सूर्यसिद्धान्त (प्राचीन भारतीय खगोल गणित - सानुवाद सटीक)
Surya Siddhanta with Hindi Mathematical Commentary
भगवान् सूर्य / मय दानव / प्रो. रामचन्द्र पाण्डेय द्वारा
६३०
सूर्य-सिद्धान्त
| क्रम संख्या | नक्षत्र का नाम | कोलब्रुक के मत से | बेंटली और केरोपंत के मत से | ह्विटने और बर्जेस के मत से | बापूदेव के मत से | वें. बा. केत-कर के मत से | शंकर बाल-कृष्ण दीक्षित के मत से | चंद्रशेखर सिंह सामंत का सिद्धान्त दर्पणभूमिका पृ० ५६, ५७ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| अभिजित | $\alpha$ Lyrae Aega | Aega | Aega | Aega | Aega | Aega | Aega | |
| २२ | श्रवण | $\alpha$ Aquilae अर्थात् Altair | Altair | Altair | Altair | Altair | Altair | Altair |
| २३ | धनिष्ठा | $\alpha$ Delphini | $\alpha$ Delphini | $\beta$ Delphini | $\alpha$ Delphini | $\alpha$ Delphini | $\alpha$ Delphini | $\alpha$ Delphini |
| २४ | शतभिषक | $\lambda$ aquarii | $\lambda$ aquarii | $\lambda$ Aquarii | $\lambda$ Aquarii | $\lambda$ Aquarii | $\lambda$ Aquarii | $\lambda$ Aquarii |
| २५ | पूर्वा भाद्रपद | Markab अर्थात् $\alpha$ Pegasi | Markab | Markab | Markab | Markab | Markab | $\beta$ Pegasi |
| २६ | उत्तरा भाद्र-पद | $\alpha$ Androme-dae अर्थात् Alpherat | $\gamma$ Pegasi (Algenib) $\alpha$ Andro-medae | Algenib $\alpha$ Andro-medae | $\alpha$ Andro-medae | $\alpha$ Andro-medae | $\gamma$ Pegasi (Algenib) | $\alpha$ Andro-medae |
| २७ | रेवती | $\zeta$ Piscium | $\zeta$ Piscium | $\zeta$ Piscium | $\zeta$ Piscium | $\zeta$ Piscium | $\zeta$ or $\mu$ Picium | $\eta$ Piscium |
नक्षत्रग्रहयुत्यधिकार ६३१ यूनानी अक्षर | नाम | उच्चारण | समान उच्चारण के रोमन अक्षर | हमारे आकाश चित्र में प्रयोग किये हुए अंक क α | alpha | आल्फ़ा | a | १ ख β | Beta | बीटा | b | २ ग γ | Gamma | गैमा | g | ३ घ δ | Delta | डेल्टा | d | ४ च ε | Epsilon | एप्साइलन | e short | ५ छ ζ | Zeta | ज़ीटा | z | ६ ज η | Eta | ईटा | e long | ७ झ θ | Theta | थीटा | th | ८ ट ι | Iota | आयोटा | i | ९ ठ K | Kappa | कैपा | k | १० ड λ | Lambda | लैम्डा | l | ११ ढ μ | Stet | म्यू | m | १२ त ν | Nu | न्यू | n | १३ थ ξ | xi | क्साई | x | १४ द o | omicron | आमीक्रोन | o short | १५ π | Pi | पाई | p | १६ ρ | Rho | रो | r | १७
६३२ सूर्य-सिद्धान्त
$${|c|c|c|c|c|} \hline यूनानी अक्षर & नाम & उच्चारण & \begin{matrix} समान उच्चारण का रोमन अक्षर \end{matrix} & \begin{matrix} हमारे आकाश चित्र में प्रयोग किये हुए अंक \end{matrix}
\hline \sigma & Sigma & सिग्मा & s & १८
\tau & Tau & टा & t & १९
\upsilon & upsilon & अपसाइलन & u & २०
\phi & Phi & फाई & ph & २१
र\quad\chi & chi & काई & ch & २२
ल\quad\psi & Psi & प्साई & ps & २३
\omega & omega & ओमेगा & olog & २४
\hline $$
नक्षत्रग्रहयुत्यधिकार ६३३ १२ राशियों के नाम १ । २ । ३ । ४ संस्कृत साहित्य । संस्कृत के । अंग्रेजी नाम । लैटिन नाम में प्रचलित नाम । पर्याय मेष क्रियः Ram Aries वृष ताबुरि Bull Taurus मिथुन जितुमः, जित्तमः Twins Gemini कर्क कुलीर crab cancer सिंह लेय Lion Leo कन्या पाथोन, पाथेय virgin Virgo तुला जूकः Balance Libra वृश्चिक कौर्प्यः scorpion scorpio धनु तौक्षिक Archer sagittarius मकर आलोकेर (?) capricorn capricornus कुंभ हृद्रोग Water-bearer Aquarius मीन इत्थ्य, इथुसी (?) Fishes Pisces १३
६३४ सूर्यसिद्धान्त रखे ही गये हैं परन्तु साथ ही साथ उनके साहित्य में प्रचलित नाम भी अब तक व्यवहार में आते हैं । यदि यह मालूम हो कि संस्कृत साहित्य में किसी तारे का क्या नाम प्रचलित है और अङ्गरेजी साहित्य में क्या नाम है तो तारों के पहचानने में बड़ी सुविधा होती है। इसलिए पहले यह बतला कर कि यूनानी भाषा के अक्षर और उनके नाम क्या हैं, एक सारिणी से यह भी बतलाया जायगा कि तारापुंजों के नाम संस्कृत और अङ्गरेजी तथा लेटिन और यूनानी भाषाओं में क्या है। अक्षरों की जगह हमारे आकाश चित्र में हिन्दी के अङ्क क्रमानुसार प्रयुक्त किये जायगे जैसा कि अन्तिम स्तम्भ में बतलाया गया है । संस्कृत, लैटिन और अंग्रेजी सभी नामों के एक ही अर्थ हैं परन्तु यूनानी नामों १ के अक्षरों में भी समानता पायी जाती है जिससे जान पड़ता है कि इनकी उत्पत्ति एक ही देश में हुई है। वह देश चाहे भारतवर्ष हो या यूनान अथवा कोई अन्य देश जिससे इन दोनों देशों ने लिया हो । यह बात भाषा-तत्व-विशारदों से ही स्पष्ट हो सकती है कि इस एकता का क्या कारण है। ज्योतिष के और भी शब्द ऐसे हैं जिनके संस्कृत, अरबी और यूनानी नामों में समता है । परन्तु इस विषय पर यहां तुलनात्मक विचार नहीं किया जायगा क्योंकि इसकी सामग्री इस समय दुर्लभ है । यदि सुविधा हुई तो भूमिका में यह विषय फिर उठाया जायगा । इस अध्याय में जिन नक्षत्रों की चर्चा हुई है उनकी पहचान के लिए यह आवश्यक है कि उनके चित्र दिये जायें । इसलिए और फाल्गुन