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उपदेशसाहस्री (श्रीमच्छङ्करभगवत्पाद विरचिता - 'हृदयस्पर्शिनी' हिन्दी टीका सहित)

Upadesha Sahasri with Hridayasparshini Hindi Commentary

आदि शङ्कराचार्य / पं. गजानन शास्त्री मुसलगांवकर द्वारा

स्रोत: महेश अनुसन्धान संस्थान माउंट आबू · महेश अनुसन्धान संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished364 पृष्ठ

उपोद्घातप्रकरणम् १३ गई है। अथवा संन्यास के उपायभूत ज्ञान की स्तुति की गई है। अतः निन्दित की अनुपादेयता (अग्राह्यता) और स्तुत को उपादेयता (ग्राह्यता) होने से तथा मोक्ष को कर्मसापेक्ष मानने पर संन्यासविधि की अनुपपत्ति होने से आत्मज्ञानरूप संन्यास ही मोक्ष का साधन है, यह स्पष्ट हो जाता है। श्लोक में आये हुए 'अतः' शब्द का अर्थ 'ज्ञान की कर्मनिरपेक्षता' है। इस कारण 'अत एव' का अर्थ होगा कि अपनी फलप्राप्ति में ज्ञान की कर्मनिरपेक्षता के कारण ही श्रुति ने ज्ञान (संन्यास) की स्तुति की है। उसी तरह एक अन्य श्रुतिलिङ्ग भी बता रहे हैं—वाजसनेयी शाखा के उपनिषद् में भी 'आत्मनि खल्वरे दृष्टे श्रुते मते विज्ञात इदं सर्वं विदितम्' यह उपक्रम कर अद्वय आत्मतत्त्व का दुन्दुभि आदि के दृष्टान्त द्वारा उपपादन किया है। तदनन्तर 'उक्तानुशासनासि मैत्रेय्येतावदरे खल्वमृतत्वम्' वाक्य से ज्ञान में अमृतत्वसाधनता का अवधारण (निश्चय) करना ही उसकी (ज्ञान की) कर्मनिरपेक्षता में लिङ्ग बताया है। अन्यथा 'एतावत्' इस अवधारण वचन की उपपत्ति नहीं हो पायगी। 'अमृतत्वस्य तु नाशाऽस्ति वित्तेन' इस वाक्य के द्वारा बताये गये वित्तसाध्य कर्म में अमृतत्व- साधन के न होने में लिङ्ग का अनुसन्धान कर लेना चाहिये। 'विद्यां च अविद्यां च' वाक्य से विहित समुच्चय से विरोध भी नहीं है। क्योंकि यह वचन देवतोपासना में ज्ञान-कर्म के समुच्चय को बता रहा है। अन्यथा 'हिरण्मयेन पात्रेण' 'अग्ने नय सुपथा' इत्यादि वाक्यों से की गई मार्गयाचना आदि की उपपत्ति नहीं हो पायगी। 'न कर्मणा न प्रजया धनेन त्यागेनैके अमृतत्वमानशुः', "त्याग एव हि सर्वेषां मोक्षसाधनमुत्तमम् । त्यजेतैव हि तज्ज्ञेयं त्यक्तुः प्रत्यक् परं पदम् ॥" इत्यादि शास्त्रवाक्यों के द्वारा जब कि त्यागोपलक्षित आत्मज्ञान को ही मुक्ति का साधन बताया गया है, इसलिये साधन- चतुष्टयसम्पन्न तत्त्वजिज्ञासु मुमुक्षुओं को कर्म का त्याग कर देना चाहिये। जबकि विविदिषु को भी कर्म का अवसर नहीं है तब विद्वान् के लिये कर्म के अवसर की कथा का प्रसंग ही कहाँ है ? अतः मोक्ष की अपेक्षा होने पर कर्मसंन्यासपूर्वक ज्ञाननिष्ठ ही होना चाहिये ॥ २० ॥ अब अग्निष्टोम का दृष्टान्त बताकर ज्ञान में कर्म की सापेक्षता को समुच्चयवादी ने बताया था उसका उत्तर अग्रिम श्लोक के द्वारा दिया जा रहा है ॥ २०-२१ ॥ नैककारकसाध्यत्वात् फलान्यत्वाच्च कर्मणः । विद्या तद्विपरीताऽतो दृष्टान्तो विषमो भवेत् ॥ २२ ॥ नैकेति—कोई भी कर्म एक कारक से साध्य नहीं है अर्थात् अनेक कारकों से हो पाता है तथा उस कर्म के फल भी भिन्न हैं, और उसके विपरीत ज्ञान का स्वभाव है। इसलिये अग्निष्टोम का दृष्टान्त देना उचित नहीं है ॥ २२ ॥ हृदयस्पर्शिनी अग्निष्टोमादि कर्मों की निष्पत्ति अनेक कारकों से हो पाती है, अर्थात् तत्तत् कर्मों के द्रव्य, मन्त्र, तन्त्र, प्रयोग नियत रहते हैं; उनसे तत्तत्कर्मों का सम्पादन किया जाता है। उसी तरह विद्या और कर्म के फल में भी भेद है। छान्दोग्य- श्रुति कहती है कि विद्या द्वारा (अर्थज्ञान के साथ) जो कर्म किया जाता है, उससे वीर्यवत्तर फलविशेष की प्राप्ति होती है। इसलिये कर्म को सहकारी की अपेक्षा रहना उचित है। किन्तु विद्या के विषय में ऐसी बात नहीं है। अर्थात् कर्मस्वभाव के विपरीत स्वभाव, विद्या का है। ज्ञान तो वस्तुपरतन्त्र है अर्थात् यथावस्त्वधीन है और प्रमाणनिबन्धन है तथा निरतिशय मोक्ष ही उसका एकमात्र फल है। इसलिये उसे (विद्या को) किसी सहकारी की अपेक्षा नहीं होती। एवञ्च कर्म और विद्या दोनों के स्वभाव में भेद होने से अग्निष्टोम का दृष्टान्त प्रस्तुत दाष्ट्रान्तिक के अनुरूप नहीं है ॥ २२ ॥ कृष्यादिवत् फलार्थत्वादन्यकर्मोपबृंहणम् । अग्निष्टोमस्त्वपेक्षेत विद्यान्यत् किमपेक्षते ॥ २३ ॥

१४ उपदेशसाहस्री कृष्यादिवदिति—अग्निष्टोम का फल सातिशय है, इसलिये उसे कृषि आदि के समान अन्यान्य कर्मों की सहायता की आवश्यकता होती है। किन्तु ज्ञान (विद्या) का फल सातिशय न होने से उसे किस अन्य वस्तु की अपेक्षा हो सकती है ? ॥ २३ ॥ हृदयस्पर्शिनी पूर्वश्लोक में बताया गया था कि अग्निष्टोम का दृष्टान्त विषम ( अननुरूप ) है, उसी विषमता को इस श्लोक के द्वारा बताया जा रहा है—कृषि, वाणिज्य आदि में सामग्रीबाहुल्य और फलबाहुल्य के कारण उसे सहकारी की अपेक्षा हुआ करती है। तदनुसार अग्निष्टोम कर्म के विषय में भी कह सकते हैं—'अग्निष्टोमः सातिशयः साध्यफलार्थत्वात् कृष्यादिवत्।' कृषि, वाणिज्य आदि में फल के उपचय ( वृद्धि ) के लिये साधनविशेष के उपचय ( वृद्धि ) की आवश्यकता का होना जैसे प्रसिद्ध है, वैसे ही अग्निष्टोम कर्म को भी अन्यकर्मोपबृंहण आवश्यक होता है। अर्थात् अपने अन्य सहकारी विधिविहित उद्गथादि- अंगसंश्रित उपासनादिरूप कर्मों के द्वारा फलाधिक्य के लिये वह अपना उपबृंहण चाहता है। किन्तु विद्या तो निरतिशय- फलवाली है, अतः उसे अन्य किसी सहकारी की अपेक्षा नहीं होती। सहकारियों की न्यूनाधिकता पर फल की न्यूनाधिकता ( फल के अतिशय में न्यूनाधिकता ) निर्भर रहती है किन्तु जहाँ फल निरतिशय ( सातिशय नहीं ) है, वहाँ किसलिये और क्यों कर सहकारी की अपेक्षा होगी ? अर्थात् नहीं ही होगी ॥ २३ ॥ प्रत्यवायस्तु तस्यैव यस्याहङ्कार इष्यते । अहङ्कारफलार्थित्वे विद्येते नात्मवेदिनः ॥ २४ ॥ प्रत्यवाय इति—प्रत्यवाय भी उसी को हो सकता है, जिसे अहंकार हो। आत्मज्ञानी को न अहंकार है और न फल की इच्छा ही है। आत्मज्ञानी में दोनों का अभाव रहता है ॥ २४ ॥ हृदयस्पर्शिनी समुच्चयवादी ने 'अकुर्वन् विहितं कर्म' इस प्रत्यवायस्मृति को उपस्थित किया था, वह स्वाभाविक अहंकारवाले अधिकारी के लिये है, वह यदि विधिविहित कर्म का अनुष्ठान न करे तो उसके लिये वह स्मृति प्रत्यवाय बता रही है। 'इस कर्म का मैं कर्ता हूँ, इस कर्म का अनुष्ठान कर उसके फल को मैं प्राप्त करूंगा' यही अहंकार का स्वरूप है। ऐसे अहंकारी अधिकारी के लिये उपर्युक्त स्मृति, प्रत्यवाय को बता रही है। आत्मतत्त्वज्ञाननिष्ठ पुरुष को न अहंकार है और न फल की इच्छा ही है, क्योंकि विषय रहने पर ही अहंकार होता है। उसकी दृष्टि में कोई विषय ही नहीं रहता। अतः अहंकाररूप निमित्त न होने से उसे प्रत्यवाय कैसे हो सकता है ? इसलिये ज्ञानी तथा अज्ञानी दोनों में समान अहंकार समझ कर नित्य- कर्म के अननुष्ठान ( अकरण ) से उसे भी प्रत्यवाय होगा, ऐसी शंका नहीं करनी चाहिये ॥ २४ ॥ तस्मादज्ञानहानाय संसारविनिवृत्तये । ब्रह्मविद्याविधानाय प्रारब्धोपनिषत्त्वियम् ॥ २५ ॥ तस्मादिति—अतः अज्ञान की निवृत्ति के लिये तथा संसार का बाध और ब्रह्मज्ञान की प्राप्ति के लिये इस उपनिषद् का प्रारंभ किया जा रहा है ॥ २५ ॥ हृदयस्पर्शिनी काठकोपनिषद् में 'विद्यैवाज्ञानहानाय न कर्मप्रतिकूलतः' ऐसा उपक्रम कर कर्म स्वतन्त्ररूप से अथवा ज्ञान की सहायता से अर्थात् किसी भी प्रकार से मोक्षप्राप्ति कराने में साक्षात् कारण ( हेतु ) नहीं है यह उपपादन किया गया है। तदनन्तर 'ब्रह्मविद्यामथेदानीं वक्तुं वेदः प्रचक्रमे' के द्वारा ब्रह्मविद्या का प्रारंभ बताया गया है। श्लोक में 'तस्मात्' शब्द है, यहाँ 'तत्' शब्द का अर्थ कर्मनिरपेक्षता है। अर्थात् विद्या की कर्मनिरपेक्षता के कारण अनादि अज्ञान के निरास के लिये

उपोद्घातप्रकरणम् १५ अपेक्षित ब्रह्मविद्या के सम्पादनार्थ यह परा उपनिषत् अर्थात् वेदान्तभाग का प्रारंभ किया गया है। यहाँ पर 'उपनिषत्' शब्द का प्रयोग लक्षणा से वेदान्तग्रन्थों के लिये किया गया है। श्लोक में आया हुआ 'संसारविनिवृत्तये' पद 'अज्ञानहान' का विशेषण है। अर्थात् 'संसार की सम्यक् निवृत्ति जिससे होती है' यह विग्रह है। इस प्रकार इसे विशेषण कहने पर उसका नपुंसकलिङ्ग में प्रयोग करना चाहिये था। अतः उसके अक्लीबत्व प्रयोग को आर्ष समझना चाहिये। एवं च ब्रह्मविद्या स्वतंत्ररूप से कार्यसहित अज्ञान की निवर्तक है, यह स्पष्ट हो जाता है ॥ २५ ॥ सदेरुपनिपूर्वस्य क्विपि चोपनिषद्भवेत् । मन्दीकरणभावाच्च गर्भादेः शातनात्तथा ॥ २६ ॥ सदेरिति—उप और नि उपसर्गपूर्वक 'सद्' धातु से 'क्विप्' प्रत्यय करने पर 'उपनिषद्' शब्द की निष्पत्ति होती है और गर्भ, जन्म, जरा, मरण को शिथिल करने तथा उनकी समाप्ति करने के कारण भी इसे उपनिषद् कहते हैं ॥ २६ ॥ हृदयस्पर्शिनी 'उपनिषद्' नाम के निर्वचन से भी स्पष्ट होता है कि ब्रह्मात्मविद्या स्वतन्त्र रूप से मोक्ष की कारण है। 'षदॢँ (सद्) विशरण-गत्यवसादनेषु'—विशरण, गति, अवसादन अर्थ में 'षदॢ' धातु है और सामीप्य अर्थ में 'उप' तथा निश्चय अर्थ में 'नि' उपसर्ग हैं। एवं च उप + नि + सद् धातु से कर्त्रर्थ में (कर्ता के अर्थ में) 'क्विप्' प्रत्यय के करने पर 'उपनिषद्' पद सिद्ध होता है। 'षदॢ' धातु के तीनों अर्थ ब्रह्मविद्या में संभव होते हैं। अतः मुख्यवृत्ति से ब्रह्मविद्या को ही उपनिषद् कहते हैं और ब्रह्मविद्या के लिये ही ग्रन्थ के होने से उसे (ग्रन्थ को) भी उपनिषद् कहते हैं। उपर्युक्त धातु के तीनों अर्थों का ब्रह्मविद्या में उपयोग इस प्रकार होता है—(१) जो मन्दविद् हैं, उनके गर्भ, जन्म, जरा आदि को 'उपनिषादयति' अर्थात् शिथिल करती है वह ब्रह्मविद्या, इसलिये उसे 'उपनिषद्' कहा जाता है। (२) जिज्ञासुओं को उनके समीप एवं निश्चित रूप से ब्रह्म की प्राप्ति करा देती है वह ब्रह्मविद्या, इसलिये उसे 'उपनिषद्' कहा जाता है। (३) ब्रह्मतत्त्व का साक्षात्कार किये हुए तत्त्वविदों के सबीज गर्भादि का नाश कर देती है, वह ब्रह्मविद्या, इस कारण उसे उपनिषद् कहा गया है। इस प्रकार ब्रह्मविद्या में ही धात्वर्थ के संघटित हो पाने से उसी (विद्या) में उपनिषद्वाच्यता सिद्ध होती है। निष्कर्ष यह है कि ब्रह्मविद्या की उपनिषत् नाम से प्रसिद्धि होने के कारण, मोक्ष की हेतुभूत उस ब्रह्मविद्या के प्रतिपादक वेदान्तग्रन्थों को भी 'लाङ्गलं जीवनम्' की तरह 'उपनिषद्' शब्द से कहा जाता है ॥ २६ ॥ ॥ इति उपोद्घातरूपं प्रथमं चैतन्यप्रकरणं समाप्तम् ॥

