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श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)

Sri Ramakrishna Vachanamrita (Part 1 - Tr. Nirala)

श्री 'म' (महेंद्रनाथ गुप्त) / सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा

DevanagariHindipublished711 पृष्ठ

२१ जुलाई, १८८३ | परिच्छेद ४६ | २६७

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“हे ईश्वर, तुम कर्ता हो, मैं अकर्ता' – यही ज्ञान है। 'हे ईश्वर, सब कुछ तुम्हारा है; देह, मन, घर, परिवार, जीव, जगत् – यह सब तुम्हारा ही है, मेरा कुछ नहीं' – इसी का नाम ज्ञान है।

“जो अज्ञानी है, वही कहता है कि ईश्वर 'वहाँ' – बहुत दूर हैं। जो ज्ञानी है, वह जानता है कि ईश्वर 'यहाँ' – अत्यन्त निकट, हृदय के बीच अन्तर्यामी के रूप में विराजमान हैं, फिर उन्होंने स्वयं भिन्न भिन्न रूप भी धारण किये हैं।”

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परिच्छेद ४७

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परिच्छेद ४७

ब्रह्मतत्त्व तथा आद्याशक्ति

(१)

पण्डित पद्मलोचन। विद्यासागर

आषाढ़ की कृष्णा तृतीया तिथि है, २२ जुलाई १८८३ ई.। आज रविवार है। भक्त लोग अवसर पाकर श्रीरामकृष्ण के दर्शन के लिए फिर आए हैं। अधर, राखाल और मास्टर कलकत्ते से एक गाड़ी पर दिन के एक-दो बजे दक्षिणेश्वर पहुँचे। श्रीरामकृष्ण भोजन के बाद थोड़ी देर आराम कर चुके हैं। कमरे में मणि मल्लिक आदि भक्त भी बैठे हैं।

श्रीरामकृष्ण अपने छोटे तख्त पर उत्तर की ओर मुँह किए बैठे हैं। भक्त लोग जमीन पर – कोई चटाई और कोई आसन पर – बैठे हैं। सभी महापुरुष की आनन्दमूर्ति को एकटक देख रहे हैं। कमरे के पास ही, पश्चिम की ओर गंगाजी दक्षिणवाहिनी होकर बही जा रही हैं। वर्षा-ऋतु के कारण स्रोत बड़ा प्रबल है, मानो गंगाजी सागर-संगम पर पहुँचने के लिए बड़ी व्यग्र हों, केवल राह में क्षण भर के लिए महापुरुष के ध्यान-मन्दिर के दर्शन और स्पर्श करती हुई जा रही हैं।

श्री मणि मल्लिक पुराने ब्राह्मभक्त हैं। उनकी उम्र साठ-पैंसठ वर्ष की है। कुछ दिन हुए वे काशीजी गए थे। आज श्रीरामकृष्ण से मिलने आए हैं और उनसे काशी-दर्शन का वर्णन कर रहे हैं।

मणि मल्लिक – एक और साधु को देखा। वे कहते हैं कि इन्द्रिय-संयम के बिना कुछ नहीं होगा। सिर्फ ईश्वर की रट लगाने से क्या होगा?

श्रीरामकृष्ण – इन लोगों का मत यह है कि पहले साधना चाहिए – शम, दम, तितिक्षा चाहिए। ये निर्वाण के लिए चेष्टा कर रहे हैं। ये वेदान्ती हैं, सदैव विचार करते हैं, 'ब्रह्म सत्य है और जगत् मिथ्या' बड़ा कठिन मार्ग है। यदि जगत् मिथ्या हुआ तो तुम भी मिथ्या हुए जो कह रहे हैं वे स्वयं मिथ्या हैं, उनकी बातें भी स्वप्नवत् हैं। बड़ी दूर की बात है।

"यह कैसा है जानते हो? जैसे कपूर जलाने पर कुछ भी शेष नहीं रहता, लकड़ी

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२२ जुलाई, १८८३ | परिच्छेद ४७ | २६९

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जलाने पर राख तो बाकी रह जाती है। अन्तिम विचार के बाद समाधि होती है। तब 'मैं' 'तुम' 'जगत्' इन सब का कोई पता ही नहीं रहता।

"पद्मलोचन बड़ा ज्ञानी था, परन्तु मैं 'माँ माँ' कहकर प्रार्थना करता था, तो भी मुझे खूब मानता था, वह बर्दवानराज का सभापण्डित था। कलकत्ते में आया था – कामारहाटी के पास एक बाग में रहता था। पण्डित को देखने की मेरी इच्छा हुई। मैंने हृदय को यह जानने के लिए भेजा कि पण्डित को अभिमान है या नहीं। सुना कि अभिमान नहीं है। मुझसे उसकी भेंट हुई। वह तो इतना ज्ञानी और पण्डित था, परन्तु मेरे मुँह से रामप्रसाद के गाने सुनकर रो पड़ा! बातें करके ऐसा सुख मुझे कहीं और नहीं मिला उसने मुझसे कहा, 'भक्तों का संग करने की कामना त्याग दो, नहीं तो तरह तरह के लोग हैं, वे तुमको गिरा देंगे'। वैष्णवचरण के गुरु उत्सवानन्द से उसने पत्र-व्यवहार करके विचार किया था, मुझसे कहा, 'आप भी जरा सुनिये'। एक सभा में विचार हुआ था – शिव बड़े हैं या ब्रह्मा। अन्त में पण्डितों ने पद्मलोचन से पूछा। पद्मलोचन ऐसा सरल था कि उसने कहा, 'मेरे चौदह पुरखों में से किसी ने न तो शिव को देखा और न ब्रह्मा को ही'। 'कामिनी-कांचन का त्याग' सुनकर एक दिन उसने मुझसे कहा, 'उन सब का त्याग क्यों कर रहे हो? यह रुपया है, वह मिट्टी है, – यह भेदबुद्धि तो अज्ञान से पैदा होती है' मैं क्या कह सकता था, बोला, 'क्या मालूम, पर मुझे रुपया-पैसा आदि रुचता ही नहीं।'

विद्यासागर की दया। भीतर सोना छिपा है।

"एक पण्डित को बड़ा अभिमान था। वह ईश्वर का रूप नहीं मानता था। परन्तु ईश्वर का कार्य कौन समझे? वे आद्याशक्ति के रूप में उसके सामने प्रकट हुए। पण्डित बड़ी देर तक बेहोश रहा। जरा होश सम्हालने पर लगातार 'का, का, का' (अर्थात्, काली) की रट लगाता रहा।

भक्त – महाराज, आपने विद्यासागर को देखा है? कैसा देखा?

श्रीरामकृष्ण – विद्यासागर के पाण्डित्य है, दया है, परन्तु अन्तर्दृष्टि नहीं है। भीतर सोना दबा पड़ा है, यदि इसकी खबर उसे होती तो इतना बाहरी काम जो वह कर रहा है, वह सब घट जाता और अन्त में एकदम त्याग हो जाता। भीतर, हृदय में ईश्वर हैं यह बात जानने पर उन्हीं के ध्यान और चिन्तन में मन लग जाता। किसी किसी को बहुत दिन तक निष्काम कर्म करते करते अन्त में वैराग्य होता हैं और मन उधर मुड़ जाता है – ईश्वर से लग जाता है।

"जैसा काम ईश्वर विद्यासागर कर रहा है वह बहुत अच्छा है। दया बहुत अच्छी है। दया और माया में बड़ा अन्तर है। दया अच्छी है, माया अच्छी नहीं। माया का अर्थ है आत्मीयों से प्रेम – अपनी स्त्री, पुत्र, भाई, बहन, भतीजा, भानजा, माँ, बाप इन्हीं से

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२७० श्रीरामकृष्णवचनामृत २२ जुलाई, १८८३

प्रेम। दया अर्थात् सब प्राणियों से समान प्रेम'।'

(२)

ब्रह्म त्रिगुणातीत है। 'मुँह से नहीं बताया जा सकता'।

मास्टर – क्या दया भी एक बन्धन है ?

