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श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

भितरे-याँर ]

भितरे प्रवेशि' देखे सब ५/९५माया-अंशे कहि तारे ५/६२मोर भ्रमे तमालेर करे ४/२५१
भितरे सूर्येर रथ-आदि ५/३४मायाकार्य नहे—सब ३/७०मोर भ्राता-सने ताँर ५/१७२
भिन्न भिन्न लिखियाछि १/१०९मायाद्वारा सृष्टि करे २/४९मोर वंशी-गीत आकर्षये ४/२४४
भ्रम, प्रमाद, विप्रलिप्सा २/८६, ७/१०७'माया'—निमित्त-हेतु ६/१४मोर रूपे आप्यायित ४/२४३
भ्रममय चेष्टा, आर ४/१०७मायार सम्बन्ध नाहि ६/२३मोरे अनुग्रह कर ७/५५
मायावादिगण ताँरे ७/४०मो-हेन अधमे दिला ५/२१०
मङ्गल-चरित्र सदा ६/१२मायावादी, कर्मनिष्ठ ७/२९मौन धरि' रहे लक्ष्मण ५/१५१
मत्स्य-कूर्माद्यवतारेर ५/७८माया यैछे दुइ अंश ६/१४
मथुराते पाठाइल रूप ७/१६४मायाशक्ति बहिरङ्गा २/१०२यत यत पिये, तृष्णा ७/२१
मथुरा देखिया पुन: ७/४४मायाशक्ति रहे कारण ५/५७यत यत प्रेमवृद्धि करे ७/२८
मथुरा-द्वारकाय निजरूप ५/२३माया हैते जन्मे तबे ५/६६यतेक पालाञाछिल ७/३५
मन्त्र गुरु आर १/३५मायिक भूतेर तथि ५/५३यत्ने आस्वादिते नारि ४/१३४
मन्मथ-मन्मथरूपे ५/२१३मीनकेतन रामदास हय ५/१६१यथेष्ट विहरि' कृष्ण ३/१३
मन्माधुर्य, राधार प्रेम ४/१४२मुख्य तिनशक्ति २/१०३यद्यपि आमार गन्धे ४/२४५
महत्स्रष्टा पुरुष, तिँहो ५/५६मुख्यवृत्ति छाड़ि' कैल ७/१३१यद्यपि आमार गुरु १/४४
महदनुभव, याते सुदृढ़ ६/५३मुख्यवृत्त्ये सेइ अर्थ ७/१०८यद्यपि आमार रसे ४/२४६
महातेजोमय वपु कोटि ७/६०मुख्यार्थे लागा'ल प्रभु ७/१३७यद्यपि आमार स्पर्श ४/२४७
महापुरुषावतारी तेंहो ५/७५मुख्यार्थ व्याख्या कर ७/१३७यद्यपि करिल रस ४/१९९
महाप्रेममय तिँहो बसिला ५/१६३'मुञ्जि ताँर भक्त'—मने ६/९१यद्यपि कहिये ताँरे कृष्णेर ५/७८
महाभावस्वरूपा श्रीराधा ४/६९मुञ्जि ये चैतन्यदास ६/४४यद्यपि केवल ताँर क्रीड़ा ५/२९
महावाक्ये करि' ७/१३०'मूर्ख तुमि, तोमार नाहि ७/७२यद्यपि तिनॆर माया २/५४
महाविष्णुर अंश—अद्वैत ६/२५मूर्ख संन्यासी निज-धर्म ७/४२यद्यपि निर्मल राधार ४/१४०
महाविष्णु सृष्टि करेन ६/७मूर्च्छित हइया मुञ्जि ५/१९७यद्यपि ब्रह्माण्डगणेर २/१०५
महासङ्कर्षण—सब जीवेर ५/४५मूढ़लोक नाहि जाने ६/१०२यद्यपि सर्वाश्रय तिँहो ५/८५
महिषीगण प्राभव ४/७८मूल एक दीप २/८९यद्यपि सांख्य माने ६/१८
महिषी-विवाहे यैछे १/७०मूल भक्त-अवतार ६/११०यबे येइ भाव उठे ४/११०
माता, पिता, स्थान ४/६५मृगमद, तार गन्ध ४/९७याते नित्यानन्दतत्त्व जाने ५/१२
माता मोरे पुत्रभावे ४/२४मो-अधमे दिल ५/२१७यार आगे तृणतुल्य चारि ७/८४
माधव-ईश्वर-पुरी ३/९४मो-पापिष्ठे आनिलेन ५/२१०याँर अंश करि' करे ५/१०६
माधवेन्द्रपुरीर इहाँ शिष्य ६/३९मो-विषये गोपीगणेर ४/२९याँर एकफणे रहे सर्षप ५/११९
माधुर्य प्रकाशि' करेन ५/२१९मोर चित्त-घ्राण हरे ४/२४५याँर द्वारा कैल प्रभु ६/३४
माधुर्य बाड़ाय ४/१९८मोर नाम लय येइ ५/२०६याँर ध्यान निज-लोके ५/२२१
मोर नाम शुने येइ ५/२०६याँर पदधूलि करे उद्धव ६/६४
मोर पुत्र, मोर सखा, ४/२१

