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श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)

Sri Ramakrishna Vachanamrita (Part 1 - Tr. Nirala)

श्री 'म' (महेंद्रनाथ गुप्त) / सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा

DevanagariHindipublished711 पृष्ठ

५१० श्रीरामकृष्णवचनामृत २५ मई, १८८४

(४)

संन्यासी का कठिन व्रत। संन्यासी और लोकशिक्षा

श्रीरामकृष्ण गंगा के किनारेवाले गोल बरामदे में बैठे हुए हैं। पास ही विजय, भवनाथ, मास्टर, केदार आदि भक्तगण हैं। श्रीरामकृष्ण एक एक बार कह रहे हैं, हा कृष्ण चैतन्य!

श्रीरामकृष्ण – (विजय आदि भक्तों से) – घर में खूब राम नाम किया गया है, कोई कहता था, इसीसे खूब रंग जमा!

भवनाथ – तिस पर संन्यास की बात!

श्रीरामकृष्ण – अहा! क्या भाव है!

यह कहकर श्रीरामकृष्ण ने गौरांग पर एक गाना गाया। गीत के समाप्त होने पर आपने विजय आदि भक्तों से कहा – “कीर्तन में बहुत ही अच्छा कहा है! – संन्यासी को नारी की ओर नजर भी उठाकर न देखना चाहिए, संन्यासी का धर्म यही है।”

विजय – जी हाँ।

श्रीरामकृष्ण – संन्यासी को देखकर लोग शिक्षा लेंगे न, इसीलिए इतना कठोर नियम है। संन्यासी को स्त्रियों का चित्र भी न देखना चाहिए। उसके लिए ऐसा कठोर नियम है। काला बकरा माता की बलि पर चढ़ाया जाता है, परन्तु जरा भी कहीं घाव हुआ तो फिर उसकी बलि नहीं दी जाती। स्त्रियों का संग तो करना ही नहीं चाहिए। इतना ही नहीं वरन् उनसे बातचीत करना भी संन्यासी के लिए निषिद्ध है।

विजय – छोटे हरिदास ने एक भक्त स्त्री के साथ बातचीत की थी, चैतन्यदेव ने हरिदास का त्याग कर दिया था।

श्रीरामकृष्ण – संन्यासी के लिए कामिनी-कांचन, जैसे सुन्दरी स्त्री के लिए उसके देह की एक खास बदबू। वह बदबू रही तो सब सौन्दर्य ही वृथा है।

“मारवाड़ी ने मेरे नाम से रुपये लिख देना चाहा – मथुर ने जमीन लिख देना चाहा, परन्तु मैं यह कुछ न ले सका।

“संन्यासी के लिए बड़े कठिन नियम हैं। जब साधु-संन्यासी का भेष किया, तब उसे ठीक ठीक साधुओं और संन्यासियों का काम करना चाहिए। थिएटर में देखा नहीं? जो राजा बनता है, वह राजा की ही तरह रहता है, जो मन्त्री बनता है, वह ठीक उसी तरह के आचरण करता है।

“किसी बहुरुपिये ने त्यागी साधु का स्वाँग दिखाया, बिलकुल साधु बन गया। दर्शकों ने उसे एक तोड़ा रुपया देना चाहा। वह ‘उँह’ कहकर चला गया। तोड़ा छुआ तक नहीं। परन्तु थोड़ी देर बाद, देह और हाथ-पैर धोकर अपने कपड़े पहनकर वह आया।

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कहा, “क्या दे रहे थे अब दीजिये। जब साधु बना था तब रुपये नहीं छू सका, अब चार आने भी मिल जायें तो न छोड़ें।'

“परन्तु मनुष्य परमहंस की अवस्था में बालक हो जाता है। पाँच वर्ष के बालक को स्त्री-पुरुष का ज्ञान नहीं होता। फिर भी लोक-शिक्षण के लिए परमहंस को सावधान रहना पड़ता है।”

श्रीयुत केशव सेन कामिनी-कांचन के भीतर थे, इसीलिए लोक-शिक्षण में बाधा पड़ी थी। श्रीरामकृष्ण यही बात कह रहे हैं।

श्रीरामकृष्ण – ये – (केशव) – समझे?

विजय – जी हाँ।

श्रीरामकृष्ण – इधर-उधर दोनों की रक्षा के लिए बढ़े, इसीलिए विशेष कुछ न कर सके।

विजय – चैतन्यदेव ने नित्यानन्द से कहा, 'नित्यानन्द, अगर मैं संसार का त्याग न करूंगा, तो लोगों का कल्याण न होगा। मुझे देखकर सब लोग संसार में रहना ही पसन्द करेंगे। कामिनी-कांचन का त्याग करके श्रीभगवान के पादपद्मों में सम्पूर्ण मन समर्पित कर देने की चेष्टा फिर कोई न करेगा।'

श्रीरामकृष्ण – चैतन्यदेव ने लोक-शिक्षा के लिए ही संसार का त्याग किया था।

“साधु-संन्यासी को अपने कल्याण के लिए भी कामिनी-कांचन का त्याग करना चाहिए। और निर्लिप्त होने पर भी लोक-शिक्षा के लिए उसे अपने पास कामिनी-कांचन न रखना चाहिए। संन्यासी – जगद्गुरु! उसे देखकर लोगों में चेतना आती है।”

सन्ध्या होने को है। भक्तगण क्रमशः प्रणाम करके बिदा हो रहे हैं। विजय केदार से कह रहे हैं – आज सुबह मैंने आपको देखा था (ध्यान में); देह में हाथ लगाना चाहा, पर फिर कहीं कोई नहीं!

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सुरेन्द्र के घर में महोत्सव

(१)

श्रीयुत सुरेन्द्र के बगीचे में

आज श्रीरामकृष्ण सुरेन्द्र के बगीचे में आये हैं। रविवार, ज्येष्ठ कृष्ण ६, १५ जून १८८४। श्रीरामकृष्ण आज सुबह नौ बजे से भक्तों के साथ आनन्द मना रहे हैं।

सुरेन्द्र का बगीचा कलकत्ते के पास काकुड़गाछी गाँव में है। उसके पास ही राम का बगीचा भी है जिसमें करीब छः महीने पहले श्रीरामकृष्ण पधारे थे। आज सुरेन्द्र के बगीचे में महोत्सव है।

सुबह से ही संकीर्तन होने लगा है। कीर्तनिये कृष्ण और गोपियों के सम्बन्ध में कीर्तन गा रहे हैं। गोपियों का प्रेम, कृष्ण के विरह से राधिका की अवस्था – यही सब गाया जा रहा है। श्रीरामकृष्ण को क्षण क्षण में भावावेश हो रहा है। भक्तगण उद्यानगृह के भीतर चारों ओर कतार बाँधे खड़े हैं।

उद्यानगृह में जो कमरा सब से बड़ा है, उसी में कीर्तन हो रहा है। जमीन पर सफेद चद्दर बिछी हुई है। जगह-जगह पर तकिये भी लगे हैं। इस कमरे के पूर्व और पश्चिम ओर एक एक कमरा और उत्तर और दक्षिण ओर बरामदे हैं। उद्यानगृह के सामने अर्थात् दक्षिण की ओर एक तालाब है, पक्का घाट भी बँधा हुआ है। गृह और तालाब के बीच से पूर्व-पश्चिम की ओर रास्ता है। रास्ते के दोनों तरफ फूल और क्रोटन आदि के पेड़ लगे हैं। उद्यानगृह के पूर्व तरफ से उत्तर के फाटक तक एक और रास्ता गया है। उसके भी दोनों ओर अनेक प्रकार की फूल-पत्तियों के पेड़ लगे हैं। फाटक के पास और रास्ते के पूर्व ओर एक और तालाब है – उसमें भी पक्का घाट है। यहाँ गांव के साधारण आदमी नहाया करते हैं और पीने के लिए पानी भी इसीसे ले जाते हैं। उद्यानगृह के पश्चिम की ओर भी रास्ता है, उसके दक्षिण-पश्चिम में रन्धनगार है। आज यहाँ खूब धूम है, यहाँ श्रीरामकृष्ण और भक्तों की सेवा होगी। सुरेश और राम प्रत्येक समय सब तरह की देखभाल कर रहे हैं।

उद्यान-गृह के बरामदे में भी भक्तों का समावेश हुआ है। कोई-कोई अकेले कोई

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मित्रों के साथ, उपर्युक्त तालाब के किनारे टहल रहे हैं। कोई कोई बँधे घाट पर जाकर थोड़ी देर के लिए विश्राम कर रहे हैं।

