उपदेशसाहस्री (श्रीमच्छङ्करभगवत्पाद विरचिता - 'हृदयस्पर्शिनी' हिन्दी टीका सहित)
Upadesha Sahasri with Hridayasparshini Hindi Commentary
आदि शङ्कराचार्य / पं. गजानन शास्त्री मुसलगांवकर द्वारा
स्रोत: महेश अनुसन्धान संस्थान माउंट आबू · महेश अनुसन्धान संस्थान (उद्गम)
४० उपदेशसाहस्री ज्ञानकर्मता (ज्ञान का कर्म आत्मा है) बताने में नहीं है। तथापि 'यत्र नान्यत् पश्यति' इत्यादि श्रुति के द्वारा आत्मा के लिए अन्य दर्शनादि का निषेध होने से 'द्रष्टव्यः' श्रुति, आत्मा को दर्शन आदि की अभ्यनुज्ञा दे रही है, यह प्रतीत होता है। अतः आत्मा में दृश्यता प्राप्त होने से अन्य दृश्य विषयों के समान उसका असत्त्व ही क्यों न माना जाय ? किन्तु यह शंका ठीक नहीं है। 'यत्र नान्यत् पश्यति' इस श्रुतिवाक्य का तात्पर्य चक्षुरादि के द्वारा भ्रम से होनेवाले अन्यदर्शन आदि की निवृत्ति में है, आत्मा में दर्शनादि की कर्मता के बताने में नहीं है। एवं च 'द्रष्टव्यः' इस श्रुति से जिस प्रकार ज्ञानकर्मता नहीं बन पाई, उसी प्रकार, 'यत्र नान्यत् पश्यति' श्रुति¹ का पूर्व उपन्यस्त श्रुति के साथ विरोध होने के भय से तथा श्रुति का तात्पर्य आत्मदर्शन विधि में होने के कारण भूमा (ब्रह्म) में ज्ञान की कर्मता तो है ही नहीं, यह निश्चय किया गया है। एवं च अविषय, नित्य, भूमा, प्रत्यगात्मा सर्वान्तर सिद्ध हो जाता है ॥ ९ ॥ ॥ इति नवमं सूक्ष्मताव्यापिताप्रकरणं समाप्तम् ॥ १. ३'यत्र नान्यत् पश्यति नान्यच्छृणोति नान्यद्विजानाति स भूमा'—( छां. उ. ७।२४।१ )
पद्यभाग १०: दृशिस्वरूपपरमार्थदर्शनप्रकरणम्
दृशिस्वरूपपरमार्थदर्शनप्रकरणम् दृशिस्वरूपं गगनोपमं परं सकृद्विभातं त्वजमेकमक्षरम् । अलेपकं सर्वगतं यदद्वयं तदेव चाहं सततं विमुक्त ॐ* ॥१॥ दृशीति—जो दृशिस्वरूप ( चेतनस्वरूप ); आकाश जैसा व्यापक है, इन्द्रियादि से परे है, नित्य प्रकाशमान है, अजन्मा है, एक है, अविनाशी है, असंग है, सर्वगत और अद्वितीय है—वही 'मैं' हूँ । अतः सदा मुक्त हूँ, ॐ ॥ १ ॥ हृदयस्पर्शिनी पूर्व प्रकरण में आत्मा की निर्विषयज्ञानस्वभावता को युक्ति से सिद्ध किया था, अब इस प्रकरण में उसी को अनुभव के द्वारा प्रकट करते हुए अविषय प्रत्यगात्मा का ज्ञान (आत्मज्ञान) निर्विषय ही होता है, यह बताया जा रहा है । एक बार में ही स्फुरित होनेवाला अर्थात् स्पष्टरूप से भासमान जो अक्षर ब्रह्म है, वही 'मैं' सदा से हूँ, अतः मैं विमुक्त हूँ । गुरु के द्वारा शिष्य को बताया हुआ जो आत्मस्वरूप है, उसे 'मुमुक्षु शिष्य ने अच्छी तरह समझ लिया है' यह ॐ कार के द्वारा सूचित किया है। एवंच 'ॐ' शब्द स्वीकृति का सूचक है । अथवा आत्मा का उक्त स्वरूप ॐ कार द्वारा मुमुक्षुओं की बुद्धि में अभिव्यक्त होता है—यह बताने के लिए ॐ का निर्देश किया है ॥ १ ॥ दृशिस्तु शुद्धोऽहमविक्रियात्मको न मेऽस्ति कश्चिद्विषयः स्वभावतः । पुरस्तिरश्चोर्ध्वमधश्च सर्वतः +सम्पूर्णभूमा त्वज आत्मनि स्थितः ॥२॥ दृशिस्त्विति—मैं तो ज्ञानस्वरूप ( दृशिः) हूँ, अतएव शुद्ध हूँ, निर्विकार हूँ, वस्तुतः मेरा कोई विषय नहीं है। मैं आगे, पीछे, ऊपर, नीचे, सभी ओर परिपूर्ण व्यापक रूप हूँ । मैं अजन्मा हूँ, और अपने स्वरूप में ही स्थित हूँ ॥ २ ॥ हृदयस्पर्शिनी 'दृशि' (ज्ञानस्वरूप चेतन) को आकाश के समान अलेपक कहा गया था, किन्तु वह संगत नहीं प्रतीत हो रहा है, क्योंकि दृशि का दृश्य के साथ सम्बन्ध रहने से उसमें अशुद्धि और विक्रिया (विकार) होना निश्चित है। किन्तु इस आशंका का समाधान इस श्लोक के द्वारा किया जा रहा है कि 'दृशि' तो आत्मस्वरूप है, उसके नित्य शुद्धत्व आदि का निश्चय श्रुति ने ही कर दिया है । भगवती श्रुति ने क्या बताया है, उसे बताते हैं—मैं तो दृशि अर्थात् ज्ञानस्वरूप हूँ, अतः वस्तुतः (परमार्थतः) शुद्ध हूँ, क्योंकि अशुद्धि तो अज्ञान से होती है अर्थात् वह तो अज्ञाननिबन्धन है, और अज्ञान, आभासरूप है यह हमें' मन्त्रवर्ण से ज्ञात होता है। दूसरा कारण यह है कि वह (आत्मा) विक्रियात्मक (विकाररूप) प्राणादिकों से अन्य (अतिरिक्त) है, अर्थात् अविक्रियात्मक है । इसी अभिप्राय को श्रुति ने भी कहा है२ । अतः इसकी (आत्मा की) शुद्धता में कोई किसी प्रकार का सन्देह नहीं है। परमार्थतः (स्वभावतः) आत्मा के साथ विषय का भी सम्बन्ध (विषयसंसर्ग) नहीं है, इस कथन से यह ज्ञात होता है कि विकार के हेतुभूत विषयों के न होने से भी वह (आत्मा) अविक्रिय (विकाररहित) है। श्रुति३ ने भी इसी अभिप्राय का समर्थन किया है। विषय के न होने से उस आत्मा की अद्वयरूपता को छान्दोग्य के भूमवाक्यांश में इस प्रकार कहा है४—आत्मा का स्वरूपावस्थान किसी के अधीन नहीं है अर्थात् स्वतंत्र है, ऐसा उपन्यास (आरंभ) करके उसी के उपपादनार्थ यह बताया कि पूर्वादि विभाग
- शिवगीता—१।७ से तुलना की जा सकती है । † सुपर्ण०—पाठः मुक्ति० उप० (२।७४) १. 'शुद्धमपापविद्धम्'—( ई. उ. ८ ) २. 'अप्राणो ह्यमनाः शुभ्रः'—( मुं. उ. २।१।२ ), तथा 'अस्थूलमनण्वह्रस्वमदीर्घम्'—( बृ. उ. ३।८।८ ) ३. 'न तदश्नाति किञ्चन न तदश्नाति कश्चन'—( छां उ. ७।२४।१ ) ४. 'स भगवः कस्मिन् प्रतिष्ठित इति स्वे महिम्नि यदि वा न महिम्नि ।'—( छां. उ. ७।२५।२ ) ६
४२ उपदेशसाहस्री तथा अधरोत्तरादि भेद से जो भी उपलब्ध हो रहा है, वह सब 'भूमा' ही है। तब यह शंका हो सकती है कि देह से लेकर बुद्धि तक जो भी अहंकारास्पद है, वह 'भूमा' (ब्रह्म) से भिन्न है। किन्तु इस शंका का समाधान बीच में ही कर दिया कि अहंबुद्धिग्राह्य भी 'भूमा' ही है। इदम्-अनिदम् जो भी है, वह सब भूमा ही है, उसके अतिरिक्त कुछ नहीं है। जब भूमा से अतिरिक्त कुछ है ही नहीं, तब भेदक के न रहने से 'प्रत्यगात्मा' ही भूमा है, इस रीति से 'आत्मै- वेदं सर्वम्'१ यहाँ तक के अंशद्वारा छान्दोग्य में सम्पूर्ण को भूमा ही बताया गया है। मैं अपनी महिमा में (आत्मा में) ही स्थित रहता हूँ अर्थात् किसी अन्य के अधीन नहीं हूँ, अतः 'मैं' अज (आविर्भावरहित) हूँ ॥ २ ॥ अजोऽमरश्चैव तथाऽजरोऽमृतः स्वयंंप्रभः सर्वगतोऽहमद्वयः । न कारणं कार्यमतीव निर्मलः सदैकतृप्तश्च ततो विमुक्त ॐ ॥३॥ अज इति—मैं जन्म रहित ( अजन्मा ), अमर, अजर, अमृत, स्वयम्प्रकाश, सर्वगत और अद्वितीय हूँ। मैं किसी का कारण नहीं हूँ और किसी का कार्य भी नहीं हूँ, अपितु अत्यन्त निर्मल और सर्वदा एकमात्र निजानन्द से ही तृप्त हूँ, अतः मैं मुक्त हूँ, ॐ ॥ हृदयस्पर्शिनी आत्मा को अज (जन्मरहित) बताया गया है, तथापि उसे जरा आदि अन्य विकार हो सकते हैं। इस आशंका के समाधानार्थ अनेक श्रुतियों के सहारे ग्रन्थकार ने उसे कूटस्थ, अद्वयस्वरूप बताया है। अत एव उसमें जन्म, जरा आदि कोई विकार नहीं हो पाते। उसकी अजता, अमरता, अजरता, अमृतता, स्वयम्प्रकाशता, सर्वगतता और अद्वयता इन सबके मूल में श्रुतियां हैं२ । इन श्रुतियों के निर्मल, एकतृप्त और विमुक्त आदि अर्थ को ग्रन्थकार ने श्लोक के३ उत्तरार्ध में ग्रथित कर दिया है। वह प्रत्यगात्मा सदा निर्मल है, सदा एकतृप्त है और सदा विमुक्त है। आचार्य के द्वारा जो मेरा स्वरूप बताया गया, वह ठीक वैसा ही है, ऐसी स्वीकृति 'ॐ' कहकर शिष्य दे रहा है ॥ ३ ॥ सुषुप्तजाग्रत्स्वपतश्च दर्शनं न मेऽस्ति किञ्चित्तु मतेर्हि मोहनम् । स्वतश्च तेषां परतोऽप्यसत्वतस्तुरीय एवास्मि सदादृगद्वयः ॥४॥ सुषुप्तेति—सुषुप्ति, जाग्रत्, स्वप्न इन तीनों अवस्थाओं में रहते हुए भी मेरा अपना कोई व्यावहारिक दर्शन नहीं है, अर्थात् तीनों ही अवस्थाओं में मैं किसी दृश्य को प्रकाशित नहीं करता। 'मैं दृश्य को प्रकाशित कर रहा हूँ'— यह तो केवल मोहमात्र है, क्योंकि उन दृश्य पदार्थों की स्वतः या परतः किसी प्रकार की भी सत्ता नहीं है। अतः 'मैं' सदा ही साक्षीस्वरूप अद्वितीय तुरीय ही हूँ ॥ ४ ॥ हृदयस्पर्शिनी यह दृशित्वरूप आत्मा सुषुप्ति, जाग्रत्, स्वप्न तीनों अवस्थाओं में भिन्न-भिन्न प्रकार से जब कि प्रतीत होता रहता है, तब उसे विकाररहित कैसे कहा जा सकता है ? इस शंका का समाधान यह है कि तीनों अवस्थाओं के १. 'आत्मैवेदं सर्वम्'—( छां. उ. ७।२५।२ ) २. 'अजो नित्यः शाश्वतोऽयं पुराणः'—(कठ. उ. २।२८), 'स वा एष महानज आत्मा'—(बृ. उ. ४।४।२२), 'अजरोऽमरोऽमृतोऽभयो ब्रह्म'—( बृ. उ. ४।४।२५ ), 'अत्रायं पुरुषः स्वयंज्योतिः'—( बृ. उ. ४।३।९ ), 'तच्छुभ्रं ज्योतिषां ज्योतिः'—( मुं. उ. १।१।६), 'नित्यं विभुं सर्वगतं सुसूक्ष्मम्'—( मुं. उ. २।२।९ ), 'एको देवः'—( श्वे. उ. ६।११ ), 'एकमेवाद्वितीयम्'— ( छां. उ. ६।२।१) 'तदेतद्ब्रह्मापूर्वमनपरमनन्तरमबाह्यम्'—( बृ. उ. २।५।१९ ) ३. 'न कारणं कार्यमतीव निर्मलः सदैकतृप्तश्च ततो विमुक्त ॐ ॥ ३ ॥ निर्मलः—'निरञ्जनः परमं साम्यमुपैति'—( मु० उ० ३।१।३ ) एकतृप्तः—'आनन्दं ब्रह्मणो विद्वान् न बिभेति कुतश्चन'—( तै. उ. २।९ ) अमृत—'आनन्दरूपममृतं यद् विभाति'—( मुं. उ. २।२।७ ) विमुक्त—'विमुक्तश्च विमुच्यते'—( कठ. उ. ५।१ )