श्रीरामकृष्ण – वह तो बहुत दूर की बात ठहरी। दया सतोगुण से होती है। सतोगुण से पालन, रजोगुण से सृष्टि और तमोगुण से संहार होता है, परन्तु ब्रह्म सत्त्व, रज, तम इन तीनों गुणों से परे है – प्रकृति से परे है।

“जहाँ यथार्थ तत्त्व है वहाँ तक गुणों की पहुँच नहीं। जैसे चोर-डाकू किसी ठीक जगह पर नहीं जा सकते; वे डरते हैं कि कहीं पकड़े न जायें। सत्व, रज, तम ये तीनों गुण डाकू हैं। एक कहानी सुनाता हूँ, सुनो –

“एक आदमी जंगल की राह से जा रहा था कि तीन डाकुओं ने उसे पकड़ा। उन्होंने उसका सब कुछ छीन लिया। एक डाकू ने कहा, 'अब इसे जीवित रखने से क्या लाभ?' यह कहकर वह तलवार से उसे काटने आया। तब दूसरे डाकू ने कहा, 'नहीं जी, काटने से क्या होगा? इसके हाथ-पैर बाँधकर यहीं छोड़ दो'। वैसा करके डाकू उसे वहीं छोड़कर चले गये। थोड़ी देर बाद उनमें से एक लौट आया और बोला, 'ओह! तुम्हें चोट लगी? आओ, मैं तुम्हारा बन्धन खोल देता हूँ' उसे मुक्त कर डाकू ने कहा, 'आओ मेरे साथ, तुम्हें सड़क पर पहुँचा दूँ' बड़ी देर में सड़क पर पहुँचकर उसने कहा, 'इस रास्ते से चले जाओ, वह तुम्हारा मकान दिखता है'। तब उस आदमी ने डाकू से कहा, 'भाई, आपने बड़ा उपकार किया; अब आप भी चलिये मेरे मकान तक; आइये' डाकू ने कहा, 'नहीं मैं वहाँ नहीं आ सकता; पुलिस को खबर लग जाएगी'

“यह संसार ही जंगल है। इसमें सत्त्व, रज, तम ये तीन डाकू रहते हैं – ये जीवों का तत्त्वज्ञान छीन लेते हैं। तमोगुण मारना चाहता है; रजोगुण संसार में फँसाता है; पर सतोगुण रज और तम से बचाता है। सत्त्वगुण का आश्रय मिलने पर काम, क्रोध आदि तमोगुण से रक्षा होती है। फिर सतोगुण जीवों का संसारबन्धन तोड़ देता है। पर सतोगुण भी डाकू है – वह तत्त्वज्ञान नहीं दे सकता। हाँ, वह जीव को उस परमधाम में जाने की राह तक पहुँचा देता है और कहता है, 'वह देखो, तुम्हारा मकान वह दीख रहा है!' जहाँ ब्रह्मज्ञान है, वहाँ से सतोगुण भी बहुत दूर है।

“ब्रह्म क्या है, यह मुँह से नहीं बताया जा सकता। जिसे उसका ज्ञान होता है वह फिर खबर नहीं दे सकता। लोग कहते हैं कि कालेपानी में जाने पर जहाज फिर नहीं लौटता।

“चार मित्रों ने घूमते-फिरते हुए ऊँची दीवार से घिरी एक जगह देखी। भीतर क्या


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है यह देखने के लिए सभी बहुत ललचाये। एक दीवार पर चढ़ गया। झाँककर उसने जो देखा तो दंग रह गया, और ‘हा हा हा’ करते हुए भीतर कूद पड़ा। फिर कोई खबर नहीं दी। इस तरह जो चढ़ा वही ‘हा हा हा’ करते हुए कूद गया! फिर खबर कौन दे?

“जड़भरत, दत्तात्रेय – ये ब्रह्मदर्शन के बाद फिर खबर नहीं दे सके। ब्रह्मज्ञान के उपरान्त, समाधि होने से फिर ‘अहं’ नहीं रहता। इसीलिए रामप्रसाद ने कहा है, ‘यदि अकेले सम्भव न हो तो मन, रामप्रसाद को साथ ले।’ मन का लय होना चाहिए, फिर ‘रामप्रसाद’ का अर्थात् अहं-तत्त्व का भी, लय होना चाहिए। तब कहीं वह ब्रह्मज्ञान मिल सकता है।”

एक भक्त – महाराज, क्या शुकदेव को ज्ञान नहीं हुआ था?

श्रीरामकृष्ण – कितने कहते हैं कि शुकदेव ने ब्रह्मसमुद्र को देखा और छुआ भर था, उसमें पैठकर गोता नहीं लगाया। इसीलिए लौटकर उतना उपदेश दे सके। कोई कहता है, ब्रह्मज्ञान के बाद वे लौट आए थे – लोकशिक्षा देने के लिए। परीक्षित् को भागवत सुनाना था और कितनी ही लोकशिक्षा देनी थी – इसीलिए ईश्वर ने उनके सम्पूर्ण अहं-तत्त्व का लय नहीं किया। एकमात्र ‘विद्या का अहं’ रख छोड़ा था।

केशव को शिक्षा – ‘दल (साम्प्रदायिकता) अच्छा नहीं’

एक भक्त – क्या ब्रह्मज्ञान होने के बाद सम्प्रदाय आदि चलाया जा सकता है?

श्रीरामकृष्ण – केशव सेन से ब्रह्मज्ञान की चर्चा हो रही थी। केशव ने कहा, आगे कहिए। मैंने कहा, और आगे कहने से सम्प्रदाय आदि नहीं रहेगा। इस पर केशव ने कहा, तो फिर रहने दीजिए। (सब हँसे।) तो भी मैंने कहा, ‘मैं’ और ‘मेरा’ यह कहना अज्ञान है। ‘मैं कर्ता हूँ, यह स्त्री, पुत्र, सम्पत्ति, मान, प्रतिष्ठा – यह सब मेरा है’ यह विचार बिना अज्ञान के नहीं होता। तब केशव ने कहा, महाराज, ‘अहं’ को त्याग देने से तो फिर कुछ रहता ही नहीं। मैंने कहा, केशव, मैं तुमसे पूरा ‘अहं’ त्यागने को नही कहता हूँ, तुम ‘कच्चा अहं’ छोड़ दो। ‘मैं कर्ता हूँ’, ‘यह स्त्री और पुत्र मेरा है’, ‘मैं गुरु हूँ’ – इस तरह का अभिमान ‘कच्चा अहं’ है – इसी को छोड़ दो। इसे छोड़कर ‘पक्का अहं’ बनाए रखो। ‘मैं ईश्वर का दास हूँ, उनका भक्त हूँ; मैं अकर्ता हूँ और वे ही कर्ता हैं’ – ऐसा सोचते रहो।

एक भक्त – क्या ‘पक्का अहं’ सम्प्रदाय बना सकता है?

