वामन पुराण
Vamana Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
| २४२ | श्रीवामनपुराण | [ अध्याय ५५ | | :--- | :--- |
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| स निमज्जन्नपि जले सामुद्रं फेनमुत्तमम्।<br>ददृशे दानवपतिस्तं प्रगृह्येदमब्रवीत्॥ ७<br><br>यदुक्तं देवपतिना वासवेन वचोऽस्तु तत्।<br>अयं स्पृशतु मां फेनः कराभ्यां गृह्य दानवः॥ ८<br><br>मुखनासक्षिकर्णादीन् सम्ममार्ज यथेच्छया।<br>तस्मिञ्छक्रोऽसृजद् वज्रमन्तर्हितमपीश्वरः॥ ९ | रथको त्यागकर पाताललोकमें चला गया। उस दानवपतिने जलमें स्नान करते हुए समुद्रके उत्तम फेनको देखा और उसे ग्रहण कर यह वचन कहा—'देवराज इन्द्रने जो वचन कहा है वह सफल हो। यह फेन मेरा स्पर्श करे।' ऐसा कहकर वह दानव दोनों हाथोंसे फेन उठाकर अपनी इच्छाके अनुसार उससे अपने मुख, नाक और कर्ण आदिका मार्जन करने लगा। उस (फेन)-में छिपे हुए इन्द्रदेवने वज्रकी सृष्टि की॥ ५–९॥ |
| तेनासौ भग्ननासास्यः पपात च ममार च।<br>समये च तथा नष्टे ब्रह्महत्याऽस्पृशद्धरिम्॥ १०<br><br>स वै तीर्थं समासाद्य स्नातः पापाद्वमुच्यत।<br>ततोऽस्य भ्रातरौ वीरौ क्रुद्धौ शुम्भनिशुम्भकौ॥ ११<br><br>उद्योगं सुमहत्कृत्वा सुरान् बाधितुमागतौ।<br>सुरास्तेऽपि सहस्राक्षं पुरस्कृत्य विनिर्ययुः॥ १२<br><br>जितास्त्वाक्रम्य दैत्याभ्यां सबलाः सपदानुगाः।<br>शक्रस्याहृत्य च गजं याम्यं च महिषं बलात्॥ १३<br><br>वरुणस्य मणिच्छत्रं गदां वै मारुतस्य च।<br>निधयः पद्मशङ्खाद्या हृतास्त्वाक्रम्य दानवैः॥ १४ | उससे उसकी नाक और मुख भग्न हो गये और वह गिर पड़ा तथा मर गया। प्रतिज्ञाके भङ्ग हो जानेसे इन्द्रको ब्रह्महत्याका पाप लगा। (फिर) वे तीर्थोंमें जाकर स्नान करनेसे पापमुक्त हुए। उसके बाद (नमुचिके मर जानेपर) शुम्भ और निशुम्भ नामके उसके दो वीर भाई अत्यन्त कुपित हुए। वे दोनों बहुत बड़ी तैयारी कर देवताओंको मारनेके लिये चढ़ आये। (फिर तो) वे सभी देवता भी इन्द्रको आगे कर निकल पड़े। उन दोनों दैत्योंने धावा बोलकर सेना और अनुचरोंके साथ देवताओंको पराजित कर दिया। दानवोंने आक्रमणकर इन्द्रके हाथी, यमके महिष, वरुणके मणिमय छत्र, वायुकी गदा तथा पद्म और शङ्ख आदि निधियोंको भी छीन लिया॥ १०–१४॥ |
| त्रैलोक्यं वशगं चास्ते ताभ्यां नारद सर्वतः।<br>तदाजग्मुर्महीपृष्ठं ददृशुस्ते महासुरम्॥ १५<br><br>रक्तबीजमथोचुस्ते को भवानिति सोऽब्रवीत्।<br>स चाह दैत्योऽस्मि विभो सचिवो महिषस्य तु॥ १६<br><br>रक्तबीजेति विख्यातो महावीर्यो महाभुजः।<br>अमात्यौ रुचिरौ वीरौ चण्डमुण्डाविति श्रुतौ॥ १७<br><br>तावास्तां सलिले मग्नौ भयाद् देव्या महाभुजौ।<br>यस्त्वासीत् प्रभुरस्माकं महिषो नाम दानवः॥ १८<br><br>निहतः स महादेव्या विन्ध्यशैले सुविस्तृते।<br>भवन्तौ कस्य तनयौ कौ वा नाम्ना परिश्रुतौ।<br>किंवीर्यौ किंप्रभावौ च एतच्छंसितुमर्हथ॥ १९ | नारदजी! उन दोनोंने तीनों लोकोंको अपने अधीन कर लिया। तब वे सभी (देवतालोग) पृथ्वीतलपर आ गये तथा उन लोगोंने रक्तबीज नामके एक महान् असुरको देखा और उससे पूछा—आप कौन हैं? उसने उत्तर दिया—विभो! मैं महिषासुरका मन्त्री एक दैत्य हूँ। मैं रक्तबीज नामसे विख्यात महापराक्रमी एवं विशाल भुजाओंवाला (दैत्य) हूँ। सुन्दर, श्रेष्ठ और विशाल भुजाओंवाले चण्ड और मुण्ड नामसे विख्यात, महिषके दो मन्त्री देवीके डरसे जलमें छिप गये हैं। महादेवीने सुविस्तृत विन्ध्यपर्वतपर हमारे स्वामी महिष नामके दानवको मार डाला है। फिर (देवताओँने पूछा—) आपलोग (हमें) यह बतलावें कि आप दोनों किसके पुत्र हैं तथा आपलोग किस नामसे विख्यात हैं? (और आप दोनों यह भी बतलावें कि) आपलोगोंमें कितना बल एवं प्रभाव है?॥ १५–१९॥ |
| अध्याय ५५ ] | देवीद्वारा नमुचिका वध; असुरसैन्यसहित चण्ड-मुण्डका विनाश | २४३ |
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| शुम्भनिशुम्भावूचतुः | |
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| अहं शुम्भ इति ख्यातो दनोः पुत्रस्तथौरसः।<br>निशुम्भोऽयं मम भ्राता कनीयान् शत्रुपूगहा॥ २०<br><br>अनेन बहुशो देवाः सेन्द्ररुद्रदिवाकराः।<br>समेत्य निर्जिता वीरा येऽन्ये च बलवत्तराः॥ २१<br><br>तदुच्यतां कया दैत्यो निहतो महिषासुरः।<br>यावत्तां घातयिष्यावः स्वसैन्यपरिवारितौ॥ २२<br><br>इत्थं तयोस्तु वदतोर्नर्मदायास्तटे मुने।<br>जलवासाद् विनिष्क्रान्तौ चण्डमुण्डौ च दानवौ॥ २३ | शुम्भ और निशुम्भने कहा—(पहले शुम्भ बोला—) मैं दनुका औरस पुत्र हूँ और शुम्भ नामसे प्रसिद्ध हूँ। यह मेरा छोटा भाई है। इसका नाम निशुम्भ है। यह शत्रुसमूहका विनाश करनेवाला (वीर) है। इसने इन्द्र, रुद्र, दिवाकर आदि देवताओं तथा अन्य अनेक अत्यन्त बलशाली वीरोंको भी (बहुत बार चढ़ाई करके) पराजित कर दिया है। अब तुम बतलाओ कि किस देवीने दैत्य महिषासुरको मार दिया है? हम दोनों अपनी सेनाओंको साथ लेकर उस देवीका विनाश करेंगे। मुने! नर्मदाके किनारे इस प्रकार दोनोंके बात करते समय चण्ड और मुण्ड नामके दोनों दानव जलसे बाहर निकल आये॥ २०–२३॥ |
| ततोऽभ्येत्यासुरश्रेष्ठौ रक्तबीजं समाश्रितौ।<br>ऊचतुर्वचनं श्लक्ष्णं कोऽयं तव पुरस्सरः॥ २४<br><br>स चोभौ प्राह दैत्योऽसौ शुम्भो नाम सुरार्दनः।<br>कनीयानस्य च भ्राता द्वितीयो हि निशुम्भकः॥ २५<br><br>एतावाश्रित्य तां दुष्टां महिषघ्नीं न संशयः।<br>अहं विवाहयिष्यामि रत्नभूतां जगत्त्रये॥ २६ | उसके बाद असुरश्रेष्ठ उन दोनोंने रक्तबीजके निकट जाकर मधुर शब्दोंमें पूछा—तुम्हारे सामने यह कौन खड़ा है? उसने उन दोनोंसे कहा—यह देवताओंको कष्ट देनेवाला शुम्भ नामका दैत्य है एवं यह दूसरा इसका छोटा भाई निशुम्भ है। मैं निश्चय ही इन दोनोंकी सहायतासे उस तीनों लोकोंमें रत्नस्वरूपा, (पर) दुष्टासे विवाह करूँगा, जिसने महिषासुरका विनाश किया है॥ २४–२६॥ |
| चण्ड उवाच<br>न सम्यगुक्तं भवता रत्नार्होऽसि न साम्प्रतम्।<br>यः प्रभुः स्यात्स रत्नार्हस्तस्माच्छुम्भाय योज्यताम्॥ २७<br>तदाचचक्षे शुम्भाय निशुम्भाय च कौशिकीम्।<br>भूयोऽपि तद्विधां जातां कौशिकीं रूपशालिनीम्॥ २८<br>ततः शुम्भो निजं दूतं सुग्रीवं नाम दानवम्।<br>दैत्यं च प्रेषयामास सकाशं विन्ध्यवासिनीम्॥ २९<br>स गत्वा तद्वचः श्रुत्वा देव्यागत्य महासुरः।<br>निशुम्भशुम्भावाहेदं मन्युनाभिपरिप्लुतः॥ ३० | **चण्डने कहा—**आपका कहना उचित नहीं है; (क्योंकि) आप अभी उस रत्नके योग्य नहीं हैं। राजा ही रत्नके योग्य होता है। अतः शुम्भके लिये ही यह संयोग बैठाइये। उसके बाद उन्होंने शुम्भ और निशुम्भसे उस प्रकार सम्पन्न स्वरूपवाली कौशिकीका वर्णन किया। तब शुम्भने अपने दूत सुग्रीव नामके दानवको विन्ध्यवासिनीके समीप भेजा। वह महान् असुर सुग्रीव वहाँ गया एवं देवीकी बात सुनकर क्रोधसे तिलमिला उठा। फिर उसने आकर निशुम्भ और शुम्भसे कहा॥ २७–३०॥ |
| सुग्रीव उवाच<br>युवयोर्वचनाद् देवीं प्रदेष्टुं दैत्यनायकौ।<br>गतवानहमद्यैव तामहं वाक्यमब्रुवम्॥ ३१<br>यथा शुम्भोऽतिविख्यातः ककुद्मी दानवेष्वपि।<br>स त्वां प्राह महाभागे प्रभुरस्मि जगत्त्रये॥ ३२<br>यानि स्वर्गे महीपृष्ठे पाताले चापि सुन्दरि।<br>रत्नानि सन्ति तावन्ति मम वेश्मनि नित्यशः॥ ३३<br>त्वमुक्ता चण्डमुण्डाभ्यां रत्नभूता कृशोदरि।<br>तस्माद् भजस्व मां वा त्वं निशुम्भं वा ममानुजम्॥ ३४ | **सुग्रीवने कहा—**दैत्यनायको! आपलोगोंके कथनके अनुसार देवीसे (संवाद) कहनेके लिये मैं गया था। मैंने आज ही जाकर उससे कहा कि भाग्यशालिनि! सुप्रसिद्ध दानवश्रेष्ठ शुम्भने तुमसे कहा है कि मैं तीनों लोकोंका समर्थ स्वामी हूँ। सुन्दरि! स्वर्ग, पृथ्वी एवं पातालके सारे रत्न मेरे घरमें सदा भरे रहते हैं। कृशोदरि! चण्ड और मुण्डने तुम्हें रत्नस्वरूपा बतलाया है। अतः तुम मेरा या मेरे छोटे भाई निशुम्भका वरण करो॥ ३१–३४॥ |
| २४४ | श्रीवामनपुराण | [ अध्याय ५५ |
