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सुश्रुत संहिता

Sushruta Samhita

महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा

स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished872 पृष्ठ

८०२

मुमुक्षुसंहिता

[ अ० ६४ ]

में संचित पित्त को तित्त धृतों के पीने से, युक्तिपूर्वक रक्तमोक्षण से, विरेचनों से निकाले। तीक्ष्ण अम्ल, उष्ण, क्षार दिन में सोना, धूप इनसे बचे। रात्रि में जागना, मैथुन भी छोड़ देवे।

(मधुर-शीतल जल गंध (मेघावर्षक)। पवित्र, स्फटिक के समान निर्मल, शरद ऋतु के चन्द्रमा की किरणों से धुला, अगस्त्य के निकलने से निर्बिष बना निर्मल होने के कारण सब जल इसमें हितकारी है। चन्दन कपूर से सुगन्धित करके, निर्मल लघु कपड़े पहिने। शरद ऋतु के फूलों की माला पहने और युक्ति से सीधु की पीये। पित्तनाशक जो भी हो, उन सब का सेवन करे।) वक्तव्य—हंसोदक—

दिव्या सूर्याशुसंतप्तं निधि चन्द्रांशुशीतलम् । कालेन पक्वं निर्दोषमगस्त्येनाविषीकृतम् ॥ हंसोदकमिति ख्यातं शारदं विमलं शुचिं । स्नानपानावगाहेषु हितमस्वु यथाऽमृतम् ॥ शारदानि च माल्यानि वासांसि विमलानि च । शरत्काले प्रशस्यन्ते प्रदोषे चन्द्ररश्मयः ॥१३-२०॥ (हेमन्तः शीतलो रूः) मन्दसूर्योऽनिलाकुलः ॥२१॥ ततस्तु शीतमासाद्य वायुस्तत्र प्रकृप्यति । कोष्ठस्थः शीतसंस्पर्शादनतःपिण्डीकृतोऽनलः ॥२२॥ रसमुच्छोषयत्याग्न्य तस्मात् स्निग्धं तदा हितम् ।) हेमन्ते लवणक्षारतित्तकाम्लकटुकोक्तटम् ॥२३॥ ससर्पित्तैलमहिममशनं हितमुच्यते । तीक्ष्णान्यपि च पानानि पिवेदगुरुभूषितः ॥२४॥ तैलाकृतस्य सुखोष्णो च वारिकोष्ठेऽवगाहनम् । साक्षारयाने महति कौशेयास्तरणस्तृते ॥२५॥ शयोत जयने तैस्तैर्धृतो गर्भगृहोदरे । स्त्रीः शिल्प्याऽगुरुधूपाद्याः पीनोरुजघनस्तनीः ॥२६॥ प्रकामं च निषेवेत् मैथुनं तर्पितो नृपः । (मधुरं तित्तकटुकमम्लं लवणमेव च ॥२७॥ अन्नपानं तिलान् माषाण्डाकाणि च दधीनि च । तथेच्छुविकृतीः शालीन सुगन्धाश्च नवानपि ॥२८॥ प्रसहानूपमांसाणि क्रव्याद्विलशाधिनाम् । औदकानां प्लवानां च पादिनां चोपसेवयेत् ॥२९॥ मद्यानि च प्रसन्नानि यत्तु किञ्चिद् बलप्रदम् । कामतस्तन्निषेवेत् पुष्टिमिच्छन् हिमागमे ॥३०॥ दिवारुच्यन्मजीर्णं च वज्येतत्र यत्नतः ।) एष एव विधिः कार्यः जिगिरे समुदाहृतः ॥३१॥

(हेमन्त ऋतु शीतल, रूख, सूर्य का तेज मन्द, वायु की अधिकतावाली होती है। इस ऋतु के शीतल होने से इस ऋतु में वायु कुपित होता है। शीतस्पर्श के कारण जाठराग्नि अन्दर में पिण्डीभूत—एकत्रित हो जाती है, इससे वह रस को सुखाती है, अतः स्निग्धभोजन इस ऋतु में हितकारी है। हेमन्त ऋतु में प्रबल लवण-तित्त-क्षार-अम्ल-कटु रसों का, प्रखुर

धी तैल का तथा उष्ण भोजन का सेवन हितकारी है। शरीर पर अगर का लेप करके तीक्ष्ण पानों को (पेयों को) पीये। शरीर पर तैल की मालिश करके गरम पानी से भरे टब में स्नान करे। अंगारों से भरी अंगीठीवाले, घर में बड़े विस्तृत देशम से विछाये विस्तर पर शीतको मिटानेवाले वस्त्रों को ओढ़कर गर्भगृह के अन्दर सोये। अगर और धूप से भरी, उरु, जघन एवं स्तनवाली स्त्रियों का आलिंगन करके वाजीकरण खान-पान से तुरंत हुआ राजा इच्छानुसार मैथुन करे। (मधुर तित्त कटु, अम्ल, लवण, खान-पान, तिल, माष, शाक, दही, गन्ने के रस से बने पदार्थ, सुगन्धित नवीन शालिषान्य, प्रसह-आनूपमांस, मांस खानेवाले एवं विलेश्यों का मांस, औदक (मछली आदि) मांस, प्लव (बत्तख आदि) आदि का मांस, कल्लुए आदि पादियों का मांस खाये। निर्मल स्वच्छ मद्य पीये। और जो भी बलप्रद हो, उसको हेमन्तऋतु में इच्छापूर्वक खाये, दिन में सोना, अजीर्ण, इनको प्रयत्न पूर्वक छोड़ देवे।) शिशिर में यही विधि बरते।

वक्तव्य—“प्रावराजिनकीशयप्रवेणीकुथकास्ततम्—” ये वस्त्रों के भेद हैं, जो कि गरम होते हैं।

“वज्येदन्तपानानि लघूनि वातलानि च । प्रवातं प्रमिताहारमुदमर्थं हिमागमे” ॥चरक ॥२१-३१॥ (हेमन्ते निचितः श्लेष्मा शैत्याच्छीतशरीरिणाम् । औषध्याद्वासनते कुपितः कुतृते च गदान् बहुन् ॥३२॥ ततोम्लमधुरस्निग्धलवणानि गुरुणि च । वज्येद्वृमनादीनि कर्माण्यपि च कारयेत् ॥३३॥ षष्ठिकान् यवाच्छीतान् मुदगान् नीवारकोद्रान् । लावादिबिष्कररसेर्दद्याद्युषेभ्र युक्तिः ॥३४॥ पटोलनिम्बवार्ताकतिक्तकैश्च हिमाग्ये । सेवेन्मध्वासवारिष्टान् सीधुमाध्वीकमाधवान् ॥३५॥ व्यायाममञ्जनं धूमं तीक्ष्णं च कवलप्रदम् । सुखाभ्युना च सर्वाथान् सेवेत् कुसुमागमे ॥३६॥ तीक्ष्णरूक्षकटु क्षारकषायां कोष्णमद्रवम् । यबसुदग्धमधुमायं वसन्ते भोजनं हितम् ॥३७॥ व्यायामोऽत्र नियुद्धाध्वशिलानिर्घातजो हितः । वस्सादनं तथा स्नानं वनिताः काननानि च ॥३८॥ सेवेत् निर्हरेच्छापि हेमन्तोपचितं कफम् । शिरोंविरैकवमनतिरूहकवलादिभिः ॥३९॥ वज्येन्मधुरस्निग्धदिवारुच्यन्गुरुद्रवान् ।

शीतल शरीरवाले पुरुषों में हेमन्त के अन्दर संचित हुआ कफ वसन्त में गरमी से कुपिय होकर बहुत से रोगों को उत्पन्न करता है। इससे अम्ल, मधुर, स्निग्ध, लवण और गुप्त वस्तुओं का त्याग करे, और वमन-विरेचन आदि कर्मों को

२० ६४ ]

उत्तरतन्त्रम्

६०३

करे। सांठी अन्न, जौ (ठण्डे किये), मूँग, नीवार, कोदा आदि को बटरे आदि विकिर मांस रसों के साथ या मूँग कुलरथी आदि के यूष से देवे। वसन्त में परवल, नीम बैंगन, तित्तक वस्तुओं से भोजन करे। मधु, आसव, अरिष्ट, सीधु, मधु-मद्य, माध्वीक, माधव (मधु से बने मद्य) का सेवन करे। व्यायाम, अंजन, तीक्ष्ण धूम, कवलग्रह को बरते। वसन्त में जल के सब कार्यों में गरम पानी बरते। तीक्ष्ण, रूक्ष, कटु, क्षार, कषाय, सुहाता गरम, द्रवरहित, जौ मूँग मधु की अधिकता का भोजन वसन्त में हितकारी है। नियुद्ध (कुशती), मुसाफरी, पत्थर फेंकना आदि व्यायाम हितकारी हैं। उबटन, स्नान, स्निग्धों, वन इनका वसन्त में सेवन करे। हेमन्त में संचित कफ को शिरोविरेचन, वमन, निरूह, कवल आदि से निकाले। मधुर, स्निग्ध, दिन में सोना, भारी द्रव बहुत वस्तुओं का त्याग करे ॥

व्यायाममुष्णमायासं मैथुनं परिशोषि च ॥४०॥

रसांश्चाग्निगुणोद्विकान् निदाघे परिवर्जयेत्।

श्रीमच्छतु में व्यायाम, धूप, परिश्रम, मैथुन, शरीर को सुखानेवाले आहार, अग्नि गुण की अधिकतावाले रसों का त्याग कर देवे। (अग्नि गुण की अधिकतावाले रस कटु, अम्ल और लवण हैं) ॥४०॥