दृशिस्वरूपपरमार्थदर्शनप्रकरणम् ४३ साक्षी के रूप में रहने वाले मेरी ( मुझ आत्मा की ) अपनी-सी ( आत्मीय-सी ) या मेरे स्वरूप जैसी ( आत्मीयमिव या स्वरूपभूतमिव ) व्यावहारिक वस्तु कोई भी नहीं दिखाई देती । फिर भी व्यवहार में ( जाग्रत् आदि अवस्था में ) जो वस्तु मेरी आत्मीय-सी या मत्स्वरूप-सी प्रतीत होती रहती है, वह सब अविद्या ( अविवेक या मोहन ) से आरोपित ( अध्यारोपित ) है । क्योंकि जाग्रदादि अवस्थारूप या जाग्रदादि अवस्थाओं में दिखाई देनेवाली वस्तुओं की सत्ता न स्वतः है और न परतः ही है । अर्थात् उन वस्तुओं की सत्ता ( सत्त्व ) और उनका स्फुरण स्वयं हो नहीं सकता ( अन्य- निरपेक्ष सत्त्व संभव नहीं ), वह तो आगमापायी ( उत्पाद-विनाशशील ) है, अतः रज्जु-सर्प की तरह उसे ( सत्ता- स्फुरण को ) आरोपित ही समझना होगा । दृश्य वस्तुओं की सत्ता और स्फुरण को परतः भी नहीं कह सकते, क्योंकि इन जड़ (दृश्य) वस्तुओं से 'पर' एकमात्र 'चैतन्य' को ही कहना होगा । तब उस चैतन्य के रूप में इन वस्तुओं की सत्ता और स्फूर्ति तो हो नहीं सकती, क्योंकि दोनों के स्वभाव परस्परविरुद्ध हैं, अर्थात् 'चैतन्य' प्रत्यक् है और 'जड़ वस्तु' पराक् है । इस प्रकार विरुद्ध स्वभाव वालों का तादात्म्य (एकाकार) होना कभी संभव ही नहीं है । उनका तादात्म्य समझना केवल भ्रम ही है । सुषुप्ति, स्वप्न और जाग्रत् अवस्थाओं में भासित होने वाले प्राज्ञ, तैजस और विश्व ये मत्स्वरूपभूत (मेरे स्वरूप) नहीं हैं । मेरा स्वरूप तो 'तुरीय' है, क्योंकि विश्वादि तीनों की अपेक्षा परे (अतिरिक्त) हूँ, इसीलिये मुझे 'तुरीय, (चतुर्थ) कहते हैं । विश्व आदि तो केवल अपनी-अपनी अवस्थाओं के द्रष्टा (दर्शक) हैं, और 'मैं' सभी अवस्थाओं का द्रष्टा हूँ, इसलिये उनसे अतिरिक्त हूँ । स्थूल-सूक्ष्म के क्रम से विचारने पर विश्व आदि के तीनों स्थानों को भी पार करके यह रहता है इसीलिये इसे 'तुरीय' शब्द से कहा गया है । वस्तुतः इसमें 'तुरीयत्व' नहीं है, अर्थात् इसके अतिरिक्त तीन हैं, उनके अनन्तर होने से यह चौथा (तुरीय) है, यह नहीं समझना चाहिये । क्योंकि इसे 'अद्वय' कहते हैं, अर्थात् यह 'आत्मा' सदा निर्विशेष ही है ॥ ४ ॥ शरीरबुद्धीन्द्रियदुःख१ सन्ततिर्न मे न चाहं मम निर्विकारतः । असत्वहेतोश्च तथैव सन्ततेरसत्त्वमस्याः स्वप्नतो हि दृश्यवत् ॥५॥ शरीरेति— शरीर, बुद्धि, इन्द्रिय और दुःखपरम्परा (दुःखसन्तति ) का मुझसे कोई सम्बन्ध नहीं है, और न मैं तत्स्वरूप हूँ, क्योंकि मैं विकाररहित (निर्विकार) हूँ । वह दुःखपरम्परा तो सोये हुए मनुष्य के स्वप्नजनित दृश्य के समान है । जैसे स्वप्नजनित दृश्य की कोई सत्ता नहीं, वैसे ही शरीरादि दुःखपरम्परा की भी कोई सत्ता नहीं है । अतः उसका मुझसे कोई सम्बन्ध नहीं है ॥ ५ ॥ हृदयस्पर्शिनी पूर्व श्लोक में आत्मा की निर्विशेषता को 'अद्वय' शब्द से बताया गया था, किन्तु वह संगत नहीं हो पा रहा है, क्योंकि उससे शरीर आदि का सम्बन्ध सबके प्रत्यक्ष है । इस शंका का समाधान इस श्लोक के द्वारा कर रहे हैं । वास्तव में यह शरीरादि परंपरा (सन्तति) न मत्स्वरूप है और न मेरी ही है । अर्थात् ये सब न मुझ आत्मा के धर्म हैं और न ये मत्स्वरूप (आत्मस्वरूप) ही हैं । क्योंकि मैं तो निर्विकार (विकार रहित) हूँ । अविक्रिय (विकाररहित) वस्तु, आगमापायी (उत्पाद-विनाशशील) शरीरादि के रूप में परिणत या उससे सम्बद्ध नहीं हुआ करती, जिससे उन जड़ वस्तुओं में तत्स्वरूपता (आत्मस्वरूपता) या तद्धर्मता (आत्मधर्मता) हो सके । इन जड़ वस्तुओं की पारमार्थिक (वास्तविक) सत्ता न हो सकने में एक अन्य हेतु भी है—स्वप्नावस्था के दृश्य के समान यह शरीरादि परम्परा भी दृश्य है । अतः स्वप्नदृश्य जैसे मिथ्या, वैसे ही यह शरीर-परम्परा भी मिथ्या समझनी चाहिये ॥ ५ ॥ इदं तु सत्यं मम नास्ति विक्रिया विकारहेतुर्न हि मेऽद्वयत्वतः । न पुण्यपापे न च मोक्षबन्धने न चास्ति वर्णाश्रमतोऽशरीरतः ॥६॥ इदमिति—यह तो सत्य ही है कि अद्वितीय होने के कारण मुझमें विकार नहीं है, न विकार का कारण ही है, तथा शरीर-रहित होने के कारण मुझमें पुण्य-पाप, मोक्ष-बन्ध तथा वर्णाश्रमधर्म भी नहीं है ॥ ६ ॥ १. सन्ततेर्न ०— पाठांतरम् ।
४४ उपदेशसाहस्री हृदयस्पर्शिनी शरीरादि परम्परा दृश्य होने से यदि मिथ्या है, तो आत्मा की शुद्धता, अविक्रियता (निर्विशेषता) भी दृश्य होने के कारण मिथ्या क्यों नहीं है? इसके उत्तर में यह कहा जा रहा है कि मुझमें न विकार (विक्रिया) है और न विकारहेतु ही है, क्योंकि मुझे 'अद्वय' कहा गया है, अद्वय (द्वयाभाव) होने के कारण ही 'स्वतः या परतः मुझमें विकार नहीं है' यह कहना यथार्थ ही है। तात्पर्य यह है, कि शंका करने वाले ने आत्मा के शुद्धत्व, अवि- क्रियत्वादि को मिथ्या सिद्ध करने के लिये जो अनुमान¹ किया है, उसमें 'दृश्यत्व' हेतु ही 'असिद्धि' दोष से युक्त होने से (वह) असद्धेतु है। उस असद्धेतु से आत्मा के शुद्धत्व, अविक्रियत्वादि में मिथ्यात्व की सिद्धि नहीं हो सकती। क्योंकि आत्मा के विक्रियाभावाद्युपलक्षित स्वरूप में ही अविक्रिय कहने का तात्पर्य है। अतः उसके शुद्धत्वादि में मिथ्यात्व की आशंका करने का अवसर ही प्राप्त नहीं होता है। यदि कहें कि उसमें विकार न होने पर भी विकार- हेतुभूत कर्म, उनके फल, उनका ध्वंस, और कर्मादि साधनों के रहने से उसकी अद्वयता कैसे हो सकती है? इस का उत्तर यह है कि वह (आत्मा) अशरीरी (शरीररहित) होने से उसे पुण्य, पाप, मोक्ष, बन्ध, वर्ण-आश्रम के धर्म आदि कुछ नहीं हैं। अतः उसमें जैसे विकार नहीं है, वैसे ही विकार के हेतु कर्मादि भी नहीं हैं, इसलिये उसके शुद्धत्व, अद्वयत्व में किसी प्रकार का सन्देह नहीं है ॥ ६ ॥ अनादितो निर्गुणतो न कर्म मे फलं च तस्मात् परमोऽहमद्वयः । यथा नभः सर्वगतं न लिप्यते तथा ह्यहं देहगतोऽपि सूक्ष्मतः ॥७॥ अनादित इति—मैं अनादि और निर्गुण हूँ, इस कारण मेरा कोई कर्म या कर्मफल भी नहीं है, इसलिये मैं सर्वोत्कृष्ट और अद्वितीय हूँ। जैसे गगन (आकाश) सर्वव्यापक (सर्वगत विभु) होने पर भी किसी वस्तु से लिप्त नहीं होता, वैसे ही अत्यन्त सूक्ष्म होने के कारण मैं, देह (शरीर) में व्याप्त होने पर भी उससे लिप्त नहीं हूँ ॥ ७ ॥ हृदयस्पर्शिनी यद्यपि आत्मा शरीरोपादान और तद्धर्मक होने से शरीरवान् (शरीरी) नहीं है तथापि उसका शरीर के साथ 'उपलक्ष्य-उपलम्भकभावरूप सम्बन्ध' तो है ही। तब उसे (आत्मा को) 'अशरीर' (शरीररहित) कैसे कह सकते हैं ? किन्तु यह शंका ठीक नहीं है, केवल सम्बन्ध को देखकर सशरीर मान लेने पर भी कर्म आदि से उसका सम्बन्ध कहना ठीक नहीं है। इसी अभिप्राय को ध्यान में रखकर पूर्व श्लोक में कहे गये पुण्य-पापादि सम्बन्धराहित्य को ही विस्तार से बता रहे हैं। जो कर्मसमवायी (कर्मसम्बन्धित) रहता है, वह सादि (आदिमान्) होता देखा गया है, जैसे रथ, शरीर आदि। इस व्याप्ति (नियम) का परमाणु और मन में यदि व्यभिचार कहें तो ठीक नहीं है, क्योंकि 'मन' की उत्पत्ति श्रुत है। और परमाणु तो कतिपय लोगों के द्वारा कल्पित मात्र है, हम उन्हें नहीं मानते। तथा जो कर्मसमवायी (कर्मसम्बन्धित) होता है, वह सगुण रहता देखा गया है, जैसे रथ, शरीर आदि। अर्थात् 'यत्र यत्र क्रियावत्त्वं तत्र तत्र सगुणत्वं सादित्वं च' इस व्याप्ति के अनुसार 'क्रियावत्त्व' व्याप्य है और 'सगुणत्व, सादित्व' व्यापक है। एवं च प्रत्यगात्मा से व्यावृत होने वाला व्यापक सगुणत्व, सादित्व अपने व्याप्य क्रियावत्त्व को लेकर (व्याप्य क्रियावत्त्व के साथ) ही उस आत्मा से निवृत्त होता है। इस प्रकार आत्मा में क्रियावत्त्व के न होने से तत्साध्य पुण्य-पापादि का होना भी असंभव है। अतः आत्मा पुण्य-पाप से रहित है। इसीलिये श्लोक में कहा गया है कि मुझसे पुण्यादिरूप कर्म और तत्साध्य (उससे होनेवाले) सुखादि फल का कोई सम्बन्ध नहीं है। इस कारण मैं संसारियों से विलक्षण, उत्तम (परम), अद्वय, निर्विशेष हूँ। क्रियावत्त्व न होने से तत्साध्य पुण्यादि का भी असंभव है, यही अविद्याकल्पित अन्य संसारियों से मेरी विलक्षणता है। मैं देह में उपलभ्यमान रहने पर भी सूक्ष्म (अमूर्त) हूँ, १. आत्मनः शुद्धत्वाविक्रियत्वादिकं मिथ्या दृश्यत्वात् शरीरादिसन्ततिवत् ।' २. 'अनादित्वान्निर्गुणत्वात् परमात्मायमव्ययः । शरीरस्थोऽपि कौन्तेय न करोति न लिप्यते ॥ यथा सर्वगतं सौक्ष्म्यादाकाशं नोपलिप्यते । सर्वत्रावस्थितो देहे तथाऽऽत्मा नोपलिप्यते ॥-(भ. गी. १३।३१-३२)