संकीर्तन हो रहा है। संकीर्तनवाले कमरे में बहुत से भक्त एकत्र हुए हैं। भवनाथ, निरंजन, राखाल, सुरेन्द्र, राम, मास्टर, महिमाचरण और मणि मल्लिक आदि कितने ही भक्त आये हैं। बहुत से ब्राह्मभक्त भी उपस्थित हैं।

कृष्णलीला गायी जा रही है। कीर्तनिया पहले गौर-चन्द्रिका गा रहा है। गौरांग ने संन्यास धारण किया है – वे कृष्ण के प्रेम में पागल हो गये हैं। उन्हें न देखकर नवद्वीप की भक्तमण्डली विलाप कर रही है। यही गीत कीर्तनिया गा रहा है।

श्रीरामकृष्ण को भावावेश है। एकाएक खड़े होकर बड़े ही करुणापूर्ण स्वरों में एक पद गाने लगे – “सखि! तू मेरे प्राणवल्लभ को मेरे पास ले आ या मुझे ही वहीं छोड़ आ।” श्रीरामकृष्ण को राधिका का भाव हो गया है। ये बातें कहते ही उनकी जबान रुक गयी। देह निःस्पन्द हो गयी और आँखें अर्धनिमीलित रह गयीं। उनका बाह्य-ज्ञान बिलकुल जाता रहा। वे समाधिमग्न हो गये।

बड़ी देर बाद श्रीरामकृष्ण अपनी साधारण दशा में आये। फिर वही करुण-स्वर! कहते हैं – “सखि! उसके पास ले जाकर तू मुझे खरीद ले, मैं तेरी दासी हो जाऊँगी। कृष्ण का प्रेम मुझे तू ही ने तो सिखाया था – प्राणवल्लभ!”

कीर्तनियों का गाना होने लगा। श्रीमती कह रही हैं – ‘सखि! मैं यमुना में पानी भरने न जाऊँगी। कदम्ब के नीचे प्रिय सखा को मैंने देखा था। उसे देखते ही मैं विह्वल हो जाती हूँ।’

श्रीरामकृष्ण को फिर आवेश हो रहा है। दीर्घ श्वास छोड़कर कातर भाव से कह रहे हैं – ‘आहा! आहा!’

कीर्तन हो रहा है। श्रीराधा की उक्ति – (कीर्तन का भाव) –

“संग-सुख की लालसा से मैं उनके शीतल अंग का निरीक्षण किया करती हूँ। माना कि वह तुम लोगों का है, परन्तु मुझे उसके दर्शन भी तो एक बार करा दो। वह भूषणों का आभूषण जब चला गया, तब ये भूषण किस काम के रहे? मेरे सुदिन चले गये हैं, ये दुर्दिन आये हैं। दुर्दशा के दिनों के आते कुछ देर भी न लगी।”

“सखि! मैं डूब मरूँगी, भला कह तो सही, कन्हैया जैसे गुणागार को मैं किसे दे जाऊँ? परन्तु देख, राधा की देह को जला न देना, पानी में भी उसे प्रवाहित न करना, वह कृष्ण के विलास की देह है, उसे तमाल की ही डाल पर रखना; क्योंकि कृष्ण भी काले हैं और तमाल की डाल भी काली है!”

५१४श्रीरामकृष्णवचनामृत१५ जून, १८८४

श्रीराधा की मूर्छित दशा का वर्णन

“श्रीराधा मूर्छित हो गयीं, ज्ञान जाता रहा, जीवन की संगिनी ने आँखें भी मूँद लीं। कोई सखी उनकी देह में चन्दन लगाती है और कोई दुःख के आँसू बहा रही है। कोई उसके मुँह पर जल-सिंचन भी करती है।

“उन्हें मूर्छित देख सखियाँ कृष्ण का नाम ले रही हैं। कृष्ण का नाम सुन उन्हें चेतना हो आयी! तमाल देखकर वे सोचती हैं कि कहीं कृष्ण तो सामने आकर नहीं खड़े हो गये।

“सखियों ने सलाह करके मथुरा में कृष्ण के पास एक दूती को भेजा। समवयस्क किसी मथुरानिवासिनी से उसका परिचय हो गया। गोपियों की दूती ने कहा, मुझे बुलाना न होगा, वह आप ही आ जायेंगे। जहाँ पर कृष्ण हैं, वहीं मथुरानिवासिनी के साथ वह दूती जा रही है। वह रास्ते में विकल हो, रोकर कृष्ण को पुकार रही है –

'हे गोपियों के जीवनाधार! तुम कहाँ हो? – प्राणवल्लभ! राधावल्लभ! लज्जानिवारण हरि! एक बार तो दर्शन दे दो। मैंने बड़ा गर्व करके इन लोगों से कहा है कि तुम आप ही मिलोगे।'

गाना – “मधुपुर की नागरी हँसकर कहती है, 'ऐ गोकुल की गोपकुमारी, सातवें द्वार के उस पार राजा रहते हैं, क्या तू वहाँ तक जायगी? और तू जायगी भी कैसे? तेरी हिम्मत देखकर तो मुझे लाज आती है।' उसकी ये बातें सुनकर दूती दुःखित हो कृष्ण को पुकारने लगी – 'हे गोपियों के जीवन! हे नागर! हाय, तुम कहाँ हो? दर्शन दे दासी के प्राणों की रक्षा करो।' ”

“हे गोपियों के जीवन! तुम कहाँ हो?” इतना सुनते ही श्रीरामकृष्ण समाधिमग्न हो गये। अन्त में कीर्तनिये ऊँचे स्वर से कीर्तन गाने लगे। श्रीरामकृष्ण फिर खड़े हो गये। समाधिमग्न। कुछ होश आने पर अस्पष्ट स्वरों में कह रहे हैं – 'किट्न्-किट्न्' (कृष्ण-कृष्ण), भाव में भरपूर मग्न हैं। पूरा नाम उच्चारण नहीं कर सकते।

राधा-कृष्ण का मिलनगीत कीर्तनिये गा रहे हैं। श्रीरामकृष्ण भी गाते हैं – “राधा खड़ी है, अंग झुकाये हुए, श्याम के बाईं ओर मानो तमाल को घेरकर।”

अब नामकीर्तन होने लगा। खोल-करताल लेकर अब कीर्तनिये एक साथ गाने लगे। भक्तगण पागलसे हो गये। श्रीरामकृष्ण नृत्य कर रहे हैं। उन्हें घेरकर भक्तगण भी आनन्द से नाच रहे हैं। सब लोग 'जय राधे गोविन्द जय राधे गोविन्द' कह रहे हैं।

कीर्तन हो जाने पर श्रीरामकृष्ण ने जरा देर के लिए आसन ग्रहण किया। इसी समय निरंजन आये और श्रीरामकृष्ण को भूमिष्ठ हो प्रणाम किया। श्रीरामकृष्ण उन्हें देखकर ही खड़े हो गये। आनन्द से श्रीरामकृष्ण की आँखें उज्ज्वल हो गयीं, कहा, “तू आ गया! (मास्टर से) देखो, यह लड़का बड़ा सरल है। सरलता पूर्वजन्मार्जित बहुत बड़ी तपस्या का फल है। कपटाचार, पटवारी बुद्धि, इन सब के रहते ईश्वर-प्राप्ति नहीं होती।

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“देखा नहीं, ईश्वर उसी वंश में अवतार लेते हैं जहाँ सरलता पायी जाती है। दशरथ कितने सरल थे! नन्द – श्रीकृष्ण के पिता – कितने सरल थे! अब भी आदमी कहते हैं, अहा! कैसा सरल है – मानो नन्द घोष हो।

(निरंजन से) “देख, तेरे मुँह पर स्याही आ गयी है, तू आफिस का काम करता है न? इसीलिए आफिस में हिसाबकिताब करना पड़ता होगा, और भी कितने ही तरह के काम होंगे! सब समय सोचना पड़ता होगा।

“संसारी आदमी जिस तरह नौकरी करते हैं, तू भी वैसे ही करता है, परन्तु कुछ भेद है। तूने अपनी माँ के लिए नौकरी की है। माँ गुरु हैं, ब्रह्ममयी की मूर्ति हैं अगर बीबी और बच्चों के लिए तू नौकरी करता तो मैं कहता ‘तुझे धिक्कार है, सौ बार धिक्कार है।’

(मणि मल्लिक से) “देखो, यह लड़का बड़ा सरल है, परन्तु आजकल कुछ झूठ बोलने लगा है। यही इतना दोष है। उस दिन कह गया, आऊँगा, परन्तु फिर नहीं आया। (निरंजन से) इसी पर राखाल कहता था, एँड़ेदाह में आकर तूने क्यों नहीं भेंट की?”

