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सूरसागर सार (सटीक हिन्दी व्याख्या)

Sur Sagar Saar with Hindi Commentary

महाकवि सूरदास / डॉ. धीरेन्द्र वर्मा द्वारा

DevanagariBrajpublished359 पृष्ठ

प्रस्तावना एवं कवि परिचय

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सूरसागर सार सटीक

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सूरसागर सार सटीक [ सूरसागर के लगभग ८३१ अत्यन्त उत्कृष्ट पदों का संकलन ] सम्पादक डॉ० धीरेन्द्र वर्मा साहित्य भवन [प्रा०] लिमिटेड के पी. कक्कड़ रोड, इलाहाबाद-२११००३

पंचम संस्करण : १९८६ मूल्य : ३०-०० साहित्य भवन प्राइवेट लिमिटेड, ९३, के० पी० कक्कड़ रोड, इलाहाबाद द्वारा प्रकाशित तथा स्टार प्रिण्टर्स, २८७, दरियाबाद, इलाहाबाद द्वारा मुद्रित ।

वक्तव्य

सूरदास हिन्दी साहित्य के सूर्य माने जाते हैं, किन्तु इस महाकवि की प्रसिद्ध कृति ‘सूरसागर’ का पठन-पाठन रसास्वादन उतना नही हो पा रहा है जितना होना चाहिए । इसके अनेक कारण हैं । एक तो यह ग्रन्थ बहुत बड़ा है । दूसरे इसमें अनेक स्तरों की सामग्री मिश्रित रूप में पाई जाती है । तीसरे इसका कोई अच्छा संस्करण कुछ वर्ष पूर्व तक उपलब्ध नही था । अब सभा का सुन्दर संस्करण दो खंडो मे प्राप्य है, किन्तु उसका मूल्य १२५) है, जो साधारण पाठक अथवा विद्यार्थी की पहुँच के बाहर है ।

उपर्युक्त कठिनाइयों के कारण ‘सूरसागर’ के अनेक संकलन प्रकाशित हुए थे, किन्तु ये प्रायः वेङ्कटेश्वर प्रेस के संस्करण के आधार पर तैयार किए गए थे, अतः वे बहुत संतोषजनक नही थे । इसके अतिरिक्त इन संकलनों मे पदचयन पर जितना ध्यान दिया जाना चाहिए था उतना नही दिया गया था । ‘सूरसुषमा’ मे ये दोष नही है, किन्तु यह केवल सवा-सौ पदों का संग्रह है जो ‘सूरसागर’ का ठीक परिचय कराने के लिए अपर्याप्त है । अतः ‘सूरसागर’ के एक अच्छे प्रतिनिधि संग्रह की आवश्यकता बनी ही रही । ‘सूरसागर सार’ के द्वारा इस आवश्यकता की पूर्ति का यत्न किया गया है ।

प्रस्तुत संग्रह में ‘सूरसागर’ के लगभग ५००० पदो में से ८३१ अत्यन्त उत्कृष्ट पदों का चयन है । संग्रह का आधार सभा का संस्करण है । विनय तथा भक्ति के पदों के उपरान्त कृष्णचरित सम्बन्धी पदो को निम्नलिखित छह शीर्षको में विभक्त किया गया है :—१. गोकुल लीला, २. वृन्दावन लीला, ३. राधा-कृष्ण, ४. मथुरा गमन, ५. उद्धव-संदेश और ६. द्वारिका चरित । एक प्रकार से कृष्ण-जन्म से लेकर राधा- कृष्ण के अन्तिम मिलन तक का सम्पूर्ण कृष्णचरित क्रमबद्ध रूप में इस चयन मे मिल सकेगा । प्रत्येक शीर्षक के अन्तर्गत अनेक उप-शीर्षको मे पद-समूह विभाजित किया गया है । ये उप-शीर्षक भी कथाक्रम के अनुसार है । परिशिष्ट (क) में रामचरित सम्बन्धी कुछ पद भी दे दिए गए हैं ।

इस संकलन के सम्बन्ध मे यह दावा तो नही किया जा सकता कि इसमें सूरसागर के समस्त उत्कृष्ट पद आ गए हैं, किन्तु इतना निश्चित है कि जो पद इसमें है वे अत्यन्त सुन्दर पदो मे से है । केवल कुछ साधारण पद कही-कही कथा की श्रृंखला जोड़ने के लिए रखने पड़े हैं । जो हो, प्रस्तुत चयन मे संग्रहकर्त्ता के ३५ वर्षों के ‘सूरसागर’ के पठन-पाठन और मनन का अनुभव सन्निहित है, तो भी रुचि-विभिन्नता के लिए बराबर स्थान रहेगा । ‘सूरसागर’ के लोकप्रिय न हो सकने का कारण यह

