तैत्तिरीयोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Taittiriya Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
१९४ \hspace{70pt} तैत्तिरीयोपनिषद् \hspace{70pt} [ वल्ली २
१९४ \hspace{70pt} तैत्तिरीयोपनिषद् \hspace{70pt} [ वल्ली २
विशेषोपमर्देन परमानन्दमपेक्ष्य | द्वारा परमानन्दकी अपेक्षा उसके समो भवति न कश्चिदुत्कर्षोऽप- | तुल्य ही सिद्ध होता है तो उस गतिको प्राप्त हुए पुरुषका कोई कर्षो वा तां गतिं गतस्येत्यभयं | उत्कर्ष या अपकर्ष नहीं रहता और वह निर्भय स्थितिको प्राप्त कर लेता प्रतिष्ठां विन्दत इत्युपपन्नम्। | है; अतः यह कथन उचित ही है।
\hspace{10pt} अस्ति नास्तीत्यनुप्रश्नो व्या- | \hspace{10pt} ब्रह्म है या नहीं—इस अनुप्रश्नकी {@{}c@{}}\scriptsize द्वितीयानुप्रश्न- \scriptsize विचारः ख्यातः। कार्यरस- | व्याख्या कर दी गयी। कार्यरूप रसकी प्राप्ति, प्राणन, अभय-प्रतिष्ठा लाभप्राणानाभयप्र- | और भयदर्शन आदि युक्तियोंसे वह तिष्ठाभयदर्शनोपपत्तिभ्योऽस्त्येव | आकाशादिका कारणरूप ब्रह्म है तदाकाशादिकारणं ब्रह्मेत्यपा- | ही—इस प्रकार एक अनुप्रश्नका निराकरण किया गया। दूसरे दो कृतोऽनुप्रश्न एकः। द्वावन्याव- | अनुप्रश्न विद्वान् और अविद्वान्की नुप्रश्नौ विद्वदविदुषोर्ब्रह्मप्राप्त्य- | ब्रह्मप्राप्ति और ब्रह्मकी अप्राप्तिके विषयमें हैं। उनमें अन्तिम अनुप्रश्न प्राप्तिविषयौ तत्र विद्वान्सम् अश्नुते | यही है कि 'विद्वान् ब्रह्मको प्राप्त न समश्नुत इत्यनुप्रश्नोऽन्त्यस्त- | होता है या नहीं?' उसका निराकरण करनेके लिये कहा जाता है। दपाकरणायोच्यते। मध्यमोऽनु- | मध्यम अनुप्रश्नका निराकरण तो प्रश्नोऽन्त्यापाकरणादेवापाकृत | अन्तिमके निराकरणसे ही हो जायगा; इसलिये उसके निराकरणका इति तदपाकरणाय न यत्यते। | यत्न नहीं किया जाता।
\hspace{10pt} स यः कश्चिदेवं यथोक्तं ब्रह्म | \hspace{10pt} इस प्रकार जो कोई उत्कर्ष और उत्सृज्योत्कर्षापकर्षमद्वैतं सत्यं | अपकर्षको त्यागकर 'मैं ही उपर्युक्त सत्य, ज्ञान और अनन्तरूप अद्वैत ब्रह्म ज्ञानमनन्तमस्मीत्येवं वेत्ती- | हूँ' ऐसा जानता है वह एवंवित्
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[Header] अनु० ८ ] शाङ्करभाष्यार्थ १९५
[संस्कृत-मूलभाष्यम्] त्येवंवित् । एवंशब्दस्य प्रकृत- परामर्शार्थत्वात् । स किम् ? अस्माल्लोकात्प्रेत्य दृष्टादृष्टेष्टवि- षयसमुदायो ह्ययं लोकस्तस्मा- ल्लोकात्प्रेत्य प्रत्यावृत्य निरपेक्षो भूत्वैतं यथाव्याख्यातमन्नमय- मात्मानमुपसंक्रामति । विषयजात- मन्नमयात्पिण्डात्मनो व्यतिरिक्तं न पश्यति । सर्वं स्थूलभूतमन्न- मयमात्मानं पश्यतीत्यर्थः । ततोऽभ्यन्तरमेतं प्राणमयं सर्वान्न मयात्मस्थम विभक्तम् । अथैतं मनोमयं विज्ञानमयमा- नन्दमयमात्मानमुपसंक्रामति । अथादृश्येऽनात्म्येऽनिरुक्तेऽनिल- यनेऽभयं प्रतिष्ठां विन्दते । तत्रैतच्चिन्त्यम् । कोऽयमेवं- [पार्श्व-टिप्पणी: तृतीयानुप्रश्न-विचारः] वित्कथं वा संक्राम- तीति । किं परस्मा- दात्मनोऽन्यः संक्रमणकर्ता प्रवि- भक्त उत स एवेति ।
[हिन्दी-अनुवाद] (इस प्रकार जाननेवाला) है; क्योंकि 'एवम्' शब्द प्रसंगमें आये हुए पदार्थ- का परामर्श (निर्देश) करनेके लिये हुआ करता है । वह एवंवित् क्या [करता है] ? इस लोकसे जाकर — दृष्ट और अदृष्ट इष्ट विषयों- का समुदाय ही यह लोक है, उस इस लोकसे प्रेत्य-प्रत्यावर्तन करके (लौटकर) अर्थात् उससे निरपेक्ष होकर इस ऊपर व्याख्या किये हुए अन्नमय आत्माको प्राप्त होता है । अर्थात् वह विषयसमूहको अन्नमय शरीरसे भिन्न नहीं देखता; तात्पर्य यह है कि सम्पूर्ण स्थूल भूतवर्गको अन्नमय शरीर ही समझता है । उसके भीतर वह सम्पूर्ण अन्नमय कोशोंमें स्थित विभागहीन प्राणमय आत्माको देखता है । और फिर क्रमशः इस मनोमय, विज्ञानमय और आनन्दमय आत्माको प्राप्त होता है । तत्पश्चात् वह इस अदृश्य, अशरीर, अनिर्वचनीय और अनाश्रय आत्मामें अभयस्थिति प्राप्त कर लेता है । अब यहाँ यह विचारना है कि यह इस प्रकार जाननेवाला है कौन ? और यह किस प्रकार संक्रमण करता है ? वह संक्रमणकर्ता परमात्मासे भिन्न है अथवा स्वयं वही है ।
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१९६ तैत्तिरीयोपनिषद् [ वल्ली २
१९६ तैत्तिरीयोपनिषद् [ वल्ली २
