वामन पुराण
Vamana Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
अध्याय ५६ ] चण्डिकासे मातृकाओंकी उत्पत्ति, असुरोंसे उनका युद्ध, रक्तबीज-निशुम्भ-शुम्भ-वध २४९
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| वज्राङ्कुशोद्यतकरा नानालङ्कारभूषिता।<br>जाता गजेन्द्रपृष्ठस्था माहेन्द्री स्तनमण्डलात् ॥ ८ | हाथमें वज्र और अंकुशको लिये, भाँति-भाँतिके आभूषणोंसे विभूषित, गजराजकी पीठपर बैठी हुई 'माहेन्द्री' शक्ति उनके स्तन-मण्डलसे उत्पन्न हुई॥५-८॥ |
| विक्षिपन्ती सटाक्षेपैर्ग्रहनक्षत्रतारकाः।<br>नखिनी हृदयाज्जाता नारसिंही सुदारुणा ॥ ९ | गर्दनके बालोंको फटकारनेसे ग्रह, नक्षत्र और ताराओंको विक्षुब्ध करती हुई तीक्ष्ण नखोंवाली अत्यन्त भयङ्कर नारसिंही शक्ति देवीके हृदयसे उत्पन्न हुई। |
| ताभिर्निपात्यमानं तु निरीक्ष्य बलमासुरम्।<br>ननाद भूयो नादान् वै चण्डिका निर्भया रिपून्।<br>तन्निनादं महच्छ्रुत्वा त्रैलोक्यप्रतिपूरकम् ॥ १० | फिर चण्डिकाने उन शक्तियोंद्वारा संहार की जाती हुई असुर-सेना एवं शत्रुओंको देखकर भयरहित होकर घोर गर्जना की। तीनों लोकोंको ध्वनिसे गुँजा देनेवाले |
| समाजगाम देवेशः शूलपाणिखिलोचनः।<br>अभ्येत्य वन्द्य चैवैनां प्राह वाक्यं तदाऽम्बिके ॥ ११ | उस गर्जनको सुनकर शूलपाणि त्रिलोचन महादेवजी देवीके निकट आये और उनको प्रणामकर (उन्होंने) यह कहा—अम्बिके! दुर्गे! मैं आ गया हूँ। मैं आपका |
| समायातोऽस्मि वै दुर्गे देह्याज्ञां किं करोमि ते।<br>तद्वाक्यसमकालं च देव्या देहोद्भवा शिवा ॥ १२ | कौन-सा कार्य करूँ? मुझे आज्ञा दीजिये। उस उक्तिके साथ ही देवीकी देहसे शिवा उत्पन्न हो गयीं। उन्होंने |
| जाता सा चाह देवेशं गच्छ दौत्येन शंकर।<br>ब्रूहि शुम्भं निशुम्भं च यदि जीवितुमिच्छथ ॥ १३ | देवेश्वरसे कहा—शङ्कर! आप दूत बनकर जाइये और शुम्भ-निशुम्भसे कहिये कि अये दुराचारियो! यदि तुम सब जानेकी इच्छा करते हो तो सातवें (लोक) |
| तद् गच्छध्वं दुराचाराः सप्तमं हि रसातलम्।<br>वासवो लभतां स्वर्गं देवाः सन्तु गतव्यथाः ॥ १४ | रसातलमें चले जाओ। इन्द्रको स्वर्गकी प्राप्ति हो एवं देवगण पीड़ा (बाधासे) रहित हो जायें॥ ९-१४॥ |
| यजन्तु ब्राह्मणाद्यामी वर्णा यज्ञांश्च साम्प्रतम्।<br>नोचेद् बलावलेपेन भवन्तो योद्धुमिच्छथ ॥ १५ | ये ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य आदि वर्ण विधि-विधानसे यज्ञ (अनुष्ठान) करें। यदि तुम (सब) अपने पूरे बलके घमण्डसे युद्ध करना चाहते हो, तो आओ। यह मैं बिना |
| तदागच्छध्वमव्यग्रा एषाऽहं विनिषूदये।<br>यतस्तु सा शिवं दौत्ये न्ययोजयत नारद ॥ १६<br>ततो नाम महादेव्याः शिवदूतीत्यजायत। | किसी घबराहटके—आसानीसे तुमलोगोंका विनाश करूँ—किये देती हूँ। नारदजी! उन्होंने शिवको दूत बनाया, अतः महादेवीका नाम शिवदूती हुआ। वे सारे |
| ते चापि शंकरवचः श्रुत्वा गर्वसमन्वितम्।<br>हुंकृत्वाऽभ्यद्रवन् सर्वे यत्र कात्यायनी स्थिता ॥ १७ | असुर भी शङ्करके गर्वीले वचनको सुनकर हुंकार करते हुए, जहाँ कात्यायनी स्थित थीं वहाँ दौड़ पड़े। उसके |
| ततः शरैः शक्तिभिरङ्कुशैश्र्वरैः<br>परश्वधैः शूलभुशुण्डिपट्टिशैः।<br>प्रासैः सुतीक्ष्णैः परिघैश्च विस्तृतै-<br>र्ववर्षतुर्दैत्यवरौ सुरेश्रीम् ॥ १८ | बाद दोनों असुर सुरेश्रीके ऊपर बाण, शक्ति, अङ्कुश, श्रेष्ठ कुठार, शूल, भुशुण्डी, पट्टिश, तीक्ष्ण प्रास और बहुत बड़े परिघ आदि अस्त्रोंकी बौछार करने लगे ॥ १५-१८॥ |
| सा चापि बाणैर्वरकार्मुकच्युतै-<br>श्चिच्छेद शस्त्राण्यथ बाहुभिः सह।<br>जघान चान्यान् रणचण्डविक्रमा<br>महासुरान् बाणशतैर्महेश्वरी ॥ १९ | युद्धमें प्रचण्ड पराक्रमशालिनी उस महेश्वरीने भी श्रेष्ठ धनुषसे निकले बाणोंसे असुरोंके शस्त्रोंको उनकी भुजाओंसहित काट दिया एवं सैकड़ों बाणोंसे अन्य असुरोंको मौतके घाट उतार दिया। |
| मारी त्रिशूलेन जघान चान्यान्<br>खट्वाङ्गपातैरपरांश्च कौशिकी।<br>महाजलक्षेपहतप्रभावान्<br>ब्राह्मी तथान्यानसुरांश्चकार ॥ २० | मारीने त्रिशूलसे बहुतोंको मारा, कौशिकीने खट्वाङ्गके प्रहारसे बहुतोंका वध किया तथा ब्राह्मीने जलराशि फेंककर दूसरे बहुत-से असुरोंको प्रभावहीन कर दिया। |
| २५० | श्रीवामनपुराण | [ अध्याय ५६ |
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| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| माहेश्वरी शूलविदारितोरस-<br>श्चकार दग्धानपरांश्च वैष्णवी।<br>शक्त्या कुमारी कुलिशेन चैन्द्री<br>तुण्डेन चक्रेण वराहरूपिणी ॥ २१<br>नखैर्विभिन्नानपि नारसिंही<br>अट्टाट्टहासैरपि रुद्रदूती।<br>रुद्रस्त्रिशूलेन तथैव चान्यान्<br>विनायकश्चापि परश्वधेन ॥ २२ | माहेश्वरीने शूलसे बहुत-से असुरोंकी छाती छेदकर जर्जर कर दिया। वैष्णवीने बहुतोंको जला कर भस्म कर डाला। कुमारीने शक्तिसे, ऐन्द्रीने वज्रसे, वाराहीने मुखसे एवं चक्रसे असुरोंका संहार किया। नारसिंहीने नखोंके प्रहारसे दैत्योंको चीर डाला, शिवदूतीने अट्टहाससे, रुद्रने त्रिशूलसे एवं विनायकने फरसेकी मारसे अन्य असुरोंको विनष्ट कर दिया॥ १९–२२॥ |
| एवं हि देव्या विविधैस्तु रूपै-<br>र्निपात्यमाना दनुपुङ्गवास्ते।<br>पेतुः पृथिव्यां भुवि चापि भूतै-<br>स्ते भक्ष्यमाणाः प्रलयं प्रजग्मुः ॥ २३<br>ते वध्यमानास्त्वथ देवताभि-<br>र्महासुरा मातृभिराकुलाश्च।<br>विमुक्तकेशास्तरलेक्षणा भयात्<br>ते रक्तबीजं शरणं हि जग्मुः ॥ २४<br>स रक्तबीजः सहसाभ्युपेत्य<br>वरास्त्रमादाय च मातृमण्डलम्।<br>विद्रावयन् भूतगणान् समन्ताद्<br>विवेश कोपात् स्फुरिताधरश्च ॥ २५<br>तमापतन्तं प्रसमीक्ष्य मातरः<br>शस्त्रैः शिताग्रैर्दितिजं ववर्षुः।<br>यो रक्तबिन्दुर्न्यपतत् पृथिव्यां<br>स तत्प्रमाणस्त्वसुरोऽपि जज्ञे ॥ २६ | इस प्रकार देवीके बहुत-से रूपोंद्वारा संहार किये जाते हुए दानव धराशायी होने लगे। भूतगण पृथ्वीपर (गिरे हुए) उन दानवोंको खा-खाकर उन्हें नष्ट करने लगे। देवताओं और मातृशक्तियोंद्वारा संहार किये जा रहे एवं व्याकुल किये गये वे सारे महान् असुर खुले बालों एवं भयसे इधर-उधर देखते हुए रक्तबीजकी शरणमें गये। क्रोधसे ओठको फड़फड़ाते हुए रक्तबीज तेज धारवाले अस्त्रोंको लेकर एकाएक आ धमका एवं भूतगणोंको इधर-उधर खदेड़ते हुए मातृव्यूहमें प्रवेश कर गया। उसको आते हुए देखकर मातृशक्तियोंने उस असुरपर अपने तेज शस्त्रोंकी बौछार कीं। (उनके शरीरसे) रक्तकी जो बूँदें पृथ्वीपर गिरती थीं उनसे उतने ही बलवान् असुर उत्पन्न हो जाते थे॥ २३–२६॥ |
