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श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

निवेदन हमारे परमाराध्य गुरुदेव नित्यलीलाप्रविष्ट ॐ विष्णुपाद अष्टोत्तरशतश्री श्रीमद्भक्तिवेदान्त नारायण गोस्वामी महाराजजीकी गौड़ीय वैष्णवाचार्योंकी विविध टीकाओं सहित श्रीचैतन्यचरितामृत हिन्दी भाषामें प्रकाशित करनेकी चिर-अभिलाषा थी। इस कार्यको सम्पादित करनेके लिये उन्होंने प्रकाशन मण्डलीको आज्ञा एवं निज शक्ति प्रदान की थी। श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामीने श्रीचैतन्य महाप्रभुके द्वारा अनुमोदित गूढ़ तत्त्व-सिद्धान्तों और सर्वोच्च रस-तत्त्वका अनूठा, अद्भुत और चमत्कारी समन्वय इस ग्रन्थमें अति सरल बङ्गला भाषामें करके अपने अप्राकृत कवित्वका परिचय प्रदान किया है। “मितञ्च सारञ्च वचो हि वाग्मिता”, श्रील कविराज गोस्वामीकी लेखनी इस उक्तिका उज्ज्वल उदाहरण है, उन्होंने अति अल्प शब्दोंमें समस्त शास्त्रोंके सारको प्रमाण सहित इस ग्रन्थमें प्रस्तुत किया है। इस ग्रन्थकी भाषा सरल होने पर भी इसमें अत्यन्त गूढ़ रहस्य समन्वित हैं। श्रील भक्तिविनोद ठाकुर और श्रील भक्तिसिद्धान्त सरस्वती ठाकुरने अपनी टीकाओं एवं अनेकानेक लेखोंके द्वारा उन गूढ़ रहस्योंको उद्घाटित किया है। इन टीकाओं और लेखों तथा श्रील गुरुदेवके प्रवचनोंको इस प्रकाशनमें समन्वय करके ग्रन्थके गूढ़ भावोंको सर्वसाधारणके लिये बोधगम्य बनानेका हमारा प्रयास है। श्रील गुरुदेवके अहैतुकी कृपाशीर्वादसे श्रीचैतन्यचरितामृत आदिलीलाका प्रथम भाग गत वर्ष श्रीगौर-पूर्णिमाके दिन उनके करकमलोंमें समर्पित किया गया था। उनके मनोवाञ्छित कार्यको सम्पूर्ण करनेके लिये प्रकाशन मण्डलीके सेवक निरन्तर प्रयासशील हैं और श्रील गुरुदेवकी प्रेरणा एवं निरुपाधिक निरवधि कृपाशक्ति हमें इस महत् कार्यमें सदा उत्साहशील बनाये रखती है। यह अति हर्षका विषय है कि श्रीचैतन्यचरितामृतका द्वितीय भाग भी अब प्रकाशित हो गया है और श्रीगुरुदेवकी प्रसन्नताके लिये उनकी निज वस्तुको उनके ही करकमलोंमें अर्पित करते हुए परमानन्दका अनुभव कर रहे हैं। इस ग्रन्थके प्रकाशनके लिये आत्मीय सहायता एवं प्रेरणाके लिये हम श्रीयुता उमादेवी दासीके आभारी हैं। इस ग्रन्थमें कुछ त्रुटियोंका रह जाना स्वाभाविक है। सुधी पाठकोंके द्वारा उनका संशोधनपूर्वक पाठ करनेसे हम आनन्दित होंगे। प्रकाशन मण्डली इन्टरनेशनल गौड़ीय वेदान्त पब्लिकेशन्स (IGVP) i

श्रीचैतन्यचरितामृत आदिलीला उत्तरार्द्धमें उद्धृत प्रमाण-ग्रन्थ तालिका एकादशी-तत्त्व—16/58; उद्वाह-तत्त्व—15/27; उज्ज्वलनीलमणि—17/293; केशव-काश्मीरी-श्लोक—16/41; बृहन्नारदीयपुराण—17/21; ब्रह्मवैवर्त्तपुराण—17/164; भक्तिरसामृतसिन्धु—8/17; भरतमुनि-वाक्य—16/71; भागवत—8/19, 25, 58; 9/42, 43, 46; 13/77; 14/69; 17/76, 78; मलमासतत्त्व—17/164; महाभारत—17/308; ललितमाधव—17/281; श्रीचैतन्यचन्द्रोक्त-श्लोक—16/82; 17/31; सामुद्र—14/15 ॥ अमृतप्रवाह भाष्यमें उद्धृत ग्रन्थादि-तालिका पुरुषसूक्त—17/18; बृहद्व्याकरण—13/29; भक्तिरसामृतसिन्धु—8/58; योगवाशिष्ठ—17/65; रामाष्टक—17/69; लघु-व्याकरण—13/29; सामुद्रिक ग्रन्थ—13/120 ॥ अनुभाष्यमें उद्धृत ग्रन्थादि-तालिका अथर्ववेद-संहिता—14/19; अद्वैतचरित—12/13-18, 27; अभिज्ञान-शकुन्तल—16/101; उत्तरचरित—16/101; एकादशी-तत्त्व—17/265, 266; कुमारसम्भव—16/101; कूर्मपुराण—17/78; कृष्णगणोद्देशदीपिका—12/83; कौस्तुभप्रभा—16/25; गीतगोविन्द या अष्टपदी—13/42; गौतमीय-तन्त्र—17/293; गौरगणोद्देशदीपिका—8/41, 59-60, 66; 9/14, 10/8, 14-17, 21-25, 29, 31-38, 40, 53, 56, 61-63, 67-68, 70-71, 73, 75-78, 80, 84-85, 91, 106-115, 119-120, 130-131, 134-136, 139, 143, 153; 11/13, 21, 23-26, 29, 31-33, 37-39, 41-42, 44-45, 51, 53-54; 12/13-18, 57-59, 65, 79-81, 83-87; 13/56, 60-61, 74; 14/68; 15/29; 17/296, 300-301; चण्डीदास-गीतिग्रन्थ—13/42; चैतन्यचन्द्रामृत—13/123; चैतन्यचन्द्रोदय-नाटक—13/89; 17/55; चैतन्य-चरित महाकाव्य—10/49, 62, 136; 14/62-68; 17/55; चैतन्यभागवत—9/11, 14; 10/30-32, 34-37, 41, 43-47, 49, 53, 58, 64, 67-73, 75-77, 113, 115, 126, 131, 135; 11/20, 23, 26, 28, 29, 31, 33-39, 41-47; 12/13-17, 40-42; 13/28, 29, 67-71; 14/19, 21-23, 25, 37-40, 73; 15/7, 23, 31; 17/7-12, 17-20, 23, 31, 37, 55, 64-65, 69-71, 79-86, 99-100, 103-114, 116, 124, 138-142, 228-230, 241-243, 262, 274, 278; चैतन्यमङ्गल (श्रीलोचनदास)—14/46; 17/69, 89, 95, 119; छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्कर-टीका)—17/78; तत्त्व-सन्दर्भ—10/105; नरोत्तमदास ठाकुरकी प्रार्थना—13/123; दशम-टिप्पणी (वैष्णवतोषणी)—17/78; नरोत्तमविलास—12/13-17; नित्यानन्दायिनी पत्रिका—12/13-17; पद्मपुराण—8/16; प्रेमतरङ्गिणी—12/58; भक्तिरत्नाकर—10/78, 84, 85, 91, 105; 11/13, 25; 12/58; 16/25; 17/55; भक्तिरसामृतसिन्धु—8/16; 14/90; ii

16/11; भक्तिसन्दर्भ—15/9-10; भागवत—12/70; 13/86, 100, 123, 124; 14/73, 88; 16/11; 17/77-78, 117, 201, 257, 312, 331; भावार्थ-दीपिका—13/80-86, 104; 17/57; भोगनिर्णय-पद्धति—12/83; महाभारत—15/27; मालती-माधव—16/101; मेघदूत—16/101; योगवाशिष्ट रामायण—12/40; रघुवंश—16/101; लघुभागवतामृत—13/86; विद्यापतिके गीतिग्रन्थ—13/42; वीरचरित—16/101; वृहज्जातकादि ग्रन्थ—13/90; वेदान्तकौस्तुभ (श्रीनिवासाचार्य)—16/25; वेदान्तदर्शनका परिजात-भाष्य—16/25; वैष्णव-तोषणी—17/77-78; वैष्णव-मञ्जुषा—10/17, 53; 12/18, 27; 13/42; 16/25; वैष्णव-वन्दना—11/29, 40; शाखानिर्णयामृत—12/13-17, 58, 62, 79-87; श्वेताश्वतरोपनिषद्—17/257; साधन-दीपिका—12/58; सीताद्वैतचरित—12/13-17; स्कन्दपुराण—15/9 हरिभक्तिविलास—10/105; 12/27; होराशास्त्र—13/90 ॥

अमृतानुक्रमणिकामें उद्धृत ग्रन्थादि-तालिका

अग्निपुराण—15/9-10; उज्ज्वलनीलमणि (आनन्दलोचनीटीका)—10/85; कर्णानन्द—10/85; गौरगणोद्देश-दीपिका—15/28; 16/25; गीता—9/39; चैतन्यभागवत—9/10; 10/14, 19, 32, 40; 12/40-42; 14/61; 16/20-21; 17/7; नारदपुराण—15/9-10, 24; पद्मपुराण—15/9-10, 24; बृहन्नारदीयपुराण—15/9-10; ब्रह्मवैवर्तपुराण—15/24; ब्रह्मसंहिता—10/85; भक्तिरत्नाकर—9/10; भक्तिरसामृतसिन्धु—8/18, 57; भविष्यपुराण—15/9-10; भागवत—8/12; 17/155-158; मत्स्यपुराण—15/9-10; मनुसंहिता—12/49-53; विष्णोधर्मोत्तर—15/9-10, 24; स्कन्दपुराण—8/24; 15/24; स्मृतिवाक्य—15/9-10; हरिभक्तिविलास—12/49-53; 15/9-10, 24 ॥

साङ्केतिक चिह्नोंकी सूची

अन्त्य — अन्त्यलीला आदि — आदिलीला उःनीः — उज्ज्वलनीलमणि कठः — कठोपनिषद छाः — छान्दोग्योपनिषद तैः — तैत्तिरयोपनिषद नाःपःराः — नारदपञ्चरात्र ब्रःसः — ब्रह्मसंहिता बृःआः — बृहदारण्यकोपनिषद मध्य — मध्यलीला मःभाः — महाभारत भःरःसिः — भक्तिरसामृतसिन्धु भाः — भागवत विःपुः — विष्णुपुराण श्वेः — श्वेताश्वतरोपनिषद हःभःविः —हरिभक्तिविलास

