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श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)

Sri Bhashya of Bhagavad Ramanujacharya with Commentary

भगवद् रामानुजाचार्य (सम्पादक: स्वामी वासुदेवाचार्य) द्वारा

DevanagariHindipublished696 पृष्ठ

( ४ ) जानने की इच्छा को जिज्ञासा कहते हैं, इच्छा क्रिया में इष्यमाण वस्तु प्रधान होती है, जिज्ञासा पद में इष्यमाण वस्तु ज्ञान है; इसलिए ब्रह्म जिज्ञासा का तात्पर्य है, ब्रह्म ज्ञान । मीमांसा के पूर्व भाग से ज्ञात कर्म की अल्प और अस्थिर फलता तथा उत्तर भाग से ज्ञात ब्रह्म ज्ञान की अनन्त और अक्षय फलता से मन में निर्वेद होता है, जिसके फलस्वरूप कर्म तत्त्व को भली भाँति जानकर ब्रह्म तत्त्व को भी जानना चाहिए ऐसा भाव होता है। ऐसा ही वृत्तिकार ने कहा भी है—"कर्मतत्त्व को भली भाँति जानने के बाद ब्रह्म ज्ञान की इच्छा होती है।" वक्ष्यति च कर्मब्रह्ममीमांसयोरेकशास्त्र्यम्—"संहितमेतच्छा- रीरकं जैमिनीयेन षोडशलक्षणेनेति शास्त्रैकत्वसिद्धिः” इति । अतः प्रतिपिपादयिषितार्थभेदेन षट्कभेदवदध्यायभेदवच्च पूर्वोत्तर- मीमांसयोर्भेदः । मीमांसाशास्त्रम्—"अथातो धर्मजिज्ञासा” इत्या- रभ्य "अनावृत्तिश्शब्दादनावृत्तिश्शब्दात्” इत्येवमन्तं संगति- विशेषेणाविशिष्टक्रमम् । वृत्तिकार कर्ममीमांसा और ब्रह्ममीमांसा दोनों को एक ही शास्त्र बतलाते हैं—"यह शारीरक मीमांसा, जैमिनि कृत धर्म मीमांसा के सोलह अध्यायों से मिलकर ही संपूर्ण एक शास्त्र के रूप में पूरी होती है।" प्रतिपाद्य विषय को जैसे पाद और अध्यायों में बाँटकर अलग- अलग वर्णन किया गया है, वैसे ही मीमांसा के पूर्व और उत्तर दो भेद हैं। मीमांसा शास्त्र पूर्व मीमांसा के आदिम सूत्र "अथातो धर्म जिज्ञासा” से लेकर उत्तर मीमांसा के अंतिम सूत्र "अनावृत्तिश्शब्दात्" में जाकर संगति विशेष के विशिष्ट क्रम से पूरा हुआ है । तथाहि प्रथमं तावत् "स्वाध्यायोऽध्येतव्यः" इति अध्ययनेनैव स्वाध्यायशब्दवाच्यवेदाख्याक्षरराशेर्ग्रहणं विधीयते । सर्व प्रथम विद्यार्थी को आदेश होता है "स्वाध्ययोऽध्येतव्यः", तथा अध्ययन से स्वाध्याय शब्द वाच्य वेद नामक अक्षर राशि को ग्रहण करने का विधान बतलाया जाता है । ankurnagpal108@gmail.com

( ५ ) तच्चाध्ययनं किंरूपम् ? कथं च कर्तव्यम् ? इत्यपेक्षायाम्— श्रावण्यां प्रौष्ठपद्यां वा उपाकृत्य यथाविधि “अष्टवर्षं ब्राह्मण- मुपनयीत तमध्यापयेत्” इत्यनेन “युक्तश्छन्दांस्यधीयीत मासान्विप्रोऽर्धपञ्चमान् ।” इत्यादिब्रतनियमविशेषोपदेशैश्चापेक्षितानि विधीयन्ते । एवं सत्संतानप्रसूतसदाचारनिष्ठात्मगुणोपेत- वेदविदाचार्योपनीतस्य व्रतनियमविशेषयुक्तस्याचार्योच्चारणानुच्चा- रणरूपमक्षरराशिग्रहणफलमध्ययनमित्यवगम्यते । उस अध्ययन का क्या रूप है ? वह कैसे किया जाता है ? ऐसी आकांक्षा होने पर “आठ वर्ष में ब्राह्मण का उपनयन करके उसे पढ़ाओ”, “श्रावण या भाद्रपद की पूर्णिमा को यथा विधि उपाकर्म करके साढ़े चार महीने तक स्थिर चित्त से वेद पढ़ना चाहिए ।” इत्यादि व्रत और नियम विशेष के उपदेश द्वारा अपेक्षित अध्ययन की विधि का निरूपण किया गया है। इस प्रकार कुलीन, सदाचार निष्ठ, आत्म गुण संपन्न वेदज्ञ आचार्य द्वारा उपनीत, विशेष व्रत नियम संपन्न (बटु) शिक्षा के उद्देश्य से जब अक्षर राशि को गुरुमुख से श्रवण कर स्वयं मुखरित करता है, उसे ही अध्ययन मानते हैं । अध्ययनं च स्वाध्यायसंस्कारः “स्वाध्यायोऽध्येतव्यः” इति स्वाध्यायस्य कर्मत्वावगमात् । संस्कारो हि नाम कार्यान्तरयोग्यता- करणम् । संस्कार्यत्वं च स्वाध्यायस्य युक्तम्, धर्मार्थकाममोक्षरूप- पुरुषार्थचतुष्टयतत्साधनावबोधितत्वात्, जपादिना स्वरूपेणापि तत्साधनत्वाच्च । एवमध्ययनविधिर्मन्त्रवन्नियमवदक्षरराशि- ग्रहणमात्रे पर्यवस्यति । “स्वाध्यायोऽध्येतव्यः” इस वाक्य से अध्ययन स्वाध्याय क्रिया का कर्म निश्चित होता है; अध्ययन से स्वाध्यायरूप संस्कार दृढ होता है । कार्यान्तर योग्यता संपादन करने वाले को संस्कार कहते हैं । अधीत अक्षर- राशि प्रतिपाद्य ज्ञानार्जन से धर्मार्थ काम मोक्ष रूप पुरुषार्थ चतुष्टय

काँ संपादन होता है तथा अक्षर राशि के जाप आदि रूप से भी पुरुषार्थ चतुष्टय की सिद्धि होती है, इसलिए स्वाध्याय की सस्कार्यता युक्ति युक्त है। वेद की अध्ययन विधि मंत्र की तरह अक्षर राशि के ग्रहण मात्र मे पर्यवसित है। अध्ययनगृहीतस्य स्वाध्यायस्य स्वभावत एव प्रयोजनवदर्था- वबोधित्वदर्शनात् । गृहीतात् स्वाध्यायादवगम्यमानात् प्रयोजनवतोऽर्थानापाततो दृष्ट्वा तत्स्वरूपप्रकारविशेषनिर्णयफल- वेदवाक्यविचाररूपमीमांसाश्रवणे अधीतवेदः पुरुषः स्वयमेव प्रवर्तते । अध्ययन-गृहीत अक्षर राशि रूप स्वाध्याय के प्रयोजनीय (यज्ञ, उपा- सना आदि) अर्थावबोध की प्रवृत्ति स्वतः ही होती है तथा वेद के विधि- वत् कण्ठस्थ हो जाने पर प्रयोजनीय विषयो को वेदो मे आदि से अन्त तक देखकर उनके स्वरूप, प्रकार विशेष आदि के निर्द्धारण के लिए वेद- वाक्य विचारात्मक मीमांसा शास्त्र के श्रवण मे वेद पढ़ा हुआ व्यक्ति स्व- यमेव उन्मुख होता है। तत्र कर्मविधिस্বরূপे निरूपिते कर्मणामल्पास्थिरफलत्वं दृष्ट्वा अध्ययनगृहीतस्वाध्यायोपनिषद्वाक्येषु च अमृतस्वरूपा- नन्तस्थिरफलापातप्रतीतेः तन्निर्णयफलवेदान्तविचाररूपशारीरक- मीमांसायामधिकरोति । कर्म मीमांसा के कर्म विधि के स्वरूप निरूपण प्रकरण में कर्मों की अल्प अस्थिर फलता को देखकर तथा अध्ययन के सिलसिले में अधीत उप- निषद् वाक्यो मे ब्रह्मज्ञान की अनन्त स्थिर फलता की प्रतीति होने पर ब्रह्मतत्त्व निर्णायक वेदांत विचार रूप शारीरक मीमांसा में स्वाभाविक प्रवृत्ति होती है। विचारक स्वतः ही शारीरक मीमांसा का अध्ययन करता है। तथाच वेदान्तवाक्यानि केवलकर्मफलस्य क्षयित्वं ब्रह्मज्ञानस्यै वाक्षयफलत्वं दर्शयन्ति—"तद्यथेह कर्मचितो लोकः क्षीयते, एव- ankurnagpal108@gmail.com