| ततस्तदाश्चर्यमयं निरीक्ष्य<br>सा कौशिकी केशिनिमभ्युवाच।<br>पिबस्व चण्डे रुधिरं त्वराते-<br>र्वितत्य वक्त्रं वडवानलाभम् ॥ २७<br>सा त्वेवमुक्ता वरदाम्बिका हि<br>वितत्य वक्त्रं विकरालमुग्रम्।<br>ओष्ठं नभस्पृक् पृथिवीं स्पृशन्तं<br>कृत्वाऽधरं तिष्ठति चर्ममुण्डा ॥ २८<br>ततोऽम्बिका केशविकर्षणाकुलं<br>कृत्वा रिपुं प्राक्षिपत स्ववक्त्रे।<br>बिभेद शूलेन तथाऽप्युरस्तः<br>क्षतोद्भवान्ये न्यपतंश्च वक्त्रे ॥ २९<br>ततस्तु शोषं प्रजगाम रक्तं<br>रक्तक्षये हीनबलो बभूव।<br>तं हीनवीर्यं शतधा चकार<br>चक्रेण चामीकरभूषितेन ॥ ३० | उसके बाद उस अद्भुत दृश्यको देखकर कौशिकीने केशिनीसे कहा—चण्डिके! वडवानल (समुद्रकी आग)-की भाँति अपने मुखको फैलाकर शत्रु का खून पी डालो। ऐसा कहनेपर वरदायिनी अम्बिकाने अपना विशाल भयङ्कर मुँह फैलाया। ऊपरी ओठसे आकाश एवं निचले ओठसे पृथ्वीका स्पर्श करती हुई चामुण्डा सामने खड़ी हो गयी। उसके बाद अम्बिकाने शत्रुके बालोंको पकड़ करके उसे घसीटकर व्याकुल कर दिया और उसे अपने मुखमें डाल लिया और उसकी छातीमें शूलका प्रहार कर दिया। तब रक्तसे उत्पन्न होनेवाले दूसरे राक्षस भी उनके मुखमें ही गिरने लगे। उसके बाद उसका रक्त सूख गया। रक्तके नष्ट हो जानेसे वह बलहीन हो गया। निर्बल हो जानेपर उसको देवीने सुवर्णसे विभूषित चक्रसे सौ टुकड़ोंमें काट डाला॥ २७–३०॥ |
अध्याय ५६ ] चण्डिकासे मातृकाओंकी उत्पत्ति, असुरोंसे उनका युद्ध, रक्तबीज-निशुम्भ-शुम्भ-वध २५१
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| तस्मिन् विशस्ते दनुसैन्यनाथे<br>ते दानवा दीनतरं विनेदुः।<br>हा तात हा भ्रातरिति ब्रुवन्तः<br>क्व यासि तिष्ठस्व मुहूर्त्तमेहि॥ ३१<br>तथाऽपरे विलुलितकेशपाशा<br>विशीर्णवर्माभरणा दिगम्बराः।<br>निपातिता धरणितले मृडन्या<br>प्रदुद्रुवुर्गिरिवरमुह्य दैत्याः॥ ३२<br>विशीर्णवर्मायुधभूषणं तद्<br>बलं निरीक्ष्यैव हि दानवेन्द्रः।<br>विशीर्णचक्राक्षरथो निशुम्भः<br>क्रोधान्मृडानीं समुपाजगाम॥ ३३<br>खड्गं समादाय च चर्म भास्वरं<br>धुन्वञ्शिरः प्रेक्ष्य च रूपमस्याः।<br>सस्तम्भमोहज्वरपीडितोऽथ<br>चित्रे यथाऽसौ लिखितो बभूव॥ ३४ | उस दानव-सेनापतिके मारे जानेपर वे सभी दानव हा तात! हा भाई! कहाँ जा रहे हो, क्षणभर रुको, यहाँ आओ—ऐसा कहते हुए करुण क्रन्दन करने लगे। मृडानीने खुले और बिखरे बालोंवाले तथा टुकड़े-टुकड़े हुए कवचवाले अनेक नंगे दैत्योंको पृथ्वीपर गिरा दिया। वे दैत्य पर्वतश्रेष्ठको छोड़कर भाग गये। टूटे कवच, हथियारों एवं आभूषणोंसे युक्त अपनी सेनाको देखकर टूटे (ही) चक्र एवं धुरीवाले रथपर चढ़कर दानवश्रेष्ठ निशुम्भ क्रोधपूर्वक मृडानी (देवी)-के पास गया। चमकती हुई तलवार और ढाल लेकर सिर हिलाते हुए वह देवीका रूप देखकर मोहज्वरसे पीड़ित हो चित्र-लिखे हुएकी भाँति ठिठक गया॥ ३१-३४॥ |
| तं स्तम्भितं वीक्ष्य सुरारिमग्रे<br>प्रोवाच देवी वचनं विहस्य।<br>अनेन वीर्येण सुरास्त्वया जिता<br>अनेन मां प्रार्थयसे बलेन॥ ३५<br>श्रुत्वा तु वाक्यं कौशिक्या दानवः सुचिरादिव।<br>प्रोवाच चिन्तयित्वाऽथ वचनं वदतां वरः॥ ३६<br>सुकुमारशरीरोऽयं मच्छस्त्रपतनादपि।<br>शतधा यास्यते भीरु आमपात्रमिवाम्भसि॥ ३७<br>एतद् विचिन्तयन्नर्थं त्वां प्रहर्तुं न सुन्दरि।<br>करोमि बुद्धिं तस्मात् त्वं मां भजस्वायतेक्षणे॥ ३८ | देवीने उस स्तब्ध हुए देवताओंके शत्रुको सामने देखकर हँसते हुए यह वचन कहा—क्या इसी शक्तिके बलपर तुमने देवताओंको पराजित किया है? और, क्या इसी बलपर मुझको (पत्नीरूपमें) पानेके लिये याचना करते रहे? कौशिकीकी बात सुननेके बाद देरतक विचार करके बोलनेवालोंमें श्रेष्ठ वह दानव यह वचन बोला—भीरु! यह तुम्हारा अत्यन्त कोमल शरीर मेरे शस्त्रोंकी मारसे जलमें कच्चे बर्तनकी तरह सैकड़ों टुकड़ोंमें अलग-अलग हो जायगा। सुन्दरि! यह सोचकर मैं तुम्हारे ऊपर आघात करनेका विचार नहीं कर रहा हूँ। अतः विशालनयने! तुम मुझे अङ्गीकार कर लो॥ ३५-३८॥ |
| मम खड्गनिपातं हि नेन्द्रो धारयितुं क्षमः।<br>निवर्तय मतिं युद्धाद् भार्या मे भव साम्प्रतम्॥ ३९<br>इत्थं निशुम्भवचनं श्रुत्वा योगीश्वरी मुने।<br>विहस्य भावगम्भीरं निशुम्भं वाक्यमब्रवीत्॥ ४०<br>नाजिताऽहं रणे वीर भवे भार्या हि कस्यचित्।<br>भवान् यदिह भार्यार्थी ततो मां जय संयुगे॥ ४१<br>इत्येवमुक्ते वचने खड्गमुद्यम्य दानवः।<br>प्रचिक्षेप तदा वेगात् कौशिकीं प्रति नारद॥ ४२ | मेरी तलवारकी मारको इन्द्र भी नहीं सह सकते। तुम युद्धका विचार छोड़ दो एवं अब मेरी पत्नी बन जाओ। मुने! योगीश्वरीने निशुम्भकी यह बात सुनकर हँसते हुए उससे भावभरे वचनमें कहा—वीर! लड़ाईके मैदानमें बिना हारे हुए मैं किसीकी पत्नी नहीं बन सकती। यदि तुम मुझे अपनी स्त्री बनाना चाहते हो तो संग्राममें मुझे जीत लो। नारदजी! इस बातके कहनेपर उस दानवने तलवार उठाकर कौशिकीकी ओर उसे वेगसे चलाया॥ ३९-४२॥ |
| तमापतन्तं निस्त्रिंशं षड्भिर्बर्हिणराजितैः।<br>चिच्छेद चर्मणा सार्द्धं तदद्भुतमिवाभवत्॥ ४३ | देवीने अपनी ओर आती हुई उस तलवारको ढालसहित मोरके पंखसे सुशोभित छः बाणोंसे काट दिया। वह (दृश्य) बड़ा ही विचित्र हुआ। |
५८- सेनापतिपदपर नियुक्त कार्तिकेयके लिये ऋषियोंद्वारा स्वस्त्ययन, तारक-विजयके लिये प्रस्थान, पाताल-केतुका वृत्तान्त, तारक महिषासुर-वध तथा सुचक्राक्षको वर
| २५२ | श्रीवामनपुराण | [ अध्याय ५६ |
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| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| खड्गे सचर्मणि छिन्ने गदां गृह्य महासुरः।<br>समाद्रवत् कोशभवां वायुवेगसमो जवे ॥ ४४<br><br>तस्यापतत एवाशु करौ श्लिष्टौ समौ दृढौ।<br>गदया सह चिच्छेद क्षुरप्रेण रणेऽम्बिका ॥ ४५<br><br>तस्मिन्निपतिते रौद्रे सुरशत्रौ भयंकरे।<br>चण्डाद्या मातरो हृष्टाश्चक्रुः किलकिलाध्वनिम् ॥ ४६ | ढालके साथ तलवारके कट जानेपर वह महा असुर गदा लेकर हवाके समान तेजीसे कौशिकीकी ओर दौड़ा। अम्बिकाने लड़ाईमें चढ़ाई करनेवाले उस असुरकी, गदाके साथ सुपुष्ट, सुडौल, गठीली भुजाओंको क्षुरप्र (खुरपे या बाण)-से उसी समय काट गिराया। उस अत्यन्त भयङ्कर देवशत्रुके गिरनेपर चण्डी आदि मातृकाएँ प्रसन्न होकर किलकिलाध्वनि (हर्षसूचक ध्वनि) करने लगीं॥ ४३—४६॥ |