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श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत आदिलीला (उत्तरार्द्ध) अध्याय-विवरण आठवाँ अध्याय— 3-24 पञ्चतत्त्वका माहात्म्य न मानकर पृथक् बुद्धिसे श्रीगौर अथवा श्रीकृष्णकी पूजा घोर अपराध, श्रीकृष्णभक्तिके बिना श्रीगौरभक्ति और श्रीगौरभक्तिके बिना श्रीकृष्णभक्ति 'अभक्ति' अथवा 'आसुरवृत्ति'; श्रीचैतन्य दयाकी चमत्कारिता; अपराधयुक्त होनेपर असंख्य बार श्रीकृष्णका श्रवण-कीर्तन वृथा, श्रीकृष्ण भुक्ति-मुक्ति देकर जीवकी वञ्चना करके 'भक्ति' नहीं देते, श्रीकृष्णके साथ रस सम्बन्ध न होनेसे केवल मुक्ति ही लाभ; महाप्रभुकी महापापीके भी प्रति प्रेम-भक्ति प्रदान लीला, श्रीगौर-निताइ सेवासे ही श्रीकृष्ण-प्रेमोदय, श्रीकृष्ण नामापराधोंका विचार करते हैं, श्रीगौर-निताईके नामोंमें अपराधका विचार नहीं है, श्रीचैतन्यभागवतके श्रवणसे श्रीगौर-निताईकी महिमा और श्रीकृष्णभक्ति-सिद्धान्तके विषयमें ज्ञान; श्रीवृन्दावनदास ठाकुरकी महिमाका कीर्तन, श्रीपण्डित हरिदास, वैष्णवोंके पचास सद्गुण, श्रीकृष्णराज गोस्वामीके द्वारा श्रीचैतन्यचरितामृतके वर्णनका रहस्य। नौवाँ अध्याय— 27-38 महाप्रभु द्वारा माली बननेका धर्म ग्रहण और नवद्वीपमें भक्तिके फलोंके उद्यानकी रचना, भक्तिकल्पवृक्ष, श्रीमाधवेन्द्रपुरी कल्पवृक्षके प्रथम अङ्कुर, अचिन्त्य शक्तिके बलसे माली होकर भी महाप्रभु स्वयं स्कन्ध एवं सभी शाखाओंके आश्रय, परमानन्दपुरी और केशव भारती-प्रमुख नौ संन्यासी वृक्षके नौ मूल, परमानन्दपुरी मध्यमूल, श्रीअद्वैत और श्रीनित्यानन्द-दो स्कन्ध, स्कन्धकी बहुतसी शाखाएँ और उपशाखाएँ, प्रेमफल, प्रेमफलास्वादन, प्रेमफल वितरण, जीवोंका नित्य-मङ्गल विधान ही परोपकार, श्रीकृष्णप्रेम अर्पण द्वारा जीवोंको अपने अनुरूप महाभागवत बनाना तथा निन्दकोंका भी श्रीकृष्णप्रेम प्राप्तिसे उद्धार। दसवाँ अध्याय— 41-94 मूल स्कन्ध शाखा अर्थात् महाप्रभुकी निजशाखाका वर्णन, श्रीगौरभक्तोंमें गुरु-लघु-भेद शून्यता; 'प्रभुपादोपाधान' शङ्कर पण्डित, वासुदेव ठाकुरकी परदुःख-कातरता, नामाचार्य हरिदास ठाकुर और उनके शिष्य सत्यराज खाँ आदि कुलीन-ग्रामवासी, कुछ भी शुल्क न लेनेवाले देहरोग-भवरोग चिकित्सक मुरारिगुप्तका आत्मवृत्तिके द्वारा कुटुम्ब भरण-पोषण, महाप्रभुका 'साक्षात्', 'आवेश' और 'आविर्भाव'-इन तीन रूपोंमें अवतीर्ण होकर कृपा, नकुल ब्रह्मचारीकी देहमें महाप्रभुका आवेश, 'नकुल ब्रह्मचारी' अथवा 'प्रद्युम्न ब्रह्मचारी' तथा महाप्रभु प्रदत्त 'नृसिंहानन्द' एक ही व्यक्तिके नाम, कुलीन-ग्रामवासियोंका माहात्म्य; श्रीरूप-सनातन-शाखाके विस्तारसे समस्त भारतका उद्धार-१) भक्त-आचार-प्रवर्तन, २) लुप्ततीर्थ उद्धार और ३) श्रीमूर्तिकी पूजाका प्रचार; श्रीस्वरूप दामोदरके अन्तर्धान होनेपर 'स्वरूपके रघुका' श्रीरूप-सनातनके चरणोंके दर्शन और महाप्रभु-स्वरूप दामोदरके विरहसे कातर होकर गोवर्धनसे कूदकर देह त्यागका सङ्कल्प लेकर वृन्दावन आगमन, श्रीरूप-सनातनके द्वारा तृतीय भाईके रूपमें रघुनाथ दास गोस्वामीको अपने समीप रखना, दास गोस्वामीके दैनिक कृत्य, रघुनाथभट्ट गोस्वामीका विवरण। iv

ग्यारहवाँ अध्याय— 97-120 श्रीनित्यानन्दस्कन्ध-शाखा अर्थात् नित्यानन्दगणोंका वर्णन। बारहवाँ अध्याय— 123-144 श्रीअद्वैतस्कन्ध-शाखा अर्थात् श्रीअद्वैतगणोंका वर्णन, श्रीअद्वैतगण पहले एकमत, बादमें दो मत-आचार्यके अनुगत और उनसे स्वतन्त्र, श्रीअच्युतानन्दानुग 'सारग्राही' एवं अन्य सब 'असार', सारग्राही-सहित सभीकी गणना करनेके बाद असारग्राहियोंका त्याग, श्रीचैतन्य महाप्रभु चौदह भुवनोंके गुरु, बाउलिया विश्वास, बाउल अथवा मायावादमतका खण्डन, महाप्रभुके द्वारा वैष्णव आचार्यके कर्त्तव्यका निर्णय, असार गणोंका श्रीगौरकृपाके अभावके कारण पतन, श्रीगौरकृष्ण-भक्त यमके गुरु और श्रीगौरकृष्ण-विमुख यमके दण्डके योग्य, श्रीगदाधर पण्डित गोस्वामीकी उपशाखाएँ, शाखा-स्मरणसे भवबन्धनका विमोचन। तेरहवाँ अध्याय— 147-171 महाप्रभुकी आदिलालाका सूत्र, गृहस्थ-लीला ही आदि-लीला एवं संन्यास-लीला ही मध्य और अन्त्य लीला, मुरारिगुप्तके द्वारा आदिलाला और स्वरूप गोस्वामीके द्वारा मध्य और अन्त्य लीलाका सूत्र-ग्रन्थन, आदिलालाके चार भाग; आदि, मध्य और अन्त्य लीलाका संक्षेपमें विवरण, पहले गुरुवर्गोंको अवतरित कराना, बादमें स्वयं अवतरण, श्रीअद्वैतकी भक्तिपूर्ण व्याख्या, श्रीकृष्णोवतार हेतु प्रतिज्ञा, विश्वरूप-जन्म, विश्वरूप-तत्त्व, श्रीगौराविर्भाव, नीलाम्बर-चक्रवर्त्तीकी गणना, आर्याओं (कुलीन स्त्रियों) का विविध उपहारों सहित श्रीगौर-दर्शन हेतु आगमन, सर्वत्र आनन्द-कोलाहल। चौदहवाँ अध्याय— 173-188 महाप्रभुकी बाल्यलीलाओंका वर्णन और माता-पिताको चरणचिह्न-प्रदर्शन, महापुरुषोंके बत्तीस लक्षण, नीलाम्बर चक्रवर्त्तीकी भविष्यवाणी, नामकरण—'विश्वम्भर' नाम, घुटनोंके बल चलना, रोनेके छलसे नाम-प्रचार, पैरोंके बल चलना, मिट्टी खानेके छलसे माताको ज्ञान प्रदान, अतिथि-ब्राह्मणके प्रति कृपा, चोरोंको दिशा-भ्रम कराना, रोगके बहानेसे एकादशीके दिन हिरण्य-जगदीशके नैवेद्यको खाना, बाल-चपलता, माताकी मूर्च्छा और नारियल लाना, गंगाके तटपर कन्याओंके साथ परिहास, लक्ष्मीदेवीकी पूजा ग्रहण और वर प्रदान, उच्छिष्ट हाँडीके ऊपर बैठना तथा माताको ब्रह्मज्ञान-उपदेश, खाली पैरोंमें ही नूपुर ध्वनि, मिश्रका शुद्ध वात्सल्य, कलम पकड़ना। पन्द्रहवाँ अध्याय— 191-198 महाप्रभुकी पौगण्ड लीलाका वर्णन-गङ्गादास पण्डितके स्थानपर व्याकरण-अध्ययन, माताको एकादशीके दिन अन्न न खाने हेतु अनुरोध, विश्वरूपका संन्यास, महाप्रभुकी मूर्च्छा और विश्वरूपके साथ वार्त्तालापरूपी कहानी, जगन्नाथ मिश्रका अप्रकट होना, लक्ष्मीदेवीके पाणिग्रहणकी लीला। सोलहवाँ अध्याय— 201-216 महाप्रभुकी कैशोर लीलाका वर्णन-अध्यापन, पण्डित विजय, जाह्नवी (गङ्गा) में जलकेलि, पूर्वबङ्गाल-गमन, वहाँ विद्याका विचार और नामसङ्कीर्त्तन, तपनमिश्रके साथ मिलन, उनको साध्य-साधन उपदेश और वाराणसी जाने हेतु आदेश प्रदान, महाप्रभुकी विरहमें लक्ष्मीदेवीकी वैकुण्ठ-प्राप्ति, महाप्रभुका घर लौटना, माताको सान्त्वना देना, विष्णुप्रियाके साथ विवाह, दिग्विजयी-जय, दिग्विजयीके द्वारा कहे गये श्लोकके दोष और गुणोंका विचार, दिग्विजयीका सरस्वतीके निकट श्रीगौरतत्त्व-विषयक ज्ञान प्राप्त करना एवं महाप्रभुका चरणाश्रय। v