मेवात्र पुण्यचितो लोकः क्षीयते”, “अन्तवदेवाऽस्य तद् भवति”, “नह्यध्रुवैः प्राप्यते”, “प्लवा ह्येते अदृढा यज्ञरूपाः”, “परीक्ष्य लोकान् कर्मचितान् ब्राह्मणो निर्वेदमायात् नास्त्यकृतः कृतेन। तद्विज्ञानार्थं स गुरुमेवाभिगच्छेत् समित्पाणिः श्रोत्रियं ब्रह्मनिष्ठम्॥ तस्मै स विद्वानुपसन्नाय सम्यक् प्रशान्तचित्ताय शमान्विताय। येनाक्षरं पुरुषं वेद सत्यं प्रोवाच तां तत्त्वतो ब्रह्मविद्याम्।” इति। “ब्रह्मविदाप्नोति परम्”, “न पुनर्मृत्यवे तदेकं पश्यति”, “न पश्योमृत्यं पश्यति”, “स स्वराड्भवति”, “तमेव विद्वानमृत इह भवति”, “नान्यः पन्था अयनाय विद्यते”, “पृथगात्मानं प्रेरितारं च मत्वा जुष्टस्ततस्तेनामृतत्वमेति” इत्यादीनि। वेदान्त वाक्य ज्ञानरहित कर्मफल की क्षीणता तथा ब्रह्मज्ञान की अक्षय फलता का ऐसा विवेचन करते है—“इस लोक की वस्तुएं जैसे नाशवान् है वैसे ही पारलौकिक वस्तुएं भी नाशवान् हैं”—“सकाम कर्मों का फल नाशवान् ही होता है”—“क्षण भंगुर कर्मों से नित्य फल कभी नहीं मिलता”—“यज्ञादि कर्म संसार से पार करने वाली दृढ नौकाएं नहीं हैं” —“लौकिक कर्मों का भली भांति पर्यवेक्षण करके, कर्मों की अक्षमता समझ कर ब्राह्मण को सांसारिक कर्मों की ओर से निर्वेद होता है, वह ब्रह्म तत्व की जिज्ञासा से हाथ में कुश आदि पूजन सामग्रियों को लेकर श्रोत्रिय और ब्रह्मनिष्ठ गुरु के निकट उपस्थित होता है, गुरु अपने निकट उपस्थित प्रशान्तचित्त संयतेन्द्रिय शिष्य को ब्रह्मविद्या का उपदेश दें जिससे कि वह अक्षर तथा सत्य से अवगत हो जाय”—“ब्रह्मवेत्ता पर- ब्रह्म को प्राप्त करता है”—“पुनः मृत्यु को प्राप्त नहीं करता”—“वह एक ही वस्तु को देखता है, जागतिक कामनाओं को न देखने वाला मृत्यु को नहीं देखता”—“वह स्वतंत्र हो जाता है” “उसको जानने वाला अमृत हो जाता है”—“उसे जानकर मृत्यु का अतिक्रमण करता है,—इसके अतिरिक्त मोक्ष का दूसरा उपाय नहीं है”—“प्रेरक आत्मा को भिन्न मानकर उसका कृपा पात्र होता है और उसी से, अमृतत्वं प्राप्त करता है।” इत्यादि।

( ८ ) ननु च साङ्गवेदाध्ययनादेव कर्मणां स्वर्गादिफलत्वं स्वर्गादीनां च क्षयित्वं ब्रह्मोपासनस्यामृतफलत्वं च ज्ञायत एव । अनन्तरं मुमुक्षुर्ब्रह्मजिज्ञासायामेव प्रवर्तताम्, किमर्था धर्मविचारापेक्षा ? एवं तर्हि शारीरकमीमांसायामपि न प्रवर्तताम् साङ्गाध्ययनादेव कृत्स्नस्य, ज्ञातत्वात् । सत्यम्, आपातप्रतीतिर्विद्यत एव, तथापि न्यायानुगृहीतस्य वाक्यस्यार्थनिश्चायकत्वादापातप्रतीतोऽप्यर्थः संशयविपर्ययौ नाति- वर्तते; अतस्तन्निर्णयाय वेदान्तवाक्यविचारः कर्तव्य इति चेत्; तथैव धर्मविचारोऽपि कर्त्तव्यः, इति पश्यतु भवान् । ( शंका ) वेद वेदांग के अध्ययन से ही कर्मों की स्वर्गादि फलता, स्वर्गादि की क्षीणता एव ब्रह्मोपासना की अमृतफलता ज्ञात हो जाती है तो मोक्ष की इच्छा वालो की ब्रह्म जिज्ञासा में ही प्रवृत्ति होगी, उन्हे धर्म विचार की अपेक्षा ही क्या है ? (उत्तर) यदि ऐसी ही बात है कि वेदाध्ययन से ही सब कुछ ज्ञात हो जाता है तो शारीरक मीमांसा में ही क्यो प्रवृत्ति होगी । (पूर्वपक्ष) उक्त विषयो की सामान्य प्रतीति अध्ययन से हो जाती है ऐसा सत्य है; फिर भी न्यायानुमोदित वाक्य के अर्थनिर्ण- यक होने से अविचारित रूप से प्रतीत होने वाला सामान्य अर्थ संशय और विपर्यय (भ्रम) की निवृत्ति नही कर पाता, इसलिए अर्थ निर्णायक वेदान्त वाक्यों का विचार आवश्यक है । (उत्तर पक्ष) आपके उक्त मत के अनुसार ही धर्म विचार भी आवश्यक हो जाता है । (लघु पूर्वपक्ष) ननु च ब्रह्मजिज्ञासा यदेव नियमेनापेक्षते, तदेव पूर्ववृत्तं वक्तव्यम् । न धर्मविचारापेक्षा ब्रह्मजिज्ञासायाः, अधीत- वेदान्तस्यानधिगतकर्मणोऽपि वेदान्तवाक्यस्यार्थविचारोपपत्तेः । कर्माङ्गाश्रयाणि उद्गीथ-आदि उपासनानि अत्रैव चिन्त्यन्ते, तदनधि- गतकर्मणो न शक्यं कर्त्तुमिति चेत्, अनभिज्ञो भवान् शारीरक- शास्त्रविज्ञानस्य । अस्मिन् शास्त्रे अनाद्यविद्याकृतविविधभेद-