| गगनस्थास्ततो देवाः शतक्रतुपुरोगमाः।<br>जयस्व विजयेत्यूचुर्हृष्टाः शत्रौ निपातिते ॥ ४७<br><br>ततस्तूर्याण्यवाद्यन्त भूतसङ्घैः समन्ततः।<br>पुष्पवृष्टिं च मुमुचुः सुराः कात्यायनीं प्रति ॥ ४८<br><br>निशुम्भं पतितं दृष्ट्वा शुम्भः क्रोधान्महामुने।<br>वृन्दारकं समारुह्य पाशपाणिः समभ्यगात् ॥ ४९<br><br>तमापतन्तं दृष्ट्वाऽथ सगजं दानवेश्वरम्।<br>जग्राह चतुरो बाणांश्चन्द्रार्धाकारवर्चसः ॥ ५० | उसके बाद आकाशमें स्थित इन्द्र आदि देवगण शत्रुको मारकर गिराये जानेपर हर्षित होते हुए बोले— विजये! तुम्हारी जय हो। फिर चारों ओर भूतगण भेरी बजाने लगे और देवगण कात्यायनीके ऊपर फूलोंकी वर्षा करने लगे। महामुनि नारदजी! निशुम्भको गिरा हुआ देखकर शुम्भ क्रोधसे हाथमें पाश लिये हुए हाथीपर चढ़कर आया। हाथीपर चढ़कर दानवेश्वरको आते देख (देवीने) चमकते हुए अर्धचन्द्राकार चार बाणोंको उठा लिया॥ ४७—५०॥ |
| क्षुरप्राभ्यां समं पादौ द्वौ चिच्छेद द्विपस्य सा।<br>द्वाभ्यां कुम्भे जघानाथ हसन्ती लीलयाऽम्बिका ॥ ५१<br><br>निकृत्ताभ्यां गजः पद्भ्यां निपपात यथेच्छया।<br>शक्रवज्रसमाक्रान्तं शैलराजशिरो यथा ॥ ५२<br><br>तस्यावर्जितनागस्य शुम्भस्याप्युत्पतिष्यतः।<br>शिरश्शिच्छेद बाणेन कुण्डलालंकृतं शिवा ॥ ५३<br><br>छिन्ने शिरसि दैत्येन्द्रो निपतात सकुञ्जरः।<br>यथा समहिषः क्रौञ्चो महासेनसमाहतः ॥ ५४<br><br>श्रुत्वा सुराः सुररिपू निहतौ मृडान्या<br>सेन्द्राः ससूर्यमरुदश्विवसुप्रधानाः।<br>आगत्य तं गिरिवरं विनयावनम्रा<br>देव्यास्तदा स्तुतिपदं त्विदमीरयन्तः ॥ ५५ | हँसते हुए उस अम्बिकाने खेल-खेलमें दो तीखे बाणोंसे उस हाथीके दो पैरोंको काट दिया एवं दो बाणोंसे उसके कुम्भस्थलपर आघात किया। दो पैरोंके कट जानेपर वह हाथी इन्द्रके वज्रसे घायल पर्वतराजकी ऊँची चोटीकी तरह अपने-आप ही गिर पड़ा। शिवाने घायल हुए हाथीपरसे उछलनेवाले शुम्भका कुण्डलसे सुशोभित मस्तक बाणसे (झट) काट दिया। सिरके कट जानेपर दैत्येन्द्र हाथीके साथ ऐसे गिरा जैसे महासेन कार्तिकेयद्वारा घायल हुआ क्रौञ्चासुर महिषके साथ गिरा था। मृडानी (देवी)-द्वारा दोनों देवशत्रुओंका संहार किया जाना सुनकर इन्द्रसहित सूर्य, मरुत्, अश्विनीकुमार एवं वसुगण आदि देवता उस श्रेष्ठ पर्वतपर आये एवं विनयपूर्वक देवीकी इस प्रकार स्तुति करने लगे॥ ५१—५५॥ |
| देवा ऊचुः<br>नमोऽस्तु ते भगवति पापनाशिनि<br>नमोऽस्तु ते सुररिपुदर्पशातनि।<br>नमोऽस्तु ते हरिहरराज्यदायिनि<br>नमोऽस्तु ते मखभुजकार्यकारिणि ॥ ५६ | देवताओंने स्तुति की— भगवति! पापनाशिनि! आपको नमस्कार है। सुर-शत्रुओंके दर्पका दलन करनेवाली! आपको नमस्कार है। विष्णु और शङ्करको राज्य देनेवाली! आपको नमस्कार है। यज्ञके भागके भोक्ता देवोंका कार्य करनेवाली! आपको नमस्कार है। |
| अध्याय ५६ ] | चण्डिकासे मातृकाओंकी उत्पत्ति, असुरोंसे उनका युद्ध, रक्तबीज-निशुम्भ-शुम्भ-वध | २५३ |
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| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| नमोऽस्तु ते त्रिदशरिपुक्षयंकरि<br>नमोऽस्तु ते शतमखपादपूजिते ।<br>नमोऽस्तु ते महिषविनाशकारिणी<br>नमोऽस्तु ते हरिहरभास्करस्तुते ॥ ५७<br><br>नमोऽस्तु तेऽष्टादशबाहुशालिनि<br>नमोऽस्तु ते शुम्भनिशुम्भघातिनि ।<br>नमोऽस्तु लोकार्त्तिहरे त्रिशूलिनि<br>नमोऽस्तु नारायणि चक्रधारिणि ॥ ५८<br><br>नमोऽस्तु वाराहि सदा धराधरे<br>त्वां नारसिंहि प्रणता नमोऽस्तु ते ।<br>नमोऽस्तु ते वज्रधरे गजध्वजे<br>नमोऽस्तु कौमारि मयूरवाहिनि ॥ ५९ | देवताओंके शत्रुओंका विनाश करनेवाली! आपको नमस्कार है। इन्द्रके द्वारा पूजित चरणोंवाली! आपको नमस्कार है। महिषासुरका विनाश करनेवाली! आपको नमस्कार है। विष्णु, शङ्कर एवं सूर्यसे स्तुति की जानेवाली! आपको नमस्कार है। अष्टादश भुजाओंवाली! आपको नमस्कार है। शुम्भ और निशुम्भका वध करनेवाली! आपको नमस्कार है। समस्त संसारका दुःख हरण करनेवाली! त्रिशूल धारण करनेवाली! आपको नमस्कार है। चक्र धारण करनेवाली नारायणि! आपको नमस्कार है। वाराहि! धराको सदा धारण करनेवाली! आपको नमस्कार है। नारसिंहि! आपके चरणोंपर हम प्रणत हैं, आपको नमस्कार है। वज्र धारण करनेवाली! गजध्वजे! आपको नमस्कार है। कौमारि! मयूरवाहिनि! आपको नमस्कार है ॥ ५६-५९ ॥ |
| नमोऽस्तु पैतामहहंसवाहने<br>नमोऽस्तु मालाविकटे सुकेशिनि ।<br>नमोऽस्तु ते रासभपृष्ठवाहिनि<br>नमोऽस्तु सर्वार्त्तिहरे जगन्मये ॥ ६०<br><br>नमोऽस्तु विश्वेश्वरि पाहि विश्वं<br>निषूद्यारीन् द्विजदेवतानाम् ।<br>नमोऽस्तु ते सर्वमयि त्रिनेत्रे<br>नमो नमस्ते वरदे प्रसीद ॥ ६१<br><br>ब्रह्माणी त्वं मृडानी वरशिखिगमना<br>शक्तिहस्ता कुमारी<br>वाराही त्वं सुवक्त्रा खगपतिगमना<br>वैष्णवी त्वं सशार्ङ्गी ।<br>दुर्द्दृश्या नारसिंही घुरघुरितरवा<br>त्वं तथैन्द्री सवज्रा<br>त्वं मारी चर्ममुण्डा शवगमनरता<br>योगिनी योगसिद्धा ॥ ६२<br><br>नमस्ते त्रिनेत्रे भगवति तव चरणानुषिक्ता<br>ये अहरहर्विनतशिरसोऽवनताः ।<br>नहि नहि परिभवमस्त्यशुभं च<br>स्तुतिबलिकुसुमकराः सततं ये ॥ ६३ | ब्रह्माके हंसपर बैठनेवाली! आपको नमस्कार है। विकट माला धारण करनेवाली! सुन्दर केशोंवाली! आपको नमस्कार है। गर्दभकी पीठपर बैठनेवाली! आपको नमस्कार है। समस्त क्लेशोंका नाश करनेवाली! जगन्मये! आपको नमस्कार है। विश्वेश्वरि! आपको नमस्कार है। आप विश्वकी रक्षा करें तथा ब्राह्मणों और देवताओंके शत्रुओंका संहार करें। त्रिनेत्रे! सर्वमयि! आपको नमस्कार है। वरदायिनि! आपको बारम्बार नमस्कार है। आप प्रसन्न हों। ब्रह्माणी और मृडानी आप ही हैं। आप ही सुन्दर मोरपर चलनेवाली और हाथमें शक्ति धारण करनेवाली कुमारी हैं। सुन्दर मुखवाली वाराही आप ही हैं तथा गरुड़पर चलनेवाली, शार्ङ्गधनुष धारण करनेवाली वैष्णवी आप ही हैं। घुर-घुर शब्द करनेवाली, देखनेमें भयंकर नारसिंही आप ही हैं। आप ही वज्र धारण करनेवाली ऐन्द्री एवं महामारी चर्ममुण्डा हैं। शवपर चलनेवाली तथा योग सिद्ध कर चुकनेवाली योगिनी भी आप ही हैं। तीन नेत्रोंवाली भगवति! आपको नमस्कार है। आपके चरणोंका आश्रय कर नम्रतासे प्रतिदिन अपना सिर झुकानेवालों तथा बलि एवं फूलोंको हाथमें लिये सर्वदा आपकी स्तुति करनेवालोंका कोई पराजय, अनादर और अकल्याण नहीं होता ॥ ६०-६३ ॥ |