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| सा चाह मां विहसती शृणु सुग्रीव मद्द्वचः।<br>सत्यमुक्तं त्रिलोकेशः शुम्भो रत्नार्ह एव च॥ ३५<br><br>किं त्वस्ति दुर्विनीताया हृदये मे मनोरथः।<br>यो मां विजयते युद्धे स भर्ता स्यान्महासुर॥ ३६<br><br>मया चोक्ताऽवलिप्ताऽसि यो जयेत् ससुरासुरान्।<br>स त्वां कथं न जयते सा त्वमुत्तिष्ठ भामिनी॥ ३७<br><br>साऽथ मां प्राह किं कुर्मि यदनालोचितः कृतः।<br>मनोरथस्तु तद् गच्छ शुम्भाय त्वं निवेदय॥ ३८<br><br>तयैवमुक्तस्त्वभ्यागां त्वत्सकाशं महासुर।<br>सा चाग्निकोटिसदृशी मत्वैवं कुरु यत्क्षमम्॥ ३९ | (उसके बाद) हँसती हुई उसने मुझसे कहा कि सुग्रीव! मेरी बात सुनो। तुमने यह ठीक कहा है कि तीनों लोकोंका स्वामी शुम्भ रत्नके अर्ह (उपयुक्त) है। परंतु महासुर! मुझ अविनीताके हृदयकी यह अभिलाषा है कि युद्धमें मुझे पराजित करनेवाला ही मेरा पति हो। उत्तरमें (तब) मैंने (उससे) कहा कि तुम्हें घमण्ड हो गया है। भला जिस असुरने सारे देवताओं और राक्षसोंको पराजित कर अपने अधीन कर लिया है वह तुम्हें क्यों नहीं पराजित कर देगा? इसलिये अये क्रोधवाली! तुम उठो—बात मान लो। उसके बाद उसने मुझसे कहा—मैं क्या करूँ? बिना विचार किये ही मैंने इस प्रकारका पण कर लिया है। अतः (तुम) जाकर शुम्भसे मेरी बात कहो। फलतः महासुर! उसके इस प्रकार कहनेपर मैं आपके निकट आ गया हूँ। वह जलती हुई आगकी लौकी भाँति तेजस्विनी है; यह जानकर आप जैसा उचित हो, वैसा कार्य करें॥ ३५-३९॥ | | पुलस्त्य उवाच<br>इति सुग्रीववचनं निशम्य स महासुरः।<br>प्राह दूरस्थितं शुम्भो दानवं धूम्रलोचनम्॥ ४० | **पुलस्त्यजी बोले—**सुग्रीवकी इस बातको सुनकर उस महान् असुर शुम्भने कुछ दूरपर खड़े धूम्रलोचन दानवसे कहा॥ ४०॥ | | शुम्भ उवाच<br>धूम्राक्ष गच्छ तां दुष्टां केशाकर्षणविह्वलाम्।<br>सापराधां यथा दासीं कृत्वा शीघ्रमिहानय॥ ४१<br><br>यश्चास्याः पक्षकृत् कश्चिद् भविष्यति महाबलः।<br>स हन्तव्योऽविचार्यायैव यदि हि स्यात् पितामहः॥ ४२<br><br>स एवमुक्तः शुम्भेन धूम्राक्षोऽक्षौहिणीशतैः।<br>वृतः षड्भिर्महातेजा विन्ध्यं गिरिमुपाद्रवत्॥ ४३<br><br>स तत्र दृष्ट्वा तां दुर्गां भ्रान्तदृष्टिरुवाच ह।<br>एह्येहि मूढे भर्तारं शुम्भमिच्छस्व कौशिकी।<br>न चेद् बलान्नयिष्यामि केशाकर्षणविह्वलाम्॥ ४४ | **शुम्भने कहा—**धूम्राक्ष! तुम जाओ। उस दुष्टाको अपराधिनी दासीकी तरह केश खींचनेसे व्याकुल बनाकर यहाँ शीघ्र ले आओ। यदि कोई पराक्रमी उसका पक्ष ले तो तुम बिना विचारे उसे मार डालना—चाहे ब्रह्मा ही क्यों न हो। शुम्भके इस प्रकार कहनेपर उस महान् तेजस्वी धूम्राक्षने छः सौ अक्षौहिणी* सेनाके साथ विन्ध्यपर्वतपर चढ़ाई कर दी। किन्तु वहाँ उन दुर्गाको देखकर दृष्टि चौंधिया जानेसे उसने कहा—मूढ़े! आओ, आओ! कौशिकी! तुम शुम्भको अपना पति बनानेकी इच्छा करो; अन्यथा मैं बलपूर्वक तुम्हारे केश पकड़कर तुम्हें घसीटता हुआ व्याकुल-रूपमें (यहाँसे) ले जाऊँगा॥ ४१-४४॥ | | श्रीदेव्युवाच<br>प्रेषितोऽसीह शुम्भेन बलान्नेतुं हि मां किल।<br>तत्र किं ह्यबला कुर्याद् यथेच्छसि तथा कुरु॥ ४५ | **श्रीदेवीने कहा—**शुम्भने तुमको मुझे बलपूर्वक ले जानेके लिये निश्चय ही भेजा है तो इस विषयमें एक अबला क्या करेगी! तुम जैसा चाहो वैसा करो॥ ४५॥ |
* एक अक्षौहिणी सेनामें १०९३५० पैदल सिपाही, ६५६१० घुड़सवार, २१८७० रथी और २१८७० गजारोही रहते हैं।
५७- कार्तिकेयका जन्म, उनके छः मुख और चतुर्मूर्ति होनेका हेतु,उनका सेनापति होना तथा उनका गण, मयूर, शक्ति और दण्डादिका पाना
अध्याय ५५ ] देवीद्वारा नमुचिका वध; असुरसैन्यसहित चण्ड-मुण्डका विनाश २४५
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| पुलस्त्य उवाच<br>एवमुक्तो विभावर्या बलवान् धूम्रलोचनः।<br>समभ्यधावत् त्वरितो गदामादाय वीर्यवान्॥ ४६<br>तमापतन्तं सगदं हुंकारेणैव कौशिकी।<br>सबलं भस्मसाच्चक्रे शुष्कमग्निरिवेन्धनम्॥ ४७<br>ततो हाहाकृतमभूज्जगत्स्यस्मिंश्चराचरे।<br>सबलं भस्मसानीतं कौशिक्या वीक्ष्य दानवम्॥ ४८ | पुलस्त्यजी बोले— विभावरी (देवी)-के इस प्रकार कहनेपर बलवान् एवं पराक्रमी धूम्रलोचन गदा लेकर झट दौड़ पड़ा। कौशिकीने गदा लेकर आ रहे उस असुरको, साथ ही उसकी सेनाको भी हुंकारसे ही ऐसे भस्म कर दिया जैसे आग सूखी लकड़ीको जला देती है। कौशिकीद्वारा सेनाके साथ बलवान् दानवको भस्म किये जाते देखकर सारे संसारमें हाहाकार मच गया॥ ४६–४८॥ |
| तच्च शुम्भोऽपि शुश्राव महच्छब्दमुदीरितम्।<br>अथादिदेश बलिनौ चण्डमुण्डौ महासुरौ॥ ४९<br>रुरुं च बलिनां श्रेष्ठं तथा जग्मुर्मुदान्विताः।<br>तेषां च सैन्यमतुलं गजाश्वरथसंकुलम्॥ ५०<br>समाजगाम सहसा यत्रास्ते कोशसम्भवा।<br>तदायान्तं रिपुबलं दृष्ट्वा कोटिशतावरम्॥ ५१<br>सिंहोऽद्रवद् धुतसटः पाटयन् दानवान् रणे।<br>कांश्चित् करप्रहारेण कांश्चिदास्येन लीलया॥ ५२<br>नखैः कांश्चिदाक्रम्य उरसा प्रममाथ च।<br>ते वध्यमानाः सिंहेन गिरिकन्दरवासिना॥ ५३<br>भूतैश्च देव्यनुचरैश्चण्डमुण्डौ समाश्रयन्।<br>तावार्त्तं स्वबलं दृष्ट्वा कोपप्रस्फुरिताधरौ॥ ५४ | शुम्भने भी (हाहाकारका) वह महान् शब्द सुना। उसके बाद उसने चण्ड एवं मुण्ड नामके दोनों महान् एवं बलवान् असुरों तथा बलवानोंमें श्रेष्ठ रुरुको आदेश दिया और वे प्रसन्नतापूर्वक (युद्धके लिये) चल पड़े। हाथियों और रथोंसे भरी उनकी बड़ी सेना शीघ्र ही वहाँ पहुँच गयी, जहाँ कौशिकी खड़ी थीं। उस समय शत्रु की सैकड़ों सेनाओंको आते देखकर सिंह युद्धमें अपनी गर्दनके बालोंको फटकारने लगा तथा खेल-खेलमें—बिना किसी परिश्रमके ही दानवोंको पछाड़-पछाड़कर मारने लगा। उसने कुछको पंजोंके थपेड़ोंसे, कुछको मुखसे, कुछको तेज नखोंसे एवं कुछको अपनी छातीके धक्के देकर भयत्रस्त कर दिया। फिर तो पर्वतकी गुफामें रहनेवाले सिंहसे एवं देवीके अनुगत भूतोंसे मारे जा रहे वे सभी दानव (भागकर) चण्ड-मुण्डकी शरणमें चले गये। चण्ड और मुण्ड अपनी सेनाको घबरायी एवं दुखी हुई देखकर कुपित हो गये और अपने ओठ फड़फड़ाने लगे॥ ४९–५४॥ |
| समाद्रवेतां दुर्गां वै पतङ्गाविव पावकम्।<br>तावापतन्तौ रौद्रौ वै दृष्ट्वा क्रोधपरिप्लुता॥ ५५<br>त्रिशाखां भृकुटीं वक्त्रे चकार परमेश्वरी।<br>भ्रुकुटीकुटिलाद् देव्या ललाटफलकाद्द्रुतम्।<br>काली करालवदना निःसृता योगिनी शुभा॥ ५६<br>खट्वाङ्गमादाय करेण रौद्र-<br>मसिञ्च कालाञ्जनकोशमुग्रम्।<br>संशुष्कगात्रा रुधिराप्लुताङ्गी<br>नरेन्द्रमूर्ध्नां स्रजमुद्वहन्ती॥ ५७ | अग्निकी ओर उड़कर जानेवाले (जलकर मरनेवाले) पतंगोंके समान वे दोनों दैत्य देवीकी ओर दौड़े। उन दोनों भयङ्कर दानवोंको सामने आते हुए देखकर देवी अत्यन्त क्रुद्ध हो गयीं। परमेश्वरीने मुखके ऊपर तीन रेखाओंवाली भृकुटि चढ़ायी। देवीके टेढ़ी भौंहोंसे युक्त भालस्थलसे शीघ्र ही विकराल मुखवाली, (भक्तोंके लिये) मङ्गलदायिनी योगिनी काली निकल आयीं। उनके हाथमें भयङ्कर खट्वाङ्ग (नामक) हथियार तथा काले अञ्जनके समान तरकससे युक्त भयङ्कर तलवार थी। उनका शरीर कंकाल और खूनसे सना हुआ था तथा उनके गलेमें राजाओंके कटे हुए सिरोंकी बनी हुई |
२४६ | श्रीवामनपुराण | [ अध्याय ५५ ---|---
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| कांश्चित् खड्गेन चिच्छेद खट्वाङ्गेन परान् रणे।<br>न्यषूदयद् भृशं क्रुद्धा सरथाश्वगजान् रिपून्॥ ५८ | मुण्डमाला थी। उन्होंने बहुत अधिक क्रुद्ध होकर युद्धमें कुछको तलवारके घाट उतार दिया और हाथी, रथ एवं घोड़ोंसे युक्त कुछ अन्य असुर-शत्रुओंको खट्वाङ्गसे मार डाला॥ ५५-५८॥ |
| चर्माङ्कुशं मुद्गरं च सधनुष्कं सघण्टिकम्।<br>कुञ्जरं सह यन्त्रेण प्रचिक्षेप मुखेऽम्बिका॥ ५९<br>सचक्रकूबररथं ससारथितुरङ्गमम्।<br>समं योधेन वदने क्षिप्य चर्वयतेऽम्बिका॥ ६०<br>एकं जग्राह केशेषु ग्रीवायामपरं तथा।<br>पादेनाक्रम्य चैवान्यं प्रेषयामास मृत्यवे॥ ६१<br>ततस्तु तद् बलं देव्या भक्षितं सबलाधिपम्।<br>रुरुर्दृष्ट्वा प्रदुद्राव तं चण्डी ददृशे स्वयम्॥ ६२<br>आजघानाथ शिरसि खट्वाङ्गेन महासुरम्।<br>स पपात हतो भूम्यां छिन्नमूल इव द्रुमः॥ ६३ | अम्बिकादेवी चर्म, अङ्कुश, मुद्गर, धनुष, घंटियों और यन्त्रके साथ हाथियोंको अपने मुखमें झोंकने लगीं और चक्र तथा सारथी, घोड़े और योद्धाके साथ कूबरसे युक्त रथको अपने मुखमें डालकर वे चबाने लगीं। फिर उन्होंने किसीको सिरके केश पकड़कर, किसीको गला पकड़कर और अन्य किसीको पैरोंसे रौंद-रौंदकर मृत्युके समीप पहुँचा दिया। उसके बाद सेनापतिके साथ उस सेनाको देवीद्वारा भक्षण किया जाता हुआ देखकर रुरु दौड़ पड़ा। चण्डीने स्वयं उसे देखा और खट्वाङ्गसे उस महान् असुरके सिरपर आघात कर दिया। वह मरकर जड़से कटे हुए वृक्षके समान पृथ्वीपर (धड़ामसे) गिर पड़ा॥ ५९-६३॥ |
| ततस्तं पतितं दृष्ट्वा पशोरिव विभावरी।<br>कोशमुत्कर्तयामास कर्णादिचरणान्तिकम्॥ ६४<br>सा च कोशं समादाय बबन्ध विमला जटाः।<br>एका न बन्धमगमत् तामुत्पाट्याक्षिपद् भुवि॥ ६५<br>सा जाता सुतरां रौद्री तैलाभ्यक्तशिरोरुहा।<br>कृष्णार्धमर्धशुक्लं च धारयन्ती स्वकं वपुः॥ ६६<br>साऽब्रवीद् वरमेकं तु मारयामि महासुरम्।<br>तस्या नाम तदा चक्रे चण्डमारीति विश्रुतम्॥ ६७ | देवीने उसे जमीनपर गिरा हुआ देखकर पशुके समान उसके कानसे पैरतकका कोश काट दिया—उसकी चमड़ी उधेड़ ली। उस कोश (चमड़ी)-को लेकर उन्होंने अपनी निर्मल जटाओंको बाँध लिया। उनमें एक जटा नहीं बाँधी गयी। उसे उखाड़कर उन्होंने जमीनपर फेंक दिया। वह जटा एक भयावनी देवी हो गयी। उसके सिरके बाल तेलसे सिक्त (सने) थे एवं वह आधा काला तथा आधा सफेद वर्णका शरीर धारण किये हुए थी। उसने कहा—मैं एक श्रेष्ठ महान् असुरको मारूँगी। तब देवीने उसका चण्डमारी—यह प्रसिद्ध नाम रख दिया॥ ६४—६७॥ |
| प्राह गच्छस्व शुभगे चण्डमुण्डविहानय।<br>स्वयं हि मारयिष्यामि तावानेतुं त्वमर्हसि॥ ६८<br>श्रुत्वैवं वचनं देव्याः साऽभ्यद्रवत तावुभौ।<br>प्रदुद्रुवतुर्भयात्तौ दिशमाश्रित्य दक्षिणाम्॥ ६९<br>ततस्तावपि वेगेन प्राधावत् त्यक्तवाससौ।<br>साऽधिरुह्य महावेगं रासभं गरुडोपमम्॥ ७०<br>यतो गतौ च तौ दैत्यौ तत्रैवानुययौ शिवा।<br>सा ददर्श तदा पौण्ड्रं महिषं वै यमस्य च॥ ७१ | देवीने कहा—शुभगे! तुम जाओ और चण्ड-मुण्डको यहाँ पकड़ लाओ! उन्हें पकड़ लानेमें तुम समर्थ हो। मैं स्वयं उन्हें मारूँगी। इस प्रकार देवीके उस कथनको सुनकर वह उन दोनोंकी ओर दौड़ पड़ी। वे दोनों भयसे दुःखी होकर दक्षिण दिशाकी ओर भाग गये। तब चण्डमारी गरुड़के समान वेगवान् गदहेपर सवार होकर वेगसे भगनेके कारण वस्त्रहीन हुए उन दोनोंके पीछे दौड़ पड़ी। (फिर तो) जहाँ-जहाँ चण्ड और मुण्ड दोनों दैत्य गये, वहाँ-वहाँ उनके पीछे शिवा भी पहुँचती गयीं। उस समय उन्होंने यमराजके पौण्ड्र नामक महिषको देखा॥ ६८-७१॥ |
