भारतकोश
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तैत्तिरीयोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Taittiriya Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished261 पृष्ठ

अनु० १ ] शाङ्करभाष्यार्थ १२३

दक्षिणो बाहुः पूर्वाभिमुखस्य | मुख व्यक्तिका यह दक्षिण [ दक्षिण दक्षिणः पक्षः । अयं सव्यो बाहु- | दिशाकी ओरका ] बाहु दक्षिण रुत्तरः पक्षः । अयं मध्यमो देह- | पक्ष है, यह वाम बाहु उत्तर पक्ष भाग आत्माङ्गानाम् । "मध्यं | है तथा यह देहका मध्यभाग अङ्गों- ह्येषामङ्गानामात्मा" इति श्रुतेः । | का आत्मा है; जैसा कि "मध्यभाग इदमिति नाभेरधस्ताद्यदङ्गं | ही इन अङ्गोंका आत्मा है" इस तत्पुच्छं प्रतिष्ठा । प्रतितिष्ठत्यन- | श्रुतिसे प्रमाणित होता है । और येति प्रतिष्ठा पुच्छमिव पुच्छम् | यह जो नाभिसे नीचेका अङ्ग है अधोलम्बनसामान्याद्यथा गोः | वही पुच्छ—प्रतिष्ठा है । इसके पुच्छम् । | द्वारा वह स्थित होता है, इसलिये यह एतत्प्रकृत्योत्तरेषां प्राणमया- | उसकी प्रतिष्ठा है । नीचेकी ओर दीनां रूपकत्वसिद्धिः; मूषानिषि- | लटकनेमें समानता होनेके कारण क्तद्रुतताम्रप्रतिमावत् । तदप्येष | वह पुच्छके समान पुच्छ है; जैसे श्लोको भवति । तत्तस्मिन्नेवार्थे | कि गौकी पूँछ । ब्राह्मणोक्तेऽन्नमयात्मप्रकाशक | इस अन्नमय कोशसे आरम्भ एष श्लोको मन्त्रो भवति ॥ १ ॥ | करके ही साँचेमें डाले हुए पिघले | ताँबेकी प्रतिमाके समान आगेके | प्राणमय आदि कोशोंके रूपकत्वकी | सिद्धि होती है । उसके विषयमें ही | यह श्लोक है; अर्थात् अन्नमय | आत्माको प्रकाशित करनेवाले उस | ब्राह्मणोक्त अर्थमें ही यह श्लोक | अर्थात् मन्त्र है ॥ १ ॥

इति ब्रह्मानन्दवल्ल्यां प्रथमोऽनुवाकः ॥ १ ॥

द्वितीय अनुवाक अन्नकी महिमा तथा प्राणमय कोशका वर्णन अन्नाद्वै प्रजाः प्रजायन्ते । याः काश्च पृथिवीꣳ- श्रिताः । अथो अन्नेनैव जीवन्ति । अथैनदपि यन्त्य- न्ततः । अन्नꣳ हि भूतानां ज्येष्ठम् । तस्मात्सर्वौषधमुच्यते । सर्वं वै तेऽन्नमाप्नुवन्ति येऽन्नं ब्रह्मोपासते । अन्नꣳ हि भूतानां ज्येष्ठम् । तस्मात्सर्वौषधमुच्यते । अन्नाद्भूतानि जायन्ते । जातान्यन्नेन वर्धन्ते । अद्यतेऽत्ति च भूतानि । तस्मादन्नं तदुच्यत इति । तस्माद्वा एतस्मादन्नरसमयाद्- न्योऽन्तर आत्मा प्राणमयः । तेनैष पूर्णः । स वा एष पुरुषविध एव । तस्य पुरुषविधतामन्वयं पुरुषविधः । तस्य प्राण एव शिरः । व्यानो दक्षिणः पक्षः । अपान उत्तरः पक्षः । आकाश आत्मा । पृथिवी पुच्छं प्रतिष्ठा । तदप्येष श्लोको भवति ॥ १ ॥ अन्नसे ही प्रजा उत्पन्न होती है। जो कुछ प्रजा पृथिवीको आश्रित करके स्थित है वह सब अन्नसे ही उत्पन्न होती है; फिर वह अन्नसे ही जीवित रहती है और अन्तमें उसीमें लीन हो जाती है; क्योंकि अन्न ही प्राणियोंका ज्येष्ठ (अग्रज—पहले उत्पन्न होनेवाला) है। इसीसे वह सर्वौषध कहा जाता है। जो लोग 'अन्न ही ब्रह्म है' इस प्रकार उपासना करते हैं वे निश्चय ही सम्पूर्ण अन्न प्राप्त करते हैं। अन्न ही प्राणियोंमें बड़ा है; इसलिये वह सर्वौषध कहलाता है। अन्नसे ही प्राणी उत्पन्न होते हैं, उत्पन्न होकर अन्नसे ही वृद्धिको प्राप्त होते हैं। अन्न CC-0 Pt. Chakradhar Joshi and Sons, Dev Prayag. Digitized by eGangotri

अनु० २ ] शाङ्करभाष्यार्थ १२५

प्राणियोंद्वारा खाया जाता है और वह भी उन्हींको खाता है । इसीसे वह 'अन्न' कहा जाता है । उस इस अन्नरसमय पिण्डसे, उसके भीतर रहनेवाला दूसरा शरीर प्राणमय है । उसके द्वारा यह ( अन्नमय कोश ) परिपूर्ण है। वह यह ( प्राणमय कोश ) भी पुरुषाकार ही है । उस ( अन्नमय कोश ) की पुरुषाकारताके अनुसार ही यह भी पुरुषाकार है । उसका प्राण ही शिर है । व्यान दक्षिण पक्ष है । अपान उत्तर पक्ष है । आकाश आत्मा ( मध्यभाग ) है और पृथिवी पुच्छ—प्रतिष्ठा है । उसके विषयमें ही यह श्लोक है ॥ १ ॥ अन्नाद्रसादिभावपरिणतात्, | रसादिरूपमें परिणत हुए अन्नसे [अन्नमयोपासन-] वा इति स्मरणार्थः, | ही स्थावर-जङ्गमस्वरूप प्रजा उत्पन्न [फलम्] प्रजाः स्थावरजङ्ग- | होती है । 'वै' यह निपात स्मरणके माः प्रजायन्ते । याः काश्चा- | अर्थमें है । जो कुछ प्रजा अविशेष विशिष्टाः पृथिवीं श्रिताः पृथि- | भावसे पृथिवीको आश्रित किये हुए है वीमाश्रितास्ताः सर्वा अन्नादेव | वह सब अन्नसे ही उत्पन्न होती है । प्रजायन्ते । अथो अपि जाता | और फिर उत्पन्न होनेपर वह अन्नसे अन्नेनैव जीवन्ति प्राणान्धार- | ही जीवित रहती—प्राण धारण यन्ति वर्धन्त इत्यर्थः । अथाप्ये- | करती अर्थात् वृद्धिको प्राप्त होती है । नदन्नमपियन्त्यपिगच्छन्ति । | और अन्तमें—जीवनरूप वृत्तिकी अपिशब्दः प्रतिशब्दार्थे । | समाप्ति होनेपर वह अन्नमें ही लीन अन्नं प्रति प्रलीयन्त इत्यर्थः । | हो जाती है । [ 'अपियन्ति' इसमें ] अन्ततोऽन्ते जीवनलक्षणाया | 'अपि' शब्द 'प्रति' के अर्थमें है । वृत्तेः परिसमाप्तौ । | अर्थात् वह अन्नके प्रति ही लीन | हो जाती है । कस्मात् ? अन्नं हि यस्माद् | इसका कारण क्या है ? क्योंकि भूतानां प्राणिनां ज्येष्ठं प्रथमजम् । | अन्न ही प्राणियोंका ज्येष्ठ यानी अन्नमयादीनां हीतरेषां भूतानां | अग्रज है । अन्नमय आदि जो इतर | प्राणी हैं उनका कारण अन्न ही है ।

