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सूर्यसिद्धान्त (प्राचीन भारतीय खगोल गणित - सानुवाद सटीक)

Surya Siddhanta with Hindi Mathematical Commentary

भगवान् सूर्य / मय दानव / प्रो. रामचन्द्र पाण्डेय द्वारा

DevanagariHindipublished838 पृष्ठ

२. त्रिप्रश्नाधिकार (दिशा, देश व काल साधन)

१५८ सूर्य सिद्धान्त
यही समीकरण (३), ४८वें श्लोक के उत्तरार्द्ध और ४६वें श्लोक के पूर्वार्द्ध
का रूप है, जिसमें 'गत और गम्य पिंडों की ज्याओं के अन्तर' की जगह संक्षेप में
'दोर्ज्यान्तर' कहा गया है ।
समीकरण (३) को समीकरण (१) में उत्थापन करने से
दैनिक स्पष्ट गति = मध्यम दैनिक गति $\pm \frac{मन्द परिधि}{३६०}$
$\times \frac{गत तथा गम्य ज्या पिण्डों का अन्तर \times मध्यम दैनिक गति}{२२५}$ (४)
कर्कादि केन्द्र में धन और मकरादि में ऋण करने का कारण यह है कि जब मंद
केन्द्र ३ राशि से अधिक और ६ राशि से कम होता है तब स्पष्ट दैनिक गति मध्यम
दैनिक गति से अधिक अन्यथा कम होती है। (देखो चित्र २६ और ३०) । मध्यम
ग्रह जितने समय में मि से मु अथवा मु से मे तक पहुँचता है उतने समय में स्पष्ट
ग्रह सि से सु अथवा सु से 'से' तक पहुँचता है अर्थात् समान काल में स्पष्ट ग्रह
मध्यम ग्रह से अधिक जाता है; इसलिए स्पष्ट ग्रह की दैनिक गति भी मध्यम ग्रह की
दैनिक गति से अधिक होगी। इत्यादि ।
मन्दस्फुटीकृतां भुक्तिं प्रोज्झ्य शीघ्रोच्चभुक्तितः ।
तच्छेषं विवरेणाऽथ हन्यात्त्रिज्यान्त्यकर्णयोः ॥५०॥
चलकर्णहृतं भुक्तौ कर्णे विज्याऽधिके धनम् ।
ऋणमूनेऽधिकात्प्रोज्भ्यं भुक्तिं वक्रगतिर्भवेत् ॥५१॥
अनुवाद-(५०-५१) मन्द स्पष्ट दैनिक गति को शीघ्रोच्च की दैनिक गति से
घटाकर शेष को त्रिज्या और शीघ्र कर्ण के अन्तर से गुणा कर दो, गुणनफल को शीघ्र
कर्ण से भाग दे दो, लब्धि को मन्द स्पष्ट गति में जोड़ दो यदि त्रिज्या से कर्ण अधिक
हो और यदि कम हो तो घटा दो । यदि लब्धि ऋणात्मक हो और मन्द स्पष्ट
गति से अधिक हो तो शेष भी ऋणात्मक होगा। यह दैनिक वक्रगति होगी ।
विज्ञान भाष्य-इस नियम को बीजगणित के अनुसार यों लिख
सकते हैं :-
स्पष्ट दैनिक गति = मन्द स्पष्ट गति
$\pm \frac{(शीघ्रोच्च - मन्द स्पष्ट गति) (शीघ्र कर्ण\backsimत्रिज्या)^{*}}{शीघ्र कर्ण}$ (५)
*यह चिह्न $\backsim$ अन्तर प्रकट करने का चिह्न है। जिन दो संख्याओं के बीच
में यह चिह्न हो उनमें से जो बड़ी हो उसमें से छोटी संख्या को घटाना चाहिये ।

स्पष्टाधिकार १५६
' उदाहरण—सूर्य और गुरु की स्पष्ट दैनिक गति (१६७६ वि० की वसंत
पंचमी की अर्द्धरात्रि को) निकालना ।
सूर्य की मध्यम दैनिक गति ५६' ८" है । इसलिए समीकरण (४) के अनुसार
[देखो उदा० १] सूर्य की स्पष्ट दैनिक गति
= ५६' ८" ± (८३३ / २१६००) × (२१० / २२५) × ५६' ८"
(यहाँ मन्द केन्द्र दूसरे पद में है इसलिए धन चिह्न लेने से)
= ५६' ८" + (८३३ / २१६००) × (२१० / २२५) × ५६' ८"
= ५६' ८" + २' ७".७
= ६१' १६" स्वल्पान्तर से
गुरु की मध्यम दैनिक गति
= ४' ५६"
गुरु की मन्द स्पष्ट गति
= ४' ५६" ± (१६४८ / २१६००) × (१६१ / २२५) × ४' ५६"
यहाँ मंद केन्द्र चौथे पद में है इसलिए ऋण चिह्न लेना चाहिए ।
∴ गुरु की मंद स्पष्ट गति
= ४' ५६" - (१६४८ / २१६००) × (१६१ / २२५) × ५'
= ४' ५६" - २५"
= ४' ३४"
गुरु के शीघ्रोच्च की गति = सूर्य की मध्यम गति = ५६' ८" । शीघ्र कर्ण = ३६०८
इसलिए इन सब मानों को समीकरण (५) में उत्थापन करने से और
धनात्मक चिह्न लेने से क्योंकि शीघ्रकर्ण त्रिज्या से अधिक है,
गुरु की स्पष्ट गति
= ४' ३४" + ((५६' ८" - ४' ३४") (३६०८ - ३४३८)) / ३६०८
= ४' ३४" + (५४' ३४" × १७०) / ३६०८
= ४' ३४" + २' ३४"
= ७' ८"

