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सुगम चिकित्सा

Sugam Chikitsa

आचार्य चतुरसेन शास्त्री द्वारा

स्रोत: June 1939 First Edition · सस्ता साहित्य मण्डल, दिल्ली (Sasta Sahitya Mandal, Delhi) · 1939 (उद्गम)

DevanagariHindipublished222 पृष्ठ

सुगम चिकित्सा

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गुर्दे हैं। वजन ११-१२ तोला तथा रंग गुलाबी है। इनका काम पेशाब बनाना है। तन्दुरुस्त गुर्दे दिन-रात में ११ सेर के क्रीव पेशाब बनाते हैं।

मसाना नाभी से नीचे है। इसीमें गुर्दे से पेशाब बनकर आता है। यह एक प्रकार की थैली है, जब भर मसाना जाती है तब पेशाब निकल जाता है।

गर्भाशय—(स्त्रियों के) गर्भाशय दाहिनी तरफ कोख में कलश के आकार का होता है।

मस्तक अस्त्ररोट के गूदे के समान ११ सेर वजन का है। खोपड़ी में रखा है। ज्ञान और चैष्टावहा नाड़ियों मस्तक इसीमें मिली हैं। स्त्री का मस्तक कुछ हलका होता है।

मस्तिष्क की बनावट

१. बृहन् मस्तिष्क २. लघु मस्तिष्क ५. प्राचीन मस्तिष्क या सेतु ४. सुप्पुन्ना नाड़ी (Spinal cord) ३. कशेरुकायें (Vertebrae)

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:६:

रोगी-परीक्षा

रोगी और रोग की परीक्षा करके तब इलाज करना चाहिए। ठीक-ठीक रोग की परीक्षा न होगी तो उसका इलाज भी न हो सकेगा। रोग की परीक्षा के तीन तरीके हैं। कुछ बातें वैद्यक विधि से जानी जाती हैं, कुछ अपने तजुर्वे से और कुछ रोगी को देखने से। बीमार की सूत्र और बातचीत से बहुत-सी बातों का अन्दाजा लगाया जा सकता है। उसे देखकर उसकी ताकत, उम्र और कितना पुराना बीमार है तथा कैसी तबीयत का और कैसी हैसियत का है, ये सब बातें जानी जा सकती हैं। नब्ज देखने और खून, पेशाब, जीभ, दस्त आदि के देखने से बहुत-सी बातें मालूम होजाती हैं।

हाथ के पहुँचे और अंगूठे की जड़ में एक गाँठ है, उसे दवाने से नब्ज देखी जाती है। नब्ज देखने में पुरुष का दाहिना और स्त्री का बाँया हाथ लेना चाहिए। खास-खास नब्ज देखना सौकों पर दोनों पैर, गले और मूत्रेन्द्रिय की भी नाड़ी देखी जाती है। इसकी जरूरत तब पड़ती है जब रोगी को चलाचली हो और हाथ की नब्ज का पता न चले। नब्ज देखने की

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रीति यह है कि नब्ज पर बहुत हल्के ढक्क से अपने दाहिने हाथ की तीनों वीच की उँगलियाँ बराबर-बराबर धरो और बायें हाथ से बीमार का हाथ कोहनी पर से जरा टेढ़ा कर दो और ध्यान से देखो कि किस उँगली के नीचे नब्ज साफ-साफ मालूम पड़ती है। अगर झँगूठे के पासवाली उँगली के नीचे है तो वायु की, वीच की उँगली के नीचे पित्त की और तीसरी उँगली के नीचे कफ की है। तेल मालिश करने के बाद, सोते हुए रोगी की, या खाना खाने के बाद या भूखे-प्यासे रोगी की नब्ज नहीं देखनी चाहिए। तन्दुरुस्त आदमी की नब्ज केँचुए की तरह धीरे-धीरे एक-सी चाल से चलती है। वायु का जोर होने पर साँप की तरह लहराती हुई, पित्त की नब्ज मेंढक की तरह फुदकती हुई और कफ की नब्ज मोर या कबूतर की तरह रुक-रुककर चलती है। सन्निपात की हालत में गड़बड़ नब्ज चलती है और मृत्यु के समय कुछ देर चलकर फिर रुक जाती है, जिसकी नब्ज इस तरह चलते-चलते वीच में रुक-रुक जाय और कहीं बदन पर सूजन न हो तो समझना कि ८-७ दिन में रोगी मर जायगा। जिसकी नब्ज झँगूठे की जड़ से आध झंगुल खसक जाय, उसकी मौत ३ दिन में होगी। जिसकी नब्ज सिर्फ झँगूठे की पासवाली उँगली के नीचे ही मालूम हो वह ४ दिन जियेगा, जिसका बदन बहुत गर्म और नाड़ी बहुत ठण्डी हो वह ३ दिन जियेगा। जिसकी नब्ज भौरि की तरह चक्कर खाकर गायब हो जाय, वह १ दिन जियेगा। जिसकी नब्ज सिर्फ झँगूठे के पासवाली उँगली के नीचे बिजली के समान भटका देकर गायब हो जाय, वह उसी दिन मरेगा। ऐसे रोगी की