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१२६ तैत्तिरीयोपनिषद् [ वल्ली २

१२६ तैत्तिरीयोपनिषद् [ वल्ली २ कारणमन्नमतोऽन्नप्रभवा अन्न- | इसलिये सम्पूर्ण प्रजा अन्नसे उत्पन्न होनेवाली, अन्नके द्वारा जीवित रहनेवाली और अन्नमें ही लीन हो जानेवाली है । क्योंकि ऐसी बात है, इसलिये अन्न सर्वौषध—सम्पूर्ण प्राणियोंके देहके सन्तापको शान्त करनेवाला कहा जाता है । जीवना अन्नप्रलयाश्च सर्वाः प्रजाः। यस्माच्चैवं तस्मात्सर्वौषधं सर्व- प्राणिनां देहदाहप्रशमनमन्न- मुच्यते । अन्नब्रह्मविदः फलमुच्यते— | अन्नरूप ब्रह्मकी उपासना करनेवालेका [ प्राप्तव्य ] फल बतलाया जाता है—वे निश्चय ही सम्पूर्ण अन्न-समूहको प्राप्त कर लेते हैं । कौन ? जो उपर्युक्त अन्नकी ही ब्रह्मरूपसे उपासना करते हैं । किस प्रकार [ उपासना करते हैं ] ? इस तरह कि मैं अन्नसे उत्पन्न, अन्नस्वरूप और अन्नमें ही लीन हो जानेवाला हूँ; इसलिये अन्न ब्रह्म है । सर्वं वै ते समस्तमन्नजात- माप्नुवन्ति । के ? येऽन्नं ब्रह्म यथोक्तमुपासते । कथम् ? अन्नजो- ऽन्नात्मान्नप्रलयोऽहं तस्मादन्नं ब्रह्मेति । कुतः पुनः सर्वान्नप्राप्तिफल- | 'अन्न ही आत्मा है' इस प्रकारकी उपासना किस प्रकार सम्पूर्ण अन्नकी प्राप्तिरूप फलवाली है, सो बतलाते हैं—अन्न ही प्राणियोंका ज्येष्ठ है—प्राणियोंसे पहले उत्पन्न होनेके कारण, क्योंकि वह उनसे ज्येष्ठ है इसलिये वह सर्वौषध कहा जाता है। अतः सम्पूर्ण अन्नकी आत्मारूपसे उपासना करनेवालेके लिये सम्पूर्ण अन्नकी प्राप्ति उचित ही है। अन्नसे प्राणी उत्पन्न होते हैं और उत्पन्न मन्नात्मोपासनमित्युच्यते । अन्नं हि भूतानां ज्येष्ठम् । भूतेभ्यः पूर्वं निष्पन्नत्वाज्ज्येष्ठं हि यस्मा- त्तस्मात्सर्वौषधमुच्यते । तस्मादुप- पन्ना सर्वान्नात्मोपासकस्य सर्वा- न्नप्राप्तिः। अन्नाद्भूतानि जायन्ते ।

अनु० २ ] शाङ्करभाष्यार्थ १२७

संस्कृत शाङ्करभाष्यहिन्दी भाष्यार्थ
जातान्यन्नेन वर्धन्त इत्युपसंहा-होनेपर अन्नसे ही वृद्धिको प्राप्त होते
रार्थं पुनर्वचनम् ।हैं—यह पुनरुक्ति उपासनाके
उपसंहारके लिये है ।
इदानीमन्ननिर्वचनमुच्यते—अब 'अन्न' शब्दकी व्युत्पत्ति
(अन्नशब्द-निर्वचनम्) अद्यते भुज्यते चैव यद्भूतैरन्नमत्ति चकही जाती है—जो प्राणियोंद्वारा 'अद्यते'— खाया जाता है और जो स्वयं भी प्राणियोंको 'अत्ति' खाता
भूतानि स्वयं तस्माद्भूतैर्भु-है, इसलिये सम्पूर्ण प्राणियोंका भोज्य
और उनका भोक्ता होनेके कारण
ज्यमानत्वाद्भूतभोक्तृत्वाच्चान्नंभी वह 'अन्न' कहा जाता है ।
तदुच्यते । इतिशब्दः प्रथमकोश-इस वाक्यमें 'इति' शब्द प्रथम
कोशके विवरणकी परिसमाप्तिके
परिसमाप्त्यर्थः ।लिये है ।
अन्नमयादिभ्य आनन्दमया-अनेक तुषाओंवाले धानोंको
तुषरहित करके जिस प्रकार चावल
(अन्नमयकोश-निरासः) न्तेभ्य आत्मभ्योऽभ्यन्तरतमं ब्रह्मनिकाल लिये जाते हैं उसी प्रकार अन्नमयसे लेकर आनन्दमय कोश-
विद्यया प्रत्यगात्मत्वेन दिदर्श-पर्यन्त सम्पूर्ण शरीरोंकी अपेक्षा
आन्तरतम ब्रह्मको विद्याके द्वारा अपने
यिषुः शास्त्रमविद्याकृतपञ्चकोशा-प्रत्यगात्मरूपसे दिखलानेकी इच्छा-
पनयेनानेकतुषकोद्रववितुषी-वाला शास्त्र अविद्याकल्पित पाँच
करणेनेव तदन्तर्गततण्डुलान्कोशोंका बाध करता हुआ 'तस्माद्वा
प्रस्तौति तस्माद्वा एतस्मादन्नरस-एतस्मादन्नरसमयात्' इत्यादि वाक्य-
मयादित्यादि ।से आरम्भ करता है—
तस्मादेतस्माद्यथोक्तादन्नरस-उस इस पूर्वोक्त अन्नरसमय
पिण्डसे अन्य यानी पृथक् और
(प्राणमयकोश-निर्वचनम्) मयात्पिण्डादन्यो व्यतिरिक्तोऽन्तरो-उसके भीतर रहनेवाला आत्मा, जो अन्नरसमय पिण्डके समान मिथ्या
ऽभ्यन्तर आत्मा पिण्डवदेव मिथ्याही आत्मारूपसे कल्पना किया हुआ

