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तत्त्वार्थ सूत्र (मोक्षशास्त्र - संस्कृत सूत्र एवं हिन्दी व्याख्या)

Tattvartha Sutra / Mokshashastra with Hindi Commentary

आचार्य उमास्वामी (उमास्वाति) / आचार्य पूज्यपाद द्वारा

DevanagariHindipublished177 पृष्ठ

अध्याय - ७ तरह से पके पदार्थ - इनका आहार करना - ये पाँच उपभोग-परिभोग परिमाण शिक्षाव्रत के अतिचार हैं। Victuals containing (one-sensed) organisms, placed near organisms, mixed with organisms, stimulants, and ill-cooked food. सचित्तनिक्षेपापिधानपरव्यपदेशमात्सर्यकालातिक्रमाः ॥३६॥ [ सचित्तनिक्षेपः ] सचित्त पत्र आदि में रखकर भोजन देना, [ सचित्तापिधानं ] सचित्त पत्र आदि से ढके हुये भोजन आदि को देना [ परव्यपदेशः ] दूसरे दातार की वस्तु को देना [ मात्सर्य ] अनादरपूर्वक देना अथवा दूसरे दातार की वस्तु को ईर्ष्यापूर्वक देना और [ कालातिक्रमः ] योग्य काल का उल्लंघन करके देना - ये पाँच अतिथिसंविभाग शिक्षाव्रत के अतिचार हैं। Placing the food on things with organisms such as green leaves, covering it with such things, food of another host, envy, and untimely food. 110

अध्याय - ७ जीवितमरणाशंसामित्रानुरागसुखानुबन्धनिदानानि ॥३७॥ [ जीविताशंसा ] सल्लेखना धारण करने के बाद जीने की इच्छा करना, [ मरणाशंसा ] वेदना से व्याकुल होकर शीघ्र मरने की इच्छा करना, [ मित्रानुरागः ] अनुराग के द्वारा मित्रों का स्मरण करना, [ सुखानुबन्ध ] पहले भोगे हुये सुखों का स्मरण करना और [ निदानं ] निदान करना अर्थात् आगामी विषय-भोगों की वांछा करना - ये पाँच सल्लेखनाव्रत के अतिचार हैं। Desire for life, desire for death, recollection of affection for friends, recollection of pleasures, and constant longing for enjoyment. अनुग्रहार्थं स्वस्यातिसर्गो दानम् ॥३८॥ [ अनुग्रहार्थं ] अनुग्रह-उपकार के हेतु से [ स्वस्यातिसर्गः ] धन आदि अपनी वस्तु का त्याग करना सो [ दानं ] दान है। Charity is the giving of one’s wealth to another for mutual benefit. विधिद्रव्यदातृपात्रविशेषात्तद्विशेषः ॥३९॥ [ विधिद्रव्यदातृपात्रविशेषात् ] विधि, द्रव्य, दातृ और पात्र की विशेषता से [ तद्विशेषः ] दान में विशेषता होती है। 111

अध्याय - ७ The distinction with regard to the effect of a gift consists in the manner, the thing given, the nature of the giver, and the nature of the recipient. ॥ इति तत्त्वार्थाधिगमे मोक्षशास्त्रे सप्तमोऽध्यायः ॥ 112

अध्याय ७: पञ्च महाव्रत, अणुव्रत व शीलाचरण

अध्याय - ८ अथ अष्टमोऽध्यायः Bondage of Karma मिथ्यादर्शनाविरतिप्रमादकषाययोगा बन्धहेतवः ॥१॥ [ मिथ्यादर्शनाविरतिप्रमादकषाययोगाः ] मिथ्यादर्शन, अविरति, प्रमाद, कषाय और योग - ये पाँच [ बंधहेतवः ] बन्ध के कारण हैं। Wrong belief, non-abstinence, negligence, passions, and activities are the causes of bondage. सकषायत्वाज्जीवः कर्मणो योग्यान्पुद्गलानादत्ते स बन्धः ॥२॥ [ जीवः सकषायत्वात् ] जीव कषायसहित होने से [ कर्मणः योग्यान्पुद्गलान् ] कर्म के योग्य पुद्गल परमाणुओं को [ आदत्ते ] ग्रहण करता है [ स बन्धः ] वह बन्ध है। The individual self attracts particles of matter which are fit to turn into karma, as the self is actuated by passions. This is bondage. प्रकृतिस्थित्यनुभवप्रदेशास्तद्विधयः ॥३॥ [ तत् ] उस बन्ध के [ प्रकृतिस्थित्यनुभवप्रदेशाः ] प्रकृतिबन्ध, स्थितिबन्ध, अनुभागबन्ध और प्रदेशबन्ध [ विधयः ] ये चार भेद हैं। 113