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भारी । सन्निपात में टेढ़ी फटी हुई, भीतर धँसी हुई, या अथखुली । वायु से फटी और रुखी, पिस्त से लाल या आँखव जीभ काली, क्रक से सफेद, कफ से लिपी हुई-सी । सन्निपात में जली हुई-सी । जीभपेट की खराबी और कृच्छ्र में मैली और नीरस । साँस में बदबू । आँतों में आँव रक्त से जीभ, होठ और मुँह में झाले । जिगर की बीमारी में जीभ में घाव रहते हैं । रोगी के मुँह का स्वाद वायु से नमकीन, पिस्त से कड़ू आ, क्रक से मीठा, सन्निपात में जड़ होता है ।

जिसकी भाँहे नीचे को मुक्त जाँच या ऊपर चढ़ जाँच उसकी मृत्यु निकट है । जिसका स्वभाव एकाएक बदल जाय, आँखें घूमे, मस्तक और गर्दन गिर जाय, बोली बदल जाय, मृत्यु लक्षण सिर से सूखे गोबर की तरह चूरा गिरे, सुबह के बक्त ललाट में पसीना आवे, नाक का छेद लाल हो जाय, या फुन्सी दिखाई दे, शरीर या मुँह का आधा रंग बदल जाय, बीमार के दोनों होठ पके जामन की तरह काला हो जाय, या दाँत काले हो जाँच, जीभ फूल जाय या काली हो जाय, आँखें फटी की फटी रह जाँच, सिर के बाल और भौं एकाएक कँधी से घाने की तरह मालूम हों, तेल न लगाने पर भी चिकनाई मालूम हो, पलकों के बाल भड़ जाँच, नाक टेढ़ी हो जाय, नाक का छेद बड़ा हो जाय, हाथ पैर और साँस ठण्डी हो जाय, जो मुँह फैलाकर साँस ले, या दूटी साँस ले, जो बात कहते-कहते बेहोश हो जाय और चित्त सोकर दोनों पैर इधर-उधर पटकें, तो उसकी मौत पास ही जानना ।

: ७ :

रोगी की टहल

याद रखने की बात यह है कि रोगी को आराम करने के लिए सिर्फ दवा ही काफी नहीं है, बल्कि उसकी सेवा-टहल सबसे बड़ी

चीज है। अगर शुरू ही में रोगी को पूरा आराम,

रोगी की टहल

अच्छी टहल और परहेज का खाना मिले तो

रोग चाहे भी जैसा भयानक हो रोगी के चंगा हो जाने की पूरी-पूरी आशा रहती है। अक्सर ऐसा देखा जाता है कि जबतक रोगी बिल्कुल लाचार नहीं हो जाता वह न तो आराम करता है और न खाने-पोने ही का खयाल रखता है। जब रोग बढ़ जाता है तब यह कार्यवाही की जाती है, ऐसी हालत में उसको अधिक लाभ नहीं होता। रोगी को जल्द आराम होने के लिए नीचे लिखी बातों की सख्त जरूरत है।