मासों के आकाशचित्र २ दिये जाते हैं । इन चित्रों में तारों के यूनानी नाम नहीं दिये गये हैं इसलिए योग- तारों के पहचानने में कुछ कठिनाई पड़ सकती है परन्तु नक्षत्रों अर्थात् तारा-समूहों और उनकी स्थिति के समझने में कोई कठिनाई नहीं हो सकती । इन चित्रों में केवल १. खेद है कि यूनानी अक्षरों के टाइप के अभाव से यूनानी नाम नहीं दिये गये । २. संवत् १६७८ विक्रमीय के कातिक मास से संवत् १६७६ के भाद्रपद मास तक की मर्यादा के लिये जब वह काशी के ज्ञानमण्डल से प्रकाशित होती थी, उसके सम्पादक बाबू सम्पूर्णानन्दजी की इच्छा से दस मास के आकाशचित्र इसी लेखक द्वारा बनाये गये थे । उन्हीं से चार चित्र चुनकर दिये हैं। इनमें उस समय के मंगल, गुरु तथा अन्य प्रधान नक्षत्र समूहों के भी स्थान दिखलाये गये हैं। इनमें से जिनकी चर्चा प्राचीन संस्कृत ग्रन्थों में आयी है उनके नाम संस्कृत ग्रन्थों से ही लिये गये हैं परन्तु जिनकी चर्चा प्राचीन ग्रन्थों में नहीं है उनके नाम वही रखे गये हैं जो आजकल
नक्षत्रग्रहयुत्यधिकार ६३५ वही तारे नहीं दिये गये हैं जिनकी चर्चा इस अध्याय में आयी है वरन् आकाश के अङ्गरेजी ग्रन्थों में पाये जाते हैं अथवा इनके हिन्दी के समानार्थ-सूचना शब्द बनाये गये हैं । जैसे Cassiopea के लिए काश्यप मंडल, Cepheus के लिए सिफियस, Draco के लिए अजगर, Leporis के लिए शशक इत्यादि । आचार्य वेंकटेश बाबू केतकर ने अपने ज्योतिर्गणित के पृष्ठ ३२४ में कई प्रधान तारों के नाम प्रसिद्ध ऋषियों और देवताओं के नाम पर रखे हैं जैसे कण्व, कुवेर, रुद्र, यम, पराशर इत्यादि । परन्तु ये नाम इस चित्र में नहीं दिये गये हैं क्योंकि अभी ये किसी सभा द्वारा स्थिर नहीं किये गये हैं इसलिए पाठकों को तभी सुविधा होगी जब वही नाम दिये जायें जो संसार के साहित्य में बहुत प्रसिद्धि पा चुके हैं । इन चित्रों में आकाश के वह दृश्य दिखलाये गये हैं जो २५ अक्षांश के सब स्थानों से चित्रों में बतलाये हुए महीनों में संध्या के ८ बजे से १० बजे तक देखे जा सकते हैं। महीने का आरम्भ संक्रान्ति के प्रायः दूसरे दिन से माना गया है क्योंकि चांद्रमास के अनुसार बनाया हुआ चित्र एक महीने से अधिक काम नहीं दे सकता जबकि संक्रान्ति के हिसाब से बनाया हुआ चित्र सैकड़ों वर्ष तक काम में आ सकता है। संक्रान्ति का विचार भी आजकल तीन तरह से किया जाता है। यहाँ सूर्य सिद्धान्त की रीति से संक्रान्ति का विचार किया गया है। पाठकों की सुविधा के लिए यह बतलाना आवश्यक जान पड़ता है कि कौन संक्रान्ति अङ्गरेजी महीने की किस तारीख को पड़ती है। इन चार चित्रों से वर्ष के बारहों महीनों में कैसे काम लिया जा सकता है उसके लिए भी कुछ बातें अगले दो पृष्ठों की सारणी में दे दी जाती हैं जिसकी विधि आगे बतलायी जायगी । आगे जो तीन-तीन महीने एकसाथ दिखलाये गये हैं उसका अर्थ यह है कि उन तीन महीनों की पहली तारीख को बीचवाले महीने का आकाश-चित्र ६ठे स्तम्भ में बतलाये हुए समय पर देखा जा सकता है। अथवा यों कहिये कि मोटे अक्षरों में बतलाये हुए महीने का आकाश-चित्र इस महीने के पीछे-आगे वाले महीनों की १ली तारीख को ६ठें स्तम्भ में बतलाये हुए समय पर देखा जा सकता है। इस सारणी में केवल यह बतलाया गया है कि महीने की १ ली तारीख को और शनि ग्रहों के चित्र भी यथास्थान दिये गये थे, जो ब्लाक से हट नहीं सकते इसलिये पाठकों को यह ध्यान रखना चाहिए कि वे ग्रह अब वहां नहीं देख पड़ेंगे क्योंकि ग्रहों के स्थान बदलते रहते हैं तारों की तरह एक से नहीं रहते। इन ब्लाकों के देने में ज्ञानमंडल के संचालक बाबू शिवप्रसाद गुप्तजी ने जो उदारता दिखलाई है उसके लिए विज्ञान-परिषद और लेखक दोनों गुप्तजी के ऋणी हैं ।
६३६ सूर्य-सिद्धांत
| सौर मास | किस संक्रान्ति से आरम्भ होता है | उस दिन की अङ्ग्रेजी तारीख जिस दिन सौर मास की पहली तारीख मानी गयी है | सौर मास की १ली तारीख के मध्याह्न काल का सूर्य का विषुवांश * | नक्षत्र काल † जिस का आकाश चित्र बनाया गया है | सौरमास की १ ली तारीख को आकाश चित्र देखने का समय धूप-घड़ी के अनुसार, मध्याह्नोपरान्त | सौर मास की १ ली तारीख का काल-समीकरण | |||
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| घण्टा | मिनट | घण्टा | मिनट | घण्टा | मिनट | ||||
| वैशाख | मेष | १४ अप्रैल | १ | २६ | १३ | ३० | ११ | ५६ | |
| ज्येष्ठ | वृष | १५ मई | ३ | २७ | १० | १ | |||
| आषाढ़ | मिथुन | १५ जून | ५ | ३३ | ७ | ५६ |
* मध्याह्नकाल में सूर्य का विषुवांश होता है वही मध्याह्न का नक्षत्रकाल भी होता है (देखो पृष्ठ २७५ पाद टिप्पणी)। यह १६८५ विक्रमीय का प्रयाग के मध्याह्नकाल का विषुवांश है। यह प्रतिवर्ष एक-एक मिनट कम होता जाता है परन्तु ४ वर्ष के बाद प्रायः यही फिर हो जाता है। परन्तु यह अन्तर नगण्य है।
† नाक्षत्र काल नाक्षत्र-घटिका-यन्त्र से जाना जाता है और जिस समय बसन्त-सम्पात-बिन्दु यामोत्तरवृत्त पर जाता है उस समय नाक्षत्र दिन का आरम्भ होता है (देखो पृष्ठ ३१७-३६)'
