भारतकोश
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श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)

Sri Ramakrishna Vachanamrita (Part 1 - Tr. Nirala)

श्री 'म' (महेंद्रनाथ गुप्त) / सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा

DevanagariHindipublished711 पृष्ठ

५ अप्रैल, १८८४ | परिच्छेद ७९ | ४७७

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५ अप्रैल, १८८४परिच्छेद ७९४७७

“देखो न, श्रीरामचन्द्र सीता के वियोग से रोने लगे थे। जब हिरण्याक्ष का वध करने के लिए वराह का अवतार लिया, तब हिरण्याक्ष का वध हो जाने पर भी भगवान अपने धाम को नहीं गये थे। वराह के ही रूप में रहने लगे। कुछ बच्चे भी हो गये थे! उन्हें लेकर एक तरह से बड़े मजे में रहते थे। देवताओं ने कहा, यह इन्हें क्या हो गया? – ये तो अब आना ही नहीं चाहते। तब सब मिलकर शिव के पास गये और सब हाल उन्हें कह सुनाया। शिव ने उनके पास जाकर उन्हें बहुत समझाया, पर सुनता कौन है, वे अपने बच्चों को दूध पिलाने लगे! (सब हँसे।) तब शिव ने त्रिशूल से देह नष्ट कर दी। भगवान् खिल-खिलाकर हँसे और अपने लोक को चले गये।”

प्राणकृष्ण – (श्रीरामकृष्ण से) – महाराज, यह अनाहत शब्द क्या है?

श्रीरामकृष्ण – अनाहत शब्द सदा आप ही आप हो रहा है। वह प्रणव-ओंकार की ध्वनि है, परब्रह्म से आती है, योगी इसे सुनते हैं। विषयी जीवों को यह ध्वनि नहीं सुन पड़ती। योगी जानते हैं कि वह ध्वनि एक ओर तो नाभि-कमल से उठती है और दूसरी ओर उस क्षीरसिन्धु-शायी परब्रह्म से।

परलोक के सम्बन्ध में श्री केशव सेन का प्रश्न

प्राणकृष्ण – महाराज, परलोक कैसा है?

श्रीरामकृष्ण – केशव सेन ने भी यह बात पूछी थी। जब तक आदमी अज्ञान दशा में रहता है, अर्थात् जब तक ईश्वर-लाभ नहीं होता, तब तक जन्म ग्रहण करना पड़ता है। परन्तु ज्ञान हो जाने पर, फिर इस संसार में नहीं आना पड़ता। पृथ्वी में या किसी दूसरे लोक में नहीं जाना पड़ता।

“कुम्हार धूप में सूखने के लिए हण्डियाँ रख देता है। देखा नहीं तुमने? – उनमें कच्ची हण्डियाँ रहती हैं और पकी हुई भी। कभी कभी जानवरों के आने-जाने से कुछ हण्डियाँ फूट जाती हैं। उनमें जो हण्डी पकी हुई होती है उसे कुम्हार फेंक देता है, उससे फिर उसका कोई काम नहीं चलता। और अगर कच्ची हण्डी फूटी तो कुम्हार उसे ले लेता है, भिगोकर गाला बनाकर चाक पर फिर चढ़ा देता है – उससे फिर दूसरी हण्डी तैयार करता है। इसी तरह, जब तक ईश्वर-दर्शन नहीं हुए तब तक कुम्हार के हाथ जाना होगा, अर्थात् इस संसार में घूम-घामकर आना होगा।

“उबाले हुए धानों के गाड़ने से क्या होगा? फिर उससे पेड़ नहीं होता! मनुष्य यदि ज्ञानाग्नि में सिद्ध हो जाय, तो फिर वह नयी सृष्टि के काम का नहीं रहता – वह मुक्त हो जाता है।

वेदान्त और अहंकार। ज्ञान और विज्ञान

“पुराणों के मत में हैं भक्त और भगवान् – मैं एक अलग और तुम अलग। शरीर

CC-0. In Public Domain. Gurukul Kangri Collection, Haridwar

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४७८श्रीरामकृष्णवचनामृत५ अप्रैल, १८८४

एक पात्र है जिसमें मन-बुद्धि-अहंकार रूपी पानी है। ब्रह्म सूर्य-स्वरूप हैं। इस पानी में उनका प्रतिबिम्ब गिर रहा है। भक्त ईश्वर का वही रूप देखता है।

“वेदान्त के मत से ब्रह्म ही वस्तु है और सब माया, स्वप्नवत्, अवस्तु। अहं-रूपी एकै लाठी सच्चिदानन्द-समुद्र में पड़ी हुई है। (मास्टर से) तुम इसे सुनते जाना - अहं-लाठी को उठा लेने पर एक सच्चिदानन्द-समुद्र रह जाता है। अहं-लाठी के रहने से दो दीख पड़ते हैं। इधर पानी का एक हिस्सा और उधर एक हिस्सा। ब्रह्मज्ञान होने पर मनुष्य को समाधि हो जाती है। तब यह अहं मिट जाता है।

“परन्तु लोक-शिक्षा के लिए शंकराचार्य ने 'विद्या का अहं' रखा था। (प्राणकृष्ण से) परन्तु ज्ञानियों का एक लक्षण और भी है। कोई कोई सोचते है, 'मैं ज्ञानी हो गया।' ज्ञान का लक्षण क्या है? ज्ञानी किसी की बुराई नहीं कर सकता। वह बालक-सा हो जाता है। लोहे के खड्ग में अगर पारस-पत्थर छुआ दिया जाय तो खड्ग सोने का हो जाता है। सोने से हिंसा का काम नहीं होता। बाहर से भले ही जान पड़ता हो कि इसमें राग-अहंकार है, परन्तु वास्तव में ज्ञानी में यह कुछ नहीं रहता।

“दूर से जली रस्सी देखिये तो जान पड़ता है कि यह रस्सी ही पड़ी हुई है, परन्तु पास जाकर फूँक मारिये तो सब राख होकर उड़ जाती है। क्रोध का, अहंकार का बस आकार मात्र है, परन्तु वह यथार्थ में क्रोध नहीं - अहंकार नहीं।

“बच्चे में आसक्ति नहीं रहती। अभी अभी उसने घरौंदा बनाया। कोई उसे छू ले तो तिनककर नाचने लगे, रोना शुरू कर दे, परन्तु खुद ही थोड़ी देर में उसे बिगाड़ डालता है। अभी अभी देखो तो कपड़े पर रीझ है। कहता है, मेरे बाबूजी ने ले दिया है, मैं नहीं दूँगा; परन्तु एक खिलौना दो; बस भूल जाता है, कपड़े को वहीं छोड़कर चला जाता है।

“ये ही सब ज्ञानी के लक्षण हैं। चाहे घर में बड़ा ऐश्वर्य हो - शीशे, मेज, तस्वीरें, गाड़ी-घोड़े, परन्तु दिल में आ जाय तो सब छोड़-छाड़कर काशी की राह पकड़ ले।

“वेदान्त के मत से जागरण अवस्था भी कुछ नहीं है। किसी लकड़हारे ने स्वप्न देखा था। कच्ची नींद में ही किसी दूसरे के जगा देने पर उसने झुँझलाकर कहा - 'तूने क्यों मुझे कच्ची नींद में जगाया? मैं राजा हो गया था और सात लड़कों का बाप। मेरे बच्चे लिखते-पढ़ते थे, अस्त्रविद्या सीख रहे थे। मैं सिंहासन पर बैठा राज कर रहा था। क्यों मेरा सब्ज-बाग उजाड़ डाला?' उस आदमी ने कहा - 'अरे वह तो स्वप्न था, उसमें क्या रखा है?' लकड़हारे ने कहा, 'चल, तू नहीं समझा। मेरा लकड़हारा होना जिस तरह सच है, स्वप्न में राजा होना उसी तरह सच है। लकड़हारा होना यदि सत्य हो तो स्वप्न में राजा होना भी सत्य है।”

अब श्रीरामकृष्ण विज्ञानी की बात कह रहे हैं -

“नेति-नेति करके आत्म-साक्षात्कार करने को ज्ञान कहते हैं। नेति-नेति विचार

CC-0. In Public Domain. Gurukul Kangri Collection, Haridwar

५ अप्रैल, १८८४ | परिच्छेद ७९ | ४७९

५ अप्रैल, १८८४ | परिच्छेद ७९ | ४७९


करके मनुष्य समाधि में आत्मदर्शन करता है।

“विज्ञान अर्थात् विशेष रूप से ज्ञान प्राप्त करना। किसी ने दूध का नाम ही नाम सुना है, किसी ने दूध देखा भर है और किसी ने दूध पिया है। जिसने सिर्फ सुना है, वह अज्ञानी है, जिसने देखा है वह ज्ञानी है, और जिसने पिया है, वह विज्ञानी है, विशेष रूप से ज्ञान उसी को हुआ है। ईश्वर को देखकर उनसे वार्तालाप करना, जैसे वे परम आत्मीय हों, इसी का नाम विज्ञान है।