[ ६ ] भी रहा कि इसे भागवत् का रूपान्तर माना जाता रहा और इस रूप में यह ग्रन्थ अत्यन्त शिथिल और असम्बद्ध दिखाई पड़ता है । 'सूरसागर' का कृष्ण-लीला सम्बन्धी रूप, जो वास्तविक 'सूरसागर' है, द्वादशस्कंधी रूपरेखा में छिप जाता है । यही कारण है कि प्रस्तुत संग्रह मे कृष्ण-चरित को ही प्रमुख स्थान दिया गया है । 'सूरसागर' की यह परम्परा अत्यन्त प्राचीन है इतना निश्चित है । महाकवि सूरदास की जीवनी तथा कृति की आलोचना से सम्बद्ध प्रचुर साहित्य उपलब्ध है, किन्तु सूर की काव्यकला का सच्चा मूल्यांकन अभी नही हुआ है । इसमे सन्देह नही कि ऐसे सहज कलात्मक रूप में इतनी, रसानुभूति कही भी अन्यत्र नही मिलती । सहृदय पाठकगण स्वयं रसास्वादन करके इस मत के तथ्य की परीक्षा कर सकते हैं । 'सूरसागर' वास्तव में 'रससागर' है । आशा है कि प्रस्तुत चयन के द्वारा सूरदास की कृति का अधिक परिचय हिन्दी के पाठक तथा विद्यार्थी दोनो ही को सुलभ हो सकेगा । इसके फलस्वरूप वे जो आनन्द प्राप्त करेगे उसी में मै अपने परिश्रम की सफलता समझूंगा । मूल 'सूरसागर सार' के द्वितीय संस्करण के प्रारम्भ में 'महाकवि' सूरदास तथा उनकी रचनाएँ शीर्षक संक्षिप्त कवि-परिचय बढाया गया था तथा अन्त में दो उपयोगी परिशिष्ट दिए गए थे । परिशिष्ट (ख) मे आई हुई प्रमुख अंतर्कथाएँ संक्षेप मे दी गई थी । अन्त मे संकलित पदो की एक पदानुक्रमणी बढ़ा दी गई थी । इन दोनों परिशिष्टो के तैयार करने का सम्पूर्ण श्रेय मेरे प्रिय सहयोगी डॉ० ब्रजेश्वर वर्मा को है । श्री नर्मदेश्वर चतुर्वेदी ने पदानुक्रमणी तैयार करने का कष्ट उठाया था, इसके लिए मैं उनका आभारी हूँ । प्रस्तुत विशेष संस्करण में समस्त पदो का अनुवाद दिया गया है । इस प्रकार का प्रयास लगभग पहली वार हुआ है । 'रामचरितमानस' के सैकडो सटीक संस्करण उपलब्ध हैं जिनके कारण उस ग्रंथ के समझने में पाठको को बहुत सहायता मिलती है । 'सूरसागर सटीक' न मिलने के कारण उसके अनेक स्थलो को विद्यार्थी, अध्यापक तथा सूर-प्रेमी समझ नही पाते है । इस पद संग्रह में इस प्रकार की कठिनाई पाठक को नही मिलेगी । इसका प्रारम्भिक अनुवाद मैंने हिन्दी विभाग के रिसर्चस्कालर श्री विद्याकान्त तिवारी को रखकर करवाया था । उन्होने पूर्ण परिश्रम के साथ इसे पूरा किया । इसके उपरान्त मैंने एक-एक अध्याय अपने पुराने शिष्य-सहयोगियो को दिए कि वे अनुवाद को मूल से मिलाकर ध्यान से देख ले । इसमे मुझे पं० उमाशंकर शुक्ल, श्रीगणेश प्रसाद, डॉ० रघुवंश, डॉ० रामस्वरूप चतुर्वेदी, डॉ० राजेन्द्र कुमार तथा डॉ० योगेन्द्र प्रताप सिंह का पूर्ण सहयोग प्राप्त हुआ । अन्त मे मैंने सम्पूर्ण अनुवाद स्वयं देखा और अपने दृष्टिकोण से यत्र-तत्र परिवर्तन किये । जो हो अनुवाद का अंतिम उत्तरदायित्व मुझ पर है । इतना परिश्रम करने पर भी अनेक स्थल अस्पष्ट

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रह गए हों आश्चर्य नहीं। कुछ स्थलों के अनुवाद के सम्बन्ध में मतभेद हो सकता है यह स्वाभाविक है। इन त्रुटियों के दूर करने के सम्बन्ध में सुझावों का मैं स्वागत -करूँगा। संग्रह के प्रकाशक साहित्य भवन (प्रा०) लिमिटेड को मैंने सलाह दी है कि मूल 'सूरसागर सार' का संस्करण भी छपवाये। यह सटीक संस्करण अतिरिक्त विशेष संस्करण के रूप में प्रकाशित करें । परिशिष्टों में परिशिष्ट (ग)—'शब्दार्थ' को सटीक संस्करण में अनावश्यक समझ कर छोड़ दिया गया है। शेष दो परिशिष्ट, अर्थात् परिशिष्ट (क)— रामचरित' तथा परिशिष्ट (ख)—'अंतर्कथाएँ' रहने दिए गए हैं। संग्रह के अन्त में मूल 'सूरसागर-सार' के समस्त पदों की अनुक्रमणी भी दी गई है। प्रयाग दीपावली, सं० २०२६ वि० । — धीरेन्द्र वर्मा