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१२८ तैत्तिरीयोपनिषद् [ वल्ली २ ❧❧❧❧❧❧❧❧❧❧❧❧❧❧❧❧❧❧❧❧❧❧❧❧❧❧❧❧❧❧❧❧❧❧❧❧❧❧❧❧❧❧❧❧❧❧❧❧❧❧❧❧❧❧❧ परिकल्पित आत्मत्वेन प्राणमयः | है, प्राणमय है। प्राण-वायु उससे प्राणो वायुस्तन्मयस्तत्प्रायः । तेन | युक्त अर्थात् तत्प्राय [ यानी उसमें प्राणमयेनान्नरसमय आत्मैष पूर्णो | प्राणकी ही प्रधानता है ]। जिस | प्रकार वायुसे धोंकनी भरी रहती है वायुनेव दृतिः । स वा एष प्राण- | उसी प्रकार उस प्राणमयसे यह | अन्नरसमय शरीर भरा हुआ है। मय आत्मा पुरुषविध एव पुरुषा- | वह यह प्राणमय आत्मा पुरुषविध | अर्थात् शिर और पक्षादिके कारण कार एव, शिरःपक्षादिभिः । | पुरुषाकार ही है। किं स्वत एव, नेत्याह । | क्या वह स्वतः ही पुरुषाकार | है ? इसपर कहते हैं—नहीं, [प्राणमयस्य] प्रसिद्धं तावदन्नरस- | अन्नरसमय शरीरकी पुरुषाकारता तो [पुरुषविधत्वम्] मयस्यात्मनः पुरुष- | प्रसिद्ध ही है; उस अन्नरसमय- विधत्वम् । तस्यान्नरसमयस्य पुरुष- | की पुरुषविधता—पुरुषाकारताके | अनुसार साँचेमें ढली हुई प्रतिमाके विधतां पुरुषाकारतामनु अयं | समान यह प्राणमय कोश भी प्राणमयः पुरुषविधो मूषानिषिक्त- | पुरुषाकार है—स्वतः ही पुरुषाकार प्रतिमावन्न स्वत एव । एवं पूर्वस्य | नहीं है। इसी प्रकार पूर्व-पूर्वकी | पुरुषाकारता है और उसके अनुसार पूर्वस्य पुरुषविधतामनूत्तरोत्तरः | पीछे-पीछेका कोश भी पुरुषाकार है; पुरुषविधो भवति पूर्वः पूर्व- | तथा पूर्व-पूर्व कोश पीछे-पीछेके श्चोत्तरोत्तरेण पूर्णः । | कोशसे पूर्ण ( भरा हुआ ) है। कथं पुनः पुरुषविधतास्य | इसकी पुरुषाकारता किस प्रकार | है ? सो बतलायी जाती है—उस इत्युच्यते। तस्य प्राणमयस्य प्राण | प्राणमयका प्राण ही शिर है। एव शिरः । प्राणमयस्य वायु- | वायुके विकाररूप प्राणमय कोशका विकारस्य प्राणो मुखनासिका- | मुख और नासिकासे निकलनेवाला | प्राण, जो मुख्य प्राणकी वृत्तिविशेष निसरणो वृत्तिविशेषः शिर एव | है, श्रुतिके वचनानुसार शिररूपसे ही

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अनु० २ ] शाङ्करभाष्यार्थ १२९ परिकल्प्यते वचनात् । सर्वत्र | कल्पना किया जाता है । इसके वचनादेव पक्षादिकल्पना । | सिवा आगे भी श्रुतिके वचनानुसार व्यानो व्यानवृत्तिर्दक्षिणः पक्षः । | ही पक्ष आदिकी कल्पना की गयी | है । व्यान अर्थात् व्यान नामकी अपान उत्तरः पक्षः । आकाश | वृत्ति दक्षिण पक्ष है, अपान उत्तर | पक्ष है, आकाश आत्मा है। यहाँ आत्मा । य आकाशस्थो वृत्ति- | प्राण-वृत्तिका अधिकार होनेके कारण विशेषः समानाख्यः स आत्मेवा- | [ 'आकाश' शब्दसे ] आकाशमें त्मा; प्राणवृत्त्यधिकारात् । | स्थित जो समानसंज्ञक प्राणकी | वृत्ति है वही आत्मा है । अपने मध्यस्थत्वादितराः पर्यन्ता वृत्ती- | आसपासकी अन्य सब वृत्तियोंकी रपेक्ष्यात्मा । "मध्यं ह्येषामङ्गा- | अपेक्षा मध्यवर्तिनी होनेके कारण नामात्मा" इति श्रुतिप्रसिद्धं | वह आत्मा है । "इन अंगोंका मध्य | आत्मा है" इस श्रुतिसे मध्यवर्ती अंग- मध्यमस्थस्यात्मत्वम् । | का आत्मत्व प्रसिद्ध ही है । पृथिवी पुच्छं प्रतिष्ठा । | पृथिवी पुच्छ-प्रतिष्ठा है। 'पृथिवी' पृथिवीति पृथिवीदेवताध्यात्म- | इस शब्दसे पृथिवीकी अधिष्ठात्री कस्य प्राणस्य धारयित्री स्थिति- | देवी समझनी चाहिये; क्योंकि | स्थितिकी हेतुभूत होनेसे वही हेतुत्वात् । "सैषा पुरुषस्यापान- | आध्यात्मिक प्राणको भी धारण मवष्टभ्य" (प्र० उ० ३।८) इति हि | करनेवाली है । इस विषयमें "वह | पृथिवी-देवता पुरुषके अपानको श्रुत्यन्तरम् । अन्यथोदानवृत्त्यो- | आश्रय करके" इत्यादि एक दूसरी र्ध्वगमनं गुरुत्वाच्च पतनं वा | श्रुति भी है । अन्यथा प्राणकी | उदानवृत्तिसे या तो शरीर ऊपरको स्याच्छरीरस्य। तस्मात्पृथिवी देवता | उड़ जाता अथवा गुरुतावश गिर पुच्छं प्रतिष्ठा प्राणमयस्यात्मनः । | पड़ता । अतः पृथिवी-देवता ही | प्राणमय शरीरकी पुच्छ-प्रतिष्ठा है । तत्तस्मिन्नेवार्थे प्राणमयात्मविषय | उसी अर्थमें अर्थात् प्राणमय आत्माके एष श्लोको भवति ॥ १ ॥ | विषयमें ही यह श्लोक प्रसिद्ध है ॥१॥ इति ब्रह्मानन्दवल्ल्यां द्वितीयोऽनुवाकः ॥ २ ॥ तै० उ० १७-१८- CC-0 Pt. Chakradhar Joshi and Sons, Dev Prayag. Digitized by eGangotri