दृशिस्वरूपपरमार्थदर्शनप्रकरणम् ४५ इस कारण मैं किसी से लिप्त नहीं हो पाता। श्रीमद्भगवद्गीता में भगवान् स्वयं कहते हैं कि "मैं परमात्मा अनादि तथा निर्गुण होने से 'अव्यय' हूँ । हे कौन्तेय ! मैं शरीरस्थ होता हुआ भी न कुछ करता हूँ और न किसी से लिप्त होता हूँ । जैसे सर्वव्यापक आकाश सूक्ष्म होने से किसी से लिप्त नहीं हो पाता, उसी तरह यह आत्मा (परमात्मा) शरीर में सर्वत्र रहता हुआ भी किसी से लिप्त नहीं हो पाता' ।।'' अर्थात् माया के द्वारा उपस्थित देहों में अनुप्रविष्ट रहने पर भी मैं उनके दोषों से दूषित नहीं हो पाता ।। ७ ।। सदा च भूतेषु समोऽहमीश्वरः क्षराक्षराभ्यां परमो ह्यथोत्तमः । परात्मतत्त्वं* च तथाऽद्वयोऽपि सन् विपर्ययेणाभि†मतस्त्वविद्यया ॥८॥ सदेति-मैं सम्पूर्ण भूतों में समान भाव से स्थित ईश्वर हूँ, मैं कार्य-कारण भाव से अलग (अतिरिक्त) हूँ। तथा उसका अधिष्ठान रहने से उनकी अपेक्षा मैं उत्कृष्ट हूँ, तथा मैं परमात्मतत्त्व और अद्वितीय होनेपर भी अविद्या के कारण विपरीत ( अन्यथा) रूप से समझा जाता हूँ ॥ ८ ॥ हृदयस्पर्शिनी आत्मोपलब्धि के अधिष्ठानस्वरूप देहादिकों की विषमता सबके प्रत्यक्ष है, ऐसे विषम देहों में प्रविष्ट हुए आत्मा की उपलब्धि होती है। अतः उस उपलभ्यमान आत्मा में भी देहादिकृत वैषम्य का होना संभव है, ऐसी स्थिति में कैसे उसका परमात्मत्व और कैसी उसकी परिपूर्णता ? किन्तु तारतम्य (वैषम्य) का यह प्रतिभास अविद्या का विलास मात्र है, वास्तविक नहीं है। देह में उसका अनुप्रवेश व्यवहार की दृष्टि में है, वस्तुतः नहीं है। 'आत्मा' को ईश्वर कहा गया है, इससे यह सूचित होता है कि वह उपाधि के परवश ( परतन्त्र) नहीं है। अतः उसमें (आत्मा में) देहादिकृत वैषम्य नहीं है। आत्मा को 'ईश्वर' (नियामक) कहनेपर उसे ईशितव्य (नियम्य) की अपेक्षा अवश्य रहेगी, उसके बिना उसमें ईश्वरत्व (नियामकत्व) कैसे बन सकेगा ? अर्थात् उसे अद्वय कहना ठीक नहीं, वह तो सद्वय है। किन्तु यह शंका ठीक नहीं है, क्योंकि वह तो क्षर-अक्षर (कार्य-कारण) से परम (व्यतिरिक्त) है इसी कारण उसे 'उत्तम' (उत्कृष्ट) कहते हैं। अतः उसकी अद्वयता सुरक्षित है। और उसका ईश्वरत्व भी उचित है। 'क्षर' का अर्थ कार्यवर्ग है क्योंकि 'क्षरति नश्यति इति क्षरः' यह 'क्षर' शब्द का निर्वचन है। और 'अक्षर' का अर्थ कारण है। अर्थात् माया से युक्त (शबलित) चिद्वस्तु, उन दोनों से यह आत्मा परम (व्यतिरिक्त) है, अर्थात् कार्यकारणादि की भेदकल्पना का यह अधिष्ठानस्वरूप है। इसीलिये इसे (आत्मा को) पुरुषोत्तम कहते हैं। अतः आत्मा का 'ईश्वरत्व' भी समुचित है। उसके ईश्वरत्व में और अद्वयता में किसी प्रकार का कोई सन्देह नहीं है। वह 'उत्तम' है, उसी कारण अन्य आत्माओं का स्वरूप (तत्त्व) भी यानी परमात्मतत्त्व भी वही है, अर्थात् 'मैं' ही सर्वात्मा हूँ, यह समझना चाहिये। इस प्रकार वह सर्वात्मा होनेपर भी उसके स्वरूप का विपरीत भान (विपरीतस्वरूपप्रतिभास) जो हो रहा है, वह विपर्यय (मिथ्याज्ञान) से अर्थात् तत्कारणीभूत अविद्या से अवच्छिन्न (युक्त) होने के कारण उसके वास्तविक रूप का ज्ञान नहीं हो पाता। भगवदुक्ति से भी उपर्युक्त अभिप्राय का समर्थन हो जाता है-भगवान् श्रीकृष्णचन्द्र ने कहा है१ कि 'इस लोक में क्षर और अक्षर नामके दो ही पुरुष हैं, उनमें समस्त भूत 'क्षर' हैं, और कूटस्थ 'अक्षर' है। इन दोनों से उपाधिरहित उत्तम पुरुष 'अन्य' ही है, जिसे परमात्मा कहते हैं, जो अव्यय (अविनाशी) ईश्वर है, १. "द्वाविमौ पुरुषौ लोके क्षरश्चाक्षर एव च । क्षरः सर्वाणि भूतानि कूटस्थोऽक्षर उच्यते ॥ उत्तमः पुरुषस्त्वन्यः परमात्मेत्युदाहृतः । यो लोकत्रयमाविश्य बिभर्त्यव्यय ईश्वरः ॥ यस्मात् क्षरमतीतोऽहमक्षरादपि चोत्तमः । अतोऽस्मि लोके वेदे च प्रथितः पुरुषोत्तमः ॥" ( १५।१६-१८)
- तत्त्वञ्च०-पाठान्तरम् । † भिभूत०-पाठान्तरम् ।
४६ उपदेशसाहस्री वही तीनों लोकों में प्रविष्ट होकर उनका भरण (धारण) करता है। मैंने क्षर का (विनाशी मायामय संसार का) अतिक्रमण किया है और अक्षर से (संसारबीज अव्यक्त से) मैं उत्तम हूँ, इस कारण मैं लोक और वेद में 'पुरुषोत्तम' नाम से प्रसिद्ध हूँ॥ ८ ॥ अविद्यया भावनया च कर्मभिर्विविक्त आत्माऽव्यवधिः सुनिर्मलः। दृगादि शक्ति प्रचितोऽहमद्वयः स्थितः स्वरूपे गगनं यथाऽचलम् ॥९॥ अविद्ययेति—अविद्या, भावना और कर्मों से असंग आत्मा का कोई व्यवधान नहीं है, इस कारण वह निर्मल है। अविद्या से अध्यस्त हुए अन्तःकरण की परिणामरूप दृगादि शक्तियों के संबंध से ही उसमें द्रष्टृत्वादि व्यवहार किया जाता है। वास्तव में तो मैं अद्वितीय हूँ, और आकाश के समान अचल (स्थिर) भाव से अपने स्वरूप में स्थित हूँ॥ ९॥ हृदयस्पर्शिनी यदि अविद्यामूलक मिथ्या ज्ञान से आत्मा आवृत है, तो उसका अविद्या से सम्बन्ध अवश्य रहेगा। किन्तु यह कहना उचित नहीं है। क्योंकि 'आत्मा' तो चित्प्रकाश है, यह बात श्रुति, स्मृति, इतिहास, पुराण और तर्क से भी सिद्ध है। अविद्या जड़ (अप्रकाशात्मिका) है। अतः दोनों का स्वभाव अत्यन्त परस्परविरुद्ध है। इस कारण दोनों का सम्बन्ध परमार्थतः होना तो दुर्घट ही है। ऐसी स्थिति में अविद्या का आश्रय अनवच्छिन्न चैतन्य तो हो नहीं सकता। यदि यह न माना जाय तो अणुमात्र का भी प्रकाश नहीं हो सकेगा। किसी से अवच्छिन्न हुए चैतन्य के भाग- विशेष को अविद्या का आश्रय कहें तो अविद्या के अतिरिक्त कोई ऐसा नहीं है, जिसकी कल्पना की जाय, तथा प्रमाण रहित कोई कल्पना नहीं की जाती। अतः अविद्या के अतिरिक्त अन्य किसी का व्यवधान न होने से दिवान्ध व्यक्ति के द्वारा दिन में कल्पित अन्धकार के समान आत्मा में अविद्या की कल्पना की जाती है। अविद्या का अर्थ 'मूलाज्ञान' है, तथा भावना का अर्थ अविद्याकृत देहाभिमान और अभिमान पूर्वक किये जाने वाले पुण्य-पापलक्षण (रूप) ही कर्म हैं। इन अविद्या, भावना और कर्म के स्पर्श से रहित (विविक्त) यह आत्मा है, क्योंकि वह व्यवधानरहित (अव्यवधि, आच्छादकरहित) है, इसी कारण वह 'सुनिर्मल' (समस्त आशंकित दोषों से रहित) है। ऐसे आत्मा में द्रष्टा, श्रोता, मन्ता, बोद्धा का व्यवहार कैसे किया जाता है ? यह व्यवहार तो अविद्या के द्वारा अध्यस्त अन्तःकरण- परिमाणरूप दृगादि शक्ति के सम्बन्ध से ही होता है। अर्थात् वास्तव में न वह द्रष्टा, है, न मन्ता है, न श्रोता है, न बोद्धा है, तथापि उसमें द्रष्टा, श्रोता, मन्ता, बोद्धा होने-का-सा आभास होता है। क्योंकि चक्षुरादि इन्द्रियों द्वारा उत्पन्न होनेवाली दर्शन-श्रवणादिशक्तिरूप बुद्धिवृत्तियों से उपचित (प्रचित) हुए की तरह मैं रहता हूँ, अतः उनसे सम्बद्ध हुआ-सा प्रतीत होता हूँ, वस्तुतः वैसा नहीं हूँ॥ ९ ॥ अहं परं ब्रह्म विनिश्चयात्मदृङ् न जायते भूय इति श्रुतेर्वचः। न चैव बीजेऽप्यसति* प्रजायते फलं न जन्मास्ति मतो ह्यमोहता ॥१०॥ अहमिति—'मैं परब्रह्म हूँ' ऐसा निश्चयात्मक आत्मज्ञान जिसे हो जाता है, उसका पुनः जन्म नहीं होता, ऐसा श्रुतिवचन है। बीज के न रहने पर फल उत्पन्न नहीं हो सकता, उसी प्रकार चूंकि अज्ञान नहीं रहा, इसलिये जन्म भी नहीं होता ॥ १० ॥ हृदयस्पर्शिनी इस प्रकार प्रत्यगात्मतत्त्व का परिज्ञान होने पर पुनरावृत्तिरहित कैवल्यफल की प्राप्ति होती है, ऐसा श्रुति वचन है¹। इसी श्रुतिसिद्ध बात को युक्ति से भी बताते हैं कि 'बीज के न रहने पर फल भी नहीं होता'। इसी १. 'स तु तत्पदमाप्नोति यस्माद्भूयो न जायते'— ( कठ. उ. ३।८ ) 'पुरुषात्न परं किंचित् सा काष्ठा सा परा गतिः'— ( कठ. उ. ३।११ ) 'अथ सोऽभयं गतो भवति'— ( तै. उ. २।७ ), 'ब्रह्म वेद ब्रह्मैव भवति'— ( बृ. उ. ३।२।९ )
- जे त्वसति०—पाठान्तरम् ।
दृशिश्वरूपपरमार्थदर्शनप्रकरणम् ४७ सामान्य नियम के अनुसार चूंकि ब्रह्मात्मज्ञान होने से मोहराहित्य (अमोहता अर्थात् मूलभूत मोह का अभाव) होता है, उस कारण मोहमूलक जन्मादिलक्षणविचित्र संसार भी नहीं होता । क्योंकि जन्मादिविकार मोहपदवाच्य अविद्यामूलक हैं। जब मूलभूत अविद्या ही नहीं रहेगी, तब तत्कार्यभूत जन्मादि विकार भी नहीं होगा ॥ १० ॥ ममेदमित्थं च तथेदमीदृशं तथाहमेवं न परो न वान्यथा । विमूढतैवँ न जनस्य कल्पना सदा समे ब्रह्मणि चाद्वये शिवे ॥११॥ ममेति—मेरा यह शरीर ऐसा ( सुन्दर या असुन्दर ) है, यह शरीर इस प्रकार का ( स्थूल या सूक्ष्म ) है, मैं ऐसा (स्थूल या सूक्ष्म) हूँ, तथा अन्य पुरुष ऐसा (हृष्ट-पुष्ट) नहीं है, ऐसी कल्पना करते रहना लोगों की मूर्खता ही है, क्योंकि सदा समानरूप से स्थित, अद्वितीय शिवस्वरूप ब्रह्म में इन कल्पनाओं के लिये स्थान नहीं है ॥ ११ ॥ हृदयस्पर्शिनी ब्रह्मात्मज्ञान होने पर मोहनिवृत्ति होती है, और मोहनिवृत्ति होने पर मोहकार्यरूप संसार की निवृत्ति होती है, यह बता चुके । अब मोहकार्य के स्वरूप को बता रहे हैं। पहिले तो दोनों देहों (सूक्ष्म-स्थूल) का अहंकार, तदनन्तर बाह्य वस्तुओं (पदार्थों) की कल्पना, तदनन्तर शोभनादि का अध्यास, तदनन्तर यह मेरा, वह ऐसा (इस प्रकार का) है, उसी प्रकार यह मेरा नहीं, इत्यादि कल्पना, उसी तरह दूसरा भी इसी प्रकार का है, या इस प्रकार का नहीं है, अन्य प्रकार का है, या अन्य प्रकार का नहीं है, या यह मेरी या दूसरे की मूढ़ता है या सुज्ञता है— ये सब, अनादि-अज्ञान ( अविद्या ) से तिरोहित आत्मस्वरूप वाले मनुष्य को जन्मादि का सम्बन्ध होने पर जो कल्पनाएँ हुआ करती हैं, वे कल्पनाएँ सदा समान परमानन्दरूप शिव अद्वय ब्रह्म में कभी नहीं हुआ करतीं । एवंच यह विचित्र संसार अज्ञान का कार्य है ॥ ११ ॥ यदद्वयं ज्ञानमतीव निर्मलं महात्मनां तत्र न शोकमोहता । तयोरभावे न हि जन्म* कर्म वा भवेद्द्वयं वेदविदां विनिश्चयः ॥१२॥ यदिति—अत्यन्त निर्मल अद्वितीय ( अद्वय ) ज्ञान के उत्पन्न होनेपर महात्माओं ( महान् आत्माओं ) को शोक-मोह नहीं हुआ करते, और शोक-मोह के न होनेपर कर्म या जन्म नहीं होते –यह वेदवेत्ताओं का निर्णय है ॥ १२ ॥ हृदयस्पर्शिनी आत्मतत्त्व का ज्ञान होनेपर अज्ञान की निवृत्ति होती है। उससे इस विचित्र संसार की निवृत्ति हो जाती है, इसीको और अधिक स्पष्ट कर रहे हैं। अद्वयात्माकार ( अद्वय ) तथा असंभावना-विपरीतभावनादिप्रतिबन्ध से शून्य ( अतीव निर्मल ) ज्ञान के उदित होनेपर ब्रह्मभूत महात्माओं को शोक-मोहता संसारित्व नहीं रहता१। उन शोक-मोह के अभाव में ( न रहनेपर ) तदुपलक्षित ( उनके द्वारा सूचित ) उन शोक-मोह के कारणभूत अज्ञान की निवृत्ति होने- पर 'बीजाभावे फलाभावः' नियम के अनुसार जन्म-मरण पुनः नहीं हो सकते, यह वेदार्थज्ञ विद्वानों का निश्चय है । यही अभिप्राय श्रुति से भी अवगत होता है२ ॥ १२ ॥ सुषुप्तवज्जाग्रति यो न पश्यति द्वयं तु पश्यन्नपि चाद्वयत्वतः । तथा च कुर्वन्नपि निष्क्रियश्च यः स आत्मविन्नान्य इतीह निश्चयः ॥१३॥ सुषुप्तवदिति—आत्मा के अद्वितीयत्व का निश्चय हो जाने के कारण जो मनुष्य सुषुप्त ( सोये हुए ) पुरुष के समान जाग्रत् अवस्था में भी द्वैत का अनुभव नहीं करता तथा जो सब कुछ करते हुए भी निष्क्रिय रहता है, वही आत्मज्ञ है, अन्य कोई नहीं—यही वेदान्तशास्त्र का निर्णय ( निश्चय ) है ॥ १३ ॥ १. 'तत्र को मोहः कः शोक एकत्वमनुपश्यतः'—( ई. उ. ७), २. 'भिद्यते हृदयग्रन्थिश्छिद्यन्ते सर्वसंशयाः । क्षीयन्ते चास्य कर्माणि तस्मिन् दृष्टे परावरे' ॥ ( मुं. उ. २।२।८ )
- कर्म जन्म०—पाठान्तरम् ।
४८ उपदेशसाहस्री हृदयस्पर्शिनी 'भिद्यते हृदयग्रन्थिः' इत्यादि शास्त्र के अनुसार आत्मविद् (आत्मज्ञ) की मुक्ति बताई गई। अब आत्मवित् के स्वरूप को बता रहे हैं—द्वैत का बाध हो जाने के कारण जाग्रत् अवस्था में अपने पूर्व संस्कार (वासना) वश द्वैत प्रपञ्च को देखता हुआ भी (उल्लेख करता हुआ भी) विशेष रूप से (आसक्ति से) उसे नहीं देखता, किन्तु सुषुप्त पुरुष की तरह विलीन प्रपञ्चवाले प्रत्यगात्मस्वरूप में ही उस द्वैत प्रपञ्च को देखता रहता है अर्थात् द्वैत की सत्ता ही न रह जाने के कारण सर्वत्र अपने को ही वह देखता है। एवञ्च यथापूर्व (आत्मज्ञान होने के पूर्व) स्नान, शौच, भिक्षाटन आदि कार्यों को करता हुआ भी अकर्तृभूत आत्मस्वरूप का आविर्भाव होने से वह निष्क्रिय है अर्थात् निर्विकार है। इस प्रकार जो आत्मवित् होगा उसीको विक्षेपदशा में भी यथार्थ आत्मज्ञान (अप्रच्युतात्मयाथात्म्य- दर्शन) होने के कारण ब्रह्मविदों में श्रेष्ठ कहा गया है। उसके अतिरिक्त अन्य कोई भले ही शास्त्रार्थज्ञ विद्वान् ही क्यों न हो, किन्तु व्यवहारकाल में ज्ञातृत्व, कर्तृत्व आदि अभिमान उसमें भरा होने से आत्मज्ञ नहीं कहा जा सकता यही वेदान्तशास्त्र का निश्चय है ।। १३ ।। इतोदमुक्तं परमार्थदर्शनं मया हि वेदान्तविनिश्चितं परम् । विमुच्यतेऽस्मिन् यदि निश्चितो भवेन्न लिप्यते व्योम१ इवेह कर्मभिः ॥१४॥ इतीति—इस रीति से वेदान्तशास्त्रनिर्णीत उत्कृष्ट परमार्थदृष्टि का निरूपण मैंने किया। यदि इसमें किसी का विश्वास (निष्ठा) हो जाय तो वह अवश्य ही मुक्त हो सकता है। तब वह आकाश के समान इस संसार में पुनः कर्मों से लिप्त (बद्ध) नहीं होगा ॥ १४ ॥ हृदयस्पर्शिनी वेदान्त शास्त्र के विषय में शास्त्रनियम के अनुसार अपने अनुभव को बता चुके। अब बता रहे हैं कि इस अद्वैत वेदान्तदर्शन में परिनिष्ठित हुआ विद्वान् कृतकृत्य होता है। अतः परानुग्रहार्थ ही इस प्रकरण के निर्माण में मेरी प्रवृत्ति हुई है ।। १४ ।। ।। इति दशमं दृशिस्वरूपपरमार्थदर्शनप्रकरणं समाप्तम् ।। १. व्योमवदेव०—पाठान्तरम् ।
पद्यभाग ११: ईक्षितृत्वप्रकरणम्
ईक्षितृत्वप्रकरणम् ईक्षितृत्वं स्वतःसिद्धं जन्तूनां च ततोऽन्यता । अज्ञानादित्यतोऽन्यत्वं सदसीति निवर्त्यते ॥१॥ ईक्षितृत्वमिति—समस्त जीवों का ईक्षितृत्व ( चित्स्वरूपत्व ) स्वभाव से ही सिद्ध है, और उनकी भिन्नता अज्ञानजनित ( उपाधि के कारण ) है । अतः 'तू सत् ( ब्रह्म ) है' इस वाक्य से उनके भेद का निरसन किया गया है ॥ १ ॥ हृदयस्पर्शिनी ब्रह्मात्मैक्यज्ञान से मुक्ति होती है अर्थात् एकमात्र ब्रह्मात्मैक्यज्ञाननिष्ठ व्यक्ति मुक्त होता है, यह जो कहा गया है, वह संगत नहीं हो सकता। क्योंकि ब्रह्म और आत्मा परस्परविरुद्ध स्वभाव के हैं, अतः उन दोनों की एकता होना संभव ही नहीं। मुक्ति तो कर्म से या कर्मसहित ज्ञान से ही हो सकती है। उसी तरह वेदान्त वाक्यों से ही सुनिश्चित (यथार्थ-सम्यक्) ज्ञान हो सकता है—यह कथन भी सन्दिग्ध है, वह ज्ञान तो अनुमानादि प्रमाण से भी हो सकेगा—यदि कोई ऐसी आशंका करे तो उस आशंका के परिहारार्थ इस प्रकरण का आरंभ किया जा रहा है, और इसके द्वारा 'ज्ञानादेव मुक्तिः' ज्ञान से ही मुक्ति होती है, यह बताया जायगा, और वह ज्ञान, वेदान्त-महावाक्य से ही हो सकेगा, अनुमानादि प्रमाणों से नहीं—यह भी बताया जायेगा । 'त्वं सत् असि' तुम सच्छब्द- लक्षित ब्रह्म ही हो, संसारी नहीं हो—इस वाक्योपदेश से ही सच्छब्दार्थ ब्रह्म और जीव का भेद निवृत्त हो जाता है । तथापि संसारी अशुद्ध जीव में उससे नितान्त विपरीत ब्रह्मत्व की संभावना कैसे कर सकते हैं ? यह आशंका हो सकती है। उस आशंका का निवारण इस प्रकार कर सकते हैं कि समस्त प्राणियों का चिद्रूपत्व ही ईक्षितृत्व है, और वह स्वतः- सिद्ध (स्वाभाविक) है। चिद्रूपत्व की तरह कर्तृत्व, भोक्तृत्व आदि को भी स्वाभाविक नहीं माना जा सकता। अन्यथा स्वरूप में व्यभिचार होगा। क्योंकि कर्तृत्व-भोक्तृत्वादि चिद्रूप से अन्य ( भिन्न ) है, जो अज्ञानजनित है। एवंच अन्यत्व ( अन्यता ) अज्ञाननिबन्धन ( अज्ञानकारणक ) है, वास्तविक ( पारमार्थिक ) नहीं है; कर्तृत्व-भोक्तृत्वादि में अज्ञानकल्पितत्व तथा ब्रह्मविपरीतत्व है, और मोक्ष स्वतश्चिन्मात्रस्वभाव ( स्वरूप ) तथा अज्ञान-निवृत्तिलक्षण ( स्वरूप ) है। मोक्ष में केवल तत्त्वज्ञान मात्र की अपेक्षा रहती है, अर्थात् तत्त्वज्ञान की आवश्यकता होती है। अतः 'तत्त्वमसि' महावाक्य के अर्थज्ञान से अज्ञान की निवृत्ति होने से कर्तृत्व-भोक्तृत्वादि की भी निवृत्ति हो जाती है। एवञ्च ज्ञान से ही अन्यत्वनिवृत्तिरूप मुक्ति होती है। उसके लिये अन्य साधन खोजने की आवश्यकता नहीं है ॥ १ ॥ एतावद्धचमृतत्वं न किंचिदन्यत्सहायकम् । ज्ञानस्येति ब्रुवच्छास्त्रं सलिङ्गं कर्म बाधते ॥२॥ एतावदिति—यह आत्मज्ञान ही अमृतत्व ( मोक्षप्राप्ति का साधन ) है । इस आत्मज्ञान का कोई और सहायक नहीं है। इस प्रकार कहता हुआ शास्त्र¹ आश्रमोचित यज्ञोपवीतादि लिङ्गों के सहित कर्म का बाध करता है ॥ २ ॥ हृदयस्पर्शिनी पूर्व कथन के अनुसार यद्यपि ज्ञान से मोक्ष होता है, तथापि वह ज्ञान, कर्मसापेक्ष होकर ही मोक्ष का साधन हो सकता है, कर्मनिरपेक्ष होकर नहीं—ऐसा कुछ लोगों का कहना है, किन्तु वह श्रुति तथा युक्ति के विरुद्ध होने के कारण उचित नहीं है। अतः कर्म को ज्ञान का सहायक मानकर उसे मोक्ष का साधन नहीं माना जा सकता। अद्वैत आत्मज्ञान के होनेपर कर्म के हेतुभूत जात्यादि के अभिमान के अभाव में कर्म की स्थिति ही कहाँ, जो मोक्षफल की प्राप्ति कराने में ज्ञान का सहायक बन सके ? एवंच ज्ञान-कर्मसमुच्चय मोक्षप्राप्ति में कारण नहीं है ॥ २ ॥ १. 'एतावदरे खल्वमृतत्वम्'—( बृ. उ. ४।५।१५ ) अमृतत्व का साधन आत्मज्ञान ही है—इन शब्दों से निश्चयपूर्वक कहनेवाली श्रुति को शास्त्र कहते हैं । ७
५० उपदेशसाहस्री सर्वैषां मनसो वृत्तमविशेषेण पश्यतः । तस्य मे निर्विकारस्य विशेषः स्यात्कथंचन ॥३॥ सर्वेषामिति—सबके अन्तःकरणों की वृत्तियों को सामान्यभाव से देखने वाले उस मुझ निर्विकार आत्मा का कोई विशेषभाव कैसे हो सकता है ? ॥ ३ ॥ हृदयस्पर्शिनी इस प्रकरण के प्रथम श्लोक के द्वारा प्रतिपादित स्वाभाविक चिद्रूपत्व को बताते हुए ज्ञानी के लिये कर्म का होना संगत नहीं हो सकता, यह प्रस्तुत श्लोक के द्वारा बताया जा रहा है। क्योंकि समस्त प्राणियों की मनोवृत्तियों के साक्षी उस आत्मा को जाति आदि का कोई अभिमान नहीं होता है। श्लोक में आये 'विशेष' शब्द का अर्थ कर्तृत्व, भोक्तृत्व आदि तथा शास्त्रविहित कर्म के साधनभूत जात्याद्यभिमान है। 'कथञ्चन' का अर्थ आक्षेप है। अर्थात् किसी प्रकार भी मुझमें विकार नहीं हो सकता, क्योंकि अभिमानशून्य होकर केवल साक्षी बनकर मैं देखता रहता हूँ ॥ ३ ॥ मनोवृत्तं मनश्चैव स्वप्नवज्जाग्रतीक्षितुः । संप्रसादे द्वयासत्त्वाच्चिन्मात्रः सर्वगोऽव्ययः ॥४॥ मन इति—स्वप्न के समान जाग्रत् अवस्था में भी मन और मन की वृत्तियों के साक्षी (ईक्षिता) आत्मा का कोई विशेषभाव कैसे हो सकता है ? किन्तु सुषुप्ति अवस्था में इन दोनों का अभाव होने से सर्वगत, अविनाशी आत्मा चेतनमात्र रह जाता है ॥ ४ ॥ हृदयस्पर्शिनी यह आत्मा सबकी मनोवृत्तियों को समान भाव से (अविशेषेण) किस प्रकार देखता है, यह जिज्ञासा होनेपर दृष्टान्त के साथ उसका उपपादन करते हुए आत्मा की चिदेकरसता को बता रहे हैं। स्वप्नावस्था में बाह्य विषय (पदार्थ) न होने से आत्मा जैसे सवृत्तिक (वृत्तिसहित) मन को ही देखता रहता है, ठीक उसी तरह जाग्रत् अवस्था में भी मनोवृत्ति (मनःप्रचार—मनोवृत्त) और उस वृत्ति के आश्रयभूत मन को आत्मा देखता है, तब उसमें कौनसी विशेषता (विकार) उपलब्ध हो रही है ? अर्थात् कोई नहीं। क्योंकि स्वप्न में जैसे वृत्तिसहित मन के अतिरिक्त आत्मा को कुछ उपलब्ध नहीं होता, वैसे ही जाग्रत् अवस्था में भी उसे विषयाकारवृत्तिविशिष्ट मन के अतिरिक्त कुछ भी उपलब्ध नहीं होता है। यदि कहें कि इस प्रकार का मनोदर्शन ही उस (आत्मा) में स्वाभाविक विशेष (विकार) है, तो यह कथन भी ठीक न होगा, क्योंकि सुषुप्तिदशा में (सम्प्रसाद में) वृत्ति और मन दोनों ही नहीं रहते१, अतः उनका दर्शन भी स्वाभाविक नहीं कहा जा सकता। एवंच आत्मा चिन्मात्र है, सर्वत्र व्याप्त है, अव्यय और अद्वितीय सिद्ध होता है ॥ ४ ॥ स्वप्नः सत्यो यथाऽऽबोधाद्देहात्मत्वं तथैव च । प्रत्यक्षादेः प्रमाणत्वं जाग्रत्स्यादाऽऽत्मवेदनात् ॥५॥ स्वप्न इति—जिस प्रकार जागने तक स्वप्न की सत्यता प्रतीत होती है, उसी प्रकार आत्मज्ञान होने तक ही जाग्रत् अवस्था में देहात्मबुद्धि और प्रत्यक्षादि प्रमाणों का प्रामाण्य समझा जाता है ॥ ५ ॥ हृदयस्पर्शिनी शंका—पूर्वप्रतिपादन यदि अकाट्य हो तो बाह्याभ्यन्तर द्वैत का अभाव स्वीकार करना ही होगा, किन्तु प्रत्यक्षादि प्रमाणों के साथ विरोध होने से तथा लौकिक-वैदिक समस्त व्यवहारों का लोपप्रसंग प्राप्त होने से पूर्वप्रतिपादन उचित नहीं प्रतीत होता। समा०—जैसे जागने तक स्वप्न सत्य अर्थात् लौकिक-वैदिक व्यवहार के योग्य प्रतीत होता है, उसी तरह जाग्रत् अवस्था में भी देहात्मबुद्धि और प्रत्यक्षादि प्रमाणों का प्रामाण्य सम्पूर्ण व्यवहारों का अंग (साधन-उपाय) माना १. 'न तु तद्द्वितीयमस्ति ततोऽन्यद्विभक्तं यत्पश्येत् ।'—(बृ. उ. ४।३।२३)
ईक्षितृत्वप्रकरणम् ५१ जाता है। परन्तु उसकी भी एक अवधि है, जो “आत्मवेदनात्” शब्द से बताई गई है, अर्थात् 'आ-आत्मवेदनात्' तक ही उसकी अवधि है। आत्मतत्त्वसाक्षात्कार के पूर्व तक ही समस्त व्यवहार की सत्ता है, आत्मतत्त्वसाक्षात्कार होनेपर सब व्यवहार समाप्त (अभाव) हो जाते हैं। अर्थात् जाग्रदवस्था में देहादि में मिथ्या आत्माभिमान रहता है, उस समय प्रत्यक्षादिकों को प्रमाण माना जाता है, इसलिये इस अविद्यावस्था में व्यवहार चलते रहते हैं, व्यवहारलोप का प्रसंग नहीं आता। एवंच यह बात स्पष्ट हो जाती है कि आत्मज्ञान के पूर्व तक ही लौकिक-वैदिक समस्त व्यवहार और उनके लिये प्रमाणों की आवश्यकता होती है, आत्मज्ञान होनेपर 'एक चिन्मात्र आत्मा' के सिवाय कुछ नहीं ॥५॥ व्योमवत्सर्वभूतस्थो भूतदोषैर्विवर्जितः । साक्षी चेताऽगुणः शुद्धो ब्रह्मैवास्मि* स केवलः ॥६॥ व्योमवदिति—मैं आकाश के समान सम्पूर्ण प्राणिवर्गों में स्थित हूँ, तथापि उनके दोषों से रहित हूँ, सबका साक्षी१, चिद्रूप, निर्गुण, शुद्ध और अद्वितीय ब्रह्म ही हूँ ॥ ६ ॥ हृदयस्पर्शिनी इस श्लोक के द्वारा उसके अव्यवहार्य स्वरूप को बता रहे हैं—विद्यावस्था (आत्मज्ञान की अवस्था) में व्यवहार का अभाव तो अभीष्ट ही है। आत्मा 'चेता' है अर्थात् अपने प्रकाश के द्वारा (आत्मा स्वप्रकाश यानी प्रकाशरूप है) अज्ञान और उसके कार्यों का प्रकाशक (अवभासक) है, इस कारण उसे चेता (चिद्रूप) कहा जाता है। प्राणियों में स्थित रहनेपर भी उनके दोषों से वह संस्पृष्ट नहीं होता, क्योंकि वह केवल साक्षी होकर स्थित रहता है। 'व्योमवत् सर्वभूतस्थः' आकाश के समान समस्त प्राणियों में स्थित है, यह कहने से उसका 'असंगत्व' ज्ञात होता है। आकाश सर्वत्र रहते हुए भी जैसे असंग, उसी तरह आत्मा भी असंग है। आत्मा को सर्वभूतस्थ कहने का तात्पर्य यह है कि सम्पूर्ण प्राणियों (भूतों) में 'अहम्' इत्याकारक वृत्ति की अभिव्यक्ति, उसके बिना रहे नहीं हो सकती२। अज्ञानरहित होने से उसे 'शुद्ध' कहते हैं। 'केवल' कहने से वह तीनों अवस्थाओं से रहित है। एवंच मैं ब्रह्म (पूर्ण) ही हूँ ॥ ६ ॥ नामरूपक्रियाभ्योऽन्यो नित्यमुक्तस्वरूपवान् । अहमात्मा परं ब्रह्म चिन्मात्रोऽहं सदाऽद्वयः ॥७॥ नामेति—मैं नाम, रूप और क्रिया से अन्य (भिन्न) और नित्यमुक्तस्वरूप हूँ, तथा मैं आत्मा ही नित्य [ सदा ] अद्वितीय [ अद्वय ] चिन्मात्र परब्रह्म हूँ ॥ ७ ॥ हृदयस्पर्शिनी इस श्लोक के द्वारा आत्मा के 'केवलत्व' को बताया गया है। अर्थात् वाच्य-वाचक और तद्व्यापारात्मक प्रपञ्च से शून्य (रहित) आत्मा है ॥ ७ ॥ अहं ब्रह्मास्मि कर्ता च भोक्ता चास्मीति ये विदुः । ते नष्टा ज्ञानकर्मभ्यां नास्तिकाः स्युर्न संशयः ॥८॥ अहमिति—'मैं ब्रह्म हूँ तथा कर्ता भोक्ता भी हूँ' ऐसा जो लोग मानते हैं, वे ज्ञान और कर्म दोनों से ही भ्रष्ट [ पतित ] हैं, और वे नास्तिक ही हैं, इसमें सन्देह नहीं ॥ ८ ॥ हृदयस्पर्शिनी शंका—ज्ञान-कर्मसमुच्चयवादी के भेदाभेदमत के अनुसार यह शंका हो रही है कि आत्मा की अद्वयता (अद्वयत्व) कैसे संगत हो सकती है ? क्योंकि 'अहं ब्रह्मास्मि' के समान 'अहं कर्ताऽस्मि' यह अनुभव भी प्रामाणिक रूप से होता है। १. श्वे. उ. ६।११ २. 'अहं मनुरभवं सूर्यश्च'—(बृ. उ. १।४।१०) इसका तात्पर्य सर्वात्मत्वाभिनय में है।
- स्मीति के०—पाठान्तरम् ।
५२ उपदेशसाहस्री समा०—शास्त्र कभी विरुद्धार्थ का प्रतिपादन नहीं करता । शास्त्र के अर्थ को जो विरुद्ध समझते हैं, वे वस्तुतः कर्मकाण्ड तथा ज्ञानकाण्ड से बहिर्मुख ही हैं, इसलिए उन्हें नास्तिक ही समझना चाहिए । वे सभी पुरुषार्थों के अयोग्य हैं ॥ ८ ॥ धर्माधर्मफलैर्योग इष्टोऽदृष्टो यथाऽऽत्मनः । शास्त्राद्ब्रह्मत्वमप्यस्य मोक्षो ज्ञानात्तथेष्यताम् ॥९॥ धर्मेति—किसी अन्य प्रमाण से सिद्ध न होनेपर भी मीमांसा शास्त्र के आधार पर ही आत्मा का धर्माधर्म- रूप फलों [ पुण्य-पाप रूप फलों ] से सम्बन्ध स्वीकार किया जाता है, वैसे ही शास्त्र-प्रमाण [ वेदान्त शास्त्र के आधार पर ] से आत्मा का ब्रह्मत्व और ज्ञान से उसका मोक्ष भी स्वीकार करना चाहिये ॥ ९ ॥ हृदयस्पर्शिनी शंका—दूसरों को नास्तिक कह देने मात्र से अद्वैत का सिद्धांत स्थिर नहीं किया जा सकता । अद्वैत की सिद्धि में कोई प्रमाण नहीं है, अतः ‘ब्रह्मैवास्मि’ यह ज्ञान नहीं हो सकता । अद्वैत को सिद्ध करने के लिए जो तादात्म्य- श्रुतियाँ उपस्थित की जाती हैं, वे सब अन्यपरक होने से उपपन्न हो जाती हैं । समा०—शास्त्र के तत्त्वार्थ को जाननेवाले विद्वान् किन्हीं अन्यान्य प्रमाणों (प्रत्यक्षानुमानादि प्रमाणों) से सिद्ध (प्रमित) न होते हुए भी जैसे केवल एकमात्र शास्त्रप्रमाण¹ के आधार पर ही आत्मा का सुख-दुःखादिरूप धर्मा- धर्मफलों के साथ सम्बन्ध मान लेते हैं, उसी तरह वे विद्वान् वेदान्तशास्त्र² के आधार पर आत्मा में ब्रह्मत्व (आत्मा को ब्रह्म) और उसका ज्ञान से ही मोक्ष स्वीकार कर लें । क्योंकि शास्त्रत्वेन दोनों समान रूप से प्रमाण हैं । एवं च भेद और कर्म दोनों निन्दित होने से उन दोनों में शास्त्र का तात्पर्य नहीं है । अतः शास्त्र का अनुसरण करनेवाले विद्वान् यथाशास्त्र ही अर्थ समझने का प्रयास करें । अतः ‘तत्त्वमसि’ वाक्य से आत्मा को ब्रह्म, अर्थात् आत्मा में ब्रह्मत्व के ज्ञान से अज्ञान की निवृत्ति, उससे ब्रह्मरूप में ही उसकी स्थिति और मोक्ष (कैवल्य) समझना चाहिये ॥ ९ ॥ या माहार्जनाद्यास्ता वासनाः स्वप्नदर्शिभिः । अनुभूयन्त एवेह ततोऽन्यः केवलो दृशिः ॥१०॥ या इति—हरिद्रा [ हल्दी ] से रंगे हुए वस्त्रादि के समान जाग्रत् दशा की वासनाएँ होती हैं, उन्हीं का स्वप्न देखने वाले पुरुष उनका अनुभव करते रहते हैं, वास्तव में उनकी सत्ता नहीं रहती । उसी प्रकार जाग्रत् अवस्था में भी शुद्ध साक्षीमात्र आत्मा उस विषयदर्शी जीव से सर्वदा भिन्न रहता है ॥ १० ॥ हृदयस्पर्शिनी समुच्चयवादी कह सकता है कि हमारे शास्त्र ने आत्मा के साथ जो धर्माधर्म का सम्बन्ध माना है, वह किसी प्रमाणान्तर से विरुद्ध न होने के कारण उचित ही है, किन्तु आत्मा का अकर्तृत्व, अभोक्तृत्व आदि उसके प्रत्यक्ष प्रतीत होनेवाले कर्तृत्व-भोक्तृत्व से विरुद्ध हैं, इस कारण वेदान्तियों का कहना ठीक नहीं है । अतः शास्त्र और अनुभव का समन्वय (अविरोध) करने के लिये हमें भेदाभेदवाद का स्वीकार कर लेना चाहिये । किन्तु उसका यह कथन ठीक नहीं है, क्योंकि आत्मा में कर्तृत्व आदि का जो प्रतिभास होता है, वह वास्तविक न होकर केवल अध्यास मात्र है । अतः श्रुत्युक्त अद्वैत का प्रतिपक्षी कोई न होने से निर्विरोध अद्वैत सिद्ध हो जाता है । स्वप्नावस्था में लिङ्ग के आश्रित रहनेवाली³ श्रुतिसिद्ध वासनाएँ ही स्वप्नदर्शियों के द्वारा देखी जाती हैं । महारजन (हरिद्रा) से रञ्जित वस्त्रादि को ‘माहारजन’ कहते हैं । स्वप्नावस्था में वात-पित्त-श्लेष्म से दूषित हुए रस से परिपूर्ण हुईं नाड़ियों में अनुगत (प्रविष्ट) हुए जाग्रद्वासनावासित मन की अनेक वासनाएँ अदृष्टादि के द्वारा उद्बुद्ध (जागरित) होती हैं, उस कारण जाग्रत् अवस्था में दृष्ट अर्थ (पदार्थ) के आकार में परिणत हुआ वह १. ‘पुण्यो वै पुण्येन कर्मणा भवति पापः पापेन’— (बृ. उ. ३।२।१३) २. ‘ब्रह्म वेद ब्रह्मैव भवति’—( मुं. उ. ३।२।९ ), ‘तमेव विदित्वातिमृत्युमेति नान्यः पन्था विद्यतेऽयनाय’—( श्वे. उ. ३।८, ६।१५) ३. ‘तस्यहैतस्य पुरुषस्य रूपं । यथा माहारजनं वासः’ इत्यारभ्य ‘यथाऽसकृद्विद्युत्तम्’ इत्यन्तेन श्रुत्युक्ता वासनाः । (बृ. उ. २।३।६)