१६० सूर्य-सिद्धान्त
दूरस्थिताच्च शीघ्रोच्चाद् ग्रहश्शिथिलरश्मिभिः ।
सव्येतराकृष्टतनुर्भवेद्वक्रगतिस्तदा ।।५२।।
कृतर्तुचन्द्रैर्वेद्रेन्द्रैः शून्यद्व्येकैर्गुणाष्टिभिः ।
शररुद्रैश्चतुर्थांश केन्द्रांशैर्भू सुतादयः ।।५३।।
भवन्ति वक्रिणस्तैस्तैः स्वैस्वैश्चक्राद्विशोधितैः ।
अवशिष्टांशतुल्यैः स्वैः केन्द्रै रुज्झन्ति वक्रताम् ।।५४।।
महत्त्वाच्छीघ्रपरिधेः सप्तमे भृगुभूसुतौ ।
अष्टमे जीवशशिजौ नवमे तु शनैश्चरः ।।५५।।
अनुवाद—(५२) जब ग्रह अपने शीघ्रोच्च से दूर (तीन राशि से अधिक
अंतर पर) हो जाता है तब शीघ्रोच्च जिन रस्सियों से उसको खींचता है वह ढीली
पड़ जाती हैं । इस कारण ग्रह विलोम दिशा में खिंच जाता है और गति वक्र हो
जाती है अर्थात् उलट जाती है । (५३) जब मङ्गल, बुध, गुरु, शुक्र और शनि के
अंतिम शीघ्रकेन्द्र (जिससे दूसरा शीघ्रफल निकाला जाता है) क्रम से १६४, १४४,
१३०, १६३, और ११५ अंश होते हैं (५४) तब इनकी वक्रगति का आरम्भ होता है
और जब शीघ्र केन्द्र क्रम से वह होते हैं जो उपर्युक्त शीघ्र केन्द्रों को ३६०० से घटाने
पर आते हैं (अर्थात् १९६, २१६, २३०, १९७ और २४५ अंश) तब वक्र गति का
अंत होता है अर्थात् तब ग्रह फिर मार्गी होते हैं । (५५) शीघ्र परिधि के बड़ी होने
से शुक्र और मङ्गल की वक्र गति उसी समय रुक जाती है जब शीघ्र केन्द्र सातवीं
राशि में होता है, बुध और गुरु की उस समय जब शीघ्र केन्द्र आठवीं राशि में होता
है और शनि की उस समय जब शीघ्र केन्द्र ६ वीं राशि में होता है ।
विज्ञान भाष्य—ग्रहों की वक्र गति का यथार्थ कारण १२-१३ श्लोकों के विज्ञान
भाष्य में विस्तार के साथ बतलाया गया है । यहाँ इतना और बतलाया गया है कि
वक्र गति का आरम्भ और अन्त कब होता है और गणित से कैसे जाना जा सकता
है । शीघ्र केन्द्र के जो अङ्क ऊपर दिये गये हैं वह मध्यम मान के अनुसार हैं इसलिए
यथार्थ में कुछ भिन्नता देख पड़ती है । ५५वें श्लोक में यह बतलाया गया है कि शीघ्र
परिधि के विस्तार के अनुसार जब शीघ्र केन्द्र सातवीं, आठवीं या नवीं राशि में
होता है तब वक्र गति का अन्त होता है । यह बात चित्र ३० के देखने से स्पष्ट हो
जाती है । स्पष्ट ग्रह शीघ्र परिधि पर भ्रमण करते हुए ऐसे दो स्थानों पर पहुँचता है
जहाँ शीघ्र कर्ण शीघ्र परिधि को स्पर्श करता है । ऐसी दशा में शीघ्र कर्ण, शीघ्र वृत्त
की त्रिज्या और कक्षा वृत्त की त्रिज्या, इन तीन रेखाओं से समकोण त्रिभुज बन
जाता है । इस त्रिभुज का वह कोण जो शीघ्र वृत्त के मध्य विन्दु पर बनता है शीघ्र

स्पष्टाधिकार १६१
परिधि की त्रिज्या के अनुसार छोटा बड़ा होता है । इसी तरह वक्र गति के आरम्भ
और अन्त के लिए भी शीघ्र केन्द्र का मान घटता बढ़ता है ।
यहाँ तक तो भारतीय रीति से ग्रहों के स्पष्ट स्थान जानने की रीति बतलायी
गयी । भास्कराचार्य तथा अन्य कई आचार्यों ने एक और रीति भी बतलायी है जिससे
ग्रहों का स्पष्ट स्थान ठीक इसी प्रकार निकलता है परन्तु वह विस्तार के भय से नहीं
लिखी गयी है । अब संक्षेप में यह बतलाया जायगा कि नवीन पद्धति के अनुसार
पाश्चात्य देशों के ज्योतिषी ग्रहों के स्पष्ट स्थान कैसे निकालते हैं ।
केपलर के नियम के अनुसार किसी ग्रह का स्पष्ट स्थान जानने के लिए
पहले यह देखना पड़ता है कि ग्रह अपने कक्षा-वृत्त में जो दीर्घवृत्त के आकार का
होता है और जिसकी नाभि पर सूर्य स्वयम् होता है, कहाँ है । फिर यह जानना पड़ता
है कि उस समय वह ग्रह पृथ्वी से कहाँ देख पड़ेगा ।
चित्र ३२
मान लो अ ग आ किसी ग्रह का दीर्घवृत्तकार कक्षावृत्त है और र, ग्रह के
आकर्षक रवि का स्थान है जो दीर्घवृत्त की नाभि पर है । जिस समय ग्रह सूर्य से
निकटतम अंतर पर अर्थात् अ पर हो उसी समय से ग्रह के भगण काल का आरम्भ
माना जाय और उस समय से 'द' दिन के अन्तर पर ग्रह ग स्थान पर देख पड़े तो
अ र ग कोण ग्रह का मंद केन्द्र कहलाता है जिसे आगे स अक्षर से सूचित किया
जायगा ।
११

