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उपदेशसाहस्री (श्रीमच्छङ्करभगवत्पाद विरचिता - 'हृदयस्पर्शिनी' हिन्दी टीका सहित)

Upadesha Sahasri with Hridayasparshini Hindi Commentary

आदि शङ्कराचार्य / पं. गजानन शास्त्री मुसलगांवकर द्वारा

स्रोत: महेश अनुसन्धान संस्थान माउंट आबू · महेश अनुसन्धान संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished364 पृष्ठ

कूटस्थाऽद्वैतात्मबोधप्रकरण ३१७ हृदयस्पर्शिनी नेति—इस पर गुरु कहते हैं कि ऐसी बात नहीं है ।—'अर्थावगतिर्हि प्रमा'—अर्थावबोध को 'प्रमा' कहते हैं। उसको स्वरूपतः अनित्य मानने में कोई युक्ति नहीं है। चक्षुरादि इन्द्रियद्वारक बुद्धिवृत्ति से व्यक्त होने वाली अवगति(ज्ञान)रूप प्रमा के नित्य रहने पर उसमें 'प्रमात्व' नहीं रहता और उसके अनित्य रहने पर 'प्रमात्व' रहता है— ऐसा विशेष मानने में कोई विनिगमक नहीं है। अर्थात् 'ज्ञान' के नित्य या अनित्य होने से उसके प्रमात्व में कोई विशेषता नहीं होती ॥ ९५॥ नित्यायां प्रमातुरपेक्षाभावः, अनित्यायां तु यत्नान्तरितत्वादवगतिरपेक्षत इति विशेषः स्यादिति चेत् ॥९६॥ हृदयस्पर्शिनी नित्यायामिति—इस पर शिष्य 'विनिगमनाभाव नहीं है', ऐसी शंका कर रहा है। क्योंकि अवगति (संविद्) को नित्य मानने पर कारकव्यापार व्यर्थ हो जायगा, यह विशेष ही विनिगमक है। अर्थात् नित्य ज्ञान में प्रमाता की अपेक्षा नहीं होगी, क्योंकि अनित्य ज्ञान में ही प्रमाता के यत्न की अपेक्षा होती है। अर्थात् प्रमाता के यत्न से अनित्य ज्ञान ही साध्य होता है, इसलिये उसमें अवगति (प्रतीति) की अपेक्षा हुआ करती है। यह विशेषता यदि कही जाय तो विनिगम का भाव नहीं है ॥ ९६ ॥ सिद्धा तर्ह्यात्मनः प्रमातुः स्वतःसिद्धिः प्रमाणनिरपेक्षतयैवेति ॥९७॥ हृदयस्पर्शिनी सिद्धेति—गुरु कहते हैं कि नित्यज्ञान के पक्ष में प्रमाण की अपेक्षा नहीं है, ऐसा यदि तुम समझते हो तो प्रमाता आत्मा के स्वरूप की स्वतः सिद्धि अर्थात् स्वप्रकाशता उसी से अर्थात् प्रमाणनिरपेक्षता से ही सिद्ध हो जाती है। अनित्य और अस्वप्रकाश की जड़ता के कारण उसे आत्मा कहना अनुपपन्न है ॥ ९७ ॥ अभावेऽप्यपेक्षाऽभावः, नित्यत्वादेवेति चेत् ॥९८॥ हृदयस्पर्शिनी अभाव इति—उसपर शिष्य कहता है कि आत्मप्रभा के नित्य होने से यदि प्रमाण की अपेक्षा नहीं है, तो प्रमा का अभाव होने पर भी नित्य होने के कारण उसे प्रमाण की अपेक्षा नहीं है, ऐसा यदि कहें तो क्या हानि है ? ॥९८॥ न, अवगतेरेवात्मनि सद्भावादिति परिहृतमेतत् । प्रमातुश्चेत्प्रमाणापेक्षा सिद्धिः, कस्य प्रमित्सा स्यात् ? यस्य प्रमित्सा, स एव प्रमाताऽभ्युपगम्यते । तदीया च प्रमित्सा प्रमेयविषयैव, न प्रमातृविषया, प्रमातृविषयत्वेऽनवस्थाप्रसङ्गात्प्रमातुस्तदिच्छायाश्च तस्याप्यन्यः प्रमाता तस्याप्यन्य इति । एवमेवेच्छायाः । प्रमातृविषयत्वे प्रमातुरात्मनोऽव्यवहितत्वाच्च प्रमेयत्वानुपपत्तिः । लोके हि प्रमेयं नाम प्रमातुरिच्छास्मृतिप्रयत्नप्रमाणजन्मव्यवहितं सिद्ध्यति, नान्यथा अवगतिः प्रमेयविषया दृष्टा । न च प्रमातुः प्रमाता स्वस्य स्वयमेव केनचिद्व्यवहितः कल्पयितुं शक्यः इच्छादीनामप्यतमेनापि । स्मृतिश्च स्मर्तव्यविषया, न स्मर्तृविषया । तथेच्छाया इष्टविषयत्वमेव, नेच्छावद्विषयत्वम्, स्मर्त्रिच्छावद्विषयत्वेऽपि ह्युभयोरनवस्था पूर्ववदपरिहार्या स्यात् ॥९९॥ हृदयस्पर्शिनी नेति—गुरु कहते हैं कि ऐसी बात न कहो। क्योंकि आत्मा में अवगति (ज्ञान) के सद्भाव के कारण ही उसे प्रमाण की अपेक्षा नहीं होती। अवगति (प्रमा) के अभाव की आशंका ही नहीं की जा सकती। अर्थात् स्वयं अवगति

३१८ | उपदेशसाहस्री ही आत्मा में रहती है, यह पहले ही हम बता चुके हैं, जिससे तुम्हारी शंका का निवारण हो जाता है। अभिप्राय यह है कि असंहत ही संघात का साक्षी है, वही चितिमान् है, यह उपपादन कर चुके हैं। अथवा 'आत्मसिद्धिः प्रमाणं नापेक्षते' आत्मसिद्धि में प्रमाण की अपेक्षा नहीं होती, यह कहने से यही निष्कर्ष निकलता है कि आत्मसिद्धि में प्रमाणाभाव की अपेक्षा होती है। किन्तु आत्मसिद्धि के नित्य होने से उसकी अपेक्षा भी नहीं होनी चाहिए- यह अभिप्राय शंका करनेवाले शिष्य का है। उस शंका का परिहार गुरु करते हैं कि 'स्वतःसिद्धि' और 'प्रमाणनिरपेक्ष्य' इन दो शब्दों से सर्वनिरपेक्ष प्रकाशमान आत्मस्वरूप की ही विवक्षा रहने से तुम्हारी शंका के लिये कोई अवकाश ही नहीं रह जाता। यदि प्रमाता की सिद्धि, प्रमाण के अधीन हो तो बताओ, प्रमाण की अपेक्षा किसे होगी ? जिसे प्रमाण की अपेक्षा रहती है, उसे ही प्रमाता मानते हैं। निष्कर्ष यह है कि जितनी भी यच्चयावत् वस्तुएँ हैं, वे सभी ज्ञात या अज्ञात रूप से प्रमातृ चैतन्य की ही विषय हुआ करती हैं। यह वस्तुस्थिति है। तब यदि कभी अज्ञात समझकर उस निर्विकल्प साक्षी चैतन्य को जानने की इच्छा होती है तो उसके ज्ञातृत्व की सिद्धि के लिये जिसे वह इच्छा होगी, वही प्रमाण का आश्रयभूत प्रमाता कहलायेगा । उस समय प्रमाता की स्वरूपसिद्धि के लिये प्रमाण की अपेक्षा होगी। किन्तु वह होगी किसे ? उसी प्रमाता को या किसी अन्य को ? और वह किसे जानने के लिये होगी ? अपने को ही जानने के लिये होगी या किसी दूसरे के जानने के लिये होगी ? एवं च किसी भी प्रकार से प्रमाता को जानने की इच्छा उत्पन्न नहीं हो रही है। अतः यह स्पष्ट हो जाता है कि जो इच्छा का आश्रय है, वह उसका विषय नहीं हो सकता। तथापि एक यह शंका हो सकती है कि आत्मा स्वयं ही अपना प्रमाता क्यों नहीं है ? इस शंका का समाधान यह है कि प्रमाणेच्छा हमेशा प्रमेयविषयिणी ही हुआ करती है, प्रमातृविषयिणी नहीं। यदि उसे प्रमातृविषयिणी मानेंगे तो प्रमाता और उसकी इच्छा का कोई अन्य प्रमाता स्वीकार करना होगा, और उसका अन्य कोई दूसरा, इस प्रकार अनवस्था-प्रसंग उपस्थित होगा। इसी प्रकार इच्छा को यदि प्रमातृ-विषयिणी मानेंगे तो प्रमाता आत्मा अव्यवहित होने के कारण उसे प्रमेय नहीं कह सकते। लोकव्यवहार में हम देखते हैं कि 'प्रमेय' सर्वदा प्रमाता से इच्छा, स्मृति एवं प्रमाण के जन्म द्वारा व्यवहित ही रहता है। उसके रहने का और कोई प्रकार नहीं है। अर्थात् इच्छा का विषयभूत प्रमेय इच्छा के जन्म (उत्पत्ति) से व्यवहित रहता है, स्मृति का विषयभूत प्रमेय स्मृति की उत्पत्ति से व्यवहित रहता है, प्रयत्न का विषयभूत प्रमेय प्रयत्न की उत्पत्ति से व्यवहित रहता है, उसी तरह प्रमाण का विषयभूत प्रमेय प्रमाण की उत्पत्ति से व्यवहित रहता है। अन्य कोई प्रकार उसके रहने का नहीं है। अवगति भी प्रमेयविषयिणी ही देखी गयी है। स्वयं प्रमाता अपने स्वयं की ही इच्छा आदि में से किसी के द्वारा व्यवहित हो ऐसी कल्पना नहीं की जा सकती। स्मृति भी स्मर्यमाण पदार्थ को ही विषय करती है। स्वयं स्मरण करनेवाले स्मर्ता को नहीं। उसी प्रकार इच्छा भी इष्ट वस्तु की ही हुआ करती है, अर्थात् इष्टवस्तु- विषयिणी ही होती है। वह इच्छा करनेवाले को अपना विषय नहीं बनाती। यदि स्मृति, स्मरणकर्ता को और इच्छा, इच्छा करने वाले को विषय करे तो पहले की तरह उन दोनों की अनवस्था होने लगेगी, जिसका परिहार नहीं हो सकेगा।। ९९ ।। ननु प्रमातृविषयावगत्यनुत्पत्तौ, अनवगत एव प्रमाता स्यादिति चेत् ।।१००।। हृदयस्पशिनी नन्विति-यहाँ तक यह बताया गया कि आत्मसिद्धि में प्रमाण-व्यापार की अपेक्षा नहीं है, क्योंकि प्रमाता में स्वविषयप्रमाणक्रियाश्रयत्व नहीं है, और अन्य प्रमाता की कल्पना करें तो अनवस्था होगी। अतः आत्मा अप्रमेय ही है, यह सिद्ध हुआ। बाह्य विषय (पदार्थ) के अवच्छेदार्थ उसे प्रमाणव्यापार की अपेक्षा रहती है, अतः प्रमाणव्यापार को व्यर्थ भी नहीं कह सकते, इस कथन से अवगति में स्वतः नित्यत्व सिद्ध किया गया। अब प्रकारान्तर से उसी के साधनार्थ पुनः पूर्व पक्ष कर रहे हैं। जिस विषय की अवगति होती है, उसी को अवगत और सिद्ध आदि शब्दों से कहा जाता है। किन्तु आपके कथनानुसार प्रमाता को विषय करनेवाला ज्ञान उत्पन्न न होने से प्रमाता तो अज्ञात ही रहेगा अर्थात् प्रमाता सर्वदा सुपुप्त ही रहेगा ।। १०० ।। न, अवगन्तुरवगतेरवगन्तव्यविषयत्वात्, अवगन्तृविषयत्वे चानवस्था पूर्ववत्स्यात् । अवगति- श्चात्मनि कूटस्थनित्यात्मज्योतिरन्यतोऽनपेक्षैव सिद्धा, अग्न्यादित्याद्युष्णप्रकाशवत् इति पूर्वमेव प्रसाधितम् ।