अध्याय - ८ Bondage is of four kinds according to the nature or species of karma, duration of karma, fruition of karma, and the quantity of space-points of karma. आद्यो ज्ञानदर्शनावरणवेदनीयमोहनीयायुर्नाम- गोत्रान्तरायाः ॥४॥ [ आद्यो ] पहला अर्थात् प्रकृतिबन्ध [ ज्ञानदर्शनावरण- वेदनीयमोहनीयायुर्नामगोत्रान्तरायाः ] ज्ञानावरण, दर्शनावरण, वेदनीय, मोहनीय, आयु, नाम, गोत्र और अन्तराय - इन आठ प्रकार का है। The type-bondage is of eight kinds, knowledge- obscuring, perception-obscuring, feeling-producing, deluding, life-determining, name-determining (physique-making), status-determining, and obstructive karmas. पञ्चनवद्व्यष्टाविंशतिचतुर्द्विचत्वारिंशद्द्विपञ्चभेदा यथाक्रमम् ॥५॥ [ यथाक्रमम् ] उपरोक्त ज्ञानावरणादि आठ कर्मों के अनुक्रम से [ पञ्चनवद्व्यष्टाविंशतिचतुर्द्विचत्वारिंशद्द्विपञ्चभेदाः ] पाँच, नव, दो, अट्ठाईस, चार, ब्यालीस, दो और पाँच भेद हैं। 114

अध्याय - ८ The subdivisions are five, nine, two, twenty-eight, four, forty-two, two, and five kinds respectively. मतिश्रुतावधिमनःपर्ययकेवलानाम् ॥६॥ [ मतिश्रुतावधिमनःपर्ययकेवलानाम् ] मतिज्ञानावरण, श्रुतज्ञानावरण, अवधिज्ञानावरण, मनःपर्ययज्ञानावरण और केवलज्ञानावरण, ये ज्ञानावरण कर्म के पाँच भेद हैं। Karmas which obscure sensory knowledge, scriptural knowledge, clairvoyance, telepathy, and omniscience, are the five kinds of knowledge- obscuring karmas. चक्षुरचक्षुरवधिकेवलानां निद्रानिद्रानिद्राप्रचला- प्रचलाप्रचलास्त्यानगृद्ध्यश्च ॥७॥ [ चक्षुरचक्षुरवधिकेवलानां ] चक्षुदर्शनावरण, अचक्षुदर्शनावरण, अवधिदर्शनावरण, केवलदर्शनावरण [ निद्रानिद्रानिद्राप्रचलाप्रचलाप्रचलास्त्यानगृद्ध्यश्च ] निद्रा, निद्रानिद्रा, प्रचला, प्रचलाप्रचला और स्त्यानगृद्धि - ये नव भेद दर्शनावरण कर्म के हैं। 115

अध्याय - ८ सदसद्वेद्ये ॥८॥ [ सदसद्वेद्ये ] सातावेदनीय और असातावेदनीय ये दो वेदनीय कर्म के भेद हैं। दर्शनचारित्रमोहनीयाकषायकषायवेदनीयाख्यास्त्रिद्विनव- षोडशभेदाः सम्यक्त्वमिथ्यात्वतदुभयान्यकषायकषायौ हास्यरत्यरतिशोकभयजुगुप्सास्त्रीपुन्नपुंसकवेदा अनन्तानुबन्ध्यप्रत्याख्यानप्रत्याख्यानसंज्वलन- विकल्पाश्चैकशः क्रोधमानमायालोभाः ॥९॥ [ दर्शनचारित्रमोहनीयाकषायकषायवेदनीयाख्याः ] दर्शनमोहनीय, चारित्रमोहनीय, अकषायवेदनीय और