“पहिले 'नेति-नेति' किया जाता है। वे पंचभूत नहीं हैं, मन, बुद्धि, अहंकार भी नहीं हैं; वे सब तत्त्वों से परे हैं। छत पर चढ़ना होगा, सब सीढ़ियों को एक एक करके छोड़ जाना होगा। सीढ़ियाँ कभी छत नहीं हैं, परन्तु छत पर पहुँचकर देखा जाता है, जिन चीजों से छत बनी है – ईंट-चूना-सुरखी – उन्हीं चीजों से सीढ़ियाँ भी बनी हैं, पर सीढ़ियाँ कभी छत नहीं हैं। जो परब्रह्म हैं वे ही जीव-जगत् और चौबीसों तत्त्व भी हुए हैं। जो आत्मा हैं वे ही पंचभूत भी हुए हैं। मिट्टी इतनी कड़ी क्यों है अगर वह आत्मा से ही हुई है? उनकी इच्छा से सब हो सकता है। हाड़ और मांस, शोणित और शुक्र से ही तो होते हैं। समुद्र का फेन कितना कड़ा होता है!

क्या गृहस्थ को विज्ञान हो सकता है? साधना चाहिए

“विज्ञान के होने पर संसार में भी रहा जा सकता है। तब अच्छी तरह अनुभव हो जाता है कि जीव और जगत् वे ही हुए हैं, वे संसार से अलग नहीं हैं। श्रीरामचन्द्र ने ज्ञान-लाभ के पश्चात् जब कहा कि मैं संसार में न रहूँगा, तब दशरथ ने समझाने के लिए वशिष्ठ को उनके पास भेजा। वशिष्ठ ने कहा, 'राम! यदि संसार ईश्वर से अलग हो तो तुम इसे छोड़ सकते हो।' श्रीरामचन्द्र चुप हो रहे। वे अच्छी तरह जानते थे, ईश्वर से अलग कोई चीज नहीं है। उन्हें फिर संसार न छोड़ना पड़ा। बात यह है कि दिव्य दृष्टि चाहिए। मन के शुद्ध होने पर ही वह दृष्टि होती है। देखो न, कुमारी-पूजा क्या है। मल और मूत्र त्याग करके आयी हुई लड़कियाँ, उन्हें मैंने देखा – साक्षात् भगवती की मूर्ति। एक ओर स्त्री है और एक ओर बच्चा; दोनों को मनुष्य प्यार कर रहा है, किन्तु भाव भिन्न हैं, तात्पर्य यह है कि खेल सब मन का है। शुद्ध मन में एक खास भाव होता है। उस मन को प्राप्त कर लेने पर इसी संसार में ईश्वर के दर्शन होते हैं। अतएव साधना चाहिए।

“साधना चाहिए। यह समझ लेना चाहिए कि स्त्रियों पर सहज ही आसक्ति हो जाती है। स्त्रियाँ स्वभाव से ही पुरुषों को प्यार करती हैं। पुरुष स्वभाव से ही स्त्रियों को प्यार करते हैं। दोनों इसीलिए जल्दी गिर जाते हैं।”

(हठयोगी आता है।)

पंचवटी में कई दिनों से एक हठयोगी रहते हैं। वे सिर्फ दूध और अफीम खाते हैं

४८०श्रीरामकृष्णवचनामृत५ अप्रैल, १८८४

और हठयोग करते हैं। रोटी-भात, यह कुछ नहीं खाते। अफीम और दूध के दाम उनके पास नहीं हैं। श्रीरामकृष्ण जब पंचवटी के पास गये थे तब वे हठयोगी से बातचीत करके आये थे। हठयोगी ने राखाल से कहा था, 'परमहंसजी से कहकर मेरी कोई व्यवस्था करा देना।' श्रीरामकृष्ण ने कहला भेजा था कि कलकत्ते के बाबू जब आयेंगे तब उनसे कहा जायगा।

हठयोगी – (श्रीरामकृष्ण से) – आपने राखाल से क्या कहा था?

श्रीरामकृष्ण – कहा था, बाबुओं से कहूँगा। अगर वे कुछ देंगे तो दे देंगे। परन्तु क्यों – (प्राणकृष्णादि से) तुम शायद इन्हें like (पसन्द) नहीं करते?

प्राणकृष्ण चुपचाप बैठे रहे।

(हठयोगी चला जाता है।)

श्रीरामकृष्ण की बातचीत होने लगी।

श्रीरामकृष्ण – (प्राणकृष्णादि भक्तों से) – और संसार में रहने पर सत्य का खूब ध्यान चाहिए। सत्य से ही परमात्मा की प्राप्ति होती है। मेरी तो इस समय सत्य की दृढ़ता कुछ कम हो गयी है, पहले बहुत थी। 'नहाऊँगा' यह कहा नहीं कि गंगा में उतरा, मन्त्रोच्चारण किया, सिर पर पानी भी डाला, परन्तु फिर भी सन्देह होता था कि शायद अच्छी तरह नहाना अभी नहीं हुआ। अमुक स्थान पर शौच के लिए जाऊँगा यह सोचा नहीं कि वहीं गया। राम के मकान गया, कलकत्ते में। कह दिया कि पूड़ियाँ न खाऊँगा। जब खाने को दिया गया, तब देखा, भूख लगी है; परन्तु कह जो दिया है कि पूड़ियाँ न खाऊँगा तो मजबूरन मिठाई से पेट भरा। (सब हँसते हैं।) इस समय तो दृढ़ता कुछ घट गयी है। टट्टी की हाजत नहीं है, परन्तु कह डाला है कि टट्टी जाऊँगा, क्या किया जाय? राम* से पूछा, उसने कहा, नहीं लगी है तो जाकर क्या कीजियेगा? तब मैंने विचार किया, सभी तो नारायण हैं, राम भी नारायण है, उसकी बात क्यों न मानूँ? हाथी नारायण है, परन्तु महावत भी तो नारायण है। महावत जिस समय कह रहा है, हाथी के पास मत आओ, उस समय उसकी बात क्यों न मानी जाय? इस तरह विचार करके अब पहले की अपेक्षा दृढ़ता कुछ घट गयी है।

"अब इस समय देख रहा हूँ, एक और अवस्था आ रही है। बहुत दिन हुए वैष्णवचरण ने कहा था, आदमी के भीतर जब ईश्वर के दर्शन होंगे, तब पूर्ण ज्ञान होगा। अब देख रहा हूँ, अनेक रूपों में वही विचरण कर रहे हैं। कभी साधु के रूप में, कभी छल-रूप में, और कभी खल-रूप में। इसीलिए कहता हूँ, साधुरूपी नारायण, छलरूपी नारायण, खलरूपी नारायण, लुच्चारूपी नारायण।


* राम चटर्जी – दक्षिणेश्वर मन्दिर के एक पुजारी।

५ अप्रैल, १८८४ | परिच्छेद ७९ | ४८१

५ अप्रैल, १८८४परिच्छेद ७९४८१

“अब चिन्ता है, सब को किस तरह भोजन कराया जाय। सब को भोजन कराने की इच्छा होती है। इसलिए एक-एक आदमी को यहाँ रखकर भोजन कराता हूँ।”

प्राणकृष्ण – (मास्टर को देखकर, सहास्य) – अच्छा आदमी है! (श्रीरामकृष्ण से) महाराज, नाव से उतरकर ही दम लिया!

श्रीरामकृष्ण – (हँसते हुए) – क्या हुआ?

प्राणकृष्ण – ये नाव पर चढ़े थे; जरा सी लहर की टक्कर लगी और इन्होंने कहा, उतार दो हमको – (मास्टर से) किस तरह फिर आये आप?

