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सुगम चिकित्सा

Sugam Chikitsa

आचार्य चतुरसेन शास्त्री द्वारा

स्रोत: June 1939 First Edition · सस्ता साहित्य मण्डल, दिल्ली (Sasta Sahitya Mandal, Delhi) · 1939 (उद्गम)

DevanagariHindipublished222 पृष्ठ

४२ / सुगम-चिकित्सा

चित्र १-३: सेंकने की विधियाँ

चित्र नं० १

चित्र नं० २

चित्र नं० ३


चित्र नं० १— सेंकने के लिए कपड़ा गरम करने की विधि ।

चित्र नं० २— कमर सेंकने की विधि ।

चित्र नं० ३— पैर सेंकने की विधि ।

फायदेमन्द इलाज

उसे भीगे अंगोष्ठे में लपेटकर सक करने के काम में ला सकते हों, दाँत का दर्द या कमर का दर्द इससे जल्द शर्म बोलल आराम होता है। वदन में गर्मी बनाए रखने के लिए जांघ में, बगलों में, पैर की पिडलियों और टखनों के नीचे सूखे तौलिये में लपेट कर बोलले रखने से दूर तक वदन में गर्मी आयाम रन्वी जा सकती है।

एक भाक मोटे ग्वहर के टुकड़े को लेकर ठण्डे पानी में भिगोओ। और घिना निचोड़े हवा में फैलाकर २-४ मटके दो और द्विताओ हमसे कपड़ा विलकुल ठण्डा हो जायगा। उसकी ठरही गही गही बनाकर मिर पर रखने से बुखार की गर्मी कम होती है। पेड़ पर रखने से पेशाब उत्तरता है। इसमें मिर पर रखने के लिए थोड़ा सिकी और पेड़ पर रखने के लिए शोरा भी मिलाया जा सकता है।

तीसरा को जब हम नहला नहीं मकने तो स्पंज करके उसके वदन को साफ करना चाहिए। इन काम में दो अंगोष्ठे होने चाहिए। पहले भीगे अंगोष्ठे को निचोड़कर स्पंज, उससे एक-एक थक साफ करता, पीछे सूखे से पोछने जाना चाहिए। बुखार उतारने में भी स्पंज बहुत मदद देता है।

: ६ :

बुखार और उसका इलाज

बुखार की बीमारी सब जीव जन्तुओं को जन्मते और मरते समय जरूर होती है। सब बीमारियों में बुखार खास है। बुखार कई किसम के होते हैं। यहाँ हम थोड़े में खास-खास बुखारों का वर्णन करेंगे।

सब किसम के बुखारों में शुरू में ये लक्षण होते हैं। मुँह का स्वाद खराब हो जाना, शरीर का भारीपन, खाने-पीने में अरुचि, आँखों में बेचैनी, नींद ज्यादा आना, हाथ-पैरों का दूटना, जम्हाई आना, बदन कोंपना, सर्दी लगना, थकान बढ़ना, रौंगटे खड़े होना, और आलस।

पीछे जब वायु का जोर हुआ तो जम्हाई आती है, पित्त का जोर होने पर अरुचि हो जाती है। सब किसम के बुखारों में चमड़ी खूब गर्म हो जाती है।

थर्मामीटर बुखार देखने की एक काँच की नली होती है। इसमें

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बुखार और उसका इलाज

भीतर पारा भरा रहता है और नलीपर नम्वर लिखे रहते हैं। इसके नीचे के हिस्से को जिसमें पारा भरा रहता है थर्मामीटर बगल में दबाकर रखना चाहिए। पहले वहाँ का पसीना पोंछ लेना चाहिए। बगल में नली इस तरह रखनी चाहिए कि पारे का हिस्सा बाहर न रह जाय। बदने की गर्मी से पारा ऊपर उठेगा। ऊपरी हिस्से में निशान और नम्वर लिखे रहते हैं। पारा जहाँतक उठे उसी हिसाब से बुखार जानना चाहिए। अक्सर चाँई बगल में नली लगाई जाती है पर मुँह में भी लगाते हैं। मुँह में जीभ के नीचे नली लगाना चाहिए। छोटे बच्चों के गुदा में लगाना चाहिए। बुखार को देखने का सबसे अच्छा समय सुबह-शाम है। लेकिन ज्यादा बीमारी हो तो १-१ या २-२ घण्टे में भी देखा जा सकता है।