पद्यभाग २: प्रतिषेधप्रकरणम्

प्रतिषेधप्रकरणम् प्रतिषेद्धुमशक्यत्वान्नेति नेतीति शेषतम् । इदं नाहमिदं नाहमित्यद्धा प्रतिपद्यते ॥१॥ प्रतिषेद्धुमिति—'स एष नेति नेत्यात्मा गृह्यते'— यह आत्मा नहीं है, यह आत्मा नहीं है, इस प्रकार अनात्म- रूप देह, इन्द्रिय आदि का निषेध करते करते, जिसका निषेध नहीं हो पाया अर्थात् निषेध के योग्य न होने के कारण जो शेष (बच) रहा, वही आत्मा है। 'यह मैं नहीं हूँ, यह मैं नहीं हूँ' इस रीति से प्रतिषेध करते करते ही उस आत्मा की साक्षात् उपलब्धि हो जाती है ॥ १ ॥ हृदयस्पर्शिनी प्रथम प्रकरण के द्वारा यह बताया गया था कि मोक्ष की साधनभूत ब्रह्मात्मविद्या ( ब्रह्मात्मक्यज्ञान ) के अवगम के लिये वेदान्त का आरम्भ करना आवश्यक है। किन्तु एक जिज्ञासा उत्पन्न होती है कि विद्योपदेश ( ब्रह्मविद्या के उपदेश ) के लिये वेदान्त का आरम्भ करना तब संगत हो सकता है कि जब विद्योदय ( ज्ञानोदय ) की संभावना हो । आत्मा का संसारित्व तो ( मैं संसारी हूँ ) सभी को प्रत्यक्ष ( अनुभव ) सिद्ध है। ऐसी स्थिति में संसारित्वग्राहक प्रत्यक्षादि प्रमाण के विरुद्ध वेदान्त के सैकड़ों वाक्य भी उपदेश करें तो भी ब्रह्मात्मैकत्वविद्या ( ब्रह्मात्मैक्यज्ञान ) का उदय होना कभी संभव नहीं हो सकता । यदि यह कहें कि प्रत्यक्ष प्रमाण की तरह आगम ( शब्द ) भी तो प्रमाण है। प्रत्यक्ष प्रमाण आत्मा के संसारित्व को बताता है तो आगम प्रमाण उसकी ब्रह्म के साथ एकता ( ब्रह्मात्मैक्य ) को बता रहा है। अतः दोनों बातें प्रमाणसिद्ध होने से दोनों को माना जा सकता है। किन्तु यह कथन उचित नहीं है, क्योंकि प्रत्यक्ष प्रमाण असंजातविरोधी है और आगम ( शब्द ) प्रमाण प्रत्यक्षोपजीवी है। अतः असंजातविरोधिन्‍याय से प्रत्यक्षप्रमाण को ही प्रबल कहा जायगा और आगम प्रमाण तदुपजीवी होने से दुर्बल रहेगा । एवंच दोनों प्रमाण होनेपर भी उनमें समानता नहीं है, अपितु प्रबल-दुर्बल भाव है। अतः दुर्बल आगम प्रमाण से ब्रह्मात्मविद्या का उदय कैसे संभव हो सकता है ? जिसके लिये वेदान्त के आरम्भ करने की आवश्यकता होगी । तुष्यतुदुर्जनन्याय से दुर्बल आगम प्रमाण के द्वारा ब्रह्मात्मविद्या ( ब्रह्मात्मैक्यज्ञान ) का उदय ( उत्पत्ति ) होना मान लिया जाय और उससे प्रत्यक्ष प्रमाणसिद्ध संसारित्व का प्रतिषेध यदि कहा जाय तो दुर्बल आगम प्रमाण से सिद्ध प्रत्यगात्मा की ब्रह्मरूपता का भी बाध प्रबल प्रत्यक्ष प्रमाण द्वारा क्यों न माना जाय ? इसी आशंका के समाधानार्थ इस द्वितीय प्रकरण का आरम्भ किया जा रहा है, जिसमें ब्रह्मात्मैक्य- ज्ञानोत्पादन द्वारा कार्यसहित अज्ञान की निवृत्ति करनेवाले वेदान्तवाक्यों का अर्थ संक्षेप में बताया जायगा । 'नेति नेति' ऐसी वीप्सा (द्विरुक्ति) करने से आरोपित सकल दृश्य-अदृश्य जड़ वस्तुओं का प्रतिषेध करते-करते एक अवधितक पहुँच जानेपर अन्त में शेष बचा हुआ जो तत्त्व है, वही आत्मतत्त्व है, उसका प्रतिषेध नहीं हो पाता। क्योंकि वहीं तक प्रतिषेध की अवधि है। अर्थात् प्रतिषेध करने वाला वही ( आत्मा ) है ( प्रतिषेध की साक्ष देनेवाला वही है ) । उसका प्रतिषेध करनेवाला कोई अन्य न होने से उसका प्रतिषेध करना अशक्य (असंभव) है। अन्त में वही एक ( प्रतिषेध करनेवाला ) शेष रह जाता है। अतः उसकी बिना किसी सन्देह के साक्षात् उपलब्धि हो जाती है। यह जो स्थूल शरीर ( देह ) है, वह मैं ( आत्मा ) नहीं हूँ, यह जो सूक्ष्मशरीर ( मन, बुद्धि, प्राण और इन्द्रिय समुदाय ) है, वह भी मैं ( आत्मा ) नहीं हूँ, और तदुपादानक जितना भी अचेतन वर्ग है, वह भी मैं ( आत्मा ) नहीं हूँ, बल्कि मैं तो इन सबका प्रकाशक अव्यभिचारी, स्वयंप्रकाश, कूटस्थ, अक्षर हूँ, जिसमें समस्त जगत् का आश्रय कहा जाने वाला अव्याकृत आकाश ओत-प्रोत है, वही मैं पर अक्षर (अहं ब्रह्माऽस्मि) हूँ। इस प्रकार से उस (आत्म तत्त्व) की असन्दिग्ध रूप से उपलब्धि हो जाती है। इस विवेचन से पूर्वोक्त शंका (विद्या तो उत्पन्न हो ही नहीं सकती) का पूर्णतया निराकरण हो जाता है। 'प्रतिषेद्धुमशक्यत्वात्' कहने से वह (आत्मा) बाध के योग्य नहीं है, यह बताया गया है। एवंच यह प्रत्यगात्मा, प्रतिषेध की अवधि तथा प्रतिषेध का साक्षी होने से उसमें प्रतिषेध की प्रसक्ति नहीं होती है ॥२॥

प्रतिषेधप्रकरणम् १७ अहं धीरिदमात्मोत्था वाचारम्भणगोचरा । निषिद्धात्मोद्भवत्वात्सा न पुनर्मांनतां व्रजेत् ॥२॥ अहं धीरिति- 'अहं' यह ज्ञान (बुद्धि), 'इदमात्मा' अर्थात् अन्तःकरणादि अनात्मवस्तु से उत्पन्न होने के कारण वह वाणी से आरम्भ होनेवाले विकार के अन्तर्गत ही है। वह (अहम्) बुद्धि (ज्ञान) निषेध किये जाने वाले आत्मा (देहादि) से उत्पन्न होने के कारण प्रमाण नहीं मानी जा सकती ॥ २ ॥ हृदयस्पर्शिनी जिज्ञासु के मन में यह शंका हो सकती है कि 'अहं ब्रह्म' यह ज्ञान निर्दिष्ट रीति से उत्पन्न होने पर भी उसे कैसे प्रमाण कहा जा सकता है ? क्योंकि देह, इन्द्रिय आदि में अभिमान तो निरन्तर होता रहता है। किन्तु ऐसी शंका करना ठीक नहीं है। क्योंकि देहादि में होनेवाले आत्माभिमान का निरन्तर बाध होता रहता है। और जिसका बाध होता है, उसे आभास कहते हैं, इसलिये दोनों (अभिमान-बुद्धि और ब्रह्मबुद्धि) की समानता नहीं है अपितु वेदान्त- वाक्योत्पन्न ज्ञान ही प्रबल है। देहादि अनात्मा में होनेवाली आत्मबुद्धि को 'अहंधी' कहते हैं। उसकी उत्पत्ति अहंकर्त्ता के बाधित स्वरूपवाले 'इदं' अंश से होती है। अर्थात् पूर्व-पूर्व अहंकार-वासना-वासित-अन्तःकरणरूप इदमात्मा से उत्पन्न होती है। अतः वह (अहं धी) अध्यासरूप है। किन्तु वेदान्तवाक्य से उत्पन्न 'अहं ब्रह्म' बुद्धि यथार्थ है, अर्थात् अध्यासरूप नहीं है। निष्कर्ष यह है कि दोनों बुद्धियाँ एक नहीं हैं। एवञ्च 'अहं धी' यह बुद्धि अयथार्थ है और 'अहं- ब्रह्म' यह बुद्धि यथार्थ है। अतः 'अहं धी' स्वरूपतः दुर्बल है। उसी प्रकार दोनों बुद्धियों के विषय भी भिन्न होने से वह (अहं धी) दुर्बल प्रतीत होती है। अहं बुद्धि का विषय अनृत, जड़, अनात्मरूप (वाचारंभण) है। उसकी (अहं- बुद्धि के विषय की) स्वतः सत्ता न रहने पर भी अपरोक्ष व्यवहार (प्रत्यक्ष व्यवहार) का विषय बनती है। इसी कारण 'नेति-नेति' शास्त्र से अहं बुद्धि के विषयस्वरूपों का निषेध (बाध) किया जाता है। ऐसे निषिद्ध (बाधित) स्वरूपों से उत्पन्न हुई इदमात्मबुद्धि (अहं धी), आत्मा का यथार्थ ज्ञान होने पर कैसे प्रमाण हो सकेगी? क्योंकि स्वप्नावस्था के ज्ञान की तरह वह इदमात्मबुद्धि (अहं बुद्धि) (१) अवस्तुरूप है, (२) अवस्तुजन्य है, (३) अवस्तुविषयक है। अतः वेदान्तवाक्योत्पन्न 'अहं ब्रह्मास्मि' ज्ञान ही प्रबल है। अहं बुद्धि (अहं धी) का स्वरूप भी निषिद्ध है और कारण भी निषिद्ध है, इसलिये ब्रह्मात्मज्ञान के हो जाने पर उस अहंबुद्धि में प्रामाण्यबुद्धि नहीं रहती ॥२॥ पूर्वबुद्धिमबाधित्वा नोत्तरा जायते मतिः । दृशिरेका स्वयं सिद्धः फलत्वात्स न बाध्यते ॥३॥ पूर्वबुद्धिमिति - प्रथम उत्पन्न हुए ज्ञान (बुद्धि) का बाध किये बिना उत्तर (द्वितीय) ज्ञान (आत्मबुद्धि) उत्पन्न नहीं हो सकता। किन्तु साक्षी चेतन, एक और स्वयंसिद्ध है। वह स्वयं फलरूप है, अतः उसका बाध नहीं होता ॥३॥ हृदयस्पर्शिनी 'मैं कर्त्ता हूँ, मैं भोक्ता हूँ' इस ज्ञान के रहते 'मैं अकर्त्ता, अभोक्ता ब्रह्म हूँ' यह ज्ञान कैसे हो सकता है ? कर्तृत्व, भोक्तृत्व ज्ञान प्रथमतः होता है, प्रथम होने के कारण उसे ही प्रबल मानना होगा; अकर्तृत्व-अभोक्तृत्व ज्ञान पश्चात् होता है, पश्चात् होने से उसे दुर्बल कहना होगा, तब प्रबल से दुर्बल का ही बाध होगा तो 'मैं ब्रह्म हूँ' यह बुद्धि कैसे होगी ? किन्तु यह शंका ठीक नहीं है, क्योंकि 'पौर्वापर्ये पूर्वदौर्बल्यं प्रकृतिवत्' इस नियम के अनुसार उत्तर- कालिक ब्रह्मात्मज्ञान से पूर्वकालिक कर्तृत्व-भोक्तृत्वज्ञान का बाध हो जायगा। जैसे शुक्ति के अज्ञान से उत्पन्न होने वाली रजतबुद्धि का बाध किये बिना शुक्तिबुद्धि नहीं हुआ करती । वैसे ही पूर्वकालिक कर्तृत्व-भोक्तृत्व बुद्धि का बाध किये बिना उत्तरकालिक आत्मतत्त्वज्ञान उत्पन्न नहीं होता। क्योंकि प्रसक्त का (प्राप्त का) निषेध करना ही 'बाध' का स्वरूप है। पूर्व के काल में उत्तरकालिक पदार्थ की प्रसक्ति (प्राप्ति) ही न होने के कारण पूर्व से उत्तर का बाध हो ही नहीं सकता। अर्थात् पूर्व से पर का बाध नहीं हो सकता, बल्कि प्रसक्त हुए पूर्व का ही पर (उत्तर) से बाध होना उचित है। एवंच उत्तरकालिक ब्रह्मात्मबुद्धि से पूर्वकालिक कर्तृत्व-भोक्तृत्व बुद्धि का बाध ३