पंचम संस्करण स्वर्गीय डॉ० धीरेन्द्र वर्मा द्वारा सम्पादित सूरसागर सार (सटीक) का यह पंचम संस्करण मुद्रित हो रहा है। इसके तृतीय संस्करण में टीकागत् अशुद्धियों और मुद्रण-जन्य अनेक दोषों को पं० उमाशंकर शुक्ल के आदेश से डॉ० किशोरी लाल, श्री रामकिशोर ने दूर कर दिया था, किन्तु खेद है कि ग्रन्थ के चतुर्थ संस्करण के प्रकाशित होते-होते शुक्ल जी का निधन हो गया। अतः चतुर्थ संस्करण उनके दिवंगत हो जाने के उपरान्त प्रकाशित हुआ, फिर भी शुक्ल जी की शैली के अनुसार व सभी रह जाने वाली त्रुटियों को इस संस्करण मे यथाशक्य दूर करने की पूर्ण चेष्टा की गई है। अब आशा है कि सूरकाव्य के सभी पाठकों के लिए यह अपेक्षाकृत अधिक उपयोगी एवं लाभप्रद सिद्ध होगा। —प्रकाशक

महाकवि सूरदास और उनकी रचनाएँ महाकवि सूरदास (लगभग १४७८-१५८२ ई०) के पूर्वार्ध जीवन के विस्तार श्री हरिराय जी ने 'चौरासी वार्ता' की 'भाव प्रकाश' नाम की अपनी टीका में दिए हैं। इन्हें हम कवि की मृत्यु के लगभग सौ वर्ष बाद की अनुश्रुति कह सकते हैं। 'भाव प्रकाश' के अनुसार सूरदास का जन्म दिल्ली के निकट सोही नाम के गाँव में एक निर्धन सारस्वत ब्राह्मण परिवार में हुआ था। वे जन्म से ही सूर थे किन्तु सगुन बताने की अद्भुत शक्ति रखते थे। पद-रचना तथा संगीत की प्रतिभा भी इनमे लडकपन से ही थी। परिवार के लोगों से कुछ मतभेद हो जाने के कारण ये घर छोड़कर एक निकट के गाँव मे रहने चले गए थे। अट्ठारह वर्ष की वय मे इन्हें पूर्ण विरक्ति हो गई और ये मथुरा-आगरा के बीच गऊघाट पर आकर रहने लगे। 'भाव प्रकाश' में सूरदास जी के सम्बन्ध में अनेक चमत्कारपूर्ण घटनाओं का भी उल्लेख है। सूरदास की उत्तरार्ध जीवनी के विस्तार गोकुलनाथ के नाम से प्रसिद्ध 'चौरासी वैष्णवन की वार्ता' मे दिए हुए हैं। इसका संकलन भी कदाचित् श्री हरिराय जी ने किया था। सूरदास विरक्त स्वामी के रूप मे गऊघाट पर रहते थे और उनके अनेक सेवक बन गए थे। पद-रचना और संगीत सम्बन्धी उनकी ख्याति अब दूर-दूर तक फैल चुकी थी। किन्तु उनकी भगवत-भक्ति का दृष्टिकोण दास्य भाव का था। गऊघाट पर ही इनकी महाप्रभु वल्लभाचार्य से भेट हुई और उनकी वात्सल्य तथा सख्य भाव की भक्ति-भावना से वे इतने प्रभावित हुए कि पुष्टिमार्ग मे दीक्षित हो गये। इसके उपरांत सूरदास गऊघाट छोड़कर गोवर्द्धन आकर रहने लगे और गोवर्द्धन में प्रायः नाथ जी के मन्दिर मे और कभी-कभी गोकुल मे श्री नवनीत प्रियाजू के समक्ष पद बना कर कीर्तन करते थे। उनका शेष समस्त जीवन इसी प्रकार भगवान् की सेवा में कटा। सूरदास जी की मृत्यु बड़ी आयु मे श्रीकृष्ण की रासभूमि परासोली में महाप्रभु वल्लभाचार्य के पुत्र तथा उत्तराधिकारी श्री विट्ठलनाथ जी के समक्ष हुई थी। इसका आंखो देखा सा वर्णन 'चौरासी वार्ता' मे सुरक्षित है। 'साहित्यलहरी' के प्रसिद्ध पद के आधार पर कुछ आलोचक सूरदास को ब्रह्म भट्ट और महाकवि चन्द्र का वंशज मानते थे। ये सात भाई थे, नेत्रहीन थे और भगवान् ने इनकी एक बार रक्षा की थी, तब से ये भगवद्भजन मे ही अपना सारा समय लगाने लगे थे। गुसांई विट्ठलनाथ ने इनको वल्लभ-सम्प्रदाय के आठ सर्वश्रेष्ठ कवियों मे स्थान दिया था। सूरसागर के पदो में कवि ने अपने अथवा अपने वंश के सम्बन्ध मे कोई भी महत्वपूर्ण बात नही कही है। इस प्रकार के साधारण उल्लेख अवश्य अनेक स्थलो पर आए हैं कि वे नेत्रहीन थे, अत्यन्त दीन-हीन थे, और भगवान्