निरंजन – मैं एँड़ेदाह में बस दो दिनों के लिए आया था।

श्रीरामकृष्ण – (निरंजन से) – ये हेडमास्टर हैं। तुझसे मिलने गये थे। मैने भेजा था। (मास्टर से) क्या उस दिन बाबूराम को मेरे पास तुमने भेजा था?

श्रीरामकृष्ण पश्चिमवाले कमरे में दो-चार भक्तों के साथ बातचीत कर रहे हैं। उसी कमरे में कुछ टेबिल और कुर्सियाँ इकट्ठी की हुई रखी थीं। श्रीरामकृष्ण टेबिल के सहारे खड़े हैं।

श्रीरामकृष्ण – (मास्टर से) – अहा! गोपियों का कैसा अनुराग है! तमाल देखकर प्रेम से विह्वल हो गयीं – एकदम प्रेमोन्माद! श्रीराधा की विरहाग्नि इतनी प्रचण्ड थी कि आँख के आँसू भी उसके ताप में सूख जाते थे। पानी बनने से पहले ही वाष्प होकर उड़ जाते थे। कभी कभी दूसरे को उनके भाव का कुछ पता ही नहीं चलता था। बड़े तालाब में हाथी के धँसने पर भी दूसरों को पता नहीं चलता।

मास्टर – जी हाँ। गौरांग का भी यही हाल था। वन देखकर उन्होंने उसे वृन्दावन सोचा था और समुद्र देखकर यमुना।

श्रीरामकृष्ण – अहा! उस प्रेम का एक बूँद भी अगर किसी को हो – कैसा अनुराग! कैसा प्यार! सिर्फ सोलह आने अनुराग नहीं, पाँच चवन्नी और पाँच आने। प्रेमोन्माद इसी का नाम है। बात यह है कि उन्हें प्यार करना चाहिए। तो फिर तुम चाहे जिस मार्ग पर रहो, साकार पर ही विश्वास करो या निराकार पर – ईश्वर मनुष्य के रूप में अवतार लेते हैं इस बात पर चाहे विश्वास करो या न करो – उन पर अनुराग रहने से ही काफी है। तब वे खुद समझा देंगे कि वे कैसे हैं।

“अगर पागल ही होना है, तो संसार की चीज लेकर क्यों पागल होते हो? पागल

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होना है, तो ईश्वर के लिए पागल बनो।”

(४)

भवनाथ, महिमा आदि भक्तों के साथ हरिकथा-प्रसंग

श्रीरामकृष्ण हॉलवाले कमरे में आये। उनके बैठने के आसन के पास एक तकिया लगा दिया गया। श्रीरामकृष्ण ने बैठते समय ‘ॐ तत् सत्’ इस मन्त्र का उच्चारण करके तकिये को स्पर्श किया। विषयी लोग इस बगीचे में आया-जाया करते हैं और ये सब तकिये वे अपने काम में लाते हैं, इसीलिए शायद श्रीरामकृष्ण ने उस मन्त्र का उच्चारण कर तकिये को शुद्ध कर लिया। भवनाथ, मास्टर आदि उनके पास बैठे हैं। समय बहुत हो गया है, परन्तु भोजन आदि का बन्दोबस्त अभी तक नहीं हुआ। श्रीरामकृष्ण बालकस्वभाव हैं। कहा, ‘क्यों जी, अभी तक कुछ देता क्यों नहीं? नरेन्द्र कहाँ हैं?’

एक भक्त – (श्रीरामकृष्ण के प्रति, सहास्य) – महाराज, अध्यक्ष रामबाबू हैं, वे ही सब देखभाल करते हैं। (सब हँसते हैं।)

श्रीरामकृष्ण – (हँसते हुए) – राम अध्यक्ष है, तब तो हो चुका!

एक भक्त – जी रामबाबू जहाँ अध्यक्ष होते हैं, वहाँ प्रायः यही हाल हुआ करता है। (सब हँसते हैं।)

श्रीरामकृष्ण – (भक्तों से) – सुरेन्द्र कहाँ है, अहा, सुरेन्द्र का स्वभाव बहुत ही अच्छा हो गया है। बड़ा स्पष्टवक्ता है, बोलते समय किसी से दबता नहीं। और देखो, मुक्तहस्त भी है। कोई उसके पास सहायता के लिए जाता है, तो उसे खाली हाथ नहीं लौटाता। (मास्टर से) तुम भगवानदास के पास गये थे, उनके बारे में क्या राय है?

मास्टर – जी, मैं कालना गया था। भगवानदास बहुत वृद्ध हो गये हैं, रात में भेंट हुई थी। जाजम पर लेटे हुए थे। एक आदमी प्रसाद ले आया और खिलाने लगा। जोर से बोलने पर सुनते हैं। आपका नाम सुनकर कहने लगे, तुम लोगों को अब क्या चिन्ता है?

“उस घर में नाम-ब्रह्म की पूजा होती है।”

भवनाथ – (मास्टर से) – आप बहुत दिनों से दक्षिणेश्वर नहीं गये। वे दक्षिणेश्वर में मुझसे आपके सम्बन्ध में पूछताछ किया करते थे और कहा था, मास्टर को अरुचि हो गयी क्या?

यह कहकर भवनाथ हँसने लगे। श्रीरामकृष्ण दोनों की बातचीत सुन रहे थे, फिर मास्टर की ओर स्नेहपूर्ण दृष्टि से देखकर बोले, “क्यों जी, बहुत दिन तक तुम वहाँ गये क्यों नहीं?”

मास्टर इसका कुछ जवाब न दे सके। इसी समय महिमाचरण आ पहुँचे।

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महिमाचरण काशीपुर में रहते हैं। श्रीरामकृष्ण पर इनकी बड़ी भक्ति है और सर्वदा ये दक्षिणेश्वर आया-जाया करते हैं। ब्राह्मण के लड़के हैं, कुछ पैतृक सम्पत्ति भी है। स्वाधीन रहते हैं, किसी की नौकरी नहीं करते। सारे समय शास्त्राध्ययन और ईश्वरचिन्तन किया करते हैं। कुछ पाण्डित्य भी है, अंग्रेजी और संस्कृत के बहुत से ग्रन्थों का अध्ययन किया है।

श्रीरामकृष्ण – (सहास्य, महिमाचरण से) – यह क्या! यहाँ तो जहाज आ गया! (सब हँसते हैं।) इन सब स्थानों में तो डोंगे ही आ सकते हैं, यह तो एकदम जहाज आ गया। (सब हँसे।) परन्तु एक बात है। यह आषाढ़ का महीना है। (सब हँसते हैं।)

महिमाचरण के साथ कितनी ही तरह की बातें हो रही हैं।

श्रीरामकृष्ण – (महिमा के प्रति) – अच्छा, बताओं, लोगों को खिलाना एक तरह से उन्हीं की सेवा नहीं है? – सब जीवों के भीतर वे अग्नि के रूप से विराजमान हैं। खिलाना अर्थात् उनमें आहुति देना।

"परन्तु इसलिए बुरे आदमी को न खिलाना चाहिए – ऐसे आदमी जिन्होंने व्यभिचार आदि महापातक किया हो। घोर विषयासक्त आदमी जहाँ बैठकर भोजन करते हैं, वहाँ सात हाथ तक की मिट्टी अपवित्र हो जाती है।

"हृदय ने सिऊड़ में एक बार कुछ आदमियों को भोजन कराया था। उनमें अधिकांश मनुष्य बुरे थे। मैंने कहा, 'देख हृदय, उन्हें अगर तू खिलायेगा तो मैं तेरे घर एक क्षण भी न ठहरूँगा।' (महिमा से) – अच्छा, मैंने सुना है, पहले लोगों को तुम बहुत खिलाते-पिलाते थे। अब शायद खर्च बढ़ गया है!" (सब हँसते हैं।)

(५)

ब्राह्मभक्तों के संग में। अहंकार। दर्शन का लक्षण

अब पत्तल पड़ रहे हैं – दक्षिणवाले बरामदे में। श्रीरामकृष्ण महिमाचरण से कह रहे हैं, "तुम एक बार जाओ, देखो वे सब क्या कर रहे हैं। और तुमसे मैं कह नहीं सकता, परन्तु जी में आ जाय तो परोस भी देना।" "सामान ले आया जाय, परोसने की बात तो तब है!" – यह कहकर महिमाचरण लम्बे डग से दालान की ओर चले गये, फिर कुछ देर बाद लौटकर आ गये।