पद्य-सूची | ४६९

[ याँर-रूपे याँर प्राणधन-नित्यानन्द ५/२२९ | युग-मन्वन्तरावतार ४/११ | राङ्गा यष्टि हस्ते दोले ५/१९० याँर प्रेमगुणे कृष्ण ६/६९ | ये आगे पड़ये, तारे ५/२०९ | रात्रे प्रलाप करे स्वरूपेर ४/१०९ याँर भगवत्ता हैते अन्येर २/८८ | येइ कहे, से पाषण्डी ३/७८ | राधाकृष्ण एक आत्मा, ४/५६ याँर भाव-शुद्धसख्य ६/७४ | येइ जन कृष्ण देखे ४/१५४ | राधाकृष्ण ऐछे सदा एकइ ४/९८ याँर माधुरीते करे लक्ष्मी ५/२२३ | येइ जपे, तार कृष्णे ७/८३ | राधाकृष्ण-भक्ति बिने ५/२२९ याँर हय, ताँर नाहि २/९६ | येई याँहा पाय, ताँहा ७/२३ | राधा-पूर्णशक्ति, कृष्ण ४/९६ याँ-सबार ऊपरे कृष्णेर ६/६५ | येइ येइ रूपे जाने, सेइ ५/१३२ | राधाप्रेम तैछे सदा ४/१२७ याँ-सबा लञा ७/१८, ७/१९ | “ये किछु कहिले तुमि ७/१०० | राधा-प्रेमा विभु-यार ४/१२८ याँहाके त' कला कहि ५/७५ | ये नयन देखिते अश्रु ५/१६५ | राधाभाव अङ्गीकरि' ४/२६८ याँहा याँहा नेत्र पड़े ४/८५ | ये ना माने, तार ६/८३ | राधा-भाव-कान्ति दुइ ४/९९ याँहार कृपाते पाइनु ५/२०० | ये पुरुष सृष्टि-स्थिति ६/८ | राधार अधर-रसे आमा ४/२४६ याँहार छटाय नाशे ३/५८ | ये-प्रकारे हय ४/१९७ | राधार वचने हरे आमार ४/२४४ याँहार तुलसीदले, याँहार ६/३३ | ये बले आमारे करे ४/१२३ | राधार दर्शने ४/२४३, २५० याँहार प्रकाशे सर्व १/८७ | येबा अज्ञे करे ताँरे ५/२२५ | राधासह क्रीड़ा रस ४/२१७ याँहार महिमा नहे ६/६ | येबा केह अन्य जाने, ४/१६१ | राधिका करेन कृष्णेर ४/९४ याँहार हुङ्कारे कैल ६/१११ | ये यैछे भजे ४/१७७ | राधिकादि लञा कैल ४/११४ याहार श्रवणे मन ४/१५७ | ये लागि कहिते भय, ४/२३६ | राधिकार प्रेम-गुरु, ४/१२४ याँहा हइते विघ्ननाश १/१०३ | यैछे कहि,–एइ विप्र २/७७ | राधिकार प्रेमे आमा ४/१२२ याँहा हैते पाइनु रघुनाथ ५/२०२ | यैछे तैछे कहि किछु ७/१७० | राधिकार भावकान्ति ४/२६७ याँहा हैते पाइनु रूप ५/२०१ | यैछे बलदेव १/७८ | राधिकार भाव-वर्ण ४/२७१ याँहा हैते पाइनु श्रीराधा ५/२०४ | यैछे वासुदेव प्रद्युम्नादि १/७८ | राधिकार भावमूर्त्ति प्रभुर ४/१०६ याँहा हैते विश्वोत्पत्ति, ५/४६ | योगमाया करिबेक ४/२९ | राधिकार भाव यैछे ४/१०८ यार एक कणा ५/५४ | | राधिकार रूप-गुण ४/२४८ यार ये लक्षण ताहा २/६९ | र | राधिकार स्पर्शे आमा ४/२४७ यारे यैछे नाचाय, से ५/१४२ | रत्नमण्डप, ताहे ५/२१८ | राधिका-स्वरूप हइते ४/१४५ याहा वइ गुरुवस्तु नाहि ४/१२९ | रस आस्वादिते आमि ४/२६४ | राधिका हयेन कृष्णेर ४/५९ याहा वइ सुनिर्मल ४/१३० | रस आस्वादिते तत्त्व ७/५ | राम-लक्ष्मण-कृष्ण ५/१५३ याहा हैते कृष्णभक्ति १/९२ | रसमय-मूर्त्ति कृष्ण ४/२२२ | रामेर चरित्र सब ५/१५० याहा हैते हय १/२४, ४/५८ | रसिक-शेखर कृष्ण ४/१६ | रासविलासी साक्षात् ५/२१२ युगधर्मकाल हैल ४/३८ | रसिकशेखर कृष्णेर ४/१०३ | रासादिक-लीला प्रभु ५/२२० युगधर्म नाम-प्रेम कैल ४/२२० | रहिते नाहिक स्थान ५/९५ | रासादि-लीलाय तिन ४/११५ युगधर्मप्रवर्त्तन नहे ४/३७ | रागमार्ग भक्ति लोके ४/१५ | रासादि-विलासी, व्रज ७/८ युगधर्म-प्रवर्त्तन हय ३/२६ | रागमार्गे भक्त भक्ति करे ४/२६५ | रुद्ररूप धरि' करे जगत् ५/१०५ युगधर्म प्रवर्त्तामु ३/१९ | रागमार्गे भजे येन ४/३३ | रूपे, गुणे, सौभाग्ये ४/२१४ ४७० | श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत

text लक्षणा-शुद्ध ]

           ल                    विधि-भक्त्ये व्रजभाव     ३/१५     वैभवगण येन ताँर     ४/७७
                                विधि, भव, नारदादि       ६/४६     वैष्णवेर गुरु तेँहो  ६/२९

लक्षणा करिले स्वतः ७/१३२ ‘विधेय’ कहिये तारे २/७६ व्यक्त करि’ भागवते ३/५० लक्ष लक्ष लोक ७/१५६, १५७ विप्र-अनुवाद, इहार २/७७ व्यष्टिजीव-अन्तर्यामी २/५१ लक्ष्मीगण ताँर वैभव ४/७८ विप्र बलि’ जानि, तार २/७८ ‘व्यास भ्रान्त’-बलि’ ७/१२१ लघुभ्राता हैया करे रामेर ५/१४९ विरुद्धार्थ कह तुमि २/८७ व्यासरूपे कैल ताहा ७/१०६ लज्जा, धैर्य, देहसुख ४/१६७ विशुद्ध निर्मल प्रेम ४/१६२ व्यासेर सूत्रेते कहे ७/१२१ लीला-अन्ते सुखे इँहार ४/२५६ विश्व-सृष्टि करे ‘निमित्त’ ६/१५ व्रजवधूगणेर एइ भाव ४/४८ लीलारस आस्वादिते ४/९८ विषयजातीय सुख आमार ४/१३३ व्रज बिना इहार ४/४७ लीलार सहाय लागि’ ४/८० विष्णुद्वारे कृष्ण करे ४/१३ व्रजाङ्गनारूप आर ४/७५ लुकाइते नारे कृष्ण ३/८९ विष्णुनिन्दा आर नाहि ७/११५ व्रजे क्रीड़ा करे ३/१२ लुटिया, खाइया, दिया ७/२४ विष्णुरूप हञा करे ५/१०४ व्रजे गोपीगण आर १/८० लोकगति देखि’ ३/९७ विस्तारे ना वणि १/१०५ व्रजेन्द्रनन्दन याँते १/८० लोकधर्म, वेदधर्म ४/१६७ वृन्दावन जाइते प्रभु ७/४० व्रजे ये विहरे १/८५ लोक निस्तारिया प्रभुर ७/१६० वृन्दावन-पुरन्दर ५/२१२ व्रजेर निर्मल राग ४/३३ लोके उपदेशे,—‘हओ ६/५० वृन्दावने पाठाइला ७/१६० व्रजेर सहिते हय ३/१० लौकिक-लीलाते धर्म ६/४० वृन्दावने वैसे यत ५/२२८ लौह आर हेम यैछे ४/१६४ वृन्दावने याह,—ताँहा ५/१९५ श वृन्दावने योगपीठे ५/२१८ व वेदगुह्य कथा एइ ५/१५९ शक्ति-एइ छयरूपे १/३२ वेद, भागवत, उपनिषद् २/२४ शक्ति सञ्चारिया तारे ५/५९ वक्तव्य-बाहुल्य १/१०५ “वेदमय-मूर्ति तुमि ७/१४८ शक्त्यावेश-अवतार १/६६, ६७ वस्तुतः परिणाम-वाद ७/१२३ वेदस्तुति हैते हरे ४/२६ शङ्ख-चक्र-गदा-पद्म ५/२८ वस्तुनिर्देश, आशीर्वाद १/२२ वेदान्त ना शुन केने ७/१०१ शतमुखे बलि, तबु ना ४/२५५ वस्तु प्रकाशिया करे १/८८ वेदान्त-पठन, ध्यान ७/६९ शरीर-विशेष ताँर ६/१० वाञ्छा भरि’ आस्वादिल ४/११४ वैकुण्ठ-बाहिरे एक ५/३२ शान्त, दान्त, कृष्णभक्ति ३/४५ वाक्ये कहे, ‘मुञ्जि चैतन्येर ६/९१ वैकुण्ठ-बाहिरे सेइ ५/५१ शास्त्रविरुद्धार्थ कभु ना २/७३ वात्सल्य-आवेशे कैल ४/११३ वैकुण्ठ-बाहिरे हय ५/३१ शास्त्रेर सिद्धान्त एइ ६/१०२ वाम-पार्श्वे श्रीराधिका ५/२२० वैकुण्ठ बेड़िय़ा एक आछे ५/५२ श्वास-सह ब्रह्माण्ड ५/६९ वाराणसीपुरी आइला ७/१५५ वैकुण्ठादि-पुरे याँर ५/२२२ शिक्षागुरुके त’ जानि १/४७ वासुदेव-सङ्कर्षण ५/२४, ४१ वैकुण्ठाद्ये नाहि ये ४/२८ शिक्षागुरु हय कृष्ण १/५८ विचार करिये यदि ४/१४५ वैकुण्ठके याय चतुर्विध ३/१७ शिङ्गा वांशी बाजाय केह ५/१९२ विचार करेन, लोकेर ३/९७ वैकुण्ठेर पृथिव्यादि सकल ५/५३ शिशु वत्स हरि’ २/३१ विचारि’ देखिये यदि ४/२४९ ‘वैवस्वत’-नाम एइ ३/९ शुक्ल, रक्त, पीतवर्ण ३/३७ विचारिते एई श्लोक ३/१०२ शुद्धवात्सल्ये ईश्वर-ज्ञान ६/५५ विजातीय-भावे नहे ४/२६६