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को ही अपना एक मात्र सहारा मानते थे। वास्तविकता यह है कि महाकवि की प्रारम्भिक जीवनी के प्रामाणिक विस्तार उपलब्ध नही है। उत्तरार्ध जीवनी से सम्वद्ध चौरासी वार्ता के उल्लेखों को प्रामाणिक माना जा सकता है। किन्तु ये जीवनी सम्बन्धी कोई विस्तार नही देते थे। महाकवि सूरदास की रचनाओ मे सबसे प्रमुख और प्रसिद्ध रचना 'सूरसागर' है। अन्य समस्त रचनाएँ अत्यन्त गौण हैं। 'सूरसारावली' ११०७ पदों का खंडकाव्य सा है, जिसमें भागवत् की कथा को ही संक्षिप्त वर्णनात्मक रूप मे दिया गया है। इसमे कोई काव्य सम्बन्धी सौन्दर्य भी नही है। 'साहित्य लहरी' ११८ कूट पदों का संग्रह है, जिसमे किसी अलंकार, नायिका या भाव का उल्लेख करके कूट शैली मे उनके उदाहरण दिये गये है। अधिकांश आलोचक इन दोनों ग्रंथों को सूरकृत मानते हैं, यद्यपि कुछ विद्वान् इस सम्वन्ध मे संदिग्ध भी हैं। नागरी प्रचारिणी सभा की खोज रिपोर्ट मे सूरदास के नाम से लगभग १०, १२ अन्य ग्रन्थों के नाम मिलते हैं, जैसे व्याहलो, पदसंग्रह, दशमस्कंध, टीका, नागलीला, भागवत, सूर-पचीसी, गोवर्द्धनलीला, सूरसागर सार, रामजन्म, एकादशी माहात्म्य आदि; जिनमें कुछ प्रकाशित भी हो चुके हैं। इन ग्रंथों मे कुछ तो कदाचित् महाकवि सूरदास की रचनाएँ नही हैं और सूरसागर मे ही विशेष कथाओ अथवा लीलाओ से सम्वद्ध पदो के संग्रह मात्र हैं। इस प्रकार महाकवि की एकमात्र प्रामाणिक और महत्वपूर्ण रचना सूरसागर ही रह जाती है। सूरदास की हस्तलिखित पोथियों की दो परम्पराएँ मिलती है। एक मे श्रीकृष्ण के केवल ब्रजचरित सम्बन्धी पदों का लीला-क्रम के अनुसार संकलन है। सूरसागर की यह परम्परा कदाचित् अधिक प्राचीन है। नवल किशोर प्रेस का सूरसागर इसी परम्परा की पोथियो के आधार पर प्रकाशित किया गया था। सूरसागर की दूसरी परम्परा मे पदो तथा खंडकाव्यो के रूप प्राप्त महाकवि की लगभग समस्त रचनाओं को एकत्रित तथा श्रीमद्भागवत के द्वादशस्कंधी क्रम के अनुसार क्रमबद्ध किया गया था। यह परम्परा वेंकटेश्वर प्रेस तथा नागरी प्रचारिणी सभा के संस्करणों से मिलती है। सूरसागर की इस परम्परा मे भी श्रीकृष्ण के ब्रजलीला सम्बन्धी पद ही प्रधान हैं। भागवत् के अन्य स्कंधो से सम्बन्धित सामग्री अत्यन्त संक्षिप्त है तथा काव्य-स्तर की दृष्टि से भी महत्वपूर्ण है द्वादशस्कंधी सूरसागर की निम्नलिखित विषय-सूची से यह स्थिति स्पष्ट हो जायेगी :- स्कंध विषय पद संख्या १. व्यास अवतार (१), विनयपद (२२३) ३४३ २. चौबीस अवतारो की सूची ३८ ३. सनकादि, (२) वाराह, (३) तथा कपिलदेव, (४) अवतार १३