श्रीरामकृष्ण भक्तों के साथ आनन्दपूर्वक भोजन कर रहे हैं।

भोजन के पश्चात् घर में आकर विश्राम करने लगे। भक्तगण भी दक्षिणवाले तालाब में हाथ-मुँह धोकर पान खाते हुए फिर श्रीरामकृष्ण के पास आ गये। सब ने आसन ग्रहण किया।

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दो बजे के बाद प्रताप आये। ये एक ब्राह्मभक्त हैं। आकर श्रीरामकृष्ण को नमस्कार किया। श्रीरामकृष्ण ने भी सिर झुकाकर नमस्कार किया। प्रताप के साथ बहुतसी बातें हो रही हैं।

प्रताप – मैं दार्जिलिंग गया था।

श्रीरामकृष्ण – परन्तु तुम्हारा शरीर उतना सुधर नहीं पाया। जान पड़ता है, कोई बीमारी हो गयी है।

प्रताप – जी, केशव को जो बीमारी थी, वही मुझे भी है। उन्हें भी यही बीमारी थी।

केशव की दूसरी बातें होने लगीं। प्रताप कहने लगे, केशव का वैराग्य उनके बचपन से ही जाहिर हो रहा था। उन्हें खेलते-कूदते हुए लोगों ने बहुत कम देखा है। हिन्दू कॉलेज में पढ़ते थे। उसी समय सत्येन्द्र के साथ उनकी बड़ी मित्रता हो गयी और उसी कारण श्रीयुत देवेन्द्रनाथ ठाकुर से उनकी मुलाकात हुई। केशव में दोनों बातें थीं, योग भी और भक्ति भी। कभी कभी उनमें भक्ति का इतना उद्रेक होता था कि वे मूर्छित हो जाते थे। गृहस्थों में धर्म लाना उनके जीवन का प्रधान उद्देश्य था।

महाराष्ट्र देश की एक स्त्री के सम्बन्ध में बातचीत होने लगी।

प्रताप – हमारे देश की कुछ महिलाएँ विलायत गयी थीं। महाराष्ट्र देश की एक महिला विलायत गयी थीं। वे खूब पण्डिता हैं; परन्तु ईसाई हो गयी हैं। आपने क्या उनका नाम सुना है?

श्रीरामकृष्ण – नहीं, परन्तु तुम्हारे मुख से जैसा सुन रहा हूँ, इससे जान पड़ता है, उसे प्रसिद्धि तथा सम्मान-प्राप्ति की इच्छा है। इस तरह का अहंकार अच्छा नहीं। 'मैंने किया' यह अज्ञान से होता है। 'हे ईश्वर तुम्हीं ने ऐसा किया', यही ज्ञान है। ईश्वर ही कर्ता हैं, और सब अकर्ता।

“मैं-मैं करने से कितनी दुर्गति होती है, इसका ज्ञान बछड़े की अवस्था सोचने पर हो जाता है। बछड़ा 'हम्मा हम्मा' (मैं, मैं) किया करता है। उसकी दुर्गति देखो। बड़ा होने पर उसे सुबह से शाम तक हल जोतना पड़ता है – चाहे धूप हो, चाहे वृष्टि। कभी कसाई के हाथ गया कि उसने उसकी बिलकुल ही सफाई कर दी। मांस लोगों के पेट में चला गया और चमड़े के जूते बने। आदमी उन पर पैर रखकर चलता है। इतने पर भी दुर्गति की इति नहीं होती। चमड़े से जंगी ढोल मढ़े गये और लकड़ी से लगातार वह पीटा जाने लगा। अन्त में अँतड़ियों को लेकर ताँत बनायी गयी। जब धुनिये के धनुए में वह लगा दी जाती है और वह रूई धुनता है तब वह 'तू-ऊं – तूं-ऊं' कहने लगता है। तब 'हम्मा-हम्मा' नहीं कहता। जब 'तूं-ऊं-तूं-ऊं' कहता है, तब कहीं निस्तार पाता है। तब मुक्ति होती है। कर्म-क्षेत्र में फिर नहीं आना पड़ता।

“जीव भी जब कहता है, 'हे ईश्वर, मैं कर्ता नहीं हूँ, कर्ता तुम हो – मैं यन्त्र मात्र

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हूँ, यन्त्री तुम हो, तब जीव संसार-यन्त्रणाओं से मुक्ति पाता है। तभी उसकी मुक्ति होती है, फिर इस कर्मक्षेत्र में उसे नहीं आना पड़ता।”

एक भक्त – जीव का अहंकार कैसे दूर हो?

श्रीरामकृष्ण – ईश्वर के दर्शन के बिना अहंकार दूर नहीं होता। यदि किसी का अहंकार मिट गया हो, तो उसे अवश्य ही ईश्वर के दर्शन हुए होंगे।

भक्त – महाराज, किस तरह समझ में आये कि ईश्वर के दर्शन हो चुके हैं?

श्रीरामकृष्ण – ईश्वर-दर्शन के कुछ लक्षण हैं। श्रीमद्भागवत में कहा है, जिस आदमी को ईश्वर के दर्शन हुए हैं उसके चार लक्षण हैं – बालवत्, पिशाचवत्, जड़वत् तथा उन्मत्तवत्।

“जिसे ईश्वर के दर्शन हुए होंगे, उसका स्वभाव बालक की तरह का हो जायेगा। वह त्रिगुणातीत हो जाता है। किसी गुण को गाँठ नहीं बाँधता, शुचि और अशुचि भी उसके पास बराबर हैं। इसीलिए वह पिशाचवत् है, और पागल की तरह कभी हँसता है, कभी रोता है। देखते ही देखते बाबुओं की तरह सजावट कर लेता है और फिर सब कपड़े बगल में दबाकर बिलकुल नंगा होकर घूमता है, इस तरह वह उन्मत्तवत् हो जाता है। और कभी यही है कि जड़ की तरह कहीं चुपचाप बैठा हुआ है, इसलिए जड़वत्।”

भक्त – ईश्वर-दर्शन के बाद क्या अहंकार बिलकुल चला जाता है?

श्रीरामकृष्ण – कभी कभी वे अहंकार बिलकुल पोंछ डालते हैं, जैसे समाधि की अवस्था में। कभी अहंकार कुछ रख भी देते हैं; परन्तु उस अहंकार में दोष नहीं। जैसे बालक का अहंकार। पाँच वर्ष का बच्चा मैं-मैं करता है, परन्तु किसी का अनिष्ट करना वह नहीं जानता।

“पारस पत्थर के छू जाने पर लोहा भी सोना हो जाता है। लोहे की तलवार सोने की तलवार हो जाती है। परन्तु तलवार का आकार मात्र रह जाता है, वह किसी का अनिष्ट नहीं कर सकती।”

(६)

जीवन का उद्देश्य – कर्म अथवा ईश्वरलाभ?

श्रीरामकृष्ण – (प्रताप से) – तुम विलायत गये थे, वहाँ क्या क्या देखा?