( ६ ) दर्शननिमित्तजन्मजरामरणादिसांसारिकदुःखसागरनिमग्नस्य निखिल- दुःखमूलमिथ्याज्ञाननिबर्हणायात्मैकत्वविज्ञानं प्रतिपिपादयिषितम्। अस्यहि भेदावलम्बिकर्मज्ञानं क्वोपयुज्यते ? प्रत्युत विरुद्धमेव । उद्गीथादिविचारस्तु कर्मशेषभूत एव ज्ञानरूपत्वाविशेषादिहैव क्रियते । स तु न साक्षात् संगतः, अतो यत् प्रधानं शास्त्रं तदपेक्षित- मेव पूर्ववृत्तं किमपि वक्तव्यम् । (वाद) ब्रह्म जिज्ञासा में जिस नियम की अपेक्षा होती है, उस पूर्व- वर्त्ती कारण के विषय में कुछ कहना है । ब्रह्म जिज्ञासा, मैं धर्म विचार अपेक्षित नहीं है । वेदांत का ज्ञाता कर्म के विधि निषेधात्मक नियमों को न जानकर भी वेदांतवाक्यों के तत्त्वों पर विचार कर सकता है । यदि आप कहें कि वेदांत में तो कर्माङ्गाश्रित उद्गीथ आदि विद्याओं का भी निरूपण है, कर्मकांड के विचार बिना उन पर विचार नहीं हो सकता । तो मेरी समझ में आप शारीरक मीमांसा शास्त्र प्रणाली से अनभिज्ञ हैं। इस शास्त्र में अनादि अविद्याजन्य भेद दृष्टि के फलस्वरूप होने वाले जन्म जरा मरण आदि सांसारिक दुःख सागर में निमग्न व्यक्ति की दुःखराशि की मूलकारण मिथ्याभ्रान्ति के निवारणार्थ, आत्मैकत्व ज्ञान का प्रति- पादन किया गया है । इस विवेक में भेद पर अवलंबित कर्म ज्ञान की क्या उपयोगिता हो सकती है ? यह तो इसमें विरुद्ध कार्य ही करेगा । उद्गीथ आदि उपासना कर्माङ्ग होते हुए भी ज्ञान स्वरूप हैं इसीलिए उनका उत्तरमीमांसा में विवेचन किया गया है, कर्म का उन उपासनाओं से साक्षात् संबन्ध नहीं है । शास्त्र के प्रधान प्रतिपाद्य विषय से संबद्ध विषय को ही उस शास्त्र का पूर्ववर्त्ती कारण कह सकते हैं, अन्य किसी को नहीं (अतः कर्म ज्ञान ब्रह्मजिज्ञासा में अपेक्षित नहीं है) । बाढम् ; तदपेक्षितं च कर्मविज्ञानमेव, कर्मसमुच्चिताद् ज्ञानादपवर्गश्रुतेः । वक्ष्यति च “सर्वापेक्षा च यज्ञादिश्रुतेरश्ववत्” इति । अपेक्षिते च कर्मण्यज्ञाते केन समुच्चयः केन नेति विभागो न शक्यते ज्ञातुम्, अतस्तदेव पूर्ववृत्तम् । ankurnagpal108@gmail.com

( १० ) (प्रतिबाद ) ब्रह्मज्ञान में कर्म ज्ञान ही अपेक्षित पूर्व कारण हो सकता है। कर्मसमुच्चित ज्ञान से ही मुक्ति होती है, ऐसा मोक्ष प्रतिपादक श्रुति वाक्य से ज्ञात होता है। ऐसा सूत्रकार भी “यज्ञादिश्रुतेरश्ववत्” मे प्रति- पादन करते हैं। ज्ञानापेक्षित कर्मकाण्ड का विशेष ज्ञान न होने से कौन सा कर्म ज्ञानसमुच्चित हो सकता है, कौन सा नहीं ? ऐसा निर्णय करना कठिन है। इसलिए समस्त कर्ममीमांसा को ब्रह्ममीमांसा का पूर्ववर्त्ती मानना होगा। नैतद् युक्तम्; सकलविशेषप्रत्यनीकचिन्मात्रब्रह्मविज्ञानादेवा- विद्यानिवृत्तेः, अविद्यानिवृत्तेरेव हि मोक्षः । वर्णाश्रमविशेषसाध्य- साधनेतिकर्तव्यताद्यनन्तविकल्पास्पदं कर्म सकलभेददर्शननिवृत्ति- रूपाज्ञाननिवृत्तेः कथमिव साधनं भवेत् ? श्रुतयश्च कर्मणामनित्य- फलत्वेन मोक्षविरोधित्वं, ज्ञानस्यैव मोक्षसाधनत्वं च दर्शयन्ति— “अन्तवदेवास्य तद् भवति”, “तद् यथेह कर्मचितो लोकः क्षीयते, एवमेवामुत्र पुण्यचितो लोकः क्षीयते”, “ब्रह्मविदाप्नोति परम्, ब्रह्मवेद ब्रह्मैव भवति”, “तमेव विदित्वातिमृत्युमेति” इत्याद्याः । (वाद) उक्त कथन संगत नही है, सर्वविध भेदों से रहित शुद्ध चिन्मय ब्रह्मज्ञान से ही अविद्या की निवृत्ति होती है, अविद्या की निवृत्ति ही मोक्ष है। वर्ण और आश्रमगत भेद, साध्य, साधन और इतिकर्तव्यता आदि अनन्त भेद सापेक्ष कर्म समस्त भेद दर्शन निवृत्तिरूप अज्ञान निवृत्ति के साधन कैसे हो सकते हैं ? ‘ अज्ञानी का कर्म निश्चित ही नाशवान् होता है”, “इस लोक में कर्मलब्ध वस्तुएं जैसे अशाश्वत होती हैं; वैसे पुण्यचित् स्वर्गादि भी नश्वर है”, “ब्रह्मवेत्ता ही पर ब्रह्म को प्राप्त कर सकता है”, “ब्रह्म को जानने वाला ब्रह्म ही होता है।” इत्यादि श्रुतियाँ भी अनित्य फल वाले कर्मों को मोक्ष विरोधी तथा ज्ञान को ही मोक्ष साधक बतलाती हैं। यदपि चेदमुक्तम्—यज्ञादिकमपिक्षाविद्येति, तद् वस्तुविरोधात् श्रुत्यक्षरपर्यालोचनया चान्तःकरणनैर्मल्यद्वारेण विविदिषोत्पत्ता- वुपयुज्यते, न फलोत्पत्तौ, “विविदिषन्तीति” श्रवणात्, विविदिषा-

( ११ ) यां जातायां ज्ञानोत्पत्तौ शमादीनामेव अन्तरङ्गोपायतां श्रुतिरेवाह “शान्तो दान्त उपरतस्तितिक्षुः समाहितो भूत्वात्मन्येवात्मानं पश्येत्” इति । तदेवं जन्मान्तरशतानुष्ठितानभिसंहितफलविशेषकर्म- मृदितकषायस्य विविदिषोत्पत्तौ सत्याम् “सदेव सोम्येदमग्र आसीद् एकमेवाद्वितीयम्”, “सत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्म”, “निष्कलं निष्क्रियं शान्तम्”, “अयमात्मा ब्रह्म”, “तत्त्वमसि” इत्यादिवाक्यजन्यज्ञानाद- विद्या निवर्त्तते । यद्यपि “विद्या यज्ञादि कर्म सापेक्ष है” ऐसा कहा गया है । श्रुति के अक्षरों की पर्यालोचना से स्पष्ट होता है कि अन्तःकरण की निर्मलता द्वारा ब्रह्म जिज्ञासा की उत्पत्ति में ही यज्ञादि कर्म की उपयोगिता है, फलोत्पत्ति में नहीं । यदि इसे फलोत्पत्ति में उपयोगी मानेंगे तो वह ज्ञान वस्तु का विरोधी सिद्ध होगा । “विविदिषन्ति” इस श्रुतिवाक्य से [L14