(तन्दुरुस्त आदमी के शरीर की गर्मी ६०। डिग्री होती है। २५ वर्ष से कम उम्र के आदमी की कुछ ज्यादा होती है। कसरत करने, दौड़ने, छूप में रहने तथा भोजन करने से कुछ बढ़ जाती है और दिन में सोने, थकने आदि से कम हो जाती है।) मामूली बुखार में १०१। डिग्री गर्मी हो तो फिक की बात नहीं है। १०४ डिग्री तक होने से बुखार तेज गिना जाता है, १०६। होने से खतरा और १०८। होने से मृत्यु होती

सुगम विक्रिप्सा

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है । पर 'कुछ बुखार' जैसे निमोनिया में या सन्निपात में या दाह- ष्वर में १०६ या १०७ डिग्री बुखार कुछ देर को होजाता है । पर १०१ और १०५ डिग्री के भीतर बुखार ठहर जाय तो वह 'स्तर- नाक' बात है । पुराने बुखारों में रात को ष्वर कम होजाता है ।

कुछ किसिम के बुखार शोक, आनन्द, जागने, थकने, भीगने, जुकाम, नजले आदि से पैदा होजाते हैं । इन में पूरा आराम करना चाहिए । और उनके कारणों को दूर करना चाहिए ।

बात के बुखार में- कांपना, कभी सदी कभी गर्मी लगना, होठ और गला सूखना, नींद न आना, छाँक न आना, कंठज होना आदि लक्षण होते हैं ।

पित्त के बुखार में तेज बुखार, पतला दस्त, नींद कम, उल्टी, पसीना, मुँह का स्वाद कड़ुआ, जलन होना, प्यास ज्यादा, गला, होठ और नाक का पक जाना आदि लक्षण होते हैं ।

कफ के बुखार में मन्दा बुखार, आलस, मुँह का स्वाद मीठा, भूख नहीं, जी मिचलाना, नींद ज्यादा, जुकाम आदि लक्षण होते हैं ।

१—करंजुआ के बीज की मींग १ पाव लेकर उसमें १ छटाँक काली मिर्च मिलाकर चने-सी गोली पानी में बनाकर ताजे पानी के साथ काम से लेने से सब प्रकार के बुखार को फायदा करती है ।

२—गिलोय, सोंठ और पीपलामूल एक-एक पैसा-भर का काढ़ा सुबह-शाम पीने से वायु का और कफ का बुखार आराम होता है ।

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बुखार और उसका इलाज

३—गिलोय, धनिया, नीम काँ छाल, लाल चन्दन, कमलगट्टे की मींग, हरक ५-५ माशा कूट-छानकर ३ पाव जल में औंटाये, आध पाव रहे तो ६ माशा शहद मिलाकर पीये। सब प्रकार के गर्मी के बुखार को फायदा करता है।

सन्निपात के बुखार में, जिसमें रोगी बेहोश होजाता है, चक-बाद करता है या उठ-उठकर भागता है, जीभ जली हुई के जैसी होजाती है, बदन में लाल या काले चकत्ते पड़ जाते हैं, सिर में सूजन आजाती है। ऐसे रोगी का इलाज बहुत होशियार डाक्टर-बैच से कराना चाहिए। नीचे लिखा काढ़ा इसमें बहुत फायदा करेगा—

१—कटहली, सोंठ, गिलोय और कूट इनको ६-६ माशा लेकर १ पाव पानी में पकावे। १ छटॉक रहने पर छानकर दो या तीन बार पीझो।

२—काला जीरा, कूट, अरएड की जड़, बड़ा गूलर, सोंठ, गिलोय, दशमूल, कपूर, काकड़ासी, जवासा और विसखपरा सब ५-५ माशा डेढ़ पाव गाय के पेशाब में पकाकर १ छटॉक रहने पर छानकर पीने से सन्निपात में बेहोश पड़ा बीमार भी अच्छा होगा।

सन्निपात के बुखार में जब हालत बहुत खराब होजाय और नाड़ी कमजोर हो जाय, बदन ठण्डा हो जाय तो कस्तूरी और कपूर १-१ रत्ती मिलाकर पान के रस में देना और हाथ-पैरों में गरम घोलल रखना। निमोनिया में दोनों फेफड़े सूज जाते हैं। खाँसी होती है, तन्वाकू रङ्ग का मटमैला चिकना कफ़ बड़ी तकलीफ़ से निकलता

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है। छाती के छूने में दर्द होता है। यह रोग बड़ी मेहनत से आराम होता है। अतः अच्छे डाक्टर-वैद्य से इलाज कराना चाहिए।

