स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)
Spanda Nirnaya of Acharya Kshemaraja with Hindi Commentary
आचार्य वसुगुप्त / क्षेमराज द्वारा
२५८ स्पन्दकारिका विकल्प-संस्कार की चार अवस्थायें—(तन्त्रालोक) अस्फुट विकल्प | भविष्यत् स्फुटत्व (भविष्य में स्फुटता की प्रक्रिया होती है ।) | प्रस्फुटता का प्रवर्तन | पूर्णाप्रस्फुटन (कली, मुकुल, विकसदवस्थ सुमन कुसुम की भाँति) विकल्प शीघ्र विकसित नहीं होते । अतः अन्तराल में अनेक अवस्थायें आती हैं— (१) अस्फुट—स्फुटताभावी के मध्य-‘भ्रश्यदस्फुटत्व’ अवस्था (२) ईषत्प्रस्फुटत्व के बाद अंकुरित प्रस्फुटत्व अवस्था (३) आसूत्रित स्फुटत्व, उद्गच्छत्स्फुटत्व आदि अनेक अवस्था विकल्पों की संस्कार-प्रक्रिया का क्रमिक विकास—स्फुटतम वैकल्पिक तद्रूपतामयी एक संवित् शक्ति का उल्लास $\rightarrow$ ‘स्व’ रूप की प्राप्ति $\rightarrow$ सङ्कोच का कलङ्क नष्ट । (४) पारमार्थिक विकल्प भी हेय हैं— परमार्थविकल्पेऽपि नावलीयेत पण्डितः । को हि भेदो विकल्पस्य शुभे वाप्यथ वाशुभे ॥ विकल्प चाहे शुभ हों या अशुभ—विकल्प तो विकल्प ही हैं $\rightarrow$ निर्विकल्पात्मक भाव ही श्रेयस्कर है— (५) विकल्प संविद के संस्कार से और अविकल्प संविद रूप में क्रमशः स्फुरित होने से स्वात्म में ही ज्ञान, क्रियात्मक संविद्रूप भैरवीय तेज का विमर्श होने लगता है । इस विमर्श में ‘मैं स्वयं भैरव शिव हूँ’ यह महानुभूति उदित होती है । अस्फुटत्व $\rightarrow$ स्फुटतमावस्था = शांभव समावेश की आनन्द भूमि यही है । यही है प्रस्फुटित विमर्श भूमि का आवेश— अतश्च भैरवीयं यत्तेजः संवित्स्वभावकम् । भूयो भूयो विमृशतां जायते तत्स्फुटात्मता ।। (तन्त्रा० ४।७) विकल्पों का संस्कार करते-करते अपने संवेदन को निर्मल बनाया जाता है और अपने हृदय में शाक्तभूमिका की अनुभूति करके पशुत्व से मुक्त होकर विश्वात्मभाव प्राप्त किया जाता है । विकल्प-संस्कार का निरन्तर अभ्यास $\rightarrow$ (प्रबुद्ध योगियों के हृदय में) ‘सहज विद्या’ (विशुद्ध विकल्प या अहंविमर्शात्मक स्वरूप की अनुभूति) $\rightarrow$ शुद्ध विद्या का प्रकाश स्वरूप का साक्षात्कार एवं मन्त्र वीर्य की अनुभूति—प्रबुद्ध से सुप्रबुद्धावस्था में प्रवेश ।। बौद्ध दर्शन में सहज तत्त्व का स्वरूप—(१) वज्रयानी सिद्धों एवं मत्स्येन्द्र के
प्रथमः निष्यन्दः २५९ योगिनी कौल मार्ग में 'सहज' = पुरुष तत्त्व + शक्ति तत्त्व का समागम प्रज्ञा + उपाय, (यो० कौ० में—शिव + शक्ति) का समागम !! (२) 'कौलज्ञाननिर्णय' में— 'सहज' = 'कुरुते देहमध्ये तु सा शक्तिः सहजा प्रिये ।।' (सहज शक्ति को शरीरस्थ करके वहीं उपलब्ध करना चाहिए ।) 'सहज' = सहज ज्ञान सहज स्वभाव आदि । नाथपंथ में 'सहज' के प्रयोगों की दिशायें—(१) 'सहज' = परम तत्त्व (२) 'सहज' = परमज्ञान, परम स्वभाव, (३) 'सहज' = परमपद, परमसुख, (४) 'सहज' = सहज जीवन पद्धति । (५) शरीर के भीतर शक्ति से संगम प्राप्त करने की योग पद्धति । विकल्प—घट पट आदि से लेकर शून्य पर्यन्त सभी पदार्थ 'विकल्प' है । अहं परामर्श के भेद—शुद्ध अहं परामर्श ।। मायीय अहं परामर्श ।। जब मितात्मा विश्व से अभिन्नतयावस्थित सविन्मात्र में या विश्व से असंस्पृष्ट स्वच्छ आत्मा में अवस्थित रहता है तब उसे शुद्ध अहं परामर्श कहते हैं । जब की मायीय (अशुद्धपरामर्श) वेद्यस्वरूप देह, बुद्धि, प्राण, शून्य आदि को अपना आलम्बन बनाता है—उन्हीं को अपना स्वरूप मान बैठता है तब इसे अशुद्ध परामर्श कहते हैं । इसी भेद दशा की प्रतीति ही 'विकल्प' है । इसी की शुद्धि से सहजविद्या का उदय होता है । कारिकाकार ने जिस सद्विद्या (सहज विद्या) का प्रतिपादन किया है एतत्संबन्ध में अभिनवगुप्त 'तन्त्रालोक' (३।१०) में कहते हैं कि (१) भावों के प्रतिघाती भाव मायात्मक होते हैं किन्तु (२) अप्रतिघाती भाव तो सद्विद्यामय होते हैं । मायात्मक भाव स्थूल एवं भेदप्रधान होते हैं । भावानां यत्प्रतीघाति वपुर्मायात्मकं हि तत् । तेषामेवास्ति सद्विद्यामयं त्वप्रतिघातकम् ।। (३।१०)१ सद्विद्यामय भाव ज्ञान शक्तिस्वभाव होते हैं—'तत्सद्विद्यामयं ज्ञानशक्तिस्वभावम् ।। (विवेक पृ० ३२९) ।। मायात्मकपदार्थप्रतिबिम्बरूप एवं ज्ञानात्मकभाव उनके ग्राहक होते हैं ।२ प्रत्यभिज्ञा एवं स्पन्द शास्त्र के जो छत्तीस तत्त्व हैं उनमें 'ईश्वर तत्त्व' से निम्न स्तर पर किन्तु मायातत्त्व के स्तर से उच्चतर स्तर पर एवं दोनों के अन्तराल में 'शुद्धविद्यातत्त्व' अवस्थित है— (१) 'विश्वं पश्चात्यन्निदन्तया निखिलमीश्वरो जातः । सा भवति शुद्धविद्या येदन्ताहन्तयोरभेदमतिः ।।' ३ (२) 'ईश्वरो' बहिरुन्मेषो, निमेषोऽन्तः सदाशिवः । सामानाधिकरण्यं च, सद्विद्याहमिदं धियोः ।।' (ईश्वरप्रत्यभिज्ञा ३।३)४ (३) 'तस्यैश्वर्यस्वभावस्य पशुभावे प्रकाशिका । विद्याशक्तिस्तिरोधानकरी मायाभिधा पुनः ।।' (ईश्वरप्रत्यभिज्ञा ३।७७)५ १. तन्त्रालोक । २. विवेक । ३. षट्त्रिंशत्तत्वसंदोह । ४-५. ईश्वरप्रत्यभिज्ञा ।
२६० स्पन्दकारिका (४) 'उन्मेषनिमेषौ बहिरन्तः स्थिती ऐवैश्वर सदाशिवौ बाह्याभ्यन्तरयोर्वेद्यवेदकयो- रेकचिन्मात्र विश्रान्तेर्भेदात्सामानाधिकरण्येनेदं विश्वमहमिति विश्वात्मनो मतिः शुद्धविद्या' —प्रत्यभिज्ञाकारिकावृत्ति ।१ इस स्वरूप वाली 'शुद्धविद्या' जो एक तत्त्व है वह इस प्रसंग में ग्राह्य नहीं है । शुद्ध विद्या इस प्रसंग की 'सहज विद्या' नहीं है । यहाँ 'शुद्धविद्या' पद उस शुद्धविमर्श को द्योतित करता है जिसके उदित होते ही योगी के अन्तःकरण में सर्वज्ञता, सर्वकर्तृत्व आदि माहेश्वर षडात्मक स्वधर्म प्रकाशित हो उठते हैं । विद्या शब्द का व्युत्पत्यात्मक अर्थ— 'विद्या' पद लाभवाचक 'विद्लृ' धातु एवं विचारमूलक 'विद्' धातु एवं ज्ञानार्थक 'विद्' धातु से व्युत्पन्न हुआ है । सहज विद्या—(१) विद्लृ (लाभ)—'विद्या' (२) विद् (ज्ञान)—'विद्या' (३) विद् (विचार)—'विद्या' (१) लाभद्योतक 'विद् लृ' धातु = 'विद्या' । इस अर्थ में 'विद्या' पद 'विमर्श' की उस उच्चतमावस्था का सूचक है जिसका विकास होने पर योगी माहेश्वर शक्तियों (सर्वज्ञता, सर्वकर्तृत्व आदि) को या शिव धर्मों को सहज रूप से अधिगत कर लेता है । (२) विचार-द्योतक विद् धातु = 'विद्या' = इस अर्थ में 'विद्या' पद विमर्श की उस उच्चतमावस्था को द्योतित करती है जिसका विकास होने के बाद योगी—'मैं अनादि हूँ' स्वातन्त्र्य, स्वात्मविमर्श, शिवत्व मेरा स्वभाव है'—का ज्ञान या अनुभव होने लगता है । (३) ज्ञान द्योतक विद् धातु = 'विद्या' । मैं स्वयं शक्तियों का स्वामी शिव हूँ । 