सर्वासि सरितो वापीर्वैतानि रुचिराणि च ॥४१॥

चन्दनानि पराध्याणि स्त्रजः सकमलोत्पलाः।

तालवृन्तानिलाहारास्तथा शीतगृहाणि च ॥४२॥

घर्मकाले निषेवेत वासांसि सुलघूनि च।

शर्कराखण्डद्विघानि सुगन्धानि हिमानि च ॥४३॥

पानकानि च सेवेत मन्थांश्चापि सशकंरान्।

भोजनं च हितं शीतं सधृतं मधुरद्रवम् ॥४४॥

श्रुतेन पयसा रात्रौ शर्करामधुरेण च।

प्रत्यग्रकुसुमाकीर्णं शयने हर्म्यसंस्थिते ॥४५॥

शयोत चन्दनार्द्राङ्गः स्पर्शयमानोऽनिलैः सुखैः।

श्रीमच्छतु में तालाब, नदियाँ, बावड़ी, सुन्दरवन, उत्कृष्ट चन्दन, कमल, नीलोफर की माठायें, ताड़ के बने पंखों की वायु, शीतल घर, हल्के पतले वस्त्रों का सेवन करे। शर्करा, खाँड़ से लिप्त, सुगन्धित, शीतल पानक (शर्बतों) का सेवन करे, और शर्करा मिश्रित मन्थों को पीये। शीतल, घृतयुक्त, मधुर, एवं द्रव भोजन हितकारी है। गरम किये दूध में शर्करा मिलाकर इससे रात्रि में भोजन करना उत्तम है। अदालिका की छत पर बिछाये, नूतन-नये फूलों से भरे बिस्तर पर शरीर पर चन्दन का लेप करके सुखदायक वायु का स्पर्श लेते हुए सोये।

वक्तव्य—“दिवा पानानि शीतानि हितं रात्रौ च भोजनम्।

ससर्पिः शर्करं शीतं श्रुतेन पयसा युतम् ॥ दिवा शीतग्रहे निद्रां निधि चन्द्रांशुशीतले। भजेचन्दनद्विघाङ्गः प्रवाते हर्म्यमस्तके ॥”

चरक ॥४१-४५॥

तापास्तये हिता नित्यं रसा ये गुरवक्षयः ॥४६॥

पयो मांसरसाः कोष्णस्तैलानि च घृतानि च।

बृंहणं चापि यत्किञ्चिदभिष्यन्दि तथैव च ॥४७॥

निद्राघोषचित्तं चैव प्रकृप्यन्तं ससौरणम्।

निहन्त्यादुनिलक्ष्नेन विधिना विधिकोविदः ॥४८॥

(नदीजलं रूक्षमुष्णमुदुमन्थं तथाऽऽतपम्।

व्यायामं च दिवास्वप्नं व्यवयं चात्र वजयेत् ॥४९॥

(नवात्ररूक्षशीताम्लुसक्तृश्चापि विवर्जयेत्।)

यवषष्टिकगोधूमान् शालीश्चाप्यनवांस्तथा ॥५०॥

हर्म्यमध्ये निवाते च भजेच्छ्रुयां सूदुत्तराम्।

सविषप्रापिविषमूत्रलाठानिष्टोवनाद्विभिः ॥५१॥

समाप्लुतं तदा तोयमान्तरिक्षं विषोपमम्।

वायुना विषदुष्टेन प्रावृषेण्येन दूषितम् ॥५२॥

तद्वि सर्वोपयोगे तु तस्मिन् काले विवर्जयेत्।

अरिष्टासवमैरेयान् सोपदंशास्तु युक्ततः ॥५३॥

पिबेत् प्रावृषि जोगांस्तु रात्रौ तानपि वर्जयेत्।

निरूहेर्वैस्तिभिश्चान्यैस्तथाऽन्यैर्मांरूतापहैः ॥५४॥

(कुपितं शमयेद्वायुं वाषिर्कं चाचरेद्विधिम् ॥)

श्रीम के बीत जाने पर प्रावृड काल में नित्य भारी तीन

रसों का (मधुर, अम्ल, लवण का) सेवन करे। दूध सुहाते गरम मांसरस, तैल, घृत इनका सेवन करे। जो भी कोई द्रव्य बृंहण एवं अभिष्यन्दि हो, उनका सेवन करे। श्रीम में संचित वायु के प्रकोप को, विधि को जाननेवाला वैद्य बातनाशक विधि से शान्त कर दे। (इसी श्रुतु में नदी का पानी, रूक्ष, उष्ण वस्तुएँ, पानी में घुले सत्, धूर, व्यायाम, दिन में सोना और मैथुन छोड़ देवे।) नूतन अन्न (एक साल से कम), रूक्ष, शीतल अन्न, शीतल जल, सत् (पानी में घुले) छोड़ दे। जो, गेहूँ, पुराने साँठों, शाली का सेवन करे। मकान के मध्य में वायु रहित स्थान पर अतिशय कोमल शय्या पर सोये। वर्षा का जल विषकाले प्राणी के मल मूत्र, लाला, थूक आदि से मिला होने के कारण विष के समान होता है, प्रावृड श्रुतु के विष से दूषित वायु से दूषित होने के कारण इस श्रुतु में प्रत्येक कार्य में यह निन्दित होता है। प्रावृड श्रुतु में चटनी आदि (या मांस को) खाकर युक्ति से पुरातन अरिष्ट, आसव, मैरेय को पीये। रात्रि में इनका भी परित्याग कर देवे। निरूह से, अनुवासन वस्ति से, तथा दूसरी बातनाशक विधियों से कुपित वायु को शान्त करे। वर्षा की श्रुतुचर्या का सेवन करे।

वक्तव्य—प्रावृडकाल में वायु का संचय होता है, संचय काल में ही वायु को शान्त करना चाहिये। यथा—“संचयेऽपहृता दोषा लभन्ते नोत्तरा गतीः” ॥४६-४५॥

श्रुतावृतौ य एतेन विधिना वत्से नरः ॥५५॥

२०४

सुश्रुतसंहिता

[ अ० ६४ ]

घोरानुक्रुतान् रोगाद्वाप्नोति स कदाचन ।

इस विधि से जो मनुष्य प्रत्येक ऋतु में बरतता है, वह श्रुतुजन्य भयानक रोगों से कभी भी आक्रान्त नहीं होता ॥५५॥

अत ऊर्ध्वं द्वादशाशनप्रविचारात् वक्ष्यामः । तत्र शीतोष्णस्तिग्धरूक्षद्रवशुष्कैककालिकद्विकालिकौषधयुक्त-मात्राहीनदोषप्रशमनवृत्त्यर्थः ॥५६॥

इसके आगे भोजन के बारह विभागों को कहेंगे—इनमें शीत, उष्ण, स्निग्ध, रूक्ष, द्रव, शुष्क, एककालिक, द्विकालिक, औषधयुक्त, मात्राहीन, दोषप्रशमन, वृत्ति के लिये ॥५६॥

तृष्णोष्णमददाहातीन् रक्तपित्तविषातुरान् ।

मूर्च्छातीन् क्षोषु च क्षीणान् शीतरैर्रूपाचरेत् ॥५७॥

तृष्णा, गरमी, मद, दाह से पीड़ित, रक्तपित्त, विष के रोगी, मूर्च्छा पीड़ित, क्षीण से क्षीण पुरुषों की शीतल अन्न (खान-पान) से चिकित्सा करे ॥५७॥

कफवातामयाविष्टान् विरिक्तान् स्नेहपायिनः ।

अक्लिन्नकायांश्च नरानुष्णोरनैरूपाचरेत् ॥५८॥

कफ-वात के रोगों से आक्रान्त, विरेचन लिये, स्नेह पीये, क्लेद रहित शरीरवालों की उष्ण अन्न से चिकित्सा करे ॥५८॥

वातिकान् रूक्षवेहांश्च व्यायायोपहतस्तथा ।

व्यायामिनश्चापि नरान् स्निग्धैर्रूपाचरेत् ॥५९॥

वात प्रकृति, रूक्ष शरीर, मैथुन से पीड़ित (थके), नित्य-प्रति व्यायाम करनेवालों की स्निग्ध अन्न ( खान-पान ) से चिकित्सा करे ॥५९॥

मेदसाऽभिपरीतास्तु स्निग्धान्मेहातुरानपि ।

कफाभिपन्नदेहांश्च रूक्षैर्रूपाचरेत् ॥६०॥

मेद से व्याप्त शरीरवालों की, स्निग्ध एवं मेहरोगियों की कफ से भरे शरीरवालों की रूक्ष अन्न से चिकित्सा करे ॥६०॥

शुष्कदेहान् पिपासातांन् दुर्बलानपि च द्रवैः ।

शुष्कशरीरवाले, पिपासा से पीड़ित, दुर्बल मनुष्यों की द्रव भोजनों से चिकित्सा करे ।

प्रक्लिन्नकायान् त्रणिनः शुष्कैर्मैहिन एव च ॥६१॥

कुष्ठ आदि से सड़े शरीरवाले, त्रण रोगियों की, मेहरोगियों की शुष्क अन्न से चिकित्सा करे ।

वक्तव्य—किलन्न त्रणों में शुष्क भोजन देवे । अक्लिन्न

त्रणों में द्रव भोजन विषेय है ॥६१॥

एककालं भवेद्येयो दुर्बलान्निबद्धये ।

दुर्बल अग्नि को बढ़ाने के लिये एक समय भोजन देना चाहिये ।

समान्नये तथाऽऽहो द्विकालमपि पूजितः ॥६२॥

समान अग्नि के लिये दोनों समय आहार देना उत्तम है ॥

औषधद्वेषिणे देयस्तथौषधसमायुतः ।

औषध से द्वेष रखनेवाले को औषध से मिला अन्न देवे ।

मन्दाग्नेये रोगिणे च मात्राहीनः प्रशस्यते ॥६३॥

तदतुदत्तस्त्वाहारे दोषप्रशमनः स्मृतः ।

मन्दाग्नि और रोगी को मात्रा से कम आहार देवे । श्रुतु के अनुसार दिया अन्न आहार दोष प्रशमक कहा गया है ॥

अतः परं तु स्वस्थानां वृत्त्यर्थं सर्व एव च ।

प्रविचारानिमान्नेव द्वादशात्र प्रयोजयेत् ॥६४॥

इसके उपरान्त समान धातु एवं समदोष प्रकृति स्वस्थ पुरुषों के लिये शरीर के धारण के लिये अन्न देवे । इन बारह विभागों को इस प्रकार प्रयोग करे ॥६४॥

अत ऊर्ध्वं दशौषधकालान् वक्ष्यामः । तत्राभक्तं

प्राग्भक्तमधोभक्तं मध्येभक्तमन्तराभक्तं सभक्तं सामुद्गं मुहुर्मुहुर्मासप्रासान्तरं चेति दशौषधकालाः ॥६५॥