सत्रहवाँ अध्याय— 219-269 महाप्रभुकी यौवन लीलाका वर्णन—महाप्रभुका गया गमन, श्रीईश्वरपुरीके साथ मिलन और दीक्षाभिनय, प्रेमप्रकाश, घरमें लौटना, शचीमाताको प्रेमदान, श्रीअद्वैत-मिलन, श्रीअद्वैतका विश्वरूप दर्शन, श्रीवासके द्वारा महाप्रभुका अभिषेक, श्रीनित्यानन्द-मिलन, निताइको महाप्रभुके द्वारा षड्भुज, चतुर्भुज और द्विभुज रूपका प्रदर्शन, श्रीनित्यानन्द प्रभुके द्वारा व्यास-पूजन, महाप्रभुका श्रीनित्यानन्द (श्रीबलदेव) के आवेशमें मूसल धारण, शचीदेवीका श्रीबलराम-कृष्ण-दर्शन, जगाइ-मधाइका उद्धार, महाप्रभुका सात-प्रहरिया भाव, मुरारिके भवनमें वराह आवेश, शुक्लाम्बरके भिक्षाके चावल खाना, 'हरेर्नाम' श्लोककी व्याख्या, नामग्रहण करनेकी प्रणाली, श्रीवास भवनमें एक वर्ष तक सङ्कीर्तन, गोपाल-चापालका उपाख्यान, दुर्बुद्धि ब्राह्मणके द्वारा महाप्रभुको शाप देना, मुकुन्दके प्रति महाप्रभुका दण्डरूपी अनुग्रह, श्रीअद्वैतके प्रति महाप्रभुकी दण्डरूपी कृपा, मुरारि गुप्तकी ऐकान्तिक रामनिष्ठा, श्रीधरके लोहेके पात्रमें जलपान और उनको वरदान, हरिदास ठाकुरके प्रति कृपा, श्रीअद्वैताचार्यके प्रति शचीदेवीके अपराधका खण्डन, पाषण्डी छात्रका 'नाममें अर्थवाद', नामापराधीके मुख दर्शन होनेपर मनुष्यका कर्त्तव्य, महाप्रभुके द्वारा अभिधेय भक्तिकी महिमाका व्याख्यान, मुरारिकी प्रशंसा, आम्रवृक्ष-रोपण और फल दानकी कहानी, कीर्तनके समय मेघोंका निवारण, श्रीवासका विष्णुसहस्र-नाम पाठ, महाप्रभुकी नृसिंहावेश-लीला, श्रीगौरनामसे अपराध क्षय, श्रीगौरदर्शनसे संसार ध्वंस, महाप्रभुका महेशावेश, भिक्षुको श्रीकृष्णप्रेम प्रदान, ज्योतिषीके द्वारा महाप्रभुको 'साक्षात् भगवान्' बतलाना, ज्योतिषीके द्वारा श्रीगौर-निताइ-तत्त्व कहना, महाप्रभुकी बलदेवके आवेशमें यमुना आकर्षण-लीला और बारह घण्टे तक नृत्य, महाप्रभुकी आज्ञासे प्रति गृहमें श्रीकृष्णसङ्कीर्तन, काजीके द्वारा मृदङ्ग तोड़ना, कीर्तन-विरोध और निषेध, महाप्रभुके द्वारा सभीको नगर सङ्कीर्तन करनेका आदेश और काजी दलन, काजीके साथ शास्त्र-विचार, काजीके द्वारा स्वप्नमें देखी गयी नृसिंह-मूर्तिके दर्शनका उपाख्यान, काजीके पयादोंके मुख और दाढ़ी जलनेका विवरण, काजीके निकट स्मार्त्त पाखण्डियोंका अभियोग, काजीका वंशधरोंके प्रति 'तालाक', श्रीवासके पुत्रका परलोकगमन, महाप्रभुके द्वारा नारायणीको उच्छिष्ट दान, यवन दर्जीके द्वारा महाप्रभुकी कृपा प्राप्ति, श्रीवासके द्वारा वृन्दावन लीलाका वर्णन, आचार्य रत्नके घरमें महाप्रभुका लक्ष्मीके आवेशमें नृत्य, किसी ब्राह्मणीके द्वारा महाप्रभुके चरण स्पर्श करनेपर महाप्रभुका गङ्गामें छलांग लगाना, महाप्रभुका उच्च स्वरमें 'गोपी' 'गोपी' कहना और पाषण्डी छात्रके द्वारा मना किये जानेपर महाप्रभुका क्रोध, पाखण्डियोंकी दुर्गति देखकर महाप्रभुकी करुणा और संन्यास ग्रहण, केशव भारतीका नदिया आगमन और महाप्रभुके साथ मिलन, महाप्रभुका काटोया जाकर संन्यास ग्रहण करना, चार प्रकारके भक्तभावोंका आस्वादन, महाप्रभुका राधाभाव, श्रीगौरनागरवादका खण्डन, श्रीकृष्णके अन्य रूपोंमें गोपियोंकी अप्रीति, गोपियोंकी श्रीकृष्णकी स्तुति, श्रीराधाके निकट श्रीकृष्णके चातुर्यकी पराजय, श्रीगौरलीलाके पार्षद एवं भक्तगणोंका तत्त्व, श्रीकृष्ण एवं श्रीगौरलीलाके रहस्य दुर्लभ, अचिन्त्य एवं तर्कातीत, तार्किकोंकी दुर्गति, श्रद्धावानकी ही सेवा प्रवृत्ति तथा आदिलीलाकी पुनरावृत्ति। vi

श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत आदिलीला भाग-2 अध्याय 8-17

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आठवाँ अध्याय आठवें अध्यायका सार—इस अध्यायमें श्रीचैतन्य महाप्रभु और श्रीनित्यानन्द प्रभुकी महिमाका वर्णन हुआ है। नामापराध रहनेपर जन्मों-जन्मोंतक श्रीकृष्णनाम करनेपर भी व्यक्तिको प्रेमधनकी प्राप्ति नहीं होती। इससे यह समझना चाहिये कि यदि नामापराधी व्यक्ति सात्त्विक विकारादिका प्रदर्शन करता है, तो वह केवल छलमात्र है। जो व्यक्ति निष्कपट भावसे श्रीचैतन्य- श्रीनित्यानन्दका नाम लेते हुए आनन्दका अनुभव करता है, दोनों प्रभु उसके हृदयको अपराधशून्य कर देते हैं। तब श्रीकृष्णनाम जप करनेसे उसके हृदयमें प्रेमका उदय होता है। श्रीवृन्दावनदास ठाकुर-कृत श्रीचैतन्यभागवतमें सूत्ररूपमें दी गयी महाप्रभुकी शेषलीलाका विस्तारसे वर्णन होना बाकी था, अतः श्रीवृन्दावनवासी वैष्णवोंकी आज्ञासे और श्रीमदनमोहनजीकी आज्ञामाला प्राप्तकर श्रील कविराज गोस्वामीने इस ग्रन्थकी रचना की। (अमृतप्रवाह भाष्य) श्रीगौरकी इच्छासे नितान्त अयोग्य व्यक्तिको भी योग्यता-लाभ :- वन्दे चैतन्यदेवं तं भगवन्तं यदिच्छया। प्रसभं नर्त्तते चित्रं लेखरङ्गे जड़ोऽप्ययम् ॥1॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है॥1॥ अमृतप्रवाह भाष्य—मैं भगवान् श्रीचैतन्यदेवकी वन्दना करता हूँ, जिनकी इच्छासे चित्रपुत्तलिका (चित्रपटपर बने चित्र) की भाँति होनेपर भी मुझ मूर्ख व्यक्तिने हठात् (सहसा) यह ग्रन्थ-लेखनरूपी नृत्य-कार्य आरम्भ किया है॥1॥ अनुभाष्य—यदिच्छया (यत् यस्य चैतन्यदेवस्य इच्छया) अयम् (अहं कृष्णदासः) जड़ोऽपि (जड़सदृशोऽपि) लेखरङ्गे (ग्रन्थरचन-क्रीड़ाकार्य) प्रसभं (हठात्) चित्रम् (आश्चर्यं यथा स्यात् तथा) नर्त्तते, तं [कृपामयं] भगवन्तं चैतन्यदेवम् [अहं] वन्दे (प्रणमामि)। श्लोक भावानुवाद—जिन श्रीचैतन्यदेवकी इच्छासे मुझ कृष्णदासने जड़-सदृश होनेपर भी हठात् ग्रन्थ-लेखन- क्रीड़ारूपी नृत्य आरम्भ किया है, उन कृपामय भगवान् श्रीचैतन्यदेवकी मैं वन्दना करता हूँ॥1॥ जय जय श्रीकृष्णचैतन्य गौरचन्द्र। जय जय परमानन्द नित्यानन्द॥2॥ अनुवाद—श्रीकृष्णचैतन्य गौरचन्द्रकी जय हो, जय हो। परमानन्द स्वरूप श्रीनित्यानन्द प्रभुकी जय हो, जय हो॥2॥ जय जयाद्वैताचार्य जय कृपामय॥ जय जय गदाधर पण्डित महाशय॥3॥ अनुवाद—कृपामय श्रीअद्वैताचार्यकी जय हो, जय हो। श्रीगदाधर पण्डित महाशयकी जय हो, जय हो॥3॥ जय जय श्रीवासादि यत भक्तगण। प्रणत हइया वन्दों सबार चरण॥4॥ अनुवाद—श्रीवासादि सभी भक्तोंकी जय हो, जय हो। मैं शरणागत होकर इन सबके चरणोंकी वन्दना करता हूँ॥4॥ मूक कवित्व करे याँ-सबार स्मरणे। पङ्गु गिरि लङ्घे, अन्ध देखे तारागणे॥5॥ अनुवाद—इनके (पञ्चतत्त्वके) स्मरणमात्रसे गूँगा व्यक्ति कविता करने लगता है, पङ्गु (चलनेमें असमर्थ) व्यक्ति भी पर्वतको लांघ सकता है और अन्धा व्यक्ति आकाशके तारोंको देखनेमें समर्थ हो जाता है॥5॥

[ 8/6-12 पञ्चतत्त्वके माहात्म्यको ना मानकर पृथक् बुद्धिसे श्रीगौर या श्रीकृष्णपूजा घोर अपराध :- ए-सब ना माने येइ पण्डितसकल। ता-सबार विद्यापाठ भेक-कोलाहल ॥ 6 ॥ अनुवाद-जो सब (स्वयंको) पण्डित (माननेवाले) पञ्चतत्त्वको नहीं मानते, उनका विद्यापाठादि मेंढकोंके कोलाहलकी भाँति निरर्थक है॥ 6 ॥ अमृतानुकणिका-मेंढकका कोलाहल उसका कुछ भी कल्याण नहीं करता, अपितु उसके लिये विपत्तिका ही आह्वान करता है। उसके कोलाहलको सुनकर सर्प उसकी स्थिति जानकर वहाँ आकर उसको ग्रास कर लेता है। इसी प्रकार जो पञ्च-तत्त्वको ईश्वर रूपमें स्वीकार नहीं करते अथवा उनकी अलौकिक शक्तिपर विश्वास नहीं करते, उनका लौकिक दृष्टिसे पण्डित होनेपर भी कोई कल्याण नहीं होता। उनका विद्याभ्यास और ग्रन्थोंका अध्ययन निरर्थक हो जाता है, क्योंकि इस पाण्डित्य अभिमानके कारण वे भगवद्-चरणोंमें अपराध कर बैठते हैं और क्रमशः वे श्रीभगवान्से बहुत दूर हो जाते हैं॥ 6 ॥ एइ सब ना माने येबा, करे कृष्णभक्ति। कृष्ण-कृपा नाहि तारे, नाहि तार गति ॥ 7 ॥ अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है॥ 7 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य-इन पञ्चतत्त्वको न मानकर जो श्रीकृष्णभक्ति करते हैं, उनपर श्रीकृष्णकी कृपा नहीं होती ॥ 7 ॥ अनुभाष्य-'तारे' अर्थात् उनके प्रति॥ 7 ॥ पूर्वे येन जरासन्ध-आदि राजागण। वेदधर्म करि' करे विष्णुर पूजन ॥ 8 ॥ कृष्णभक्ति बिना गौरभक्ति, गौरभक्ति बिना कृष्णभक्ति-अभक्ति :- कृष्ण नाहि माने, ताते दैत्य करि' मानि। चैतन्य ना मानिले तैछे दैत्य तारे जानि ॥ 9 ॥ अनुवाद-जैसे द्वापरमें जरासन्धादि राजा वेदविहित धर्मके अनुसार विष्णुकी पूजा करते थे, परन्तु वे श्रीकृष्णको नहीं मानते थे, इसलिये इन्हें दैत्य माना गया है। इस प्रकार जो श्रीचैतन्य महाप्रभुकी भगवत्ताको स्वीकार नहीं करते, उन्हें भी दैत्यके रूपमें जानो॥ 8-9 ॥ अनुभाष्य-विष्णु-परतत्त्व स्वयंरूप श्रीकृष्णको स्वीकार न करके उनके प्रति विद्वेष अथवा उदासीनवशतः जरासन्धादिकी वेदमन्त्रोंके द्वारा की गयी विष्णुपूजा भी आसुरिक धर्ममें ही समाप्त होती है, उसी प्रकार अपने स्वरूपगत धर्म श्रीचैतन्यदास्यको भुलाकर जीवकी विष्णुपूजाकी जो चेष्टा है, वह भी उत्पातमय आसुरिक-धर्म या अवैष्णवता मात्र है॥ 9 ॥ महाप्रभुकी संन्यासलीलाका हेतु :- 'मोरे ना मानिले सब लोक हबे नाश।' इथि लागि' कृपार्द्र प्रभु करिल संन्यास ॥ 10 ॥ संन्यासी-बुद्धये मोरे करिबे नमस्कार। तथापि खण्डिबे दुःख, पाइबे निस्तार ॥ 11 ॥ अनुवाद-'जो मुझे (स्वयं भगवान्को) नहीं मानते, उन सभी लोगोंका नाश होगा'-यह विचारकर कृपासे द्रवीभूत होकर श्रीचैतन्य महाप्रभुने संन्यास ग्रहण किया। संन्यासी जानकर वे मुझे नमस्कार करेंगे, इससे उनके दुःखोंका नाश होगा और उनका उद्धार हो जायेगा॥ 10-11 ॥ अनुभाष्य-श्रीचैतन्यचन्द्र श्रीराधाकृष्णतत्त्वसे अभिन्न वस्तु हैं। किन्तु कुछ अज्ञानी लोग अपनी जड़ और भोगमय चित्त-वृत्तिके कारण श्रीगौरसुन्दरकी अप्राकृत लीलाको साधारण समझकर अपराध कर बैठते हैं। ऐसे निर्बोध लोगोंके अपराधोंकी चिन्ता करके श्रीगौरहरिने कृपावश संन्यास ग्रहणकर उनके प्रति दयाका प्रकाश किया॥ 11 ॥ महावदान्य श्रीगौरमें अभक्ति-आसुरिक-वृत्ति :- हेन कृपामय चैतन्य ना भजे येइ जन। सर्वोत्तम हइलेओ तारे असुरे गणन ॥ 12 ॥ 4 | श्रीचैतन्यचरितामृत

