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सूर्यसिद्धान्त (प्राचीन भारतीय खगोल गणित - सानुवाद सटीक)

Surya Siddhanta with Hindi Mathematical Commentary

भगवान् सूर्य / मय दानव / प्रो. रामचन्द्र पाण्डेय द्वारा

DevanagariHindipublished838 पृष्ठ

त्रिप्रश्नाधिकार ४३५ हो तो तारा द त दिशा में सदैव देख पड़ेगा, चाहे तारे से प्रकाश द्रष्टा की आंख में उसी क्षण पहुँच जाय जिस क्षण तारे से चलता है या उसके आने में कुछ देर लगे । परन्तु यदि यह मान लिया जाय कि द्रष्टा द दि दिशा में चल रहा है तो तारा उसको द त की दिशा में तभी देख पड़ेगा जब प्रकाश उसी क्षण द्रष्टा की आंख में पहुँचे जिस क्षण तारे से चलता है परन्तु यदि प्रकाश के त से द तक आने में कुछ समय लगता है तो तार द त दिशा में कदापि नहीं देख पड़ेगा । मान लो कि द म उस नली का अक्ष (axis) है जिसके मा दा और मि दि समानान्तर भुज हैं । जिस समय प्रकाश नली में म से अक्ष म द की ओर उतर रहा है यदि उसी समय नली अपने ही समानान्तर द दि की ओर जा रही है और जितनी देर में प्रकाश म द दूरी चलता है उतनी देर में नली द दा दूरी के समान आगे बढ़ती है तो चित्र ८ की तरह यह प्रकट है कि प्रकाश द पर न पहुँच कर दा पर चित्र ८६ पहुँचेगा । इससे यह जान पड़ेगा कि प्रकाश म दा दिशा से आ रहा है और तारा दा म की सीध में कहीं ता पर है । इस कारण यदि नली चलायमान हो और तारा त पर हो तो यह नली की अक्ष की दिशा में नहीं देख पड़ेगा वरन् दा म ता दिशा में देख पड़ेगा । अर्थात् तारे का स्पष्ट स्थान ता होगा जो यथार्थ स्थान से उसी दिशा की

४३६ सूर्य-सिद्धान्त ओर बढ़ा हुआ है जिस दशा में नली जा रही है। इस प्रकार इन दोनों गतियों के कारण तारे के यथार्थ और स्पष्ट स्थानों में त म ता कोण का अन्तर पड़ता है जिसे भूचलन संस्कार (Aberration) कहते हैं। यह जानना सहज है कि त म ता अथवा द म दा कोण का परिमाण क्या है क्योंकि म द दा त्रिभुज में द दा ज्या द म दा ------ = ------------- म दा ज्या म द दा परन्तु द दा पृथ्वी उतने समय की चाल है जितने समय में प्रकाश म दा के समान चलता है इसलिए द दा और म दा की दूरियों में वही अनुपात है जो पृथ्वी और प्रकाश की गतियों में है। परन्तु पृथ्वी प्रति सेकेन्ड १८ १/२ मील चलती है और प्रकाश १,८६,००० मील चलता है इसलिए ज्या द म दा द दा पृथ्वी की गति १८.५ ------------- = ---- = ------------- = -------- के लगभग ज्या म द दा म दा प्रकाश की गति १८६००० १ = ------- के लगभग १०००० यदि भूचलन संस्कार को भू माना जाय तो ज्या द म दा = ज्या भू = भू जब कि भू का मान रेडियन में हो । ऐसी दशा में १ भू = ------- × ज्या म द दा १०००० यदि भू को विकलाओं में लिखा जाय तो भू" १ १ -------- = ------------- ज्या म द दा = ------------ ज्या त द ता २०६२६५ १०००० १०००० अथवा भू" = २०".६३ ज्या त द सा २०".६३ को भूचलन संस्कार का स्थिराङ्क (coefficient of aberration) कहते हैं। इसका अधिक शुद्ध मान २०".४७ है। यदि त द सा कोण ६०° के समान हो तो यह स्पष्ट है कि भूचलन संस्कार का महत्तम मान २०".४७ होगा। यह स्पष्ट है कि भूचलन संस्कार के स्थिराङ्क में पृथ्वी की गति एक गुणक के रूप में वर्तमान है। परंतु पृथ्वी की गति सदा समान नहीं होती जिस समय पृथ्वी अपने नीच पर रहती है उस समय इसकी गति अत्यन्त तीव्र और जिस समय यह अपने उच्च पर रहती है उस समय इसकी गति अत्यन्त मंद रहती है। इसलिए पहली दशा में भूचलन संस्कार का स्थिराङ्क २०".८० और दूसरी दशा में २०".१३ होता है।