| २५४ | श्रीवामनपुराण | [ अध्याय ५६ |
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| एवं स्तुता सुरवरैः सुरशत्रुनाशिनी<br>प्राह प्रहस्य सुरसिद्धमहर्षिवर्यान्।<br>प्राप्तो मयाऽद्भुततमो भवतां प्रसादात्<br>संग्राममूर्ध्नि सुरशत्रुजयः प्रमर्दात्॥ ६४<br>इमां स्तुतिं भक्तिपरा नरोत्तमा<br>भवद्भिरुक्तामनुकीर्त्तयन्ति ।<br>दुःस्वप्ननाशो भविता न संशयो<br>वरस्तथान्यॊ व्रियतामभीप्सितः॥ ६५ | श्रेष्ठ देवताओंके इस प्रकार प्रार्थना करनेपर देवताओंके शत्रुओंका संहार करनेवाली देवीने देवताओं, सिद्धों और श्रेष्ठ महर्षियोंसे हँसकर कहा—मैंने आपलोगोंकी कृपासे युद्धभूमिमें (शत्रुका) मर्दन कर देवशत्रुओं (दानवों)-पर अत्यन्त अनूठी विजय प्राप्त की है। आपलोगोंसे कही गयी इस स्तुतिको पढ़नेवाले भक्तिपरायण श्रेष्ठ मनुष्योंके दुःस्वप्नोंका निस्सन्देह नाश होगा। (अब) आपलोग दूसरे इच्छित वरको माँगँ॥ ६४-६५॥ | | देवा ऊचुः<br>यदि वरदा भवती त्रिदशानां<br>द्विजशिशुगोषु यतस्व हिताय।<br>पुनरपि देवरिपूनपरांस्त्वं<br>प्रदह हुताशनतुल्यशरीरे॥ ६६ | देवताओँने कहा— यदि आप देवताओंको वर देना चाहती हैं तो ब्राह्मणों, बच्चों और गौओंके कल्याणके लिये यत्न कीजिये। अग्निके सदृश शरीरवाली! आप (हम सबके) अन्य देवशत्रुओंको भविष्यमें भी जलाकर भस्म करें॥ ६६॥ | | देव्युवाच<br>भूयो भविष्याम्यसृगुक्षितानना<br>हराननस्वेदजलोद्भवा सुराः।<br>अन्धासुरस्याप्रतिपोषणे रता<br>नाम्ना प्रसिद्धा भुवनेषु चर्चिका॥ ६७<br>भूयो वधिष्यामि सुरारिमुत्तं<br>सम्भूय नन्दस्य गृहे यशोदया।<br>तं विप्रचित्तिं लवणं तथाऽपरौ<br>शुम्भं निशुम्भं दशनप्रहारिणी॥ ६८<br>भूयः सुरास्तिष्ययुगे निराशिनी<br>निरीक्ष्य मारीं च गृहे शतक्रतोः।<br>सम्भूय देव्याऽमितसत्यधामया<br>सुरा भरिष्यामि च शाकम्भरी वै॥ ६९<br>भूयो विपक्षक्षपणाय देवा<br>विन्ध्ये भविष्याम्यृषिरक्षणार्थम्।<br>दुर्वृत्तचेष्टान् विनिहत्य दैत्यान्<br>भूयः समेष्यामि सुरालयं हि॥ ७०<br>यदाऽरुणाक्षो भविता महासुरः<br>तदा भविष्यामि हिताय देवताः।<br>महाभिलिरूपेण विनष्टजीवितं<br>कृत्वा समेष्यामि पुनस्त्रिविष्टपम्॥ ७१ | देवीने कहा— देवो! मैं पुनः शङ्करके मुखके पसीनेके जलसे उत्पन्न हो करके रक्तसे रञ्जित मुखवाली होकर संसारमें चर्चिका नामसे प्रसिद्ध होऊँगी और अन्धकासुरका संहार करूँगी। फिर मैं नन्दके गृहमें यशोदासे उत्पन्न होकर प्रबल देव-शत्रुका वध करूँगी। वहाँ मैं अवतार लेकर दाँतोंके आघातसे विप्रचित्ति, लवणासुर एवं अन्य शुम्भ-निशुम्भ दानवोंका विनाश करूँगी। देवताओ! कलि-युगमें भोजन न करती हुई इन्द्रके घरमें मारीको देखकर मैं पुनः अमितसत्यधामा देवीके साथ इन्द्रके घर शाकम्भरीके रूपमें प्रकट होकर भरण-पोषण करूँगी। देवताओ! पुनः मैं शत्रुओंके संहार तथा ऋषियोंकी रक्षाके लिये विन्ध्याचलमें उपस्थित होऊँगी। देवो! वहाँ दुराचारी दैत्योंका नाश करनेके बाद पुनः स्वर्ग चली जाऊँगी। देवताओ! अरुणाक्ष नामक महासुरके उत्पन्न होनेपर महाभ्रमरके रूपसे पुनः उत्पन्न होऊँगी एवं उसका संहार कर फिर स्वर्ग चली जाऊँगी॥ ६७–७१॥ |
अध्याय ५७] कार्त्तिकेयका जन्म, उनके छः मुख और चतुर्मूर्ति होनेका हेतु, उनका दण्डादिका पाना २५५
| पुलस्त्य उवाच | |
|---|---|
| इत्येवमुक्त्वा वरदा सुराणां<br>कृत्वा प्रणामं द्विजपुङ्गवानाम्।<br>विसृज्य भूतानि जगाम देवी<br>खं सिद्धसङ्घैरनुगम्यमाना ॥ ७२<br>इदं पुराणं परमं पवित्रं<br>देव्या जयं मङ्गलदायि पुंसाम्।<br>श्रोतव्यमेतन्नियतैः सदैव<br>रक्षोघ्नमेतद्भगवानुवाच ॥ ७३ ॥ | पुलस्त्यजी बोले— ऐसा कहनेके बाद देवी श्रेष्ठ ब्राह्मणोंको प्रणाम करके अन्य प्राणियोंको बिदाकर एवं देवोंको वर देकर सिद्धोंके साथ स्वर्गमें चली गयीं। देवीकी यह विजय-कथा परम पवित्र और प्राचीन है, यह पुरुषोंको मङ्गल देनेवाली है, संयतचित्त मनुष्योंको इसे सदा सुननी चाहिये। भगवान्ने इसे 'रक्षोघ्न' कहा है ॥ ७२–७३ ॥ |
॥ इस प्रकार श्रीवामनपुराणमें छप्पनवाँ अध्याय समाप्त हुआ ॥ ५६ ॥
सत्तावनवाँ अध्याय
कार्त्तिकेयका जन्म, उनके छः मुख और चतुर्मूर्ति होनेका हेतु, उनका सेनापति होना तथा उनका गण, मयूर, शक्ति और दण्डादिका पाना
| नारद उवाच | |
|---|---|
| कथं समहिषः क्रौञ्चो भिन्नः स्कन्देन सुव्रत।<br>एतन्मे विस्तराद् ब्रह्मन् कथयस्वामितद्युते ॥ १ | नारदजीने पूछा— दृढ़तासे व्रतका सुपालन करनेवाले अमित तेजस्वी ब्रह्मन्! आप मुझे विस्तारसे यह बतलाइये कि स्कन्दने महिषके सहित क्रौञ्चको किस प्रकार मारा ? ॥ १ ॥ |
| पुलस्त्य उवाच | |
| शृणुष्व कथयिष्यामि कथां पुण्यां पुरातनीम्।<br>यशोवृद्धिं कुमारस्य कार्त्तिकेयस्य नारद ॥ २<br>यत्तत्पीतं हुताशेन स्कन्नं शुक्रं पिनाकिनः।<br>तेनाक्रान्तोऽभवद् ब्रह्मन् मन्दतेजा हुताशनः ॥ ३<br>ततो जगाम देवानां सकाशममितद्युतिः।<br>तैश्चापि प्रहितस्तूर्णं ब्रह्मलोकं जगाम ह ॥ ४<br>स गच्छन् कुटिलां देवीं ददर्श पथि पावकः।<br>तां दृष्ट्वा प्राह कुटिले तेज एतत्सुदुद्धरम् ॥ ५ | पुलस्त्यजी बोले— नारद! सुनो, मैं कीर्तिको बढ़ानेवाली कुमार कार्त्तिकेयकी पवित्र प्राचीन कथा कहता हूँ। ब्रह्मन्! अग्निने शङ्करके उस च्युत शुक्रका पान कर लिया था। उससे ग्रस्त होनेके कारण अग्निका तेज फीका हो गया। उसके बाद अत्यन्त तेजस्वी अग्नि देवताओंके निकट गये। फिर उन देवोंके भेजे जानेपर वे शीघ्र ही ब्रह्मलोक चले गये। मार्गमें जाते हुए अग्निने कुटिला नामकी देवीको देखा। उसको देखकर अग्निने कहा—कुटिले! इस तेजको धारण करना कठिन है ॥ २–५ ॥ |