8/12 ] अनुवाद-ऐसे कृपालु श्रीचैतन्य महाप्रभुका जो लोग भजन नहीं करते, वे (जगत्में) सर्वश्रेष्ठ होनेपर भी असुरतुल्य हैं॥12॥ अनुभाष्य-“हे जीवों! केवल श्रीकृष्णका भजन करो”-श्रीचैतन्यचन्द्रकी इस प्रकारकी दयाकी जो लोग उपलब्धि नहीं कर सकते, वे निश्चय ही असुर अर्थात् विष्णुभक्तिरहित अवैष्णव हैं, चाहे जगत्के विषयी लोगोंके मध्य वे श्रेष्ठ माने जाते हों। श्रीकृष्णभजनको त्यागकर श्रीचैतन्यभजनमें भी श्रीचैतन्यचन्द्रकी दया नहीं है, क्योंकि ऐसा भजन कलिके प्रभावसे मनकी कल्पनामात्र है। उसी प्रकार निरीश्वर स्मार्त्त अथवा पञ्चोपासक समाजका अनुगमनकर क्षुद्र नश्वर स्वार्थसिद्धिके लिये विष्णुपूजाका प्रयास करनेवालोंकी श्रीकृष्ण-चैतन्यात्मक (चैःचः आदिलीला 1/1 में वर्णित) छह तत्त्वोंमें किसी एक तत्त्वको त्यागकर अन्य एक तत्त्वके प्रति जो श्रद्धा अथवा पूजा है, अथवा श्रीचैतन्य महाप्रभुको श्रीकृष्णसे भिन्न सामान्य मर्त्य जीवोंमें श्रेष्ठ समझकर गौरनाम, गौरमन्त्र और गौरशक्तिके प्रति जो अश्रद्धा है, वह भी आसुरिक धर्म अर्थात् कलिके प्रभावसे मनकी कल्पनामात्र है॥12॥ अमृताणुकणिका-इस अध्यायके 6-12 पयार संख्यामें वर्णित है कि जो श्रीकृष्ण-चैतन्यात्मक छह तत्त्वोंको नहीं मानते, वे असुर ही हैं-ऐसा शाब्दिक अर्थ ग्रहण करनेपर शैव-शाक्त-धर्म-सम्प्रदायके लोग, योग-ज्ञानमार्ग अवलम्बी साधक, यहाँ तक कि महाप्रभुके अनुगत वैष्णवोंके अतिरिक्त अन्य वैष्णव सम्प्रदायके लोग भी असुर ही कहलायेंगे, परन्तु यह श्रील कविराज गोस्वामीका उद्देश्य नहीं है। भक्तिरसामृतसिन्धुमें श्रील रूप गोस्वामीने कहा है-“ज्ञानतः सुलभा मुक्तिः” अर्थात् ज्ञानमार्गमें भजनसे मुक्ति सुलभ है। चैःचः (मध्य 20/157) में कहा गया है- “ज्ञान, योग, भक्ति,-तिन साधनेर वशे। ब्रह्म, आत्मा, भगवान्-त्रिविध प्रकाशे॥” इस पयारमें भी ज्ञानमार्ग, योगमार्ग और सभी प्रकारके भक्तिमार्गोंकी सार्थकता स्वीकार हुई है। इसलिये गौड़ीय वैष्णवोंका मत यही है कि अन्य प्रमाणिक सम्प्रदायके भक्त परव्योम स्थित अपने-अपने इष्ट भगवद्-स्वरूपका भजन करके वैकुण्ठमें सालोक्यादि चार प्रकारकी मुक्ति प्राप्त करते हैं। परम उदार वैष्णवशास्त्र सभी साधक सम्प्रदायोंके प्रति यथायोग्य मर्यादाका प्रदर्शन करते हैं, कहीं भी सङ्कीर्णताको आश्रय नहीं देते। श्रुतियोंमें कहा गया है कि परतत्त्व वस्तु एक होकर भी अनेक रूपोंमें प्रकाशित होती है (एकोऽपि सन् यो बहुधावभाति) और वह रसस्वरूप है (रसो वै सः)। उसमें अनन्त वैचित्री है और वह रसामृतसिन्धु है। नारायण, राम, नृसिंहादि विभिन्न भगवद्-स्वरूप उसकी रस वैचित्रीके विभिन्न रूपमात्र हैं। विभिन्न रसवैचित्री जिस प्रकार अखिलरसामृत-सिन्धु परतत्त्व वस्तुमें ही अवस्थित है, उसी प्रकार ये सब रसवैचित्रीके विभिन्न रूप या विग्रह भी उस परतत्त्व वस्तु अखिलरसामृत-घन विग्रहके ही अन्तर्भुक्त हैं, उससे स्वतन्त्र विग्रह नहीं हैं। जैसे, नारायण जिस रसवैचित्रीके मूर्त्तरूप हैं, उसी रस वैचित्रीके उपासक भक्तोंके निकट परतत्त्व वस्तु अपने विग्रहमें नारायण रूपको प्रकट करती है। इसी बातको महाप्रभुने (चैःचः मध्यलीला 9/156) में कहा है- “एक ईश्वर-भक्तेर ध्यान-अनुरूप। एकइ विग्रहे करे नानाकार रूप॥” अर्थात् एक ही ईश्वर भक्तोंके ध्यानके अनुरूप एक ही विग्रहमें नाना प्रकारके रूप प्रकट करते हैं। लीलामें श्रीकृष्णने अपने वासुदेव-विग्रहमें ही अर्जुनको विश्वरूप दिखलाया और श्रीचैतन्य महाप्रभुने अपने विग्रहमें लक्ष्मी, दुर्गा, महेश, वराह, नृसिंह, बलदेवादि विभिन्न भगवद्-स्वरूपके रूपोंको नदीयावासी भक्तोंको दिखलाया। (‘बहुमूर्त्येकमूर्तिकम्’ भाः 10/40/7)-इस प्रकार परतत्त्व वस्तु एक मूर्तिमें बहुमूर्ति और बहुमूर्तिमें आठवाँ अध्याय | 5

[ 8/12-15 एकमूर्ति है; इन सब विभिन्न रूपोंमें तत्त्वके विचारसे कोई भी भेद नहीं है, क्योंकि सभी एक ही परतत्त्व वस्तुके एक ही विग्रहकी विभिन्न अभिव्यक्ति हैं। जो किसी भी भगवद्-स्वरूपके प्रति अवज्ञा प्रदर्शन नहीं करते अथवा उनमें पृथक् भगवद्-भेद बुद्धि नहीं करते, अपने उपास्य-स्वरूपके अतिरिक्त अन्य भगवद्-स्वरूपोंका भजन नहीं करनेपर भी वे निज भजन अनुरूप अभीष्ट वस्तुको ही प्राप्त करते हैं। जैसे हनुमानजी श्रीरामचन्द्रके सेवक हैं और वे श्रीकृष्णका भजन नहीं करते हैं, तथापि श्रीरामचन्द्र और श्रीकृष्णको अभिन्न भगवद्-तत्त्व स्वीकार करनेपर वे श्रीरामचन्द्रकी सेवासे वञ्चित नहीं होते। किन्तु जरासन्धादि राजा श्रीकृष्ण-स्वरूपकी भगवत्ताको ही स्वीकार नहीं करते, विष्णु-भजन करनेपर भी उन्हें श्रीविष्णुकी कृपा प्राप्त नहीं होती है, इसलिये उनकी गणना असुरोंमें होती है। महाप्रभुने कहा है (चैःचः मध्यलीला 9/155)- “ईश्वर-तत्त्वे भेद मानिले हय अपराध॥” एक ही ईश्वर-तत्त्वमें भेद माननेसे अपराध होता है। श्रीचैतन्यदेव भी भगवद्-स्वरूप हैं, उनकी अवज्ञा करना भगवद्-स्वरूपकी अवज्ञा ही है। इसलिये श्रीचैतन्यदेवकी अतुलनीय करुणाके अभिभूत होकर श्रीकविराज गोस्वामी जो वचन कह रहे हैं, उनका तात्पर्य यह है-“श्रीचैतन्यदेवकी अवज्ञा करके अन्य भगवद्-स्वरूपका भजन करनेपर भी लोग असुरोंमें गणित होते हैं॥” 12॥ श्रीगौर-नित्यानन्दके भजन-निमित्त सभीको कविराज गोस्वामीका आदेश सहित अनुरोध :- अतएव पुनः कहों उर्ध्वबाहु हञा। चैतन्य-नित्यानन्द भज कुतर्क छाड़िया॥ 13॥ अनुवाद-इसलिये मैं (कृष्णदास) भुजाओंको ऊपर उठाकर पुनः कहता हूँ कि सब कुतर्कोंको त्यागकर श्रीचैतन्य-नित्यानन्दका भजन करो॥ 13॥ अमृतानुकणिका-भगवान्‌के जितने गुण जीवके चित्तको आकृष्ट करते हैं, उनके मध्य करुणा ही जीवोंके पक्षमें सर्वश्रेष्ठ है। भगवान् रस-स्वरूप और रसिकशेखर होनेपर भी यदि वे करुणा करके उसकी उपलब्धि करनेकी योग्यता जीवको नहीं दें, तो जीवको क्या लाभ? करुणाकी अभिव्यक्ति जिस भगवद्-स्वरूपमें जितनी अधिक होती है, वह भगवद्-स्वरूप ही जीवके चित्तको उतना ही अधिक आकृष्ट करता है। यह करुणा श्रीगौर-नित्यानन्दमें सर्वापेक्षा अधिक रूपमें अभिव्यक्त होती है, इसलिये ग्रन्थकार कविराज गोस्वामी सभीको पुकारकर कह रहे हैं कि कुतर्कको छोड़कर तुम सब श्रीगौर-नित्यानन्दका भजन करो। परन्तु श्रीकृष्णका भजन त्यागकर श्रीगौर-नित्यानन्दका भजन करना इस पयारका अभिप्राय नहीं है। श्रीचैतन्य-नित्यानन्द प्रभु पुनः पुनः श्रीकृष्ण भजनका आदेश दे रहे हैं, इसलिये उनकी अवज्ञा करनेपर उनकी कृपा लाभ नहीं होगी। इस पयारका अभिप्राय यह है-श्रीगौर-नित्यानन्दके आदेशानुसार श्रीकृष्ण-भजनके साथ-साथ श्रीगौर- नित्यानन्दका भी भजन करना चाहिये॥ 13॥ प्रत्यक्ष और अनुमानवादी तार्किकोंको भी उपदेश :- यदि वा तार्किक कहे, - 'तर्क से प्रमाण। तर्कशास्त्रे सिद्ध येइ, सेइ सेव्यमान॥' 14॥ श्रीगौरकी दया समस्त दयाकी अपेक्षा अधिकतर चमत्कारी :- श्रीकृष्णचैतन्य-दया करह विचार। विचार करिले चित्ते पाबे चमत्कार॥ 15॥ अनुवाद-यदि कोई तार्किक कहे कि तर्क ही प्रमाण है (अर्थात् श्रीचैतन्य-श्रीनित्यानन्दके भजनकी क्या आवश्यकता है?) और तर्कशास्त्रसे जो सिद्ध हुए हैं, वे ही सेव्य हैं अर्थात् भजन करने योग्य हैं, (तो) श्रीकृष्णचैतन्यकी दयाका विचार करो। अच्छी प्रकारसे विचार करनेपर तुम्हारे चित्तमें चमत्कार होगा॥ 14-15॥ 6 | श्रीचैतन्यचरितामृत