किं ततः ? | पूर्व०-इस विचारसे लाभ क्या है ? | यद्यन्यः स्याच्छ्रुतिविरोधः । | सिद्धान्ती-यदि वह उससे भिन्न “तत्सृष्ट्वा तदेवानुप्राविशत्” | है तो “उसे रचकर उसीमें अनुप्रविष्ट ( तै० उ० २ । ६ । १) “अ- | हो गया” “यह अन्य है और मैं न्योऽसावन्योऽहमस्मीति । न स | अन्य हूँ-इस प्रकार जो कहता है वेद” ( बृ० उ० १ । ४ । १० ) | वह नहीं जानता” “एक ही “एकमेवाद्वितीयम्” ( छा० उ० | अद्वितीय” “तू वह है” इत्यादि ६ । २ । १) “तत्त्वमसि” | श्रुतियोंसे विरोध होगा । और यदि ( छा० उ० ६ । ८-१६ ) इति । | वह स्वयं ही आनन्दमय आत्माको अथ स एव, आनन्दमयमात्मानमु- | प्राप्त होता है तो उस [ एक ही ] पसंक्रामतीति कर्मकर्तृत्वानुप- | में कर्म और कर्तापन दोनोंका होना पत्तिः, परस्यैव च संसारित्वं | असम्भव है, तथा परमात्माको ही पराभावो वा । | संसारित्वकी प्राप्ति अथवा उसके | परमात्मत्वका अभाव सिद्ध होता है । | यद्युभयथा प्राप्तो दोषो न | पूर्व०-यदि दोनों ही अवस्थाओं- | में प्राप्त होनेवाले दोषका परिहार परिहर्तुं शक्यत इति व्यर्था | नहीं किया जा सकता तो उसका | विचार करना व्यर्थ है और यदि चिन्ता । अथान्यतरस्मिन्पक्षे | किसी एक पक्षको स्वीकार कर लेनेसे | दोषकी प्राप्ति नहीं होती अथवा दोषाप्राप्तिस्तृतीये वा पक्षेऽदुष्टे | कोई तीसरा निर्दोष पक्ष हो तो उसे स एव शास्त्रार्थ इति व्यर्थैव | ही शास्त्रका आशय समझना चाहिये । | ऐसी अवस्था में भी विचार करना चिन्ता । | व्यर्थ ही होगा । | न; तन्निर्धारणार्थत्वात् । सत्यं | सिद्धान्ती-नहीं, क्योंकि यह | उसका निश्चय करनेके लिये है ।
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अनु० ८ ] शाङ्करभाष्यार्थ १२७ प्राप्तो दोषो न शक्यः परिहर्तु- | यह ठीक है कि इस प्रकार प्राप्त | होनेवाला दोष निवृत्त नहीं किया मन्यतरस्मिंस्तृतीये वा पक्षेऽदुष्टे- | जा सकता तथा उपर्युक्त दोनों | पक्षोंमेंसे किसी एकका अथवा किसी ऽवधृते व्यर्था चिन्ता स्यान्न तु | तीसरे निर्दोष पक्षका निश्चय हो | जानेपर भी यह विचार व्यर्थ ही सोऽवधृत इति तदवधारणार्थ- | होगा। किन्तु उस पक्षका निश्चय | तो नहीं हुआ है; अतः उसका | निश्चय करनेके लिये होनेके कारण त्वादर्थवत्येवैषा चिन्ता । | यह विचार सार्थक ही है । सत्यमर्थवती चिन्ता शास्त्रा- | पूर्व०—शास्त्रके तात्पर्यका निश्चय | करनेके लिये होनेसे तो सचमुच र्थावधारणार्थत्वात् । चिन्तयसि | यह विचार सार्थक है, परन्तु तू तो | केवल विचार ही करता है, निर्णय च त्वं न तु निर्णेष्यसि, | तो कुछ करेगा नहीं । किं न निर्णेतव्यमिति वेद- | सिद्धान्ती—निर्णय नहीं करना वचनम् ? | चाहिये—ऐसा क्या कोई वेदवाक्य है ? न। | पूर्व०—नहीं । कथं तर्हि ? | सिद्धान्ती—तो फिर निर्णय क्यों | नहीं होगा ? बहुप्रतिपक्षत्वात् । एकत्ववादी | पूर्व०—क्योंकि तेरा प्रतिपक्ष | बहुत है। वेदार्थपरायण होनेके त्वम्, वेदार्थपरत्वात्, बहवो हि | कारण तू तो एकत्ववादी है किन्तु | तेरे प्रतिपक्षी वेदबाह्य नानात्ववादी नानात्ववादिनो वेदबाह्यास्त्व- | बहुत हैं। इसलिये मुझे सन्देह है त्प्रतिपक्षाः । अतो ममाशङ्कां न | कि तू मेरी शङ्काका निर्णय नहीं निर्णेष्यसीति । | कर सकेगा। एतदेव मे स्वस्त्ययनं यन्मा- | सिद्धान्ती—तूने जो मुझे बहुत-से
१९८ तैत्तिरीयोपनिषद् [ वल्ली २
मेकयोगिनमनेकयोगिबहुप्रतिप- | अनेकत्ववादी प्रतिपक्षियोंसे युक्त | एकत्ववादी बतलाया है—यही बड़े क्षमात्थ । अतो जेप्यामि सर्वान्; | मङ्गलकी बात है । अतः अब मैं | सबको जीत लूँगा; ले, मैं विचार आरभे च चिन्ताम् । | आरम्भ करता हूँ । स एव तु स्यात्तद्भावस्य वि- | वह संक्रमणकर्ता परमात्मा ही | है; क्योंकि यहाँ जीवको परमात्म- वक्षितत्वात् । तद्विज्ञानेन परमा- | भावकी प्राप्ति बतलानी अभीष्ट है । | 'ब्रह्मवेत्ता परमात्माको प्राप्त कर लेता त्मभावो ह्यत्र विवक्षितो ब्रह्म- | है' इस वाक्यके अनुसार यहाँ ब्रह्म- | विज्ञानसे परमात्मभावकी प्राप्ति होती विदाप्नोति परमिति । न ह्यन्य- | है—यही प्रतिपादन करना इष्ट है । | किसी अन्य पदार्थका अन्य पदार्थ- स्यान्यभावापत्तिरुपपद्यते । ननु | भावको प्राप्त होना सम्भव नहीं है । | यदि कहो कि उसका स्वयं अपने तस्यापि तद्भावापत्तिरनुपपन्नैव ? | स्वरूपको प्राप्त होना भी असम्भव | ही है, तो ऐसी बात नहीं है; न; अविद्याकृततादात्म्यापो- | क्योंकि यह कथन केवल अविद्यासे | आरोपित अनात्मपदार्थोंका निषेध हार्थात् । या हि ब्रह्मविद्यया | करनेके लिये ही है । [ तात्पर्य यह | है कि ] ब्रह्मविद्याके द्वारा जो स्वात्मप्राप्तिरुपदिश्यते साविद्या- | अपने आत्मस्वरूपकी प्राप्तिका | उपदेश किया जाता है वह अविद्या- कृतस्यान्नादिविशेषात्मन आत्म- | कृत अन्नमयादि कोशरूप विशेषात्मा- | का अर्थात् आत्मभावसे आरोपित त्वेनाध्यारोपितस्यानात्मनोऽपो- | किये हुए अनात्माका निषेध करनेके | लिये ही है । हार्था । | कथमेवमर्थतावगम्यते ? | पूर्व०—उसका इस प्रयोजनके | लिये होना कैसे जाना जाता है ?