| महेश्वरेण संत्यक्तं निर्दहेद् भुवनान्यपि।<br>तस्मात् प्रतीच्छ पुत्रोऽयं तव धन्यो भविष्यति ॥ ६<br><br>इत्यग्निना सा कुटिला स्मृत्वा स्वमतमुत्तमम्।<br>प्रक्षिपस्वाम्भसि मम प्राह वह्निं महापगा ॥ ७ | शङ्करके द्वारा त्यागा गया यह तेज समस्त लोकोंको दग्ध कर देगा, अतः तुम इसे ग्रहण कर लो। इससे तुम्हें एक भाग्यशाली पुत्र होगा। अग्निके इस प्रकार कहनेपर अपने उत्तम मनोरथका स्मरणकर महानदी कुटिलाने अग्निसे कहा—इसे मेरे जलमें छोड़ |
| २५६ | श्रीवामनपुराण | [ अध्याय ५७ | | :--- | :--- |
| ततस्त्वधारयद्देवी शार्वं तेजस्त्वपूपुषत्।<br>हुताशनोऽपि भगवान् कामचारी परिभ्रमन्॥ ८<br>पञ्चवर्षसहस्राणि धृतवान् हव्यभुक् ततः।<br>मांसमस्थीनि रुधिरं मेदोऽन्त्ररेतसी त्वचः॥ ९<br>रोमश्मश्र्वक्षिकेशाद्याः सर्वे जाता हिरण्मयाः।<br>हिरण्यरेता लोकेषु तेन गीतश्च पावकः॥ १० | दें। (ऐसा करनेपर) उसके बाद वह देवी शङ्करके तेजको ग्रहणकर उसका पालन-पोषण करने लगी। भगवान् अग्निदेव भी इच्छाके अनुसार विचरण करने लगे। अग्निने उस तेजको पाँच हजार वर्षोंतक धारण किया था। इसलिये अग्निके मांस, हड्डी, रक्त, मेदा, आँत, रेतस्, त्वचा, रोम, दाढ़ी-मूँछ, नेत्र एवं केश आदि सभी सुवर्णमय बन गये। इसीसे संसारमें अग्निको 'हिरण्यरेता' कहा जाने लगा॥ ६-१०॥ | | पञ्चवर्षसहस्राणि कुटिला ज्वलनोपमम्।<br>धारयन्ती तदा गर्भं ब्रह्मणः स्थानमागता॥ ११<br>तां दृष्टवान् पद्मजन्मा संतप्यन्तीं महापगाम्।<br>दृष्ट्वा पप्रच्छ केनायं तव गर्भः समाहितः॥ १२<br>सा चाह शाङ्करं यत्तच्छुक्रं पीतं हि वह्निना।<br>तदशक्तेन तेनाद्य निक्षिप्तं मयि सत्तम॥ १३<br>पञ्चवर्षसहस्राणि धारयन्त्याः पितामह।<br>गर्भस्य वर्तते कालो न पपात च कर्हिचित्॥ १४ | तब अग्निके समान उस गर्भको पाँच हजार वर्षोंतक धारण करती हुई कुटिला ब्रह्माके स्थानपर गयी। कमलजन्मा ब्रह्माने उस महानदीको सन्तप्त होती देखकर पूछा—तुम्हारा यह गर्भ किसके द्वारा स्थापित है? उसने उत्तर दिया—सत्तम! अग्निने पिये हुए शङ्करके उस शुक्रको अपनेमें धारण करनेकी शक्ति न होनेके कारण मुझमें त्याग दिया। पितामह! गर्भ धारण किये हुए मेरा पाँच हजार वर्षका समय बीत गया; परंतु किसी प्रकार यह बाहर नहीं निकल रहा है॥ ११-१४॥ | | तच्छ्रुत्वा भगवानाह गच्छ त्वमुदयं गिरिम्।<br>तत्रास्ति योजनशतं रौद्रं शरवणं महत्॥ १५<br>तत्रैनं क्षिप सुश्रोणि विस्तीर्णे गिरिसानुनि।<br>दशवर्षसहस्रान्ते ततो बालो भविष्यति॥ १६<br>सा श्रुत्वा ब्रह्मणो वाक्यं रूपिणी गिरिमागता।<br>आगत्य गर्भं तत्याज मुखेनैवाद्रिनन्दिनी॥ १७<br>सा तु संत्यज्य तं बालं ब्रह्माणं सहसागमत्।<br>आपोमयी मन्त्रवशात् संजाता कुटिला सती॥ १८ | उसको सुनकर भगवान् ब्रह्माने कहा—तुम उदयाचलपर जाओ। वहाँपर सौ योजनमें फैला हुआ सरपतोंका विशाल घनघोर वन है। अयि सुन्दर कटिवाली! उस विस्तृत पर्वतकी ऊँची चोटीपर इसे छोड़ दो। यह दस हजार वर्षोंके बाद बालक हो जायगा। ब्रह्माकी बात सुननेके बाद वह गिरिनन्दिनी सुन्दरी पर्वतपर गयी एवं मुखसे ही (उसने) गर्भका परित्याग कर दिया। वह उस (जन्म लेनेवाले) बालकको छोड़कर शीघ्र ही ब्रह्माके समीप चली गयी। सती कुटिला मन्त्र (शाप)-के कारण जलरूपमें हो गयी॥ १५-१८॥ | | तेजसा चापि शार्वेण रौक्मं शरवणं महत्।<br>तन्निवासिरताश्चान्ये पादपा मृगपक्षिणः॥ १९<br>ततो दशसु पूर्णेसु शरदशशतेष्वथ।<br>बालार्कदीप्तिः संजातो बालः कमललोचनः॥ २०<br>उत्तानशायी भगवान् दिव्ये शरवणे स्थितः।<br>मुखेऽङ्गुष्ठं समाक्षिप्य रुरोद घनराडिव॥ २१<br>एतस्मिन्नन्तरे देव्यः कृत्तिकाः षट् सुतेजसः।<br>ददृशुः स्वेच्छया यान्त्यो बालं शरवणे स्थितम्॥ २२ | शङ्करके तेजसे वह विशाल सरपतोंका वन सुवर्णमय बन गया। उस वनमें रहनेवाले वृक्ष, मृग एवं पक्षी भी सुवर्णमय हो गये। उसके बाद दस हजार वर्षोंके बीत जानेपर उगते हुए बाल सूर्यके सदृश दीप्तिमान् तथा कमलके समान आँखोंवाला बालक उत्पन्न हुआ। उस दिव्य सरपतके वनमें उत्तान सोये हुए भगवान् कुमार अपने मुखमें अपना अंगूठा डालकर बादलकी ध्वनिके समान अस्पष्ट ध्वनिमें रोने लगे। इसी बीच स्वेच्छासे जाती हुई दिव्य तेजस्विनी छहों कृत्तिकाओंने सरपतके वनमें स्थित उस बालकको देखा॥ १९-२२॥ |
अध्याय ५७] कार्त्तिकेयका जन्म, उनके छः मुख और चतुर्मूर्ति होनेका हेतु, उनका दण्डादिका पाना २५७
| कृपायुक्ताः समाजग्मुर्यत्र स्कन्दः स्थितोऽभवत्।<br>अहं पूर्वमहं पूर्वं तस्मै स्तन्येऽभिचुक्रुशुः॥ २३<br><br>विवदन्तीः स ता दृष्ट्वा षण्मुखः समजायत।<br>अबीभरंश्च ताः सर्वाः शिशुं स्नेहाच्च कृत्तिकाः ॥ २४<br><br>ध्रियमाणः स ताभिस्तु बालो वृद्धिमगान्ममुने।<br>कार्त्तिकेयेति विख्यातो जातः स बलिनां वरः ॥ २५<br><br>एतस्मिन्नन्तरे ब्रह्मन् पावकं प्राह पद्मजः।<br>कियत्प्रमाणः पुत्रस्ते वर्त्तते साम्प्रतं गुहः ॥ २६ | ये कृत्तिकाएँ दयापूर्वक वहाँ गयीं जहाँ कुमार स्कन्द थे। उन्हें दूध पिलानेके लिये वे आपसमें 'हम पहले, हम पहले' (पिलायेंगी-) कहकर विवाद करने लगीं। उन्हें आपसमें विवाद करती हुई देखकर वह कुमार षण्मुख (छह मुखवाले) बन गये। फिर तो उन (छहों) कृत्तिकाओंने प्रेमपूर्वक बच्चेका पोषण किया। मुने! उनके द्वारा रक्षित होकर वह शिशु बड़ा हुआ। वह बलवानोंमें श्रेष्ठ कार्त्तिकेय नामसे प्रसिद्ध हुआ। ब्रह्मन्! इसी बीच ब्रह्माने अग्निसे प्रश्न किया कि अग्निदेव! तुम्हारा पुत्र गुह (कार्त्तिकेय) इस समय कितना बड़ा हुआ है? ॥ २३—२६॥ |
| स तद्वचनमाकर्ण्य अजानंस्तं हरात्मजम्।<br>प्रोवाच पुत्रं देवेश न वेद्मि कतमो गुहः ॥ २७<br><br>तं प्राह भगवान् यत्तु तेजः पीतं पुरा त्वया।<br>त्रैयम्बकं त्रिलोकेश जातः शरवणे शिशुः ॥ २८<br><br>श्रुत्वा पितामहवचः पावकस्त्वरितोऽभ्यगात्।<br>वेगिनं मेषमारुह्य कुटिला तं ददर्श ह ॥ २९<br><br>ततः पप्रच्छ कुटिला शीघ्रं क्व व्रजसे कवे।<br>सोऽब्रवीत् पुत्रदृष्ट्यर्थं जातं शरवणे शिशुम् ॥ ३० | ब्रह्माके प्रश्नको सुनकर अग्निने शङ्करके उस पुत्रको न जाननेके कारण उत्तरमें कहा—देवेश! मैं पुत्रको नहीं जानता; कौन-सा गुह है? भगवान्ने उनसे कहा—त्रिलोकेश! पूर्वकालमें तुमने शङ्करका जो तेज पी लिया था, वह शरवण (सरपतके वन)-में शिशुरूपसे उत्पन्न हुआ है। पितामहका वचन सुननेके बाद अग्निदेव तीव्र गतिवाले बकरेपर चढ़कर शीघ्र (वहाँ) गये। कुटिलाने उन्हें जाते हुए देखा। तब कुटिलाने उनसे पूछा—अग्निदेव! आप कहाँ जा रहे हैं? उन्होंने कहा—कुटिले! शरवणमें उत्पन्न हुए बालक पुत्रको देखने जा रहा हूँ ॥ २७—३०॥ |