तृतीय अनुवाक प्राणकी महिमा और मनोमय कोशका वर्णन प्राणं देवा अनु प्राणन्ति । मनुष्याः पशवश्च ये । प्राणो हि भूतानामायुः । तस्मात्सर्वायुषमुच्यते । सर्वमेव त आयुर्यन्ति ये प्राणं ब्रह्मोपासते । प्राणो हि भूता- नामायुः । तस्मात्सर्वायुषमुच्यत इति । तस्यैष एव शारीर आत्मा यः पूर्वस्य । तस्माद्वा एतस्मात्प्राणमयाद्- न्योऽन्तर आत्मा मनोमयः । तेनैष पूर्णः । स वा एष पुरुषविध एव । तस्य पुरुषविधतामन्वयं पुरुष- विधः । तस्य यजुरेव शिरः । ऋग्दक्षिणः पक्षः । सामोत्तरः पक्षः । आदेश आत्मा । अथर्वाङ्गिरसः पुच्छं प्रतिष्ठा । तदप्येष श्लोको भवति ॥ १ ॥ देवगण प्राणके अनुगामी होकर प्राणन-क्रिया करते हैं तथा जो मनुष्य और पशु आदि हैं [ वे भी प्राणन-क्रियासे ही चेष्टावान् होते हैं ] । प्राण ही प्राणियोंकी आयु ( जीवन ) है । इसीलिये वह 'सर्वायुष' कहलाता है । जो प्राणकी ब्रह्मरूपसे उपासना करते हैं वे पूर्ण आयुको प्राप्त होते हैं । प्राण ही प्राणियोंकी आयु है । इसलिये वह 'सर्वायुष' कहलाता है । उस पूर्वोक्त ( अन्नमय कोश ) का यही देहस्थित आत्मा है । उस इस प्राणमय कोशसे दूसरा इसके भीतर रहनेवाला आत्मा मनोमय है । उसके द्वारा यह पूर्ण है । वह यह [ मनोमय कोश ] भी पुरुषाकार ही है । उस ( प्राणमय कोश ) की पुरुषाकारताके अनुसार ही यह भी पुरुषाकार है । यजुः ही उसका शिर है, ऋक् दक्षिण पक्ष है, CC-0 Pt. Chakradhar Joshi and Sons, Dev Prayag. Digitized by eGangotri

[Page Header] अनु० ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ १३१


साम उत्तर पक्ष है, आदेश आत्मा है तथा अथर्वाङ्गिरस पुच्छ— प्रतिष्ठा है । उसके विषयमें ही यह श्लोक है ॥ १ ॥


[बायाँ स्तम्भ - संस्कृत भाष्य]

प्राणं देवा अनु प्राणन्ति । [हाशिया: प्राणस्य प्राधान्यम्] देवा अग्न्यादयः प्राणं वाय्वात्मानं प्राणनशक्तिमन्तमनु तदात्म- भूताः सन्तः प्राणन्ति प्राणन- कर्म कुर्वन्ति प्राणनक्रियया क्रियावन्तो भवन्ति । अध्यात्मा- धिकाराद्देवा इन्द्रियाणि प्राणमनु प्राणन्ति मुख्यंप्राणमनु चेष्टन्त इति वा । तथा मनुष्याः पशवश्च ये ते प्राणनकर्मणैव चेष्टावन्तो भवन्ति । अतश्च नान्नमयैनैव परिच्छि- न्नेनात्मनात्मवन्तः प्राणिनः । किं तर्हि ? तदन्तर्गतेन प्राणमये- नापि साधारणेनैव सर्वपिण्ड- व्यापिनात्मवन्तो मनुष्यादयः । एवं मनोमयादिभिः पूर्वपूर्वव्या- पिभिरुत्तरोत्तरैः सूक्ष्मैरानन्दम- यान्तैराकाशादिभूतारब्धैरविद्या- कृतैरात्मवन्तः सर्वे प्राणिनः । तथा स्वाभाविकेनाप्याकाशादि-


[दायाँ स्तम्भ - हिन्दी भाष्यार्थ]

प्राणं देवा अनु प्राणन्ति—अग्नि आदि देवगण प्राणनशक्तिमान् वायु- रूप प्राणके अनुगामी होकर अर्थात् तद्रूप होकर प्राणन-क्रिया करते हैं; यानी प्राणन-क्रियासे क्रियावान् होते हैं । अथवा यहाँ अध्यात्म- सम्बन्धी प्रकरण होनेसे [ यह समझना चाहिये कि ] देव अर्थात् इन्द्रियाँ प्राणके पीछे प्राणन करती यानी मुख्य प्राणकी अनुगामिनी होकर चेष्टा करती हैं । तथा जो भी मनुष्य और पशु आदि हैं वे ही प्राणन-क्रियासे ही चेष्टावान् होते हैं । इससे जाना जाता है कि प्राणी केवल परिच्छिन्नरूप अन्नमय कोशसे ही आत्मवान् नहीं हैं । तो क्या है ? वे मनुष्यादि जीव उसके अन्तर्वर्ती सम्पूर्ण पिण्डमें व्याप्त साधारण प्राणमय कोशसे भी आत्मवान् हैं । इस प्रकार पूर्व-पूर्व कोशमें व्यापक मनोमयसे लेकर आनन्दमय कोशपर्यन्त, आकाशादि भूतोंसे होनेवाले अविद्याकृत कोशों- से सम्पूर्ण प्राणी आत्मवान् हैं । इसी प्रकार वे स्वभावसे ही


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१३२ तैत्तिरीयोपनिषद् [ वल्ली २ कारणेन नित्येनाविकृतेन सर्व- | आकाशादिके कारण, नित्य, गतेन सत्यज्ञानानन्तलक्षणेन | निर्विकार, सर्वगत, सत्य, ज्ञान एवं | अनन्तरूप, पञ्चकोशातीत सर्वात्मासे पञ्चकोशातिगेन सर्वात्मनात्म- | भी आत्मवान् हैं। वही परमार्थतः वन्तः। स हि परमार्थत आत्मा | सबका आत्मा है—यह बात भी सर्वेषामित्येतदप्यर्थादुक्तं भवति। | इस वाक्यके तात्पर्यसे कह ही दी | गयी है। प्राणं देवा अनु प्राणन्तीत्युक्तं | देवगण प्राणके पीछे प्राणन- तत्कस्मादित्याह । प्राणो हि | क्रिया करते हैं—ऐसा पहले कहा यस्माद्भूतानां प्राणिनामायुर्जीव- | गया। ऐसा क्यों है? सो बतलाते नम् । “यावद्ध्यस्मिञ्शरीरे प्राणो | हैं—क्योंकि प्राण ही प्राणियोंका वसति तावदायुर” (कौ० उ० | आयु—जीवन है। “जबतक इस ३। २) इति श्रुत्यन्तरात्। | शरीरमें प्राण रहता है तभीतक तस्मात्सर्वायुषम् । सर्वेषामायुः | आयु है” इस एक अन्य श्रुतिसे भी सर्वायुः सर्वायुरेव सर्वायुषमित्यु- | यही सिद्ध होता है। इसीलिये वह च्यते । प्राणापगमे मरणप्रसिद्धेः। | ‘सर्वायुष’ है। सबकी आयुका नाम प्रसिद्धं हि लोके सर्वायुष्ट्वं | ‘सर्वायु’ है, ‘सर्वायु’ ही ‘सर्वायुष’ प्राणस्य । | कहा जाता है; क्योंकि प्राण-प्रयाण- | के अनन्तर मृत्यु हो जाना प्रसिद्ध | ही है। प्राणका सर्वायु होना तो | लोकमें प्रसिद्ध ही है। अतोऽस्माद्वाह्यादसाधारणाद- | अतः जो लोग इस बाह्य प्राणोपासन- न्नमयादात्मनोऽप- | असाधारण (व्यावृत्तरूप) अन्नमय फलम् क्रम्यान्तः साधा- | कोशसे आत्मबुद्धिको हटाकर इसके | अन्तर्वर्ती और साधारण [सम्पूर्ण रणं प्राणमयमात्मानं ब्रह्मोपासते | इन्द्रियोंमें अनुगत] प्राणमय कोश- येऽहमस्मि प्राणः सर्वभूताना- | को ‘मैं प्राण सम्पूर्ण भूतोंका आत्मा

