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त्रिपुरारहस्य (ज्ञान खण्ड - महर्षि दत्तात्रेय-परशुराम संवाद सान्वय सटीक)

Tripura Rahasya Jnana Khanda with Hindi Commentary

महर्षि दत्तात्रेय / भगवान् परशुराम द्वारा

DevanagariHindipublished404 पृष्ठ

अष्टादशोऽध्यायः। २६६ प्रष्टुर्विद्या हि सुदृढा प्रश्नो बीजं निरूपणे ॥ ५८ ॥ अप्रष्टुर्नैव विद्या स्यात् पृष्ट्वा विद्यात्ततो गुरुम् । चितिरेकैव वैचित्र्याद्भासते इति सम्भवेत् ॥ ५९ ॥ एकरूपो यथाऽऽदर्शः प्रतिबिम्बादनेकधा । पश्य स्वाप्नविकल्पादौ मन एकं हि केवलम् ॥ ६० ॥ द्रष्टृदर्शनदृश्यात्मवैचित्र्येण विभाति हि । एवं शुद्धैव सा संविद्विचित्राकारभासिनी ॥ ६१ ॥ चितिश्चेत्यमिति द्वेधा स्वप्नेऽपि हि विभासते । आलोकमन्तरा त्वन्धो भावं जानाति वै ननु ॥ ६२ ॥ अन्धस्याभासमानश्च रूपं भाति स्मृतौ किल । नैवं चितेरभाने किं कदा कुत्र विभासते ॥ ६३ ॥ सन्देहसे छूट सकता है ? विद्या तो पूछनेवालेकी ही पक्की होती है, वास्तवमें प्रश्न ही निरूपणका बीज है। जो प्रश्न नहीं करता उसे विद्या (ज्ञान) प्राप्त नहीं होती, अतः प्रश्न करके ही गुरुदेवसे विद्या प्राप्त करनी चाहिये ॥ ५८-५९ पू० ॥ एक ही चैतन्य अनेकरूपोंमें भास रहा है—यह बात इसी प्रकार सम्भव है जैसे दर्पण एकरूप होनेपर भी प्रतिबिम्बके कारण अनेकरूप जान पड़ता है ॥ ५९ उ०-६० पू० ॥ देखो, स्वप्न और मनोराज्य आदिमें केवल एक ही मन द्रष्टा; दर्शन और दृश्य आदि अनेक रूपोंमें भासता ही है। इसी प्रकार वह संवित् शुद्ध होनेपर भी अनेक रूपोंमें भासनेवाली है। स्वप्नमें भी चिति और चेत्य-ये दो भेद भासते ही हैं। [यदि यह द्वैत स्वप्नमें मिथ्या है तो जाग्रत्में क्यों नहीं है ? ] ॥ ६० उ०-६२ पू० ॥ [तुमने कहा कि प्रकाश और घटादिके समान भासक और भास्य दोनोंहीकी सत्ता है, सो यह बात नहीं है, क्योंकि घटादि तो नेत्र या प्रकाश न होनेपर भी अन्य साधनोंसे भास जाते हैं; जैसे—] अन्धा आदमी प्रकाश न होनेपर भी वस्तुओंको स्पर्शादिके द्वारा जान ही लेता है तथा अन्धे आदमीको रूपका भान न होनेपर भी स्मृतिमें उसका भान होता ही है; किन्तु चेतनके विषयमें ऐसी बात नहीं है, चेतनका भान न होनेपर भला कब किसीको कहीं किसी वस्तु- का भान हुआ है ? ॥ ६२ उ०-६३ ॥

२७० त्रिपुरारहस्ये ज्ञानखण्डे यथाऽऽदर्शं विना किञ्चित् प्रतिबिम्बं न भाति वै । आदर्शान्नातिरिक्तोऽतः प्रतिबिम्बो भवेद्यथा ॥ ६४ ॥ एवं चितिमृते किञ्चिदतिरिक्तं न विद्यते । अतएव मनोऽप्यन्यत् सर्वथा नास्ति वै चितेः ॥ ६५ ॥ यथा स्वप्ने मनस्तद्वज्जाग्रत्यपि मनो न हि । कल्पितं कार्यसंसिद्ध्यै करणं केवलं मनः ॥ ६६ ॥ यथा स्वाप्नः कुठारः स्यात् करणं तरुछेदने । राम क्रियाऽसत्यरूपा सत्यं तत् करणं कथम् ॥ ६७ ॥ असता नरशृङ्गेण कः कदा सुविदारितः । तस्मान्नास्ति मनो राम चासत्कार्यस्य कारणम् ॥ ६८ ॥ स्वप्ने दृशिः क्रिया कार्यं कारणं मन उच्यते । यथा तथा सर्वदापि मनो नास्ति क्रियाकरम् ॥ ६९ ॥ जिस प्रकार दर्पणके बिना कोई भी प्रतिबिम्ब नहीं भासता और इसीसे जैसे दर्पणसे भिन्न प्रतिबिम्ब है ही नहीं, इसी प्रकार चेतनके बिना और चेतनसे भिन्न कुछ भी नहीं है। अतः मन भी चेतनसे भिन्न बिलकुल नहीं है ॥ ६४-६५ ॥ जैसे स्वप्नमें [स्वाप्न पदार्थों से भिन्न] मन नहीं है उसी प्रकार जाग्रत्में भी मनकी पृथक् सत्ता नहीं है। स्वप्नके समान जाग्रत्में भी कार्यनिर्वाहके लिये करणरूपसे मन की कल्पना हो जाती है ॥ ६६॥ जिस प्रकार स्वप्नमें पेड़ काटनेके लिये स्वप्नकी ही कुल्हाड़ी होती है [वैसे ही मन भी कल्पित ही होता है]। परशुराम! यदि स्वप्नकी क्रिया असत्य है तो उसका साधन ही कैसे सत्य हो सकता है ॥ ६७ ॥ मनुष्यके सींग होता ही नहीं। फिर उस अलीक नरशृंगसे कोई कब विदीर्ण हो सकता है। अतः परशुराम! स्वप्नमें असत्य कार्यका कारण मन है ही नहीं ॥ ६८ ॥ स्वप्नमें जैसे दृकशक्ति ही क्रियारूप कार्य और उसका कारण मन कही जाती है उसी प्रकार सर्वदा ही जाग्रत् कालमें भी क्रिया करनेवाला मन वास्तवमें नहीं है ॥ ६९ ॥