'विश्व' मेरा स्पन्दन है । यही उन्मनन भी है । 'सहज अभ्यास', 'सहज जप', 'सहज ज्ञान', 'सहजयोग, 'सहज विद्या' आदि का उदय संभव है । 'हठयोगप्रदीपिका' में कहा गया है कि—'सहजावस्था' योग की एक उच्चावस्था है । इसके निम्न लक्षण हैं— (१) इस अवस्था में समस्त कार्य कलाप अकृत्रिम रूप से निष्पादित होते हैं । (२) इसमें कुण्डलिनी उद्बुद्ध रहती है । (३) इसमें समस्त सायास कार्यों का त्याग कर दिया जाता है । (४) यह स्वयमेव उत्पन्न होती है—स्वयंभू स्थिति है— 'उत्पन्नशक्तिबोधस्य त्यक्तनिःशेषकर्मणः । योगिनः सहजावस्था स्वयमेव प्रजायते ॥ (उपदेश ४।११) १. प्रत्यभिज्ञाकारिकावृत्ति ।
प्रथमः निष्यन्दः २६१ (५) 'सहजावस्था' अत्यन्त दुर्लभ है— दुर्लभो विषयत्यागो दुर्लभं तत्त्वदर्शनम्। दुर्लभा सहजावस्था सद्गुरोः करुणां विना॥ (हठ० प्र० ४।९) 'सहजविद्या' सहज ज्ञान (यौगिक ज्ञान) को आत्मीकृत (क्रोडीकृत) करके चलता है और यौगिक विद्या या यौगिक ज्ञान योग की दृष्टि में इस प्रकार है— ज्ञानं कुतो मनसि संभवतीह तावत्, प्राणोऽपि जीवति मनो म्रियते न यावत्। प्राणो मनो द्वयमिदं विलयं नयेद्यो, मोक्षं स गच्छति नरो न कथंचिदन्यः॥ (४।१५) जब तक 'सहज सदृश तत्त्व' का ध्यान में उदय नहीं होता तब तक 'ज्ञान' दंभ एवं मिथ्या प्रलाप मात्र है— यावद्ध्याने सहजसदृशं जायते नैव तत्त्वम्। तावज्ज्ञानं वदति तददिं दंभ मिथ्याप्रलापः॥ (ह० प्र० ४।११४) योगियों ने 'राजयोग', 'समाधि', 'उन्मनी', 'मनोन्मनी', 'तत्त्व', 'अमरत्व', 'लय', 'शून्याशून्य', 'परं पद', 'अद्वैत', 'निरालम्ब', 'निरञ्जन', 'अमनस्क', 'तुर्या', 'जीवन्मुक्ति' एवं 'सहजा' सभी को समानार्थक माना है— राजयोगः समाधिश्च उन्मनी च मनोन्मनी। अमरत्वं लयस्तत्त्वं शून्याशून्यं परं पदम्। अमनस्कं तथाद्वैतं निरालम्बं निरञ्जनम्। जीवन्मुक्तिश्च सहजा तुर्या चेत्येकवाचकाः॥ —स्वात्माराम मुनीन्द्र (हठयोगप्रदीपिका ४।३-४)
[५] द्वितीयो निष्यन्दः सहजविद्योदयनिष्यन्दः स्पन्दस्वरूप आत्मबल-प्राप्त मन्त्रों की शक्तियों में वृद्धि— तदाक्रम्य बलं मन्त्राः सर्वज्ञबलशालिनः । प्रवर्तन्तेऽधिकाराय करणानीव देहिनः ॥ २६ ॥ उस स्पन्दस्वरूप आत्मबल के साथ तद्रूपता प्राप्त करने से समस्त मन्त्र सर्वज्ञता आदि (षड्विध) शांभव बलों को प्राप्त कर लेते हैं और (वे मन्त्र) मांत्रिक साधक के अभीष्टों को उसी प्रकार सिद्ध कर देते हैं यथा शरीरधारी प्राणियों की इन्द्रियाँ (अपने अभीष्टों को सिद्ध कर देती हैं) ॥ २६ ॥
- सरोजिनी * तत् + बलं = उस स्पन्दरूपात्मक आत्मबल ॥ 'सर्वज्ञबलशालिनः मन्त्राः तद् बलं आक्रम्य देहिनाम् करणानीव अधिकाराय प्रवर्तन्ते ॥' तत् = वह । स्पन्द तत्त्वात्मक बल, प्राणरूप वीर्य । स्पन्दरूप 'आत्मबल' आक्रम्य = ('अभेदेन आश्रयतया अवष्टभ्य') ॥ (On catching hold of that strength) बलं = प्राणरूप वीर्य ॥ (Life vitality) निरावरण चिद्रूप (कल्लट) तद् बलं = वह शक्ति (That strength) आक्रम्य = अधिष्ठाय = (कल्लट) 'स्पन्द- तत्त्वात्मक' : स्पन्द तत्त्व से युक्त ॥१ तत् = उस (बल को) 'तदाक्रम्य' = तत् + आक्रम्य ॥ (कल्लट) सर्वज्ञता = सर्वज्ञता (सर्वकर्तृत्व, सर्वव्यापकत्व, सर्वज्ञातृत्व, पूर्णतृप्तित्व आदि) सब कुछ जानने की क्षमता ॥ सर्वज्ञता, सर्वकर्तृत्व, सर्वव्यापकत्व, सर्वशक्तिमत्ता आदि गुणों से समृद्ध 'मन्त्र' स्पन्दात्मक शक्ति या प्राण रूप वीर्य को, (सम्यक् अभेदापत्ति के साथ) प्राप्त करके प्राणियों को अधिकार सम्पन्न बनाने हेतु उसी प्रकार प्रवर्तित होते हैं जिस प्रकार इन्द्रियाँ प्राणियों को ऐन्द्रिय विषय प्राप्त कराने हेतु प्रवर्तित होती हैं ।२ १. क्षेमराज : स्पन्दनिर्णय । २. स्पन्दनिर्णय ।
द्वितीयः निष्यन्दः २६३ मान्त्रीशक्ति के प्रकटीकरण की विधि एवं जाग्रत मन्त्रों की अचिन्त्य शक्ति आचार्य क्षेमराज ने 'स्पन्दनिर्णय' में इस श्लोक को द्वितीय अध्याय के प्रथम श्लोक के रूप में प्रस्तुत किया है और सात श्लोकों में समाप्त कर दिया है । यह 'सहजविद्योदय निष्यन्द' का प्रथम श्लोक है ।१ प्रस्तुत श्लोक में 'मन्त्र शक्ति' का निरूपण किया गया है और उसके प्रथमोदय पर प्रकाश डाला गया है । 'मन्त्र' उस बल को प्राप्त करके सर्वज्ञत्व की शक्ति से आवेष्टित हो उठते हैं (Get endued with the power of omniscience) और अपने कार्यों का संपादन उसी प्रकार करते हैं जिस प्रकार सशरीरी व्यक्ति की इन्द्रियाँ किया करती हैं । ये 'मन्त्र' अपने आराधकों के चित्त के साथ लयीभूत हो जाते हैं (Get absorbed) वे शान्तरूप एवं अशुद्धियों से रहित होकर आराधकों के चित्त में लीन हो जाते हैं अतः ये मन्त्र शिव की यथार्थ शक्ति प्राप्त किये हुए होते हैं ।२ 'अनन्त', 'व्योमव्यापी' आदि मन्त्र सर्वज्ञत्वादि सामर्थ्य आदि के द्वारा प्राणियों के अधिकार के लिए प्रवर्तित होते हैं । जिस प्रकार प्राणियों की इन्द्रियाँ अपने बल के द्वारा ऐन्द्रिय विषयों के प्रकाशन का कार्य करती हैं ठीक उसी प्रकार 'मन्त्र' भी साधकों के लिए कार्य संपादित करते हैं और ये सृष्टि-संहार-तिरोधान-एवं अनुग्रह आदि कार्य निष्पादित करते हैं । उस शक्ति (स्पन्दात्मक शक्ति) को प्राप्त करके ये पवित्र मन्त्र (यथा अनन्त, व्योमव्यापी आदि मन्त्र) सर्वज्ञता आदि की शक्ति प्राप्त कर लेते हैं तथा सृष्टि-स्थिति- संहार-तिरोधान एवं अनुग्रह आदि देव कार्यों को निष्पादित करते हैं । ('तत् स्पन्द- तत्त्वात्मकं बलं प्राणरूपं वीर्यमाक्रम्य अभेदेन आश्रयतया अवष्टभ्य भगवन्तोऽनन्तव्योम- व्याप्यादयो मन्त्राः सर्वज्ञबलेन जृंभमाणा देहिनां प्रवर्तन्ते—सृष्टिसंहारतिरोधानअनुग्रहादि कुर्वन्ति ।।')