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श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)

Sri Bhashya of Bhagavad Ramanujacharya with Commentary

भगवद् रामानुजाचार्य (सम्पादक: स्वामी वासुदेवाचार्य) द्वारा

DevanagariHindipublished696 पृष्ठ

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ही हैं, ऐसा अश्वपति ने उपदेश दिया। शरीर के मध्यभाग को संदेह कहते हैं। इस प्रकार जो द्युमूर्धादिविशिष्ट रूप परमात्मा का प्रसिद्ध है उसे ही वैश्वानर का बतलाया गया इससे स्पष्ट हो जाता है कि-वैश्वानर परमात्मा ही है। पुनरप्यनिर्णयमेवाशंक्य परिहरति— पुनः अनिर्णय की आशंका करके परिहार करते हैं— शब्दादिभ्योऽन्तः प्रतिष्ठानाच्च नेतिचेन्न तथा दृष्ट्युपदेशादसम्भवात् पुरुषमपि चैनमधीयते ।१।२।२७।। यदुक्तं वैश्वानरः परमात्मेति निश्चीयत इति, तन्न शब्दादिभ्योऽन्तः प्रतिष्ठानाच्च, जाठरस्याप्यग्नेरिह प्रतीयमानत्वात् । शब्दस्तावद् वाजिनां वैश्वानर विद्याप्रकरणे “स एषोऽग्निर्वैश्वानरः” इति वैश्वानर समानाधिकरणतयाऽग्निरिति श्रूयते । अस्मिन् प्रकरणे च “हृदयं गार्हपत्यो मनोऽन्वाहार्यं पचन आस्यमाहवनीयः” इति वैश्वानरस्य हृदयादिस्थस्याग्नित्रय कल्पनं क्रियते । ‘तद् यद्भक्तं प्रथममागच्छेत्तद्धोमीयं स यां प्रथमामाहुतिं जुहुयात्तां जुहुयात्प्राणाय स्वाहा” इत्यादिना प्राणाहुत्याधारत्वं च वैश्वानरस्यावगम्यते । तथा वैश्वानरास्मिन् पुरुषेऽन्तः प्रतिष्ठानं वाजसनेयिनः समामनन्ति “स यो हैतमेवमग्नि वैश्वानरं पुरुषविधं पुरुषेऽन्तः प्रतिष्ठितं वेद” इति। अतोऽग्नि शब्द सामानाधिकरण्यात् अग्नित्रेतापरिकल्पनात् प्राणाहुत्याधार भावात् अन्तः प्रतिष्ठानाच्च वैश्वानरस्य जाठरत्वमपि प्रतीयत इति नैकान्ततः परमात्मत्व- मिति चेत् । जो यह कहा कि-वैश्वानर परमात्मा ही है, सो यह समझ में नहीं आता, क्यों कि-शब्द आदि तथा आभ्यंतरस्थित होने से, जाठराग्नि की

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प्रतीति होती है। वाजसनेय प्रश्नोपनिषद् के वैश्वानर के प्रकरण में जैसे- वैश्वानर शब्द के साथ अग्नि शब्द का सामानाधिकरण्य अभेद रूप से कहा गया है। प्रस्तुत प्रकरण में भी - "हृदय गार्हपत्याग्नि है, मन अन्वाहार्यपचन है तथा मुख आहवनीय है" वैश्वानर की, हृदय आदि तीन स्थानों में तीनों अग्नियों के रूप में कल्पना की गई है । "जो अन्न पहिले आवे उसका हवन करना चाहिए उस समय वह भोक्ता जो प्रथम आहुति दे उसे" प्राणाय स्वाहा "कहकर दे" इत्यादि में भी प्राणाहुति के आधार रूप से वैश्वानर की ही प्रतीति होती है। तथा वाजसनेय सहिता में इस वैश्वानर आत्मा को जीव शरीर का अभ्यन्तर्वर्त्ती भी कहा गया है—"जो पुरुष के देहान्तर्वर्ती पुरुषाकृति वैश्वानर अग्नि को जानते हैं।" इस प्रकार अग्नि के साथ अभेद रूप से निर्देश, अग्नित्रय रूप से कल्पना, प्राणाहुति की अधिकरणता तथा शरीराभ्यंतर स्थिति आदि से वैश्वानर, जाठराग्नि ही प्रतीति होता है, एकमात्र परमात्मा ही वैश्वानर शब्दाभिधेय नहीं है। तत्र-तथा दृष्ट्युपदेशात्-पूर्वोक्तस्य त्रैलोक्य शरीरस्य परस्य ब्रह्मणो वैश्वानरस्य जाठराग्निशरीरतया तद्विशिष्टस्योपासनो- पदेशात् । अग्निशब्दादिभिर्हि न केवलो जाठरः प्रतिपाद्यते, अपितु जाठराग्नि विशिष्ट. परमात्मा । कथमिदमवगम्यत इति चेत्-- असंभवात् जाठरस्य केवलस्य त्रैलोक्यशरीरत्वासंभवात् । त्रैलोक्य- शरीरतया प्रतिपन्नवैश्वानर समानाधिकरणो जाठर विषयतया प्रतीयमानोऽग्निशब्दो जाठरशरीरतया तद् विशिष्टं परमात्मानमे- वाभिद धतीत्यर्थः । यथोक्तं भगवता- "अहं वैश्वानरोभूत्वा प्राणिनां देहमाश्रितः, प्राणापान समायुक्त. पचाम्यन्नं चतुर्विधम् "इति जाठरानल शरीरो भूत्वेत्यर्थः । अतः तद्विशिष्टस्योपासनमत्रोप- दिश्यते । कि च-पुरुषमपिचैनमधीयते वाजसनेयिनः "स एषोऽग्नि- वैश्वानरो यत्पुरुषः" इति; नहि जाठरस्य केवलस्य पुरुषत्वम्,