कभी-कभी खून भी निकलता है। सातवें दिन निमोनिया पेशाब और पसीना ज्यादा आता है। तन्त्र की चाल १ मिनट में १२० तक हो जाती है, स्वर १०४ डिग्री का होता है। नींद नहीं आती, साँस कष्ट से लिया जाता है। कभी-कभी मुँह पर फुन्सी हो जाती है। कभी-कभी फेफड़ा सड़ जाता है और सड़े हुए दूध की मलाई की भाँति बदबूदार बलगम निकलता है। बूढ़े और बालक को बहुत मुश्किल से आराम होता है।

कभी-कभी इसमें वेहोशी और सरसाम भी हो जाता है। इस के लिए अगर डाक्टर का बन्दोबस्त न हो तो दशमूल के काढ़े में पीपल का चूर्ण बुरकी डालकर दिन-रात में ३-४ बार पीना चाहिए। वाजरा और नमक की पोटली से सेकना चाहिए। गरम पानी पीने को दो। कफ निकलने में कष्ट हो तो अदरक का रस नमक मिला, गरम-गरम मुँह में भरकर शूकना चाहिए।

पुराना बुखार—१० दिन बीतने पर बुखार पुराना हो जाता है। इसके लिए यह काढ़ा बहुत अच्छा है—

गिलोय, नीम की छाल, लाल चन्दन, पद्माख, मुलहठी, बुरकी, मोथा और बड़ी हरड। ४-५ माशे का काढ़ा शहद मिलाकर पीना चाहिए।

स्वर में प्यास—ज्यादा हो तो पके हुए पानी में सौँफ की पोटली बनाकर चूसने को दो।

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बुखार और उसका इलाज

ज्वरदाह—हो तो गीले कपड़े से शरीर को संज करो। हाथ-पैरों के तलुओं पर काँसे के बरतन धिसो।

ज्वर में पसीना ज्यादा हो—तो गरम-गरम भुने चने झिलिका उतारकर पोटली बनाकर पसीने की जगह फेरो। पेट्रोल या तार-पीन का तेल मलो।

( ज्वर में उल्टी होने पर—खस, चन्दन धिसकर मिश्री मिलाकर पिलाओ।

ज्वर में कब्ज होने पर—२॥ तोला अरएडी का तेल गर्म दूध या पानी में पिलाओ।

ज्वर में पेशाब रुक जाय तो—२ रस्ती से ६ रस्ती तक शोरा ठण्डे पानी में मिलाकर दो-दो घण्टे में दो।

ज्वर में हिचकी हो—तो राई का चूर्ण ६ माशा आध-सेर पानी में मिलाकर थोड़ी देर रखदो, वही पानी निथार कर रोगी को पिलाओ।

ज्वर में सूवास हो तो—मोर का पंख जलाकर शहद में चढ़ाओ।

ज्वर में खाँसी हो तो—बहेड़ा घी चुपड़ भूभल में दवा दो और मुँह में रखकर रस चूसने दो।

ज्वर में अश्वि हो तो—सैन्धा-नमक और अदरक का रस मुँह में रखकर कुल्ले करादो।

ज्वर आराम होने पर—खान-पान आदि का ऐसा बन्दोबस्त रखो कि कब्ज न रहे और बददुष्मी न हो। ज्यादा मिहनत भी न करो। बरना दुबारा बुखार आना बहुत घुरा है।

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मलेरिया, मोतीभूरा, चेचक तथा छूत के बुखारों का वर्णन हमने अन्यत्र किया है।

नीचे बुखार के कुछ आजमूसा नुसखे लिखे जाते हैं। जिनसे सब प्रकार के बुखार आराम होते हैं।

१—नीलोफर ६ माशा, खूबकलों ४। माशा दोनों को ढेढ़ पाव पानी में ओटाओ, आधपाव रहे तो छानकर थोड़ी मिश्री डालकर पियो।

२—सफेद कृष्ण ४ भाग, कपूर १ भाग, पानी में जड़ली बेर के समान गोली बनाकर सेवन करनेसे गर्मी का ज्वर दूर होता है।

३—सफेद कृष्ण १ माशा, संखिया १ रत्ती, पीस मोठ के बराबर गोली बनावे। जाड़ा चढ़ने से पहले १ गोली खाय। जाड़े बुखार की बढ़िया दवा है।