श्रीरामकृष्ण – मैंने केशव सेन से कहा, ‘मैं सम्प्रदाय का नेता हूँ, मैंने सम्प्रदाय बनाया है, मैं लोगों को शिक्षा दे रहा हूँ’ – इस तरह का अभिमान ‘कच्चा अहं’ है। किसी मत का प्रचार करना बड़ा कठिन काम है। वह ईश्वर की आज्ञा बिना नहीं हो सकता। ईश्वर का आदेश होना चाहिए। शुकदेव को भागवत की कथा सुनाने के लिए आदेश मिला था।

२७२ श्री श्रीरामकृष्णवचनामृत २२ जुलाई, १८८३

यदि ईश्वर का साक्षात्कार होने के बाद किसी को आदेश मिले और तब यदि वह प्रचार का बीड़ा उठाए – लोगों को शिक्षा दे, तो कोई हानि नहीं। उसका अहं 'कच्चा अहं' नहीं, 'पक्का अहं' है।

“मैंने केशव से कहा था, 'कच्चा अहं' छोड़ दो। 'दास अहं' 'भक्त का अहं' – इसमें कोई दोष नहीं। तुम सम्प्रदाय की चिन्ता कर रहे हो, पर तुम्हारे सम्प्रदाय से लोग अलग होते जा रहे हैं। केशव ने कहा, महाराज, तीन वर्ष हमारे सम्प्रदाय में रहकर फिर दूसरे सम्प्रदाय में चला गया और जाते समय उलटे गालियाँ दे गया। मैंने कहा, तुम लक्षणों का विचार क्यों नहीं करते? क्या चाहे जिसको चेला बना लेने से ही काम हो जाता है!

“केशव से मैंने और भी कहा था कि तुम आद्याशक्ति को मानो। ब्रह्म और शक्ति अभिन्न हैं – जो ब्रह्म हैं वे ही शक्ति हैं। जब तक 'मैं देह हूँ' यह बोध रहता है, तब तक दो अलग अलग प्रतीत होते हैं। कहने के समय दो आ ही जाते हैं। केशव ने काली (शक्ति) को मान लिया था।

“एक दिन केशव अपने शिष्यों के साथ आया। मैंने कहा, मैं तुम्हारा लेक्चर सुनूँगा। उसने चाँदनी में बैठकर लेक्चर दिया। फिर घांट पर आकर बहुत-कुछ बातचीत की। मैंने कहा, जो भगवान् हैं वे ही दूसरे रूप में भक्त हैं, फिर वे ही एक दूसरे रूप में भागवत हैं। तुम लोग कहो, भागवत-भक्त-भगवान्। केशव ने और साथ ही भक्तों ने भी कहा, भागवत-भक्त-भगवान्। फिर जब मैंने कहा, कहो, गुरु-कृष्ण-वैष्णव, तब केशव ने कहा, महाराज, अभी इतनी दूर बढ़ना ठीक नहीं। लोग मुझे कट्टर कहेंगे।

माया का खेल देख श्रीरामकृष्ण की मूर्च्छा

“त्रिगुणातीत होना बड़ा कठिन है। ईश्वरलाभ किए बिना वह सम्भव नहीं। जीव माया के राज्य में रहता है। यही माया ईश्वर को जानने नहीं देती। इसी माया ने मनुष्य को अज्ञानी बना रखा है। हृदय एक बछड़ा लाया था। एक दिन मैंने देखा कि उसे उसने बाग में बाँध दिया है, चारा चुगाने के लिए। मैंने पूछा, 'हृदय, तू रोज उसे वहाँ क्यों बाँध रखता है?' हृदय ने कहा, 'मामा, बछड़े को घर भेजूँगा। बड़ा होने पर वह हल में जोता जाएगा।' ज्योंही उसने यह कहा, मैं मूर्च्छित हो गिर पड़ा। सोचा, कैसा माया का खेल है! कहाँ तो कामारपुकुर सिहोड़ और कहाँ कलकत्ता! यह बछड़ा उतना रास्ता चलकर जाएगा, वहाँ बढ़ता रहेगा, फिर कितने दिन बाद हल खींचेगा! इसी का नाम संसार है – इसी का माया है।”

“बड़ी देर बाद मेरी मूर्च्छा टूटी थी।”

२२ जुलाई, १८८३ | परिच्छेद ४७ | २७३

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(३)

समाधि में

श्रीरामकृष्ण प्रायः रातदिन समाधिस्थ रहते हैं – उनका बाहरी ज्ञान नहीं के बराबर होता है, केवल बीच बीच में भक्तों के साथ ईश्वरीय प्रसंग और संकीर्तन करते हैं। करीब तीन-चार बजे मास्टर ने देखा कि वे अपने छोटे तख्त पर बैठे हैं – भावाविष्ट हैं। थोड़ी देर बाद जगन्माता से बातें करते हैं।

माता से वार्तालाप करते हुए एक बार उन्होंने कहा, “माँ, उसे एक कला भर शक्ति क्यों दी?” थोड़ी देर चुप रहने के बाद फिर कहते हैं, “माँ, समझ गया, एक कला ही पर्याप्त होगी। उसी से तेरा काम हो जाएगा – जीवशिक्षण होगा।”

क्या श्रीरामकृष्ण इसी तरह अपने अन्तरंग भक्तों में शक्तिसंचार कर रहे हैं? क्या यह सब तैयारी इसीलिए हो रही है कि आगे चलकर वे जीवों को शिक्षा देंगे?

मास्टर के अलावा कमरे में राखाल भी बैठे हुए हैं। श्रीरामकृष्ण अब भी भावमग्न हैं, राखाल से कहते हैं, “तू नाराज हो गया था? मैंने तुझे क्यों नाराज किया, इसका कारण है; दवा अपना ठीक असर करेगी समझकर। पेट में तिल्ली अधिक बढ़ जाने पर मदार के पत्ते आदि लगाने पड़ते हैं।”

कुछ देर बाद कहते हैं, “हाजरा को देखा, शुष्क काष्ठवत् है। तब यहाँ रहता क्यों है? इसका कारण है, जटिला कुटिला* के रहने से लीला की पुष्टि होती है।

(मास्टर के प्रति) “ईश्वर का रूप मानना पड़ता है। जगद्धात्री रूप का अर्थ जानते हो? जिन्होंने जगत् को धारण कर रखा है – उनके धारण न करने से, उनके पालन न करने से जगत् नष्टभ्रष्ट हो जाय। मनरूपी हाथी को जो वश में कर सकता है, उसी के हृदय में जगद्धात्री उदित होती हैं।”

राखाल – मन मतवाला हाथी है।

श्रीरामकृष्ण – सिंहवाहिनी का सिंह इसीलिए हाथी को दबाये हुए है।

सन्ध्यासमय मन्दिर में आरती हो रही है। श्रीरामकृष्ण भी अपने कमरे में ईश्वर का नाम ले रहे हैं। कमरे में धूनी दी गयी। श्रीरामकृष्ण हाथ जोड़कर छोटे तख्त पर बैठे हैं – माता का चिन्तन कर रहे हैं। बेलघरिया के गोविन्द मुकर्जी और उनके कुछ मित्रों ने आकर उनको प्रणाम किया और जमीन पर बैठे। मास्टर और राखाल भी बैठे हैं।

बाहर चाँद निकला हुआ है। जगत् चुपचाप हँस रहा है। कमरे के भीतर सब लोग


* श्रीराधा की सास और ननद – आयान घोष की माता और बहन।

२७४श्रीरामकृष्णवचनामृत२२ जुलाई, १८८३

चुपचाप बैठे श्रीरामकृष्ण की शान्त मूर्ति देख रहे हैं। आप भावमग्न हैं। कुछ देर बाद बातें की। अब भी भावाविष्ट हैं।

श्यामारूप। उत्तम भक्त। विचारपथ

श्रीरामकृष्ण (भावमग्न) - तुम लोगों को कोई शंका हो तो पूछो। मैं समाधान करता हूँ।

गोविन्द तथा अन्यान्य भक्त लोग सोचने लगे।

गोविन्द - महाराज, श्यामारूप क्यों हुआ?