अध्याय ५५ ] देवीद्वारा नमुचिका वध; असुरसैन्यसहित चण्ड-मुण्डका विनाश २४७
| सा तस्योत्पाटयामास विषाणं भुजगाकृतिम्।<br>तं प्रगृह्य करेणैव दानवावन्वगाज्जवात् ॥ ७२<br><br>तौ चापि भूमिं संत्यज्य जगमतुर्गगनं तदा।<br>वेगेनाभिसृता सा च रासभेन महेश्वरी ॥ ७३<br><br>ततो ददर्श गरुडं पन्नगेन्द्रं चिखादिषुम्।<br>कर्कोटकं स दृष्ट्वैव ऊर्ध्वरोमा व्यजायत ॥ ७४<br><br>भयान्मार्याश्च गरुडो मांसपिण्डोपमो बभौ।<br>न्यपतंस्तस्य पत्राणि रौद्राणि हि पतत्रिणः ॥ ७५ | उसने (चण्डमारीने) उस महिषकी साँपके आकारवाली सींगको उखाड़ लिया और उसे हाथमें लेकर वह शीघ्रतासे दानवोंके पीछे पील पड़ी। तब वे दोनों दैत्य पृथ्वी छोड़कर आकाशमें चले गये। फिर महेश्वरीने अपने गधेके साथ शीघ्रतासे उन दोनोंका पीछा किया। (देवीने) सर्पराज कर्कोटकको खानेकी इच्छावाले गरुड़को देखा। (फिर तो देवीको) देखते ही उनके रोंगटे खड़े हो गये; वे डर गये। चण्डमारीके भयसे गरुड़ मांसपिण्डके समान—लोथड़े-से हो गये। उन पक्षिराजके भयङ्कर पाँख (भयके कारण) गिर पड़े ॥ ७२—७५ ॥ |
| खगेन्द्रपत्राण्यादाय नागं कर्कोटकं तथा।<br>वेगेनानुसरद् देवी चण्डमुण्डौ भयातुरौ ॥ ७६<br><br>सम्प्राप्तौ च तदा देव्या चण्डमुण्डौ महासुरौ।<br>बद्धौ कर्कोटकेनैव बद्ध्वा विन्ध्यमुपागमत् ॥ ७७<br><br>निवेदयित्वा कौशिक्यै कोशमादाय भैरवम्।<br>शिरोभिर्दानवेन्द्राणां तार्क्ष्यपत्रैश्च शोभनैः ॥ ७८<br><br>कृत्वा स्रजमनौपम्यां चण्डिकायै न्यवेदयत्।<br>घर्घरां च मृगेन्द्रस्य चर्मणः सा समर्पयत् ॥ ७९ | पक्षिराजके (गिरे हुए) पाँखों तथा कर्कोटक सर्पको लेकर चण्डमारी भयसे आर्त चण्ड और मुण्डके पीछे दौड़ी। उसके बाद तुरंत ही वह देवी चण्ड और मुण्ड नामक महान् असुरोंके निकट पहुँच गयी एवं उन दोनोंको कर्कोटक नागसे बाँधकर विन्ध्यपर्वतपर ले आयी। उस चण्डमारीने देवीके पास उन दानवोंको निवेदित करके बाद भयङ्कर कोश लेकर दानवोंके मस्तकों तथा गरुडके सुन्दर पाँखोंसे बनी अनुपम माला निर्मितकर देवीको दे दी एवं सिंहचर्मका घाघरा भी देवीको समर्पित किया ॥ ७६—७९ ॥ |
| स्रजमन्यैः खगेन्द्रस्य पत्रैर्मूर्ध्नि निबध्य च।<br>आत्मना सा पपौ पानं रुधिरं दानवेष्वपि ॥ ८०<br><br>चण्डा त्वादाय चण्डं च मुण्डं चासुरनायकम्।<br>चकार कुपिता दुर्गा विशिरस्कौ महासुरौ ॥ ८१<br><br>तयोरेवाहिना देवी शेखरं शुष्करेवती।<br>कृत्वा जगाम कौशिक्याः सकाशं मार्यया सह ॥ ८२<br><br>समेत्य साब्रवीद् देवि गृह्यतां शेखरोत्तमः।<br>ग्रथितो दैत्यशीर्षाभ्यां नागराजेन वेष्टितः ॥ ८३<br><br>तं शेखरं शिवा गृह्य चण्डाया मूर्ध्नि विस्तृतम्।<br>बबन्ध प्राह चैवैनां कृतं कर्म सुदारुणम् ॥ ८४ | उन्होंने स्वयं गरुड़के अन्य पाँखोंसे दूसरी माला बनाकर उसे अपने सिरमें बाँध लिया और (फिर वे) दानवोंका खून पीने लगीं। उसके बाद प्रचण्ड दुर्गाने चण्ड और असुरनायक मुण्डको पकड़ लिया एवं कुपित होकर उन दोनों महासुरोंका सिर काट डाला। शुष्करेवती देवीने सर्पद्वारा उनके सिरका अलंकार बनाया और वह चण्डमारीके साथ कौशिकीके पास गयी। वहाँ जाकर उसने कहा—देवि! दैत्योंके सिरसे गुँथे एवं नागराजसे लपेटकर सिरपर पहने जानेवाले इस श्रेष्ठ अलंकारको धारण करें। शिवा देवीने उस विस्तृत सिरके आभूषणको लेकर उसे चामुण्डाके मस्तकपर बाँध दिया और उनसे कहा—आपने अत्यन्त भयंकर कार्य किया है ॥ ८०—८४ ॥ |
| शेखरं चण्डमुण्डाभ्यां यस्माद् धारयसे शुभम्।<br>तस्माल्लोके तव ख्यातिश्चामुण्डेति भविष्यति ॥ ८५<br><br>इत्येवमुक्त्वा वचनं त्रिनेत्रा<br>सा चण्डमुण्डस्रजधारिणीं वै।<br>दिग्वाससं चाभ्यवदत् प्रतीता<br>निष्षूदय स्वारिबलान्यमूनि ॥ ८६ | यतः आपने चण्ड और मुण्डके सिरोंका शुभ आभूषण धारण किया है, अतः आप लोकमें चामुण्डा नामसे प्रख्यात होंगी। चण्ड और मुण्डकी माला धारण करनेवाली उन देवीसे त्रिनेत्राने इस प्रकार कहकर दिगम्बरसे कहा—तुम अपने इन शत्रुसैनिकोंका विनाश करो। |
| २४८ | श्रीवामनपुराण | [ अध्याय ५६ |
|---|
| सा त्वेवमुक्ताऽथ विषाणकोट्या<br>सुवेगयुक्तेन च रासभेन।<br>निषूदयन्ती रिपुसैन्यमुग्रं<br>चचार चान्यानसुरांश्चखाद॥ ८७<br>ततोऽम्बिकायास्त्वथ चर्ममुण्डया<br>मार्या च सिंहेन च भूतसंघैः।<br>निपात्यमाना दनुपुङ्गवास्ते<br>ककुद्मिनं शुम्भमुपाश्रयन्त॥ ८८ | ऐसा कहनेपर बहुत तेज गतिवाले गधेके साथ वह देवी सींगकी नोकसे उग्र शत्रु-सेनाके दलोंका संहार करती हुई विचरण करने लगी और (इस प्रकार) असुरोंको चबाने लगी। उसके बाद अम्बिकाकी अनुगामिनियों—चर्ममुण्डा, मारी, सिंह एवं भूतगणोंद्वारा मारे जा रहे वे महादानव अपने नायक शुम्भकी शरणमें गये॥ ८५–८८॥ |
॥ इस प्रकार श्रीवामनपुराणमें पचपनवाँ अध्याय समाप्त हुआ॥ ५५॥
छप्पनवाँ अध्याय
चण्डिकासे मातृकाओंकी उत्पत्ति, असुरोंसे उनका युद्ध, रक्तबीज-निशुम्भ-शुम्भ-वध, देवताओंके द्वारा देवीकी स्तुति, देवीद्वारा वरदान और भविष्यमें प्रादुर्भावका कथन
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| पुलस्त्य उवाच<br>चण्डमुण्डौ च निहतौ दृष्ट्वा सैन्यं च विद्रुतम्।<br>समादिदेशातिबलं रक्तबीजं महासुरम्।<br>अक्षौहिणीनां त्रिंशद्भिः कोटिभिः परिवारितम्॥ १<br><br>तमापतन्तं दैत्यानां बलं दृष्ट्वैव चण्डिका।<br>मुमोच सिंहनादं वै ताभ्यां सह महेश्वरी॥ २<br><br>निनदन्त्यास्ततो देव्या ब्रह्माणी मुखतोऽभवत्।<br>हंसयुक्तविमानस्था साक्षसूत्रकमण्डलुः॥ ३<br><br>माहेश्वरी त्रिनेत्रा च वृषारूढा त्रिशूलिनी।<br>महाहिवलया रौद्रा जाता कुण्डलिनी क्षणात्॥ ४ | पुलस्त्यजी बोले—(नारदजी!) शुम्भने चण्ड और मुण्डको मृत तथा सैनिकोंको भगा हुआ देखकर अत्यन्त बलवान् महान् असुर रक्तबीजको (लड़नेके लिये) आज्ञा दी। उसके बाद महेश्वरी चण्डिकाने दैत्योंकी तीस करोड़ अक्षौहिणीवाली उस सेनाको आती हुई देखकर उन दोनों देवियोंके साथ सिंहके समान गर्जन किया। उसके बाद सिंहके समान निनाद (हुंकार) करती हुई देवीके मुखसे हंसके विमानपर बैठी हुई तथा अक्षमाला और कमण्डलु लिये ब्रह्माणी उत्पन्न हो गयी। क्षणभरमें ही वृषपर आरूढ़ त्रिशूलधारिणी महासर्पके कंगन पहने और कुण्डल धारण किये हुए तीन नेत्रोंवाली माहेश्वरी भी उत्पन्न हो गयी॥ १–४॥ |
| कण्ठादथ च कौमारी बर्हिपत्रा च शक्तिनी।<br>समुद्भूता च देवर्षे मयूरवरवाहना॥ ५ | देवर्षि नारदजी! मोरपंखसे सुशोभित, शक्तिरूपिणी एवं श्रेष्ठ मोरके वाहनपर आरूढ़ ‘कौमारी' देवीके कण्ठसे उत्पन्न हुई। |
| बाहुभ्यां गरुडारूढा शङ्खचक्रगदासिनी।<br>शार्ङ्गबाणधरा जाता वैष्णवी रूपशालिनी॥ ६ | गरुडपर सवार, शङ्ख, चक्र, गदा, तलवार एवं धनुष-बाण धारण करनेवाली सौन्दर्यशालिनी 'वैष्णवी' शक्ति देवीकी दोनों भुजाओंसे उत्पन्न हुई। |
| महोग्रमुशला रौद्रा दंष्ट्रोल्लिखितभूतला।<br>वाराही पृष्ठतो जाता शेषनागोपरि स्थिता॥ ७ | भारी भयङ्कर मूसल लिये, दाढ़ोंसे पृथ्वीको खोदनेवाली, शेषनागके ऊपर स्थित 'वाराही' शक्ति देवीकी पीठसे उत्पन्न हुई। |
अध्याय ५६ ] चण्डिकासे मातृकाओंकी उत्पत्ति, असुरोंसे उनका युद्ध, रक्तबीज-निशुम्भ-शुम्भ-वध २४९
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| वज्राङ्कुशोद्यतकरा नानालङ्कारभूषिता।<br>जाता गजेन्द्रपृष्ठस्था माहेन्द्री स्तनमण्डलात् ॥ ८ | हाथमें वज्र और अंकुशको लिये, भाँति-भाँतिके आभूषणोंसे विभूषित, गजराजकी पीठपर बैठी हुई 'माहेन्द्री' शक्ति उनके स्तन-मण्डलसे उत्पन्न हुई॥५-८॥ |
| विक्षिपन्ती सटाक्षेपैर्ग्रहनक्षत्रतारकाः।<br>नखिनी हृदयाज्जाता नारसिंही सुदारुणा ॥ ९ | गर्दनके बालोंको फटकारनेसे ग्रह, नक्षत्र और ताराओंको विक्षुब्ध करती हुई तीक्ष्ण नखोंवाली अत्यन्त भयङ्कर नारसिंही शक्ति देवीके हृदयसे उत्पन्न हुई। |
| ताभिर्निपात्यमानं तु निरीक्ष्य बलमासुरम्।<br>ननाद भूयो नादान् वै चण्डिका निर्भया रिपून्।<br>तन्निनादं महच्छ्रुत्वा त्रैलोक्यप्रतिपूरकम् ॥ १० | फिर चण्डिकाने उन शक्तियोंद्वारा संहार की जाती हुई असुर-सेना एवं शत्रुओंको देखकर भयरहित होकर घोर गर्जना की। तीनों लोकोंको ध्वनिसे गुँजा देनेवाले |
| समाजगाम देवेशः शूलपाणिखिलोचनः।<br>अभ्येत्य वन्द्य चैवैनां प्राह वाक्यं तदाऽम्बिके ॥ ११ | उस गर्जनको सुनकर शूलपाणि त्रिलोचन महादेवजी देवीके निकट आये और उनको प्रणामकर (उन्होंने) यह कहा—अम्बिके! दुर्गे! मैं आ गया हूँ। मैं आपका |
| समायातोऽस्मि वै दुर्गे देह्याज्ञां किं करोमि ते।<br>तद्वाक्यसमकालं च देव्या देहोद्भवा शिवा ॥ १२ | कौन-सा कार्य करूँ? मुझे आज्ञा दीजिये। उस उक्तिके साथ ही देवीकी देहसे शिवा उत्पन्न हो गयीं। उन्होंने |
| जाता सा चाह देवेशं गच्छ दौत्येन शंकर।<br>ब्रूहि शुम्भं निशुम्भं च यदि जीवितुमिच्छथ ॥ १३ | देवेश्वरसे कहा—शङ्कर! आप दूत बनकर जाइये और शुम्भ-निशुम्भसे कहिये कि अये दुराचारियो! यदि तुम सब जानेकी इच्छा करते हो तो सातवें (लोक) |
| तद् गच्छध्वं दुराचाराः सप्तमं हि रसातलम्।<br>वासवो लभतां स्वर्गं देवाः सन्तु गतव्यथाः ॥ १४ | रसातलमें चले जाओ। इन्द्रको स्वर्गकी प्राप्ति हो एवं देवगण पीड़ा (बाधासे) रहित हो जायें॥ ९-१४॥ |