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अनु० ८ ] शाङ्करभाष्यार्थ १९९ विद्यामात्रोपदेशात् । विद्या- | सिद्धान्ती—केवल ज्ञानका ही याश्च दृष्टं कार्यमविद्यानिवृत्ति- | उपदेश किया जानेके कारण । अज्ञानकी निवृत्ति—यह ज्ञानका स्तच्चेह विद्यामात्रमात्मप्राप्तौ | प्रत्यक्ष कार्य है, और यहाँ आत्माकी प्राप्तिमें वह ज्ञान ही साधन बतलाया साधनमुपदिश्यते । | गया है । मार्गविज्ञानोपदेशवदिति चे- | पूर्व०—यदि वह मार्गविज्ञानके उपदेशके समान हो तो ? [ अब त्नात्मत्वे विद्यामात्रसाधनोप- | इसीकी व्याख्या करते हैं—] केवल ज्ञानका ही साधनरूपसे उपदेश देशोऽहेतुः । कस्मात् ? देशान्तर- | किया जाना उसकी परमात्मरूपतामें कारण नहीं हो सकता । ऐसा प्राप्तौ मार्गविज्ञानोपदेशदर्श- | क्यों है ? क्योंकि देशान्तरकी प्राप्तिके लिये भी मार्गविज्ञानका उपदेश होता नात् । न हि ग्राम एव गन्तेति | देखा गया है । ऐसी अवस्थामें ग्राम ही गमन करनेवाला नहीं हुआ चेत् ? | करता—ऐसा माने तो ? न, वैधर्म्यात् । तत्र हि ग्राम- | सिद्धान्ती—ऐसा कहना ठीक नहीं क्योंकि वे दोनों समान धर्मवाले नहीं विषयं विज्ञानं नोपदिश्यते । | हैं । * [तुमने जो दृष्टान्त दिया है ] उसमें ग्रामविषयक विज्ञानका उपदेश तत्प्राप्तिमार्गविषयमेवोपदिश्यते | नहीं दिया जाता, केवल उसकी प्राप्तिके मार्गसे सम्बन्धित विज्ञान-
- ग्रामको जानेवाले और ब्रह्मको प्राप्त होनेवालेमें बड़ा अन्तर है । इसके सिवा ग्रामको जानेवालेको जो मार्गके विज्ञानका उपदेश किया जाता है उसमें यह नहीं कहा जाता कि 'तू अमुक ग्राम है' परन्तु ब्रह्मज्ञानका उपदेश तो 'तू ब्रह्म है' इस अभेदसूचक वाक्यसे ही किया जाता है । CC-0 Pt. Chakradhar Joshi and Sons, Dev Prayag. Digitized by eGangotri
२०० तैत्तिरीयोपनिषद् [ वल्ली २
२०० तैत्तिरीयोपनिषद् [ वल्ली २ विज्ञानम् । न तथैह ब्रह्मविज्ञानं | का ही उपदेश किया जाता है । | उसके समान इस प्रसङ्गमें ब्रह्म- व्यतिरेकेण साधनान्तरविषयं | विज्ञानसे भिन्न किसी अन्य साधन- | सम्बन्धी विज्ञानका उपदेश नहीं विज्ञानमुपदिश्यते । | किया जाता । उक्तकर्मादिसाधनापेक्षं ब्रह्म- | यदि कहो कि [ पूर्वकाण्डमें ] | कहे हुए कर्मकी अपेक्षावाला ब्रह्मज्ञान विज्ञानं परप्राप्तौ साधनमुप- | परमात्माकी प्राप्तिमें साधनरूपसे | उपदेश किया जाता है, तो ऐसी दिश्यत इति चेन्न; नित्य- | बात भी नहीं है; क्योंकि मोक्ष | नित्य है—इत्यादि हेतुओंसे इसका त्वान्मोक्षस्येत्यादिना प्रत्युक्त- | पहले ही निराकरण किया जा चुका | है । 'उसे रचकर वह उसीमें अनु- त्वात् । श्रुतिश्च तत्सृष्ट्वा तदेवा- | प्रविष्ट हो गया' यह श्रुति भी कार्य- | में स्थित आत्माका परमात्मत्व प्रदर्शित नुप्राविशदिति कार्यस्थस्य तदा- | करती है । अभय-प्रतिष्ठाकी उपपत्ति- त्मत्वं दर्शयति । अभयप्रतिष्ठोप- | के कारण भी [ उनका अभेद ही | मानना चाहिये ] । यदि ज्ञानी अपनेसे पत्तेश्च । यदि हि विद्यावान्स्वा- | भिन्न किसी औरको नहीं देखता | तो वह अभयस्थितिको प्राप्त कर त्मनोऽन्यन्न पश्यति ततोऽभयं | लेता है—ऐसा कहा जा सकता | है; क्योंकि उस अवस्थामें भयके प्रतिष्ठां विन्दत इति स्याद्भयहेतोः | हेतुभूत अन्य पदार्थकी सत्ता नहीं | रहती । अन्य पदार्थ [ अर्थात् परस्यान्यस्याभावात् । अन्यस्य | द्वैत ] के अविद्याकृत होनेपर चाविद्याकृतत्वे विद्ययावस्तुत्व- | ही विद्याके द्वारा उसके अवस्तुत्व- | दर्शनकी उपपत्ति हो सकती दर्शनोपपत्तिस्तद्धि द्वितीयस्य | है । [ भ्रान्तिवश प्रतीत होनेवाले ]
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अनु० ८ ] शाङ्करभाष्यार्थ २०१ चन्द्रस्य सत्त्वं यदतैमिरेकेण | द्वितीय चन्द्रमाकी वास्तविकता यही है कि वह तिमिररोगरहित चक्षुष्मता न गृह्यते । नेत्रोंवाले पुरुषद्वारा ग्रहण नहीं किया जाता। नैवं न गृह्यत इति चेत् ? पूर्व०-परन्तु द्वैतका ग्रहण न होता हो-ऐसी बात तो है नहीं । न, सुषुप्तसमाहितयोर- सिद्धान्ती-ऐसा मत कहो; क्योंकि सोये हुए और समाधिस्थ ग्रहणात् । पुरुषको उसका ग्रहण नहीं होता । सुषुप्तेऽग्रहणमन्यासक्तवदिति पूर्व०-किन्तु सुषुप्तिमें जो द्वैतका अग्रहण है वह तो विषयान्तरमें चेत् ? . आसक्तचित्त पुरुषके अग्रहणके समान है ? न, सर्वाग्रहणात् । जाग्रत्स्वप्न- सिद्धान्ती-नहीं, क्योंकि उस समय तो सभी पदार्थोंका अग्रहण योरन्यस्य ग्रहणात्सत्त्वमेवेति है [ फिर वह अन्यासक्तचित्त कैसे कहा जा सकता है ? ] यदि कहो कि जाग्रत् और स्वप्नावस्था में अन्य चेन्न; अविद्याकृतत्वाज्जाग्र- पदार्थोंका ग्रहण होनेसे उनकी सत्ता है ही, तो ऐसा कहना भी ठीक नहीं; त्स्वप्नयोः; यदन्यग्रहणं जाग्रत्स्वप्न- क्योंकि जाग्रत् और स्वप्न अविद्या- कृत हैं। जाग्रत् और स्वप्नमें जो अन्य योस्तदविद्याकृतमविद्याभावेऽभा- पदार्थका ग्रहण है वह अविद्याके कारण है; क्योंकि अविद्याकी निवृत्ति होनेपर उसका अभाव हो जाता है ? वात् । सुषुप्तेऽग्रहणमप्यविद्याकृत- पूर्व०-सुषुप्तिमें जो अग्रहण है वह भी तो अविद्याके ही कारण है। मिति चेत् ?