१६२ सूर्य-सिद्धान्त
क को केन्द्र मानकर क अ या क आ त्रिज्या से जो वृत्त खींचा जाता है वह
दीर्घवृत्त को अ, आ विन्दुओं पर स्पर्श करता है । ऐसे वृत्त को दीर्घवृत्त का सहायक
वृत्त (Auxiliary circle) कहते हैं । यदि ग से दीर्घअक्ष पर ग ब लम्ब गिराया
जाय तो यह बढ़ाने पर सहायक वृत्त को गा विन्दु पर काटेगा । यदि गा को सामान्य
केन्द्र क से मिलाया जाय तो अ क गा कोण को ग का उत्केन्द्र ( eccentric
anomaly) कहते हैं । उत्केन्द्र को उ अक्षर से सूचित किया जायगा । स और उ
चापीय मानों में नापे जाते हैं । यदि ग्रह की दैनिक मध्यम गति 'भ' चापीय मान
में हो तो २ π / भ दिन ग्रह का भगण काल होगा क्योंकि एक भ चक्र कोणात्मक मान
में ३६०° और चापीय मान में २π होता है । यदि ग्रह की दैनिक गति सदैव 'भ'
के समान होती तो द दिन पीछे अ से ग्रह का अंतर द X भ होता । द X भ को
मध्यम मन्द केन्द्र कहते हैं जिसे आगे 'म' से सूचित किया जायगा । यदि ग्रह का
कोणीय वेग स्थिर होता तो मध्यम मन्द केन्द्र ही स्पष्ट केन्द्र भी होता ।
दीर्घवृत्त के गुणों के आधार पर मध्यम मन्द केन्द्र और उत्केन्द्र तथा स्पष्ट
मन्द केन्द्र और उत्केन्द्र के सम्बन्ध इस प्रकार जाने जा सकते हैं :—
केपलर के दूसरे नियम के अनुसार,
क्षेत्रफल अ र ग / दीर्घवृत्त का क्षेत्रफल = द / भगण काल
= द / (२ π / भ)
= (द X भ) / २π
परन्तु क्षेत्रफल अ र ग / क्षेत्रफल अ र गा = थ / त
= π त. थ / π त. त
= दीर्घवृत्त का क्षेत्रफल / सहायक वृत्त का क्षेत्रफल
यहाँ त, थ क्रमानुसार दीर्घवृत्त के दीर्घ और लघु अक्ष हैं ।
• क्षेत्रफल अ र ग / • दीर्घवृत्त का क्षेत्रफल = क्षेत्रफल अ र गा
/ सहायक वृत्त का क्षेत्रफल
*देखो Askwith's Pure Geometry, pp. 205.; 206.

स्पष्टाधिकार १६३
क्षेत्रफल अ र ग
= -------------------
πत²
परन्तु अ र ग का क्षेत्रफल = क्षेत्रफल अ क ग — क्षेत्रफल र क ग
= त² / २ उ — बगा ✕ कर / २
= त.² उ / २ — त.ज्याउ ✕ त.च / २
= त² / २ (उ — च ज्या उ)
यहाँ च दीर्घ वृत्त की केन्द्र-च्युति (eccentricity) है ।
पहले सिद्ध किया गया है कि
क्षेत्रफल अ र ग / दीर्घवृत्त का क्षेत्रफल = द. भ / २π
∵ द. भ / २π = [ त² / २ (उ — च ज्या उ) ] / πत²
या भ. द = उ — च ज्या उ (१)
यह समीकरण मध्यम मन्द केन्द्र और उत्केन्द्र का सम्बन्ध प्रकट करता है ।
स्पष्ट केन्द्र और उत्केन्द्र का सम्बन्ध स्थापित करना :—
दीर्घवृत्त का ध्रुवीय समीकरण (Polar equation) है,
रग = त (१ — च²) / (१ + च कोज्या स) जहाँ रग, र नाभि से ग ग्रह का अन्तर है । परन्तु
दीर्घवृत्त की परिभाषा के अनुसार,
रग = च ✕ नियामक रेखा (directrix) से ग का अन्तर
= च ✕ ब से नियामक रेखा का अन्तर
= च ✕ (केन्द्र से नियामक रेखा का अन्तर — केन्द्र से ब का अन्तर)
= च ✕ (त / च — बक)
= च ✕ (त / च — त कोज्या उ)
= त — च ✕ त कोज्या उ
∵ कर्ण = त (१ — च कोज्या उ) (२)

१६४ सूर्य-सिद्धान्त
∵ त (१ - च²) / (१ + च कोज्या स) = त (१ - च कोज्या उ)
अर्थात् (१ - च²) / (१ + च कोज्या स) = १ - च कोज्या उ
वा १ + च कोज्या स = (१ - च²) / (१ - च कोज्या उ)
वा च कोज्या स = (१ - च²) / (१ - च कोज्या उ) - १
= [च (कोज्या उ - च)] / (१ - च कोज्या उ)
∴ कोज्या स = (कोज्या उ - च) / (१ - च कोज्या उ)
∴ १ - कोज्या स = १ - (कोज्या उ - च) / (१ - च कोज्या उ)
= (१ - च कोज्या उ + कोज्या उ + च) / (१ - च कोज्या उ)
और १ + कोज्या स = (१ - च कोज्या उ + कोज्या उ - च) / (१ - च कोज्या उ)
∴ (१ - कोज्या स) / (१ + कोज्या स) = (१ - च कोज्या उ - कोज्या उ + च) / (१ - च कोज्या उ + कोज्या उ - च)
= [(१ - कोज्या उ) (१ + च)] / [(१ + कोज्या उ) (१ - च)]
= [(१ + च) / (१ - च)] × [(१ - कोज्या उ) / (१ + कोज्या उ)]
∴ *स्परे² (स / २) = [(१ + च) / (१ - च)] × स्परे² (उ / २)
अथवा स्परे (स / २) = √[(१ + च) / (१ - च)] × स्परे (उ / २) (३)
यह समीकरण स्पष्ट मंद केन्द्र और उत्केन्द्र के सम्बन्ध प्रकट करता है ।