३ मन्त्र-विज्ञान और उसका विधान— मन्त्र में चार बातें मुख्य होती हैं—(१) 'बीज' (२) 'पिण्ड' (३) 'पद' (४) 'नाम' । उनका धर्म है—(१) मनन एवं (२) त्राण । उनका बल है—निरावरण चित् का उल्लास (पराशक्ति) उसी शक्ति को लेकर 'मन्त्र' सहज नादशक्ति से उद्बोधित होकर प्रदीप्त होते हैं उनमें सर्वज्ञता आदि का बल आ जाता है । जब सिद्धमन्त्री उनका प्रयोग करता है तब वे—(१) 'अनुग्रह' और (२) 'निग्रह' करने में समर्थ होते हैं । जिस प्रकार एक शरीरधारी अपने कर-चरणों का प्रयोग करता है ठीक उसी प्रकार एक सिद्धमन्त्री मन्त्रों का प्रयोग करता है । आत्मा के परत्व का अवबोध होने के कारण मन्त्रज्ञ इच्छा मात्र से मन्त्रों का यथेष्ट प्रयोग कर सकता है । 'त्रिकसार' नामक ग्रन्थ में कहा गया है कि—वर्णातीत निराकार परम तत्त्व का बोध हो जाने पर 'मन्त्र' मन्त्राधिपों के साथ किंकर हो जाते हैं अर्थात् वशीभूत हो जाते हैं । १-३. स्पन्दनिर्णय ।
२६४ स्पन्दकारिका ‘विदिते तु परे तत्त्वे वर्णातीते ह्यविग्रहे । किंकरत्वं तु गच्छन्ति मन्त्रा मन्त्राधिपैः सह ॥’ यदि ऐसा नहीं है तो बड़े प्रयत्न से प्रयोग करने पर भी कठपुतली के समान निष्फल चेष्ट ही रहते हैं क्योंकि सत्यसंकल्पचिच्छक्ति के बल का स्पर्श न होने के कारण वे केवल वर्ण-मात्रा अर्थात् मात्र जड़ अक्षर ही बने रहते हैं—‘त्रिकसार' में यही कहा गया है— हंसपारमेश्वर नामक ग्रन्थ में कहा गया है कि—केवल वर्णरूप 'मन्त्र' पशुभाव में स्थित है। सुषुम्नामार्ग से उच्चारण करने पर वे 'पशुपति' हो जाते हैं। वस्तुतः शाक्त मार्ग में ही मन्त्रों की सफलता है। ‘पशुभावे स्थिता मन्त्राः केवला वर्णरूपिणः । सौषुम्णेऽध्वन्युच्चरिताः पतित्वं प्राप्नुवन्ति ते ॥’ वस्तुतः शाक्त मार्ग में ही मन्त्र साकल्य प्रदान करते हैं—‘ऐष शाक्तो मार्गोऽत्र च मन्त्राणां साकल्यम्' । तत्त्वरक्षा-विधान में कहा गया है—आत्म संवित् अथवा परम पद में मन्त्र का प्रयोग नहीं करना चाहिए, क्योंकि वह शक्ति और क्रिया से रहित है शक्ति के विषय में ही मन्त्र का प्रयोग करना चाहिए। वही जप सफल होता है अन्य नहीं— ‘अशक्तत्वान्निष्क्रियत्वान्न पुंसि न परे पदे । शक्तौ नियोजयेन्मन्त्रं जपस्तु सफलो भवेत् ॥’ श्रीवैहायसी नामक ग्रन्थ में भी कहा गया है— संधिस्थल में नादोर्ध्वध्वनि से बोधित 'जप' करना चाहिए यथा सूत्र में मणि ग्रथित होते हैं। ठीक इसी प्रकार शक्ति के ताने-बाने से निर्मित मन्त्राक्षरों का ध्यान करना चाहिए। वह शक्ति परम व्योम में रहती है और परमामृत से समृद्ध है। उक्त रीति से 'जप' करने पर 'मन्त्र' अपने स्वरूप को प्रकट कर देता है अपने को आच्छादित नहीं रखता— ‘विषुवत्कं जपं कुर्यान्नादोर्ध्वध्वनिबोधितम् । मन्त्राक्षराणि मणिवच्छक्तौ प्रोतानि भावयेत् ॥ तामेव च परे व्योम्नि परमामृतबृंहिताम् ॥’ श्रीकालपरा नामक ग्रन्थ में भी कहा गया है—शब्द नादात्मक हैं अतः उसके साथ प्रत्यय, संवित् संलग्न रहकर बढ़ाती रहती है। मन्त्र बोध के स्वरूप में स्थित संवित् अभिन्न है अतः वह आत्मबोध भी करा देती है— ‘शब्दो नादात्मकस्तस्मात् प्रत्येनोपबृंहितः । मन्त्रबोधस्वरूपस्थमभिन्नो बोधयत्यपि ॥’ संकर्षणसूत्र में भी इसी भाव को इस प्रकार व्यक्त किया गया है—चिद्रूपता स्वात्मैकनिष्ठ है। भाव और अभाव उसकी दशायें हैं—परिष्कार हैं। वह स्वसंवेदन
द्वितीयः निष्यन्दः २६५ संवेद्य है। प्रकृति से अतीत भी वहीं, प्रकृति का विषय भी वही यही मन्त्रों का प्रत्य- यात्मक कारण है। मन्त्र बाहर और भीतर वर्णरूप से प्रकट होते हैं। वे शाश्वत पदरूप होते हैं। वे मनुष्य के कर चरणादिक के समान हैं। वीर्य का योग होने पर किसी भी काल में प्रयोग करने पर वे सिद्ध होते हैं— स्वात्मैकनिष्ठं चिद्रूपं भावाभावपरिष्कृतम् । स्वसंवेदनसंवेद्यं प्रकृत्यतीतगोचरम् ॥ इयं योनिः स्मृता विप्र मन्त्राणां प्रत्ययात्मिका । ते मन्त्रा वर्णरूपेण सबाह्याभ्यन्तरोदिताः ॥ नैष्कालिकपदावस्थाः करणानीव देहिनाम् । प्रयुक्ताः सर्वकालेषु सिद्ध्यन्ते वीर्ययोगतः ॥ जब शुद्ध बोधात्मक रूप से अन्तर्बाह्य दोनों में उदित मन्त्र का एक बार भी जप किया जाता है तब वह लक्ष बार किये हुए जप के समतुल्य हो जाता है। 'जपसंहिता' में भी कहा गया है—'एक ही मन्त्रनाथ अन्तर एवं बाह्य दोनों में उदित होकर एक हो जाता है और तब उस जप को लक्ष्य संख्या से भी अधिक समझना चाहिए'— 'एकस्य मन्त्रनाथस्याप्यन्तर्बाह्योदितस्य च । यदैक्यं तं जपं विद्धि लक्षसंख्याधिकं मुने ॥'१ तेन = उसके द्वारा। प्रस्तुत व्याख्यान के कारण। एते = ये मन्त्र। आराध्यदेवतावाचकवर्णादिसंनिवेश पूर्णमन्त्र। शिवधर्मिणः = शिव अर्थात् परमेश्वर के अनन्यसाधारण सर्वज्ञता आदिगुण (धर्म) वाले ! शिव से अभिन्नस्वरूप ॥ किस कारण? क्योंकि 'तत्' = समनन्तर प्रतिपादितस्वरूप वाले शिव से सम्बद्ध। बल = सामर्थ्य ॥ शक्ति। आक्रम्य = उच्चिचारयिषावस्था में उसके साथ अभेदोपपत्ति स्थापित करते हुए स्वीकार करके। सर्वज्ञबलशालिनः = सर्वज्ञ शिव के बल द्वारा श्लाघमान होकर 'अधिकाराय प्रवर्तन्ते' = यथास्व प्रतिनियत कार्य संपादन के स्वाम्यर्थ प्रस्तुत होते हैं (प्रसरन्ति)। मन्त्र-विज्ञान ये मन्त्र यदि परमेश्वर से अभेदावस्था प्राप्त न कर लें तब तक ये उत्पादविनाश- धर्मक एवं वर्णमात्रात्मक होने के कारण तृण को भी झुकाने में असमर्थ हैं। पारमात्मिकी शक्ति से भिन्न रहने पर ये तृणा को भी टेढ़ा नहीं कर सकते ॥ मन्त्रों की असमर्थता कब और क्यों?— 'एते हि अनासादित परमेश्वराभेददशा उत्पाद-विनाशधर्मक वर्णमात्रात्मकाः तृण- मपि कुब्जयितुमशक्ताः ।।'—परमेश्वर में अभेदापत्ति के बिना मन्त्रों की यही स्थिति रहती १. उत्पलदेवाचार्य : 'स्पन्दप्रदीपिका'।