ईक्षितृत्वप्रकरणम् ५३ मन हरिद्रारञ्जित पटादि के रूप के समान भासित होने लगता है और स्वप्नद्रष्टा के द्वारा उसकी उपलब्धि द्रष्टा, दृश्य, दर्शन एवं तत्करणादि के रूप में नित्य हुआ करती है। अतः स्वप्न में दिखाई पड़नेवाली माहारजन (पीतवस्त्र) आदि के समान लिङ्गात्मा (मन-बुद्धि) के सहित वासनाओं की अपेक्षा दृशिस्वरूप द्रष्टा आत्मा विलक्षण ही प्रतीत होता है। उसी तरह जाग्रत् अवस्था में कर्तृत्ववादि भी दृश्य होने के कारण अनात्मधर्म ही हैं, यह निश्चित होता है। अतः कर्तृत्वादि धर्मवाले लिङ्ग (मन-बुद्धि) से दृशिस्वरूप केवल शुद्ध आत्मा कोई अन्य ही है ॥ १० ॥ कोशादिव विनिष्कृष्टः कार्यकारणवर्जितः । यथाऽसिर्दृश्यते स्वप्ने तद्वद्बोद्धा स्वयंप्रभः ॥११॥ कोशादिति—जिस प्रकार कोश से निकाला खड्ग् उस कोश से पृथक् [ भिन्न ] दिखलाई देता है, उसी प्रकार स्वप्नावस्था में स्वयंप्रकाश बोद्धा भी कार्य-कारणाकार मन से पृथक् ही रहता है ॥ ११ ॥ हृदयस्पर्शिनी आत्मा की स्वप्नावस्था में दृश्य की अपेक्षा विलक्षण (पृथक्) प्रतीति होती है। जैसे खड्ग (असि) कोश (म्यान) से अलग करने पर (निकालनेपर) अपने स्वरूप में दिखाई देता है, उसी तरह कार्य-कारणवर्जित अर्थात् कार्य- कारणाकार लिङ्गात्मक मन से पृथक् बोद्धा आत्मा स्वप्न में यथावत् दिखाई देता है। 'दृश्यते' दिखाई देता है—कहने से उसे (आत्मा को) दृश्य विषयों के समान मिथ्या नहीं समझना चाहिये, क्योंकि वह स्वयंप्रभ है। वह अपनी महिमा से ही प्रकाशित रहता है, विषय की तरह प्रकाशित किया नहीं जाता। अथवा¹ श्रुति के द्वारा निर्णीत होने से कार्य- कारणवर्जित आत्मा का स्वप्न में ज्ञान होता है। एवं च कोशनिष्कृष्ट असि की तरह आत्मा भी स्वप्नसंस्काराश्रय सूक्ष्म देह से विलक्षण दिखाई देता है। उपाधि से पृथक् अपने स्वरूप में ही उसका अवभास होता है, इसी अभिप्राय को प्रदर्शित करने में 'असि' का दृष्टान्त दिया गया है ॥ ११ ॥ आपेषात्प्रतिबुद्धस्य ज्ञस्य स्वाभाविकं पदम् । उक्तं नेत्यादिवाक्येन कल्पितस्यापनेतृणा ॥१२॥ आपेषादिति—कल्पित प्रपञ्च का बाध करने वाले 'नेति नेति' आदि वाक्य ने हाथ दबाने से जगे हुए चेतन आत्मा का स्वाभाविक रूप बताया है ॥ १२ ॥ हृदयस्पर्शिनी शंका— आत्मा को जो स्वयंप्रकाश कहा गया है, वह कैसे संभव हो सकता है, क्योंकि वह तो ब्रह्म से विलक्षण (भिन्न) है। समा०— श्रुतिविरोध होने के कारण ऐसी शंका करना ठीक नहीं है। आत्मा में कर्तृत्वादि की जो प्रतीति होती है, वह स्वप्नप्रतीति की तरह मिथ्या होने से आत्मा शुद्ध ही है अर्थात् ब्रह्म ही है, यह शास्त्र बता रहा है, अतः निर्विरोध यह जाना जा सकता है। एवं च भेदाऽभेद की कल्पना कर अपने मन को कलुषित करना उचित नहीं है। ²श्रुति कहती है कि प्राण के अनेक नाम पुकारने पर भी वह आत्मा प्रबुद्ध नहीं हो पाया किन्तु हाथ से दबाते ही वह जाग उठा, इससे स्पष्ट होता है कि प्राण-इन्द्रियस्वरूप लिङ्गसमुदाय से विलक्षण (भिन्न) और स्थूल संघात (समुदाय) से भी विलक्षण (भिन्न) ही आत्मा है। अतएव अर्थात् समस्त जड़ पदार्थों से विलक्षण होने के कारण ही वह (आत्मा) ज्ञानस्वभाव (स्वरूप) है। पाणि (कर—हाथ) स्पर्श से प्रतिबुद्ध हुए त्वंपदार्थ 'ज्ञ' का परब्रह्मरूप स्वाभाविक पद, कल्पित (अध्यस्त) मूर्त-अमूर्त-तद्वासनाश्रयरूप के निषेधक 'नेति' वाक्य से³ कहा गया है। 'नेति नेति' ऐसी वीप्सा (द्विरुक्ति) के द्वारा यह बताया गया है कि समस्त कारण-कार्यात्मक उपाधि का प्रतिषेध कर 'अखण्ड ब्रह्म' में 'नेति' वाक्य का तात्पर्य है। एवं च श्रुतिविरोध होने से आत्मा को ब्रह्म से विलक्षण समझना ठीक नहीं है ॥ १२ ॥ १. 'अत्रायं पुरुषः स्वयंज्योतिः'—( बृ. उ. ४।३।९ ) २. 'तं पाणिनाऽऽपेषं बोधयाञ्चकार स होत्तस्थौ' इत्यारभ्य 'स होत्तस्थौ' 'बृहत्पाण्डरवासः सोम राजन्'……( बृ. उ. २।१।१५ ) ३. 'अथात आदेशो नेति नेति' इत्यारभ्य 'सत्यस्य सत्यमिति प्राणा वै सत्यं तेषामेष सत्यम्'—इत्यन्तेन वाक्येन ।—(बृ. उ. २।३।६)
५४ उपदेशसाहस्री महाराजादयो लोका मयि यद्वत्प्रकल्पिताः । स्वप्ने, तद्वद्द्वयं विद्याद्रूपं वासनया सह ॥१३॥ महाराजेति—जिस प्रकार स्वप्नकाल में राजा-महाराजा आदि लोक मुझमें ही कल्पित होते हैं अर्थात् मैं राजा हूँ, महाराजा हूँ ऐसी कल्पना निद्रादोष के कारण मेरे ही चित्त में होती है, उसी प्रकार वासनाओं के सहित इस द्वैत दृश्य को भी मुझमें ही कल्पित जानो ॥ १३ ॥ हृदयस्पर्शिनी हाथ से दबाने पर१ प्रतिबुद्ध हुआ 'ज्ञ' आत्मा, प्राण आदि से विलक्षण है। इस प्रकार कल्पित संसार के निषेधक वचन से कल्पित संसार, 'आत्मा' पर आरोपित है, यह बताया गया है। अर्थात् 'नेति नेति' इत्यादि शास्त्रवचन से निषिध्यमान संसार कल्पित है, यह श्रुति ने ही बता दिया है। स्वप्नावस्था में महाराजा आदि लोगों की कल्पना मुझ दृगात्मा में जैसे की जाती है, उसी तरह लिङ्ग शरीर के आश्रय से रहनेवाली वासना के साथ मूर्त और अमूर्त दो रूपों की मुझमें कल्पना की गई है२। श्रुति ने भी स्वप्नदृश्य (महाराजत्वादि की आभासता) का निर्देश कर उपसंहार में शरीर के भीतर ही महाराजा आदि के रूप में प्राणशब्दवाच्य लिङ्गरूप उपाधिका ग्रहण कर यह स्वप्नद्रष्टा, व्यवहार करता है—यह प्रदर्शित किया है। अर्थात् स्वप्न में महाराजा आदि निर्दिष्ट लोग भोग्यविशेष होते हुए भी स्वप्नद्रष्टा में कल्पित हैं। अतः स्वप्न में उपलब्ध हुई कोई भी वस्तु वास्तविक नहीं है। एवञ्च वासना के आश्रयभूत लिङ्ग- शरीर के सहित मूर्तामूर्तरूप स्थूल पदार्थ भी दृगात्मा में कल्पित ही हैं, क्योंकि दृगात्मा के द्वारा वह दृश्य हैं ॥ १३ ॥ देहलिङ्गात्मना कार्या वासनारूपिणा क्रियाः । नेति नेत्यात्मरूपत्वान्न मे कार्या क्रिया क्वचित् ॥१४॥ देहेति—वासनाओं [ संस्कारों ] का संचय करनेवाले तथा स्थूल-सूक्ष्म शरीर का अभिमान रखनेवाले आत्मा को ही कर्मानुष्ठान कर्तव्य रहता है। यह स्थूल देह आत्मा नहीं है, यह सूक्ष्म देह आत्मा नहीं है इत्यादि वाक्यों द्वारा लक्षित 'मैं' तो आत्मस्वरूप हूँ। अतः मेरे लिये कभी कोई कर्म कर्तव्य नहीं है ॥ १४ ॥ हृदयस्पर्शिनी स्वप्नप्रपञ्च के समान जाग्रत्प्रपञ्च भी प्रत्यगात्मा में कल्पित है यह सिद्ध ( ज्ञात ) हो जानेपर प्रत्यक्तत्त्व को जाननेवाले ( आत्मज्ञानसम्पन्न ) के लिये कर्म करने की संभावना ही नहीं रहती, क्योंकि कर्म ( क्रिया ) तो उसे करने होते हैं, जो स्थूल-सूक्ष्म देह का अभिमान करता हो, किन्तु जिसे अपने स्थूल-सूक्ष्म शरीर का कोई अभिमान न हो, उसके लिये कर्मानुष्ठान कैसे संभव हो सकता है ? यह स्थूल-सूक्ष्मदेहाभिमानी आत्मा वासनारूपी है अर्थात् संस्कारों ( वासनाओं ) का संचय करते रहने का इसका स्वभाव है। ये संस्कार कर्मप्रवृत्ति कराने में निमित्त ( कारण-हेतु ) होते हैं। अर्थात् कर्म से संस्कार, और संस्कार से पुनः कर्म, पुनः उससे संस्कार, पुनः उससे कर्म इस प्रकार अविच्छिन्न परम्परा चलती रहती है। किन्तु जब 'नेति नेति' श्रुति के द्वारा अपने स्वरूप ( आत्मस्वरूप ) का साक्षात्कार ( ज्ञान ) हो जाता है, तब दोनों देहों का अभिमान न रहने से स्वप्न में या जाग्रत् अवस्था में स्वाभाविक रूप से और विधि के बलपर ही कोई कर्म ( क्रिया ) उसके लिये कर्तव्य नहीं रह जाती है ॥ १४ ॥ न ततोऽमृतताऽऽशास्ति कर्मणोऽज्ञानहेतुतः । मोक्षस्य ज्ञानहेतुत्वान्न तदन्यदपेक्षते ॥१५॥ नेति—कर्म की उत्पत्ति अज्ञान से है, इस कारण उससे अमृतत्व की आशा नहीं की जा सकती। मोक्ष का कारण तो एकमात्र ज्ञान ही है, इसलिये वह किसी अन्य कर्म आदि की अपेक्षा नहीं रखता ॥ १५ ॥ १. “तं पाणिनाऽऽपेषं बोधयाञ्चकार” इत्यारभ्य “स होत्तस्थौ” –( बृ. उ. २।१ ) २. “यत्रैष एतत्सुप्तोऽभूद्य एष विज्ञानमयः पुरुषः” इत्युपक्रम्य “स यत्रैतत्स्वप्नया चरति ते हास्य लोकास्तदुतेव महाराजो भवत्युतेव महाब्राह्मण उतेवोच्चावचं निगच्छति” इति इवशब्देन स्वप्नदृश्यस्य आभासतां मध्ये निर्दिश्य “एवमेवैष एतत्प्राणान् गृहीत्वा स्वे शरीरे यथाकामं परिवर्तते” इत्युपसंहारः । ( बृ. उ. २।१।१८ )