२०२ तैत्तिरीयोपनिषद् [ वल्ली २
२०२ तैत्तिरीयोपनिषद् [ वल्ली २ न, स्वाभाविकत्वात् । द्रव्य- | सिद्धान्ती—नहीं, क्योंकि वह तो स्वाभाविक है । द्रव्यका तात्त्विक वस्तुन्स्तात्त्विक- | स्य हि तत्त्वमविक्रि- | स्वरूप तो विकार न होना ही है; विशेषरूपयो- | या परानपेक्षत्वात् । | क्योंकि उसे दूसरेकी अपेक्षा नहीं होती । दूसरेकी अपेक्षावाला होनेके र्निर्वचनम् | विक्रिया न तत्त्वं | कारण विकार तत्त्व नहीं है । जो परापेक्षत्वात् । न हि कारकापेक्षं | कर्ता, कर्म, करण आदि कारकोंकी अपेक्षावाला होता है वह वस्तुका वस्तुनस्तत्त्वम् । सतो विशेषः | तत्त्व नहीं होता । विद्यमान वस्तुका विशेष रूप कारकोंकी अपेक्षावाला कारकापेक्षः, विशेषश्च विक्रिया । | होता है, और विशेष ही विकार होता है । जाग्रत् और स्वप्नका जो जाग्रत्स्वप्नयोश्च ग्रहणं विशेषः । | ग्रहण है वह भी विशेष ही है । जिसका जो रूप अन्यकी अपेक्षासे यद्धि यस्य नान्यापेक्षं स्वरूपं | रहित होता है वही उसका तत्त्व होता है और जो अन्यकी अपेक्षा- तत्तस्य तत्त्वम्, यदन्यापेक्षं न | वाला होता है वह तत्त्व नहीं होता; क्योंकि उस अन्यका अभाव होनेपर तत्तत्त्वम्; अन्याभावेऽभावात् । | उसका भी अभाव हो जाता है । तस्मात्स्वाभाविकत्वाज्जाग्रत्स्वप्न- | अतः [सुषुप्तावस्था] स्वाभाविक होनेके कारण उस समय जाग्रत् और स्वप्न- वन्न सुषुप्ते विशेषः । | के समान विशेषकी सत्ता नहीं है । येषां पुनरीश्वरोऽन्य आत्मनः | किन्तु जिनके मतमें ईश्वर आत्मा- भेददृष्टे- | कार्यं चान्यत्तेषां | से भिन्न है और उसका कार्यरूप यह जगत् भी भिन्न है उनके भयकी र्भयहेतुत्वम् | भयानिवृत्तिर्भयस्या- | निवृत्ति नहीं हो सकती; क्योंकि भय दूसरेके ही कारण हुआ करता न्यनिमित्तत्वात् । सतश्चान्यस्यात्म- | है । अन्य पदार्थ यदि सत् होगा तब तो उसके स्वरूपका अभाव हानानुपपत्तिः । न चासत आ- | नहीं हो सकता और यदि असत्
अनु० ८ ] शाङ्करभाष्यार्थ २०३
त्मलाभः । सापेक्षस्यान्यस्य भय- | होगा तो उसके स्वरूपकी सिद्धि ही नहीं हो सकती । यदि कहो हेतुत्वमिति चेन्न, तस्यापि तुल्य- | कि दूसरा ( ईश्वर ) तो [ हमारे धर्माधर्म आदिकी ] अपेक्षासे ही त्वात् । यद्धर्माद्यनुसहायीभूतं | भयका कारण है, तो ऐसा कहना भी ठीक नहीं; क्योंकि वह [ सापेक्ष ईश्वर ] भी वैसा ही है । जो कोई नित्यमनित्यं वा निमित्तमपेक्ष्या- | [ ईश्वरादि ] दूसरा पदार्थ नित्य या अनित्य अधर्मादिरूप सहायक निमित्त- न्यद्भयकारणं स्यात्तस्यापि तथा- | की अपेक्षासे भयका कारण होता है, यथार्थ होनेके कारण उसके स्वरूपका भी अभाव न होनेसे भूतस्यात्महानाभावाद्भयानिवृत्तिः | उसके भयकी निवृत्ति नहीं हो सकती; और यदि उसके स्वरूपका अभाव आत्महाने वा सदसतोरितरेत- | माना जाय तो सत् और असत्को इतरेतरत्व [ अर्थात् सत्को असत्त्व और असत्को सत्त्व ] की प्राप्ति रापत्तौ सर्वत्रानाश्वास एव । | होनेसे कहीं विश्वास ही नहीं किया जा सकता । \hspace{1cm} एकत्वपक्षे पुनः सनिमित्तस्य | \hspace{0.5cm} परन्तु एकत्व-पक्ष स्वीकार करने-पर तो सारा संसार अपने कारणके ज्ञानाज्ञानयो- \hspace{0.5cm} संसारस्य अविद्या- | सहित अविद्याकल्पित होनेके कारण कोई दोष ही नहीं आता । तिमिर र्नात्मधर्मत्वम् \hspace{0.5cm} कल्पितत्वाददोषः । | रोगके कारण देखे गये द्वितीय चन्द्रमाके स्वरूपकी न तो प्राप्ति ही तैमिरिकदृष्टस्य हि द्वितीयचन्द्र- | होती है और न नाश ही । यदि कहो कि ज्ञान और अज्ञान तो स्य नात्मलाभो नाशो वास्ति । | आत्माके ही धर्म हैं [ इसलिये उनके कारण आत्माका विकार होता होगा ] विद्याविद्ययोस्तद्धर्मत्वमिति चेन्न | तो ऐसा कहना ठीक नहीं; क्योंकि प्रत्यक्षत्वात् । विवेकाविवेकौ | वे तो प्रत्यक्ष ( आत्माके दृश्य ) हैं ।