२६६ स्पन्दकारिका हैं क्योंकि उस स्थिति में ये आद्यन्त, उत्पन्न एवं विनष्ट एवं अनित्यधर्मा वर्णाक्षर मात्र रहते हैं। ये मन्त्र— 'तद बलं आक्रम्य सर्वज्ञबलशालिनः' हुआ करते हैं। उक्त पारमेश्वर शक्ति को पाकर ('उक्त बलाक्रमणेन') ये मन्त्र सुनिश्चित कार्यों या अभीष्टों को निष्पादित करने में सहायक हो जाते हैं और ये दीक्षादिक के द्वारा वृश्चिक- विष की अपसारणा से लेकर आकर्षण (स्तंभन, मोहन, वशीकरण, आकर्षण आदि) पर्यन्त परापर सिद्धियों (अभीष्ट-साधन) के निष्पादनाधिकार में अप्रतिहतशक्ति बन जाते हैं—'उक्त बलाक्रमणेन तु नियतेतिकर्तव्यतासहाया दीक्षादि वृश्चिकविषाकर्षणान्त परापर स्वकार्यसंपादनाधिकाराप्रतिहतशक्तयो भवन्ति।' यदि सभी मन्त्रों में उक्त पारमेश्वर शक्ति के प्राप्ति की पराक्रम-क्षमता समान है तो फिर इनमें अधिकारों की भिन्नता क्यों है? वे सभी साधनों में अभीष्टार्जन करने में सफल क्यों नहीं हो पाते? ये मन्त्र किस प्रकार साधकों के नियत अधिकार के लिए प्रवर्तित होते हैं? ये साधकों के कार्यों में उसी प्रकार सहायक होते हैं जैसे कर्मेन्द्रियाँ एवं ज्ञानेन्द्रियाँ ('देहिनां करणानिव') ॥ परमेश्वर के द्वारा ही चेतनत्वापादन हेतु उत्पन्न प्रवृत्ति आदि में साम्य होते हुए भी इन्द्रियाँ अपने लिये प्रकृति द्वारा प्रदत्त शक्ति के बल से शब्दादिक विषयों के प्रकाशन में समर्थ है—और उनका सामर्थ्य उसी सीमा तक पर्यवसित है। इन इन्द्रियों का अधिकार पृथक्-पृथक् है। सभी इन्द्रियाँ सभी इन्द्रियों के अधिकार या सामर्थ्य का उपयोग नहीं कर पातीं (यथा—नेत्रेन्द्रिय देख पाती है किन्तु सुन नहीं पाती और श्रवणेन्द्रिय सुन पाती है किन्तु देख नहीं पाती आदि-आदि)। उसी प्रकार ये मन्त्र साधकों के स्वीकृत परस्वभाव एवं अहम्भाव की प्रतिपत्तियों के विषय में यथा नियताधिकार के क्षेत्र में ही प्रवर्तित होते हैं उसका अतिक्रमण करके नहीं— मन्त्र विज्ञान—'मन्त्राः साधकानां स्वीकृतपरस्वभावाहंभावप्रतिपत्तीनां यथानियमिता- धिकाराय प्रवर्तन्ते ॥'— अतः सर्वज्ञबलशाली होने के बाद भी ये मन्त्र इन्द्रियों की ही भाँति नियताधिकार मात्र हैं—'तस्मात् करणवत् सर्वज्ञबलशालिनोऽपि मन्त्रा नियताधिकारा एव ॥'¹ 'मन्त्र' का स्वरूप, उसका लक्षण एवं उसके प्रभाव के विषय में शास्त्रों ने बहुत विवेचन किया है निम्नांकित उद्धरण ध्यातव्य हैं— 'मननमयी निजविभवे निजसंकोचे भये त्राणमयी' ॥ (१) कवलितविश्वविकल्पा अनुभूति कापि मन्त्रशब्दार्थः²। (२) 'मननत्राणधर्माणो मन्त्राः'। (३) 'वर्णात्मको न मन्त्रो दशभुजदेहो न पंचवदनोऽपि ।³ संकल्पपूर्वकूटौ नादोल्लासो भवेन्मन्त्रः ॥'⁴ १. रामकण्ठाचार्यः 'स्पन्दकारिकाविवृति'। २-४. महार्थमञ्जरी।
द्वितीयः निष्यन्दः २६७ (४) ‘सेयमेवंविधा भगवती संविद्देव्येव मन्त्रः ।’१ (५) ‘सर्वक्रोडीकारो स्थितत्वाद् देव्येव मन्त्रः ॥’२ (६) ‘चिदग्निसंहारमरीचिमन्त्रः संविद्विकल्पान् ग्लपयन्नुदेति’ ।३ (७) मन्त्राश्चिन्मरीचयः । (८) जब तक कि मन्त्र निर्मल नहीं हो जाते तब तक ये सिद्ध नहीं हो सकते— ‘यावन्न निर्मला मन्त्रास्तावत्सिद्धिः कथं भवेत्? (१६।४४ ने०तं०) । (९) पशुप्रमाताओं के लिए तो मन्त्र एक ‘करण’ है किन्तु आचार्य ‘कारण’ हैं—और शिवस्वरूप हैं— मन्त्राकरणरूपास्तु पशुकार्यस्य साधने । आचार्यः कारणं तत्र शिवरूपो यतः स्मृतः ॥ (ने०तं० १६।३।१६०) (१०) मन्त्रोदय होता कैसे है? इन्हें शिवात्मक क्यों कहते हैं? शिवशक्तिनियोगाच्च मन्त्राणामुदयः परः । सर्वत्रकलदा मन्त्रा यतस्तेऽतः शिवाः स्मृताः ॥ (ने०तं० १६।४६) (११) मन्त्र शक्ति का प्रभाव क्या है? अचिन्त्य है— यद्यत्प्रकुरुते ज्ञानी शिवशक्तिसमाश्रयात् । तत्तत्प्रसिद्ध्यते तस्य शिवशक्तिप्रभावतः ॥ (नेत्रतन्त्रः १६।७०) तस्य वै संमुखा मन्त्रा दृष्टप्रत्ययकारकाः । क्षणेन कुरुते सर्वं शिवः परमकारणम् ॥ (नेत्रतन्त्रः १६।७१) तं प्रबोध्येत यस्तु ज्ञानयोगबलान्वितः । मन्त्रशक्तिप्रभावेण स दीक्ष्यान्दीक्षयेत्प्रिये । क्षयं नयत्यसौ पाशान् ददात्येव परं पदम् ॥ (नेत्रतन्त्र १६।७४) अचिन्त्या मन्त्रशक्तिर्वै परमेशमुखोद्भवा । (ने०तं० १६।७०) (१२) मन्त्र-सिद्धि के उपाय—(१) दीपन (२) बोधन (३) ताडन (४) अभिषेचन (५) विमलीकरण (६) इंधन (७) निवेशन (८) सन्तर्पण (९) गुप्तिभाव— एवं नव प्रकारेण मन्त्रवादमशेषतः । यो जानाति स जानाति मन्त्र-साधन-साधनम् ॥ मन्त्र और मन्त्रविज्ञान—श्लोक क्र० २६ एवं २७ में कारिकाकार ने यह प्रति- पादित किया है कि योगियों की जो पवित्र भारती है उसमें आत्मशक्ति का सञ्चार हो जाता है और उनके द्वारा उच्चारित मन्त्र वर्णमात्र नहीं रहते प्रत्युत् वे ‘सर्वज्ञबलशाली’ बन जाते हैं और किसी भी इच्छित आकांक्षा को पूर्ण करने वाले एवं सारे कार्यों का निष्पादन करने वाले होते हैं । १-३. महार्थमञ्जरी ।
२६८ स्पन्दकारिका मन्त्रात्मिकाशक्ति—सभी प्रकार के मन्त्र (मन्त्राः) स्पन्दस्वरूपात्मिका संवित् शक्ति के साथ एकाकारता प्राप्त करने के फलस्वरूप सर्वज्ञता आदि (सर्वज्ञता, सर्वात्मक बोध, अप्रतिबंधित स्वातन्त्र्य, अपनी अनन्त शक्तियों का निर्बाध प्रसार, अनन्तशक्ति, शक्ति चक्रों के ऐश्वर्य, सर्वकर्तृत्व, सर्वव्यापकत्व, परम संतृप्ति आदि) आत्मबलों (बल) को अधि-गत करके यथाकांक्षित कार्यों के निष्पादन करने का अधिकार उसी प्रकार अधिगत कर लेते हैं जिस प्रकार शरीरी प्राणियों की इन्द्रियाँ अपने निजी संकल्प मात्र के द्वारा ही अपने समस्त आकांक्षित कार्यों का निष्पादन कर लेती हैं ॥ २६ ॥ भट्टकल्लट कहते हैं—समस्त प्रकार के मन्त्र आवरण शून्य चिद्रूपता (आत्म चैतन्य) के साथ तादात्म्य स्थापित कर लेने के परिणामस्वरूप सर्वज्ञता आदि माहेश्वर बलों को प्राप्त कर लेते हैं तथा समस्त शरीरधारी जीवों की इन्द्रियों की भाँति अपनी अनुकम्पा आदि अधिकार सम्बद्ध कार्यों को निष्पादित करने लगते हैं । आत्मबल का संस्पर्श प्राप्त करने के बिना वे मन्त्र किसी आकारान्तर विशेष (शक्ति शून्य वर्णों, मन्त्रों और मात्राओं वाले विशेष रूप वाले) के द्वारा किसी भी कार्य का निष्पादन एवं फल- सिद्धि में समर्थ नहीं हो पाते । ‘तत् बलं निरावरणचिद्रूपमधिष्ठाय, मन्त्राः सर्वज्ञत्वादिन बलेन श्लाघा- युक्ताः प्रवर्तन्ते अनुग्रहादौ स्वाधिकारे, करणानि यथा देहिनाम्, नान्येन आकारादि विशेषेण ।।' ॥ २६ ॥ १ वहीं ये शान्त रूप एवं निरञ्जन (माया जन्य रागों से मुक्त) मन्त्र आराधकों के चित्त के साथ चिदाकाश में संलीन हो जाते हैं अतः ये समस्त मन्त्र शिव धर्मात्मक माने जाने चाहिए ॥ भट्टकल्लट कहते हैं—ये ‘शान्तरूप’ ‘निरञ्जन’ (मायाकालुष्यविवर्जित) मन्त्र सांसारिक भोगसिद्धि से निवृत्त होकर साधक के चित्त के साथ स्वभाव (निर्मल संवित् तत्त्व = स्वस्वभाव) में या सामान्य स्पन्दात्मिका शाक्त भूमि में विलीन हो जाते हैं । मन्त्रों का स्वस्वभाव है कि वे आत्मा का शिव के साथ तादात्म्य स्थापित कर देते हैं । इसी कारण समस्त मन्त्रों को शिवात्मक कहा जाता है । भट्टकल्लट के शब्दों में—‘तत्रैव स्वस्वभावव्योम्नि निवृत्ताधिकाराः प्रलीयन्ते, शान्तरूपाः, माया- कालुष्यरहिताः, सह साधकचित्तेन अनेन कारणेन शिव संयोजनास्वभावेन, इति शिवात्मिका उच्यन्ते ।।' २ ‘मन्त्र’ आवरणशून्य चिद्रूपता के साथ तादात्म्य (एकाकारता) अधिगत करने के अनन्तर ही सर्वज्ञता आदि माहेश्वर बल प्राप्त कर पाते हैं इसके पूर्व नहीं । मन्त्र के दो रूप हैं—(१) 'साञ्जन एवं (२) 'निरञ्जन' । सांसारिक भोगों की प्राप्ति की ओर उन्मुख मन्त्रों को साञ्जन मन्त्र कहा जाता है किन्तु जिनका प्रयोग निराकांक्ष होकर स्वस्वरूपा- भिव्यक्ति के लिए किया जाता है उन्हें 'निरञ्जन' कहा जाता है । १. 'स्पन्दसर्वस्व' । २. 'स्पन्दसर्वस्व' ।
द्वितीयः निष्यन्दः २६९ मन्त्रों का चिदाकाश में लय एवं उनकी शिवात्मकता— तत्रैव सम्प्रलीयन्ते शान्तरूपा निरञ्जनाः । सह साधकचित्तेन तेनैते शिवधर्मिणः ॥ २७ ॥ वे शान्त (शुद्ध संवित्) एवं निरञ्जन (मायिक आच्छादनों से शून्य) मन्त्र (निवृत्ताधिकार होकर) आराधक के चित्त के ही साथ वहीं (स्वस्वभाव व्योम, या स्पन्दात्मक बल या विशुद्ध चिद्रूप सामान्य स्पन्द रूप शाक्त भूमिका में) लीन हो जाते हैं । अतः वे (समस्त मन्त्र) शिवस्वरूप (ही) हैं ॥ २७ ॥
- सरोजिनी * तत्रैव = 'स्वस्वभाव व्योम में' = विशुद्धचिद्रूपता में, तत्रैव = वहीं (स्पन्दात्मक बल में) ॥ (स्वस्वभाव व्योम में—भट्टकल्लट) निरञ्जनाः = अञ्जन+शून्य (कृतकृत्य होने के कारण निवृत्तअधिकारमल) ॥ कृतकृत्य = अपने पदार्थ या लक्ष्य प्राप्त करने पर आत्मतृप्त ॥ (निरञ्जनाः शान्तरूपाः मन्त्राः स्पन्दात्मके बले सम्यक् अभेदापत्या प्रकर्षेण अपुनरावृत्या लीयन्ते । अधिकार-मलान मुच्यन्ते आराधकचित्तेन सह ।¹ मन्त्र-विज्ञान—समस्त मन्त्र शिवधर्मी या शिवस्वरूप हैं । 'मन्त्र' अपने मूल रूप में आत्मा की किरणें हैं—चैतन्य की रश्मियाँ हैं—'मन्त्राश्चिन्मरीचयः' । 'प्रणव' (महा- मन्त्र) की १२ कलायें हैं । उनमें 'बिन्दु' नाद के रूप में विकसित होता है । नाद ही 'मन्त्र' के रूप में आकार ग्रहण करता है । मन्त्र भी अशुद्धियों से मुक्त हो जाते हैं और उनके कार्यों की अशुद्धियाँ भी, उनके द्वारा लक्ष्य-प्राप्ति के अनन्तर, लुप्त हो जाती हैं । ये मन्त्र एवं उनके स्वामी महेश्वर शिव के स्वभाव वाले हैं—शिवस्वभावी हैं—शिवधर्मी हैं—और स्पन्दसार हैं । ये स्पन्द से उत्पन्न होते हैं और उसी में लय हो जाते हैं ।² एक प्रश्न यह उठता है कि—मन्त्र एवं करणों का उदय तो समान स्रोत से होता हैं—उदय में तो दोनों समधर्मी हैं फिर करण सर्वज्ञात्मक क्यों नहीं हैं? परमेश्वर 'मायाशक्ति' के द्वारा शरीर एवं इन्द्रियों का आविर्भाव करता है और ये भेदपूर्ण हैं— द्वैतात्मक हैं । परमात्मा 'विद्याशक्ति' के द्वारा आकाश के माध्यम से मन्त्रों को जन्म देता है । इन मन्त्रों का सार तत्त्व अधिष्ठात्री शक्तियों में निवास किया करता है । मन्त्रों के द्वारा सर्वज्ञता आदि गुण एवं शक्तियाँ प्राप्त की जाती हैं यह संगत तथ्य है क्योंकि मायिक धरातल पर भी मन्त्र में (किसी देवी के वाचक के रूप में) शरीर एवं पुर्यष्टक की भाँति बोध-संकोचत्व (Limitation in knowledge) नहीं है प्रत्युत् उसमें सर्व- ज्ञत्वादि गुण निहित है ।³ इस पंक्ति की व्याख्या उपर्युक्त विधि से अनन्त भट्टारक के संदर्भ में भी की जानी चाहिए जो कि विद्यापाद पर स्थित है एवं सृष्टि करते हैं । १-३. स्पन्दनिर्णय ।
२७० स्पन्दकारिका इस श्लोक के दूसरी व्याख्या भी की जानी चाहिए—दीक्षादिक में व्याप्त गुरुजनों की इन्द्रियों के रूप में समस्त 'मन्त्र' स्पन्द सिद्धान्त पर आश्रित हैं और वे साधक के मस्तिष्क के साथ स्पन्द में लय हो जाते हैं। दीक्षादिक में प्रवृत्त समस्त आचार्यादिकों के करण रूप समस्त मन्त्र उन स्पन्द तत्त्व रूप 'बल' को अधिगत करके—आराधक के चित्त के साथ भोगमोक्ष के साधन आदि के अधिकार के लिए प्रवृत्त होते हैं और वहीं शान्त, (वाचक शब्दात्मक शरीर रूप) एवं निरञ्जन (शुद्ध) रूप से लय हो जाते हैं। १ (१) मन्त्र स्पन्दसार हैं। मन्त्रों की स्पन्दरूपता एवं स्पन्दसारता का प्रतिपादन ही इस श्लोक का मुख्याभिप्राय है। शैव संप्रदाय के अनुसार (जिसमें ८ एवं १८ भेद हैं) 'मन्त्र' स्पन्द के साथ अभिन्न हैं। (२) मन्त्र, मन्त्रेश्वर आदि के रूप में होने वाली सृष्टि शुद्धसृष्टि है और शिवस्वभावा है किन्तु मायादिरूपा अशुद्ध सृष्टि भी शिव से भिन्न नहीं है प्रत्युत् शिवस्वरूपा ही हैं। शुद्धसृष्टि मन्त्ररूपता है और उनके अधिपति देवता शिव के स्वभाव वाले हैं। २ ये 'मन्त्र' साधक के चित्त की प्रवृत्ति एवं निवृत्ति के निमित्त से अर्थात् उसकी आधारभूत इच्छा से पुनः लीन हो जाते हैं—उसी शक्तिमान् स्वस्वभाव में लय प्राप्त कर लेते हैं। क्योंकि ये स्वस्वभाव के अनुगामी और शक्तिरूप हैं। यही बात 'कालपरा' नामक ग्रन्थ में भी कहा गया है—पर अक्षर रूप वृक्ष में अनेक शक्तियाँ विद्यमान हैं। उनके विवर्त शक्ति के वर्णों के रूप में प्रकट होते हैं और मुख के द्वारा निःसृत होते हैं— ३ पराक्षर तरोधर्तुर्माना शक्तेर्विवर्तगाः । शक्तयो वर्णदेहेषु वक्त्राद्दर्णत्वमागताः ॥ ये शक्तियाँ कृतकृत्य होने के कारण स्वयं शान्त हैं और निरञ्जन (कालुष्यरहित) है, या निरञ्जन तत्त्व से अनुप्राणित हैं। यही कारण है जो शिव शङ्कर में धर्म हैं वे ही मन्त्र में भी अर्थात् मन्त्र भी सर्वज्ञ एवं सर्वकर्ता हैं। सह साधक चित्तेन लीयन्ते तत्र यत् स्मृतम् । ४ शिवतात्मनि सर्वात्म्यात् चाहैतत्सोपपत्तिकम् ॥ साधक के चित्त में मन्त्र लीन हो जाते हैं अर्थात् आत्मा ही शिव है । ५ मन्त्र योग—ये शिवधर्मीमन्त्र जिस सीमा तक अधिकार-सम्पन्न हैं उस सीमा तक प्रवृत्त होते हुए, अञ्जन (वाच्योपराग मल से या वर्णादिरूप भावनात्मकता) से मुक्त होकर एवं शान्तरूप (शुद्ध अर्थात् संविन्मात्रावशिष्ट, एवं निर्विकार आत्मा के स्वरूप वाला) होकर तत्रैव—परमकारण एवं स्वस्वभावशिव में संप्रलीयन्ते—सम्यक् रूप से लीन हो जाते हैं अर्थात् उनके साथ ऐक्य प्राप्त कर लेते हैं। निरञ्जन—अञ्जनरहित । वाच्योपराग मल से या वर्णादिरूप भावनात्मकता से रहित । शान्तरूपाः = संविन्मात्रावशेष । शुद्ध एवं निर्विकार आत्मा वाले । १-२. स्पन्दनिर्णय । ३-५. स्पन्दप्रदीपिका ।
द्वितीयः निष्यन्दः २७१ तत्रैव = स्वस्वभाव, परमकारण शिव में । सम्प्रलीयन्ते—सम्यक् रूप से लय हो जाते हैं । उसके साथ एकाकार हो जाते हैं । एकता प्राप्त कर लेते हैं । शिवधर्मिणः = शिव अर्थात् परमेश्वर के अनन्यसाधारण सर्वज्ञत्वादि गुण (धर्म) वाले अर्थात् शिव से अभिन्न स्वरूप वाले । आराधकचित्तेन सह = आराधक के मन के साथ । कैसे चित्त के साथ? उस अवस्था में अभिसंधि उपाधि से रहित होने के कारण स्वाभाविक मात्रावशेष साधक-चित्त के साथ । इसके द्वारा इसे तात्त्विकमन्त्रवीर्यात्मक प्रतिपादित क्यों किया गया? क्योंकि मांत्रिक चेतना के उदय एवं अस्तमन की दशाओं की परमकारणस्वरूप शिव के साथ अभिन्नता है— 'मन्त्रचेतसोः उदयास्तमयदशयोः परमकारणात् शिवाभेदः ॥' इस प्रकार मन्त्रात्मक एवं साधक के चित्त के साथ एकात्मक होने के कारण स्वयं शिव एवं शक्ति ही वर्णसंकल्पादिरूपधारिणी होकर प्रकट हो जाती हैं और इस तरह होकर शिव की शक्ति स्वस्वभावबल का स्पर्श न पाने वाले साधकों में भेदविभ्रम उत्पन्न करती हुई केवल नियतार्थसाधनाधिकार को ही प्रवर्तित करती है । यथा प्रतिपादित स्वस्वभाव में ही सुदृढ़ आत्मप्रतिपत्ति हुआ करती है । १ 'मन्त्र सर्वार्थसाधनाधिकारी हुआ करते हैं: 'मन्त्राः सर्वार्थसाधनाधिकारिणो भवन्ति' जो यथाप्रतिपादित स्वस्वभाव में ही सुदृढ़ रूप से आत्मप्रतिपत्ति कर चुके हैं उनके उदय एवं अस्तमय (अस्तमन) के परिज्ञाता समस्त मन्त्र सर्वार्थसाधनाधिकारी होते हैं और वे इसके लिए उन-उन कर्तव्यों के साहित्य (एक साथ होना या रहना के नियमादिक की अपेक्षा भी नहीं रखते ) 'मन्त्राः सर्वार्थसाधनाधिकारिणो भवन्ति तत्तदितिकर्तव्यतासाहित्यनियमाद्यपेक्षां बिना' इस स्थिति में— मन्त्र विज्ञान— 'यद्यद्वचनं येन येनाभिसंधिना उच्चारयति तत तस्यामोघमन्त्रतामापद्यते ॥' अतः योगियों के द्वारा, स्वभावबलाक्रमण वाले, सिद्ध एवं स्वतः सिद्ध मन्त्रों के पराक्रम (सामर्थ्य) प्रत्यवमृष्टव्य हैं । मन्त्र शिवधर्मी हैं—'मन्त्रा एव शिवधर्मिणो' । जब तक कि कोई 'क्रिया' ज्ञान नहीं बन जाती एवं कोई 'कार्य' ज्ञेय नहीं बन जाता अर्थात् परतत्त्वाभेदापत्तिलब्धात्मक एवं (इस प्रकार) शिवात्मक नहीं बन जाते तब तक 'मन्त्र' शिवधर्मी नहीं बन पाते । २
१. स्पन्दकारिकाविवृतिः रामकण्ठाचार्य । २. स्पन्दविवृति (रामकण्ठाचार्य) ।
२७२ स्पन्दकारिका 'मन्त्र' द्विविध प्रकार हैं—(१) भोगरूप = 'साञ्जन' (२) मोक्षरूप = 'निरञ्जन' यहाँ निरञ्जन (मायाकालुष्य रहित) एवं शान्त मन्त्रों के विषयों में ही कहा गया है क्योंकि वे ही चिदाकाश में लीन होते हैं। इन मन्त्रों के द्वारा साधक की आत्मा शिवभाव के साथ तादात्म्य प्राप्त कर लेती है। 'मन्त्र' का स्वरूप—(१) 'मन्त्र' परावाक् स्वरूप है—देवतारूप हैं—कुण्डलिनी- शक्तिरूप हैं। 'कामधेनुतन्त्र' में वर्णमाला के प्रत्येक वर्ण को कुण्डलिनीस्वरूप कहा गया है। (२) 'मन्त्र' अहंविमर्शस्वरूप हैं। प्रत्येक विमर्श अभिलापात्मक ही होता है। अभिलाप तो वर्णात्मक होता है अतः प्रत्येक विमर्श शब्दात्मक होता है। वाणी या शब्द—(१) परा (२) पश्यन्ती (३) मध्यमा (४) वैखरी चार सोपानों पर व्यक्त होते हैं। शब्द (वाणी, वाक् तत्त्व) से पूर्णतः पृथक् 'विमर्श' संभव नहीं है। 'वर्ण' 'पद' एवं 'मन्त्र' ये तीनों शब्द के अध्व (मार्ग) हैं। 'कला' 'तत्त्व' एवं 'भुवन' ये तीन 'अर्थाध्व' हैं। इन्हीं ६ अध्वाओं (षडध्व) से समस्त जगत् की उत्पत्ति होती है। 'शब्द' एव 'अर्थ' शिव-शक्ति के रूप हैं। शब्दना-विरहित विमर्श की सत्ता संभव नहीं है। विमर्शात्मक शब्दना अपने उच्चतम शिखर पर 'परावाक्' कहलाती है। यह आन्तर शब्दना के स्वरूप वाली (स्पन्दात्मिका शब्दना) 'परावाक्' मयूराण्डरसवत् अपने भीतर समस्त वाचक एवं वाच्य (शब्दराशि) को अविभक्त रूप में अवस्थित रखती है और अहं रूप (बीजरूप) में अवस्थित है। समस्त 'मन्त्र' इसी अहमात्मक परावाक् के स्वस्वरूप हैं। 'परावाक्' 'सामान्य स्पन्द' है। सामान्य स्पन्द गतिशून्य होकर भी किंचित् चलता वाला है इसी 'परावाक्' से 'पश्यन्ती' 'पश्यन्ती' से 'मध्यमा' एवं 'मध्यमा' से 'वैखरी' का विकास होता है। 'वैखरी वाक्' में प्रसृत परावाक् अपने स्थूलतम सोपान पर आरूढ़ होती है और वैखरी वाक् के (१) पूर्व मालिनी (मातृका) एवं (२) 'मालिनी' दो स्तरों पर व्यक्त होती है। परावाक्-पश्यन्ती-मध्यमा-वैखरी—(१) पूर्वमालिनी—अ से क्ष पर्यन्त वर्णमाला ('स्वच्छन्द तन्त्र' में भी मान्य) (२) मालिनी—न से क पर्यन्त वर्णमाला (मालिनी विजयोत्तर आदि तन्त्रों में प्रतिपादित) ॥ मालिनी का क्रम—न, ऋ, ॠ, ऌ, ॡ, थ, च, ध, ई, ण, उ, ऊ, ब, क, ख, ग, घ, ङ, इ, अ, व, भ, य, उ ढ, ठ, झ, ञ, ज, ष, र, ट, प, छ, ल, आ, स, अः, ह, ष, क्ष, म, श, अं, त, ए, ऐ, ओ, औ, द, क (मालिनीविजयोत्तरतन्त्र)। पशुप्रमाता एवं पतिप्रमाता में साम्य एवं सभी अवस्थाओं में शिवत्व की व्यापकता— यस्मात् सर्वमयो जीवः सर्वभावसमुद्भवः । तत्संवेदनरूपेण तादात्म्यप्रतिपत्तितः ॥ २८ ॥ तेन शब्दार्थ चिन्तासु न साऽवस्था न यः शिवः । भोक्तैव भोग्यभावेन सदा सर्वत्र संस्थितः ॥ २९ ॥