[ ११ ] ४ दत्तात्रेय, (५) यज्ञपुरुष, (६) हरि अथवा ध्रुववरदेन, (७) तथा पृथु (८) अवतार १३ ५ ऋषभदेव (६) ४ ६. अजामिल उद्धार अवतार (१०) ८ ७. नृसिंह (११), नारद (१२) ५ ८. गजमोचन (१३), कूर्म (१४), धन्वन्तरि (१५) वामन (१६), तथा मत्स्य (१७), अवतार १७ ६. राम (१८), परशुराम (१६) १७४ १०. कृष्ण अवतार (२०) ४१६० पूर्वार्ध : ब्रजचरित उत्तरार्ध : द्वारिका चरित - १४६ ११. नारायण (२१), हंस (२२) ४ १२. बुद्ध (२३), कल्कि (२४) ५ ४८३६ ऊपर चौबीस अवतारों की सूची में दस मुख्य अवतार मोटे टाइप में दिये गए हैं। इस प्रकार सूरसागर की इस परम्परा के लगभग ५००० पदों मे ४००० से अधिक पद श्रीकृष्ण की ब्रजलीलाओं से सम्बद्ध हैं, तथा शेष १००० पदों में श्रीकृष्ण का द्वारिका चरित, विनय पद, राम अवतार सम्बन्धी पद तथा २२ अवतारो का अत्यन्त संक्षिप्त वर्णन है। यहाँ इस बात का उल्लेख कर देना भी अनुचित न होगा कि सूरदास ने लगभग सवा लाख पद लिखे थे, इस किंवदंती का कोई भी प्रामाणिक आधार नही है। कवि की पद-रचना पांच छह हज़ार पदो के बीच ही रही होगी, जो लगभग प्राप्त है। वास्तव मे यह संख्या भी कम नही है। जैसा ऊपर की सूची से स्पष्ट है, द्वादशस्कंधी परम्परा के सूरसागर में दशम स्कंध के पदसमूह के बाद अधिक संख्या मे प्रथम स्कंध के विनयपद तथा नवम-स्कंध के राम-अवतार सम्बन्धी पद पाए जाते है। विनयपदों मे दास्य भक्ति तथा दैन्य भावना प्रधान है। बहुत संभव है कि इस पद समूह में कवि की कुछ प्रारम्भिक रचनाएँ हो, जब वे गऊघाट पर रहते थे और महाप्रभु वल्लभाचार्य के सम्पर्क में नही आए थे, तथा कुछ की प्रौढ शैली को देखकर ऐसा मालूम होता है कि वे कवि की वृद्धावस्था की रचनाएँ होनी चाहिए। रामावतार का विस्तृत वर्णन होना स्वाभाविक है क्योंकि कृष्णावतार के अतिरिक्त भगवान् के अवतारों में यह मुख्य है। सूरदास ने द्वारिकावासी श्रीकृष्ण का चरित भी बहुत संक्षेप मे ही दिया है। आकार तथा स्तर दोनों ही दृष्टि-कोणो से यह स्पष्ट है कि श्रीकृष्ण की ब्रजलीलाओ के गान में ही कवि की वास्तविक अभिरुचि थी। इसमें संदेह नही कि सूरसागर मे वर्णित श्रीकृष्ण की लीलाओं का मूलाधार

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श्रीमद्भागवत दशम स्कंध पूर्वार्ध है, किन्तु इस आधार के कारण सूरसागर को श्रीमद्- भागवत का उल्था अथवा स्वतन्त्र अनुवाद मानना भारी भूल होगी। महाकवि ने अपनी असाधारण प्रतिभा के द्वारा परिचित लीलाओं के वर्णनों में अनेक मौलिक कल्पनाओं का समावेश किया है, इसके अतिरिक्त अनेक नई लीलाओं तथा चरित्रों को भी बढ़ाया है जो भागवत में नहीं मिलते। उदाहरण के लिए श्रीमद्भागवत में राधा के नाम तक का उल्लेख नहीं है, जब कि सूरसागर में राधा-कृष्ण प्रेम का प्रारम्भ, विकास तथा परिणति का बहुत ही सजीव, आकर्षक और महत्त्वपूर्ण चित्रण है। इसी प्रकार 'भ्रमर गीत' अथवा 'उद्धव गोपी' संवाद वाले अंश में श्रीमद्भागवत में उद्धव श्रीकृष्ण का संदेश गोपियों को सुनाते हैं और वे उसे शिरोधार्य कर लेती हैं। सूरसागर का भ्रमर- गीत सगुण-निर्गुण वादों और कर्म, ज्ञान तथा भक्ति मार्गों के सिद्धांतों के शास्त्रार्थ के साथ-साथ प्रौढ ध्वनि काव्य का एक अत्यन्त उत्कृष्ट उदाहरण है। रस की दृष्टि से सूरसागर में प्रधान रूप में केवल शृङ्गार रस के संयोग और वियोग पक्षों का चित्रण है, किन्तु इस रस की जिस बारीकी और गहराई में कवि की पैठ है वह उसकी असाधारण प्रतिभा का परिचायक है। मुख्य रस के चित्रण के साथ-साथ अनुभावों तथा व्यभिचारी अथवा संचारी भावों के भी सैकड़ो सजीव उदाहरण सूरसागर में बिखरे पड़े हैं। सब मिलाकर कवि की रचना का क्षेत्र प्रत्येक दृष्टि से सीमित कहा जा सकता है — श्रीकृष्ण की व्रज-लीला, शृङ्गार रस तथा पदशैली, किन्तु इस सीमित क्षेत्र में महाकवि के समकक्ष क्या निकट भी तो कोई अन्य कवि नहीं पहुँच सका है। सूरसागर की भाषा व्रजभाषा है, यद्यपि एक संग्रह ग्रंथ होने के कारण उसमें इस भाषा के अनेक स्तर मिलते हैं। किन्तु सूरसागर के मुख्य भाग की भाषा-शैली अत्यन्त प्रौढ तथा साहित्यिक है। सूरदास जी के लगभग एक शताब्दी पहले से व्रज- भाषा में साहित्य रचना होने लगी थी, किन्तु व्रजभाषा को साहित्यिक भाषा के उच्च सिंहासन पर आसीन करने का श्रेय इस महाकवि को ही प्राप्त है। वल्लभ-सम्प्रदाय में सूरसागर एक महत्त्वपूर्ण धार्मिक ग्रंथ माना जाता है। किन्तु कवि की रचना में संकुचित साम्प्रदायिकता का पूर्ण अभाव है। वल्लभ-सम्प्रदाय के शुद्धाद्वैतवाद दर्शन के विस्तार भी 'सूरसागर' में नहीं मिलते। धर्म अथवा दर्शन के कुछ मूल सिद्धान्तों को कवि ने अवश्य माना है, जैसे श्रीकृष्ण को साक्षात् परब्रह्म अथवा उनका अवतार मानना, राधा को परब्रह्म की शक्ति के रूप में समझना, गोपियों को आत्मा का प्रतीक मानना, श्रीकृष्ण अथवा परब्रह्म की प्राप्ति के उपायों में प्रेमभक्ति के मार्ग को सर्वश्रेष्ठ समझना इत्यादि। किन्तु इन मूल सिद्धान्तों की अभिव्यक्ति कवि ने उत्कृष्टतम काव्य के रूप में की है। यही कारण है कि भावुक कृष्णभक्तों तथा सहृदय काव्य-रसिकों, दोनों ही की पूर्ण तुष्टि करने में महाकवि की यह असाधारण कृति समान रूप से पूर्णतया सफल हुई है।