त्रिप्रश्नाधिकार ४३७ भूचलन संस्कार के कारण सूर्य, तारों और दूर के ग्रहों के भोगांश, शर, विषुवांश और क्रान्ति पर क्या प्रभाव पड़ता है इसकी व्याख्या विस्तार के भय से छोड़ दी जाती है। यहाँ इसकी चर्चा साधारण रीति से कर दी जाती है:— जिस प्रकार वार्षिक लंबन के कारण तारा अपने यथार्थ स्थान के चारों ओर एक छोटी सी कक्षा में घूमता हुआ देख पड़ता है उसी प्रकार भूचलन संस्कार के कारण भी वह अपने यथार्थ स्थान के चारों ओर एक छोटी सी कक्षा में घूमता हुआ देख पड़त। है। यह कक्षा भी क्रान्तिवृत्त के तल के समानान्तर होती है। इसकी कक्षा का आकार भी उसी प्रकार बदलता है जिस प्रकार लंबन के कारण तारे की कक्षा का आकार बदलता है। जिस समय इसका आकार दीर्घवृत्त की तरह होता है उस समय इसका दीर्घ अक्ष २०''.४७ के समान होता है और लघु अक्ष २०''.४७ ✕ज्या श के समान होती हैं जब कि श तारे का शर या विक्षेप हो । यह स्पष्ट ही है कि तारे का भूचलन संस्कार उसी दिशा में होता है जिस दिशा में पृथ्वी की गति होती है परन्तु जिस दिशा में पृथ्वी की गति होती है उससे ६०° आगे सूर्य रहता है क्योंकि पृथ्वी की गति भूकक्षा की स्पर्शरेखा की दिशा में होती है जो भूकक्षा के अर्द्धव्यास से ६०° का कोण बनाता और सूर्य भूकक्षा के केन्द्र पर रहता है। इसलिए यह सिद्ध हो गया कि तारे का भूचलन संस्कार क्रान्ति- वृत्त के उस बिन्दु की ओर होता है जो सूर्य से ६०° पीछे रहता है अर्थात् जिसका भोगांश सूर्य के भोगांश से ६०° कम होता है । जो तारा क्रान्तिवृत्तीय ध्रुव अर्थात् कदम्ब पर होता है वह वर्ष भर में अपने यथार्थ स्थान के चारों ओर एक वृत्त पर घूमता हुआ देख पड़ता है जिसके अर्द्धव्यास का कोणात्मक मान २०'.४६ होता है । जो तारा क्रान्तिवृत्त पर होता है वह क्रान्तिवृत्त पर ही अपने यथार्थ स्थान से २०''.४६ आगे और पीछे लोलक की तरह आन्दोलन (Oscillation) करता हुआ देख पड़ता है। इसलिए वर्ष भर में कुल अंतर ४०''.६ के समान पड़ता है। जो तारा किसी और स्थान में रहता है जिससे उसका शर मान लो श के समान होता है, वह वर्ष भर में एक दीर्घवृत्त पर घूमता हुआ देख पड़ता है जिसका केन्द्र तारे का यथार्थ स्थान होता है, जिसके दीर्घ अक्ष का आधा २०''.४६ और लघु अक्ष का आधा २०''.४६ ज्याश तथा जिसका तल क्रान्तिवृत्त के तल के समानान्तर होता है ! इस पर बहुत से पाठक पूछ बैठेंगे कि वार्षिक लंबन और भूचलन संस्कार में फिर अंतर क्या है। इसका उत्तर यह है कि वार्षिक लम्ब के कारण तारा जिस

४३८ सूर्य-सिद्धान्त कक्षा में घूमता हुआ देख पड़ता है उसका विस्तार तारे की दूरी पर अवलंबित है अर्थात् तारा जितना ही दूर होगा उसका लंबन उतना ही कम होगा जिसके कारण कक्षा का आकार भी छोटा होगा । सबसे निकट वाले तारे की जो कक्षा लंबन के कारण देख पड़ती है उसके दीर्घ अक्ष का आधा ०"•७६ से अधिक नहीं है । परन्तु भूचलन संस्कार के कारण तारे की जो कक्षा देख पड़ती है उसके दीर्घ अक्ष का आधा सदैव २०"•५० होता है और यह सब तारों के लिए समान होता है । दूसरी बात यह है कि यदि तारा उसी दिशा में हो जिस दिशा में सूर्य है अथवा सूर्य से ठीक १८०° पर हो तो लंबन का परिमाण शून्य होता है परन्तु भूचलन संस्कार का परिमाण महत्तम अर्थात् २०"•४७ होता है । तीसरे यह कि लंबन के कारण तारा सूर्य की ही ओर कुछ हटा हुआ देख पड़ता है परन्तु भूचलन संस्कार के कारण तारा उस बिन्दु की ओर हटा हुआ देख पड़ता है जो सूर्य से ६०° पीछे होता है । ग्रहों पर भूचलन संस्कार का प्रभाव दो तरह से पड़ता है, एक तो पृथ्वी की गति के कारण; दूसरा ग्रह की गति के कारण । यदि ग्रह की गति पृथ्वी की गति के समान हुई और उसी दिशा में हुई तो भूचलन संस्कार का अभाव होगा । अन्य दशाओं में भूचलन संस्कार क्या होगा इसकी गणना अगल-अलग सहज ही की जा सकती है । चन्द्रमा की गति प्रकाश की गति की तुलना में बहुत कम होती है इसलिए इसके कारण भूचलन संस्कार शून्य के समान समझा जा सकता है । पृथ्वी की गति के कारण भी चन्द्रमा में भूचलन संस्कार नहीं के समान होता है क्योंकि पृथ्वी के साथ-साथ चन्द्रमा भी वर्ष भर में सूर्य की परिक्रमा कर आता है । इसलिए चन्द्रमा में भूचलन संस्कार का प्रभाव शून्य के समान होता है । दैनिक भूचलन संस्कार—पृथ्वी की दैनिक गति के कारण विषुवत् रेखा का कोई बिन्दु दिन भर में २५,००० मील के लगभग चलता है क्योंकि विषुवत् रेखा पर पृथ्वी की परिधि २५,००० मील के लगभग लम्बी होती है । अन्य स्थानों की परिधि इससे छोटी होती है । इसलिए जब दिन भर में २५,००० मील की गति होती है तो एक सेकंड में ३/१० मील की गति सिद्ध हुई । परन्तु पृथ्वी की वार्षिक गति १८ १/२ मील प्रति सेकंड होती है । इसलिए पृथ्वी की दैनिक गति उसकी वार्षिक गति की ३/१० ÷ ३७/२ = ३/१० × २/३७ = ६/३७० = १/६२ । इसलिए वार्षिक गति के कारण जितना भूचलन संस्कार होता है उसका बासठवां भाग दैनिक गति के कारण विषुवत् रेखा पर होगा । अन्य स्थान पर इससे भी कम होगा इसलिए यह भी नहीं के समान समझ लेने में अनुचित नहीं है । भूचलन संस्कार आविष्कार—इसके आविष्कार की कथा बहुत ही रोचक है । परन्तु विस्तार के साथ लिखने की आवश्यकता नहीं है । ब्रैडली नामक

