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सुन्दर विलास (सन्त सुन्दरदास जी - अद्वैत वेदान्त एवं ज्ञान-भक्ति काव्य सटीक)

Sundar Vilas of Sant Sundardas with Hindi Commentary

सन्त सुन्दरदास जी द्वारा

DevanagariHindipublished284 पृष्ठ

४० ] ॥ सुन्दर विलास ॥ जैसे कोऊ गुडी कौ चढावत गगन माहि, ताहू की तौ धुनि मुनि वैसे ही बखानिये । सुन्दर कहत तैसे काल कौ प्रचंड बेग, रात दिन चल्यौ जाइ अचिरज मानिये ॥२१॥ माया जोरि जोरि नर राखत जतन करि, कहत है एक दिन मेरै काम आइ है । तोहि तौ मरत कछु बार नहि लागै शठ, देखत ही देखत बुलूला सो बिलाइ है ॥ धन तौ धर्योई रहै चलत न कौडी गहै, रीते ही हाथनि जैसौ आयौ तैसौ जाइ है । करि लै सुकृत यह बरिया न आवै फेरि, सुन्दर कहत पुनि पीछे पछिताइ है ॥२२॥ बावरौ सौ भयौ फिरै बावरी ही बात करै, बावरे ज्यौ देत वायु लागत बौरानौ है । माया कौ उपाइ जानै माया की चातुरी ठानै, माया सौं मगन अति माया लपटानौ है ॥ (२१) भभीरी-झींगुर कीडा । गुडी-पतंग । (२२) वलूला-पानी का बुदबुदा, झाग । सुकृत-सत्कर्म । बरिया-मौका, अवसर । देत वायु-बकवाद करता है । बोरानो बोराया हुआ मा । चातुरी-चतुराई ।

॥ काल चितावनी को अंग ॥ [ ४१ जौबन कौ मद मातौ गिनत न कोऊ नातौ, काम बस कामिनी कै हाथ ही बिकानौ है । श्रुति ही भयौ बेहाल सूझत न माथै काल, सुन्दर कहत ऐसो और को दिवानो है ॥२३॥ झूठौ धन झूठौ धाम झूठौ कुल झूठौ काम, झूठी देह झूठौ नाम धरिकें बुलायौ है । झूठौ तात झूठी मात झूठे सुत दारा भ्रात, झूठी हित मानि मानि झूठौ मन लायौ है ॥ झूठौ लेन झूठौ देन झूठौ मुख बोलै बैन, झूठै झूठै करि फेन झूठ ही कौ धायौ है । झूठ ही मैं एतौ भयौ झूठ ही मैं पचि गयो, सुन्दर कहत साच कबहुँ न आयौ है ॥२४॥ दीर्घाक्षरी झूठे हाथी झूठे घोरा झूठे आगै झूठा दौरा, झूठा बध्या झूठा छोडा झूठा राजा रानी है । झूठी काया झूठी माया झूठा झूठे धधा लाया, झूठा मूवा झूठा जाया झूठी याको वानी है ॥ झूठा सोवै झूठा जागै झूठा झूमै झूठा भाजै, झूठा पीछे झूठा लागे झूठै झूठी मानी है । झूठा लीया झूठा दीया झूठा खाया झूठा पीया, झूठा सौदा भलै कीया ऐसा झूठा प्रानी है ॥२५॥ (२५) वध्या-बधा हुआ । छोडा-छूटा हुआ ।

४२ ] ॥ सुन्दर विलास ॥ झूठ सौ बध्यौ है लाल ताहि तें ग्रसत काल, काल बिकराल ब्याल सबही कौ खात है । नदी कौ प्रवाह जैसे जात है समुद्र माहि, तैसे जग काल हि कै मुख मैं समात है ॥ देह सौ ममत्व तातैं काल कौ भै मानत है, ज्ञान उपजैं तें वह कालहू विलात है । सुन्दर कहत परब्रह्म है सदा अखंड, आदि मधि अन्त एक सोई ठहरात है ॥२६॥ इन्दव छंद काल उपावत काल खपावत, काल मिलावत है गहि माटी । काल हलावत काल चलावत, काल सिखावत है सब आटी ॥ काल बुलावत काल भुलावत, काल डुलावत है वन घाटी । सुन्दर काल मिटै तबही पुनि, ब्रह्म विचार पढै जब पाटी ॥२७॥ इति काल चेतावनी कौ अंग सम्पूर्ण (२६) लाल-प्यारे । (२७) आटी-दाव पेंच । पाटी-पाठ ।