कूटस्थाऽद्वयात्मबोधप्रकरण ३१९ अवगतेश्चैतन्यात्मज्योतिषः स्वात्मन्यनित्यत्वे, आत्मनः स्वार्थतानुपपत्तिः कार्यकारणसंघातवत्संहतत्वात्पारार्थ्यं दोषवत्त्वं चावोचाम । कथं ? चैतन्यात्मज्योतिषः स्वात्मन्यनित्यत्वे स्मृत्यादिव्यवधानात्सान्तरत्वम् । ततश्च तस्य चैतन्यज्योतिषः प्रागुत्पत्तेः; प्रध्वंसाच्चोर्ध्वमात्मन्येवाभावात्, चक्षुरादीनामिव संहतत्वात्, पारार्थ्यं स्यात् । यदा च तदुत्पन्नमात्मनि विद्यते, *न तदाऽऽत्मनः स्वार्थत्वम्, तद्भावाभावापेक्षा ह्यात्मानात्मनोः स्वार्थत्वपरार्थत्वसिद्धिः । तस्मादात्मनोऽन्यनिरपेक्षमेव नित्यचैतन्यज्योतिष्ट्वं सिद्धम् ।।१०१।। हृदयस्पशिंनी नेति—शिष्य से उसका अभिप्राय स्पष्ट कराने के लिये गुरु उस से पूछते हैं कि क्या तुम, सुषुप्त की समानता का परिहार करने के लिये आत्मा को अवगति (ज्ञान) का विषय कहना चाहते हो, या केवल सुषुप्तसमानता का परिहार मात्र कहना चाह रहे हो ? इन दो विकल्पों में से प्रथम विकल्प तो उचित नहीं है। क्योंकि ज्ञाता (अवगन्ता) का जो ज्ञान है, वह ज्ञेय को ही विषय करता है। यदि वह ज्ञाता को विषय करे तो पूर्ववत् अनवस्था प्राप्त होगी। यह तो हम पहले ही बता चुके हैं कि अग्नि और सूर्य की उष्णता एवं प्रकाश के तुल्य, आत्मा में अन्य किसी की अपेक्षा से रहित कूटस्थ नित्य स्वयंप्रकाश ज्ञान स्वतः सिद्ध है। आत्मा में यदि चैतन्यात्मप्रकाशरूप ज्ञान अनित्य हो तो आत्मा की स्वार्थता अनुपपन्न होती है। ऐसी अवस्था में देहेन्द्रिय के समान संहत होने से हमने उसका पारार्थ्य तथा दोषयुक्त होना भी बताया था। शिष्य ने पूछा 'किस प्रकार' तो उसी उक्त अनुपपत्ति को पुनः याद करा रहे हैं। यदि आत्मा का चैतन्यरूप ज्ञान अनित्य हो तो स्मृति, इच्छा आदि का व्यवधान (विच्छेद) रहने से वह चैतन्य ज्योतिरूप ज्ञान व्यवहीत (सान्तर) होगा। अर्थात् वह इच्छादिवृत्त्यन्तरपूर्वक होगा। उससे क्या होगा ? तब तो उस चैतन्यरूप ज्ञान का अपनी उत्पत्ति से पूर्व और विनाश के पश्चात् आत्मा में ही अभाव हो जाने से चक्षुरादि के तुल्य संहत होने से उसका (आत्मा का) पारार्थ्य सिद्ध होगा। चैतन्यरूप ज्ञान पैदा होकर आत्मा में रहता है, अतः आत्मा की स्वार्थता सिद्ध नहीं हो सकती, क्योंकि उसमें संहतत्व का अभाव होने से स्वार्थत्व और स्वार्थत्व के होने से ही अनात्मा के परार्थत्व की सिद्धि हो जाती है। अतः आत्मा का अन्यनिरपेक्ष रहना ही उसकी नित्य चैतन्य प्रकाशरूपता है, यह सिद्ध हो जाता है ।। १०१ ।। नन्वेवं सति, असति प्रमाश्रयत्वे, कथं प्रमातुः प्रमातृत्वम् ? ।।१०२।। हृदयस्पशिंनी नन्विति—शिष्य कहता है कि आत्मा यदि प्रमा का आश्रय नहीं है तो प्रमातारूप चेतन का प्रमातृत्व कैसे संभव हो पायगा ? ।। १०२ ।। उच्यते—प्रमाया नित्यत्वेऽनित्यत्वे च रूपविशेषाभावात् । अवगतिर्हि प्रमा, तस्याः स्मृती- च्छादिपूर्विकाया अनित्यायाः कूटस्थनित्याया वा, न स्वरूपविशेषो विद्यते, यथा धात्वर्थस्य तिष्ठत्यादेः फलस्य गत्यादिपूर्वकस्यानित्यस्यागतिपूर्वकस्य नित्यस्य वा रूपविशेषो नास्तीति तुल्यो व्यपदेशो दृष्टः— “तिष्ठन्ति मनुष्याः” “तिष्ठन्ति पर्वताः” इत्यादिः । तथा नित्यावगतिस्वरूपेऽपि, प्रमातरि प्रमातृत्व- व्यपदेशो न विरुध्यते, फलसामान्यादिति ।।१०३।। हृदयस्पशिंनी उच्यत इति—गुरु कहते हैं कि जन्य प्रमा का आश्रय न होने पर भी उसमें प्रमातृत्व का व्यवहार उपपन्न हो सकता है। प्रमा चाहे नित्य हो या अनित्य हो, उसमें स्वरूप का कोई भेद नहीं है क्योंकि अवगति (ज्ञान) को ही 'प्रमा' शब्द से कहते हैं। वह प्रमा स्मृतिपूर्वक या इच्छा आदि पूर्वक अनित्य हो अथवा कूटस्थ नित्य हो, उसके स्वरूप में कोई

  • नैवं सम्भवति—पाठान्तरम् ।

अन्तर नहीं है। जैसे 'स्था' आदि धातु के अर्थ (गति, निवृत्ति आदि) में गत्यादिपूर्वकता के कारण अनित्यता होने पर अथवा पूर्वगति आदि की शून्यता रहने से नित्यता होने पर कोई विशेषता नहीं होती। उसी से (धात्वर्थ से) 'मनुष्य स्थित है' 'पर्वत स्थित है' इस प्रकार समान व्यपदेश होता देखा गया है। 'मनुष्य स्थित है' इस उदाहरण में गत्यादिपूर्वकता के कारण अनित्य स्थिति का प्रदर्शन है, तथा 'पर्वत स्थित है' इसमें जिसके पहले भी गति आदि नहीं थी, ऐसी नित्य स्थिति प्रदर्शित की गयी है। किन्तु इस प्रकार अर्थ में भेद होने पर भी व्यपदेश (व्यवहार) में कोई भेद नहीं है। उसी प्रकार प्रमाता चेतन के नित्यज्ञानस्वरूप होने पर भी उसे प्रमाता कहने में कोई विरोध नहीं है। क्योंकि नित्य-अनित्य द्विविध ज्ञान के फल तो समान ही हैं। अभिप्राय यह है कि प्रमाण के फल को ही प्रमा कहते हैं। वह चित्प्रकाशरूप है, अतः उसे प्रमातृगत ही कहना होगा। अन्यथा उसे विषयगत मानने पर 'मया इदं विदितम्'—मैंने यह जाना इस प्रकार स्वात्मा में ज्ञान-ज्ञेय सम्बन्ध का अनुभव अनुपपन्न होगा। और अन्तःकरणादि जड़ पदार्थ में व्यापाराश्रयता के रहने पर भी चिदाश्रयत्व नहीं रहता है, उस कारण उसमें प्रमातृत्व उपपन्न नहीं होता है। किन्तु चिदात्मा तो कूटस्थ है, उस कारण उसमें व्यापारवत्ता के न रहने से प्रमा के प्रति उसका कर्तृत्व अनुपपन्न है। मुख्य वृत्ति से जड़-अजड़ दोनों में भी प्रमातृत्व व्यपदेश की योग्यता नहीं है। परस्पराध्यास के कारण व्यवहार चलता रहता है, अतः बाह्य विषय में भी आत्मा का प्रमातृत्व मिथ्या ही है। ऐसी स्थिति में स्वयंप्रकाश स्वभाववाले आत्मा में प्रमातृत्व की शंका करने का अवकाश ही कहाँ है? और उसके अनवभास का प्रसंग ही कहाँ है? तथा प्रमाण की अपेक्षा भी कहाँ और कैसे है? ॥१०३॥

अत्राह शिष्यः-नित्यावगतिस्वरूपस्यात्मनोऽविक्रियत्वात्कार्यकरणे संहृत्य* तक्षादीनामिव वास्यादिभिः कर्तृत्वं नोपपद्यते । असंहतस्वभावस्य च कार्यकारणोपादानेऽनवस्था प्रसज्येत । तक्षादीनां तु कार्यकारणैर्नित्यमेव संहतत्वमिति वास्याद्युपादाने नानवस्था स्यादिति ॥१०४॥

हृदयस्पर्शिनी अत्रेति—इस प्रकार से कूटस्थ नित्य चैतन्य स्वप्रकाश आत्मा में अन्तःकरणरूप उपाधि के सम्बन्ध से प्राप्त औपाधिक प्रमातृत्व का उपपादन करके, अब कर्तृत्व भी उसी प्रकार है, यह बताने के लिये प्रश्न उपस्थित कराते हैं। गुरु का उपर्युक्त कथन सुनकर शिष्य कहता है—जिस प्रकार बसूल आदि साधनों (औजारों) से युक्त हुए बिना काष्ठ- वर्धक (तक्षा, बढ़ई) का कर्तृत्वसम्बन्ध नहीं हो पाता, उसी प्रकार नित्यज्ञानस्वरूप आत्मा का भी देह और इन्द्रियों से सम्बन्ध हुए बिना कर्तृत्व उपपन्न नहीं है। क्योंकि वह निर्विकार है। असंहत स्वभाववाला आत्मा यदि शरीर और इन्द्रिय का ग्रहण करता है ऐसा कहें तो अनवस्था दोष का प्रसंग उपस्थित होता है। तक्षा (बढ़ई) का तो देह, इन्द्रियों से सर्वदा ही संहतत्व है, इस कारण वह बसुला आदि साधनों का जो ग्रहण करता है, उसमें अनवस्था नहीं आने पाती। 'तक्षादीनामिव' यह व्यतिरेक दृष्टान्त है ॥ १०४ ॥

इह तु असंहतस्वभावस्य करणानुपदाने कर्तृत्वं नोपपद्यत इति करणमुपादेयम्, तदुपादानमपि विक्रियैवेति तत्कर्तृत्वे करणान्तरमुपादेयम्, तदुपादानेऽप्यन्यदिति प्रमातुः स्वातन्त्र्येऽनवस्थाऽपरिहार्या स्यादिति । न च क्रियैवात्मानं कारयति, अनिर्वर्तितायाः स्वरूपाभावात् । अथान्यदात्मानमुपेत्य क्रियां कारयतीति चेत्--न, अन्यस्य स्वतःसिद्धत्वाविषयत्वाद्यनुपपत्तेः न ह्यात्मनोऽन्यदचेतनं वस्तु स्वप्रमाणकं दृष्टम् । शब्दादि सर्वमेवावगतिफलावसानप्रत्ययप्रमितं सिद्धं स्यात् । अवगतिश्चेदात्मनोऽन्यस्य स्यात्, सोऽप्यात्मैवासंहतः स्वार्थः स्यात्, न परार्थः । न च देहेन्द्रियविषयाणां स्वार्थतामवगन्तुं शक्नुमोऽवगत्य- वसानप्रत्ययापेक्षसिद्धिदर्शनात् ॥१०५॥

हृदयस्पर्शिनी इहेति—गुरु कहते हैं कि आत्मा में कर्तृत्व वास्तविक नहीं है। कर्तृत्व दो प्रकार का होता है। एक तो करण के द्वारा साध्य होने वाला, और दूसरा सान्निध्यमात्र से निष्पन्न होनेवाला। बढ़ई के समान आत्मा में करणोपादान-