त्रिप्रश्नाधिकार ४३६ ज्योतिषी जिस समय अजगर नामक तारा पुंज के तीसरे तारे (γ Draconis) के वार्षिक लम्बन की जांच कर रहा था उस समय उसको जान पड़ा कि इस तारे का शर स्थिर नहीं रहता वरन् वर्ष भर में क्रमानुसार कुछ बदलता रहता है जिसका कारण उस समय तक की जितनी जानी हुई बातें थीं उनसे समझ में नहीं आता था । अंत में वह इस सिद्धांत पर पहुँचा कि पृथिवी की वार्षिक गति और प्रकाश की गति के कारण यह वार्षिक परिवर्तन सभी तारों में होता रहता है--ब्रैडली को इस घटना का अनुभव १७८६ विक्रमीय में हुआ था । इस प्रकार काल-समीकरण, वर्तन, लंबन, भूचलन-संस्कार इत्यादि नवीन आविष्कारों की मीमांसा सहित त्रिप्रश्नाधिकार का विज्ञान भाष्य समाप्त हुआ । इति

सूर्य-सिद्धान्त का विज्ञान भाष्य द्वितीय खण्ड [ चन्द्रग्रहणाधिकार, सूर्यग्रहणाधिकार, परिलेखाधिकार, ग्रहयुत्यधिकार, नक्षत्रग्रहयुत्यधिकार, उदयास्ताधिकार, शृङ्गोन्नत्यधिकार, पाताधिकार, भूगोलाध्याय, ज्योतिषोपनिषदध्याय, मानाध्याय ] भाष्यकार स्व० महावीरप्रसाद श्रीवास्तव डा० रत्नकुमारी स्वाध्याय संस्थान इलाहाबाद

प्रकाशक डा० रत्नकुमारी स्वाध्याय संस्थान विज्ञान परिषद् भवन महर्षि दयानन्द मार्ग इलाहाबाद-२११००२ फोन नं० ५४४१३ प्रथम संस्करण, दिसम्बर १६४० [ विज्ञान परिषद् प्रयाग से ] द्वितीय संस्करण, मई १६८३ (स्वाध्याय संस्थान से) मूल्य रु० ४०.०० मुद्रक सरयू प्रसाद पाण्डेय नागरी प्रेस, अलोपीबाग, इलाहाबाद प्रस्तावना डॉ० रत्नकुमारी स्वाध्याय संस्थान की ओर से प्राचीन वाङ्मय के कई ग्रन्थ प्रकाशित किये जा चुके हैं—स्वामी सत्यप्रकाश और डॉ० उषा ज्योतिष्मती के ग्रन्थ, जैसे बखशाली-मेनुस्क्रिप्ट, शुल्ब-सूत्र ( संस्कृत और अंग्रेजी में ) । इसी परम्परा में हम स्वर्गीय श्री महाबीर प्रसाद श्रीवास्तव के सूर्य-सिद्धान्त का विज्ञान भाष्य प्रकाशित कर रहे हैं। यह गौरव हमें विज्ञान-परिषद्, प्रयाग की उदारता से प्राप्त हुआ है, जिसके लिए हम परिषद् के अधिकारियों के उपकृत हैं । इस ग्रन्थ के प्रकाशन का व्ययसाध्य कार्य सम्पादित करना हमारे लिए कठिन होता यदि हमें करनाल के आदरणीय रायसाहब चौधरी प्रताप सिंह जी और उनके द्वारा स्थापित न्यास से आर्थिक सहायता प्राप्त नहीं हुई होती । चौधरी साहब के हम अत्यन्त आभारी हैं। हम प्रथम खण्ड मार्च १६८२ में प्रकाशित कर चुके हैं, जिसमें मध्यमाधिकार, स्पष्टाधिकार और त्रिप्रश्नाधिकार हैं । इस दूसरे खण्ड में ११ अध्याय हैं । इस प्रकार कुल १४ अध्यायों में पूरा सूर्य-सिद्धान्त समाप्त हुआ । एस० रंगनायकी, १० मई, १६८३. एम० एस-सी०, डी० फिल, डी० एस-सी० निदेशिका

विषय-सूची अध्याय पृष्ठ चतुर्थ अध्याय— चन्द्रग्रहणाधिकार ४४१ पंचम अध्याय— सूर्यग्रहणाधिकार ५०६ षष्ठम अध्याय - परिलेखाधिकार ५४५ सप्तम अध्याय—ग्रहयुत्यधिकार ५७६ अष्टम अध्याय—नक्षत्रग्रहयुत्यधिकार ६०४ नवम अध्याय—उदयास्ताधिकार ६५२ दशम अध्याय—शृंगोन्नत्यधिकार ६८१ एकादश अध्याय—पाताधिकार ७०१ द्वादश अध्याय--भूगोलाध्याय ७१८ त्रयोदश अध्याय—ज्योतिषोपनिषदध्याय ७७३ चतुर्दश अध्याय--मानाध्याय ७६४ परिशिष्ट ८०६ ग्रन्थ सूची ८१०