१८ उपदेशसाहस्री होना ही उचित है। तथापि विपरीत ही क्यों न माना जाय ? अर्थात् कर्तृत्व-भोक्तृत्व बुद्धि के द्वारा ब्रह्मात्मबुद्धि का ही बाध होना क्यों न माना जाय ? इस आशंका का समाधान यह है कि ज्ञप्तिस्वरूप ब्रह्मात्मा को ही 'दृशि' कहते हैं, अर्थात् ब्रह्मात्माकार अन्तःकरणवृत्ति में प्रतिफलित होनेवाले अपरोक्ष स्फुरण को 'दृशि' कहते हैं। वह एक है अर्थात् किसी पर (द्वितीय) के न होने से उसे अद्वितीय कहते हैं। वह स्वयं सिद्ध है, अर्थात् किसी अन्य की अपेक्षा किये बिना भी उसकी सत्ता का स्फुरण होता है। इन निर्दिष्ट विशेषणों से स्पष्ट होता है कि वह ( आत्मतत्व ) बाध होने योग्य नहीं हैं, क्योंकि उसका कोई बाधक ही नहीं है। उसका ज्ञान भी परमार्थविषयक होने से बाध के योग्य नहीं है। उस ज्ञान का फल भी बाध होने योग्य नहीं है, अर्थात् अबाध्य है। ज्ञान से अभिव्यक्त होने वाले एवं बाधरहित ब्रह्मात्मतत्त्व को ही औपचारिक फल कहा गया है। अर्थात् नित्यसिद्ध ब्रह्मात्मतत्त्व में 'फल' शब्द का प्रयोग लाक्षणिक है, क्योंकि विषयाकार वृत्ति के द्वारा उसकी अभिव्यक्ति होती है। एवं च वस्तु, उसका ज्ञान और उसके फल का बाध न हो सकने से उसके द्वारा कर्त्रादिबुद्धि का ही बाध होना उचित है। यदि कहें कि पूर्वकालिक कर्तृत्व-भोक्तृत्व बुद्धि का उत्तरकालिक आत्मज्ञान के द्वारा बाध मानने पर उपजीव्य विरोध होगा, अतः कर्तृत्व बुद्धि को बाध्य कैसे कहा जाय ? किन्तु यह शंका अधिक देर टिक नहीं पाती, क्योंकि पूर्वकालिक कर्तृत्व-भोक्तृत्व बुद्धि के व्यवहार में अंगरूप अंश का उत्तरकालिक आत्मज्ञान से बाध नहीं किया जाता, अतः उपजीव्य विरोध की शंका करना ठीक नहीं है। शब्द प्रमाण को पदार्थ का ज्ञान कराने में प्रमाणान्तर की अपेक्षा रहने पर भी, वाक्यार्थ का ज्ञान कराने में उसे अन्य प्रमाण की अपेक्षा नहीं रहती। पदार्थ बोध में भी केवल व्यवहार की ही अपेक्षा रहती है। एवं च अत्यन्त अबाध्य अर्थ होने से औपनिषद आत्मज्ञान ही तत्त्वावेदक है॥ ३॥ इदं वनमतिक्रम्य शोकमोहादिदूषितम् । वनाद् गान्धारको यद्वत्स्वात्मानं प्रतिपद्यते ॥४॥ इदमिति- जिस प्रकार गान्धार देश निवासी कोई पुरुष वन को पार कर अपने देश पहुँच गया। उसी प्रकार शोकमोहादि दोषों से दूषित इस देहरूप वन को पार कर मुमुक्षु पुरुष अपने आत्मस्वरूप को पा लेता है ॥ ४ ॥ हृदयस्पर्शिनी वेदान्तवाक्य से ब्रह्मात्मज्ञान की अनुत्पत्ति की आशंका का उन्मूलन कर, तथा वेदान्तवाक्यजन्य ब्रह्मात्म- ज्ञान की प्रबलता का उपपादन कर पूर्वप्रवृत्त प्रत्यक्ष आदि के द्वारा उसके बाधित होने की आशंका का उन्मूलन किया गया। अब एक श्रौत दृष्टान्त देकर पदार्थपरिशोधन द्वारा उस ब्रह्मात्मज्ञान की उत्पत्ति का निरूपण इस श्लोक के द्वारा किया जा रहा है। एक वन का रूपक देकर शरीर को बता रहे हैं। वन में जैसे व्याघ्र, तस्कर आदि होते हैं, उसी तरह इस शरीररूपी वन में व्याघ्र, तस्कर आदि के स्थानापन्न राग, द्वेष, मोह, शोक आदि बसे हुए हैं। इन राग, द्वेषादि से व्याप्त होने के कारण दूषित इस शरीररूपी वन को पार कर आचार्य से किञ्चिन्मात्र निर्देश पाकर अन्वय-व्यतिरेक के द्वारा पदार्थशोधन करते हुए देह आदि को अनात्मा जानकर त्यागते हैं और सर्वत्र अनुस्यूत एवं अबाधित आत्मतत्त्व को प्राप्त करते हैं। अर्थात् 'अहं ब्रह्मास्मि' इस प्रकार औपनिषद पुरुष को जानते हैं। जैसे गान्धारदेश-निवासी किसी पुरुष को तस्करों ने उसकी आँखें बाँधकर किसी घोर जंगल में लाकर छोड़ दिया। वह पुरुष बन्धन से छुटकारा पाने के लिये चिल्लाने लगा, तो उसी जगह कोई दयालु महापुरुष आ पहुँचा, और उसने उसको बन्धन से मुक्त कर दिया। उस दयालु महापुरुष ने उसे अपने स्वदेश जाने का मार्ग बता दिया। तब वह बुद्धिमान् पुरुष गाँव-गाँव पूछता हुआ वन से अपने स्वदेश पहुँच जाता है। उसी तरह इस संसारी पुरुष की आँखों पर मिथ्या अज्ञान की पट्टी, इन अविद्या, राग आदि तस्करों ने बाँध दी है। अर्थात् इसकी विवेकदृष्टि को मिथ्या अज्ञान- रूपी वस्त्र से ढँक दिया है। और उसको अपने स्वदेश से लाकर देहरूपी अरण्य में छोड़ दिया है। तब वह अपनी आँख पर बंधी पट्टी को दूर करने की इच्छा से आक्रोश कर रहा है, उसके उस आक्रोश को सुनकर कदाचित् कोई परमकारुणिक ब्रह्मवित् आचार्य वहाँ पहुँचकर उसकी आँख पर बंधी मिथ्या अज्ञानरूपी वस्त्र की पट्टी खोल देते हैं और उसे उसके स्वदेशरूप ब्रह्मात्मा का निर्देश कर देते हैं, तब वह स्वयं अन्वयव्यतिरेक के सहारे ऊह करता हुआ अपने स्वरूप को पा लेता है और कृतकृत्य हो जाता है ॥४॥ ॥ इति द्वितीयं प्रतिषेधप्रकरणं समाप्तम् ॥

पद्यभाग ३: ईश्वरात्मप्रकरणम्

ईश्वरात्मप्रकरणम् ईश्वरश्चेदनात्मा स्यान्नासावस्मीति धारयेत् । आत्मा चेदीश्वरोऽस्मीति विद्या साऽन्यनिवर्तिका ॥१॥ ईश्वरश्चेदिति—यदि ईश्वर अनात्मा होता, तो मुमुक्षु को वह ईश्वर (ब्रह्म) मैं हूँ, यह ज्ञान कभी न होता, और यदि उसे यह ज्ञान हो जाय कि 'मैं ईश्वर हूँ' तो यह ज्ञान अपने से भिन्न की निवृत्ति करता है ॥ १ ॥ हृदयस्पर्शिनी इसके पूर्व प्रकरण में जो ब्रह्मविद्या का प्रतिपादन किया उसमें प्रकाशमान जो ब्रह्म है, वह प्रत्यगात्मा ( जीव ) से भिन्न है अथवा अभिन्न ? यह सन्देह इसलिये हो रहा है कि 'द्वा सुपर्णा सयुजा' श्रुति में भेद सुनाई पड़ रहा है, और 'अयमात्मा ब्रह्म' श्रुति में अभेद सुनाई पड़ रहा है। इस सन्देह का निराकरण प्रस्तुत प्रकरण में किया जा रहा है। सत्य, ज्ञान, अनन्त, आनन्द रूप परमात्मा (ईश्वर), जिसे जगत् का कारण माना जाता है, वह मेरु पर्वत आदि के समान अनात्मरूप है या आत्मरूप है? यदि वह मेरु की तरह अनात्मरूप हो तो जैसे कोई भी मेरु में अहं- बुद्धि अर्थात् 'मेरु ही मैं हूँ' नहीं मानता, वैसे ही ईश्वर को अनात्मरूप मानने पर कोई भी मुमुक्षु अपने को 'मैं ईश्वर हूँ' नहीं समझेगा । तब 'तत्त्वमसि' ( वही तू है ) इस वचन से विरोध होगा। अर्थात् 'तत्त्वमसि' वाक्य संगत नहीं होगा, और 'आत्मेति तूपगच्छन्ति ग्राहयन्ति च' इस न्याय के साथ भी विरोध होगा। यदि 'ईश्वर एव आत्मा अहमस्मि नान्यः' ईश्वर ही मैं हूँ, कोई अन्य नहीं हूँ, ऐसा समझे तो न श्रुति के साथ और न न्याय के साथ ही विरोध होगा । यह अभिन्नाकार ब्रह्मात्मैक्यज्ञान अविद्या एवं तत्कार्यभूत समस्त संसार का निवर्तक होता है। 'ब्रह्म वेद ब्रह्मैव भवति' 'ब्रह्मैव सन् ब्रह्माप्येति' जो ब्रह्म जानता है, वह ब्रह्म ही हो जाता है, ब्रह्म होता हुआ ही ब्रह्म को प्राप्त होता है। इस श्रुति ने ब्रह्मज्ञान का फल ब्रह्मभाव होना ही बताया है। अन्य को किसी अन्य का भाव प्राप्त होना संभव नहीं है। अतः ऐक्यज्ञान ही फलवान् है, और उसीमें शास्त्र का तात्पर्य है, भेद में नहीं । भेदज्ञान का कोई फल नहीं है और भेदज्ञान की 'अन्योऽसावन्योऽहमस्मीति न स वेद' वाक्य के द्वारा निन्दा की गई है। जहाँ कहीं भेद श्रवण हो, वहाँ उसका तात्पर्य अनादि अविद्या से कल्पित भेद के अनुवाद में ही समझना चाहिये, स्वार्थ में नहीं ॥ १ ॥ आत्मनोऽन्यस्य चेद्धर्मा अस्थूलत्वादयो मताः । अज्ञेयत्वेऽस्य किं तैः स्यादात्मत्वे त्वन्यधीहृतिः ॥२॥ आत्मन इति—यदि अस्थूलत्व अनणुत्व आदि धर्म आत्मभिन्न ईश्वर के हों तो उस आत्मभिन्न ईश्वर के अज्ञेय होने के कारण उन धर्मों के श्रवण से जिज्ञासु को कौन-सा लाभ होगा ? और यदि ईश्वर का आत्मा से अभिन्न रूप में (आत्म स्वरूप से ) बोध होगा तो उसमें (ईश्वर में) अनात्म धर्मों (स्थूलत्व, कृशत्व आदि) की जो बुद्धि हो रही है वह निवृत्त हो जाती है ॥ २ ॥ हृदयस्पर्शिनी प्रत्यगात्मा (जीवात्मा) और ब्रह्म (ईश्वर) के अभेद में ही वेद (श्रुति) का तात्पर्य है। क्योंकि अस्थूलादि श्रुतिवाक्यों के पर्यालोचन से दोनों ( ईश्वर अर्थात् ब्रह्म और प्रत्यगात्मा अर्थात् जीव) एक ही (अभिन्न) प्रतीत होते हैं । श्रुतिप्रतिपादित अस्थूलत्वादि धर्मों को यदि प्रत्यगात्मा (जीवात्मा) से भिन्न ईश्वर के कहें तो वह ईश्वर अनात्मभूत (आत्मभिन्न) होने से अज्ञेय कहा जायगा, तब श्रुतिप्रतिपादित उसके अस्थूलत्वादि धर्मों के श्रवण से मुमुक्षु को कौन-सा लाभ होना है? अर्थात् कोई लाभ नहीं। क्योंकि उस श्रवण से मैं स्थूल हूँ, मैं कृश हूँ, इत्यादि स्वगत (अपने में होने वाली) भ्रान्ति की निवृत्ति तो हो नहीं सकेगी। यदि ईश्वर (ब्रह्म) और जीवात्मा