  • संहतस्य-पाठान्तरम् ।

कूटस्थाद्वयात्मबोधप्रकरण ३२१ साध्य कर्तृत्व नहीं हो सकता, इस कारण परमार्थतः उसमें कर्तृत्व का अभाव है। तथापि लौकिक मायावी अथवा चुम्बक के समान अविवेकवश माया से उत्पन्न अन्तःकरणरूप विकार के सन्निधिमात्र से उसमें कर्तृत्व की प्रतीति होना संभव है। यदि यह कहा जाय कि क्रिया ही उससे कर्म करा लेती है, तो क्रिया की निष्पत्ति तो कर्ता के ही द्वारा होती है। अतः जिस प्रकार उत्पन्न होने से पूर्व घट के द्वारा जलानयन का कार्य नहीं होता, उसी प्रकार अपनी निष्पत्ति के पूर्व कोई भी क्रिया, किसी दूसरे के प्रति किसी प्रकार भी उपकारक नहीं हो सकती। इसी अभिप्राय को ग्रन्थकार कह रहे हैं कि यहाँ करण को लिये बिना असंहत स्वभाववाले आत्मा का कर्तृत्व नहीं बन सकता, इसलिये उसे करण का ग्रहण करना ही चाहिये। किन्तु करण का ग्रहण करना भी एक विकार ही है। अतः उसके कर्तृत्व के लिये भी उसे दूसरे करण को ग्रहण करने की आवश्यकता होगी, तथा उसे ग्रहण करने के लिये एक अन्य करण को ग्रहण करना होगा, इस प्रकार से प्रमाता की स्वतन्त्रता (कर्तृत्व) के सिद्ध होने में अनवस्था दोष का निवारण नहीं हो सकेगा। यह भी नहीं कह सकते कि क्रिया ही आत्मा से कर्म करा लेती है। क्योंकि किसी भी क्रिया की निष्पत्ति (उत्पत्ति) हुए बिना उसका कोई स्वरूप नहीं हुआ करता। यह भी नहीं कह सकते कि कोई वस्तु, आत्मा के समीप (सन्निध) पहुँचकर उससे कर्म (क्रिया) करा लेती है। किन्तु यह कथन भी उचित न होगा। क्योंकि आत्मा के अतिरिक्त किसी भी अन्य वस्तु का स्वतःसिद्धत्व और अविषयत्व सम्भव नहीं है। आत्मा से भिन्न कोई अन्य जड़ वस्तु स्वतःसिद्ध नहीं देखी है। शब्दादि यच्चयावत् सभी विषय अवगतिफलावसान प्रत्यय से ही प्रमित हुआ करते हैं। यदि अवगति (ज्ञान) आत्मा के अतिरिक्त किसी अन्य की हो तो वह भी असंहत और स्वार्थ आत्मा ही होगा, वह परार्थ नहीं होगा। देह और इन्द्रियों की स्वार्थता को हम समझ नहीं सकते, क्योंकि वे भी अवगतिफलावसान प्रत्यय से ही सिद्ध होते देखे जाते हैं। तात्पर्य यह है कि वस्तुतः ईश्वर, आत्मभिन्न नहीं है, क्योंकि प्रत्यगात्मा की तरह वह अवगति (ज्ञान) का आश्रय है- 'ईश्वरः वस्तुतः आत्मभिन्नो न भवति, अवगत्याश्रयत्वात् प्रत्यगात्मवत्' इस प्रकार अनुमान से अनुगृहीत हुई “अयमात्मा ब्रह्म”१ इत्यादि श्रुति से आत्मा से अन्य कोई चेतन नहीं है। वह आत्मभूत ईश्वर, देहादिकों से असंहत, स्वार्थ, स्वतन्त्र है; परतन्त्र नहीं है, इसलिए वह क्रिया का शेष नहीं है। एवं च आत्मा में जो कर्तृत्व की प्रतीति होती है, वह केवल भ्रममात्र ही है। ईश्वरस्वरूप आत्मा में जगत्कर्तृत्व भी माया के द्वारा ही है। तात्पर्य यह है कि कहीं भी कर्तृत्व, पारमार्थिक नहीं है। लोकायतमत (चार्वाक मत) से शंका करते हैं कि आत्मा अवगत्याश्रय होने से उसमें असंहत्व कैसे है? क्योंकि संहत देहादि में भी अवगत्याश्रयत्व देखा जाता है। इसके उत्तर में यह अनुमान होगा कि 'देहादिः न अवगत्याश्रयः अवगम्यमानत्वात् घटादिवत् ।' देहादि, अवगति के आश्रय नहीं हैं, क्योंकि वे तो घटादि की तरह अवगम्यमान हैं। अवगति का आश्रय तो आत्मा ही है ॥ १०५ ॥ ननु देहस्यावगतौ न कश्चित्प्रत्यक्षादिप्रत्ययान्तरमपेक्षते ॥१०६ ॥ हृदयस्पशिनी नन्विति-देहादि में अव गत्यवसानप्रत्ययापेक्षसिद्धिकत्व कैसे है? क्योंकि 'मैं मनुष्य हूँ, मैं जानता हूँ' इस प्रकार का ज्ञान तो सभी को स्वतःएव होता है। अर्थात् वह ज्ञान स्वसंवेद्य है। देहादि का ज्ञान होने के लिए किसी प्रत्यक्षादि अन्य प्रमाण की अपेक्षा नहीं रहती ॥ १०६ ॥ बाढम्, *जाग्रत्येवं स्यात् । मृतिसुषुप्तयोस्तु देहस्यापि प्रत्यक्षादिप्रमाणापेक्षैवा† सिद्धिः, तथैवेन्द्रियाणाम्—बाह्या एव हि शब्दादयो देहेन्द्रियाकारपरिणताः — इति ‡प्रत्यक्षादिप्रमाणापेक्षैव हि सिद्धिः । सिद्धिरिति च प्रमाणफलमवगतिमवोचाम । सा चावगतिः कूटस्था स्वयंसिद्धा आत्मज्योतिः स्वरूपेति च ॥१०७॥ हृदयस्पशिनी बाढमिति-गुरु ने कहा-ठीक है। किन्तु यह अनुभव स्वनिबन्धन नहीं है, अपितु देह और आत्मा के अविवेक से है। क्योंकि जाग्रत्-अवस्था में वैसा अनुभव होता है। मृत्यु और सुषुप्ति के समय में देह की सिद्धि भी प्रत्यक्षादि प्रमाण की अपेक्षा रखती है। यदि देह स्वयं प्रकाशस्वभाव होता तो अपनी सत्ता में प्रमाणनिरपेक्ष स्वभाव १. (बृ. उ. २।५।१९) * जाग्रत्येवैवं - पाठान्तरम् । † णापेक्षयैव - पाठान्तरम् । ‡ पेक्ष्यैव - पाठान्तरम् । ४१

३२२ उपदेशसाहस्री के कारण सुषुप्ति-मरणावस्था भी प्रमाणनिरपेक्ष सिद्धिवाली होती । किन्तु ऐसी बात नहीं है, तस्मात् 'देह' अचेतन है। इसी प्रकार इन्द्रियों की सिद्धि भी प्रमाण के अधीन है। इस प्रकार देह में बताये गये न्याय का इन्द्रिय के सिद्धि में अतिदेश किया गया है। देह और इन्द्रियों के आकार में परिणत हुए शब्दादि विषय बाह्य ही हैं। अतः उनकी सिद्धि में प्रत्यक्षादि प्रमाण की अपेक्षा होती ही है। इस विषय में अनुमान इस प्रकार किया जायेगा- 'देहादिः अनात्मा भौतिकत्वात् बाह्यवत्' । ग्राह्य, ग्राहक, करण उनके आयन के रूप में भूतों का ही परिणाम होता है। क्योंकि 'उपकार्योपकारक भाव से परस्पर संहत हुए पदार्थ समानयोनि हुआ करते हैं, ऐसा नियम है। 'सिद्धि' का अर्थ निष्पत्ति नहीं है। यदि 'निष्पत्ति' अर्थ होता, तो उसे प्रत्यक्षादि की अपेक्षा न होती । 'सिद्धि' का अर्थ है प्रमाण की फलभूता अवगति, यह हम पूर्व कह चुके हैं। वह अवगति कूटस्थ, स्वयंसिद्ध, एवं स्वयंप्रकाशरूप है। यह कहकर अर्थात् अवगति का स्वरूप बताकर लोकायतिकों की शंका का निरसन कर दिया गया है। लोकायतिक का कहना था कि देहादि के आकार में भूतों के परिणत होने पर उनमें मदशक्ति की तरह अवगति उत्पन्न होती है, अतः उसे भी देह की तरह भौतिक ही समझ लेना चाहिये। इस शंका का निरसन हो जाने से अवगति की कूटस्थता ही स्थिर रहती है ॥ १०७ ॥

अत्राह चोदकः--अवगतिः प्रमाणानां फलं कूटस्थनित्यात्मज्योतिःस्वरूपेति च विप्रति- षिद्धम् । इत्युक्तवन्तमाह--न विप्रतिषिद्धम् । कथं तर्हि* ? कूटस्था नित्यापि सति प्रत्यक्षादिप्रत्ययान्ते लक्ष्यते तादर्थ्यात् । प्रत्यक्षादिप्रत्ययस्य अनित्यत्वे, अनित्येव †भवति । प्रमाणानां फलमित्युपचर्यते ॥१०८॥

हृदयस्पर्शिनी अत्रेति-इस पर प्रश्नकर्ता कहता है-'अवगति' को प्रमाणों का फल बताना और उसे कूटस्थ, नित्य एवं स्वयंप्रकाश कहना तो परस्परविरुद्ध है। इस प्रकार कहनेवाले शिष्य से गुरु कहते हैं-हमारा कथन परस्परविरुद्ध नहीं है। तब शिष्य ने पूछा कि आपने अवगति को प्रमाणों का फल कैसे कहा था ? गुरु कहते हैं-यद्यपि 'अवगति'- अकार्यरूप है, तथापि कृपाकाशाकार्यत्ववत् उसमें कार्यत्व का उपचार किया जाता है। अतः उसके फलत्वप्रसिद्धि में कोई विरोध नहीं है। उपचार करने में निमित्त क्या है ? तो उत्तर दे रहे हैं कि वह अवगति, कूटस्थ और नित्य रहने पर भी वह अपनी अभिव्यक्ति के लिये प्रत्यक्षादि ज्ञान के फलरूप से लक्षित होती है और प्रत्यक्षादि ज्ञान अनित्य होने के कारण वह भी अनित्य-सी होती है। यही कारण है कि वह अवगति उपचार के लक्षण के (लक्षणा के) द्वारा प्रमाणों के फलस्वरूप कही जाती है। तस्मात् कूटस्थावगतिरूप आत्मा में प्रमातृत्व, कर्तृत्व, फलत्व यह सब कल्पना मात्र है। देहादि संहत पदार्थों में परार्थता, जाड्य, पराधीनसिद्धिता रहती है ॥ १०८ ॥

यद्येवं भगवन्, कूटस्थनित्यावगतिरात्मज्योतिःस्वरूपैव स्वयंसिद्धा, आत्मनि प्रमाणनिरपेक्षत्वात् ततोऽन्यदचेतनं संहत्यकारित्वात्परार्थम् । येन च सुखदुःखमोहहेतुप्रत्ययावगतिरूपेण परार्थ्यं, तेनैव स्वरूपेणानात्मनोऽस्तित्वं, नान्येन रूपान्तरेण । अतो नास्तित्वमेव परमार्थतः । यथा हि लोके रज्जुसर्प- मरीच्युदकादीनां तदवगतिव्यतिरेकेणाभावो दृष्टः, एवं जाग्रत्स्वप्नद्वैतभावस्यापि तदवगतिव्यतिरेकेणाभावो युक्तः । एवमेव परमार्थतः भगवन्, अवगतेरात्मज्योतिषो नैरन्तर्यभावात्कूटस्थनित्यताऽद्वैतभावश्च, सर्वप्रत्ययभेदेष्वव्यभिचारात् । प्रत्ययभेदाश्चावगतिं व्यभिचरन्ति । यथा स्वप्ने नीलपीताद्याकारभेदरूपाः प्रत्ययास्तदवगतिं व्यभिचरन्तः परमार्थतो न सन्तीत्युच्यन्ते, एवं जाग्रत्यपि नीलपीतादिप्रत्ययभेदास्ता- मेवावगतिं व्यभिचरन्तोऽसत्यरूपा भवितुमर्हन्ति । तस्याश्चावगतेरन्योऽवगन्ता नास्तीति न स्वेन स्वरूपेण स्वयमुपादातुं हातुं वा शक्यते, अन्यस्य चाभावात् ॥१०९॥