                                             पद्य-सूची  |  ४७१

[ शुद्ध-सबे

'शुद्धभक्त'-तत्त्वमध्ये ताँ ७/१६श्री-भू-नीला-शक्ति ५/२८५/१३२
शुद्धभावे करिब ३/१००श्रीमदनगोपाल-श्रीगोविन्द ५/२११सकल सम्भवे ताँते २/१११,
शुद्धसत्त्वमय यत वैकुण्ठ ५/४३श्रीराधा-मदनमोहन प्रभु ५/२१६५/१२७
शुन उद्धव, सत्य, कृष्ण ६/५७श्रीराधा-ललिता-सङ्गे ५/२१३सङ्कर्षण-अवतार-कारण ६/८९
शुनि' चमत्कार हैल ७/१३४श्रीराधिका हैते ४/७५सखा शुद्धसख्ये करे ४/२५
शुनि' देखि' आनन्दित ७/१५३श्रीरामेर दास्य तिँहो ६/८८सच्चिदानन्द, पूर्ण, कृष्णेर ४/६१
शुनिते ना पारि, फाटे ७/५१श्रीरूप-कृपाय पाइनु ५/२०३सज्जन, दुर्जन, पङ्गु ७/२६
शुनिले खण्डिबे चित्तेर १/१०७श्रीरूप, सनातन, भट्ट १/३६सत्य एइ हेतु ४/६
शुनिले जानिबे सब १/१०९श्रीवास, हरिदास, रामदास ६/४८सत्य-त्रेता-कलिकाले ३/३७
'शेष'-रूपे करे कृष्णेर ५/१०श्रीवासादि, आर यत ५/१४४सत्य, त्रेता, द्वापर ३/७
शेषलीलाय धरे नाम ३/३४श्रीवासादि परिषद ३/७४सदा आमा नाना नृत्य ४/१२४
शेषलीलाय प्रभुर कृष्ण ४/१०७श्रीवासादि यत कोटि ७/१६सनकादि भागवत शुने ५/१२२
शेष-शयन-जले करिल ५/९९सनातन-कृपाय पाइनु ५/२०३
श्याम-चिक्कण कान्ति, ५/१८४सनातन गोसाञि आसि' ७/४७
षड्विधैश्वर्य ताँहा सकल ५/४४सन्धिनी सार अंश ४/६४
श्रषड्विधैश्वर्यपूर्ण, परतत्त्व ७/१३८संन्यास-आश्रम प्रभु ७/३३
श्रवणादि भक्ति-कृष्ण ७/१४१षडैश्वर्यपूर्ण लक्ष्मीकान्त २/२३संन्यास करिया प्रभु कैला ७/३५
श्रवणे, दर्शने आकर्षये ४/१४८संन्यासी हइया कर नर्त्तन ७/६८
श्रीअङ्ग, श्रीमुख येइ ३/६३संन्यासी हइया करेन ७/४१
श्रीकृष्णचैतन्य आर प्रभु १/८७सङ्कर्षणेर विभूति सब ५/४४सब अवताररे करि २/६८
श्रीकृष्णचैतन्य गोसाञि ४/२२२,सङ्कीर्त्तन प्रचारिया सब ६/११२सब अण्डे प्रवेशिला ५/९४
४/४२५सङ्कीर्त्तन-प्रवर्त्तक ३/७६सब निस्तारिते करे ७/३८
श्रीकृष्णचैतन्य प्रभु स्वयं १/४२सङ्कीर्त्तन-यज्ञे ताँरे ३/७६सब रस हैते शृङ्गारे ४/४४
श्रीकृष्णचैतन्यरूपे कैल ४/१००संन्यासीर सङ्गे नाहि ७/४६सब श्रोतागणेर करि २/११६
श्रीकृष्णचैतन्यरूपे सर्व ६/१०७संन्यासीरे कृपा लागि' ७/५६सब श्रोता-वैष्णवेरे १/३०
श्रीकृष्ण जानाये सब ३/३४सकल जगते मोरे ३/१५सबाकारे कृष्णनाम ७/१५०
श्रीगोलोक, श्वेतद्वीप ५/१७सकल जीवेर तिँहो हुये ५/११२सबा नमस्करि' गेला पाद ७/५९
श्रीगोविन्द बसियाछेन ५/२१९सकल वेदेर हय ७/१३९सबा निस्तारिते प्रभु कृपा ७/३८
श्रीचैतन्य-नित्यानन्द १/१०८सकल वैष्णव ताँर ५/१६३सबार आश्रय कृष्ण २/१०४
श्रीचैतन्य-सेइ कृष्ण ५/१५६सकल वैष्णव, शुन १/३१सबा लञा निज-कार्य ५/१४५
श्रीजीव, गोपालभट्ट १/३६सकल संन्यासी कहे ७/१३५,सबा हैते सकलांशे ६/६८
श्रीदामादि ब्रजे यत ६/६११४७सबे आसि' कृष्ण-अङ्गे ४/१२
श्रीबलराम गोसाञि मूल ५/८सकल संन्यासी मुञि ७/५४सबे एड़ाइल मात्र काशीर ७/३९
श्रीभागवत-आदि शास्त्रेर ७/४८सकल सम्भवे कृष्ण २/११५,सबे परिषद, सबे ५/१४५