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( ४४६ ) परमात्मन एव हि निरुपाधिकं पुरुषत्वं यथा-“सहस्रशीर्षापुरुषः” पुरुष एवेदं सर्वम्” इत्यादौ । उक्त शंका असंगत है, जाठराग्नि का परमात्मा की दृष्टि से ही उपदेश किया गया है, अर्थात् त्रैलोक्य शरीरधारी के रूप से परब्रह्म को, वैश्वानर कहा गया है, जाठराग्नि उनका शरीर स्थानीय है, इसी दृष्टि से, जाठराग्नि विशिष्ट रूप का उपास्य रूप से उपदेश दिया गया है। अग्नि आदि शब्द केवल जाठराग्नि बोधक ही नहीं हैं, अपितु जाठराग्नि विशिष्ट रूप परमात्मा के भी बोधक है। यदि कहो कि, ऐसा कैसे समझें तो केवल जाठराग्नि में, त्रिलोकी शरीरत्व संभव नहीं है। त्रैलोक्य शरीर विशिष्ट रूप से प्रतिपन्न, वैश्वानर के साथ, सामानाधिकरण्य रूप से प्रयुक्त, यदि कोई शब्द, जाठराग्नि अर्थ का बोधक हो तो भी, यही समझना चाहिए कि-जाठराग्नि परमात्मा का शरीर है और वह परमात्मा का ही बोधक है, जैसा कि भगवान ने स्वयं कहा है-“मैं वैश्वानर होकर प्राणियों के शरीर में आश्रित हूँ, प्राण अपान वायु से संयुक्त होकर चार प्रकार के खाद्यों का परिपाक करता हूँ” उक्त वाक्य में जाठराग्नि विशिष्ट ही उपास्य बतलाए गए हैं। वाजसनेय में इन्हें ही पुरुष रूप बतलाया गया है-“यह वैश्वानर अग्नि ही पुरुष हैं।” केवल जाठराग्नि मात्र, पुरुष नहीं हो सकता एकमात्र परमात्मा को ही पुरुष रूप से स्मरण किया गया है-” सहस्रशीर्षापुरुषः “पुरुष एवेदं सर्वम्” इत्यादि । अतएव न देवता भूतञ्च।१।२।२८॥ उक्तेभ्य एव हेतुभ्यो देवतायाश्च ‘तृतीयस्य’ महाभूतस्यापि न वैश्वानरत्व प्रसंगः । उक्त कारणों से ही, वैश्वानर शब्द, देवता या तृतीय महाभूत अग्नि का भी, वाचक नहीं है। साक्षादप्यविरोधं जैमिनिः ।१।२।२९॥ वैश्वानरसमानाधिकरणस्याग्निशब्दस्य जाठराग्नि शरीरतया तद् विशिष्टस्य परमात्मनो वाचकत्वं, तथैव परमात्मन उपास्यत्व ankurnagpal108@gmail.com

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चोक्तम् । जैमिनिस्त्वाचार्यो वैश्वानर शब्दवदग्निशब्दस्यापि परमात्मन एव साक्षात् अव्यवधानेन वाचकत्वे न कश्चिद् विरोध इति मन्येत । अग्नि शब्द का वैश्वानर के साथ, अभेदभाव निर्दिष्ट होते हुए भी, जाठराग्नि शरीर होने से, तद्विशिष्ट परमात्मा का ही वाचक हो सकता है । वैसे ही परमात्मा के रूप को, उपास्य भी कहा गया है। जैमिनि आचार्य, वैश्वानर शब्द की तरह, अग्नि शब्द का भी, परमात्मा से, साक्षात् संबंध मानते हैं, और वाचकता में कोई विरोध नहीं समझते । एतदुक्तं भवति, यथा वैश्वानर शब्दः साधारणोऽपि परमा- त्माऽसाधारणधर्मविशेषितो विश्वेषां नराणां नेतृत्वादिना गुणेन परमात्मानमेवाभिदधातीति निश्चीयते, एवमग्निशब्दोऽप्यग्रनयना- दिना येनैवगुणेन योगाज्ज्वलने वर्तते, तस्यैव गुणस्य निरुपाधिकस्य काष्ठागतस्य परमात्मनि सम्भवादस्मिन् प्रकरणे परमात्माऽसाधा- रण विशेषितः परमात्मानमेवाभिधत्त इति । जैसे कि वैश्वानर शब्द, साधारण और अविशिष्ट होते हुए भी परमात्मा के असाधारण विशिष्ट धर्मों से, विशेषित होकर, समस्त जीव समुदाय के नेता परमात्मा, का वाचक है; उसी प्रकार “अग्नि” शब्द भी “आगे ले जाने वाला” व्युत्पत्ति के अनुसार नेतृत्व गुणवाला है । परमात्मा का यह स्वाभाविक गुण है; इस प्रकरण में परमात्मा के असाधारण गुणों से विशेषित होने से, वह अग्नि भी परमात्मा बोधक ही है । “यस्त्वेतमेवं प्रादेशमात्रमभिविमानं” इत्यपरिच्छिन्नस्य परस्य ब्रह्मणो द्युप्रभृतिपृथिव्यन्त प्रदेश संबन्धिन्या मात्रया परिच्छिन्नत्वं कथमुपपद्यते ?—तत्राह— शंका की जाती है कि— 'वह प्रादेश मात्र में ही परिमित नहीं है', इस श्रुति वाक्य में कहे गए अपरिच्छिन्न परब्रह्म की, द्युलोक से पृथ्वी पर्यन्त परिणाम परिच्छिन्नता कैसे हो सकती है ? इसका उत्तर देते हैं—

( ४५१ ) अभिव्यक्तेरित्याश्मरथ्यः ।१।२।३०॥ उपासकाभिव्यक्त्यर्थं प्रादेशमात्रत्वं परमात्मन् इत्याश्मरथ्य आचार्यो मन्यते । “द्यौर्मूर्धा आदित्यश्चक्षुः, वायुः प्राणः, आकाशो मध्यकायः आपोबस्तिः, पृथिवी पादौ,” इति द्युप्रभृतिप्रदेशसंबन्धिन्या मात्रया परिच्छिन्नत्वं कृत्स्नमभिव्याप्तवता विगतमानस्य ह्यभिव्यक्ते- रेव हेतुर्भवति । उपासकों की अभिव्यक्ति सामर्थ्य के लिए, परमात्मा का प्रादेश मात्र रूप, शास्त्रों में वर्णन किया गया है; ऐसा आश्मरथ्य आचार्य का मत है। “द्युलोक सिर, सूर्य नेत्र, वायु प्राण, आकाश मध्य शरीर, जल बस्ति, पृथिवी चरण,” इत्यादि वाक्य में, द्युलोक आदि प्रदेशों से संबंधित प्रदेशगत परिमाण द्वारा, सर्वव्यापी परमात्मा की, जो परिच्छिन्नता बतलाई गई है, वह अभिव्यक्ति सामर्थ्य के लिए ही है। मूर्ध प्रभृत्यवयवविशेषैः पुरुषविधत्वं परस्य ब्रह्मणः किमर्थ- मिति चेत्—तत्राह— सिर आदि अवयव विशेषों से युक्त पुरुष रूप का विधान परमात्मा के लिए क्यों किया गया है ? इस शंका का समाधान करते हैं— अनुस्मृतेर्बादरिः ।१।२।३१॥ तथोपासनार्थमिति बादरिराचार्यो मन्यते ।” यस्त्वेतमेवम-