8/14-16 ]

अनुभाष्य—जगत्के लोग अपनी-अपनी भोगमयी सङ्कीर्ण बुद्धिके अनुसार दयाके एक आदर्शकी कल्पना करते हैं, परन्तु श्रीचैतन्यचन्द्रकी दया उनके विचारोंके अनुरूप नहीं है। तर्कशास्त्र पढ़कर लोगोंकी यह धारणा होती है कि तर्कके समान स्वरूप निर्धारण और सत्यके उद्घाटनमें समर्थवान और कोई वृत्ति नहीं है; इसलिये तर्कके हाथोंमें पड़कर जीवका तर्क ही उसके एकमात्र आश्रयदाता और पालकके स्थानपर अधिकार करता है। किन्तु जिस नींवके ऊपर तर्क प्रतिष्ठित है, उसकी सूक्ष्म आलोचना करनेपर बुद्धिमान् जीव ही यह समझ सकता है कि उसकी लौकिक ज्ञानेन्द्रियाँ भगवद्-विषयकी खोज करनेमें कितनी दुर्बल हैं, कहाँ तक अक्षम और अभावयुक्त हैं? तार्किक लोग अधिकतर 'असत्य' को ही तर्कसिद्ध 'सत्य' कहकर स्थिर करते हैं, इसलिये परिणाममें कुतर्कके फलसे उन्हें सियारादिकी योनियोंकी प्राप्ति होती है। तो भी जो लोग प्रधानरूपसे 'प्रत्यक्ष' और 'अनुमान' को नींव अथवा सहारा मानकर विषयके यथार्थ-निर्धारणके लिये प्रस्तुत हैं, उन लोगोंको भी कविराज गोस्वामी सम्बोधन करके कह रहे हैं कि जिनके पास दृष्टि है, विचार-शक्ति है, जिन्होंने सब प्रकारकी दयाके सम्पूर्ण चित्रको अनुभव किया है या देखनेका सामर्थ्य और सुयोग प्राप्त किया है, वे उन सब प्रकारकी दयाकी एक तालिका बना लें। तब उस तालिकामें लिखित सभी प्रकारकी दयाकी श्रीगौरहरिकी दयाके साथ तुलना करके देखेंगे, तो यह पायेंगे कि श्रीगौरहरि जैसी दया किसी भी सृष्ट-वस्तुमें अथवा सृष्टिकर्त्तामें अथवा अवतारोंमें और यहाँ तक अवतारी (श्रीकृष्ण) में भी नहीं है। उदार-विग्रह श्रीगौरहरिकी दया अवश्य ही सभीकी अपेक्षा अधिक विस्मय और चमत्कारिता हृदयमें लायेगी॥14-15॥


अपराध रहनेसे असंख्य बार श्रीकृष्णका श्रवण-कीर्तन वृथा :— बहु जन्म करे यदि श्रवण, कीर्त्तन। तबु त' ना पाय कृष्णपदे प्रेमधन ॥ 16 ॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है॥16॥ अमृतप्रवाह भाष्य—दस प्रकारके नामापराधोंसे युक्त व्यक्ति यद्यपि अनेक जन्मोंतक श्रवण-कीर्तन करे, तथापि उसे श्रीकृष्णके चरणोंमें प्रेमरूपी धनकी प्राप्ति नहीं होती है॥16॥ अनुभाष्य—श्रीचैतन्य महाप्रभुके चरणोंका आश्रय किये बिना यदि कोई व्यक्ति श्रवण-कीर्तनाख्या भक्तिका आश्रय करता है, तो भी अनेक जन्मोंमें उसे श्रीकृष्णप्रेम प्राप्तिकी सम्भावना नहीं है। श्रीचैतन्यचन्द्रकी शिक्षानुसार जो स्वयंको तिनकेसे भी अति-तुच्छ मानकर, वृक्षसे भी अधिक सहनशील, अपने सम्मानकी आशा न करके दूसरोंको यथायोग्य मान देते हुए किसी प्रकारका प्राकृत अभिमान नहीं रखते हैं, वे दस नामापराधोंसे मुक्त होकर सदा श्रीकृष्णनाम ग्रहण करनेमें समर्थ होते हैं और प्रेम लाभ करते हैं। तात्पर्य यह है कि बद्धजीव श्रीकृष्णसेवासे विमुख हैं। जड़ेन्द्रियोंकी तृप्ति अथवा नश्वर स्वार्थकी सिद्धिके लिये श्रीकृष्णनामको जड़ेन्द्रियोंके द्वारा ग्रहण करने योग्य कोई विशेष वस्तु मानकर अथवा जड़ीय अक्षरके समान वाचक और वाच्यरूप श्रीकृष्णनाम और नामी श्रीकृष्णमें भेदबुद्धि रखते हुए स्वयंको श्रीनामप्रभुका नित्यदास ना जानकर असंख्य बार अपराधयुक्त नामादिका उच्चारण करनेपर भी वे शुद्ध-साधनभक्तिसे प्राप्त होनेवाले श्रीकृष्णप्रेमको प्राप्त नहीं कर पाते हैं। हःभःविः 11/527 में पद्मपुराणका श्लोक— “नामैकं यस्य वाचि स्मरणपथगतं श्रोतमूलं गतं वा, शुद्धं वाशुद्धवर्णं व्यवहितरहितं तारयत्यैव सत्यम्। तच्चेद्देहद्रविण-जनता-लोभ-पाषण्ड-मध्ये, निक्षिप्तं स्यान्न फलजनकं शीघ्रमेवात्र विप्र॥”

आठवाँ अध्याय | 7

[ 8/16-18 “हे विप्रवर ! एक हरिनाम भी जिसकी जिह्वापर उदित हो जाते हैं अथवा कर्णेन्द्रियमें प्रवेश करते हैं या स्मरण-पथपर जागरूक हो जाते हैं, उसका वे नाम (प्रभु) अवश्य ही उद्धार करेंगे। यहाँ नामोच्चारणमें वर्णोंकी शुद्धता, अशुद्धता अथवा विधिके अनुसार शुद्ध नामोच्चारण या अशुद्ध उच्चारण आदिका महत्त्व नहीं है, अर्थात् श्रीनाम इनका कुछ भी विचार नहीं करते, परन्तु विचारणीय यह है कि यदि वे सर्वशक्तिसम्पन्न नाम शरीर, गृह, अर्थ-सम्पत्ति, पुत्र-परिवार और लोभ (काञ्चन, कामिनी और प्रतिष्ठादि) आदि पाषाणके ऊपर पतित हों अर्थात् उनके उद्देश्यसे लिये जाँय, तो (श्रीकृष्ण-प्रेमरूपी) फल शीघ्र ही उत्पन्न नहीं होता। श्रीरूप गोस्वामीने भक्तिरसामृतसिन्धु पूर्व विभाग-द्वितीय लहरीमें लिखा है— “अतः श्रीकृष्णनामादि न भवेद्ग्राह्यमिन्द्रियैः। सेवोन्मुखे हि जिह्वादौ स्वयमेव स्फुरत्यदः॥” “श्रीकृष्णनामादिको प्राकृत इन्द्रियों (जिह्वा-कान आदि) के द्वारा ग्रहण नहीं किया जा सकता। जब इन्द्रियाँ श्रीकृष्णकी सेवाके लिये उन्मुख होती हैं, तो नाम स्वतः ही जिह्वापर स्फुरित हो जाता है॥”16॥ श्रीकृष्णमें प्रेमभक्ति-सुदुर्लभा :- (भःरःसिः 1/1/36 में उद्धृत तन्त्रवचन) ज्ञानतः सुलभा मुक्तिर्भुक्तिर्यज्ञादिपुण्यतः। सेयं साधनसाहस्रैर्हरिभक्तिः सुदुर्ल्लभा ॥17॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है॥17॥ अमृतप्रवाह भाष्य—ज्ञानके प्रयासके द्वारा सहजमें मुक्ति होती है और यज्ञादि पुण्यकर्मोंके द्वारा स्वर्गके भोगादि सुलभ होते हैं, किन्तु सहस्र-सहस्र साधन करनेपर भी सहजमें हरिभक्ति प्राप्त नहीं होती। [इसका तात्पर्य यह है कि साधनके साथ और भी कुछ प्रक्रिया (शुद्धभक्तोंका दास्य और भक्त-भगवान्के साथ सम्बन्ध-ज्ञान) है, उसका अवलम्बन करनेसे हरिभक्ति प्राप्त होती है]॥17॥ अनुभाष्य—ज्ञानतः (स्वरूपज्ञानेन) [कर्मबन्धात्] मुक्तिः, यज्ञादिपुण्यतः (यज्ञेश्वर-सेवाजनित-सौभाग्येन) भुक्तिः सुलभा च। साधनसाहस्रैः (अन्याभिलाषितायुक्तैः कर्मज्ञानाद्यावृतैः प्रचुर-साधनैः) सा इयं हरिभक्तिः सुदुर्लभा। श्लोक भावानुवाद—स्वरूपज्ञानकी उपलब्धि होनेसे कर्मबन्धनसे मुक्ति, यज्ञेश्वरकी सेवा करनेके सौभाग्यसे भुक्ति (संसारके भोग) सुलभ हैं। परन्तु श्रीकृष्णसे इतर अभिलाषाओंसे युक्त, कर्म-ज्ञानसे आवृत प्रचुर साधन करनेपर भी यह हरिभक्ति सुदुर्लभ है॥17॥ जीवके भाव और रतिके पूर्व तक ही श्रीकृष्णका मुक्तिदान, रति देखनेपर प्रेमभक्तिदान :- कृष्ण यदि छुटे भक्ते भुक्ति मुक्ति दिया। कभु भक्ति ना देन राखेन लुकाइया॥18॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है॥18॥ अमृतप्रवाह भाष्य—भक्तगण यदि भुक्ति-मुक्तिकी आशा करते हैं, तो श्रीकृष्ण शुद्धभक्तितत्त्वको उनसे छिपाकर (अर्थात् उन्हें न देकर) उन्हें भुक्ति-मुक्ति देकर अपना छुटकारा पा लेते हैं॥18॥ अमृतानुकणिका—भक्त यदि श्रीकृष्णके द्वारा भुक्ति या मुक्ति पाकर सन्तुष्ट हो जाते हैं, अर्थात् वे यह मानते हैं कि उनकी मनोभीष्ट वस्तुकी उन्हें उपलब्धि हो गयी है, तो श्रीकृष्ण उन्हें अपनी प्रेमाभक्ति प्रदान नहीं करते। इसका कारण यह है कि जब तक हृदयमें भुक्ति-मुक्तिकी स्पृहा रहती है, तब तक वह हृदय भक्तिके आविर्भावकी योग्यता लाभ नहीं करता। श्रील रूप गोस्वामीने भक्तिरसामृतसिन्धु (पूर्वः 2/14) में कहा है— “भुक्तिमुक्तिस्पृहा यावत् पिशाची हृदि वर्तते। तावद्भक्तिसुखस्यात्र कथमभ्युदयो भवेत्॥” अर्थात् “भुक्ति (लौकिक भोग-सुख) और मुक्ति (ब्रह्मानन्द) को प्राप्त करनेकी स्पृहा पिशाची है, जब 8 | श्रीचैतन्यचरितामृत