२० उपदेशसाहस्री (प्रत्यगात्मा) दोनों को एक ही (अभिन्न) समझते हैं अर्थात् 'अस्थूलत्वादि धर्मवाला ईश्वर मैं हूँ' यह समझते हैं, तब दोनों के एक ही रहने से स्वात्मा (जीवात्मा) में होनेवाली स्थूलत्व, कृशत्वादि की भ्रान्त बुद्धि जो मोह के कारण हो रही थी, उसका बाध श्रुत्युक्त धर्मों (अस्थूलत्वादि) के श्रवण से हो जाता है। आत्मा में स्थूलत्व, कृशत्व आदि की बुद्धि, मोहमूलक होने से मिथ्या है। अतः जीवात्मा को ईश्वर (ब्रह्म) समझना ही समुचित है। दोनों में भेद नहीं है ॥२॥ मिथ्याध्यासनिषेधार्थं ततोऽस्थूलादि गृह्यताम् । परत्र चेन्निषेधार्थं शून्यतावर्णनं हि तत् ॥३॥ मिथ्येति—आत्मा में स्थूलत्व, कृशत्वादि के भ्रम (मिथ्या अध्यास) की निवृत्ति के लिये ही 'अस्थूलमणणु' आदि वाक्य को मानना चाहिये। यदि उक्त श्रुतिवाक्य को आत्मभिन्न अनात्म वस्तु के निषेधार्थ माना जाय तो शून्यवाद (शून्यता वर्णन) ही हो जायगा। अनात्म पदार्थ जड़ होने से स्थूलत्वादि धर्मों से युक्त ही हुआ करते हैं। यदि उनका निषेध यहाँ कहा जाय तो ईशयितव्य वस्तु ही कोई नहीं होगी, और उसके न रहने पर ईश्वर का ईश्वरत्व ही नहीं रह सकेगा, तब शून्यवाद का प्रसंग प्राप्त होगा ॥३॥ हृदयस्पर्शिनी 'कस्मिन्नु खलु आकाश ओतश्च प्रोतश्च' इस प्रकार कार्य-कारणात्मक जगत् के विषय में प्रश्नोत्तर करते हुए 'अक्षर' का उपक्रम किया ओर 'एतस्य वा अक्षरस्य प्रशासने गार्गि' इस प्रकार जगदीश्वर के रूप से मध्य में परामर्श करते हुए 'अहं द्रष्टृ' इत्यादि के द्वारा उसके स्वभाव का कथन कर अन्त में 'एतस्मिन्नु खल्वक्षरे गार्ग्याकाश ओतश्च प्रोतश्च' कहकर उपसंहार किया गया है। इससे यह स्पष्ट है कि सम्पूर्ण ब्राह्मणवाक्य का तात्पर्य ईश्वरपरक ही है। बृहदारण्यक उपनिषद् में प्रत्यगात्मा का अक्षरब्रह्म से अभेद का ही निश्चय किया गया है। जबकि ईश्वर और आत्मा के अभेद में ही शास्त्र का तात्पर्य है, तब उक्त अस्थूलादि वाक्य को प्रत्यगात्मा में अध्यस्त स्थूलत्वादि के प्रतिषेधपरक ही समझना चाहिये। एवंच अज्ञानमूलक मिथ्याध्यास की निवृत्ति के लिये अस्थूलत्वादि को प्रत्यगात्मा के विशेषण समझने चाहिये। अन्यथा अस्थूलादि वाक्य को आत्मभिन्न अनात्म पदार्थ (ईश्वर) के स्थूलत्वादि धर्मों के निषेध के लिये यदि कहें तो उसे शून्यता का ही वर्णन कहा जायगा। आत्मा से अन्य सभी कुछ जड़ है, उनमें स्थूलत्वादि धर्म रहते ही हैं, वे सभी जब निषेध्य कोटि में आ जायेंगे तब ईश्वर में ईश्वरत्व का भी सम्बन्ध नहीं रहेगा अर्थात् ईश्वर में पराग्रूपता (अनात्मता) मानने से घट की तरह अनीश्वरत्व का प्रसंग प्राप्त होगा, और उक्त वाक्य केवल निषेधपरक ही रहेगा। अतः अस्थूलत्वादि धर्मवाले में अनात्मत्व का सम्बन्ध न रहने से उसे ईश्वर ही कहना होगा, वह (ईश्वर) आत्मा ही है, अन्य कोई नहीं, यही स्वीकार करना उचित है ॥३॥ बुभुत्सोर्यदि चान्यत्र प्रत्यगात्मन इष्यते । अप्राणो ह्यमनाः शुभ्र इति चानर्थकं वचः ॥४॥ बुभुत्सोरिति—प्रत्यगात्मा से भिन्न देहादि अनात्मा में स्थूलत्वादि धर्मों का निषेध करना ही जिज्ञासु को यदि इष्ट हो तो 'अप्राणो ह्यमनाः' वह (आत्मा) प्राणहीन, मनोहीन है, इत्यादि वाक्य व्यर्थ हो जायगा। प्राणादि का अनात्म पदार्थ में अभाव रहने से यह वचन अप्राप्त का निषेधक कहलायेगा ॥४॥ हृदयस्पर्शिनी आत्मतत्त्वजिज्ञासु व्यक्ति यदि जीवात्मा से भिन्न देह, इन्द्रिय, प्राण, मन के धर्मों का निषेधक यह वाक्य (अस्थूलमणणु) है, ऐसा समझे तो 'अप्राणः' इत्यादि वाक्य निर्विषय (व्यर्थ) होगा, क्योंकि अनात्मा में प्राण और मन का सम्बन्ध प्राप्त नहीं है। अतः अप्राप्त प्रतिषेध, दृष्टार्थ न हो पाने से निष्फल होगा। और अप्राणादि वाक्य अनर्थक होगा ॥ ४ ॥ ॥ इति तृतीय ईश्वरात्मप्रकरणं समाप्तम् ॥

पद्यभाग ४: तत्त्वज्ञानस्वभावप्रकरणम्

यहाँ पृष्ठ का पंक्ति-दर-पंक्ति लिप्यन्तरण प्रस्तुत है:

तत्त्वज्ञानस्वभावप्रकरणम् अहंप्रत्ययबीजं यदहंप्रत्ययवत्स्थितम् । नाहंप्रत्ययवह्ल्युष्टं कथं कर्म प्ररोहति ॥१॥ अह्मिति—अहंकार का जो बीजरूप कर्म अहं-प्रत्यय से युक्त अन्तःकरण में स्थित है, वह 'मैं अहंकार नहीं हूँ' इस ज्ञानाग्नि से दग्ध हो जाने पर पुनः कैसे पैदा हो सकता है? ॥ १ ॥ हृदयस्पर्शिनी 'अहं ब्रह्मास्मि' इस ब्रह्मात्मज्ञान ( ईश्वर से अभिन्न आत्मा का ज्ञान ) को मोक्ष का साधन बताया गया है, किन्तु वह कैसे संभव है ? क्योंकि अनेक जन्मों के अनेक सञ्चित कर्म रहते हैं, अतः उनका फल अवश्य ही प्राप्त होना है । एवञ्च उन सञ्चित कर्मों के प्रतिबन्धक रहते ब्रह्मात्मैक्यज्ञान, मोक्ष का साधन नहीं हो सकेगा । 'अहम्' इस प्रत्यय को 'अहंकार' ( अनात्मा में आत्माभिमान ) कहते हैं । उस अहंकार के कारण ही मनुष्य कर्म करता है, अर्थात् कर्म और अहंकार का कार्य-कारणभाव सम्बन्ध है । तात्पर्य यह है कि अहम्प्रत्यय ( अहंकार ) ही कर्म का कारण ( बीज ) है । जिस साभास अन्तःकरण में 'अहम्' अर्थात् 'मैं' इस प्रकार की प्रतीति होती है, उस अन्तःकरण को 'अहम्प्रत्ययवत्' कहते हैं । अथवा 'अहम्' इस प्रकार की प्रतीति जिस अहंकार में होती है, वह साभास अहंप्रत्यय जिस कर्म का उपादान कारण (बीज) है, उस कर्म को 'अहम्प्रत्ययबीज' शब्द से कहा गया है । मूलाज्ञान (मूलाविद्या) के कार्यरूप अहम्प्रत्यय- विशिष्ट-अहंकार में 'कर्म' की स्थिति रहती है, इसलिये 'कर्म' को 'अहम्प्रत्ययवत्स्थित' शब्द से कहा गया है । क्योंकि कार्य का अपने उपादान में रहने का ही नियम है, अन्यत्र नहीं । एवं च अहंप्रत्ययवत् (अहंकारविशिष्ट) साभास अहंकार में अथवा अन्तःकरण में सञ्चित कर्म जब 'नाहं कर्ता भोक्ता किन्तु ब्रह्मैवास्मि' 'मैं कर्ता, भोक्ता नहीं हूँ, मैं तो ब्रह्म ही हूँ' इस प्रकार वेदान्त वाक्य से उत्पन्न हुए ज्ञानाग्नि के द्वारा दग्ध हो जाता है ( जला दिया जाता है ), तब वह ( संचित कर्म ) पुनः फलोन्मुख नहीं होता । जैसे अग्नि; जलाने योग्य वस्तुओं को जलाता है, वैसे ही वेदान्त- वाक्योत्पन्न 'नाहं कर्ता ब्रह्म वाह्मस्मि' यह ज्ञान सञ्चित कर्मों को जला देता है, इसलिये वेदान्तवाक्योत्पन्न ज्ञान 'नाहं कर्ता, ब्रह्मैवाह्मस्मि' को अग्नि शब्द से कहा गया है । जैसे दग्ध हुए ( जले हुए ) बीज से अंकुर पैदा नहीं हो पाता वैसे ही ज्ञानाग्नि से दग्ध हुए सञ्चित कर्म से फलोत्पत्ति नहीं होती । वेदान्तवाक्य से आत्मतत्त्वज्ञान होनेपर मूलाज्ञान ( मूलाविद्या ) की निवृत्ति होना सुनिश्चित है, क्योंकि अज्ञान और ज्ञान दोनों परस्परविरुद्ध हैं । मूलाज्ञान की निवृत्ति होने से उसके कार्यभूत अन्तःकरण की भी निवृत्ति हो जाती है । जब अन्तःकरणरूप आश्रय ही नहीं रहा, तब 'कर्म' कहां स्थित रहेंगे ? निराश्रय तो रह नहीं सकते । अतः पूर्वोक्त शंका ( सञ्चित कर्मरूप प्रतिबन्धक के रहते आत्मज्ञान विफल होगा ) उचित नहीं है । निष्कर्ष यह हुआ कि वेदान्तवाक्योत्पन्न ब्रह्मात्मज्ञान ही मोक्षप्राप्ति का एकमात्र उपाय ( साधन ) है ॥ १ ॥ दृष्टवच्चेत्प्ररोहः स्यान्नान्यकर्मा स इष्यते । तन्निरोधे कथं तत्स्यात्पृच्छामो वस्तुच्यताम् ॥२॥ दृष्टवदिति—यदि यह कहा जाय कि दृष्टफलोत्पादक भिक्षाटनादि कर्मों के समान तत्त्वज्ञानी के संचित कर्म भी फल देंगे । किन्तु यह कहना इसलिये ठीक नहीं है कि ज्ञानी का भिक्षाटनादि व्यापार तो प्रारब्धकर्म के कारण हो रहा है । तथापि पुनः प्रश्न उत्पन्न होता है कि तत्त्वज्ञानाग्नि से मूलाविद्यारूप अज्ञान की निवृत्ति जब हो जाती है, तब उसका (अज्ञान का) कार्यभूत प्रारब्ध कर्म भी कैसे रहेगा ? इसका समाधान कीजिये ॥२॥ हृदयस्पर्शिनी शंका करनेवाले का अभिप्राय यह है कि ज्ञानी के भिक्षाटनादि कर्मों का फल उसे जैसे उपलब्ध होता है, वैसे ही विधिविहित अग्निहोत्रादि कर्मों का अदृष्ट फल भी उसे क्यों नहीं मिलेगा ? किन्तु यह शंका ठीक नहीं है,