मास्टर – (सहास्य) – पैदल चलकर।

संसारी लोगों के लिए विषय-कर्मत्याग कठिन है

प्राणकृष्ण – (श्रीरामकृष्ण से) – महाराज, अब सोच रहा हूँ, काम छोड़ दूँगा। काम करने लगा, तो फिर और कुछ नहीं होगा। इन्हें (साथ के एक बाबू की ओर इशारा करके) काम सिखा रहा हूँ। मेरे छोड़ देने पर ये काम करेंगे, अब और नहीं होता।

श्रीरामकृष्ण – हाँ, बड़ी झंझट है। इस समय कुछ दिन निर्जन में ईश्वर-चिन्तन करना बहुत अच्छा है। तुम कहते तो हो कि छोड़ोगे। कप्तान ने भी यही बात कही थी। संसारी आदमी कहते तो हैं, पर कर नहीं सकते।

“कितने ही पण्डित हैं जो ज्ञान की बातें कहा करते हैं। वे मुख ही से कहते हैं, काम कुछ नहीं कर सकते। जैसे गिद्ध उड़ता तो बहुत ऊँचे है, परन्तु उसकी नजर मरघट पर ही रहती है। अर्थात् उसी कामिनी-कांचन पर – संसार पर आसक्ति। अगर मैं सुनता हूँ कि किसी पण्डित को विवेक-वैराग्य है तो मुझे सचमुच उनसे श्रद्धापूर्ण भय होता है और नहीं तो वे सब भेड़-बकरे-से ही जान पड़ते हैं।”

प्राणकृष्ण प्रणाम करके बिदा हुए। उन्होंने मास्टर से चलने के लिए पूछा। मास्टर ने कहा; मैं अभी न जाऊँगा, आप चलिये। प्राणकृष्ण ने हँसते हुए कहा, तुम अब और नाव पर कदम रखोगे? (सब हँसते हैं।)

मास्टर ने पंचवटी में थोड़ी देर टहलकर, जिस घाट में श्रीरामकृष्ण नहाते थे, उसी में नहाया। इसके बाद श्रीभवतारिणी और राधाकान्त के दर्शन किये। वे सोच रहे हैं, मैंने सुना था ईश्वर निराकार हैं, तो फिर क्यों मैं इस मूर्ति के सामने प्रणाम कर रहा हूँ? क्या श्रीरामकृष्ण साकार देव-देवियों को मानते हैं इसलिए? मैं तो ईश्वर के सम्बन्ध में कुछ भी नहीं समझता; परन्तु जब कि श्रीरामकृष्ण मानते हैं, तो मैं किस खेत की मूली हूँ – मानना ही होगा।

मास्टर श्रीभवतारिणी माता के दर्शन कर रहे हैं। देखा, उनके दोनों बायें हाथों में खड्ग और नरमुण्ड शोभा दे रहे हैं, दोनों दाहिने हाथों में वर और अभय। एक ओर वे

४८२श्रीरामकृष्णवचनामृत५ अप्रैल, १८८४

भयंकरा मूर्ति हैं और दूसरी ओर भक्तवत्सला मातृमूर्ति। उनमें दो भावों का एकत्र समावेश हो रहा है। भक्तों के निकट, अपने दीन-हीन जीवों के निकट, माता दयामयी और स्नेहमयी के स्वरूप में आती हैं और यह भी सत्य है कि वे भयंकरा और कालकामिनी भी हैं। एक ही आधार में ये दो भाव क्यों हैं, इसका हाल तो वे ही जानें।

मास्टर श्रीरामकृष्ण की व्याख्या याद कर रहे हैं। सोच रहे हैं – सुना है, केशव सेन ने भी श्रीरामकृष्ण के पास देवी-प्रतिमा का अस्तित्व स्वीकार कर लिया था। 'क्या यही मृण्मय आधार में चिन्मयी मूर्ति है?' केशव यही बात कहते थे।

अब वे श्रीरामकृष्ण के पास आकर बैठे। वे नहा चुके हैं, यह देखकर श्रीरामकृष्ण ने उन्हें फलमूल प्रसाद खाने के लिए दिया। गोल बरामदे में आकर उन्होंने प्रसाद पाया। पानीवाला लोटा बरामदे में ही रह गया था। वे जल्दी से श्रीरामकृष्ण के पास आकर कमरे में बैठ ही रहे थे कि श्रीरामकृष्ण ने कहा, तुम लोटा नहीं लाये?

मास्टर – जी हाँ, लाता हूँ।

श्रीरामकृष्ण – वाह!

मास्टर का चेहरा फीका पड़ गया। बरामदे से लोटा लाकर कमरे में रखा।

मास्टर का घर कलकत्ते में है। घर में शान्ति न मिलने के कारण उन्होंने श्यामपुकुर में किराये का मकान लिया है। उनका स्कूल भी वहीं है। उनके अपने मकान में उनके पिता और भाई रहते हैं। श्रीरामकृष्ण की इच्छा है कि वे अपने मकान में आकर रहें; क्योंकि एक ही घर और एक ही थाली के खानेवालों में भजन-पूजन करने की बड़ी सुविधा है। यद्यपि श्रीरामकृष्ण बीच-बीच में ऐसा कहते थे, तथापि दुर्भाग्यवश मास्टर अपने घर वापस नहीं जा सके। आज श्रीरामकृष्ण ने फिर वही बात उठायी।

श्रीरामकृष्ण – क्यों, अब तुम घर जाओगे?

मास्टर – मेरा तो वहाँ रहने के लिए किसी तरह जी नहीं चाहता।

श्रीरामकृष्ण – क्यों, तुम्हारा बाप मकान गिरवाकर वहाँ नयी इमारत खड़ी कर रहा है।

मास्टर – घर में मुझे बड़ी तकलीफ मिली है। वहाँ जाने को मेरा किसी तरह मन नहीं होता।

श्रीरामकृष्ण – तुम किससे डरते हो?

मास्टर – सब से।

श्रीरामकृष्ण – (गम्भीर स्वर में) – वह भय वैसा ही है जैसा तुम्हें नाव पर चढ़ते समय होता है।

देवताओं का भोग लग गया। आरती हो रही है। कालीमन्दिर में आनन्द हो रहा है। आरती का शब्द सुनकर, कंगाल, साधु, फकीर, सब अतिथि-शाला में दौड़े आ रहे हैं।

५ अप्रैल, १८८४ परिच्छेद ७९ ४८३

५ अप्रैल, १८८४ परिच्छेद ७९ ४८३

किसी के हाथ में पत्तल है, किसी के हाथ में थाली लोटा। सब ने प्रसाद पाया। आज मास्टर ने भी भवतारिणी का प्रसाद पाया।

(३)

केशवचन्द्र सेन और 'नवविधान'। 'नवविधान में सार है'

श्रीरामकृष्ण प्रसाद ग्रहण करके जरा विश्राम कर रहे हैं। इतने में राम, गिरिन्द्र तथा और भी कई भक्त आ पहुँचे। भक्तों ने माथा टेककर प्रणाम किया और आसन ग्रहण किया।

श्रीयुत केशवचन्द्र सेन के नवविधान की चर्चा चली।

राम – (श्रीरामकृष्ण से) – महाराज, मुझे तो ऐसा नहीं जान पड़ता कि नवविधान से कोई उपकार हुआ हो। केशव बाबू अगर सच्चे होते, तो फिर उनके शिष्यों की यह दशा क्यों होती? मेरे मत से उनके भीतर कुछ भी नहीं है। जैसे खपरे बजाकर दरवाजे में ताला लगाना। लोग सोचते हैं, इसके खूब रुपये हैं – झनकार हो रही है, परन्तु भीतर बस खपरे ही खपरे हैं! बाहर के लोग भीतर की खबर क्या जानें!