अनु० ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ १३३ मात्मायुर्जीवनहेतुत्वादिति ते । और उनके जीवनका कारण होनेसे सर्वमेवायुरस्मिँल्लोके यन्ति; नाप- । उनकी आयु हूँ' इस प्रकार ब्रह्मरूपसे मृत्युना म्रियन्ते प्राक्प्राप्तादायुष । उपासना करते हैं वे इस लोकमें इत्यर्थः । शतं वर्षाणीति तु युक्तं । पूर्ण आयुको प्राप्त होते हैं । अर्थात् “सर्वमायुरेति” ( छा० उ० २ । । प्रारब्धवश प्राप्त हुई आयुसे पूर्व ११–२०, ४ । ११–१३ ) इति । अपमृत्युसे नहीं मरते । “पूर्ण आयु- श्रुतिप्रसिद्धेः । । को प्राप्त होता है” ऐसी श्रुति-प्रसिद्धि किं कारणं प्राणो हि भूता- । होनेके कारण यहाँ [ 'सर्वायु' नामायुस्तस्मात्सर्वायुषमुच्यत इति । । शब्दसे ] सौ वर्ष समझने चाहिये । । [ प्राणको सर्वायु समझनेका ] यो यद्गुणं ब्रह्मोपास्ते स तद्- । क्या कारण है ? क्योंकि प्राण ही । प्राणियोंकी आयु है इसलिये वह गुणभागभवतीति विद्याफलप्राप्ते- । 'सर्वायुष' कहा जाता है । जो । व्यक्ति जैसे गुणवाले ब्रह्मकी उपासना हेत्वर्थं पुनर्वचनं प्राणो हीत्यादि । । करता है वह उसी प्रकारके गुणका । भागी होता है—इस प्रकार विद्याके तस्य पूर्वस्यान्नमयस्यैष एव । फलकी प्राप्तिके इस हेतुको प्रदर्शित । करनेके लिये 'प्राणो हि भूताना- शारीरेऽन्नमये भवः शारीर । मायुः' इत्यादि वाक्यकी पुनरुक्ति की । गयी है । यही उस पूर्वकथित आत्मा । कः ? य एष प्राणमयः । । अन्नमय कोशका शारीर—अन्नमय । शरीरमें रहनेवाला आत्मा है । कौन ? । जो कि यह प्राणमय है । तस्माद्वा एतस्मादित्युक्तार्थ- । 'तस्माद्वा एतस्मात्' इत्यादि शेष [मनोमयकोश-] मन्यत् । अन्यो- । पदोंका अर्थ पहले कह चुके हैं । [निर्वचनम्] ऽन्तर आत्मा मनो- । दूसरा अन्तर-आत्मा मनोमय है । । संकल्प-विकल्पात्मक अन्तःकरणका मयः । मन इति संकल्पाद्यात्म- । नाम मन है; जो तद्रूप हो उसे कमन्तःकरणं तन्मयो मनोमयो । मनोमय कहते हैं; जैसे

१३४ तैत्तिरीयोपनिषद् [ वल्ली २

१३४ तैत्तिरीयोपनिषद् [ वल्ली २ यथान्नमयः । सोऽयं प्राणमय- होनेके कारण ] अन्नमय कहा गया स्याभ्यन्तर आत्मा । तस्य यजु- है । वह इस प्राणमयका अन्तर्वर्ती आत्मा है । उसका यजुः ही शिर रेव शिरः । यजुरित्यनियताक्षर- है । जिनमें अक्षरोंका कोई नियम पादावसानो मन्त्रविशेषस्तज्जा- नहीं है ऐसे पादोंमें समाप्त होनेवाले मन्त्रविशेषका नाम यजुः है । उस तीयवचनो यजुःशब्दस्तस्य जातिके मन्त्रोंका वाचक 'यजुः' शिरस्त्वं प्राधान्यात् । प्राधान्यं च शब्द है । उसे प्रधानताके कारण शिर कहा गया है । यागादिमें यागादौ संनिपत्योपकारकत्वात् । संनिपत्य उपकारक * होनेके कारण यजुषा हि हविर्दीयते स्वाहाका- यजुः-मन्त्रोंकी प्रधानता है; क्योंकि स्वाहा आदिके द्वारा यजुर्मन्त्रोंसे ही रादिना । हवि दी जाती है । वाचनिकी वा शिरआदि- अथवा इन सब प्रसंगोंमें शिर आदिकी कल्पना श्रुतिवाक्यसे ही कल्पना सर्वत्र । मनसो हि समझनी चाहिये । अक्षरोंके [उच्चारणके] स्थान, [आन्तरिक] प्रयत्न, स्थानप्रयत्ननादस्वरवर्णपदवाक्य- [उससे उत्पन्न हुआ] नाद, [उदात्तादि] स्वर, [अकारादि] वर्ण, [उनसे रचे हुए] विषया तत्संकल्पात्मिका पद और [पदोंके समूहरूप] वाक्यसे सम्बन्ध रखनेवाली तथा उन्हींके तद्भाविता वृत्तिः श्रोत्रादिकरण- संकल्प और भावसे युक्त जो श्रवणादि इन्द्रियोंके द्वारा उत्पन्न होनेवाली द्वारा यजुःसंकेतविशिष्टा यजुः 'यजुः' संकेतविशिष्ट मनकी वृत्ति है

  • यज्ञाङ्ग दो प्रकारके होते हैं—एक संनिपत्य उपकारक और दूसरे आरात् उपकारक । उनमें जो अङ्ग साक्षात् अथवा परम्परासे प्रधान यागके कलेवरकी पूर्ति कर उसके द्वारा अपूर्वकी उत्पत्तिमें उपयोगी होते हैं वे संनिपत्य उपकारक कहलाते हैं । यजुर्मन्त्र भी यागशरीरको निष्पन्न करनेवाले होनेसे संनिपत्य उपकारक हैं । CC-0 Pt. Chakradhar Joshi and Sons, Dev Prayag. Digitized by eGangotri

एवं च मनोवृत्तित्वे मन्त्राणां | इस प्रकार मन्त्रोंके मनोवृत्तिरूप

अनु० ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ १३५

इत्युच्यते । एवमृगेवं साम | वही 'यजुः' कही जाती है । इस च । | प्रकार 'ऋक्' और ऐसे ही 'साम' | को भी समझना चाहिये ।* एवं च मनोवृत्तित्वे मन्त्राणां | इस प्रकार मन्त्रोंके मनोवृत्तिरूप | होनेपर ही उस वृत्तिका आवर्तन वृत्तिरेवावर्त्यत इति मानसो जप | करनेसे उनका मानसिक जप किया | जाना ठीक हो सकता है । अन्यथा उपपद्यते । अन्यथाविषयत्वान्म- | घटादिके समान मनके विषय न | होनेके कारण तो मन्त्रोंकी आवृत्ति न्त्रो नावर्तयितुं शक्यो घटादि- | भी नहीं की जा सकती थी और | उस अवस्थामें मानसिक जप होना वदिति मानसो जपो नोपपद्यते । | सम्भव ही नहीं था । किन्तु मन्त्रोंकी | आवृत्तिका तो बहुत-से कर्मोंमें विधान मन्त्रावृत्तिश्च चोद्यते बहुशः | किया ही गया है [ इससे उसकी | असम्भावना तो सिद्ध हो नहीं कर्मसु । | सकती ] ।