३२ उपदेशसाहस्री क्योंकि ज्ञानी का भिक्षाटनादि व्यापार अन्यकर्मा है। उसके भिक्षाटनादि व्यापार में ज्ञानी का वह प्रारब्धकर्म कारण है, जिसका फल अन्यत्र प्रवृत्त है। इसलिये उसका भिक्षाटनादि व्यापार 'अन्यकर्मा' है। भिक्षाटनादि कर्म तो तत्त्वज्ञान के अविरुद्ध प्रारब्धफलकर्मनिबन्धन है। किन्तु विधिविहित कर्म, तत्त्वज्ञान के विरोधी होने के कारण उस प्रकार के नहीं हैं। तथापि एक शंका अभी अवशिष्ट है कि ज्ञान से अज्ञान की निवृत्ति अपने मूल अहंकार के सहित होती है; अतः आश्रयभूत अहंकार की निवृत्ति हो जाने से तदाश्रित संचित कर्म की भी निवृत्ति जब हो रही है तो प्रारब्धकर्म की भी निवृत्ति हो जानी चाहिये। जिस प्रारब्धकर्म के कारण ज्ञानी की भिक्षाटनादि कर्म में प्रवृत्ति होती है, उस प्रारब्ध कर्म की निवृत्ति तत्त्वज्ञान से क्यों नहीं होती ? इस शंका का उत्तर दीजिये ॥ २ ॥ देहाद्यारम्भसामर्थ्याज्ज्ञानं सद्विषयं त्वयि । अभिभूय फलं कुर्यात्कर्मान्ते ज्ञानमुद्भवेत् ॥३॥ देहादीति—प्रारब्धकर्म में देहोत्पादन (देहारंभ) सामर्थ्य है। अतः वह ज्ञानी के सद्वस्तु (ब्रह्म) विषयक ज्ञान को अभिभूत करके अपना फल देता है। उस प्रारब्ध कर्म की फलभोग के द्वारा समाप्ति होने पर ही प्रतिबन्ध- शून्य ज्ञान का आविर्भाव होता है ॥ ३ ॥ पूर्वोक्त अवशिष्ट आशंका का उत्तर दे रहे हैं—ब्रह्मात्मविषयक ( सद्द्विषयक ) ज्ञान, वेदान्तवाक्यरूप प्रमाण से उत्पन्न होने के कारण यद्यपि प्रबल है, तथापि उसे यह प्रारब्धकर्म, विदेहकैवल्यरूप फल नहीं देने देता, क्योंकि इस प्रारब्धकर्म में देहारंभ (देहोत्पादन) का सामर्थ्य प्रबलतर है। अतः यह प्रारब्धकर्म देहाभास, जगदाभासरूप अपना फल तुम जैसे ज्ञानी को भी अवश्य देगा। प्रारब्धकर्मजन्य फलभोग की समाप्ति होने पर ही प्रतिबन्धरहित ज्ञान उद्भूत होता है। और वह वर्तमानकार्यसंपादक अविद्यालेश ( अविद्यासंस्कार ) की भी निवृत्ति कर देता है तथा उस ज्ञानी को स्वाराज्य पर स्थापित कर देता है ॥ ३ ॥ आरब्धस्य फले ह्येते भोग ज्ञानं च कर्मणः । अविरोधस्तयोर्युक्तो वैधर्म्यं चेतरस्य तु ॥४॥ आरब्धस्येति—भोग और ज्ञान दोनों ही प्रारब्ध कर्म के फल हैं। अतः उनमें अविरोध अर्थात् विरोध न रहना ठीक हो है। किन्तु प्रारब्धातिरिक्त अन्य कर्मों का ज्ञान से विरोध है। अतः उन्हीं का ज्ञानाग्नि से दाह हो पाता है, प्रारब्धकर्म का नहीं। उन प्रारब्ध कर्मों का क्षय (नाश) फलभोग से ही होता है ॥ ४ ॥ हृदयस्पर्शिनी पुनः शंका होती है कि आरब्ध कर्म हो या अनारब्ध कर्म हो, दोनों ही समानरूप से अज्ञानकार्य हैं। अज्ञान की निवृत्ति होने पर दोनों का ही आश्रय समान रूप से निवृत्त हो जाता है। ऐसी स्थिति में यह कहना कि प्रारब्धकर्मवशात् ज्ञानी को भी भोग भोगना पड़ता है और अनारब्ध कर्म तथा उसके फल की स्थिति ज्ञानी में नहीं होती, यह कैसे संभव हो सकता है ? इस शंका का समाधान इस श्लोक के द्वारा दिया जा रहा है—भोग और ज्ञान दोनों ही आरब्धकर्म के फल हैं। अतः दोनों ( भोग और ज्ञान ) में अविरोध रहना उचित ही है, किन्तु अनारब्ध- फलवाले संचित तथा क्रियमाण कर्मों का तो ज्ञान के साथ विरोध है ही, क्योंकि दोनों में वैपरीत्य है, वैधर्म्य है। ज्ञान को शरीरादि की अपेक्षा करनी ही पड़ती है, जो शरीरादि अपने कारणभूत अज्ञान से पैदा होते हैं। जिसने शरीर धारण न किया हो ऐसे अशरीरी में आगन्तुक ( अकस्मात् ) ज्ञान का होना संभव नहीं। ज्ञान का कारण और शरीर आदि का कारण एक नहीं हो सकता। क्योंकि अन्य का कारण किसी अन्य की उत्पत्ति में हेतु नहीं हो सकता, सभी कार्यों के अपने अपने कारण नियत होते हैं। अतः कुछ कर्मविशेषों के द्वारा ज्ञानोत्पत्तियोग्य शरीरविशेषों में अपना फल देना आरंभ कर दिये जाने पर उस शरीरविशेष का आश्रय करके ज्ञान के हेतुभूत कर्म, 'ज्ञान' का आरंभ करते हैं यह स्वीकार करना होगा। देह के होने पर उससे भोग होना अवश्यंभावी है। अतः भोगप्रद कर्म के द्वारा उत्पन्न हुए शरीर (देह) का आश्रय कर अपने हेतुभूत प्रारब्धकर्म से आसादित (प्राप्त) ज्ञान, अज्ञाननिवृत्तिरूप अपने फल को उत्पन्न करता है, तथापि एकमात्र भोग के ही द्वारा नष्ट होने वाले देहारंभक प्रारब्धकर्म से आक्षिप्त जो अविद्या-

तत्त्वज्ञानस्वभावप्रकरणम् २३ लेश (अविद्यासंस्कार) है, उसकी निवृत्ति नहीं कर पाता है, क्योंकि उसका (प्रारब्धकर्म से उत्पन्न ज्ञान का) उपजीव्य के साथ कोई विरोध नहीं है। एवंच आरब्धफलकर्म और ज्ञान दोनों में कोई विरोध नहीं है। किन्तु अनारब्धफलवाले कर्मों का (संचित-क्रियमाणकर्मों का) तथा उनके फलों का अकर्तृभूत आत्मतत्त्व के ज्ञानोदय (ज्ञानोत्पत्ति) के साथ विरोध है, अतः कर्तृत्वभाव (अहंकार या अन्तःकरण) की निवृत्ति होने पर आश्रय के न रहने से अनारब्धफलवाले कर्मों का न रह पाना संगत ही है। ज्ञान के साथ उन कर्मों का सहावस्थान हो ही नहीं सकता। प्रारब्धकर्म प्रवृत्त- फलवाला है और अनारब्धकर्म अप्रवृत्तफलवाला है, यही दोनों में भेद है ॥ ४ ॥ देहात्मज्ञानवज्ज्ञानं देहात्मज्ञानबाधकम् । आत्मन्येव भवेद्यस्य स नेच्छन्नपि मुच्यते । ततः सर्वमिदं सिद्धं प्रयोगोऽस्माभिरोरितः ॥५॥ देहात्मेति-आत्मज्ञानी को भी यदि प्रारब्ध कर्म का भोग भोगना ही पड़ता है तो बहुत संभव है कि भोगते- भोगते उसे पुनः देहाभिमान हो जाय, और उससे ज्ञान प्रतिबद्व होकर उसका मोक्ष न हो पाय । इस आशंका का समा- धान इस प्रकार दिया जा रहा है कि जिस प्रकार संसारी (अज्ञानी) पुरुषों को देहात्मबुद्धि हो रही है, उसी प्रकार जिसे आत्मा में ही देहात्मबुद्धि को निवृत्त करनेवाला 'ज्ञान' हो गया हो, वह पुरुष इच्छा न करने पर भी मुक्त हो जाता है। अतः प्रारब्ध से आत्मज्ञान का अविरोध आदि सब बातें सिद्ध हो चुकीं। तत्संबंधी युक्तियों को हम पहले बता चुके हैं ॥ ५ ॥ हृदयस्पर्शिनी देहारम्भक कर्मनिबन्धन भोग यदि ज्ञानी को होता है, तो कदाचित् देहात्माभिमान से उत्पन्न दुरित, 'ज्ञान' का प्रतिबन्धक भी हो सकता है, तब मोक्षप्राप्ति कैसे संभव हो सकेगी ? इसका समाधान यह है कि जैसे अविवेकी लौकिक पुरुष को अपने देह में ही 'मनुष्योऽहम्' मैं मनुष्य हूँ, इस प्रकार निःसन्दिग्ध आत्मज्ञान होता है, वैसे देह से लेकर अहंकार तक के साक्षी आत्मा (मुख्यात्मा) में ही जिसको देहात्मज्ञान का बाधक 'अहमस्मि परं ब्रह्म' मैं ब्रह्म हूँ, यह निःसन्दिग्ध ज्ञान हो जाता है, उस पुरुष की इस ब्रह्मज्ञान के बलपर समस्त अनर्थराशि (मूलाज्ञान, उसका कार्य, उसके संस्कार आदि सभी कुछ) निवृत्त हो जाती है, उस स्थिति में मुक्ति की इच्छा न रहनेपर भी उस ज्ञानबल पर वह मुक्त ही है। एवंच आत्मतत्त्वज्ञान के आविर्भूत होनेपर पुनः देहाभिमान होने का कोई कारण ही नहीं है, अतः मोक्ष में कोई प्रतिबन्धक नहीं है। श्रुति-स्मृतियाँ भी इसका समर्थन करती हैं ॥ ५ ॥ ॥ इति चतुर्थन्तत्त्वज्ञानस्वभावप्रकरणं समाप्तम् ॥

पद्यभाग ५: बुद्ध्यपराधप्रकरणम्

बुद्धयपराधप्रकरणम् मूत्राशङ्को यथोदङ्को नाग्रहीदमृतं यथा । कर्मनाशभयाज्जन्तोरात्मज्ञानाग्रहस्तथा ॥१॥ मूत्राशङ्केति—जिस प्रकार उदङ्क ऋषि ने मूत्र की आशंका से अमृत को ग्रहण नहीं किया उसी प्रकार वर्णाश्रमविहित कर्म नष्ट हो जायगा, इस भय से संसारी जीव आत्मज्ञान को स्वीकार नहीं करता ॥ १॥ हृदयस्पर्शिनी यदि पूर्वप्रकरणप्रदर्शित प्रक्रिया के अनुसार 'ब्रह्मात्मज्ञान' अमृतत्व (मोक्ष) का साधन है, तो सभी लोग 'अहं ब्रह्मास्मि' 'मैं ब्रह्म हूँ' इस आत्मज्ञान का स्वीकार क्यों नहीं करते ? सभी को स्वभावतः ही परमपुरुषार्थ (मोक्ष) की इच्छा तो रहती है। इस आशंका का समाधान एक आख्यायिका के द्वारा कर रहे हैं—उदङ्क नाम के किसी ऋषि ने अपनी तपस्या के द्वारा भगवान् महाविष्णु को सन्तुष्ट कर लिया और उनसे देवताओं के लिये सुरक्षित अमृत को माँगा, तब भगवान् महाविष्णु ने 'इसे अमृत दे दो' ऐसा देवेन्द्र से कहा । तब इन्द्र महाविष्णु की आज्ञा के अनुसार अमृतकलश को वहाँ ले गये और चाण्डालवेष धारण कर लिया तथा अमृतकलश को अपने मूत्राशयस्थान में रख लिया और सोचा कि ऐसा करने से ऋषि को असूया होगी और वह अमृतपान नहीं करेगा। यह सब मनमें सोचकर इन्द्र ने उदङ्क ऋषि को अमृत देना आरंभ किया। तब उदङ्क को भी आशंका हुई कि कहीं यह चाण्डाल का मूत्र तो नहीं है? इस प्रकार मूत्र की आशंका से उदङ्क ऋषि ने प्रत्यक्ष रूप में वास्तविक अमृत की उपलब्धि होनेपर भी अमृत के रूप में इस मूत्र को पीने से मेरी जाति भ्रष्ट होगी, मैं जिस अमृत को चाहता था, वह यह नहीं है, अतः मुझे नहीं लेना है, ऐसा सोचकर उसे जिस प्रकार स्वीकार नहीं किया उसी तरह लोगों को भी यह भय रहता है कि हमारा वर्णाश्रमविहित कर्म कहीं नष्ट न हो जाय इसलिए लोग भी यथार्थ आत्मज्ञान के प्रति इच्छुक नहीं रहते, उसकी ओर अनादर की दृष्टि से देखते हैं। एवञ्च पदार्थ (वस्तु) के स्वरूप का वास्तविक ज्ञान न रहना तथा विपरीतज्ञान रहना ये दोनों श्रुत्युक्त आत्मस्वरूप का ज्ञान प्राप्त न करने में कारण हुआ करते हैं। अतः मुमुक्षु को चाहिये कि वह पदार्थविवेकशील बनें ॥ १ ॥ बुद्धिस्थश्चलतीवात्मा ध्यायतीव च दृश्यते । नौ गतस्य यथा वृक्षास्तद्वत्संसारविभ्रमः ॥२॥ बुद्धिस्थ इति—यह आत्मा बुद्धि में स्थित है, अतः चलता हुआ-सा, ध्यान करता हुआ-सा दिखाई देता है। जिस प्रकार नाँव में बैठकर जाते हुए व्यक्ति को तट पर स्थित वृक्ष चलते हुए-से दिखाई देते हैं, उसी प्रकार यह संसार का भ्रम हो रहा है ॥ २ ॥ हृदयस्पर्शिनी प्रथम श्लोक में दिये गये दृष्टान्त के द्वारा यह बताया गया था कि देवेन्द्र के वेषान्तर और मूत्राशय- स्थान (बस्तिस्थान) में अमृतकलश को छिपाकर रखने से जात्यन्तर के मूत्र का भ्रम उदङ्क को हुआ । इसी कारण उसने अमृत का ग्रहण नहीं किया । एवंच अमृत के ग्रहण न करने में देवेन्द्र का वेषान्तर करना और अमृत कलश को बस्तिस्थान में छिपाकर रखना ये दो ही कारण थे, इसीलिये उदङ्क को भ्रम हुआ । किन्तु ब्रह्मरूप आत्मा के सम्बन्ध में भ्रम होने का वैसा कोई कारण नहीं है, तब ब्रह्मात्मज्ञान में प्रवृत्ति क्यों नहीं होती ? इस आशंका का समाधान इस प्रकार किया गया है कि पदार्थविवेक होने से पूर्व अनादि अविद्या के कारण अपनी आत्मा में लिङ्ग शरीर का ज्ञान अध्यस्त रहने से आत्मा को उसका अभिमान रहता है। अर्थात् अध्यस्त बुद्धिरूप लिङ्ग शरीर में अभिमानी होकर आत्मा स्थित है। वह (आत्मा) वस्तुतः अविक्रिय (विकार-रहित) है, अतः वह चलता फिरता नहीं है, वह