ईक्षितृत्वप्रकरणम् ५५ हृदयस्पर्शिनी अज्ञानविलसित देहाभिमान से ही कर्म होता है, अतः कर्म अज्ञानमूलक है, इस कारण उससे (कर्म से) मोक्ष की आशा रखना व्यर्थ है। ज्ञान और अज्ञान का विवेक न होनेपर ही कर्म करने की ओर प्रवृत्ति होती है। अज्ञान और कर्म दोनों जड़ पदार्थ हैं, अतः उनमें परस्पर कोई विरोध नहीं है। एवं च 'अज्ञाननिवृत्तिरूप मोक्ष' की निष्पत्ति में कर्म की सहायता की आशा करना व्यर्थ है। यदि मोक्ष को 'ब्रह्मात्मना अवस्थान' (ब्रह्मरूप होकर रहना) अर्थात् परमानन्दाविर्भाव रूप मानें तब भी उत्पाद्य, आप्य, विकार्य, संस्कार्य इन चतुर्विध क्रियाफलों से उक्त मोक्ष, विलक्षण होनेसे उसमें भी कर्म की कोई अपेक्षा नहीं है। शंका--कर्म, स्वयं मोक्ष में कारण (हेतु) न होनेपर भी मोक्ष में हेतुभूत जो ज्ञान, उसके सहायक के रूप में कर्म को भी कारण क्यों न माना जाय ? समा०--अज्ञान की निवृत्ति में ज्ञान ही एकमात्र पर्याप्त है, उसे कर्म आदि अन्य किसी की सहायता की अपेक्षा नहीं होती। अन्यत्र भी नहीं, क्योंकि अज्ञान के निवृत्त होनेपर ब्रह्मात्मना अवस्थान अर्थात् परमानन्दाविर्भाव का होना तो स्वयं (स्वतः) सिद्ध है ॥ १५ ॥ अमृतं चाभयं नातं नेतीत्यात्मा प्रियो मम । विपरीतमतोऽन्यद्यत् त्यजेत्तत्सक्रियं ततः ॥१६॥ अमृतमिति- 'नेति नेति' इत्यादि वाक्य से निषेधमुखेन प्रतिपादित आत्मा, अमृत और अभयरूप है। वह नाशवान् नहीं है तथा मेरा प्रिय है। उससे भिन्न जो अनात्मा है, वह इससे विपरीत स्वभाववाला है। अतः उस सक्रिय अनात्मा का त्याग ही करना चाहिये ॥ १६ ॥ हृदयस्पर्शिनी शंका-यदि अमृतत्व (मोक्ष) को कर्मसाध्य माना जाय तो स्वर्गादि फल की तरह तथा कृषि आदि के फल की तरह वह अनित्य और सभय कहलायेगा। समा०-किन्तु अभयरूपत्व श्रुति१ के साथ तथा मोक्ष से भिन्न यच्चयावत् पदार्थों में आर्तत्व कहकर मोक्ष में अनार्तत्व२ बतानेवाली श्रुति के साथ विरोध उपस्थित होने के भय से वैसा नहीं मान सकते। शंका-ब्रह्म यद्यपि अभय, अनार्त है, और कर्मसाध्य नहीं है तथापि भोक्ता जीवके के लिये अमृतत्व तो कर्म से ही साध्य होगा। समा०-जो मेरा प्रिय है, जिसे हम भोक्ता समझ रहे हैं, अर्थात् जाया आदि जो प्रिय (प्रीत्यास्पद) ज्ञात हो रहे हैं, वह सब मेरा ही स्वरूप है३। उसे 'नेति' श्रुति ने अशेष-विशेषरहित बताया है। इसलिये वह सब मद्रूप ही है अर्थात् निर्विशेष ब्रह्मस्वरूप ही है, उससे भिन्न (अतिरिक्त) नहीं है। अतः उसे भी अमृतत्व, कर्म से प्राप्य नहीं है। अतः उक्त आत्मस्वरूप से भिन्न, जिसे हम भेदबुद्धि से ग्रहण करते हैं (अपने से भिन्न समझते हैं), उस अनात्मभूत (विपरीत) दृश्य का क्रिया सहित त्याग करे अर्थात् उसका अभिमान न करे। क्योंकि हमने अज्ञानवशात् आत्मापर संसार को अध्यस्त कर लिया है। अतः ब्रह्मात्मा से भिन्न जो भी विरुद्धस्वरूप हो, और जो क्रियासहित हो, उस सब का अभिमान छोड़ दे, क्योंकि ब्रह्मात्मज्ञान से अज्ञान की निवृत्ति हो जाती है। 'क्रियासहित उस अनात्मभूत दृश्य का त्याग करे'-यह आत्मज्ञ के लिये विधान (विधि) नहीं किया गया है, क्योंकि वह आत्मज्ञ तो अविनियोज्य है, किन्तु उसके प्रति यह केवल अनुवादमात्र है। तथापि साधक के लिये विधि का उपयोग हो सकता है, अतः 'त्यजेत्' यह विधिप्रत्यय (नियोग) निर्देश, साधक को दृष्टि में रखकर किया गया है। तस्मात् ब्रह्मात्मा के अज्ञान के कारण होने- वाला यह संसार, केवल ब्रह्मात्मज्ञान से ही निवृत्त हो जाता है, यह ठीक ही कहा गया है ॥ १६ ॥ ॥ इति एकादशमीक्षितृत्वप्रकरणं समाप्तम् ॥ १. (तै. उ. २।७) २. (बृ. उ. ३।४।२) ३. 'अनेन जीवेनात्मनानुप्रविश्य'-(छां. उ. ६।३।२)
पद्यभाग १२: प्रकाशप्रकरणम्
प्रकाशप्रकरणम् प्रकाशस्थं यथा देहं सालोकमभिमन्यते । द्रष्ट्राभासं तथा चित्तं द्रष्टाहमितिम॑न्यते ॥१॥ प्रकाशस्थमिति—जिस प्रकार प्रकाश में स्थित स्थूल देह को लोग प्रकाश से युक्त समझते हैं, उसी प्रकार साक्षी [द्रष्टा] आत्मा से प्रकाशित हुए चित्त को ही वे लोग साक्षी समझते हैं, अर्थात् 'चित्त' को ही 'मैं साक्षी हूँ' ऐसा कहते हैं ॥ १ ॥ हृदयस्पर्शिनी शंका—इस भोक्ता आत्मा को यदि 'निर्विशेष' रूप में स्वीकार करते हैं तो उसका उसी रूप में (निर्विशेष) अनुभव क्यों नहीं होता ? अर्थात् यदि 'प्रिय' शब्द से कहा हुआ आत्मा ही ब्रह्म है, तो सब लोग जिस प्रकार आत्मा को अहंरूप से अनुभव करते हैं, उस प्रकार ब्रह्म को क्यों नहीं करते ? समा०—ब्रह्म यद्यपि कर्तृत्व-भोक्तृत्व आदि से शून्य (रहित) है, तथापि लोगों को विवेक न हो पाने से (अविवेक से) उसका वैसा अनुभव नहीं हो पाता । जिस प्रकार प्रकाश सामान्यरूप से सर्वत्र व्याप्त है, परन्तु वह किसी स्थूल शरीर से युक्त होने पर तदाकार लगने लगता है, उसी प्रकार सर्वत्र समानरूप से व्याप्त निर्विशेष चैतन्य, अन्तःकरण में व्याप्त रहने से अन्तःकरणाकार (अन्तःकरणरूप) प्रतीत होने लगता है । और उस चिदाभासविशिष्ट अन्तःकरण को ही लोग 'आत्मा' कहने लगते हैं । एवंच 'अहं' रूप से जिस आत्मा का हम अनुभव करते हैं, वह अविवेक के कारण करते हैं । वास्तव में तो आत्मा और ब्रह्म में कोई भेद नहीं है । शंका करनेवाले का अभिप्राय यह था कि यदि भोक्ता, जिसे 'प्रिय' शब्द से कहा जाता है, (वह) निर्विशेष ब्रह्मस्वरूप ही है, तो सब लोग 'अहं अह॑', इस प्रकार आत्मा का अनुभव तो करते हैं, 'ब्रह्म अहम्' ऐसा अनुभव क्यों नहीं करते ? उक्त शंका का समाधान यही है कि पदार्थतत्त्व-परिशोधनाभावरूप अपराध के कारण ही 'ब्रह्म अहम्' ऐसा अनुभव नहीं कर पाते । अर्थात् साभास अन्तःकरण को न पहिचानने के कारण (साभास अन्तःकरण का विवेक न होने के कारण) यथार्थ रूप से अपनी आत्मा को (आत्मा के यथार्थ रूप को) नहीं जान पाते । अतः इस प्रकरण में मुख्यतया (प्राधान्येन) 'तत्-त्वम्' पदार्थ का शोधन बताया जा रहा है । वास्तव में आत्मा अनवच्छिन्न, प्रकाशरूप है, तथापि अन्तःकरण के सम्पर्क से अन्तःकरणाकाराकारित हुआ भासने लगता है । इस कारण 'अहं कर्ता, अहं भोक्ता' इस प्रकार अन्तःकरणस्वभावविशिष्ट (अन्तःकरणाकाराकारित) को ही 'आत्मा' समझते हैं, शुद्ध आत्मा को नहीं जान पाते ॥ १ ॥ यदेव दृश्यते लोके तेनाभिन्नत्वमात्मनः । प्रपद्यते ततो मूढस्तेनात्मानं न विन्दति ॥२॥ यदेवेति—लोकव्यवहार में [प्राण से लेकर स्थूल देह तक] जो कुछ दिखाई देता है, उसी से आत्मा का तादात्म्य हो जाता है । अतः अज्ञानी व्यक्ति को आत्मा का यथार्थ रूप से ज्ञान नहीं हो पाता ॥ २ ॥ हृदयस्पर्शिनी पूर्व श्लोक में यह बताया था कि आत्मा के स्वरूप का यथार्थ ज्ञान न होने में साभास अन्तःकरण का अविवेक ही कारण है, और उसी के माध्यम से देह तक अविवेक चलता रहता है, जिससे आत्मा के यथार्थ स्वरूप की प्रतिपत्ति (ज्ञान) नहीं हो पाती । अर्थात् लोकव्यवहार में प्राण से लेकर स्थूलदेह तक जो अहंकारास्पद है, वह सब साभासचित्त से अविविक्तरूप में अनुभूत होता है । उस कारण प्राण से देह तक सबकी आत्मरूप में प्रतीति होती है । अर्थात् ये सब आत्मा से अभिन्न (आत्मा ही) प्रतीत होते हैं । तात्पर्य यह है कि देह आदि और आत्मा इनका परस्पर एक दूसरे में अध्यास करते रहने की मूर्खता के कारण यह मूढ मनुष्य आत्मा को ब्रह्मरूप से नहीं जानता ॥ २ ॥
प्रकाशप्रकरणम् ५७ दशमस्य नवात्मत्वप्रतिपत्तिवदात्मनः । दृश्येषु तद्वदेवायं मूढो लोको न चान्यथा ॥३॥ दशमस्येति—दशम आत्मा को नवम समझने के समान यह संसार बुद्धि आदि दृश्य वर्ग में मोहित हो रहा है । इसके विपरीत अनुभव नहीं करता ॥ ३ ॥ हृदयस्पर्शिनी एक बार दस विद्यार्थियों ने नदी के पार पहुँचकर, यह जानने के लिए कि हममें से कोई बह तो नहीं गया, आपस में गिनना आरंभ किया । उनमें से जो भी गिनना आरंभ करता वह अपने को छोड़कर शेष नौ को गिन जाता, इस श्रुतिप्रसिद्धि के समान जिस प्रकार विद्यार्थी दशमरूप अपने को भूलकर अपने को नौ से भिन्न नहीं देख पाते थे, उसी प्रकार बुद्धि आदि दृश्यवर्ग में मोहित हुए लोग अपने को बुद्धि आदि से असंग अनुभव नहीं कर पाते । क्योंकि आचार्योपदेश से हीन होने के कारण दृश्य पदार्थों में आत्मतादात्म्य प्रतिपत्ति बनी रहती है, उस कारण अपनी आत्मा को अन्यथा ही समझते रहते हैं। अर्थात् बुद्ध्यादि दृश्यवर्ग का अपोह (त्याग) करके 'ब्रह्मास्मि' इसप्रकार उसकी यथार्थरूपता (स्वरूपयाथात्म्य) को नहीं जान पाते ॥ ३ ॥ त्वं कुरु त्वं तदेवेति प्रत्ययावैककालिकौ । एकनीडौ कथं स्यातां विरुद्धौ न्यायतो वद ॥४॥ त्वमिति—'तू यज्ञ आदि का अनुष्ठान कर' और 'तू वही [ब्रह्म ही] है' इस प्रकार के दो विरुद्ध ज्ञान एक ही समय एक आश्रय में कैसे रह सकते हैं ? यह युक्ति के द्वारा बतलाओ ॥ ४ ॥ हृदयस्पर्शिनी एक ही चेतन का कर्त्ता-भोक्ता होना तथा कर्ता-भोक्ता न होना अर्थात् शुद्ध ब्रह्मरूप होना संभव नहीं । अतः यह कहना कि प्रत्यक्ष अनुभव और श्रुति के अविरोध के लिए प्रत्यगात्मा को ही कर्त्ता-भोक्ता तथा ब्रह्मरूप मान लिया जाय, अर्थात् प्रत्यगात्मा में ही कर्तृत्वादि धर्मवत्त्व और ब्रह्मरूपत्व रहे, अविवेक की कल्पना कर उसे मूढ़ कहने की क्या आवश्यकता ? अथवा शास्त्रोपदेश या आचार्योपदेश से हीन होने के कारण बुद्ध्यादि दृश्य पदार्थों के विपरीत आत्मयाथात्म्य (आत्मा के यथार्थ रूप) को नहीं जान पाता, अतः पदार्थ (जड़-चेतन) का विवेक न होने से उसका मोक्ष होना संभव नहीं रहता, यह बताया गया था। तब यह आशंका होती है कि पदार्थ- विवेक (जड़-चेतन पदार्थ के भेदज्ञान) की क्या आवश्यकता ? शास्त्र से आत्मा की ब्रह्मरूपता के ज्ञात होनेपर 'ब्रह्माहमस्मि' इस प्रकार प्रसंख्यान (ज्ञान) होने से ही आत्मा के याथात्म्य का आपरोक्ष्य (प्रत्यक्ष) हो जाने के कारण मोक्ष का होना संभव हो सकता है। अतः यह प्रसंख्यानविधि का अवसर है, पदार्थविवेक का नहीं—यह आशंका हो सकती है, किन्तु एक विषय (एक नीडि) में एककालिक दो विरुद्ध प्रत्यय कैसे हो सकते हैं? अतः श्रुति ने जो जीव के लिए अग्निहोत्रादि कर्मों की अवश्यकर्तव्यता का विधान किया है, वह उसके लोकप्रसिद्ध कर्तृत्व को स्वीकार करके केवल अज्ञानावस्था में ही है । ज्ञानवान् तथा जिज्ञासु के लिए तो उसके शुद्ध स्वरूप का ही निरूपण किया गया है। अतः वास्तव में आत्मा के कर्तृत्व आदि का बाध करना ही श्रुति को अभीष्ट है। अर्थात् एक ही आत्मा के लिये 'कुरु, और तदेव त्वम्' = करो और वही तुम हो, इस प्रकार कर्तृत्व और अकर्तृत्व प्रकारक और समसामयिक (एक- कालिक) विरुद्ध ज्ञान का कराना उसी प्रकार होगा, जैसे एक ही पदार्थ में शीत और उष्ण का ज्ञान कराना। अतः परस्पर विरुद्ध दो ज्ञानों में से किसी एक के द्वारा किसी एक का बाध अवश्य करना ही होगा, क्योंकि एक ही वस्तु में दो परस्पर विरुद्ध ज्ञानों को प्रमाण नहीं माना जा सकता ॥ ४ ॥ देहाभिमानिनो दुःखं नादेहस्य स्वभावतः । स्वापवृत्तप्रहाणाय तत्त्वमित्युच्यते दृशेः ॥५॥ देहेति—यदि कहें कि आत्मा का दुःखी होना या सुखी होना आदि का सभी को प्रत्यक्ष अनुभव है, अतः प्रत्यक्ष प्रमाण के आधार पर श्रुतिप्रतिपादित निर्दुःखत्व (दुःखशून्यता) का ज्ञान ही बाधित होता है—ऐसा क्यों न कहा ८