| यजन्तु ब्राह्मणाद्यामी वर्णा यज्ञांश्च साम्प्रतम्।<br>नोचेद् बलावलेपेन भवन्तो योद्धुमिच्छथ ॥ १५ | ये ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य आदि वर्ण विधि-विधानसे यज्ञ (अनुष्ठान) करें। यदि तुम (सब) अपने पूरे बलके घमण्डसे युद्ध करना चाहते हो, तो आओ। यह मैं बिना |
| तदागच्छध्वमव्यग्रा एषाऽहं विनिषूदये।<br>यतस्तु सा शिवं दौत्ये न्ययोजयत नारद ॥ १६<br>ततो नाम महादेव्याः शिवदूतीत्यजायत। | किसी घबराहटके—आसानीसे तुमलोगोंका विनाश करूँ—किये देती हूँ। नारदजी! उन्होंने शिवको दूत बनाया, अतः महादेवीका नाम शिवदूती हुआ। वे सारे |
| ते चापि शंकरवचः श्रुत्वा गर्वसमन्वितम्।<br>हुंकृत्वाऽभ्यद्रवन् सर्वे यत्र कात्यायनी स्थिता ॥ १७ | असुर भी शङ्करके गर्वीले वचनको सुनकर हुंकार करते हुए, जहाँ कात्यायनी स्थित थीं वहाँ दौड़ पड़े। उसके |
| ततः शरैः शक्तिभिरङ्कुशैश्र्वरैः<br>परश्वधैः शूलभुशुण्डिपट्टिशैः।<br>प्रासैः सुतीक्ष्णैः परिघैश्च विस्तृतै-<br>र्ववर्षतुर्दैत्यवरौ सुरेश्रीम् ॥ १८ | बाद दोनों असुर सुरेश्रीके ऊपर बाण, शक्ति, अङ्कुश, श्रेष्ठ कुठार, शूल, भुशुण्डी, पट्टिश, तीक्ष्ण प्रास और बहुत बड़े परिघ आदि अस्त्रोंकी बौछार करने लगे ॥ १५-१८॥ |
| सा चापि बाणैर्वरकार्मुकच्युतै-<br>श्चिच्छेद शस्त्राण्यथ बाहुभिः सह।<br>जघान चान्यान् रणचण्डविक्रमा<br>महासुरान् बाणशतैर्महेश्वरी ॥ १९ | युद्धमें प्रचण्ड पराक्रमशालिनी उस महेश्वरीने भी श्रेष्ठ धनुषसे निकले बाणोंसे असुरोंके शस्त्रोंको उनकी भुजाओंसहित काट दिया एवं सैकड़ों बाणोंसे अन्य असुरोंको मौतके घाट उतार दिया। |
| मारी त्रिशूलेन जघान चान्यान्<br>खट्वाङ्गपातैरपरांश्च कौशिकी।<br>महाजलक्षेपहतप्रभावान्<br>ब्राह्मी तथान्यानसुरांश्चकार ॥ २० | मारीने त्रिशूलसे बहुतोंको मारा, कौशिकीने खट्वाङ्गके प्रहारसे बहुतोंका वध किया तथा ब्राह्मीने जलराशि फेंककर दूसरे बहुत-से असुरोंको प्रभावहीन कर दिया। |
| २५० | श्रीवामनपुराण | [ अध्याय ५६ |
|---|
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| माहेश्वरी शूलविदारितोरस-<br>श्चकार दग्धानपरांश्च वैष्णवी।<br>शक्त्या कुमारी कुलिशेन चैन्द्री<br>तुण्डेन चक्रेण वराहरूपिणी ॥ २१<br>नखैर्विभिन्नानपि नारसिंही<br>अट्टाट्टहासैरपि रुद्रदूती।<br>रुद्रस्त्रिशूलेन तथैव चान्यान्<br>विनायकश्चापि परश्वधेन ॥ २२ | माहेश्वरीने शूलसे बहुत-से असुरोंकी छाती छेदकर जर्जर कर दिया। वैष्णवीने बहुतोंको जला कर भस्म कर डाला। कुमारीने शक्तिसे, ऐन्द्रीने वज्रसे, वाराहीने मुखसे एवं चक्रसे असुरोंका संहार किया। नारसिंहीने नखोंके प्रहारसे दैत्योंको चीर डाला, शिवदूतीने अट्टहाससे, रुद्रने त्रिशूलसे एवं विनायकने फरसेकी मारसे अन्य असुरोंको विनष्ट कर दिया॥ १९–२२॥ |
| एवं हि देव्या विविधैस्तु रूपै-<br>र्निपात्यमाना दनुपुङ्गवास्ते।<br>पेतुः पृथिव्यां भुवि चापि भूतै-<br>स्ते भक्ष्यमाणाः प्रलयं प्रजग्मुः ॥ २३<br>ते वध्यमानास्त्वथ देवताभि-<br>र्महासुरा मातृभिराकुलाश्च।<br>विमुक्तकेशास्तरलेक्षणा भयात्<br>ते रक्तबीजं शरणं हि जग्मुः ॥ २४<br>स रक्तबीजः सहसाभ्युपेत्य<br>वरास्त्रमादाय च मातृमण्डलम्।<br>विद्रावयन् भूतगणान् समन्ताद्<br>विवेश कोपात् स्फुरिताधरश्च ॥ २५<br>तमापतन्तं प्रसमीक्ष्य मातरः<br>शस्त्रैः शिताग्रैर्दितिजं ववर्षुः।<br>यो रक्तबिन्दुर्न्यपतत् पृथिव्यां<br>स तत्प्रमाणस्त्वसुरोऽपि जज्ञे ॥ २६ | इस प्रकार देवीके बहुत-से रूपोंद्वारा संहार किये जाते हुए दानव धराशायी होने लगे। भूतगण पृथ्वीपर (गिरे हुए) उन दानवोंको खा-खाकर उन्हें नष्ट करने लगे। देवताओं और मातृशक्तियोंद्वारा संहार किये जा रहे एवं व्याकुल किये गये वे सारे महान् असुर खुले बालों एवं भयसे इधर-उधर देखते हुए रक्तबीजकी शरणमें गये। क्रोधसे ओठको फड़फड़ाते हुए रक्तबीज तेज धारवाले अस्त्रोंको लेकर एकाएक आ धमका एवं भूतगणोंको इधर-उधर खदेड़ते हुए मातृव्यूहमें प्रवेश कर गया। उसको आते हुए देखकर मातृशक्तियोंने उस असुरपर अपने तेज शस्त्रोंकी बौछार कीं। (उनके शरीरसे) रक्तकी जो बूँदें पृथ्वीपर गिरती थीं उनसे उतने ही बलवान् असुर उत्पन्न हो जाते थे॥ २३–२६॥ |
| ततस्तदाश्चर्यमयं निरीक्ष्य<br>सा कौशिकी केशिनिमभ्युवाच।<br>पिबस्व चण्डे रुधिरं त्वराते-<br>र्वितत्य वक्त्रं वडवानलाभम् ॥ २७<br>सा त्वेवमुक्ता वरदाम्बिका हि<br>वितत्य वक्त्रं विकरालमुग्रम्।<br>ओष्ठं नभस्पृक् पृथिवीं स्पृशन्तं<br>कृत्वाऽधरं तिष्ठति चर्ममुण्डा ॥ २८<br>ततोऽम्बिका केशविकर्षणाकुलं<br>कृत्वा रिपुं प्राक्षिपत स्ववक्त्रे।<br>बिभेद शूलेन तथाऽप्युरस्तः<br>क्षतोद्भवान्ये न्यपतंश्च वक्त्रे ॥ २९<br>ततस्तु शोषं प्रजगाम रक्तं<br>रक्तक्षये हीनबलो बभूव।<br>तं हीनवीर्यं शतधा चकार<br>चक्रेण चामीकरभूषितेन ॥ ३० | उसके बाद उस अद्भुत दृश्यको देखकर कौशिकीने केशिनीसे कहा—चण्डिके! वडवानल (समुद्रकी आग)-की भाँति अपने मुखको फैलाकर शत्रु का खून पी डालो। ऐसा कहनेपर वरदायिनी अम्बिकाने अपना विशाल भयङ्कर मुँह फैलाया। ऊपरी ओठसे आकाश एवं निचले ओठसे पृथ्वीका स्पर्श करती हुई चामुण्डा सामने खड़ी हो गयी। उसके बाद अम्बिकाने शत्रुके बालोंको पकड़ करके उसे घसीटकर व्याकुल कर दिया और उसे अपने मुखमें डाल लिया और उसकी छातीमें शूलका प्रहार कर दिया। तब रक्तसे उत्पन्न होनेवाले दूसरे राक्षस भी उनके मुखमें ही गिरने लगे। उसके बाद उसका रक्त सूख गया। रक्तके नष्ट हो जानेसे वह बलहीन हो गया। निर्बल हो जानेपर उसको देवीने सुवर्णसे विभूषित चक्रसे सौ टुकड़ोंमें काट डाला॥ २७–३०॥ |
अध्याय ५६ ] चण्डिकासे मातृकाओंकी उत्पत्ति, असुरोंसे उनका युद्ध, रक्तबीज-निशुम्भ-शुम्भ-वध २५१
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| तस्मिन् विशस्ते दनुसैन्यनाथे<br>ते दानवा दीनतरं विनेदुः।<br>हा तात हा भ्रातरिति ब्रुवन्तः<br>क्व यासि तिष्ठस्व मुहूर्त्तमेहि॥ ३१<br>तथाऽपरे विलुलितकेशपाशा<br>विशीर्णवर्माभरणा दिगम्बराः।<br>निपातिता धरणितले मृडन्या<br>प्रदुद्रुवुर्गिरिवरमुह्य दैत्याः॥ ३२<br>विशीर्णवर्मायुधभूषणं तद्<br>बलं निरीक्ष्यैव हि दानवेन्द्रः।<br>विशीर्णचक्राक्षरथो निशुम्भः<br>क्रोधान्मृडानीं समुपाजगाम॥ ३३<br>खड्गं समादाय च चर्म भास्वरं<br>धुन्वञ्शिरः प्रेक्ष्य च रूपमस्याः।<br>सस्तम्भमोहज्वरपीडितोऽथ<br>चित्रे यथाऽसौ लिखितो बभूव॥ ३४ | उस दानव-सेनापतिके मारे जानेपर वे सभी दानव हा तात! हा भाई! कहाँ जा रहे हो, क्षणभर रुको, यहाँ आओ—ऐसा कहते हुए करुण क्रन्दन करने लगे। मृडानीने खुले और बिखरे बालोंवाले तथा टुकड़े-टुकड़े हुए कवचवाले अनेक नंगे दैत्योंको पृथ्वीपर गिरा दिया। वे दैत्य पर्वतश्रेष्ठको छोड़कर भाग गये। टूटे कवच, हथियारों एवं आभूषणोंसे युक्त अपनी सेनाको देखकर टूटे (ही) चक्र एवं धुरीवाले रथपर चढ़कर दानवश्रेष्ठ निशुम्भ क्रोधपूर्वक मृडानी (देवी)-के पास गया। चमकती हुई तलवार और ढाल लेकर सिर हिलाते हुए वह देवीका रूप देखकर मोहज्वरसे पीड़ित हो चित्र-लिखे हुएकी भाँति ठिठक गया॥ ३१-३४॥ |
| तं स्तम्भितं वीक्ष्य सुरारिमग्रे<br>प्रोवाच देवी वचनं विहस्य।<br>अनेन वीर्येण सुरास्त्वया जिता<br>अनेन मां प्रार्थयसे बलेन॥ ३५<br>श्रुत्वा तु वाक्यं कौशिक्या दानवः सुचिरादिव।<br>प्रोवाच चिन्तयित्वाऽथ वचनं वदतां वरः॥ ३६<br>सुकुमारशरीरोऽयं मच्छस्त्रपतनादपि।<br>शतधा यास्यते भीरु आमपात्रमिवाम्भसि॥ ३७<br>एतद् विचिन्तयन्नर्थं त्वां प्रहर्तुं न सुन्दरि।<br>करोमि बुद्धिं तस्मात् त्वं मां भजस्वायतेक्षणे॥ ३८ | देवीने उस स्तब्ध हुए देवताओंके शत्रुको सामने देखकर हँसते हुए यह वचन कहा—क्या इसी शक्तिके बलपर तुमने देवताओंको पराजित किया है? और, क्या इसी बलपर मुझको (पत्नीरूपमें) पानेके लिये याचना करते रहे? कौशिकीकी बात सुननेके बाद देरतक विचार करके बोलनेवालोंमें श्रेष्ठ वह दानव यह वचन बोला—भीरु! यह तुम्हारा अत्यन्त कोमल शरीर मेरे शस्त्रोंकी मारसे जलमें कच्चे बर्तनकी तरह सैकड़ों टुकड़ोंमें अलग-अलग हो जायगा। सुन्दरि! यह सोचकर मैं तुम्हारे ऊपर आघात करनेका विचार नहीं कर रहा हूँ। अतः विशालनयने! तुम मुझे अङ्गीकार कर लो॥ ३५-३८॥ |
| मम खड्गनिपातं हि नेन्द्रो धारयितुं क्षमः।<br>निवर्तय मतिं युद्धाद् भार्या मे भव साम्प्रतम्॥ ३९<br>इत्थं निशुम्भवचनं श्रुत्वा योगीश्वरी मुने।<br>विहस्य भावगम्भीरं निशुम्भं वाक्यमब्रवीत्॥ ४०<br>नाजिताऽहं रणे वीर भवे भार्या हि कस्यचित्।<br>भवान् यदिह भार्यार्थी ततो मां जय संयुगे॥ ४१<br>इत्येवमुक्ते वचने खड्गमुद्यम्य दानवः।<br>प्रचिक्षेप तदा वेगात् कौशिकीं प्रति नारद॥ ४२ | मेरी तलवारकी मारको इन्द्र भी नहीं सह सकते। तुम युद्धका विचार छोड़ दो एवं अब मेरी पत्नी बन जाओ। मुने! योगीश्वरीने निशुम्भकी यह बात सुनकर हँसते हुए उससे भावभरे वचनमें कहा—वीर! लड़ाईके मैदानमें बिना हारे हुए मैं किसीकी पत्नी नहीं बन सकती। यदि तुम मुझे अपनी स्त्री बनाना चाहते हो तो संग्राममें मुझे जीत लो। नारदजी! इस बातके कहनेपर उस दानवने तलवार उठाकर कौशिकीकी ओर उसे वेगसे चलाया॥ ३९-४२॥ |