  • किसी कोण की ज्या को उसकी कोटिज्या से भाग देने पर जो कुछ आता
    है वह उस कोण की स्पर्श रेखा कहलाता है । संक्षेप में किसी कोण म की स्पर्श रेखा
    को स्परे म लिखते हैं ।

स्पष्टाधिकार १६५
समीकरण (१), (२) और (३) से उ के किसी मान को जान कर स्पष्ट
मन्द केन्द्र, मन्द कर्ण और द के मान जान सकते हैं । परन्तु व्यवहार में इससे सरलता
नहीं होती । यदि मध्यम मन्द केन्द्र का मान जान कर स्पष्ट मन्द केन्द्र और कर्ण
का मान जाना जा सके तो अधिक उपयोगी होता है । इसके लिए समीकरण (३)
को त्रिकोणमिति की रीति से फैलाना पड़ता है जो यों किया जाता है :—
लोनी की त्रिकोणमिति भाग २ अथवा टाडहंटर की त्रिकोणमिति या
म. म. सुधाकर द्विवेदी के चलन कलन पृष्ठ ४२ से यह स्पष्ट है कि
इ^(स/२ √-१) - इ^(-स/२ √-१) १
स्परे स/२ = --------------------------------- × ------- ,
इ^(स/२ √-१) + इ^(-स/२ √-१) √-१
यहाँ इ नेपिएरियन लघुरिक्त का आधार है, जिसका मान बीजगणित के अनुसार है
१ + १ + १/|२ + १/|३ + १/|४ + ⋯ इत्यादि जब कि |४ का अर्थ है ४ × ३ × २
× १, |३ का अर्थ है ३ × २ × १, |११ का अर्थ है ११ × १० × ६ × ... २ × १ ।
इ^(उ/२ √-१) - इ^(-उ/२ √-१) १
इसी प्रकार स्परे उ/२ = --------------------------------- × -------
इ^(उ/२ √-१) + इ^(-उ/२ √-१) √-१
∴ समीकरण (३) का रूप होगा,
इ^(स/२ √-१) - इ^(-स/२ √-१)

इ^(स/२ √-१) + इ^(-स/२ √-१) / १+च
= /------- ×
/ १-च
इ^(उ/२ √-१) - इ^(-उ/२ √-१)

इ^(उ/२ √-१) + इ^(-उ/२ √-१)

१६६ सूर्य-सिद्धान्त
अथवा
\frac{\frac{स\sqrt{-१}}{इ} - १}{\frac{स\sqrt{-१}}{इ} + १} = \sqrt{\frac{१+च}{१-च}} \times \frac{\frac{उ\sqrt{-१}}{इ} - १}{\frac{उ\sqrt{-१}}{इ} + १} \quad \quad (क)
समीकरण (क) के प्रत्येक पक्ष में १ जोड़ा जाय तो
\frac{२ \frac{स\sqrt{-१}}{इ}}{\frac{स\sqrt{-१}}{इ} + १} =
\frac{\sqrt{१+च}(\frac{उ\sqrt{-१}}{इ} - १) + \sqrt{१-च}(\frac{उ\sqrt{-१}}{इ} + १)}{\sqrt{१-च}(\frac{उ\sqrt{-१}}{इ} + १)} \quad \quad (ख)
और यदि समीकरण (क) का प्रत्येक पक्ष १ में से घटाया जाय तो
\frac{२}{\frac{स\sqrt{-१}}{इ} + १}
= \frac{\sqrt{१-च}(\frac{उ\sqrt{-१}}{इ} + १) - \sqrt{१+च}(\frac{उ\sqrt{-१}}{इ} - १)}{\sqrt{१-च}(\frac{उ\sqrt{-१}}{इ} + १)} \quad \quad (ग)
समीकरण (ख) के बायें पक्ष को समीकरण (ग) के बायें पक्ष से तथा (ख) के दाहिने पक्ष को (ग) के दाहिने पक्ष से भाग देने से
\frac{स\sqrt{-१}}{इ} = \frac{\sqrt{१+च}(\frac{उ\sqrt{-१}}{इ} - १) + \sqrt{१-च}(\frac{उ\sqrt{-१}}{इ} + १)}{\sqrt{१-च}(\frac{उ\sqrt{-१}}{इ} + १) - \sqrt{१+च}(\frac{उ\sqrt{-१}}{इ} - १)}
= \frac{\frac{उ\sqrt{-१}}{इ}(\sqrt{१-च} + \sqrt{१+च}) + \sqrt{१-च} - \sqrt{१+च}}{-\frac{उ\sqrt{-१}}{इ}(\sqrt{१+च} - \sqrt{१-च}) + \sqrt{१-च} + \sqrt{१+च}}
= \frac{\frac{उ\sqrt{-१}}{इ} - \frac{\sqrt{१+च} - \sqrt{१-च}}{\sqrt{१+च} + \sqrt{१-च}}}{१ - \frac{उ\sqrt{-१}}{इ} \times \frac{\sqrt{१+च} - \sqrt{१-च}}{\sqrt{१+च} + \sqrt{१-च}}}