8/18-20 ] तक वह साधकके हृदयमें विद्यमान रहती है, तब तक उसमें विशुद्ध भक्तिका सुख भला कैसे उदित हो सकता है? अर्थात् भक्ति उस हृदयमें कभी भी उदित नहीं हो सकती।” जिनके हृदयमें भुक्ति-मुक्तिकी वासना नहीं है, वे भुक्ति-मुक्ति पाकर भी तृप्त नहीं होते, यहाँ तक कि श्रीकृष्ण स्वयं उन्हें भुक्ति-मुक्ति प्रदान करने चाहें, तो वे उसे ग्रहण नहीं करते। ऐसे ही व्यक्ति प्रेमाभक्तिको प्राप्त करते हैं॥18॥ श्रीकृष्णके साथ रस-सम्बन्ध नहीं होने पर मुक्तिमात्र-लाभ :- (श्रीमद्भागवत 5/6/18) - राजन् पतिर्गुरुरलं भवतां यदूनां दैवं प्रियः कुलपतिः क्व च किङ्करो वः। अस्त्वेवमङ्ग भजतां भगवान् मुकुन्दो मुक्तिं ददाति कर्हिचित् स्म न भक्तियोगम्॥19॥ अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है॥19॥ अमृतप्रवाह भाष्य-शुकदेव गोस्वामीने कहा-“हे राजन्! भगवान् श्रीकृष्णचन्द्र तुम्हारे (पाण्डवोंके) और यादवोंके सम्बन्धसे कभी पति, गुरु, देवता, प्रियबन्धु, कुलपति और कभी वे सेवक भी बन जाते हैं। [यहाँपर यह ज्ञातव्य है], मुकुन्द भजनशील लोगोंको सहजमें 'मुक्ति' तो प्रदान करते है, परन्तु भजनमें भक्तका किस प्रकारका निष्ठा-चातुर्य है, उसे देखकर ही वे उसे 'भक्तियोग' देते हैं॥19॥ अनुभाष्य-ऋषभदेवके चरित्र वर्णन प्रसङ्गमें शुकदेव गोस्वामी परिक्षित महाराजसे कह रहे हैं- हे राजन्! भगवान् मुकुन्दः (श्रीकृष्णः) भवतां (पाण्डवानां) यदूनां च पतिः (अधीश्वरः पालकः), गुरुः (उपदेष्टा), दैवं (उपास्यविग्रहः), प्रियः (आत्मा), कुलपतिः; क्व च (कदाचित् दौत्यादिषु) वः (युष्माकं पाण्डवानां) किङ्करः (आज्ञावहः) च। हे अङ्ग! एवम् अस्तु, [तथापि स भगवान्] भजतां (जनानां सकामभक्तेभ्य इति यावत्) मुक्तिं ददाति, कर्हिचित् (कदापि) [तेभ्यः] भक्तियोगं न ददाति स्म। श्लोक भावानुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है॥19॥ किन्तु उदारविग्रह श्रीगौरसुन्दरकी महापापी तकको प्रेमभक्ति प्रदान-लीला :- हेन प्रेम श्रीचैतन्य दिला यथा तथा। जगाइ मधाइ पर्यन्त—अन्येर का कथा॥20॥ अनुवाद-किन्तु श्रीचैतन्य महाप्रभुने ऐसे सुदुर्लभ प्रेमको जहाँ-तहाँ प्रदान किया। औरोंकी तो बात ही क्या है, उन्होंने जगाइ-मधाइ तकको यह सुदुर्लभ प्रेम प्रदान किया॥20॥ अनुभाष्य-जगाइ और मधाइके जैसे अन्य पापी और दुष्चरित्र व्यक्ति भी श्रीगौरसुन्दरकी कृपा पाकर पापों और दुष्कृतियोंको पूर्णरूपसे त्यागकर कब श्रीकृष्णप्रेमको प्राप्त करेंगे?॥20॥ अमृताणुकणिका-बड़े-बड़े योगियों तथा ब्रह्मादि देवताओंके लिये परम दुर्लभ कृष्णप्रेमको महाप्रभुने जहाँ-तहाँ धनी-दरिद्र, पापी-पुण्यात्मा, बालक-वृद्ध, स्त्री-पुरुष, ब्राह्मण-चण्डाल, यवनादि सभीको बिना भेद-भावके प्रदान किया। नामापराध और वैष्णवापराध कृष्णप्रेम प्राप्तिमें बड़े बाधक हैं। जो सुदुराचारी होनेपर भी यदि निरपराधी हैं, उनके सभी पाप नामाभाससे ही दूर हो जाते हैं और उनका हृदय प्रेम लाभ करने योग्य हो जाता है। इस पयारमें निरपराध व्यक्तिको प्रेमदानकी बात कही गयी है। जगाइ-मधाइ, ये दोनों भाई नवद्वीपमें ब्राह्मण कुलमें उत्पन्न हुए थे, परन्तु दुःसङ्गके कारण सभी प्रकारके बुरे कर्मोंमें लिप्त थे। ऐसा कोई दुष्कर्म नहीं था जो इन्होंने नहीं किया अथवा कर नहीं सकते थे। वे सदा मदिरापान करके मत्त रहते थे। ये अति दुराचारी थे, परन्तु अपराधी नहीं थे। महाप्रभुके आदेशसे श्रीनित्यानन्द प्रभु और हरिदास ठाकुर घर-घर नाम प्रचारके लिये जाते थे और एक दिन इन दोनों भाइयोंके पास आये और उनसे कृष्णनाम करनेके लिये कहा। मदिरापानसे मत्त दोनों भाइयोंने उनपर क्रोध प्रकाश करते हुए मधाइने श्रीनित्यानन्द प्रभुके माथेपर आठवाँ अध्याय | 9

[ 8/20-24 मदिराकी मटकीसे प्रहार किया। यह समाचार पाते ही महाप्रभु तुरन्त वहाँ आये और अपने ऐश्वर्यका प्रकाश करते हुए अपने चक्रका आह्वान करने लगे, किन्तु श्रीनित्यानन्द प्रभु महाप्रभुसे उन्हें क्षमा करनेकी प्रार्थना करने लगे। इस प्रकार श्रीनित्यानन्द प्रभुके द्वारा प्रहार सहनकर क्रोधके अभाव और क्षमाशीलता एवं करुणाके गुणोंको देखकर जगाइ-मधाइका हृदय विगलित हो गया तथा तीव्र अनुतापकी ज्वालासे उनका हृदय दग्ध हो गया। महाप्रभुके ऐश्वर्यको देखकर वे कातर होकर कृपाकी याचना करने लगे। महाप्रभुने कृपा परवश होकर उनके हृदयके सभी कल्मषको धोकर उन्हें प्रेमदान करके कृतार्थ किया॥20॥ स्वतन्त्र ईश्वर प्रेम-निगूढ़-भाण्डार। बिलाइल यारे तारे, ना कैल विचार॥21॥ श्रीगौर-निताइकी सेवासे ही श्रीकृष्णप्रेमोदय :- अद्यापिह देख चैतन्य-नाम येइ लय। कृष्णप्रेमे पुलकाश्रु-विह्वल से हय॥22॥ अनुवाद-श्रीचैतन्य महाप्रभु स्वतन्त्र ईश्वर और निगूढ़-प्रेमके भण्डार हैं। इसलिये कोई विचार किये बिना उन्होंने (पात्र-अपात्र सभीको) इस प्रेम-भक्तिका वितरण किया। (श्रीगौरसुन्दरकी कृपा ऐसी विशेष है कि) अभी भी जो श्रीचैतन्य महाप्रभुका नाम लेते हैं, वे श्रीकृष्णप्रेममें विह्वल हो जाते हैं और उनके नेत्रोंसे अश्रु बहने लगते हैं तथा शरीरमें पुलक हो जाता है॥21-22॥ अमृतप्रवाह भाष्य-श्रीचैतन्य-अवतारका एक विशेष आश्चर्य विषय यह है कि जो कोई उनके समीप जायेगा, पात्र-अपात्रका विचार किये बिना वे निगूढ़-प्रेमका भण्डार उसे दे देंगे, क्योंकि वे स्वतन्त्र ईश्वर हैं। और भी देखें, श्रीचैतन्यचन्द्र जगद्गुरुके रूपमें अवतीर्ण हुए हैं। कोई अपराधी हो अथवा निरपराधी, 'हे गौराङ्ग! हे कृष्णचैतन्य!' कहकर जो उनके शरणागत होकर उनको पुकारता है, तो श्रीकृष्णप्रेमके पुलक-अश्रु आदि सात्त्विक विकारोंके उदित होनेसे वह विह्वल हो जाता है॥21-22॥ नित्यानन्द बलिते हय कृष्णप्रेमोदय। आउलाय सकल अङ्ग, अश्रु-गङ्गा बय॥23॥ अनुवाद-श्रीनित्यानन्द प्रभुका नाम लेने मात्रसे व्यक्तिमें श्रीकृष्णप्रेमका उदय होता है और उसके अङ्गोंमें रोमाञ्च तथा नेत्रोंसे गङ्गाकी भाँति अश्रुओंकी धारा प्रवाहित होने लगती है॥23॥ अपराध रहनेपर मुक्तकुलके उपास्य श्रीकृष्णनामक उदयका अभाव :- 'कृष्णनाम' करे अपराधेर विचार। कृष्ण बलिले अपराधीर ना हय विकार॥24॥ अनुवाद-'श्रीकृष्णनाम' प्रभु अपराधोंका विचार करते हैं और अपराधी व्यक्तिको नामका वास्तविक फल 'प्रेम' प्राप्त नहीं होता। इसलिये श्रीकृष्ण नामका उच्चारण करनेसे अपराधी व्यक्तिमें कोई विकार उत्पन्न नहीं होते॥24॥ अमृतप्रवाह भाष्य-पद्मपुराणमें दस नामापराध- (1) सतां निन्दा (नाम प्रचार करनेवाले नामपरायण सन्तोंकी निन्दा) (2) श्रीविष्णुसकाशात् शिवनामादेः स्वातन्त्र्यमननम् (शिवादि देवताओंको विष्णुके समान अथवा उनसे स्वतन्त्र ईश्वर मानना) (3) गुर्वज्ञा (गुरुकी अवज्ञा) (4) श्रुति-तदनुयायिशास्त्रनिन्दा (श्रुतियों और उनके अनुगत शास्त्रोंकी निन्दा करना) (5) हरिनाम-महिम्नि अर्थवादमात्रमेतदिति मननम् (हरिनामकी महिमा केवल अर्थवाद है, ऐसा मानना) (6) तत्र प्रकारान्तरेणार्थकल्पनम् (अथवा भगवन्नामोंको काल्पनिक समझना) (7) नामबलेन पापप्रवृत्तिः (नामके बलपर पाप करनेकी प्रवृत्ति) 10 | श्रीचैतन्यचरितामृत