* तर्हि अवगतेः फलत्वं ? तत्त्वोपचारात्-अधिकः पाठः । † तेन प्रमा०-पाठान्तरम् ।

कूटस्थाद्वयात्मबोधप्रकरणम् ३२३ हृदयस्पर्शिनी यद्येवमिति-इस प्रकार अब आत्मा और अनात्मा के यथार्थ स्वरूप को समझकर वह शिष्य, अवगत किये अर्थ को गुरु के प्रति निवेदन करता हुआ आत्मा के अद्वैतत्व को संभावित करने के लिए द्वैत के मृषात्व को प्रकट कर रहा है। शिष्य निवेदन करता है कि हे भगवन् ! यदि ऐसी बात है तो कूटस्थ, नित्य अवगति (ज्ञान) स्वयंप्रकाश- स्वरूप और स्वयं सिद्ध ही है, क्योंकि आत्मा में अन्य किसी प्रमाण की अपेक्षा नहीं है। और उससे जो भिन्न है, वह अचेतन और मिलकर कार्यकारी होने से परार्थ है अर्थात् चेतनार्थ (चेतन के लिये) है। चैतन्य के प्रतिभासमात्र से उसकी सिद्धि होने से स्वप्नदृष्ट की तरह वह अनृत (मिथ्या) है। इसपर सांख्यवादी शंका करता है कि जितना भी दृश्य है, वह सब सुख-दुःख-मोहान्वयी रहता है, अतः वह सत्त्व-रजस्तमोरूप प्रकृति का कार्य है, यह स्पष्ट प्रतीत होता है। ऐसी स्थिति में उसे अनृत (मिथ्या) कैसे समझा जाय ? गुरु समाधान करते हैं कि जिस सुख, दुःख और मोह अर्थात् सत्त्व-रजस्तमोहेतुक प्रत्ययावगतिरूप से जड़ वस्तु, परार्थ (भोक्तृशेषवत्) प्रतीत होती है, उसी रूप से उस जड़ वस्तु (दृश्य वस्तु) की सत्ता (अस्तित्व) भी है, किसी अन्य रूप से (सत्त्वादि रूप से) नहीं है। क्योंकि उसमें कोई प्रमाण नहीं है। अतः परमार्थतः उसकी (जड़ वस्तु की) सत्ता ही नहीं है। किञ्च-जिस प्रकार लोकव्यवहार में रज्जु-सर्प एवं मृगमरीचिका आदि की प्रतीति के अतिरिक्त उनका अभाव ही दृष्टिगोचर होता है। इसी को हम अनुमान के आकार में इस प्रकार कह सकते हैं— 'विमतं जाग्रत्स्वप्नावस्थं दृश्यं नावगतिव्यतिरेकेण क्वचिदपि परमार्थसत्, दृश्यत्वाज्जडत्वाद्वा, रज्जुसर्पादिवत्' । इस प्रकार दृश्य पदार्थ सापेक्ष होने से उसके मायामय होने की सम्भावना है, अतः द्रष्टृत्व ही अद्वैत है, वही मेरे अनुभव में अब आरूढ़ हो गया है। इसी का अब निरन्तर अनुभव हो रहा है। जाग्रत् और स्वप्नावस्था के द्वैतरूप दृश्य का उसकी प्रतीति के अतिरिक्त परमार्थतः अभाव ही युक्तियुक्त प्रतीत हो रहा है। उसी प्रकार हे भगवन् ! अवगतिरूप प्रत्यक् प्रकाश की कूटस्थ नित्यता और अद्वैत भाव का मेरे द्वारा अनुभव किया जा रहा है। वह स्वयंप्रकाश अवगति निरन्तर वर्तमान रहती है, उस कारण वह कूटस्था, नित्या और द्वैतरहिता है। क्योंकि समस्त प्रत्ययभेदों में उसका अव्यभिचार है। किन्तु प्रत्यय भेदों का अपनी अवगति में व्यभिचार रहता है। जिस प्रकार स्वप्नावस्था में नील-पीताद्याकार भेदरूप प्रत्ययों का परस्पर अपनी अवगति में व्यभिचार होने के कारण 'वे परमार्थतः नहीं हैं' ऐसा कहा जाता है, उसी प्रकार जाग्रदवस्था में भी नील-पीतादि प्रत्ययभेदों का उस अवगति में व्यभिचार होने से वे असत्यरूप ही होने चाहिए। इसी को हम अनुमान के आकार में इस प्रकार कह सकते हैं—'विमता जाग्रत्प्रत्ययाः परमार्थतो न विद्यन्ते, चैतन्यप्रकाशव्यभिचारित्वात्, ये एवं, ते एवं, यथा स्वप्नप्रत्ययाः तथा चेमे, तस्मात्तथा' । अभिप्राय यह है कि जिस प्रकार स्वप्नावस्था में देखते हैं कि नीलाकार ज्ञान में पीताकार ज्ञान नहीं रहता, तथा पीताकार ज्ञान में नीलाकार ज्ञान नहीं रहता किन्तु ज्ञान उन सभी में रहता है, केवल उसकी उपाधि का व्यभिचार होता है। उसी प्रकार जाग्रत् ज्ञान में भी है। इसलिए आपस में व्यभिचारी होने के कारण जिस प्रकार वे स्वप्न में मिथ्या हैं, उसी प्रकार जाग्रत् में भी हैं। इतना ही नहीं, संपूर्ण स्वप्नावस्था का जाग्रत् अवस्था में और जाग्रत् अवस्था का स्वप्नावस्था में भी व्यभिचार है। इससे भी उनका मिथ्यात्व स्पष्ट हो जाता है। किन्तु उनके साक्षी का किसी भी अवस्था में व्यभिचार नहीं दिखाई देता। इस कारण परमार्थतः वही कूटस्थ, नित्य, सद्वस्तु है। क्योंकि जो परमार्थतः सत्य हो अर्थात् जिसका किसी काल में भी अभाव न हो, उसी को 'वस्तु' शब्द से कहना उचित है। श्रीमद्भगवद्गीता में भी कहा है— “नासतो विद्यते भावो नाभावो विद्यते सतः । उभयोरपि दृष्टोऽन्तस्त्वनयोस्तत्त्वदर्शिभिः ॥” (२।१५) सद्वस्तु से विलक्षण असद्रूप इस जगत् की सत्ता (अस्तित्व) नहीं हो सकती और सत्स्वरूप ब्रह्म की असत्ता (अभाव) नहीं हो सकती, इस प्रकार तत्त्वदर्शियों ने सत् और असत् के विषय में निश्चय किया है। स्वप्न, जाग्रत् आदि अवस्थाओं में होने वाली अवगति का कोई अन्य ज्ञाता नहीं है। उस कारण अन्य वस्तु का अभाव होने के कारण अपने स्वरूप से उसका न तो ग्रहण ही किया जा सकता है और न त्याग ही किया जा सकता है। अवगन्ता (ज्ञाता) के अतिरिक्त अन्य किसी वस्तु के न होने के कारण 'मैं पूर्ण हूँ' यह अनुभव आपके प्रसाद से अब हो रहा है॥ १०९॥

३२४ उपदेशसाहस्री तथैवेति। एषाऽविद्या, यन्निमित्तः संसारो जाग्रत्स्वप्नलक्षणः। तस्या अविद्याया विद्या निवर्तिका। इत्येवं त्वमभयं प्राप्तोऽसि*। नातः परं जाग्रत्स्वप्नदुःखमनुभविष्यसि। संसारदुःखात् मुक्तोऽसीति ॥११०॥ हृदयस्पर्शिनी तथैवेति—इस प्रकार से जब शिष्य ने कहा तब गुरु उसकी बात का समर्थन कर रहे हैं। प्रकरण के प्रारम्भ में शिष्य ने विद्या और अविद्या का स्वरूप, उसका विभाग पूछा था, उसे विस्तार के साथ बता चुके हैं। अब प्रकरण का उपसंहार करने जा रहे हैं। गुरु ने शिष्य से कहा कि अब जो तुम्हें अपनी पूर्णता का अनुभव हो रहा है, वह ठीक ही हो रहा है। जिसके कारण जाग्रत्-स्वप्नरूप संसार की प्रतीति होती है, वह तो 'अविद्या' है अर्थात् 'अज्ञान' है। और वेदान्तमहावाक्यजन्य प्रत्यय से अभिव्यक्त होनेवाला कूटस्थ जो आत्मप्रकाश है, वह 'विद्या' है। पूर्वोक्त उस अज्ञान (अविद्या) की निवृत्ति करनेवाला ज्ञान (विद्या) ही है। अब तुम्हें विद्या (ज्ञान) प्राप्त हो गया है। इसलिए अब तुमने अभय प्राप्त कर लिया है। अब से भविष्य में तुम जाग्रत्-स्वप्नजन्य दुःख का अनुभव नहीं करोगे। तुम अब संसाररूप दुःख से मुक्त हो गये हो। अतः तुम कृतकृत्य हो गये हो ॥ ११० ॥ ओमिति ॥१११॥ हृदयस्पर्शिनी ओमिति—गुरु ने जो कहा उसे शिष्य ने भी 'ॐ' शब्द से स्वीकृति दे दी। अर्थात् आपने जो कहा, वह सत्य है ॥ १११ ॥ ॥ इति द्वितीयम् कूटस्थाद्वयात्मबोधप्रकरणम् समाप्तम् ॥

  • प्राप्नोषि—पाठभेदः ।

॥ अथ परिसङ्ख्यानप्रकरणम् ॥ ३ ॥ मुमुक्षूणामुपात्तपुण्यापुण्यक्षपणपराणामपूर्वानुपचयार्थिनां* परिसंख्यानमिदमुच्यते--अविद्याहेतवो दोषा वाङ्मनःकायप्रवृत्तिहेतवः; प्रवृत्तेश्चेष्टानिष्टमिश्रफलानि कर्माण्युपचीयन्ते इति-तन्मोक्षार्थम् ॥११२॥ हृदयस्पर्शिनी मुमुक्षूणामिति—पूर्व प्रकरण में तत्त्वज्ञान का निरूपण किया गया है। जीव के परम कल्याण का हेतु वही है। जिसे उस तत्त्वज्ञान की प्राप्ति हो जाती है, वही कृतकृत्य है। तब उसके लिये विधि रूप से कुछ भी कर्तव्य नहीं है। किन्तु भेद (द्वैत) दर्शन की दृढ़ वासना के कारण जिनकी उसमें स्थिरता नहीं होती अर्थात् निर्वातस्थ प्रदीप के समान जिनका ज्ञान निश्चल नहीं है, उनके ज्ञान की दृढ़ता के लिये यह 'परिसंख्यान' (अनात्म वस्तुओं का निषेध) प्रकरण प्रारंभ किया जा रहा है। यह परिसंख्यान उन मुमुक्षुओं (नितान्त उपशम चाहने वालों) के लिये कहा जा रहा है, जो अपने सञ्चित पुण्य-पाप का क्षय करने में तत्पर हैं, क्योंकि कर्म तो अविद्यामूलक होते हैं, अतः उसकी निवृत्ति हुए बिना आत्यन्तिक निवृत्ति का होना संभव नहीं है। तथा पूर्वोपार्जित कर्मों का उच्छेद और अपूर्वो- त्पादक कर्म का अननुष्ठान ये दोनों अविद्या की निवृत्ति से ही उपपन्न होंगे। इसलिये अविद्या की निवृत्ति के द्वारा उन दोनों की इच्छा रखने वाले अर्थात् जिन्हें क्रियमाण कर्मजनित धर्माधर्मरूप अपूर्व की वासना नहीं है, उन मुमुक्षुओं के लिये यह परिसंख्यान कहा जा रहा है। इस प्रकार अधिकारी को बताया गया है। अब परिसंख्यान का प्रयोजन बताते हैं—अविद्याजनित राग-द्वेषादि दोष, वाणी, मन और शरीर की प्रवृत्ति होने में कारण होते हैं। वाणी, मन और शरीर के व्यापार (प्रवृत्ति कर्म) द्विविध होते हैं—एक शास्त्रीय और दूसरा स्वाभाविक। ये ही देव-तिर्यक् मनुष्यत्वप्रापक हुआ करते हैं। इस प्रकार की प्रवृत्ति से इष्ट-अनिष्ट एवं मिश्र फल वाले कर्मों का संचय होता है। उनकी निवृत्ति के लिये अर्थात् अविद्यारागादिनिबन्धन कर्म और उसके फलसम्बन्ध के निवृत्त्यर्थ यह 'परिसंख्यान' कहा जा रहा है ॥ ११२ ॥ तत्र शब्दस्पर्शरूपरसगन्धानां विषयाणां श्रोत्रादिग्राह्यत्वात्, स्वात्मनि परेषु वा विज्ञानाभावः, तेषामेव परिणतानां यथा लोष्टादीनाम् । श्रोत्रादिद्वारैश्च ज्ञायन्ते । येन च ज्ञायन्ते, स विज्ञातृत्वाद- तज्जातीयः । ते हि शब्दादयोऽन्योन्यसंसर्गित्वाज्जन्मवृद्धिपरिणामापक्षयनाशसंयोगावियोगाविर्भावतिरो- भावविकारविकारिक्षेत्रबीजाद्यनेकधर्माणः, सामान्येन च सुखदुःखाद्यनेककर्माणः । तद्विज्ञातृत्वादेव स विज्ञाता सर्वशब्दादिधर्मविलक्षणः ॥११३॥ हृदयस्पर्शिनी तत्रेति—अब उसके उपस्कर के सहित परिसंख्यान प्रकार को बता रहे हैं। प्रथमतः अनात्म वस्तुओं से आत्मा को विविक्त समझकर उसका अनुसन्धान करें, इस प्रकार उपदेश देते हुए उसके विवेक करने का प्रकार बताते हैं। शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गन्ध ये विषय हैं, क्योंकि श्रोत्रादि इन्द्रियों से ग्राह्य होते हैं। अतः अपने द्वारा अथवा घटादि किसी अन्य पदार्थ के द्वारा उनका ज्ञान होना संभव नहीं है। जिस प्रकार लोष्ट (मिट्टी के ढेले) आदि को कोई ज्ञान नहीं हो पाता, उसी प्रकार शरीरादि रूप में परिणत हुए उन सूक्ष्मभूत रूप-शब्दादि विषयों को भी कोई ज्ञान नहीं होता। अनुमान का आकार इस प्रकार होगा—'विमता देहादयो न चेतनावन्तः विज्ञानकर्मत्वात् लोष्टादिवत्।' इस अनुमान में कोई हेत्वसिद्धि की शंका न कर सके, एतदर्थ उस हेत्वसिद्धि का परिहार करने के लिये कहा कि देहादि आकार में परिणत हुए शब्दादि विषय, श्रोत्रादि इन्द्रियों के द्वारा ही जाने जाते हैं। इस प्रकार देह, इन्द्रिय, मन, बुद्धि, प्राण, अहंकार पर्यन्त जितना भी साक्ष्य पदार्थ है, वह सब अनात्म पदार्थ है, इसलिये वह हेय (त्याज्य) है, ऐसा उपदेश