विषय-सूची विनय तथा भक्ति १७ मंगलाचरण १७, सगुणोपासना १७, भक्त-वत्सलता १८, अविद्या माया २२, गुरु महिमा २३, नाम महिमा २४, विनती २५, भगवदाश्रय २६, भावी ३१, वैराग्य ३३, मन प्रबोध ३६, चित्तबुद्धि-संवाद ४१, हरिविमुख- निन्दा ४२, सत्संग महिमा ४३, स्थितप्रज्ञ ४३, आत्मज्ञान ४४। गोकुल-लीला ४७ कृष्ण जन्म ४७, शैशवचरित ५०, वालगोपाल ५५, माखन-चोरी ६५। वृन्दावन-लीला ८० वृन्दावन प्रस्थान ८०, गोदोहन ८०, गो-चारण ८०, काली दमन ८७, मुरली ९४, कमरी १००, चीर-हरन १०१, गोवर्द्धन धारण १०४, रासलीला ११०, पनघट लीला १२०, दमन लीला १२३, गोपिका अनु- राग १३३, रूप वर्णन १३६, नेत्र अनुराग १४१। राधा-कृष्ण १४६ प्रथम मिलन १४६, गाढ़ी कृष्ण १५०, सम्बन्ध रहस्य १५३, राधा सखी संवाद १५६, माता की सीख १६०, कृष्ण दर्शन १६१, राधा का अनुराग १६४, उपहास १७१, सहसा भेट १७२, व्याज मिलन १७६, भ्रम १८१, एकनिष्ठा १८२, लघुमान लीला १८४, कृष्ण-गोपिका १८६, मानलीला १९३, खंडिता प्रकरण १९६, मध्यम मान १९८, बड़ी मान- लीला २०३, वसंतोत्सव २०७। मथुरा गमन २११ अक्रूर ब्रज आगमन २११, मथुरा प्रयाण २१४, मथुरा प्रवेश तथा कंस वध २१६, नन्द का ब्रज प्रत्यागमन २२५, गोपी-वचन तथा ब्रजदशा २३०, गोपी विरह २३६। उद्धव संदेश २६० उद्धव को ब्रज भेजना २६०, तीन पाती तथा संदेश २६५, उद्धव ब्रज आगमन २६६, उद्धव का गोपियों को पाती देना २७४, भ्रमरगीत २७८,

[ १४ ] उद्धव-गोपी संवाद २७६, उद्धव हृदय-परिवर्तन तथा गोपी संदेश ३१६, पूर्ण परिवर्तन तथा यशोदा संदेश ३२५, उद्धव मथुरा प्रत्यागमन तथा कृष्ण-उद्धव संवाद ३२७, श्रीकृष्ण वचन ३३६। द्वारिका चरित ३३८ द्वारिका प्रयाण ३३८, रुक्मिणी परिणय ३३८, बलभद्र ब्रज यात्रा ३४२, सुदामा चरित ३४४, ब्रजनारी पथिक संवाद ३४६, रुक्मिणी-कृष्ण संवाद ३५४, कुरुक्षेत्र मे कृष्ण-ब्रजवासी भेट ३५५, राधाकृष्ण मिलन ३५६ । परिशिष्ट - (क) राम चरित ३६४ (ख) अंतर्कथाएँ ३७४ पदानुक्रमणी ३८५