५८ उपदेशसाहस्री जाय ? किन्तु ऐसा सोचना ठीक नहीं होगा, क्योंकि दुःख देहाभिमानी को ही होता है, देहाभिमानहीन आत्मा तो स्वभाव से ही निर्दुःख रहता है, जैसा सुषुप्ति में रहता है। अतः उस देहाभिमान की निवृत्ति के लिये भगवती श्रुति ने 'साक्षी आत्मा' को 'तदेव त्वम्' 'तू वही है' यह उपदेश दिया है ॥ ५ ॥ हृदयस्पर्शिनी आशंका करनेवाले का अभिप्राय यह था कि आत्मा में दुःखित्वाभिमान तो प्रत्यक्ष अनुभवसिद्ध है, अतः अनुभवात्मक प्रत्यक्षज्ञान से 'तदेव त्वमसि' वही तू है—इस शाब्दज्ञान (श्रुति से होनेवाले ज्ञान) का ही बाध होना चाहिए। यही बताने के लिए यह प्रसंख्यान-विधि हो सकता है। किन्तु समाधान देनेवाले का यह कहना है कि यदि दुःखित्व आदि धर्म आत्मा के स्वाभाविक होते, तो तत्त्वज्ञान का सैकड़ों बार अभ्यास करनेपर भी उससे उन स्वाभाविक धर्मों की निवृत्ति कदापि न होती, क्योंकि 'ज्ञान' ही अज्ञान का विरोधी है। एवं च दुःखित्वाभिमान के प्रत्यक्षज्ञान के स्थिरीकरणार्थ 'तदेव त्वमसि' को प्रसंख्यान-विधि कहना व्यर्थ है। अर्थात् जबकि अविद्याप्रयुक्त देहाद्यभिमाननिबन्धन दुःखित्व आदि धर्म हैं, तब अविद्यात्मक कारण (प्रयोजक) के निवृत्त होने से ही दुःखित्व आदि अभिमान की निवृत्ति हो ही जायेगी, और अविद्या की निवृत्ति एकमात्र ज्ञान के ही अधीन है। अतः कर्मविधि के लिये यहाँ अवकाश नहीं है, अर्थात् देहाभिमानशून्य के लिये कर्म का विधान नहीं है। दुःखित्व-सुखित्व आदि आत्मा का स्वाभाविक रूप नहीं है, उसका स्वाभाविक रूप तो 'अदेहत्व' है। अथवा श्लोक में कहे गये 'नाऽदेहस्य' पद के द्वारा 'देहाभिमानव्यतिरेकेण न दुःखमस्ति' कहा गया है। देहाभिमान के अभाव में दुःख नहीं है, इस अभिप्राय के समर्थन में सुषुप्ति का दृष्टान्त दिया गया है। अतः दृशिरूप आत्मा के देहाभिमान की समूल निवृत्ति के लिये ही भगवती श्रुति ने 'तत्त्वमसि' का उपदेश किया है। एवं च ब्रह्मा और आत्मा की एकता का बोधन किया जा रहा है; कर्म का नहीं ॥ ५ ॥ दृशेश्च्छाया यदारूढा मुखच्छायेव दर्शने । पश्यंस्तं प्रत्ययं योगी दृष्ट आत्मेति मन्यते ॥६॥ दृशेरिति—जिस प्रकार दर्पण आदि में मुख की छाया [प्रतिबिम्ब] पड़ती है, उसी प्रकार जिसमें साक्षी आत्मा का आभास [प्रतिबिम्ब] पड़ता है, उस 'अहम्प्रत्यय' [बुद्धि] को देखकर ही कतिपय योगी 'मुझे आत्मसाक्षात्कार हो गया है' ऐसा समझने लगते है ॥ ६ ॥ हृदयस्पर्शिनी 'तत्त्वमसि' आदि वाक्योपदेश के अनन्तर आत्मा को देह से व्यतिरिक्त (पृथक्—भिन्न) जाननेवाले को भी 'मैं दुःखी हूँ' इस प्रकार की प्रतीति (अनुभव) होती है, अर्थात् आत्मा के शुद्ध स्वरूप का ज्ञान होनेपर भी उन्हें अपनी आत्मा के सुखी-दुःखी होने का अनुभव होता ही रहता है। अतः कहना होगा कि 'देहाभिमान दुःख आदि का कारण नहीं है'। इस आशंका के समाधान में यह कहा गया है कि 'अहम्' यह प्रत्यय कल्पित आत्मविषयक है। चिदाभास- विशिष्ट अन्तःकरण (बुद्धि) को आत्मदर्शन के रूप में समझना, यह भ्रम है। वह शुद्ध आत्मदर्शन न होकर आत्म- दर्शनाभास है। मूल श्लोक में 'दर्शने' का अर्थ है 'दर्पणे' अर्थात् दर्पण में। क्योंकि 'दर्शयतीति दर्शनं दर्पणादि', उस दर्पण में मुख का आभास (छाया, प्रतिबिम्ब) जैसे आरूढ़ होता (पड़ता) है, उसी प्रकार दृशि रूप प्रत्यगात्मा की छाया (आभास) जिस प्रत्यय में संक्रान्त (आरूढ़) होती है, उस प्रत्यय १ (साभास अन्तःकरण) को देखनेवाला अर्थात् 'अहम्' रूप में समझनेवाला योगी, अग्रहणात्मक अविद्या से सम्बद्ध होने के कारण 'मैंने आत्मदर्शन कर लिया' समझने लगता है। जैसे छोटे-बड़े मलिन दर्पण में अपने मुख को देखनेवाला मूर्ख मनुष्य अपने मुख को ही मलिन एवं छोटा-बड़ा समझता है, क्योंकि उसे दर्पण और मुख के स्वरूप का विवेक नहीं है। वैसे ही यह नवीन योगी उपाधि के दोषों से आस्कन्दित (युक्त) हुए के समान ही मानो अपनी आत्मा को समझकर 'मैं कर्ता हूँ, मैं दुःखी हूँ' इस प्रकार अपने को कर्ता, सुखी, दुःखी समझता है। क्योंकि उसे उपाधि के और अपने आत्मा के स्वरूप का विवेकज्ञान (पृथक्-पृथक् रूपेण ज्ञान) नहीं है। एवं च 'अहम्' यह ज्ञान (दर्शन) कल्पित आत्मविषयक है। यह ध्यान में रखकर ही यह कहा १. प्रत्ययः—प्रत्याययतीति प्रत्ययः अहंकारः साभासमन्तःकरणम् ।
गया है कि 'दुःखित्व' अविवेक अभिमाननिबन्धन है। अतः 'तत्त्वमसि' महावाक्य से सम्यक् आत्मज्ञानसम्पन्न व्यक्ति में दुःखित्व आदि की अनुवृत्ति का होना संभव नहीं है। बल्कि प्रतिभास के ही बाधित होने की अनुवृत्ति होती रहती है ॥ ६ ॥ तं च मूढं च यद्यन्यं प्रत्ययं वेत्ति नो दृशेः । स एव योगिनां प्रेष्ठो* नेतरः स्यान्न संशयः ॥७॥ तं चेति—जो व्यक्ति उस उपाधिभूत अहंकार, मोहात्मक अविवेक और अन्य उपाधिगत सुख-दुःखादि प्रत्ययों को साक्षी प्रत्यगात्मा में नहीं मानता, वही व्यक्ति आत्मज्ञानी योगियों को प्रियतम लगता है, अन्य नहीं, इसमें कोई संशय नहीं ॥ ७ ॥ हृदयस्पर्शिनी शंका-यदि साभास अहंकार को आत्मा समझनेवाला (आत्मरूप में देखनेवाला) सम्यग्दर्शी (परमार्थ- दर्शी) नहीं, तो सम्यग्दर्शी किसे कहा जाय ? समा०-जो पुरुष उपाधिभूत अहंकार (प्रत्यय), और मोहात्मक अविवेक (मूढ़) तथा अन्य उपाधिगत आभास या दुःख आदि को—'साक्ष्यमेव इदं सर्वम्'=यह सब कुछ दृश्य (साक्ष्य) है, —साक्ष्य (दृश्य) के रूप में मानता (जानता) है; दृशि (साक्षी) जो आत्मा है, उससे इसका कोई सम्बन्ध नहीं है—इस प्रकार विवेक-बुद्धि रखनेवाला व्यक्ति ही सम्यग्दर्शी (परमार्थदर्शी) है, अर्थात् योगियों१ का प्रियतम (प्रेष्ठ) रहता है। साभास अहंकार को ही आत्मा समझनेवाला सम्यग्दर्शी नहीं है। इसमें किसी प्रकार का संशय नहीं करना चाहिए। भगवद्गीता२ में भगवान् ने भी अपने श्रीमुख से 'संशय करते रहना ठीक नहीं है अर्थात् अनुचित है'—ऐसा कहा है ॥ ७ ॥ विज्ञातेर्यस्तु विज्ञाता स त्वमित्युच्यते यतः । स स्यादनुभवस्तस्य ततोऽन्योऽनुभवो मृषा ॥८॥ विज्ञातेरिति—जो विज्ञाति का [समस्त विशिष्ट ज्ञानों का] विज्ञाता [प्रकाशक] है, वही 'त्वम्' पद से बताया गया है, अतः उस 'त्वम्' पद का यथार्थ अनुभव तो वही है और उससे भिन्न जो अनुभव है, वह मिथ्या है ॥ ८ ॥ हृदयस्पर्शिनी शंका—सभी लोगों के लिये आत्मा के रूप में भासित होनेवाला अहंकार भी देह की तरह अनात्मा होने के कारण यदि त्याज्य है तो उससे पृथक् अन्य कोई अर्थ 'त्वम्' पद से प्रतीत नहीं हो रहा है, ऐसी स्थिति में 'तत्त्व- मसि' महावाक्य का तो कोई विषय ही नहीं रहेगा अर्थात् महावाक्य को निरालम्बन ही कहना होगा। समा०—अहंकार आदि से विविक्त (भिन्न, पृथक्) अर्थ का प्रतिपादन श्रुति ने ही कर दिया है। अतः उक्त आशंका ठीक नहीं है। अर्थात् पूर्वप्रतिपादित 'त्वम्' पद के यथार्थ अर्थ का अवलम्बन कर 'तत्त्वमसि' वाक्य प्रवृत्त हुआ है, इसलिए उसके निरालम्बन होने की आशंका करना उचित नहीं है। क्योंकि श्रुति३ में षष्ठ्यन्त शब्द से निर्दिष्ट बुद्धिवृत्तिरूप अनित्य ज्ञान (विज्ञान, विज्ञाति) को तुम, विज्ञाता (नित्य विज्ञप्ति = ज्ञान या विज्ञान के रूप में ज्ञाता) मत समझो। किन्तु 'तत्त्वमसि' वाक्य के 'त्वम्' शब्द से उसको बताया जा रहा है, जो विज्ञप्ति (विज्ञान या ज्ञान) का विषय नहीं है, अपितु उसका (विज्ञप्ति, ज्ञान या विज्ञान का) विज्ञाता (ज्ञाता) है, सर्वसाक्षी है। उस सर्वावभासक (सर्वप्रकाशक) को ही 'त्वम्' शब्द से 'तत्त्वमसि' महावाक्य में बताया गया है। एवं च उस सर्वावभासक का अवलम्बन कर 'तत्त्वमसि' वाक्य की प्रवृत्ति होने से उसके निरालम्बनत्व की आशंका के लिये कोई अवकाश नहीं १. योगिनाम्—युज्यतेऽनेनेति योगस्तत्त्वज्ञानं, तद् विद्यते येषां ते योगिनः तेषाम् । २. 'अज्ञश्चाश्रद्दधानश्च संशयात्मा विनश्यति ।'-( भ. गी. ४।४० ) ३. 'नहि विज्ञातुर्विज्ञातेर्विपरिलोपो विद्यते ।'-( बृ. उ. ४।३।३० ) 'न विज्ञातेर्विज्ञातारं विजानीयाः ।'—( बृ. उ. ३।४।२ )
- श्रेष्ठो—पाठान्तरम् ।