४७२ | श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत

सम्प्रदाय-सेइ ] सम्प्रदाय-अनुरोधे तत्त्व ७/१३६ | सहस्र विस्तीर्ण याँर ५/११८ | सेइकाले श्रीअद्वैत करेन ४/२७० सम्बन्ध, अभिधेय ७/१४६ | सहाय करेन ताँर लइया ६/११ | सेइ कृष्ण अवतारी २/१०९ सम्यक् आस्वादिते नारे ४/१५८ | साक्षात् कन्दर्प, यैछे ५/१८४ | सेइ कृष्ण अवतीर्ण २/९, सर्व-अवतार-बीज ५/८२, | साक्षात् व्रजेन्द्रसुत ५/२२५ | ६/८२, ७/९ ५/१०१ | साताइश चतुर्युग गेले ३/९ | सेइ कृष्ण-नवद्वीपे ५/६ सर्व अवतार-लीला ५/१३३ | साधनभक्ति हैते हय ७/१४२ | सेइ कृष्णनाम कभु ७/९६ सर्व-अवतारी कृष्ण ५/४ | साधिलेन निजवाञ्छा ४/५० | सेइकाले एक विप्र ७/५२ 'सर्वकान्ति'-शब्देर ४/९४ | सावरणे प्रभुरे १/४३ | सेइ क्षणे वृन्दावने करिनु ५/१९९ सर्वग, अनन्त, ब्रह्म ५/१५ | साम्प्रदायिक संन्यासी तुमि ७/६७ | सेइ गीत-श्लोके सुख ४/११० सर्वग, अनन्त, विभु ५/१८ | सायुज्य ना लय भक्त ३/१८ | सेइ गोपीगण-मध्ये ४/२१४ सर्वगुणखनि कृष्णकान्ता ४/६९ | सायुज्येर अधिकारी ताँहा ५/३८ | सेइ गोविन्द भजि आमि २/१६ सर्वचतुर्व्यूह-अंशी, तुरीय ५/२४ | सार्टि, सारूप्य आर ३/१८ | सेइ चारियुगे दिव्य ३/७ सर्वत्याग करि करे ४/१६९ | सालोक्य-सामीप्य-सार्टि ५/३० | सेइजन आह्लादिते पारे ४/२४० सर्वत्र मागिये १/२५ | सिंहग्रीव, सिंहवीर्य ३/३० | सेइ जले कैल अर्थ ५/९६ सर्वदा ईश्वर-तत्त्व ५/८८ | 'सिद्धलोक' नाम तार ५/३३ | सेइ त' अंशरे कहि ५/८१ सर्वपालिका, सर्व ४/८९ | सिद्धान्त बलिया चित्ते २/११७ | सेइ त' अनन्त, याँर ५/१२५ सर्व वेदसूत्रे करे कृष्णेर ७/१३१ | सुखवाञ्छा नाहि ४/१८६ | सेइ त' 'अनन्त' 'शेष' ५/१२० सर्वभावे करिल कृष्ण, ४/२६९ | सुवर्ण-कुण्डल कर्णे ५/१८६ | सेइ त' कारणार्णवे ५/५५ सर्वमन्त्रसार नाम, -एइ ७/७४ | सुवलित हस्त, पद ५/१८४ | सेइत' गोविन्द २/२२ सर्व-यज्ञ हैते ३/७७ | सूर्य चन्द्र बाहिरेर १/९७ | सेइ त' पुरुष याँर 'अंश' ५/९१ सर्वरूपे आस्वाद्ये कृष्ण ५/११ | सूर्यचन्द्र हरे यैछे १/८८ | सेइ त' पुरुष अनन्त ५/९४ सर्वलक्ष्मीगणेर तिँहो ४/९० | सूर्य जिनि' मणिगण करे ५/११८ | सेइ त' भक्तेर वाक्य २/१११ सर्वलक्ष्मीगणेर शोभा ४/९२ | सूर्यमण्डल येन बाहिरे ५/३४ | सेइ त' मायार दुइविध ५/५८ सर्व-सौन्दर्य-कान्ति ४/९२ | सूर्य येन सविग्रह २/२५ | सेइ त' सुमेधा ३/७७ सर्वांश आसि' तबे ५/१३१ | स्थितिकर्त्ता विष्णु ४/८ | सेइ तिनजनेर तुमि २/५६ सर्वाश्रय ईश्वरेर करि ७/१२९ | सृष्टिलीला-कार्य करे ५/९ | सेइ तिन जलशायी २/५० सर्वाश्रय, सर्वाद्भुत, ऐश्वर्य ५/४७ | सृष्टि-स्थिति-प्रलय ५/१०५ | सेइ तिन सुख कभु नहे ४/२६७ सर्वोपरि श्रीगोकुल ५/१७ | सृष्ट्यादि-निमित्ते येइ ५/८१ | सेइ तिनेर अंशी २/५७ सहस्र-चरण-हस्त ५/१०१ | सृष्ट्यादिक सेवा,-ताँर ५/१० | सेइ दुइ एक एबे ४/५७ सहस्रनामे कैल ताँर ३/४७ | से आनन्देर प्रति ४/२०१ | सेइ दुइ जगतेरे १/८६ सहस्र मस्तक ताँर ५/१०० | सेइ अंश लज्ञा ज्येष्ठ ५/१५४ | सेइ दुइ प्रभुर करि १/१०३ सहस्र-वदने करे कृष्ण ५/१२१ | सेइ अपराधे तार ५/२२६ | सेइ दुइ, याँर अंश ५/७६ सहस्रवदने येँहो शेष ६/७६ | सेइ अभिमान-सुखे ६/४२ | सेइ द्वारे आचण्डाले ४/४० 'सहस्रवदने' शेष नाहि ५/२३४ | सेह एक जीवेर १/९४ | सेइ द्वारे प्रवर्त्ताइल ४/२२६ पद्य-सूची | ४७३

[ सेइ-ह्लादिनीर सेइ নহে, याते कर्त्ता-हेतु ५/६२ सेइ नारायण कृष्णेर २/२८ सेइ नारायणेर मुख्य अङ्ग ६/२१ सेइ नेत्रे अविच्छिन्न बहे ५/१६५ सेइ पश्चतत्त्व मिलि' ७/२० सेइ पद्मनाले हैल चौद्द ५/१०३ सेइ पद्मे हैल ब्रह्मार ५/१०२ सेइ परव्योमे नारायणेर ५/४० सेइ परिकरगण सङ्गे ७/९ सेइ पुरुष सृष्टि-स्थिति ५/८० सेइ पुरुषादि-सबार २/१०५ सेइ पुरुषेर सङ्कर्षण ५/४६ सेइ प्रभु नित्यानन्द ५/१०७, ५/११६ सेइ प्रेमार आमि ४/१३२ सेइ प्रेमार राधिका ४/१३२ सेइभावे कहे—'मुञि ५/१३४ सेइ भावे मत्त प्रभु ४/१०८ सेइभावे सुख-दुःख ४/१०६ सेइ भावे हइ आमि ४/२२ सेइ बन्या ता-सबारे ७/३० सेइ बलराम-गौरसङ्गे ५/११ सेइ बलराम-सङ्गे ५/६ सेइ ब्रह्म गोविन्देर २/१५ सेइ भक्तगण हय १/६४ सेइ भावे अनुगत ताँर ६/८६ सेइभावे निजवाञ्छा ४/२२१ सेइ रस आस्वादिते ४/२२३ सेइ रात्रे प्रभु मोरे ५/१८० सेइ राधाभाव लञा ४/२२० सेइ लिखि, येइ शुनि ६/११३ सेइ विष्णु 'शेष'-रूपे ५/११७ सेइ विष्णु हय याँर ५/११६ सेइ सब अस्त्र ३/७२ सेइ सब महादक्ष धाञा ७/३० सेइ सब लभ्य एइ ५/२३२ सेइ सर्ववेदेर 'अभिधेय' ७/१४२ सेइ सिंह वसुक ३/३१ सेइ सुखमाधुर्य-घ्राणे ४/२६३ सेइ सुखे मत्त, किछु ६/१०४ सेइ सूत्र-एइ तार कैल ५/२३१ सेइ हैते संन्यासीर फिरे ७/१४९ सेतुबन्ध पर्यन्त कैला ७/१६७ से पुरुषेर अंश-अद्वैत ६/१० से प्रतिज्ञा भङ्ग हैल ४/१७९ से वैष्णवेर पदरेणु ५/२३० से मङ्गलाचरण हय १/२२ से माधुर्य बाड़े ४/१९० सेवक योगाय ताम्बूल ५/१९२ से-सब तोमार अंश २/४८ से सब पाइनु आमि ५/२३२ से से लीला करिब ४/२८ सेह गोविन्देर अंश २/१८ सेहो त' कृष्णेर ४/१८१ सेहो तोमार अंश ३/६९ स्तुति-भक्त्ये करे ताँर ६/४० स्त्री, वृद्ध, बालक, युवा ७/२५ स्थितिकर्त्ता विष्णु ४/८ स्वकीया-परकीया-रूपे ४/४६ स्वगण सहिते चैतन्येर ६/३३ स्वच्छ धौतवस्त्रे ४/१७० स्वजने करये यत्न ४/१६८ स्वतःप्रमाण वेद-प्रमाण ७/१३२ स्वतन्त्र लीलाय दुःख ५/१५० स्वप्नभङ्ग हैल, देखि ५/१९७ स्वामाधुर्य आस्वादिते ६/१०६ स्वमाधुर्य देखि' कृष्ण ४/१३७ स्वमाधुर्ये लोकेर मन ५/२१५ 'स्वयं-भगवत्ता' पिछे २/८२ स्वयं भगवान् २/८, ७०, ८८, १०६, १२०, ७/७ स्वयं भगवानेर कर्म ४/८ स्वयं-भगवानेर कृष्णत्व २/८३ स्वयंरूप कृष्णेर कायव्यूह १/८१ स्वरूप-ऐश्वर्ये ताँर नाहि ७/१३९ स्वरूप-गोसाञि-प्रभुर ४/१०५ स्वरूप गोसाञि मात्र ४/१६० स्वरूपविग्रह कृष्णेर ५/२७ स्वरूपशक्ति—'ह्लादिनी' ४/५९ स्वसुखार्थ सालोक्य ४/२०४ स्व-स्व-प्रेम-अनुरूप ४/१४३ स्वेद, कम्प, रोमाञ्चाश्रु ७/८९ ह हरिध्वनि करे लोक ७/१५९ हस्तमुखनेत्र-अङ्ग ६/३७ हासाय, नाचाय, मोरे ७/८२ हासि, कान्दि, नाचि, गाइ ७/७८ हिरण्यगर्भ, अन्तर्यामी ५/१०६ हिरण्यगर्भे आत्मा २/५१ हीनाचार कर केने, इथे ७/७० हृदये धरये ये चैतन्य ४/२३३ हृदये बाड़ये प्रेम-लोभ ४/१३६ हेनकाले आइल ४/२६९ हेन चित्र-लीला करे ७/१५२ हेन जीवतत्त्व लञा ७/१२० हेन नारायण,-याँर ५/१०७ हेन प्रभु नित्यानन्द, के ५/१२५ हेन ये गोविन्द प्रभु, ५/२२७ हैते पुरुष करे मायाते ५/६५ ह्लादिनी कराय कृष्णे ४/६० ह्लादिनीर द्वारा करे ४/६० ह्लादिनीर सार 'प्रेम' ४/६८ ४७४ | श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत

अक्षज-अभिधा ] शब्दकोश

अ अक्षजज्ञान—इन्द्रियोंके द्वारा प्राप्त ज्ञान अघटन-घटन-पटीयसी—असम्भवको भी सम्भव तथा इसके विपरीत करनेवाली अचिद्वस्तु—जो वस्तु चित् नहीं हो अच्छेद्य—अविभाज्य, जिसका छेदन ना हो सके अच्युत—जो च्युत नहीं हो अज—अजन्मा अजागलस्तन—बकरीके गलेमें लटकनेवाली स्तनके जैसी चीज अज्ञ—ज्ञानरहित अणिमा—योगकी आठ सिद्धियोंमेंसे एक, जिसमें योगी अणुके समान सूक्ष्म हो जाता है अतिक्रम—मर्यादा, कर्त्तव्य, अधिकार आदिका उल्लंघन अतिक्रान्त—अतीत, क्रमका उल्लंघन किया हुआ अतिशय—अत्यधिक अतिशयोक्ति—किसी बातका बढ़ा-चढ़ाकर कहना अत्याज्य—नहीं त्यागने योग्य अत्युत्तम—अति उत्तम अदृष्ट—न देखा हुआ, अज्ञात अधिदैव—आराध्य देवता अधिरूढ़—बढ़ा हुआ अधिष्ठान—आधार, आश्रय अनभिज्ञ—न जाननेवाला अनवरत—निरन्तर अनायास—बिना कष्टके

अनिर्वचनीय—वचनसे ना वर्णन करने योग्य अनुक्षण—निरन्तर अनुगत—अनुगामी, अधीन अनुवर्त्तन—अनुसरण, अनुगमन अनुष्ठान—आरम्भ करना, कोई धार्मिक कृत्य अनुसन्धान—खोज, प्रयत्न अन्तर्भुक्त—किसीके अन्तर्गत होना अन्तर्भूत—अन्तर्गत अन्त्य—अन्तका, आखिरी अन्यतम—बहुतोंमें से एक, सर्वश्रेष्ठ अन्वय—वाक्यमें शब्दोंका परस्पर सम्बन्ध, मेल अन्वेषण—खोज, ढूँढना अपकार—अहित अपटुता—अकुशलता अपरा—जो श्रेष्ठ ना हो अपरिमित—अगणित, अनगिनत अपवर्ग—मोक्ष, निर्वाण अपूर्व—जो पहले ना हुआ हो, अनूठा अप्राकट्य—अप्रकट होना अप्राकृत—अलौकिक अप्रारब्ध—वैसा फल जो वर्तमान शरीरमें न भोगा जा रहा हो अप्रासङ्गिक—प्रस्तुत विषयसे असम्बद्ध, प्रसङ्गके विरुद्ध अबाध—बाधारहित अभयत्व—अभयता अभिज्ञ—जाननेवाला अभिधा—नाम, वाच्यार्थ प्रकट करनेवाली शब्द शक्ति

शब्दकोश | ४७५

[ अभिधान-इति

अभिधान-शब्दकोष अभिधेय-अर्थ या उपाय, कथनीय, विषय अभिप्राय-मूल अर्थ, तात्पर्य अभिप्रेत-उद्दिष्ट, अभिलाषित, स्वीकृत अभिवृद्धि-अभ्युदय, बढ़ना अभिव्यक्ति-प्रकट करना अभिसन्धि-जोड़, समझौता अभिसार-आगे बढ़ना, प्रियसे मिलने जाना अभिहित-कहा हुआ अभीष्ट-प्रिय, रुचिकर अभ्यस्त-बार बार अभ्यास किया गया अभ्युदय-उदय अमित-अत्यधिक अरण्य-वन अवगत-जाना हुआ अर्वाचीन-नया, बादमें उत्पन्न हुआ अवतारणा-नीचे लाना, इन्द्रियगोचर करना अवतीर्ण-अवतारके रूपमें प्रकट अवधारण-शब्दके अर्थकी सीमा बाँधना, निश्चय करना अवयव-अङ्ग, अंश अवरुद्ध-रुका हुआ अवलम्बन-आश्रय लेना, सहारा लेना अवलोकन-देखना अवशिष्ट-बचा हुआ, शेष अवस्थान-रहना, अवस्थिति अविचिन्त्य-अचिन्त्य अविच्छिन्न-अविभक्त, लगातार अविच्छिन्न तैलधारावत्-तेलकी धाराके समान अटूट अव्यय-अविकारी अव्याकृत-अव्यक्त अशेष-सम्पूर्ण अष्टसिद्धि-आठ प्रकारकी सिद्धियाँ असङ्ग-आसक्तिहीन असङ्गत-प्रसङ्गविरुद्ध, अनुचित असङ्गति-मेलका ना होना असंस्कृत-संस्कारहीन असमोर्द्ध-जिससे बड़ा और जिसके बराबर कोई नहीं हो असार-सारहीन असूया-ईर्ष्या, दूसरेके गुणमें दोष निकालना

आ आख्यायिका-कहानी आच्छन्न-ढका हुआ आत्मविषयणी-आत्म-सम्बन्धी आत्मसात्-अपने अधिकारमें आत्यन्तिक-असीम आदित्य-सूर्य आधान-स्थापन, कोई वस्तु रखनेका स्थान रखना आधिदैविक-देवताओंके द्वारा कृत आधिभौतिक-अन्य प्राणियों द्वारा प्रदत्त आध्यात्मिक-मानसिक, आत्म-सम्बन्धी आपाततः-अचानक, अन्तमें आप्त-पूर्ण, कुशल आम्नाय-वेद, श्रुत, परम्पराप्राप्त उपदेश आयुध-अस्त्र आरूढ़-आसीन आरोहण-चढ़ना, ऊपरकी ओर जाना आर्त्ति-क्लेश, पीड़ा आर्ष-ऋषियोंका आलोचना-गुण-दोष निरूपण आलोच्य-आलोचना योग्य आह्लादित-आनन्दित

इ इति-इस प्रकार, समाप्ति

४७६ | श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत

इहलोक-ग्रीवा ]