| तमापतन्तं निस्त्रिंशं षड्भिर्बर्हिणराजितैः।<br>चिच्छेद चर्मणा सार्द्धं तदद्भुतमिवाभवत्॥ ४३ | देवीने अपनी ओर आती हुई उस तलवारको ढालसहित मोरके पंखसे सुशोभित छः बाणोंसे काट दिया। वह (दृश्य) बड़ा ही विचित्र हुआ। |
५८- सेनापतिपदपर नियुक्त कार्तिकेयके लिये ऋषियोंद्वारा स्वस्त्ययन, तारक-विजयके लिये प्रस्थान, पाताल-केतुका वृत्तान्त, तारक महिषासुर-वध तथा सुचक्राक्षको वर
| २५२ | श्रीवामनपुराण | [ अध्याय ५६ |
|---|
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| खड्गे सचर्मणि छिन्ने गदां गृह्य महासुरः।<br>समाद्रवत् कोशभवां वायुवेगसमो जवे ॥ ४४<br><br>तस्यापतत एवाशु करौ श्लिष्टौ समौ दृढौ।<br>गदया सह चिच्छेद क्षुरप्रेण रणेऽम्बिका ॥ ४५<br><br>तस्मिन्निपतिते रौद्रे सुरशत्रौ भयंकरे।<br>चण्डाद्या मातरो हृष्टाश्चक्रुः किलकिलाध्वनिम् ॥ ४६ | ढालके साथ तलवारके कट जानेपर वह महा असुर गदा लेकर हवाके समान तेजीसे कौशिकीकी ओर दौड़ा। अम्बिकाने लड़ाईमें चढ़ाई करनेवाले उस असुरकी, गदाके साथ सुपुष्ट, सुडौल, गठीली भुजाओंको क्षुरप्र (खुरपे या बाण)-से उसी समय काट गिराया। उस अत्यन्त भयङ्कर देवशत्रुके गिरनेपर चण्डी आदि मातृकाएँ प्रसन्न होकर किलकिलाध्वनि (हर्षसूचक ध्वनि) करने लगीं॥ ४३—४६॥ |
| गगनस्थास्ततो देवाः शतक्रतुपुरोगमाः।<br>जयस्व विजयेत्यूचुर्हृष्टाः शत्रौ निपातिते ॥ ४७<br><br>ततस्तूर्याण्यवाद्यन्त भूतसङ्घैः समन्ततः।<br>पुष्पवृष्टिं च मुमुचुः सुराः कात्यायनीं प्रति ॥ ४८<br><br>निशुम्भं पतितं दृष्ट्वा शुम्भः क्रोधान्महामुने।<br>वृन्दारकं समारुह्य पाशपाणिः समभ्यगात् ॥ ४९<br><br>तमापतन्तं दृष्ट्वाऽथ सगजं दानवेश्वरम्।<br>जग्राह चतुरो बाणांश्चन्द्रार्धाकारवर्चसः ॥ ५० | उसके बाद आकाशमें स्थित इन्द्र आदि देवगण शत्रुको मारकर गिराये जानेपर हर्षित होते हुए बोले— विजये! तुम्हारी जय हो। फिर चारों ओर भूतगण भेरी बजाने लगे और देवगण कात्यायनीके ऊपर फूलोंकी वर्षा करने लगे। महामुनि नारदजी! निशुम्भको गिरा हुआ देखकर शुम्भ क्रोधसे हाथमें पाश लिये हुए हाथीपर चढ़कर आया। हाथीपर चढ़कर दानवेश्वरको आते देख (देवीने) चमकते हुए अर्धचन्द्राकार चार बाणोंको उठा लिया॥ ४७—५०॥ |
| क्षुरप्राभ्यां समं पादौ द्वौ चिच्छेद द्विपस्य सा।<br>द्वाभ्यां कुम्भे जघानाथ हसन्ती लीलयाऽम्बिका ॥ ५१<br><br>निकृत्ताभ्यां गजः पद्भ्यां निपपात यथेच्छया।<br>शक्रवज्रसमाक्रान्तं शैलराजशिरो यथा ॥ ५२<br><br>तस्यावर्जितनागस्य शुम्भस्याप्युत्पतिष्यतः।<br>शिरश्शिच्छेद बाणेन कुण्डलालंकृतं शिवा ॥ ५३<br><br>छिन्ने शिरसि दैत्येन्द्रो निपतात सकुञ्जरः।<br>यथा समहिषः क्रौञ्चो महासेनसमाहतः ॥ ५४<br><br>श्रुत्वा सुराः सुररिपू निहतौ मृडान्या<br>सेन्द्राः ससूर्यमरुदश्विवसुप्रधानाः।<br>आगत्य तं गिरिवरं विनयावनम्रा<br>देव्यास्तदा स्तुतिपदं त्विदमीरयन्तः ॥ ५५ | हँसते हुए उस अम्बिकाने खेल-खेलमें दो तीखे बाणोंसे उस हाथीके दो पैरोंको काट दिया एवं दो बाणोंसे उसके कुम्भस्थलपर आघात किया। दो पैरोंके कट जानेपर वह हाथी इन्द्रके वज्रसे घायल पर्वतराजकी ऊँची चोटीकी तरह अपने-आप ही गिर पड़ा। शिवाने घायल हुए हाथीपरसे उछलनेवाले शुम्भका कुण्डलसे सुशोभित मस्तक बाणसे (झट) काट दिया। सिरके कट जानेपर दैत्येन्द्र हाथीके साथ ऐसे गिरा जैसे महासेन कार्तिकेयद्वारा घायल हुआ क्रौञ्चासुर महिषके साथ गिरा था। मृडानी (देवी)-द्वारा दोनों देवशत्रुओंका संहार किया जाना सुनकर इन्द्रसहित सूर्य, मरुत्, अश्विनीकुमार एवं वसुगण आदि देवता उस श्रेष्ठ पर्वतपर आये एवं विनयपूर्वक देवीकी इस प्रकार स्तुति करने लगे॥ ५१—५५॥ |
| देवा ऊचुः<br>नमोऽस्तु ते भगवति पापनाशिनि<br>नमोऽस्तु ते सुररिपुदर्पशातनि।<br>नमोऽस्तु ते हरिहरराज्यदायिनि<br>नमोऽस्तु ते मखभुजकार्यकारिणि ॥ ५६ | देवताओंने स्तुति की— भगवति! पापनाशिनि! आपको नमस्कार है। सुर-शत्रुओंके दर्पका दलन करनेवाली! आपको नमस्कार है। विष्णु और शङ्करको राज्य देनेवाली! आपको नमस्कार है। यज्ञके भागके भोक्ता देवोंका कार्य करनेवाली! आपको नमस्कार है। |
| अध्याय ५६ ] | चण्डिकासे मातृकाओंकी उत्पत्ति, असुरोंसे उनका युद्ध, रक्तबीज-निशुम्भ-शुम्भ-वध | २५३ |
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| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| नमोऽस्तु ते त्रिदशरिपुक्षयंकरि<br>नमोऽस्तु ते शतमखपादपूजिते ।<br>नमोऽस्तु ते महिषविनाशकारिणी<br>नमोऽस्तु ते हरिहरभास्करस्तुते ॥ ५७<br><br>नमोऽस्तु तेऽष्टादशबाहुशालिनि<br>नमोऽस्तु ते शुम्भनिशुम्भघातिनि ।<br>नमोऽस्तु लोकार्त्तिहरे त्रिशूलिनि<br>नमोऽस्तु नारायणि चक्रधारिणि ॥ ५८<br><br>नमोऽस्तु वाराहि सदा धराधरे<br>त्वां नारसिंहि प्रणता नमोऽस्तु ते ।<br>नमोऽस्तु ते वज्रधरे गजध्वजे<br>नमोऽस्तु कौमारि मयूरवाहिनि ॥ ५९ | देवताओंके शत्रुओंका विनाश करनेवाली! आपको नमस्कार है। इन्द्रके द्वारा पूजित चरणोंवाली! आपको नमस्कार है। महिषासुरका विनाश करनेवाली! आपको नमस्कार है। विष्णु, शङ्कर एवं सूर्यसे स्तुति की जानेवाली! आपको नमस्कार है। अष्टादश भुजाओंवाली! आपको नमस्कार है। शुम्भ और निशुम्भका वध करनेवाली! आपको नमस्कार है। समस्त संसारका दुःख हरण करनेवाली! त्रिशूल धारण करनेवाली! आपको नमस्कार है। चक्र धारण करनेवाली नारायणि! आपको नमस्कार है। वाराहि! धराको सदा धारण करनेवाली! आपको नमस्कार है। नारसिंहि! आपके चरणोंपर हम प्रणत हैं, आपको नमस्कार है। वज्र धारण करनेवाली! गजध्वजे! आपको नमस्कार है। कौमारि! मयूरवाहिनि! आपको नमस्कार है ॥ ५६-५९ ॥ |
| नमोऽस्तु पैतामहहंसवाहने<br>नमोऽस्तु मालाविकटे सुकेशिनि ।<br>नमोऽस्तु ते रासभपृष्ठवाहिनि<br>नमोऽस्तु सर्वार्त्तिहरे जगन्मये ॥ ६०<br><br>नमोऽस्तु विश्वेश्वरि पाहि विश्वं<br>निषूद्यारीन् द्विजदेवतानाम् ।<br>नमोऽस्तु ते सर्वमयि त्रिनेत्रे<br>नमो नमस्ते वरदे प्रसीद ॥ ६१<br><br>ब्रह्माणी त्वं मृडानी वरशिखिगमना<br>शक्तिहस्ता कुमारी<br>वाराही त्वं सुवक्त्रा खगपतिगमना<br>वैष्णवी त्वं सशार्ङ्गी ।<br>दुर्द्दृश्या नारसिंही घुरघुरितरवा<br>त्वं तथैन्द्री सवज्रा<br>त्वं मारी चर्ममुण्डा शवगमनरता<br>योगिनी योगसिद्धा ॥ ६२<br><br>नमस्ते त्रिनेत्रे भगवति तव चरणानुषिक्ता<br>ये अहरहर्विनतशिरसोऽवनताः ।<br>नहि नहि परिभवमस्त्यशुभं च<br>स्तुतिबलिकुसुमकराः सततं ये ॥ ६३ | ब्रह्माके हंसपर बैठनेवाली! आपको नमस्कार है। विकट माला धारण करनेवाली! सुन्दर केशोंवाली! आपको नमस्कार है। गर्दभकी पीठपर बैठनेवाली! आपको नमस्कार है। समस्त क्लेशोंका नाश करनेवाली! जगन्मये! आपको नमस्कार है। विश्वेश्वरि! आपको नमस्कार है। आप विश्वकी रक्षा करें तथा ब्राह्मणों और देवताओंके शत्रुओंका संहार करें। त्रिनेत्रे! सर्वमयि! आपको नमस्कार है। वरदायिनि! आपको बारम्बार नमस्कार है। आप प्रसन्न हों। ब्रह्माणी और मृडानी आप ही हैं। आप ही सुन्दर मोरपर चलनेवाली और हाथमें शक्ति धारण करनेवाली कुमारी हैं। सुन्दर मुखवाली वाराही आप ही हैं तथा गरुड़पर चलनेवाली, शार्ङ्गधनुष धारण करनेवाली वैष्णवी आप ही हैं। घुर-घुर शब्द करनेवाली, देखनेमें भयंकर नारसिंही आप ही हैं। आप ही वज्र धारण करनेवाली ऐन्द्री एवं महामारी चर्ममुण्डा हैं। शवपर चलनेवाली तथा योग सिद्ध कर चुकनेवाली योगिनी भी आप ही हैं। तीन नेत्रोंवाली भगवति! आपको नमस्कार है। आपके चरणोंका आश्रय कर नम्रतासे प्रतिदिन अपना सिर झुकानेवालों तथा बलि एवं फूलोंको हाथमें लिये सर्वदा आपकी स्तुति करनेवालोंका कोई पराजय, अनादर और अकल्याण नहीं होता ॥ ६०-६३ ॥ |
| २५४ | श्रीवामनपुराण | [ अध्याय ५६ |
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| एवं स्तुता सुरवरैः सुरशत्रुनाशिनी<br>प्राह प्रहस्य सुरसिद्धमहर्षिवर्यान्।<br>प्राप्तो मयाऽद्भुततमो भवतां प्रसादात्<br>संग्राममूर्ध्नि सुरशत्रुजयः प्रमर्दात्॥ ६४<br>इमां स्तुतिं भक्तिपरा नरोत्तमा<br>भवद्भिरुक्तामनुकीर्त्तयन्ति ।<br>दुःस्वप्ननाशो भविता न संशयो<br>वरस्तथान्यॊ व्रियतामभीप्सितः॥ ६५ | श्रेष्ठ देवताओंके इस प्रकार प्रार्थना करनेपर देवताओंके शत्रुओंका संहार करनेवाली देवीने देवताओं, सिद्धों और श्रेष्ठ महर्षियोंसे हँसकर कहा—मैंने आपलोगोंकी कृपासे युद्धभूमिमें (शत्रुका) मर्दन कर देवशत्रुओं (दानवों)-पर अत्यन्त अनूठी विजय प्राप्त की है। आपलोगोंसे कही गयी इस स्तुतिको पढ़नेवाले भक्तिपरायण श्रेष्ठ मनुष्योंके दुःस्वप्नोंका निस्सन्देह नाश होगा। (अब) आपलोग दूसरे इच्छित वरको माँगँ॥ ६४-६५॥ | | देवा ऊचुः<br>यदि वरदा भवती त्रिदशानां<br>द्विजशिशुगोषु यतस्व हिताय।<br>पुनरपि देवरिपूनपरांस्त्वं<br>प्रदह हुताशनतुल्यशरीरे॥ ६६ | देवताओँने कहा— यदि आप देवताओंको वर देना चाहती हैं तो ब्राह्मणों, बच्चों और गौओंके कल्याणके लिये यत्न कीजिये। अग्निके सदृश शरीरवाली! आप (हम सबके) अन्य देवशत्रुओंको भविष्यमें भी जलाकर भस्म करें॥ ६६॥ | | देव्युवाच<br>भूयो भविष्याम्यसृगुक्षितानना<br>हराननस्वेदजलोद्भवा सुराः।<br>अन्धासुरस्याप्रतिपोषणे रता<br>नाम्ना प्रसिद्धा भुवनेषु चर्चिका॥ ६७<br>भूयो वधिष्यामि सुरारिमुत्तं<br>सम्भूय नन्दस्य गृहे यशोदया।<br>तं विप्रचित्तिं लवणं तथाऽपरौ<br>शुम्भं निशुम्भं दशनप्रहारिणी॥ ६८<br>भूयः सुरास्तिष्ययुगे निराशिनी<br>निरीक्ष्य मारीं च गृहे शतक्रतोः।<br>सम्भूय देव्याऽमितसत्यधामया<br>सुरा भरिष्यामि च शाकम्भरी वै॥ ६९<br>भूयो विपक्षक्षपणाय देवा<br>विन्ध्ये भविष्याम्यृषिरक्षणार्थम्।<br>दुर्वृत्तचेष्टान् विनिहत्य दैत्यान्<br>भूयः समेष्यामि सुरालयं हि॥ ७०<br>यदाऽरुणाक्षो भविता महासुरः<br>तदा भविष्यामि हिताय देवताः।<br>महाभिलिरूपेण विनष्टजीवितं<br>कृत्वा समेष्यामि पुनस्त्रिविष्टपम्॥ ७१ | देवीने कहा— देवो! मैं पुनः शङ्करके मुखके पसीनेके जलसे उत्पन्न हो करके रक्तसे रञ्जित मुखवाली होकर संसारमें चर्चिका नामसे प्रसिद्ध होऊँगी और अन्धकासुरका संहार करूँगी। फिर मैं नन्दके गृहमें यशोदासे उत्पन्न होकर प्रबल देव-शत्रुका वध करूँगी। वहाँ मैं अवतार लेकर दाँतोंके आघातसे विप्रचित्ति, लवणासुर एवं अन्य शुम्भ-निशुम्भ दानवोंका विनाश करूँगी। देवताओ! कलि-युगमें भोजन न करती हुई इन्द्रके घरमें मारीको देखकर मैं पुनः अमितसत्यधामा देवीके साथ इन्द्रके घर शाकम्भरीके रूपमें प्रकट होकर भरण-पोषण करूँगी। देवताओ! पुनः मैं शत्रुओंके संहार तथा ऋषियोंकी रक्षाके लिये विन्ध्याचलमें उपस्थित होऊँगी। देवो! वहाँ दुराचारी दैत्योंका नाश करनेके बाद पुनः स्वर्ग चली जाऊँगी। देवताओ! अरुणाक्ष नामक महासुरके उत्पन्न होनेपर महाभ्रमरके रूपसे पुनः उत्पन्न होऊँगी एवं उसका संहार कर फिर स्वर्ग चली जाऊँगी॥ ६७–७१॥ |
अध्याय ५७] कार्त्तिकेयका जन्म, उनके छः मुख और चतुर्मूर्ति होनेका हेतु, उनका दण्डादिका पाना २५५
| पुलस्त्य उवाच | |
|---|---|
| इत्येवमुक्त्वा वरदा सुराणां<br>कृत्वा प्रणामं द्विजपुङ्गवानाम्।<br>विसृज्य भूतानि जगाम देवी<br>खं सिद्धसङ्घैरनुगम्यमाना ॥ ७२<br>इदं पुराणं परमं पवित्रं<br>देव्या जयं मङ्गलदायि पुंसाम्।<br>श्रोतव्यमेतन्नियतैः सदैव<br>रक्षोघ्नमेतद्भगवानुवाच ॥ ७३ ॥ | पुलस्त्यजी बोले— ऐसा कहनेके बाद देवी श्रेष्ठ ब्राह्मणोंको प्रणाम करके अन्य प्राणियोंको बिदाकर एवं देवोंको वर देकर सिद्धोंके साथ स्वर्गमें चली गयीं। देवीकी यह विजय-कथा परम पवित्र और प्राचीन है, यह पुरुषोंको मङ्गल देनेवाली है, संयतचित्त मनुष्योंको इसे सदा सुननी चाहिये। भगवान्ने इसे 'रक्षोघ्न' कहा है ॥ ७२–७३ ॥ |
॥ इस प्रकार श्रीवामनपुराणमें छप्पनवाँ अध्याय समाप्त हुआ ॥ ५६ ॥
सत्तावनवाँ अध्याय
कार्त्तिकेयका जन्म, उनके छः मुख और चतुर्मूर्ति होनेका हेतु, उनका सेनापति होना तथा उनका गण, मयूर, शक्ति और दण्डादिका पाना
| नारद उवाच | |
|---|---|
| कथं समहिषः क्रौञ्चो भिन्नः स्कन्देन सुव्रत।<br>एतन्मे विस्तराद् ब्रह्मन् कथयस्वामितद्युते ॥ १ | नारदजीने पूछा— दृढ़तासे व्रतका सुपालन करनेवाले अमित तेजस्वी ब्रह्मन्! आप मुझे विस्तारसे यह बतलाइये कि स्कन्दने महिषके सहित क्रौञ्चको किस प्रकार मारा ? ॥ १ ॥ |
| पुलस्त्य उवाच | |
| शृणुष्व कथयिष्यामि कथां पुण्यां पुरातनीम्।<br>यशोवृद्धिं कुमारस्य कार्त्तिकेयस्य नारद ॥ २<br>यत्तत्पीतं हुताशेन स्कन्नं शुक्रं पिनाकिनः।<br>तेनाक्रान्तोऽभवद् ब्रह्मन् मन्दतेजा हुताशनः ॥ ३<br>ततो जगाम देवानां सकाशममितद्युतिः।<br>तैश्चापि प्रहितस्तूर्णं ब्रह्मलोकं जगाम ह ॥ ४<br>स गच्छन् कुटिलां देवीं ददर्श पथि पावकः।<br>तां दृष्ट्वा प्राह कुटिले तेज एतत्सुदुद्धरम् ॥ ५ | पुलस्त्यजी बोले— नारद! सुनो, मैं कीर्तिको बढ़ानेवाली कुमार कार्त्तिकेयकी पवित्र प्राचीन कथा कहता हूँ। ब्रह्मन्! अग्निने शङ्करके उस च्युत शुक्रका पान कर लिया था। उससे ग्रस्त होनेके कारण अग्निका तेज फीका हो गया। उसके बाद अत्यन्त तेजस्वी अग्नि देवताओंके निकट गये। फिर उन देवोंके भेजे जानेपर वे शीघ्र ही ब्रह्मलोक चले गये। मार्गमें जाते हुए अग्निने कुटिला नामकी देवीको देखा। उसको देखकर अग्निने कहा—कुटिले! इस तेजको धारण करना कठिन है ॥ २–५ ॥ |
| महेश्वरेण संत्यक्तं निर्दहेद् भुवनान्यपि।<br>तस्मात् प्रतीच्छ पुत्रोऽयं तव धन्यो भविष्यति ॥ ६<br><br>इत्यग्निना सा कुटिला स्मृत्वा स्वमतमुत्तमम्।<br>प्रक्षिपस्वाम्भसि मम प्राह वह्निं महापगा ॥ ७ | शङ्करके द्वारा त्यागा गया यह तेज समस्त लोकोंको दग्ध कर देगा, अतः तुम इसे ग्रहण कर लो। इससे तुम्हें एक भाग्यशाली पुत्र होगा। अग्निके इस प्रकार कहनेपर अपने उत्तम मनोरथका स्मरणकर महानदी कुटिलाने अग्निसे कहा—इसे मेरे जलमें छोड़ |
| २५६ | श्रीवामनपुराण | [ अध्याय ५७ | | :--- | :--- |
| ततस्त्वधारयद्देवी शार्वं तेजस्त्वपूपुषत्।<br>हुताशनोऽपि भगवान् कामचारी परिभ्रमन्॥ ८<br>पञ्चवर्षसहस्राणि धृतवान् हव्यभुक् ततः।<br>मांसमस्थीनि रुधिरं मेदोऽन्त्ररेतसी त्वचः॥ ९<br>रोमश्मश्र्वक्षिकेशाद्याः सर्वे जाता हिरण्मयाः।<br>हिरण्यरेता लोकेषु तेन गीतश्च पावकः॥ १० | दें। (ऐसा करनेपर) उसके बाद वह देवी शङ्करके तेजको ग्रहणकर उसका पालन-पोषण करने लगी। भगवान् अग्निदेव भी इच्छाके अनुसार विचरण करने लगे। अग्निने उस तेजको पाँच हजार वर्षोंतक धारण किया था। इसलिये अग्निके मांस, हड्डी, रक्त, मेदा, आँत, रेतस्, त्वचा, रोम, दाढ़ी-मूँछ, नेत्र एवं केश आदि सभी सुवर्णमय बन गये। इसीसे संसारमें अग्निको 'हिरण्यरेता' कहा जाने लगा॥ ६-१०॥ | | पञ्चवर्षसहस्राणि कुटिला ज्वलनोपमम्।<br>धारयन्ती तदा गर्भं ब्रह्मणः स्थानमागता॥ ११<br>तां दृष्टवान् पद्मजन्मा संतप्यन्तीं महापगाम्।<br>दृष्ट्वा पप्रच्छ केनायं तव गर्भः समाहितः॥ १२<br>सा चाह शाङ्करं यत्तच्छुक्रं पीतं हि वह्निना।<br>तदशक्तेन तेनाद्य निक्षिप्तं मयि सत्तम॥ १३<br>पञ्चवर्षसहस्राणि धारयन्त्याः पितामह।<br>गर्भस्य वर्तते कालो न पपात च कर्हिचित्॥ १४ | तब अग्निके समान उस गर्भको पाँच हजार वर्षोंतक धारण करती हुई कुटिला ब्रह्माके स्थानपर गयी। कमलजन्मा ब्रह्माने उस महानदीको सन्तप्त होती देखकर पूछा—तुम्हारा यह गर्भ किसके द्वारा स्थापित है? उसने उत्तर दिया—सत्तम! अग्निने पिये हुए शङ्करके उस शुक्रको अपनेमें धारण करनेकी शक्ति न होनेके कारण मुझमें त्याग दिया। पितामह! गर्भ धारण किये हुए मेरा पाँच हजार वर्षका समय बीत गया; परंतु किसी प्रकार यह बाहर नहीं निकल रहा है॥ ११-१४॥ | | तच्छ्रुत्वा भगवानाह गच्छ त्वमुदयं गिरिम्।<br>तत्रास्ति योजनशतं रौद्रं शरवणं महत्॥ १५<br>तत्रैनं क्षिप सुश्रोणि विस्तीर्णे गिरिसानुनि।<br>दशवर्षसहस्रान्ते ततो बालो भविष्यति॥ १६<br>सा श्रुत्वा ब्रह्मणो वाक्यं रूपिणी गिरिमागता।<br>आगत्य गर्भं तत्याज मुखेनैवाद्रिनन्दिनी॥ १७<br>सा तु संत्यज्य तं बालं ब्रह्माणं सहसागमत्।<br>आपोमयी मन्त्रवशात् संजाता कुटिला सती॥ १८ | उसको सुनकर भगवान् ब्रह्माने कहा—तुम उदयाचलपर जाओ। वहाँपर सौ योजनमें फैला हुआ सरपतोंका विशाल घनघोर वन है। अयि सुन्दर कटिवाली! उस विस्तृत पर्वतकी ऊँची चोटीपर इसे छोड़ दो। यह दस हजार वर्षोंके बाद बालक हो जायगा। ब्रह्माकी बात सुननेके बाद वह गिरिनन्दिनी सुन्दरी पर्वतपर गयी एवं मुखसे ही (उसने) गर्भका परित्याग कर दिया। वह उस (जन्म लेनेवाले) बालकको छोड़कर शीघ्र ही ब्रह्माके समीप चली गयी। सती कुटिला मन्त्र (शाप)-के कारण जलरूपमें हो गयी॥ १५-१८॥ | | तेजसा चापि शार्वेण रौक्मं शरवणं महत्।<br>तन्निवासिरताश्चान्ये पादपा मृगपक्षिणः॥ १९<br>ततो दशसु पूर्णेसु शरदशशतेष्वथ।<br>बालार्कदीप्तिः संजातो बालः कमललोचनः॥ २०<br>उत्तानशायी भगवान् दिव्ये शरवणे स्थितः।<br>मुखेऽङ्गुष्ठं समाक्षिप्य रुरोद घनराडिव॥ २१<br>एतस्मिन्नन्तरे देव्यः कृत्तिकाः षट् सुतेजसः।<br>ददृशुः स्वेच्छया यान्त्यो बालं शरवणे स्थितम्॥ २२ | शङ्करके तेजसे वह विशाल सरपतोंका वन सुवर्णमय बन गया। उस वनमें रहनेवाले वृक्ष, मृग एवं पक्षी भी सुवर्णमय हो गये। उसके बाद दस हजार वर्षोंके बीत जानेपर उगते हुए बाल सूर्यके सदृश दीप्तिमान् तथा कमलके समान आँखोंवाला बालक उत्पन्न हुआ। उस दिव्य सरपतके वनमें उत्तान सोये हुए भगवान् कुमार अपने मुखमें अपना अंगूठा डालकर बादलकी ध्वनिके समान अस्पष्ट ध्वनिमें रोने लगे। इसी बीच स्वेच्छासे जाती हुई दिव्य तेजस्विनी छहों कृत्तिकाओंने सरपतके वनमें स्थित उस बालकको देखा॥ १९-२२॥ |
अध्याय ५७] कार्त्तिकेयका जन्म, उनके छः मुख और चतुर्मूर्ति होनेका हेतु, उनका दण्डादिका पाना २५७
| कृपायुक्ताः समाजग्मुर्यत्र स्कन्दः स्थितोऽभवत्।<br>अहं पूर्वमहं पूर्वं तस्मै स्तन्येऽभिचुक्रुशुः॥ २३<br><br>विवदन्तीः स ता दृष्ट्वा षण्मुखः समजायत।<br>अबीभरंश्च ताः सर्वाः शिशुं स्नेहाच्च कृत्तिकाः ॥ २४<br><br>ध्रियमाणः स ताभिस्तु बालो वृद्धिमगान्ममुने।<br>कार्त्तिकेयेति विख्यातो जातः स बलिनां वरः ॥ २५<br><br>एतस्मिन्नन्तरे ब्रह्मन् पावकं प्राह पद्मजः।<br>कियत्प्रमाणः पुत्रस्ते वर्त्तते साम्प्रतं गुहः ॥ २६ | ये कृत्तिकाएँ दयापूर्वक वहाँ गयीं जहाँ कुमार स्कन्द थे। उन्हें दूध पिलानेके लिये वे आपसमें 'हम पहले, हम पहले' (पिलायेंगी-) कहकर विवाद करने लगीं। उन्हें आपसमें विवाद करती हुई देखकर वह कुमार षण्मुख (छह मुखवाले) बन गये। फिर तो उन (छहों) कृत्तिकाओंने प्रेमपूर्वक बच्चेका पोषण किया। मुने! उनके द्वारा रक्षित होकर वह शिशु बड़ा हुआ। वह बलवानोंमें श्रेष्ठ कार्त्तिकेय नामसे प्रसिद्ध हुआ। ब्रह्मन्! इसी बीच ब्रह्माने अग्निसे प्रश्न किया कि अग्निदेव! तुम्हारा पुत्र गुह (कार्त्तिकेय) इस समय कितना बड़ा हुआ है? ॥ २३—२६॥ |