स्पष्टाधिकार १६७
यदि √१ + च - √१ - च
───────────── के स्थान पर प रखा जाय
√१ + च + √१ - च
तो इस समीकरण का रूप होगा
इ^{स√-१} = इ^{उ√-१} - प
────────────
१ - इ^{उ√-१} × प
१ - प / इ^{उ√-१}
= ───────────── × इ^{उ√-१}
१ - प × इ^{उ√-१}
= इ^{उ√-१} × १ - प इ^{-उ√-१}
──────────────
१ - प इ^{उ√-१}
प्रत्येक पक्ष का लघुरिक्त (logarithm) लेने से,
लरि इ^{स√-१} = लरि इ^{उ√-१} +
लरि (१ - प इ^{-उ√-१}) - लरि (१ - प इ^{उ√-१}) (घ)
परन्तु लरि (१ - प इ^{उ√-१}) = - प इ^{उ√-१} -
(प इ^{उ√-१})² (प इ^{उ√-१})³ (प इ^{उ√-१})⁴
─────────── - ─────────── - ─────────── - ......
२ ३ ४
और लरि (१ - प इ^{-उ√-१}) = - प इ^{-उ√-१} -
(प इ^{-उ√-१})² (प इ^{-उ√-१})³
──────────── - ──────────── - .........
२ ३
पहले को दूसरे में से घटाने पर,
प (इ^{उ√-१} - इ^{-उ√-१}) + प² ×
──
२
(इ^{२√-१ उ} - इ^{-२√-१ उ}) + प³
──
३

१६८ सूर्य-सिद्धान्त
(इ^{३√-१ उ} - इ^{-३√-१ उ}) + .........
∴ समीकरण (घ) का रूप होगा,
स√-१ = उ√-१ + प (इ^{उ√-१} - इ^{-उ√-१})

  • \frac{प^२}{२} (इ^{२√-१ उ} - इ^{-२√-१ उ})
  • \frac{प^३}{३} (इ^{३√-१ उ} - इ^{-३√-१ उ}) + .........
    अथवा स = उ + प × \frac{इ^{उ√-१} - इ^{-उ√-१}}{√-१}
  • \frac{प^२}{२} × \frac{इ^{२उ√-१} - इ^{-२उ√-१}}{√-१}
  • \frac{प^३}{३} × \frac{इ^{३उ√-१} - इ^{-३उ√-१}}{√-१} + ......
    परन्तु \frac{इ^{उ√-१} - इ^{-उ√-१}}{२√-१} = ज्या उ,
    \frac{इ^{२उ√-१} - इ^{-२ उ√-१}}{२√-१} = ज्या २ उ, इत्यादि
    इसलिये स = उ + प × २ज्याउ + \frac{प^२}{२} × २ ज्या २ उ
  • \frac{प^३}{३} × २ज्या३उ + .........
    अथवा स = उ + २(पज्याउ + \frac{प^२}{२} ज्या २उ + \frac{प^३}{६} ज्या३उ
  • \frac{प^४}{४} ज्या४उ + .........(च)

स्पष्टाधिकार १६६
यदि समीकरण (च) में उ, ज्या उ, ज्या २ उ, इत्यादि के स्थान पर इनके
मान ऐसे रखे जायँ जिनमें उ न रहे वरन भ, द रहे जो समीकरण (१) से सम्भव है
तो ऐसा समीकरण मिल जायगा जिसमें केवल स, भ और द रहेंगे और जो व्यवहार
के लिए बहुत ही उपयोगी होगा । परन्तु उ, ज्या उ, ज्या २ उ इत्यादि के मान भ
और द में रूप में तभी ज्ञात हो सकते हैं जब लैग्रेंज के सिद्धान्त (Lagrange's
Theorem) के अनुसार उ, ज्या उ, ज्या २ उ इत्यादि का विस्तार किया जाय ।
इसलिए संक्षेप में पहले यह बतलाना चाहिये कि लैग्रेंज का सिद्धान्त क्या है । यह
सिद्धान्त म० म० सुधाकर द्विवेदी के चलन कलन पृष्ठ १०७, ११० में तथा विलियम-
सन के 'डिफरेंशल कैलकुलस' पृष्ठ १५१-१५३ में दिया हुआ है । इस सिद्धान्त का
रूप यह है :-
यदि र = ह + य. फ (र) ऐसा समीकरण हो जिसमें ह और य स्वतंत्र राशि
हों और फ (र) ऐसा फलन (function) हों जो र के मान पर आश्रित हो तो र
का कोई अन्य फलन
फि (र) = फि (ह) + य. फ (ह). फि' (ह)

  • य^२ / |२ . ता / ताह { [फ(ह)]^२ फि' (ह) }
  • य^३ / |३ . ता^२ / ता ह^२ { [फ(ह)]^३ फि' (ह) } + ......
  • य^न / |न . ता^(न-१) / ता(ह)^(न-१) { [फ(ह)]^न फि' (ह) } +...
    यहाँ फि' (ह), फि (ह) का पहला तात्कालिक सम्बन्ध dy / dx है, तथा ता / ताह,
    ता^२ / ताह^२, ता^३ / ताह^३ इत्यादि आगे कोष्ठों में लिखे हुए पदों के पहले, दूसरे, तीसरे
    तात्कालिक सम्बन्ध हैं ।
    समीकरण (१) का रूप है,
    भ.द = उ - च ज्या उ
    वा उ = भ.द + च ज्या उ
    = म + च ज्या उ, जहाँ म = भद ।
    जो उसी रूप में है जिस रूप में
    र = ह + य. फ (र)
    जहाँ र, ह और य क्रमानुसार उ, म और च के समान हैं ।

१७० सूर्य-सिद्धान्त
यदि फि (उ)=उ तो फि (म)=म और फि' (म)=१
∴ उ=म+ च. ज्याम. १ + $\frac{च^२}{\vert २}$ $\frac{ता}{ताम}$ { [ज्याम].१$^२$ }

  • $\frac{च^३}{\vert ३} \cdot \frac{ता^२}{ताम^२}$ { (ज्याम)$^३$ } + $\frac{च^४}{\vert ४} \cdot \frac{ता^३}{ताम^३}$ { [ज्याम]$^४$ . १ }
  • $\frac{च^५}{\vert ५} \cdot \frac{ता^४}{ताप^४}$ { [ज्याम]$^५$ . १ } + $\frac{च^६}{\vert ६} \cdot \frac{ता^५}{ताम^५}$ { [ज्याम]$^६$ . १ } + ... इत्यादि