नक्षत्रग्रहयुधिकार ६३७ $ श्रावण & कर्क & १७ जुलाई & ७ & ४५ & १६ & ३० & ११ & ४३ भाद्रपद & सिंह & १७ अगस्त & ८ & ४६ & & & ८ & ४२ आश्विन & कन्या & १७ सितम्बर & ११ & ३८ & & & ७ & ५१ $ $ कार्तिक & तुला & १८ अक्टूबर & १३ & ३१ & & & ११ & ५७ मार्गशीर्ष & वृश्चिक & १७ नवम्बर & १५ & २६ & १ & ३० & ८ & ५६ पौष & धनु & १६ दिसम्बर & १७ & ३४ & & & ७ & ५५ $ $ माघ & मकर & १४ जनवरी & १६ & ४२ & & & ११ & ४६ फाल्गुन & कुम्भ & १३ फरवरी & २१ & ४६ & ७ & ३० & ८ & ४३ चैत्र & मीन & १५ मार्च & २३ & ३६ & & & ७ & ५० $
६३८ सूर्य-सिद्धान्त कौन आकाश चित्र किस समय देखना चाहिये। यदि महीने की किसी और तारीख को आकाश-चित्र से काम लेना हो तो यह ध्यान में रखना चाहिये कि जो दृश्य महीने की १ ली तारीख को १० बजे देख पड़ता है वही दृश्य २री तारीख को दस बजने से ४ मिनट पहले, ३री तारीख को दस बजने से ४ x २ = ८ मिनट पहले, एक सप्ताह के बाद अर्थात् ८वीं तारीख को ४ x ७ = २८ मिनट पहले और १५ दिन के बाद १६ तारीख को १५ x ४ = ६० मिनट या १ घंटा पहले अर्थात् ९ बजे देख पड़ेगा। इसका कारण यह है कि पृथ्वी दिन रात भर में १ अंश सूर्य की परिक्रमा करने में आगे बढ़ती है जिससे सूर्य तारों के मध्य पूरब की ओर एक अंश खसकता हुआ देख पड़ता है। इसलिये सूर्य को यामोत्तर वृत्त पर आने में प्रतिदिन ४ मिनट की देर हो जाती है अथवा सूर्य का विषुवांश प्रति दिन प्रायः ४ मिनट बढ़ता जाता है। परन्तु आकाश-चित्र जिस नाक्षत्र-काल का बनाया गया है वह स्थिर है इसलिये मध्याह्न से जितने समय पर आकाश किसी दिन देख पड़ता है उससे ४ मिनट पहले ही दूसरे दिन देख पड़ता है (देखो पृष्ठ ४६३-४६६) । सीधा नियम यह है कि मध्याह्न के सूर्य के विषुवांश से जितना पहले या पीछे आकाश चित्र का नाक्षत्र-काल है मध्याह्न से उतना ही पहले या पीछे आकाश-चित्र में बतलाये गये दृश्य आकाश में देख पड़ते हैं। जैसे वैशाख की १ ली तारीख को मध्याह्नकालीन सूर्य का विषुवांश १ घण्टा २६ मिनट के लगभग होता है और ज्येष्ठ के आकाश चित्र का नाक्षत्रकाल १० घंटा ३० मिनट है अर्थात् मध्याह्नकालीन विषुवांश से १२ घण्टा १ मिनट पीछे है इसलिये वैशाख की १ ली तारीख को ज्येष्ठ का आकाश चित्र रात के १२ बजकर १ मिनट पर देख पड़ेगा। परन्तु ६ठें स्तम्भ में ११ बज कर ५६ मिनट बतलाया गया है इसका कारण यह है। कि १२ घंटा १ मिनट नाक्षत्र-काल में है और ११ घंटा ५६ मिनट धूपघड़ी के अनुसार सावन-काल में है। क्योंकि यह बतलाया जा चुका है कि सावन दिन नाक्षत्र दिन से ४ मिनट के लगभग बड़ा होता है (देखो पृष्ठ ३३७-३६) इसलिये नाक्षत्र-काल का ६ घण्टा सावन-काल के ५ घण्टा ५६ मिनट के समान होता है। इस नियम के अनुसार यदि आप माघ महीने की १ली तारीख को एक ही रात में आकाश के कुल तारों को देखना चाहें तो सहज ही देख सकते हैं। इस तारीख को बम्बई और जगन्नाथ पुरी को मिलाने वाली रेखा के उत्तर के प्रान्तों में अर्थात् सारे उत्तर भारत में सूर्य साढ़े पांच बजे के पहले अस्त होता है। इसलिये ६ बजे संध्या के समय आकाश के तारे अच्छी तरह दिखाई पड़ने लगते हैं। इस तारीख को मध्याह्नकालीन सूर्य का विषुवांश १६ घण्टा ४२ मिनट होता है इसलिये मध्याह्न से
नक्षत्रग्रहयुत्यधिकार ६३६
६ घण्टा पीछे का नाक्षत्र काल हुआ १८ घण्टा ४२ मिनट + ६ घण्टा = २४ घण्टा ४२ मिनट अथवा १ घण्टा ४२ मिनट जो १ घण्टा ३० मिनट के लगभग है। इस लिये माघ की १ली तारीख को १ घण्टा ३० मिनट वाले नाक्षत्रकाल का आकाश चित्र अर्थात् मार्गशीर्ष का आकाश चित्र ६ बजे संध्या के समय देखा जा सकता है। इसका अर्थ यह हुआ कि आप श्रवण से लेकर पुनर्वसु तक के १३ नक्षत्रों को अथवा धनिष्ठा से लेकर पुनर्वसु तक के १२ नक्षत्रों को सहज ही पहचान सकते हैं। यदि इससे ६ घंटा पीछे १२ बजे रात को आकाश देखें तो उस समय का नाक्षत्रकाल ७ घंटा ४२ मिनट के लगभग होगा जब कि फाल्गुन मास का आकाश-चित्र आपके काम में आ सकता है क्योंकि फाल्गुन मास का आकाश चित्र उस समय का है जब नाक्षत्र काल ७ घंटा ३० मिनट होता है। इस चित्र से आपको अश्विनी से लेकर हस्त नक्षत्र तक की पहचान सहज ही हो सकती है। इसी प्रकार यदि आप इसी रात को ६ बजे प्रातःकाल के लगभग अथवा १०, १२ मिनट और पहले ही आकाश देखें तो ज्येष्ठ का आकाश चित्र काम दे सकता है क्योंकि ६ बजे प्रातःकाल का नाक्षत्रकाल १३ घंटा ४० मिनट के लगभग होगा और इससे १२, १३ मिनट पहले का आकाश-चित्र १३ घंटा ३० मिनट के नाक्षत्रकाल के समय का होगा। इस आकाश-चित्र से आप पुनर्वसु से लेकर मूल या पूर्वाषाढ़ तक के तारे देख सकते हैं। इसी प्रकार यह भी हिसाब लगाया जा सकता है कि किसी और रात को किस समय किस मास के आकाश चित्र काम दे सकते हैं। चित्र का साधारण वर्णन—चित्र में जो गोल रेखा खींची हुई है वह २५ अक्षांश का क्षितिज है इसलिए प्रयाग या काशी के क्षितिज से प्रायः मिलता है। केन्द्र में धन का एक चिह्न इस प्रकार + है। इससे आकाश का वह बिन्दु प्रकट होता है जो २५ अक्षांश पर सिर के ठीक ऊपर होता है। इसे खस्वस्तिक या खमध्य कहते हैं। गोल रेखा के पास उत्तर, दक्षिण, पूरब, पच्छिम तथा इनके बीच की दिशाएं दिखलाई गयी हैं। उत्तर से दक्षिण तक जो सीधी रेखा देख पड़ती है वह यामोत्तर वृत्त है। मध्याह्नकाल में सूर्य इसी रेखा पर रहता है। पूरब से पच्छिम तक जो टेढ़ी रेखा देख पड़ती है वह विषुवद्वृत्त है। वसंत-सम्पात और शरद्-संपात के दिन सूर्य इसी पर देख पड़ता है और ठीक पूर्व में उदय तथा ठीक पच्छिम में अस्त होता है। विषुवद्वृत्त को काटती हुई एक दूसरी रेखा भी है जिसे क्रान्तिवृत्त कहते हैं। सूर्य इसी पर प्रतिदिन चलता हुआ देख पड़ता है। यथार्थ में यह हमारी पृथ्वी का मार्ग है जिस पर चलती हुई यह वर्ष भर में सूर्य की एक परिक्रमा कर लेती है। यह मार्ग बड़े महत्व का है। चंद्रमा और ग्रह इसी के आसपास आकाश में चक्कर लगाते हुए