चतुर्थ अध्याय चन्द्रग्रहणाधिकार (संक्षिप्त वर्णन) [ १ श्लोक-सूर्य और चन्द्रमा के मध्यव्यास के मान । २-३ श्लोक-प्रत्येक के स्पष्ट व्यास जानने की रीति तथा चंद्रमा की कक्षा में सूर्य का स्पष्ट व्यास (योजनों और कलाओं में) जानने की रीति । ४-५ श्लोक-चंद्रमा की कक्षा में पृथ्वी की छाया के व्यास का मान जानने की रीति । ६ श्लोक-चंद्रमा के पात के कहाँ रहने से ग्रहण हो सकता है । ७ श्लोक-किस तिथि में ग्रहण हो सकता है । ८ श्लोक- अमावस्या और पूर्णमासी के अन्तकाल के सूर्य और चंद्रमा को स्पष्ट करने की रीति । ९ श्लोक-ग्रहण क्यों पड़ता है । १० श्लोक-ग्रस्त भाग का परिमाण जानने की रीति । ११ श्लोक-सर्वग्रास ग्रहण होगा या खंड ग्रहण अथवा ग्रहण न पड़ेगा यह निश्चय करने की रीति । १२-१५ श्लोक-ग्रहण और सर्वग्रास ग्रहण कितने समय तक रहेगा यह जानने की रीति । १६ श्लोक-ग्रहण के आरंभकाल और अन्तकाल जानने की रीति । १७ श्लोक-सर्वग्रास ग्रहण के आरंभकाल और अन्तकाल जानने की रीति । १८-२१ श्लोक-किस समय कितना भाग ग्रस्त रहेगा यह जानने की रीति । २२-२३ श्लोक-ग्रास का परिमाण जानकर इष्टकाल जानने की रीति । २४-२५ श्लोक-ग्रहण का चित्र खींचने के लिये वलन जानने की आवश्यकता । २६ श्लोक-इष्टकाल में बिम्ब का अंगुलात्मक मान जानने की रीति । ] सूर्य और चंद्रमा में ग्रहण किस प्रकार लगता है यह जानने के लिए पहले प्रकाश के कुछ गुणों की जानकारी आवश्यक है । इसलिए पहले संक्षेप में इन्हीं पर विचार किया जायगा । यह सबके अनुभव की बात है कि रात को दीपक के उजेले में दीवाल पर किसी वस्तु की जो छाया पड़ती है वह कहीं हल्की और कहीं गहरी होती है । गहरी छाया बीच में होती है और हल्की छाया गहरी छाया को घेरे रहती है । यदि वस्तु दीवाल के पास हो तो गहरी छाया बड़ी होती है और हल्की छाया कम । ज्यों-ज्यों वह वस्तु दीवाल से दूर होती जाती है परंतु दीपक के निकट त्यों-त्यों छाया का विस्तार तो बढ़ता जाता है परंतु गहरी छाया कम होती जाती है और हल्की छाया अधिक । यदि वस्तु दीपक से छोटी हो तो एक स्थिति ऐसी भी आ जायगी जिसमें गहरी छाया बिल्कुल नहीं पड़ेगी, केवल हल्की छाया दीवाल पर देख पड़ेगी ।

४४२ सूर्य-सिद्धान्त

हां, यदि वस्तु दीपक से बड़ी हो तो गहरी छाया दीवाल पर सदैव पड़ेगी । दीवाल के जिस भाग पर गहरी छाया पड़ती है उस भाग पर दीपक के प्रकाश का कोई अंश नहीं पहुँचता परन्तु हल्की छाया में दीपक का प्रकाश कुछ न कुछ अवश्य पहुँचता है । यदि कोई कीड़ा दीवाल पर गहरी छाया में हो तो उसे दीपक बिल्कुल नहीं देख पड़ेगा परन्तु हल्की छाया में उसे दीपक का कोई न कोई भाग अवश्य देख पड़ेगा । इसकी परीक्षा यों की जा सकती है :— एक दीपक या लम्प जलाकर रख लो । थोड़ी दूर पर एक पेंसिल, गोली या ऐसी चीज़ जो दीपक से छोटी हो खड़ी कर दो या टाँग दो । कुछ और दूर पर एक पतला कागज़ हाथ में इस प्रकार थामो कि इस पर पेंसिल की गहरी और हल्की दोनों छाया पड़ें । गहरी छाया में सुई से एक छेद कर दो और इसी से देखो कि दीपक देख पड़ता है या नहीं । दीपक नहीं देख पड़ेगा । हल्की छाया में सुई से छेद करके देखो । दोपक का कुछ अंश देख पड़ेगा । रेखागणित से यह जाना जा सकता है कि गहरी छाया कहाँ पड़ेगी और हल्की छाया कहाँ पड़ेगी । इनके विस्तार आदि का पता लगाना भी गणित से सम्भव है । सूर्य, चन्द्रमा में ग्रहण कैसे पड़ता है यह जानने के लिए गहरी और हल्की छाया का गणित करना पड़ता है इसलिए इस पर अच्छी तरह विचार करना आवश्यक है । आगे गहरी छाया को केवल छाया और हल्की छाया को परिछाया कहा जायगा । मान लो र एक प्रकाशमान पिंड और च एक अपारदर्शक पिंड है । दोनों पिंड गोलाकार हैं । र से प्रकाश की किरणें चारों दिशाओं में फैलती हैं परन्तु जो किरणें च पिंड पर पड़ती हैं वे इसके आगे नहीं बढ़ने पातीं । इन दोनों पिंडों को सीधी स्पर्श करती हुई रेखाएँ खींची जायें तो वे त बिन्दु पर परस्पर मिलकर एक दूसरे को काटती हुई आगे बढ़ेंगी । आ त ई सूची (cone) के आकार का होगा । यही च पिंड से बनी हुई छाया की सीमा होगी । इसके ऊपर, नीचे, इधर उधर छाया नहीं पड़ेगी । (देखो चित्र ६०) । इन दोनों पिंडों को छूती हुई जो रेखाएँ ता बिन्दु पर मिलती हैं इनसे परिछाया की सीमा बनती है । यदि एक पट (पर्दा) छाया में इस प्रकार रखा जाय कि वह र, च पिंडों के केन्द्रों को मिलानेवाली रेखा से समकोण पर रहे तो इस पट पर छाया का जो वृत्त बनेगा उसका व्यास छ छा होगा और परिछाया के वृत्त का व्यास उ ऊ होगा जिसमें छाया का व्यास भी शामिल है (देखो चित्र ६१) । यदि उ छ खंड में किसी जगह प बिंदु पर एक छेद कर दिया जाय और इसी छेद से प्रकाशमान पिंड देखा जाय तो पिंड का वह ऊपरी भाग देख पड़ेगा जो पा बिन्दु के ऊपर है । यह पा बिन्दु प आ