  • र्थानां, थिनः—पाठौ ।

३२६ उपदेशसाहस्री करने के पश्चात् अब अवशिष्ट जो आत्मतत्त्व है, वही अदेय है, वही सब का साक्षी है। अर्थात् जिसके द्वारा ये विषय जाने जाते हैं, वह ज्ञाता होने के कारण उन विषयों से विजातीय है। अर्थात् भूतसंघात से विलक्षण स्वभाव को बता रहे हैं कि वे शब्दादि परस्पर एक दूसरे से मिल जाने के कारण अर्थात् उनमें अन्योन्यसंसर्गिता होने के कारण जन्म, वृद्धि, विपरिणाम, क्षय, नाश, संयोग, वियोग, आविर्भाव, तिरोभाव, विकार, विकारी, क्षेत्र और बीज आदि अनल्प (अनेक) धर्मोंवाले तथा सामान्यरूप से सुख-दुःखादि अनेक कर्मोंवाले हैं। अभिप्राय यह है कि किसी जड़ वस्तु की उत्पत्ति (जन्म) होनेपर ही उसका 'अस्तित्व' गृहीत होता है। सभी जड़ पदार्थों के जन्मादि छह विकार होते हैं, जो स्वरूपनिबन्धन हैं, जैसे संयोग-वियोग पुत्राद्यनुबन्ध निबन्धन हैं। आविर्भाव-तिरोभाव शब्द आगन्तुक प्रकाश के विषय होने से जड़ता के द्योतक हैं। विकार-विकारी शब्द व्रण-गण्ड-विस्फोटकादि अवस्थाओं को बताते हैं। क्षेत्र-बीज शब्द से स्त्री-पुं-प्रकृत्यात्मक परिणामभेद को बताया गया है। 'आदि' पद से अनुक्त अवान्तर भेदों को समझना चाहिये। शब्दादि विषयों का अनुभव होनेपर सुख-दुःख-मोह-रोगादि की उत्पत्ति तो प्रसिद्ध ही है। इन विषयों के विज्ञातृत्व के कारण ही उनका ज्ञाता (आत्मा) शब्दादि सभी विषयों के धर्मों से विलक्षण है॥ ११३॥ तत्र शब्दादिभिरुपलभ्यमानैः पीड्यमानो विद्वानेवं परिसंचक्षीत ॥११४॥ हृदयस्पर्शनी तत्रशब्दादिभिरिति—इस रीति से साक्षी और साक्ष्य इनके अन्वय-व्यतिरेक से आत्मा-अनात्मा का विवेक कर 'अहं ब्रह्मास्मि' ऐसा शुद्ध आत्मा का ही अनवरत अनुसन्धान करे, जब अन्यप्रयुक्त शब्दाद्युपलम्भ से विक्षेप उपस्थित हो जाय, तब अवकृपा, नैष्ठुर्यादि विकारों की उत्पत्ति के भय का परिहार करने के लिये अपने को उपलब्ध होनेवाले शब्दादि विषयों से पीडित होता हुआ विद्वान् इस प्रकार ज्ञानाभ्यास करे ॥ ११४॥ शब्दस्तु ध्वनिसामान्यमात्रेण, विशेषधर्मर्वा षड्जादिभिः, प्रियैः स्तुत्यादिभिरिष्टैरनिष्टैश्चासत्य- बीभत्सपरिभवाक्रोशादिभिर्वचनैर्वा मां दृक्स्वभावमसंसर्गिणमविक्रियमचलमनिधनमभयमत्यन्तसूक्ष्ममविषयं गोचरीकृत्य, स्प्रष्टुं नैवार्हति, असंसर्गित्वादेव मम* । †अत एव न शब्दनिमित्ता हानिवृद्धिर्वा । अतो मां किं करिष्यति स्तुतिनिन्दादिप्रियाप्रियत्वादिलक्षणः शब्दः ? अविवेकिनं हि शब्दमात्मत्वेन गतं प्रियः शब्दो वर्धयेत्, अप्रियश्च क्षपयेत्, अविवेकिस्वात् । नतु मम विवेकिनो बालाग्रमात्रमपि कर्तुमुत्सहते इति । एवमेव स्पर्शसामान्येन तद्विशेषैश्च शीतोष्णमृदुकर्कशादिज्वरोदरशूलादिलक्षणैश्चाप्रियैः प्रियैश्च कैश्चिच्छ- रीरसमवायिभिर्बाह्यागन्तुकनिमित्तैश्च न मम काचिद्विक्रिया वृद्धिहानिलक्षणा अस्पर्शतवात्क्रियते, व्योम्न इव मुष्टिघातादिभिः । तथा रूपसामान्येन तद्विशेषैश्च प्रियाप्रियैः स्त्रीव्यञ्जनादिलक्षणैररूपत्वान्न मम काचिद्धानिर्वृद्धिर्वा क्रियते । तथा रससामान्येन तद्विशेषैश्च प्रियाप्रियैः मधुराम्ललवणकटुतिक्तकषायैमूढ- बुद्धिभिः परिगृहीतैः अरसात्मकस्य मम न काचिद्धानिर्वृद्धिर्वा क्रियते । तथा गन्धसामान्येन तद्विशेषैश्च प्रियाप्रियैः पुष्पाद्यनुलेपनादिलक्षणैरगन्धात्मकस्य न मम काचिद्धानिर्वृद्धिर्वा क्रियते, "अशब्दमस्पर्शस- रूपमव्ययं तथारसन्नित्यमगन्धवच्च यत्" इति श्रुतेः ॥११५॥ हृदयस्पर्शनी शब्द इति—ध्वनिरूप (अव्यक्त वर्णविशेष, नाद मात्र) सामान्य धर्म के द्वारा षड्जादि, प्रियस्तुति आदि और इष्ट, अनिष्ट तथा असत्य, बीभत्स, अपमानसूचक और निन्दात्मक वचनरूप विशेष धर्मों के द्वारा मुझ दृक्- स्वरूप, संसर्गशून्य, अविकारी, अविचल, अविनाशी, अभय, अत्यन्त सूक्ष्म और अविषय को अपना विषय बनाकर

  • मां—पाठभेदः । † यत—पाठभेदः ।

परिसंख्यानप्रकरणम् ३२७ शब्द तो मुझे स्पर्श भी नहीं कर सकता, क्योंकि मैं तो संसर्गशून्य ही हूँ। इसीलिये शब्द के कारण मेरी कोई हानि या लाभ नहीं होता। अतः स्तुतिनिन्दादि-प्रियाप्रियत्वादि गुणवाला शब्द, मेरा क्या करेगा ? जो अविवेकी है, उसे ही 'शब्द' आत्मरूप से प्राप्त होता है। अतः अज्ञानी होने के कारण प्रिय शब्द उसे वृद्धिगत कर देता है और अप्रिय शब्द गिरा देता है। यह 'शब्द' तो मुझ विवेकी का बालाग्र के बराबर भी हानि-लाभ नहीं कर सकता। जैसे मुष्टिप्रहार से आकाश की कोई हानि नहीं की जा सकती, उसी प्रकार सामान्य स्पर्श से अथवा शीत, उष्ण, मृदु (कोमल) एवं कठोर आदि स्पर्शविशेष तथा ज्वर, उदरशूलादिरूप अप्रिय और बाह्य आगन्तुक निमित्तों से होने वाले शरीरसंबंधी किन्हीं प्रियाप्रिय स्पर्शों से भी मेरा किसी प्रकार का हानि-लाभरूप विकार नहीं हो सकता। उसी तरह सामान्यरूप से तथा उसके प्रिय एवं अप्रिय स्त्री-व्यञ्जनादि विशेष भेदों द्वारा भी मेरी कोई हानि या लाभ नहीं किया जा सकता। क्योंकि मैं रूपरहित हूँ। तथा सामान्य 'रस' से अथवा मूढ़बुद्धि पुरुषों द्वारा ग्रहण किये जानेवाले उसके मीठे, खट्टे, खारे, कड़वे, चटपटे और कसैले आदि प्रिय और अप्रियरूप विशेष भेदों से भी मुझ अरसात्मक का कोई हानि या लाभ नहीं होता। ऐसे ही 'सामान्य गन्ध' से तथा पुष्प एवं अनुलेपनादिरूप उसके प्रिय या अप्रिय विशेष रूपों से मुझ गन्धहीन का कोई हानि-लाभ नहीं होता, क्योंकि भगवती श्रुति कह रही है कि "अशब्दमस्पर्शमरूपमव्ययं तथाऽरसं नित्यमगन्धवच्च यत्"१—जो आत्मा शब्दरहित, स्पर्शरहित, अविनाशी, रसहीन, नित्य, और गन्धरहित है ।। ११५ ।।

किञ्च--य एव बाह्याः शब्दादयः, ते शरीराकारेण संस्थिताः२ तद्ग्राहकैश्च श्रोत्राद्याकारैः, अन्तःकरणद्वयतद्विषयाकारेण३ च, ४अन्योन्यसंसर्गित्वात्संहतत्वाच्च सर्वक्रियासु । तत्रैवं सति विदुषो न मम कश्चिच्छत्रुमित्रमुदासीनो वाऽस्ति । तत्र यदि कश्चित् मिथ्याज्ञानाभिमानेन प्रियमप्रियं वा प्रयुयुङ्क्षेत्५ क्रियाफललक्षणं तन्मृषैव प्रयुयुङ्क्षति६ सः, तस्याविषयत्वान्मम, "अव्यक्तोऽयमचिन्त्योऽयम्" इति स्मृतेः । तथा सर्वेषां पञ्चानामपि भूतानामविकार्यः, अविषयत्वात्, "अच्छेद्योऽयमदाह्योऽयम्" इति स्मृतेः । याऽपि शरीरेन्द्रियसंस्थानमात्रमुपलक्ष्य, मद्भक्तानां विपरीतानां च प्रियाप्रियादिप्रयुयुक्षा, तज्जा च धर्मा- धर्मादिप्राप्तिः, तेषामेव, न तु मय्यजरेऽमृतेऽभये । "नैनं कृताकृते तपतः", "न कर्मणा वर्धते नो कनीयान्", "सबाह्याभ्यन्तरो ह्यजः", "न लिप्यते लोकदुःखेन बाह्यः" इत्यादिश्रुतिभ्यः । अनात्मवस्तु- न्यन्चाऽसत्त्वं७ परमो हेतुः । आत्मनश्चाद्वयत्वे८, ९द्वयस्यासत्त्वात्, यानि सर्वाण्युपनिषद्वक्यानि विस्तरशः समीक्षितव्यानि समीक्षितव्यानीति ।।११६।।

हृदयस्पर्शिनी किञ्चेति—इस प्रकार सामान्य-विशेष रूपवाले शब्द-स्पर्श-रूप-रस-गन्धादि विषयों से मेरी न कोई हानि है और न वृद्धि (लाभ) है, अतः से उनसे अनभिभूत हूँ; ऐसा निरन्तर चिन्तन करते रहना चाहिए, यह बताकर अब शब्दादि विषयों से अपने अनभिभव का अनुचिन्तन करने के लिए बता रहे हैं। किञ्च—जो बाह्य शब्दादि शरीराकार में तथा उन शब्दादिकों को ग्रहण करनेवाले श्रोत्रादि के रूप में स्थित हैं, वे ही एक-दूसरे से संश्लिष्ट होने के कारण दो अन्तःकरण (मन और बुद्धि) और उनके विषयरूप से भी परिणत हो गये हैं, क्योंकि वे सभी क्रियाओं में परस्पर मिले रहते हैं। तब ऐसी स्थिति में मुझ विद्वान का कोई भी शत्रु, मित्र या उदासीन नहीं है। अतः यदि मिथ्या ज्ञानाभिमान के कारण कोई पुरुष किसी प्रकार के क्रियाफलरूप प्रिय या अप्रिय का प्रयोग करना चाहता है, तो उसकी यह प्रयोग की इच्छा मिथ्या ही है। क्योंकि "यह अव्यक्त और अचिन्त्य है"१० इस स्मृति के अनुसार मैं तो उसका विषय नहीं हूँ।

१. ( कठ उ. ३।१५ ) ६. प्रयुयुक्षते—पाठभेदः । २. तत्परिणामरूपैः—अधिको पाठः । ७. असत्त्वादिति—पाठभेदः । ३. बुद्धिमन्सी—अधिको पाठः । ८. अद्वयत्वविषयाणि—पाठभेदः । ४. तेषाम्—अधिको पाठः । ९. द्वैतस्य—पाठभेदः । ५. प्रयुयुक्षते—पाठभेदः । १०. ( भ. गी. २।२५ )