प्रताप – आप जिसे कांचन कहते हैं, विलायत के आदमी उसी की पूजा करते हैं; परन्तु कोई कोई अच्छे, अनासक्त मनुष्य भी हैं। यों तो आदि से अन्त तक सब रजोगुण की ही महिमा है। अमेरिका में भी मैंने यही देखा।

श्रीरामकृष्ण – (प्रताप से) – विषयकार्यों में केवल विलायतवालों को ही आसक्ति नहीं है, सभी जगह यही हाल है। परन्तु, बात यह है कि कर्मकाण्ड को आदिकाण्ड कहा

Digitized by Arya Samaj Foundation Chennai and eGangotri ५२० श्री रामकृष्णवचनामृत १५ जून, १८८४

है। सतोगुण (भक्ति, विवेक, वैराग्य, दया आदि सब) के बिना ईश्वर नहीं मिल सकते। रजोगुण में कर्म का आडम्बर होता है, इसीलिए रजोगुण से तमोगुण आ जाता है। ज्यादा कर्म में फँसने पर ही ईश्वर को मनुष्य भूल जाता है। तब कामिनी-कांचन में भी आसक्ति बढ़ जाती है।

"परन्तु कर्मों का बिलकुल त्याग कोई नहीं कर सकता। तुम्हारी प्रकृति खुद तुमसे कर्म करा लेगी, तुम अपनी मर्जी से करो या न करो। इसीलिए कहा है, अनासक्त होकर कर्म करो, अर्थात् कर्म-फल की आकांक्षा न करो; जैसे, पूजा, जप, तप, यह सब कर रहे हो, परन्तु सम्मान या पुण्य के लिए नहीं।

"इस तरह अनासक्त होकर कर्म करने का ही नाम कर्मयोग है। यह बड़ा कठिन है। एक तो कलिकाल है, सहज ही आसक्ति आ जाती है। सोच रहा हूँ, अनासक्त होकर काम कर रहा हूँ, परन्तु न जाने किधर से आसक्ति आ जाती है, समझ में नहीं आता। कभी पूजा और महोत्सव किया या बहुत से कंगालों को खिलाया, सोचा, अनासक्त होकर मैं यह सब कर रहा हूँ, परन्तु फिर भी न जाने किधर से लोक-सम्मान की इच्छा आ जाती है, पता नहीं। बिलकुल अनासक्त होना उसके लिए सम्भव है जिसे ईश्वर के दर्शन हो चुके हैं।"

एक भक्त – जिन्होंने ईश्वर को प्राप्त नहीं किया, उनके लिए क्या उपाय है? क्या वे विषय-कर्म छोड़ दें?

श्रीरामकृष्ण – कलिकाल के लिए भक्तियोग है, नारदीय भक्ति। ईश्वर का नाम-गुणगान और व्याकुल होकर प्रार्थना करना – 'हे ईश्वर, मुझे ज्ञान दो, भक्ति दो, मुझे दर्शन दो।' कर्मयोग बड़ा कठिन है। इसीलिए प्रार्थना करनी चाहिए, 'हे ईश्वर, मेरे कर्म घटा दो और जितने कर्म तुमने रखे हैं, उन्हें तुम्हारी कृपा से अनासक्त होकर कर सकूँ और अधिक कर्म लपेटने की मेरी इच्छा न हो!'

"कर्म कोई छोड़ नहीं सकता। 'मैं सोच रहा हूँ', 'मैं ध्यान कर रहा हूँ' – ये भी कर्म हैं। भक्ति पा लेने पर विषयकर्म आप ही आप घट जाते हैं। तब वे अच्छे नहीं लगते। मिश्री का शरबत मिल जाय, तो फिर सीरा कौन पीता है?"

एक भक्त – विलायत के आदमी 'कर्म करो – कर्म करो' कहा करते हैं, तो क्या कर्म जीवन का उद्देश्य नहीं है?

श्रीरामकृष्ण – जीवन का उद्देश्य है ईश्वर-लाभ। कर्म तो आदिकाण्ड है, वह जीवन का उद्देश्य नहीं हो सकता। निष्काम कर्म एक उपाय हो सकता है, परन्तु वह भी उद्देश्य नहीं हैं।

"शम्भू कहता था, अब ऐसा आशीर्वाद दीजिये कि जो रुपये हैं, उनका सद्व्यय कर सकूँ। अस्पताल, दवाखाना, रास्ताघाट, कुआँ इनके तैयार करने में लग जाय। मैंने

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कहा, यह सब काम अनासक्त होकर कर सको तो अच्छा है, परन्तु है यह बड़ा कठिन। और चाहे जो हो, कम से कम इतना याद रहे कि तुम्हारे मनुष्य-जीवन का उद्देश्य है ईश्वर-लाभ – अस्पताल और दवाखाना बनाना नहीं। सोचो कि ईश्वर तुम्हारे सामने आये, आकर तुमसे कहा, कोई वर माँगो। तो क्या तुम उनसे कहोगे, मेरे लिए कुछ अस्पताल और दवाखाने बनवा दो या यह कहोगे, 'हे भगवन्, तुम्हारे पादपद्मों में मेरी शुद्धा भक्ति हो – मैं तुम्हें सब समय देख सकूँ।' अस्पताल, दवाखाना ये सब अनित्य वस्तुएँ हैं। एकमात्र ईश्वर वस्तु है, और सब अवस्तु। उन्हें प्राप्त कर लेने पर जान पड़ता है, कर्ता वे ही हैं, हम लोग अकर्ता हैं। तो फिर क्यों उन्हें छोड़कर इतने काम इकट्ठे कर हम अपनी जान दें? उन्हें पा लेने पर उनकी इच्छा से कितने ही अस्पताल और दवाखाने हो जायेंगे।

“इसीलिए कहता हूँ, कर्म आदिकाण्ड है, कर्म जीवन का उद्देश्य नहीं, साधना करके और भी आगे बढ़ जाओ। साधना करते हुए जब और आगे बढ़ जाओगे, तब अन्त में समझोगे, ईश्वर ही एकमात्र वस्तु है, और सब अवस्तु, ईश्वरलाभ ही जीवन का उद्देश्य है। एक लकड़हारा जंगल में लकड़ी काटने गया था। एकाएक किसी ब्रह्मचारी से उसकी भेंट हो गयी। ब्रह्मचारी ने कहा, 'सुनो जी, बढ़ते जाओ।' लकड़हारा घर लौटकर सोचने लगा, ब्रह्मचारी ने आगे बढ़ने के लिए क्यों कहा।

“इसी तरह कुछ दिन बीत गये। एक दिन वह बैठा हुआ था, एकाएक ब्रह्मचारी की बात याद आ गयी। तब उसने मन ही मन कहा, मैं आज और भी आगे बढ़ जाऊँगा। वन में और भी आगे चलकर उसने देखा, चन्दन के हजारों पेड़ थे। तब मारे आनन्द के लोटपोट हो गया। चन्दन की लकड़ी उस दिन घर ले आया। बाजार में बेचकर खूब धनी हो गया।

“और भी बढ़ने पर ईश्वर की प्राप्ति होगी, उनके दर्शन होंगे। क्रमशः उनके साथ मुलाकात और बातचीत होगी।”

केशव के स्वर्गलाभ के पश्चात् मन्दिर की वेदी को लेकर जो विवाद हुआ था, अब उसकी बात होने लगी।

श्रीरामकृष्ण – (प्रताप से) – सुना है, तुम्हारे साथ वेदी के सम्बन्ध में कोई झगड़ा हुआ है। जिन लोगों ने झगड़ा किया है, वे तो सब ऐसे ही हैं। – मानो कीड़े-मकोड़े। (सब हँसते हैं।)

(भक्तों को) “देखो, प्रताप और अमृत ये सब शंख की तरह बजते हैं। और दूसरे आदमियों को देखो, उनमें कोई आवाज ही नहीं हैं।' (सब हँसते हैं।)

प्रताप – महाराज, बजने की बात अगर आपने चलायी तो आम की गुठली भी तो बजती है!

५२२ श्रीरामकृष्णवचनामृत १५ जून, १८८४

(७)

श्रीरामकृष्ण – (प्रताप से) – देखो, तुम्हारे ब्राह्मसमाज का लेक्चर सुनकर आदमी का भाव आसानी से ताड़ लिया जाता है। मुझे एक हरिसभा में ले गये थे। आचार्य थे एक पण्डित, नाम समाध्यायी था। कहा, ईश्वर नीरस हैं, हमें अपने प्रेम और भक्ति से उन्हें सरस कर लेना चाहिए। यह बात सुनकर मैं तो दंग रह गया। तब एक कहानी याद आ गयी। एक लड़के ने कहा था, मेरे मामा के यहाँ बहुत से घोड़े हैं – गोशाले भर। अब सोचो, अगर गोशाला है, तो वहाँ गौओं का रहना ही सम्भव है, घोड़ों का नहीं। इस तरह की असम्बद्ध बातें सुनकर आदमी क्या सोचता है? यही कि घोड़े-सोड़े कहीं कुछ नहीं हैं! (सब हँसते हैं।)

एक भक्त – घोड़े तो हैं ही नहीं, गौएँ भी नहीं हैं! (सब हँसते हैं।)

श्रीरामकृष्ण – देखो न, जो रस-स्वरूप हैं, उन्हें कहता है 'नीरस'; इससे यही समझ में आता है कि ईश्वर क्या चीज हैं, उसने कभी अनुभव भी नहीं किया।

'मैं कर्ता, मेरा घर' अज्ञान। जीवन का उद्देश्य 'डुबकी लगाना'