२०४ तैत्तिरीयोपनिषद् [ वल्ली २ रूपादिवत्प्रत्यक्षावुपलभ्येते अन्तः-| रूप आदि विषयोंके समान अन्तः- करणस्थौ । न हि रूपस्य | करणमें स्थित विवेक और अविवेक प्रत्यक्ष उपलब्ध होते हैं । प्रत्यक्ष प्रत्यक्षस्य सतो द्रष्टृधर्मत्वम् । | उपलब्ध होनेवाला रूप द्रष्टाका धर्म अविद्या च स्वानुभवेन रूप्यते | नहीं हो सकता । 'मैं मूढ हूँ, मेरी बुद्धि मलिन है' इस प्रकार अविद्या मूढोऽहमविविक्तं मम विज्ञान- | भी अपने अनुभवके द्वारा निरूपण मिति । | की जाती है । तथा विद्याविवेकोऽनुभूयते । | इसी प्रकार विद्याका पार्थक्य भी अनुभव किया जाता है । बुद्धिमान् उपदिशन्ति चान्येभ्य आत्मनो | लोग दूसरोंको अपने ज्ञानका उपदेश किया करते हैं । तथा दूसरे लोग विद्याम्।तथा चान्येऽवधारयन्ति। | भी उसका निश्चय करते हैं । अतः तस्मान्नामरूपपक्षस्यैव विद्याविद्ये | विद्या और अविद्या नाम-रूप पक्षके ही हैं, तथा नाम और रूप आत्माके नामरूपे च नात्मधर्मौ । “नाम- | धर्म नहीं हैं, जैसा कि “जो नाम रूपयोर्निर्वहिता ते यदन्तरा | और रूपका निर्वाह करनेवाला है तथा जिसके भीतर वे ( नाम तद्ब्रह्म” ( छा० उ० ८ । १४ । | और रूप ) रहते हैं, वह ब्रह्म है” १) इति श्रुत्यन्तरात् । ते च | इस अन्य श्रुतिसे सिद्ध होता है । वे नाम-रूप भी सूर्यमें दिन और पुनर्नामरूपे सवितर्यहोरात्रे इव | रात्रिके समान कल्पित ही हैं, कल्पिते न परमार्थतो विद्यमाने । | वस्तुतः विद्यमान नहीं हैं । अभेदे “एतमानन्दमयमा- | पूर्व ०–किन्तु [ ईश्वर और जीवका ] अभेद माननेपर तो “वह इस त्मानमुपसंक्रामति” ( तै० उ० | आनन्दमय आत्माको प्राप्त होता है” २ । ८ । ५ ) इति कर्मकर्तृत्व-| इस श्रुतिमें जो [ पुरुषका ] कर्तृत्व और [ आनन्दमय आत्माका ] कर्मत्व बताया नुपपत्तिरिति चेत् ? | है वह उपपन्न नहीं होता ? CC-0 Pt. Chakradhar Joshi and Sons, Dev Prayag. Digitized by eGangotri
अनु० ८ ] शाङ्करभाष्यार्थ २०५ न; विज्ञानमात्रत्वात्संक्रमण- | सिद्धान्ती—नहीं, क्योंकि पुरुष- [संक्रमणशब्द-तात्पर्यम्] स्य । न जलूकादि- | का संक्रमण तो केवल विज्ञानमात्र वत्संक्रमणमिहोप- | है । यहाँ जोंक आदिके संक्रमणके समान पुरुषके संक्रमणका उपदेश दिश्यते, किं तर्हि ? विज्ञानमात्रं | नहीं किया जाता । तो कैसा ? इस संक्रमण-श्रुतिका अर्थ तो केवल संक्रमणश्रुतेरर्थः । | विज्ञानमात्र है ।* ननु मुख्यमेव संक्रमणं श्रूयत | पूर्व ०—'उपसंक्रामति' इस पदसे यहाँ मुख्य संक्रमण ( समीप जाना ) उपसंक्रामतीति चेत् ? | ही अभिप्रेत हो तो ? न; अन्नमयेऽदर्शनात् । न | सिद्धान्ती—नहीं, क्योंकि अन्नमयमें मुख्य संक्रमण देखा नहीं जाता— ह्यन्नमयमुपसंक्रामतो बाह्यादस्मा- | अन्नमयको उपसंक्रमण करनेवालेका ल्लोकाज्जलूकावत्संक्रमणं दृश्यते- | जोंकके समान इस बाह्य जगत्से अथवा किसी और प्रकारसे संक्रमण ऽन्यथा वा । | नहीं देखा जाता । मनोमयस्य बहिर्निर्गतस्य | पूर्व ०—बाहर [निकलकर विषयोंमें] गये हुए मनोमय अथवा विज्ञानमय विज्ञानमयस्य वा पुनः प्रत्या- | कोशोंका तो वहाँसे पुनः लौटनेपर अपनी ओर होना संक्रमण हो ही वृत्त्यात्मसंक्रमणमिति चेत् ? | सकता है ? न; स्वात्मनि क्रियाविरोधा- | सिद्धान्ती—नहीं, क्योंकि इससे अपनेमें ही अपनी क्रिया होना— दन्योऽन्नमयमन्यमुपसंक्रामतीति | यह विरोध उपस्थित होता है । अन्नमयसे भिन्न पुरुष अपनेसे भिन्न प्रकृत्य मनोमयो विज्ञानमयो वा | अन्नमयको प्राप्त होता है—इस प्रकार
- अर्थात् यहाँ 'संक्रमण', शब्दका अर्थ 'जाना' या 'पहुँचना' नहीं बल्कि 'जानना' है । CC-0 Pt. Chakradhar Joshi and Sons, Dev Prayag. Digitized by eGangotri
२०६ तैत्तिरीयोपनिषद् [ वल्ली २
२०६ तैत्तिरीयोपनिषद् [ वल्ली २
स्वात्मानमेवोपसंक्रामतीति वि- | प्रकरणका आरम्भ करके अब ‘मनो- रोधः स्यात् । तथा नानन्दमय- | मय अथवा विज्ञानमय अपनेको ही प्राप्त होता है’ ऐसा कहनेमें स्यात्मसंक्रमणमुपपद्यते । तस्मान्न | उससे विरोध आता है । इसी प्रकार प्राप्तिः संक्रमणं नाप्यन्नमयादी- | आनन्दमयका भी अपनेको प्राप्त होना सम्भव नहीं है; अतः प्राप्तिका नामन्यतमकर्तृकम् । पारिशेष्याद- | नाम संक्रमण नहीं है और न वह अन्नमयादिमेंसे किसीके द्वारा किया न्नमयाद्यानन्दमयान्तात्मव्यति- | जाता है । फलतः आत्मासे भिन्न रिक्तकर्तृकं ज्ञानमात्रं च संक्रमण- | अन्नमयसे लेकर आनन्दमय कोश- पर्यन्त जिसका कर्ता है वह ज्ञानमात्र मुपपद्यते । | ही संक्रमण होना सम्भव है ।