३२४ उपदेशसाहस्री उसी प्रकार "यह अच्छेद्य और अदाह्य है"१ इस स्मृति के अनुसार समस्त भूतों का अविषय होने से मैं अविकारी हूँ। इसी प्रकार इस शरीर और इन्द्रियसंस्थानमात्र को लक्ष्य बनाकर जो मेरे भक्तों और अभक्तों को इसका प्रिय अथवा अप्रिय साधन करने की इच्छा होती है, तथा उसके कारण उन्हें जो पुण्य एवं पाप की प्राप्ति होती है, वह भी उन्हें ही है। "मुझ अजर-अमर एवं अभयरूप२ आत्मा" में उसकी सत्ता नहीं है। जैसा कि "इसे पाप और पुण्य नहीं सताते३", "यह कर्म से न बढ़ता है न घटता है४", "वह बाहर-भीतर विद्यमान और अजन्मा है५", "वह संसारदुःख से लिप्त नहीं होता, क्योंकि वह उससे बाहर है६"—इत्यादि श्रुति-स्मृतियों से सिद्ध होता है, अनात्मवस्तु की सत्ता नहीं है—यही इसमें प्रधान हेतु है। द्वैत की सत्ता न होने के कारण आत्मा के अद्वयत्वविषयक जितने भी उपनिषद्वाक्य हैं, उन सभी की विस्तारपूर्वक आलोचना करनी चाहिये, आलोचना करनी चाहिए। यह द्विरुक्ति गद्य-प्रबन्ध की समाप्ति सूचित करने के लिए की गई है। भूत-भौतिक ही सक्रिय रहते हैं, मैं ज्ञानी तो समस्त विकार-विकारिसंघात का साक्षी निर्विकार हूँ। मेरा कोई शत्रु-मित्र आदि नहीं है। यदि कोई अपने मिथ्याज्ञान के कारण होनेवाले देहाभिमान से क्रियाफलस्वरूप प्रिय-अप्रिय का प्रयोग करना चाहे, तो वह मिथ्या ही है, क्योंकि मैं उसका विषय नहीं हूँ। अतः ब्रह्म- विद्याप्रतिपादक समस्त वेदान्तवाक्यों का बहुशाखोपसंहार न्याय से पुनः पुनः आलोचन करते रहना चाहिए ॥ ११६ ॥ इति श्रीमत्परमहंस-परिव्राजकाचार्य-श्रीमच्छङ्कर-भगवत्पूज्यपादकृतौ सकलवेदोपनिषत्सारोपदेशसाहस्र्यां गद्यभागः समाप्तः ॥ इति श्रीमत्परमहंस—परिव्राजकाचार्य—श्रीमच्छङ्करभगवत्पूज्यपादकृतौ सकलवेदोपनिषत्सारोपदेशसाहस्र्यां गद्यभागस्य मुसलगाँवकरोपनामकेन श्रीगजाननशास्त्रिणा कृता 'हृदयस्पर्शिनी' हिन्दीव्याख्या पूर्णतां गता ॥ ॥ श्रीकृष्णार्पणमस्तु ॥ १. (भ. गी. २।२४) २. (बृ. उ. ४।४।२५) तथा (प्र. उ. ५।७) ३. (बृ. उ. ४।४।२२) ४. (बृ. उ. ४।४।२३) ५. (मु. उ. २।१।२) ६. (कठ. उ. ५।११)

श्लोकानुक्रमणी अकल्पितेऽप्येवमजे २६७ अन्वयी ग्राहकस्तेषां २०९ अकार्यशेषमात्मानम् ८२ अपायोद्भूतिहीनाभिः १६९ अकालत्वाददेशत्वात् ८८ अपि निन्दोपपत्तेश्च १४४ अकुर्वदिदं यदि २६८ अपेक्षा यदि भिन्नेऽपि १२८ अकुर्वन् सर्वकृच्छुद्धः १७८ अपोहो यदि भिन्नानां २३५ अचक्षुष्कादिशास्त्राच्च ६८ अप्रकाशो यथा १३२ अचक्षुष्कादिशास्त्रोक्तं ६८ अप्राणस्य न कर्मास्ति ६५ अक्षुण्णवान्न दृष्टिर्मे ६५ अप्राणस्याऽमनस्कस्य ८६ अजोऽमरश्चैव तथा ४२ अप्राप्यैव निवर्तन्ते १०८ अजोऽहं चामरोऽमृत्युः १७१ अबद्धचक्षुषो नास्ति १६० अज्ञानं कल्पनामूलं १२३ अभावरूपं त्वमसीह २६२ अज्ञानं तस्य मूलं ४ अभिन्नोऽपि हि बुद्ध्यात्मा २३३ अज्ञासिषमिदं मां च २२९ अभियुक्तप्रसिद्धिश्चैत् २०५ अतः सर्वमिदं सिद्धं २१८ अमनस्कस्य का चिन्ता ८८ अतोऽन्यथा न ग्रह २७० अमनस्कस्य शुद्धस्य ६९ अत्यरेचयदित्युक्तो १२ अमूर्तमूर्तानि च ९३ अथाभ्युपेत्यापि २६९ अमृतं चाभयं नातं ५५ अदृशिर्दृशिरूपेण २१२ अमृतत्वं श्रुतं यस्मात् १२ अदृश्योऽपि यथा राहुः १६१ अर्थी दुःखी च यः श्रोता २१० अदृष्टं द्रष्टृविज्ञातं १११ अलुप्ता त्वात्मनो दृष्टिः ६२ अद्रष्टुर्नेव चान्धस्य २३२ अवगत्या हि संख्यातः २२५ अध्यक्षः स्वयमस्त्येव २२८ अवस्थान्तरमप्येवं १४३ अध्यक्षस्य दृशेः कीदृक् २३७ अविकल्पं तदस्त्येव १२३ अध्यक्षस्य पृथक्सिद्धौ २२४ अविक्रियत्वेऽपि २१२ अध्यक्षस्य समीपे तु २०९ अविद्याया भावनया ४६ अध्यक्षस्य समीपे स्यात् २२३ अविद्याप्रभवं सर्वं १५६ अध्यक्षस्यापि सिद्धिः स्यात् २३० अविद्याबद्धचक्षुष्ट्वात् २४४ अध्यक्षेण कृता दृष्टिः २३७ अविद्यामात्र एवातः १९९ अध्यक्षोऽहमिति ज्ञानं २३२ अविविच्योभयं वक्ति २१० अनवस्थान्तरत्वाच्च १४१ अविवेकात्पराभावं ३२ अनादितो निर्गुणतो ४४ अवेद्यमेकं यदनन्य २७० अनित्या सा विशुद्धेति ६७ अशनायादिनिर्मुक्तः २५१ अनुभूतेः किमन्यस्मिन् २३२ अशनायादिनिर्मुक्त्यै २२० अनेकजन्मान्तर १४६ अशनायाद्यतिक्रान्तं ७८ अन्यच्चेतसदहंग्राह २२१ अशब्दादित्वतो नास्य १६१ अन्यदृष्टिः शरीरस्थः १६९ असत्समं चैव २६६ अन्यदृष्टिस्त्वविद्या स्यात् १५० असदेतत्ततो युक्तं १५३ अन्योन्यापेक्षया तेषां २१५ असदेतत्त्रयं १५२ अन्वयव्यतिरेकाभ्यां पदार्थः २४८ असद्वयं तेऽपि हि २६५ अन्वयव्यतिरेकोस्तद् २४६ असमाधिं न पश्यामि ८६ अन्वयव्यतिरेकोक्तिः पदार्थ २४६ असिद्धितश्चापि २६६ अन्वयव्यतिरेकौ हि २१७ अस्ति तावत्स्वयं नाम १३०

उपदेश-साहस्री ३३० अस्पर्शात्वाददेहत्वात् २४१ आत्मा ह्यात्मीय इत्येष ८१ अस्पर्शत्वान्न मे ६६ आत्मैकः सर्वभूतेषु ९९ अस्पर्शोऽपि यथा स्पर्शं २४१ आदर्शमुखसामान्यं २०५ अहं कर्ता ममेदं ८ आदर्शस्तु यदाभासो २२२ अहंकर्त्रात्मनि न्यस्तं १९२ दर्शनानुविधायित्वं २०८ अहंकारादिसंतानः १९५ आधारस्याप्यसत्त्वाच्च १२७ अहंकृत्यात्मनिर्भासः १९४ आधिभेदाद्यथा भेदो २२६ अहंक्रियाद्या हि ९० आपेषात्प्रतिबुद्धस्य ५३ अहंधीरिदमात्मोत्था १७ आभासस्तदभावश्च २१३ अहं निर्मुक्त इत्येव २५४ आभासे परिणामश्चेत् २२३ अहं परं ब्रह्म ४६ आभासो यत्र तत्रैव १९३ अहं प्रत्ययबीजं यत् २१ आरब्धस्य फले होते २२ अहं ब्रह्मास्मि कर्ता च ५१ आलोकस्थो घटो यद्वत् २३८ अहं ब्रह्मास्मि सर्वोऽस्मि ७० अहं ममेति त्वमनर्थं २६० इतरेतरहेतुत्वे १३६ अहं ममेत्येषण ९० इति प्रणुन्ना द्वयवादं १४५ अहं ममैको न ३४ इतीदमुक्तं परमार्थं ४८ अहंशब्दस्य निष्ठा या २१९ इतोऽन्योऽनुभवः कश्चित् २५५ अहमज्ञासिषं चेदं २२८ इत्येतद्यावदज्ञानं ६९ अहमित्यात्मधीर्या च ८४ इत्येवं प्रतिपत्तिः स्यात् २२२ अहमेव च भूतेषु १७४ इत्येवं सर्वदाऽऽत्मानं ७३ अहमेव सदात्मज्ञः १७६ इदं तु सत्यं मम ४३ इदं पूर्वमिदं पश्चात् २४४ आत्मज्ञस्यापि यस्य ७९ इदं रहस्यं परमं १४५ आत्मनीह यथाध्यासः १९० इदं वनमतिक्रम्य १८ आत्मनो ग्रहणे चापि २२९ इदमंशोऽहमित्यत्र २९ आत्मनोऽन्यस्य चेत् १९ इहैव घटते प्रश्नो २५४ आत्मप्रत्यायिका ह्येषा १८१ आत्मबुद्धिमनेश्चक्षूरा १२४ ईक्षितृत्वं स्वतःसिद्धं ४९ आत्मबुद्धिमनेश्चक्षुः ११० ईश्वरत्वेन किं तस्य ८४ आत्मरूपविधेः कार्यं १६७ ईश्वरश्चेदनात्मा स्यात् १९ आत्मलाभः परो लाभः १३५ आत्मलाभात्परो न्यायः १४९ उत्पाद्याप्यविकार्याणि १६७ आत्माग्नेरिन्धना बुद्धिः १०४ उपलब्धिः स्वयंज्योतिः १९२ आत्मा ज्ञेयः परो १४८ एतावद्ध्यमृतत्वं न ४९ आत्मानं सर्वभूतस्थं ८५ एतेनैवात्मनाऽऽत्मानो १२२ आत्माभासस्तु तिङ्वाच्यः २०२ एवं च नेति २५० आत्माभासापरिज्ञानात् २०० एवं तत्त्वमसीत्यस्य २५० आत्माभासाश्रयश्चात्मा १९९ एवं विज्ञातवाक्यार्थे २१८ आत्माभासाश्रयश्चैवं १९८ एवं शास्त्रानुमानाभ्यां ६३ आत्माभासो यथाहंकृत् १९३ आत्मार्थत्वाच्च सर्वस्य १३४ कथं हीदं २५४ आत्मार्थोऽपि हि यो लाभः १४९ करणं कर्म कर्ता च ७७ कर्ता दुःख्यहमस्मीति २५३ कर्ताध्यक्षः सदस्मीति २१०