॥ देहात्म विछोह को अग ॥ [ ४३ अथ देहात्म विछोह को अग ॥४॥ इन्दव छन्द वै श्रवना रसना मुख बैठे हि, वैसे हि नासिका वैसे हि अखी । वै कर वै पग वै सब द्वार सु, वै नख सीस हि रोम असखी ॥ वैसेहि देह परी पुनि दीसत, एक बिना सब लागत खखी । सुन्दर कोऊ न जानि सकै यह, बोलत हो सो कहा गयौ पखी ॥१॥ बोलत चलात पीवत खात सु, सीचत है द्रुम कौ जैसे माली । लेतहु देतहु देखत रीझत, तोरत तान बजावत ताली ॥ जा महि कर्म विकर्म किये सब, है यह देह परी अब ठाली । सुन्दर सो कतहू नहिं दीसत, खेल गयौ इक खेल सो ख्याली ॥२॥ (१) खखी-सूना । (२) ठाली-सूनी, बेकार । ख्याली-खिलाडी आत्मा ।

४४ ] ॥ सुन्दर विलास ॥ मात पिता जुवती सुत वधव, लागत हैं सब कौ अति प्यारे । लोग कुटुम्ब खरौ हित राखत, होइ नहीं हमतें कहु न्यारो ॥ देह सनेह तहा लग जानहु, बोलत है मुख शब्द उचारो । सुन्दर चेतनि शक्ति गई जब, वेगि कहै घर माहि निकारो ॥३॥ रूप भलौ तब ही लग दीसत, जौलंग बोलत चालत आगै । पीवत खात सुनै अरु देखत, सोइ रहै उठिकै पुनि जागै । मात पिता भइया मिलि बैठत, प्यार करं जुवती गर लागै । सुन्दर चेतनि शक्ति गई जब, देखत ताहि सबै डरि भागै ॥४॥ मनहर छंद कौन भांति करतार कियौ है शरीर यह, पावक कै मध्य देखौ पानी कौ जमावनौ । नासिका श्रवन नैन बदन रसन बैन, हाथ पाव अंग नख सिख कौ बनावनौ ॥ (३) जुवती-युवती, स्त्री ।

॥ देहात्म विछोह को अंग ॥ [ ४५ अजब अनूप रूप चमक दमक ऊप, सुन्दर शोभित अति अधिक सुहावनौ । जाही छिन चेतना सकति जब लीन होइ, ताही छिन लागत सबनिकौ अभावनी ॥५॥ मृत्तिका कौ पिंड देह ताही मै युगति भई, नासिका नयन मुख श्रवन बनाये है । शीस हाथ पाव अरु अगुंली बिराजमान, अगुंली कै आगै पुनि नखऊ लगाए है ॥ पेट पीठि छाती कठ चिबुक अधर गाल, दशन रसन बहु वचन सुहाए है । सुन्दर कहत जब चेतना सकति गई, वही देह जारि बारि छार करि आये है ॥६॥ देह तो प्रगट यह ज्यौ की त्यौ ही जानियत, नैन के झरौखे माहि झाकत न देखिये । नाक के झरौखे माहि नैकु न सुबास लेत, कान के झरौखे माहि सुनत न लेखिये ॥ (५) पावक-अग्नि । ऊप-सफाई । सकति-शक्ति । अभावनी-अरुचिकर, भद्दा । (६) चिबुक-ठोडी । अधर-होठ । दशन-दात ।

४६ ] ।। सुन्दर विलास ।।

मुख के झरोखे मै वचन न उचार होत, जीभ हू कौ खटरस स्वाद न विसेखिये । सुन्दर कहत कोउ कौन बिधि जानै ताहि, कारौ पीरौ काहू द्वार जानौ हू न पेखिये ॥७॥ माई तौ पुकारि छाती कूटि कूटि रोवत है, बाप हू कहत मेरौ नन्दन कहा गयौ । भाइया कहत मेरी बाह आज दूरि भई, बहन कहत मेरै बीर दुख है दयौ ॥ कामिनी कहत मेरौ सीस सिरताज कहा, उनि ततकाल हाथ मै सिधौरा है लयौ । सुन्दर कहत ताहि कोऊ नहि जानि सकै, बोलत हुतौ सु यह छिन मैं कहा भयौ ॥८॥ रज अरु बीरज कौ प्रथम सयोग भयौ, चेतना सकति तब कौन भाति आई है । कोऊ तौ कहत बीज मध्य ही कियौ प्रवेस, किनहु क पंच मास पीछै कै सुनाई है ॥ (८) सिधोरा-सिंदूर नारियल आदि सती होने का सामान । बोलत हुतो-बोलने वाला ।