ज्ञानमात्रत्वे चानन्दमयान्तः- | इस प्रकार ‘संक्रमण’ शब्दका स्थस्यैव सर्वान्तरस्याकाशाद्यन्न- | अर्थ ज्ञानमात्र होनेपर ही आनन्दमय कोशके भीतर स्थित सर्वान्तर तथा मयान्तं कार्यं सृष्ट्वानुपविष्टस्य | आकाशसे लेकर अन्नमयकोशपर्यन्त कार्यवर्गको रचकर उसमें अनुप्रविष्ट हृदयगुहाभिसंबन्धादन्नमयादि- | हुए आत्माका जो हृदयगुहाके ष्वनात्मस्वात्मविभ्रमः संक्रमणे- | सम्बन्धसे अन्नमय आदि अनात्माओं- में आत्मत्वका भ्रम है वह संक्रमण- नात्मविवेकविज्ञानोत्पत्त्या विन- | स्वरूप विवेक ज्ञानकी उत्पत्तिसे नष्ट श्यति । तदेतस्मिन्नविद्याविभ्रम- | हो जाता है । अतः इस अविद्यारूप भ्रमके नाशमें ही संक्रमण शब्दका नाशे संक्रमणशब्द उपचर्यते न | उपचार ( गौणरूप ) से प्रयोग किया गया है; इसके सिवा किसी और ह्यन्यथा सर्वगतस्यात्मनः संक्र- | प्रकार सर्वगत आत्माका संक्रमण मणमुपपद्यते । | होना सम्भव नहीं है ।
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अनु० ८ ] शाङ्करभाष्यार्थ २०७ वस्त्वन्तराभावाच्च । न च | आत्मासे भिन्न अन्य वस्तुका स्वात्मन एव संक्रमणम् । न हि | अभाव होनेसे भी [ उसका किसीके | प्रति जानारूप संक्रमण नहीं हो जलूकात्मानमेव संक्रामति । | सकता ] । अपना अपनेको ही | प्राप्त होना तो सम्भव नहीं है । तस्मात्सत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्मेति | जोंक अपने प्रति ही संक्रमण ( गमन ) | नहीं करती । अतः 'ब्रह्म सत्यस्वरूप, यथोक्तलक्षणात्मप्रतिपत्त्यर्थमेव | ज्ञानस्वरूप और अनन्त है' इस | पूर्वोक्त लक्षणवाले आत्माके ज्ञानके बहुभवनसर्गप्रवेशरसलाभाभय- | लिये ही सम्पूर्ण व्यवहारके आधार- | भूत ब्रह्ममें अनेक होना, सृष्टिमें संक्रमणादि परिकल्प्यते ब्रह्मणि | अनुप्रवेश करना, आनन्दकी प्राप्ति, | अभय और संक्रमणादिकी कल्पना सर्वव्यवहारविषये; न तु परमार्थतो | की गयी है; परमार्थतः तो निर्विकल्प | ब्रह्ममें कोई विकल्प होना सम्भव निर्विकल्पे ब्रह्मणि कश्चिदपि | है नहीं । विकल्प उपपद्यते । | तमेतं निर्विकल्पमात्मानमेवं- | इस प्रकार क्रमशः उस इस | निर्विकल्प आत्माके प्रति उपसंक्रमण- क्रमेणोपसंक्रम्य विदित्वा न | कर अर्थात् उसे जानकर साधक बिभेति कुतश्चनाभयं प्रतिष्ठां | किसीसे भयभीत नहीं होता । वह विन्दत इत्येतस्मिन्नर्थेऽप्येष श्लो- | अभयस्थिति प्राप्त कर लेता है । इसी | अर्थमें यह श्लोक भी है । इस को भवति । सर्वस्यैवास्य प्रक- | सम्पूर्ण प्रकरणके अर्थात् आनन्द- रणस्यानन्दवल्ल्यर्थस्य संक्षेपतः | वल्लीके अर्थको संक्षेपसे प्रकाशित प्रकाशनायैष मन्त्रो भवति ॥५॥ | करनेके लिये ही यह मन्त्र है ॥५॥ इति ब्रह्मानन्दवल्ल्यामष्टमोऽनुवाकः ॥ ८ ॥
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नवम अनुवाक ब्रह्मानन्दका अनुभव करनेवाले विद्वान्की अभयप्राप्ति यतो वाचो निवर्तन्ते अप्राप्य मनसा सह । आनन्दं ब्रह्मणो विद्वान् न बिभेति कुतश्चनेति । एतँह वाव न तपति । किमहँसाधु नाकरवम् । किमहं पाप- मकरवमिति । स य एवं विद्वानेते आत्मानँ स्पृणुते । उभे ह्येवैष एते आत्मानँ स्पृणुते । य एवं वेद । इत्युप- निषत् ॥ १ ॥ जहाँसे मनके सहित वाणी उसे प्राप्त न करके लौट आती है उस ब्रह्मके आनन्दको जाननेवाला किसीसे भी भयभीत नहीं होता । उस विद्वान्को, मैंने शुभ क्यों नहीं किया, पापकर्म क्यों कर डाला—इस प्रकारकी चिन्ता सन्तप्त नहीं करती । उन्हें [ ये पाप और पुण्य ही तापके कारण हैं--] इस प्रकार जाननेवाला जो विद्वान् अपने आत्माको प्रसन्न अथवा सबल करता है उसे ये दोनों आत्मस्वरूप ही दिखायी देते हैं । [ वह कौन है ? ] जो इस प्रकार [ पूर्वोक्त अद्वैत आनन्दस्वरूप ब्रह्मको ] जानता है । ऐसी यह उपनिषद् ( रहस्यविद्या ) है ॥ १ ॥ यतो यस्मान्निर्विकल्पाद्यथोक्त- | जिस पूर्वोक्त लक्षणोंवाले | निर्विकल्प अद्वयानन्दरूप आत्माके लक्षणादद्वयानन्दादात्मनो वाचो- | पाससे द्रव्यादि सविकल्प वस्तुओंको | प्रकाशित करनेवाला वाक्य-- ऽभिधानानि द्रव्यादिसविकल्प- | अभिधान, जो वस्तुत्वमें [ ब्रह्मको CC-0 Pt. Chakradhar Joshi and Sons, Dev Prayag. Digitized by eGangotri
[अनु० ९ ] शाङ्करभाष्यार्थ २०९
[मूल संस्कृत (वाम भाग)]