१—रोगी को बिछौने पर चुपचाप लिटाये रहो और पूरा आराम करने दो।

२—ताजा हल्का और परहेज का खाना खाने को दो।

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३—कालतु मुलाकतियों को रोगी के पास मत आने दो।

४—अच्छे वैद्य-डाक्टर से इलाज कराओ।

५—जबतक पूरा आराम न हो जाय परहेज और आराम का पूरा ध्यान रखो।

६—रोगी को साफ हवादार कमरे में रखो और किसीको वहाँ हुक्का-बीड़ी मत पीने दो और न वहाँ भीड़ रहने दो।

७—रोगी को भरपूर नींद सोने दो।

दहल करनेवाला ऐसा आदमी होना चाहिए कि जो समझदार, धीरजवान और फुर्तिला हो। बीमार अक्सर चिड़चिड़ा होजाता है और अकारण ही बक-भक किया करता है।

दहल करनेवाला

जबतक सेवा करनेवाला रोगी से प्रेम न करेगा, वह उसकी बकभक सहन न करेगा और न उसकी गन्दगी साफ करेगा रोगी को आराम नहीं पहुँचा सकता। उसे डाक्टर-वैद्य की बताई हुई बातों का भी पूरा ध्यान रहना चाहिए जिससे वह पूरी तौर-पर उनका रोगी से पालन करा सके, तथा निरालस्य होकर रात-दिन रोगी की देख-भाल कर सके।

जिस कमरे या कोठरी में मरीज रखा जाय वह बिल्कुल खाली और साफ हो, उसमें सटर-पटर कोई सामान न हो। उसमें

कमरा

सिवा दहल करनेवाले के कोई न आवे, न सोवे।

उसमें हवा और उजाले की काफी गुंजाइश

रहनी चाहिए। पर हवा का मोका मरीज को न लगे यह ध्यान रहे।

छूत के मरीज को बिल्कुल दूर रखना चाहिए।

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रोगी की टहल

बहुत लोग समझते हैं कि बीमार को नहलाना न चाहिए। पर याद रखो कि तन्दुरुस्त आदमी की बनिस्वत रोगी को नहलाने की ज्यादा जरूरत है क्योंकि उसके शरीर से स्नान पसीने के रूप में ज्यादा जहर निकलते रहते हैं और चमड़ी साफ न रहने से नये रोगों को पैदा कर देते हैं। कमजोर रोगी को स्पंज-स्नान कराना चाहिए जिसकी विधि हमने अन्यत्र लिख दी है।

हमने अन्यत्र थर्मोमिटर देखने की रीति लिखी है। नाड़ी देखने की रीति भी लिखी है। भिन्न-भिन्न उम्र में नाड़ी बुखार देखना की गति भिन्न होती है वह भी हमने पीछे लिख दिया है। इस बात का बारीकी से खयाल रखा जाय।

बीमार का साँस भी कभी-कभी देखा जाता है। इसकी रीति यह है कि एक हाथ में घड़ी लो और दूसरा रोगी की छाती पर धरो। हर बार जब साँस ले, गिनो।

तुरत के बच्चे का साँस १ मिनट में ४० बार होता है।

२ वर्ष में ..... २८ " "

४ " ..... २५ " "

१० " ..... २० " "

जवान आदमी का ..... १६-१८ बार " "

टहल करनेवाले को, खासकर छूत के बीमार की टहल करने के समय अपने हाथ और अङ्ग की सफाई का पूरा खयाल रखना चाहिए। हैजा, ताऊन, मोतीभर्रा, चेचक आदि के बीमार का

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दस्त, पेशाब उठाकर या उसे साफ करके गर्म पानी में पोटास परमैंगनेट मिलाकर उससे हाथ धोना चाहिए। आराम होने पर रोगी के कपड़े इसी दवा के पानी में उबाल डालने

सफाई

चाहिए। उनके दस्त और गंदगी को जला डालना चाहिए। साधारण रोगी के बिछौने हर २४ घण्टे बाद धूप में पड़े रहने चाहिए। नीलाथोथा भी पानी में मिलाकर सफाई के काम में लाया जा सकता है। ४ गिलास पानी में १ चम्मच नीलाथोथा काफी है। जिस घर में बीमार रह चुका हो उसे लीप-पोत कर साफ कर देना चाहिए।