इसके आगे दस औषध कालों को कहेंगे इनमें अभक्त, प्राग्भक्त, अधोभक्त, मध्येभक्त, अन्तराभक्त, सभक्त, सामुद्ग, मुहुर्मुहुः, प्रास, प्रासान्तर-ये दस औषधकाल (औषध देने के समय) हैं ॥६५॥

तत्राभक्तं तु यत केवलमेवौषधमुपयुज्यते ॥६६॥

इनमें जब केवल औषध ही बरती जाती है, उसको अभक्त कहते हैं ।

वि० मन्तव्य—जैसे लंघन-उपवास करते २ औषध खिलाई जाती है ॥६६॥

वीर्याधिकं भवति भेषजमन्मनहोन्

हन्यात्तथाऽऽमयमसंशयमाशु चैव ।

तद्वाळवृद्धवन्तितामृदवस्तु पीत्वा

ग्लानिं परां समुपयान्ति बलक्षयं च ॥६७॥

अन्न के बिना औषध अधिक शक्तिशाली होती है । इससे औषध बिना संशय के रोगों को शान्त करती है । परन्तु इस प्रकार की औषध बालक, बृद्ध, स्त्री एवं कोमल प्रकृति के मनुष्य पीकर विशेष ग्लानि तथा बलक्षय को प्राप्त होते हैं ।

वि० मन्तव्य—इससे लाभ तो बहुत होता है, परन्तु बाल आदि को उससे हानि भी होती है, और उनको भी जिनको लंघन का निषेध है । ऐसे रोगियों को लघु भोजन के साथ २ औषध देना चाहिये देखिये निम्नलिखित श्लोक ६६ ॥६७॥

प्राग्भक्तं नाम श्रोक्तं यत प्राग्भक्तस्तयोपयुज्यते ॥६८॥

जो औषध भोजन से पूर्व दी जाती है, उसका नाम प्राग्भक्त है ॥६८॥

श्रीमं विपाकमुपयान्ति बलं न हिंस्या-

द्वजावृतं न च मुधबंदनान्निरेति ।

प्राग्भक्तसेवितमथौषधमेतदेव

दद्यात्तु च वृद्धशिशुभोक्तुमाक्रान्नाभ्यः ॥६९॥

अ० ६४]

अन्तरत्नत्रय

८०१

इस प्रकार की औषधि शीघ्र ही मुखपूर्वक पच जाती है, बल का नाश नहीं करती। अन्न से आहत होने के कारण मुख से वापिस नहीं निकलती। भोजन से पूर्व सेवन की औषध वृद्ध, शिशु, डरपोक, कृश एवं स्त्रियों के लिये देनी चाहिये ॥६६॥

अधोभक्तं नाम—यदधो भक्तस्येति ॥७०॥

जो औषध भोजन के पीछे दी जाती है, उसका नाम अधोभक्त है ॥७०॥

मध्यभक्तं नाम—यन्मध्ये भक्तस्य पीयते ॥७१॥

जो औषध भोजन के बीच में दी जाती है, उसका नाम मध्येभक्त है ॥७१॥

पीतं यदन्नमुपयुज्य तदूर्ध्वकाये

हन्याद् गदान् बहुविधाश्च बलं ददाति ।

मध्ये तु पीतमपहन्यविसारिभावा-

चे मध्यदेहसमिभूय भवन्ति रोगाः ॥७२॥

औषध पीकर जो अन्न खाया जाता है, वह शरीर के ऊर्ध्व भाग के बहुत से रोगों को नष्ट करके, शरीर के ऊर्ध्व भाग में बल देता है। भोजन के बीच में पी हुई औषध न फैलने के स्वभाव के कारण कोष्ठ के रोगों को नष्ट करती है ॥७२॥

अन्तराभक्तं नाम—यदन्तरा पीयते पूर्वापरयोर्मक्तयोः ७३ पूर्व और अपर भोजनों के बीच में जो औषध पी जाती है, (प्रातः और सायं भोजन के बीच में) वह अन्तराभक्त है ॥७४॥

सभक्तं नाम—यत् सह भक्तैन ॥७५॥

भोजन के साथ सिद्ध की या खाई हुई औषध सभक्त है ॥

पथ्यं सभक्तमबलाबलयोहिं नित्यं

तद्वृद्धिषामपि तथा शिशुवृद्धयोश्च ।

हृद्यं मनोबलकरं त्वथ दीपनं च

पथ्यं सदा भवति चान्तरभक्तकं यत् ॥६५॥

स्त्री, दुर्बल, औषध से द्रव रखनेवाले, शिशु, वृद्ध इनके लिये भोजन के साथ औषध देना सदा हितकारी है। इस प्रकार दी हुई औषध हृदय के लिये प्रिय, मनोबल को देनेवाली, अग्निदीपक, सदा पथ्य है ॥७५॥

सामुद्रगं नाम—यद्वक्तस्यादावन्ते च पीयते ॥७६॥

दोषे द्विधा प्रविस्तृते च समुद्रगसंज्ञ-

माद्यन्तयोर्यदशनस्य निषेध्यते तु ॥७७॥

सामुद्रग—भोजन के आदि में और भोजन के अन्त में जो औषध दी जाती है, वह सामुद्रग है। दोष के ऊपर और नीचे दोनों ओर प्रसृत होने पर औषध को भोजन के आदि और अन्त में दिया जाता है, इसको सामुद्रग कहते हैं ॥७६,७७॥

मुहुर्मुहुर्नाम—

सभक्तमभक्तं वा यदोषधं मुहुर्मुहुर्पयुज्यते ॥७८॥

श्वासे मुहुर्मुहुर्तिप्रस्तृते च कासे

हिक्कावमीपु स वदन्त्युपयोऽयमेतत् ॥७९॥

भोजन के साथ या भोजन के बिना जो औषध बार-बार सेवन की जाती है, उसका नाम मुहुः मुहुः है। श्वास में या कास के बहुत वेगवान् होने पर, हिचकी में, वमन में औषध को बार-बार देना चाहिये ॥

प्रासं तु—यत्पिण्डन्यामिश्रम् ॥८०॥

कवच के साथ मिलाई औषध प्रास औषध है ॥

प्रासान्तरं तु यद्प्रासान्तरेषु ॥८१॥

दो प्रासों ( कवलों ) के बीच में दी गई औषध प्रासान्तर औषध कही जाती है ॥८१॥

प्रासेषु चूर्णमबलाग्निपु दीपनीयं

वाजीकराण्यपि तु योजयितुं यतेत ।

प्रासान्तरेषु वितरेद्दमनीयभूमान्

श्वासादिषु प्रथितदृष्टगुणाश्च लेहान् ॥८२॥

दुर्बलाग्नि में, प्रासों में औषध देवे। दीपन गुण एवं वाजीकरण औषधियों को भी इसी रूप में देने का यत्न करे। वमन कारक धूमों को प्रासों के बीच में देवे। श्वास आदि रोगों में दृष्ट गुणवाले प्रसिद्ध लेहों को प्रासान्तरों में दे ॥८२॥

एवमेते दूगौषधकालाः ॥८३॥

इस प्रकार से ये दश औषधकाल हैं।

रोग्यवेक्ष्य यथा प्रायः निरन्तो बलवान् पिबेत् ।

भेषजं लघुपथ्यान्नैः युक्तमद्यात्तु दुर्बलः ॥

भेषज्यकालो भक्तादौ मध्ये पश्चान्मुहुर्मुहुः ।

सामुद्रगं भक्तसंयुक्तं प्रासे प्रासान्तरे तथा ॥ चरक ॥

विसृष्टे विष्णून्ने विशदकरणे देहे च सुलघौ

विशुद्धे चोद्गारे हृदि सुविमले वाते च सरति ।

तथाऽन्नश्रद्धायां कृमपरिगमे कुक्षौ च शिथिले

प्रदैयस्त्वाहारी भवति भिषजां कालः स तु मतः ॥८४॥

आहारकाल—मलमूत्र का त्याग कर चुकने पर, इन्द्रियों के निर्मल होने पर, शरीर में हल्कापन प्रतीत होने से, उद्गार के शुद्ध हो जाने पर, हृदय में निर्मलता होने से, अपान वायु का अघः प्रवाहण होने पर, भोजन में रुचि होने पर, थकान मिट जाने पर, उदर में ढीलापन होने से, वैद्य को चाहिये कि इस समय आहार देवे, क्योंकि भोजन का सच्चा समय यही है ॥८४॥

इति श्रीमुश्रुतसंहितायामुत्तरतन्त्रे तन्त्रभूषणाध्यायेषु

स्वस्थवृत्ताध्यायो नाम (द्वितीयोऽध्यायः, आदितः)

चतुःषष्ठितमोऽध्यायः ॥६४॥

८०६

सुश्रुतसंहिता

[ अ० १५ ]

पञ्चषष्टितमोऽध्यायः

अथातस्तन्त्रयुक्तिमध्यायं व्याख्यास्यामः ॥१॥

यथे वाच भगवान् धन्वन्तरिः ॥२॥

अब इसके आगे तंत्रयुक्ति अध्याय का व्याख्यान करेंगे—

जैसा कि भगवान् धन्वन्तरि ने कहा था।

वि० मन्तव्य—तन्त्र-तत्र आयुर्वेदः, शाखा, विद्या, सूत्रं, शान्, शास्त्रं, लक्षणं तन्त्रम् इति अनर्थन्तरम् ( च० सू० अ० ३० ) अर्थात् ये सब शब्द तन्त्र के पर्याय हैं। युक्ति-योजना-जोड़ना अर्थात् तन्त्रमें लिखे गये वाक्यों के शब्दों को जोड़कर उचित अर्थ निकालना “तन्त्रयुक्ति” कहलाता है। तन्त्रयुक्तियों के बिना वाक्यों का तारय नहीं निकाला-समझा जा सकता ॥