श्रीरामकृष्ण – कुछ सार जरूर है। नहीं तो इतने आदमी केशव को क्यों मानते हैं? शिवनाथ को लोग क्यों नहीं पहचानते? ईश्वर की इच्छा के बिना ऐसा कभी होता नहीं।

"परन्तु संसार का त्याग किये बिना आचार्य का काम नहीं होता। लोग कहते हैं, यह संसारी आदमी है, यह खुद तो कामिनी और कांचन का छिपकर भोग करता है और हमसे कहता है, 'ईश्वर ही सत्य हैं – संसार स्वप्नवत् अनित्य है।' सर्वत्यागी हुए बिना उसकी बात सब लोग नहीं मानते। जो लोग संसार में पड़े हैं उन्ही में कोई कोई मान सकते हैं। केशव के घर-द्वार, कुटुम्ब-परिवार था, अतएव मन भी संसार में था। संसार की रक्षा भी तो करनी होगी? इसीलिए इतना लेक्चर उसने दिया, परन्तु अपने संसारे को बड़ी मजबूती में रख गया है। कैसा दामाद है! मैं उसके घर के भीतर गया, देखा बड़े बड़े पलंग हैं। सांसारिक काम करने लगे तो धीरे धीरे ये सब आ जाते हैं। भोग की ही भूमि संसार कहलाती है।"

राम – वे पलंग और मकान केशव को हिस्से में मिले थे। महाराज, आप कुछ भी कहें, परन्तु विजय बाबू ने कहा है – 'केशव सेन ने मुझसे कहा था, मैं ईसा और गौरांग का अंश हूँ और तुम अपने को अद्वैत का अंश बतलाया करो।' और उसने क्या कहा था – आप जानते हैं? आपको कहा था – वे भी नवविधान के हैं! (श्रीरामकृष्ण और सब हँसते हैं।)

श्रीरामकृष्ण – (हँसते हुए) – परमात्मा जाने, मैं तो यह भी नहीं जानता कि नवविधान का अर्थ क्या है। (सब हँसते हैं।)

४८४ श्रीरामकृष्णवचनामृत ५ अप्रैल, १८८४

राम – केशव की शिष्यमण्डली कहती है, ज्ञान और भक्ति का समन्वय सब से पहले केशव बाबू ने किया है।

श्रीरामकृष्ण – (आश्चर्य में आकर) – यह क्या! तो फिर अध्यात्म-रामायण है क्या? नारद श्रीरामचन्द्र की स्तुति करते हैं – 'हे राम! वेदों में जिस परब्रह्म की कथा है, वह तुम्हीं हो। तुम्हीं (ब्रह्म ही) मनुष्य के रूप में हमारे पास हो, तुम्हें (ब्रह्म को) ही हम मनुष्य देख रहे हैं; वस्तुतः तुम मनुष्य नहीं हो – वही परब्रह्म हो।' श्रीरामचन्द्र ने कहा, 'नारद, तुम पर मैं प्रसन्न हुआ हूँ; तुम वर माँगो।' नारद ने कहा, 'राम, और क्या वर माँगूँ; अपने पादपद्मों में मुझे शुद्धा भक्ति दो। और अपनी भुवनमोहिनी माया में कभी फँसा न देना।' इस तरह अध्यात्म-रामायण में केवल ज्ञान और भक्ति की ही बातें हैं।

फिर केशव के शिष्य अमृत की बात चली।

राम – अमृत बाबू कैसे हो गये हैं।

श्रीरामकृष्ण – हाँ, उस दिन मैंने बड़ा दुबला देखा।

राम – महाराज, अब लेक्चर की भी बात सुन लीजिये। जब खोल में पहला धावा मारा गया तब साथ ही कहा गया – 'केशव की जया' आपने कहा था – बँधी तलैया में ही दल* होता है। इसी पर एक दिन लेक्चर में अमृत बाबू ने कहा, साधु ने कहा है सही कि बँधी तलैया में दल होता है, परन्तु भाइयो, दल चाहिए – संगठन चाहिए – सच कहता हूँ – सच कहता हूँ – दल चाहिये। (सब हँसते हैं।)

श्रीरामकृष्ण – यह क्या है! राम-राम यह भी लेक्चर है!

फिर यह बात उठी कि कोई कोई जरा अपनी तारीफ चाहते हैं।

श्रीरामकृष्ण – निमाई-संन्यास का नाटक हो रहा था। केशव के यहाँ मुझे ले गये थे। वहाँ सुना, न जाने किसने कहा, ये दोनों केशव और प्रताप गौरांग और नित्यानन्द हैं। प्रसन्न ने तब मुझसे पूछा, तो फिर आप कौन हैं? देखा, केशव एकटक मेरी ओर देख रहा था, मैं क्या कहता हूँ यह सुनने के लिए। मैंने कहा, मैं तुम्हारे दासों का दास, रेणु की रेणु हूँ। केशव ने हँसकर कहा ये पकड़ में नहीं आना चाहते।

राम – केशव कभी कभी आपको जान दि बैपटिस्ट बतलाते थे।

एक भक्त – और कभी कभी आपको उन्नीसवीं सदी के चैतन्य बतलाते थे।

श्रीरामकृष्ण – इसके क्या माने?

भक्त – अर्थात् अंग्रेजी की इस शताब्दी में चैतन्यदेव फिर आये हैं और वे आप हैं।

श्रीरामकृष्ण – (अन्यमनस्क होकर) – खैर, वह तो जैसे हुआ। अब यह


* यहाँ 'दल' शब्द पर श्लेष है। 'दल' शब्द के दो अर्थ हैं – काई तथा सम्प्रदाय।

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बतलाओ कि हाथ कैसे अच्छा हो। अब बस यही सोचता हूँ कि हाथ कैसे अच्छा हो।*

त्रैलोक्य के गाने की बात चली। त्रैलोक्य केशव के समाज में भगवत्-गुणानुवाद-कीर्तन करते हैं।

श्रीरामकृष्ण – अहा! त्रैलोक्य का क्या ही सुन्दर गाना है!

राम – क्या सब बिलकुल ठीक होता है?

श्रीरामकृष्ण – हाँ, बिलकुल ठीक। अगर वैसा न होता तो मन को इतना क्यों खींचता?

राम – आप ही के सब भाव लेकर गीतों की रचना की गयी है। केशव सेन उपासना के समय उन्हीं सब भावों का वर्णन करते थे और त्रैलोक्य बाबू उसी तरह के पद जोड़ते थे। देखिये, एक गाना है –

(भावार्थ) 'प्रेम के बाजार में आनन्द का मेला लगा हुआ है। भक्तों के संग हरि अपनी मौज में कितने ही खेल खेल रहे हैं।'

"आप भक्तों के साथ आनन्द करते हैं, यह देखकर इस गाने की रचना हुई है।"

श्रीरामकृष्ण – (हँसते हुए) – तुम अब जलाओ मत। मुझे भला क्यों लपेटते हो? (सब हँसते हैं।)

गिरीन्द्र – ब्राह्मगण कहते हैं, परमहंसदेव में Faculty of organisation नहीं है।

श्रीरामकृष्ण – इसका क्या मतलब?

मास्टर – आप संगठन करना नहीं जानते, आप में बुद्धि कम है, यह कहते हैं।

श्रीरामकृष्ण – (राम से) – अब यह बतलाओ, मेरा हाथ क्यों टूटा? तुम इसी विषय पर एक लेक्चर दो। (सब हँसते हैं।)

"ब्राह्मसमाजी निराकार-निराकार कहा करते हैं। खैर, कहें। उन्हें अन्दर से पुकारने ही से हुआ। अगर अन्तर की बात हो तो वे तो अन्तर्यामी हैं, वे अवश्य समझा देंगे, उनका स्वरूप क्या है।

"परन्तु यह अच्छा नहीं – यह कहना कि हम लोगों ने जो कुछ समझा है, वही ठीक है, और दूसरे जो कुछ करते हैं, सब गलत। हम लोग निराकार कह रहे हैं, अतएव वे साकार नहीं, निराकार हैं; हम लोग साकार कह रहे हैं, अतएव वे साकार हैं, निराकार नहीं! मनुष्य क्या कभी उनकी इति कर सकता है?

"इसी तरह वैष्णवों और शाक्तों में भी विरोध है। वैष्णव कहता है 'हमारे केशव ही एकमात्र उद्धारकर्ता हैं' और शाक्त कहता है, 'बस हमारी भगवती एकमात्र उद्धार करनेवाली है।'


* उनके टूटे हाथ से मतलब है।

४८६ श्रीरामकृष्णवचनामृत ५ अप्रैल, १८८४

“मैं वैष्णवचरण को सेजो बाबू* के पास ले गया था। वैष्णवचरण वैरागी है, बड़ा पण्डित है, परन्तु कट्टर वैष्णव है। इधर सेजो बाबू भगवती के भक्त हैं। अच्छी बातें हो रही थीं, इसी समय वैष्णवचरण ने कह डाला, ‘मुक्ति देनेवाले तो एक केशव ही हैं।’ केशव का नाम लेते ही सेजो बाबू का मुँह लाल हो गया और वे बोले, ‘तू साला!’ (सब हँस पड़े।) मथुर बाबू शाक्त जो थे! उनके लिए यह कहना स्वाभाविक ही था। मैंने इधर वैष्णवचरण को खींच लिया।

“जितनें आदमियों को देखता हूँ, धर्म-धर्म करके एक दूसरे से झगड़ा किया करते हैं। हिन्दू, मुसलमान, ब्राह्मसमाजी, शाक्त, वैष्णव, शैव, सब एक दूसरे से लड़ाई-झगड़ा करते हैं यह बुद्धिमानी नहीं है। जिन्हें कृष्ण कहते हो, वे ही शिव, वे ही आद्याशक्ति हैं, वे ही ईसा हैं और वे ही अल्लाह हैं। एक राम उनके हजार नाम।