  • भिविमानमात्मानमात्मानं - वैश्वानरमुपास्ते स सर्वेषु लोकेषु, सर्वेषु भूतेषु, सर्वेषु आत्मसु अन्नंमत्ति” इति ब्रह्म प्राप्तये ह्युपासनमुपदिश्यते एतमेवमिति-उक्त प्रकारेण पुरुषाकारमित्यर्थः । सर्वेषु लोकेषु, सर्वेषु भूतेषु, सर्वेष्वात्मसु वर्त्तमानं यदन्नं भोग्यं तदत्ति-सर्वत्र वर्त्तमानं स्वत एवानवधिकातिशयानन्दं ब्रह्मानुभवति । यत्तु सर्वैः कर्मवश्यैरात्मभिः प्रत्येकमनन्यसाधारणमन्नंभुज्यते तन्मुमुक्षुभिस्त्या- ज्यत्वादह्रि न गृह्यते ।

( ४५२ ) परब्रह्म का पुरुष रूप से वर्णन उपासना के लिए किया गया है, ऐसा बादरि आचार्य का मत है। "जो सर्वतो भाव से अपरिमित इस वैश्वानर आत्मा की पुरुषाकार रूप से उपासना करता है, वह व्यक्ति समस्त लोकों में समस्त भूतों में, समस्त आत्माओं में वर्त्तमान जो भोग्य अन्न है, उनको भोगता है" इत्यादि में उपासना को ही ब्रह्म प्राप्ति का उपाय बतलाया गया है। "एतमेवम्" का तात्पर्य है ऐसे पुरुषाकार। सब लोक समस्त भूत और समस्त आत्माओ के वर्त्तमान अन्न के भोग का तात्पर्य है कि-सर्वत्र अवस्थित निरतिशय असीम आनंद स्वरूप ब्रह्म की अनुभूति करता है। यदि अर्थ करें कि-कर्माधीन आत्माओं से मुक्त साधारण भोगों को भोगता है, तो समीचीन न होगा; मुमुक्षुओं के लिए ये भोग त्याज्य हैं। यदि परमात्मा वैश्वानरः, कथंतर्हि उरः प्रभृतीनां वेद्यादित्वो- पदेशः ? यावताजाठराग्नि परिग्रह एवैतदुपपद्यत ? इत्यत्राह- यदि परमात्मा ही वैश्वानर है, तो उर इत्यादि का वेदी इत्यादि के रूप में उपदेश क्यों किया गया है ? वेदी इत्यादि के वर्णन से तो यही ज्ञात होता है कि-जाठराग्नि का ही वर्णन है इस संशय का उत्तर देते हैं- सम्पत्तेरिति जैमिनिस्तथा हि दर्शयति ॥१।२।३२॥ अस्य परमात्मन एव वैश्वानरस्य द्युप्रभृतिपृथिव्यंत शरीरस्य समाराधनभूतायाः उपासकैरहरहः क्रियमाणायाः प्राणाहुतेरग्नि होत्रत्वसंपादनायायमुरः प्रभृतीनां वेदित्वाद्युपदेश, इति जैमिनिरा- चार्यो मन्यते । द्युलोक से पृथ्वी पर्यन्त जिसका शरीर है, उस वैश्वानर परमात्मा की ही, उपासक, नित्य प्राणाहुति रूप से, उपासना करते हैं। उसी प्राणाहुति अग्निहोत्र को साधारण रूप से बतलाने के लिए उर आदि को बेदी आदि रूप से वर्णन किया गया है, ऐसा जैमिनि आचार्य का मत है। तथाहि-परमात्मोपासनोचितमेव फलं प्राणाहुत्या अग्निहोत्र- सम्पत्ति च दर्शयतीयं श्रुतिः । "स य इदमविद्वानग्निहोत्रं जुहोति, ankurnagpal108@gmail.com

  • र्धै or र्धा? 'र्धा' (vertical line with aa-matra).
  • दि (da with i-matra). Now look at the next letter: Is it 'या' or 'पा'? Wait! Look at the bottom: it is rounded like 'प'. Wait, why did I think 'या'? Let's look at the left part of this letter: Does it have the curly front of 'य'? Wait, look at 'या' in 'नामधेयानुपासक': In 'नामधेया': the 'य' bulges to the left, goes in, then goes down. In this letter in मूर्धादि...: It starts from the top line, goes straight down, curves at the bottom to the right, and goes up to the vertical line! Wait! It's a 'प'! Wait, why does it look slightly like 'य'? Because the ink on the left side of the 'प' has a tiny irregularity or slight slant, but it is definitely 'पा'! Wait, look at the next letter: 'दां' (da with aa-matra and anusvara). Then 'ते' (ta with e-matra). Then 'षु' (shha with u-matra). "मूर्धादिपादांतेषु" - of course! Head to feet: "मूर्धादि-पादान्तेषु"! That makes 100% sense both visually