अध्याय - ८ कषायवेदनीय - ये चार भेदरूप मोहनीय कर्म के हैं और इसके अनुक्रम से [ त्रिद्विनवषोडशभेदाः ] तीन, दो, नव और सोलह भेद हैं। वे इस प्रकार से हैं - [ सम्यक्त्वमिथ्यात्वतदुभयानि ] सम्यक्त्व मोहनीय, मिथ्यात्व मोहनीय और सम्यग्मिथ्यात्वमोहनीय - ये दर्शन मोहनीय के तीन भेद हैं; [ अकषायकषायौ ] अकषायवेदनीय और कषायवेदनीय ये दो भेद चारित्र मोहनीय के हैं; [ हास्यरत्यरतिशोकभयजुगुप्सास्त्रीपुन्नपुंसकवेदाः ] हास्य, रति, अरति, शोक, भय, जुगुप्सा, स्त्रीवेद, पुरुषवेद और नपुंसकवेद - ये अकषायवेदनीय के नव हैं; और [ अनन्तानुबन्ध्यप्रत्याख्यानप्रत्याख्यानसंज्वलनविकल्पाः च ] अनन्तानुबन्धी, अप्रत्याख्यान, प्रत्याख्यान तथा संज्वलन के भेद से तथा [ एकशः क्रोधमानमायालोभाः ] इन प्रत्येक के क्रोध, मान, माया और लोभ ये चार प्रकार - ये सोलह भेद कषायवेदनीय के हैं। इस तरह मोहनीय कर्म के कुल अट्ठाईस भेद हैं। The deluding karmas are of twenty-eight kinds. These are the three subtypes of faith-deluding karmas¹, the two types of conduct-deluding karmas ¹ The three subtypes of faith-deluding karmas are wrong belief, mixed right and wrong belief, and right belief slightly clouded by wrong belief. 117

अध्याय - ८ which cause (and which are caused by) the passions and quasi-passions, the subtypes of the passions² and the quasi-passions³ being sixteen and nine respectively. नारकतैर्यग्योनमानुषदैवानि ॥१०॥ [ नारकतैर्यग्योनमानुषदैवानि ] नरकायु, तिर्यंचायु, मनुष्यायु और देवायु – ये चार भेद आयुकर्म के हैं। (The life-karmas determine the quantum of life in the states of existence as) infernal beings, plants and animals, human beings, and celestial beings. गतिजातशरीरांगोपांगनिर्माणबन्धनसंघातसंस्थान- संहननस्पर्शरसगंधवर्णानुपूर्व्यगुरुलघूपघात- परघातातपोद्योतोच्छ्वासविहायोगतयः प्रत्येकशरीरत्रससुभगसुस्वरशुभसूक्ष्मपर्याप्ति- स्थिरादेययशःकीर्तिसेतराणि तीर्थकरत्वं च ॥११॥ ² The passions are four – anger, pride, deceitfulness, and greed. Each of these four is further divided into four classes, namely that which leads to infinite births, that which hinders partial abstinence, that which disturbs complete self-restraint, and that which interferes with perfect conduct. Thus the passions make up sixteen. ³ The quasi-passions are nine, namely laughter, liking, disliking, sorrow, fear, disgust, the male sex-passion, the female sex-passion, and the neuter sex-passion. 118

अध्याय - ८ [ गतिजातिशरीरांगोपांगनिर्माणबन्धनसंघातसंस्थान- संहननस्पर्शरसगंधवर्णानुपूर्व्यगुरुलघूपघात- परघातातपोद्योतोच्छ्वासविहायोगतयः ] गति, जाति, शरीर, अंगोपांग, निर्माण, बन्धन, संघात, संस्थान, संहनन, स्पर्श, रस, गंध, वर्ण, आनुपूर्वी, अगुरुलघु, उपघात, परघात, आतप, उद्योत, उच्छ्वास और विहायोगति - ये इक्कीस, तथा [ प्रत्येकशरीरत्रससुभगसुस्वरशुभसूक्ष्मपर्याप्ति- स्थिरादेययशःकीर्तिसेतराणि ] प्रत्येक शरीर, त्रस, सुभग, सुस्वर, शुभ, सूक्ष्म, पर्याप्ति, स्थिर, आदेय और यशःकीर्ति - ये दस तथा इनसे उलटे दस अर्थात् साधारण शरीर, स्थावर, दुर्भग, दुस्वर, अशुभ, बादर (-स्थूल), अपर्याप्ति, अस्थिर, अनादेय और अपयशःकीर्ति - ये दस, [ तीर्थकरत्वं च ] और तीर्थकरत्व, इस तरह नामकर्म के कुल ब्यालीस भेद हैं। The name (physique-making) karmas comprise the state of existence, the class, the body, the chief and secondary parts, formation, binding (union), molecular interfusion, structure, joint, touch, taste, odour, colour, movement after death, neither heavy nor light, self-annihilation, annihilation by others, emitting warm splendour, emitting cool lustre, respiration, gait, individual body, mobile being, amiability, a melodious voice, beauty of form, minute body, complete development (of the organs), firmness, lustrous body, glory and renown, and the •••••••••••••••••••••••••••••••••••••••• 119