निष्क्रिय है, तथापि बुद्धि के चलने पर वही (आत्मा ही) चलता हुआ-सा प्रतीत होता है, उसी तरह उसके (बुद्धि के) निश्चल होनेपर (ध्यान करने पर ) आत्मा ही निश्चल-सा ( ध्यान करता हुआ-सा) भासित होता है। वस्तुतः वह (आत्मा) ध्यान नहीं करता, क्योंकि चलन-क्रिया ही जब उसमें नहीं है, तब तत्प्रतियोगिक नैश्चल्य (निश्चलता) का भी उसमें न रहना स्वाभाविक है। विकारशील बुद्धि के अविवेक के कारण आरंभ में ही 'संसारी अहमस्मि' मैं संसारी हूँ, इस प्रकार के विपरीतनिश्चयरूप दोषवशात् लोग, आत्मा की ब्रह्मरूपता श्रुति के द्वारा बताई जाने पर भी उसे नहीं ग्रहण कर पाते। अविवेक के कारण होने वाले विपरीत ज्ञान में नौका का दृष्टान्त दिया गया है। एवंच अविवेक से आत्मा में संसारित्वभ्रान्ति लोगों को हुआ करती है ॥ २ ॥ नौस्थस्य प्रातिलोम्येन नगानां गमनं यथा । आत्मनः संसृतिस्तद्वद्ध्यायतीवेति हि श्रुतिः ॥३॥ नौस्थस्येति - जिस प्रकार नांव में बैठे हुए व्यक्ति को तीरवर्ती वृक्षों का विपरीत दिशा में जाना प्रतीत होता है, उसी प्रकार आत्मा के संसरण की प्रतीति होती रहती है। इसी अभिप्राय को 'ध्यायतीव' इस श्रुति ने भी कहा है ॥३॥ हृदयस्पर्शिनी द्वितीय श्लोक की बात को ही पुनः दुहरा रहे हैं- जल में चलती नांव में बैठे व्यक्ति को उपाधि का विवेक न होने से अपनी नांव की गति की दिशा के ठीक विपरीत दिशा की ओर चलते हुए जलाशयतीरवर्ती पर्वत, वृक्ष आदि दिखाई देते हैं, उसी तरह असंसारी आत्मा की संसृति का अनुभव होता है। इसी अभिप्राय को "ध्यायतीव" श्रुति ने भी बताया है ॥ ३ ॥ चैतन्यप्रतिबिम्बेन व्याप्तो बोधो हि जायते । बुद्धेः शब्दादिभिर्भासस्तेन मोमुह्यते जगत् ॥४॥ चैतन्येति - प्रत्येक विषय का ज्ञान चिदाभास के द्वारा विषय के व्याप्त होने पर ही होता है। इसलिये बुद्धि को शब्दादि रूप से आत्मा को ही प्रतीति हो रही है। इस आत्मा-अनात्मा के अविवेक से ही जगत् अत्यन्त मोहित हो रहा है ॥ ४ ॥ हृदयस्पर्शिनी पूर्व श्लोक में दृष्टान्त का वर्णन अच्छी तरह किया गया। अब इस श्लोक में दाष्टन्ति को अच्छी तरह बता रहे हैं- शुक्ति-रजत के समान बुद्धि-आत्मा में अध्यास की बात सुनकर मन में शंका उत्पन्न होती है कि शुक्ति में रजत का सादृश्य आदि संभव होने से 'अन्यत्र अन्यधर्माध्यास' का होना तो ठीक है, किन्तु विषय-विषयीरूप बुद्धि और आत्मा के अत्यन्त विलक्षण (एक दूसरे से अत्यन्त भिन्न) होने से उनमें अन्योन्यधर्माध्यास का होना कैसे संभव हो सकता है ? यदि कहें कि चिदाभास के द्वारा सादृश्य आदि का होना यहाँ भी संभव हो सकता है। किन्तु यह कहना ठीक न होगा, क्योंकि चिदाभास और विषयाकार दोनों का बुद्धि में संक्रमण होने से कृश-स्थूल आदि विषयधर्मों का आत्मा में अध्यास कर और आनन्द आदि आत्मधर्मों का बुद्धि में अध्यास (आरोप) कर मैं कर्ता हूँ, मैं भोक्ता हूँ इस प्रकार लोकव्यवहार चलता रहता है। बुद्धि (अन्तःकरण) में पड़े हुए चैतन्य के प्रतिबिम्ब को ही 'चिदाभास' कहते हैं। उस चिदाभास से बुद्धि का बोध व्याप्त हुआ करता है, अर्थात् बुद्धि, विषयाकार (विषय के आकार की) हो जाती है। आत्मा को अपने आभास का विवेक न होने के कारण शब्दादि विषयों के द्वारा (बुद्धि की वृत्ति में व्याप्त विषयों के द्वारा) विषयभूत देहादि के रूप में अपना भास (स्फुरण) होता रहता है। श्लोक में 'शब्दादिभिः' यह इत्थंभाव अर्थ में तृतीया विभक्ति का प्रयोग किया गया है। यदि “शब्दादिनिर्भासः" पाठ हो तो उसे "बोध" का विशेषण समझना चाहिए, और 'शब्दादिविषय का निर्भास है जिसमें' ऐसा बहुव्रीहि करना चाहिए। देहादि विषय और चैतन्य का बुद्धिवृत्तिरूप एक ही स्थान में संश्लेष-सा हो जाता है, तब एक-दूसरे का विवेक (भेदज्ञान) न हो पाने से संसारी लोग अत्यन्त मोहित रहते हैं। जैसे नाव में बैठे हुए व्यक्ति को नाव के चलने का अनुभव नहीं होता अपितु अचल वृक्षों के चलने का उपाधि के सामर्थ्य से अनुभव होता है। उसी प्रकार बुद्धिस्थित आत्मा देहात्मभाव को प्राप्त हुआ-सा उसके ४

२६ उपदेशसाहस्री (बुद्धि के) व्यापार को पृथक् अनुभव नहीं करता। अपने (बुद्धि में पड़े हुए) आभास का विवेक न होने से अपने में (चिदात्मा में) ही विकार का आरोप कर लेता है और मिथ्या अनुभव करता रहता है। इसी अभिप्राय का समर्थन ‘ध्यायतीव’ इत्यादि श्रुति के द्वारा किया गया है। अतः उपाधि के कारण उसे अपने में संसारी होने का भ्रम होता है ॥ ४ ॥ चैतन्यभास्यताहमस्तादर्थ्यं च तदस्य यत् । इदमंशप्रहाणे न परः सोऽनुभवो भवेत् ॥५॥ चैतन्येति—चिज्जडग्रन्थिरूप अहंकार की चैतन्यभास्यता (दृश्यता) और उसका आत्मार्थ (आत्मा का अंगभूत) होना, ये दोनों बातें अहंकार से ही संबन्धित हैं। इस इदमंश (अहंकार के दृश्यत्व) का विवेक हो जानेपर उपर्युक्त दोनों नहीं रह पाते, तब जो अनुभव होता है वही, पर-आत्मा है ॥ ५ ॥ हृदयस्पर्शिनी अभी तक यह बताया गया था कि संसाराध्यास अविवेकाधीन है। किन्तु पदार्थ के स्वरूप का यथार्थ ज्ञान (विवेकज्ञान) हुए पुरुष की वेदान्तवाक्य से ‘अहं ब्रह्मास्मि’ इस प्रकार बुद्धिवृत्ति होती है, तब उसे मुक्ति का लाभ होता है। अतः मुमुक्षु को चाहिए कि वह पदार्थविवेकशील बने। चिदचिद्ग्रन्थिरूप अहंकार (अहम्) की जो चैतन्यभास्यता (दृश्यता) है, और चिदात्मा के लिए विषयोपस्थापक होने से उसका (अहंकार का) तदर्थ्य, है। ये दोनों (अहंकार की दृश्यता और चिदात्मा के प्रति अंग बनना) अहंकार से संबंधित हैं, उसमें ‘इदम्’ अंश का विवेक (प्रहाण) होने पर ये दोनों नहीं होंगे। अभिप्राय यह है कि अहंकार की चैतन्याकारता, जो मोह से प्राप्त हुई है और अहंकार में जो चेतनशेषत्व है, वह भी मोह से ही सिद्ध है, किन्तु यहाँ पर (अहम् में) ‘इदम्’ अंश का विवेक के द्वारा परित्याग करने पर उक्त दोनों बातें, जो मोह से हो रही थीं, वे नहीं हो पातीं। तब जो अनिदं अंश (इदम् अंश से भिन्न), जो अनुभव साक्षी के रूप में है, शेष रह जाता है (बचा रहता है) वही पर (परमात्मा) ही होगा। वही ‘अहं ब्रह्म’ वाक्य का अर्थ है। अथवा—जबकि इस अहंकार में चैतन्यभास्यता, (जड़ता) और तच्छेषत्व है, इस कारण यह अहंकार ‘आत्मा’ नहीं है। इस प्रकार वेद्यांश का त्याग करने से और अस्मदर्थता के अभिमान का त्याग करने से जो अनुभव होता है, वही पर-आत्मा है, यह निश्चय करना चाहिए। अथवा अहंकार के इदमंश को पृथक् करने से उस सर्वोत्कृष्ट ‘पर’ का अनुभव होता है। निष्कर्ष यह है कि अनिदंरूप अहंकार के इदमंश का मनन के द्वारा बाध होनेपर जो अवशिष्ट, अवाध्य अंश है, वही आत्मा है, यह अनुभव होगा। यदि कोई कहे कि ‘अहम्’ इस प्रतीति में ‘इदम्’ अंश का तो भास है ही नहीं, जिसके प्रहाण से सर्वोत्कृष्ट अनुभव होगा, किन्तु यह कथन ठीक नहीं है। सुषुप्तिकाल में केवल आत्मा का ही भान होता है। अहंकार का उस काल में अवभास नहीं होता, इसी कारण उसका अनात्मत्व निश्चित होता है। जाग्रत्काल में वह अहंकार अपने आप स्वयं आ जाता है, अतः उसमें चैतन्यभास्यता सिद्ध हो जाती है। इस कारण कहना होगा कि ‘अहम्’ इस प्रकार के अवभास में ‘इदम्’ अंश के न रहने पर भी चैतन्यभास्यत्वेन रूपेण इदमाकारता भासित होती है। दूसरा कारण यह भी है कि आत्मा में कर्तृत्व, भोक्तृत्व आदि व्यवहारनिर्वाहक के रूप में अहंकार, आत्मार्थ है अर्थात् आत्मा का शेष (अंग) है। इससे भी सिद्ध होता है कि ‘अहम्’ इस अवभास में अनात्मरूप ‘इदमंश’ है। एवंच उस इदमंश के प्रहाण से ब्रह्मात्मानुभव अवश्य हो सकता है। इस प्रकार पदार्थ का परिशोधन करनेपर वेदान्तवाक्योत्पन्न ‘अहं ब्रह्मास्मि’ यह ज्ञान होने से मनुष्य मुक्त हो जाता है ॥ ५ ॥ ॥ इति पञ्चमम्बुबुद्धयपराधप्रकरणं समाप्तम् ॥

पद्यभाग ६: विशेषापोहप्रकरणम्

विशेषापोहप्रकरणम् छित्त्वा त्यक्तेन हस्तेन स्वयं नात्मा विशेष्यते । तथा शिष्टेन सर्वेण येन येन विशेष्यते ॥१॥ छित्वेति—काटकर डाल दिये हुए हाथ द्वारा स्वयं आत्मा ('मैं हाथवाला हूँ') इस प्रकार विशेषित नहीं होता, उसी प्रकार त्यक्तहस्तातिरिक्त सभी से अर्थात् छिन्न हाथ के अतिरिक्त शेष (बचे हुए) मनुष्यत्वादि जिन जिन विशेषणों से विशेषित किया जाता है, उनमें से किसी से भी वास्तव में वह विशिष्ट नहीं है ॥१॥ हृदयस्पर्शिनी वेदान्तवाक्य से 'अहं ब्रह्मा' मैं ब्रह्म हूँ, यह ज्ञान पदार्थविवेकवान् को होता है, यह पूर्व प्रकरण में बता चुके । वहीं पर 'अहम्' में स्थित 'इदमंश' के प्रहाण से साक्षितत्त्व (आत्मतत्त्व) के शोधन का सूक्ष्म उपाय भी बता चुके, किन्तु उस सूक्ष्म उपाय को अपनाने में जो असमर्थ हो, उसके लिये पदार्थशोधन के स्थूल उपाय को बताने के उद्देश्य से इस प्रकरण का आरंभ किया जा रहा है। जो वस्तु अपने स्वरूप को अलग करके ज्ञात नहीं हो सकती, जैसे अग्नि की उष्णता; उष्णता तो अग्नि का स्वरूप ही है, वह अग्नि का विशेषण नहीं है, तथापि कहीं कहीं भेद की कल्पना कर विशेषणता का भी व्यवहार लोग किया करते हैं। सत् आत्मा में सत्ता, चैतन्य, आनन्द का कभी भी अभाव (विनाश) न होने से वे आत्मा के विशेषण नहीं हैं, अपितु वे आत्मा के स्वरूप हैं। और कृश, स्थूल, कृष्ण, गौर, मनुष्य, श्रोता, द्रष्टा, वक्ता, कामी, क्रोधी, ज्ञानी, कर्त्ता, भोक्ता, सुखी, दुःखी ऐसे ही अन्य भी आत्मा के विशेषण कहे जाते हैं, क्योंकि ये सत्ता आदि के समान आत्मा के स्वरूपभूत नहीं हैं। क्योंकि सुषुप्ति अवस्था में आत्मा की सत्ता रहने पर भी कृश, स्थूल आदिकों का अभाव रहता है। इन सबसे पृथक् रहने वाले में कूटस्थता का निश्चय करना चाहिये। जैसे हाथ कटने के बाद 'मैं हाथ वाला हूँ' ऐसा विशिष्ट प्रत्यय किसी को नहीं होता, वैसे ही 'मैं पैर वाला हूँ' ऐसा विशिष्ट प्रत्यय भी नहीं करना चाहिये ॥१॥ तस्मात्त्यक्तेन हस्तेन तुल्यं सर्वं विशेषणम् । अनात्मत्वेन तस्माज्ज्ञो मुक्तः सर्वैर्विशेषणैः ॥२॥ तस्मादिति—आत्मस्वरूप के अतिरिक्त समस्त वस्तुएँ अनात्म होने के कारण, वे सभी विशेषण, काटकर फेंक दिये गये हाथ के समान ही हैं। अतः आत्मा, अखिल (समस्त) विशेषणों से रहित है ॥२॥ हृदयस्पर्शिनी श्रोत्र आदि स्थूलदेहाश्रय होने से आत्मा के विशेषण नहीं हो सकते तो न हों, सुख-दुःखादि जो स्थूल- देहाश्रय नहीं हैं, उन्हें तो आत्मा के विशेषण समझा ही जा सकेगा। किन्तु विचार करने पर वे भी आत्मविशेषण नहीं बन पाते। स्थूल, सूक्ष्म दोनों देहों के धर्मों का आत्मा में व्यभिचार पाया जाता है, यह बात सभी के स्वानुभव- गम्य है। ऐसे व्यभिचारी धर्मों को आत्मविशेषण मानकर उनसे आत्मा को विशेषित नहीं समझना चाहिये। ये जितने भी अनात्मधर्म, अनात्मवस्तुएँ हैं, वे सब देह के ही विशेषण होते हैं, आत्मा के नहीं; वे सत्, चित्, आनन्द के समान आत्मा के स्वरूप भी नहीं हैं। इसीलिये ऐसा अनुमान प्रयोग भी करते हैं—'विमतानि विशेषणानि नात्म- स्वभावभूतानि विशेषणत्वात् छित्त्वा त्यक्तहस्तवत्।' इस कारण यह 'ज्ञ' अर्थात् विवेकज्ञानवान् समस्त विशेषणों से रहित चित्-सत्-आनन्दमात्रस्वरूप से ही अवशिष्ट रहता है ॥२॥