द्वान्त्रिंशत्तन्त्रयुक्त्यो भवन्ति शास्त्रे। तद्यथा-अधिकरणं १, योगः २, पदार्थः ३, हेतुवर्धः ४, उद्देशः ५, निर्देशः ६, उपदेशः ७, अपदेशः ८, प्रदेशः ९, अतिदेशः १०, अपवर्गः ११, वाक्यशेषः १२, अर्थापत्तिः १३, विपर्ययः १४, प्रसङ्गः १५, एकान्तः १४, अनेकान्तः १७, पूर्वपक्षः १८, निर्णयः १९, अनुमतं २०, विधानम् २१, अनागतावैक्षणम् २२, अतिक्रान्तावैक्षणं २३, संशयः २४, व्याख्यानं २५, स्वसंज्ञा २६, निर्वाचनं २७, निदर्शनं २८, नियोगः २०, विकल्पः ३०, समुच्चयः ३१, ऊहम् ३२, इति ॥३॥

सुश्रुत शास्त्र में बत्तीस तंत्रयुक्तियाँ हैं। यथा—अधिकरण, योग, पदार्थ, हेतुवर्ध, उद्देश, निर्देश, उपदेश, अपदेश, प्रदेश, अतिदेश, अपवर्ग, वाक्यशेष, अर्थापत्ति, विपर्यय, प्रसंग, एकान्त, अनेकान्त, पूर्वपक्ष, निर्णय, अनुमत, विधान, अनागतावैक्षण, अतिक्रान्तावैक्षण, संशय, व्याख्यान, स्वसंज्ञा, निर्वाचन, निदर्शन, नियोग, विकल्प, समुच्चय, और ऊह ये बत्तीस तंत्रयुक्तियाँ हैं।

वक्तव्य—अन्य शास्त्रों में छत्तीस तंत्रयुक्तियाँ मानी हैं ॥३॥

अत्रासां तन्त्रयुक्तानां किं प्रयोजनम्? उच्यते—वाक्ययोजनमर्थयोजनं च ॥४॥

इन तंत्र युक्तियों का लाभ क्या है? कहते हैं—असम्बद्ध वाक्य का सम्बन्ध जोड़ना और छिपे हुए अर्थ को प्रकाशित करना, इन तंत्र युक्तियों का प्रयोजन है।

वि० मन्तव्य—प्रयोजन-तन्त्रयुक्तियों का आवश्यकता—अबीयानोऽपि शास्त्राणि तन्त्रयुक्त्यविच्छिन्नः। नाधिगच्छति शास्त्रार्थान् अर्थान् माग्यक्षये यथा ॥ च० सि० अ० १२। अर्थात् जा तन्त्रयुक्तियों को भली भाँति नहीं जानता वह शास्त्रों को पढ़ता हुआ भी शास्त्र के अर्थों को नहीं समझ सकता। और ‘अतश्च प्रकृतं बुद्ध्या देशकालान्तराणि च। तन्त्रकृतः अभिप्रायान् उपमानं च अर्थ आदिशेत्। ३७। ( च० अ० २६ )। तात्पर्य—तन्त्रकृतों के अभिप्राय को समझकर ही अर्थ कहना चाहिये ॥४॥

भवन्ति चात्र लोकाः—

असद्वादिप्रयुक्तानां वाक्यानां प्रतिषेधनम्।

स्ववाक्यसिद्धिरपि च क्रियते तन्त्रयुक्तिः ॥५॥

व्यक्ता नोक्तास्तु ये ३५५ लीना ये चाप्यनिर्मलाः।

लेशोक्ता ये च केचित्स्युस्तेषां चापि प्रसाधनम् ॥६॥

इस विषय में श्लोक भी है—तंत्र युक्तियों द्वारा असद्वादियों से प्रयुक्त वाक्यों का प्रतिषेध किया जाता है। तथा तंत्रयुक्तियों से अपने वाक्य की सिद्धि भी की जाती है। स्पष्ट होने से जो विषय नहीं कहे, तथा जो अर्थ छिपे होने के कारण स्पष्ट नहीं हैं, और जो विषय संक्षिप्त रूप में (लेशमात्र) कहे हैं, उनका भी स्पष्टीकरण तंत्रयुक्तियों से होता है ॥५,६॥

यथाऽस्मज्जवनस्यार्कः प्रदीपो वैश्वानरो यथा।

प्रबोधस्य प्रनाशार्थं तथा तन्त्रस्य युक्तयः ॥७॥

जिस प्रकार कि कमल वन के लिये सूर्य, घर के लिये दीपक प्रकाश करनेवाला होता है, उसी प्रकार तत्र को प्रकाशित करने के लिये, स्पष्ट करने के लिये युक्तियाँ हैं ॥७॥

तत्र यमर्थमधिकृत्योच्यते तदधिकरणं,

यथा—रसं दोषं वा ॥८॥

इसमें जिस अर्थ (विषय) को लेकर कहा जाता है, उसका नाम अधिकरण है, यथा रस या दोष को लेकर कहेंगे।

वि० मन्तव्य—अधिकरण—अध्याय, प्रकरण आदि का पर्याय है। अधिकरण नाम यं अधिकृत्य प्रवर्चते कर्ता ( च० सि० अ० १२ श्लो० ७१ की च० पा० टी० ) ॥८॥

येन वाक्यं युज्यते स योगः यथा—

‘तैलं पिबेत्चासृतवर्हिनिम्ब-

हिंसाभयावृक्षकपिप्पलीभिः।

सिद्धं बलाभ्यां च सदेवदारु

हिताय नित्यं गलगण्डरोगे ॥

इत्यत्र तैलं सिद्धं पिबेदिति प्रथमं वक्तव्ये तृतीयपादे सिद्धमिति प्रयुक्तं; एवं दूरस्थानामपि पदानामेकीकरणं योगः ॥९॥

जिससे वाक्य जोड़ा जाता है वह योग है। गिलोय, नीम, हिंसा, हरड, कुटज, पिप्पली, बला, अतिबला, देवदारु इनसे सिद्ध किया तैल पीये। यह गलगण्ड रोग में हितकारी है। इसमें सिद्ध तैल पीये, इस प्रकार कहने की अपेक्षा है, ‘सिद्ध किया’ यह शब्द तीसरे पाद में है, दूरस्थ होने पर भी पद को मिलाकर एक करने का नाम योग है ॥९॥

योऽर्थोऽभिहितः सूत्रे पदे वा स पदार्थः, पदस्य पदयोः पदानां वाऽर्थः, अपरिमिताश्च पदार्थाः। यथा—स्नेहस्वेदाञ्जनेषु निर्दिष्टेषु द्रव्योद्ययाणां वाऽर्थानासुप-

अ० ६५ ]

उत्तरतन्त्रम्

209

पत्तिर्दृश्यते, तत्र योऽर्थः पूर्वापरयोगसिद्धो भवति स प्रहीतव्यः, यथा—'वेदोत्पत्तिमध्यायं व्याख्यास्याम' इत्युक्ते सन्दिग्धते बुद्धिः—कतमस्य वेदस्योत्पत्तिं वक्ष्यतीति, यतः ऋग्वेदाद्यस्तु वेदाः, 'विद् विचारेण, विद्बल्लाम्बे' इत्येतयोश्च धातवोरनेकार्थयोः प्रयोगात्, तत्र पूर्वापरयोगमुपलभ्य प्रतिपत्तिर्भवति—आयुर्वेदोत्पत्तिमयं विवक्षुरिति एष पदार्थः ॥१०॥

सूत्र में या पद में जो अर्थ कहा हो उसे पदार्थ कहते हैं। एक पद का, दो पद का, वा बहुत से पदों का जो अर्थ होता है, वह पदार्थ है। पदों के अर्थ असंख्येय होते हैं। यथा—स्नेहन स्वेदन-अंजन में कहे हुए दो या तीन अर्थों की प्रतीति (अनुभव) होती है (कौनसा स्नेहन, कौनसा स्वेद, कौनसा अंजन बरते), इनमें पूर्वापर योग को देखकर जो अर्थ निर्णय किया जाये, वह लेना चाहिये। यथा—“वेदोत्पत्ति अध्याय का व्याख्यान करेंगे—” ऐसा कहने पर बुद्धि में सन्देह उत्पन्न होता है कि कौन से वेद की उत्पत्ति को कहें। क्योंकि ऋग्वेद आदि वेद हैं, विद् विचारेण और विद्बल्लाम्बे—इन धातुओं का अनेक अर्थों में प्रयोग देखा जाता है। इस अवस्था में पूर्वापर संयोग को देखकर ज्ञान होता है कि आयुर्वेदोत्पत्ति को कहनेवाले हैं, यह पदार्थ है ॥१०॥

यद्वन्यदुक्तमन्यार्थसाधकं भवति स हेत्वर्थः। यथा मृत्पिण्डोऽग्निः प्रकिलद्यते तथा माषदुग्धप्रभृतिभिर्ब्रणः प्रकिलद्यत इति ॥११॥

अन्य के लिये कही हुई जो बात दूसरे अर्थ को सिद्ध करती है, उसे हेत्वर्थ कहते हैं। यथा—पानी से मिट्टी का ढेला गीला होता है उसी प्रकार उड़द दूध आदि से ब्रण भी क्लेदयुक्त होता है ॥११॥

समासवचनमुद्देशः। यथा—शल्यमिति ॥१२॥

संक्षेप में कहने का नाम उद्देश है, यथा—शल्यम् ॥१२॥

विस्तरवचनं निर्वेशः। यथा—शारीरमागन्तुकं चेति ॥

विस्तार से कहने का नाम निर्वेश है, यथा—शारीरशल्य, आगन्तुजशल्य ॥१३॥

एवमित्युपदेशः। यथा—तथा न जागृयाद्वाग्नी दिवा-स्वप्नं च वर्जयेत् ॥१४॥

इस प्रकार से करे, यह उपदेश है, यथा रात में न जागे और दिन में सोना छोड़ देवे।

वक्तव्य—उपदेश नियोग में भेद—उपदेश प्रायिक होता है, और नियोग अप्रायिक होता है ॥१४॥

अनेन कारणेनेत्यपदेशः, यथाऽपदिश्यते—मधुरः श्लेष्माणमभिवर्धयतीति ॥१५॥

इस कारण से यह कार्य हुआ है, या होता है, ऐसा कहना अपदेश है, यथा—कहते हैं कि मधुर रस कफ को बढ़ाता है ॥