वस्तुविषयाणि वस्तुसामान्या- न्निर्विकल्पेऽद्वयेऽपि ब्रह्मणि प्रयो- क्तृभिः प्रकाशनाय प्रयुज्यमाना- न्यप्राप्याप्रकाशयैव निवर्तन्ते स्वसामर्थ्याद्धीयन्ते— मन इति प्रत्ययो विज्ञानम् । तच्च यत्राभिधानं प्रवृत्तमतीन्द्रि- येऽप्यर्थे तदर्थे च प्रवर्तते प्रका- शनाय । यत्र च विज्ञानं तत्र वाचः प्रवृत्तिः । तस्मात्सहैव वाङ्मनसयोरभिधानप्रत्यययोः प्रवृत्तिः सर्वत्र । तस्माद्ब्रह्मप्रकाशनाय सर्वथा प्रयोक्तृभिः प्रयुज्यमाना अपि वाचो यस्मादप्रत्ययविषयादन- भिधेयाददृश्यादिविशेषणात्सहैव मनसा विज्ञानेन सर्वप्रकाशन- समर्थेन निवर्तन्ते तं ब्रह्मण आ- नन्दं श्रोत्रियस्यावृजिनस्याकामह- तै० उ० २७–२८--
[हिन्दी भाष्यार्थ (दक्षिण भाग)]
अन्य सविकल्प वस्तुओंके ] समान समझनेके कारण वक्ताओंद्वारा, ब्रह्म- के निर्विकल्प और अद्वैत होनेपर भी, उसका निर्देश करनेके लिये प्रयोग किया जाता है, उसे न पाकर अर्थात् उसे प्रकाशित किये बिना ही लौट आता है—अपनी सामर्थ्यसे च्युत हो जाता है— [ 'मनसा सह' ( मनके सहित ) इस पदसमूहमें ] 'मन' शब्द प्रत्यय अर्थात् विज्ञानका वाचक है । वह, जहाँ-कहीं अतीन्द्रिय पदार्थोंमें भी शब्दकी प्रवृत्ति होती है वहीं उसे प्रकाशित करनेके लिये प्रवृत्त हुआ करता है । जहाँ-कहीं भी विज्ञान है वहीं वाणीकी भी प्रवृत्ति है । अतः अभिधान और प्रत्ययरूप वाणी और मनकी सर्वत्र साथ-साथ ही प्रवृत्ति होती है । इसलिये वक्ताओंद्वारा सर्वथा ब्रह्मका प्रकाश करनेके लिये ही प्रयोग की हुई वाणी, जिस प्रतीतिके अविषयभूत, अकथनीय, अदृश्य और निर्विशेष ब्रह्मके पाससे मन अर्थात् सबको प्रकाशित करनेमें समर्थ विज्ञानके सहित लौट आती है उस ब्रह्मके आनन्दको—श्रोत्रिय निष्पाप
२१० तैत्तिरीयोपनिषद् [ वल्ली २
२१० तैत्तिरीयोपनिषद् [ वल्ली २ तस्य सर्वैषणाविनिर्मुक्तस्यात्मभूतं | अकामहत और सब प्रकारकी विषयविषयिसंबन्धविनिर्मुक्तं | एषणाओंसे मुक्त साधकके आत्मभूत, स्वाभाविकं नित्यमविभक्तं पर- | विषय-विषयी सम्बन्धसे रहित, स्वाभाविक, नित्य और अविभक्त मानन्दं ब्रह्मणो विद्वान्यथोक्तेन | ऐसे ब्रह्मके उत्कृष्ट आनन्दको पूर्वोक्त विधिसे जाननेवाला पुरुष कोई विधिना न बिभेति कुतश्चन | भयका निमित्त न रहनेके कारण निमित्ताभावात् । | किसीसे भयभीत नहीं होता । न हि तस्माद्विदुषोऽन्यद्वस्त्व- | उस विद्वान्से भिन्न कोई दूसरी न्तरमस्ति भिन्नं यतो बिभेति । | वस्तु ही नहीं है जिससे कि उसे भय अविद्यया यदोदरमन्तरं कुरुते, | हो । अविद्यावश जब थोड़ा-सा भी अन्तर करता है तभी जीवको भय अथ तस्य भयं भवतीति ह्युक्तम् । | होता है—ऐसा कहा ही गया है । विदुषश्चाविद्याकार्यस्य तैमिरिक- | अतः तिमिररोगीके देखे हुए द्वितीय चन्द्रमाके समान विद्वान्के अविद्या- दृष्टद्वितीयचन्द्रवन्नाशाद्भयनिमि- | के कार्यभूत भयके निमित्तका नाश त्तस्य न बिभेति कुतश्चनेति | हो जानेके कारण वह किसीसे नहीं युज्यते । | डरता—ऐसा कहना ठीक ही है । मनोमये चोदाहृतो मन्त्रो | मनोमय कोशके प्रकरणमें यह मन्त्र उदाहरणके लिये दिया गया मनसो ब्रह्मविज्ञानसाधनत्वात् । | था; क्योंकि मन ब्रह्मविज्ञानका तत्र ब्रह्मत्वमध्यारोप्य तत्स्तु- | साधन है । उसमें ब्रह्मत्वका आरोप त्यर्थं न बिभेति कदाचनेति | करके उसकी स्तुतिके लिये ही 'वह कभी नहीं डरता' इस वाक्यसे उसके भयमात्रं प्रतिषिद्धमिहाद्वैतविषये | भयमात्रका प्रतिषेध किया गया था । न बिभेति कुतश्चनेति भयनिमि- | यहाँ अद्वैतप्रकरणमें वह किसीसे नहीं डरता,—इस प्रकार भयके त्तमेव प्रतिषिध्यते । | निमित्तका ही प्रतिषेध किया जाता है। CC-0 Pt. Chakradhar Joshi and Sons, Dev Prayag. Digitized by eGangotri
अनु० ९ ] शाङ्करभाष्यार्थ २११ नन्वस्ति भयनिमित्तं साध्व- शङ्का—किन्तु शुभ कर्मका न करणं पापक्रिया च ? करना और पापकर्म करना यह तो भयका कारण है ही ? नैवम्; कथमित्युच्यते—एतं समाधान—ऐसी बात नहीं है । यथोक्तमेवंचिदम्, ह वावेत्यव- किस प्रकार नहीं है सो बतलाया जाता है—इस पूर्वोक्तको अर्थात् इस धारणार्थो, न तपति नोद्वेज- प्रकार जाननेवालेको वह तप्त—उद्विग्न यति न संतापयति । कथं पुनः अर्थात् सन्तप्त नहीं करता । मूलमें 'ह' और 'वाव' ये निश्चयार्थक साध्वकरणं पापक्रिया च न निपात हैं । वह पुण्यका न करना तपतीत्युच्यते । किं कस्मात्साधु और पापक्रिया उसे किस प्रकार शोभनं कर्म नाकरवं न कृतवा- ताप नहीं देते ? इसपर कहते हैं—'मैंने शुभ कर्म