श्रीरामकृष्ण – (प्रताप से) – देखो, तुमसे कहता हूँ। तुम पढ़े लिखे बुद्धिमान और गम्भीर हो। केशव और तुम मानो गौरांग और नित्यानन्द; दोनों भाई थे। लेक्चर देना, तर्क झाड़ना, वादविवाद यह सब तो खूब हुआ। क्या तुम्हें ये सब अब भी अच्छे लगते हैं? अब सब मन समेटकर ईश्वर पर लगाओ। अपने को अब ईश्वर में उत्सर्ग कर दो।

प्रताप – जी हाँ, इसमें क्या सन्देह है, यही करना चाहिए; परन्तु यह सब जो मैं कर रहा हूँ, उनके (केशव के) नाम की रक्षा के लिए ही कर रहा हूँ।

श्रीरामकृष्ण – (हँसकर) – तुमने कहा तो है कि उनके नाम की रक्षा के लिए सब कुछ कर रहे हो; परन्तु कुछ दिन बाद यह भाव भी न रह जायगा। एक कहानी सुनो। किसी आदमी का घर पहाड़ पर था, घर क्या, कुटिया थी। बड़ी मेहनत करके उसने बनाया था। कुछ दिन बाद एक बहुत बड़ा तूफान आया। कुटिया हिलने लगी। तब उसे बचाने के लिए उस आदमी को बड़ी चिन्ता हुई। उसने कहा, हे पवन देव, देखो महाराज, घर न तोड़ियेगा। पवन देव क्यों सुनने लगे? कुटिया चरचराने लगी। तब उस आदमी ने एक उपाय सोच निकाला। उसे याद आ गया कि हनुमानजी पवन देव के लड़के हैं। बस, घबराया हुआ वह कहने लगा – दोहाई है, घर न तोड़ियेगा, दोहाई है, हनुमानजी का घर है। कितनी ही बार उसने कहा, 'हनुमानजी का घर है', 'हनुमानजी का घर है,' पर इससे कोई लाभ न हुआ। तब कहने लगा, 'महाराज, लक्ष्मणजी का घर है – लक्ष्मणजी का।' इससे भी कुछ हल न हुआ तब कहा, 'सुनो, यह श्रीरामचन्द्रजी का घर है; देखो महाराज, इसे अब न तोड़िये। दोहाई है, जय रामजी की।' इससे भी कुछ न हुआ। घर चरचराता हुआ

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टूटने लगा। तब जान बचाने की फिक्र हुई। वह घर से निकल आया। निकलते समय कहा – 'धत्तेरे घर की!'

(प्रताप से) “केशव के नाम की रक्षा तुम्हें न करनी होगी। जो कुछ हुआ है, समझना, उन्हीं की इच्छा से हुआ है। उनकी इच्छा से हुआ और उन्हीं की इच्छा से जा रहा है; तुम क्या कर सकते हो? तुम्हारा इस समय कर्तव्य है कि ईश्वर पर सब मन लगाओ – उनके प्रेम के समुद्र में कूद पड़ो।”

यह कहकर श्रीरामकृष्ण अपने मधुर कण्ठ से गाने लगे –

“ऐ मन, रूप के समुद्र में तू डूब जा, तलातल और पाताल तक में जब खोज करेगा, तब वह प्रेम रत्न तेरे हाथ लगेगा।”

(प्रताप से) “गाना सुना? लेक्चर और झगड़ा यह सब तो बहुत हो चुका, अब डुबकी लगाओ। और इस समुद्र मे डूबने से फिर मरने का भय न रह जायगा, यह तो अमृत का समुद्र है! यह न सोचना कि इससे आदमी का दिमाख बिगड़ जाता है। यह न सोचना की ज्यादा ईश्वर ईश्वर करने से आदमी पागल हो जाता है। मैंने नरेन्द्र से कहा था –

प्रताप – महाराज, नरेन्द्र कौन?

श्रीरामकृष्ण – है एक लड़का। मैंने नरेन्द्र से कहा था, ईश्वर रस का समुद्र है। क्या तेरी इच्छा इस रस के समुद्र में डुबकी लगाने की नहीं होती? अच्छा, सोच, एक नाँद में रस है और तू मक्खी हो गया है, तो कहाँ बैठकर रस पीयेगा? नरेन्द्र ने कहा, मैं नाँद के किनारे पर बैठकर रस पीऊँगा। मैंने पूछा, क्यों? किनारे पर क्यों बैठेगा? उसने कहा, ज्यादा बढ़ जाऊँगा तो डूब जाऊँगा और जान से भी हाथ धोना होगा। तब मैंने कहा, बेटा, सच्चिदानन्द-समुद्र में वह भय नहीं है। वह तो अमृत का समुद्र है, उसमें डुबकी लगाने से मृत्यु का भय नहीं है। आदमी अमर हो जाता है। ईश्वर के लिए पागल होने से आदमी का सिर बिगड़ नहीं जाता।

(भक्तों से) “मैं और मेरा, इसे अज्ञान कहते हैं। रासमणि ने कालीमन्दिर की प्रतिष्ठा की है; यही बात लोग कहते हैं। कोई यह नहीं कहता कि ईश्वर ने किया है। ब्राह्म समाज अमुक आदमी ने तैयार किया, यही लोग कहेंगे; कोई यह न कहेगा कि ईश्वर की इच्छा से यह हुआ है। मैंने किया, यह अज्ञान है। हे ईश्वर तुम कर्ता हो, मैं अकर्ता; तुम यन्त्री हो, मैं यन्त्र; यह ज्ञान है। हे ईश्वर, मेरा कुछ भी नहीं है – न यह मन्दिर मेरा है, न यह कालीबाड़ी न यह समाज, ये सब तुम्हारी चीजें हैं। यह स्त्री, पुत्र, परिवार, कुछ भी मेरा नहीं। सब तुम्हारी चीजें हैं; इसी का नाम ज्ञान है।

“मेरी वस्तु, मेरी वस्तु कहकर, उन सब चीजों को प्यार करना ही माया है। सब को प्यार करने का नाम दया है। मैं केवल ब्राह्म समाज के आदमियों को प्यार करता हूँ या अपने परिवार के मनुष्यों को, यह माया है। केवल देश के आदमियों को प्यार करता हूँ, यह माया

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है। सब देशों के मनुष्यों को प्यार करना, सब धर्मों के लोगों को प्यार करना, यह दया से होता है, भक्ति से होता है।

"माया से आदमी बँध जाता है, ईश्वर से विमुख हो जाता है। दया से ईश्वर की प्राप्ति होती है। शुकदेव, नारद, इनमें दया थी।"

(८)

ब्राह्म समाज और कामिनी-कांचन

प्रताप – महाराज, जो लोग आपके पास आते हैं, क्या क्रमशः उनकी उन्नति हो रही है?

श्रीरामकृष्ण – मैं कहता हूँ, संसार करने में दोष क्या है? परन्तु संसार में दासी की तरह रहो।

"दासी अपने मालिक के मकान को कहती है, 'हमारा मकान', परन्तु उसका अपना मकान कहीं किसी गाँव में होता है। मुख से तो वह मालिक के मकान को कहती है 'हमारा घर', परन्तु मन ही मन जानती है कि वह उसका घर नहीं, उसका घर एक दूसरे गाँव में है। और मालिक के लड़के को सेती है और कहती है, मेरा हरि बड़ा बदमाश हो गया, मेरे हरि को मिठाई पसन्द नहीं आती! 'मेरा हरि' वह मुख ही से कहती है, मन ही मन जानती है, हरि मेरा लड़का नहीं, मालिक का लड़का है।

"इसीलिए तो, जो लोग आते हैं, उनसे कहता हूँ संसार में रहो, इसमें दोष नहीं; परन्तु मन ईश्वर पर रखो। समझना कि घर-द्वार, संसार-परिवार तुम्हारे नहीं हैं, ये सब ईश्वर के हैं। समझना कि तुम्हारा घर ईश्वर के यहाँ है। मैं उनसे यह भी कहता हूँ कि व्याकुल होकर उनकी भक्ति के लिए उनके पाद-पद्मों में प्रार्थना करो।"

विलायत की बात फिर होने लगी। एक भक्त ने कहा, महाराज, आजकल विलायत के विद्वान लोग, सुना है, ईश्वर का अस्तित्व नहीं मानते।

प्रताप – मुँह से चाहे वे कुछ भी कहें, पर यह मुझे विश्वास नहीं होता कि उनमें कोई सच्चा नास्तिक है। इस संसार की घटनाओं के पीछे एक कोई महान् शक्ति है, यह बात बहुतों को माननी पड़ी है।

श्रीरामकृष्ण – तो बस हो गया। शक्ति तो मानते हैं न? तो नास्तिक फिर क्यों हैं?