॥ देहात्म विछोह को अंग ॥ [ ४७ देह कौ बियोग जब देखत ही होइ गयौ. तब कोऊ कहै कहा जाइ कै समाई है । पण्डित रिषीश्वर तपीश्वर मुनीश्वर ऊ, सुन्दर कहत यह किनहू न पाई है ॥६॥ तबहि लौ क्रिया सब होत है विविध भांति, जब लग घट माहि चेतन प्रकास है । देह कै अशक्त भये क्रिया सब थकि जात, जब लग श्वास चलै तब लग आश है ॥ श्वासऊ थक्यौ है जब रोवन लगे है तब, सब कोऊ कहैं यह भयौ घट नास है । काहू नहिं देख्यौ किंहि और कौन कहा गयौ, सुन्दर कहत यह बडौई तमास है ॥१०॥ देह तौ सुरूप तौलौ जौलौ है अरूप माहि, सब कोऊ आदर करत सनमान है । टेढी पाग बाधि वार वार ही मरोरै मूछ, बाहु उसकारै अति धरत गुमान है ॥ (१०) असक्त-अशक्त, असमर्थ ।

४८ ] ।। सुन्दर विलास ।। देस देस ही के लोक आइकै हजूरि होहि, बैठि करि तखत कहावै सुलतान है । सुन्दर कहत जब चेतना सकति गई, उहै देह ताकी कोऊ मानत न आन है ॥११॥ ।। इति देहात्म बिछोह को अंग सम्पूर्णं ।। (११) तमास-तमाशा, अचम्भे की बात ।

॥ तृष्णा को अंग ॥ [ ४६ अथ तृष्णा को अंग ॥५॥ इन्दव छन्द नैनन की पल ही पल मैं, छिन आध घरी घटिका जु गई है । याम गयौ युग याम गयौ, पुनि साझ गई तब भोर भई है ॥ आज गई अरु काल्हि गई, परसौ तरसौ कछु और ठई है । सुन्दर ऐसे ही आयु गई, तृष्णा दिन ही दिन होत नई है ॥१॥ दुर्मिला छंद कन ही कन कौ बिललात फिरै, शठ जाचत है जन ही जन कौ । तन ही तन कौ अति सोच करै, नर खात रहै अन ही अन कौ ॥ मन ही मन की तृष्णा न मिटी, पुनि धावत है धन ही धन कौ । छिन ही छिन सुन्दर आयु घटी, कबहू न गयौ बन ही बन कौ ॥२॥ (१) घटिका-घडी । याम-पहर । युग-दो । (२) कन- कण, अन्न के दाने । अन-अन्न ।

५० ] ॥ सुन्दर विलास ॥ इन्दव छन्द जौ दस बीस पचास भये शत, होहि हजारनि लाख मगैगी । कोटि अरब्ब खरब्ब असखि, पृथीपति होने की चाह जगैगी ॥ स्वर्ग पताल कौ राज करौ, तृष्णा अधिकी अति आग लगैगी । सुन्दर एक सन्तोष बिना शठ, तेरी तौ भूख न क्यौ ही भगैगी ॥३॥ लाख करोरि अरब्ब खरब्बनि, नीलि पदम्म तहा लग खाटी । जोरि हि जोरि भण्डार भरे सब, और रही सु जिमी तर दाटी ॥ तोहु न तोहि सतोष भयौ शठ, सुन्दर तै तृष्णा नही काटी । सुझत नाहि न काल सदा सिर, मारि कै थाप मिलाइ है माटी ॥४॥ (४) जमी तरदाटी -जमीन में गाड दी ।