| साऽब्रवीत् तनयो मह्यं ममेत्याह च पावकः।<br>विवदन्तौ ददर्शाथ स्वेच्छाचारी जनार्दनः ॥ ३१<br><br>तौ पप्रच्छ किमर्थं वा विवादमिह चक्रथः।<br>तावूचतुः पुत्रहेतो रुद्रशुक्रोद्भवाय हि॥ ३२<br><br>तावुवाच हरिर्देवो गच्छ तं त्रिपुरान्तकम्।<br>स यद् वक्ष्यति देवेशस्तत्कुरुध्वमसंशयम् ॥ ३३<br><br>इत्युक्तौ वासुदेवेन कुटिलाग्नी हरान्तिकम्।<br>समभ्येत्योचतुस्तथ्यं कस्य पुत्रेति नारद ॥ ३४ | उसने कहा कि 'पुत्र मेरा है' और अग्निने कहा कि 'मेरा है'। स्वेच्छासे विचरण कर रहे जनार्दनने उन दोनोंको परस्पर विवाद करते हुए देखा। उन्होंने उन दोनोंसे पूछा—तुम दोनों आपसमें किसलिये विवाद कर रहे हो। (तो) उन दोनोंने कहा—रुद्रके शुक्रसे उत्पन्न हुए पुत्रके लिये। विष्णुने उन दोनोंसे कहा—तुमलोग त्रिपुरासुरका विनाश करनेवाले शिवके पास जाओ। वे देवेश जो कहें, उसे निस्संदेह करो। (पुलस्त्यजी कहते हैं कि) नारदजी! वासुदेवके इस प्रकार कहनेपर कुटिला एवं अग्नि शङ्करके पास गये और उन्होंने (उनसे) यह गूढ रहस्य पूछा कि पुत्र किसका है? ॥ ३१—३४॥ |
| रुद्रस्तद्वाक्यमाकर्ण्य हर्षनिर्भरमानसः।<br>दिष्ट्या दिष्ट्येति गिरिजां प्रोद्भूतपुलकोऽब्रवीत् ॥ ३५ | उनके वचनको सुनकर शङ्करका मन हर्षसे भर गया। उन्होंने हर्षगद्गद होकर गिरिजासे कहा—अहो |
| २५८ | श्रीवामनपुराण | [ अध्याय ५७ | | :--- | :--- | | ततोऽम्बिका प्राह हरं देव गच्छाम तं शिशुम्।<br>प्रष्टुं समाश्रयेद् यं स तस्य पुत्रो भविष्यति ॥ ३६<br>बाढमित्येव भगवान् समुत्तस्थौ वृषध्वजः।<br>सहोमया कुटिलया पावकेन च धीमता ॥ ३७<br>सम्प्राप्तास्ते शरवणं हराग्निकुटिलाम्बिकाः।<br>ददृशुः शिशुकं तं च कृत्तिकोत्सङ्गशायिनम् ॥ ३८ | भाग्य! अहो भाग्य!! तब अम्बिकाने शङ्करसे कहा—देव! हम सब उस शिशुसे ही पूछने चलें। वह जिसका आश्रय स्वीकार करेगा उसीका पुत्र होगा। ठीक है—ऐसा कहकर वृषध्वज भगवान् शङ्कर पार्वती, कुटिला तथा बुद्धिमान् पावकके साथ चलनेके लिये उठ खड़े हुए। शङ्कर, पार्वती, कुटिला एवं पावक शरवणमें गये। इन लोगोंने कृत्तिकाकी गोदमें लेटे हुए उस बालकको देखा॥ ३५-३८॥ | | ततः स बालकस्तेषां मत्वा चिन्तितमादरात्।<br>योगी चतुर्मूर्तिरभूत् षण्मुखः स शिशुस्त्वपि ॥ ३९<br>कुमारः शङ्करमगाद् विशाखो गौरिमागमत्।<br>कुटिलामगमच्छाखो महासेनोऽग्निमभ्ययात् ॥ ४०<br>ततः प्रीतियुतो रुद्र उमा च कुटिला तथा।<br>पावकश्चापि देवेशः परां मुदमवाप च ॥ ४१<br>ततोऽब्रुवन् कृत्तिकास्ताः षण्मुखः किं हरात्मजः।<br>ता अब्रवीद्धरः प्रीत्या विधिवद् वचनं मुने ॥ ४२ | उसके बाद छः मुखोंवाला वह बालक उन लोगोंको चिन्तित जान करके उनमें आदर रखकर बच्चा होते हुए भी योगीके समान कुमार, विशाख, शाख, महासेन—(इन) चार मूर्तियोंवाला हो गया। कुमार शङ्करके, विशाख गिरिजाके, शाख कुटिलाके और महासेन अग्निके समीप चले गये। फिर तो रुद्र, उमा, कुटिला तथा देवेश्वर अग्नि—ये चारों ही अत्यन्त हर्षित हो गये। उसके बाद उन कृत्तिकाओंने पूछा—क्या षड्वदन शङ्करके पुत्र हैं? मुने! शङ्करने उन सभीसे प्रेमपूर्वक विधिवत् (आगेका) वचन कहा—॥ ३९-४२॥ | | नाम्ना तु कार्त्तिकेयो हि युष्माकं तनयस्त्वसौ।<br>कुटिलायाः कुमारेति पुत्रोऽयं भविताऽव्ययः ॥ ४३<br>स्कन्द इत्येव विख्यातो गौरीपुत्रो भवत्वसौ।<br>गुह इत्येव नाम्ना च ममासौ तनयः स्मृतः ॥ ४४<br>महासेन इति ख्यातो हुताशस्यास्तु पुत्रकः।<br>शारद्वत इति ख्यातः सुतः शरवणस्य च ॥ ४५<br>एवमेष महायोगी पृथिव्यां ख्यातिमेष्यति।<br>षडास्यत्वान्महाबाहुः षण्मुखो नाम गीयते ॥ ४६ | कृत्तिकाओ! 'कार्त्तिकेय' नामसे ये तुम्हारे पुत्र होंगे तथा ये अविनाशी 'कुमार' नामसे कुटिलाके पुत्र होंगे। ये ही 'स्कन्द' नामसे विख्यात गौरीके पुत्र होंगे तथा 'गुह' नामसे मेरे पुत्र होंगे। 'महासेन' नामसे ये अग्निके प्रख्यात पुत्र होंगे तथा 'शारद्वत'—इस नामसे विख्यात ये शरवणके पुत्र होंगे। इस प्रकार ये महायोगी भूमण्डलमें विख्यात होंगे। छः मुखवाले होनेके कारण ये महाबाहु षण्मुख नामसे प्रसिद्ध होंगे॥ ४३-४६॥ | | इत्येवमुक्त्वा भगवान् शूलपाणिः पितामहम्।<br>सस्मार दैवतैः सार्द्धं तेऽथ्याजग्मुस्त्वरान्विताः ॥ ४७<br>प्रणिपत्य च कामारिमुमां च गिरिनन्दिनीम्।<br>दृष्ट्वा हुताशनं प्रीत्या कुटिलां कृत्तिकास्तथा ॥ ४८<br>ददृशुर्बालमत्युग्रं षण्मुखं सूर्यसंनिभम्।<br>मुष्णन्तमिव चक्षूंषि तेजसा स्वेन देवताः ॥ ४९<br>कौतुकाभिवृताः सर्वे एवमूचुः सुरोत्तमाः।<br>देवकार्यं त्वया देव कृतं देव्याऽग्निना तथा ॥ ५० | इस प्रकार कहकर शूलपाणि शङ्करने देवताओंके साथ पितामह ब्रह्माका स्मरण किया। वे सभी सहसा वहाँ आ गये और कामरिपु शङ्कर तथा गिरिनन्दिनी पार्वतीको प्रणामकर एवं अग्निदेव, कुटिला और कृत्तिकाओंको स्नेहपूर्वक देखकर उन देवोंने अतिशय दीप्तिमान् सूर्यके सदृश एवं अपने तेजसे सभीके नेत्रोंको चकाचौंधमें डालनेवाले उस षडानन बालकको देखा। प्रसन्नतासे भरे उन श्रेष्ठ देवोंने कहा—देव! आपने, देवीने एवं अग्निने देवताओंका कार्य सम्पन्न कर दिया॥ ४७-५०॥ |
अध्याय ५७] कार्तिकेयका जन्म, उनके छः मुख और चतुर्मूर्ति होनेका हेतु, उनका दण्डादिका पाना २५९
| तदुत्तिष्ठ व्रजामोऽद्य तीर्थमौजसमव्ययम्।<br>कुरुक्षेत्रे सरस्वत्यामभिषिञ्चाम षण्मुखम्॥ ५१<br>सेनायाः पतिरस्त्वेष देवगन्धर्वकिंनराः।<br>महिषं घातयत्वेष तारकं च सुदारुणम्॥ ५२<br>बाढमित्यब्रवीच्छर्वः समुत्तस्थुः सुरास्ततः।<br>कुमारसहिता जग्मुः कुरुक्षेत्रं महाफलम्॥ ५३<br>तत्रैव देवताः सेन्द्रा रुद्रब्रह्मजनार्दनाः।<br>यत्नमस्याभिषेकार्थं चक्रुर्मुनिगणैः सह॥ ५४ | तो आप उठें। अब हमलोग अविनाशी औजस तीर्थको चलें। कुरुक्षेत्रमें चलकर सरस्वती (नदी)-में हमलोग षण्मुखका अभिषेक करें। देवो, गन्धर्वो और किन्नरो! ये हमारे सेनापति बनें और महिष तथा भयंकर तारकका संहार करें। शङ्करने कहा—बहुत अच्छा। उसके बाद सभी देवता उठे और कुमारके साथ महान् फलदायी कुरुक्षेत्रमें चले गये। वहीं मुनियोंके साथ इन्द्र, रुद्र, प्रजापति ब्रह्मा, जनार्दन आदि समस्त देवताओंने उस कुमारके अभिषेकका उपाय किया॥ ५१—५४॥ |
|---|---|