प्रताप – इसके अतिरिक्त यूरोप के पण्डित, Moral Government (सत्कर्मों का पुरस्कार और पाप का दण्ड इस संसार में होता है) – यह बात भी मानते हैं।

बड़ी देर तक बातचीत होने के बाद प्रताप चलने के लिए उठे।

श्रीरामकृष्ण – (प्रताप से) – तुम्हें और क्या कहूँ? केवल इतना कहता हूँ कि अब वाद-विवाद के बीच में न रहो।

१५ जून, १८८४ | परिच्छेद ८२ | ५२५

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“एक बात और। कामिनी-कांचन ही मनुष्य को ईश्वर से विमुख करते हैं, उस ओर नहीं जाने देते। देखो न, अपनी स्त्री की सब लोग बड़ाई करते हैं। (सब हँसते हैं।) चाहे वह अच्छी हो या खराब। अगर पूछो, क्यों जी, तुम्हारी स्त्री कैसी है, तो उसी समय जवाब मिलता है, जी बहुत अच्छी है।”

प्रताप – तो मैं अब चलता हूँ।

प्रताप चले गये। श्रीरामकृष्ण की अमृतमयी, कामिनी और कांचन के त्याग की बात समाप्त नहीं हुई। सुरेन्द्र के बगीचे के पेड़ और उनकी पत्तियाँ दक्षिणी हवा के झोंकों में झूम रही थीं तथा मृदुल मर्मर शब्द सुना रही थीं। बातें उसी मर्मर शब्द के साथ मिल गयीं, भक्तों के हृदय में एक बार धक्का लगाकर अनन्त आकाश में विलीन हो गयीं।

कुछ देर बाद श्रीयुत मणिलाल मल्लिक ने श्रीरामकृष्ण से कहा, 'महाराज, अब दक्षिणेश्वर चलिये। आज वहाँ केशव सेन की माँ और उनके घर की स्त्रियाँ आपके दर्शनों के लिए आयेंगी। आपको वहाँ न पाकर सम्भव है, वे दुःखित हो वहाँ से लौट जायँ।'

केशव को शरीर छोड़े कई महीने हो गये हैं। उनकी वृद्धा माता और घर की स्त्रियाँ, श्रीरामकृष्ण को बहुत दिनों से न देखने के कारण, आज दक्षिणेश्वर में उनके दर्शन करने जायेंगी।

श्रीरामकृष्ण – (मणि मल्लिक से) – ठहरो बाबू, एक तो मेरी आँख नहीं लगी, जल्दबाजी इतनी न कर सकूँगा। वे गयी हैं, तो क्या किया जाय? वहाँ वे लोग बगीचे में टहलेंगी, आनन्द मनायेंगी।

कुछ देर विश्राम करके श्रीरामकृष्ण दक्षिणेश्वर चले। जाते समय सुरेन्द्र की कल्याण-कामना करते हैं। सब कमरों में एक-एक बार जाते हैं और मृदु स्वर से नामोच्चार कर रहे हैं। कुछ अधूरा न रखेंगे, इसीलिए खड़े हुए कह रहे हैं – 'मैंने उस समय पूड़ी नहीं खायी, थोड़ी सी ले आओ।'

बिलकुल जरा ही लेकर खा रहे हैं और कह रहे हैं – 'इसके बहुत से अर्थ हैं। पूड़ी नहीं खायी, यह याद आयेगा तो फिर आने की इच्छा होगी।' (सब हँसते हैं।)

मणि मल्लिक – (सहास्य) – अच्छा तो था, हम लोग भी आते। (भक्तमण्डली हँस रही है।)

परिच्छेद ८३

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निष्काम भक्ति

दक्षिणेश्वर मन्दिर में भक्तों के संग में

श्रीरामकृष्ण दक्षिणेश्वर मन्दिर में भक्तों के साथ अपने कमरे में बैठे हुए हैं। शाम हो गयी है, श्रीरामकृष्ण जगन्माता का स्मरण कर रहे हैं। कमरे में राखाल, अधर, मास्टर तथा और भी दो-एक भक्त हैं।

आज शुक्रवार है, जेष्ठ की कृष्णा द्वादशी, २० जून १८८४। पाँच दिन बाद रथयात्रा होगी। कुछ देर बाद ठाकुरबाड़ी में आरती होने लगी। अधर आरती देखने चले गये। श्रीरामकृष्ण मणि के साथ बातचीत कर रहे हैं।

श्रीरामकृष्ण – अच्छा, बाबूराम की क्या पढ़ने की इच्छा है?

“बाबूराम से मैंने कहा, तू लोक-शिक्षण के लिए पढ़। सीता का उद्धार हो जाने पर विभीषण को राज्य करना पसन्द न आया। राम ने कहा, मूर्खों को शिक्षा देने के लिए तुम राज्य करो। नहीं तो वे कहेंगे, विभीषण ने राम की सेवा की, परन्तु क्या पाया? – राज्य देखकर उन्हें भी सन्तोष होगा।

“तुमसे कहता हूँ, उस दिन मैंने देखा, बाबूराम, भवनाथ और हरीश, ये प्रकृतिभाववाले हैं।

“बाबूराम को देखा कि वह देवीमूर्ति है। गले में माला, सखियाँ साथ हैं। उसने स्वप्न में कुछ पाया है, वह शुद्धसत्त्व है, थोड़े से यत्न से ही उसकी आध्यात्मिक जागृति हो जायेगी।

“बात यह है कि देह-रक्षा के लिए बड़ी असुविधा हो रही है। वह अगर आकर रहे तो अच्छा है। इन लड़कों का स्वभाव एक खास तरह का हो रहा है। नोटो (लाटू) ईश्वरी भाव में ही रहता है – वह तो शीघ्र ही ईश्वर में लीन हो जायेगा।

“राखाल का स्वभाव ऐसा हो रहा है कि मुझे ही उसे पानी देना पड़ता है। (मेरी) सेवा वह विशेष नहीं कर सकता।

“बाबूराम और निरंजन, इन्हें छोड़कर और लड़के कौन हैं? अगर कोई आता है, तो मालूम होता है कि उपदेश लेकर चला जायेगा।

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२० जून, १८८४ | परिच्छेद ८३ | ५२७

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२० जून, १८८४परिच्छेद ८३५२७

“परन्तु मैं, खींच-खाँचकर बाबूराम को भी नहीं लाना चाहता। घर में गुल-गपाड़ा मच सकता है। (सहास्य) मैं जब कहता हूँ, चला क्यों नहीं आता, तब बार बार कहता है, आप कुछ ऐसा ही कर दीजिये जिससे मैं आ सकूँ। राखाल को देखकर रोता है, कहता है, वह मजे में है।

“राखाल अब घर के बच्चे की तरह रहता है। जानता हूँ, अब वह आसक्ति में पड़ नहीं सकता। कहता है, 'वह सब फीका लगता है।' उसकी स्त्री यहाँ आयी थी। उम्र १४ साल की है। यहाँ होकर कोन्नगर गयी थी। उन लोगों ने उससे (राखाल से) कोन्नगर जाने को कहा, पर वह न गया। कहता है – आमोद-प्रमोद अब अच्छा नहीं लगता। अच्छा, निरंजन को तुम क्या समझते हो?”

मास्टर – जी, बड़े अच्छे चेहरे-मोहरे का है।

श्रीरामकृष्ण – नहीं, सिर्फ चेहरा-मोहरा नहीं। सरल है। सरल होने पर सहज ही ईश्वर को लोग पा जाते हैं। सरल होने पर उपदेश भी शीघ्र सफल हो जाता है। जोती हुई जमीन, कंकड़ का नाम नहीं, बीज पड़ते ही पेड़ उग जाता है। फल भी शीघ्र आ जाते हैं।

“निरंजन विवाह न करेगा। तुम क्या कहते हो? कामिनी और कांचन, ये ही बाँधते हैं न?”