( १२ ) वाक्यार्थज्ञानमविद्यां निवर्त्तयतीत्येवंरूपस्य श्रवणस्यापेक्षितमेव पूर्ववृत्तं वक्तव्यम् । तच्च नित्यानित्यवस्तुविवेकः, शमदमादि- साधनसम्पत्, इहामुत्र फलभोगविरागः, मुमुक्षुत्वं चेत्येतत्साधन- चतुष्टयम् । अनेन विना जिज्ञासानुपपत्तेः, अर्थस्वभावादेवेदमेव पूर्ववृत्तमिति ज्ञायते । श्रवण, मनन और निदिध्यासन वाक्यार्थज्ञान के उपयोगी साधन हैं। तत्त्वदर्शी आचार्य से "समस्त वेदान्त वाक्य अभेद विद्या के प्रतिपादक हैं" ऐसे युक्तियुक्त वाक्यार्थ ग्रहण को श्रवण कहते हैं। ऐसे आचार्योपदिष्ट तथ्य को युक्ति संगत मानकर आत्मसात् करने के अभ्यास को मनन कहते हैं। एकत्व ज्ञान की विरोधी अनादि भेद बुद्धि और उसके संस्कारों को दूर करने के लिए आचार्योपदिष्ट तत्व की अनवरत भावना को निदिध्यासन कहते हैं। इस प्रकार श्रवण मनन आदि द्वारा जिसकी समस्त भेदवासना निरस्त हो चुकी है, (तत्वमसि आदि) वाक्य जनित ज्ञान उसी की अविद्या की निवृत्ति कर सकता है। इस प्रकार का श्रवण रूप कर्म ही वाक्यार्थ ज्ञान का पूर्ववर्ती अपेक्षित कर्म है, ऐसा कहना चाहिए। नित्य अनित्य वस्तु का विवेक, शम दम आदि साधन, ऐहिक और पारलौकिक फल भोग से वैराग्य तथा मुमुक्षता ये चार साधन हैं, इनके बिना ब्रह्म जिज्ञासा हो नही सकती। श्रुतियों के वास्तविक अर्थ से ये चारो ही अपेक्षित पूर्ववृत्त ज्ञात होते हैं। एतदुक्तं भवति—ब्रह्मस्वरूपाच्छादिकाऽविद्यामूलमपारमार्थिकं भेददर्शनमेव बन्धमूलम् । बन्धश्चापारमार्थिकः स च समूलोऽपा- रमार्थिकत्वादेव ज्ञानेनैव निवर्त्यते । निवर्त्तकं च ज्ञानं तत्त्व- मस्यादिवाक्यजन्यम् । तस्यैतस्य वाक्यजन्यस्य ज्ञानस्य स्वरूपो- त्पत्तौ कार्ये वा कर्मणो नोपयोगः, विविदिषायामेव तु कर्मणामुपयोगः स च पापमूलरजस्तमोनिबर्हणद्वारेण सत्त्वविवृद्ध्या भवती- त्युपयोगमभिप्रेत्य "ब्राह्मणा विविदिषन्ति" इत्युक्तमिति । अतः कर्मज्ञानस्यानुपयोगादुक्तमेव साधनचतुष्टयं पूर्ववृत्तमिति वक्तव्यम् । ankurnagpal108@gmail.com

( १३ ) कथन यह है कि ब्रह्म के स्वरूप को ढकने वाली अविद्या से प्रसूत असत्य भेद दर्शन ही (जीवों के) बन्धन का कारण है, वह बन्धन भी अवास्तविक है, और वह समूल अवास्तविक होने से ज्ञान से ही उसकी निवृत्ति हो जाती है। तत्त्वमसि आदि वाक्य जन्य ज्ञान ही उक्त बन्धन का निवारक है। इस प्रकार के वाक्य जन्य ज्ञान में कार्य या कर्म की कोई उपयोगिता नहीं है, विविदिषा में ही एक मात्र कर्मों की उपयोगिता है। वह विविदिषा, पाप के हेतु रज और तम गुणों की निवृत्ति तथा सत्त्व गुण की अत्यधिक वृद्धि में ही होती है। इसकी इस उपयोगिता के आशय से ही “ब्राह्मणाः विविदिषन्ति” ऐसा निर्देश किया गया है। इससे सिद्ध होता है कि ब्रह्मज्ञान में कर्मज्ञान की कोई उपोगिता नहीं है, पूर्वोक्त साधन चतुष्टय ही पूर्ववर्ती उपयोगी साधन हैं। (लघु सिद्धान्त)—अत्रोच्यते—यदुकमविद्यानिवृत्तिरेव मोक्षः सा च ब्रह्मविज्ञानादेव भवति, इति । तदभ्युपगम्यते, अविद्यानिवृत्तये वेदान्तवाक्यैर्विधित्सितं ज्ञानं किंरूपमिति विवेचनीयम्, किं वाक्याद् वाक्यार्थज्ञानमात्रम्, उत तन्मूलमुपासनात्मकं ज्ञानम् ? इति । (प्रतिवाद) आपने जो यह कहा कि “अविद्या निवृत्ति ही मोक्ष है और वह ब्रह्मज्ञान से ही होती है”, तो मैं पूछता हूँ कि अविद्या निवृत्ति के लिए वेदान्त वाक्यों के विधित्सित ज्ञान का रूप क्या है, यह विवेचन का विषय है। वह ज्ञान वाक्य जन्य वाक्यार्थ ज्ञान मात्र है अथवा वाक्यार्थ ज्ञान मूलक उपासना का बोधक है ? न तावद् वाक्यजन्यं ज्ञानं तस्य विधानमन्तरेणापि वाक्या- देव सिद्धेः, तावन्मात्रेणाविद्यानिवृत्त्यनुपलब्धेश्च । न च वाच्यम् भेदवासनायामन्निरस्तायां वाक्यमविद्यानिवर्त्तकं ज्ञानं न जनयति, जातेऽपि सर्वस्य सहसैव भेदज्ञानानिवृत्तिः न दोषाय, चन्द्रैकत्वे ज्ञातेऽपि द्विचन्द्रज्ञानानिवृत्तिवत् । अनिवृत्तमपि छिन्नमूलत्वेन न बन्धाय भवति, इति । वाक्य जन्य ज्ञान तो अविद्या निवृत्ति का कारण हो नहीं सकता,

( १४ )