( ४५२ ) परब्रह्म का पुरुष रूप से वर्णन उपासना के लिए किया गया है, ऐसा बादरि आचार्य का मत है। "जो सर्वतो भाव से अपरिमित इस वैश्वानर आत्मा की पुरुषाकार रूप से उपासना करता है, वह व्यक्ति समस्त लोकों में समस्त भूतों में, समस्त आत्माओं में वर्त्तमान जो भोग्य अन्न है, उनको भोगता है" इत्यादि मे उपासना को ही ब्रह्म प्राप्ति का उपाय बतलाया गया है। "एतमेवम्" का तात्पर्य है ऐसे पुरुषाकार। सब लोक समस्त भूत और समस्त आत्माओ के वर्त्तमान अन्न के भोग का तात्पर्य है कि-सर्वत्र अवस्थित निरतिशय असीम आनंद स्वरूप ब्रह्म की अनुभूति करता है। यदि अर्थ करें कि-कर्माधीन आत्माओं से मुक्त साधारण भोगों को भोगता है, तो समीचीन न होगा; मुमुक्षुओं के लिए ये भोग त्याज्य है। यदि परमात्मा वैश्वानरः, कथंतर्हि उरः प्रभृतीनां वेद्यादित्वो- पदेशः ? यावताजाठराग्नि परिग्रह एवैतदुपपद्यत ? इत्यत्राह- यदि परमात्मा ही वैश्वानर है, तो उर इत्यादि का वेदी इत्यादि के रूप में उपदेश क्यों किया गया है ? वेदी इत्यादि के वर्णन से तो यही ज्ञात होता है कि-जाठराग्नि का ही वर्णन है इस संशय का उत्तर देते हैं- सम्पत्तेरिति जैमिनिस्तथा हि दर्शयति ।१।२।३२॥ अस्य परमात्मन एव वैश्वानरस्य द्युप्रभृतिपृथिव्यंत शरीरस्य समाराधनभूतायाः उपासकैरहरहः क्रियमाणायाः प्राणाहुतेरग्नि होत्रत्वसंपादनायायमुरः प्रभृतीनां वेदित्वाद्युपदेश, इति जैमिनिरा- चार्यो मन्यते । द्युलोक से पृथिवी पर्यन्त जिसका शरीर है, उस वैश्वानर परमात्मा की ही, उपासक, नित्य प्राणाहुति रूप से, उपासना करते है । उसी प्राणाहुति अग्निहोत्र को साधारण रूप से बतलाने के लिए उर आदि को बेदी आदि रूप से वर्णन किया गया है, ऐसा जैमिनि आचार्य का मत है । तथाहि-परमात्मोपासनोचितमेव फलं प्राणाहुत्या अग्निहोत्र- सम्पत्ति च दर्शयतीयं श्रुतिः । "स य इदमविद्वानग्निहोत्रं जुहोति, ankurnagpal108@gmail.com

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यथाङ्गारानपोह्य भस्मनि जुहुयात्तादृक् तत् स्यात्, अथ य एतदेवं विद्वानग्निहोत्रं जुहोति तस्य सर्वेषु लोकेषु सर्वेषु भूतेषु सर्वेष्वा- त्मसु हुतं भवति, तद्यथेषीक तूलमग्नौ प्रोतं प्रदूयेतैवं हास्य सर्वे पाप्मानः प्रदूयन्ते” इति । परमात्मोपासना के उचित फल तथा प्राणाहुति रूप अग्निहोत्र सम्पादन के प्रदर्शन करने वाली श्रुति इस प्रकार है-“जो इस वैश्वानर विद्या को न जाकर आहुति देता है, उसकी आहुति अंगारा रहित भस्म में दी गई आहुति के समान है, जो इसके रहस्य को जानकर अग्निहोत्र करता है, उसकी समस्त लोक, समस्त भूत और समस्त आत्माओं में आहुति हो जाती है। जैसे कि—सींक अगला हिस्सा अग्नि में घुसा देने पर तत्काल जल जाता है वैसे ही, रहस्य को जानकर अग्निहोत्र करने वाले के पाप भस्म हो जाते हैं।” आमनन्ति चैनमस्मिन् ।१।२।३३॥ एनं परं पुरुषं द्युमूर्धत्वादिविशिष्टं वैश्वानरं, अस्मिन् उपासक शरीरे प्राणाहुत्याधारत्वाय आमनन्ति च-“तस्य हवा एतस्यात्मनो वैश्वानरस्य मूर्धैव सुतेजाः” इत्यादिना । अयमर्थः “यस्त्वेतमेवं प्रादेशमात्रममिविमानमात्मानं वैश्वानरमुपास्ते” इति त्रैलोक्य- शरीरस्य परमात्मनो वैश्वानरस्योपासनं विधाय “सर्वेषु लोकेषु” इत्यादिनाब्रह्मप्राप्ति च फलमुपदिश्य, अस्यैवोपासनस्यांगभूतम् प्राणाग्निहोत्रं “तस्य ह वा एतस्य” इत्यादिनापदिशति, यः पूर्वमुपा- स्यतयोपदिष्टो वैश्वानरस्तस्यावयवभूत अद्न्यादित्यादीन् सुतेजो- विश्वरूपादिनामधेयानुपासक शरीरे मूर्धादियादांतेषु संपादयति । मूर्धैव सुतेजाः-उपासकस्य मूर्धैव परमात्ममूर्धभूता द्यौरित्यर्थः । चक्षुर्विश्वरूप आदित्य इत्यर्थः प्राण पृथग्वर्त्मा वायुरित्यर्थः । संदेहो बहुलः-उपासकस्य मध्यकाय एव परमात्ममध्यकायभूत आकाश इत्यर्थः । पृथिव्येव पादौ-अस्य पादावेवतत्पादभूता पृथिवी इत्यर्थः । ankurnagpal108@gmail.com

( ४५४ ) "इस वैश्वानर आत्मा का मस्तक ही सुतेजा (द्युलोक) है" इत्यादि श्रुति में भी, द्युलोक आदि रूप मस्तक आदि विशेषणों से विशेषित उस परम पुरुष वैश्वानर को उपासक के शरीर मे, प्राणाहुति के आधार रूप से बतलाया गया है । इसका तात्पर्य है कि- "जो लोग सर्वव्यापी वैश्वानर आत्मा की प्रादेशमात्र में परिमित उपासना करते है" इस श्रुति मे त्रैलोक्य शरीरधारी वैश्वानर परमात्मा की उपासना का उपदेश देकर "सर्वेषु लोकेषु" इत्यादि में-ब्रह्म प्राप्ति रूप, उपासना के फल का उल्लेख करके, "तस्य ह वा एतस्य" इत्यादि में, उपासना के अंगभूत अग्निहोत्र का उपदेश दिया गया है । इसी प्रकार, पहिले जो वैश्वानर का, उपास्य रूप से उपदेश दिया गया है, उनमें भी वैश्वानर के अवयव स्थानीय, सुतेज और विश्वरूपादि नामक आदित्य आदि की, उपासक के शरीर में, मस्तक से पैर तक, अवयवों के रूप में कल्पना की गई है । "मूर्धैव सुतेजः" यह ही परमात्मा का मस्तक स्थानीय द्युलोक है। "चक्षुः विश्वरूपः" अर्थात् उपासक के नेत्र ही, परमात्मा के नेत्र स्थानीय आदित्य है । "प्राण पृथग् वर्त्मा" अर्थात् प्राणवायु ही प्राण है । "संदेहो बहुलः" अर्थात् उपासक का मध्य काय ही परमात्मा का मध्य कायस्थ आकाश है । "पृथिव्येव पादौ" अर्थात् उपासक के पैर ही, परमात्मा की पादरूप पृथिवी है । एवमुपासकः स्वशरीरे परमात्मानं त्रैलोक्यशरीरं वैश्वानरं सन्निहितमनुसंधाय स्वकीयान्युरोलोमहृदयमनआस्यानि प्राणाहुत्या- धारस्य परमात्मनो वैश्वानरस्य वेदिर्बहिगार्हपत्यान्वाहार्यपचाहव- नीयानग्निहोत्रोपकरणभूतान् परिकल्प्य प्राणाहुतेश्चाग्निहोत्रत्वं परिकल्प्यैवं विधानेन प्राणाग्निहोत्रेण परमात्मानं वैश्वानरमाराधये- दिति "उर एव वेदिर्लोमानि बर्हिर्हृदयं गार्हपत्यः" इत्यादिनाेप- दिश्यते । अतः परमात्मा पुरुषोत्तम एव वैश्वानर इति सिद्धम् । इस प्रकार उपासक, त्रैलोक्य शरीर वैश्वानर परमात्मा को अपने ही शरीर में संलग्न मानकर, अनुसंधान करते हुए, अपने वक्ष-लोम-