सूरसागर सार सटीक

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विनय तथा भक्ति मंगलाचरण चरन-कमल बंदौं हरि-राइ। जाकी कृपा पंगु गिरि लंघै, अँधे कौं सब कछु दरसाइ । बहिरौ सुनै, गूँग पुनि बोलै, रंक चलै सिर छत्र धराइ । सूरदास स्वामी करुनामय, बार-बार बंदौं तिहिं पाइ ॥१॥ अर्थ—मैं भगवान् के कमलवत् चरणों की वन्दना करता हूँ, जिनकी कृपा से लंगड़ा पर्वत लांघ जाता है [तथा] अन्धे को सब कुछ दिखाई पड़ने लगता है, बहरा सुनने लगता है, गूंगा बोलने लगता है तथा अत्यन्त निर्धन भी छत्रधर (सम्राट्) बन जाता है। सूरदास कहते है कि ऐसे कृपालु स्वामी के उन चरणों की मैं बार-बार वन्दना करता हूँ ॥१॥ सगुणोपासना अबिगत-गति कछु कहत न आवै । ज्यौँ गूँगैं मीठे फल कौ रस अंतरगत हीँ भावै । परम स्वाद सबही सु निरंतर अमित तोष उपजावै । मन-बानी कौं अगम-अगोचर, सो जाने जो पावै । रूप-रेख-गुन-जाति जुगति-बिनु निरालंब कित धावै । सब विधि अगम बिचारहिं तातैं सूर सगुन-पद गावै ॥२॥ अर्थ—[भगवान् के] अव्यक्त (निर्गुणस्वरूप) की कुछ रीति कही नही जा सकती । जैसे गूंगे को मीठे फल का स्वाद मन-ही-मन अच्छा लगता है, वैसे ही निर्गुण ब्रह्म की प्राप्ति का आनन्द भी अत्यन्त उच्चकोटि का है तथा निरन्तर असीम सन्तोष प्रदान करने वाला है। [निर्गुण ब्रह्म] मन वाणी के द्वारा दुर्बोध एव अग्राह्य है तथा इन्द्रियातीत है, जो उसे प्राप्त कर लेता है वही उसे जान पाता है (उससे उत्पन्न आनन्द तथा ज्ञान की अनुभूति मनुष्य अभिव्यक्त नही कर सकता ।) [निर्गुण ब्रह्म] रूप, आकार, गुण, जाति तथा तर्क से रहित (अव्यपदेश्य) है। इस प्रकार निरवलम्ब होकर [मन निर्गुण ब्रह्म के ध्यान मे] कहाँ दौड़े ? अतः (निर्गुण ब्रह्म को) विचार की दृष्टि से सब प्रकार से पहुँच के बाहर (अगम) जानकर सूर अपने पदो मे (ब्रह्म के) सगुण रूप का गायन कर रहा है ॥२॥ २

१५ सूरसागर सार सटीक भक्तवत्सलता बासुदेव की बड़ी बड़ाई । जगत पिता, जगदीस, जगत-गुरु, निज भक्तनि की सहत ढिठाई । भृगु कौ चरन राखि उर ऊपर, बोले बचन सकल-सुखदाई । सिव-विरंचि मारन कौँ धाए, यह गति काहू देव न पाई । बिनु-बदलैँ उपकार करत हैं, स्वारथ बिना करत मित्राई । रावन अरि कौ अनुज विभीषन, ताकौँ मिले भरत की नाई । बकी कपट करि मारन आई, सो हरि जू बैकुंठ पठाई । बिनु दीन्हेँ ही देत सूर प्रभु, ऐसे हैंँ जदुनाथ गुसाईं ॥३॥ अर्थ—वासुदेव (श्रीकृष्ण) की महत्ता अवर्णनीय है । वे सम्पूर्ण संसार के पिता, स्वामी तथा गुरु हैं और अपने भक्तो की धृष्टता सहन कर लेते हैं । भृगु के चरणों [के आघात] को अपने हृदय पर सहन कर उन्होने सबको आनन्दित करने वाले वचनों का प्रयोग किया । [इस प्रकार की सहनशीलता के अभाव मे] शिव और ब्रह्मा [अपना अपमान करने वाले भृगु को] मारने दौडे । इस प्रकार की गति कोई भी देवता नही प्राप्त कर सका । [जैसी विष्णु भगवान् ने दिखलाई] प्रतिफल की इच्छा के बिना वे उपकार करते है । [तथा] स्वार्थ रहित सोहार्द्र का भाव रखते है । [उनकी इस उदारता का एक अन्य प्रमाण यह है कि] शत्रु रावण के छोटे भाई विभीषण से वे भरत की भाँति [अर्थात् भाई के समान निश्छल रूप से] मिले । बकी कपट [रूप धारण] करके भगवान् को मारने आयी थी, उसे उन्होने [कृपा करके] स्वर्ग भेज दिया । सूर के प्रभु भक्तो से बिना कुछ प्राप्त किये ही [बहुत कुछ] दे डालते है । यदुवंशियों मे श्रेष्ठ (श्री- कृष्ण) इस प्रकार के [उदार तथा महान्] स्वामी हैं ॥३॥ प्रभु कौ देखौ एक सुभाइ । अति-गंभीर-उदार-उदधि हरि, जान-सिरोमनि राइ । तिनका सौँ अपने जनकौ गुन मानत मेरु-समान । सकुचि गनत अपराध-समुद्रहिँ बूंद-तुल्य भगवान । बदन-प्रसन्न कमल सनमुख ह्वैँ देखत हौँ हरि जैसेँ । विमुख भए अकृपा न निमिषहूँ, फिरि चितयौँ तो तैसेँ । भक्त-विरह कातर करुनामय, डोलत पाछैँ लागे । सूरदास ऐसे स्वामी कौँ देहिँ पीठि सो अभागे ॥४॥ अर्थ—प्रभु (भगवान् श्रीकृष्ण) का एक स्वभाव [विशेष रूप मे] दिखाई पडता है । भगवान् सागर की भाँति गंभीर तथा उदार है । ज्ञानियों मे सर्वश्रेष्ठो के राजा है । अपने भक्त के तृणवत् (अल्प) गुणो को वे सुमेरु पर्वत के समान (महान्) हैं तथा समुद्र तुल्य [बडे-बडे] अपराधो को बूंद के समान छोटा मानते है । [भक्त के] भगवान्