४—हरताल तबक्री, फटकरी प्रत्येक १ तोला २। माशा ग्वार-पाठा के रस में नीम के सोटे से घोंटे जिसमें पैसा जड़ा हो। १६ पहर घोटकर टिकिया बनावे और छाया में सुखाकर मिट्टी के बर्तन में ऊपर नीचे पीपल की राख भरकर कपरोड़ी कर गढ़ा खोद जड़ली उपलों की आँच दे। ठण्डा होने पर निकाले, एक चाबल खुराक है। भोजन दूध चाबल दे। एक दिन में कफ और पित्त के ज्वर को आराम करेगा।

५—हींग और नमक दो माशे सेर भर जल में ओटावे जब ६ माशा रहजाय पीवे, चौथैया जाय।

६—नोसादर ३ रत्ती कालीमिर्च दो नग वारी के दिन कूटकर खाने से वारी रुक जाती है।

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कीड़ों की बीमारियाँ

कुछ बीमारियाँ कीड़ों से होती हैं। ये कीड़े बहुत छोटे होते हैं और आँख से नहीं देखे जा सकते। ये बहुत भयानक होते हैं और जो बीमारियाँ इनसे होती हैं वे भी भयानक होती हैं। १०० में ६० माँत इन्हीं बीमारियों से होती हैं जो कीड़ों से पैदा होती हैं। ये कीड़े इतने बड़े हैं कि एक रात-दिन में एक २५ करोड़ होजाते हैं। सील, अन्धेरा, सड़ा-गला, साग-पात और गद्दों का गन्दा पानी इन कीड़ों की जन्मभूमि है। ये हैजा, चेचक, मोतीभरा, लाल बुखार, तपेदिक, डिपथिरिया, ताऊन, गर्मी, मोसमी बुखार, आदि रोगों को पैदा करते हैं। इसीसे ये बीमारियाँ छूत की कहलाती हैं। क्योंकि यह उड़कर दूसरों को लगती हैं। इसलिए सब लोगों को दो बातों में होशियार रहना चाहिए। एक तो यह कि जब ऐसी बीमारियाँ फैली हों तो अपना बचाव करे; दूसरे जब ऐसे बीमार की टहल करनी पड़े तो अपनी दिफाजत रखे। याद रखने की बात है कि यह कीड़े ४ ढंग से शरीर में घुसते हैं। या तो खाने-

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पीने की चीजों के साथ मूँह के रास्ते, या नाक के रास्ते सांस के साथ हवा में, या कहींसे चमड़ी कट गई हो तो उस रास्ते से। अथवा खटमल, पिस्सू, जूँ, या मच्छर के काटने से जिनके भीतर पहले ही से ये कीड़े होते हैं। इनसे बचने की रीति यह है कि ऐसे रोगियों के कपड़े-लत्ते, बरतन, खाना अलग रखा जाय, और अपने काम में न लिया जाय। रोगी को भी अलग कमरेमें रखा जाय, उसके कपड़े, बरतन काम में लाने से पहले गर्म पानी में खूब उथाल लेने चाहिए और उसका दस्त, पेशाव, थूक बगैरा उठाकर अपने हाथ भी अच्छी तरह साफ कर लेने चाहिए। जहाँ ऐसी बीमारी फैली हो वहाँ से कहीं चला जाना चाहिए और यदि रहना पड़े तो हरी साग-सब्जी और फल खाने छोड़ देना चाहिए। पानी उबाल कर पीना चाहिए। अपने शरीर को जरक लगने से रोकना चाहिए और मक्खी, मच्छर, पिस्सू, आदि के काटने से बचाना चाहिए।

तपेदिक बहुत खराब बीमारी है। इसे क्षय रोग कहते हैं। बहुत होशियारी से इसका जल्द इलाज करने से यह आराम हो सकता है। जिनकी पतली चपटी छातियाँ होती तपेदिक हैं और कन्धे मुके हुए रहते हैं उन्हें इस बीमारी के लगने का डर रहता है। इस बीमार का शुरुमें बज्रन कम होता जाता है। जुकाम-सा मालूम देता है, सूखी खाँसी का धसका चलता रहता है। वे लोग जल्दी थक जाते हैं। कुछ हफ्ते बाद ही उन्हें शाम को हल्का बुखार रहने लगता है। और सुबह-शाम उसके की खाँसी आती है। कुछ दिन बाद रात को पसीना आने लगता है।