श्रीरामकृष्ण - वह तो सिर्फ दूर से वैसा दिखता है। पास जाने पर कोई रंग ही नहीं! तालाब का पानी दूर से काला दिखता है। पास जाकर हाथ से उठाकर देखो, कोई रंग नहीं। आकाश दूर से नीले रंग का दिखता है। पास के आकाश को देखो, कोई रंग नहीं। ईश्वर के जितने ही समीप जाओगे उतनी ही धारणा होगी कि उनके नाम-रूप नहीं। कुछ दूर हट आने से फिर वही 'मेरी श्यामा माता'। जैसे घासफूल का रंग।

"‘श्यामा पुरुष है या प्रकृति? किसी भक्त ने पूजा की थी। कोई दर्शन करने आया तो उनसे देवी के गले में जनेऊ देखकर कहा, ‘तुमने माता के गले में जनेऊ पहनाया है!’ भक्त ने कहा, ‘भाई, तुम्हीं ने माता को पहचाना है। मैं अब तक नहीं पहचान सका कि वे पुरुष है या प्रकृति! इसीलिए जनेऊ पहना दिया था।’

"‘जो श्यामा हैं वे ही ब्रह्म हैं। जिनका रूप है वे ही रूपहीन भी हैं। जो सगुण हैं वे ही निर्गुण हैं। ब्रह्म ही शक्ति है और शक्ति ही ब्रह्म। दोनों में कोई भेद नहीं। एक सच्चिदानन्दमय है और दूसरी सच्चिदानन्दमयी।’"

गोविन्द - योगमाया क्यों कहते हैं?

श्रीरामकृष्ण - योगमाया अर्थात् पुरुष-प्रकृति का योग। जो कुछ देखते हो वह सब पुरुष-प्रकृति का योग है। शिव-काली की मूर्ति में शिव के ऊपर काली खड़ी हैं। शिव शव की भाँति पड़े हैं, काली शिव की ओर देख रही हैं, - यह सब पुरुष-प्रकृति का योग है। पुरुष निष्क्रिय है, इसीलिए शिव शव हो रहे हैं। पुरुष के योग से प्रकृति सब काम करती है - सृष्टि, स्थिति, प्रलय करती है।

"राधाकृष्ण की युगलमूर्ति का भी यही अभिप्राय है। इसी योग के लिए वक्रभाव है। और यही योग दिखाने के लिए श्रीकृष्ण की नाक में मुक्ता और श्रीमती की नाक में नीलम है। श्रीमती का रंग गोरा, मुक्ता जैसा उज्ज्वल है। श्रीकृष्ण का रंग साँवला है, इसीलिए श्रीमती नीलम धारण करती है। फिर श्रीकृष्ण के वस्त्र पीले और श्रीमती के नीले हैं।

२२ जुलाई, १८८३ | परिच्छेद ४७ | २७५

२२ जुलाई, १८८३ | परिच्छेद ४७ | २७५

“उत्तम भक्त कौन है? जो ब्रह्मज्ञान के बाद देखता है कि ईश्वर ही जीव, जगत् और चौबीस तत्त्व हुए हैं। पहले ‘नेति नेति’ (यह नहीं, यह नहीं) करके विचार करते हुए छत पर पहुँचना पडता है। फिर वही आदमी देखता है कि छत जिन चीजों - ईंट, चूने और सुरखी - से बनी है, सीढ़ी भी उन्हीं से बनी है। तब वह देखता है कि ब्रह्म ही जीव, जगत और सब कुछ है।

“केवल शुष्क विचार! मैं उस पर थूकता हूँ। (आप जमीन पर थूकते हैं।)

“क्यों विचार कर शुष्क बना रहूँगा! जब तक ‘मैं’ और ‘तुम’ है, तब तक प्रार्थना है कि ईश्वर के चरणकमलों में शुद्धा भक्ति बनी रहे।

(गोविन्द से) “कभी कहता हूँ, तुम्हीं ‘मैं’ हो और ‘मैं’ ही ‘तुम’ हूँ। फिर कभी ‘तुम्हीं तुम हो’ - ऐसा हो जाता है! इस समय अपने अहं को ढूँढ़ नहीं पाता।

“शक्ति का ही अवतार होता है। एक मत से राम और कृष्ण चिदानन्द समुद्र की दो लहरें हैं।

“अद्वैतज्ञान के बाद चैतन्य होता है। तब मनुष्य देखता है कि ईश्वर ही सब प्राणियों में चैतन्य रूप से विद्यमान हैं। चैतन्यलाभ के बाद आनन्द होता है - ‘अद्वैत-चैतन्य-नित्यानन्द’।*

(मास्टर से) “और तुमसे कहता हूँ - ईश्वर के रूप पर अविश्वास मत करना। यह विश्वास करना कि ईश्वर के रूप हैं, फिर जो रूप तुम्हें पसन्द हो उसी का ध्यान करना।

(गोविन्द से) “बात यह है कि जब तक भोग-वासना बनी रहती है, तब तक ईश्वर को जानने या उनके दर्शन करने के लिए प्राण व्याकुल नहीं होते। बच्चा खेल में मग्न रहता है। मिठाई देकर बहलाओ तो थोड़ीसी खा लेगा। जब उसे न खेल अच्छा लगता है न मिठाई, तब वह कहता है, ‘माँ के पास जाऊँगा।’ फिर वह मिठाई नहीं चाहता। अगर कोई आदमी, जिसे उसने न कभी देखा है और न पहचानता है, आकर कहे, ‘आ, तुझे माँ के पास ले चलूँ’, तो वह उसके साथ चला जाएगा। जो कोई उसे गोद में बिठाकर ले जायगा, वह उसी के साथ जाएगा।

“संसार के भोग समाप्त हो जाने के बाद ईश्वर के लिए प्राण व्याकुल होते हैं। उस समय केवल एक चिन्ता रहती है कि किस तरह उन्हें पाऊँ। उस समय जो जैसा बताता है, मनुष्य वैसा ही करने लगता है।”

मास्टर (स्वगत) - भोगवासना समाप्त हो चुकने के बाद ही ईश्वर के लिए प्राण व्याकुल होते हैं।


* पन्द्रहवीं शताब्दी में नदिया में तीन महापुरुष भी इन्हीं नामों के हुए थे। उनमें श्रीचैतन्य भगवान् के अवतार समझे जाते हैं। शेष दो उनके पार्षद थे।

२७६ | श्रीरामकृष्णवचनामृत | २२ जुलाई, १८८३

(४)

समाधि में जगन्माता के साथ वार्तालाप

एक दूसरे दिन श्रीरामकृष्ण दक्षिणेश्वर में अपने कमरे के दक्षिणपूर्ववाले बरामदे की सीढ़ी पर बैठे हैं। साथ में राखाल, मास्टर तथा हाजरा हैं। श्रीरामकृष्ण हँसी हँसी में बचपन की अनेक बातें कह रहे हैं।

सायंकाल हुआ। श्रीरामकृष्ण समाधिमग्न हैं। अपने कमरे में छोटे तख्त पर बैठे जगन्माता के साथ वार्तालाप कर रहे हैं। कह रहे हैं, “माँ, तू इतना झमेला क्यों करती है? माँ, क्या मैं वहाँ पर जाऊँ? यदि तू ले जाएगी तो जाऊँगा।”

श्रीरामकृष्ण का किसी भक्त के घर पर जाना तय हुआ था। क्या वे इसीलिए जगन्माता की आज्ञा के लिए इस प्रकार कह रहे हैं?

जगन्माता के साथ श्रीरामकृष्ण फिर वार्तालाप कर रहे हैं। सम्भव है अब किसी अन्तरंग भक्त के लिए प्रार्थना कर रहे हैं। कह रहे हैं, “माँ, उसे शुद्ध बना दो। अच्छा माँ, उसे एक कला क्यों दी?”

श्रीरामकृष्ण कुछ देर चुप हैं। फिर कह रहे हैं, “ओफ! समझा। इसी से तेरा काम होगा।” सोलह कलाओ में से एक कला शक्ति द्वारा तेरा काम अर्थात् लोकशिक्षा होगी - क्या श्रीरामकृष्ण यही कह रहे हैं?