  • 'यजुः' आदि शब्दोंसे यजुर्वेद आदि ही समझे जाते हैं । परन्तु यहाँ जो उन्हें मनोमय कोशके शिर आदि रूपसे बतलाया गया है उसमें यह शंका होती है कि उनका उससे ऐसा क्या सम्बन्ध है जो वे उसके अङ्गरूपसे बतलाये गये हैं ? इस वाक्यमें भगवान् भाष्यकारने उसी बातको स्पष्ट किया है । इसका तात्पर्य यह है कि यजुः, साम अथवा ऋक् आदि मन्त्रोंके उच्चारणमें सबसे पहले अन्यान्य शब्दोंके उच्चारणके समान मनका ही व्यापार होता है । पहले कण्ठ अथवा तालु आदि स्थानोंसे जठराग्निद्वारा प्रेरित वायुका आघात होता है, उससे अस्फुट नादकी उत्पत्ति होती है; फिर क्रमशः स्वर और अकारादि वर्ण अभि- व्यक्त होते हैं । वर्णोंके संयोगसे पद और पदसमूहसे वाक्यकी रचना होती है । इस प्रकार मानसिक सङ्कल्प और भावसे ही यजुः आदि मन्त्र अभिव्यक्त होकर श्रोत्रेन्द्रियसे ग्रहण किये जाते हैं । अतः मनोवृत्तिसे उत्पन्न होनेवाले होनेके कारण ही यहाँ यजुर्विषयक मनोवृत्तिको 'यजुः', ऋग्विषयक वृत्तिको 'ऋक्' और सामविषयक वृत्तिको 'साम' कहा गया है; तथा इस प्रकारकी यजुर्वृत्ति ही मनोमय कोशकी शीर्षस्थानीय है । CC-0 Pt. Chakradhar Joshi and Sons, Dev Prayag. Digitized by eGangotri

१३६ तैत्तिरीयोपनिषद् [ वल्ली २

१३६ तैत्तिरीयोपनिषद् [ वल्ली २


[बायाँ स्तम्भ (मूल संस्कृत)]

अक्षरविषयस्मृत्यावृत्त्या मन्त्रावृत्तिः स्यादिति चेत् ? न; मुख्यार्थासंभवात् । "त्रिः प्रथमामन्वाह त्रिरुत्तमाम्" इति ऋगावृत्तिः श्रूयते । तत्रर्चो- ऽविषयत्वे तद्विषयस्मृत्यावृत्त्या मन्त्रावृत्तौ च क्रियमाणायाम् "त्रिः प्रथमामन्वाह" इति ऋगा- वृत्तिर्मुख्योऽर्थश्चोदितः परित्यक्तः स्यात् । तस्मान्मनोवृत्त्युपाधि- परिच्छिन्नं मनोवृत्तिनिष्ठमात्म- चैतन्यमनादिनिधनं यजुःशब्द- वाच्यमात्मविज्ञानं मन्त्रा इति । एवं च नित्यत्वोपपत्तिर्वेदानाम् । अन्यथा विषयत्वे रूपादि- वदनित्यत्वं च स्यान्नैतद्यु- क्तम् । "सर्वे वेदा यत्रैकं भवन्ति


[दायाँ स्तम्भ (हिन्दी अनुवाद)]

शङ्का-मन्त्रके अक्षरोंको विषय करनेवाली स्मृतिकी आवृत्ति होनेसे मन्त्रकी भी आवृत्ति हो सकती है— यदि ऐसा मानें तो ? समाधान—नहीं; क्योंकि [ ऐसा माननेसे जपका विधान करनेवाली श्रुतिका ] मुख्य अर्थ असम्भव हो जायगा । "तीन बार प्रथम ऋक् की आवृत्ति करनी चाहिये और तीन बार अन्तिम ऋक् का अन्वाख्यान ( आवर्तन ) करे" इस प्रकार ऋक् की आवृत्तिके विषयमें श्रुतिकी आज्ञा है । ऐसी अवस्थामें मन्त्रमय ऋक् तो मनका विषय नहीं है, अतः मन्त्रकी आवृत्तिके स्थानमें यदि केवल उसकी स्मृतिका ही आवर्तन किया जाय तो "तीन बार प्रथम ऋक् की आवृत्ति करनी चाहिये" इस श्रुतिका मुख्य अर्थ छूट जाता है । अतः यह समझना चाहिये कि मनोवृत्तिरूप उपाधिसे परिच्छिन्न मनोवृत्तिस्थित जो अनादि-अनन्त आत्मचैतन्य 'यजुः' शब्दवाच्य आत्मविज्ञान है वह यजुर्मन्त्र है । इसी प्रकार वेदोंकी नित्यता भी सिद्ध हो सकती है; नहीं तो इन्द्रियोंके विषय होने- पर तो रूपादिके समान उनकी भी अनित्यता ही सिद्ध होगी; और ऐसा होना ठीक नहीं है । "जिसमें समस्त

अनु० ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ १३७

स मानसीन आत्मा" इति च | वेद एकरूप हो जाते हैं वह मनरूप श्रुतिर्नित्यात्मनैकत्वं ब्रुवत्यृगा- | उपाधिमें स्थित आत्मा है" यह नित्य दीनां नित्यत्वे समञ्जसा स्यात् । | आत्माके साथ ऋगादिका एकत्व बतलानेवाली श्रुति भी उनका "ऋचो अक्षरे परमे व्योमन्य- | नित्यत्व सिद्ध होनेपर ही सार्थक हो सकती है । इस सम्बन्धमें स्मिन्देवा अधि विश्वे निषेदुः" | "जिसमें सम्पूर्ण देव स्थित हैं उस अक्षर और परब्रह्मरूप आकाशमें ( श्वे० उ० ४ । ८ ) इति च | ही ऋचाएँ तादात्म्यभावसे व्यवस्थित मन्त्रवर्णः । | हैं" ऐसा मन्त्रवर्ण भी है । आदेशोऽत्र ब्राह्मणम्; अति- | 'आदेश आत्मा' इस वाक्यमें 'आदेश' शब्द ब्राह्मणका वाचक देष्टव्यविशेषानतिदिशतीति। अथ- | है; क्योंकि वेदोंका ब्राह्मणभाग ही कर्त्तव्यविशेषोंका आदेश ( उपदेश ) र्वाङ्गिरसा च दृष्टा मन्त्रा ब्राह्मणं | देता है । अथर्वाङ्गिरस ऋषिके साक्षात्कार किये हुए मन्त्र और च शान्तिकपौष्टिकादिप्रतिष्ठा- | ब्राह्मण ही पुच्छ—प्रतिष्ठा हैं; क्योंकि उनमें शान्ति और पुष्टिकी स्थितिके हेतुर्मप्रधानत्वात्पुच्छं प्रतिष्ठा । | हेतुभूत कर्मोंकी प्रधानता है । तदप्येष श्लोको भवति मनो- | पूर्ववत् इस विषयमें ही—मनोमय आत्माका प्रकाश करनेवाला ही मयात्मप्रकाशकः पूर्ववत् ॥१॥ | यह श्लोक है ॥ १ ॥