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कीड़ों की बीमारियाँ

कभी-कभी छाती में दर्द होता है और थूक में लाल रक्त मिला जाता है। भूख मर जाती है और रोगी चिड़चिड़ा और निराश हो जाता है। इसकी खवार में रोग के कीड़े होते हैं। इसलिए उसे होशियारी से थूकना चाहिए। अगर वह मरीज लापरवाही से इधर-उधर थूक देगा, तो वह थूक धूल में मिलकर सूख जायगा और इधर-उधर उड़कर सांस के साथ मुँह में चला जायगा और बीमारी पैदा करेगा। सबसे अच्छी बात तो यह है कि बीमारी शुरू होते ही उसका इलाज अच्छे डाक्टर या वैद्य से कराओ। हरेक बड़े शहर में इस बीमारी के खास शफाखाने बन गये हैं। जिनमें ऐसे बीमारों को दवा दी जाती है।

तपेदिक कई तरह की होती है। छाती की तपेदिक में खाँसी मुख्य बात है। कपटमाल भी तपेदिक ही की बीमारी है। इसमें स्वर सूखा होजाता है और निगलने में तकलीफ होती है। हड्डियों में तपेदिक होने से टॉंग छोटी पड़ जाती है क्योंकि यह ज्यादातर फूलहे के जोड़ पर होता है। रीढ़ की हड्डी पर होने से कूबड़ निकल जाता है। बच्चों को जब कपटमाल निकलती है वह पीला और दुर्बल हो जाता है, और दुखती है और कान बहने लगता है। गले पर और आगे-पीछे गिलियाँ निकल आती हैं।

सब किसिम के तपेदिक का बड़िया इलाज यह है कि रोगी खूब आराम करे, फिक और मिहनत से बचे, हल्का और पुष्टिकारक खाना खाए, और बढ़न की ताकत बढ़े ऐसा उपाय करे। हर-चक्र ताजी हवा में रहे, धूप, धूल, भीड़ और बन्द जगह में न रहे।

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दिन में पेड़ के नीचे चारपाई पर पड़े रहना अच्छा है। उसे दूध, मलाई, चावल, गेहूँ की रोटी, मक्खन, अंगूर, दाख, हरी तरकारी और ताजे फल दे सकते हैं। पर हाजमे का खयाल रखकर। अगर आदत हो, अण्डे और मांस का रस भी दिया जा सकता है। मछली का तेल (Cod Liver Oil) जो सब अंग्रेजी दवा बेचने वालों के यहाँ मिलता है तपेदिक की अच्छी दवा है, पर यह दवा नहीं, खुराक है। सुबह सबसे पहले एक ग्लास गर्म दूध बकरी या गाय का पीना बहुत अच्छा है। इससे खाँसी कम उठेगी। मरीज को रोज दही जाना जरूरी है। अगर बुरा तैज हो तो ठण्डे पानी से स्पंज करना चाहिए। अगर मुँह से खून आवे तो उसे बिल्कुल विस्तर पर लेटे रहना चाहिए। अगर ज्यादा खून थूके तो ठण्डे पानी में साफ कपड़े के टुकड़े भिगोकर छाती पर रखना चाहिए। आराम होने पर भी ऐसे रोगी को बहुत एहतियात से रहना चाहिए, जिससे बीमारी पीछे न लग जाय। तपेदिक के मरीज को ब्रह्मचर्य से रहना जरूरी है।

१—नर्म गेहूँ घी में भूनलो। इसे २१ बार आँखों के ताजे रस में घोटो। एक छटाँक गेहूँ में एक बार में एक छटाँकरस डालो, बिल्कुल सूख जाने पर दुबारा डालो। २१ बार घुट जाने पर सुखाकर शीशी में भरलो। खुराक ४ रत्ती से एक माशा तक की है। सुबह-शाम शहद में चटाओ। सब किसिम के तपेदिक को फायदा करेगी।

२—कैकड़ा नाम का एक जानवर पानी में मकड़ी की शकल का

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कीड़ा की वीमारियाँ

होता है। वह सूखा हुआ बड़े-बड़े पंसारी की दुकान पर भी मिलता है। उसे कुल्हिया में जलालो और उसीकी राख ६ तोला, सेलखड़ी, सफेद कत्था, कतीरा, बबूल का गोंद, पोस्त के दाने, गेरू सब १-१ तोला लो। ६-६ माशा अफीम और कपूर मिलाओ। कूट-पीट कर बेर-सी गोली बनाओ। हर बक् मुँह में रखकर चूसने को दो। इससे खून थूकने में धारास मिलेगा।