अब भावविभोर स्थिति में मास्टर आदि से आद्याशक्ति तथा अवतार-तत्त्व के सम्बन्ध में कह रहे हैं -

“जो ब्रह्म है, वही शक्ति है। मैं उन्हीं को माँ कहकर पुकारता हूँ। जब वे निष्क्रिय रहते हैं तब उन्हें ब्रह्म कहते हैं, और जब वे सृष्टि, स्थिति, संहार कार्य करते हैं, तब उन्हें शक्ति कहते हैं। जिस प्रकार स्थिर जल और हिलता-डुलता जल। शक्ति की लीला से ही अवतार होते हैं। अवतार प्रेम-भक्ति सिखाने आते हैं। अवतार मानो गाय का स्तन है। दूध स्तन से ही मिलता है। मनुष्य रूप में वे अवतीर्ण होते हैं।”

कोई कोई भक्त सोच रहे हैं, क्या श्रीरामकृष्ण अवतारी पुरुष हैं, जैसे श्रीकृष्ण, चैतन्यदेव, ईसा?


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परिच्छेद ४८

परिच्छेद ४८

बलराम के मकान पर

ईश्वरदर्शन की बात। जीवन का उद्देश्य

एक दिन, १८ अगस्त १८८३ ई., शनिवार को तीसरे पहर श्रीरामकृष्ण बलराम के घर आए हैं। आप अवतार-तत्त्व समझा रहे हैं।

श्रीरामकृष्ण (भक्तों के प्रति) – अवतार लोकशिक्षा के लिए भक्ति और भक्त लेकर रहते हैं। मानो छत पर चढ़कर सीढ़ी से आते-जाते रहना। जब तक ज्ञान नहीं होता, जब तक सभी वासनाएँ नष्ट नहीं होतीं, तब तक दूसरे लोग छत पर चढ़ने के लिए भक्तिपथ पर रहेंगे। सब वासनाएँ मिट जाने पर ही छत पर पहुँचा जाता है। दुकानदार का हिसाब जब तक नहीं मिलता, तब तक वह नहीं सोता। खाते का हिसाब ठीक करके ही सोता है!

(मास्टर के प्रति) "मनुष्य यदि डुबकी लगाए तो अवश्य सफल होगा। डुबकी लगाने पर सफलता निश्चित है।

"अच्छा, केशव सेन, शिवनाथ, – ये लोग जो उपासना करते हैं, वह तुम्हें कैसी लगती है?"

मास्टर – जी, जैसा आप कहते हैं, – वे बगीचे का ही वर्णन करते हैं, परन्तु बगीचे के मालिक के दर्शन करने की बात बहुत कम कहते हैं। प्रायः बगीचे के वर्णन से ही प्रारम्भ और उसी में समाप्ति हो जाती है।

श्रीरामकृष्ण – ठीक। बगीचे के मालिक की खोज करना और उनसे बातचीत करना, यही असल काम है। ईश्वर का दर्शन ही जीवन का उद्देश्य है।*

बलराम के घर से अब अधर के घर पधारे हैं। सायंकाल के बाद अधर के बैठकघर में नाम-संकीर्तन और नृत्य कर रहे हैं; कीर्तनकार वैष्णवचरण गाना गा रहे हैं। अधर, मास्टर, राखाल आदि उपस्थित हैं।

कीर्तन के बाद श्रीरामकृष्ण भाव में विभोर होकर बैठे हैं। राखाल से कह रहे हैं, "यहाँ का जल श्रावण मास का जल नहीं है। श्रावण मास का जल काफी तेजी के साथ


* आत्मा वा अरे द्रष्टव्यः श्रोतव्यो मन्तव्यो निदिध्यासितव्यः। – बृहदारण्यक उपनिषद् २।४।५

२७८ श्रीरामकृष्णवचनामृत १८ अगस्त, १८८३

आता है और फिर निकल जाता है। यहाँ पर पाताल से निकले हुए स्वयम्भू शिव हैं, स्थापित किए हुए शिव नहीं हैं। तू क्रोध में दक्षिणेश्वर से चला आया; मैंने माँ से कहा, 'माँ, इसके अपराध पर ध्यान न देना।'

क्या श्रीरामकृष्ण अवतार हैं? स्वयम्भू शिव हैं?

फिर भावविभोर होकर अधर से कह रहे हैं – “भैया, तुमने जो नाम लिया था, उसी का ध्यान करो।” ऐसा कहकर अधर की जिव्हा अपनी उँगली से छूकर उस पर न जाने क्या लिख दिया। क्या यही अधर की दीक्षा हुई?


परिच्छेद ४९

परिच्छेद ४९

दक्षिणेश्वर में भक्तों के साथ

(१)

वेदान्तवादियों का मत। माया अथवा दया?

आज रविवार का दिन है। श्रावण कृष्णा प्रतिपदा, १९ अगस्त १८८३ ई.। अभी कुछ ही देर पहले देवी का भोग लगा और आरती हुई। अब मन्दिर बन्द हो गया है। श्रीरामकृष्ण देवी का प्रसाद पाने के बाद कुछ आराम कर रहे थे। विश्राम के बाद – अभी दोपहर का समय ही है – वे अपने कमरे में तख्त पर बैठे हुए हैं। इसी समय मास्टर ने आकर उन्हें प्रणाम किया। थोड़ी देर बाद उनके साथ वेदान्त-सम्बन्धी चर्चा होने लगी।

श्रीरामकृष्ण (मास्टर से) – देखो, ‘अष्टावक्र-संहिता’ में आत्मज्ञान की बातें हैं। आत्मज्ञानी कहते हैं, ‘सोऽहम्’ अर्थात् मैं ही वह परमात्मा हूँ। यह वेदान्तवादी संन्यासियों का मत है। सांसारिक व्यक्तियों के लिए यह मत ठीक नहीं है। सब कुछ किया जा रहा है, फिर भी ‘मैं ही वह निष्क्रिय परमात्मा हूँ’ यह कैसे हो सकता है? वेदान्तवादी कहते हैं कि आत्मा निर्लिप्त है। सुख-दुःख, पाप-पुण्य – ये सब आत्मा का कुछ भी बिगाड़ नहीं सकते; परन्तु देहाभिमानी व्यक्तियों को कष्ट दे सकते हैं। धुआँ दीवार को मैला करता है, पर आकाश का कुछ नहीं कर सकता। कृष्णकिशोर ज्ञानियों की तरह कहा करता था कि मैं ‘ख’ अर्थात् आकाशवत् हूँ। वह परम भक्त था; उसके मुँह में यह बात भले ही शोभा दे, पर सब के मुँह में यह शोभा नहीं देती।

“पर ‘मैं मुक्त हूँ’ यह अभिमान बड़ा अच्छा है। ‘मैं मुक्त हूँ’ कहते रहने से कहनेवाला मुक्त हो जाता है। और ‘मैं बद्ध हूँ’ कहते रहने से कहनेवाला बद्ध ही रह जाता है। जो केवल यह कहता है कि ‘मैं पापी हूँ’ वही सचमुच गिरता है। कहते यही रहना चाहिए – ‘मैंने उनका नाम लिया है, अब मेरे पाप कहाँ? मेरा बन्धन कैसा?’


* हृदय श्रीरामकृष्णदेव के भानजे थे और १८८१ ई. तक कालीमन्दिर में रहकर लगभग २३ वर्ष तक इनकी सेवा की थी। उनका जन्मस्थान हुगली जिले के अन्तर्गत सिहोड़ ग्राम में था। श्रीरामकृष्ण का जन्मस्थान कामारपुकुर, यहाँ से दो कोस दूर है। ६२ वर्ष की अवस्था में हृदय का देहावसान हुआ।

२८० | श्रीरामकृष्णवचनामृत | १९ अगस्त, १८८३

“देखो, मेरा चित्त बड़ा अप्रसन्न हो रहा है। हृदय* ने चिट्ठी लिखी है कि वह बहुत बीमार है। यह क्या है - माया या दया?”