| ततोऽम्बुना सप्तसमुद्रवाहिनी<br> नदीजलेनापि महाफलेन।<br>वरौषधीभिश्च सहस्त्रमूर्तिभि-<br> स्तदाभ्यषिञ्चन् गुहमच्युताद्याः॥ ५५<br><br>अभिषिञ्चति सेनान्यां कुमारे दिव्यरूपिणि।<br>जगुर्गन्धर्वपतयो ननृतुश्चाप्सरोगणाः॥ ५६<br><br>अभिषिक्तं कुमारं च गिरिपुत्री निरीक्ष्य हि।<br>स्नेहादुत्सङ्गं स्कन्दं मूर्ध््न्यजिघ्रन्मुहुर्मुहुः॥ ५७<br><br>जिघ्रती कार्तिकेयस्य अभिषेकार्द्रमाननम्।<br>भात्यद्रिजा यथेन्द्रस्य देवमाताऽदितिः पुरा॥ ५८ | उसके बाद अच्युत (विष्णु) आदि देवताओंने (सरस्वतीके तथा) सातों समुद्रोंमें मिलकर बहनेवाली नदियोंके महान् फलदायक जलसे एवं सहस्रों प्रकारकी उत्तमोत्तम ओषधियोंसे गुहका (सेनापतिके पदपर) अभिषेक किया। दिव्य रूप धारण करनेवाले सेनापति कुमारके अभिषिक्त हो जानेपर गन्धर्वराज गाने लगे एवं अप्सराएँ नृत्य करने लगीं। गिरिजाने कुमारको अभिषिक्त देखकर स्नेहसे गोदमें ले लिया और वे बार-बार उनके सिरको सूँघने लगीं। अभिषेकसे आर्द्र हुए कार्तिकेयके मुखको (आशीर्वाद देनेकी प्रक्रियामें) सूँघती हुई पार्वती पूर्वकालमें (आशीर्वाद देती हुई) इन्द्रके मुखको सूँघनेवाली देवमाता अदिति-जैसी सुशोभित हुईं॥ ५५—५८॥ |
| तदाऽभिषिक्तं तनयं दृष्ट्वा शर्वो मुदं ययौ।<br>पावकः कृत्तिकाश्चैव कुटिला च यशस्विनी॥ ५९<br><br>ततोऽभिषिक्तस्य हरः सेनापत्ये गुहस्य तु।<br>प्रमथांश्चतुरः प्रादाच्छक्रतुल्यपराक्रमान्॥ ६०<br><br>घण्टाकर्णं लोहिताक्षं नन्दिसेनं च दारुणम्।<br>चतुर्थं बलिनां मुख्यं ख्यातं कुमुदमालिनम्॥ ६१<br><br>हरदत्तान् गणान् दृष्ट्वा देवाः स्कन्दस्य नारद।<br>प्रददुः प्रमथान् स्वान् स्वान् सर्वे ब्रह्मपुरोगमाः॥ ६२ | उस समय शङ्कर, पावक, कृत्तिकाएँ एवं यशस्विनी कुटिला (-ये सभी) अपने पुत्रको अभिषिक्त देखकर अत्यन्त हर्षित हुए। उसके बाद शङ्करने सेनापतिके पदपर अभिषिक्त किये गये गुहको इन्द्रके सदृश शक्तिवाले चार प्रमथों—घण्टाकर्ण, लोहिताक्ष, दारुण नन्दिसेन और चौथे बलवानोंमें श्रेष्ठ विख्यात कुमुदमालीको दिया। नारदजी! शङ्करद्वारा दिये गये गणोंको देखकर ब्रह्मा आदि सभी देवताओंने (सेनापति) स्कन्दके लिये अपने-अपने प्रमथोंको (भी) दे दिया॥ ५९—६२॥ |
| स्थाणुं ब्रह्मा गणं प्रादाद् विष्णुः प्रादाद् गणत्रयम्।<br>संक्रमं विक्रमं चैव तृतीयं च पराक्रमम्॥ ६३<br><br>उत्केशं पङ्कजं शक्रो रविर्दण्डकपिङ्गलौ।<br>चन्द्रो मणिं वसुमणिमश्विनौ वत्सनन्दिनौ॥ ६४ | ब्रह्माने अपने गण स्थाणुको दिया और विष्णुने संक्रम, विक्रम और पराक्रम नामके तीन गणोंको दिया। इन्द्रने उत्केश और पङ्कजको, रविने दण्डक और पिङ्गलको, चन्द्रमाने मणि एवं वसुमणिको, अश्विनीकुमारोंने वत्स और नन्दीको दिया। |
| २६० | श्रीवामनपुराण | [ अध्याय ५७ |
|---|
| ज्योतिर्हुताशनः प्रादाज्ज्वलज्जिह्वं तथापरम्।<br>कुन्दं मुकुन्दं कुसुमं त्रीन् धाताऽनुचरान् ददौ ॥ ६५<br>चक्रानुचक्रौ त्वष्टा च वेधातिस्थिरसुस्थिरौ।<br>पाणित्यजं कालकञ्च प्रादात् पूषा महाबलौ ॥ ६६ | अग्निने ज्योति तथा दूसरे ज्वलज्जिह्वको दिया। धाताने कुन्द, मुकुन्द तथा कुसुम नामके तीन अनुचरोंको दिया। त्वष्टाने चक्र और अनुचक्रको, वेधाने अतिस्थिर और सुस्थिरको एवं पूषाने महाबलशाली पाणित्यज तथा कालकको दिया ॥ ६३-६६ ॥ | | स्वर्णमालं घनाह्वं च हिमवान् प्रमथोत्तमौ।<br>प्रादादेवोच्छ्रितो विन्ध्यस्त्वतिशृङ्गं च पार्षदम् ॥ ६७<br>सुवर्चसं च वरुणः प्रददौ चातिवर्चसम्।<br>संग्रहं विग्रहं चाब्धिर्नागा जयमहाजयौ ॥ ६८<br>उन्मादं शङ्कुकर्णं च पुष्पदन्तं तथाऽम्बिका।<br>घसं चातिघसं वायुः प्रादादनुचरावुभौ ॥ ६९<br>परिघं चटकं भीमं दहतिदहनौ तथा।<br>प्रददावंशुमान् पञ्च प्रमथान् षण्मुखाय हि ॥ ७० | हिमालयने प्रमथोंमें श्रेष्ठ स्वर्णमाल और घनाह्वको तथा ऊँचे विन्ध्याचलने अतिशृङ्ग नामक पार्षदको दिया। वरुणने सुवर्चा एवं अतिवर्चाको, समुद्रने संग्रह तथा विग्रहको एवं नागोंने जय तथा महाजयको दिया। अम्बिकाने उन्माद, शङ्कुकर्ण और पुष्पदन्तको तथा पवनने घस और अतिघस नामके दो अनुचरोंको दिया। अंशुमान्ने षडाननको परिघ, चटक, भीम, दहति तथा दहन नामके पाँच प्रमथोंको दिया ॥ ६७-७० ॥ | | यमः प्रमाथमुन्माथं कालसेनं महामुखम्।<br>तालपत्रं नाडिजङ्घं षडेवानुचरान् ददौ ॥ ७१<br>सुप्रभं च सुकर्माणं ददौ धाता गणेश्वरौ।<br>सुव्रतं सत्यसन्धं च मित्रः प्रादाद् द्विजोत्तम ॥ ७२<br>अनन्तः शङ्कुपीठश्च निकुम्भः कुमुदोऽम्बुजः।<br>एकाक्षः कुनटी चक्षुः किरीटी कलशोदरः ॥ ७३<br>सूचीवक्त्रः कोकनदः प्रहासः प्रियकोऽच्युतः।<br>गणाः पञ्चदशैते हि यक्षैर्दत्ता गुहस्य तु ॥ ७४ | यमराजने प्रमाथ, उन्माथ, कालसेन, महामुख, तालपत्र और नाडिजङ्घ नामके छः अनुचरोंको दिया। द्विजोत्तम! धाताने सुप्रभ और सुकर्मा नामके दो गणेश्वरोंको तथा मित्रने सुव्रत तथा सत्यसन्ध नामके दो अनुचरोंको दिया। यक्षोंने अनन्त, शङ्कुपीठ, निकुम्भ, कुमुद, अम्बुज, एकाक्ष, कुनटी, चक्षु, किरीटी, कलशोदर, सूचीवक्त्र, कोकनद, प्रहास, प्रियक एवं अच्युत—इन पंद्रह गणोंको कार्तिकेयको दे दिया ॥ ७१-७४ ॥ | | कालिन्द्याः कालकन्दश्च नर्मदाया रणोत्कटः।<br>गोदावर्याः सिद्धयात्रस्तमसायाद्रिकम्पकः ॥ ७५<br>सहस्रबाहुः सीताया वञ्जुलायाः सितोदरः।<br>मन्दाकिन्यास्तथा नन्दो विपाशायाः प्रियङ्करः ॥ ७६<br>ऐरावत्याश्चतुर्दंष्ट्रः षोडशाक्षो वितस्तया।<br>मार्जारं कौशिकी प्रादात् क्रथक्रौञ्चौ च गौतमी ॥ ७७<br>बाहुदा शतशीर्षं च वाहा गोनन्दनन्दिकौ।<br>भीमं भीमरथी प्रादाद् वेगारि सरयूर्ददौ ॥ ७८ | कालिन्दीने कालकन्दको, नर्मदाने रणोत्कटको, गोदावरीने सिद्धयात्रको एवं तमसाने अद्रिकम्पकको दिया। सीताने सहस्रबाहुको, वञ्जुलाने सितोदरको, मन्दाकिनीने नन्दको एवं विपाशाने प्रियङ्करको दिया। ऐरावतीने चतुर्दंष्ट्रको, वितस्ताने षोडशाक्षको, कौशिकीने मार्जारको एवं गौतमीने क्रथ और क्रौञ्चको दिया। बाहुदाने शतशीर्षको, वाहाने गोनन्द और नन्दिकको, भीमरथीने भीमको और सरयूने वेगारिको दिया ॥ ७५-७८ ॥ | | अष्टबाहुं ददौ काशी सुबाहुमपि गण्डकी।<br>महानदी चित्रदेवं चित्रा चित्ररथं ददौ ॥ ७९<br>कुहूः कुवलयं प्रादान्मधुवर्णं मधूदका।<br>जम्बूकं धूतपापा च वेणा श्वेताननं ददौ ॥ ८०<br>श्रुतवर्णं च पर्णासा रेवा सागरवेगिनम्।<br>प्रभावार्थं सहं प्रादात् काञ्चना कनकेक्षणम् ॥ ८१<br>गृध्रपत्रं च विमला चारुवक्त्रं मनोहरा।<br>धूतपापा महारावं कर्णा विद्रुमसंनिभम् ॥ ८२ | काशीने अष्टबाहुको, गण्डकीने सुबाहुको, महानदीने चित्रदेवको तथा चित्राने चित्ररथको दिया। कुहूने कुवलयको, मधूदकाने मधुवर्णको, धूतपापाने जम्बूकको और वेणाने श्वेताननको समर्पित किया। पर्णासाने श्रुतवर्णको, रेवाने सागरवेगीको, प्रभावाने अर्थ और सहको एवं काञ्चनाने कनकेक्षणको दिया। विमलाने गृध्रपत्रको, मनोहराने चारुवक्त्रको, धूतपापाने महारावको एवं कर्णाने विद्रुमसंनिभको दिया ॥ ७९-८२ ॥ |