श्लोकानुक्रमणी ३३१

कर्त्ता भोकेति यच्छास्त्रं १८४ | चैतन्यप्रतिबिम्बेन २५ कर्तृकर्मफलाभावात् ८० | चैतन्यभास्यताहम २६ कर्तृत्वं कारकापेक्षं ६३ | चैतन्यभासता बुद्धेः २०१ कर्त्रा चेदहमित्येवं २३९ | छायाक्रान्तेर्निषेधोऽयं १९७ कर्मकार्यस्त्वनित्यः स्यात् १५१ | छित्त्वा त्यकेन हस्तेन २७ कर्मस्वात्मा स्वतन्त्रश्चेत् ९८ | जनिमज्ज्ञानविज्ञेयं ३८ कर्माणि देहयोगार्थं ३ | जन्ममृत्युप्रवाहेषु ११५ कर्मेप्सिततमत्वात्स २२५ | जाग्रत्त्वञ्च तथा भेदो १५४ कल्प्योपाधिभिरेवैतत् १५४ | जाग्रत्स्वप्नौ तयोर्बीजं १२४ कारकाण्युपमृद्नाति ९ | जातिकर्मादिमत्त्वाद्धि १९२ किमन्यद्ग्राहयेत्कश्चित् २२७ | जात्यादीन् संपरित्यज्य ९९ किं संदेवाह्रमस्तीति २२० | जिघत्सा वा पिपासा ६६ कुण्डल्यहमिति ह्येतत् २४१ | जीवश्चेत्परमात्मानं १७६ कूटस्थेऽपि फलं योग्यं २२१ | ज्ञातता स्वात्मलाभो वा २३१ कृतकृत्यश्च सिद्धश्च ७३ | ज्ञाताऽयत्नोऽपि तद्वज्ज्ञः ११४ कृपाणास्तेऽन्यथैवातो १७६ | ज्ञातुर्ज्ञातिर्हि नित्योक्ता ३८ कृष्णलादौ प्रमाजन्म २४९ | ज्ञातुर्ज्ञेयः परो ह्यात्मा ८० कृष्णाग्रो लोहिताभासम् २१३ | ज्ञातैवात्मा सदा ग्राह्यो २८ कुष्यादिवत्फलार्थत्वात् १३ | ज्ञातैवाह्मविज्ञेयः ६२ केवलां मनसो वृत्तिं १६२ | ज्ञानं ज्ञेयं तथा ज्ञाता १८२ कोशादिव विनिष्कृष्टः ५३ | ज्ञानज्ञेयादिवादेऽतः २३१ क्रियोत्पत्तौ विनाशित्वं १३७ | ज्ञानयत्नाद्यनेकत्वं १२१ क्षणवाच्योऽपि योऽर्थः २३५ | ज्ञानेनैव विशेष्यत्वात् १३९ क्षणिकं हि तदत्यर्थं १२६ | ज्ञानेकार्थपरत्वात्तं १५१ क्षीरात्सर्पिर्यथोद्धृत्य १७१ | ज्ञैकदेशो विकारो वा १९५ क्षुधया पीड्यमानोऽपि २५८ | ज्योतिषो द्योतकत्वेऽपि १२१ खमिवेकरसा ज्ञप्तिः १०२ | तं च मूढं च यद्यन्यं ५९ गन्तव्यं च तथा नैव ८७ | तच्छुद्धः प्रत्यगात्मा २४९ गुणानां समभावस्य १३५ | तत्त्वमस्यादिवाक्येषु २४० घटादिरूपं यदि ९१ | तत्त्वमोस्तुल्यनीडार्थं २४९ घ्राणादीनि तदर्थाश्च ११७ | तत्रैवं संभवत्यर्थे २४७ चक्षुर्युक्ता धियो वृत्तिः १६२ | तत्रैवं सति बुद्धीज्ञैः १०७ चक्षुर्वत्कर्मकर्तृत्वं १२० | तथा ध्रुवफला विद्या ८ चितिस्वरूपे स्वतः ३३ | तथान्येन्द्रिययुक्ता ६७ चित्तं चेतनमित्येतत् २१४ | तथान्येषां च भिन्नत्वात् १३९ चित्ते ह्यादर्शवद्यस्मात् १५६ | तथाऽविक्रियरूपत्वात् १३३ चिन्मात्रज्योतिषा सर्वाः ७६ | तथैव चेतनाभासं २१४ चिन्मात्रज्योतिषो नित्यं ८७ | तदप्यस्तीवति चेत्तन्न २१४ चेतनस्त्वं कथं देहः २२८ | तदा तु दृश्यते दुःखं २४२ चेतनोऽचेतनो वाऽपि १०८ | तदेवेकं त्रिधा ज्ञेयं १५९ चेष्टितं च यतो मिथ्या १८७ | तद्विज्ञानाय युक्त्यादि २५३ चैतन्यं सर्वगं सर्वं १ | तस्माज्ज्ञाभासबुद्धीनां २०८

३३२ उपदेश-साहस्री तस्मात्त्यक्तेन हस्तेन २७ देहात्मज्ञानवज्ज्ञानं २३ तस्मादज्ञानहानाय १४ देहात्मबुद्ध्यपेक्षत्वात् ६३ तस्मादनुभवायैव १८४ देहादावभिमानोत्थो २४० तस्मादाद्यन्तमध्येषु २५० देहाद्यारंभसामर्थ्यात् २२ तस्माद्भ्रान्तिरतोऽन्या हि १४३ देहाद्यैरविशेषेण १० तस्माद्वाक्यार्थविज्ञानात् २५६ देहाभिमानिनो दुःखं ५७ तस्मान्नीलं तथा पीतं १३६ देहेऽहंप्रत्ययो यद्वत् २०७ तस्यैवाऽज्ञत्वमिष्टं २३० द्रष्टा च दृश्यं च २६३ तापान्तत्वादनित्यत्वात् १६७ द्रष्टुश्चान्यद्द्रवेद्दृश्यं ९७ तुल्यकालसमुद्भूतौ १२९ द्वयोरेवेति चेत्तन्न १९६ त्वं कुरु त्वं तदेवेति ५७ धर्माधर्मफलैर्योगः ५२ त्वंपदार्थविवेकाय २५५ धर्माधर्मविनिर्मुक्तं १७८ त्वंसतोस्तुल्यनीडत्वात् २४२ धर्माधर्मौ ततोऽज्ञस्य ४ त्वमर्थं प्रत्यगात्मानं २५६ धीरेवाथस्वरूपा हि ७५ त्वमित्यध्यक्षनिष्ठश्चेत् २११ ध्यायतीत्यविकारित्वं १६३ त्वयि प्रशान्ते न हि २६१ ध्रुवा हानित्याश्च न २६९ दक्षिणाक्षिप्रधानेषु १०५ दग्धैवमुष्णः सत्तायां ११४ न कश्चिच्चेष्यते धर्मः २३४ ददतश्चात्मनो ज्ञानं १८२ न चास्ति शब्दादिः ८९ दशमस्त्वमसीत्येवं तत्त्वं २४४ न चेत्स इष्टः २६९ दशमस्त्वमसीत्येवं वाक्यं २४२ न चेद्भूयः प्रसूयेत १२ दशमस्य नवात्मत्व ५७ न ततोऽमृतताऽऽशास्ति ५४ दशाहाशौचकार्याणां १६६ न तस्यैवान्यतोऽपेक्षा ११२ दाहच्छेदविनाशेषु २४० न दृशेरविकारित्वात् १९८ दुःखी स्याद्दुःख्यहं मानात् १२० न दृष्टिलुप्यते द्रष्टुः १०३ दुःख्यस्मीति सति ज्ञाने २४७ ननु कर्म तथा नित्यं ६ दृशिरूपे सदा नित्ये ६० न ध्रुवफला विद्या ८ दृशिरेवानुभूयेत २५१ नन्वेवं दृशिसंक्रान्तिः २१३ दृशिस्तु शुद्धोऽहम् ४१ न प्रकाश्यं यथोष्णत्वं १३८ दृशिस्वरूपं गगनोपमं ४१ न प्रियाप्रिय इत्युक्ते ९८ दृशिस्वरूपेण हि ९० न बाह्यं मध्यतो वाऽन्तः १७४ दृशेश्छाया यदारूढा ५८ न बुद्धेरवबोधोऽस्ति २०२ दृश्यत्वादहमित्येष १०२ न बुद्धेर्बुद्धिवाच्यत्वं २०३ दृष्टं चापि यथा रूपं १५३ न मेऽस्ति कश्चिन्न च २६४ दृष्टं जागरितं विद्यात् १५८ न मेऽस्ति मोहस्तव २६२ दृष्टं हित्वा स्मृतिं तस्मिन् १०९ न मे हेयं न चादेयं ७२ दृष्टवच्चेत्प्ररोहः स्यात् २१ न येषामेक एवात्मा २०४ दृष्टिः श्रुतिर्मतिर्ज्ञातिः ८३ नवबुद्ध्यवहारार्द्धि २४४ दृष्टिः स्पृष्टिः श्रुतिघ्रातिः १८८ न सच्चाहं न चासच्च ७१ द्रष्टृदृश्यत्वसंबन्धः २११ न स्मरेदात्मनो ह्यात्मा ७९ द्रष्टृ श्रोतॄ तथा मन्तृ ८१ न स्वयं स्वस्य नान्यश्च १८० दृष्ट्वा बाह्यं निमील्याथ १७० न ह्याजात्यादि १९३ देहलिङ्गात्मना कार्या ५४ न हस्ती न तदारूढो १६०

श्लोकानुक्रमणी ३३३ न हि दीपान्तरापेक्षा १६४ प्रकृतिप्रत्ययार्थौ यो २०१ न हि सिद्धस्य कर्तव्यं २५२ प्रज्ञाप्राणानुकार्यात्मा ८६ न हीह लाभोऽभ्यधिकः १४७ प्रतिबन्धविहीनत्वात् २२० नात्माभासत्वसिद्धिश्चेत् २२४ प्रतिलोममिदं सर्वं २१६ नाद्राक्षमहमित्यस्मिन् २१७ प्रतिषिद्धेदंमंशो ज्ञः ६१ नानयोर्ह्याश्रयत्वं च २०२ प्रतिषेद्धुमशक्यत्वात् १६ नान्यदन्यद्द्भवेद्यस्मात् ९५ प्रत्यक्षमनुमानं च २३६ नान्येन ज्योतिषा कार्यं ११२ प्रत्यक्षादीनि बाधेरन् २४७ नाप्यतो भावशब्देन २०२ प्रत्यगात्मन आत्मत्वं २४८ नामजात्यादयो यद्वत् २३६ प्रत्ययी प्रत्ययश्चैव २२१ नामरूपक्रियाभ्योऽन्यो ५१ प्रत्ययायस्तु तस्यैव १४ नामादिभ्यः परे भूम्नि १७३ प्रथमं ग्रहणं सिद्धिः २२७ नाहोरात्रे यथा सूर्ये ११५ प्रधानस्य च पारार्थ्यं १३६ नित्यमुक्तः सदेवास्मि १८३ प्रबोधरूपं मनसो ९३ नित्यमुक्तत्वविज्ञानं २४८ प्रबोधेन यथा स्वप्नं २४९ निमीलोन्मीलने स्थाने १२१ प्रमथ्य वज्रोपम १८३ नित्यमुक्तस्य शुद्धस्य ६५ प्रयुज्य तृष्णाज्वर २६० नियोगोऽप्रतिपन्नतवात् १८६ प्रशान्तचित्ताय १४६ निर्गुणं निष्क्रियं नित्यं १७९ प्रसन्ने विमले व्योम्नि ८५ निर्दुःखवाचिना योगात् २४२ प्रसिद्धिमंढलोकस्य २०५ निर्दुःखोऽतीतदेहेषु १८८ प्रागेवैतद्विधेः कर्म १६५ निर्दुःखो निष्क्रियोऽकामः २५३ प्राणाद्येवं त्रिकं हित्वा १७० निवृत्ता सा कथं भूयः ११ प्राप्तश्चेत्प्रतिषिध्येत १९० निश्चयार्था भवेद्बुद्धि ११८ प्रामाण्येऽपि स्मृतेः २२९ नेति नेतीति देहादीन् १० फलान्तं चानुभूतं यत् ९६ नेति नेत्यादिशास्त्रेभ्यः १७५ फले च हेतौ च ३५ नैककारकसाध्यत्वात् १३ बन्धं मोक्षं च सर्वं १७९ नैतदेवं रहस्यानां १८७ बाध्यते प्रत्ययेनेह २४० नैतद्देयमशान्ताय १८१ बाह्याकारवतो ज्ञसेः १२७ नैवं स्वप्ने पृथक्सिद्धिः २२४ बिलासर्पस्य निर्याणे ११३ नौस्थस्य प्रातिलोम्येन २५ बीजं चैकं यथा भिन्नं १५९ पदवाक्यप्रमाणज्ञैः १४८ बुद्धिस्थश्चलतीवात्मा २४ परलोकभयं यस्य ८४ बुद्धीनां विषयो दुःखं २५१ परस्य देहे न यथा १४६ बुद्धेः कर्तृत्वमध्यक्ष्य २०६ पारगस्तु यथा नद्याः ७८ बुद्धेस्तु प्रत्ययास्तस्मात् २०८ पार्थिवः कठिनो धातुः ११७ बुद्धौ चेत्तत्कृतः कश्चित् २२३ पुत्रदुःखं यथाध्यस्तं १८९ बुद्धौ दृश्यं भवेद्बुद्धौ ३२ पूर्वा स्यात्प्रत्ययव्याप्तिः २३८ बुद्धयर्थान्याहरेतानि ११८ पूर्वदेहपरित्यागे १६५ बुद्ध्यादीनामनात्मत्वं ७७ पूर्वबुद्धिमबाधित्वा १७ बुद्ध्यादौ सत्युपाधौ ८५ पूर्वोक्तं यत्तमोबीजं १७१ बुद्ध्यारूढं सदा सर्वं दृश्यते ३० पृष्टमाकांक्षितं वाच्यं २५४ बुद्ध्यारूढं सदा सर्वं सा २१६ प्रकाशस्थं यथा देहं ५६ बुभुत्सोर्यदि चान्यत्र २०