“वस्तु एक ही है, केवल उसके नाम अलग अलग हैं। सब लोग एक ही वस्तु की चाह कर रहे हैं। अन्तर इतना ही है कि देश अलग है, पात्र अलग और नाम अलग। एक तालाब में बहुत से घाट हैं। हिन्दू एक घाट से पानी ले रहे हैं, घड़े में भरकर कहते हैं, ‘जल’। मुसलमान एक दूसरे घाट से पानी भर रहे हैं, चमड़े के बैग में – कहते हैं, ‘पानी’। क्रिस्टान तीसरे घाट से पानी ले रहे हैं – वे कहते हैं ‘वाटर’ (Water)। (सब हँसते हैं।)

“अगर कोई कहे, नहीं यह चीज जल नहीं है, यह पानी है या वाटर नहीं जल है, तो यह हँसी की ही बात होगी। इसीलिए दल, मतान्तर और झगड़े होते हैं। धर्म के नाम पर लठ्ठम लट्ठा, मार-काट? यह सब अच्छा नहीं है। सब उन्हींके पथ पर जा रहे हैं। आन्तरिकता होने पर, व्याकुलता आने पर – उन्हें मनुष्य प्राप्त करेगा ही। (मणि से) तुम यह सुनते जाओ – वेद, पुराण, तन्त्र-शास्त्र उन्हींको चाहते हैं; वे किसी दूसरे को नहीं चाहते। सच्चिदानन्द बस एक ही हैं। जिन्हें वेदों में ‘सच्चिदानन्द ब्रह्म’ कहा है, तन्त्र में उन्हींको ‘सच्चिदानन्द शिव’ कहा है, उन्हींको उधर पुराणों में ‘सच्चिदानन्द कृष्ण’ कहा है।”

श्रीरामकृष्ण ने सुना, राम घर में कभी कभी स्वयं भोजन पकाते हैं।

श्रीरामकृष्ण – (मणि से) – क्या तुम भी अपने हाथ से भोजन पकाते हो?

मणि – जी नहीं।

श्रीरामकृष्ण – कोशिश करके देखो न जरा, थोड़ा सा गो-घृत छोड़ कर भोजन किया करो। शरीर और मन शुद्ध जान पड़ने लगेंगे।


* रानी रासमणि के दामाद श्रीयुत मथुरानाथ विश्वास।

५ अप्रैल, १८८४ परिच्छेद ७९ ४८७

राम की घर-गृहस्थी की बहुत सी बातें हो रही हैं। राम के पिता परम वैष्णव हैं। घर में श्रीधर की सेवा होती है। राम के पिता ने अपना दूसरा विवाह किया था उस समय राम की उम्र बहुत कम थी। पिता और विमाता राम के घर में ही थे, परन्तु विमाता के साथ रहकर राम सुखी नहीं रह सके। इस समय विमाता की उम्र चालीस साल की है। विमाता के कारण राम और उनके पिता में कभीकभी अनबन हो जाती थी। आज वे ही सब बातें हो रही हैं।

राम – बाबूजी की बुद्धि मारी गयी है।

श्रीरामकृष्ण – (भक्तों से) – सुना? बाबूजी की बुद्धि मारी गयी है और आपकी बहुत अच्छी है।

राम – उनके (विमाता के) मकान में आने ही से अशान्ति होती है। एक न एक झंझट पैदा होती है। हमारा परिवार नष्ट होने पर आ गया। इसीलिए मैं कहता हूँ, वे अपने मायके में क्यों नहीं जाकर रहतीं?

गिरीन्द्र – (राम से) – अपनी स्त्री को उसी तरह मायके में क्यों नहीं रखते? (सब हँसते हैं।)

श्रीरामकृष्ण – (सहास्य) – यह क्या कुछ हण्डी और घड़ा है? हण्डी एक जगह रही और उसका ढक्कन दूसरी जगह! शिव एक ओर तथा शक्ति दूसरी ओर!

राम – महाराज, हम लोग सुख से हैं, वे आयी नहीं कि तोड़फोड़ मचाया। ऐसी दशा में –

श्रीरामकृष्ण – हाँ, अलग एक मकान कर दो, यह एक बात हो सकती है। महीने-महीने सब खर्च देते जाना। पिता कितने बड़े गुरु हैं! राखाल मुझसे पूछता था, क्या मैं बाबूजी की थाली में खा लूँ? मैंने कहा, 'अरे, यह क्या? तुझे हो क्या गया है जो तू अपने बाप की थाली में न खायेगा?'

"परन्तु एक बात है। जो लोग सन्मार्ग में हैं, वे अपना जूठा किसी को खाने के लिए नहीं देते। यहाँ तक कि कुत्ते को भी जूठन नहीं दी जाती।"

गिरीन्द्र – महाराज, माँ-बाप ने अगर कोई घोर अपराध किया हो, कोई घोर पाप किया हो तो?

श्रीरामकृष्ण – तो वह भी सही। माता यदि व्याभिचारिणी हो तो भी उसका त्याग न करना चाहिए। अमुक बाबुओं की गुरुपत्नी का चरित्र नष्ट हो गया। तब उन्होंने कहा, उनका लड़का गुरु बनाया जाय। मैंने कहा, 'यह तुम क्या कहते हो? तुम सूरन को छोड़कर सूरन की आँख लोगे? नष्ट हो गयी तो क्या हुआ? तुम उसे ही अपना इष्ट समझो।' एक गाने में है – 'मेरे गुरु यद्यपि कलवार की दूकान पर जाया करते हैं, तथापि मेरे गुरु नित्यानन्द राय हैं।'

४८८श्रीरामकृष्णवचनामृत५ अप्रैल, १८८४

चैतन्यदेव और माँ। मनुष्य के ऋण

“माँ-बाप क्या कुछ साधारण मनुष्य हैं? बिना उनके प्रसन्न हुए धर्म-कर्म कुछ भी नहीं होता। चैतन्यदेव प्रेम से पागल थे, परन्तु फिर भी संन्यास से पहले कुछ दिन लगातार उन्होंने अपने माता को समझाया था। कहा था - 'माँ! मैं कभी कभी आकर तुम्हें देख-दिखा जाया करूँगा।' (मास्टर से तिरस्कार करते हुए) और तुम्हारे लिए कहता हूँ, माँ-बाप ने तुम्हें आदमी बना दिया, अब कई लड़के-बच्चे भी हो गये हैं, इस पर बीबी को साथ लेकर निकल आना! माता-पिता को धोखा देकर बीबी-बच्चों को लेकर, वैष्णव-वैष्णवी बनकर निकलता है! तुम्हारे बाप को कोई कमी नहीं है, नहीं तो मैं कहता, धिक्कार है तुमको! (सब के सब स्तब्ध हैं।)

“कुछ ऋण हैं। देवऋण, ऋषिऋण; उधर मातृऋण, पितृऋण, स्त्री-ऋण। माता-पिता के ऋण का शोध किये बिना कोई काम नहीं होता। फिर पत्नी का भी ऋण है। हरीश पत्नी का त्याग करके यहाँ आकर रहता है। यदि उसकी स्त्री के भोजन की सुविधा न होती तो मैं कहता, साला बेईमान है।

“ज्ञान के पश्चात् उसी पत्नी को तुम साक्षात् भगवती देखोगे! सप्तशती में है, 'या देवी सर्वभूतेषु मातृरूपेण संस्थिता।' वे ही माँ हुई हैं।

“जितनी स्त्रियाँ देखते हो, सब वे ही हैं; इसीलिए मैं वृन्दा (नौकरानी) को कुछ कह नहीं सकता। कोई-कोई लोग श्लोक झाड़ते हैं - लम्बी-लम्बी बातें बघारते हैं, परन्तु उनका व्यवहार कुछ और ही होता है। इस हठयोगी के लिए किसी तरह अफीम और दूध इकट्ठा हो, रामप्रसन्न बस इसी चिन्ता में मारामारा घूमता है। और वह यह भी कहता है कि मनु में साधु-सेवा का उल्लेख है। इधर बूढ़ी माँ खाने को नहीं पाती, सौदा खरीदने के लिए हाट-बाजार खुद जाया करती है। क्या कहूँ ऐसा क्रोध आता है!