इहलोक—यह लोक

ईक्षण—दृष्टिपात ईशिता—ईश्वरत्व

उच्छिष्ट—खाकर छोड़ा हुआ, परित्यक्त उत्कृष्ट—उन्नत, श्रेष्ठ उद्बुद्ध—जगा या जगाया हुआ, विकसित उद्भासित—व्यक्त, चमकता हुआ उद्यत—तैयार उद्रेक—प्रचुरता, बढ़ती उद्वेग—क्षोभ, चित्तकी अस्थिरता उपक्रम—योजना, आरम्भ, प्रयास उपशम—विराग, विरक्ति उपलक्षित—इशारेसे बताया हुआ, लक्ष्य किया हुआ उपाङ्ग—छोटा या सहायक अंग उपार्जित—कमाया हुआ उपादान—साधन-सामग्री उपादेय—ग्रहण करने योग्य, उपयोगी उपेयत्व—उपाय-योग्य होनेका भाव उरु—विस्तृत, महान उरुक्रम—विष्णु उरुगाय—उत्तम व्यक्तियोंके द्वारा जिसका स्तुतिगान किया गया हो

एकरस—जो सदा एक रूपमें रहे, अपरिणामी एकीभूत—जो मिलकर एक हो गया हो

ऐहिक—सांसारिक


औत्सुक्य—उत्सुकता औद्धत्य—उद्धतता, अखड़पन औपाधिक—उपाधियुक्त

कर्त्तृत्व—कर्ताका धर्म, कार्य कलुषित—गंदा, कलुषयुक्त कल्प—वेदका एक अङ्ग, ब्रह्माका एक दिन कल्पवृक्ष—इच्छा पूरी करनेवाला वृक्ष काम्यकर्म—फलकी कामनासे किया जानेवाला कर्म कैतव—छल, धोखा केवला भक्ति—शुद्धा भक्ति कैङ्कर्य—दासत्व कैवल्य मुक्ति—निर्वाण मुक्ति कौतूहलवश—उत्सुकतावश क्रोड़ीभूत—अन्तर्भूत क्लान्त—थका हुआ, क्षीण

क्ष क्षिति—पृथ्वी क्षेत्र—शरीर क्षेत्रज्ञ—शरीरका ज्ञाता, आत्मा तथा परमात्मा क्षोभ—असन्तोष, व्याकुलता

ग्रथित—गूँथा हुआ ग्रन्थि—गाँठ ग्रास—आहार ग्रीवा—गर्दन


शब्दकोश | ४७७

[ घ्राण-निमज्जत घ घ्राण-गन्ध, सूँघनेकी शक्ति च चित्तगुहा-हृदयरूपी कन्दरा चित्-शक्ति-भगवानकी एक प्रकारकी शक्ति चिदालोचना-चित्-वस्तुकी आलोचना चिन्तामल-चिन्तारूपी मल चिन्मयत्व-चिन्मयता चैतन्यत्व-चेतनता चैतन्यनिष्ठ-चित्-वस्तुमें जिसकी निष्ठा है चैतन्यहीन-चेतनारहित छ छन्दविद्या-अठारह विद्याओंमें एक ज जर्जरित-जो जर्जर हो गया हो त तत्त्वज्ञान-तत्त्ववस्तुका ज्ञान तत्त्वतः-यथार्थतः तत्त्वविद्-तत्त्वको जाननेवाला तदीय-भगवत्-सम्बन्धी तनय-पुत्र तन्मय-तल्लीन तादात्म्य-दो वस्तुओंके परस्पर अभिन्न होनेका स्वभाव तारतम्य-दो वस्तुओंके घट-बढ़कर होनेका भाव तिर्यग्-पशु-पक्षी तैलधारावत्-तैलकी भाँति धारावाला त्रिगुणातीत-तीनों गुणोंसे अतीत त्रिवर्ग-धर्म, अर्थ और काम द दिक्पाल-दश दिशाओंके रक्षक देवता दुर्ज्ञेय, दुर्बोध-कठिनाईसे जानने योग्य दुर्निगृहीत-कठिनाईसे वशमें लाया हुआ दुर्वारित-कठिनाईसे निवारण किया हुआ दुरूह-कठिन दुस्त्याज्य-नहीं त्यागने योग्य देदीप्यमान-चकमता-दमकता हुआ देहाध्यास-देहमें मिथ्या अभिमान द्रव्यमययज्ञ-द्रव्य द्वारा किया गया यज्ञ द्विजवर-ब्राह्मणश्रेष्ठ द्वैतभाव-दो होनेका भाव ध धूसरित-धूलसे भरा हुआ ध्वनित होना-पता चलना न नराकृति-मनुष्यके समान आकृति नामाभास-नामका आभास निःशक्तिक-शक्तिरहित निःश्वास-प्राणवायु या साँसका बाहर निकलना निःसृत-निकला हुआ निकृष्ट-तुच्छ निकेतन-घर निक्षेप करना-फेंकना निगृहीत-निग्रह किया हुआ निग्रह-संयम नितान्त-अत्यन्त, एकदम निमज्जत-डूबा हुआ, स्नात ४७८ | श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत

नियम-प्रताड़ित ] नियमाग्रह—नियम-पालनमें आलस्य निरञ्जन—निर्दोष, अज्ञानसे रहित निरपेक्ष—किसी औरकी अपेक्षा नहीं निर्गत—बाहर निकला हुआ निर्गुण—सत्त्व, रज और तमोगुणसे अतीत रखनेवाला निर्दिष्ट—निर्देशित निर्वाण—मोक्ष निर्विकल्प—विकल्पसे रहित निर्विवाद—बिना विवादका निरुद्ध—विशेषरूपसे रोका हुआ निरूपक—निरूपण करनेवाला निरूपण—किसी विषयको ठीक-ठीक समझा देना निशा—रात्रि निष्काम कर्म—कामनासे रहित कर्म निष्पन्न—जिसकी उत्पत्ति हुई है निसर्गवाद—प्रकृतिवाद (प्रकृति ही जगत्‌की सृष्टि करनेवाली है, ऐसा मतवाद) निस्तारक—निस्तार करनेवाला निस्त्रैगुण्य—तीनों गुणोंसे अतीत निहत—मारा हुआ नीलमणि—नीलम नैतिक—नीति-सम्बन्धी नैमित्तिक—निमित्तसे उत्पन्न नैरन्तर्य—निरन्तर होनेका भाव नैर्घृण्य—निर्ममता, क्रूरता प पक्षान्तर—दूसरी ओर पन्था—पथ परिज्ञात—अच्छे प्रकारसे ज्ञात परनिष्ठित—दूसरेमें निष्ठावाला परदार—दूसरेकी स्त्री परवर्ती—बादमें पराक्रान्त—शक्तिशाली परिग्रह—ग्रहण पराभक्ति—श्रेष्ठा, शुद्धा भक्ति पराभूत—पराजित परिचर्या—सेवा परिचालक—चलानेवाला परिदृष्ट—दृष्ट परिनिष्ठित—पूर्णतया निपुण परिमित—सीमित परिलक्षित—अच्छी तरह देखाभाला हुआ परिव्राजक—संन्यासी परिवेष्टित—घिरा हुआ पर्यन्त—तक पर्यवसित—समाप्त पाण्डित्य—विद्वता पारत्रिक—परलोक-सम्बन्धी पारलौकिक—परलोक-सम्बन्धी पार्षद—परिकर पाषण्डी—पाखण्डी पूर्वपक्ष—संशयके सम्बन्धमें उठाया गया प्रश्न पूर्वराग—मिलनसे पहलेका राग प्रकरण—निर्माण, प्रसङ्ग प्रकृत—यथार्थ प्रकृष्ट—उत्तम प्रक्षिप्त—बादमें जोड़ा या घुसाया हुआ प्रच्छन्न—ढका हुआ प्रजल्प—इधर-उधरकी बात प्रज्ञा—बुद्धि प्रणयन—रचना, निर्माण प्रणत—शरणागत प्रणतपाल—शरणागतकी रक्षा करनेवाले प्रणति—प्रणाम, शरणागति प्रताड़ित—सताया गया शब्दकोश | ४७९