३३४ उपदेश-साहस्री बोधस्यात्मस्वरूपत्वात् १४२ मोक्षोऽवस्थान्तरं यस्य १३३ बोधात्मज्योतिषा दीप्ता १४२ य आत्मा नेति नेतीति ७८ बौद्धैस्तु प्रत्ययैरेवं २०७ यतश्च नित्योऽहमतो २६२ ब्रह्मा दाशरथेर्यद्वत् २१८ यतो न चान्यः पर २६१ ब्रह्माद्याः स्थावरान्ता ये ३७ यतोभूत्वा भवेद्याच्च ११३ ब्रह्मास्मीति च विज्ञेयं २५७ यत्कामस्तत्क्रतुर्भूत्वा १६६ भवाभवत्वं तु न २६७ यत्र यस्यावभासस्तु २०६ भानोर्बिम्बं यथा चौष्ण्यं १६२ यत्स्थस्तापो रवेर्देहे ६० भारूपत्वाद्यथा भानोः १७४ यथात्मबुद्धिचाराणां ३० भिक्षामटन् यथा स्वप्ने ७४ यथानुभूयते तृप्तिः २५० भिद्यते हृदयग्रन्थिः ११६ यथान्यत्वेऽपि तादात्म्यं ८३ भूतदोषैः सदाऽस्पृष्टं ३७ यथा विद्या तथा कर्म ७ भूतिर्येषां क्रिया सैव २३३ यथा विशुद्धं गगनं ९२ भेदाभावेऽप्यभावस्य २३५ यथा सर्वान्तरं व्योम ६४ भेदोऽभेदस्तथा चैको ७२ यथा ह्यन्यशरीरेषु १०० मंच्चैतन्यावभास्यत्वम् ३८ यथेष्टाचरणप्राप्तिः २५७ मणौ प्रकाशयते यद्वत् ३१ यथोक्तं ब्रह्म यो वेद ११५ मदन्यः सर्वभूतेषु ७० यदद्वयं ज्ञानमतीव ४७ मनसश्चेन्द्रियाणां च १५७ यदा नित्येषु वाक्येषु २४५ मनोबुद्धीन्द्रियाणां च १०६ यदाभासेन संन्यासः २२५ मनोवृत्तं मनश्चैव ५० यदायं कल्पयेद्भेदं १५५ ममात्मास्य त आत्मेति ७२ यदाहंकर्तुरात्मत्वं २०४ ममाहंकारयत्नेच्छाः ८२ यदेव दृश्यते लोके ५६ ममाहं चेत्यतोऽविद्या १६६ यद्धर्मा यः पदार्थो १२२ ममाहमित्येतदपोह्य ११६ यद्येवं नान्यदृश्यास्ते २०९ ममेदं द्वयमप्येतत् २१६ यद्वाक्सूर्यांशुसंपात १४९ ममेदं प्रत्ययो ज्ञेयौ २१५ यन्मनास्तन्मयोऽन्यत्वे १०१ ममेदमित्थं च तथे ४७ यस्माद्भीताः प्रवर्तन्ते १७२ महाराजादयो लोका ५४ यस्मिन् देवाश्च वेदाश्च ८९ माधुर्यादि च यत्कार्यं १९८ या तु स्यान्मानसी ६६ मानसे तु गृहे व्यक्तः १०५ या माहारजनाद्यास्ता ५२ मानस्र्यस्तद्वदन्यस्य ६७ यावान् स्यादिदमंशो यः २८ मायाहस्तिनमारुह्य १५९ युगपत्समवेतत्वं १३८ मिथश्च भिन्ना यदि २६४ येन वेत्ति स वेदः स्यात् १५४ मिथ्याध्यासनिषेधार्थं २० येन स्वप्नगतो वक्ति १५४ मुखादन्यो मुखाभासः १९४ येनात्मना विलीयन्ते १८३ मुखेन व्यपदेशात्स १९६ येनाधिगम्यतेऽभावः १३० मूढया मूढ इत्येवं ६८ यो वेदालुप्तदृष्टित्वं ६१ मूत्राशङ्को यथोदङ्को २४ योऽहंकर्तारमात्मानं ८२ मूषासिक्तं यथा ताम्रं ७५ यो हि यस्मात् २५८ मृषाध्यासस्तु यत्र स्यात् १२९ रज्जुसर्पो यथा रज्ज्वा १९९ मोक्षस्तन्नाश एव स्यात् १४३ रहस्यं सर्ववेदानां १८१

गद्यभाग ३: परिसंख्यानप्रकरणम्

श्लोकानुक्रमणी ३३५ रागद्वेषक्षयाभावे ६ व्यक्तिः स्यादप्रकाशस्य ११२ राजवत् साक्षिमात्रत्वात् १७९ व्यंजकत्वं तदेवास्या ७६ राहोः प्रागेव वस्तुत्वं १९७ व्यंजकस्तु यथाऽऽलोकः ११९ रूपवत्त्वाद्यसत्त्वान्न ३९ व्यंजको वा यथाऽऽलोको ७५ रूपसंस्कारतुल्याधी १०१ व्यवधानाद्धि पारोक्ष्यं १६४ रूपस्मृत्यन्धकारार्थाः ११० व्यस्तं नाहं समस्तं वा १०४ रूपादीनां यथान्यः स्यात् २३६ व्यापकं सर्वतो व्योम १०९ वाक्यार्थप्रत्ययी कश्चित् १८७ व्याप्तुमिष्टं च यत्कर्त्तुः २३० वाक्यार्थो व्यज्यते चैवं २४६ व्योमवत् सर्वभूतस्थो ५१ वाक्ये तत्त्वमसीत्यस्मिन् २४९ व्रणस्नाय्वोरभावेन १०० वाक्यं हि श्रूयमाणानां २४५ शक्त्यलोपात्सुषुप्ते ज्ञः १६३ वाचारंभणमात्रत्वात् १७३ शब्दादीनामभावश्च ६८ वाचारंभणशास्त्राच्च १३१ शब्दाद्वाऽनुमितेर्वापि २३० वाच्यभेदात्तु तद्भेदः १५१ शब्दानांमयथार्थत्वे २०४ वाथ्वादीनां यथोत्पत्तेः ३७ शब्देनैव प्रमाणेन २२७ वासुदेवो यथाऽश्वत्थे १०० शरीरबुद्धीन्द्रिय ४३ विकल्पना चाप्यभवे २६५ शरीरबुद्ध्योर्यदि ९१ विकल्पनाच्चापि २६७ शरीरेन्द्रियसंधातः ११९ विकल्पना वापि तथा २६३ शान्तं प्राज्ञं तथा मुक्तं १६८ विकल्पोऽद्भवतोऽसत्त्वं १३१ शान्तेशचायतनसिद्धत्वात् १२८ विकारित्वमशुद्धत्वं ३१ शारीरादि तपः कुर्यात् १५७ विक्षेपो नास्ति तस्मान्मे ६९ शारीरा पृथिवी तावत् १६ विज्ञातुनैव विज्ञाता ६१ शास्त्रप्रामाण्यतो ज्ञेया १८४ विज्ञातेर्यस्तु विज्ञाता ५९ शास्त्रयुक्तिविहीनत्वात् १४४ विदिताविदिताभ्यां ११५ शास्त्रस्यानतिशक्यत्वात् १७४ विद्यया तारिताः स्मो यैः १८२ शास्त्राद्ब्रह्मास्मि नान्योऽहं २५७ विद्यायाः प्रतिकूलं हि ८ शास्त्रानर्थक्यमेव स्यात् १४२ विद्याऽविद्ये श्रुतिप्रोक्ते १५६ शिरोदुःखादिनात्मानं १२० विद्यैवाऽज्ञानहानाय ६ शून्यताऽपि न युक्तैवं १२२ विमथ्य वेदोदधितः २७१ श्रद्धाभक्ती पुरस्कृत्य १४४ विमुच्य मायामय ३३ श्रुतमात्रेण चेन्न स्यात् २१९ विराड्वैश्वानरो बाह्य १७३ श्रुतानुमानजन्मानौ १८७ विरुद्धत्वदतः शक्यं ९ श्रुतेः स्वात्मनि नाशङ्का २५५ विविच्य्मास्मात् स्वमात्मानं ११० श्रोतुः स्यादुपदेशश्चेत् २२३ विवेकात्मधिया दुःखं २४१ श्रोतृश्रोतव्ययोर्भेदी २५२ विशुद्धिश्चात एवास्य १३२ षडूर्गिमालाभ्यतिवृत्त २६१ विशेषणमिदं सर्वं २८ संकल्पाध्यवसायौ १२५ विशेषो मुक्तबद्धानां १३६ संघातो वाऽस्मि भूतानां १०३ विषयग्रहणं यस्य २३८ संनिधौ सर्वदा तस्य १९२ विषयत्वं विकारित्वं १६४ सम्बन्धग्रहणं शास्त्रात् २१२ विषया वासना वापि १०६ सम्बन्धानुपपत्तेश्च १३७ वेदान्तवाक्यपुष्पेभ्यो २५९ संभाव्यो गोचरे शब्दः १९१ वेदार्थो निश्चितो ह्येष ७३

३३६ उपदेश-साहस्री

संयोगस्याप्यनित्यत्वात् १३३ सिद्धादेवाहमित्यस्मात् १८४ संवादमेतं यदि ३५ सिद्धिः स्यात्स्वात्मलाभश्चेत् २३१ संसारिणां कथा त्वास्तां १९६ सिद्धे दुःखित्व इष्टं २४१ संसारी च स इत्येक १९४ सिद्धो मोक्षस्त्वमित्येतत् २५२ संसारो वस्तुसंस्तेषां २०० सिद्धो मोक्षोऽहमित्येवं २५२ सकामः सक्रियोः सिद्ध २५३ सुखादेनर्तिमधर्मत्वं १३९ सकृदुक्तं न गृह्णाति १८६ सुषुप्तजाग्रत्स्वपत्तश्च ४२ स गुरुस्तारयेद्युक्तं १६८ सुषुप्तवज्जाग्रति ४७ स चोक्तस्तन्निभत्वं प्राक् २३७ सुषुप्त्याख्यं तमोऽज्ञानं १५८ सत्तामात्रे प्रकाशस्य ११३ सूक्ष्मताव्यापिते ज्ञेये ३६ सत्यं ज्ञानमनन्तं च १७२ सूक्ष्मैकागोचरेभ्यश्च १४१ सत्यमेवमनामार्यं २५० सेतुं सर्वव्यवस्थानां १७७ सदभ्युपेतं भवतोप २६५ सेत्स्यतीत्येव चेत्तत्स्यात् २५१ सदसत्सदसच्चेति १३० सोऽध्यासो नेतीति १९० सदसीति फलं चोक्त्वा १८८ सोपाधिश्चैवमात्मोक्तो १०७ सदस्मीति च विज्ञानं १७७ स्थानावच्छेददृष्टिः १२५ सदस्मीति धियोऽभावे २१५ स्थावरं जंगमं चैव ८१ सदस्मीति प्रमाणोत्था १८५ स्थितो दीपो यथाऽयत्नः ११९ सदा च भूतेषु समोऽहं ४५ स्पष्टत्वं कर्मकर्त्रादेः २३२ सदा च भूतेषु समोऽस्मि ३४ स्मरतो दृश्यते दृष्टं ९६ सदेरूपनिपूर्वस्य १५ स्यान्मालाऽपरिहार्या तु १४० सदेव त्वमसीत्युक्ते १८६ स्वप्नः सत्यो यथाऽऽबोधात् ५० सदेवेत्यादिवाक्येभ्यः २४९ स्वप्नस्मृत्योर्घटादेर्हि ७४ सद्ब्रह्माहं करोमीति १८४ स्वप्ने तद्वत्प्रबोधे यो १५५ सबाह्याभ्यन्तरे शुद्धे ७७ स्वप्ने दुःख्यहमध्यासं २४८ स बाह्याभ्यन्तरोऽजीर्णो १६४ स्वभावशुद्धे गगने ९४ स भयादभयं प्राप्तः २५७ स्वयं ज्योतिर्न हि द्रष्टुः २१८ समं तु तस्मात्सततं २७० स्वयं लब्धस्वभावत्वात् १५० समस्तं सर्वगं शान्तं १११ स्वयंवैद्यत्वपर्यायः २५० समाधिर्वाऽसमाधिर्वा ६९ स्वयमेवावभास्यन्ते २०८ समापय्य क्रियाः सर्वा २ स्वरूपं चात्मनो ज्ञानं २०६ समाप्तेस्तर्हि दुःखस्य २४८ स्वरूपत्वान्न सर्वस्य १३४ सम्यक् संशयमिथ्योक्ताः २२६ स्वरूपस्यानिमित्तत्वात् १३३ सर्वज्ञोऽप्यत् एव १०७ स्वरूपाव्यवधानाभ्यां १११ सर्वप्रत्ययसाक्षित्वात् १०३ स्वलक्षणावधिनशः २३४ सर्वप्रत्ययसाक्षी ज्ञः १११ स्वसाक्षिकं ज्ञानं १४५ सर्वमात्मेति वाक्यार्थे २५६ स्वाकारान्यावभासं १२६ सर्वमूर्तिवियुक्तं यत् ७१ स्वात्मबुद्धिमपेक्ष्यासौ ९७ सर्वस्यात्माऽहमेवेति १७५ स्वार्थस्य ह्यप्रहाणेन २४३ सर्वेषां मनसो वृत्तं ५० हन्त तर्हि न मुख्यार्थो २०४ साक्षादेव स विज्ञेयः १६१ हित्वा जात्यादिसम्बन्धान् १७७ सादित्यं हि जगत्प्राणः ७९ हूयन्ते तु हवींषीति १०५