के समक्ष (शरण में) जाने पर जिस प्रकार वे कमल की भाँति प्रसन्नमुख दिखाई पड़ते है, (भक्त के) विमुख हो जाने पर भी वे [वैसे ही प्रसन्नमुख तथा कृपालु रहते हैं और] उसके ऊपर एक क्षण के लिये भी क्रोध नही करते । भक्त जब फिर उनकी ओर झुकता है तो वे पूर्ववत् ही [कृपालु] हो जाते हैं। भक्त के विरह में व्याकुल भगवान् उसके पीछे लगे घूमते रहते हैं। सूरदास कहते हैं कि ऐसे कृपालु स्वामी से मुख मोड़ने वाले बड़े ही अभागे हैं ॥४॥ राम भक्तवत्सल निज बानौँ । जाति, गोत, कुल नाम, गनत नहिँ, रंक होइ कै रानौँ । सिब-ब्रह्मादिक कौन जाति प्रभु, हौं अजान नहिँ जानौँ । हमता जहाँ तहाँ प्रभु नाहीँ, सो हमता क्योँ मानौँ ? प्रगट खंभ तैँ दए दिखाई, जद्यपि कुल कौ दानौ । रघुकुल राघव कृष्ण सदा ही, गोकुल कीन्हौँ थानौ । बरनि न जाइ भक्त की महिमा, बारंबार बखानौँ । ध्रुव राजपूत, बिदुर दासी-सुत कौन कौन अरगानौ । जुग जुग बिरद यहै चलि आयौ, भक्तनि हाथ बिकानौ । राजसूय मैँ चरन पखारे स्याम लिए कर पानीँ । रसना एक, अनेक स्याम-गुन, कहँ लगि करौँ बखानौ । सूरदास-प्रभु की महिमा अति, साखी बेद पुरानौ ॥५॥ अर्थ—भक्तवत्सलता ही भगवान् का निजी स्वरूप, बिरद (बाना) है। [भक्त के प्रति वात्सल्य भाव रखने मे] वे जाति, गोत्र, कुल तथा नाम (आदि) की गणना (भेद) नही करते, न इस बात का कि वह रंक है या राजा । हे प्रभु, शिव ब्रह्मा आदि की कौन जाति है - मैं अज्ञानी कुछ नहीं जानता । अहंकार की भावना जहाँ होती है वहाँ प्रभु [का सान्निध्य] प्राप्त नही हो सकता, तो ऐसे अहंकार की भावना को हम प्रश्रय क्यो दे ? यद्यपि [प्रह्लाद] दैत्यवंश मे उत्पन्न हुआ था [तथापि उसकी रक्षा के लिये] स्तम्भ से प्रकट हुये । [भगवान्] [रघुवंश मे रामचन्द्रजी के रूप मे प्रकट हुए तथा] श्रीकृष्ण के रूप मे गोकुल को [उन्होने] अपना स्थान बनाया । भक्त की महिमा का [आसानी से] वर्णन नही हो सकता [इस कारण मैं] बार-बार उनका बखान कर रहा हूँ। ध्रुव राजपुत्र थे किन्तु विदुर दासी पुत्र थे तथा और भी किसका किसका भेद करूँ (तफ़सील दूँ) [जिनके उद्धार मे भगवान् ने भेद-भाव नही रखा] युगो से भगवान् का यह गुण या सुयश (बिरद) प्रसिद्ध है कि वे भक्तो के हाथ बिक चुके है । [महाराज युधिष्ठिर के] राजसूय में भगवान् श्रीकृष्ण ने अपने हाथ मे जल लेकर [अपनी महत्ता का विचार न करके राजाओ के] चरण धोये । जिह्वा एक है किन्तु श्याम के गुण अनेक हैं उनका बखान कहाँ तक करूँ ? सूरदास के प्रभु की महिमा असीम है, वेद तथा पुराण इसके साक्षी (समर्थक) है ॥५॥