अध्याय - ८ opposites of these (commencing from individual body), and Tīrthakaratva. उच्चैर्नीचैश्च ॥१२॥ [ उच्चैर्नीचैश्च ] उच्चगोत्र और नीचगोत्र - ये दो भेद गोत्र कर्म के हैं। The high and the low. दानलाभभोगोपभोगवीर्याणाम् ॥१३॥ [ दानलाभभोगोपभोगवीर्याणाम् ] दानान्तराय, लाभान्तराय, भोगान्तराय, उपभोगान्तराय और वीर्यान्तराय - ये पाँच भेद अन्तराय कर्म के हैं। प्रकृतिबन्ध के उपभेदों का वर्णन यहाँ पूर्ण हुआ। The obstructive karmas are of five kinds, obstructing the making of gifts, gain, enjoyment of consumable things, enjoyment of non-consumable things, and effort (energy). आदितस्तिसृणामन्तरायस्य च त्रिंशत्सागरोपमकोटीकोट्यः परा स्थितिः ॥१४॥ 120

अध्याय - ८ [ आदितस्तिसृणाम् ] आदि से तीन अर्थात् ज्ञानावरण, दर्शनावरण, तथा वेदनीय [ अन्तरायस्य च ] और अन्तराय - इन चार कर्मों की [ परा स्थितिः ] उत्कृष्ट स्थिति [ त्रिंशत्सागरोपमकोटीकोट्यः ] तीस कोड़ाकोड़ी सागर की है। The maximum duration of the three main types (primary species) from the first and obstructive karmas is thirty sāgaropama kotīkotī. सप्ततिर्मोहनीयस्य ॥१५॥ [ मोहनीयस्य ] मोहनीय कर्म की उत्कृष्ट स्थिति [ सप्ततिः ] सत्तर कोड़ाकोड़ी सागर की है। Seventy sāgaropama kotīkotī is the maximum duration of the deluding karmas. विंशतिर्नामगोत्रयोः ॥१६॥ [ नामगोत्रयोः ] नाम और गोत्र कर्म की उत्कृष्ट स्थिति [ विंशतिः ] बीस कोड़ाकोड़ी सागर की है। Twenty sāgaropama kotīkotī is the maximum duration of the name-karma and the status- determining karma. 121

अध्याय - ८ त्रयस्त्रिंशत्सागरोपमाण्यायुषः ॥१७॥ [ आयुषः ] आयु कर्म का उत्कृष्ट स्थिति [ त्रयस्त्रिंशत्सागरोपमाणि ] तेंतीस सागर की है। Thirty-three sāgaropamas is the maximum duration of life. अपरा द्वादशमुहूर्ता वेदनीयस्य ॥१८॥ [ वेदनीयस्य अपरा ] वेदनीय कर्म की जघन्य स्थिति [ द्वादशमुहूर्ता ] बारह मुहूर्त की है। The minimum duration of the feeling-producing karma is twelve muhūrtas. नामगोत्रयोरष्टौ ॥१९॥ [ नामगोत्रयोः ] नाम और गोत्र कर्म की जघन्य स्थिति [ अष्टौ ] आठ मुहूर्त की है। The minimum duration of the name-karma and the status-determining karma is eight muhūrtas. शेषाणामन्तर्मुहूर्ता ॥२०॥ 122