अष्टादशोऽध्यायः। २७१ चिदात्मा केवलः स्वच्छः स्वाच्छन्द्यान्मन आदिकम्। परिकल्प्य व्यवहरेत् दृश्यद्रष्ट्रादिभेदतः ॥ ७० ॥ क्वचित् क्वचित् केवलं तु निर्विकल्पात्मना स्थितः । शृणु भार्गव चित्तत्त्वं परिपूर्णमपि स्वयम् ॥ ७१ ॥ नाकाशतुल्यं चैतन्यात् स्वप्रकाशमतः स्थितम्। आकाशश्च चिदात्मा च न विलक्षणतां गतौ ॥ ७२ ॥ पूर्णः सूक्ष्मो निर्मलश्चाजोऽनन्तोऽपि निराकृतिः । सर्वाधारोऽप्यसङ्गात्मा सर्वान्तरबहिर्भवः ॥ ७३ ॥ विशेषस्तत्र चैतन्यमाकाशे तन्न विद्यते । वस्तुतश्चैतन्यपूर्ण आत्मैवाकाश उच्यते ॥ ७४ ॥ नह्यात्माकाशयोर्भेदो लेशतोऽपि हि विद्यते । य आकाशः स आत्मैव यथात्माऽऽकाश एव सः॥ ७५ ॥ अज्ञाः पश्यन्त्यात्मरूपमाकाशमिति वै भ्रमात् । केवल शुद्ध चिदात्मा ही अपने स्वातन्त्र्यसे मन आदिकी कल्पना करके कभी तो द्रष्टा और दृश्य आदि भेदरूपसे व्यवहार करता है और कभी केवल निर्विकल्प रूपसे स्थित रहता है ॥ ७०-७१ पू० ॥ भृगुनन्दन ! सुनो, चित्तत्त्व स्वयं परिपूर्ण होनेके कारण आकाश के समान नहीं है। इसीसे वह स्वयंप्रकाश भी है। [आकाशकी तरह जड़ नहीं है।] इसके सिवा आकाश और चिदात्मामें कोई और भेद नहीं है ॥ ७१ उ०-७२ ॥ आकाशकी तरह चिदात्मा भी परिपूर्ण, सूक्ष्म, निर्मल, अजन्मा, अनन्त, निराकार, सबका आधार, असङ्ग और सबके भीतर-बाहर रहनेवाला है। उसमें विशेषता केवल चैतन्यकी ही है, आकाशमें यह गुण नहीं है। वास्तवमें तो चैतन्यसे पूर्ण आकाश ही 'आत्मा' कहा जाता है ॥ ७३-७४ ॥ आकाश और आत्माका और कोई लेशमात्र भी अन्तर नहीं है। जो आकाश है वही आत्मा है और जो आत्मा है वही आकाश है ॥ ७५ ॥ अज्ञानी लोग भ्रमवश आत्माके स्वरूपको ही आकाशरूपमें देखते हैं;

२७२ त्रिपुरारहस्ये ज्ञानखण्डे सौरालोकं यथोलूकस्तमोमात्रं प्रपश्यति ॥ ७६ ॥ आकाशमेव विज्ञास्तु पश्यन्त्यात्मचिदात्मकम् । परा चितिः परेशानी स्वच्छस्वातन्त्र्यवैभवात् ॥ ७७ ॥ अवभासयदात्मानं परिच्छिन्नमनेकधा । यथा राम स्वमात्मानं स्वप्ने बहुविधं पृथक् ॥ ७८ ॥ मनुष्यादिविभेदेन भासयत्येवमेव हि । अनेकधावभासोऽपि परिच्छिन्नदृशैव हि ॥ ७९ ॥ स्वयं स्वदृष्ट्या पूर्णात्मरूपिण्येव परा चितिः । ऐन्द्रजालिक एकोऽपि स्वमात्मानमनेकधा ॥ ८० ॥ भासयंस्तत्र द्रष्टॄणां स्वदृष्ट्या भासयेत् स्वयम् । एक एव निर्विकार एवं सा परमा चितिः ॥ ८१ ॥ शुद्धैकरूपभासापि परिच्छिन्ना ह्यनेकधा । परिच्छिन्नस्वरूपाणां भासयेन्मायया वृता ॥ ८२ ॥ जैसे उल्लू सूर्यके प्रकाशको ही अन्धकाररूपमें देखा करते हैं ॥ ७६ ॥ ज्ञानी पुरुष तो आकाशको ही चेतन आत्माके रूपमें देखते हैं। भगवती पराचिति अपने निर्दोष स्वातन्त्र्यके बलसे अपने स्वरूपको ही अनेक प्रकारसे परिच्छिन्न रूपोंमें प्रकट करती है, जिस प्रकार कि परशुरामजी ! स्वप्नावस्थामें वह मनुष्यादि अनेकों रूपोंमें स्वयं ही भासित हुआ करती है ॥ ७७-७९ पू० ॥ उसका यह अनेकरूपसे भासना भी परिच्छिन्न दृष्टिसे ही है। स्वयं अपनी दृष्टिमें तो वह पराचिति परिपूर्ण आत्मस्वरूपिणी ही है ॥ ७९ उ०-८० पू० ॥ जिस प्रकार ऐन्द्रजालिक (जादूगर) अकेला होनेपर भी अपनेको दर्शकोंके प्रति अनेकों रूपोंमें आभासित करनेपर भी अपनी दृष्टिसे तो स्वयं अकेला ही रहता है ॥ ८० उ०-८१ पू० ॥ इसी प्रकार वह पराचिति एक और निर्विकार ही है तथा [अपनी दृष्टिमें] शुद्ध एकरूपमें ही भासती भी है, तथापि मायासे आवृत होनेपर वह परिच्छिन्न होकर अनेकों परिच्छिन्न रूपोंको भासित करने लगती है ॥ ८१ उ०-८२ ॥

अष्टादशोऽध्यायः। २७३ मायावरणमप्येतत् परिच्छिन्नदृशो भवेत् । यथैन्द्रजालिको मायावृतश्चान्यदृशो भवेत् ॥ ८३ ॥ मायापरचितोऽत्यन्तं स्वातन्त्र्यमतिदुर्धटम् । लोकेऽपि योगिनोऽन्ये च मान्त्रिका ऐन्द्रजालिकाः॥ ८४ ॥ आच्छादितं स्वस्वातन्त्र्यं प्राप्य किञ्चित् सुयुक्तितः। दुर्घटं घटयन्त्येव ततो नैतद्विचित्रितम् ॥ ८५ ॥ एवं परचितेः स्वच्छस्वातन्त्र्यात् स्वात्मनो वपुः। अनेकधा परिच्छिन्नं भासितं भृगुनन्दन ॥ ८६ ॥ परिच्छेदोऽभिमानस्य त्वेकदेशे सुविश्रमः। साऽप्यपूर्णत्वविख्यातिर्याऽविद्या परिगीयते ॥ ८७ ॥ अत्र मुह्यन्ति बहवस्तार्किकाः पण्डिता अपि । स्वात्मानमनुदाहृत्य बहिर्दृष्टितया स्थितेः ॥ ८८ ॥ उसका यह मायारूप आवरण भी परिच्छिन्न दृष्टिवालोंके लिये ही है, जैसे ऐन्द्रजालिक दूसरोंकी दृष्टिमें ही मायासे आवृत्त होता है ॥ ८३ ॥ पराचितिका परमस्वातन्त्र्य ही माया है। यह अत्यन्त दुर्घट है।१ लोकमें भी योगी लोग तथा दूसरे मान्त्रिक आदि थोड़ा-सा संकुचित सामर्थ्य पाकर किसी युक्तिसे न होनेवाली बातें करके दिखा ही देते हैं। अतः पराचितिके लिये यह कोई विचित्र बात नहीं है ॥ ८४-८५ ॥ परशुरामजी ! इस प्रकार पराचितिके निर्मल स्वातन्त्र्यके कारण अपना ही स्वरूप अनेक प्रकारसे परिच्छिन्न होकर भासने लगा है ॥८६॥ अभिमानका किसी एक देशमें टिक जाना ही 'परिच्छेद' है। वही अपूर्णत्वबुद्धि भी है, जिसे 'अविद्या' नामसे कहा जाता है ॥८७॥ अपने आत्माका अनुसन्धान न करने तथा बाह्य दृष्टिसे स्थित रहनेके कारण इस विषयमें अनेकों तार्किकों और पण्डितोंको भी भ्रम हो जाता है ॥ ८८ ॥ १. अर्थात् असम्भव बातोंको भी सम्भव कर देनेवाला है।