| स तद्वचनमाकर्ण्य अजानंस्तं हरात्मजम्।<br>प्रोवाच पुत्रं देवेश न वेद्मि कतमो गुहः ॥ २७<br><br>तं प्राह भगवान् यत्तु तेजः पीतं पुरा त्वया।<br>त्रैयम्बकं त्रिलोकेश जातः शरवणे शिशुः ॥ २८<br><br>श्रुत्वा पितामहवचः पावकस्त्वरितोऽभ्यगात्।<br>वेगिनं मेषमारुह्य कुटिला तं ददर्श ह ॥ २९<br><br>ततः पप्रच्छ कुटिला शीघ्रं क्व व्रजसे कवे।<br>सोऽब्रवीत् पुत्रदृष्ट्यर्थं जातं शरवणे शिशुम् ॥ ३० | ब्रह्माके प्रश्नको सुनकर अग्निने शङ्करके उस पुत्रको न जाननेके कारण उत्तरमें कहा—देवेश! मैं पुत्रको नहीं जानता; कौन-सा गुह है? भगवान्ने उनसे कहा—त्रिलोकेश! पूर्वकालमें तुमने शङ्करका जो तेज पी लिया था, वह शरवण (सरपतके वन)-में शिशुरूपसे उत्पन्न हुआ है। पितामहका वचन सुननेके बाद अग्निदेव तीव्र गतिवाले बकरेपर चढ़कर शीघ्र (वहाँ) गये। कुटिलाने उन्हें जाते हुए देखा। तब कुटिलाने उनसे पूछा—अग्निदेव! आप कहाँ जा रहे हैं? उन्होंने कहा—कुटिले! शरवणमें उत्पन्न हुए बालक पुत्रको देखने जा रहा हूँ ॥ २७—३०॥ |
| साऽब्रवीत् तनयो मह्यं ममेत्याह च पावकः।<br>विवदन्तौ ददर्शाथ स्वेच्छाचारी जनार्दनः ॥ ३१<br><br>तौ पप्रच्छ किमर्थं वा विवादमिह चक्रथः।<br>तावूचतुः पुत्रहेतो रुद्रशुक्रोद्भवाय हि॥ ३२<br><br>तावुवाच हरिर्देवो गच्छ तं त्रिपुरान्तकम्।<br>स यद् वक्ष्यति देवेशस्तत्कुरुध्वमसंशयम् ॥ ३३<br><br>इत्युक्तौ वासुदेवेन कुटिलाग्नी हरान्तिकम्।<br>समभ्येत्योचतुस्तथ्यं कस्य पुत्रेति नारद ॥ ३४ | उसने कहा कि 'पुत्र मेरा है' और अग्निने कहा कि 'मेरा है'। स्वेच्छासे विचरण कर रहे जनार्दनने उन दोनोंको परस्पर विवाद करते हुए देखा। उन्होंने उन दोनोंसे पूछा—तुम दोनों आपसमें किसलिये विवाद कर रहे हो। (तो) उन दोनोंने कहा—रुद्रके शुक्रसे उत्पन्न हुए पुत्रके लिये। विष्णुने उन दोनोंसे कहा—तुमलोग त्रिपुरासुरका विनाश करनेवाले शिवके पास जाओ। वे देवेश जो कहें, उसे निस्संदेह करो। (पुलस्त्यजी कहते हैं कि) नारदजी! वासुदेवके इस प्रकार कहनेपर कुटिला एवं अग्नि शङ्करके पास गये और उन्होंने (उनसे) यह गूढ रहस्य पूछा कि पुत्र किसका है? ॥ ३१—३४॥ |
| रुद्रस्तद्वाक्यमाकर्ण्य हर्षनिर्भरमानसः।<br>दिष्ट्या दिष्ट्येति गिरिजां प्रोद्भूतपुलकोऽब्रवीत् ॥ ३५ | उनके वचनको सुनकर शङ्करका मन हर्षसे भर गया। उन्होंने हर्षगद्गद होकर गिरिजासे कहा—अहो |
| २५८ | श्रीवामनपुराण | [ अध्याय ५७ | | :--- | :--- | | ततोऽम्बिका प्राह हरं देव गच्छाम तं शिशुम्।<br>प्रष्टुं समाश्रयेद् यं स तस्य पुत्रो भविष्यति ॥ ३६<br>बाढमित्येव भगवान् समुत्तस्थौ वृषध्वजः।<br>सहोमया कुटिलया पावकेन च धीमता ॥ ३७<br>सम्प्राप्तास्ते शरवणं हराग्निकुटिलाम्बिकाः।<br>ददृशुः शिशुकं तं च कृत्तिकोत्सङ्गशायिनम् ॥ ३८ | भाग्य! अहो भाग्य!! तब अम्बिकाने शङ्करसे कहा—देव! हम सब उस शिशुसे ही पूछने चलें। वह जिसका आश्रय स्वीकार करेगा उसीका पुत्र होगा। ठीक है—ऐसा कहकर वृषध्वज भगवान् शङ्कर पार्वती, कुटिला तथा बुद्धिमान् पावकके साथ चलनेके लिये उठ खड़े हुए। शङ्कर, पार्वती, कुटिला एवं पावक शरवणमें गये। इन लोगोंने कृत्तिकाकी गोदमें लेटे हुए उस बालकको देखा॥ ३५-३८॥ | | ततः स बालकस्तेषां मत्वा चिन्तितमादरात्।<br>योगी चतुर्मूर्तिरभूत् षण्मुखः स शिशुस्त्वपि ॥ ३९<br>कुमारः शङ्करमगाद् विशाखो गौरिमागमत्।<br>कुटिलामगमच्छाखो महासेनोऽग्निमभ्ययात् ॥ ४०<br>ततः प्रीतियुतो रुद्र उमा च कुटिला तथा।<br>पावकश्चापि देवेशः परां मुदमवाप च ॥ ४१<br>ततोऽब्रुवन् कृत्तिकास्ताः षण्मुखः किं हरात्मजः।<br>ता अब्रवीद्धरः प्रीत्या विधिवद् वचनं मुने ॥ ४२ | उसके बाद छः मुखोंवाला वह बालक उन लोगोंको चिन्तित जान करके उनमें आदर रखकर बच्चा होते हुए भी योगीके समान कुमार, विशाख, शाख, महासेन—(इन) चार मूर्तियोंवाला हो गया। कुमार शङ्करके, विशाख गिरिजाके, शाख कुटिलाके और महासेन अग्निके समीप चले गये। फिर तो रुद्र, उमा, कुटिला तथा देवेश्वर अग्नि—ये चारों ही अत्यन्त हर्षित हो गये। उसके बाद उन कृत्तिकाओंने पूछा—क्या षड्वदन शङ्करके पुत्र हैं? मुने! शङ्करने उन सभीसे प्रेमपूर्वक विधिवत् (आगेका) वचन कहा—॥ ३९-४२॥ | | नाम्ना तु कार्त्तिकेयो हि युष्माकं तनयस्त्वसौ।<br>कुटिलायाः कुमारेति पुत्रोऽयं भविताऽव्ययः ॥ ४३<br>स्कन्द इत्येव विख्यातो गौरीपुत्रो भवत्वसौ।<br>गुह इत्येव नाम्ना च ममासौ तनयः स्मृतः ॥ ४४<br>महासेन इति ख्यातो हुताशस्यास्तु पुत्रकः।<br>शारद्वत इति ख्यातः सुतः शरवणस्य च ॥ ४५<br>एवमेष महायोगी पृथिव्यां ख्यातिमेष्यति।<br>षडास्यत्वान्महाबाहुः षण्मुखो नाम गीयते ॥ ४६ | कृत्तिकाओ! 'कार्त्तिकेय' नामसे ये तुम्हारे पुत्र होंगे तथा ये अविनाशी 'कुमार' नामसे कुटिलाके पुत्र होंगे। ये ही 'स्कन्द' नामसे विख्यात गौरीके पुत्र होंगे तथा 'गुह' नामसे मेरे पुत्र होंगे। 'महासेन' नामसे ये अग्निके प्रख्यात पुत्र होंगे तथा 'शारद्वत'—इस नामसे विख्यात ये शरवणके पुत्र होंगे। इस प्रकार ये महायोगी भूमण्डलमें विख्यात होंगे। छः मुखवाले होनेके कारण ये महाबाहु षण्मुख नामसे प्रसिद्ध होंगे॥ ४३-४६॥ | | इत्येवमुक्त्वा भगवान् शूलपाणिः पितामहम्।<br>सस्मार दैवतैः सार्द्धं तेऽथ्याजग्मुस्त्वरान्विताः ॥ ४७<br>प्रणिपत्य च कामारिमुमां च गिरिनन्दिनीम्।<br>दृष्ट्वा हुताशनं प्रीत्या कुटिलां कृत्तिकास्तथा ॥ ४८<br>ददृशुर्बालमत्युग्रं षण्मुखं सूर्यसंनिभम्।<br>मुष्णन्तमिव चक्षूंषि तेजसा स्वेन देवताः ॥ ४९<br>कौतुकाभिवृताः सर्वे एवमूचुः सुरोत्तमाः।<br>देवकार्यं त्वया देव कृतं देव्याऽग्निना तथा ॥ ५० | इस प्रकार कहकर शूलपाणि शङ्करने देवताओंके साथ पितामह ब्रह्माका स्मरण किया। वे सभी सहसा वहाँ आ गये और कामरिपु शङ्कर तथा गिरिनन्दिनी पार्वतीको प्रणामकर एवं अग्निदेव, कुटिला और कृत्तिकाओंको स्नेहपूर्वक देखकर उन देवोंने अतिशय दीप्तिमान् सूर्यके सदृश एवं अपने तेजसे सभीके नेत्रोंको चकाचौंधमें डालनेवाले उस षडानन बालकको देखा। प्रसन्नतासे भरे उन श्रेष्ठ देवोंने कहा—देव! आपने, देवीने एवं अग्निने देवताओंका कार्य सम्पन्न कर दिया॥ ४७-५०॥ |
अध्याय ५७] कार्तिकेयका जन्म, उनके छः मुख और चतुर्मूर्ति होनेका हेतु, उनका दण्डादिका पाना २५९
| तदुत्तिष्ठ व्रजामोऽद्य तीर्थमौजसमव्ययम्।<br>कुरुक्षेत्रे सरस्वत्यामभिषिञ्चाम षण्मुखम्॥ ५१<br>सेनायाः पतिरस्त्वेष देवगन्धर्वकिंनराः।<br>महिषं घातयत्वेष तारकं च सुदारुणम्॥ ५२<br>बाढमित्यब्रवीच्छर्वः समुत्तस्थुः सुरास्ततः।<br>कुमारसहिता जग्मुः कुरुक्षेत्रं महाफलम्॥ ५३<br>तत्रैव देवताः सेन्द्रा रुद्रब्रह्मजनार्दनाः।<br>यत्नमस्याभिषेकार्थं चक्रुर्मुनिगणैः सह॥ ५४ | तो आप उठें। अब हमलोग अविनाशी औजस तीर्थको चलें। कुरुक्षेत्रमें चलकर सरस्वती (नदी)-में हमलोग षण्मुखका अभिषेक करें। देवो, गन्धर्वो और किन्नरो! ये हमारे सेनापति बनें और महिष तथा भयंकर तारकका संहार करें। शङ्करने कहा—बहुत अच्छा। उसके बाद सभी देवता उठे और कुमारके साथ महान् फलदायी कुरुक्षेत्रमें चले गये। वहीं मुनियोंके साथ इन्द्र, रुद्र, प्रजापति ब्रह्मा, जनार्दन आदि समस्त देवताओंने उस कुमारके अभिषेकका उपाय किया॥ ५१—५४॥ |
|---|---|
| ततोऽम्बुना सप्तसमुद्रवाहिनी<br> नदीजलेनापि महाफलेन।<br>वरौषधीभिश्च सहस्त्रमूर्तिभि-<br> स्तदाभ्यषिञ्चन् गुहमच्युताद्याः॥ ५५<br><br>अभिषिञ्चति सेनान्यां कुमारे दिव्यरूपिणि।<br>जगुर्गन्धर्वपतयो ननृतुश्चाप्सरोगणाः॥ ५६<br><br>अभिषिक्तं कुमारं च गिरिपुत्री निरीक्ष्य हि।<br>स्नेहादुत्सङ्गं स्कन्दं मूर्ध््न्यजिघ्रन्मुहुर्मुहुः॥ ५७<br><br>जिघ्रती कार्तिकेयस्य अभिषेकार्द्रमाननम्।<br>भात्यद्रिजा यथेन्द्रस्य देवमाताऽदितिः पुरा॥ ५८ | उसके बाद अच्युत (विष्णु) आदि देवताओंने (सरस्वतीके तथा) सातों समुद्रोंमें मिलकर बहनेवाली नदियोंके महान् फलदायक जलसे एवं सहस्रों प्रकारकी उत्तमोत्तम ओषधियोंसे गुहका (सेनापतिके पदपर) अभिषेक किया। दिव्य रूप धारण करनेवाले सेनापति कुमारके अभिषिक्त हो जानेपर गन्धर्वराज गाने लगे एवं अप्सराएँ नृत्य करने लगीं। गिरिजाने कुमारको अभिषिक्त देखकर स्नेहसे गोदमें ले लिया और वे बार-बार उनके सिरको सूँघने लगीं। अभिषेकसे आर्द्र हुए कार्तिकेयके मुखको (आशीर्वाद देनेकी प्रक्रियामें) सूँघती हुई पार्वती पूर्वकालमें (आशीर्वाद देती हुई) इन्द्रके मुखको सूँघनेवाली देवमाता अदिति-जैसी सुशोभित हुईं॥ ५५—५८॥ |
| तदाऽभिषिक्तं तनयं दृष्ट्वा शर्वो मुदं ययौ।<br>पावकः कृत्तिकाश्चैव कुटिला च यशस्विनी॥ ५९<br><br>ततोऽभिषिक्तस्य हरः सेनापत्ये गुहस्य तु।<br>प्रमथांश्चतुरः प्रादाच्छक्रतुल्यपराक्रमान्॥ ६०<br><br>घण्टाकर्णं लोहिताक्षं नन्दिसेनं च दारुणम्।<br>चतुर्थं बलिनां मुख्यं ख्यातं कुमुदमालिनम्॥ ६१<br><br>हरदत्तान् गणान् दृष्ट्वा देवाः स्कन्दस्य नारद।<br>प्रददुः प्रमथान् स्वान् स्वान् सर्वे ब्रह्मपुरोगमाः॥ ६२ | उस समय शङ्कर, पावक, कृत्तिकाएँ एवं यशस्विनी कुटिला (-ये सभी) अपने पुत्रको अभिषिक्त देखकर अत्यन्त हर्षित हुए। उसके बाद शङ्करने सेनापतिके पदपर अभिषिक्त किये गये गुहको इन्द्रके सदृश शक्तिवाले चार प्रमथों—घण्टाकर्ण, लोहिताक्ष, दारुण नन्दिसेन और चौथे बलवानोंमें श्रेष्ठ विख्यात कुमुदमालीको दिया। नारदजी! शङ्करद्वारा दिये गये गणोंको देखकर ब्रह्मा आदि सभी देवताओंने (सेनापति) स्कन्दके लिये अपने-अपने प्रमथोंको (भी) दे दिया॥ ५९—६२॥ |