ज्ञान के विधान के अतिरिक्त केवल वाक्य से तो उसकी सिद्धि हो नहीं सकती, केवल उतने होने मात्र से अविद्या निवृत्ति देखी भी नहीं जाती । ऐसा भी नहीं कह सकते कि भेदवासना के निवारण के बिना "तत्त्वमसि" आदि वाक्य अविद्या निवारक ज्ञानोत्पादक नहीं होते । क्योंकि चन्द्र एक है ऐसी जानकारी होते हुए भी दृष्टि दोष से दो चन्द्रों की जो भ्रान्ति होती है, वह निराधार ही तो है, उसका निराकरण तो होता नहीं, निराकृत न होने पर भी निर्मूल होने से उसका कोई महत्व भी नहीं है । उसी प्रकार भेद ज्ञान भी भ्रान्ति मूलक ही तो है, उसका कोई सत्य आधार तो है नहीं, फिर वह भेदज्ञान बन्धन का कारण भी नहीं हो सकता, उसका निराकरण सहसा न भी हो तो उसमें हानि ही क्या है ? वाक्य- जन्य ज्ञान का कुछ असर तो होना ही चाहिए । सत्यां सामग्र्यां ज्ञानानुत्पत्त्यनुपपत्तेः, सत्यामपि विपरीत- वासनायामाप्तोपदेशलिङ्गादिभिर्बाधकज्ञानोत्पत्तिदर्शनात् । सत्यपि वाक्यार्थज्ञाने अनादिवासनया मात्रया भेदज्ञानमनुवर्तत इति भवता न शक्यते वक्तुम्, भेदज्ञानसामग्र्या अपि वासनाया मिथ्यारूपत्वेन ज्ञानोत्पत्त्यैव निवृत्तत्वात्, ज्ञानोत्पत्तावपि मिथ्यारूपायास्तस्याः अनिवृत्तौ निवर्त्तकान्तराभावात् कदाचिदपि नास्या वासनाया निवृत्तिः । वासनाकार्यं भेदज्ञानं छिन्नमूलमथ चानुवर्त्तत इति बालिशभाषितम् । द्विचन्द्रज्ञानादौ तु बाधकसन्निधावपि मिथ्याज्ञानहेतोः परमार्थ- तिमिरादिदोषस्य ज्ञानबाध्यत्वाभावेन अविनष्टत्वाद मिथ्याज्ञान- निवृत्तिरविरुद्धा । प्रबलप्रमाणबाधितत्वेन भयादिकार्यं तु निवर्त्तते । अपिच भेदवासनानिरसनद्वारेण ज्ञानोत्पत्तिमभ्युपगच्छतां कदा- चिदपि ज्ञानोत्पत्तिः न सेत्स्यति । भेदवासनाया अनादिकालोप- चितत्वेनापरिमितत्वात् तद्विरोधिभावनायाश्चाल्पत्वादनया तन्नि- रासानुपपत्तेः । प्रायः ज्ञानोत्पादक साधनों के रहते हुए भी ज्ञानोत्पत्ति नहीं होती तथा विरुद्ध संस्कारों के होते हुए भी महात्माओ के उपदेश और आक- स्मिक घटनाओं से सहसा ज्ञानोत्पत्ति होती देखी जाती है ।

( १५ ) वाक्यार्थ ज्ञान के होने पर भी अनादि वासना के कारण थोड़ी बहुत भेद दृष्टि बनी ही रहती है, ऐसा तो आप कह नहीं सकते, क्योंकि आपके मत से भेदवासना मिथ्या है अतः भेदोत्पादक साधनों के रहते हुए भी ज्ञानोत्पत्ति से ही उस मिथ्यावासना की निवृत्ति हो जानी चाहिये। यदि ज्ञानोत्पत्ति होने पर भी मिथ्यारूप उस वासना की निवृत्ति नहीं होती.तो, उसकी निवृत्ति का ज्ञान के अतिरिक्त कोई दूसरा उपाय तो है नहीं, फिर वासना की निवृत्ति कभी भी सम्भव नहीं है। भेद दृष्टि की मूल कारण वासना नष्ट हो जाय और उसका कार्य भेदज्ञान फिर भी बना रहे, ऐसा तो मूर्ख ही कह सकता है। “चन्द्र दो हैं” ऐसा जो ज्ञान होता है उसमें भ्रम के निवारक यथार्थ ज्ञान के होते हुए भी, भ्रम के यथार्थ कारण तिमिर आदि दोष (नेत्र रोग विशेष) की स्थिति रहती है, जिसे यथार्थ स्वानुभूत ज्ञान से दूर नहीं किया जा सकता, इस स्थिति में दो चन्द्र संबंधी मिथ्या भ्रान्ति होती भी है तो कोई विरुद्ध बात नहीं है; किसी प्रामाणिक व्यक्ति के द्वारा दो चन्द्र देखने वाले व्यक्ति की भ्रान्ति निवारण की जाती है तो उसके भ्रम जन्य भय आदि की निवृत्ति हो जाती है। उसी प्रकार वाक्यार्थ जन्य ज्ञान से भेदवासना की निवृत्ति हो जाने पर भेददृष्टि की भी निवृत्ति हो जानी चाहिये, यदि भेददृष्टि बनी रहती है तो निश्चित- ही भेदवासना भी है, वह वाक्यार्थ जन्य ज्ञान से कदापि निवृत्त नहीं होती ऐसा मानना पड़ेगा। भेदवासना के निराकरण से ही ज्ञानोत्पत्ति को चाहने वालों की भी ज्ञानोत्पत्ति कभी हो नहीं सकती, क्योंकि भेदवासना अनन्त काल- संचित होने से अपरिमित है तथा उसके विपरीत भावना (ज्ञानवासना) बहुत ही अल्प है, उसके द्वारा प्रबल भेदवासना का निराकरण सम्भव नहीं है। अतो वाक्यार्थज्ञानादन्यदेव ध्यानोपासनादिशब्दवाच्यं ज्ञानं वेदान्तवाक्यैर्विधित्सितम् । तथा च श्रुतयः—"विज्ञाय प्रज्ञां कुर्वीत", “अनुविद्य विजानाति”, “ओमित्येवात्मानं ध्यायथ”, “निचाय्य तं मृत्युमुखात् प्रमुच्यते”, “आत्मानमेव लोकमुपासीत”, “आत्मा वाऽरे द्रष्टव्यः श्रोतव्यो मन्तव्यो निदिध्यासितव्यः” “सोऽन्वेष्टव्यः स विजिज्ञासितव्यः”—इत्येवमाद्याः। ankurnagpal108@gmail.com

( १६ ) इससे यह निश्चित होता है कि वाक्यार्थ ज्ञान से भिन्न ध्यान, उपासना आदि शब्दगम्य ज्ञान ही वेदांत वाक्यों का अभीप्सिन तात्पर्य है, ऐसा ही "अच्छी तरह जानकर प्रज्ञा (ध्यान) करनी चाहिये", "भली भांति (वेदांतवाक्यों की) पर्यालोचना करके जानने की चेष्टा करो", "आत्मा का प्रणव रूप से चिन्तन करो", "उपासक उस परमात्मा को देखकर मृत्यु मुख से मुक्त होते है", "आत्मा की ही उपामना करो" "आत्मा ही श्रोतव्य, द्रष्टव्य, मंतव्य और निदिध्यासितव्य है", "वही अन्वेष्टव्य और जिज्ञास्य है"—इत्यादि श्रुतिवाक्यों का भी तात्पर्य है। अत्र निदिध्यासितव्य इत्यादिनेकार्थ्यात् "अनुविद्य विजानाति", "विज्ञाय प्रज्ञां कुर्वीत" इत्येवमादिभिर्वाक्यार्थज्ञानस्य ध्यानोपकारक- त्वात् "अनुविद्य" "विज्ञाय" इत्यनूद्य "प्रज्ञां कुर्वीत" "विजानाति" इति ध्यानं विधीयते। "श्रोतव्य" इति चानुवादः, स्वाध्यायस्यार्थ- परत्वेनाधीतवेदः पुरुषः प्रयोजनवदर्थावबोधित्वदर्शनात्तन्निर्णयाय स्वयमेव श्रवणे प्रवर्त्तते इति श्रवणस्य प्राप्तत्वात्। श्रवणप्रतिष्ठार्थ- त्वान्मननस्य "मन्तव्य" इति चानुवादः, तस्माद् ध्यानमेव विधीयते। वक्ष्यति च "आवृत्तिरसकृदुपदेशात्" इति। उपर्युक्त श्रुति वाक्यो में निदिध्यासन आदि सभी उपाय एक ही अर्थ के द्योतक हैं। "अनुविद्य विजानाति", "विज्ञाय प्रज्ञां कुर्वीत" इत्यादि वाक्यों से वाक्यार्थ ज्ञान की ध्यानोपकारकता ही बतलाई गई है, "प्रज्ञा कुर्वीत", "विजानाति" आदि शब्दों में ध्यान का ही विधान बतलामा गया है। "श्रोतव्य" शब्द भी ध्यान का अनुवाद है, अधीत अक्षर राशि का अर्थावबोध ही स्वाध्याय का सही तात्पर्य है, वेदों को पढ़ा हुआ व्यक्ति शब्द के प्रयोजनीय अर्थ को जानकर उमके निर्णय के लिए स्वयं ही श्रवण के लिए प्रस्तुत होता है। इस प्रकार श्रवण भी ध्यान का ही एक प्रकार सिद्ध होता है। श्रवण को स्थिर करना ही मनन का प्रयोजन है, "मनन" 'श्रवण'अपेक्षित उपाय है, इसलिए "मन्तव्य" को भी भ्यान का ही अनुवाद मानना चाहिये, इससे भी ध्यान का ही विधान किया गया है। "आवृत्ति- रसकृदुपदेशात्" सूत्र में सूत्रकार भी उक्त तथ्य का प्रतिपादन करते हैं। ankurnagpal108@gmail.com