“परन्तु एक बात और है। अगर प्रेमोन्मत्त अवस्था हो तो फिर कौन है बाप, कौन है माँ और कौन है स्त्री? ईश्वर पर इतना प्यार हो कि पागल हो जाय। फिर उसके लिए कुछ भी कर्तव्य नहीं रह जाता। सब ऋणों से वह मुक्त हो जाता है। प्रेमोन्माद कैसा है, जानते हो? उस अवस्था के आने पर संसार भूल जाता है। अपनी देह जो इतनी प्यारी चीज है, वह भी भूल जाता है। यह अवस्था चैतन्यदेव की हुई थी। समुद्र में कूद पड़े, समुद्र का बोध ही नहीं। मिट्टी में बार-बार पछाड़ खा-खाकर गिरते हैं, न भूख है, न नींद; शरीर का बोध भी नहीं!”

श्रीरामकृष्ण 'हा चैतन्य' कह उठे।

(भक्तों के प्रति) “चैतन्य के माने अखण्ड चैतन्य। वैष्णवचरण कहता था, गौरांग अखण्ड चैतन्य की ही एक छटा हैं।

५ अप्रैल, १८८४ | परिच्छेद ७९ | ४८९

५ अप्रैल, १८८४परिच्छेद ७९४८९

“तुम्हारी क्या इस समय तीर्थ जाने की इच्छा है?”

बूढ़े गोपाल – जी हाँ, जरा देखभाल आयें।

राम – (बूढ़े गोपाल से) – ये कहते हैं, बहूदक के बाद कुटीचक की अवस्था होती है। जो साधु अनेक तीर्थों का भ्रमण करते हैं, उनका नाम है बहूदक, और जो एक जगह डटकर आसन जमा देते हैं उन्हें कुटीचक कहते हैं।

“एक बात और ये कहते हैं। एक पक्षी जहाज के मस्तूल पर बैठा था। जहाज गंगा से होकर काले पानी में (समुद्र में) चला गया। पक्षी को इसका होश न था। जब वह होश में आया, तब किनारे का पता लगाने के लिए उत्तर की ओर उड़ गया। परन्तु उसने किनारा कहीं न देखा, तब लौट आया। फिर जरा देर विश्राम करके दक्षिण की ओर गया। उधर भी किनारा न दीख पड़ा। इसी तरह कुछ-कुछ विश्राम करके पूर्व और पश्चिम में भी गया। जब उसने देखा, कहीं किनारा नहीं है, तब मस्तूल पर आकर चुपचाप बैठ गया।”

श्रीरामकृष्ण – (बूढ़े गोपाल और भक्तों से) – जब तक यह बोध है कि ईश्वर वहाँ है – वहाँ है, तब तक अज्ञान है। जब यहाँ है, यह बोध हो जाता है, तब ज्ञान।

“एक आदमी तम्बाकू पीना चाहता था। वह अपने पड़ोसी के घर गया – टिकिया सुलगाने के लिए। घर के सब लोग सो गये थे। बड़ी देर तक दरवाजा खटखटाने पर एक आदमी खोलने के लिए नीचे उतर आया। उस आदमी को देखकर घरवाले ने पूछा, कहो, कैसे आये? उसने कहा, क्या कहूँ कैसे आया। जानते तो हो कि तम्बाकू पीने का चस्का है, टिकिया सुलगाने आया था। तब घरवाले ने कहा अजी वाह, तुम तो बड़े भले मानस निकले, इतनी मेहनत करके आये और दरवाजा खटखटाया, तुम्हारे हाथ में लालटेन जो है! (सब हँसते हैं।)

“जो कुछ चाहता है, वही उसके पास है, फिर भी आदमी अनेक स्थानों में चक्कर लगाया करता है।”

राम – महाराज, अब इसका मतलब समझ में आ गया। समझा कि गुरु क्यों कहते हैं कि चारों धाम करके आ जाओ। जब एक बार चक्कर मारकर देखता है कि जो कुछ यहाँ है, वही सब वहाँ भी है, तब फिर वह गुरु के पास लौटकर आता है। यह सब केवल गुरु की बात पर विश्वास होने के लिए है।

बात कुछ रुक गयी। श्रीरामकृष्ण राम की तारीफ कर रहे हैं।

श्रीरामकृष्ण – (भक्तों से) – अहा! राम में कितने गुण हैं। कितने भक्तों की सेवा और उनका पालन-पोषण करता है। (राम से) अधर कहता था, तुमने उसकी बड़ी खातिरदारी की – क्यों, ठीक है न?

अधर शोभाबाजार में रहते हैं। श्रीरामकृष्ण के परमभक्त हैं। उनके यहाँ चण्डी के गीत हुए थे। श्रीरामकृष्ण और भक्तों में से कितने ही वहाँ गये थे। परन्तु अधर राम को

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४९०श्रीरामकृष्णवचनामृत५ अप्रैल, १८८४

न्योता देना भूल गये थे। राम बड़े अभिमानी हैं – उन्होंने लोगों से उसके लिए दुःख प्रकट किया था। इसीलिए अधर राम के घर गये थे। उनसे भूल हुई थी, इसके लिए दुःख प्रकट करने गये थे।

राम – वह अधर का दोष नहीं है। न्योता देने का भार राखाल पर था।

श्रीरामकृष्ण – राखाल का दोष लेना ही नहीं चाहिए। गला दबाओ तो अब भी दूध निकल आये।

राम – महाराज, कहते क्या हैं, चण्डी के गीत हुए – ?

श्रीरामकृष्ण – अधर यह नहीं जानता था। देखो न, उस दिन यदु मल्लिक के यहाँ मेरे साथ गया था। मैंने लौटते समय पूछा, तुमने सिंहवाहिनी को प्रणामी दी? उसने कहा, महाराज, मैं नहीं जानता था कि प्रणामी देनी पड़ती है।

“अच्छा, अगर न भी कहा हो, तो राम-नाम में दोष क्या है? जहाँ राम-नाम होता हो वहाँ बिना बुलाये भी जाया जाता है। न्योते की आवश्यकता नहीं होती।”

□ □ □

CC-0. In Public Domain. Gurukul Kangri Collection, Haridwar

परिच्छेद ८०

परिच्छेद ८०

आत्मदर्शन के उपाय

(१)

फलहारिणी पूजा तथा विद्यासुन्दर कृत नाटक का अभिनय

श्रीरामकृष्ण उसी पूर्वपरिचित कमरे में बैठे हैं दिन के ११ बजे का समय हुआ। राखाल, मास्टर आदि भक्तगण उसी कमरे में उपस्थित हैं। गत रात्रि में फलहारिणी काली की पूजा हो गयी। उस उत्सव के उपलक्ष्य में सभा-मण्डप में रात्रि के तीसरे पहर से नाटक का अभिनय शुरू हुआ है – विद्यासुन्दर कृत नाटक।

श्रीरामकृष्ण ने प्रातःकाल काली माता के दर्शन को जाते समय थोड़ा अभिनय भी देखा है। नाटकवाले लोग स्नान आदि कर चुकने के बाद श्रीरामकृष्ण का दर्शन करने आये हैं।

शनिवार, २४ मई १८८४ ई., अमावस्या।

गोरे रंग का जो लड़का ‘विद्या’ बना था उसने अच्छा अभिनय किया था। श्रीरामकृष्ण आनन्द से उसके साथ ईश्वर सम्बन्धी अनेक बातें कर रहे हैं। भक्तगण उत्सुक होकर सब सुन रहे हैं।

श्रीरामकृष्ण – (विद्या के अभिनेता के प्रति) – तुम्हारा अभिनय बहुत अच्छा हुआ। यदि कोई गाने में, बजाने में, नाचने में या किसी भी एक विद्या में प्रवीण हो, तो वह चेष्टा करने पर शीघ्र ही ईश्वर को प्राप्त कर सकता है।

‘मृत्यु की याद करो।’ ‘अभ्यासयोग’

“और तुम लोग जिस प्रकार देर तक अभ्यास करके गाना, बजाना या नाचना सीखते हो, उसी प्रकार ईश्वर में मन लगाने का अभ्यास करना होता है। पूजा, जप, ध्यान, इन सब का नियमित रूप से अभ्यास करना पड़ता है।

“क्या तुम्हारा विवाह हो गया है? कोई बाल-बच्चे हैं?”