चन्द्रग्रहणाधिकार ४४३ उ क ख ग घ छ ट छा प क झ उ फ ऊ चित्र ६१ आ इ ई चित्र ६० ल पा अ र चित्र ६२

४४४ सूर्य्य-सिद्धान्त स्पर्शरेखा को बढ़ाने से प्रकाशमान पिंड पर निश्चय किया जाता है। यदि ऊ छा खंड में कहीं छेद किया जाय तो प्रकाशमान पिंड के नीचे का भाग देख पड़ेगा। परन्तु यदि छेद छ छा खंड में किया जाय तो प्रकाशमान पिंड का कोई भाग नहीं देख पड़ेगा। सारांश यह कि यदि द्रष्टा अ आ त रेखा के ऊपर परन्तु ता अ उ के नीचे कहीं रहेगा तो उसे र पिंड का ऊपरी भाग अवश्य देख पड़ेगा परन्तु नीचे वाला भाग नहीं देख पड़ेगा। इसी प्रकार इ ई त रेखा के नीचे और अ ई ऊ रेखा के ऊपर द्रष्टा के रहने से प्रकाशमान पिंड का नीचे वाला भाग अवश्य देख पड़ेगा परन्तु ऊपर वाला भाग नहीं देख पड़ेगा। यदि पट त विन्दु पर लाया जाय तो यहाँ छाया नाममात्र को भी नहीं रहेगी। प्रकाशमान पिंड देख तो नहीं पड़ेगा परन्तु इसकी चमक चारों ओर कुछ अवश्य देख पड़ेगी। यदि पट त से और दूर किया जाय तो एक ओर ही दृश्य देख पड़ेगा। क ख और ग घ परिछाया के खंडों में तो पहले की ही तरह बात देख पड़ेगी परन्तु ख ग खंड में जो छाया की सीमा बनाने वाली रेखाओं के बीच में है प्रकाशमान पिंड का किनारे वाला पूरा भाग देख पड़ेगा परन्तु बीच में अन्धकार रहेगा (देखो चित्र ६२)। चित्र से यह प्रकट ही है कि ख ग के बीच किसी विन्दु से च पिंड को स्पर्श करती हुई जो रेखाएँ खींची जायेंगी वह र पिंड के ऊपर नीचे दोनों ओर पहुँचेंगी। पिंड गोल है इसलिए बीच में अन्धकारमय होने से कंकण की तरह देख पड़ेगा। यह सब दृश्य प्रयोग द्वारा देखे जा सकते हैं। एक गोल लम्प, गेंद तथा लकड़ी के चौखटे में तने हुए पट, बस तीन चीजें इसके लिए पर्याप्त हैं। र पिंड की जगह गोल लम्प और च की जगह गेंद को समझना चाहिए। अंधेरी रात में किसी स्थान में यह प्रयोग सहज ही किया जा सकता है। इसी प्रयोग से सूर्य ग्रहण की सारी बातें समझ में आ सकती हैं। र को रवि या सूर्य और च को चन्द्रमा समझना चाहिए। पट की जगह पृथ्वी को समझना चाहिए। जिस तरह यह पिंड के निकट रहने पर छाया और परिछाया दोनों में रहता है परन्तु दूर रहने पर केवल परिछाया या छाया की सीमा बनाने वाली रेखाओं के बीच में रहता है, इसी तरह पृथ्वी भी कभी चन्द्रमा के निकट रहने से चन्द्रमा की छाया और परिछाया दोनों में रहती है और कभी दूर रहने से केवल प र छाया में ही रहती है। पृथ्वी चन्द्रमा से बहुत बड़ी है इसलिए सारी पृथ्वी छाया या परिछाया में नहीं पड़ सकती। पृथ्वी का जो भाग छाया में पड़ जाता है वहाँ के निवासियों को सूर्य बिलकुल नहीं देख पड़ता। इसलिये सूर्य का पूर्णग्रहण या सर्वग्रहण (total eclipse of the sun) होता है। पृथ्वी का जो भाग परिछाया में पड़ता है वहाँ के