६४० सूर्य-सिद्धान्त देख पड़ते हैं। क्रान्तिवृत्त २७ समान भागों में बाँटा गया है जिन्हें नक्षत्र कहते हैं । मार्गशीर्ष के आकाश चित्र में नक्षत्रों के नाम भी दे दिये गये हैं परन्तु अन्य चित्रों में नक्षत्रों की केवल क्रम संख्या दी गयी है। जैसे क्रान्तिवृत्त पर जहाँ १ लिखा है वहाँ १ ला नक्षत्र अश्विनी का अन्त होता है, जहाँ ५ लिखा है वहाँ ५वाँ नक्षत्र मृगशिरा समाप्त होता है, इत्यादि । क्रान्तिवृत्त पर जहाँ छोटे से वृत्त के भीतर चिह्न बना हुआ है वहीं सूर्य-सिद्धान्त के अनुसार आजकल रेवती नक्षत्र का अन्त और अश्विनी नक्षत्र का आरम्भ समझा जाता है। क्रान्तिवृत्त, विषुवद्वृत्त और यामोत्तरवृत्त की रेखाएं आकाश में देख नहीं पड़ती हैं। इनकी कल्पना ज्योतिषियों ने सुविधा के लिए की है। वैसे तो निर्मल आकाश में जब अन्धेरी रात हो अनगिनत तारे देख पड़ते हैं परन्तु इन चित्रों में केवल वही दिखलाये गये हैं जो चांदनी रात में भी देखे जा सकते हैं। आकार का परिचय कराने के लिये कुछ ऐसे तारे भी ले लिये गये हैं जो पूर्णमासी के ३, ४ दिन आगे-पीछे चन्द्रमा का अधिक प्रकाश होने के कारण नहीं देख पड़ते। आकाश-गङ्गा भी जिनमें नन्हें-नन्हें असंख्य तारे एक दूसरे से मिले हुए देख पड़ते हैं इन चित्रों में नहीं दिखलायी गयी है। अंधेरी रात में यह आकाश-गंगा भी उत्तर की ओर प्रजापति, परशु, कश्यप, राजहंस और श्रवण मण्डलों को नहलाती हुई वृश्चिक, धनु राशियों को सींचती हुई प्रसिद्ध अग्रहायण और लुब्धक मण्डल को पुनर्वसु और प्रश्वा से अलग करती हुई उत्तर से दक्खिन तक आकाश को घेरे हुए है। जिस समय का चित्र बनाया गया है उससे कुछ पहले देखने पर पूर्व क्षितिज के पास वाले तारे उदय न होने के कारण नहीं देख पड़ेंगे और पच्छिम क्षितिज के पास वाले तारे कुछ ऊपर देख पड़ेंगे और यामोत्तर वृत्त के पास वाले तारे कुछ पूरव की ओर हटे हुए देख पड़ेंगे। परन्तु यदि उपर्युक्त समय से कुछ पीछे आकाश देखा जाय तो पूर्व क्षितिज के तारे कुछ ऊपर उठे हुए देख पड़ेंगे और क्षितिज के पास कुछ नये तारे भी उदय हो चुके रहेंगे; पच्छिम क्षितिज में कुछ तारे अस्त हुए रहेंगे और यामोत्तर वृत्त के पास वाले तारे पच्छिम की ओर ढल चुके रहेंगे । २५ अक्षांश के जो स्थान उत्तर हैं वहाँ उत्तर के कुछ और तारे देख पड़ेंगे । परन्तु जो स्थान दक्षिण हैं वहाँ दक्खिन के कुछ और तारे देख पड़ेंगे और तारों की ऊँचाई-नीचाई में भी कुछ अन्तर देख पड़ेगा परन्तु इससे कोई कठिनाई नहीं हो सकती । चित्र देखने की रीति—जिधर मुँह करके आकाश को देखना हो चित्र में अंकित उसी दिशा को नीचे करके चित्र को खड़ा कर लीजिए । सबसे नीचे वह तारा है जो क्षितिज के पास देख पड़ेगा । नीचे से केन्द्र तक जो जो तारे चित्र में
नक्षत्रग्रहयुत्यधिकार ६४१
दिखाये गये हैं क्षितिज से खस्वस्तिक तक वही तारे उसी क्रम से देख पड़ेंगे। ज्येष्ठ मास का आकाश चित्र— सिर के ऊपर—स्वाती खस्वस्तिक से कुछ पूरब और दक्खिन है। पौन घण्टे में यह यामोत्तर वृत्त पर आ जायगा और उस समय खस्वस्तिक से ५ अंश दक्खिन रहेगा। उत्तर—सप्तर्षि के पहले ५ तारे यामोत्तर वृत्त से पच्छिम हो गये हैं। छठा तारा वशिष्ठ प्रायः यामोत्तर वृत्त पर है। इसी के पास इसका युगल तारा अरुंधती भी ध्यान से देखने पर देख पड़ेगा। सातवाँ तारा मरीचि कुछ पूरब है और १५ मिनट में यामोत्तर वृत्त पर आ जायगा। सप्तर्षि के नीचे ४ मंद तारे पूरब से पच्छिम की ओर प्रायः एक रेखा में फैले हुए देख पड़ते हैं। यह अजगर की पूँछ की तरफ के तारे हैं, जिसका मुँह इस समय उत्तर-पूर्व दिशा में प्रायः उसी ऊँचाई पर देख पड़ता है जिस ऊँचाई पर लघु- सप्तर्षि के तारे उत्तर दिशा में अजगर की लपेट के नीचे देख पड़ते हैं। उत्तर से कुछ पूर्व की ओर सिफियस के तीन तारे क्षितिज के पास ही देख पड़ते हैं। उत्तर-पूरब—इस दिशा में क्षितिज के पास ही हंस मण्डल के तारे देख पड़ते हैं। यहाँ से लेकर पूरब-दक्खिन के कोने तक एक चमकती हुई सड़क सी दिखाई पड़ती है। इसी को आकाश-गंगा कहते हैं। इसमें अनगिनत तारे आरम्भिक दशा में हैं। हंस के ऊपर बहुत ही चमकीला तारा अभिजित है। प्रथम श्रेणी का यह तीसरा तारा है। इसी के बगल में पूरब की ओर अजगर का मुख है। पूरब—क्षितिज के पास ही कुछ उत्तर की ओर हटकर श्रवण नक्षत्र के तीन तारे हैं जिसके बीच का तारा बहुत चमकीला और प्रथम श्रेणी का है। श्रवण के ऊपर खस्वस्तिक और क्षितिज के बीचोबीच हरिकुलेश पुंज है जिसके सभी तारे मन्द ज्योति के हैं। हरिकुलेश पुंज के कुछ ही ऊपर ५, ७ तारे मुकुट के आकार के देख पड़ते हैं। इसके तारे भी मन्द ज्योति के हैं। इसके और ऊपर खस्वस्तिक के पास स्वाती पुंज है जिसका स्वाती नामक तारा प्रथम श्रेणी का चमकीला तारा है रङ्ग में कुछ-कुछ लाल है। पूरब-दक्षिण—इस समय इस दिशा में वृश्चिक राशि के तारे अपनी अपूर्व छटा से आकाश को शोभायमान कर रहे हैं। ऐसा जान पड़ता है मानों एक बड़ा भारी बिच्छू आकाश में लटक रहा है जिसका मुख अनुराधा नक्षत्र के तीन तारों से बना हुआ है और पेट में ज्येष्ठा नक्षत्र के तीन तारे लटक रहे हैं। बीच वाला तारा भी प्रथम श्रेणी का और कुछ-कुछ लाल है। बिच्छू का डंक दक्खिन की ओर फैला हुआ