विद्या – जी, एक लड़की का देहान्त हो गया है, फिर एक सन्तान हुई है।

श्रीरामकृष्ण – इसी बीच में हुआ और मर भी गया। तुम्हारी यह कम उम्र! कहते

४९२ श्रीरामकृष्णवचनामृत २४ मई, १८८४

हैं – ‘सन्ध्या के समय पति मरा, कितनी रात तक रोऊँगी!’ (सभी हँस पड़े।)

“संसार में सुख तो देख रहे हो? मानो आमड़ाफल, केवल गुठली और छिलका है। और फिर खाने से अम्लशूल हो जाता है!

“नाटक कम्पनी में नट का काम कर रहे हो, ठीक है, परन्तु बड़ा कष्ट होता है! अभी कम उम्र है इसीलिए गोलगाल चेहरा है। इसके बाद सब बिगड़ जायगा। नट प्रायः उसी प्रकार के होते हैं। मुँह सूखा, पेट मोटा, बाँह पर ताबीज। (सभी हँसे)

मैंने क्यों विद्यासुन्दर का गाना सुना? देखा – ताल, मान, गाना सब अच्छे हैं। बाद में माँ ने दिखा दिया कि नारायण ही इन नटों का रूप धारण कर नाटक कर रहे हैं।”

विद्या – जी, काम और कामना में क्या भेद है?

श्रीरामकृष्ण – काम मानो वृक्ष का मूल है और कामना मानो शाखा-प्रशाखाएँ।

“ये काम, क्रोध, लोभ आदि छः रिपु एकदम तो जायेंगे नहीं, इसीलिए ईश्वर की ओर उनका मुँह फेर देना होगा। यदि कामना करनी हो, लोभ करना हो तो ईश्वर की भक्ति की कामना करनी चाहिए और उन्हें पाने के लिए लोभ करना चाहिए; यदि मद अर्थात् मत्तता करनी है, अहंकार करना है, तो ‘मैं ईश्वर का दास हूँ, ईश्वर की सन्तान हूँ’ यह कहकर मत्तता, अहंकार करना चाहिए। सम्पूर्ण मन उन्हें दिये बिना उनका दर्शन नहीं होता।

“कामिनी और कांचन में मन का व्यर्थ में व्यय होता है। यह देखो न, बाल-बच्चे हुए हैं, नाटक में काम करना पड़ रहा है – इन सब अनेक कर्मों के कारण ईश्वर में मन का योग नहीं हो पाता।

“भोग रहने से ही योग घट जाता है। भोग रहने से ही कष्ट होता है। श्रीमद्भागवत में कहा है – अवधूत ने अपने चौबीस गुरुओं में चील को भी एक गुरु बनाया था। चील के मुँह में मछली थी, इसीलिए हजार कौओं ने उसे घेर लिया। मछली को मुँह में लेकर वह जिधर जाती थी उधर ही सब कौए काँव काँव करके उसके पीछे भागते थे। पर जब चील के मुँह से अपने आप मछली गिर गयी, तो सब कौए मछली की ओर दौड़े, चील की ओर फिर न गये।

“मछली अर्थात् भोग की चीज। कौए हैं चिन्ताएँ। जहाँ भोग है वहीं चिन्ता है। भोगों का त्याग होने से ही शान्ति होती है।

“फिर देखो, अर्थ ही अनर्थ हो जाता है। तुम भाई भाई अच्छे हो, परन्तु भाई भाई में बटवारे के प्रश्न पर झगड़ा होता है। कुत्ते आपस में एक दूसरे को चाटते हैं, खूब प्रेम भाव रहता है। परन्तु उन्हें यदि कोई भात, रोटी आदि कुछ फेंक दे, तो आपस में वे एक दूसरे को काटने लगेंगे।

“बीच-बीच में यहाँ पर आते जाना। (मास्टर आदि को दिखाकर) ये लोग आते हैं,

२४ मई, १८८४ | परिच्छेद ८० | ४९३

२४ मई, १८८४परिच्छेद ८०४९३

रविवार या किसी दूसरे अवकाश के दिन आते हैं।”

विद्या – हमारा रविवार तीन मास का होता है। श्रावण, भाद्रपद और पौष - वर्षकाल और धान काटने का समय। जी, आपके पास आयें, यह तो हमारा अहोभाग्य है!

“दक्षिणेश्वर में आते समय दो व्यक्तियों का नाम सुना था – आपका और ज्ञानार्णव का।”

श्रीरामकृष्ण – भाइयों के साथ मेल रखकर रहना। मेल रहने से ही देखने सुनने में सब भला होता है। नाटक में नहीं देखा? चार व्यक्ति गाना गा रहे हैं, परन्तु यदि प्रत्येक व्यक्ति अलग अलग तान छेड़ दे तो नाटक पर ही पानी फिर जायगा!

विद्या – जाल में अनेक पक्षी फँसे पड़े हैं। यदि एक साथ चेष्टा करके जाल लेकर एक ही दिशा में उड़ जायें तो बहुत कुछ बचाव हो सकता है। परन्तु यदि प्रत्येक पक्षी अलग अलग दिशा में उड़ने की चेष्टा करे, तो कुछ नहीं होता। नाटक में भी देखने में आता है, सिर पर घड़ा, और नाच रहा है।

श्रीरामकृष्ण – गृहस्थी करो, परन्तु सिर पर घड़े को ठीक रखो अर्थात् ईश्वर की ओर मन को स्थिर रखो।

“मैंने पल्टन के सिपाहियों से कहा था, तुम लोग संसार का कामकाज करोगे, परन्तु कालरूपी (मृत्युरूपी) मूसल हाथ पर पड़ेगा, इसका ख्याल रखना।

“उस देश में बढ़ई लोगों की औरतें ओखली में चिउड़ा कूटती हैं। एक औरत मूसल को उठाती और गिराती है, और दूसरी चिउड़ा उलट देती है – यह ध्यान रखती है कि कहीं मूसला हाथ पर न पड़ जाय। इधर बच्चे को स्तन-पान भी कराती है और एक हाथ से भीगे धान को चूल्हे पर रखकर पतीले में भून लेती है। फिर ग्राहक के साथ बातचीत भी करती है, कहती है, तुम्हारे ऊपर इतने पैसे पहले के उधार हैं, दे जाना।

“ईश्वर में मन रखकर इसी प्रकार संसार में अनेकानेक कामकाज कर सकते हो, परन्तु अभ्यास चाहिए और होशियार रहना चाहिए, तब दोनों ओर की रक्षा होती है।”

आत्मदर्शन या ईश्वरदर्शन का उपाय-साधुसंग

या विज्ञान (साइन्स)?

विद्या – जी, इसका क्या प्रमाण है कि आत्मा शरीर से पृथक् है?

श्रीरामकृष्ण – प्रमाण? ईश्वर को देखा जा सकता है। तपस्या करने पर उनकी कृपा से ईश्वर का दर्शन होता है। ऋषियों ने आत्मा का साक्षात्कार किया था। साइन्स से ईश्वरतत्त्व जाना नहीं जाता, उसके द्वारा केवल इन इन्द्रियग्राह्य बातों का पता लगता है कि इसके साथ उसे मिलाने पर यह होता है और उसके साथ इसे मिलाने पर यह होता है;

४९४ श्रीरामकृष्णवचनामृत २४ मई, १८८४

इसीलिए इस बुद्धि के द्वारा यह सब समझा नहीं जाता। साधुसंग करना होता है। वैद्य के साथ रहते रहते नाड़ी परखना आ जाता है।

विद्या – जी, अब समझा।

श्रीरामकृष्ण – तपस्या चाहिए, तब वस्तु की प्राप्ति होगी। शास्त्र के श्लोकों को रट लेने से भी कुछ न होगा। 'गांजा गांजा' मुँह से कहने से नशा नहीं होता। गांजा पीना पड़ता है।

“ईश्वर-दर्शन की बात लोगों को समझायी नहीं जा सकती। पाँच वर्ष के बालक को पति-पत्नी के मिलने के आनन्द की बात समझायी नहीं जा सकती।”

विद्या – जी, आत्मदर्शन किस उपाय से हो सकता है?