अध्याय - ८ [ शेषाणां ] बाकी के अर्थात् ज्ञानावरण, दर्शनावरण, मोहनीय, अन्तराय और आयु - इन पाँच कर्मों की जघन्य स्थिति [ अन्तर्मुहूर्ता ] अन्तर्मुहूर्त की है। The minimum duration of the rest is up to one muhūrta. विपाकोऽनुभवः ॥२१॥ [ विपाकः ] विविध प्रकार का जो पाक है [ अनुभवः ] सो अनुभव है। Fruition is the ripening or maturing of karmas. स यथानाम ॥२२॥ [ सः ] यह अनुभाग बन्ध [ यथानाम ] कर्मों के नाम के अनुसार ही होता है। (The nature of) fruition is according to the names of the karmas. ततश्च निर्जरा ॥२३॥ 123

अध्याय - ८ [ ततः च ] तीव्र, मध्यम या मन्द फल देने के बाद [ निर्जरा ] उन कर्मों की निर्जरा हो जाती है अर्थात् उदय में आने के बाद कर्म आत्मा से पृथक् हो जाते हैं। नामप्रत्ययाः सर्वतो योगविशेषात्सूक्ष्मैकक्षेत्रावगाह- स्थिताः सर्वात्मप्रदेशेष्वनन्तानन्तप्रदेशाः ॥२४॥ [ नामप्रत्ययाः ] ज्ञानावरणादि कर्म प्रकृतियों का कारण, [ सर्वतः ] सर्व तरफ से अर्थात् समस्त भावों में [ योगविशेषात् ] योग विशेष से [ सूक्ष्मैकक्षेत्रावगाहस्थिताः ] सूक्ष्म, एकक्षेत्रावगाहरूप स्थित [ सर्वात्मप्रदेशेषु ] और सर्व आत्मप्रदेशों में [ अनन्तानन्तप्रदेशाः ] जो कर्म पुद्गल के अनन्तानन्त प्रदेश हैं सो प्रदेशबन्ध है। 124

अध्याय - ८ सद्धेद्यशुभायुर्नामगोत्राणि पुण्यम् ॥२५॥ [ सद्धेद्यशुभायुर्नामगोत्राणि ] साता वेदनीय, शुभ आयु, शुभ नाम और शुभ गोत्र [ पुण्यम् ] ये पुण्य-प्रकृतियाँ हैं। अतोऽन्यत्पापम् ॥२६॥ [ अतःअन्यत् ] इन पुण्य-प्रकृतियों से अन्य अर्थात् असाता वेदनीय, अशुभ आयु, अशुभ नाम और अशुभ गोत्र [ पापम् ] ये पाप-प्रकृतियाँ हैं। ॥ इति तत्त्वार्थाधिगमे मोक्षशास्त्रे अष्टमोऽध्यायः ॥ 125

अध्याय - ९ अथ नवमोऽध्यायः Stoppage and Shedding of Karma आस्रवनिरोधः संवरः ॥१॥ [ आस्रवनिरोधः ] आस्रव का रोकना सो [ संवरः ] संवर है अर्थात् आत्मा में जिन कारणों से कर्मों का आस्रव होता है उन कारणों को दूर करने से कर्मों का आना रुक जाता है उसे संवर कहते हैं। The obstruction of influx is stoppage (samvara). स गुप्तिसमितिधर्मानुप्रेक्षापरीषहजयचारित्रैः ॥२॥ [ गुप्तिसमितिधर्मानुप्रेक्षापरीषहजयचारित्रैः ] तीन गुप्ति, पाँच समिति, दश धर्म, बारह अनुप्रेक्षा, बावीस परीषहजय और पाँच चारित्र - इन छः कारणों से [ सः ] संवर होता है। Stoppage (is effected) by control, carefulness, virtue, contemplation, conquest by endurance, and conduct. तपसा निर्जरा च ॥३॥ [ तपसा ] तप से [ निर्जरा च ] निर्जरा होती है और संवर भी होता है। 126