॥ तृष्णा को अग ॥ [ ५१ भूख लिये दसहू दिस दौरत, ताहि तैं तूं कबहू न अघै है । भूख भण्डार भरै नहि कैसै हु, जो, धन मेरु कुबेर लौ पै है ॥ तू अब आगै ही हाथ पसारत, ताहि तै हाथ कछू नहिं ऐहै । सुन्दर क्यों नहिं तोष करै नर, खाइ हि खाइ केतौइक खैहै ॥५॥ भूख नचावत रक हि राज हि, भूख नचाइकै विश्व विगोई । भूख नचावत इन्द्र सुरासुर, और अनेक जहा लग जोई ॥ भूख नचावत है अध ऊरध, तीनहू लोक गनै कहा कोई । सुन्दर जाइ तहा दुख ही दुख, ज्ञान बिना न कहू सुख होई ॥६॥ (६) विगोई-विगाड देती है। अध-नीचे के लोक। ऊरध-ऊपर के लोक ।

५२ ] ॥ सुन्दर विलास ॥ पेट पसार दियौ जितही तित, तै यह भूख कितीयक थापी । ओर न छोर कछू नहि आवत, मैं बहु भाति भली बिधि मापी ॥ देखत देह भयौ सब जीरन, तू नित नौतन आहि अद्यापी । सुन्दर तोहि सदा समझावत, हे तृष्णा ! अजहू नही घापी ॥७॥ तीनहू लोक अहार कियौ फिर, सात समुद्र पियौ सब पानी । और जहा तहा ताकत डोलत, काढत आँखि डरावत प्रानी ॥ दात दिखावत जीभ हलावत, याहि तें मै यह डाइनि जानी । सुन्दर खात भये कितने दिन, हे तृष्णा ! अजहू न अघानी ॥८॥ (७) जीरन-जीर्ण, जर्जर । नौतन-नूतन, नया । अद्यापी-अभी भी ।

॥ तृष्णा को अंग ॥ [ ५३ पांव पताल परै गये नीकसि, सीस गयौ असमान अघेरौ । हाथ दसो दिसि कौं पसरै पुनि, पेट भरै न समुद्र सुमेरौ ॥ तीनहु लोक लिये मुख भीतरि, आंखिहु कान बधे चहु फेरौ । सुन्दर देह धर्यो अति दीरघ, हे तृष्णा ! कहुं छेह न तेरौ ॥६॥ बादि वृथा भटकै निस बासर, दूरि कियौ कबहूं नहि घोषा । तूं हथियारीन पापिनि कोठनि, साच कहू मति मानहि रोषा ॥ तोहि मिल्यौ तबतें भयौ बधन, तूं मरि है तबही होइ मोषा । सुन्दर और कहा कहिये तोहि, हे तृष्णा ! अब तौ करि तोषा ॥१०॥ (९) अघेरो-आगे । सुमेरौ-सुमेरु पर्वत । (१०) हति- यारिन-हत्यारी । मोषा-मोक्ष, मुक्ति, छुटकारा ।

५४ ] ॥ सुन्दर विलास ॥ क्यों जग माहि फिरै भख मारत, स्वारथ कौन पर्यौ जिहि जोलै । ज्यौ हरिहाइ गऊ नहि मानत, दूध दुह्यौ कछु सो पुनि ढोलै ॥ तू अति चंचल हाथ न आवत, नीकसि जाइ नही मुख बोलै । सुन्दर तौहि कह्यो बेरि केतक, है तृष्णा ! अब तू मति डोलै ॥११॥ तैं कोऊ कान धरी नहि एकहु, बोलत बोलत पेट ही पाक्यो । हौ कोऊ बात बनाइ कहू जब, त तब पीसत ही सब फाक्यौ ॥ केतक द्यौस भये परमोघत, तैं अब आगै हि ' को रथ हाक्यौ । सुन्दर सीख गई सबही चलि, हे तृष्णा ' कहि के तोहि थाक्यौ ॥१२॥ (११) हरिहाई-हरा चारा खाने को उतावली । (१२) द्यौस-दिवस, दिन । परमोघत-समझाते-समझाते । पीसत ही-पीसते पीसते ही ।