मास्टर भी क्या कहें - मौन रह गये।

श्रीरामकृष्ण – माया किसे कहते हैं, पता है? माता-पिता, भाई-बहन, स्त्री-पुत्र, भानजे-भानजी, भतीजे-भतीजी आदि आत्मीयजनों के प्रति प्रेम – यही माया है। और प्राणिमात्र से प्रेम का नाम दया है। मुझे यह क्या हुई – माया या दया! हृदय ने मेरे लिए बहुत-कुछ किया था – बड़ी सेवा की थी – अपने हाथों मेरा मैला तक साफ किया था; पर अन्त में उसने उतना ही कष्ट भी दिया था। वह इतना अधिक कष्ट देता था, कि एक बार मैं बाँध पर जाकर गंगा में डूबकर देहत्याग करने तक को तैयार हो गया था। पर फिर भी उसने मेरा बहुत-कुछ किया था। इस समय यदि उसे कुछ रुपये मिल जाते, तो मेरा चित्त स्थिर हो जाता। पर मैं किस बाबू से कहूँ! कौन कहता फिरे!

(२)

'मृण्मयी आधार में चिन्मयी देवी' – विष्णुपुर में मृण्मयी का दर्शन

लगभग दो या तीन बजे होंगे। इसी समय भक्तवीर अधर सेन तथा बलराम आ पहुँचे और भूमिष्ठ हो प्रणाम कर बैठ गए। उन्होंने पूछा, “आपकी तबीयत कैसी है?” श्रीरामकृष्ण ने कहा, “हाँ, शरीर तो अच्छा ही है, पर मेरे मन में थोड़ी व्यथा हो रही है।” इस अवसर पर हृदय की तकलीफ के सम्बन्ध में कोई बात ही नहीं उठायी।

बड़ा बाजार (कलकत्ते) के मल्लिक-घराने की सिंहवाहिनी देवी की चर्चा छिड़ी।

श्रीरामकृष्ण – मैं भी सिंहवाहिनी के दर्शन करने गया था। चासाधोबीपाड़ा के एक मल्लिक के यहाँ देवी विराजमान थीं। मकान टूटा-फूटा था, क्योंकि मालिक गरीब हो गये थे। कहीं कबूतर की विष्ठा पड़ी थी, कहीं काई जम गयी थी, और कहीं छत से सुरखी और रेत ही झर-झरकर गिर रही थी। दूसरे मल्लिक घरानेवालों के मकान में जो श्री देखी वह श्री इसमें नहीं थी।

(मास्टर से) – “अच्छा, इसका क्या अर्थ है, बतलाओ तो सही।”

मास्टर चुप्पी साधे बैठे रहे।

श्रीरामकृष्ण – बात यह है कि जिसके कर्म का जैसा भोग है, उसे वैसा ही भोगना पड़ता है। संस्कार, प्रारब्ध आदि बातें माननी ही पड़ती हैं।

“उस टूटे-फूटे मकान में भी मैंने देखा कि सिंहवाहिनी का चेहरा जगमगा रहा है! आविर्भाव मानना ही पड़ता है।

“मैं एक बार विष्णुपुर गया था। वहाँ राजासाहब के अच्छे अच्छे मन्दिर आदि हैं। वहाँ मृण्मयी नाम की भगवती की एक मूर्ति है। मन्दिर के पास ही कृष्णबाँध, लालबाँध

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१९ अगस्त, १८८३परिच्छेद ४९२८१

नाम के बड़े बड़े तालाब हैं। तालाब में मुझे उबटन के मसाले की गन्ध मिली! भला ऐसा क्यों हुआ? मुझे तो मालूम भी नहीं था कि स्त्रियाँ जब मृण्मयी देवी के दर्शन के लिए जाती हैं तो उन्हें वे वह मसाला चढ़ाती हैं! तालाब के पास मेरी भाव-समाधि हो गयी। उस समय तक विग्रह नहीं देखा था – भावावेश में मुझे वहीं पर मृण्मयी देवी के दर्शन हुए – कटि तक।”

भक्त का सुख-दुःख

इसी बीच में दूसरे भक्त आ जुटे और काबुल के विद्रोह तथा लड़ाई की बातें होने लगीं। किसी एक ने कहा कि याकूब खाँ (काबुल के अमीर) राजसिंहासन से उतार दिये गये हैं। श्रीरामकृष्णदेव को सम्बोधन करके उन्होंने कहा कि याकूब खाँ भी ईश्वर का एक बड़ा भक्त है।

श्रीरामकृष्ण – बात यह है कि सुख-दुःख देह के धर्म हैं। कविकंकण-चण्डी में लिखा है कि कालूवीर को कैद की सजा हुई थी और उसकी छाती पर पत्थर रखा गया था। कालूवीर भगवती का वरपुत्र था फिर भी उसे यह दुःख भोगना पड़ा। देहधारण करने से ही सुख-दुःख का भोग करना पड़ता है।

“श्रीमन्त भी तो बड़ा भक्त था। उसकी माँ खुल्लना को भगवती कितना अधिक चाहती थीं! पर देखो, उस श्रीमन्त पर कितनी विपत्ति पड़ी! यहाँ तक कि वह श्मशान में काट डालने के लिए ले जाया गया।”

“एक लकड़हारा परम भक्त था। उसे भगवती के साक्षात् दर्शन हुए, उन्होंने उसे खूब चाहा और उस पर अत्यन्त कृपा की, परन्तु इतने पर भी उसका लकड़हारे का काम नहीं छूटा! उसे पहले की तरह लकड़ी काटकर ही रोटी कमानी पड़ी। कारागार में देवकी को चतुर्भुज शंख-चक्र-गदा-पद्मधारी भगवान् के दर्शन हुए, पर तो भी उनका कारावास नहीं छूटा।”

मास्टर – केवल कारावास ही क्यों? शरीर ही तो सारे अनर्थ का मूल है। उसी को छूट जाना चाहिए था।

श्रीरामकृष्ण – बात यह है कि प्रारब्ध कर्मों का भोग होता ही है। जब तक वह हैं, तब तक देहधारण करना ही पड़ेगा। एक काने आदमी ने गंगास्नान किया। उसके सारे पाप तो छूट गए, पर कानापन दूर नहीं हुआ! (सभी हँसे।) उसे अपना पूर्वजन्म का फल भोगना था, वही वह भोगता रहा।

मास्टर – जो बाण एक बार छोड़ा जा चुका उस पर फिर किसी तरह का वश नहीं रहता।

श्रीरामकृष्ण – देह का सुख-दुःख चाहे जो कुछ हो, पर भक्त को ज्ञान-भक्ति का

२८२श्रीरामकृष्णवचनामृत१९ अगस्त, १८८३

ऐश्वर्य रहता है। वह ऐश्वर्य कभी नष्ट नहीं होता। देखो, पाण्डवों पर कितनी विपत्ति पड़ी, पर इतने पर भी उनका चैतन्य एक बार भी नष्ट नहीं हुआ। उनकी तरह ज्ञानी, उनकी तरह भक्त कहाँ मिल सकते हैं?