२७४ त्रिपुरारहस्ये ज्ञानखण्डे गुरूपदिष्टं यत् किञ्चित् सद्वाप्यसदपीतरत् । अनुदाहृत्य चात्मानं यावन्न ह्यवलोकयेत् ॥ ८९ ॥ तावन्न फलमाप्नोति परोक्षात्मतया श्रुतेः । अतो मयोक्तं राम त्वं सम्पश्यात्मनि सद्द्दशा ॥ ९० ॥ चितिर्या परमा देवी सर्वसामान्यरूपिणी । सा प्रकाशमयी यस्माज्जडव्यावृत्तरूपिणी ॥ ९१ ॥ अतः स्वात्मनि विश्रान्तिस्त्वहन्ता पररूपिणी । जडाश्चिदात्मविश्रान्ताश्चिदात्मनि विभासतः ॥ ९२ ॥ न स्वरूपे स्वतो भान्ति तस्मान्न स्वात्मविश्रमः । चितेस्तु केवलं स्वस्मिन्ननन्यापेक्षया सदा ॥ ९३ ॥ भासमानत्वतः स्वस्मिन् विश्रान्तिरूपपद्यते । पूर्णाहन्ता परा सेयं या जडेषु न विद्यते ॥ ९४ ॥ गुरुदेवने सत् , असत् अथवा किसी अन्यरूपसे जो कुछ बतलाया है उसे जबतक आत्मानुसंधान करते हुए नहीं देखा जायगा तबतक केवल परोक्षरूपसे सुन लेनेसे ही मोक्ष रूप फलकी प्राप्ति नहीं होगी । इसलिये परशुराम ! मैंने जो कुछ कहा है उसे तुम अन्तर्मुखी दृष्टिसे अच्छीतरह अनुभव करो ॥ ८९-६० ॥ सम्पूर्ण पदार्थोंके विशेष अंशोंको त्यागकर उनमें सामान्यरूपसे भासनेवाली परमा देवी जो चिति है वही प्रकाशस्वरूपा है क्योंकि उसके स्वरूपमें जडताका सर्वथा निषेध है ॥ ६१ ॥ अतः वह स्वस्वरूपमें विश्रान्तिस्वरूपा है तथा पराहन्तारूपिणी है । जड पदार्थ उस चित्स्वरूपमें ही विश्रान्त हैं, चिदात्माके आश्रयसे ही उनका भान होता है ॥ ६२ ॥ वे अपने स्वरूपमें स्वयं प्रकाशित नहीं होते, इसलिये उनकी अपनेमें ही विश्रान्ति ( स्थिति ) नहीं है । केवल शुद्ध चितिकी ही अपनेमें विश्रान्ति होनी सम्भव है, क्योंकि वह किसी अन्यकी अपेक्षा न करके सर्वदा अपने स्वरूपमें ही प्रकाशमान है । यही श्रेष्ठ पूर्णा- हन्ता है, जो कि जड पदार्थोंमें नहीं है ॥ ६३-६४ ॥

अष्टादशोऽध्यायः। २७५ व्यावृत्तिः स्पर्शहीनेयं परिच्छेदविवर्जनात् । सर्वमस्यां यतः संस्थमादर्शे नगरं यथा ॥ ९५ ॥ व्यावृत्तिर्वा परिच्छेदः कथं केन हि सम्भवेत् । एवं पूर्णस्वरूपायाः पूर्णं यत्स्फुरणं स्थितम् ॥ ९६ ॥ तदेव स्वात्मविश्रान्तिः पूर्णाहन्ता च कथ्यते । अखण्डैकरसं ह्येतदेतावद्राम वै भवेत् ॥ ९७ ॥ निरूपणे बहुविधमिव तत् प्रतिभासते । एतावदेव स्वातन्त्र्यं यतः शक्तिर्हि तन्मयी ॥ ९८ ॥ प्रकाशस्तेजसो यद्वदौष्ण्यं चैवापृथक् स्थितम् । एवं स्वातन्त्र्यविश्रान्तिसहितैकरसात्मिका ॥ ९९ ॥ इयमेव हि मायाख्या शक्तिः परमदुर्धटा । आदर्शवद्यत्स्वरूपे चिदेकरसरूपिणी ॥ १०० ॥

[ इसमें अन्य सभीका अभाव है ] इसलिये यह व्यावृत्ति सब प्रकारके परिच्छेदसे शून्य होनेके कारण भेदके स्पर्शमें रहित है; क्योंकि दर्पणमें प्रतिबिम्बित नगरके समान सब कुछ इसीमें भास रहा है ॥ ९५ ॥ फिर इसकी व्यावृत्ति या परिच्छेद किसीके द्वारा कैसे हो सकते हैं । इस प्रकार इस पूर्णस्वरूपाका जो पूर्णरूपसे स्फुरित होना है वही स्वात्मविश्रान्ति या पूर्णाहन्ता कही जाती है । परशुराम ! ऐसी यह चिति सचमुच अखण्ड एकरस ही है ॥ ९६-९७ ॥ केवल निरूपण ( चर्चा ) के समय ही वह अनेक रूप-सी भास- ने लगती है । यही उसका स्वातन्त्र्य है और वास्तवमें वो उसका वह परमस्वातन्त्र्यरूप सामर्थ्य भी तद्रूप ही है, [ उससे भिन्न नहीं ] ॥ ९८ ॥ जिस प्रकार अग्निमें प्रकाश और उष्णता उससे अभिन्न ही रहते हैं उसी प्रकार इन स्वातन्त्र्य और विश्रान्तिके सहित वह एक- रसरूपा ही है ॥ ९९ ॥ यही असम्भवको भी सम्भव कर देनेवाली माया नामकी शक्ति है, जो दर्पणकी तरह अपने स्वरूपमें एकरस चित्स्वरूपिणी रहते हुए

२७६ त्रिपुरारहस्ये ज्ञानखण्डे

सत्यप्यनेकवैचित्र्याभासनेन विभासते । तथा भासनकालेऽपि स्वरूपादनिवर्त्तनम् ॥ १०१ ॥ परिच्छेदावभासो यः सोऽनात्माभास उच्यते । साऽविद्या जडशक्तिः सा शून्यं प्रकृतिरेव च ॥ १०२ ॥ अत्यन्ताभाव आकाशस्तमः प्रथमसर्गकः । सर्वं तदेव संप्रोक्तं परिच्छेदनमादिमम् ॥ १०३ ॥ राम यः परिपूर्णात्मा विश्रमो वै समास्थितः । तस्यैकदेशताभ्रान्तिकृतमाकाशभासनम् ॥ १०४ ॥ अत आत्मप्रदेशो य आत्माभिमतिवर्जितः । आकाशः स हि सम्प्रोक्तः स हि संसारकारणम् ॥ १०५ ॥ एष एव भवेद्भेदः पशुदृष्ट्यैकगोचरः । राम सूक्ष्मदृशा पश्य य आकाशस्त्वयेक्ष्यते ॥ १०६ ॥ तत्रत्यजीवराशीनामात्मा चैतन्यमेव सः । यथान्यदेहेष्वाकाशो भासते यः सदा तव ॥ १०७ ॥