६४२ सूर्य-सिद्धान्त है जिसमें बहुत से छोटे-छोटे तारे चमक रहे हैं। क्षितिज के पास ही मूल नक्षत्र के तारे भी पास ही पास देख पड़ते हैं। कुछ पूरब की ओर परन्तु क्षितिज के पास ही पूर्वाषाढ़ नक्षत्र के तारे देख पड़ते हैं। मूल और पूर्वाषाढ़ के तारे धनुराशि में हैं जो पूरा उदय नहीं हुआ है। पूर्वाषाढ़ के ऊपर चित्र में मङ्गल ग्रह के दो स्थान दिखलाये गये हैं परन्तु अब वह यहाँ नहीं देख पड़ेगा। अनुराधा के ऊपर विशाखा नक्षत्र के दो तारे दहने बायें फैले हुए देख पड़ते हैं। ये बहुत चमकीले नहीं हैं परन्तु बड़े महत्व के हैं। दक्षिण—इस दिशा में क्षितिज के पास ही सेन्टोरी पुंज के दो तीन तारे प्रथम श्रेणी के हैं। ये इतने दक्खिन हैं कि हम काशी, प्रयाग निवासियों को एक घण्टे से अधिक नहीं दिखाई पड़ते। लखनऊ वालों को इससे भी कम समय तक देख पड़ते हैं। अलीगढ़, बरेली वालों को कठिनाई से देख पड़ेंगे और इससे भी उत्तर रहने वालों को नहीं देख पड़ेंगे। कुछ पच्छिम की ओर क्षितिज के पास ही दूसरी श्रेणी के चार तारे पास ही पास देख पड़ते हैं। यह भी एक घण्टे से अधिक नहीं देख पड़ते। खस्वस्तिक और दक्षिण क्षितिज के मध्य से कुछ और ऊपर प्रथम श्रेणी का चित्रा तारा है जो अपनी स्थिति के कारण बड़े महत्व का है। यह प्रायः क्रान्तिवृत्त पर है। आज से कोई सवा सोलह सौ वर्ष पहले शरद सम्पात इसी तारे के पास होता था अर्थात् जब सूर्य यहाँ पहुँचता था तब वह दक्षिण गोल में जाता था। आजकल शरद सम्पात इस तारे से २२ अंश ५० कला के लगभग पच्छिम हो गया है और उस जगह है जहाँ १२ वें नक्षत्र के पास श अक्षर लिखा हुआ है। महाराष्ट्र प्रान्त में इसी तारे के सम्बन्ध में बड़ा वाद-विवाद चल रहा है। जो लोग कहते हैं कि अश्विनी नक्षत्र अथवा मेष राशि का आरम्भ उस बिन्दु से माना जाना चाहिए जिससे चित्रा तारा ठीक १८० अंश दूर है वे लोग चैत्र पक्ष के कहलाते हैं। इस पक्ष के समर्थक आचार्य वेंकटेश बापू जी केतकर तथा अन्यान्य सज्जन हैं। इनके विरुद्ध एक दूसरा पक्ष है जिसके समर्थक लोकमान्य तिलक भी थे। इनका मत है कि अश्विनी का आरम्भ स्थान वह बिन्दु है जिससे चित्रा तारा १८४, अंश के लगभग दूर है। यह विन्दु रेवती नक्षत्र में है (देखो भाद्रपद मास का चित्र) । इसीलिए इस पक्ष को रैवत पक्ष कहते हैं। चित्रा से पच्छिम कुछ नीचे की ओर हस्त नक्षत्र के ५ तारे हाथ की अंगुलियों की तरह फैले हुए देख पड़ते हैं। हस्त के ऊपर कन्या राशि के कई मन्द-मन्द तारे देख पड़ते हैं। नीचे की ओर के दो-तीन तारे जो प्रायः सीधी रेखा में हैं क्रान्तिवृत्त के पास ही प्रायः उसी के समानान्तर देख पड़ते हैं। इस रेखा के पच्छिम सिरे पर
नक्षत्रग्रहयुत्यधिकार ६४३ जो तारा है उसी के पास आजकल शरद सम्पात बिन्दु है, इसलिये जब सूर्य यहां आता है तब वह दक्षिण गोल में जाता है । इसी से चित्रा तारा २३ अंश के लगभग दूर है। दक्षिण पच्छिम—इस दिशा के आकाश में कोई महत्व के तारे नहीं हैं । बहुत मन्द-मन्द तारों की एक वक्र रेखा चित्रा और हस्त नक्षत्रों के नीचे से होती हुई पच्छिम दिशा तक फैली हुई है जिसके पच्छिमी सिरे पर एक तारा कुछ चमकीला है । पच्छिम—क्षितिज के पास प्रश्वा नामक तारा देख पड़ता है । इससे उत्तर की ओर कई मन्द-मन्द तारे एक वक्र रेखा में देख पड़ते हैं जिसके उत्तरी छोर पर दो प्रथम श्रेणी के तारे हैं । यही पुनर्वसु नक्षत्र के दो तारे हैं । प्रश्वा से पुनर्वसु तक मन्द-मन्द तारों की जो वक्र रेखा बन जाती है वह मिथुन राशि है । प्रश्वा के ऊपर बहुत मन्द-मन्द तारों का एक वक्र है जिसे कर्क राशि कहते हैं। यह ठीक पच्छिम की ओर देख पड़ता है । इससे ऊपर कुछ ही पच्छिम की ओर हटकर खस्वस्तिक और क्षितिज के बीचोबीच सिंह राशि के तारे अपनी अपूर्व छटा दिखा रहे हैं। सिंह की गर्दन नीचे की ओर लटकी हुई है जिसमें ६, ७ तारे सहज ही देखे जा सकते हैं जिनका आकार हँसिया की तरह जान पड़ता है। दक्खिन वाला अथवा बायीं ओर वाला तारा कुछ कुछ लाल है और प्रथम श्रेणी का है। इसी को मघा का योग तारा या केवल मघा तारा कहते हैं। यह प्रायः क्रान्तिवृत्त पर है इसलिए बड़े महत्व का है । इससे दाहिने उत्तर की ओर एक और तारा है जो चमक में मघा से कुछ कम है परन्तु इतना चमकीला अवश्य है कि पूर्णमासी की रात में भी देखा जा सकता है ! मघा के ऊपर दो तारे दाहिने बायें चमकते हुए देख पड़ते हैं । ये पूर्वा फाल्गुनी नक्षत्र के तारे हैं और सिंहराशि की कमर में हैं। सिंह राशि की पूंछ में पूर्वाफाल्गुनी के कुछ और ऊपर उत्तराफाल्गुनी नक्षत्र का अकेला तारा