(३)

कप्तान और नरेन्द्र का आगमन

इसी समय नरेन्द्र और विश्वनाथ उपाध्याय आये। विश्वनाथ नेपालराजा के वकील थे – राजप्रतिनिधि थे। श्रीरामकृष्ण इन्हें कप्तान कहा करते थे। नरेन्द्र की आयु लगभग इक्कीस वर्ष की है – इस समय वे बी. ए. में पढ़ते हैं। बीच बीच में, विशेषतः रविवार को दर्शन के लिए आ जाते हैं।

जब वे प्रणाम करके बैठ गए तो श्रीरामकृष्णदेव ने नरेन्द्र से गाना गाने के लिए कहा। कमरे के पश्चिम ओर एक तम्बूरा लटका हुआ था। यन्त्रों का सुर मिलाया जाने लगा। सब लोग एकाग्र होकर गवैये की ओर देखने लगे कि कब गाना आरम्भ होता है।

श्रीरामकृष्ण (नरेन्द्र से) – देख, यह अब वैसा नहीं बजता।

कप्तान – यह पूर्ण होकर बैठा है, इसी से इसमें शब्द नहीं होता! (सब हँसे।) पूर्णकुम्भ है!

श्रीरामकृष्ण (कप्तान से) – पर नारदादि कैसे बोले?

कप्तान – उन्होंने दूसरों के दुःख से कातर होकर उपदेश दिए थे।

श्रीरामकृष्ण – हाँ, नारद, शुकदेव आदि समाधि के बाद नीचे उतर आए थे। दया के कारण, दूसरों के हित की दृष्टि से उन्होंने उपदेश दिए थे।

नरेन्द्र ने गाना शुरू किया। गाने का आशय इस प्रकार था – "सत्य-शिव-सुन्दर का रूप हृदय-मन्दिर में चमक रहा है। उसे देख-देखकर हम उस रूप के समुद्र में डूब जायेंगे। वह दिन कब होगा? हे नाथ, जब अनन्त ज्ञान के रूप में तुम हमारे हृदय में प्रवेश करोगे, तब हमारा अस्थिर मन निर्वाक् होकर तुम्हारे चरणों मे शरण लेगा। आनन्द और अमृतत्व के रूप में जब तुम हमारे हृदयाकाश में उदित होगे, तब चन्द्रोदय में जैसे चकोर उमंग से खेलता फिरता है, वैसे हम भी, नाथ, तुम्हारे प्रकाशित होने पर आनन्द मनाएंगे।" इत्यादि।

'आनन्द और अमृतत्व के रूप में' ये शब्द सुनते ही श्रीरामकृष्ण गम्भीर समाधि में मग्न हो गए। आप हाथ बाँधे पूर्व की ओर मुँह किए बैठे हैं। देह सरल और निश्चल है। आनन्दमयी के रूपसमुद्र में आप डूब गए हैं। बाह्यज्ञान बिलकुल नहीं है। साँस अत्यन्त मन्द चल रही है। नेत्र पलकहीन हैं। आप चित्रवत् बैठे हैं। मानो इस राज्य को छोड़ कहीं और चले गये हैं।

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(४)

सच्चिदानन्द-लाभ का उपाय। ज्ञानी और भक्त में अन्तर

समाधि टूटी। इसी बीच में नरेन्द्र उन्हें समाधिस्थ देखकर कमरे से बाहर पूर्ववाले बरामदे में चले गए हैं। वहाँ हाजरा महाशय एक कम्बल के आसन पर हरिनाम की माला हाथ में लिए बैठे हैं। नरेन्द्र उनसे बातें कर रहे हैं। इधर कमरा दर्शकों से भरा है। समाधि-भंग के बाद श्रीरामकृष्ण ने भक्तों की ओर दृष्टि डाली तो देखा कि नरेन्द्र वहाँ नहीं हैं। तम्बूरा सूना पड़ा है। सब भक्त उनकी ओर उत्सुक होकर देख रहे हैं।

श्रीरामकृष्ण – आग लगा गया है, अब चाहे वह रहे या न रहे!

(कप्तान आदि से) “चिदानन्द का आरोप करो तो तुम्हें भी आनन्द मिलेगा। चिदानन्द तो है ही, – केवल आवरण और विक्षेप है।* विषय पर आसक्ति जितनी घटेगी, उतनी ही ईश्वर पर रुचि बढ़ेगी।

कप्तान – कलकत्ते के घर की ओर जितना ही बढ़ोगे, वाराणसी से उतनी ही दूर होते जाओगे।

श्रीरामकृष्ण – श्रीमती (राधिका) कृष्ण की ओर जितना बढ़ती थीं उतनी ही कृष्ण की देहगन्ध उन्हें मिलती जाती थी। मनुष्य जितना ही ईश्वर के पास जाता है उतनी ही उसकी उन पर भाव-भक्ति होती जाती है। नदी जितनी ही समुद्र के समीप होती है उतना ही उसमें ज्वार-भाटा होता है।

“ज्ञानी के भीतर मानो गंगा एक-सी बहती रहती है। उसके लिए सभी स्वप्नवत् है। वह सदा स्व-स्वरूप में स्थित रहता है। पर भक्त की गंगा एक गति से नहीं बहती। भक्त कभी हँसता, कभी रोता है; कभी नाचता और कभी गाता है। भक्त ईश्वर के साथ विलास करना चाहता है – वह कभी तैरता है, कभी डूबता है और कभी फिर ऊपर आता है – जैसे बर्फ का टुकड़ा पानी में कभी ऊपर और कभी नीचे आता-जाता रहता है! (हँसी)

ब्रह्म और शक्ति अभिन्न हैं

“ज्ञानी ब्रह्म को जानना चाहता है। भक्त के लिए भगवान् – सर्वशक्तिमान् षडैश्वर्यपूर्ण भगवान् हैं। परन्तु वास्तव में ब्रह्म और शक्ति अभिन्न हैं। जो सच्चिदानन्दमय हैं वे ही सच्चिदानन्दमयी हैं। जैसे मणि और उसकी ज्योति। मणि की ज्योति कहने से ही मणि का बोध होता है और मणि कहने से ही उसकी ज्योति का। बिना मणि को सोचे उसकी ज्योति की धारणा नहीं हो सकती, वैसे ही बिना मणि की ज्योति को सोचे मणि को भी सोचा नहीं जा सकता।


* अर्थात वह ढक गया है और उसकी जगह दूसरी चीज का आभास हो रहा है।

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२८४श्रीरामकृष्णवचनामृत१९ अगस्त, १८८३

“एक ही सच्चिदानन्द का शक्ति के भेद से उपाधिभेद होता है। इसलिए उनके विविध रूप होते हैं। 'तारा, वह तो तुम्हीं हो।' जहाँ कहीं कार्य (सृष्टि, स्थिति, प्रलय) हैं वहीं शक्ति है। परन्तु जल स्थिर रहने पर भी जल है और हिलोरें, बुलबुले आदि उठने पर भी जल ही है। सच्चिदानन्द ही आद्याशक्ति हैं – जो सृष्टि, स्थिति, प्रलय करती हैं। जैसे कप्तान जब कोई काम नहीं करते तब भी वही हैं, जब पूजा करते हैं तब भी वही हैं, और जब वे लाटसाहब के पास जाते हैं तब भी वही हैं, केवल उपाधि का भेद है।”

कप्तान – जी हाँ।

श्रीरामकृष्ण – मैंने यही बात केशव सेन से कही थी।

कप्तान – केशव सेन भ्रष्टाचार, स्वेच्छाचार हैं; वे बाबू हैं, साधु नहीं।

श्रीरामकृष्ण (भक्तों से) – कप्तान मुझे केशव सेन के यहाँ जाने को मना करता है।

कप्तान – महाराज, आप तो जाएँगे ही, भला उस पर मैं क्या करूँ?