ही अनेकों विचित्र आभासोंके रूपमें भासने लगती है। और इस प्रकार भासनेके समय भी अपने स्वरूपसे च्युत नहीं होती ॥१००-१०१॥ इसमें जो परिच्छेदोंकी प्रतीति होती है वही अनात्माभास कही जाती है। तथा वही अविद्या, जडशक्ति, शून्य और प्रकृति भी कहलाती है ॥ १०२ ॥ उसका वह प्रथम परिच्छेद ही अत्यन्ताभाव, आकाश, तप और प्रथम सर्ग कहा जाता है ॥ १०३ ॥ परशुराम ! इसकी जो पूर्णाहन्तारूप विश्रान्ति है उसीमें एक- देशताकी भ्रान्ति होनेसे आकाशका भान होने लगता है ॥ १०४ ॥ अतः आत्माका जो प्रदेश आत्माभिमान (अहंभाव) से रहित है वही आकाश कहा जाता है और वही संसारका कारण है ॥ १०५ ॥ यह आकाश ही अज्ञानियोंकी दृष्टिसे दिखायी देनेवाला भेद है। [और भेद ही संसारका मूल है, इसीसे इसे संसारका कारण कहा है।] परशुराम ! तुम सूक्ष्म दृष्टिसे विचार करो। तुम जो आकाश देखते हो वही तो उसमें रहनेवाले जीवसमूहका चैतन्य आत्मा है ॥ १०६-१०७ पू० ॥

अष्टादशोऽध्यायः। २७७ स एव तेषामात्मा स्याच्चिदानन्दघनात्मकः । एवं स्वकल्पिताकाशग्रस्तं यच्चिद्वपुः स्थितम् ॥ १०८ ॥ तदेव मन इत्युक्तमात्मैव न हि चेतरत् । तत्रावरणमुख्यत्वात् प्रमाणं मन उच्यते ॥ १०९ ॥ आवृतप्राधान्यतस्तु प्रमाता जीव उच्यते । एवमाकाशावृतोऽपि चिदात्मा भूय एव तु ॥ ११० ॥ आकाशे कोमलेऽत्यन्तशिथिले निर्घनेऽमले । कठिनश्लिष्टघनतामालिन्यानां प्रकल्पजैः ॥ १११ ॥ भूतान्याभास्य देहात्मा देहेनापि समावृतः । कुम्भोदरगतो दीप उदरं व्याप्य भासते ॥ ११२ ॥ एवमेष शरीरान्तरवभासनमात्रकः । आस्ते गूढप्रदीपात्मा तदन्तर्मात्रभासनः ॥ ११३ ॥ जिस प्रकार दूसरोंके शरीरोंमें जो आकाश प्रतीत होता है वही उनका चिदानन्दघनस्वरूप आत्मा है और वही सर्वदा तुम्हारा भी आत्मा है ॥ १०७ उ०-१०८ पू० ॥ इस प्रकार जो चैतन्यस्वरूप हमारे कल्पित आकाशसे व्याप्त है वही 'मन' कहा गया है और वही आत्मा भी है, कोई अन्य नहीं ॥ १०८ उ०-१०९ पू० ॥ आवरण करनेवाली जडशक्तिकी प्रधानतासे उसे प्रमाणरूप मन कहते हैं और आवृत होनेवाली चित्शक्तिके प्राधान्यसे वही प्रमाता जीव कहा जाता है ॥ १०९ उ०-११० पू० ॥ इस प्रकार आकाशसे आवृत हुआ भी चिदात्मा फिर पञ्चभूतोंसे आवृत हो जाता है । आकाश अत्यन्त कोमल, शिथिल, विरल और निर्मल है; किन्तु उसमें कठिनता, संश्लेष, सघनता और मलिनता- की कल्पनासे पञ्चभूत प्रकट हो जाते हैं । इस प्रकार देहसे आवृत होकर यह देहात्मा घड़ेके भीतर रखे हुए दीपककी तरह शरीरके भीतर व्याप्त होकर प्रकाशित होने लगता है ॥ ११० उ०-११२ ॥ इस प्रकार यह आत्मा शरीरके भीतरी भागको ही प्रकाशित करता है, जैसे घड़ेके भीतर रखा हुआ दीपक उसके भीतरी भागको प्रकाशित किया करता है ॥ ११३ ॥

२७८ त्रिपुरारहस्ये ज्ञानखण्डे दीपप्रभा घटच्छिद्राद्यथा निर्याति वै बहिः । एवमक्षद्वारमुखाद् भूयो निर्याति वै चितिः ॥ ११४ ॥ निर्याणं तु चितेर्नास्ति पूर्णत्वादक्रियत्वतः । स्वात्मावरणमाकाशं स्फूत्तिंशक्तिश्चिदात्मनः ॥ ११५ ॥ यावन्निवारयेत्तावन्निर्याणं प्रतिभासते । मनोव्यापार एष स्यात् स्फूर्त्त्यापहतिरावृतेः ॥ ११६ ॥ तस्माद्राम मनो नान्यदात्मैव मन उच्यते । चला चितिर्मनोनाम्नी निश्चलात्मस्वरूपिणी ॥ ११७ ॥ आवृत्त्यमिहतिः स्फूर्त्या चलनं राम वै चितेः । एतदेव विकल्पः स्याद्विकल्पपरिवर्जने ॥ ११८ ॥ निर्विकल्पं पूर्णरूपं विज्ञानं मुक्तिनामकम् । राम त्यजात्र सन्देहं विकल्पस्य विवर्जने ॥ ११९ ॥ अप्यावरणदोषः स्यादिति नास्त्येव चावृतिः । आवृतिर्न हि सत्यास्ति यतः स्वेनैव कल्पिता ॥ १२० ॥ जिस प्रकार घड़ेके छिद्रोंमें होकर दीपकका प्रकाश बाहर निकलता रहता है, उसी प्रकार फिर यह चिदात्मा इन्द्रियद्वारोंसे होकर बाहर निकलने लगता है ॥ ११४ ॥ चेतन पूर्ण और अक्रिय है, इसलिये उसका कहीं आना-जाना नहीं हो सकता । किन्तु जब चिदात्माकी चेतनशक्ति अपने आवरण आकाश- को अलग करती है तो उसका निकलना भासने लगता है । चेतनके द्वारा यह आवरणकी निवृत्ति ही मनका व्यापार है ॥ ११५-११६ ॥ इसलिये परशुराम ! मन कोई अन्य पदार्थ नहीं है, आत्मा ही मन कहा जाता है । चलायमान चेतनका नाम मन है और निश्चल चेतन आत्मस्वरूप है ॥ ११७ ॥ चितिशक्तिके स्फुरणद्वारा आवरणका हटना ही चेतनका चलन है । यही विकल्प है । विकल्पका त्याग होनेपर जो निर्विकल्प पूर्ण विज्ञान रहता है उसीका नाम मुक्ति है ॥ ११८-११९ पू० ॥ परशुराम ! तुम यह सन्देह त्याग दो कि विकल्पका त्याग होनेपर भी आवरणदोष फिर हो सकता है; क्योंकि आवरण तो है ही नहीं