इति ब्रह्मानन्दवल्ल्यां तृतीयोऽनुवाकः ॥३॥

चतुर्थ अनुवाक मनोमय कोशकी महिमा तथा विज्ञानमय कोशका वर्णन यतो वाचो निवर्तन्ते । अप्राप्य मनसा सह । आनन्दं ब्रह्मणो विद्वान् । न बिभेति कदाचनेति । तस्यैष एव शारीर आत्मा यः पूर्वस्य । तस्माद्वा एतस्मा- न्मनोमयादन्योऽन्तर आत्मा विज्ञानमयस्तेनैष पूर्णः । स वा एष पुरुषविध एव । तस्य पुरुषविधतामन्वयं पुरुषविधः । तस्य श्रद्धैव शिरः । ऋतं दक्षिणः पक्षः । सत्यमुत्तरः पक्षः । योग आत्मा । महः पुच्छं प्रतिष्ठा । तदप्येष श्लोको भवति ॥ १ ॥ जहाँसे मनके सहित वाणी उसे न पाकर लौट आती है उस ब्रह्मानन्दको जाननेवाला पुरुष कभी भयको प्राप्त नहीं होता । यह जो [ मनोमय शरीर ] है वही उस अपने पूर्ववर्ती [ प्राणमय कोश ] का शारीरिक आत्मा है । उस इस मनोमयसे दूसरा इसका अन्तर-आत्मा विज्ञानमय है । उसके द्वारा यह पूर्ण है । वह यह विज्ञानमय भी पुरुषाकार ही है । उस [ मनोमय ] की पुरुषाकारताके अनुसार ही यह भी पुरुषाकार है । उसका श्रद्धा ही शिर है । ऋत दक्षिण पक्ष है । सत्य उत्तर पक्ष है । योग आत्मा ( मध्यभाग ) है और महत्तत्त्व पुच्छ-प्रतिष्ठा है । उसके विषयमें ही यह श्लोक है ॥ १ ॥ यतो वाचो निवर्तन्ते । अप्राप्य | जहाँसे मनके सहित वाणी उसे | न पाकर लौट आती है-इत्यादि मनसा सहेत्यादि । तस्य पूर्वस्य | [ अर्थ स्पष्ट ही है ] उस पूर्व- प्राणमयस्यैष एवात्मा शारीरः | कथित प्राणमयका यही शारीर CC-0 Pt. Chakradhar Joshi and Sons, Dev Prayag. Digitized by eGangotri

अनु० ४ ] शाङ्करभाष्यार्थ १३९

शरीरे प्राणमये भवः शारीरः । | अर्थात् प्राणमय शरीरमें रहनेवाला कः ? य एष मनोमयः । तस्माद्वा | आत्मा है । कौन ? यह जो मनोमय एतस्मादित्यादि पूर्ववत् । अ- | है । 'तस्माद्वा एतस्मात्' इत्यादि न्योऽन्तर आत्मा विज्ञानमयो | वाक्यका अर्थ पूर्ववत् समझना चाहिये । उस इस मनोमयसे दूसरा मनोमयस्याभ्यन्तरो विज्ञानमयः । | इसका अन्तर आत्मा विज्ञानमय है अर्थात् मनोमय कोशके भीतर विज्ञानमय कोश है । मनोमयो वेदात्मोक्तः । वे- | मनोमय कोश वेदरूप बतलाया दार्थविषया बुद्धिनिश्चयात्मिका | गया था । वेदोंके अर्थके विषयमें जो निश्चयात्मिका बुद्धि है उसीका विज्ञानं तच्चाध्यवसायलक्षणम- | नाम विज्ञान है । और वह अन्तः- न्तःकरणस्य धर्मः । तन्मयो | करणका अध्यवसायरूप धर्म है । तन्मय अर्थात् प्रमाणस्वरूप निश्चय निश्चयविज्ञानैः प्रमाणस्वरूपैर्नि- | विज्ञानसे (निश्चयात्मिका बुद्धिसे) र्वर्तित आत्मा विज्ञानमयः । | निष्पन्न होनेवाला आत्मा विज्ञानमय है, क्योंकि प्रमाणके विज्ञानपूर्वक प्रमाणविज्ञानपूर्वको हि यज्ञादि- | ही यज्ञादिका विस्तार किया जाता स्तायते । यज्ञादिहेतुत्वं च | है । विज्ञान यज्ञादिका हेतु है- यह बात श्रुति आगे चलकर मन्त्र- वक्ष्यति श्लोकेन । | द्वारा बतलायेगी । निश्चयविज्ञानवतो हि कर्तव्ये- | निश्चयात्मिका बुद्धिसम्पन्न पुरुष- ष्वर्थेषु पूर्वं श्रद्धोत्पद्यते । सा | को सबसे पहले कर्त्तव्य कर्ममें श्रद्धा ही उत्पन्न होती है । अतः सम्पूर्ण सर्वकर्त्तव्यानां प्राथम्याच्छिर इव | कर्मोंमें प्रथम होनेके कारण वह शिरके समान उस विज्ञानमयका शिरः । ऋतसत्ये यथाव्या- | शिर है । ऋत और सत्यका अर्थ पहले (शिक्षावल्ली, नवम अनुवाकमें) ख्याते एव । योगो युक्तिः | की हुई व्याख्याके ही समान है ।

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१४० तैत्तिरीयोपनिषद् [ वल्ली २

१४० तैत्तिरीयोपनिषद् [ वल्ली २


[बायाँ स्तम्भ - संस्कृत भाष्य] समाधानम्, आत्मेवात्मा । आत्मवतो हि युक्तस्य समाधान- वतोऽङ्गानीव श्रद्धादीनि यथार्थ- प्रतिपत्चिक्षमाणि भवन्ति । तस्मात्समाधानं योग आत्मा विज्ञानमयस्य । महः पुच्छं प्रतिष्ठा । मह इति महत्तत्त्वं प्रथमजम् । "महद्यक्षं प्रथमजं वेद" (बृ० उ० ५।४।१) इति श्रुत्यन्तरात् । पुच्छं प्रतिष्ठा कारणत्वात् । कारणं हि कार्याणां प्रतिष्ठा । यथा वृक्षवीरुधां पृथिवी । सर्व- बुद्धिविज्ञानानां च महत्तत्त्वं कारणम् । तेन तद्विज्ञानमयस्या- त्मनः प्रतिष्ठा । तदप्येष श्लोको भवति पूर्ववत् । यथान्नमयादी- नां ब्राह्मणोक्तानां प्रकाशकाः श्लोका एवं विज्ञानमयस्यापि ॥१॥