॥ तृष्णा को अंग ॥ [ ५५ तूं हि भ्रमाइ प्रदेस पठावत, बूडत जाइ समुद्र जिहाजा । तूं हि भ्रमाइ पहार चढावत, बादि'वृथा मरि जाइ अकाजा ॥ तै सब लोक नचाइ भली बिधि, भांड किये सब रंक रु राजा । सुन्दर तोहि दुखाइ कहूं अब, हे तृषणा ! तोहि नैकु न लाजा ॥१३॥ ॥ इति तृष्णा को अंग सम्पूर्ण ॥

५६ ] ॥ सुन्दर विलास ॥ ॥ अथ अधीरज उराहनैं को अंग ॥६॥ इन्दव छंद पाव दिये चलनै फिरनै कोड, हाथ दिये हरि कृत्त करायौ । कान दिये सुनिये हरि को जस, नैन दीये तिनि माग दिखायौ ॥ नाक दीयौ मुख शोभत ता करि, जीभ दई हरि को गुन गायौ । सुन्दर साज दियौ परमेश्वर, पेट दियौ परि पाप लगायौ ॥१॥ कूप भरै अरु वापि भरै पुनि, ताल भरै बरखा रितु तीनौ । कोठि भरै घट माट भरै, घर हाट भरै सब ही भरि लीनौ ॥ खदक खास बुखार भरै परि, पेट भरै न बडौ दर दीनौ । सुन्दर रीतौ ही रीतौ रहै यह, कौन खडा परमेश्वर कीनौ ॥२॥ (१) अधीरज-अधीरता । उराहना-उलाहना, उपालभ देना । (२) वापि-बावडी । माट-बडा मटका । खदक-बडा गढ्ढा । खास-खाई । बुखार-भखारी । दर-गढ्ढा ।

॥ अधीरज उराहने को अग ॥ [ ५७ मनहर छन्द किधौ पेट चूल्हा किधौ भाठी किधौं भार आइ, जोई कछु झौंकिये सु सब जरि जातु है । किधौं पेट थल किधौ वावी किधौ सागर है, जितौ जल परै तितौ सकल समातु है ॥ किधौ पेट दैत्य किधौ भूत प्रेत राक्षस है, खाउ खाउ करै कहू नैकु न अघांतु है । सुन्दर कहत प्रभु कौन पाप लायौ पेट, जबतै जनम भयौ तब ही को खातु है ॥३॥ बिग्रह तौ बिग्रह करत अति बार बार, तनु पुनि तनुक न कबहू अधायौ है । घट न भरत क्यौ ही घट्योई रहत नित, शरीर रिराइ मैं तौ कछुक न खायौ है ॥ देह देह कहत ही कहत जनम बीत्यौ, पिंड पिंड काजै निसि दिन ललचायौ है । पुदगल गिलत गिलत न तृपत होइ, सुन्दर कहत बपु कौन पाप लायौ है ॥४॥ (३) किधो-क्या अथवा बनाग । भाटी-भट्टी । (४) विग्रह-शरीर या झगडा । तनु-शरीर । तनुक- थोडा सा भी । रिगइ-रोता ही रहता है । पुदगल-शरीर ।

५८ ] ॥ सुन्दर विलास ॥ पाजी पेट काज कोतवाल कौ अधीन होत, कोतवाल सु तौ सिकदार आगै लीन है । सिकदार दीवान कै पीछै लग्यौ डोलै पुनि, दीवान हू जाइ पातिसाह आगै दीन है ॥ पातिसाह कहै या खुदाइ मुझै और देइ, पेट हो पसारै, नहि पेट बसि कौन है । सुन्दर कहत प्रभु क्यौ ही नहि भरै पेट, एक पेट काज एक एक कौ अधीन है ॥५॥ तै तो प्रभु दीयौ पेट जगत नचायौ जिन, पेट ही के लिये घर घर द्वार फिर्यौ है । पेट ही के लिये हाथ जोरि आगै ठाडौ होइ, जोइ जोइ कह्यौ सोइ सोइ उनि कर्यौ है ॥ पेट ही कै लिये पुनि मेघ सीत घाम सहै, पेट ही कै लिये जाइ रनु मांहि मर्यौ है । सुन्दर कहत इन पेट सब किये भाड, और गैल छूटी परि पेट गैल पर्यौ है ।॥६॥ (५) सिकदार-फौजदार, सेनापति । दीवान-मन्त्री । पातिसाह, राजा, बादशाह । (६) रनु-रण, युद्ध । भाड-नाच नाचने वाला ।

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