[ प्रतिपादित-म्लेच्छ प्रतिपादित—प्रमाणित प्रतिपाद्य—जिसे प्रमाणित किया जाय प्रतिभात—प्रभावयुक्त, ज्ञात प्रतीयमान—जान पड़ता हुआ, जिसकी प्रतीति हो रही हो प्रत्यगात्मा—जीवात्मा प्रत्यवाय—दोष प्रत्याहार—निरोध, रोकना प्रत्युपकार—भलाईके बदलेमें की हुई भलाई प्रदत्त—दिया हुआ प्रधान—मायाकी एक वृत्ति प्रधानतः—मुख्यरूपसे प्रपत्ति—शरणागति प्रभूत—अत्यधिक प्रभृति—जैसा प्रयोजनीयता—आवश्यकता प्रयोजक—प्रयुक्त करनेवाला प्रयोजकत्व—प्रयोजक होनेका भाव प्रवर—श्रेष्ठ प्रवर्त्तक—किसी काममें लगानेवाला, आरम्भ करनेवाला प्रवृत्ति—मनका किसी विषयकी ओर झुकाव, प्रभाव प्रशस्त—प्रशंसाके योग्य प्रशान्तात्मा—शुद्ध या शान्त आत्मा प्रशामक—शान्त करनेवाला प्राकृत—प्रकृति-सम्बन्धी प्राक्तन—प्राचीन प्रादुर्भूत—आविर्भूत, अवतरित प्रादेशिक वाक्य—प्रसङ्गगत, स्थानीय वाक्य प्रापक—प्राप्त करने या करानेवाला प्रापञ्चिक—जगत् या प्रपञ्च-सम्बन्धी प्राप्य—प्राप्त होने योग्य प्रार्थित—प्रार्थना किया हुआ प्रेमास्पद—प्रेमका स्थल प्रेमोत्कर्ष—प्रेमका उत्कर्ष ब बाहुल्य—अधिकता बाह्य अङ्ग—बाहरी अङ्ग बिद्ध—छेदा हुआ, आहत बृहत्—बड़ा बोधगम्य—समझमें आने योग्य ब्रह्मलय—ब्रह्ममें लय होना ब्रह्मवेत्ता—ब्रह्मको जाननेवाला ब्रह्मानन्द—ब्रह्मका आनन्द ब्रह्मानुभूति—ब्रह्मकी अनुभूति भ भक्तानन्दायिनी—भक्तोंको आनन्द देनेवाली भोक्तृत्वभाव—भोक्ता होनेका भाव म मत्सम्बन्धी—मेरे सम्बन्धी मत्सरता—डाह, जलन, द्वेष मथन—मथनेका भाव मधुरिमा—माधुर्य मन्वन्तर—ब्रह्माजीके दिनका चौदहवाँ भाग मन्तव्य—विचार, मत मर्मार्थ—सार महत्—बड़ा मायाच्छन्न—मायाके द्वारा आच्छन्न मुकुलित—आधा विकसित मुमुक्षु—मुक्तिकी इच्छा करनेवाला मेधायुक्त—मेधावी मोहान्ध—मोहसे अन्धा म्लेच्छ—चारो वर्णोंसे भी नीच ४८० | श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत

यतिगण-व्योम ]

यतिगण-संन्यासी लोग याग-यज्ञ यादृच्छिक-स्वतन्त्र, ऐच्छिक युक्तियुक्त-उचित, युक्तिपूर्ण युगपत्-एक ही समयमें, साथ-साथ युगावतार-प्रत्येक युगमें लेनेवाले अवतार योगमाया-भगवान्‌की परा शक्ति योगस्थैर्य-योगकी स्थिरता

रक्तिम-लालिमायुक्त रञ्जित-रंगा हुआ रूक्ष-रूखा, नीरस

लिङ्गशरीर-सूक्ष्म शरीर लिप्सा-किसी वस्तुको पानेकी इच्छा लुब्ध-ललचाया हुआ, लोभित लोकपाल-लोकका पालन करनेवाला लोकप्रवर्त्तन-लोगोंके कल्याणके लिये

वञ्चक-वञ्चना करनेवाला वयस-उम्र वर्चस्व-अधिकार वर्णविशिष्ट-वर्णवाला वर्णसङ्कर-भिन्न जातियोंके स्त्री-पुरुषसे उत्पन्न वाक्-वाणी, बोलनेकी इन्द्रिय वाचाल-अधिक बोलनेवाला वागिन्द्रिय-जिह्वा विक्षिप्त-पागल, उद्विग्न विगुण-गुणहीन


विच्युति-भूल, पतन, वियोग विजितात्मा-जिसने मनको जीत लिया है विज्ञ-पण्डित, जाननेवाला विदित-मालूम विधर्म-धर्मविरुद्ध विधिवादिगण-नैतिक लोग विधेय-करने योग्य विधेयात्मा-जिसकी आत्मा संयत हो विन्यास-व्यवस्थित करना विपर्यय-प्रतिकूलता, विपरीतता विभूति-ऐश्वर्य विरहकातर-विरहसे कातर विरोधाभास-विचारमें विरोध प्रतीत होना विलास-क्रीड़ा विवक्षित-इच्छित, कथित विवृत-स्पष्ट, व्यक्त विशारद-निपुण विशिष्ट-विशेषतायुक्त विशिष्टता-विशेषता विशुद्धचित्त-जिसका चित्त शुद्ध है विशेषत्व-विशेषता विषयणी-विषयसे सम्बन्धित विहित-आदेश किया हुआ वृष्टि-वर्षा वेदज्ञ-वेदोंके जाननेवाला वैषम्य-विषमता व्यङ्गोक्ति-गूढ़भाषा, वह भाषा जिसमें व्यङ्ग हो व्यतिक्रम-उल्लङ्घन व्यतिरेक-असङ्गति, निषेध व्यवहृत-व्यवहार किया हुआ व्योम-आकाश