( ४१५ ) हृदय-मन आदि को, प्राणाहुति के अधिकरण स्थानीय वैश्वानर परमात्मा की, वेदि-बर्हि-गार्हपत्य-आहवनीय- अन्वाहार्यपचन आदि की, अग्निहोत्र यज्ञीय उपकरण रूप से तथा प्राणाहुति की अग्निहोत्र रूप से परिकल्पना करके, उक्त प्रकार की प्राणाहुति द्वारा, वैश्वानर परमात्मा की आराधना करे, यही उपदेश “वक्ष ही वेदी, लोम ही बर्हि (कुश) हृदय ही गार्हपत्य है” इत्यादि श्रुति में दिया गया है। इससे सिद्ध होता है कि पुरुषोत्तम परमात्मा ही वैश्वानर है । ॥ द्वितीय पाद समाप्त ॥

[ प्रथम अध्याय ] [ तृतीय पाद ] १ द्युभ्वाद्यधिकरणः— द्युभ्वाद्यायतनं स्वशब्दात् ॥१।३।१॥ आथर्वणिका अधीयते "यस्मिन् द्यौः पृथिवी चान्तरिक्षमोतंम- नस्सह प्राणैश्च सर्वैः, तमेवैकं जानथात्मानमन्या वाचो विमुंचथ अमृतस्यैष सेतुः" इति । तत्र संशयः किमयं द्युपृथिव्यादीनामायतनत्वेन श्रूयमाणो जीवः, उत परमात्मा ? इति किं युक्तम् ? जीव इति कुतः ? "अरा इव रथनाभौ संहता यत्र नाड्यस्स एषोऽन्तश्चरते बहुधा जायमानः" इति परस्मिन् श्लोके पूर्ववाक्य प्रस्तुतं द्युपृथिव्याद्यायतनं “यत्र” इति पुनरपि सप्तम्यन्तेन परामृश्य तस्य नाड्याधारत्वमुक्त्वा, पुनरपि “स एषोऽन्तश्चरेत बहुधा जायमानः” इति तस्य बहुधा जायमानत्वं चोच्यते । नाडी संबंधो देवादिरूपेण बहुधा जायमानत्वं च जीवस्यैव धर्मः । अस्मिन्नपि श्लोके “ओतं मनस्सह प्राणैश्च सर्वैः” इति प्राणपंचकस्य मनश्चाश्रयत्वमुच्यमानं जीवधर्मएव एवं जीवत्वे निश्चिते सति द्युपृथिव्याद्यायतनत्वादिकं यथा कथंचित् संगमयितव्यम्-इति । आथर्वणिक मुंडकोपनिषद में प्रसंग आता है कि—“जिसमें स्वर्ग, पृथ्वी और अंतरिक्ष तथा प्राणों सहित मन गुंथा हुआ है, उसी एक सबके आत्मस्वरूप को जानो, दूसरी बातों को सर्वथा छोड़ दो, वही अमृत सेतु हैं ।” ankurnagpal108@gmail.com

इस पर संशय होता है कि-द्युभू आदि का आयतन, जीवात्मा है अथवा परमात्मा ? कह सकते हैं कि-जीवात्मा है-क्यों कि-'रथकी नाभि में जुड़े हुए अरों की भांति, जिसमें समस्त देहव्यापिनी नाड़ियाँ एकत्र स्थित है, वह बहुत प्रकार से उत्पन्न होने वाला, मध्य भाग में रहता है" इस बाद के श्लोक में, पूर्व श्लोक में प्रस्तुत द्युपृथिवी आदि के आयतन को ही "यत्र" शब्द से पुनः नाड़ियों का आधारभूत बतलाकर पुनः"स एषोऽन्तश्चरते बहुधा जायमानः" से उसी का अनेक रूपों में उत्पन्न होना बतलाया गया है। नाड़ियों से संबंधित, देहादि रूप से प्रायः जन्म लेना, जीव का ही धर्म है । पूर्व श्लोक में "मनस्सह प्राणैश्च सर्वैः" इत्यादि में, पंचप्राण समन्वित मनको जिसका आश्रय कहा गया है वह भी जीव ही प्रतीत होता है, क्योंकि, यह भी जीव का ही धर्म है । इस प्रकार जीवत्व के निश्चित हो जाने पर, द्युपृथिवी आदि का आयतन, जीव को ही मानना संगत होगा । सिद्धान्तः—एवं प्राप्ते प्रचक्ष्महे—द्युभ्वाद्यायतनंस्वशब्दात्- द्युपृथिव्यादीनामायतनं परं ब्रह्म, कुतः ? स्व शब्दात्—परब्रह्मासा- धारण शब्दात् । “अमृतस्यैष सेतुः" इति परस्य ब्रह्मणोऽसाधारण शब्दः । “तमेवं विद्वान् अमृत इह भवति, नान्यः पन्था अयनाय विद्यते" इति सर्वत्रोपनिषत्सु स एवामृतत्वप्राप्ति हेतुः श्रूयते । सिनोतेश्च बधनार्थत्वात् सेतुः, अमृत्य प्रापक इत्यर्थः. सेतुरिव वा सेतुः-नद्यादिषु सेतुर्हि कूलस्य प्रतिलम्भकः, संसाराणर्वपारभूतस्यामृ- त्येष प्रतिलम्भक इत्यर्थः । द्युभू आदि के आयतन परमात्मा ही हैं, क्यों कि-उक्त प्रसंग में परब्रह्म के द्योतक असाधारण विशेषणों का प्रयोग किया गया है । “अमृत का सेतु" शब्द परब्रह्म की असाधारण विशेषता का द्योतक है । "उनके इस रूप को जानकर इस लोक में ही अमृत हो जाते हैं, इसके अतिरिक्त जीवनयात्रा का कोई दूसरा मार्ग नहीं है" इत्यादि उपदेश प्रायः सभी उपनिषदों में दिया गया है, जिसमें परमात्मा को ही अमृतत्व प्राप्ति का हेतु बतलाया गया है । 'सिञ्.' धातु का बंधन अर्थ होने से सेतु शब्द का