8/24 ] (8) अन्यशुभक्रियाभिर्नाम्नां साम्यमननम् (धर्म, व्रत, त्याग, होमादि प्राकृत शुभ कर्मोंको अप्राकृत भगवन्नामके समान समझना) (9) अश्रद्धाने विमुखे च नामोपदेशः (अश्रद्धालु और नाम-श्रवण करनेसे विमुख मनुष्यको नामका उपदेश देना) (10) श्रुतेऽपि नाम्नां माहात्म्ये तत्राप्रीतिर्हि (नामकी अद्भुत महिमा सुनकर भी शरीरमें 'मैं' और सांसारिक भोग्य वस्तुओंमें 'मेरा' की बुद्धि रखकर श्रीनामोच्चारणमें प्रीति नहीं दिखाना)। (विस्तृत व्याख्या अनुभाष्यमें द्रष्टव्य है)। इन दस अपराधोंके रहनेपर श्रीकृष्ण कृपा नहीं करते। अपराधी व्यक्तिके श्रीकृष्णनामसे वास्तविक सात्त्विक विकारादि नहीं होते ॥24॥ अनुभाष्य—दस नामापराध-सम्बन्धमें मूल श्लोक— (1) “सतां निन्दा नाम्नः परमपराधं वितनुते। यतः ख्यातिं यातं कथमुसहते तद्विगर्हाम्॥ (2) शिवस्य श्रीविष्णोर्य इह गुणनामादि-सकलं। धिया भिन्नं पश्येत् स खलु हरिनामाहितकरः॥ (3) गुरोरवज्ञा (4) श्रुतिशास्त्रनिन्दनं (5) तथार्थवादो (6) हरिनाम्नि कल्पनम्। (7) नाम्नो बलाद् यस्य हि पापबुद्धिर्न विद्यते तस्य यमैर्हि शुद्धिः॥ (8) धर्म-व्रत-त्याग-हुतादि-सर्वशुभक्रिया-साम्यमपि प्रमादः। (9) अश्रद्दधाने विमुखेऽप्य शृण्वति यश्चोपदेशः शिवनामापराधः॥ (10) श्रुतेऽपि नाममाहात्म्ये यः प्रीतिरहितो नरः। अहंममादि परमो नाम्नि सोऽप्यपराधकृत्॥” दस प्रकारके नामापराधोंकी व्याख्या— (1) साधुवर्गकी निन्दा नामके प्रति परम अपराध विस्तार करती है। जिन सब नाम-परायण साधुओंके द्वारा जगत्में श्रीकृष्णनाम प्रसिद्धि लाभ करता है (अर्थात् प्रचारित होता है), श्रीनामप्रभु उन सब साधुओंकी निन्दा कैसे सहन कर सकते हैं? इसलिये साधु-निन्दा नामापराध है। (2) इस संसारमें जो व्यक्ति प्राकृत वस्तुओंकी भाँति मङ्गलमय श्रीविष्णुके नाम, रूप, गुण और लीलादिको नामी श्रीविष्णुसे पृथक् मानते हैं; अथवा शिवादि देवताओंको उनके प्रतिद्वन्द्वीके रूपमें श्रीविष्णुसे स्वतन्त्र या अभिन्न देखते हैं, उनका वह नामके छलसे नामापराध निश्चय ही अहितकर है। (3) नाम-तत्त्वविद् गुरुको मरणशील और पञ्चभौतिक शरीरयुक्त साधारण मनुष्य मानकर उनकी अवज्ञा अथवा उनसे ईर्ष्या करना। (4) वेद और सात्वत-पुराणादिकी निन्दा करना। (5) हरिनामकी महिमाको अति-स्तुति समझना। (6) भगवान्के नामोंको काल्पनिक समझना नामापराध है। (7) जिनकी नामके बलपर पापाचरणमें बुद्धि होती है, उनकी अनेक यम, नियम, ध्यान, धारणादि कृत्रिम योग-प्रक्रियाओंके द्वारा भी शुद्धि नहीं होती—यह निश्चित है। (8) धर्म, व्रत, त्याग, होमादि प्राकृत शुभ कर्मोंके साथ अप्राकृत नाम-ग्रहणको समान या तुल्य समझना भी प्रमाद या असावधानी है—यह भी नामापराध है। (9) श्रद्धाहीन और नाम-श्रवणसे विमुख व्यक्तिको नामका उपदेश देना भी मङ्गलमय श्रीनामके प्रति नामापराध है। (10) नामकी अद्भुत महिमाको सुनकर भी जो [रक्त, मांस और चमड़ेके] शरीरमें 'मैं' और [सांसारिक भोग्य पदार्थोंमें] 'मेरा' की बुद्धि रखते हैं तथा नाम-ग्रहण-श्रवणमें प्रीति अथवा आदर नहीं दिखलाते हैं, वे भी नामापराधी हैं॥24॥ अमृताणुकणिका—यदि कोई हरिनाम करता है और उसने दीक्षा भी ग्रहण की है, परन्तु इन दस प्रकारके भयङ्कर अपराधोंसे बचनेकी चेष्टा नहीं करता है, तो अग्निमें भस्म डालनेके समान उसका भजन नष्ट हो जायेगा। यहाँ कुछ नामापराधोंके कारणोंकी आलोचना आठवाँ अध्याय | 11

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की जा रही है। दस नामापराधोंमें पहला अपराध साधु-निन्दा है। इससे बचनेका बड़ी सावधानीसे प्रयास करना चाहिये। कनिष्ठ वैष्णवसे लेकर उत्तम वैष्णव तक किसीकी भी निन्दा नहीं करनी चाहिये। दूसरा नामापराध शिवजीको विष्णुसे स्वतन्त्र भगवद्-ज्ञान करके उनका नाम करना है। वैष्णव लोग इससे तो थोड़ी सी सावधानीसे बच सकते हैं। तीसरा नाममापराध गुरुकी अवज्ञा है—यहाँ गुरुकी निन्दा नहीं कहा गया है, क्योंकि साधारण व्यक्ति भी गुरुकी निन्दा नहीं करता या उनपर प्रहार नहीं करता, किन्तु गुरुकी अवज्ञा कर सकता है। गुरु अवज्ञाका कारण गुरुमें मर्त्यबुद्धि रखकर ऐसा विचार करना है कि उनके समस्त आदेश पालनीय नहीं हैं, केवल कुछ ही आदेश पालनीय हैं। कुछ शिष्य ऐसा विचार रखते हैं कि गुरुजीने जब गृहस्थ जीवनको तो स्वीकार किया नहीं है, तब उन्हें इस विषयमें क्या ज्ञान हो सकता है? इसलिये गुरुके पारमार्थिक उपदेश तो माननेके योग्य हैं, परन्तु लौकिक सम्बन्धी उपदेश माननेके लिये हम बाध्य नहीं हैं। यह अर्द्ध-कुकुटि न्याय है और महापराध है। कुछ शिष्य यह संशय भी करते हैं कि क्या गुरुजीने सब शास्त्र पढ़े हैं अथवा नहीं? ये भी हमारे समान खाते-पीते-सोते हैं, तो किस विषयमें ये हमसे श्रेष्ठ हैं? केवल हमसे आयुमें बड़े हैं और बुढ़ापेमें तो बुद्धि मन्द हो जाती है। इसलिये गुरुके चरणोंकी अवज्ञाकी बहुत सम्भावना है। पुनः पुनः करनेपर यह अपराध वज्रसार हो जाता है और प्रायश्चित करनेसे भी दूर नहीं होता है। हरिनामकी महिमाको अति-स्तुति समझना पाँचवाँ नामापराध है। शास्त्रोंमें जो नामकी महिमा बतलायी गयी है, उसपर विश्वास नहीं होता। सभी अनर्थोंसे पूर्ण महापापी अजामिलने अपने पुत्रके उद्देश्यसे सङ्केतसे अनजानेमें हरिनाम किया और सभी पापोंसे मुक्त हो गया—यह शास्त्रोंमें नामकी महिमा बहुत कम लिखी गयी है। स्कन्दपुराणमें कहा गया है—

“मधुर-मधुरमेतन्मङ्गलं मङ्गलानां सकलनिगमवल्ली-सत्फलं चित्स्वरूपम्। सकृदपि परिगीतं श्रद्धया हेलया वा भृगुवर नरमात्रं तारयेत् कृष्णनाम॥” “हरिनाम सब प्रकारके मङ्गलोंमें श्रेष्ठ मङ्गल-स्वरूप है, मधुरसे भी सुमधुर है। वह निखिल श्रुति-लताओंका चिन्मय सुपक्वफल है। हे भार्गवश्रेष्ठ! श्रद्धासे हो अथवा अवहेलनासे, मनुष्य यदि स्पष्ट रूपसे एकबार भी निरपराध होकर “कृष्ण” नामका उच्चारण करे, तो वह नाम उसी समय मनुष्यको तार देता है।” इसलिये शास्त्रमें नामकी महिमा जो कुछ बतलायी गयी है, वह थोड़ी बतलायी गयी है, अधिक नहीं। जो ऐसा नहीं समझकर कहते हैं कि नामकी महिमा इतनी नहीं है, परन्तु यदि शुद्धनाम करें तो मुक्ति हो जायेगी अथवा नामाभाससे भी मुक्ति हो जायेगी, वे नामापराधी हैं। एक साँपके मन्त्रको जाननेवालेपर लोगोंको विश्वास हो जाता है, क्योंकि उसका प्रभाव शीघ्र ही दिखायी देता है। परन्तु नामजपका प्रभाव सहज ही दिखायी नहीं देता, इसलिये यह नामापराध होनेकी सम्भावना अधिक है। छठा नामापराध हरिनामको काल्पनिक समझना है। भगवान्‌का रूप ही नहीं है, वे निराकार हैं, तो उनके नाम कृष्ण आदि भी काल्पनिक हैं—ऐसा यदि कोई विचारकर नाम करता है, तो वह नामापराध करता है। प्राकृत शुभ कर्मोंके समान ही नामको मानना आठवाँ नामापराध है और अधिकांश लोग ऐसा ही मानते हैं। वे भूत-पिशाच-तावीज़ आदिमें विश्वास रखते हैं, परन्तु भगवान्‌के नाममें उनका विश्वास नहीं है। वे नहीं जानते हैं कि जहाँ भगवद्-नाम होता है, वहाँ कोसों दूर तक भूत-पिशाच नहीं आ सकते। इसलिये गुरु-पदाश्रय करके इस अपराधसे बचना चाहिये। अन्य नामापराधोंसे तो बच सकते हैं, परन्तु देहात्मबुद्धि रखते हुए नाम करना—इस दसवें नामापराधसे बचना सबसे कठिन है। बद्धजीवमें देहात्मबुद्धि होती है और वह स्वयंको शरीर मानता है। परन्तु श्रीकृष्णने