भोजन—बीमार के लिए खास प्रकार का खाना बनाया जाता है।

१—थोड़ा कुटा हुआ चावल या जौ का दलिया बनाकर १० गुने पानी में पकाना चाहिए। फिर उसमें नमक या चीनी मिलाकर पीना चाहिए।

२—बहुत कमजोर मरीज को खासकर जिन्हें आँब-खून के दस्त की बीमारी हो यह उत्तम है कि थोड़ी धान की खीले गर्म-पानी से भिगोकर मसल-खान कर मिश्री या नमक मिलाकर देना चाहिए।

३—मूंग, मसूर, अरहर की दाल का शोरबा बनाना हो तो दाल को १८ गुने पानी में सिभाना चाहिए। उसमें सैन्धा-नमक और जीरा तथा हरा धनिया, पोदीना डाला जा सकता है। काली मिर्च इच्छा होने पर डाली जा सकती हैं।

४—पुराने बुखार के लिए दूध में बराबर पानी मिला २-३ सासुत

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शर्मा श्री टहल

पीपल डालकर पकाने में जब पानी जलजाय तब दूध छान कर मिश्री, चीनी मिलाकर रोगी को देना बहुत लाभकारी है।

५—कमजोर रोगी को आटे की रोटी जो जल्द हज्म हो मके, बनाने की विधि यह है कि आटा गुंदाकर एक घण्टा तक पानी में भिगो रखना—फिर नूत्र ममलकर गोला बनाना, फिर एक बरतन में पानी चुल्हे पर चढ़ाकर वह गोला १५-२० मिनट उबालकर बाहर निकाल लेंना, फिर उसकी रोटी बनाना। यह रोटी बहुत जल्द हज्म होती है।

६—मच्छी-तरकारी—जैसे लोका-धीया, तोरई, पालक, चाँलाई आदि पतली रसदार बनाना चाहिए। ज्यादा मिर्च-ममाला न डालना चाहिए।

७—मूँह का स्वाद खराब होने पर पोदीना अदरख नीबू मिलाकर चटनी बनाई जा सकती है। या अनारदाने की चटनी भी फायदा कर सकती है। ताजे नीबू में नमक, काली-मिर्च मिलाकर गर्म करके चूसना फायदा करता है। मुनक्का बीज निकाल नमक-मिर्च मिला, सूई में छेद, गर्म करके खाये जा सकते हैं।

८—फलों में सेव, संतरा, अनार भीठा बेदना, पपीता, अंगूर, मुनक्का, अंजीर, गन्ना आदि मौका देखकर डाक्टर की सलाह से दिये जा सकते हैं।

: ८ :

प्रायदेमन्द इलाज

कुछ इलाज ऐसे हैं जिनमें दवा की जरूरत नहीं पड़ती और उनसे बहुत-सी बीमारियाँ अच्छी हो जाती हैं। ये कुदरती इलाज के तरीके हैं। इनमें न कोई खतरा है और न खर्च।

सूरज की किरणों से तन्दुरुस्ती का बड़ा गहरा सम्बन्ध है। सूरज की किरणें हमें ताकत देती हैं। उनमें बीमारी के कौड़ों को मार डालने की अनोखी ताकत होती है। अगर सूरज की किरणें हम शरीर को ज्यादा-से-ज्यादा खुला हुआ सूरज की किरणों के सामने रखें तो हम तन्दुरुस्त और मजबूत बने रहेंगे। जो हिस्सा सूरज की किरणों के सामने खुला रहता है उसमें फोड़-फुन्सी नहीं होता। तपेदिक के बीमार के लिए सूरज की रोशनी बहुत जरूरी है। हमेशा याद रखो कि बीमार को ऐसे कमरे में रखो जिसमें सूरज की रोशनी काफी हो।

याद रखो कि आन्न और पानी के बिना तो हम कुछ दिन जिन्दा रह भी सकते हैं, पर हवा के बिना कुछ मिनटों में भर