'. Wait! 'शि' has the matra 'ि' on the left. Then 'श' has a vertical bar on the right. Then... wait, what is to the right of 'शि'? There is a letter! Wait, look at the top: There is:

  1. Matra of 'ि'
  2. 'श'
  3. Another letter? Wait, let's look at: “तस्याशिश-” Wait! In the image: “ त स्या शि Then there is ANOTHER 'श' or 'ख'??? Wait! Let's look at the image provided by user: Line 9: “सन्ततं सिराभिस्तु लम्बत्या कोशसंन्निमम्” इत्यारभ्य “तस्याशिश- Wait! Look at the original text in the image: Look at: “तस्या Then: शि Then: श- Wait, why does it look like 'श'? Wait, could it be: 'शि' followed by 'ख'? Wait, look at the top: Is there a 'ख'? Let's look at the shape: It has a loop at top left. A curve down. A loop up. And a vertical bar. Wait, that is 'ख'! Wait, does it have an 'ा' (aa matra)? No, it does NOT have an 'ा' matra! Wait, but line 10: Does line

श्रुति में—देवादि जीवों के अनायास आश्रय के लिए, परंपुरुष परमेश्वर स्वकीय विशेषताओं सहित, स्वेच्छा से विभिन्न जातीय रूप-आकृत-गुण और कर्मों से समन्वित होकर अनेक जन्म धारण करते हैं। ऐसा स्पष्ट उल्लेख है। स्मृति में भी जैसे—“अजन्मा और अव्यय समस्त भूतों का स्वामी मैं अपनी प्रकृति के साहाय्य से अपनी माया के प्रभाव से अनेक रूपों में प्रकट हो जाता हूँ'' इस प्रकार जीव के भोगोपकरण मन आदि की आश्रयता और सर्वाधारकता, परब्रह्म की ही बतलाई गई है। इतश्च परमपुरुषः—इसलिए भी परंपुरुष आयतन हैं कि— मुक्तोपसृप्यव्यपदेशाच्च ।१।३।२॥ अयं द्युपृथिव्याद्यायतनभूतः पुरुषः संसारबंधान्मुक्तै रपि प्राप्यतया व्यपदिश्यते “यदा पश्यः पश्यते रुक्मवर्णं कर्त्तारमीशं पुरुषं ब्रह्मयो- निम्, तदा विद्वान् पुण्यपापे विधूय निरंजनः परमं साम्यमुपैति” “यथानद्यः स्यदमानाः समुद्रे अस्तं गच्छंति नामरूपे विहाय, तथा विद्वान् नामरूपादविमुक्तः परात्परं पुरुषमुपैति दिव्यम्” इति । संसारबंधनाद् विमुक्ता एव हि विधूतपुण्यपापा निरंजना नाम- रूपाभ्यां विनिर्मुक्ताश्च । पुण्यपापनिबंधनाचित् संसर्ग प्रयुक्तनामरूप- भाक्त्वमेव हि संसारः । अतो विधूतपुण्यपापैः निरंजनै प्रकृतिसंसर्ग रहितैः परेण ब्रह्मणा परमं साम्यमापन्नैः प्राप्यतया निर्दिष्ट द्यु पृथिव्याद्यानभूतः, परंब्रह्मैव । सांसारिक बंधनों से मुक्त जीवों के लिए भी, स्वर्ग पृथ्वी आदि के आयतन परंपुरुष ही प्राप्य कहे गए हैं—“जब यह द्रष्टा (जीवात्मा) सब के शासक ब्रह्मा के भी आदि कारण, संपूर्ण जगत के रचयिता, दिव्य प्रकाश स्वरूप परं पुरुष का प्रत्यक्ष कर लेता है, उस समय पुण्यपाप दोनों से मुक्त, निर्मल वह ज्ञानी महात्मा, सर्वोत्तम समता प्राप्त कर लेता है”—जैसे कि बहती हुई नदियाँ, नाम रूप छोड़कर समुद्र में विलीन हो जाती हैं, वैसे ही ज्ञानी महात्मा, नामरूप रहित होकर, उत्तमोत्तम दिव्य पुरुष परमात्मा को प्राप्त हो जाता है । “अर्थात् जो सांसारिक

( ४६० ) बंधनों से मुक्त होते हैं वे ही पुण्य पापों से मुक्त निरंजन, तथा नाम रूप से विमुक्त हैं। पुण्यपाप निबंधक अचित् (जड) संसर्ग से होने वाली नामरूप की अस्मिता (अर्थात् यह मेरा नाम, यह मेरा रूप है) ही संसार है। पुण्यपाप रहित निरंजन-प्रकृति संसर्ग शून्य, परब्रह्म के साथ अत्यंत साम्यता को प्राप्त पुरुष के लिए, प्राप्य रूप से जिनका निर्देश किया गया है, वह, स्वर्ग पृथ्वी आदि आयतन परं पुरुष परमात्मा ही हैं। परब्रह्मासाधारणशब्दादिभिः परमेव ब्रह्मेति प्रसाध्य, प्रत्यगा- त्मा साधारणशब्दाभावाच्चायं पर एव-इत्याह- जो परमात्म बोधक असाधारण शब्दों का उल्लेख, द्युभू आदि प्रकरण में है, वह परब्रह्म का ही है, इस सिद्धान्त का निर्णय करके-अब सिद्धान्त भी पुष्टि करेंगे कि—इस प्रकरण में किसी भी ऐसे साधारण शब्द का प्रयोग नहीं है कि जिससे जीवात्मा को आयतन माना जा सके; यह परमात्मा ही आयतन है इत्यादि— नानुमानमतच्छब्दात् प्राणभृच्च ।१।३।३॥ यथाऽस्मिन् प्रकरणे प्रतिपादक शब्दाभावात् प्रधानं न प्रति- पाद्यम्, एवं प्राणभृदपीत्यर्थः । अनुमीयत इति अनुमानं परोक्तं प्रधानमुच्यते, अनुमानप्रमितत्वादानुमानमिति वा, अतच्छब्दात् तद् वाचिशब्दाभावा दित्यर्थः । “अर्थाभावे यदव्ययम्” इत्यव्ययीभावः । जैसे कि—इस प्रकरण में एक भी ऐसा शब्द नहीं मिलता, जिससे कि—प्रधान प्रकृति का आयतन रूप से प्रतिपादन हो सके, वैसे ही जीवात्मा बोधक शब्दों का भी अभाव है। सांख्यशास्त्र में प्रधान को आनुमानिक कहा गया है, क्योंकि यह अनुमान से ही प्रतिपादित है [अर्थात्-जीवात्मा ने, जिस अप्रत्यक्ष शक्ति द्वारा अपने को अभिभूत परवश माना उसे ही संसार बंधन का “प्रधान” कारण माना, स्वभावगत होने से उसे “प्रकृति” कहा तथा जीवात्मा पर शासन करने वाली “माया” समझा, ये सब कुछ अनुमान ही मात्र है अतत् शब्दात् का तात्पर्य है, उस प्रधान संबंधी शब्दों का अभाव । पाणिनीय व्याकरण के ankurnagpal108@gmail.com