लोनी की त्रिकोणमिति भाग २ के अनुसार ज्या म के किसी घात (ज्या म)$^न$
का विस्तार यदि न सम है तो यह होगा :-
ज्या$^न$म= $\frac{१}{२^{न-१} \times (-१)^{\frac{न}{२}}}$ { कोज्या नम - नकोज्या (न - २)म

  • $\frac{न (न-१)}{\vert २}$ कोज्या (न - ४) म - $\frac{न (न-१) (न-२)}{\vert ३}$ कोज्या (न - ६)म
  • ......इत्यादि}

यदि न विषम हो तो,
ज्या$^न$म= $\frac{१}{२^{न-१} (-१)^{\frac{न-१}{२}}}$ { ज्यानम - नज्या (न - २)म

  • $\frac{न (न-१)}{\vert २}$ ज्या (न - ४) म - $\frac{न (न-१) (न-२)}{\vert ३}$
    ज्या (न - ६) म + ......... इत्यादि }

∴ $\frac{ता}{ताम}$ { [ज्या म]$^२$ } = $\frac{ता}{ताम}$ ($\frac{१ - कोज्या २म}{२}$) = ज्या २म,
$\frac{ता^२}{ताम^२}$ (ज्या$^३$म) = $\frac{ता^२}{ताम^२}$ ($\frac{३ज्याम - ज्या ३म}{४}$)
= $\frac{६ज्या ३म - ३ज्याम}{४}$
= $\frac{३}{७}$ (३ज्या ३म - ज्याम)

स्पष्टाधिकार १७१
$\frac{ता^३}{ताम^३}(ज्या^४म)=$
$\frac{ता^३}{ताम^३}{\frac{१}{२^३(-१)^२}$
$\times (कोज्या४म-४कोज्या२म+\frac{२\times ३}{\lfloor २}\times १}$
$=\frac{१}{८}(४^३ज्या४म-४\times २^३ज्या२म)$
$=४(२ज्या४म-ज्या२म)$
$\frac{ता^४}{ताम^४}(ज्या^५५)=\frac{ता^४}{ताम^४}{\frac{१}{२^४(-१)^२}$
$\times (ज्या५म-५ज्या३म+\frac{५\times ४}{\lfloor २}ज्याम)}$
$=\frac{१}{२^४}(५^४ज्याम५म-५\times ३^४ज्या३म+१०ज्याम)$
$\frac{ता^५}{ताम^५}(ज्या^६५)=\frac{ता^५}{ताम^५}{\frac{१}{२^५(-१)^२}(कोज्या ६ म$
$-६ कोज्या ४म+\frac{६\times ५}{\lfloor २}कोज्या २ म-\frac{६\times ५\times ४}{\lfloor ३}\times \frac{१}{२})}$
$=\frac{१}{२^५}(६^५ ज्या ६म-६\times ४^५ ज्या ४ म+१५\times २^५ ज्या २ म)$
$\therefore उ=म+चज्याम +\frac{च^२}{२}ज्या २ म+\frac{च^३}{\lfloor ३}\times \frac{३}{४}(३ ज्या३म-ज्याम$
$+\frac{च^४}{\lfloor ४}\times ४(२ ज्या ४ म-ज्या २ म)+\frac{च^५}{\lfloor ५}\times \frac{१}{२^४}$
$\times (५^४ ज्या ५ म-५\times ३^४ ज्या ३ म+१० ज्या म)$
$+\frac{च^६}{\lfloor ६}\times \frac{१}{२^५}(६^५ ज्या ६ म-६\times ४^५ ज्या ४ म+$
$१५\times २^५ ज्या २ म)+\dots\dots\dots$
यदि ज्या म, ज्या २ म इत्यादि अलग करके एकत्र कर दिये जायें तो
$उ=म+(च-\frac{१}{८}च^३+\frac{१}{१६२}च^५)ज्या म +(\frac{च^२}{२}-\frac{च^४}{६}+\frac{च^६}{४५})$
$ज्या २म+(\frac{३च^३}{८}-\frac{२७च^५}{१२८})ज्या ३ म$

१७२ सूर्य-सिद्धान्त

  • (च⁴/३ - ४च⁶/१५) ज्या ४ म + १२५च⁵/३८४ ज्या ५ म + ......
    इस समीकरण में ज्या ६ म तथा इसके आगे की ज्याओं के गुणक और वे
    पद जिनमें च के छठवें घात के आगे की संख्या वर्तमान है छोड़ दिये गये क्योंकि इनके
    मान नहीं के समान हैं।
    समीकरण (१) को इस प्रकार भी लिख सकते हैं :—
    च ज्या उ = उ - म
    तब ज्या उ = (उ - म)/च
    जिसका यह अर्थ हुआ कि यदि उ के विस्तार में से म घटाया जाय और शेष
    को च से भाग दे दिया जाय तो ज्या उ का विस्तार हो जायगा । इसलिए
    ज्या उ = ( १ - १/८ च² + १/१९२ च⁴ ) ज्या म
  • ( च/२ - च³/६ + च⁵/४८ ) ज्या २ म
  • ( ३/८ च² - २७/१२८ च⁴ ) ज्या ३ म
  • ( च³/३ - ४/१५ च⁵ ) ज्या ४ म + १२५/३८४ च⁴ ज्या ५ म + ...
    यदि फि (उ) = ज्या २ उ तो फि (म) = ज्या२म और फि'(म) =
    २ कोज्या २ म,
    इसलिए लैग्रेंज के सिद्धान्त के अनुसार
    ज्या २ उ = ज्या २ म + च ज्या म × २ कोज्या १ म
  • (च² ता)/(|२ ताम) (ज्या² म × २ कोज्या२म)
  • (च³ ता²)/(|३ ताम²) (ज्या³ म × २ कोज्या २ म)
  • (च⁴ ता³)/(|४ ताम³) (ज्या⁴ म × २ कोज्या २ म)
  • (च⁵ ता⁴)/(|५ ताम⁴) (ज्या⁵ म × २ कोज्या २ म) + ...
    जिसमें ज्या म × २ कोज्या २ म = ज्या ३ म - ज्या म,