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फायदेमन्द इलाज

जावेंगे। अक्सर लोग यह भूल करते हैं कि बीमार के कमरे में हवा नहीं जाने देते। यह बड़ी भूल की बात है। जबतक हमें

साफ़ हवा और पानी साफ़ हवा साँस लेने को न मिलेगी हम कभी तन्दुरुस्त नहीं रह सकते।

इसी तरह पानी भी दुनिया में अमृत है। हमारे शरीर का जितना वजन है उसका दो हिस्सा पानी है। तन्दुरुस्त आदमी को साढ़े तीन सेर पानी पीना चाहिए। बीमार आदमी को खूब पानी पीना चाहिए। बुखार के बीमार को खास तौर पर खूब पानी पीना चाहिए पर यह उबालकर ठण्डा कर लिया जाय। खूब पानी पीने से पेशाब और पसीना खूब आयेगा—बुखार हल्का हो जायगा।

ठण्डे और गरम पानी से सिकार्ड करने से चोट लगने या दर्द होने पर बहुत फ़ायदा होता है। गरम पानी के सेक से नसें ढीली

पड़ जाती हैं और ठण्डे पानी के सेकने से सिकुड़ सेकना जाती हैं। इससे खून का दौरा ठीक हो जाता है।

सेकने के लिए तीन फिट लम्बा और इतना ही चौड़ा कोई खहर का या कम्बल का टुकड़ा लेना चाहिए। सेकने के लिए आधी घाल्टी उबलता पानी चाहिए। इसे अंगीठी या चूल्हे पर रखकर गरम किया जाय। सेकने के लिए कपड़े के दो टुकड़े ही काफी हैं। एक टुकड़ा मेज या चौकी पर फैला दो। दूसरे टुकड़े को तीन तह लम्बी करके उसके दोनों छोर पकड़कर उबलते पानी में डुबो दो ताकि वे खूब भीग जायें, फिर उन दोनों छोरों को उल्टी ओर से जल्दी से मोड़ो और खींचो, इससे सब पानी निचुड़ जायगा और

सुगम चिकित्सा

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हाथ भी न जलेंगे। अब इस कपड़े को फेंले हुए कपड़े में लपेटकर जहाँ सेक करना हो वहाँ सेको। (देखो चित्र नं० १) ध्यान रखो कि चमड़ी जल न जाय। जितना ज्यादा पानी कपड़े में होगा उतना ही ज्यादा गरम मालूम होगा। रीढ़ पर, पेट पर, छाती पर या हाथ-पैरों के जोड़ों पर अक्सर सेकने की जरूरत पड़ जाती है। एक बार ५ मिनट तक सेककर कपड़ा फिर पानी में डाल दो और पाव घरुटे तक सेक रखो। तकलीफ़ ज्यादा हो तो आध घण्टे भी सेका जा सकता है। सेकने के बाद अङ्ग को गीला न रहने दो।

कमर के दर्द में तेल की मालिश करने और लेप करने की वनिस्वत सादा पानी से सेक करने से जल्द दर्द आराम हो जाता है, सूजन भी कम हो जाती है और खर्च भी कुछ नहीं होता। हर्ज भी कुछ नहीं। (देखो चित्र नं० २)

सिर दर्द होने पर या शुरू-शुरू बुखार में पेड़ की सूजन या बवाई फट जाने पर पैरों को सेकने से बहुत फायदा होता है। इसकी सीधी तरकीब है यह कि एक बड़ी बाल्टी में गर्म पानी भरकर पैर उसमें डालकर मूढ़े पर बैठ जाओ और यदि पसीना लाना हो तो कम्बल ओढ़ लो। (देखो चित्र नं० ३) यह काम बन्द मकान में करो। १५-२० मिनट पैर पानी में रखो, बीच-बीच में गरम पानी पीखो। अगर पानी में एक चम्मच पिस्ती राई डाल दी जायगी तो सेक खूब तेज़ होगी। पेशाब बन्द हो जाने पर, पेड़ की सूजन में, गर्भाशय की सूजन में, योनि या अण्डकोप