३—अड़ूसे का ताजा पत्तों का रस निकाल कर २ तोला ६ माशा शहद मिलाकर सुबह शाम पीने को दो।

४—कण्ठमाल में मुर्दे की जली हुई हड्डी चिता से लाकर अण्डे की जर्दी या सिर्फें में पत्थर पर घिसकर लेप करो फायदा करेगा। साथ में बकरी के कन्धे की हड्डी कुल्हिया में जलाकर १५ दिन खाय। खुराक चबत्ती भर पानी के साथ।

५—गाय के खुर और साँग मीठे तेल में जलाकर तेल छान कर रखले। उसका कण्ठमाल की गांठों पर लेप करे।

(६—सीतोपलादि चूर्ण और न्यवनप्राश तपेदिक का बहुत अच्छी दवा है।)

हैजें का हमला अक्सर रात को होता है। घोड़े के पेशाब के समान दस्त आने लगते हैं, पेट में ऐंठन होती है, साथ ही कैं होती है। कैं में पहले खुराक निकलती है और हैजा पीछे दस्त-जैसी चीज कैं में भी निकलने लगती है। प्यास बहुत लगती है, टाँगें, बाँह और पीठ ऐंठने लगती हैं। कुछ देर बाद आँखें भीतर धसने लगती हैं और नीचे काले गढ़े

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पड़ जाते हैं। नाक नोकीली होजाती है। गालों में गढ़े पड़ जाते हैं, आंठ नीले और दँत काले होजाते हैं, शरीर ठण्डा हो जाता है। चमड़ी गीली और चिपचिपी हो जाती है। हाथों और उँगलियों की चमड़ी खुरदरी होजाती है। साँस ठण्डा आता है और पेशाब बहुत कम होजाता है। कभी-कभी कुछ ही घण्टों में रोगी मर जाता है और कभी-कभी दो-तीन दिन जीता है। रोगी के दस्तकै में रोग के अनगिनत कीड़े रहते हैं। इसलिये उसे होशियारी से फ़ैरन जला दिया जाय, बरना इधर-उधर डाल देंगे से बीमारी फैलने का भारी अन्देशा है। रोगी की सेवा करनेवाले की जान भी ख़तरे में समझनी चाहिए। इसलिये उसे बड़ी होशियारी से अपने हाथ साफ़ करने चाहियें। बच्चों को अक्सर हैजा ज़्यादा ख़तरनाक नहीं होता।

इस बीमारी का इलाज जल्द ही कर देना चाहिए। रोग शुरू होते ही पास के अच्छे चिकित्सक को बुलाओ। मरीज को चार-पाई पर लिटा दो। लेंटे-लेंटे ही दस्त कराओ। बार-बार नींबू का रस मिलाया हुआ पानी पिलाओ। खट्टी और बासी छाछ धूप में रखकर वह पीने को दो। खाना शुरू में १२ घण्टे तक कुछ मत दो। पेट पर सेक करो। बीमार को गरम रखो, गरम पानी की बोटलें बगल और जाँघों में रखो, कमबल लपेट दो, २ सेर गरम पानी में एक चम्मच नमक डालकर गुदा में पिचकारी दो। यह काम दिन में ३ बार करो। गुलाबी दवा (पोटासियम परमेग्नेट) भी पिचकारी की दवा में मिला दो। पीने के पानी में भी घोल दो। एक

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कीड़ों की बीमारियाँ

गिलास पानी में एक रस्ती दवा काफी है। यह दवा अंग्रेजी दवा-खानों में मिल जाती है। दस्त बन्द हो जायें तो चावल का माण्ड खाने को दो। पर नमक, पानी की पिचकारी और नींबू का रस मिला पानी बराबर देते रहो। पीठ के नीचे सेक भी करो। खबरदार रहो, सामूली दस्त बन्द करने की दवा न दो।

१—आक का जड़ और अदरक बराबर लेकर घोटकर काली मिर्च के बराबर गोली बना लो। हर ३ घण्टे पर एक गोली पानी से दो। रोग कम होने पर ढेर में दो।

बीमार के अच्छा होने पर उस कोठरी को चूने से पुतवा दो। बरतन आग में तपा डालो और बिस्तरा जला दो। बरना जरा-सी भूल में नारे गांव में हैजा फैलने का डर है। ईन्धे के दिनों में कच्चे फल, तरकारी, खीरे, खरबूचे आदि न खाये जायें, पानी पका लिया जाय और भूखा न रहा जाय, न ठण्डा-वासी खाया जाय।