शब्दकोश | ४८१

[ शोच्य-स्वानन्द श शोच्य—शोचनीय शैव—शिवके उपासक श्रुत—सुना हुआ श्रोतव्य—सुनने योग्य श्लेषोक्ति—छिपे अर्थवाली बात ष षडैश्वर्यपूर्ण—छः ऐश्वर्योंसे परिपूर्ण स सङ्कीर्णता—उदार ना होनेका भाव संवरण—छिपाना संवेदन—अनुभूति संस्पर्श—अच्छी तरहसे होनेवाला स्पर्श संहर्त्ता—संहार करनेवाला सङ्गति—मेल सञ्चित—जमा किया हुआ सदातन—विष्णु सद्विवेकी—सद् विवेकवाला समत्वभाव—समताका भाव सन्निविष्ट—उत्तम रूपसे एकाग्र समाहर—समुच्चय, समूह समाहित—संयमित, व्यवस्थित सम्बन्धविशिष्ट—सम्बन्धवाला सम्मत—सहमत, एक मत समन्वित—संयुक्त, स्वाभाविक रूपसे क्रमबद्ध सम्यक्—भलीभाँति, अच्छी तरह सर्वतन्त्र—समस्त सिद्धान्त सर्वतोभावेन—सम्पूर्ण रूपसे सर्वभूतात्मा—सभी जीवोंके आत्मा अर्थात् परमात्मा सर्वभुक्—सब कुछ खा जानेवाला सर्वात्मकत्व—सर्वात्मकता सहस्र—हजार साम—सामवेद सामर्थ्यविशिष्ट—सामर्थ्यवान् साम्यलक्षण—समानताका लक्षण सारगर्भित—तत्त्वपूर्ण सालोक्य मुक्ति—जीवका भगवान्‌के साथ एक ही लोकमें वास करना साष्टाङ्ग प्रणाम—आठ अङ्गोंसे प्रणाम (सिर, हाथ, पैर, आँख, जंघा, हृदय, वचन और मन) सुखान्वेषी—सुखकी खोज करनेवाला सुदुराचारी—अति दुराचारी सुधा—अमृत सुरस—रसयुक्त सुष्ठु—भली भाँति, अच्छी तरह सुस्पष्ट—विशेषरूपसे स्पष्ट सौम्य—सुन्दर, कोमल स्खलित—गिरा हुआ स्निग्ध—स्नेहयुक्त, प्रियता स्नेहाधिक्य—स्नेहकी अधिकता स्फूर्ति—स्फुरण, व्यक्त होना स्पृहा—इच्छा, आकाङ्क्षा स्फुरण—व्यक्त होना स्फुलिङ्ग—चिङ्गारी स्मार्त्त—स्मृति शास्त्रका अनुयायी स्थायित्व—स्थिरता स्रुवा—घीमें आहुति डालनेकी करछी स्वच्छन्द—स्वतन्त्र स्वधर्मस्थ—अपने धर्ममें स्थित स्वयंभू—स्वयं उत्पन्न स्वानन्दपूर्ण—अपने आनन्दमें पूर्ण ४८२ | श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत

हत-हृदगत ] ह हत—मरा हुआ हतभागा—भाग्यहीन हन्त—मारना हिरण्यगर्भ—ब्रह्मा हेयता—तुच्छता हृदगत—हृदय-सम्बन्धी शब्दकोश | ४८३

४८४ | श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत

॥ श्रीश्रीगुरुगौराङ्गौ जयतः ॥ गुरुपरम्परामें श्रीकृष्णचैतन्यके अधीन चौथी पीढ़ीके महापुरुष श्रीरूपानुग अप्राकृत-कविकुलश्रेष्ठ- ॐ विष्णुपाद श्रीश्रीमद् कृष्णदास-कविराज-गोस्वामी-रचित श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत आदिलीला [द्वितीय भाग (अध्याय 8-17)] गुरुपरम्परामें श्रीकृष्णचैतन्यके अधीन आठवीं पीढ़ीके पुरुषप्रधान श्रीरूपानुगवर- ॐ विष्णुपाद श्रीश्रीमद् सच्चिदानन्द-भक्तिविनोद-ठाकुर-रचित अमृतप्रवाह-भाष्य, गुरुपरम्परामें श्रीकृष्णचैतन्यके अधीन नौवीं पीढ़ीके श्रेष्ठ परिजन परमहंस-परिव्राजकाचार्य-श्रीरूपानुगश्रेष्ठ- श्रीब्रह्मामाध्वगौड़ीय-सम्प्रदायके सर्वोत्तम संरक्षक- ॐ विष्णुपाद परमहंसस्वामी श्रीश्रीमद्भक्तिसिद्धान्त सरस्वती गोस्वामी प्रभुपाद-रचित श्रीस्वरूप-रूप-विरोधी समस्त-कुसिद्धान्तोंको निरस्त करनेवाला अनुभाष्य एवं विविध गौड़ीय वैष्णवाचार्योंके लेखों एवं नित्यलीलाप्रविष्ट ॐ विष्णुपाद अष्टोत्तरशतश्री श्रीमद्भक्तिवेदान्त नारायण गोस्वामी महाराजके प्रवचनोंसे सङ्कलित 'अमृतानुकणिका' भाष्य, भूमिका, विविध सूची और विवरण आदि-सहित गुरुपरम्परामें श्रीकृष्णचैतन्यके अधीन दसवीं पीढ़ीके श्रेष्ठ परिजन श्रीगौड़ीय वेदान्त समितिके प्रतिष्ठाता-आचार्य-भास्कर नित्यलीलाप्रविष्ट ॐ विष्णुपाद अष्टोत्तरशतश्री श्रीमद्भक्तिप्रज्ञान केशव गोस्वामी महाराजके अनुकम्पा-पात्र नित्यलीलाप्रविष्ट ॐ विष्णुपाद अष्टोत्तरशतश्री श्रीमद्भक्तिवेदान्त नारायण गोस्वामी महाराजके- आदेश-निर्देशानुसार उनके चरणाश्रितजनोंके द्वारा अनुवादित और सम्पादित प्रकाशक : इन्टरनेशनल गौड़ीय वेदान्त पब्लिकेशन्स

मूल बङ्गला पयार, संस्कृत श्लोक, अमृतप्रवाह भाष्य, अनुभाष्य और अमृतानुकणिका सहित प्रकाशित प्रथम संस्करण — श्रीगौरपूर्णिमा, 23 मार्च, 2016 1000 प्रतियाँ 卐 卐 卐 卐 卐 ग्रन्थ प्राप्ति स्थान श्रीरमणविहारी गौड़ीय मठ बी-3, म्यूज़िकल फॉउन्टेन पार्कके निकट, जनकपुरी, नई दिल्ली 011-25533568 श्रीकेशवजी गौड़ीय मठ जवाहर हाट, मथुरा (उ.प्र.) 0565-2502334 श्रीरूप-सनातन गौड़ीय मठ दान गली, वृन्दावन (उ.प्र.) +91 9219478001 श्रीगिरिधारी गौड़ीय मठ दसविसा, राधाकुण्ड रोड, गोवर्धन (उ.प्र.) 0565-2815668 श्रीश्रीकेशवजी गौड़ीय मठ कोलेरडाङ्गा लेन, नवद्वीप (प.ब.) +91 9153125442 श्रीराधामाधव गौड़ीय मठ 293, सैक्टर-14, फरीदाबाद (हरियाणा) +91 9911283869 जयश्री दामोदर गौड़ीय मठ चक्रतीर्थ रोड़, जगन्नाथपुरी (ओडीशा) +91 9776238328 श्रीराधागोविन्द गौड़ीय मठ डी-5, सैक्टर-55, नौएडा, (उ.प्र.) +91 9910400878 खण्डेलवाल एण्ड सन्स अठखम्बा बाज़ार, वृन्दावन (उ.प्र.) 0565-2443101

विषय-सूची सम्पादक-मण्डली निवेदन 。。。。。 i उद्धृत ग्रन्थ 。。。。。。。。。。 ii - iii अध्याय विवरण 。。。。。。。。。 iv - vi अध्याय 8 ग्रन्थ-रचनार्थ वैष्णव-आज्ञा-कथन 。。。。 3-24 अध्याय 9 भक्तिकल्पवृक्ष वर्णन 。。。。。。。 27-38 अध्याय 10 मूलस्कन्ध-शाखा वर्णन 。。。。。。。 41-94 अध्याय 11 श्रीनित्यानन्दस्कन्ध-शाखा वर्णन 。。。。 97-120 अध्याय 12 श्रीअद्वैतस्कन्ध-शाखा वर्णन 。。。。。 123-144 अध्याय 13 जन्म-महोत्सव वर्णन 。。。。。。。 147-171 अध्याय 14 बाल्यलीला-सूत्र वर्णन 。。。。。。。 173-188 अध्याय 15 पौगण्डलीला-सूत्र वर्णन 。。。。。。。 191-198 अध्याय 16 कैशोरलीला-सूत्र वर्णन 。。。。。。。 201-216 अध्याय 17 यौवनलीला-सूत्र वर्णन 。。。。。。。 219-269 श्लोक सूची 。。。。。。。。。 271-272 पद्य सूची 。。。。。。。。。 273-297 शब्दकोश 。。。。。。。。。 299-306

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