[दायाँ स्तम्भ - हिन्दी अनुवाद] योग-युक्ति अर्थात् समाधान ही आत्माके समान उसका आत्मा है । युक्त अर्थात् समाधानसम्पन्न आत्मवान् पुरुषके ही अङ्गादिके समान श्रद्धा आदि साधन यथार्थ ज्ञानकी प्राप्तिमें समर्थ होते हैं । अतः समाधान यानी योग ही विज्ञानमय कोशका आत्मा है और महः उसकी पुच्छ—प्रतिष्ठा है । "प्रथम उत्पन्न हुए महान् यक्ष (पूजनीय) को जानता है" इस एक अन्य श्रुतिके अनुसार 'महः' यह महत्तत्त्वका नाम है । वही [ विज्ञानमयका ] कारण होनेसे उसकी पुच्छ—प्रतिष्ठा है; क्योंकि कारण ही कार्यवर्गकी प्रतिष्ठा (आश्रय) हुआ करता है, जैसे कि वृक्ष और लता-गुल्मादिकी प्रतिष्ठा पृथिवी है। महत्तत्त्व ही बुद्धिके सम्पूर्ण विज्ञानोंका कारण है । इसलिये वह विज्ञानमय आत्माकी प्रतिष्ठा है । पूर्ववत् उसके विषयमें ही यह श्लोक है अर्थात् जैसे पहले श्लोक ब्राह्मणोक्त अन्नमय आदिके प्रकाशक हैं उसी प्रकार यह विज्ञानमयका भी प्रकाशक श्लोक है ॥ १ ॥


इति ब्रह्मानन्दवल्ल्यां चतुर्थोऽनुवाकः ॥ ४ ॥

पञ्चम अनुवाक विज्ञानकी महिमा तथा आनन्दमय कोशका वर्णन विज्ञानं यज्ञं तनुते । कर्माणि तनुतेऽपि च । विज्ञानं देवाः सर्वे । ब्रह्म ज्येष्ठमुपासते । विज्ञानं ब्रह्म चेद्वेद । तस्माच्चेन्न प्रमाद्यति । शरीरे पाप्मनो हित्वा । सर्वान्कामान्समश्नुत इति । तस्यैष एव शारीर आत्मा यः पूर्वस्य । तस्माद्वा एतस्माद्विज्ञानमयादन्योऽन्तर आत्मानन्दमयः । तेनैष पूर्णः । स वा एष पुरुषविध एव । तस्य पुरुषविधतामन्वयं पुरुषविधः । तस्य प्रियमेव शिरः । मोदो दक्षिणः पक्षः । प्रमोद उत्तरः पक्षः । आनन्द आत्मा । ब्रह्म पुच्छं प्रतिष्ठा । तदप्येष श्लोको भवति ॥१॥ विज्ञान (विज्ञानवान् पुरुष) यज्ञका विस्तार करता है और वही कर्मोंका भी विस्तार करता है। सम्पूर्ण देव ज्येष्ठ विज्ञान-ब्रह्मकी उपासना करते हैं। यदि साधक 'विज्ञान ब्रह्म है' ऐसा जान जाय और फिर उससे प्रमाद न करे तो अपने शरीरके सारे पापोंको त्यागकर वह समस्त कामनाओं (भोगों) को पूर्णतया प्राप्त कर लेता है। यह जो विज्ञानमय है वही उस अपने पूर्ववर्ती मनोमय शरीरका आत्मा है। उस इस विज्ञानमयसे दूसरा इसका अन्तर्वर्ती आत्मा आनन्दमय है। उस आनन्दमयके द्वारा यह पूर्ण है। वह यह आनन्दमय भी पुरुषाकार ही है। उस (विज्ञानमय) की पुरुषाकारताके समान ही यह पुरुषाकार है। उसका प्रिय ही शिर है, मोद दक्षिण पक्ष है, प्रमोद उत्तर पक्ष है, आनन्द आत्मा है और ब्रह्म पुच्छ-प्रतिष्ठा है। उसके विषयमें ही यह श्लोक है ॥ १ ॥ CC-0 Pt. Chakradhar Joshi and Sons, Dev Prayag. Digitized by eGangotri

१४२ तैत्तिरीयोपनिषद् [ वल्ली २

१४२ तैत्तिरीयोपनिषद् [ वल्ली २ विज्ञानं यज्ञं तनुते । विज्ञान- | विज्ञान यज्ञका विस्तार करता विज्ञानमयो- वान्हि यज्ञं तनोति | है अर्थात् विज्ञानवान् पुरुष ही पासनम् श्रद्धादिपूर्वकम् । | श्रद्धादिपूर्वक यज्ञका अनुष्ठान करता अतो विज्ञानस्य कर्तृत्वं तनुत | है। अतः यज्ञानुष्ठानमें विज्ञानका कर्तृत्व है और तनुते—इसका भाव इति कर्माणि च तनुते । यस्मा- | यह है कि वही कर्मोंका भी द्विज्ञानकर्तृकं सर्वं तस्माद्युक्तं | विस्तार करता है। इस प्रकार क्योंकि सब कुछ विज्ञानका ही विज्ञानमय आत्मा ब्रह्मेति । | किया हुआ है इसलिये 'विज्ञानमय आत्मा ब्रह्म है' ऐसा कहना ठीक किं च विज्ञानं ब्रह्म सर्वे देवा | ही है। यही नहीं, इन्द्रादि सम्पूर्ण इन्द्रादयो ज्येष्ठं प्रथमजत्वात्सर्व- | देवगण विज्ञानब्रह्मकी, जो सबसे पहले उत्पन्न होनेवाला होनेसे प्रवृत्तीनां वा तत्पूर्वकत्वात्प्रथमजं | ज्येष्ठ है अथवा समस्त वृत्तियाँ विज्ञानपूर्वक होनेके कारण जो विज्ञानं ब्रह्मोपासते ध्यायन्ति | प्रथमोत्पन्न है, उस विज्ञानरूप ब्रह्मकी तस्मिन्विज्ञानमये ब्रह्मण्यभि- | उपासना अर्थात् ध्यान करते हैं। तात्पर्य यह है कि वे उस विज्ञानमय मानं कृत्वोपासत इत्यर्थः । | ब्रह्ममें अभिमान करके उसकी .उपासना करते हैं। अतः वे उस तस्मात्ते महतो ब्रह्मण उपा- | महद्ब्रह्मकी उपासना करनेसे ज्ञान सनाज्ज्ञानैश्वर्यवन्तो भवन्ति । | और ऐश्वर्यसम्पन्न होते हैं। तच्च विज्ञानं ब्रह्म चेद्यदि वेद | उस विज्ञानरूप ब्रह्मको यदि विजानाति न केवलं वेदैव तस्मा- | जान ले—केवल जान ही न ले बल्कि द्ब्रह्मणश्चेन्न प्रमाद्यति बाह्येष्वेवा- | यदि उससे प्रमाद भी न करे; बाह्य अनात्म पदार्थोंमें आत्मबुद्धि की नात्मस्वात्मभावितत्वात्प्राप्तं वि- | हुई है, उसके कारण विज्ञानमय ज्ञानमये ब्रह्मण्यात्मभावनायाः | ब्रह्ममें की हुई आत्मभावनासे प्रमाद

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