अष्टादशोऽध्यायः। २७६

यथा मनोरथे बद्धः केन चिच्छत्रुणा स्वयम् । ताड्यमानस्तर्ज्यमानो यावत् सङ्कल्पवर्जनम् ॥ १२१ ॥ कुर्यात्तावत्ताडनं वा तर्जनं वापि लीयते । किं तत्र शिष्यते बन्धस्तथात्रापि विभावय ॥ १२२ ॥ अनादिकालाद्रामात्र बन्धो नास्त्येव कस्यचित् । जडात्मभ्रान्तिमुत्सृज्य कोऽयं बन्धो विचारय ॥ १२३ ॥ एष एव महाबन्धो बन्धसत्यत्वनिश्चयः । मृषा भीतस्य बालस्य यक्षग्रह इव स्थितः ॥ १२४ ॥ यावद्वन्धभ्रान्तिमेनां नोत्सृजेद् बुद्धिमानपि । न तावत् संसृतेर्मुक्तो भवेत् क्वापि महोद्यमैः ॥ १२५ ॥ कोऽयं बन्धः कथं वा स्यान्निर्मलस्य चिदात्मनः । प्रतिबिम्बात्मकैः स्वात्मादर्शान्तःप्रविभावितैः ॥ १२६ ॥ बन्धो यदि तदादर्शप्रतिबिम्बाग्निरादहेत् । आवरण वास्तविक नहीं है, क्योंकि वह तो अपना ही कल्पना किया हुआ है ॥ ११६ उ०-१२० ॥ जिस प्रकार कोई मनोराज्य करे कि उसे किसी शत्रुने बाँध लिया है, वह मारता है और धमका रहा है। किन्तु जैसे ही वह उस संकल्पको त्यागता है उसके वे ताडन और तर्जन भी लीन हो जाते हैं। क्या वहाँ कोई बन्धन बच रहता है ? वैसी ही बात यहाँ समझो ॥ १२१-१२२ ॥ परशुराम ! इस संसारमें अनादिकालसे किसीका कोई बन्धन नहीं है। इस जडस्वरूपा भ्रान्तिको त्यागकर विचार करो कि वास्तवमें बन्धन है क्या ? ॥ १२३ ॥ बन्धनकी सत्यता समझना—यही सबसे बड़ा बन्धन है। वह झूठमूठ हौआसे डरे हुए बालकके भयके समान बना हुआ है ॥ १२४ ॥ बुद्धिमान् पुरुष भी जबतक इस भ्रान्तिको नहीं त्यागेगा, तब तक महान् प्रयत्न करनेपर भी वह संसारसे कभी मुक्त नहीं होगा ॥ १२५ ॥ यह बन्धन है क्या ! निर्मल चिदात्माको यह हो भी कैसे सकता है ? यदि अपने आत्मारूप दर्पणमें भासनेवाले प्रतिबिम्बात्मक पदार्थोंसे इसे बन्धन हो सकता है तब तो दर्पणके प्रतिबिम्बमें प्रतीत होनेवाले

२८० त्रिपुरारहस्ये ज्ञानखण्डे बन्धस्य सत्यताबुद्धिर्मनसोऽस्तित्वनिश्चयः ॥ १२७ ॥ एतद्द्वयमृते नास्ति बन्धः कस्यापि कुत्रचित् । यावदेतद्द्वयमलं सद्विचारमहाजलैः ॥ १२८ ॥ नोन्मार्जितं तावदिह तस्य संसारनाशनम् । अहं वा ब्रह्मदेवो वा विष्णुर्वापि च शङ्करः ॥ १२९ ॥ विद्यात्मिका वा त्रिपुरा नैव शक्ताः कथञ्चन । तस्माद्राम द्वयञ्चैतत् परित्यज्य सुखी भव ॥ १३० ॥ तस्माद्राम निर्विकल्परूपे मनसि संस्थिते । आत्ममात्रत्वतस्तस्य द्वैतं न परिशिष्यते ॥ १३१ ॥ इदं तदितिरूपेण भासनान्यन्मनो नहि । इदमादिपरित्यागे मनसात्मैव शिष्यते ॥ १३२ ॥ रज्जुसर्पपरिभ्रान्तिः सत्याभिमतवस्तुनि । रज्जुरूपे हि सर्पस्य भासिनीति विनिश्चयः ॥ १३३ ॥ अग्निसे भी पदार्थोंका दाह हो जाना चाहिये ॥ १२६-१२७ पू० ॥ ‘बन्धनको सत्य समझना’ और ‘मनकी सत्ता स्वीकार करना’ इन दो को छोड़कर कहीं किसीके लिये और कोई बन्धन नहीं है ॥ १२७ उ०-१२८ पू० ॥ जबतक सद्विचाररूप महान् जलसे इन दो मलोंका मार्जन नहीं होगा तबतक मैं, ब्रह्मा, विष्णु, शंकर अथवा विद्यास्वरूपिणी स्वयं देवी त्रिपुरा भी किसी प्रकार उसके संसार की निवृत्ति नहीं कर सकते। इसलिये परशुराम ! तुम इन दोनोंको त्यागकर सुखी हो जाओ ॥ १२८ उ०-१३० ॥ अतः परशुराम ! यद्यपि समाधिमें निर्विकल्परूपमें मन रहता है, तथापि उस समय वह आत्ममात्र ही तो है, इसलिये द्वैत नहीं रहता॥१३१॥ ‘यह’ ‘वह’ इत्यादि रूपसे भासनेके सिवा मन और कुछ नहीं है। जब मनसे ‘यह’ ‘वह’ इत्यादिका त्याग हो गया तब तो आत्मा ही रह जाता है ॥ १३२ ॥ रज्जुमें भासित होनेवाली सर्पकी भ्रान्ति व्यवहारमें सत्य मानी हुई वस्तुमें होती है। अतः उसके विषयमें यह निश्चय होता है कि यह रज्जुके रूपमें सर्पकी प्रतीति कराने वाली है ॥ १३३ ॥

अष्टादशोऽध्यायः। २८१ तत्र सर्पस्य बाधोऽपि रज्ज्वालम्बनहेतुतः। चिद्रूपादात्मनोऽन्यत्तु रज्जुज्ञानं स्थितं भवेत् ॥ १३४ ॥ सापि रज्जुस्थिति यदा स्वप्नदृष्टान्तकल्पिता। रज्जुबाधे हि तज्ज्ञानं कथं शिष्येत् किमाश्रयम् ॥ १३५ ॥ तस्माद् दृश्यस्य बाधे तु तज्ज्ञानं केवला हि दृक्। चिदात्मानतिरिक्तत्वाद् द्वैतं तेन कथं भवेत् ॥ १३६ ॥ अर्थक्रिया हि संदृष्टा स्वप्नवस्तुषु सुस्थिरा। स्वाप्नवस्तु स्थिरमिति स्वप्ने सर्वैर्विभावितम् ॥ १३७ ॥ एतावानेव भेदः स्यात् स्वप्नजाग्रद्विभासयोः। जाग्रति स्वप्नमिथ्यात्वनिश्चयो भवति ध्रुवम् ॥ १३८ ॥ स्वप्ने न जायते जाग्रन्मिथ्यात्वस्य विनिर्णयः। नैतावतैव सत्यत्वं जाग्रद्व्यवहृतेर्भवेत् ॥ १३९ ॥ उसमें सर्पका तो बाध हो जाता है, क्योंकि उसका आलम्बन तो रज्जु ही होती है। किन्तु उस समय भी चिद्रूप आत्मासे रज्जुका ज्ञान भिन्न ही रहता है, [ उसका बाध नहीं होता ] ॥ १३४ ॥ पर जब स्वप्नके दृष्टान्तसे वह रज्जु भी चेतनमें कल्पित मानी जाय, तब रज्जुका बाध होनेपर उसका ज्ञान किस प्रकार और किसके आश्रयसे शेष रहेगा ? ॥ १३५ ॥ अतः दृश्य जगत्का बाध होनेपर उसका ज्ञान केवल चिन्मात्र ही रहता है। वह चिदात्मासे भिन्न है ही नहीं, फिर द्वैत कैसे रह सकता है ? ॥ १३६ ॥ [ यदि कार्यका निर्वाह करनेवाली और स्थिर जान पड़नेके कारण व्यावहारिक वस्तुओंको सत्य मानो, तब तो ] स्वप्नकी वस्तुओंमें भी स्थिर कार्यनिर्वाहकता देखी जाती है। स्वप्नमें स्वप्नके पदार्थ भी सबको स्थिर ही जान पड़ते हैं ॥ १३७ ॥ स्वप्न और जाग्रत्की प्रतीतियोंमें केवल इतना ही भेद है कि जाग्रत्कालमें स्वप्नका मिथ्यात्व-निश्चय तो अवश्य हो जाता है, किन्तु स्वप्नमें जाग्रत्का मिथ्यात्व निश्चय नहीं होता। इतनेसे ही जाग्रत्कालके व्यवहारकी सत्यता तो सिद्ध हो नहीं सकती ॥१३८-१३९॥