२८ उपदेशसाहस्री विशेषणमिदं सर्वं साध्वलङ्करणं यथा । अविद्याध्यक्षस्तमतः सर्वं ज्ञात आत्मन्यसद्भवेत् ॥३॥ विशेषणमिति—अविद्या से उत्पन्न हुए अध्यास के कारण होनेवाले ये समस्त विशेषण भी पुरुष के आभूषणों के समान ठीक ही हैं। किन्तु आत्मज्ञान होने पर ये सब असत् ही हैं, ऐसा निश्चय होता है ॥ ३ ॥ हृदयस्पर्शिनी उपर्युक्त रीति से विशेषणों के अनात्मरूप रहने पर भी उनका आत्मा से वियोग नहीं है, क्योंकि आगम तथा अपाय के द्वारा उनका आत्मा से सम्बन्ध निरन्तर बना रहता है। तथापि ये सब विशेषण अलंकार की तरह हैं। जैसे अलंकारों का अलंकार्य व्यक्ति के साथ सम्बन्ध रहने पर भी, वे अलंकार्य व्यक्तिस्वरूप या उसके धर्म नहीं समझे जाते, केवल उनका औचित्य समझा जाता है। अन्यथा उनका निकालना-पहिनना (आगम-अपाय) नहीं बन सकेगा। यदि ऐसी बात है तो 'मनुष्योऽहम्' मैं मनुष्य हूँ, ऐसी मनुष्यत्व के साथ तादात्म्य प्रतीति क्योंकर होती है ? तो उत्तर होगा कि मोह से ही वैसी प्रतीति होती है। ये सभी विशेषण आत्मा में अविद्या के द्वारा अध्यस्त हैं। अतः आत्मा के ज्ञात होने पर जब अविद्या की निवृत्ति हो जाती है, तब असत् पदार्थों का बाध हो जाता है। अर्थात् किसी भी काल में वे विद्यमान नहीं हैं यह निश्चय हो जाता है ॥ ३ ॥ ज्ञातैवात्मा सदा ग्राह्यो ज्ञेयमुत्सृज्य केवलः । अहमित्यपि यद्ग्राह्यं व्यपेताङ्गसमं हि तत् ॥४॥ ज्ञातैवेति—अतः ज्ञेय ( दृश्य ) का बाघ करके आत्मा का केवल ज्ञातारूप से ही सर्वदा अनुभव करना चाहिये। 'अहम्' इस प्रकार ग्राह्य ( ज्ञेय ) रूपसे आत्मा का जो अनुभव हो रहा है, वह भी कटे हुए अंग के समान ही वस्तुतः अनात्मा ही है ॥ ४ ॥ हृदयस्पर्शिनी पूर्व श्लोक में "ज्ञात आत्मन्यसद् भवेत्" कहा गया है। 'तब ज्ञाते आत्मनि' अर्थात् आत्मा के ज्ञात होनेपर कहने से आत्मा में 'ज्ञेयत्व' धर्म की प्रतीति होगी, और अन्य विशेषणों की तरह 'ज्ञेयत्व' में अनात्मत्व कहना होगा। अतः 'ज्ञायमानत्व धर्म' से वस्तु में अनात्मत्व समझना उचित नहीं है। अर्थात् ज्ञेय पदार्थों को अनात्मा कहना ठीक नहीं है। क्योंकि 'आत्मा' भी ज्ञेय है। किन्तु इस शंका का समाधान इस प्रकार होगा कि 'ज्ञेय' ( दृश्य ) अंश का त्याग कर जो सर्वदा सबका ज्ञाता है, वही 'आत्मा, है। ग्राह्यांश (ज्ञेयांश) आत्मा नहीं है। इतना ही नहीं, वह 'केवल' है, अर्थात् 'ज्ञातृत्व' विशेषण से भी रहित है। 'ज्ञातृत्व' तो उसका उपलक्षक है। एवं च ज्ञातृत्व से उपलक्षित ( सूचित ), अलुप्तप्रकाशस्वभाव होने से सर्वानुस्यूत, चिन्मात्र जो वस्तु है, वही 'आत्मा' है, इस प्रकार का ज्ञान विवेकी पुरुष को होता है। 'अहम्' इस प्रकार अनुभूयमान होने से ( अनुभव का विषय होने से ) ज्ञाता को ही 'आत्मा' कैसे कहा जाय ? शंका करनेवाला यद्यपि 'इदम् अहम्' 'यह मैं, इस प्रकार 'ग्राह्य' को ही आत्मा समझता है, तथापि वह ( इदमंश ) तो कटे हुए हाथ की तरह ही है। क्योंकि सुषुप्ति, मूर्छा की अवस्था में आत्मा के रहनेपर भी उसकी 'अहम्'-मैं-के द्वारा प्रतीति नहीं होती। अतः 'आत्मा' के रहनेपर उसकी 'अहम्' से प्रतीति अवश्य होती ही है, ऐसा कोई नियम नहीं है। वह तो आत्मा के द्वारा दृश्य है, इसलिये उसे आत्मा नहीं कह सकते। एवं च 'आत्मा' अहंप्रत्यय से भी ग्राह्य नहीं है ॥ ४ ॥ यावान् स्यादिदमंशो यः स स्वतोऽन्यो विशेषणम् । विशेषक्षयो यत्र सिद्धो ज्ञश्चित्रगुर्यथा ॥५॥ यावानिति—'अहम्' इस प्रत्यय में जितना 'इदम् अंश' ( दृश्यत्व ) है, वह आत्मा से पृथक् होने के कारण उसका विशेषण ही है। इस विशेषांश का भी जहाँ क्षय हो जाता है, वहाँ चित्रगु के समान आत्मा का निश्चय हो जाता है ॥ ५ ॥

विशेषापोहप्रकरणम् २९ हृदयस्पर्शिनी जब कि 'आत्मा' अहं प्रत्यय से भी ग्राह्य नहीं, चक्षुरादि इन्द्रियों से भी ग्राह्य नहीं, तब उसके अस्तित्व में क्या प्रमाण है ? इस प्रकार शंका करना ठीक नहीं है, क्योंकि आत्मा की सिद्धि स्वयमेव ही है, उसकी सिद्धि में अन्य की अपेक्षा नहीं होती । चिदचिदात्मक 'अहम्' प्रत्यय में जितना अचिदात्मक अहंकारादि इदमंश है, वह जिसका विशेषण हो, वही प्रत्यगात्मा है । एवं च अहंकारादि विशेषणों से अतिरिक्त, तथा समस्त विशेषणों की व्यावृत्ति (प्रक्षय) जहाँ हो जाती है, अर्थात् निर्विशेष और किसी अन्य की अपेक्षा किये बिना ही जिसका स्वरूप स्फुरित (लब्धसत्ताक) होता रहता है, वही प्रत्यगात्मा है। जैसे 'चित्रगुः देवदत्तः' में 'चित्रगुः' देवदत्त का विशेषण है। उस विशेषण से देवदत्त बिलकुल पृथक् है । उक्त विशेषण से सम्बन्ध होने के पूर्व ही उसका अस्तित्व सिद्ध है, अपनी सिद्धि (अस्तित्व) के लिये उसे विशेषण से सम्बन्ध रखने की आवश्यकता नहीं होती, उसी तरह 'आत्मा' भी अहंकारादि से सम्बन्ध होने के पूर्व से ही अपनी महिमा (प्रभाव) के द्वारा ही सिद्ध है। उसे अपने अस्तित्व के लिये अहंकार आदि की अपेक्षा नहीं होती । इसी अभिप्राय को अनुमान-प्रयोग के द्वारा भी कहा जा सकता है—'विमतं विशेषणं स्वविलक्षणविशेष्यनिष्ठं विशेषणत्वात् चित्रगुत्ववत् ।' एवं च प्रत्यगात्मा का अस्तित्व स्वतः सिद्ध है ॥ ५ ॥ इदमंशोऽहमित्यत्र त्याज्यो नात्मेति पण्डितैः । अहं ब्रह्मेति शिष्टांशो भूतपूर्वगतेर्भवेत् ॥ ६ ॥ इदमिति—'अहम्' इस प्रतीति में केवल 'इदमंश' ही पण्डितों के लिये त्याज्य है । 'आत्मा' का त्याग अभीष्ट नहीं है । 'अहं ब्रह्मास्मि' इस वाक्य में पूर्व प्रसंग के ( भूतपूर्वगति के ) अनुसार अवशिष्ट अंश का ही ग्रहण किया गया है ॥ ६ ॥ हृदयस्पर्शिनी जब कि 'अहम्' भी अनात्मा है तब 'अहं ब्रह्म' यह तादात्म्यबोधक श्रुति कैसे उपपन्न हो सकेगी ? यह शंका, श्रुति के तात्पर्य को न समझने के कारण हो रही है । 'अहं ब्रह्म' यह श्रुति अध्यस्त अहंकार के मूल की निवृत्ति के लिये है, 'अहंकार' में आत्मत्वप्रतिपत्ति कराने के लिये नहीं है, अर्थात् अहम् (अहंकार ) आत्मा है, यह बताने के लिये नहीं है । 'अहम्' कहने पर अहंकार का अवभास होता है, उसमें जो इदमंश है, वह दृश्य होने से 'आत्मा' नहीं है, इस बात को बुद्धिमान् लोग अच्छी तरह समझ लें, अर्थात् उस अहम् ( अहंकार ) में आत्माभिमान न करें । अहंकार के त्यागने पर अवशिष्ट अनिर्दरूप अंश है, वही अहं शब्द से लक्षित ब्रह्म है, इस प्रकार वह जाना जाता है । यदि अहम् में आत्माभिमान नहीं करना है, तो 'अहम् ब्रह्म' श्रुति वैसा निर्देश क्यों कर रही है ? इसका उत्तर तो यह है कि 'अहं ब्रह्म' में जो अहंकार का उल्लेख है, वह भूतपूर्व गति के कारण है । अर्थात् 'भूता सञ्जाता पूर्वमविद्याव- स्थायाम्' अविद्यावस्था में 'अहमात्मा' इस प्रकार जो गति (बुद्धि) हुई थी, यानी ब्रह्मज्ञान होने के पूर्व अविद्यादशा में 'अहमात्मा' अहंकार को ही आत्मा समझ रहे थे, इस दृढ़ परिचय के कारण ही अब वाक्यार्थज्ञान के समय भी अहम् का उल्लेख किया गया है । अहंकार से लक्षित जो वस्तु है, उसका साक्षी 'अहम्' मैं—इस प्रकार श्रुति उल्लेख कर रही है ॥ ६ ॥ ॥ इति षष्ठं विशेषापोहप्रकरणं समाप्तम् ॥