द्वितीयः निष्यन्दः २७३ जिससे कि पशुप्रमाता सर्वमय है क्योंकि (पशुप्रमाता भी प्रति प्रमाता की भाँति जगत् के समस्त) भावों (घट, पट आदि) के साथ संवेदनस्वरूप तादात्म्य प्राप्त करके समस्त भावों की सृष्टि करता रहता है ॥ २८ ॥ अतः शब्द (वाचक) एवं अर्थ (वाच्य) की चिन्ताओं (विमर्शन) में ऐसी कोई अवस्था ही नहीं है जो शिवरूपात्मिका न हो । नित्य रूप से (सदैव) सर्वत्र भोक्ता (आत्मा) ही भोग्य (प्रमेय पदार्थ) के रूप में अवस्थित है ॥ २९ ॥
- सरोजिनी * शिव सर्वत्र स्थित है, सदैव स्थित है, सर्वव्यापक है । इसी प्रकार जीव भी सर्वत्र स्थित है, सदैव स्थित है, एवं सर्वव्यापक है । जीव 'सर्वमय' है । शब्द एवं अर्थ के माध्यम से व्यक्त ऐसी कोई संवेदनात्मक अवस्था ही नहीं है जो शिवात्मक न हो ॥ सारांश यह कि—आत्मा ही शिव है । आत्मा ही जगत् है । यह सब जगत् आत्मा ही है । सब चिन्मय है । इस श्लोक में यह प्रतिपादित किया गया है कि—शुद्धसृष्टि तो शिवस्वभावा है ही किन्तु जो मायादि रूपा अशुद्ध सृष्टि है वह भी शिवस्वरूपा है ।¹ सृष्टि के दो रूप हैं—(१) शुद्धा सृष्टि (२) अशुद्धा सृष्टि । जीवात्मा समस्त विश्व के साथ अभिन्न है क्योंकि समस्त वस्तुओं का सृजन उसी एक के द्वारा किया गया है क्योंकि वह समष्टि का (हस्तामलकवत् एक साथ ही) ज्ञान प्राप्त करता है और सर्वव्यापक है—विश्वव्यापकत्व प्राप्त है । अतः ऐसी कोई अवस्था नहीं है जो कि शिव से अभिन्न न हो । अनुभविता सर्वत्र विद्यमान है और वह अनुभूत पदार्थ के रूप में भी विद्यमान है ।² यस्मात् = जिसके द्वारा । जिसके कारण । जीवः = प्राणी । ग्राहक । सर्वमयः = शिववद्विश्वरूप । शब्दार्थ = शब्द = वाचक । अर्थ = पदार्थ । अर्थ—वाच्य ॥ चिन्तासु = विकल्पज्ञान आदि रूपों में स्थित चिन्ताओं में । सावस्था = वह अवस्था । आदि-मध्य-अन्त रूप अवस्थायें । 'सर्वमेव शिव- स्वरूपम् इत्यर्थः ।।' ग्राहक, भोक्ता, चिदात्मा ही भोग्य भाव से देह-नील आदि के रूप में सदैव नित्य रूप से सर्वत्र विचित्र तत्त्वभुवनादिक पद में स्थित हैं । कोई भी भोग्य वस्तु भोक्ता से भिन्न नहीं है 'न तु भोग्यं नाम किंचिद् भोक्तुर्भिन्नमस्ति ।।'³ जीव—इस शब्द से प्रारंभ करके एवं 'शिव' शब्द से उपसंहार करने के द्वारा ग्रन्थकार ने—'जीवशिवयोर्वास्तवो न कोऽपि भेदः'—इस प्रकार देहादिक अवस्थाओं में १-३. स्पन्दनिर्णय । स्पं० १८
२७४ स्पन्दकारिका कोई अपूर्णमन्यता मन्तव्य नहीं है प्रत्युत् चिद्घनशिवस्वभावता ही भंग्योपदेश द्वारा यहाँ प्रतिपाद्य है ।¹ भट्टकल्लट ने 'स्पन्दकारिकावृत्ति' में इस कारिका की व्याख्या इस प्रकार की है—यह जीवात्मा सर्वमय है क्योंकि यह स्वीय संवेदनों के माध्यम से प्रत्येक भाव का सृजन करता है । अनुभव में आने वाला प्रत्येक पदार्थ उसके संवेदन का विषय बन जाता है । यह मितप्रमाता किसी भी बाह्य पदार्थ का अनुभव करने के अनन्तर उसे अपने शरीर के रूप में ग्रहण कर लेता है । इसका शरीर मात्र सिर, पैर आदि अंगों वाला शरीर नहीं रह जाता प्रत्युत् बाह्यार्थ भी अनुभव के विषय बन जाने पर उसका शरीर बन जाते हैं— 'सर्वात्मक एवायमात्मा सर्वानुभावोत्पत्तिद्वारेण अनुभूयमानस्यैव संवेदनात् बाह्यार्थ- मनुभूयमानमेव शरीरत्वेन गृह्णाति, न तु शिरः पाण्यादिलक्षितम् एकमेवास्य शरीरम्' ।। 'तेन शब्दार्थचिन्तासु ..... संस्थितः ।' इस कारिका की व्याख्या भट्टकल्लट ने 'स्पन्दकारिकावृत्ति' में इस प्रकार की है—'तेन तथाविधेन सर्वात्मकेन स्वभावेन, शब्दार्थयोः चिन्तासु न सा अवस्था या शिवस्वभावं न व्यञ्जयति, अतो भोक्तैव हि भोग्यभावेन सर्वत्रावस्थितो न त्वन्यत् भोग्यमस्ति ।। २९ ।। साधकों के चित्त में 'मन्त्र' लीन हो जाते हैं और इस प्रकार आत्मा ही शिव है । इसको प्रमाणित करने हेतु ग्रन्थकार ने २८, २९ कारिकायें कही हैं । उत्पलदेव कहते हैं— सह साधकचित्तेन लीयन्ते तत्र यत् स्मृतम् । शिवात्मनि सर्वात्म्यात् चाहैतत्सोपपत्तिकम् ॥ बोद्धा होने के कारण जीव या आत्मा सर्वमय, सर्वात्मक एवं विश्वरूप है । उत्पलदेव कहते हैं— 'यस्माज्जीव आत्मैव सर्वमयः सर्वात्मको विश्वरूपः बोद्धृरूपत्वात् । कहा भी गया है—तत्त्व ज्ञान के होते ही सब चिन्मय हो जाता है । वेद्य का ऐसा कोई भाग नहीं है जो कि वेदक से बाहर हो । 'वेद्य' ही वेदक है । 'वेदक' संवित् है । 'संवित्' आत्मा है ।' तब तो सबसे बड़ा यथार्थ यही है कि—आत्मा ही जगत् है । 'यदैव विदितं विश्वं तदानीमेव चिन्मयम् । यन्नास्ति भागो वेद्योऽसौ नाथ यो वेदकाद् बहिः ॥ वेद्यो वेदकतामाप्तो वेदकः संविदात्मकम् । संवित् त्वदात्मा चेत् सत्यं तदिदं त्वन्मयं जगत् ।।' छान्दोग्य श्रुति में भी कहा गया है— 'आत्मैवेदं जगत् सर्वं नेह नानास्ति किंचन' ।।' (छा० ३।९।१२) १. स्पन्दनिर्णय ।