२८२ त्रिपुरारहस्ये ज्ञानखण्डे यथा जाग्रति वस्तूनां स्थिरतार्थक्रियापि च । दृश्यते किं तथा स्वप्ने दृश्यते न हि वा वद ॥ १४० ॥ न स्वप्ने जागरा भावाः स्वाप्ना वा नैव जागरे । अर्थक्रियाकरा वापि स्थिरा वा भान्ति तत्समम् ॥ १४१ ॥ विभावय सूक्ष्मदृशा को भेदोऽतीतस्वप्नयोः । पश्यैन्द्रजालिककृते स्थैर्यमर्थक्रियामपि ॥ १४२ ॥ किं तावतैव तत् सत्यमैन्द्रजालिकनिर्मितम् । सत्यासत्यविभागो वै प्राकृतैर्विदितो न हि ॥ १४३ ॥ अतएव मोहितास्ते प्रोचुः सत्यं हि जागतम् । कदाप्यभावसंस्पृष्टं सत्यं राम प्रचक्षते ॥ १४४ ॥ अभावः स्यादभानाद्वै त्वभानं न चितेः क्वचित् । अभानमचितामस्ति ह्यनेकत्वावभासतः ॥ १४५ ॥ जाग्रत्कालमें जिस प्रकार वस्तुओंकी स्थिरता और कार्यनिर्वाहकता देखी जाती है, बताओ, क्या स्वप्नमें स्वप्नके पदार्थोंकी वैसी नहीं देखी जाती ? ॥ १४० ॥ हाँ, स्वप्नमें जाग्रत्के पदार्थ और जाग्रत्में स्वप्नके पदार्थ न तो कार्यनिर्वाहक जान पड़ते हैं और न स्थिर ही। सो, यह बात दोनों अवस्थाओंमें समान ही है ॥ १४१ ॥ तुम सूक्ष्मदृष्टिसे विचार करो कि जाग्रत्की बीती हुई घटनाओंमें और स्वप्नमें क्या भेद है ? देखो, जाग्रदवस्थामें ऐन्द्रजालिककी बनायी हुई वस्तुओंमें स्थिरता भी रहती है और कार्यनिर्वाहकता भी । तो क्या इतनेसं ही उसकी बनायी हुई वे वस्तुएँ सत्य हो जाती हैं ? ॥ १४२-१४३ पू० ॥ यह सत्य और असत्यका भेद साधारण पुरुषोंको मालूम नहीं है । इसीसे वे मोहवश कहते हैं कि जगत्के पदार्थ सत्य हैं ॥ १४३ उ०-१४४ पू० ॥ परशुराम ! सत्य तो वह है जिसे कभी अभावका स्पर्श नहीं होता । और अभाव तब होता है जब भान न हो । तो चितिका अभाव कभी नहीं होता । और अभाव तो अचेतन दृश्य पदार्थोंका ही होता है, क्योंकि उनमें अनेकता भासती है ॥ १४४ उ०--१४५ ॥

अष्टादशोऽध्यायः। २८३ परस्पराभावभासा अचिद्भावा हि सर्वथा। चिद्भानं कदा कुत्र स्याद्राम प्रविचारय ॥ १४६ ॥ यदा चितिर्न भायाद्वै तदा भायात् कथं वद। न भायाद्वा कथं भायादभाने यदि तद्द्वयोः ॥ १४७ ॥ राम भायादेव चितिस्तस्मात् सत्यैव सा चितिः। राम सत्यासत्यभेदं शृणु संक्षेपतो ब्रुवे ॥ १४८ ॥ अन्यानपेक्षभासं स्यात् सत्यमन्यदसत्यकम् । अन्यथा रज्जुसर्पाद्यमपि सत्यं भवेन्ननु ॥ १४९ ॥ बाधो ह्यभावविज्ञानं तद्भावेऽपि हि सम्भवेत् । दृश्य पदार्थ सर्वथा अन्योन्याभावपूर्वक¹ ही भासते हैं। किन्तु परशुराम ! विचार तो करो—भला, चेतनका अभाव कब और कहाँ हो सकता है ? ॥ १४६ ॥ जब चेतनका भान न होगा तब उस 'तब' ( काल ) का भी भान कैसे होगा ? यदि कहो कि नहीं होगा, तो उन काल और चेतन दोनोंका अभान होनेपर उस अभानका भी भान कैसे होगा ? [ क्योंकि काल और चेतनके अभानका भान भी तो चेतनके ही प्रकाशमें हो सकता है । ] ॥ १४७ ॥ अतः परशुराम ! चेतन तो भासता ही रहता है, इसलिये वही सत्य है । राम ! सत्य और असत्यका भेद संक्षेपसे सुनो, मैं बताता हूँ ॥ १४८ ॥ जो दूसरेकी अपेक्षाके बिना भासे वह सत्य, अन्य सब असत्य । नहीं तो रज्जुमें कल्पित सर्पादि भी सत्य मानने होंगे² ॥ १४९ ॥ [ यदि बाध और अबाधको ही सत्यासत्यका निर्णय करनेमें हेतु मानें तो— ] 'बाध' कहते हैं अभावानुभूति को । यह भावमें भी हो १. जैसे घट और पट दो भिन्न पदार्थ हैं, इनका भान परस्पर एक-दूसरेके अभावपूर्वक ही होगा । अर्थात् घटाभावके बिना पटका और पटाभावके बिना घटका भान नहीं हो सकता । २. यदि सत्य और असत्यका ऐसा लक्षण न करके यह मानें कि जिसका बाध या अभाव हो जाय वह असत्य और जिसका बाध या अभाव न हो वह सत्य— तो प्रतीतिकालमें तो रज्जुमें कल्पित सर्पका भी न अभाव होता है और न बाध, इसलिये उसे भी सत्य ही मानना होगा । अतः सबसे निर्दोष लक्षण वही है जो यहाँ किया गया है ।