( ४६१ ) नियम “अर्थाभावे यदव्ययम्” के अनुसार “अतच्छब्दात्” पद में अव्ययी- भाव समास है । इतश्चायं न प्रत्यगात्मा—इसलिए भी यह जीवात्मा आयतन नहीं है कि-- भेदव्यपदेशात् ।१।३।४॥ “समानेवृक्षे पुरुषो निमग्नोऽनीशया शोचति मुह्यमानः जुष्टं यदा पश्यत्यन्यमीशमस्य महिमानमिति वीतशोकः” इत्यादिभिर्जीवाद् विलक्षणत्वेनायं व्यपदिश्यते । अनीशया भोग्यभूतया प्रकृत्या मुह्य- मानः शोचति जीवः अयं यदा स्वस्मादन्यं सर्वस्येशं प्रीयमाणम्, अस्य ईश्वरस्य महिमानं च निखिलजगन्नियमनरूपं पश्यति, तदावीतशोकोभवति । “शरीर रूपी एक ही वृक्ष पर रहने वाला जीवात्मा, गहरी आसक्ति में डूबा हुआ है असमर्थ होने से वह मोहित हुआ शोक करता है । जब यह भक्तों द्वारा नित्य सेवित, अपने से भिन्न प्रभु को और उसकी महिमा को जान लेता है, तब सर्वथा शोक रहित हो जाता है” इत्यादि में परमात्मा को जीव से विलक्षण बतलाया गया है । उस वाक्य का तात्पर्य है कि-अनीश भोग्यरूप प्रकृति से मोहित जीवात्मा शोक करता है जब यह, अपने से भिन्न सर्वेश्वर की दयालुता महिमा और सर्वजगतनियामकता को देखता है तब शोक रहित हो जाता है । प्रकरणात् १।३।५॥ प्रकरणंचेदं परस्य ब्रह्मण इति “अदृश्यत्वादिगुणको धर्मोक्तेः” इत्यत्रैव प्रदर्शितम् । नाडी संबंधबहुधाजायमानत्वमनः प्राणधार- णैश्च प्रकरणविच्छेदाशंकामात्रमत्र पर्यहाष्मं । यह प्रकरण परब्रह्म के वर्णन का ही है, जैसा कि-‘अदृश्यत्वादि” सूत्र १।२।२१। में दिखलाया गया है । यहाँ केवल नाडी संबंध, बहुधा- जन्म, मनप्राण आदि धारकता इत्यादि कुछ विशेषताओं को जीवात्मा संबंधी मानने की शंका की गई, और उसी का परिहार किया गया । ankurnagpal108@gmail.com

( ४६२ ) स्थित्यदनाभ्याञ्च ।१।३।६।। “द्वा सुपर्णा सप्रजा सखाया समानं वृक्षं परिषस्वजाते, तयोर- न्यः पिप्पलं स्वाद्वत्यनश्नन्नन्यो अभिचाकशीति” इत्येकस्य कर्म- फलादनम्, अन्यस्य च कर्मफलमनश्नत एव दीप्यमानतया शरीरान्त- स्थितिमात्रं प्रतिपाद्यते । तत्र कर्मफलम् अनश्नन् दीप्यमान एव सर्वज्ञोऽमृतसेतुः सर्वात्मा द्युम्वाद्यायतनं भवितुमर्हति, न पुनः कर्म- फलमदन् शोचन् प्रत्यगात्मा, अतोद्यु॒भ्वाद्यायतनं परमात्मेति सिद्धम् । “सदा साथ रहने वाले, परस्पर सख्य भाव रखने वाले, दो पक्षी, एक ही वृक्ष पर रहते है, उन दोनों मे एक वृक्ष के फलों को स्वाद से खाता है, दूसरा-उनका उपभोग न करके, केवल देखता मात्र है।” इत्यादि में एक का कर्मफल भक्षण और दूसरे का भक्षण न करके, एक- मात्र प्रकाशरूप से, स्थित होना बतलाया गया है । इसमें कर्मफल न भोगने वाला प्रकाश स्वरूप ही सर्वज्ञ, अमृत सेतु, सर्वात्मा द्यु पृथ्वी आदि का आयतन हो सकता है; कर्मफल को भोगने वाला दुःखी जीवात्मा उक्त गुणों वाला नहीं हो सकता । इससे सिद्ध होता है कि--द्युपृथ्वी आदि का आयतन परमात्मा ही है । २ भूमाधिकरणः— भूमा सम्प्रसादादध्युपशात् ।१।३।७।। इदमामनन्ति छन्दोगाः “यत्रनान्यत्पश्यति नान्यच्छृणोति नान्यद्विजानाति स भूमा, अथ यत्रान्यत्पश्यति अन्यच्छृणोति अन्य- द्विजानाति तदल्पम्” इति । अत्रायंभूमशब्दो भावप्रत्यान्तो व्युत्पा- द्यते । तथा हि पृथिव्यादिषु बहु शब्दः पठ्यते, ततः “पृथ्वादिभ्य इमनिज्वा” इति इमनिज प्रत्यये कृते “बहोर्लोपोभू च बहोः” इति प्रकृति प्रत्ययोर्विकारे भूमेति भवति । भूमा बहुत्वमित्यर्थः । अत्र ankurnagpall08@gmail.com