द्वितीयः निष्यन्दः २७५ अर्थात् इदम् के रूप में प्रतीयमान यह सब जगत् आत्मा ही है। आत्मा में नानात्व किंचिन्मात्र भी नहीं है। समस्त भावों का समुद्भव आत्मा से ही होता है। संविद् के आरोहण से ही 'परा' 'पश्यन्ती' 'मध्यमा' आदि वाणियों का उदय होता है और समस्त सत्तायें इसीसे सिद्ध होती है। आचार्यों ने भी कहा है कि—सभी के कारण तुम्हीं हो क्योंकि घट में मृत्तिका के समान सभी में तुम्हारा अन्वय है। जब संवित् के बिना विश्व की सिद्धि हो ही नहीं सकती—संपूर्ण विश्व संविद्—समन्वित है—तब तो असंवित् विश्व का कारण कैसे हो सकता है? संवित् ही सत् है और सत् ही संवित् है। संवित् की उपासना किये बिना वहीं संपूर्ण सत् है—यह अनुभव में नहीं आ सकता— त्वत्कारणत्वं सर्वस्मिन्नपि ज्ञातं त्वदन्वयात् । संवित्समन्विते विश्वे नाऽसंवित् कारणं भवेत् ॥ संविदायतनं ज्ञातं तत् सदाख्यां प्रपद्यते । तावतैव न लभ्या स्यादनुपासितसंविदा ॥ तथा यह भी कहा है कि— त्वदात्मकत्वं भावानां विवदन्ते न केचन । यत्प्रकाशदशां याता नाऽप्रकाशः प्रकाशते ॥ अर्थात् सभी भाव तुम्हारे ही स्वरूप है इसमें किसी का विवाद नहीं है क्योंकि सब प्रकाशित होते हैं। क्या कहीं अप्रकाश भी प्रकाशित होता है? और भी कहा गया है— 'तुम प्रकाशक एक ही हो। सर्जन भाषण और बोधन-ये तीनों तुम्हारे प्रकाश हैं। तुम अन्य प्रकाशों से व्यतिरिक्त हो, जैसे दूसरे प्रकाशक सूर्य आदि। किन्तु तुम्हारे प्रकाश के उदय के बिना कोई दूसरा प्रकाश प्रकाशित नहीं हो सकता। श्रुति, पंचरात्र भी तो यही कहते हैं कि वहाँ सूर्य चन्द्र आदि का प्रकाश नहीं है। उसी के प्रकाश से यह सब प्रकाशित हो रहा है— 'सृजन् वदन् ज्ञापयंश्च त्रिधैकस्त्वं प्रकाशकः । व्यतिरिक्तः प्रकाशेभ्यो न यथाऽन्ये प्रकाशकाः । न प्रकाशाः प्रकाशन्ते त्वत्प्रकाशोदयं विना ॥' पंचरात्र में भी कहा गया है कि—'न तत्रादित्यो भाति' अर्थात् वहाँ सूर्य-चन्द्रादि प्रकाश नहीं है। उसी के प्रकाश से यह सब प्रकाशित हो रहा है। संवित् सर्वमय है—इसका अन्य उदाहरण भी है। जितने संवेद्य हैं वे संवेदनरूप अनुभव के द्वारा ही संविदित होते हैं। उनसे तादात्म्य होता है। तद्भावरूपता होती है और अभेद का संवेदन होता है। 'स्वात्मसप्तति' में कहा गया है—सभी वस्तुएं ज्ञानस्वभाव का ही विषय होती हैं और उसके साथ तादात्म्य प्राप्त हो जाती है। जीव ज्ञान स्वरूप है अतः वह सर्वमय है—
२७६ स्पन्दकारिका 'यद्वद् वस्तुस्वभावेन ज्ञानेन विषयीकृतम्। तद्वत्तादात्म्यमायाति जीवः सर्वमयो ह्यतः॥' 'संवित्प्रकाश' में कहा गया है—अग्नि से समाविष्ट सब अग्निरूप ही दिखता है, वैसे ही ज्ञान समाविष्ट सब ज्ञानरूप ही देखिए'— 'यथाऽग्निना समाविष्टं सर्वं तद्रूपमीक्ष्यते। तथा ज्ञानसमाविष्टं सर्वं तद्रूपमीक्ष्यताम्॥' 'आगमरहस्य' में भी कहा गया है—ज्ञान से आकार वर्ग भासित होता है अतः यह विश्वमयी विभूति ज्ञान ही है। तुम्हीं विश्वात्मक हो, यह केवल शास्त्रसिद्ध ही नहीं है, आत्मसंवित् से संविदित् होने के कारण अनुभवसिद्ध भी है— आकार वर्ग उपरि प्रतिभासतेऽस्य, ज्ञानस्य सापि तव विश्वमयीविभूतिः। विश्वात्मकस्त्वमिति नाऽऽगमसिद्धमेतत्, किन्तु स्वसंविदितरूपतयापि सिद्धम्॥ संवित् तत्त्व ही प्राण के माध्यम से वाणी का रूप धारण करता है—'संविदेव प्राणद्वारेण वायूरूपतां धत्ते॥' इसीलिए कहा भी गया है—संवित् तत्त्व वाणी का रूप-अर्थात् परा-पश्यन्ती- मध्यमा एवं वैखरी भी बन जाता है। इन चारों वाणियों का वक्ता निर्विशेष परमस्थायी और नित्योदित निजाकृति है। सूर्य के समान तेज का विस्तार करता हुआ वह हृदय में प्रकाशित होता है और चिदिच्छा-शक्ति से संबुद्ध है और आत्मबल ही उसका बल है— स्थानेषु विवृते वायौ कृतवर्णपरिग्रहा। वैखरी वाक् प्रयोक्तॄणां प्राणवृत्तिनिबन्धना॥ केवलं बुद्धयुपादानात् क्रमरूपानुपातिनी। प्राणवृत्तिमतिक्रम्य मध्यमा वाक् प्रवर्तते॥ अविभागात्तु पश्यन्ती सर्वतः संहृतक्रमा। स्वरूप ज्योतिरेवान्तः सूक्ष्मा वागनपायिनी॥ स्वयं रौति य एषोन्तर्निर्विशेषनवात्मकः। स परः परमः स्थायी नित्योदित निजाकृतिः॥ चिदिच्छाशक्तिसम्बुद्धः स्पन्द आत्मबलेरितः। सवितेव स तेजांसि विचिन्वन् हृदि राजते॥ 'प्रत्यभिज्ञा' में भी कहा गया है—प्रत्यवमर्शात्मा चिति ही सरस परावाक् है। परमात्मा का यह स्वातन्त्र्य ही मुख्य ऐश्वर्य है। वह सर्वदेशकाल में स्फुरित होती हुई सभी का आधार है और परमेश्वर का हृदय है—और उसका रूप है अन्तः संकल्प— 'चितिः प्रत्यवमर्शात्मा परावाक् स्वरसोदिता। स्वातन्त्र्यमेतन्मुख्यं तदैश्वर्यं परमात्मनः॥
द्वितीयः निष्यन्दः २७७ सा स्फुरत्ता महासत्ता देशकालाविशेषिणी । सैषाऽऽभारतया प्रोक्ता हृदयं परमेष्ठिनः ॥' इस महासत्ता का रूप है अन्तःसंकल्प। उसमें शब्द एवं अर्थ-दोनों एक साथ स्फुरित होते हैं। अतः दोनों का अभेद ही प्रख्यात है। ग्रन्थकार कहते हैं—'शब्दानुवेधन के बिना प्रत्यय का उदय नहीं होता'— 'यतः शब्दानुवेधेन न बिना प्रत्ययोद्भवः ॥' 'वाक् का मूल संवित् है'। कहा भी गया है— जैसे निजात्मा संवित् से संपूर्ण जगत् अनुविद्ध है वैसे ही संवित् से सम्पूर्ण वाणी अनुबिद्ध है— 'यथा तथा जगद्विद्धं सर्वमेव निजात्मना । तथा तयाऽनुविद्धेयं सर्वतो भाति भारती ॥' योगिनाथ का कथन है कि—परतत्त्व में किसी भी वस्तु की सिद्धि के लिए वाणी को स्वीकार करना पड़ता है क्योंकि रूप के अनुसंधान से वस्तु का निश्चय होता है। उसकी उन्मुख वृत्ति से ही वस्तु के सद्भावना की कल्पना होती है। उसके बिना किसी को आत्मलाभ नहीं हो सकता क्योंकि उस अवस्था में केवल स्वरूप ज्योति रहती है। वहाँ विभाग और क्रम की अपेक्षा नहीं होती। उसका रूप योगिगम्य होता है। उसी उन्मुखता से चिन्तनमयी वाग्धारा बनती है। तदनन्तर विशिष्ट शब्द के विषय की स्फुरणात्मिका विवक्षा होती है। इसके बाद वह शब्द का रूप धारण करके अर्थ को प्रकट करती है। इसलिए संवित्प्रसूत वाणी के बिना किसी अर्थ का अवधारण नहीं हो सकता।'- 'तस्मात् सर्वस्य सिद्ध्यर्थं भारती कारणं परे । परेष्वप्या तदा रूपान्वेषणार्थं निश्चयात् ॥ तस्या औन्मुख्यवृत्त्यैव सद्भावपरिकल्पनात् । नहि तामन्तरेणैषा लभेताऽऽत्मानमम्बिके ॥ सा च तस्यामवस्थायां स्वरूपज्योतिरित्यते । निर्विभागक्रमापेक्षा योगिगम्यानुरूपिणी ॥ तत औन्मुख्यतश्चिन्तामयी भवति वाक् शिवे । विशिष्टशब्दविषयविवक्षास्फुरणात्मिका ॥ ततः शब्दात्मकत्वेन विवृतार्थमयी भवेत् । तदात्मतामन्तरेण यस्मान्नार्थावधारणम् ॥' इस प्रकार सर्वप्रकाशक संवित्स्वरूप की प्रभा के समान प्रकाशन शक्ति अन्तस्संकल्परूपा वाणी बनकर फिर वर्ण, पद, वाक्य को जीवन-दान करती है और पदार्थ के रूप में बाहर दीखती है। यह प्रबुद्धों के लिए स्वानुभवसिद्ध है।