प्रकृतस्यातिक्रान्तेन साधनं प्रदेशः। यथा देवदत्तस्यानेन शल्यमुद्भूतं तथा यज्ञदत्तस्याप्ययमुद्भूतं ॥

प्रकृत वस्तु के भी आगे जाकर सिद्ध करने का नाम प्रदेश है। यथा—इसने देवदत्त का शल्य निकाला है, इसी प्रकार यज्ञदत्त का भी (शल्य) निकाला होगा ॥१६॥

प्रकृतस्यानागतस्य साधनमतिदेशः यथा-यतोऽस्य वायुरूपधर्ममुत्तिष्ठते तेनोदावर्ती स्यादिति ॥१७॥

प्रकृत में न आई हुई वस्तु को सिद्ध करने का नाम अतिदेश है, यथा—क्योंकि इसकी वायु रूप को उठती है, इसलिये वह उदावर्ती रोगी होगा। यह संभावना हो जाती है ॥

अभिन्व्याप्यापकर्षणमपवर्गः, यथा—अस्वेद्या विषोपसृष्टाः, अन्यत्र कीटविषादिति ॥१८॥

सब में व्याप्त होकर फिर अपकर्षण करना (अपवाद करना) अपवर्ग है, यथा—विष से पीड़ितों को स्वेद नहीं देना चाहिये यह कहकर कीट विषादि को छोड़कर यह कहना अपवर्ग है ॥

येन पदेनानुक्तेन वाक्यं समाप्यते स वाक्यशेषः। यथा—शिरःपाणिपादपाशर्वगुष्ठोदरोरसामित्युक्ते पुरुषग्रहणं विनाऽपि गम्यते पुरुषस्येति ॥१९॥

जिस अनुक्त पद से वाक्य समाप्त किया जाता है, वह वाक्यशेष है, यथा शिर, हाथ, पैर, पाशर्व, पीठ, उदर, छाती इतना कहने पर 'पुरुष के' कहे बिना भी पुरुष के, यह जान लिया जाता है ॥१९॥

यदकीर्तितमर्थोदापद्यते साऽर्थोपपत्तिः। यथा—भोदनं मोक्षे इत्युक्तेऽर्थादापन्नं भवति-नार्य पिपासुर्यवागमिति ॥

जो न कहा हुआ भी अर्थ से प्रतिपादित होता है, उसको अर्थोपपत्ति कहते हैं, यथा—चावल खाऊंगा यह कहने से अर्थ से समझ लिया जाता है कि, यह यवाग नहीं पीना चाहता ॥

यद्यत्राभिहितं तस्य प्रातिलोम्यं विपर्ययः। यथा—कुशाल्यप्राणभीरवो दुश्चिकित्स्या इत्युक्ते विपरीतं गृह्णते दृढादयः मुचिकित्स्या इति ॥२०॥

जो यहां कहा हो, उसके विपरीत का नाम विपर्यय है, यथा—कूश, अल्पप्राण, भीरु पुरुष दुश्चिकित्स्य होते हैं, यह कहने पर विपरीत रूप में समझ लिया जाता है कि दृढ़ बहुप्राण निडर व्यक्ति मुचिकित्स्य हैं ॥२०॥

प्रकरणान्तरेण समापनं प्रसङ्गः, यदा प्रकरणान्तरितो योऽर्थोऽसङ्कृष्टः समाप्यते स प्रसङ्गः, यथा—पञ्चमहाभूतशरीरिसमवायः पुरुषस्तस्मिन् क्रिया सोऽधिष्ठानमिति

८०८

सुश्रुतसंहिता

[ अ० ६५ ]

वेदोत्पत्तावभिधाय, भूतचिन्तायां पुनरुक्तं—यतोऽभिहितं पञ्चमहाभूतशरीरिसमवायः पुरुष इति, स स्वस्वेष कर्म-पुरुषश्रिक्रिस्ताधिकृत इति ॥२२॥

दूसरे प्रकरण समान (तुल्य) का नाम प्रसंग है, अथवा प्रकरणों के बीच में जो विषय बार-बार कहा जाता है—समाप्त किया जाता है, उसे प्रसंग कहते हैं। यथा—वेदोत्पत्ति अध्याय में 'पंचमहाभूतशरीरिसमवायः पुरुषः' उसमें, क्रिया, वही अधि-धान हैं, यह कहकर भूतचिन्ता अध्याय में फिर कहना कि क्योंकि कहा है 'पंचमहाभूतशरीरिसमवायः पुरुषः' इति वही कर्मपुरुष चिकित्सा में अधिकृत है ॥२२॥

(सर्वत्र) यदवधारणेनोच्यते स एकान्तः यथा—त्रिवृद्धिरेचयति, मदनफलं वामयति (एत्र) ॥२३॥

जो विना विकल्प के निश्चित रूप से कहा जाता है, वह एकान्त है, यथा—निशोय विरेचन करता है, मदनफल वमन करता है ॥२३॥

क्वचित्था क्वचिदन्यथेति या सोऽनेकान्तः, यथा—केचिदाचार्यां त्रवते द्रव्यं प्रधानं, केचिद्वरसं, केचिद्वीर्यं केचिद्विपाकमिति ॥२४॥

कहीं ऐसा और कहीं दूसरा ऐसा जहाँ हो (अनिश्चित) उसे अनेकान्त कहते हैं, यथा—कोई आचार्य कहते हैं कि द्रव्य प्रधान है, कोई रस को, कोई वीर्य को और कोई विपाक को प्रधान मानते हैं ॥२४॥

आत्मेपपूर्वकः प्रश्नः पूर्वपक्षः। यथा—कथं वात-निमित्ताश्वत्वारः प्रमेहा असाध्या भवन्तीति ॥२५॥

आत्मेपपूर्वकप्रश्न को पूर्वपक्ष कहते हैं, यथा—वातजन्य चार प्रमेह किस कारण से असाध्य होते हैं ॥२५॥

तस्योत्तरं निर्णयः। यथा—शरीरं प्रपीड्य पश्चा-दधो गत्वा बसामेदोमज्जातुविद्धं मूत्रं विसृजति वातः, एवमसाध्या वातजा इति ॥२६॥

तथा चोक्तम्—

कृत्स्नं शरीरं निष्पीड्य मेदोमज्जावसायुतः।

अधः प्रकृप्यते वायुस्तेनासाध्यास्तु वातजाः ॥२७॥

इसके उत्तर का नाम निर्णय है, यथा—शरीर को पीड़ित करके पीछे नीचे मूत्राशय में जाकर वसा, मेद, मज्जा से मिला मूत्र वायु त्याग करता है, इसलिये वातजन्य प्रमेह असाध्य हैं। कहा भी है—सम्पूर्ण शरीर को पीड़ित करके मेद, मज्जा, वसा से मिली वायु अघोभाग में प्रकृपित होती है, इसलिये वात-जन्य प्रमेह असाध्य हैं ॥२६-२७॥

परमतमप्रतिपिद्धमुमुतम्। यथा—अन्यो ब्रूयात्—सप्त रसा इति, तच्छाप्रतिषेधादुमुन्यते कथचिदिति ॥

दूसरे मत को स्वीकार करना (विरोध न करना) अनुमत है, यथा—दूसरा कहे सात रस हैं, इसका विरोध न करने से किसी भी प्रकार में सहमत होना अनुमत है ॥२८॥

प्रकरणानुपूर्याऽभिहितं विधानम्। यथा—सकथि-मर्मण्येकादश प्रकरणानुपूर्याऽभिहितानि ॥२९॥

प्रकरण के अनुसार कहने का नाम विधान है, यथा—टांग के मर्म ग्यारह प्रकरण के अनुसार कह दिये हैं ॥२९॥

एवं वक्ष्यतीत्यनागतावेश्मम्। यथा—इलोकस्थाने ब्रूयात्—चिकित्सितेषु वक्ष्यामीति ॥३०॥

इस प्रकार से कहेंगे, यह कहना अनागतावेश्म है, यथा—इलोकस्थान में कहे कि—चिकित्सा में कहेंगे ॥३०॥

यत्पूर्वमुक्तं तदतिक्रान्तावेश्मम्। यथा—चिकित्सितेषु ब्रूयात्—इलोकस्थाने यद्विरितमिति ॥३१॥

जो पहले कहा हो, उसे कहना अतिक्रान्तावेश्म है, यथा—चिकित्सा में कहे कि—इलोकस्थान में जैसा कहा है ॥३१॥

उभयहेतुदर्शनं संशयः। यथा—तलहृदयाभिघातः प्राणहरः, पाणिपादच्छेदनमप्राणहरमिति ॥३२॥

हेतु का दोनों में घटना संशय है, यथा—तलहृदय (मर्म) पर चोट लगना प्राणहर है, हाथ पैर का काटना प्राणनाशक नहीं है ॥३२॥

तन्त्रेऽतिशयोपवर्णनं व्याख्यानम्। यथा—इह पञ्च-विशतिकः पुरुषो व्याख्यायते, अन्येष्वायुर्वेदतन्त्रेषु भूता-दिप्रभृत्यारभ्य चिन्ता ॥३३॥

अतिरिक्त विषय का कहना व्याख्यान है, यथा—इस सुश्रुत में पञ्चवीस तन्त्रोंवाले पुरुष को कहा जाता है, दूसरे आयुर्वेद तंत्रों में भूतादि अहंकार से आरम्भ करके (अन्यक्त से नहीं) व्याख्यान किया जाता है ॥३३॥

अन्यशास्त्रासामान्या स्वसंज्ञा। यथा—मिश्रुतमिति मधुसर्पिषोप्रहृणं, लोकप्रसिद्धमुदाहरणं वा ॥३४॥

अन्य शास्त्रों के समान न होना स्वसंज्ञा है। यथा मिश्रुत से मधु और घृत का ग्रहण करना, अथवा लोक प्रसिद्ध उदाहरण का नाम स्वसंज्ञा है, यथा महास्नेह ॥३४॥

निश्चितं वचनं निर्वचनम्। यथा—आयुर्विद्यते-ऽस्मिन्नेन वा, आयुर्विन्दतीत्यायुर्वेदः ॥३५॥