मास्टर – जी हाँ।

श्रीरामकृष्ण – पान-तम्बाकू के छोड़ने से क्या होगा? कामिनी और कांचन का त्याग ही त्याग है।

“भाव में मैंने देखा, यद्यपि वह नौकरी करता है, फिर भी उसे दोष स्पर्श नहीं कर सका। माँ के लिए नौकरी करता है, इसमें दोष नहीं है।

“तुम जो काम करते हो, इसमें दोष नहीं है। यह अच्छा काम है।

“नौकरी करके जेल गया, बद्ध हुआ, बेड़ियाँ पहनीं, फिर मुक्त हुआ। मुक्त होने के बाद क्या वह नाचने-कूदने लगता है? नहीं, वह फिर नौकरी करता है। इसी प्रकार तुम्हारी भी इच्छा स्वयं के लिए कोई धन-संचय करने की नहीं है – ठीक है – तुम्हें तो केवल अपने कुटुम्ब के निर्वाह के लिए ही चिन्ता है – नहीं तो सचमुच वे और कहाँ जायें?”

मणि – यदि कोई उनकी जिम्मेदारी ले ले तो मैं निश्चिन्त हो जाऊँ।

श्रीरामकृष्ण – ठीक है, परन्तु अभी यह भी करो और वह भी करो – अर्थात् संसार के कर्तव्य भी करो और आध्यात्मिक साधना भी।

मणि – सब कुछ त्याग सकना बड़े भाग्य की बात है।

श्रीरामकृष्ण – ठीक है। परन्तु जैसे जिसके संस्कार। तुम्हारा कुछ कर्म अभी बाकी है। उतना हो जाने पर शान्ति होगी, तब तुम्हें वह छोड़ देगा। अस्पताल में नाम लिखाने

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५२८ श्रीरामकृष्णवचनामृत २० जून, १८८४.

पर फिर सहज ही नहीं छोड़ते। बिलकुल अच्छे हो जाने पर छोड़ते हैं।

“यहाँ जो भक्त आते हैं, उनके दो दर्जे हैं। जो एक दर्जे के हैं वे कहते हैं, ‘हे ईश्वर, हमारा उद्धार करो।’ दूसरे दर्जेवाले अन्तरंग हैं, वे यह बात नहीं कहते। दो बातें जानने से ही उनकी बन जाती है। एक तो यह कि मैं (श्रीरामकृष्ण) कौन हूँ, दूसरी यह कि वे कौन हैं - मुझसे उनका क्या सम्बन्ध है।

“तुम इस श्रेणी के हो। नहीं तो और कोई क्या इतना कर सकता था!

“भवनाथ, बाबूराम का प्रकृतिभाव है। हरीश स्त्रियों का कपड़ा पहनकर सोता है। बाबूराम ने भी कहा है, मुझे वही भाव अच्छा लगता है। बस मिल गया। यही भाव भवनाथ का भी है। नरेन्द्र, राखाल, निरंजन, इन लोगों का पुरुष-भाव है।

“अच्छा, हाथ टूटने का क्या अर्थ है? पहले एक बार भावावस्था में दाँत टूट गया था। अबकी बार भावावस्था में हाथ टूट गया।”

मणि को चुपचाप बैठे देखकर श्रीरामकृष्ण आप ही आप कह रहे हैं -

“हाथ टूटा सब अहंकार निर्मूल करने के लिए। अब भीतर ‘मैं’ कहीं खोजने पर भी नहीं मिलता। खोजने को जब जाता हूँ तो देखता हूँ वे हैं। पूर्ण रूप से अहंकार नष्ट हुए बिना उन्हें कोई पा नहीं सकता।

“चातक को देखो, मिट्टी में रहता है, पर कितने ऊँचे पर चढ़ता है।

“कभी-कभी देह काँपने लगती है कि कहीं विभूतियाँ न आ जायँ। इस समय अगर विभूतियों का आना हुआ तो यहाँ अस्पताल-दवाखाने खुल जायेंगे। लोग आकर कहेंगे, मेरी बीमारी अच्छी कर दो। क्या विभूतियाँ अच्छी होती हैं?”

मास्टर – जी नहीं, आपने तो कहा है, आठ विभूतियों में से एक के भी रहने पर ईश्वर नहीं मिल सकते।

श्रीरामकृष्ण – बिलकुल ठीक, जो हीनबुद्धि हैं वे ही विभूतियाँ चाहते हैं।

“जो आदमी बड़े आदमी के पास कुछ प्रार्थना कर बैठता है, उसकी फिर खातिरदारी नहीं होती, उसे फिर एक ही गाड़ी पर, बड़े आदमी के साथ चढ़ने का सौभाग्य नहीं होता; यदि उसे वह चढ़ाता भी है, तो पास बैठने नहीं देता। इसीलिए निष्काम भक्ति, अहैतुकी भक्ति सब से अच्छी होती है।

साकार निराकार दोनों ही सत्य हैं

“अच्छा, साकार और निराकार दोनों सत्य हैं - क्यों? निराकार में मन अधिक देर तक नहीं रहता, इसीलिए भक्त साकार को लेकर रहते हैं।

“कप्तान ठीक कहता है, चिड़िया ऊपर उड़ती हुई जब थक जाती है, तब फिर डाल पर आकर विश्राम करती है। निराकार के बाद साकार।

२० जून, १८८४ | परिच्छेद ८३ | ५२९

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२० जून, १८८४परिच्छेद ८३५२९

"तुम्हारे अड्डे में एक बार जाना होगा। भावावस्था में देखा – अधर का घर, सुरेन्द्र का घर, बलराम का घर – ये सब मेरे अड्डे हैं।

"वे यहाँ आयें या न आयें, मुझे इसका हर्ष-दुःख नहीं।"

मास्टर – जी, ऐसा क्यों होगा? सुख का बोध होने से ही तो दुःख होता है। आप सुख और दुःख के अतीत हैं।

श्रीरामकृष्ण – हाँ, और मैं देख रहा हूँ, बाजीगर और उसका खेल। बाजीगर ही नित्य है और उसका खेल अनित्य – स्वप्नवत्।

"जब चण्डी सुनता था, तब यह बोध हुआ था। शुम्भ और निशुम्भ का जन्म हुआ, थोड़ी ही देर में सुना, उनका विनाश हो गया।"

मास्टर – जी, मैं कालना में गंगाधर के साथ जहाज पर जा रहा था। जहाज के धक्के से एक नाव उलट गयी, उस पर २०-२५ आदमी सवार थे। सब डूब गये। जहाज के पीछे उठनेवाली तरंगों के फेन की तरह सब लोग पानी के साथ मिल गये।

"अच्छा, जो मनुष्य बाजीगरी देखता है, क्या उसमें दया होती है? क्या उसे अपने उत्तरदायित्व का बोध रहता है, उत्तरदायित्व का बोध रहने पर ही तो मनुष्य में दया होगी न?"

श्रीरामकृष्ण – वह (ज्ञानी) सब देखता है- ईश्वर, माया, जीवजगत्। वह देखता है, माया (विद्या-माया और अविद्या-माया), जीव और जगत् – ये हैं भी और नहीं भी हैं। जब तक अपना 'मैं' रहता है, तब तक वे भी रहते हैं। ज्ञानरूपी खड्ग के द्वारा उन्हें काट डालने पर फिर कुछ नहीं रह जाता। तब अपना 'मैं' भी बाजीगर का तमाशा हो जाता है।

मणि विचार कर रहे हैं। श्रीरामकृष्ण ने कहा – "किस तरह, जानते हो? जैसे पच्चीस दलवाले फूल को एक ही वार से काटना।

"कर्तृत्व! राम राम! शुकदेव, शंकराचार्य, इन लोगों ने विद्या का 'मैं' रखा था। दया मनुष्य की नहीं, दया ईश्वर की है। विद्या के 'मैं' के भीतर ही दया है। विद्या का 'मैं' वे ही हुए हैं।

"तुम चाहे लाख बार यह अनुभव करो कि यह सब तमाशा है, पर हो तुम उन्हीं के 'अण्डर' (Under अधीन)। उनसे तुम बच नहीं सकते। तुम स्वाधीन नहीं हो। वे जैसा करायें, वैसा ही करना होगा। वह आद्याशक्ति जब ब्रह्मज्ञान देगी तब ब्रह्मज्ञान होगा – तभी तमाशा देखा जाता है, नहीं तो नहीं।

"जब तक थोड़ासा भी 'मैं' है, तब तक उस आद्याशक्ति का ही इलाका है; उन्हीं के अण्डर हो – उन्हें छोड़कर जाने की गुंजाइश नहीं है।

"आद्याशक्ति की सहायता से ही अवतारलीला होती है। उन्हीं की शक्ति से अवतार, अवतार कहलाते हैं। तभी अवतार कार्य कर सकते हैं। सब माँ की शक्ति है।

CC-0. In Public Domain. Gurukul Kangri Collection, Haridwar