगी शाक्त भूमिका की अनुभूतियों के अनन्तर उत्तरोत्तर उत्कृष्टतर भूमिकाओं पर आरूढ़ होने के लिए जिस निरतिशय कौतूहल से आविष्ट होकर परिणामतः विचित्र अन्योन्यानुभूतियों के स्तर पर पहुँचता है वह यौगिक स्तर आश्चर्यों से भरा हुआ है । यह स्वानुभवगम्य, अन्तर्मुखी, विस्मयकारी योग भूमिका योग की तुरीय भूमिका है । आचार्य वरदराज कहते हैं कि—जब व्यक्ति सांसारिक जीवन में किसी सातिशय वस्तु को देखता है तो उसके मन में एक स्तंभकारिणी, साश्चर्य मनोवृत्ति का आविर्भाव होता है । वह उन प्रत्यक्षीकृत विशिष्ट वस्तुओं के विशिष्ट आकार-प्रकार को विस्मयपूर्वक देखता हुआ उनका स्वानुभव तो करता है किन्तु उसके आश्चर्यकारी सौन्दर्य की अभिव्यक्ति न कर पाने पर भी वह उसके अकथ्य सौन्दर्यातिशय की अनुभूति में विलीन हो जाता है—यही अवस्था ‘विस्मय’ है ।४ आध्यात्मिक धरातल पर जब कोई आत्मनिष्ठ योगी वेद्य पञ्चक (पंच महाविषय) को सामान्यस्पन्दान्विता अहन्ता में लीन करके १. शिवसूत्रवार्तिक (वरदराज) । २. कुलयुक्ति । ३. शिवसूत्रविमर्शिनी (क्षेमराज) । ४. शिवसूत्रवार्तिक (वरदराज) ।

प्रथमः निष्यन्दः १७९ अनिर्वचनीय चैतन्य रस के अनिर्वाच्य आनन्दातिशय के साक्षात्कार से मण्डित स्वरूप- समावेश का अनुभव करता है और उसके द्वारा आनन्द के विस्मय सागर में डूब जाता है। स्वरूपसमावेश की यह आश्चर्यकारी स्पन्दरूपता ही विकल्प शून्य तुर्यातीतावस्था रूप 'विस्मय भूमिका' है। भेदशून्य विश्वात्मभाव, अपने को सर्वत्र चिन्मात्ररूप में प्रति- ष्ठित के रूप में अनुभव या पराहंता की अनुभूति ही इस 'विस्मय' का अपर पक्ष है। क्रममुद्रा—तुर्यावस्थाजन्य निरतिशय आनन्दानुभव को प्राप्त करने हेतु योगी की बार-बार अन्तर्मुखोन्मुखता ही 'क्रममुद्रा' है। 'क्रममुद्रा' के अन्य पर्याय हैं—'शांभव समावेश' 'स्वरूप समावेश' 'भैरव मुद्रा' एवं 'नित्योदित समाधि' है। 'क्रम मुद्रा' में दो शब्द है—(१) 'क्रम', (२) 'मुद्रा'। 'क्रम'—सृष्टि, स्थिति, संहार का क्रम ।। 'मुद्रा' = मुद्रित करना = स्वरूप में विश्रान्ति 'क्रममुद्रा' = तुरीयावस्था। प्रत्येक क्रम को कवलित करके स्वरूप में विश्रान्ति, । 'नित्योदित समाधि' ।। बाह्यावभासो को तुरीय सत्ता में मुद्रित करना। 'प्रत्यभिज्ञाहृदयम्' में कहा गया है कि—नित्योदित—बाह्याभ्यन्तरसमावेश—(१) 'मुद्' अर्थात् हर्ष के वितरण करने से परमानन्दस्वरूप होने । (२) पाशों को नष्ट करने का । (३) विश्व को अन्तः—तुरीय सत्ता में मुद्रित करने के कारण मुद्रात्मा और सृष्ट्यादि क्रम का आभासक होने के कारण तथा क्रमाभासस्वरूप होने से 'क्रम' कहा जाता है 'विश्वस्य अन्तः तुरीयसत्तायां मुद्रणात् च मुद्रात्मा, क्रमः अपि सृष्ट्यादिक्रमाभासकत्वात् तत्क्रमाभासरूपत्वात् च 'क्रम' इति अभिधीयते इति ।।' १ यह अवस्था (क्रममुद्रा, शांभव समावेश) अन्तर्मुखावस्था के अतिरिक्त बहिर्मुखा- वस्था में भी चिद्रूपात्मक रहती है— 'तत्रादौ बाह्याद् अन्तः प्रवेशः, अभ्यन्तराद् बाह्यस्वरूपे प्रवेश आवेशवशाद् जायत इति सबाह्याभ्यन्तरोऽयं मुद्राक्रमः ।।' २ 'क्रममुद्रया अन्तः स्वरूपया बहिर्मुखः समाविष्टो भवति साधकः ।।' ३ 'क्रममुद्रा' समाधि की स्थिति है। इसमें योगी स्वरूप समावेश की शक्ति द्वारा बहिर्मुखता से अन्तर्मुखता में और अन्तर्मुखता से बहिर्मुखता में त्वरित प्रवेश करता है। 'सबाह्याभ्यन्तरसमावेश' का नामान्तर ही 'क्रममुद्रा' है। इस अवस्था में अवस्थित योगी सांसारिक कार्य कलापों का निष्पादन करता हुआ भी समाधिकालगत संस्कारों के द्वारा प्रत्येक वेद्य वस्तुओं में चिन्मात्रता के दर्शन करता हुआ स्वस्वरूप में अवस्थित रहता है— आसादित समावेशो योगिवरो व्युत्थानेऽपि समाधिरससंस्कारेण क्षीब इव सानन्दं घूर्णमानो । भावराशि शरदभ्रलवम् इव चिद्गगन एवं लीयमानं पश्यन् । भूयो भूयः अन्त- र्मुखताम् एवं समवलम्बमानो, निमीलितसमाधिक्रमे रम चिदैक्यमेव विमृशन्, व्युत्थानाभि- मतावसरे अपि समाध्येकरस एव भवति—' १. क्षेमराज प्रत्यभिज्ञाहृदयम् । २-३. प्रत्यभिज्ञाहृदयम् ।