निश्चित वचन का कहना निर्वचन है, यथा—इसमें (इस शास्त्र में) आयु (आयु का ज्ञान) रहती है, या इस शास्त्र से आयु प्राप्त की जाती है यह आयुर्वेद है ॥३५॥

दृष्टान्तव्यक्तिनिर्दर्शनम्। यथा—अग्निर्वायुना सहितः कश्चै वृद्धि गच्छति तथा वातपित्तकफदुष्टो ब्रण इति ॥३६॥

अ० ६६ ] १०२

उत्तरतन्त्रम्

६०६

दृष्टान्त देकर स्पष्ट करने का नाम निदर्शन है, यथा-अग्नि वायु के साथ मिलकर तिनकों के ढेर में बढ़ती है, इसी प्रकार वात-पित्त कफ से दूषित व्रण बढ़ता है ॥३६॥

इदमेव कर्तव्यमिति नियोगः । यथा—पथ्यमेव भोक्तव्यमिति ॥३७॥

यही करना चाहिये, इनका नाम नियोग है, यथा पथ्य ही खाना चाहिये ॥

वक्तव्य—इसका अपवाद भी होता है—

“उत्पद्यते हि साऽवस्था देशकालबलं प्रति ।

यस्यां कार्यमकार्यं स्याद् वर्जितं कार्यमेव च ॥”३७॥

इदं चेदं चेति समुच्चयः । यथा—मांसवर्गं एणहरिणादयो लावतिचिरिसारङ्गाश्च प्रधानानीति ॥३८॥

‘यह भी है और यह भी है’ इसका नाम समुच्चय है, यथा—मांसवर्ग में एण, हरिण आदि मुख्य हैं और वटेर-तितर-सारङ्ग आदि भी मुख्य हैं ॥३८॥

इदं वेदं चेति विकल्पः । यथा—रसौदनः सघृता यवा-गूर्वा (भवस्त्विति) ॥३९॥

यह अथवा यह—इसका नाम विकल्प है, मांसरस के साथ भात अथवा घृतमिश्रित यवागूर् खाये ॥३९॥

यदनिर्दिष्टं बुद्ध्याऽवगम्यते तद्ब्रह्म । यथा—अभिहितमन्तपानविषो चतुर्विधं चान्नमुपदिश्यते—भक्ष्यं भोज्यं लेह्यं पेयमिति एवं चतुर्विधं वक्तव्ये द्विविधमभिहितम्, इदमत्रोहम्—अन्नपाने विभिन्नयोर्द्वयोर्ग्रहणे कृते चतुर्णामपि ग्रहणं भवस्तीति चतुर्विधश्चाहारः प्रविरलः प्रायेण द्विविध एव, अतो द्वित्वं प्रसिद्धमति । किञ्चान्यत्-अन्नं भक्ष्यमवरुद्धं, घनसाधन्यार्त्तं, पेयेन लेह्यं, द्रवसाधन्यार्त्तं ॥४०॥

जो न कहा हो, उसे बुद्धि से जानने का नाम उद्य है, यथा—अन्नपानविधि में कहा है कि चार प्रकार का अन्न कहा जाता है । भक्ष्य, भोज्य, लेह्य, पेय । इस प्रकार चार प्रकार का कहने में दो प्रकार का कहा है । इसमें यहाँ तक बुद्धि से विचारना चाहिये कि मुख्य रूप से दो प्रकार के अन्नपान के ग्रहण करने में चारों प्रकार के अन्न का ग्रहण हो जाता है । अतिशय विभाग रूप में चार प्रकारका आहार भी दो प्रकार का ही है, इसलिये दो प्रकार का प्रसिद्ध है । और भी कुछ अन्न से भक्ष्य वस्तु अलग नहीं, घन वस्तु की समानता से । पेय में लेह्य का समावेश हो जाता है, द्रव की समानता से ॥४०॥

भवन्ति चात्र—

सामान्यदर्शनेनासां व्यवस्था संप्रदर्शिता ।

विशेषस्तु यथायोगमुपधायीं विपञ्चित्ता ॥४१॥

द्वान्निशयुक्तयो ह्येतास्तन्त्रसारगवेषणे ।

मया सम्यग्निनिहताः शब्दार्थन्यायसंयुताः ॥४२॥

यो ह्येता विधिवद्भेति दोषीभूतास्तु बुद्धिमान् ।

स पूजाहो भिषक्श्रेष्ठ इति धन्वन्तरेभ्यस्तम् ॥४३॥

इस विषय में श्लोक हैं—इन तंत्रयुक्तियों की व्यवस्था सामान्य रूप में यहाँ कह दी है, विद्वान् को चाहिये कि इनकी विशेषताओं को योग के अनुसार निश्चय कर ले । यन्त्र के सार को ढूँढने में बत्तीस युक्तियाँ हैं, इनको शब्द-अर्थ-न्याय के साथ मैंने भली प्रकार कह दिया है । जो बुद्धिमान् इन प्रकाशमान् युक्तियों को भली प्रकार जानता है, वह पूजा के योग्य श्रेष्ठ वैद्य है, ऐसा धन्वन्तरि का मत है ॥४१-४३॥

इति श्रीसुश्रुतसंहितायामुत्तरतन्त्रे तन्त्रभूषणाध्यायेषु तन्त्र-

युक्तिनाम (तृतीयोऽध्यायः, आदितः)

पञ्चषष्ठितमोऽध्यायः ॥६५॥

षट्षष्ठितमोऽध्यायः

अथातो दोषभेदविकल्पमध्यायं व्याख्यास्यामः ॥१॥

यथोवाच भगवान् धन्वन्तरिः ॥२॥

अत्र इसके आगे दोषभेदविकल्प अध्याय का व्याख्यान करेंगे-जैसा कि भगवान् धन्वन्तरि ने कहा था ॥१,२॥

अष्टाङ्गवेदविद्वांसं दिवोदासं महौजसम् ।

छिन्नशाखाथसंदेहं सूक्ष्मागाधगमोदधिम् ॥३॥

विश्वामित्तसुतः श्रीमान् सुश्रुतः परिपुच्छति ।

आयुर्वेद के आठों अंगों के विद्वान् महा तेजस्वी, शास्त्र के अर्थों में सम्पूर्ण रूप से संशय रहित, सूक्ष्म अगाध शास्त्र के सागर दिवोदास को विश्वामित्र पुत्र श्रीमान् सुश्रुत ने पूछा ।

वक्तव्य—विश्वामित्र यद्यपि राजर्षि थे—तथापि तप के कारण ब्रह्म तेज से दीप्त होने के कारण श्रीमान् कहे हैं, यथा—“विद्यासमाप्तो ब्राह्मं वा सत्त्वमार्थमथापि वा । ध्रुवमाविशति ज्ञानात्तस्माद् वैद्यो द्विजः स्मृतः ॥” च० ॥३॥

द्विषष्टिदोषभेदा ये पुरस्तात्परिकीर्तिता ॥४॥

कति तत्रैकशो ज्ञेया द्विजो वाप्यथवा त्रिशः ।

आपने रसभेद विकल्प में दोषों के जो बासठ भेद कहे हैं, उनमें कितने एकवाले, कितने दोवाले और कितने तीनवाले जानने चाहिये ।

वक्तव्य—दोष संसर्ग बासठ हैं, रसभेद तिरसठ हैं, यथा—द्विषष्टिदोषभेदाः स्यु रसभेदाज्जिषष्टिषा ।

स्वास्थ्यं त्रिषष्ठं विज्ञेयं तत्र षड्ख्योजितम् ॥

एकशः षड् द्विधास्त्वैकविधातिश्रुतुरन्विता ।

त्रिषो द्वान्निशदित्येवं त्रयो दोषाः त्रिषष्टिषा ॥

वि० मन्तव्य—अध्याय ६४ श्लो० ४ में अविद्यच अर्थात्

द९४ सुश्रतसंहितीं

प्रकतिस्थ तथा विदग्ध अथात्‌ विकंतं दोषों के जो ६३ भद्‌

के ह उन्हीं का विवरण इस अध्याये किया गया हे ।

जव दोष प्रकृतिस्थ रहते है तब स्वास्थ्य (आरोग्य-नीरोगता,

बना रहता है ओर जब विकृत हो जाते है तब विविष रोग

उन्न हो जाते है | देखिये- सू अ० १५ । विधिमेद से

विदग्ध दोषदो प्रकारके होते दै, श-बृद्ध-स्वपरिमाण से

अधिक-बड़े इए, ₹-श्चीण-स्वपरिमाण से घटे इए ॥४॥

तस्य तद्रचनं श्रस्वा खंशयच्छिन्महातपाः ॥५॥ `

प्रोताव्मा चपजाद्‌ छः सुश्चतायाह त्वतः ।

सुश्रत ॐ इन वचनो को सुनकर संशय को नाश करने

वाके महातपस्वी, प्रसन्न आत्मा, दप्ाद्‌ल धन्वन्तरि ने

सुश्रत के ल्यि यथाथरूप मे कहा कि-

त्रयो दोषा धातवश्च पुरीषं मूत्रमेव च ॥६॥

देहं सन्धारयन्त्येते ह्यग्यापन्ना रघैर्हितेः।

पथ्य रसो से अविकत इए तीन दोष, सातां घातु मल

ओर मू इस शरीर को धारण करते हं ॥५,६॥

पुरुषः षोडञकखः प्राणाश्चैकादशेव ये ॥७।

रोगाणां तु सहसरं यच्छतं वि तिरेव च । डतं च पञ्च द्रव्याणां तरिसप्रत्यधिकोत्तरम्‌ ॥८॥।

व्यासतः कीर्तितं तद्धि षोडशकलावाखा पुरुष, एकादश (ग्यारह) प्राण, एकर्हजार

२ रोग, पाच सो तिहत्तर द्रव्य ये विस्तार से क

वक्तव्य-षोडश कलावाठा -पुरुष - पंचमहामूत, -पएकाद्रा

इन्द्रिया, ये सोलह विकार, ग्यारह -प्राण-अग्नि, सोम; . वायु सत्त्व, रज, तम ओर पाँच इन्द्रर्या, एक, हजार -एकयो . बीस