२८४ त्रिपुरारहस्ये ज्ञानखण्डे अभावे भावविज्ञानमपि सम्भवति स्फुटम् ॥ १५० ॥ ततो न बाधितं सत्यमसत्यं बाधितं भवेत् । इति पक्षो न युक्तः स्यात् सर्वथा व्यभिचारतः ॥ १५१ ॥ चितोऽभाने न किञ्चित् स्यान्न स्यात्तदपि सर्वथा । तस्माद्यश्चिन्न भातीति वदेत् तार्किकसत्खरः ॥ १५२ ॥ स ब्रूयान्नाहमस्मीति तत्र केन किमुच्यते । यस्यात्मनि स्यात् सन्देहो भानाभावेन सर्वदा ॥ १५३ ॥ सोऽन्येषां नाशयेन्मोहं निपुणैस्तर्कगुम्फनैः । तदा गण्डशिलाप्येषाऽप्यन्यमोहं विनाशयेत् ॥ १५४ ॥ तस्मार्दथक्रियाभासमात्रेण न हि सत्यता । सर्वमेव हि विज्ञानं भ्रान्तिरेव न संशयः ॥ १५५ ॥ सकती है। और अभावमें भी स्पष्टतया भावरूपताकी अनुभूति हो जाती है १ ॥ १५० ॥ इसलिये अबाधित सत्य होता है और बाधित असत्य—यह पक्ष बिल्कुल ठीक नहीं है, क्योंकि इसका व्यभिचार भी देखा जाता है ॥ १५१ ॥ यदि चेतनका भान न हो तब तो कुछ भी नहीं रहेगा। यहाँ तक कि 'कुछ नहीं है' का भी भान नहीं होगा। इसलिये जो मूर्ख- तार्किक कहता है कि चेतन नहीं भासता वह तो मानो कहता है कि 'मैं नहीं हूँ'। ऐसी अवस्थामें किसके द्वारा क्या कहा जा रहा है ॥ १५२-१५३ पू० ॥ अतः जिसे भान न होनेके कारण सर्वदा अपने अस्तित्वमें ही सन्देह हो, वह तो कुशल तर्कके गुम्फन द्वारा [ अर्थात् शास्त्ररचना करके ] अवश्य दूसरोंके अज्ञानको नष्ट कर देगा ! [ अर्थात् उसके कथन द्वारा दूसरोंका अज्ञान कभी निवृत्त नहीं हो सकता।] ऐसी अवस्थामें तो शायद यह पत्थरकी शिला भी दूसरोंका अज्ञान नष्ट कर दे ॥ १५३ उ०-१५४ ॥ इसलिये जिसमें कार्यनिर्वाहकता प्रतीत हो उसकी इतने ही से १. कई बार ऐसी भ्रान्ति हो जाती है कि जो वस्तु मौजूद है उसके न होनेका ज्ञान होता है और जो नहीं है उसके होनेका अतः यह पक्ष निर्विवाद नहीं है।

अष्टादशोऽध्यायः। २८५ अपरेयं महाभ्रान्तिस्तेष्वभ्रान्तत्वनिश्चयः । यथा हि बाघविज्ञानात् पूर्वं भ्रान्तिर्भवेत्तथा ॥ १५६ ॥ सर्वजाग्रतविज्ञानमभ्रान्तिरिव हि स्थितम् । यथा च रजतज्ञानं शुक्तिज्ञानाद् भ्रमात्मकम् ॥ १५७ ॥ एवं चिदात्मविज्ञानात् सर्वं ज्ञानं भ्रमात्मकम् । नभोनीलभ्रमः सर्वसमानो भासते तथा ॥ १५८ ॥ जागतो भ्रम एष स्यात् सर्वेषां दोषहेतुतः । अभ्रान्तिशुद्धविज्ञानं यच्चिदात्मतया स्थितम् ॥ १५९ ॥ एवमेतच्चया पृष्टं प्रोक्तं युक्त्यनुसङ्गतम् । सन्देहमत्र सन्त्यज्य राम प्रोक्तं विनिश्चिनु ॥ १६० ॥ कथं मुक्ते व्यवहृतिरिति पृष्टं पुरा तु यत् । तत्ते प्रवक्ष्यामि राम शृणु सम्यक् समाहितः ॥ १६१ ॥ सत्यता सिद्ध नहीं हो जाती । इसमें सन्देह नहीं कि इस प्रकारके सब ज्ञान भ्रममात्र ही हैं । तथा उन्हें भ्रम न मानना—यह दूसरी बहुत बड़ी भ्रान्ति है ॥ १५५-१५६ पू० ॥ जिस प्रकार कोई भी भ्रान्ति उसका बाध अनुभव होनेसे पहले सत्य ही जान पड़ती है उसी प्रकार जाग्रत्कालका सारा ज्ञान अभ्रान्ति- सा ही जान पड़ता है ॥ १५६ उ०-१५७ पू० ॥ किन्तु जिस प्रकार शुक्तिका परिचय हो जानेपर उसमें अध्यस्त चाँदीकी प्रतीति भ्रमरूप जान पड़ती है, उसी प्रकार चेतन आत्माका ज्ञान होनेपर अन्य सभी ज्ञान भ्रमरूप निश्चय होते हैं ॥ १५७ उ०-१५८ पू० ॥ जिस प्रकार आकाशकी नीलताका भ्रम सबको समानरूपसे भासता है उसी प्रकार अविद्यारूप दोषके कारण जाग्रत्कालका भ्रम सभीको समानरूपसे हो रहा है । अभ्रान्ति तो शुद्ध विज्ञान ही है जो चेतन आत्मारूपसे स्थित है ॥ १५८ उ०-१५६ ॥ परशुराम ! इस प्रकार तुम्हारे प्रश्नके विषयमें मैंने युक्तिपूर्वक उत्तर दे दिया । तुम इस विषयमें सन्देह त्यागकर जैसा कहा गया है वैसा ही निश्चय करो ॥ १६० ॥ तुमने पहले ( पन्द्रहवें अध्यायके आरम्भमें ) पूछा था कि मुक्ति हो जानेपर भी व्यवहार कैसे होता है ! उसका उत्तर देता हूँ ! परशुराम ! खूब सावधान होकर सुनो ॥ १६१ ॥

२८६ त्रिपुरारहस्ये ज्ञानखण्डे मुक्ता हि ज्ञानिनो लोके ह्युत्तमाधममध्यमाः । प्रारब्धोपनतैर्भोगैः खिद्यमानाः क्षणे क्षणे ॥ १६२ ॥ स्वरूपज्ञास्तु ये राम ते मन्दज्ञानिनः स्मृताः । ये तु प्रारब्धसंप्राप्तान् भुञ्जाना अपि नो विदुः ॥ १६३ ॥ मधुक्षीवा रसमिव मध्यास्ते ज्ञानिनः स्मृताः । ये तु प्रारब्धकोटीनां फलैरपि विचित्रितैः ॥ १६४ ॥ न स्वस्थितेः प्रच्यवन्ते नोद्विजन्त्यापदां गणैः । न विस्मयन्ति चाश्चर्यैर्न हृष्यन्ति महासुखैः ॥ १६५ ॥ अन्तःशान्ता वहिर्लोकसमास्ते ज्ञानिषूत्तमाः । एवं बुद्धिविभेदेन ज्ञानपाकविभेदतः ॥ १६६ ॥ प्रारब्धशेषमाहात्म्याद्व्यवहारा विचित्रिताः । मधुमत्तादिवच्चैषां व्यवहारोऽपि सम्भवेत् ॥ १६७ ॥ इति श्रीत्रिपुरारहस्ये ज्ञानखण्डे अष्टादशोऽध्यायः ।