इसी समय राखाल कमरे में भोजन करने बैठ रहे थे। परन्तु वहाँ अनेक लोग हैं, इसलिए सोच-विचार कर रहे हैं। श्रीरामकृष्ण आजकल राखाल का गोपाल-भाव से पालन कर रहे हैं। – ठीक मानो माँ यशोदा का वात्सल्य-भाव।

श्रीरामकृष्ण (राखाल के प्रति) – खा न रे! ये लोग नहीं तो उठकर एक ओर खड़े हो जायँ। (एक भक्त के प्रति) राखाल के लिए बर्फ रखो। (राखाल के प्रति) तू फिर बन-हुगली जायगा? धूप में न जाना।

राखाल भोजन करने बैठे। श्रीरामकृष्ण फिर विद्या का अभिनय करनेवाले लड़के के साथ वार्तालाप कर रहे हैं।

श्रीरामकृष्ण – (विद्या के प्रति) – तुम सब ने मन्दिर में प्रसाद क्यों नहीं लिया? यहीं पर भोजन करते।

विद्या – जी, सभी की राय तो एक-सी नहीं है, इसीलिए अलग रसोई बन रही है। सभी लोग अतिथिशाला में भोजन करना नहीं चाहते।

राखाल भोजन करने बैठे हैं; श्रीरामकृष्ण भक्तों के साथ बरामदे में बैठकर फिर बातचीत कर रहे हैं।

(२)

आत्मदर्शन का उपाय

श्रीरामकृष्ण – (विद्या अभिनेता के प्रति) – आत्मदर्शन का उपाय है व्याकुलता। मन, वचन और कर्म से उन्हें पाने की चेष्टा। जब देह में काफी पित्त जम जाता है, तो सभी चीजें पीली दिखती हैं; पीले के अतिरिक्त दूसरा कोई रंग नहीं दिखता।

“तुम नाटकवालों में जो लोग केवल औरतों का काम करते हैं, उनका प्रकृतिभाव हो जाता है। औरतों का चिन्तन करके औरतों की तरह चलना-फिरना, सभी कुछ उनके समान हो जाता है। इसी प्रकार रात-दिन ईश्वर का चिन्तन करने पर उन्हीं का स्वभाव प्राप्त

२४ मई, १८८४ परिच्छेद ८० ४९५

२४ मई, १८८४ परिच्छेद ८० ४९५

हो जाता है।

"मन को जिस रंग में रँगवाओगे उसका वही रंग हो जाता है। मन मानो धोबी के घर का धुला हुआ कपड़ा है।"

विद्या – तो इसे एक बार पहले धोबी के घर भेजना होगा।

श्रीरामकृष्ण – हाँ, पहले चित्तशुद्धि, उसके बाद मन को यदि ईश्वर-चिन्तन में छोड़ दो, तो उसी रंग का बन जायगा। फिर यदि संसार करो, नाटकवाले का काम करो या जो कुछ भी करो, उसी प्रकार का बन जायगा।

(३)

श्रीरामकृष्ण ने थोड़ा सा ही विश्राम किया था कि कलकत्ते से हरि, नारायण, नरेन्द्र बन्द्योपाध्याय आदि ने आकर भूमिष्ठ हो उन्हें प्रणाम किया। नरेन्द्र बन्द्योपाध्याय प्रेसीडेन्सी कॉलेज के संस्कृत अध्यापक राजकृष्ण बन्द्योपाध्याय के पुत्र हैं। घर में मेल न होने के कारण श्यामपुकुर में अलग मकान लेकर स्त्री-पुत्र के साथ रहते हैं। बहुत ही सरलचित्त व्यक्ति हैं; २९-३० साल की उम्र होगी। जीवन के शेष भाग में उन्होंने प्रयाग में निवास किया था। ५८ वर्ष में उनका देहान्त हुआ था।

ध्यान के समय वे घण्टा-ध्वनि आदि नाना प्रकार के शब्द सुनते थे। भूटान, उत्तर पश्चिम तथा अन्य अनेक प्रदेशों में उन्होंने भ्रमण किया था, बीच-बीच में श्रीरामकृष्ण का दर्शन करने आते थे।

हरि (स्वामी तुरीयानन्द) उन दिनों अपने बागबाजार के मकान में भाइयों के साथ रहते थे। जनरल असेम्बली में प्रवेशिका (मैट्रिक) तक पढ़कर उस समय घर पर ईश्वर-चिन्तन, शास्त्र-पाठ तथा योग का अभ्यास किया करते थे। कभी कभी दक्षिणेश्वर में जाकर श्रीरामकृष्ण का दर्शन करते थे। श्रीरामकृष्ण बागबाजार में बलराम के घर जाने पर उन्हें कभी कभी बुला लेते थे।

बौद्धधर्म की बात: ब्रह्म ज्ञानस्वरूप है

श्रीरामकृष्ण – (भक्तों के प्रति) – बुद्धदेव की बात हमने अनेक बार सुनी है। वे दस अवतारों में से एक हैं। ब्रह्म अचल, अटल है, निष्क्रिय है और ज्ञानस्वरूप है। जब बुद्धि उस ज्ञानस्वरूप में लीन हो जाती है, उस समय ब्रह्मज्ञान होता है, उस समय मनुष्य बुद्ध बन जाता है।

"न्यांगटा (तोतापुरी) कहा करता था, मन का लय बुद्धि में, और बुद्धि का लय ज्ञानस्वरूप में हो जाता है।

"जब तक 'अहं' भाव रहता है, तब तक ब्रह्मज्ञान नहीं होता। ब्रह्मज्ञान होने पर, ईश्वर का दर्शन होने पर 'अहं' अपने वश में आ जाता है। ऐसा न होने पर 'अहं' को

४९६ श्रीरामकृष्णवचनामृत २४ मई, १८८४

वशीभूत नहीं किया जा सकता। अपनी परछाईं को पकड़ना कठिन है परन्तु सूर्य जब सिर पर आ जाता है तो परछाईं आधे हाथ के भीतर रहती है।”

भक्त – ईश्वर-दर्शन का स्वरूप कैसा है?

श्रीरामकृष्ण – नाटक का अभिनय नहीं देखा है? लोग सब आपस में बातचीत कर रहे हैं; ऐसे समय परदा उठ गया तब सब लोगों का सारा मन अभिनय में लग जाता है। फिर बाहर की ओर दृष्टि नहीं रहती। इसी का नाम है समाधिस्थ होना।

“फिर परदा गिरने पर पुनः बाहर की ओर दृष्टि। मायारूपी परदा गिरने पर फिर मनुष्य बहिर्मुख हो जाता है। (नरेन्द्र बन्द्योपाध्याय के प्रति) तुमने अनेक देशों में भ्रमण किया है। कुछ साधुओं की कहानी सुनाओ।”

बन्द्योपाध्याय ने भूटान में दो योगियों को देखा था, वे आधा सेर नीम का रस पी जाते थे, ये ही सब कहानियाँ कह रहे हैं। फिर नर्मदा के तट पर साधु के आश्रम में गये थे। उस आश्रम के साधु ने पैण्ट पहने बंगाली बाबू को देखकर कहा था, 'इसके पेट में छुरी है।'

श्रीरामकृष्ण – देखो, साधुओं के चित्र घर में रखने चाहिए, इससे सदा ईश्वर का उद्दीपन होता है।

बन्द्योपाध्याय – मैंने आपका चित्र कमरे में रखा है और साथ ही एक पहाड़ी साधु का चित्र भी रखा है – हाथ में गांजा की चिलम में आग जल रही है।

श्रीरामकृष्ण – हाँ, साधुओं का चित्र देखने से उद्दीपन होता है। जैसे मिट्टी का बना हुआ आम देखने से वास्तविक आम का उद्दीपन होता है, युवती स्त्री देखने से लोगों के मन में जिस प्रकार भोग का उद्दीपन होता है।

“इसीलिए तुम लोगों से कहता हूँ कि सदैव ही साधु-संग आवश्यक है। (बन्द्योपाध्याय के प्रति) संसार की ज्वाला तो देखी है। भोग लेने में ही ज्वाला है। चील के मुँह में जब तक मछली थी, तब तक झुण्ड के झुण्ड कौए आकर उसे तंग कर रहे थे।

“साधु-संगति में शान्ति होती है। जल के भीतर मगर बहुत देर तक रहता है, साँस लेने के लिए एक एक बार जल के ऊपर चला आता है। उस समय साँस लेकर शान्त हो जाता है।”

नाटकवाला – जी आपने भोग की बातें कहीं सो ठीक है। ईश्वर से भोग माँगने पर अन्त में विपत्ति होती है। मन में कितने प्रकार की कामनाएँ उठ रही हैं, सभी कामनाओं से तो मंगल नहीं होता। ईश्वर कल्पतरु हैं। मनुष्य उनसे जो भी कुछ माँगता है, वही उसे प्राप्त होता है। अब उसके मन में यदि ऐसी भावना हो कि 'ये तो कल्पतरु हैं अच्छा, देखें, यदि शेर यहाँ पर आ जाय तो जानों।' बस शेर की याद करते ही शेर आ खड़ा होता है और उसे खा जाता है।