रोग, इन रोगों का विस्तरत दणन श्लोक बद्धः करके उल्हण. ने रीकामेंदियाइे। चरक भे सोलह कठा से- चतुष्पदं षोडशकरं भेषजमिति

भिषजो भाषन्ते, इख वाक्य से षोडशगुण रोगी, वेय, परिचारक,

ओषध इनके सोह गुण कोद मानते हँ ।. उनके मत में कला

शब्द गुणव] ची है १ । इसपे कोई सवभत चिन्तां शरीरोक्त सुख दुःख इच्छा द्वेष प्रयत्नादि को धोढडश् गुण मानते है । वि० मन्तव्य--डल्लन टीका में श्लोक बद्धं विवरण इस प्रकार दे-- „ . अत्र सोते तन्ते षट्स्थानेषु प्रोक्तरोगाः शोकैः अभि- _ घीयन्ते-

हीनाऽतिदग्धो क्षारेण, बधः प्लुष्टादयोऽग्निना । चदु धूमविदहितः पश्च शोणितदुटयः ॥१॥ दोषधातमलादीनां द्वात्रिंशत्‌ श्चयब्रद्धितः। . . 2 स्योल्यकाश्य नरिविघो बिखंसाचो बलक्षयः ॥२॥ त वय विषाविम्‌। - षट्‌ शोफाः षडन्रणा वंहिन्ितयं विषयादिकम्‌ |

` त्वगाभिषसिरास्नायुखन्ध्यस्थिमञ्जसम्भवाः |

.= णएवरःसुखेः ससषष्टिः. इति स्थाने द्वितीयके 4

. . द्राचत्वारिशदधिका"त्रिशती-परिकीर्निता ॥१६॥

कणपाल्याऽऽमयाः पञ्च क्रव्यं उक्तं चतुर्विधम्‌ ॥१६॥

, वान्तरेचितयोः प्रोक्ता व्यापदो दश पञ्चः च|

` _ षटं नेत्रप्रणिधानस्य नेत्रस्य. एकादश एव ठ ॥२९०॥

ˆ पञ्चवस्तिकृताः तत्र चत्वारः पीडने कृताः ।

एकादश द्रव्यङृताः, ससत शय्याङतास्तया ॥२९॥ , „>+

` “ चचवत्वारिशैत्‌ चर्तलश्च वेयतों व्यापदस्तथा | & ।

करोषाऽऽयासादिकाः पच्च दश चं आदरदेदुकाः ॥२२॥

___ | स्नेदस्यःकारणानि.उो.अप्रस्यांगमङ्ृन्ति च ।

“ इतिनेत्रादिदोष्रेण षष्ठिः सप्त षमासतः ॥२३॥

[ > ६६

आमं विदग्धं विष्टन्घं' अजीणं' च तथा त्रिधा ॥३॥ `

इति षटषष्िः आतङ्कः सूत्रस्थाने नि दरशिताः ।

आमपक्वाशये त्रे तथा इन्द्रियचवुष्टये ॥४॥ 4 न =>

४ = 5

शक्रे चेकाङ्गसवाङ्गगताः साधिका दश ॥५॥

त्रयोदशाऽऽब्रतैः अन्यैः. दोषैः स्युः मारुतेः. खलु । :

पक्षाघातोऽयतन्वश्च मन्यास्तम्भोऽर्दितस्तथा ॥&॥

गृध्रसी सह विश्वाच्या शिरः करोष्टुकपूवकम्‌ ।

खज्ञः पङ्कः कलायाख्यः कण्टकः. पाद्‌ द्‌ाहङत्‌ +1॥७॥ `

पादहषोंऽववाह्श्च मृकमिन्मिनगद्‌गदा,

तून्याऽध्मानद्वयेऽष्टीलादयं अयासि षट्‌ तथा ॥८।) . :

चमकीलः चतललश्चाऽश्मयः पञ्च भगन्दराः। _.

तथाऽद्य कष्टानि किलासानि पुनः त्रिषा ॥६॥।

प्रमेहा वि्तिः प्रोक्ताः पिडका नव॒ तत्कृताः ।

उदराणि तथाऽष्टो च मूढगभस्तथाऽष्टषा ॥१०॥

ना । व

` बाह्या विद्रधयः षट्‌ स्युः तयाऽन्तःस्थाः स्मूता दशः ।

विख्पनाडीस्तनजाः तशेवं॒पञ्च पञ्च च ॥११॥

ग्रन्थयः सप्त, चेका स्यात्‌ अपची, खतधाऽब दम्‌ ! ˆ ` ~

गढगण्डाः त्रयः; सप्त, द्धयः;परिकौत्तिताः;॥ ९२६.

उपदशा मताः पञ्च; -श्लीपदं चतथा. व्रि्षुः॥ ~

~ -मगनाःअ्टदय जग्रा शकदोषास्तथेव च ॥॥॥१३॥ `

~. चत्वारिशत्‌-तथाऽ्टौ च छुद्ररोगाः प्रकीततिताः-।:-- = >

+; -अष्टौ ओष्ठ्भवा दन्तमूङेषु द (प्र च ॥१४]।: . `. <

-.> अष्टौ. दन्तुषु,:जिहायां पञ्च). ताल्वगताःनव.॥ = ` > ५

कण्ठे चःअशाद्‌श. रयाः च्तुःस॒वरखरा गदाः ॥१५५॥

अष्टौ शुक्रगता रोगा अष्टो आत्तवदु्टयः. -.; स - । त = [' १4

चत्वारोऽपग्दराः प्रोक्ता अपातः व॒ .अपराङ्तः ॥१५॥ क

„ मक्कल्लटीनयोषाश्च नगमेशाहतस्तथा । ` ~ + ~ 8 | |

. . नागोदरः स्वुतिगमं शारीरे संप्तविश्चतिः ॥ १८॥ ६

अथ मेदोऽनिकवेगात्‌ श्वयथु; सरुजश्च . यः आब्यवातः सवंसराः शोफाः पञ प्रकीतिताः ।... ~

१ क १४ ४, २९,

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अ० ६६ ]

उत्तरतन्त्रम्

८११

एवं चिकित्सितस्थाने रुजोऽधानवतिः तथा । अच्चादिरखाविज्ञाने विशतिः विषहेतुका ॥२४॥ स्थावरे वेगाः स्युः दर्वाकरमण्डलिनां विषे । राजिलवैकरञ्जानां प्रत्येकं सप्त सप्त च ॥२५॥ मृषिकास्तु दशाऽष्टौ च सप्तवेगा अलर्कजाः । सप्तषष्टियतं चात्र कीटानां विषपायिनाम् ॥२६॥ सप्त चत्वारिशयुतं कल्पस्थाने शतद्वयम् । नव सन्ध्याश्रयाः प्रोक्ता वर्त्मजाश्च एकविंशतिः ॥२७॥ शुक्लभागे दशैकश्च चत्वारः कृष्णभागजाः । सर्वाश्रयाः सप्तदश दृष्टिजा द्वादशेव तु ॥२८॥ बाह्यजौ द्वौ नेत्ररोगौ इति षट्सप्ततिः स्मृता । कुक्कुणकः शिशोरेव, कर्णऽष्टाविंशतिर्गुणम् ॥२९॥ एकविंशद्वद्वाणगताः सप्रतिश्यायपञ्चकाः । एकादश शिरोरोगाः परं शालाक्यसंज्ञिते ॥३०॥ आतङ्कानां शतं प्रोक्तं षट्चत्वारिंशता युतम् । नव बालग्रहा योनिव्यापदो विंशतिः त्रियाः ॥३१॥ एवं कुमारतन्त्रेऽस्मिन् एकोनविंशद्वद्वाणमयाः । अष्टौ ज्वरा, अतीसारः षट्, चतुष्टयः प्रवाहिकाः ॥३२॥ चत्वारौ ग्रहणीदोषा, यद्वमेको गुल्मपञ्चकम् । हृद्द्वोगाः पञ्च, चत्वारः पाण्डुवाल्याः कामलाद्वयम् ॥३३॥ हलीमकः पानकी च रक्तपित्तं चतुर्विषम् । षट् प्रकारा मता मूर्च्छा विकाराः सप्त मद्यजाः ॥३४॥ दाहाः पञ्च, तृषः सप्त लृदयः पञ्च देहिनाम् । हिकाः क्षासाः तथा कासाः प्रत्येकं पञ्च पञ्च च ॥३५॥ स्वरभेदाः तथा षट् स्युः, विंशतिः कुमिजातयः । नवोदावर्त्तका दृष्टा विस्मृत्यः तिष्ठ एव च ॥३६॥ आनाही द्वौ आमविट्को तथाऽरोचकपञ्चकम् । मूत्राधाता द्वादश स्युः इति कायचिकित्सिते ॥३७॥ आमयानां शतं प्रोक्तं चत्वारिंशत् च सप्त च । देवता दैत्य-गन्धर्व-यक्ष-पितृ-अहि-रक्षसाम् ॥३८॥ पिशाचस्याऽभिषक्त्रेण गदाः च अष्टौ प्रकीर्तिताः । अपस्माराश्च चत्वारः उन्मादाः षड् उदीरिताः ॥३९॥ अष्टादश गदा भूतविद्यायां सूक्ष्मदक्षिभिः । एवं हि सौश्रुते तन्त्रे काशिराजेन कीर्तिताः ॥४०॥ रोगाणां तु सहस्रं यत् शतं विशतिरेव च ।

भिन्ना दोषाण्यो गुणाः ।

द्विषष्टिधा भवन्त्येते भूयिष्ठमिति निश्चयः ॥४१॥

जिस प्रकार सत्त्व, रज, तम गुण भिन्न हुए बासठ प्रकार के होते हैं, उसी प्रकार से तीनों दोष भी विभक्त होकर बासठ प्रकार के हो जाते हैं ।

वक्तव्य—“रजोभृष्टिष्ठो भावतः, रजो हि प्रवर्त्तकं सर्वभा- वानाम् पित्तं सत्त्वोत्कटम् लघुप्रकाशकत्वात् । कफः तमोबहुलः— गुरुप्रावरणकत्वात् ।” कफप्रकृति पुरुष में सत्त्व गुण की प्रधानता कफ में सत्त्व और तम दोनों गुण के रहने से है । यथा— “सत्त्वतमोबहुला आपः” ॥