ताऊन की बीमारी चूहों से फैलती है। पहले चूहों को यह बीमारी होती है। ऐसे चूहों के शरीर पर अनगिनत पिस्सू लिपटे रहते हैं जिनके पेट में ताऊन के कीड़े रहते हैं।

ताऊन

जब चूहे को ताऊन की बीमारी होती है, तब वह नौखलाया हुआ आंगन में चक्कर खाता है और थोड़ी देर में मर जाता है। मुनासिब है कि यह हालत देखते ही घर खाली कर देना चाहिए या उसे फिनाइल से धुलवाना चाहिए। फिनाइल का दीन वाज़ार में खूब सस्ता मिलता है। आमतौर पर यह बीमारी

सूगम विक्रिस्ता

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३ किसिम की होती है। एक गांठवाला, दूसरी बिना गाँठ की; इसमें उल्टी या दस्त के रास्ते खून आता है; तीसरी वह जिसमें फेफड़े सूजकर निमोनिया होजाता है। इनमें सबसे खराब वह है जिसमें गाँठ नहीं निकलती। गाँठवाला वह मरीज भी जिसकी बगल में गाँठ हो, ज्यादा खतरनाक है। तीसरी किसिम की ताऊन अकसर आराम हो जाती है। गाँठ पककर फूट जाना आराम होने की निशानी है। बदन पर खून के बिन्ते या दहोरे पड़ जाना बहुत खराब हैं। मुँह, नाक, दस्त और पेशाब के रास्ते खून गिरना भी इसी तरह खतरनाक है। गाँठ का बैठ जाना भी बुरा चिन्ह है। ताऊन का बीमार कुछ घण्टों से लेकर एक महीने तक जिन्दा रह सकता है। कभी-कभी चौबीस घण्टे के अन्दर, कभी दूसरे या तीसरे दिन, और कभी-कभी पाँचवे-छठे और सातवें दिन मरीज मर जाता है। बीमारी ज्यों-ज्यों पुरानी होती है बीमार के बचने की आशा होती जाती है।

पेट में जो कंठुए पड़ जाते हैं, वे लम्बे और गोल होते हैं, इनका छोर तुकौला होता है। ये ४ से ६ इञ्च तक लम्बे होने हैं।

ये छोटी आँतों में होते हैं; पर मेदे में भी जा सकते हैं। कभी-कभी जब उल्टी होती है वे गले तक चढ़ आते हैं। खास-नाली में चले आने से बालक का दम घुटकर मर जाने का बड़ा अन्देशा रहता है। जब बालक के पेट में कंठुए हो जाते हैं तो उसकी भूख बन्द हो जाती है और उसका जी मिचलाने लगता है, कभी-कभी पेट में दर्द भी होने

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कीड़ों की बीमारियाँ

लगता है। बालक नाक मलता है और दांत कट-कटाता है।

जब यह मालूम होजाय कि किसी बालक के पेट में केंचुएँ हैं तो दोपहर को उसे परएडी का तेल पिलादो, उसी दिन शाम को आधा ग्रैन सेन्टोनीन थोड़ी चीनी मिलाकर पिलादो। दूसरे दिन सुबह और फिर शाम को भी आधा-आधा ग्रैन सेन्टोनीन दो। इसके दो घण्टे बाद परएडी का तेल पिलाओ। इन दो दिनों में उसे कुछ तरकारी खाने को मत दो, सिर्फ चावल का माण्ड दो। सेन्टोनीन अंग्रेजी दवा है, वह बाल-बच्चे दारों को अपने घर में हरवक्त बनाए रखनी चाहिए। बच्चों के पेट में एकाध केंचुएँ होना हर हालत में मुश्किल है, ऐसी हालत में साल में एक बार सेन्टोनीन दे देना ही अच्छा है। क्योंकि ज्यादा केंचुएँ होने से तो पता चल जाता है पर थोड़ी केंचुएँ होने से न उल्टी होती है न दस्त होते हैं। ये केंचुएँ चुपचाप खुराक के रस को चूसते रहते हैं जिससे बालक की बढ़ती रुक जाती है। परन्तु यदि रखो कि सेन्टोनीन ज़हर है, उसे ज्यादा मत दो, उसके देने से पेशाब पीला होजाता है और पीला ही दीखने लगता है, पर इससे डरने की बात नहीं, एक-दो दिन में यह बात जाती रहती है।