लोकमें मुक्त हुए ज्ञानी पुरुष तीन प्रकारके हैं—उत्तम, अधम और मध्यम। जो लोग प्रारब्धवश प्राप्त हुए भोगोंसे क्षण-क्षणमें खिन्न होते रहते हैं, किन्तु जिन्हें स्वरूपका ज्ञान होता है, वे मन्द ज्ञानी माने जाते हैं ॥ १६२-१६३ पू० ॥ जिन्हें प्रारब्धसे प्राप्त हुए भोगोंको भोगते हुए भी, मदिरोन्मत्तके समान निरन्तर समाहित रहनेके कारण, उन भोगोंका कुछ पता नहीं चलता, वे मध्यम ज्ञानी माने गये हैं ॥ १६३ उ०-१६४ पू० ॥ किन्तु जो करोड़ों प्रारब्धोंके तरह-तरहके फल-भोग प्राप्त होनेपर भी अपनी स्वरूपस्थितिसे च्युत नहीं होते, अनेकों आपत्तियाँ आने- पर भी खिन्न नहीं होते, बड़े-बड़े आश्चर्योंसे भी जिन्हें विस्मय नहीं होता और महान् सुखोंकी प्राप्ति होनेपर भी हर्ष नहीं होता, इस प्रकार जो भीतरसे शान्त और ऊपरसे अन्य लोगोंके समान रहते हैं, वे ज्ञानियोंमें उत्तम माने गये हैं ॥ १६४ उ०-१६६ पू० ॥ इस प्रकार बुद्धिके भेदसे, ज्ञानकी परिपक्वताके भेदसे और शेष प्रारब्धके प्रभावसे ज्ञानियोंके व्यवहार भिन्न-भिन्न प्रकारके होते हैं। तथापि मदोन्मत्तादिके समान उनके द्वारा व्यवहार भी अवश्य हो सकता है ॥ १६६ उ०-१६७ ॥ अष्टादश अध्याय समाप्त।

एकोनविंशोऽध्यायः इति दत्तात्रेयमुखाच्छ्रुत्वा भार्गवनन्दनः । भूयः पप्रच्छ मुक्तानां व्यवहारक्रमं क्रमात् ॥ १ ॥ भगवन् भूय एतन्मे विस्तरेण निरूपय । यथा बुद्धिविभेदेन ज्ञानपाकविचित्रता ॥ २ ॥ ज्ञानन्त्वेकविधं स्वात्ममात्रभानात्मकं ननु । उपेयञ्च तदेव स्याद्यन्मोक्षस्तत्प्रथात्मकः ॥ ३ ॥ तत् कथं बुद्धिभेदेन पाकभेदसमाश्रयम् । साधनान्यपि भिद्यन्तेऽथवा नेति तदीरय ॥ ४ ॥ इति पृष्टः पुनस्तेन दत्तात्रेयो दयानिधिः । विस्तरेण तमेवार्थं प्रवक्तुमुपचक्रमे ॥ ५ ॥ एकोनविंश अध्याय ॥ १९ ॥ ज्ञानियोंकी स्थितियोंके भेद श्रीदत्तात्रेयजीके मुखसे यह सब सुनकर भृगुनन्दन परशुरामने उनसे क्रमशः मुक्तपुरुषोंकी व्यवहारपद्धतिके विषयमें पुनः प्रश्न किया ॥ १ ॥ भगवन् ! आप कृपा करके यह बात मुझे विस्तारपूर्वक फिर समझाइये कि बुद्धिभेदके कारण ज्ञानियोंके ज्ञानकी परिपक्वतामें कैसे अन्तर रह जाता है ॥ २ ॥ यह तो निश्चय है कि केवल अपने आत्माका भानरूप ज्ञान तो सबको एक-सा ही होता है। तथा उस ज्ञानकी स्थितिरूप जो मोक्ष है वही सबका लक्ष्य भी है ॥ ३ ॥ फिर बुद्धिभेदके कारण उसकी परिपक्वतामें रहनेवाला अन्तर क्यों ? क्या उनके साधनोंमें भी कोई भेद रहता है या नहीं—यह सब बताइये ॥ ४ ॥ उनके इस प्रकार पूछनेपर दयानिधि भगवान् दत्तात्रेयने उसी बातको पुनः विस्तारपूर्वक कहना आरम्भ किया ॥ ५ ॥

२८८ त्रिपुरारहस्ये ज्ञानखण्डे शृणु राम प्रवक्ष्यामि रहस्यं ह्येतदुत्तमम् । साधने न विभेदोऽस्ति ज्ञानं न चित्रसाधनम् ॥ ६ ॥ तारतम्यात् साधनानां फलप्राप्तिर्विभेदिता । पूर्णे तु साधने ज्ञानमनायासेन सिद्ध्यति ॥ ७ ॥ अपूर्चितारतम्येन त्वयासापेक्षणाद्भवेत् । वस्तुतः साधनं किञ्चिज्ज्ञानेनैवोपयुज्यते ॥ ८ ॥ ज्ञानं क्वचिन्नैव साध्यं सिद्धत्वात्तु स्वभावतः । चैतन्यमेव विज्ञानं तत् सदा स्वप्रकाशकम् ॥ ९ ॥ तत्र का साधनापेक्षा नित्याभानस्वरूपके । चैतन्यं निहितं चित्तकरण्डेऽतिसुनिर्मले ॥ १० ॥ अनन्तवासनापङ्कमग्नं नैवोपलक्ष्यते । निरोधसलिलैः सम्यग् वासनापङ्कमार्जने ॥ ११ ॥ परशुराम ! सुनो, मैं यह उत्तम रहस्य तुम्हें सुनाता हूँ । ज्ञानके साधनोंमें कोई भेद नहीं रहता । ज्ञान विभिन्न साधनोंवाला नहीं है ॥ ६ ॥ किन्तु साधनोंकी न्यूनाधिकता रहनेके कारण उनकी फलप्राप्तिमें अन्तर रहता है । साधन की पूर्णता होनेपर तो सहजहीमें ज्ञान प्राप्त हो जाता है । और अपूर्णता रहनेपर उसकी न्यूनाधिकताके अनुसार प्रयास करनेकी आवश्यकता पड़ती है ॥ ७-८ पू० ॥ वास्तवमें तो ज्ञानप्राप्तिके लिये साधनकी कोई आवश्यकता नहीं होती, क्योंकि ज्ञान स्वभावसे ही सिद्ध होनेके कारण किसी साधनसे प्राप्त होनेवाला नहीं है ॥ ८ उ०-९ पू० ॥ चैतन्य ही तो ज्ञान है और वह सदा ही स्वयंप्रकाश है । अतः उस नित्यप्रकाशस्वरूपकी उपलब्धिके लिये साधनकी क्या आवश्यकता है ? ॥ ९ उ०-१० पू० ॥ यह चैतन्य चित्तरूप स्फटिकमणिकी अत्यन्त स्वच्छ पिटारीमें रखा हुआ है । किन्तु अनन्तवासनाओंकी कीचड़में फँसा होनेके कारण दिखायी नहीं देवा ॥ १० उ०-११ पू० ॥ अतः चित्तनिरोधरूप जलसे उस वासनाओंके कीचड़को धोना