स्पष्टाधिकार १७३
ता/ताम (ज्या² म × २ कोज्या २ म)
= ता/ताम ( (१ - कोज्या २ म)/२ × २ कोज्या २ म )
= ता/ताम (कोज्या २ म - कोज्या² २ म)
= ता/ताम (कोज्या २ म - (१ + कोज्या ४ म)/२ )
= २ ज्या ४ म - २ ज्या २ म,
ता²/ताम² (ज्या³ म × २ कोज्या २ म)
= ता²/ताम² ( (३ ज्या म - ज्या ३ म)/४ × २ कोज्या २म )
= ता²/ताम² ( (३ ज्या म कोज्या २ म - ज्या३म कोज्या २म)/२ )
= ता²/ताम² { ३/८ (ज्या ३ म - ज्या म) - १/८ (ज्या ५ म + ज्या म) }
= ता²/ताम² { १/८ (३ ज्या ३ म - ४ ज्या म - ज्या ५ म) }
= १/८ ( - ३² ज्या ३ म + ४ ज्या म + ५² ज्या ५ म),
ता³/ताम³ (ज्या⁴ म × २ कोज्या २ म)
= ता³/ताम³ { १/८ (कोज्या ४ म - ४ कोज्या २ म + ३) २ कोज्या २ म }
= ता³/ताम³ { १/८ (२ कोज्या ४ म कोज्या २ म - ४.२ कोज्या² २ म

  • ६ कोज्या २ म) }
    = ता³/ताम³ { १/८ (कोज्या ६ म + कोज्या २ म) -
    ४/८ (१ + कोज्या ४ म) + ६/८ कोज्या २ म }
    = ता³/ताम³ { १/८ (कोज्या ६ म - ४ कोज्या ४ म + ७ कोज्या २ म - ४) }

१७४ सूर्य सिद्धान्त
$=\frac{१}{८} (६^३ ज्या ६ म - ४^४ ज्या ४ म + ७ \times २^३ ज्या २म)$
$\because ज्या २ उ = ज्या २म + च (ज्या३म - ज्याम)$
$+\frac{च^२}{२} (२ ज्या ४ म - २ ज्या २ म)$
$+\frac{च^३}{\underline{\vert ३}} \times \frac{१}{४} (२५ ज्या ५ म - २७ ज्या ३म + ४ ज्याम)$
$+\frac{च^४}{\underline{\vert ४}} \times \frac{१}{८} (२१६ ज्या ६ म - २५६ ज्या ४ म$
$+ ५६ ज्या २ म) + \dots\dots\dots\dots$
$= \left( -च + \frac{च^३}{६} \right) ज्या म + \left( १ - च^२ + \frac{७च^४}{२४} \right) ज्या२ म$
$+ \left( च - \frac{६च^३}{८} \right) ज्या ३ म + \left( च^२ - \frac{४च^४}{३} \right) ज्या ४ म$
$+ \frac{२५ च^३}{२४} ज्या ५ म + \dots\dots\dots$
यदि फि $(उ) = ज्या३ उ$ तो फि $(म) = ज्या ३ म$ और फि$'(म) = ३$
कोज्या ३ म, इसलिए लैग्रेंज के सिद्धान्त के अनुसार,
ज्या ३ उ $=$ ज्या ३ म $+$ च ज्या म $\times$ ३ कोज्या ३ म
$+\frac{च^२}{\underline{\vert २}} \frac{ता}{ताम} {ज्या^२ म \times ३ कोज्या ३ म}$
$+\frac{च^३}{\underline{\vert ३}} \frac{ता^२}{ताम^२} {ज्या^३ म \times ३ कोज्या ३ म} + \dots\dots$
$= ज्या ३ म + \frac{३}{२} च (ज्या ४ म - ज्या २ म) + \frac{च^२}{२} \times \frac{३}{४}$
$(५ ज्या ५ म - ६ ज्या ३ म + ज्या म)$
$+\frac{च^३}{६} \times \frac{३}{८} (३६ ज्या ६ म - ४८ ज्या ४ म + १२ ज्या २ म) + \dots$
$= \frac{३च^२}{८} ज्या म - \left( \frac{३च}{२} - \frac{३च^३}{४} \right) ज्या २ म$
$+ \left( १ - \frac{६च^२}{४} \right) ज्या ३ म$

स्पष्टाधिकार १७५
$+ \left( \frac{३ च}{२} - ३ च^३ \right) ज्या ४ म + \frac{१५ च^२}{८} ज्या ५ म$
$+ \frac{६च^३}{४} ज्या ६ म + \dots\dots$
इसी तरह, ज्या ४ उ $=$ ज्या ४ म $+$ च ज्या म $\times$ ४ कोज्या ४ म
$+ \frac{च^२}{२} \frac{ता}{ताम} ज्या^२ म \times ४ कोज्या ४ म \right}$
$=$ ज्या ४ म $+$ २ च (ज्या ५ म $-$ ज्या ३ म)
$+ \frac{च^२}{२}$ (६ ज्या ६ म $-$ ८ ज्या ४ म $+$ २ ज्या २ म)
$=च^२ ज्या २ म - २ च ज्या ३ म$
$+ (१ - ४च^२) ज्या ४ म + २ च ज्या ५ म + \dots\dots$
और ज्या ५ उ $=$ ज्या ५ म $+ \frac{५}{२} च ( ज्या ६ म - ज्या ४ म) + \dots\dots$
$= - \frac{५च}{२} ज्या ४ म + ज्या ५म + \frac{५च}{२} ज्या ६ म + \dots$
इस प्रकार समीकरण (च) के उ, ज्या उ, ज्या २ उ इत्यादि के मान तो आ
गये परन्तु इसके प, प$^२$, प$^३$ इत्यादि के मान जानना रह गये। यहाँ प
$\frac{\sqrt{१+च} - \sqrt{१-च}}{\sqrt{१+च} + \sqrt{१-च}}$ के लिए रखा गया है।
इसके किसी घात का विस्तार लैग्रेंज के सिद्धान्त के अनुसार जाना
जा सकता है। परन्तु पांच छः घात तक के विस्तार जिनमें च$^७$ से अधिक अंक लाने
की आवश्यकता नहीं है द्वियुपद सिद्धान्त (Binomial Theorem) से भी जाने जा
सकते हैं जो यहाँ दिखलाये जाते हैं :—
प $= \frac{\sqrt{१+च} - \sqrt{१-च}}{\sqrt{१+च} + \sqrt{१-च}}$
$= \frac{१ - \sqrt{१-च^२}}{च}$
$= \frac{१}{च} (१ - \sqrt{१-च^२})$
$= \frac{१}{च} १ - (१-च^२)^\frac{१}{२} \right}$