क्यों नहीं किया' नस्मीति पश्चात्संतापो भवत्या- ऐसा पश्चात्ताप मरणकाल समीप सन्ने मरणकाले । तथा किं आनेपर हुआ करता है तथा 'मैंने कस्मात्पापं प्रतिषिद्धं कर्माकरवं पाप यानी प्रतिषिद्ध कर्म क्यों किया' ऐसा दुःख नरकपात आदि- कृतवानस्मीति च नरकपतनादि- के भयसे होता है । ये पुण्यका न दुःखभयात्तापो भवति । ते एते करना और पापका करना इस साध्वकरणपापक्रिये एवमेनं न विद्वान्को इस प्रकार सन्तप्त नहीं करते जैसे कि वे अविद्वान्को किया तपतो यथाविद्वांसं तपतः । करते हैं । कस्मात्पुनर्विद्वांसं न तपत वे विद्वान्को क्यों सन्तप्त नहीं इत्युच्यते—स य एवंविद्वानेते करते ? सो बतलाया जाता है—ये साध्वसाधुनी तापहेतू इत्यात्मानं पाप-पुण्य ही तापके हेतु हैं—इस प्रकार जाननेवाला जो विद्वान् स्पृणुते प्रीणयति बलयति वा आत्माको प्रसन्न अथवा सबल करता CC-0 Pt. Chakradhar Joshi and Sons, Dev Prayag. Digitized by eGangotri
२१२ तैत्तिरीयोपनिषद् [ वल्ली २
यहाँ पृष्ठ का पूर्ण एवं यथावत पाठ प्रस्तुत है:
२१२ तैत्तिरीयोपनिषद् [ वल्ली २ परमात्मभावेनोभे पश्यतीत्यर्थः । | है अर्थात् इन दोनोंको परमात्मभाव- | से देखता है [ उसे ये पाप-पुण्य उभे पुण्यपापे हि यस्मादेवमेष | सन्तप्त नहीं करते ] । क्योंकि ये | पाप-पुण्य दोनों ऐसे हैं [ अर्थात् विद्वानेते आत्मानमात्मरूपेणैव | आत्मस्वरूप हैं ] अतः यह विद्वान् | इस पाप-पुण्यरूप आत्माको आत्म- पुण्यपापे स्वेन विशेषरूपेण | भावनासे ही अपने विशेषरूपसे | शून्य कर आत्माको ही तृप्त करता शून्ये कृत्वात्मानं स्पृणुत एव । | है । वह विद्वान् कौन है ? जो इस | प्रकार जानता है अर्थात् पूर्वोक्त को य एवं वेद यथोक्तमद्वैत- | अद्वैत एवं आनन्दस्वरूप ब्रह्मको | जानता है । उसके आत्मभावसे मानन्दं ब्रह्म वेद तस्यात्मभावेन | देखे हुए पुण्य-पाप निर्वीर्य और | ताप पहुँचानेवाले न होनेसे दृष्टे पुण्यपापे निर्वीर्ये अतापके | जन्मान्तरके आरम्भक नहीं होते । जन्मान्तरारम्भके न भवतः । | इतीयमेवं यथोक्तास्यां वल्लयां | इस प्रकार इस वल्लीमें, जैसी कि | ऊपर कही गयी है, यह ब्रह्मविद्या- ब्रह्मविद्योपनिषत्सर्वाभ्यो विद्या- | रूप उपनिषद् है । अर्थात् इसमें | अन्य सब विद्याओंकी अपेक्षा परम भ्यः परमरहस्यं दर्शितमित्यर्थः । | रहस्य प्रदर्शित किया गया है । इस परं श्रेयोऽस्यां निषण्णमिति ॥ १ ॥ | विद्यामें ही परम श्रेय निहित है ॥१॥ इति ब्रह्मानन्दवल्ल्यां नवमोऽनुवाकः ॥ ९ ॥ इति श्रीमत्परमहंसपरिव्राजकाचार्यगोविन्दभगवत्पूज्यपादशिष्य- श्रीमच्छङ्करभगवतः कृतौ तैत्तिरीयोपनिषद्भाष्ये ब्रह्मानन्दवल्ली समाप्ता । CC-0 Pt. Chakradhar Joshi and Sons, Dev Prayag. Digitized by eGangotri
भृगुवल्ली
भृगुवल्ली प्रथम अनुवाक भृगुका अपने पिता वरुणके पास जाकर ब्रह्मविद्याविषयक प्रश्न करना तथा वरुणका ब्रह्मोपदेश सत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्माकाशा- | क्योंकि सत्य, ज्ञान और अनन्त दिकार्यमन्नमयान्तं | ब्रह्म ही आकाशसे लेकर अन्नमय- उपक्रमः सृष्ट्वा तदेवानुप्रविष्टं | पर्यन्त कार्यवर्गको रचकर उसमें | अनुप्रविष्ट हो सविशेष-सा उपलब्ध विशेषवदिवोपलभ्यमानं यस्मा- | हो रहा है इसलिये वह सम्पूर्ण त्स्मात्सर्वकार्यविलक्षणमदृश्यादि- | कार्यवर्गसे विलक्षण अदृश्यादि धर्म- | वाला आनन्द ही है; और वही मैं धर्मकमेवानन्दं तदेवाहमिति | हूँ—ऐसा जानना चाहिये; क्योंकि विजानीयादनुप्रवेशस्य तदर्थत्वा- | उसके अनुप्रवेशका यही उद्देश्य | है । इस प्रकार जाननेवाले उस त्तस्यैवं विजानतः शुभाशुभे | साधकके शुभाशुभ कर्म जन्मान्तरका कर्मणी जन्मान्तरारम्भके न | आरम्भ करनेवाले नहीं होते । | आनन्दवल्लीमें यही विषय कहना भवत इत्येवमानन्दवल्ल्यां विव- | अभीष्ट था । अब ब्रह्मविद्या तो क्षितोऽर्थः परिसमाप्ता च ब्रह्म- | समाप्त हो चुकी । यहाँसे आगे | ब्रह्मविद्याके साधन तपका निरूपण विद्या । अतः परं ब्रह्मविद्या- | करना है तथा जिनका पहले | निरूपण नहीं किया गया है उन साधनं तपो वक्तव्यमन्नादिविष- | अन्नादिविषयक उपासनाओंका भी याणि चोपासनान्यनुक्तानीत्यत | वर्णन करना है; इसीलिये इस
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