है । इस प्रकार यह प्रकट है कि पच्छिम दिशा में दो राशियों के तारे अपनी चमक से सहज ही लोगों को आकर्षित कर सकते हैं; केवल कर्कराशि के तारों को मिथुन और सिंहराशियों के बीच कुछ दक्खिन की ओर ध्यान से देखना पड़ता है । उत्तर पच्छिम — इस दिशा में क्षितिज के पास प्रजापति मण्डल के केवल प्रजापति नाम का तारा देख पड़ता है । ब्रह्महृदय तारा कुछ पहले अस्त हो गया है । इसके सिवा क्षितिज के पास कोई चमकीला तारा अथवा तारासमूह नहीं है । बहुत ऊपर पहले बतलाये हुए सप्तर्षिमण्डल के तारे देख पड़ते हैं । सप्तर्षिमण्डल के दो ध्रुव- सूचक तारों क्रतु और पुलहकी रेखा में दक्खिन की ओर एक तारा है। इससे और दक्खिन परन्तु पूर्वाफाल्गुनी के उत्तर दोनों के बीच में बहुत मन्द-मन्द तारे सर्पाकार
६४४ सूर्य-सिद्धान्त देख पड़ते हैं और पुराणों में प्रसिद्ध नहुष राजा की याद दिलाते हैं जो अगस्त ऋषि के शाप से सर्प बन गया था । इस प्रकार ज्येष्ठमास के आकाश चित्र का वर्णन पूरा हुआ । भाद्रपद मास का आकाश चित्र सिर के ऊपर--इस समय तीन प्रसिद्ध नक्षत्रमण्डल खस्वस्तिक के आस- पास देख पड़ते हैं । श्रवणमण्डल के तीन तारे प्रायः यामोत्तरवृत्त पर खस्वस्तिक से कुछ दखिन हटे हुए देख पड़ते हैं । इसी के पास धनिष्ठा नक्षत्र के चार तारे बहुत पास-पास परन्तु मन्द ज्योति के हैं । यह नक्षत्र ऐतिहासिक दृष्टि से बड़े महत्व का है । वेदांग-ज्योतिष-काल में जब सूर्य यहाँ पहुँचता था तभी उत्तरायण का आरम्भ होता था । खस्वस्तिक के पास ही एक मन्द तारा है जो हंस की पूंछ का अन्तिम तारा है । इससे उत्तर पूर्व दिशा में एक ही रेखा में दो और तारे हैं जो इससे अधिक चमकीले हैं परन्तु उत्तर वाला इनमें सबसे अधिक चमकीला है । बीच वाले तारे के अगल-बगल पहली रेखा से समकोण बनाते हुए प्रायः एक ही रेखा में दो-तीन तारे और देख पड़ते हैं जो हंस के पंख की तरह जान पड़ते हैं। यह हंस आकाशगंगा में पंख फैलाये तैरता हुआ जान पड़ता है । हंस के पच्छिम अभिजित नक्षत्र है जिसका सबसे चमकीला तारा भी अभिजित नाम से प्रसिद्ध है । यह आकाशगङ्गा से बाहर पच्छिम की ओर है । चमक में इस तारे का स्थान तीसरा है । आकाशगङ्गा—यह चित्र में नहीं दिखलाई गई है परन्तु इस समय इसका दृश्य बहुत ही मनोरम है । इस समय यह उत्तर-पूर्व क्षितिज से दक्षिण-पच्छिम क्षितिज तक फैली हुई है। उत्तर-पूर्व दिशा में इस समय परशु या पारसीक मण्डल उदय हो रहा है। वहीं से आकाशगङ्गा का भी आरम्भ देख पड़ता है जो राह में काश्यप मण्डल को नहलाती हुई सिफियस के बगल से होती हुई हंस को अच्छी तरह शराबोर कर देती है । हंस के उत्तर वाले तारे से ही इसकी दो शाखायें हो जाती हैं जो प्रायः समानान्तर दिशा में आगे बढ़ती हुई दक्षिणपच्छिम क्षितिज के पास फिर मिलती हुई जान पड़ती हैं । पूर्ववाली शाखा श्रवण नक्षत्र को परिप्लावित करती हुई धनु- राशि के मूल और पूर्वाषाढ़ नक्षत्रों को लीन करती हुई क्षितिज में गुप्त हो जाती है । पच्छिमवाली शाखा में चमकीले तारे बहुत कम हैं । दक्षिण-पच्छिम क्षितिज के पास वृश्चिक के डंक के तारों को डुबाती हुई यह भी गुप्त हो जाती है । ज्येष्ठा नक्षत्र इस शाखा के पच्छिमी तट पर देख पड़ता है ।
नक्षत्रग्रहयुत्यधिकार ६४५ उत्तर—लघु सप्तर्षि के तारे ध्रुव से पच्छिम की ओर फैले हुए हैं। लघु सप्तर्षि के कुछ और पच्छिम अजगर लटका हुआ देख पड़ता है जिसके मुख के चार तारे अभिजित के पास तक फैले हुए देख पड़ते हैं। अजगर की पूंछ के पास सप्तर्षि मण्डल के ध्रुव-सूचक तारे उत्तर और उत्तर-पच्छिम दिशाओं के बीच क्षितिज के पास ही देख पड़ते हैं। इस सप्तर्षि मण्डल के अन्य तारे उत्तर-पच्छिम दिशा में देख पड़ते हैं। ध्रुवतारा के पूरब कुछ ऊपर की ओर सिफियस के ४ मंद तारे हैं जिसके और पूरब काश्यप मण्डल के तारे अंग्रेजी के डब्लू (W) अक्षर का आधार बनाते हुए देख पड़ते हैं। काश्यप मण्डल से नीचे उत्तर-पूर्व दिशा में परशु या पारसीक मण्डल के तारे क्षितिज के पास ही हैं। पूर्व—पूर्वं और उत्तर-पूर्व दिशाओं के बीच क्षितिज के पास ही अश्विनी नक्षत्र के तीन तारे उदय होते हुए देख पड़ते हैं। इसके ऊपर अंतरमदा (Andro- meda) का वक्र देख पड़ता है जिसका आरम्भ पारसीक मण्डल के पास से होता है। इस वक्र पर पूर्वाभाद्रपद और उत्तरभाद्रपद नक्षत्रों के उत्तरवाले तारे हैं। इन दो नक्षत्रों के दो-दो तारे मिलकर एक वर्गाकार बनाते हैं जिसे भाद्रपदावर्ग अथवा (square of Pegasus) कहते हैं। वर्ग के नीचे वाले दो तारे उत्तराभाद्रपद नक्षत्र में हैं और ऊपर वाले तारे पूर्वाभाद्रपद नक्षत्र में हैं। उत्तराभाद्रपद के तारों की रेखा की सीध में दक्खिन की ओर बढ़ने पर प्रायः उतनी ही दूरी पर जितनी दूरी पर ये दो तारे आपस में हैं वसंत-संपात विन्दु है जहाँ क्रान्तिवृत्त और विषुवद्वृत्त एक दूसरे को काटते हुए जान पड़ते हैं। जब सूर्य यहाँ देख पड़ता है तभी वसंत ऋतु का आरम्भ होता है और सूर्य उत्तर गोल में आता है। इसी दिन दिन रात समान होते हैं और इसी समय से दिन बड़ा और रात छोटी होने लगती है। पूर्व-दक्षिण - इस दिशा में चमकीले तारे बहुत कम हैं। ज्येष्ठ के महीने में इस दिशा में जितने तारे थे वे सब इस महीने में दक्षिण-पच्छिम दिशा में हो गये हैं। क्षितिज के पास एक प्रथम-श्रेणी का तारा (Fomalhaut) अवश्य देख पड़ता है जिसे हिन्दी में कुम्भज कहना उचित प्रतीत होता है यद्यपि कुम्भज का पर्याय अगस्त्य तारा इससे बहुत भिन्न है। इसका नाम कुम्भज मैंने दो कारणों से रखा है। एक कारण तो यह है कि यह कुम्भ राशि के पास है, दूसरा कारण यह है कि यह ७,८ बजे संध्या के समय प्रायः आश्विन के महीने में दिखाई देने लगता है जब वर्षा ऋतु का अन्त होता है। जबकि अगस्त्य नामक तारे का उदय वर्षा ऋतु के ठीक मध्य में होता है और प्रातःकाल केवल थोड़ी देर तक देख पड़ता है। कुम्भज से कुछ