चित्र नं० १ सेंकने के लिए कपड़ा गरम करने की विधि

चित्र नं० ३ पैर सेंकने की विधि

चित्र नं० २ कमर सेंकने की विधि

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फायदेमन्द इलाज

की सूजन में, गरम पानी में बैठना बहुत फायदेमन्द है। स्त्रियों को मासिक धर्म के समय जो कष्ट होता है उसमें भी इससे बहुत फायदा होता है। कूलहे का दर्द और रुक-रुककर मासिक-धर्म होने में भी यह इलाज सुफौद है। इसकी तरकीब यह है कि एक चौड़ी परात चौकी पर रखकर उसमें गरम पानी भर दो और रोगी को उसमें बैठो दो। पैरों को दूसरी बाल्टी में गरम पानी भरकर डलवा दो। १०-१५ मिनट यह सेक करना चाहिए। बदल पर पसीना लाना हो तो कम्बल उड़ाया जा सकता है। सिर पर गीला झंगोछा लपेट लेना चाहिए। ( देखो चित्र नं० ४ )

गरम पानी की भाँति ठण्डे पानी में भी इसी तरह बैठो जा सकता है। पेशाब की जलन या स्त्रियों के रक्तस्राव में इससे फायदा होता है। पास में तालाब या नदी होने पर भी यह काम किया जा सकता है। गरम पानी में बैठने के बाद जो अङ्ग गरम पानी में डूबे थे पहले उन्हें ठण्डे पानी से भीगे मोटे झंगोछे से और फिर सूखे झंगोछे से रगड़-रगड़कर पोंछ देना चाहिए।

यह यन्त्र वाज़ार में मिलता है। इसे एनीमा कहते हैं। यह बहुत काम की चीज़ है। हर गाँव में एक होना चाहिए।

पिचकारी स्त्रियों की योनि में खाज, जखम हों, सफेदे की बीमारी हो या माहवारी ठीक न हो या बच्चा पैदा होने के बाद सफाई न हुई हो तो यह पिचकारी स्त्रियों की योनि में देना चाहिए। इसकी सीधी रीति यह है कि रोगी को

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चारपाई, चटाई या तख्त पर चित्त लिटाओ। साधारण सफाई के लिए मामूली गरम पानी ही काफी हैं। पर पूंछ में दर्द हो तो पानी जरा तेज कर लेना चाहिए। बीमार से गन्ध-भर ऊँचाई पर दीवार में कील ठोककर बरतन को टाँग दी और नली को घी से चिकना करके योनि में डाल दो—पानी आने दो। मासिक-धर्म रुक-रुक कर आता हो तो दो-तीन बार दिन-भर में करना चाहिए। सकेदी की बीमारी में जरा-सी गुलाबी फटकरी पानी में मिलाकर पिचकारी देनी चाहिए।

कोठा साफ करने के लिए यही पिचकारी गुदा में लगाई जा सकती है। इसके लिए रोगी को दाहिनी करवट लिटाओ, दाहिना पैर सिकोड़ दो, बाँया फैला दो और धीरे से नली गुदा में जरा सीधी लगाकर प्रवेश कर दो। इस काम के लिए दो या डेढ़ सेर पानी होना चाहिए। सादा पानी से भी काम चल सकता है। पर पेट में भारी दर्द हो, पेट सरल हो, शुद्ध पड़ गये हों तो पानी में एक चम्मच नमक और जरा-सा साबुन नहाने का घोल दो। योनी और गुदा के काम की अलग-अलग नालियाँ बाजार में अंग्रेजी दवावालों के यहाँ मिलती हैं। इसे २। इच्छ गुदा में भीतर जाने दो। पिचकारी देने पर जब थोड़ा पानी रह जाय तब नली निकाल लो—टूटी जाने की इच्छा को जरा देर रोको और रोगी के पेट को हाथ से दबाओ। बच्चों को भी इससे लाभ होगा, पर नली छोटी होनी चाहिए। ( देखो चित्र नं० ५ )

साफ वीतल में गरम पानी भरकर खूब कसकर डांट दो और

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