चन्द्रग्रहणाधिकार ४४५ निवासियों को सूर्य का खंडग्रहण (partial eclipse) देख पड़ता है। यदि पृथ्वी पर छाया न पहुँचे तो वह उसी स्थिति में रहेगी जो क ख ग घ पट से दिखायी गयी है। ऐसी दशा में पृथ्वी का जो भाग छाया की सीमा बनाने वाली रेखा के बीच में होगा वहाँ कंकण ग्रहण (annular eclipse) देख पड़ेगा। जिस तरह चंद्रमा की छाया या परिछाया में पृथ्वी के आ जाने से सूर्य में पूर्ण ग्रहण खंड ग्रहण, अथवा कंकण ग्रहण देख पड़ता है उसी तरह पृथ्वी की छाया में जब चंद्रमा आ जाता है तब प्रकाशहीन हो जाता है। इसी को चन्द्रग्रहण कहते हैं। यदि चंद्रमा का पूर्ण पिंड छाया में आ जाय तो पूर्ण चन्द्रग्रहण (total eclipse of the moon) और अधूरा पिंड छाया में आवे तो खंड चंद्रग्रहण (partial eclipse of the moon) पड़ता है। इस स्थिति में चंद्रमा निवासी सूर्य में ही ग्रहण लगता हुआ देखेंगे परंतु उनको कंकण ग्रहण देखने का सौभाग्य नहीं हो सकता क्योंकि चंद्रमा से पृथ्वी का आकार बड़ा होने के कारण चंद्रमा कभी छाया से बाहर नहीं जा सकता है। चित्र से यह भी स्पष्ट है कि छाया में पहुँचने के पहले परिछाया मे घुसना आवश्यक है। यह स्मरण रखना चाहिए कि चंद्रग्रहण तभी देख पड़ता है जब चंद्रमा पृथ्वी की छाया में जाता है। यदि चंद्रमा केवल परिछाया में जाय तो ग्रहण नहीं देख पड़ेगा, हाँ कुछ मलिनता अवश्य आ जाती है। ऊपर जो कुछ कहा गया है उससे स्पष्ट है कि सूर्य, चंद्रमा और पृथ्वी की परस्पर दूरियों के अनुसार छाया और परिछाया का परिमाण भी कम या अधिक हो सकता है। यह बात पहले ही बतलायी जा चुकी है कि सूर्य और पृथ्वी के बीच की दूरी तथा चंद्रमा ओर पृथ्वी के बीच की दूरी घटती बढ़ती रहती है। दूरी के घटने बढ़ने से इन पिंडों के कोणात्मक आकार घटे बड़े देख पड़ते हैं (देखो पृष्ठ ८४-८५) इसलिए कोणात्मक आकारों का परिमाण जानने के लिए इनकी स्पष्ट दूरियों का जानना आवश्यक है। परंतु त्रिप्रश्नाधिकार में यह बतलाया गया है कि किसी पिंड के आकार, लम्बन और उसकी स्पष्ट दूरी में परस्पर क्या संबंध है। इसलिए लंबन या दूरी दोनों में से किसी के जान लेने से यह जाना जा सकता है कि छाया का परिमाण किस समय कितना होता है। चित्र १३ से यह जाना जाता है कि चंद्रग्रहण के समय चंद्रमा की कक्षा में पृथ्वी की छाया का व्यास कितना बड़ा होता है। मान लो कि चित्र १३ में च चंद्रमा है जो पृथ्वी की छाया में स बिंदु पर प्रवेश कर रहा है, इसलिए यह रा पा स्पर्श रेखा को छू रहा है क्योंकि सूर्य और

४४६ सूर्य-सिद्धान्त रा सू र ग सा का हा पा पृ पी चित्र ६३ च म भू श

चन्द्रग्रहणाधिकार ४४७ पृथ्वी की सामान्य स्पर्शरेखाओं रा पा और री पी से ही पृथ्वी की छाया बनती है जिसकी नोक न है। सूर्य और पृथ्वी की त्रिज्याएँ र रा और प पा स्पर्शरेखा रा पा के समकोण पर हैं। प रि रेखा पा रा के समानान्तर है। पहले यह जानना आवश्यक है कि कोण स प छ किसके समान है क्योकि यह कोण पृथ्वी के केन्द्र पर छाया की उस त्रिज्या से बनता है जो चंद्रमा की कक्षा में है इसलिए इससे चंद्रकक्षा में छाया के आकार का पता चलेगा। ∠ रि प र = रि र / प र = (रा र - रा रि) / प र = (रा र - पा प) / प र = (रा र / प र) - (पा प / प र) = सूर्य की त्रिज्या - सूर्य का लंबन = त्र - ल त्र और ल से सूर्य की त्रिज्या और लंबन सूचित किये गये हैं। ∠ स प छ = ∠ प स पा - ∠ प न पा = ∠ प स पा - ∠ रि प र क्योंकि प रि और न पा रा समान्तर हैं और न प र दोनों को काटता है। यहाँ ∠ प स पा = प पा / प स = चंद्रमा का लंबन = ला ला को चंद्रमा का परम लंबन या क्षितिज लंबन मान लेने में बहुत अंतर नहीं पड़ेगा। इसलिए ∠ स प छ = ला - (त्र - ल) = ल + ला - त्र इससे यह सिद्ध हुआ कि यदि सूर्य और चन्द्रमा के क्षितिज लम्बनों के योगफल से सूर्य की त्रिज्या का कोणात्मक मान घटा दिया जाय तो जो कुछ शेष रहता है उसी के समान चन्द्रकक्षा में पृथ्वी की छाया की त्रिज्या का कोणात्मक मान होता है। इसी को भूभाद्र्ध भी कहते हैं। अनुभव से जाना गया है कि पृथ्वी के वातावरण के कारण इसकी छाया उपर्युक्त गणितसिद्ध छाया से १/५० गुणा बड़ी होती है क्योंकि ऊपर के गणित में पृथ्वी के केवल ठोस पिंड का विचार किया है, इसके वातावरण का नहीं। उदाहरण- यदि सूर्य का लंबन ६'', चन्द्रमा का लंबन ५८' १'' और सूर्य त्रिज्या १६' १३'' हो तो चंद्रकक्षा में पृथ्वी की छाया की त्रिज्या बतलाओ ? भूभाद्र्ध = ल + ला - त्र = ६'' + ५८' १'' - १६' १३''