६४६ सूर्य-सिद्धान्त और दक्षिण की ओर तीन तारे समकोण त्रिभुज के तीन कोण विन्दु बनाते हुए देख पड़ते हैं। इनका नाम सारस रखा गया है क्योंकि अंग्रेजी में इन्हें Crane कहते हैं। कुम्भज के ऊपर कुछ पूरब की ओर हटे हुए कुम्भराशि के मन्द मन्द तारे हैं। सारस के ऊपर और श्रवण नक्षत्र के नीचे दोनों के बीच में मकरराशि के मन्द तारे हैं। दक्षिण—इस दिशा में इस समय क्षितिज के पास कोई चमकीले तारे नहीं हैं। श्रवण नक्षत्र बहुत ऊपर खस्वस्तिक के पास देख पड़ता है। दक्षिण-पच्छिम—जैसे ज्येष्ठ के महीने में दक्षिण-पूर्व दिशा वृश्चिक और धनु राशियों के तारों से शोभायमान होती है इसी तरह इस महीने में दक्षिण-पच्छिम दिशा इन्हीं दो राशियों के तारों से जगमगा रही है। यहाँ विशेषता यह है कि इस समय धनुराशि के सभी तारे, तथा पूर्वाषाढ़ और उत्तराषाढ़ नक्षत्रों के भी तारे दिखाई पड़ रहे हैं। बिच्छू के और पच्छिम क्षितिज के पास विशाखा नक्षत्र के तारे भी दिखाई देते हैं। पच्छिम—इस दिशा में इस समय कोई तारे विशेष महत्व के नहीं हैं। विशाखा के तारे कुछ दक्खिन हट कर हैं। स्वाती का तारा कुछ उत्तर की ओर हटा हुआ है परन्तु यह कहा जा सकता है कि प्रायः इसी दिशा में स्वाती का तारा है। स्वाती मण्डल के ऊपर मुकुट और मुकुट के ऊपर हरिकुलेश मण्डल के मन्द मन्द तारे हैं जिनकी चर्चा ज्येष्ठ मास के आकाश चित्र के पूरब दिशा के वर्णन में अच्छी तरह की जा चुकी है। मार्गशीर्ष मास का आकाश चित्र इस मास में आकाश बहुत स्वच्छ रहता है। वैशाख, जेठ महीनों की धूल और सावन भादों के बादल कहीं देख नहीं पड़ते और न माघ, फागुन के कुहरा से ही दृष्टि को बाधा पहुँचती है। इसलिए इस महीने के आकाश-चित्र से ज्ञान और मनो- रंजन दोनों होते हैं। इस महीने के आकाश में पूरब दिशा में बहुत से नये तारे और तारा समूह देख पड़ते हैं जिनकी चर्चा प्राचीन साहित्य में भी अनेक स्थलों पर की गयी है। उत्तर—क्षितिज के पास लघु सप्तर्षि के तारे लटके हुए देख पड़ते हैं। इस समय इनमें ध्रुव तारा सबसे ऊपर है। लघु सप्तर्षि के ऊपर सिफियस के तीन मन्द तारे पच्छिम की ओर फैले हुए देख पड़ते हैं। क्षितिज से जितने ऊपर ध्रुव तारा है, ध्रुवतारा से उतने ही ऊपर काश्यप मण्डल अंग्रेजी के एम् (M) अक्षर के आकार का देख पड़ता है। इसके चार बड़े तारे यामोत्तर वृत्त को लांघकर पच्छिम की ओर
नक्षत्रग्रहयुत्यधिकार ६४७ चले गये हैं, केवल एक तारा यामोत्तरवृत्त से कुछ ही पूरब है । काश्यप मण्डल के ऊपर अन्तरमदा का वक्र है जिसका केवल एक तारा अब यामोत्तर-वृत्त से पूरब है और सब पच्छिम की ओर चले गये हैं । सिर के ऊपर—अश्विनी नक्षत्र बिलकुल सिर पर देख पड़ता है। उत्तर पूरब—इस दिशा में कुछ पूरब की ओर और हटकर पुनर्वसु के दो तारे उदय हो चुके हैं । इनके ऊपर ठीक उत्तर-पूर्व दिशा में प्रजापति मण्डल चमक रहा है जिससे पाँच मुख्य तारे पंचभुज क्षेत्र बनाते हुए जान पड़ते हैं । इस मण्डल के उत्तर वाले दो तारे बहुत तेजवान हैं और नीचे ऊपर देख पड़ते हैं । नीचे वाले तारे प्रजापति और ऊपर वाले को ब्रह्महृदय कहते हैं। चमक में इसका स्थान चौथा है । आकाश में सबसे चमकीला तारा लुब्धक है जो इस समय पूर्व दिशा से कुछ दखिन है और क्षितिज के पास ही देख पड़ता है । दूसरा तारा अगस्त्य है जो अभी क्षितिज के ऊपर नहीं आया है । तीसरा तारा अभिजित है जो उत्तर-पच्छिम क्षितिज के पास देख पड़ता है और चौथा तारा ब्रह्महृदय है । ब्रह्महृदय के सम्मुख पंचभुज क्षेत्र के दखिन कोने पर अग्नि नामक तारा है । प्रजापति मण्डल के ऊपर पारसीक मण्डल या परशुमण्डल है जिसके दक्षिण सिरे पर कृत्तिका नक्षत्र के ६ तारे पास ही पास देख पड़ते हैं । पारसीक मण्डल के ऊपर प्रायः सिर पर अश्विनी नक्षत्र के तीन तारे हैं जिनमें दो बड़े हैं। पूर्व —इस दिशा में प्रश्वा नामक प्रथम श्रेणी का तारा उदय हो चुका है परन्तु क्षितिज के बिल्कुल पास है । इससे कुछ दक्षिण हटकर क्षितिज के पास ही लुब्धक अपनी दिव्य ज्योति से चमक रहा है । लुब्धक और प्रश्वा के ऊपर प्रसिद्ध आग्रहायण मण्डल (Orion) है जो अपनी दिव्य ज्योति, आकार और प्रसिद्धि के कारण अत्यन्त प्राचीन काल से महत्वपूर्ण समझा जाता है। लोकमान्य तिलक ने इसी के सूक्ष्म विचार से अपने प्रसिद्ध ग्रन्थ ओरायन (Orion) में सिद्ध किया है कि वेद के जिस मंत्र में इसकी चर्चा की गयी है वह आज से कम से कम ६००० वर्ष पहले प्रकाशित हुआ होगा । इसको कालपुरुष भी कहते हैं । इसकी चर्चा यूनानी और पारसी साहित्य में बहुत आलंकारिक भाषा में की गयी है। इस मण्डल के बीच में तीन चमकीले तारे प्रायः एक ही रेखा में पास ही पास देख पड़ते हैं जिन्हें इल्वक कहते हैं। इनमें सबसे ऊपर वाला तारा प्रायः विषुवद्वृत्त पर है इसलिए क्षितिज के जिस विन्दु पर यह तारा उदय होता है वही ठीक पूर्व दिशा है और जहाँ अस्त होता है वही पच्छिम दिशा है । आग्रहायण के चारों कोनों पर चार तारे अपनी अपूर्व छटा दिखलाते हैं । इनमें उत्तरवाला नीचे का तारा कुछ कुछ लाल रंग का