त्रय एव पृथग् दोषा द्विगो नव समाधिजैः । त्रयोदशाधिकैकद्विसप्तमध्योत्पन्नोऽस्त्रिगः ॥१०॥ पञ्चागदेवं तु सह भवन्ति क्षयमागतैः । क्षीणमध्यधिकक्षीणक्षणवृद्धैस्तथाऽपरे ॥११॥ द्वादशेवं समाख्याताऽक्षयो दोषा द्विषष्टिधा ।

पृथग रूप में वात, पित्त, कफ, तीन दोषों में दो दोष स्वस्थ और एक बढ़ा रहे, इस प्रकार से तीन भेद बनते हैं । दो दोष के समान रूप में बढ़ने से और एक के स्वस्थ रहने से, तीन, तथा दो दोषों में एक दोष के अधिक बढ़ने से और तीसरे दोष के स्वस्थ रहने से छे भेद, इस प्रकार सप्त अधिक भेद से कुल नौ भेद होते हैं । तीनों दोषों के बढ़ने से तेरह भेद होते हैं, यथा—तीनों दोषों के मिलने पर एक दोष की अधिकता से तीन, तीनों दोषों के मिलने पर दो दोषों के बढ़ने से तीन, सप्त, मध्यम, उत्पन्न भेद से छे, तीनों की अधिकता से एक, इस प्रकार तेरह भेद हैं । जिस प्रकार दोषों की वृद्धि से ये पच्चीस भेद होते हैं, उसी प्रकार दोषों के क्षीण होने से भी पच्चीस भेद हो जाते हैं । क्षीण मध्य, अधिक क्षीण, क्षीण, भेद होते हैं, इस प्रकार से ये बासठ भेद हैं ।

१ (१) वायुवृद्धः पित्तकफौ समौ । पित्तं वृद्धं वायुकफौ समौ । कफो वृद्धो वायुपित्तै समौ ।—३,

(२) वायुपित्तै वृद्धे, कफः समः । वायुकफौ वृद्धौ पित्तं समम् । पित्तकफौ वृद्धौ वायुः समः । एक को अति वृद्धि है— वायोःपित्तै वृद्धे कफः समः । पित्ताद् वायुवृद्धः कफः समः । कफात् वायुवृद्धः पित्तं समम् । वायोः कफौ वृद्धः पित्तं समम् । पित्तात्कफौ वृद्धौ वायुः समः । कफात् पित्तं वृद्धं वायुः समः ॥७-८-९॥

(३) वायोः पित्तकफौ वृद्धौ । पित्तात्कफवायु । कफाद् वायुपित्तै । वातपित्ताम्यां कफौ वृद्धः वायुकफाम्यां पित्तं वृद्धम्, पित्तकफाम्यां वायुवृद्धः ॥—६

(४) वायुपित्तकफा वृद्धा वृद्धतरा वृद्धतमाः । इसी प्रकार वायु कफ पित्त । पित्त कफ वायु । पित्त वायु कफ । वायु पित्त कफ । कफ पित्त वायु ।—६

(५) वायुपित्तकफा वृद्धाः ।—१ इस प्रकार दोष की वृद्धि से पच्चीस ३+९+६+१+१ = २५ बनते हैं ।

वृद्ध शब्द के स्थान पर क्षीण शब्द प्रयोग कर देने से इसी प्रकार २५ बनते हैं ।

८१२

सुश्रुतसंहिता

[ अ० ६३ ]

वि० मन्तव्य—यह स्मरण रखिये कि दोषों के बढ़ने ही से रोग नहीं होते, अपितु घटने से भी रोग होते हैं। विदग्ध दोषों के ये ६२ भेद अर्थात् अवस्थाएँ हैं, और रोग का निदान करते समय दोषों की अंशांश कल्पना द्वारा इनका विवेचन किया जाता है। चिकित्सक इसका विचार करे कि कौन दोष वृद्ध है, कौन दोष क्षीण है, तथा कौन दोष सम है। रोगस्तु दोषवैषम्य—दोषों की विषमावस्था रोग है, और दोष-साम्यमरोगता—दोषों की समवस्था अरोगता (स्वास्थ्य) है। यह ६२ भेद तो केवल परस्पर मिले हुए तीन दोषों के हैं, परन्तु रस आदि धातुओं तथा मलों के साथ मिलाकर तो इनके भेद असंख्य हो जाते हैं, (देखिये श्लो० १२)।

द्वयुत्पन्नैकोत्पन्नैः षट् स्युर्हीनमध्याधिकैश्च षट्। समैश्चैको विकारास्ते सन्निपाताख्योदश ॥ संसर्गे नव षट् तेभ्य एक वृद्धया समैज्यः। पृथक् त्रयः स्युस्तैर्वृद्धैर्याषयः पंचविशतिः ॥ यथा वृद्धेस्तथा क्षीणदोषैः स्युः पंचविशतिः। वृद्धिक्षयकृतश्रान्यो विकल्प उपदेष्टव्ये ॥ वृद्धिरैकस्य समता चैकस्यैकस्य संक्षयः। ब्रह्मं वृद्धिः क्षयश्चैकस्यैकवृद्धिर्द्वयोः क्षयः ॥

चरक सू० अ० १७-४१-४४ ॥

मिश्रा धातुमलैर्दोषा यान्त्यसंख्येतान् पुनः ॥१२॥ तस्मात् प्रसङ्गं संयम्य दोषभेदविकल्पनैः। रोगं विदित्वोपचरेद्दसभेदैर्यथैरितैः ॥१३॥

(६) वातो वृद्धः पित्तं समं कफः क्षीणः। पित्तं वृद्धं वातः समः कफः क्षीणः। कफो वृद्धः वातः क्षीणः पित्तं समम्। कफो वृद्धः वातः समः पित्तं क्षीणम्। वातो वृद्धः कफः समः पित्तं क्षीणम्। पित्तं वृद्धं कफः समो वातः क्षीणः।—६

(७) वायुः क्षीणः पित्तकफौ वृद्धौ। पित्तं क्षीणं कफवायु वृद्धौ। कफः क्षीणो वायुपित्तौ वृद्धौ। वायुपित्तौ क्षीणौ कफौ वृद्धः। पित्तकफौ क्षीणौ वायुवृद्धः। कफवायु क्षीणौ पित्तं वृद्धम् ॥—६

८—वायु पित्त कफ सम १ +

इस प्रकार ६ + ६ + १ = १३, कुल २५ + २५ + १३ = ३३ भेद हुए।

† “समवातपित्तार्लेष्माणं प्रकृतितस्थानां समा भवत्यन्यन्यः ॥”

चरक वि० अ० ६।

भिषक् कर्ताऽथ करणं रक्षा दोषास्तु कारणम्।

कार्यमारोग्यमेवैकमनारोग्यमभतोऽन्यथा ॥१४॥

दोष रक्तादि धातु और मलों से मिलकर असंख्येय बन जाते हैं। इसलिये दोष भेद विकल्पना का नियमन करके रोग को जानकर कहे हुए रस भेदों से चिकित्सा करे। वैद्य कर्ता है, रस-करण (साधन) हैं, दोष कारण हैं, आरोग्य कार्य है, अनारोग्य-अकार्य है।

वि० मन्तव्य—चिकित्सा कर्म में—वैद्य “कर्ता”—चिकित्सा करनेवाला है। मधुर आदि रस करण अर्थात् चिकित्सा के उपकरण हैं। इनके द्वारा चिकित्सा की जाती है—दोषों का शमन किया जाता है। वात आदि दोष रोगों का कारण—हेतु है। और आरोग्य (स्वास्थ्य) कार्य—कर्तव्य कर्म है। वैद्य (कर्ता) रसों (उपकरणों) द्वारा दोषों (रोगकारणों) का शमन करता है, यही कार्य—कर्तव्य कर्म है ॥१४॥

अध्यायानां तु षट्पञ्चुषा प्रथिताथेपदक्रमम्।

एवंमेतदरोषेण तन्त्रमुत्तरमुद्दिमत ॥१५॥

छथासठ अध्यायों में अर्थ-पद क्रम से ज्ञान ऐश्वर्य से भरा यह सम्पूर्ण उत्तर तंत्र गूँथा हुआ है।

वि० मन्तव्य—इन ६६ अध्यायों द्वारा प्रथित है, अर्थ-पद-क्रम जिसमें ऐसा यह उत्तर तन्त्र पूर्ण रूप से बुद्धिमान्-बुद्धिमान्-महान् है ॥१५॥

स्पष्टगृढार्थविज्ञानमगाढमन्धचेतसाम्

यथाविधि यथाप्रश्नं भवतां परिकीर्तितम् ॥१६॥

स्पष्ट, गृढ अर्थ को बतानेवाला, मन्द बुद्धिवाले भी जिसको सरलता से जान सकते हैं, इसको विधि एवं प्रश्न के अनुसार आपको कह दिया है ॥१६॥

सहोत्तरं त्वेतदधीत्य सर्वं

ब्राह्मं विधानेन यथोदितेन।

न हीयतेऽर्थान्मनसोऽभ्युपेता-

देतद्रुचो ब्राह्ममतीव सत्यम् ॥१७॥

कही हुई विधि के अनुसार उत्तर तंत्र के साथ इस सम्पूर्ण ब्राह्म (ज्ञान) को पढ़कर, मन से ग्रहण किये हुए (मली प्रकार समझे हुए) विषयों से अलग नहीं होता, यह ब्राह्म वचन (ब्रह्म का वचन) पूर्ण सत्य है ॥१७॥

इति सुश्रुतसंहितायामुत्तरतन्त्रे दोषभेदविकल्पो नाम

षट्पञ्चितीभोऽध्यायः ॥१६॥

इति सौश्रुते आयुर्वेदशास्त्रे उत्तरस्थानं समाप्तम्।

समासोऽयं ग्रन्थः।

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A small, dark, rectangular emblem or seal is centered on a textured, reddish-brown background. The emblem features a central circular motif containing a lotus flower and a figure, surrounded by text in a circular border. The entire emblem is set against a background with a fine, woven texture and a mottled reddish-brown color.