४४६ सूर्य-सिद्धान्त = ५८' १०" - १६' १३" = ४१' ५७" । यह गणितसिद्ध छाया की त्रिज्या है। वातावरण के कारण छाया का १/५० गुना बढ़ जाता है। इसलिए कुल छाया = ४१' ५७" + (४१' ५७"/५०) = ४१' ५७" + ५०" = ४२' ४७" यह प्रकट है कि चन्द्रकक्षा में भूभाद्वं (पृथ्वी की छाया की त्रिज्या) का परिमाण सदैव एकसा नहीं रहता क्योंकि यह सूर्य और चन्द्रमा के लंबन तथा सूर्य की कोणात्मक त्रिज्या पर अवलंबित है और यह तीनों बातें पृथ्वी से सूर्य और चन्द्रमा की दूरियों पर अवलंबित हैं जो सदैव घटा बढ़ा करती हैं। अब यह बतलाया जायगा कि इस विषय पर सूर्य-सिद्धान्त का क्या मत है। सूर्य और चन्द्र बिम्बों का मध्यम व्यास तथा चन्द्रकक्षा में सूर्य का स्पष्ट व्यास— सार्धानि षट् सहस्राणि योजनानि विवस्वतः । विष्कम्भो मण्डलस्येन्दोः साशीतिस्तु चतुश्शती ॥१॥ स्वभ्यासौ त्रिज्याऽभ्यस्तौ स्वमन्दश्रवणोद्धृतौ । स्पष्टौ स्वको स्वकौ भूमेस्तथा सूची शशाङ्कवत् ॥२॥ स्फुटस्वभुक्तिगुणितो मध्यभुक्त्या हृतो स्वकौ । रवेस्स्वभगणाभ्यस्तः शशाङ्कभगणोद्धृतः ॥३॥ अनुवाद—(१) सूर्य के मण्डल का मध्यम व्यास ६५०० योजन और चंद्रमा के मण्डल का मध्यम व्यास ४८० योजन है। (२) जिस समय किसी का स्पष्ट व्यास जानना हो तो उसके मध्यम व्यास को उस समय की उसकी स्पष्टगति से गुणा कर दो और गुणनफल को उसकी मध्यमगति से भाग दे दो। सूर्य के स्पष्ट व्यास को सूर्य के महायुगीय भगण से गुणा करके गुणनफल को चन्द्रमा के महायुगीय भगण से भाग देने पर (३) अथवा सूर्य के स्पष्ट व्यास को चन्द्रकक्षा से गुणा करके और गुणनफल को सूर्य की कक्षा से भाग देने पर जो आता है वही चन्द्रकक्षा में सूर्य के स्पष्ट व्यास का परिमाण है। चन्द्रकक्षा में सूर्य और चन्द्रमा के व्यास को १५ से भाग देने पर सूर्य और चन्द्रमा के व्यास कलाओं में ज्ञात हो जाते हैं। विज्ञान भाष्य—इन तीन श्लोकों का सार यह है— सूर्य बिम्ब का मध्यम व्यास = ६५०० योजन चन्द्र बिम्ब का मध्यम व्यास = ४८० योजन

चन्द्रग्रहणाधिकार ४४६ स्फुट व्यास = मध्यम व्यास ✕ स्फुट गति / मध्यम गति चन्द्रकक्षा में सूर्य का स्फुट व्यास = सूर्य का स्फुट व्यास ✕ सूर्य का महायुगोय भगण / चन्द्रमा का महायुगीय भगण अथवा = सूर्य का स्फुट व्यास ✕ चन्द्रकक्षा / सूर्य की कक्षा यहां यह शंका उत्पन्न हो सकती है कि क्या सूर्य का योजनात्मक आकार भी घटता बढ़ता है क्योंकि ऊपर बतलाया गया है कि सूर्य का स्फुट (स्पष्ट) व्यास उसकी स्फुट गति पर अवलंबित है जो सदा घटती बढ़ती रहती है। परन्तु बात यह नहीं है। सूर्य का योजनात्मक आकार स्फुट गति के अनुसार कदापि घटता बढ़ता नहीं है, हां कलात्मक या कोणात्मक आकार अवश्य बदलता है जिसकी मीमांसा स्पष्टाधिकार पृष्ठ ८४-८६ में अच्छी तरह की गयी है। यहां मध्यम व्यास और स्फुट व्यास का परिमाण यद्यपि योजनों में बतलाया गया है तथापि इसे कोणात्मक ही समझना चाहिए क्योंकि इस जानने की जो रीति भास्कराचार्य जी१ ने लिखी है उससे यह अर्थ निकलता है। भास्कराचार्य जी कहते हैं कि जिस दिन सूर्य की स्पष्ट या स्फुट गति मध्यम गति के समान हो उस दिन उदयकाल में ३४३८ इकाइयों के समान दो लकड़ियां लेकर इनके दो सिरों को मिलाकर२ मूल स्थानों में आंख रखकर सूर्य के बिंब को इस प्रकार बेधो कि इन लकड़ियों के आगेवाले सिरे बिम्ब के उत्तर और दखिन वाले किनारों को स्पर्श करें। इसी दशा में लकड़ियों के सिरों को इस प्रकार कस दो कि आगेवाले सिरों की दूरी में कोई भेद न पड़े। अब इन सिरों की दूरी को उसी इकाई से नापो जिससे लकड़ियों की लम्बाई नापी गयी है। यह अन्तर जितनी इकाइयों के समान होगा उतनी ही कला सूर्य के बिम्ब का व्यास होगा। भास्कराचार्य जी के अनुसार यह व्यास ३२′३१″३३‴ होता है। यदि इसको ३२′३०″ या ३२′·५ माना जाय और सूर्य की कक्षा३ का मान ४३,३१,५०० योजन लिया जाय तो सूर्य- बिम्ब का योजनात्मक मान इस प्रकार प्राप्त होगा :— १. गणिताध्याय पृष्ठ १७१-१७२ २. आजकल यह काम परकार (dividers) की नोकों से किया जा सकता है। आंख उस विन्दु पर होनी चाहिए जहां कम्पास की दोनों भुजाएं मिलती हों। ३. भूगोलाध्याय श्लोक ८६ ।