६४८ सूर्य-सिद्धान्त
देख पड़ता है। इसे ही आर्द्रा नक्षत्र का योग तारा कहते हैं। इसके ऊपरवाला तारा मृगशिरा नक्षत्र का योग तारा कहलाता है। दक्खिन की ओर का ऊपरवाला तारा भी प्रथम श्रेणी का है। गाँववाले इस मण्डल को हन्नाहन्नी कहते हैं और जाड़े की रात में इसकी स्थिति से समय का पता लगाते हैं। आग्रहायण मण्डल के दक्खिन कई तारे मंद ज्योति के हैं जिनसे शशक का आकार बना हुआ जान पड़ता है। इसीलिए इनको शशक (Leporis) कह सकते हैं। आग्रहायण के ऊपर कुछ उत्तर हटकर रोहिणी नक्षत्र है जिसका नीचे वाला तारा प्रथम श्रेणी का कुछ कुछ लाल रंग का है। इसी रंग के कारण इसका नाम रोहिणी पड़ा। रोहिणी नक्षत्र के ५ तारों से जो आकार बनता है वह अङ्गरेजी के (V) अक्षर के सदृश होता है। रोहिणी नक्षत्र के उत्तर प्रजापति मंडल और ऊपर कुछ उत्तर की ओर कृत्तिका पुंज है जिसे गाँव वाले कचपचिया कहते हैं। इससे भी रात को समय जानने का काम लिया जाता है। कृत्तिका के ऊपर प्रायः शिर पर अश्विनी नक्षत्र है। जिन तारापुंजों की चर्चा इस समय की गयी है और जो इस समय पूर्व दिशा में देख पड़ते हैं जाड़े की ऋतु में रात भर दिखाई देते हैं इसलिए इनको शीतकाल के नक्षत्र (Winter constellations) कहते हैं। पूर्व-दक्षिण-इस दिशा में कोई चमकीले तारे नहीं देख पड़ते। शशक कुछ पूरब है जिसकी चर्चा पहले हो चुकी है। दक्षिण-इस दिशा में क्षितिज के पास तीन तारों का पुंज है जिसे अङ्गरेजी में फीनिक्स कहते हैं। बहुत ऊपर तिमिमंडल देख पड़ता है जिसका मुंह ह्वेल मछली के आकार का नीचे की ओर लटका हुआ और फैला हुआ जान पड़ता है। इसके तारे सभी धीमी ज्योति के हैं। दक्षिण-पच्छिम-इस दिशा में इस समय सारस और कुम्भज या दूसरा अगस्त देख पड़ते हैं। दूसरे की चर्चा पहले की जा चुकी है। पच्छिम-दक्षिण और पच्छिम दिशाओं के बीच क्षितिज के पास मकर राशि के मन्द मन्द तारे फैले हुए हैं। इनके ऊपर कुम्भ राशि के तारे भी देख पड़ते हैं। पच्छिम-इस दिशा में क्षितिज के पास ही श्रवण नक्षत्र के तारे देख पड़ते हैं। श्रवण के ऊपर कुछ उत्तर हटकर धनिष्ठा के तारे हैं। श्रवण के बहुत ऊपर पूर्वा भाद्रपद और उत्तरा भाद्रपद के तारे हैं जिनका वर्गाकार भी बहुत ही साफ-साफ देख पड़ता है। वर्गाकार क्षेत्र के नीचेवाली भुज के दो तारे पूर्वाभाद्रपद और ऊपर वाले भुज के दो तारे उत्तरा भाद्रपद के तारे कहलाते हैं।
नक्षत्रग्रहयुत्यधिकार ६४६ उत्तर-पच्छिम — इस दिशा में अभिजित नक्षत्र क्षितिज के पास ही देख पड़ता है । अभिजित के ऊपर हंसमंडल के तारे हैं । इससे और उत्तर क्षितिज के पास अजगर के मुख के कुछ तारे देख पड़ते हैं । आकाश-गंगा — इस समय आकाशगंगा पूर्व क्षितिज के पास से उत्तर- पच्छिम क्षितिज तक फैली है। पूर्व क्षितिज में यह प्रश्वा को उत्तर तट पर और लुब्धक को दक्खिन तट पर छोड़ती हुई आग्रहायण के उत्तर, अग्नि और ब्रह्महृदय के बीच से होती हुई पारसीक मंडल और काश्यप मंडल के मध्य हंसमंडल के पास दो शाखाओं में बँटती हुई और श्रवण को दक्खिन तट पर छोड़ती हुई पच्छिम और उत्तर-पच्छिम क्षितिज में विलीन हो जाती है । फाल्गुन मास का आकाशचित्र सिर पर—मिथुनराशि इस समय ठीक सिर पर है । पुनर्वसु के दोनों तारे प्रायः खस्वस्तिक पर और प्रश्वा कुछ दक्खिन है । उत्तर – लघुसप्तर्षि ध्रुवतारा से पूर्व की ओर फैला हुआ है । ध्रुवतारा से पच्छिम सिफियस के तीन तारे हैं जिनमें से एक क्षितिज से बिल्कुल मिला हुआ है । लघुसप्तर्षि के पूर्व अजगर की लपेट है जिसका मुंह अभी क्षितिज से नीचे है । उत्तर-पूर्व— इस दिशा में सप्तर्षि मंडल के सातों तारे दिखाई पड़ रहे हैं । सप्तर्षि के ऊपर सर्पाकार मंद-मंद तारे हैं । उत्तर-पूर्व और पूर्व दिशाओं के बीच क्षितिज के पास ही कुछ कुछ लाल रंग का स्वाती तारा है । पूरब—इस दिशा में क्षितिज के पास कन्या राशि के तारे दिखाई पड़ रहे हैं । अभी चित्रा उदय नहीं हुआ है। कन्या राशि के ऊपर सिंहराशि के सब तारे दिखाई पड़ रहे हैं। नीचे वाला अकेला तारा उत्तराफाल्गुनी नक्षत्र का है। इसके ऊपर दो तारे पूर्वाफाल्गुनी नक्षत्र के हैं। पूर्वाफाल्गुनी के ऊपर मघा नक्षत्र के तारे हंसिया के आकार के देख पड़ते हैं। इस हंसिया के नीचे के दो तारे बहुत चमकीले हैं जिनमें दक्खिनवाला तारा मघा का योगतारा है। यह भी कुछ कुछ लाल रंग का देख पड़ता है। हँसिया के ऊपर बहुत मंद-मंद तारे हैं। उत्तरवाले तारों को पुष्यनक्षत्र और दक्खिन वालोंतारों को आश्लेषा नक्षत्र कहते हैं। यहीं कर्कराशि भी है। पुनर्वसु और मघा के बीच में जितने मंद-मंद तारे हैं सभी कर्कराशि में कहे जा सकते हैं। १४