( १७ ) तदिदमपवर्गोपायतया विधित्सितं वेदनमुपासनम् इत्यवगम्यते । विद्युपास्योर्व्यतिकरेणोपक्रमोपसंहारदर्शनात् “मनो ब्रह्मेत्युपासीत' इत्यत्र “भाति च तपति च कीर्त्या यशसा ब्रह्मवर्चसेन य एवं वेद”, “न स वेद अकृत्स्नो ह्येष आत्मेत्येवोपासीत”, “यस्तद् वेद यत्स वेद स मयैतदुक्तः” इत्यत्र “अनु म एतां भगवो देवतां शाधि यां देवतामु- पास्से” इति । मोक्ष के उपाय के रूप में वेदन और उपासना शब्द का श्रुति वाक्यों में आगे पीछे उलट पलट कर विधान वर्णन किया गया है । जैसे—“मन की ब्रह्म रूप से उपासना करनी चाहिए”, “जो उसे इस प्रकार जानता है वह कीर्ति ( पराक्रम जन्य प्रतिष्ठा ), यश ( दान जन्य प्रतिष्ठा ) और ब्रह्मतेज से उद्दीप्त होकर सबको अभिभूत करता है”, “वे पूर्ण आत्मा को नहीं जानते, ये सब तो उसके अंशमात्र हैं”, “आत्मा इन अंशों में व्याप्त है, ऐसा मानकर ही उपासना करनी चाहिए”, “जो उसे जानता है वही वास्तविक ज्ञाता है”, “भगवन् ! आप जिस देवता की उपासना करते हैं मुझे उन्हीं का उपदेश दें ।” इत्यादि । ध्यानं च तैलधारावदविच्छिन्नस्मृतिसंतानरूपम् । “ध्रुवा स्मृतिः, स्मृतिलम्भे सर्वग्रन्थीनां विप्रमोक्षः” इति ध्रुवायाः स्मृते- रपवर्गोपायतवश्रवणात् । सा च स्मृतिः दर्शनसमाकारा “भिद्यते हृदयग्रन्थिश्चिद्यन्ते सर्वसंशयाः । क्षीयन्ते चास्य कर्माणि तस्मिन् दृष्टे परावरे ॥” इत्यनेनैकार्थ्यात् । एवं सति “आत्मा वा अरे द्रष्ट- व्यः” इत्यनेन निदिध्यासनस्य दर्शनसमानाकारता विधीयते । भवति च स्मृतेर्भावनाप्रकर्षाद् दर्शनरूपता । वाक्यकारेणैतत्सर्वं प्रपञ्चितम् “वेदनमुपासनं स्यात् तद्विषये श्रवणात्” इति । सर्वा- सूपनिषत्सु मोक्षसाधनतया विहितं वेदनमुपासनमित्युक्तम् “सकृत् प्रत्ययं कुर्यात् शब्दार्थस्य कृतत्वात्प्रयाजादिवत्” इति पूर्वपक्षं कृत्वा “सिद्धन्तूपासनशब्दात्” इति वेदनम् असकृदावृत्तं मोक्षसाधनमिति ankurnagpal108@gmail.com

( १८ ) निर्णीतम्। “उपासनं स्याद् ध्रुवानुस्मृतिदर्शनान्निर्वचनाच्च” इति। तस्यैव वेदनस्योपासनरूपस्यासकृदावृत्तस्य ध्रुवानुस्मृतित्वमुप- वर्णितम्। तैल धारा की तरह अखंड प्रवाहमयी स्मृति परम्परा ही ध्यान है। “स्मृति के आश्रय से हृदयस्थ समस्त ग्रन्थियाँ भंग हो जाती हैं।” इस वाक्य में ध्रुवा स्मृति को मोक्ष का उपाय बतलाया गया है। वह स्मृति आत्मदर्शन के समान रूप वाली है, “उस परावर सर्वोत्तम पुरुष का दर्शन करके हृदयस्थ ग्रन्थियों का मोचन, संशयों का उच्छेद तथा कर्मों का क्षय हो जाता है” इस वाक्य से स्मृति और दर्शन की एकार्थता सिद्ध होती है। इसी प्रकार “आत्मा वा अरे” इत्यादि वाक्य से निदिध्यासन की दर्शन रूपता दिखलायी गयी है। स्मृति भावना के प्रकर्ष से इसकी दर्शन रूपता होती है। वाक्यकार ने इस सबका विस्तृत विवेचन इस प्रकार किया है—“वेदन ही उपासना है ऐसा श्रुति से ही ज्ञात होता है।” सभी उपनिषदों में मोक्ष के उपाय रूप से विहित “वेदन” को ही “उपासना” रूप बतलाया गया है। प्रयाजादि याग की तरह ज्ञानानु- शीलन भी एक बार करना चाहिए” इस वाक्य को पूर्वपक्ष के रूप में उद्धृत करके “सिद्धन्तूपासनशब्दात्” इस सूत्र से “वेदन” की प्रवाहमयी आवृत्ति का मोक्ष साधन के रूप में निर्णय किया गया है। तथा “उपासनं स्याद् ध्रुवानुस्मृतिर्दर्शनान्निर्वचनाच्च” इस सूत्र से उस उपासना रूप वेदन की प्रवाहमयी आवृत्ति को ध्रुवा स्मृति बतलाया गया है। सेयं स्मृतिर्दर्शनरूपा प्रतिपादिता, दर्शनरूपता च प्रत्यक्षता- पत्तिः। एवं प्रत्यक्षतापन्नामपवर्गसाधनभूतां स्मृतिं विशिनष्टि— “नायमात्मा प्रवचनेन लभ्यो न मेधया न बहुना श्रुतेन। यमेवैष वृणुते तेन लभ्यस्तस्यैष आत्मा विवृणुते तनूं स्वाम्॥” इति। अनेन केवलश्रवणमनननिदिध्यासनानामात्मप्राप्त्यनुपायत्वमुक्त्वा “यमेवैष आत्मा वृणुते तेनैव लभ्यः” इत्युक्तम्। उक्त स्मृति की दर्शन रूपता का प्रतिपादन किया गया है, दर्शन रूपता को ही साक्षात्कार कहते हैं। ऐसी साक्षात्कार रूपता को प्राप्त