१७६ सूर्य-सिद्धान्त
$=\frac{१}{च} (\frac{च^२}{२}+\frac{च^४}{८}+\frac{च^३}{१६}+......)$
$=\frac{च}{२}+\frac{च^३}{८}+\frac{च^५}{१६}+......$
$प^२ =(\frac{च}{२}+\frac{च^३}{८}+\frac{च^५}{१६})^२$
$=\frac{च^२}{४}+\frac{च^४}{८}+\frac{५च^६}{६४}+......$
$प^३ =(\frac{च}{२}+\frac{च^३}{८}+\frac{च^५}{१६})(\frac{च^२}{४}+\frac{च^४}{८}+\frac{५च^६}{६४})$
$=\frac{च^३}{८}+\frac{३च^५}{३२}+\frac{\overline{\xi}च^७}{१२८}+......$
$प^४ =(\frac{च^२}{४}+\frac{च^४}{८}+\frac{५}{६४}च^६)^२$
$=\frac{च^४}{१६}+\frac{च^६}{१६}+......$
$=प^५ (\frac{च^४}{१६}+\frac{च^६}{१६})(\frac{च}{२}+\frac{च^३}{८}+\frac{च^५}{१६})$
$=\frac{च^५}{३२}+.........$
अब समीकरण (च) में प, $प^२$, $प^३$ इत्यादि तथा उ, ज्या उ, ज्या २ उ
इत्यादि के विस्तृत मान उत्थापन किये जायं तो इसका रूप यह होगा :—
स$=म+(च-\frac{च^३}{८}+\frac{च^५}{१६२}) ज्याम +(\frac{च^२}{२}-\frac{च^५}{६}+\frac{च^६}{४८}) ज्या २ म$
$+(\frac{३च^३}{८}-\frac{२७च^५}{१२८}) ज्या ३ म$
$+(\frac{च^४}{३}-\frac{४च^६}{१५}) ज्या ४ म +\frac{१२५च^५}{३८४} ज्या ५ म +$
$+२ { (\frac{च}{२}+\frac{च^५}{१६}) [(१-\frac{च^२}{८}+\frac{च^४}{१६२}) ज्या म$
$+(\frac{च}{२}-\frac{च^२}{६}+\frac{च^५}{४८}) ज्या २ म$

स्पष्टाधिकार १७७
$+\left(\frac{३ च^२}{८}-\frac{२७ च^४}{११\tau}\right) ज्या ३ म+\left(\frac{च^३}{३}-\frac{४ च^५}{१५}\right)\times ज्या ४ म$
$+\frac{१२५ च^५}{३८४} ज्या ५ म+\cdots\cdots]$
$+\frac{३}{२}\left(\frac{च^२}{४}+\frac{च^४}{८}+\frac{५ च^६}{६४}\right)\left[\left(-च+\frac{च^३}{६}\right)ज्या म$
$+\left(१-च^२+\frac{७ च^४}{२४}\right)ज्या २ म$
$+\left(च-\frac{६च^३}{८}\right)ज्या ३ म+\left(च^२-\frac{४च^४}{३}\right)\timesज्या ४ म$
$\left.+\frac{२५च^३}{२४} ज्या ५ म+\cdots\cdots\right]$
$+\frac{३}{२}\left(\frac{च^३}{८}+\frac{३च^५}{३२}\right)\left[\frac{३च^२}{८}ज्या म-\left(\frac{३च}{२}-\frac{३च^३}{४}\right)\timesज्या २ म$
$+\left(१-\frac{६च^२}{४}\right)ज्या ३ म+\left(\frac{३च}{२}-३च^३\right)\timesज्या ४ म$
$\left.+\frac{१५च^२}{८}ज्या ५म+\frac{६च^३}{४} ज्या ६ म+\cdots\cdots\right]$
$+\frac{१}{६}\left(\frac{च^४}{१६}+\frac{च^६}{१६}\right)\left[च^२ ज्या २ म-२ च ज्या ३ म$
$+\left(१-४च^२\right)ज्या ४ म+२ च ज्या ५ म ]$
$\left.+\frac{१}{२}\times\frac{च^५}{३२}\left[-\frac{५च}{२} ज्या ४ म+ज्या ५ म+\frac{५च}{२} ज्या ६ म\right]\right}$
स के इस मान में ज्या ६ म के आगे के पद तथा वह सब पद जिनके गुणक
च६ या उससे अधिक हैं छोड़ दिये गये हैं क्योंकि इससे कोई विशेष अशुद्धि नहीं हो
सकती। इस मान को सरल करने पर ऐसे पद भी मिलेंगे जिनके गुणक च६ से
अधिक हैं। इनको भी छोड़ देने तथा ज्या म, ज्या २ म इत्यादि के गुणक एकत्र
करने पर
स $=$ म $+\left(२च-\frac{१}{४}च^३+\frac{५}{६६}च^५\right)ज्या म$
$+\left(\frac{५}{४}च^२-\frac{११}{२४}च^४+\frac{१७}{१६२}च^६\right)ज्या २ म$
१२