| स्थाणुं ब्रह्मा गणं प्रादाद् विष्णुः प्रादाद् गणत्रयम्।<br>संक्रमं विक्रमं चैव तृतीयं च पराक्रमम्॥ ६३<br><br>उत्केशं पङ्कजं शक्रो रविर्दण्डकपिङ्गलौ।<br>चन्द्रो मणिं वसुमणिमश्विनौ वत्सनन्दिनौ॥ ६४ | ब्रह्माने अपने गण स्थाणुको दिया और विष्णुने संक्रम, विक्रम और पराक्रम नामके तीन गणोंको दिया। इन्द्रने उत्केश और पङ्कजको, रविने दण्डक और पिङ्गलको, चन्द्रमाने मणि एवं वसुमणिको, अश्विनीकुमारोंने वत्स और नन्दीको दिया। |
| २६० | श्रीवामनपुराण | [ अध्याय ५७ |
|---|
| ज्योतिर्हुताशनः प्रादाज्ज्वलज्जिह्वं तथापरम्।<br>कुन्दं मुकुन्दं कुसुमं त्रीन् धाताऽनुचरान् ददौ ॥ ६५<br>चक्रानुचक्रौ त्वष्टा च वेधातिस्थिरसुस्थिरौ।<br>पाणित्यजं कालकञ्च प्रादात् पूषा महाबलौ ॥ ६६ | अग्निने ज्योति तथा दूसरे ज्वलज्जिह्वको दिया। धाताने कुन्द, मुकुन्द तथा कुसुम नामके तीन अनुचरोंको दिया। त्वष्टाने चक्र और अनुचक्रको, वेधाने अतिस्थिर और सुस्थिरको एवं पूषाने महाबलशाली पाणित्यज तथा कालकको दिया ॥ ६३-६६ ॥ | | स्वर्णमालं घनाह्वं च हिमवान् प्रमथोत्तमौ।<br>प्रादादेवोच्छ्रितो विन्ध्यस्त्वतिशृङ्गं च पार्षदम् ॥ ६७<br>सुवर्चसं च वरुणः प्रददौ चातिवर्चसम्।<br>संग्रहं विग्रहं चाब्धिर्नागा जयमहाजयौ ॥ ६८<br>उन्मादं शङ्कुकर्णं च पुष्पदन्तं तथाऽम्बिका।<br>घसं चातिघसं वायुः प्रादादनुचरावुभौ ॥ ६९<br>परिघं चटकं भीमं दहतिदहनौ तथा।<br>प्रददावंशुमान् पञ्च प्रमथान् षण्मुखाय हि ॥ ७० | हिमालयने प्रमथोंमें श्रेष्ठ स्वर्णमाल और घनाह्वको तथा ऊँचे विन्ध्याचलने अतिशृङ्ग नामक पार्षदको दिया। वरुणने सुवर्चा एवं अतिवर्चाको, समुद्रने संग्रह तथा विग्रहको एवं नागोंने जय तथा महाजयको दिया। अम्बिकाने उन्माद, शङ्कुकर्ण और पुष्पदन्तको तथा पवनने घस और अतिघस नामके दो अनुचरोंको दिया। अंशुमान्ने षडाननको परिघ, चटक, भीम, दहति तथा दहन नामके पाँच प्रमथोंको दिया ॥ ६७-७० ॥ | | यमः प्रमाथमुन्माथं कालसेनं महामुखम्।<br>तालपत्रं नाडिजङ्घं षडेवानुचरान् ददौ ॥ ७१<br>सुप्रभं च सुकर्माणं ददौ धाता गणेश्वरौ।<br>सुव्रतं सत्यसन्धं च मित्रः प्रादाद् द्विजोत्तम ॥ ७२<br>अनन्तः शङ्कुपीठश्च निकुम्भः कुमुदोऽम्बुजः।<br>एकाक्षः कुनटी चक्षुः किरीटी कलशोदरः ॥ ७३<br>सूचीवक्त्रः कोकनदः प्रहासः प्रियकोऽच्युतः।<br>गणाः पञ्चदशैते हि यक्षैर्दत्ता गुहस्य तु ॥ ७४ | यमराजने प्रमाथ, उन्माथ, कालसेन, महामुख, तालपत्र और नाडिजङ्घ नामके छः अनुचरोंको दिया। द्विजोत्तम! धाताने सुप्रभ और सुकर्मा नामके दो गणेश्वरोंको तथा मित्रने सुव्रत तथा सत्यसन्ध नामके दो अनुचरोंको दिया। यक्षोंने अनन्त, शङ्कुपीठ, निकुम्भ, कुमुद, अम्बुज, एकाक्ष, कुनटी, चक्षु, किरीटी, कलशोदर, सूचीवक्त्र, कोकनद, प्रहास, प्रियक एवं अच्युत—इन पंद्रह गणोंको कार्तिकेयको दे दिया ॥ ७१-७४ ॥ | | कालिन्द्याः कालकन्दश्च नर्मदाया रणोत्कटः।<br>गोदावर्याः सिद्धयात्रस्तमसायाद्रिकम्पकः ॥ ७५<br>सहस्रबाहुः सीताया वञ्जुलायाः सितोदरः।<br>मन्दाकिन्यास्तथा नन्दो विपाशायाः प्रियङ्करः ॥ ७६<br>ऐरावत्याश्चतुर्दंष्ट्रः षोडशाक्षो वितस्तया।<br>मार्जारं कौशिकी प्रादात् क्रथक्रौञ्चौ च गौतमी ॥ ७७<br>बाहुदा शतशीर्षं च वाहा गोनन्दनन्दिकौ।<br>भीमं भीमरथी प्रादाद् वेगारि सरयूर्ददौ ॥ ७८ | कालिन्दीने कालकन्दको, नर्मदाने रणोत्कटको, गोदावरीने सिद्धयात्रको एवं तमसाने अद्रिकम्पकको दिया। सीताने सहस्रबाहुको, वञ्जुलाने सितोदरको, मन्दाकिनीने नन्दको एवं विपाशाने प्रियङ्करको दिया। ऐरावतीने चतुर्दंष्ट्रको, वितस्ताने षोडशाक्षको, कौशिकीने मार्जारको एवं गौतमीने क्रथ और क्रौञ्चको दिया। बाहुदाने शतशीर्षको, वाहाने गोनन्द और नन्दिकको, भीमरथीने भीमको और सरयूने वेगारिको दिया ॥ ७५-७८ ॥ | | अष्टबाहुं ददौ काशी सुबाहुमपि गण्डकी।<br>महानदी चित्रदेवं चित्रा चित्ररथं ददौ ॥ ७९<br>कुहूः कुवलयं प्रादान्मधुवर्णं मधूदका।<br>जम्बूकं धूतपापा च वेणा श्वेताननं ददौ ॥ ८०<br>श्रुतवर्णं च पर्णासा रेवा सागरवेगिनम्।<br>प्रभावार्थं सहं प्रादात् काञ्चना कनकेक्षणम् ॥ ८१<br>गृध्रपत्रं च विमला चारुवक्त्रं मनोहरा।<br>धूतपापा महारावं कर्णा विद्रुमसंनिभम् ॥ ८२ | काशीने अष्टबाहुको, गण्डकीने सुबाहुको, महानदीने चित्रदेवको तथा चित्राने चित्ररथको दिया। कुहूने कुवलयको, मधूदकाने मधुवर्णको, धूतपापाने जम्बूकको और वेणाने श्वेताननको समर्पित किया। पर्णासाने श्रुतवर्णको, रेवाने सागरवेगीको, प्रभावाने अर्थ और सहको एवं काञ्चनाने कनकेक्षणको दिया। विमलाने गृध्रपत्रको, मनोहराने चारुवक्त्रको, धूतपापाने महारावको एवं कर्णाने विद्रुमसंनिभको दिया ॥ ७९-८२ ॥ |
अध्याय ५७ ] कार्त्तिकेयका जन्म, उनके छः मुख और चतुर्मूर्ति होनेका हेतु, उनका दण्डादिका पाना २६१
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| सुप्रसादं सुवेणुश्च जिष्णुमोघवती ददौ।<br>यज्ञबाहुं विशाला च सरस्वत्यो ददुर्गणान्॥ ८३<br>कुटिला तनयस्यादाद् दश शक्रबलान् गणान्।<br>करालं सितकेशं च कृष्णकेशं जटाधरम्॥ ८४<br>मेघनादं चतुर्दंष्ट्रं विद्युज्जिह्वं दशाननम्।<br>सोमाप्यायनमेवोग्रं देवयाजिनमेव च॥ ८५<br>हंसास्यं कुण्डजठरं बहुग्रीवं हयाननम्।<br>कूर्मग्रीवं च पञ्चैतान् ददुः पुत्राय कृत्तिकाः॥ ८६ | सुवेणुने सुप्रसादको और ओघवतीने जिष्णुको प्रदान किया। विशालाने यज्ञबाहुको दिया। इस प्रकार इन सरस्वती आदि नदियोंने अनेक गणोंको दिया। कुटिलाने अपने पुत्र (उन)-को कराल, सितकेश, कृष्णकेश, जटाधर, मेघनाद, चतुर्दंष्ट्र, विद्युज्जिह्व, दशानन, सोमाप्यायन एवं उग्र देवयाजी नामके दस गणोंको दिया। कृत्तिकाओंने अपने पुत्रको हंसास्य, कुण्डजठर, बहुग्रीव, हयानन तथा कूर्मग्रीव—इन पाँच अनुचरोंको प्रदान किया॥ ८३-८६॥ |
| स्थाणुजङ्घं कुम्भवक्त्रं लोहजङ्घं महाहनम्।<br>पिण्डाकारं च पञ्चैतान् ददुः स्कन्दाय चर्षयः॥ ८७<br>नागजिह्वं चन्द्रभासं पाणिकूर्मं शशीक्षकम्।<br>चाषवक्त्रं च जम्बूकं ददौ तीर्थः पृथूदकः॥ ८८<br>चक्रतीर्थं सुचक्राक्षं मकराक्षं गयाशिरः।<br>गणं पञ्चशिखं नाम ददौ कनखलः स्वकम्॥ ८९<br>बन्धुदत्तं वाजिशिरो बाहुशालं च पुष्करम्।<br>सर्वौजसं माहिषकं मानसः पिङ्गलं यथा॥ ९० | ऋषियोंने स्कन्दको स्थाणुजङ्घ, कुम्भवक्त्र, लोहजङ्घ, महाहन और पिण्डाकार—इन पाँच अनुचरोंको दिया। पृथूदक तीर्थने नागजिह्व, चन्द्रभास, पाणिकूर्म, शशीक्षक, चाषवक्त्र तथा जम्बूक नामके अनुचरोंको दिया। गयाशिरने चक्रतीर्थ, सुचक्राक्ष तथा मकराक्षको और कनखलने पञ्चशिख नामके अपने गणोंको दिया। वाजिशिरने बन्धुदत्त, पुष्कर और बाहुशालको तथा मानसने सर्वौजस, माहिषक और पिङ्गलको दिया॥ ८७-९०॥ |
| रौद्रमौशनसः प्रादात् ततोऽन्ये मातरो ददुः।<br>वसुदामां सोमतीर्थः प्रभासो नन्दिनीमपि॥ ९१<br>इन्द्रतीर्थं विशोकां च उदपानो घनस्वनाम्।<br>सप्तसारस्वतः प्रादान्मातरश्चतुरोद्भुताः॥ ९२<br>गीतप्रियां माधवीं च तीर्थनेमिं स्मिताननाम्।<br>एकचूडां नागतीर्थः कुरुक्षेत्रं पलासदाम्॥ ९३<br>ब्रह्मयोनिश्चण्डशिलां भद्रकालीं त्रिविष्टपः।<br>चौण्डीं भैण्डीं योगभैण्डीं प्रादाच्चरणपावनः॥ ९४ | औशनसने रुद्रको प्रदान किया तथा अन्योंने मातृकाओंको दिया। सोमतीर्थने वसुदामाको और प्रभासने नन्दिनीको तथा उदपानने इन्द्रतीर्थ, विशोका और घनस्वनाको अर्पित किया। सप्तसारस्वतने गीतप्रिया, माधवी, तीर्थनेमि एवं स्मितानना नामकी चार अद्भुत मातृकाओंको प्रदान किया। नागतीर्थने एकचूडा, कुरुक्षेत्र और पलासदाको दिया। ब्रह्मयोनिने चण्डशिलाको, त्रिविष्टपने भद्रकालीको तथा चरणपावनने चौण्डी, भैण्डी तथा योगभैण्डीको दिया॥ ९१-९४॥ |
| सोपानीयां मही प्रादाच्छालिकां मनसो ह्रदः।<br>शतघण्टां शतानन्दां तथोलूखलमेखलाम्॥ ९५<br>पद्मावतीं माधवीं च ददौ बदरिकाश्रमः।<br>सुषमामेकचूड़ां च देवीं धमधमां तथा॥ ९६<br>उत्क्राथनीं वेदमित्रां केदारो मातरो ददौ।<br>सुनक्षत्रां कद्रुलां च सुप्रभातां सुमङ्गलाम्॥ ९७<br>देवमित्रां चित्रसेनां ददौ रुद्रमहालयः।<br>कोटरामूर्ध्ववेणीं च श्रीमतीं बहुपुत्रिकाम्॥ ९८<br>पलितां कमलाक्षीं च प्रयागो मातरो ददौ।<br>सूपलां मधुकुम्भां च ख्यातिं दहदहां पराम्॥ ९९<br>प्रादात् खटकटां चान्यां सर्वपापविमोचनः।<br>संतानिकां विकलिकां क्रमश्चत्वरवासिनीम्॥ १०० | महीने सोपानीयाको, मानसह्नदने शालिकाको एवं बदरिकाश्रमने शतघण्टा, शतानन्दा, उलूखलमेखला, पद्मावती और माधवीको प्रदान किया। केदारतीर्थने सुषमा, एकचूडा, धमधमादेवी, उत्क्राथनी तथा वेदमित्रा नामक मातृकाओंको दिया। रुद्रमहालयने सुनक्षत्रा, कद्रूला, सुप्रभाता, सुमङ्गला, देवमित्रा और चित्रसेनाको दिया। प्रयागने कोटरा, ऊर्ध्ववेणी, श्रीमती, बहुपुत्रिका, पलिता तथा कमलाक्षी नामकी मातृकाओंको अर्पित किया। सर्वपापविमोचनने सूपला, मधुकुम्भा, ख्याति, दहदहा, परा और खटकटाको समर्पित किया। क्रमने सन्तानिका, विकलिका और चत्वरवासिनीको प्रदान किया॥ ९५-१००॥ |