( १६ ) मोक्ष की साधन रूपा स्मृति का विश्लेषण श्रुति में इस प्रकार करते हैं— “इस आत्मा को प्रवचन, मेधा या अधिक शास्त्र ज्ञान से नहीं प्राप्त कर सकते, यह आत्मा ही जिसको वरण करता है, उसे ही वह प्राप्त होता है, उसके समक्ष अपना रूप प्रकट कर देता है।” इस वाक्य से केवल श्रवण मनन निदिध्यासन को आत्मप्राप्ति में असमर्थ बतला कर “वही जिसे वरण करता है उसके समक्ष प्रकट होता है” ऐसी साक्षात्- कार रूपा स्मृति का वर्णन किया गया है। प्रियतम एव वरणीयो भवति, यस्यायं निरतिशयं प्रियः स एवास्य प्रियतमो भवति, यथायं प्रियतमात्मानं प्राप्नोति तथा स्वयमे- व भगवान् प्रयतत इति भगवतैवोक्तम्—“तेषां सततयुक्तानां भजतां प्रीतिपूर्वकम् । ददामि बुद्धियोगं तं येन मामुपयान्ति ते ॥” इति । “प्रियो हि ज्ञानिनोऽत्यर्थमहं स च मम प्रियः ।” इति च । अतः साक्षात्काररूपा स्मृतिः स्मर्यमाणात्यर्थप्रियत्वेन स्वयमप्यत्यर्थं प्रिया यस्य स एव परेणात्मना वरणीयो भवतीति तेनैव लभ्यते परमात्मेत्युक्तं भवति; एवंरूपा ध्रुवानुस्मृतिरेव भक्तिशब्देनाभि- धीयते । उपासनपर्यायत्वाद् भक्तिशब्दस्य । श्रत एव श्रुतिस्मृतिभिरेव- मभिधीयते “तमेव विदित्वातिमृत्युमेति”, “तमेवं विद्वानमृत इह भवति”, “नान्यः पन्था अयनाय विद्यते”, “नाहं वेदैर्नतपसा न दानेन न चेज्यया । शक्य एवं विधो द्रष्टुं दृष्टवानसि मां यथा ॥ भक्त्या त्वनन्यया शक्य अहमेवं विधोऽर्जुन । ज्ञातुं द्रष्टुं च तत्त्वेन प्रवेष्टुं च परन्तप ॥”, “पुरुषः स परः पार्थ भक्त्या लभ्यस्त्वनन्यया ॥” इति । प्रियतम व्यक्ति ही वरणीय होता है, जिस व्यक्ति के ये प्रभु अत्यन्त प्रिय होते हैं वही उनका प्रियतम होता है। जिस प्रकार यह प्रियतम उन्हें प्राप्त होता है वैसा प्रयास भगवान स्वयं ही करते हैं। ऐसा भगवान का ही कथन है—“प्रीतिपूर्वक निरन्तर भजन करने वालों को मैं ऐसी

( २० ) बुद्धि प्रदान करता हूँ जिससे वे मुझे प्राप्त कर सकें।" "ज्ञानी भक्तों का मैं अत्यन्त प्रिय हूँ और वे मेरे प्रियतम हैं।" अत्यन्त प्रिय प्रभु ही स्वयं स्मृतिमार्ग में प्रकट होकर साक्षात्कार के अनुरूप अपनी प्रिय स्मृति प्रदान करते हैं, जिससे उपासक परमात्मा का वरणीय होता है, उसी से वह परमात्मा को प्राप्त होता है। इस प्रकार की ध्रुवानुस्मृति ही भक्ति शब्द से कही गयी है, उपासना शब्द भक्ति शब्द का पर्यायवाची है, इससे भी उक्त बात की पुष्टि होती है। श्रुति- स्मृतियों से भी ऐसा ही ज्ञात होता है, जैसे—"उसको इस प्रकार जानकर मृत्यु का अतिक्रमण करता है", "उसको जानकर मुक्त हो जाता है", "इसको जानने का कोई दूसरा मार्ग नहीं है", "जैसा तुमने मुझे देखा है, मेरे इस रूप को वेदाध्ययन, तप, दान, यज्ञ किसी भी साधन से नहीं देखा जा सकता", "मेरी अनन्य भक्ति द्वारा ही मेरे इस रूप को देखा और समझा जा सकता है", "केवल भक्ति द्वारा ही पर पुरुष को प्राप्त किया जा सकता है।" इत्यादि। एवंरूपाया ध्रुवानुस्मृतेः साधनानि यज्ञादीनि कर्माणि इति "यज्ञादिश्रुतेरश्ववत्" इत्यभिधास्यते। यद्यपि विविदिषन्तीति यज्ञा- दयो विविदिषोत्पत्तौ विनियुज्यन्ते, तथापि तस्यैव वेदनस्य ध्यानरूप- स्याहरहरनुष्ठीयमानस्याभ्यासाधेयातिशयस्याप्रयाणानुवर्तमानस्य ब्रह्मप्राप्तिसाधनत्वात्तदुत्पत्तये सर्वाण्याश्रमकर्माणि यावज्जीवमनु- ष्ठेयानि। वक्ष्यति च "आ प्रयाणात्तत्रापि हि दृष्टम्"। "अग्निहोत्रादि तु तत्कार्यायैव तद्दर्शनात्।" "सहकारित्वेन च" इत्यादिषु। वाक्यकारश्च ध्रुवानुस्मृतेर्विवेकादिभ्य एव निष्पत्तिमाह—"तल्ल- ब्धिर्विवेकविमोकाभ्यासक्रियाकल्याणानवसादानुद्धर्षेभ्यः संभवान्नि र्वचनाच्च" इति। इस प्रकार ध्रुवा स्मृति के साधनरूप यज्ञादि कर्म हैं, ऐसा "यज्ञादि- श्रुतेरश्ववत्" सूत्र में बतलावेंगे। यद्यपि "विविदिषन्ति" इस श्रुति में यज्ञादि कर्मों को विविदिषोत्पत्ति में साधन बतलाया गया है, तथापि नित्य निरन्तर मरणपर्यन्त अनुष्ठीयमान, अभ्यास द्वारा उत्कृष्टता को प्राप्त ध्यान-

( २१ ) रूप वेदन ही ब्रह्मप्राप्ति का साधन है, उसी की उत्पत्ति के लिए आश्रम विहित समस्त कर्मों का जीवन पर्यन्त अनुष्ठान करना चाहिए। सूत्रकार भी इसी बात का समर्थन “अप्रयाणात्तत्रापि हि दृष्टम्”, “अग्निहोत्रादि तु तत्कार्यायैव तद्दर्शनात्”, “सहकारित्वेन च” इत्यादि सूत्रों में करते हैं। वाक्यकार विवेक आदि से ध्रुवानुस्मृति की निष्पत्ति कहते हैं-“विवेक, विमोक, अभ्यास, क्रिया, कल्याण, अनवसाद और अनुद्धर्ष से ध्रुवानुस्मृति होती है, शास्त्र भी इसका समर्थन करते हैं।” विवेकादीनां स्वरूपंचाह—“जात्याश्रयनिमित्तादुष्टादन्नात् कायशुद्धिर्विवेकः” इति। तत्र निर्वचनम्-“आहारशुद्धौ सत्त्व- शुद्धिः सत्त्वशुद्धौ ध्रुवा स्मृतिः” इति। “विमोकः कामानभिष्वङ्गः” इति। “शान्त उपासीत” इति निर्वचनम्, “आरम्भणः शीलनं पुनः पुनरभ्यासः” इति। निर्वचनं च स्मार्त्तमुदाहृतं भाष्यकारेण-“सदा तद्भावभावितः” इति। “पञ्चमहायज्ञाद्यनुष्ठानं शक्तितः क्रिया” इति। निर्वचनं “क्रियावानेष ब्रह्मविदां वरिष्ठः”, “तमे तंवेदानुवचनेन ब्राह्मणा विविदिषन्ति यज्ञेन दानेन तपसाऽनाशकेन” इति च। “सत्यार्जवदयादानाहिंसानभिध्याः कल्यायानि” इति। निर्वचनं “सत्येन लभ्यः”, “तेषामेवैष विरजो ब्रह्मलोकः” इत्यादि। “देश- कालवैगुण्याच्छोकवस्त्वाद्यनुस्मृतेश्च तज्जं दैन्यमभास्वरत्वं मनसोऽव- सादः” इति। “तद्विपर्ययोऽनवसादः”। निर्वचनं “नायमात्मा बलहीनेन लभ्यः” इति। “तद्विपर्ययजा तुष्टिरुद्धर्षः” इति। तद्विपर्ययोऽनुद्धर्षः, अतिसंतोषश्च विरोधीत्यर्थः। निर्वचनमपि “शान्तो दान्तः” इति। एवं नियमयुक्तस्याश्रमविहितकर्मानुष्ठानेनैव विद्यानिष्पत्तिरित्युक्तं भवति। विवेक आदि का स्वरूप भी बतलाते हैं- जाति आश्रय निमित्त दोषों से रहित अन्न से शरीर की रक्षा करना विवेक है। इस पर शास्त्र- प्रमाण जैसे-“आहार शुद्धि से अन्तःकरण शुद्ध होता है, अन्तःकरण की शुद्धि से ही ध्रुवा स्मृति होती है।” काम्य विषयों में आसक्ति न होना ankurnagpal108@gmail.com