पेट के केंचुएँ पेट में नहीं पैदा होते, खुराक और पानी के साथ इनके अण्डे पेट में जाते हैं। आँतों के ये कीड़े अनगिनत अण्डे देते हैं, और ये अण्डे दस्त के रास्ते बाहर निकलते हैं, और ज़मीन में, नदी या तालाब के पानी में, या बगीचों की हरियाली में अपनी जगह बना लेते हैं। इनमें बच्चे के लिए यह बहुत

सुगम त्रिकिंसा-

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ज़रूरी है कि उवाला हुच्चा पानी काम में लाया जाय। सड़ी तर-कारी जो बाज़ार से मौल ली जाय उसे पकाकर खाया जाय, फलों को खाने से पहले गर्म पानी में थोकर छील लेना चाहिए। बच्चों को मुँह में उँगली नहीं डालने देनी चाहिए; न अष्ट-सष्ट चीज़ों की मुँह में रखने की आदत पड़ने देनी चाहिए। इस किसम के कीड़ों के अण्डे कुत्तों और विल्लियों की आँतों में भी होते हैं, जब वे बालक के हाथों को चाटते हैं तो ये कीड़े उनके हाथ में लग जाते हैं, फिर बालक उँगलियों को मुँह में डालकर या उन्हीं हाथों से खाना खाकर उन कीड़ों को मुँह में डाल लेता है।

दस आदमियों में से चार को कद्दूदाने की बीमारी होती है। जिनके पेट में ये कीड़े होते हैं वे बहुत सुस्त और ठीले-ढाले रहते

कद्दूदाने हैं। कद्दूदाना एक सफेद गोलाकार लम्बा और बारीक कीड़ा है। वह तिहाई इच्छ से आध इच्छ

तक लम्बा और सीने के धागे के जैसा मोटा होता है। अगर सीने के मामूली धागे को आध इच्छ के छोटे-छोटे टुकड़ों में काट डाला जावे तो वे कद्दूदाने के जैसे दीख पड़ेंगे। ये छोटे कीड़े बच्चों और बड़ों दोनों के जिसम में घुस जाते हैं। कभी-कभी वे गिनती में बहुत कम, यानी १०-२० ही होते हैं, पर कभी-कभी उनकी गिनती हजारों तक पहुँच जाती है। वे कीड़े आँत की भीतरी परत में चिपक जाते हैं और खून को चूसने लगते हैं। वे सिर्फ़ खून ही को नहीं चूसते वहाँ घाव भी बना देते हैं जिनसे खून रिस्ता रहता है। इस तरह लगातार खून रिसने रहने से और इस जहर से जो

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कीड़ों की बीमारियाँ

इन कीड़ों से पैदा होता है आदमी दुबला और पीक पड़ जाता है, ताकत कम हो जाती है और तपेदिक होने का खतरा हो जाता है। बच्चे, जिनके पेट में कद्दूदाने होते हैं, छोटे ही रहते हैं और उनकी बढ़ावार रुक जाती है, वे १८ वीस वर्ष की उम्र में १०-१२ वर्ष के बालक से लगते हैं।

अगर तुम यह देखो कि किसी बालक की चमड़ी पीली पड़ गई है, वह सुस्त हो गया है और उसे चूना या मिट्टी रखने की इच्छा होती है तो जान लो कि इसके पेट में कद्दूदाने की बीमारी है। पाँव के तलुए और अँगूठों के बीच में खुजली चलने से यह समझना चाहिए कि कद्दूदाने पैर की चमड़ी के जरिये शरीर में घुस रहे हैं।

ये कद्दूदाने पेट में अनगिनत अण्डे देते हैं, पाखाने के साथ ये बाहर निकलते हैं, जब पाखाना इधर-उधर फँक दिया जाता है, तो ये भी फैल जाते हैं, १० दिन में इनमें से कीड़े निकल आते हैं, और घर के आँगन या बगीचे की मिट्टी में रेंगने लगते हैं। जो आदमी या बच्चे नंगे पैर चलते हैं उनके पैरों पर चढ़ जाते हैं और सौका पाकर चमड़ी में छेद करके भीतर घुस जाते हैं। और आँतों तक पहुँच जाते हैं। वहाँ मजे में खून चूसते रहते हैं।

इनके रोकने की सबसे अच्छी तरकीब यह है कि पक्के पाखानों को काम में लाया जाय, इधर-उधर मैला न फँका जाय। टह्रियों में ढकनेदार बालटियाँ हों, पाखाना दूर ले जाया जाय या गाड़ दिया जाय। अगर घर में पक्का पाखाना नहीं है तो