( ४६३ ) चायं बहुशब्दो वैपुल्यवाची न संख्यावाची । "यत्रान्यत्पश्यति— तदल्पम्" इत्यल्पप्रतियोगित्व श्रवणात् । अल्पशब्द निर्दिष्ट धर्मि- प्रतियोगि प्रतिपादन परत्वादेव धर्मिपरश्च निश्चीयते न धर्ममात्र- परः । तदेवं भूमेति विपुल इत्यर्थः । वैपुल्यविशेष्यश्चेहात्मेत्यवगतः "तरति शोकमात्मवित्" इति प्रक्रम्य भूमविज्ञानमुपदिश्य "आत्मैवेदं सर्वम्" इति तस्यैवो पसंहारात् । छान्दोग्योपनिषद में कहा गया है कि—"जहाँ कुछ और नहीं देखता, कुछ और नहीं सुनता, कुछ और नहीं जानता, वह भूमा है, किन्तु जहाँ कुछ और देखता, और सुनता, और जानता है, वह अल्प है।" इस वाक्य का प्रयुक्त भूमा शब्द, भावात्मक तद्धित प्रत्यय से बना है । "बहु" शब्द का पाठ पृथिव्यादि शब्द के साथ किया गया है।"पृथ्वादिभ्य इमनिज्वा" इस पाणिनि सूत्र से इमनिज् प्रत्यय करने पर "बहोर्लोपो भूच बहोः" इस पाणिनीय सूत्र से प्रकृति प्रत्यय में, विकार करने पर "भूमा" शब्द निष्पन्न होता है। भूमा शब्द बहुत अर्थ वाला है। बहु शब्द यहाँ पर विपुलतावाची है, संख्यावाची नहीं है । "यत्रान्यत् पश्यति तदल्पम्" इसमें प्रतियोगी रूप से अल्पत्व का उल्लेख किया गया है, इससे सिद्ध होता है कि बहु शब्द विपुलतावाची है जैसे कि—अल्प शब्द, धर्मी अर्थात् अल्पता वाले विशिष्ट पदार्थ का बोधक है, वैसे ही यह भूमा शब्द भी उसके विपरीत अर्थ का प्रतिपादन करता है, इससे ज्ञात होता है कि— भूमा शब्द भी विपुलता वाले विशिष्टपदार्थ धर्मी का प्रतिपादन करता है, यह केवल धर्म (विशेषता) मात्र का प्रतिपादक नहीं है । इस प्रकार भूमा का अर्थ होता है विपुल । विपुलता धर्म से विशेष्य आत्मा ही यहाँ अभिधेय है "आत्मज्ञ पुरुष शोक को पार करता है" इत्यादि से भूमा विज्ञान का उपदेश देकर "यह सारा जगत् आत्म स्वरूप ही है" इत्यादि से उसी भूमा तत्त्व का उपसंहार किया गया है । अत्र संशय्यते—किमयं भूमागुण विशिष्टः प्रत्यगात्मा उत पर- मात्मा इति । किं युक्तम् ? प्रत्यगात्मेति । कुतः ? "श्रुतं ह्येव में भगवद्दृशेभ्यस्तरति शोकमात्मवित्" इत्यात्मजिज्ञासयोपसेदुषे नार-

( ४६४ ) दाय नामादिप्राण पर्यन्तेषु उपास्यतयोपदिष्टेषु “अस्ति भगवो नाम्नोभूयः” “अस्ति भगवो वाचो भूयः” इत्यादयः प्रश्नाः “वाग्वाव नाम्नोभूयसी” “मनो वाव वाचो भूय.” इत्यादीनि च प्रतिवचनानि, प्राणात् प्राचीनेषु दृश्यन्ते, प्राणे तु न पश्यामः । अतः प्राणपर्यन्त एवायमात्मोपदेश इति प्रतीयते, तेनेह प्राणशब्द निर्दिष्टः प्राण ग्रहचारी प्रत्यगात्मैव न वायु विशेष मात्रम् । “प्राणो ह पिता प्राणो ह माता” इत्यादयश्च प्राणस्य चेतनतामवगमन्ति। “पितृहा मातृहा” इत्यादिना सप्राणेषु पितृप्रभृतिषूपमर्दकारिणि हिंसकत्वनि मित्तो- पक्रोशवचनात्सेष्वविगतप्राणेष्वत्यंतोपमर्दकारिण्यप्युपक्रोशाभाववच्च- नाच्च हिंसायोग्यश्चेतन एव प्राण शब्द निर्दिष्टः । अप्राणेषु स्थाव- रेष्वपि चेतनेषूपमर्दभावाभावयो र्हिंसातदभावदर्शनादयं हिंसा योग्य- तया निर्दिष्टः प्राणः प्रत्यगात्मैव निश्चीयते । उक्त विषय में संशय होता है कि—भूमा गुण विशिष्ट जीवात्मा है या परमात्मा ? कह सकते हैं कि जीवात्मा क्योंकि--“मैंने आप जैसों से सुना है कि-आत्मवेत्ता शोक से पार हो जाता है” आत्मज्ञान के उद्देश्य से आए हुए नारद द्वारा ऐसा प्रश्न करने पर, सनकादि कुमारों ने उन्हें उपास्य रूप से उपदिष्ट नाम से लेकर प्राणतक सभी के विषय में “भगवन् ! नाम से बड़ा कुछ है क्या ?” भगवन् ! वाक्य से बड़ा कुछ है क्या ?” इत्यादि प्रश्नों तथा “नाम से वाक्य बड़ा है— “वाक्य से मन बड़ा है” इत्यादि उत्तरों में जो उपदेश दिया उसमे प्राण के पूर्ववर्त्ती, शब्द, वाक्य आदि का ही उल्लेख किया, प्राण का नही किया, जिससे ज्ञात होता है कि-प्राणतक ही आत्मोपदेश दिया गया [अर्थात् प्राण, नाम आदि सभी से, श्रेष्ठ है, उससे बड़ा कोई नही है] इससे यह भी ज्ञात होता है कि-प्राण का तात्पर्य, केवल वायुमात्र नही है अपितु प्राण शब्द अपने अपने सहचारी जीवात्मा का ही बोधक है। “प्राण ही पिता है, प्राण ही माता है” इत्यादि से प्राण की चेतनता ज्ञात होती है । “पितृहा मातृहा” इत्यादि मे, प्राणवान माता-पिता की मारने वाले की ही. ankurnagpal108@gmail.com