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गीता-भागवतमें कहा है कि हम शरीर नहीं आत्मा हैं और उसे ही गुरु एवं अन्य शास्त्र भी कह रहे हैं, तो इसमें विश्वास रखना चाहिये। जब माँ जिसे हमारा पिता बतलाती है और हम उसके वचनोंपर विश्वासकर उसे अपना पिता मान लेते हैं, तब भगवान् और गुरुके वचनोंपर विश्वास क्यों नहीं होता? भगवान् और गुरुके वचनोंपर विश्वास करके इन दस प्रकारके नामापराधोंसे बचना चाहिये॥24॥ अपराधीके पाषाण-हृदयमें भाव शुद्ध नहीं, कृत्रिममात्र :- (श्रीमद्भागवत-2/3/24)— तदश्मसारं हृदयं वतेदं, यद्गृह्यमाणैर्हरिनामधेयैः। न विक्रियेताथ यदा विकारो, नेत्रे जलं गात्ररुहेषु हर्षः॥25॥ अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है॥25॥ अमृतप्रवाह भाष्य-हरिनाम ग्रहण करनेपर भी जिनके हृदयमें विकार, नेत्रोंमें अश्रु और शरीरमें रोमाञ्च नहीं होता, उनका हृदय पाषाणके समान अर्थात् कठोर अपराधके द्वारा उनका हृदय कठोर होता है, इसलिये नामग्रहणसे भी वह द्रवीभूत नहीं होता॥25॥ अनुभाष्य-श्रीसूत गोस्वामीके मुखसे श्रीशुक- परीक्षित-संवाद श्रवण करते-करते ऋषियोंके द्वारा और अधिक श्रवण करनेकी अभिलाषा प्रकट करनेपर हरिकथा श्रवणसे विमुख लोगोंकी निन्दाके प्रसङ्गमें श्रीसूत गोस्वामीको सम्बोधित शौनक-वाक्य,— यत् हृदयं गृह्यमाणैः (कीर्त्त्यमानैरपि) हरिनामधेयैः न विक्रियेत, बत (अहो!) तत् इदं हृदयं अश्मसारं (नामापराधवशात् अश्मवत् पाषाणखण्डतुल्यः सारो यस्य तत्, कठिनमेव)। अथ यदा विकारो भवति, [तदा] नेत्रे जलं (अश्रु) गात्ररुहेषु हर्षः (रोमाञ्चः) भवति। (अतिगम्भीराणां महाभागवतानां हरिनामभिः चित्तद्रवेऽपि बहिरश्रुपुलकादीनाम् अदर्शनात् कृत्रिमाभ्यासानुकार पराणां पिच्छिलचित्तानां जड़ीय-प्रतिष्ठाभिलाषिणां सत्त्वाभासाद्भावेऽपि बहिः कपटाश्रुपुलकदयो दृश्यन्ते। अतएव बहुनामग्रहणेऽपि कनिष्ठाधिकारिणां विषयभोगप्रवणत्वात् कृत्रिमचित्तद्रवभावो नामापराध-लिङ्गमेवेति सन्दर्भः)। श्लोक भावानुवाद—(नामापराधके कारण) जिस हृदयमें हरिनाम लेनेपर भी विकार नहीं होता, वह पाषाणके समान कठोर ही है। हृदय जब पिघल जाता है, तब नेत्रोंसे अश्रुधारा बहती है और रोमावली आनन्दसे पुलकित होती है। (अति गम्भीर महाभागवतोंमें हरिनाम ग्रहण करनेसे चित्त द्रवित होनेपर भी बाहर अश्रु-पुलकादि नहीं दिखायी देते। कृत्रिम अभ्यास करके उनका अनुकरण करनेवाले कठोर हृदयवाले व्यक्तियोंमें सत्त्वाभास न होनेपर भी केवल जड़-प्रतिष्ठाके लिये बाहर कपट अश्रु-पुलकादि दिखलायी देते हैं। इसलिये बहुत नाम करनेपर भी कनिष्ठ अधिकारीके द्वारा विषय भोगोंमें लिप्त होनेके कारण चित्तके द्रवित होनेके कृत्रिम विकार प्रदर्शन करना नामापराध ही है)। श्रीमद्भागवतके इस श्लोकके गौड़ीय भाष्यमें श्रील विश्वनाथ चक्रवर्तीकी टीका, तथ्य और विवृति द्रष्टव्य है॥25॥ अमृतानुकणिका—शौनक ऋषि हरिकथा श्रवण-कीर्तन और हरिसेवाकी श्रेष्ठता प्रतिपादनके प्रसङ्गमें हरिभजनहीन व्यक्तियोंके बाह्य अङ्गसमूहकी निन्दा करके अब उनके अन्तःकरणकी भी निन्दा कर रहे हैं। अनर्थमुक्त पुरुषको नाम ग्रहणमात्रसे ही नाम माधुर्य अनुभव होता है, इसलिये नाम-माधुर्य अनुभवके साथ-साथ हृदयमें विकार और उसके भीतरी लक्षण क्षान्ति आदि तथा बाह्य लक्षण अश्रु-पुलकादि प्रकाशित होते हैं। अनेक बार हरिनाम ग्रहण करनेपर भी यदि किसीका हृदय द्रवीभूत नहीं होता, तब निश्चय ही वह व्यक्ति नामापराधी है। सर्वशक्तिमान् नाम देह-गृह-परिवार-लोभ आदिमें आसक्त पाषाण-सम चित्तमें शीघ्र फलजनक नहीं होते। इन सब प्रतिबन्धकोंके द्वारा हृदय विकार निरस्त हो जाते हैं। सामान्यमात्र प्रतिबन्धक रहनेपर उच्चारित नाम नामाभास होता है। किन्तु बृहत् प्रतिबन्धक रहनेपर उच्चारित नामाक्षर नामापराध मात्र है। नामापराधीका हृदय लोहेके

आठवाँ अध्याय | 13

[ 8/25-28 समान कठोर है, इसलिये हरिनाम श्रवण-कीर्तन करनेपर भी वह द्रवीभूत नहीं होता। यद्यपि हरिनामसे चित्तद्रवताके बाह्य लक्षण अश्रु-पुलक हैं, तथापि ये अश्रु-पुलक सब समय चित्तद्रवताके लक्षण हैं, ऐसा नहीं कहा जा सकता। श्रीरूप गोस्वामीने कहा है कि कुछ लोग ऐसे भावुक होते हैं कि उनकी आँखोंमें सहज ही अश्रु आ जाते हैं। वे सामान्य थोड़ासा सुख या दुःखका कारण उपस्थित होनेपर अधीर हो जाते हैं और उनके नेत्रोंसे अश्रु बहने लगते हैं। इस प्रकारके अश्रु बहना उनका हृदय-दौर्बल्यके अतिरिक्त और कुछ नहीं है। कोई-कोई अन्य भावुक व्यक्ति प्रतिष्ठा पानेके लोभसे कृत्रिम अभ्यासके द्वारा अश्रु-पुलक दिखलाते हैं। इसलिये अश्रु-पुलक ही सदा भावावस्थाके लक्षण हैं, ऐसा नहीं कहा जा सकता। अधिकतर देखा जाता है कि अति गम्भीर महानुभाव भक्तका चित्त कीर्तनादिके द्वारा द्रवीभूत होनेपर भी उनमें बाहरसे अश्रु-पुलकादि प्रकाशित नहीं होते। इसलिये बाहरसे अश्रु-पुलकादि होनेपर भी जो हृदय विगलित नहीं होता, वही पाषाणके समान कठोर है—यही अश्मसार-शब्दका अर्थ है। श्रीरूप गोस्वामीने भक्तिरसामृतसिन्धुमें कहा है कि जिनके हृदयमें भावका अङ्कुरमात्र भी उदित हुआ है, उन सभी पुरुषोंमें जो लक्षण देखे जाते हैं, वे इस प्रकार हैं— भक्तिभावके द्वारा हृदय द्रवित होनेपर बहिर्क्रियाके स्वरूप अश्रु-पुलकादि उदित होनेपर उसे सात्त्विक विकार कहते हैं। हृदय विकारका ऐसा साधारण लक्षण होनेपर भी कुछ असाधारण लक्षण भी हैं—क्षान्ति, अव्यर्थकालत्व, विरक्ति, मानशून्यता, आशाबन्ध, समुत्कण्ठा, नामगानमें सदा रुचि, भगवत्-गुणकीर्त्तनमें आसक्ति और वृन्दावनदि भगवत्-धामोंमें वास करनेमें प्रीति— भावभक्तिके ये नौ यथार्थ लक्षण हैं। निरपराधी भक्तजन नामसङ्कीर्त्तन करनेसे ही अपने हृदयमें नामका प्रभाव अनुभव करते हैं और नामके आस्वादनमें विभोर हो जाते हैं। उस अनुभवके कार्यस्वरूप हृदय द्रवित हो जाता है, जिससे उक्त लक्षण प्रकटित होते हैं। किन्तु जो अपराधी, परश्रीकातर (दूसरोंके सम्पन्न होनेपर ईर्ष्यालु) होते हैं, बहुत नाम करनेपर भी नामकी अप्रसन्नतासे उनका चित्त भक्तिभावसे द्रवित नहीं होता। बाहरसे अश्रु-पुलकादि देखे जानेपर भी हृदय लोहेके समान कठिन होनेके कारण, इस श्लोकमें उनकी निन्दा की गयी है। साधुसङ्गके प्रभावसे निरन्तर नाम ग्रहण करनेसे चित्त द्रवित होनेपर उनके हृदयका काठिन्य दूर हो सकता है॥25॥ स्वप्रकाश नामप्रभुका जिह्वापर उदित होकर श्रीकृष्णप्रेम-प्रदान :- एक ‘कृष्णनामे’ करे सर्वपाप नाश। प्रेमेर कारण भक्ति करेन प्रकाश॥26॥ अनुवाद—एक (अपराधरहित) श्रीकृष्णनाम सभी पापोंका नाश करके प्रेम उत्पन्न करानेवाली (साधन) भक्तिको प्रकाशित करता है॥26॥ अमृतप्रवाह भाष्य—प्रेमको उदय करानेवाली जो साधनभक्ति है, उसे प्रकाशित करता है॥26॥ शुद्धनामका फल श्रीकृष्णप्रेमके लक्षण :- प्रेमेर उदये हय प्रेमेर विकार। स्वेद-कम्प-पुलकादि गद्गदाश्रुधार॥27॥ अनायासे भवक्षय, कृष्णेर सेवन। एक कृष्णनामेर फले पाइ एत धन॥28॥ अनुवाद—(साधकमें) प्रेम उदय होनेसे शरीरमें स्वेद (पसीना), कम्प और पुलकादि, गला रुद्ध होना तथा नेत्रोंसे अश्रुधारा प्रवाहित होना—ये प्रेमके विकार उत्पन्न होते हैं। अनायास ही उसका भवबन्धन कट जाता है और उसे श्रीकृष्ण-सेवाकी प्राप्ति होती है। एक श्रीकृष्णनामसे उसे इतनी विशाल धनराशिकी प्राप्ति होती है॥27-28॥ अमृतानुकणिका—कृष्ण सम्बन्धी किसी भावके द्वारा जब चित्त साक्षात् रूपमें अथवा कुछ व्यवधानके साथ 14 | श्रीचैतन्यचरितामृत