अध्याय - ९ By penance (austerity) dissociation also. सम्यग्योगनिग्रहो गुप्तिः ॥४॥ [ सम्यग्योगनिग्रहो ] भले प्रकार योग का निग्रह करना सो [ गुप्तिः ] गुप्ति है। Curbing activity well is control (gupti). ईर्याभाषैषणादाननिक्षेपोत्सर्गाः समितयः ॥५॥ [ ईर्याभाषैषणादाननिक्षेपोत्सर्गाः ] सम्यक् ईर्या, सम्यक् भाषा, सम्यक् एषणा, सम्यक् आदाननिक्षेप और सम्यक् उत्सर्ग – ये पाँच [ समितयः ] समिति हैं। (चौथे सूत्र का ‘सम्यक्’ शब्द इस सूत्र में भी लागू होता है।) Walking, speech, eating, lifting and laying down, and depositing waste products constitute the five- fold regulation of activities. उत्तमक्षमामार्दवार्जवशौचसत्यसंयमतपस्त्यागाकिञ्चन्य- ब्रह्मचर्याणि धर्मः ॥६॥ 127

अध्याय - ९ [ उत्तमक्षमामार्दवार्जवशौचसत्यसंयमतपस्त्यागाकिञ्चन्य- ब्रह्मचर्याणि ] उत्तम क्षमा, उत्तम मार्दव, उत्तम आर्जव, उत्तम शौच, उत्तम सत्य, उत्तम संयम, उत्तम तप, उत्तम त्याग, उत्तम आकिंचन्य और उत्तम ब्रह्मचर्य - ये दस [ धर्मः ] धर्म हैं। Supreme forbearance, modesty, straightforward- ness, purity, truthfulness, self-restraint, austerity, renunciation, non-attachment, and celibacy constitute virtue or duty. अनित्याशरणसंसारैकत्वान्यत्वाशुच्यास्रवसंवरनिर्जरा- लोकबोधिदुर्लभधर्मस्वाख्याततत्त्वानुचिन्तनमनुप्रेक्षाः ॥७॥ [ अनित्याशरणसंसारैकत्वान्यत्वाशुच्यास्रवसंवरनिर्जरा- लोकबोधिदुर्लभधर्मस्वाख्याततत्त्वानुचिन्तनम् ] अनित्य, अशरण, संसार, एकत्व, अन्यत्व, अशुचि, आस्रव, संवर, निर्जरा, लोक, बोधिदुर्लभ और धर्म - इन बारह के स्वरूप का बारम्बार चिन्तवन करना सो [ अनुप्रेक्षाः ] अनुप्रेक्षा है। Reflection is meditating on transitoriness, helpless- ness, transmigration, loneliness, distinctness, impurity, influx, stoppage, dissociation, the universe, rarity of enlightenment, and the truth proclaimed by religion. 128

अध्याय - ९ मार्गाच्चवननिर्जरार्थं परिषोढव्याः परीषहाः ॥८॥ [ मार्गाच्चवननिर्जरार्थं ] संवर के मार्ग से च्युत न होने और कर्मों की निर्जरा के लिये [ परीषहाः परिषोढव्याः ] बाईस परीषह सहन करने योग्य हैं। (यह संवर का प्रकरण चल रहा है, अतः इस सूत्र में कहे गये 'मार्ग' शब्द का अर्थ 'संवर का मार्ग' समझना।) The afflictions are to be endured so as not to swerve from the path of stoppage of karmas and for the sake of dissociation of karmas. क्षुत्पिपासाशीतोष्णदंशमशकनाग्न्यारतिस्त्रीचर्यानिषद्या- शय्याक्रोशवधयाचनाऽलाभरोगतृणस्पर्शमल- सत्कारपुरस्कारप्रज्ञाऽज्ञानादर्शनानि ॥९॥ [ क्षुत्पिपासाशीतोष्णदंशमशकनाग्न्यारतिस्त्रीचर्यानिषद्या- शय्याक्रोशवधयाचनाऽलाभरोगतृणस्पर्शमल- सत्कारपुरस्कारप्रज्ञाऽज्ञानादर्शनानि ] क्षुधा, तृषा, शीत, उष्ण, दंशमशक, नग्न्य, अरति, स्त्री, चर्या, निषद्या, शय्या, आक्रोश, वध, याचना, अलाभ, रोग, तृणस्पर्श, मल, सत्कारपुरस्कार, प्रज्ञा, अज्ञान और अदर्शन, ये बाईस परीषह हैं। 129