( २१ )

विमोक है। इस पर शास्त्र प्रमाण जैसे—"शान्त चित्त से उपासना करनी चाहिए।" अवलम्बनपूर्वक शुभ विषय के पुनः पुनः अनुशीलन को अभ्यास कहते हैं। शास्त्र प्रमाण में भाष्यकार इसमें स्मृतिवाक्य प्रस्तुत करते हैं—"सदा उस परमात्मभाव में निमग्न रहता है।" यथाशक्ति पंचयज्ञों के अनुष्ठान को क्रिया कहते हैं। शास्त्र प्रमाण जैसे—"ब्राह्मण वेदाध्ययन यज्ञ, दान, तप द्वारा भोगतृणारहित होकर परमात्मा को जानने की इच्छा करते हैं।" सत्य, सरलता, दया, दान, अहिंसा और अनभिध्या (सफल चिन्ता) को कल्याण कहते हैं। शास्त्र प्रमाण—"इस विरज (निर्दोष) ब्रह्मलोक को सत्य से प्राप्त करते हैं।" देश काल आदि की विपरीतता तथा शोक के कारणों की स्मृति से होने वाली मन की दुर्बलता और अप्रसन्नता को अवसाद कहते हैं, इनका न होना अनवसाद है। शास्त्र प्रमाण—"यह आत्मा बलहीन (दुर्बल मन वाले) व्ययित से लभ्य नहीं है।" उक्त अवसाद से होने वाले असंतोष को उद्धर्ष कहते हैं, उसकी विपरीत स्थिति है। "शान्तदान्त" आदि वाक्य इसका उदाहरण है। इन नियमो से युक्त आश्रम विहित कर्मानुष्ठान से ही विद्या की निष्पत्ति हो सकती है; यही वक्तव्य का सारांश है। तथाच श्रुत्यन्तरम् "विद्यां चाविद्यां च यस्तद्वेदोभयं सह। अवि- द्यया मृत्युं तीर्त्वा विद्ययाऽमृतमश्नुते ॥" इति । अत्राविद्याशब्दाभिहितं वर्णाश्रमविहितं कर्म । अविद्यया कर्मणा, मृत्युं ज्ञानोत्पत्ति- विरोधि प्राचीनं कर्म, तीर्त्वा अपोह्य, विद्यया ज्ञानेन, अमृतं ब्रह्म, अश्नुते प्राप्नोति इत्यर्थः । मृत्युतरणोपायतया प्रतीता अविद्या विद्ये तराद् विहितं कर्मैव, यथोक्तम्—"इयाज सोऽपि सुबहून् यज्ञान् ज्ञानव्यपाश्रयः । ब्रह्मविद्यामधिष्ठाय ततुं मृत्युमविद्यया ॥" इति । एक दूसरी श्रुति भी उक्त तथ्य की पुष्टि करती है—"जो प्रसिद्ध विद्या और अविद्या दोनों को जानते हैं, वे अविद्या से मृत्यु का अतिक्रमण करके विद्या से अमृतत्व प्राप्त करते हैं।" यहाँ अविद्या शब्द का अर्थ वर्णाश्रम विहित कर्म है। अर्थात् अविद्या-वर्णाश्रम कर्म द्वारा ज्ञानोत्पत्ति विरोधी प्रारब्ध कर्म से,-छुटकारा पाकर, विद्या—ज्ञान

( २३ ) ज्ञान से, अमृत - ब्रह्म को प्राप्त करते हैं। मृत्युतरण के उपायरूप से प्रतीत अविद्या का तात्पर्य विद्याभिन्न वर्णाश्रम विहित कर्म ही है। जैसा कि कहा गया—"ज्ञान संपन्न उन्होंने भी ब्रह्मबुद्धि अवलंबनपूर्वक, अविद्या द्वारा ज्ञानविरोधी प्राक्तन कर्मों के निवारणार्थ बहुत से यज्ञों का अनुष्ठान किया।" ज्ञानविरोधि च कर्म पुण्यपापरूपम्। ब्रह्मज्ञानोत्पत्ति- विरोधित्वेनानिष्टफलतयोभयोरपि पापशब्दाभिधेयत्वम्। अस्य च ज्ञानविरोधित्वं ज्ञानोत्पत्तिहेतुभूतशुद्धसत्त्वविरोधिरजस्तमोविवृद्धि- द्वारेण। पापस्य च ज्ञानोदयविरोधित्वम्—"एष एवासाधु कर्म कारयति तं यमधो निनीषति" इति श्रुत्या अवगम्यते। रजस्तमोर्यथार्थज्ञानावरणत्वं सत्त्वस्य च यथार्थज्ञानहेतुत्वं भगवतैव प्रतिपादितं सत्त्वात्संजायते ज्ञानमित्यादिना। अतश्च ज्ञानोत्पत्तये पापं कर्म निरसनीयम्, तन्निरसनञ्च अनभिसंहित- फलेनानुष्ठितेन धर्मेण। तथा च श्रुतिः—"धर्मेण पापमपनुदति" इति। तदेवं ब्रह्मप्राप्तिसाधनं ज्ञानं सर्वाश्रिमकर्मापेक्षम्, अतो ऽपेक्षितकर्मस्वरूपज्ञानं केवलकर्मणामल्पास्थिरफलत्व ज्ञानं च कर्म- मीमांसावसेयम् इति, सैवापेक्षिता ब्रह्मजिज्ञासायाः पूर्ववृत्ता वक्तव्या। पुण्य-पाप रूप कर्म ही ज्ञान विरोधी हैं। ज्ञानोत्पत्ति के विरोधी होने से दोनों ही अनिष्ट फलदायी हैं, इसलिए दोनों का ही पाप शब्द से कथन किया गया है। चित्तशुद्धि से ज्ञानोत्पत्ति होती है, रज और तम गुणों की वृद्धि करने वाला पाप उसके प्रतिकूल है, इसलिए वह ज्ञान- विरोधी है। पाप की ज्ञानोदय-विरोधिता "जिसको अधोगति देना चाहते हैं उससे भगवान ही पाप कराते हैं।" इस श्रुति से ज्ञात होती है। रज और तम की ज्ञानावरणता तथा सत्त्व की यथार्थ ज्ञानहेतुता का प्रतिपादन स्वयं भगवान् ने ही "सत्त्वात्संजायतेज्ञानम्" इत्यादि से किया है, इसलिए ज्ञानोदय के लिए पाप कर्म का निरसन आवश्यक है, उसका निराकरण अनासक्त फल वाले कर्मानुष्ठान से ही हो सकता है। जैसा कि श्रुति-वाक्य भी है—"धर्म से पापों का निरसन होता है।"