४५० सूर्य-सिद्धान्त चित्र ९४ कोई कक्षा = ३६०° = २१,६००' ∵ सूर्य की कक्षा भी २१,६०० कला के समान है परन्तु योजनों में यह ४३,३१,५०० के समान है इसलिए २१६००' = ४३,३१,५०० योजन ∵ ३२.५' = (३२.५ × ४३३१५००) / २१६०० योजन = ६५१७ योजन सूर्य-सिद्धान्त ने सूर्य का मध्यम व्यास ६५०० योजन माना है इससे प्रकट होता है कि इस ग्रन्थ में सूर्य का उदयकालिक बिम्ब ३२' ३०" से कम लिया गया है जो ठीक भी है क्योंकि वर्तन के कारण उदयकालिक बिम्ब यथार्थ से कुछ बड़ा देख पड़ता है । इस तरह यह सिद्ध है कि सूर्य या चन्द्र बिम्बों का योजनात्मक मान कलात्मक मानों से ही जाना गया है । मध्यम व्यास से स्फुट व्यास जानने का जो नियम बतलाया गया है वह कुछ स्थूल है क्योंकि सूर्य या चन्द्रमा की स्फुटगति का परिवर्तन उसी अनुपात से नहीं होता चित्र ९५

चन्द्रग्रहणाधिकार ४५१ जि अनुपात से इनके कोणात्मक बिम्बों का परिवर्तन होता है। (देखो स्पष्टाधिकार पृष्ठ ८८) । चन्द्रकक्षा में सूर्य का स्पष्ट व्यास जानने के दो नियम बतलाये गये हैं जो वास्तव में एक ही नियम के दो रूप हैं। चित्र ६५ में यदि र रा सूर्य की कक्षा, और च चा चन्द्रमा की कक्षा के खंड मान लिये जायें, भ पृथ्वी का केन्द्र हो और यदि र रा सूर्य बिम्ब के समान मान लिया जाय तो चन्द्रकक्षा में यह बिम्ब च चा के समान होगा। यह स्पष्ट ही है कि च चा भ च चन्द्रकक्षा का व्यासार्ध —— = —— = ——————————— र रा भ र सूर्यकक्षा का व्यासार्ध चन्द्रकक्षा = —————— स सूर्यकक्षा क्योंकि दो वृत्तों की परिधियों में वही अनुपात होता है जो उनके व्यासार्धों में होता है। इसलिए र रा × चन्द्रकक्षा च चा = —————————— सूर्यकक्षा सूर्य का स्पष्ट व्यास × चन्द्रकक्षा = ———————————————— सूर्य की कक्षा इस प्रकार चन्द्रकक्षा में सूर्य के स्पष्ट व्यास के जानने का दूसरा नियम सिद्ध हो गया। अब यह बतलाना कठिन नहीं है कि पहला इसका रूपान्तर किस प्रकार है। यह पहले ही बतलाया जा चुका है कि हमारे आचार्यों का मत है कि प्रत्येक ग्रह की दैनिक योजनात्मक गति समान होती है। इसलिए यह सिद्ध है कि प्रत्येक ग्रह एक महायुग या कल्प में जितने योजन चलता है वह सब ग्रहों के लिए एक सा है। ग्रह एक महायुग में जितने योजन चलता है उसको यदि ग्रह के महायुगीय भगण से भाग दे दिया जाय तो ग्रह की कक्षा का मान योजनों में निकल आवेगा, इसको यों भी लिखा जा सकता है :— ग्रह की महायुगीय गति (योजनों में) —————————————— = ग्रह की कक्षा (योजनों में) ग्रह का महायुगीय भगण यदि ग्रह की महायुगीय योजनात्मक गति को म मान लिया जाय और सूर्य के महायुगीय भगण को र तथा चन्द्रमा के महायुगीय भगण को च मान लिया जाय तो उपर्युक्त नियम के अनुसार

४५२ सूर्य-सिद्धान्त $\frac{म}{र} =$ सूर्य की कक्षा और $\frac{म}{च} =$ चन्द्रकक्षा यदि दूसरे समीकरण के प्रत्येक पक्ष को पहले समीकरण के समपक्ष (corres- ponding sides) से भाग दे दिया जाय तो $\frac{म}{च} \div \frac{म}{र} = \frac{चन्द्रकक्षा}{सूर्य की कक्षा}$ अथवा $\frac{र}{च} = \frac{चन्द्रकक्षा}{सूर्य की कक्षा}$ इस प्रकार सूर्य के स्फुट व्यास का पहला नियम भी सिद्ध हो गया । यहाँ यह बतला देना आवश्यक है कि सूर्य का स्फुट व्यास तथा सूर्य की कक्षा का विस्तार यथार्थ में उतना नहीं है जितना हमारे सिद्धान्त ग्रन्थों में बतलाया गया है । अनेक बेधों से यह सिद्ध हो गया कि सूर्य का लम्बन ९ कला से अधिक नहीं होता इसलिए पृथ्वी से इसकी दूरी लम्बन के सूत्र के अनुसार (देखो त्रिप्रश्नाधिकार पृष्ठ ३८४) ९ करोड़ २६ लाख मील है और इसके पिंड का व्यासार्ध ४, ३२, ८६० मील है (देखो पृष्ठ ६६) । यदि योजन का परिमाण ५ मील के समान समझा जाय (देखो पृष्ठ ५४) तो सूर्य का व्यासार्ध = $\frac{४३२८६०}{५} =$ ८६५७८ योजन, और सूर्य की मध्यम दूरी = $\frac{९,२६,००,०००}{५} =$ १,८५,२०,००० योजन यह परिमाण हमारे सिद्धान्त के परिमाणों से कितना भिन्न है यह नीचे की तालिका से स्पष्ट हो जायगा जहां सब परिमाण योजनों में दिये जाते हैं :-

सूर्यसिद्धान्तसिद्धान्त शिरोमणिR. S. Ball's Spherical Astronomy
सूर्य बिंब का व्यास६५००६५२२
सूर्य की मध्यम दूरी६८८३७८६८८३७७
चन्द्र बिंब का व्यास४८०४८०
चन्द्रमा की मध्यम दूरी५१५६६५१५६६