पद्यभाग ७: बुद्ध्यारूढप्रकरणम्

बुद्ध्यारूढप्रकरणम् बुद्ध्यारूढं सदा सर्वं दृश्यते यत्र तत्र वा । मया तस्मात्परं ब्रह्म सर्वज्ञश्चास्मि सर्वगः ॥१॥ बुद्ध्यारूढमिति—मुझे जहाँ-तहाँ, सर्वत्र, सर्वदा बुद्धिवृत्ति पर आरूढ़ हुई ही समस्त वस्तुओं की प्रतीति हुआ करती है, अतः मैं (समस्त दृश्य प्रपञ्च से विलक्षण) सब का साक्षी, सर्वगत ब्रह्म ही हूँ ॥ १ ॥ हृदयस्पर्शिनी अन्वय-व्यतिरेक द्वारा पदार्थों का पर्यालोचन (शोधन) करने वाले को वाक्य से ही वाक्यार्थज्ञान होता है, इस नियम के अनुसार ‘अहं ब्रह्मास्मि’ इस प्रकार के वाक्यार्थज्ञान का होना निश्चित है, तथापि अपने अनुभव के बलपर उसे स्पष्ट करने के लिये इस प्रकरण का आरंभ किया जा रहा है । सर्वत्र (जाग्रत् अवस्था में हो या स्वप्नावस्था में हो, इस लोक में हो या परलोक में हो) और सर्वदा, जो कुछ भी (चाहे वह अध्यात्म हो या अधिभूत हो या अधिदैव हो) प्रत्यक्ष होता है या शास्त्र के द्वारा जाना जाता है, वह सब बुद्धिगत विषय ही उपलब्ध होता रहता है। उन विषयों का प्राप्तिकर्त्ता मैं तो निर्विकार हूँ, साक्षी हूँ। निर्विशेष निर्विकार होने से मैं ही परब्रह्म हूँ। सर्व दृश्य विषयों से विलक्षण होने से ‘पर’ हूँ, और प्रपञ्चातीत होने से ‘ब्रह्म’ हूँ। सर्वार्थप्रकाशक (सर्वज्ञ) और अपरिच्छिन्न (सर्वग) हूँ ॥ १ ॥ यथात्मबुद्धिचाराणां साक्षी तद्वत् परेष्वपि । नैवापोढुं न चाऽऽदातुं शक्यस्तस्मात्परो ह्यहम् ॥२॥ यथेति—जिस प्रकार अपनी बुद्धि के स्थूल-सूक्ष्मादि देहरूप विषयों का मैं साक्षी हूँ, उसी प्रकार दूसरों के शरीरों में भी मैं उनका साक्षी हूँ। अतः सर्वगत होने के कारण मेरा ग्रहण या त्याग नहीं किया जा सकता, अतएव मैं समस्त प्रपञ्च से विलक्षण परमात्मा ही हूँ ॥ २ ॥ हृदयस्पर्शिनी आत्मा को सर्वज्ञ (सर्वार्थप्रकाशक) कहा गया है, किन्तु वह कैसे संभव हो सकता है? क्योंकि अन्य पुरुष की बुद्धि में स्थित वस्तु (विषय) की उपलब्धि या स्मरण किसी अन्य पुरुष को होना कभी संभव नहीं, अतः एक आत्मा में सब की बुद्धियों की अध्यक्षता का कथन संगत नहीं है। कल्पना किये हुए (कल्पित) आत्मीय संघात में बुद्धि और उसकी वृत्तियों का जिस प्रकार मैं साक्षी हूँ, उसी प्रकार परकीयत्वेन कल्पित संघात में भी तत्तद् बुद्धि और उनकी वृत्तियों का मैं ही साक्षी हूँ, क्योंकि भिन्न-भिन्न साक्षी के होने में कोई प्रमाण नहीं है। अभिप्राय यह है कि आत्मा के साथ बुद्धि का संबंध सर्वव्यवहारप्रवर्तक होने के कारण है। ऐसी आत्मबुद्धि (आत्मसंबन्धिनी बुद्धि) का प्रचार (चार) जिनमें है, ऐसे उन अध्यात्म, अधिदैवरूप स्थूल, सूक्ष्म देहों (आत्मबुद्धिचारों) का साक्षी (स्फोरक) जैसे मैं हूँ, वैसे ही परकीय बुद्धिचारों का भी मैं ही साक्षी हूँ। यही अभिप्राय श्रुति से भी अवगत होता है कि एकमात्र चिदेकरस मुझ आत्मा में ही समस्त प्रमातृतद्बुद्धितत्प्रचारगोचर प्रपञ्च कल्पित किया गया है, इस कारण मुझे ‘सर्वज्ञ’ समझना ठीक ही है। इस प्रकार से जब कि मैं सर्वसाक्षी होने के कारण और सर्वाधिष्ठान होने के कारण सर्वज्ञ और सर्वगत हूँ, अतः उसका अपोह (निराकरण) करना उचित नहीं है, अर्थात् ‘यह इसका द्रष्टा नहीं है, यहाँ वह नहीं है, ऐसा निराकरण करना किसी के द्वारा भी संभव नहीं है। इसी प्रकार ज्ञान या क्रिया के द्वारा मुझे प्रकाशित करना या उत्पन्न करना भी संभव नहीं है। क्योंकि मैं ग्राह्य-ग्राहकादि प्रपञ्च से विलक्षण हूँ, अर्थात् हानोपादानादि समस्त सांसारिक व्यवहार के परे हूँ। इसलिये मैं पर (परमात्मा) ही हूँ, क्योंकि भेद की निन्दा शास्त्र में की गई है ॥ २ ॥

बुद्ध्यारूढप्रकरणम् ३१ विकारित्वमशुद्धत्वं भौतिकत्वं न चात्मनः। अशेषबुद्धिसाक्षित्वाद्, बुद्धिवच्चाल्पवेदना ॥३॥ विकारित्वमिति—आत्मा में विकारित्व, अशुद्धत्व तथा भौतिकत्व नहीं है। तथा समस्त बुद्धियों का साक्षी होने से उसमें बुद्धि के समान अल्पज्ञता भी नहीं है ॥ ३ ॥ हृदयस्पर्शिनी बुद्ध्यारूढ (बुद्धिगत) समस्त विषयों को यदि वह क्षेत्रज्ञ प्रकाशित करता है, तो उसे दर्शनक्रिया का कर्ता कहना होगा। कर्ता होने से उसमें विकारित्वादि दोषों का होना अपरिहार्य है, तब तो उसे 'अनात्मा' ही कहना होगा। किन्तु ऐसी आशंका करना ठीक नहीं है, क्योंकि बुद्धि की तरह उसमें सावयवत्व न होने से उसे विकारी नहीं कह सकते, वह तो समस्त विकारों का साक्षी है। अतएव क्रियागुणयोगित्व (दर्शनक्रियाकर्तृत्व) उसमें न होने से उसकी अशुद्धता का भी निरसन हो जाता है। वह तो सकलगुणक्रियाविशिष्ट वस्तुओं का साक्षी है। उसी तरह रूपरहित होने से उसे भौतिक भी नहीं कह सकते। दूसरी बात यह भी है कि बुद्धि की तरह उस आत्मा में अल्पज्ञान (वेदना) भी नहीं है। जैसे बुद्धि को बुद्धि और उसके संसर्गादिविषयों का ही ज्ञान रहता है, वैसा आत्मा को उतना ही सीमित ज्ञान नहीं है। वह तो अशेष (समस्त) बुद्धियों का साक्षी है, इतना ही नहीं, उसके समस्त विकारों का भी वह साक्षी है। एवंच आत्मा में विकारित्व, सगुणत्व, भौतिकत्व और बुद्धि की तरह अल्पद्रष्टृत्व नहीं है। तात्पर्य यह है कि अशेष विकारों का साक्षी होने से विकारित्व नहीं, अशेष अशुद्धियों का साक्षी होने से अशुद्धत्व नहीं, उसी तरह सगुणत्व, सदोषत्व भी नहीं है। समस्त भौतिक पदार्थों का साक्षी होने से वह भौतिक भी नहीं है। सर्व बुद्धियों का साक्षी होने से बुद्धि की तरह अल्पज्ञ भी नहीं है ॥ ३ ॥ मणौ प्रकाश्यते यद्वद्रक्ताद्याकारताऽऽतपे । मयि संदृश्यते सर्वमातपेनेव तन्मया ॥४॥ मणाविति—जिस प्रकार स्फटिक में लालिमा की प्रतीति सूर्य के प्रकाश में होती है, उसी तरह मेरी विद्या- मानता में ही बुद्धिस्थ सम्पूर्ण विषय प्रकाशित होते रहते हैं ॥ ४ ॥ हृदयस्पर्शिनी यह क्षेत्रज्ञ आत्मा, बुद्धि की तरह अल्पज्ञ नहीं है, यह बताया। जबकि क्षेत्रज्ञ, बुद्धि के समस्त विषयों का ग्राहक है तब तो उसके लिये कोई कर्तव्य बचा ही नहीं। और उसे द्रष्टा मानने पर उसमें विकारित्व तो अर्थात् प्राप्त होता है। निष्कर्ष यह है कि यदि आत्मा को निर्विकार ही मानें तो वह सर्वार्थप्रकाशक कैसे कहा जा सकता है? इस आशंका का समाधान एक दृष्टान्त के द्वारा करते हुए 'निर्विकार' ही सर्वार्थ प्रकाशक हो सकता है यह बता रहे हैं। जैसे स्फटिकमणि में जपापुष्परूप रक्ताकारता के न रहने पर भी, वह सूर्य के प्रकाश में ही अभिव्यक्त होती है, वैसे ही सूर्यस्थानापन्न मुझ क्षेत्रज्ञ के विद्यमान रहने पर ही स्फटिकमणि के स्थानापन्न बुद्धि में जपापुष्प- रक्तता आदि के स्थानापन्न सम्पूर्ण विषय दिखलाई पड़ता है। तस्मात् आतप के समान निष्प्रकम्प मेरे द्वारा ही सब कुछ प्रकाशित किया जाता है। निष्कर्ष यह है कि सूर्यप्रकाश से लालिमा (रक्ताकारता) की प्रतीति की तरह बुद्धिस्थ सम्पूर्ण विषय क्षेत्रज्ञ के द्वारा ही प्रकाशित होने योग्य हैं। अतः क्षेत्रज्ञ का होना आवश्यक है। अतः बुद्धि की तरह वह विकारवान् नहीं है। उसके द्रष्टृत्व को सुनकर उसमें विकारित्व की शंका करना ठीक नहीं है, क्योंकि सूर्य के समान कुछ बिना किये ही अपने व्यापार के बिना ही केवल अपनी सन्निधिमात्र से ही उसमें सर्वविषयप्रकाशकत्व संगत हो जाता है। यदि कदाचित् द्रष्टृत्व के कारण उसके विकारी होने की आशंका से 'बुद्धि' को ही द्रष्ट्री कहें तो वह उचित न होगा। इस रीति से बुद्धि को द्रष्ट्री न मानने पर उसका (बुद्धि का) उपयोग (आवश्यकता) ही क्या है? यह शंका होना स्वाभाविक है, किन्तु उसका समाधान यह है कि 'चैतन्य' में विषयविशेष का आकार देने के लिये उसका (बुद्धिका) उपयोग होता है ॥ ४ ॥ १. ज्ञाल्य.-पाठान्तरम् ।

३२ उपदेशसाहस्री बुद्धौ दृश्यं भवेद्बुद्धौ सत्यां नास्ति विपर्यये । द्रष्टा यस्मात्सदा द्रष्टा तस्माद्द्वैतं न विद्यते ॥ ५ ॥ बुद्धाविति—बुद्धि के रहने पर ही बुद्धि में दृश्य की प्रतीति होती है। उसके न रहने पर नहीं होती, किन्तु साक्षी आत्मा तो सर्वदा ही साक्षी रहता है। इस कारण 'द्वैत' की सत्ता नहीं है ॥ ५ ॥ हृदयस्पर्शिनी अब प्रत्यगात्मा की अद्वितीयता को बताते हुए उसकी शुद्धता को बता रहे हैं। जाग्रत् ( जागरित ) अवस्था में अविद्या के द्वारा कल्पित ( अध्यस्त ) उस बुद्धि में आरूढ़ हुआ दृश्य ही द्वैतरूप में भासित होता है। सुषुप्ति अवस्था में बुद्धि के न रहनेपर (अविद्या के द्वारा बुद्धि के अध्यस्त न रहनेपर ) वह द्वैतरूप दृश्य नहीं रहता है। अर्थात् द्वैत की सत्ता नहीं रहती। इस व्यभिचार के कारण द्वैत की सत्ता वास्तविक नहीं है। किन्तु साक्षी सभी अवस्थाओं में सर्वदा द्रष्टा ही रहता है, दृश्य की तरह उसकी सत्ता कभी व्यभिचरित नहीं होती। एवंच प्रत्यगात्मा की सत्ता से प्रकाशमानत्व का कहीं व्यभिचार नहीं है। और प्रकाशमानता के साथ व्यभिचार होनेपर 'सत्ता' का होना कभी संभव नहीं हो सकता। तस्मात् सर्वदा प्रकाशमान न होने के कारण द्वैत की सत्ता वास्तविक नहीं है, किन्तु नित्य, शुद्ध, अद्वितीय प्रत्यगात्मा (प्रत्यक् चैतन्य) ही सर्वदा विद्यमान है ॥ ५ ॥ अविवेकात् पराभावं यथा बुद्धिरवैत्तथा। विवेकात्तु परादन्यः स्वयं चापि न विद्यते ॥ ६ ॥ अविवेकादिति—जिस प्रकार अविवेक के कारण बुद्धि को परात्मा के अभाव की प्रतीति होती थी, उसी प्रकार अब विवेक हो जाने पर उस परात्मा से भिन्न वह बुद्धि स्वयं भी नहीं रहती ॥ ६ ॥ हृदयस्पर्शिनी अविद्या से द्वैत की प्रतीति होती है और विद्या से द्वैत की प्रतीति नहीं होती, यह बता चुके; उसी तरह आत्मा के साथ उनका (विद्या, अविद्या का) संसर्ग न होने से प्रत्यगात्मा की शुद्धता में कोई हानि नहीं है। किन्तु वह विद्या और अविद्या साभास बुद्धि की ही हैं। द्वैत की वास्तविक सत्ता न होने से द्वैतसंसर्गकृत 'अशुद्धता' आत्मा में नहीं है, तथापि विद्या-अविद्या के सम्बन्ध होने से आत्मा में अशुद्धि हो सकती है। अविवेक उसे कहते हैं कि जहाँ भेद (विवेक) की प्रतीति (ज्ञान) नहीं हो पाती, जैसे अनात्मा (देह आदि) में आत्माभिमान (आत्मबुद्धि), अर्थात् विपर्ययज्ञान । इस अविवेक (मिथ्या ज्ञान ) के कारण असंसारी तथा सर्वसाक्षी होने के कारण अनात्मवर्ग से भिन्न उस 'पर' आत्मा के अभाव (असत्त्व) को रजस्तमोगुण की अधिकता के कारण बुद्धि ने समझा था, वैसे ही विवेक के हो जाने पर (समस्त अनात्म पदार्थों का निरसन करते हुए आत्मस्वरूप का निर्धारण होनेपर) असंसारी परमात्मा से भिन्न कोई नहीं है। यह जीवात्मा भी उससे भिन्न नहीं है। विवेक के समय 'सत्त्व' का उद्रेक हो जाता है। अतएव श्रवणादि का अनुष्ठान करते हुए ब्रह्मात्मैकत्वविषयक वेदान्तवाक्योत्पन्न उस विवेकज्ञान से परमात्मा के अतिरिक्त कुछ भी उसे दिखाई नहीं देता। अपने कारण सहित वह साभास बुद्धि भी अपना अस्तित्व खो बैठती है, क्योंकि उस समय सभी कुछ प्रत्यग् ब्रह्मरूप हो जाता है। एवञ्च विद्या-अविद्यारूप सम्यग् ज्ञान और भ्रान्तिज्ञान भी बुद्धि के होने के कारण आत्मा में अशुद्धि का गन्ध भी नहीं है ॥ ६ ॥ ॥ इति सप्तमं बुद्ध्यारूढप्रकरणं समाप्तम् ॥