श्रीरामकृष्ण (नाराज होकर) – तुम लाटसाहब के पास रुपये के लिए जा सकते हो, और मैं केशव सेन के पास नहीं जा सकता? वह तो ईश्वरचिन्तन करता है, हरि का नाम लेता है। इधर तुम्हीं तो कहते हो, 'ईश्वर ही अपनी माया से जीव और जगत् हुए हैं।'

(५)

ज्ञानयोग और भक्तियोग का समन्वय

यह कहकर श्रीरामकृष्ण एकाएक कमरे से उत्तर-पूर्ववाले बरामदे में चले गये। कप्तान और अन्य भक्त कमरे में ही बैठे उनकी प्रतीक्षा करने लगे। मास्टर भी उनके साथ बरामदे में आये। बरामदे में नरेन्द्र हाजरा से बातें कर रहे थे। श्रीरामकृष्ण जानते थे कि हाजरा को शुष्क ज्ञानविचार बड़ा प्यारा है; वे कहा करते हैं, 'जगत् स्वप्नवत् है, पूजा और चढ़ावा आदि सब मन का भ्रम है, केवल अपने यथार्थ रूप की चिन्ता करना ही हमारा लक्ष्य है, और मैं ही वह परमात्मा हूँ – सोऽहम्।'

श्रीरामकृष्ण (हँसते हुए) – तुम लोगों की क्या बातचीत हो रही है?

नरेन्द्र (हँसते हुए) – कितनी लम्बी लम्बी बातें हो रही हैं।

श्रीरामकृष्ण (हँसते हुए) – किन्तु शुद्ध ज्ञान और शुद्धा भक्ति एक ही है। शुद्ध ज्ञान जहाँ ले जाता है वहीं शुद्धा भक्ति भी ले जाती है। भक्ति का मार्ग बड़ा सरल है।

नरेन्द्र – 'ज्ञानविचार का और प्रयोजन नहीं माँ, अब मुझे पागल बना दो!' (मास्टर से) देखिये, हैमिल्टन की एक किताब में मैंने पढ़ा – ‘A learned ignorance is the end of Philosophy and beginning of Religion.’

श्रीरामकृष्ण (मास्टर से) – इसका अर्थ क्या है?

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१९ अगस्त, १८८३ | परिच्छेद ४९ | २८५

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१९ अगस्त, १८८३परिच्छेद ४९२८५

नरेन्द्र – दर्शनशास्त्रों का पठन समाप्त होने पर मनुष्य पण्डितमूर्ख बन बैठता है; और 'धर्म धर्म' करने लगता है। तब धर्म का आरम्भ होता है।

श्रीरामकृष्ण (हँसते हुए) – थैंक यू, थैंक यू (धन्यवाद, धन्यवाद)! (सब लोग हँसे।)

(६)

नरेन्द्र के अनेक गुण

थोड़ी देर में सन्ध्या होते देखकर अधिकांश लोग अपने अपने घर लौटे। नरेन्द्र ने भी विदा ली।

दिन ढलने लगा। सन्ध्या होने ही वाली है। देवस्थान में चारों ओर बत्तियाँ जलाने का प्रबन्ध होने लगा। कालीमन्दिर और विष्णुमन्दिर के पुजारी गंगाजी में अर्धनिमग्न होकर अन्तरबाह्य शुद्धि कर रहे हैं – शीघ्र ही आरती करनी होगी तथा देवताओं को रात्रिकालीन नैवेद्य चढ़ाना होगा। दक्षिणेश्वर ग्राम के निवासी युवकगण बगीचे में टहलने आए हुए हैं – किसी के हाथ में छड़ी है, तो कोई मित्रों के साथ घूम रहा है। वे लोग गंगा के किनारे पुश्ते पर टहल रहे हैं तथा पुष्पों की सुगन्ध से भरे निर्मल सन्ध्या-समीरण का आनन्द लेते हुए श्रावण की गंगा के तरंगमय प्रवाह को देख रहे हैं। उनमें से जो कुछ चिन्तनशील हैं वे पंचवटी की निर्जन भूमि में अकेले टहल रहे हैं। भगवान् श्रीरामकृष्ण भी पश्चिमवाले बरामदे से थोड़ी देर के लिए गंगादर्शन करने लगे।

सन्ध्या हुई। नौकर बत्तियाँ जला गया। दासी ने श्रीरामकृष्ण के कमरे में दीप जलाकर धूनी दी। बारह शिवमन्दिरों में आरती होते ही विष्णु तथा काली के मन्दिर में आरती होने लगी। घण्टा, घड़ियाल आदि का मधुर गम्भीर नाद उठने लगा – मन्दिर के निकट ही बहती हुई गंगा का कलकलनिनाद तो गूँज ही रहा था।

श्रावण की कृष्णा प्रतिपदा है। थोड़ी ही देर में चाँद निकला। विशाल प्रांगण तथा उद्यान के वृक्ष धीरे धीरे चन्द्रकिरण से आप्लावित हो गए। ज्योत्स्ना के स्पर्श से भागीरथी का जल मानो प्रफुल्लित होकर बह रहा है।

सन्ध्या होते ही श्रीरामकृष्ण जगन्माता को प्रणाम करके तालियाँ बजाते हुए हरिध्वनि करने लगे। कमरे में बहुतसे देवदेवियों की तस्वीरें थी – जैसे ध्रुव और प्रह्लाद की, राजाराम की, कालीमाता की, राधाकृष्ण की – आपने सभी देवताओं को उनके नाम ले-लेकर प्रणाम किया। फिर कहने लगे, 'ब्रह्म-आत्मा, भगवान् भागवत-भक्त-भगवान्, ब्रह्म-शक्ति, शक्ति-ब्रह्म; वेद-पुराण-तन्त्र; गीता-गायत्री; मैं शरणागत हूँ, शरणागत हूँ; नाहं नाहं (मैं नहीं, मैं नहीं), तू ही, तू ही; मैं यन्त्र हूँ, तुम यन्त्री हो'; इत्यादि।

नामोच्चारण के बाद श्रीरामकृष्ण हाथ जोड़कर जगन्माता का चिन्तन करने लगे।

CC-0. In Public Domain. Gurukul Kangri Collection, Haridwar

२८६ श्रीरामकृष्णवचनामृत १९ अगस्त, १८८३

सन्ध्या समय दो-चार भक्त बगीचे में गंगा के किनारे टहल रहे थे। आरती के बाद वे एक-एक करके श्रीरामकृष्ण के कमरे में इकट्ठे होने लगे।

श्रीरामकृष्ण तख्त पर बैठे हैं। मास्टर, अधर, किशोरी आदि नीचे, उनके सामने बैठे हैं।

श्रीरामकृष्ण (भक्तों से) – नरेन्द्र, भवनाथ, राखाल ये सब नित्यसिद्ध और ईश्वरकोटि के हैं। इनकी जो शिक्षा होती है वह बिना प्रयोजन के ही होती है। तुम देखते नहीं, नरेन्द्र किसी की 'केयर' (परवाह) नहीं करते? मेरे साथ वह कप्तान की गाड़ी पर जा रहा था। कप्तान ने उसे अच्छी जगह पर बैठने को कहा, परन्तु उसने उस तरफ देखा तक नहीं। वह मेरा ही मुँह नहीं ताकता। फिर जितना जानता है उतना प्रकट नहीं करता – कहीं मैं लोगों से कहता न फिरूँ कि नरेन्द्र इतना विद्वान् है। उसके माया-मोह नहीं हैं – मानो कोई बन्धन ही नहीं है। बड़ा अच्छा आधार है। एक ही आधार में बहुत से गुण रखता है – गाने-बजाने, लिखने-पढ़ने सब में बहुत प्रवीण है। इधर जितेन्द्रिय भी है – कहता है, विवाह नहीं करूँगा! नरेन्द्र और भवनाथ इन दोनों में बड़ा मेल है – जैसा स्वामी-स्त्री में होता है। नरेन्द्र यहाँ ज्यादा नहीं आता। यह अच्छा है। ज्यादा आने से मैं विह्वल हो जाता हूँ।