अध्याय ५७ ] कार्त्तिकेयका जन्म, उनके छः मुख और चतुर्मूर्ति होनेका हेतु, उनका दण्डादिका पाना २६१
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| सुप्रसादं सुवेणुश्च जिष्णुमोघवती ददौ।<br>यज्ञबाहुं विशाला च सरस्वत्यो ददुर्गणान्॥ ८३<br>कुटिला तनयस्यादाद् दश शक्रबलान् गणान्।<br>करालं सितकेशं च कृष्णकेशं जटाधरम्॥ ८४<br>मेघनादं चतुर्दंष्ट्रं विद्युज्जिह्वं दशाननम्।<br>सोमाप्यायनमेवोग्रं देवयाजिनमेव च॥ ८५<br>हंसास्यं कुण्डजठरं बहुग्रीवं हयाननम्।<br>कूर्मग्रीवं च पञ्चैतान् ददुः पुत्राय कृत्तिकाः॥ ८६ | सुवेणुने सुप्रसादको और ओघवतीने जिष्णुको प्रदान किया। विशालाने यज्ञबाहुको दिया। इस प्रकार इन सरस्वती आदि नदियोंने अनेक गणोंको दिया। कुटिलाने अपने पुत्र (उन)-को कराल, सितकेश, कृष्णकेश, जटाधर, मेघनाद, चतुर्दंष्ट्र, विद्युज्जिह्व, दशानन, सोमाप्यायन एवं उग्र देवयाजी नामके दस गणोंको दिया। कृत्तिकाओंने अपने पुत्रको हंसास्य, कुण्डजठर, बहुग्रीव, हयानन तथा कूर्मग्रीव—इन पाँच अनुचरोंको प्रदान किया॥ ८३-८६॥ |
| स्थाणुजङ्घं कुम्भवक्त्रं लोहजङ्घं महाहनम्।<br>पिण्डाकारं च पञ्चैतान् ददुः स्कन्दाय चर्षयः॥ ८७<br>नागजिह्वं चन्द्रभासं पाणिकूर्मं शशीक्षकम्।<br>चाषवक्त्रं च जम्बूकं ददौ तीर्थः पृथूदकः॥ ८८<br>चक्रतीर्थं सुचक्राक्षं मकराक्षं गयाशिरः।<br>गणं पञ्चशिखं नाम ददौ कनखलः स्वकम्॥ ८९<br>बन्धुदत्तं वाजिशिरो बाहुशालं च पुष्करम्।<br>सर्वौजसं माहिषकं मानसः पिङ्गलं यथा॥ ९० | ऋषियोंने स्कन्दको स्थाणुजङ्घ, कुम्भवक्त्र, लोहजङ्घ, महाहन और पिण्डाकार—इन पाँच अनुचरोंको दिया। पृथूदक तीर्थने नागजिह्व, चन्द्रभास, पाणिकूर्म, शशीक्षक, चाषवक्त्र तथा जम्बूक नामके अनुचरोंको दिया। गयाशिरने चक्रतीर्थ, सुचक्राक्ष तथा मकराक्षको और कनखलने पञ्चशिख नामके अपने गणोंको दिया। वाजिशिरने बन्धुदत्त, पुष्कर और बाहुशालको तथा मानसने सर्वौजस, माहिषक और पिङ्गलको दिया॥ ८७-९०॥ |
| रौद्रमौशनसः प्रादात् ततोऽन्ये मातरो ददुः।<br>वसुदामां सोमतीर्थः प्रभासो नन्दिनीमपि॥ ९१<br>इन्द्रतीर्थं विशोकां च उदपानो घनस्वनाम्।<br>सप्तसारस्वतः प्रादान्मातरश्चतुरोद्भुताः॥ ९२<br>गीतप्रियां माधवीं च तीर्थनेमिं स्मिताननाम्।<br>एकचूडां नागतीर्थः कुरुक्षेत्रं पलासदाम्॥ ९३<br>ब्रह्मयोनिश्चण्डशिलां भद्रकालीं त्रिविष्टपः।<br>चौण्डीं भैण्डीं योगभैण्डीं प्रादाच्चरणपावनः॥ ९४ | औशनसने रुद्रको प्रदान किया तथा अन्योंने मातृकाओंको दिया। सोमतीर्थने वसुदामाको और प्रभासने नन्दिनीको तथा उदपानने इन्द्रतीर्थ, विशोका और घनस्वनाको अर्पित किया। सप्तसारस्वतने गीतप्रिया, माधवी, तीर्थनेमि एवं स्मितानना नामकी चार अद्भुत मातृकाओंको प्रदान किया। नागतीर्थने एकचूडा, कुरुक्षेत्र और पलासदाको दिया। ब्रह्मयोनिने चण्डशिलाको, त्रिविष्टपने भद्रकालीको तथा चरणपावनने चौण्डी, भैण्डी तथा योगभैण्डीको दिया॥ ९१-९४॥ |
| सोपानीयां मही प्रादाच्छालिकां मनसो ह्रदः।<br>शतघण्टां शतानन्दां तथोलूखलमेखलाम्॥ ९५<br>पद्मावतीं माधवीं च ददौ बदरिकाश्रमः।<br>सुषमामेकचूड़ां च देवीं धमधमां तथा॥ ९६<br>उत्क्राथनीं वेदमित्रां केदारो मातरो ददौ।<br>सुनक्षत्रां कद्रुलां च सुप्रभातां सुमङ्गलाम्॥ ९७<br>देवमित्रां चित्रसेनां ददौ रुद्रमहालयः।<br>कोटरामूर्ध्ववेणीं च श्रीमतीं बहुपुत्रिकाम्॥ ९८<br>पलितां कमलाक्षीं च प्रयागो मातरो ददौ।<br>सूपलां मधुकुम्भां च ख्यातिं दहदहां पराम्॥ ९९<br>प्रादात् खटकटां चान्यां सर्वपापविमोचनः।<br>संतानिकां विकलिकां क्रमश्चत्वरवासिनीम्॥ १०० | महीने सोपानीयाको, मानसह्नदने शालिकाको एवं बदरिकाश्रमने शतघण्टा, शतानन्दा, उलूखलमेखला, पद्मावती और माधवीको प्रदान किया। केदारतीर्थने सुषमा, एकचूडा, धमधमादेवी, उत्क्राथनी तथा वेदमित्रा नामक मातृकाओंको दिया। रुद्रमहालयने सुनक्षत्रा, कद्रूला, सुप्रभाता, सुमङ्गला, देवमित्रा और चित्रसेनाको दिया। प्रयागने कोटरा, ऊर्ध्ववेणी, श्रीमती, बहुपुत्रिका, पलिता तथा कमलाक्षी नामकी मातृकाओंको अर्पित किया। सर्वपापविमोचनने सूपला, मधुकुम्भा, ख्याति, दहदहा, परा और खटकटाको समर्पित किया। क्रमने सन्तानिका, विकलिका और चत्वरवासिनीको प्रदान किया॥ ९५-१००॥ |
५९- ऋतध्वजका पातालकेतुपर आक्रमण कर प्रहार करना, अन्धकका गौरीको प्राप्त करनेके लिये प्रयत्न करना
| २६२ | श्रीवामनपुराण | [ अध्याय ५८ |
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| जलेश्वरीं कुक्कुटिकां सुदामां लोहमेखलाम्।<br>वपुष्मत्युल्मुकाक्षी च कोकनामा महाशनी।<br>रौद्रा कर्कटिका तुण्डा श्वेततीर्थो ददौ त्विमाः॥ १०१<br>एतानि भूतानि गणांश्च मातरो<br>दृष्ट्वा महात्मा विनतातनूजः।<br>ददौ मयूरं स्वसुतं महाजवं<br>तथारुणस्ताम्रचूडं च पुत्रम्॥ १०२<br>शक्तिं हुताशोऽद्रिसुता च वस्त्रं<br>दण्डं गुरुःसा कुटिला कमण्डलुम्।<br>मालां हरिः शूलधरः पताकां<br>कण्ठे च हारं मघवानुरस्तः॥ १०३<br>गणैर्वृतो मातृभिरन्वयातो<br>मयूरसंस्थो वरशक्तिपाणिः।<br>सैन्याधिपत्ये स कृतो भवेन<br>रराज सूर्येव महावपुष्मान्॥ १०४ | श्वेततीर्थने तो जलेश्वरी, कुक्कुटिका, सुदामा, लोहमेखला, वपुष्मती, उल्मुकाक्षी, कोकनामा, महाशनी, रौद्रा, कर्कटिका और तुण्डा—इन अनुचरियोंको दिया। इन भूतों, गणों और मातृकाओंको देखकर विनता-पुत्र महात्मा गरुड़ने अपने पुत्र महावेगशाली मयूरको समर्पित किया और अरुणने अपने पुत्र ताम्रचूडको प्रदान कर दिया। अग्निने शक्ति, पार्वती ने वस्त्र, बृहस्पतिने दण्ड, उस कुटिलाने कमण्डलु, विष्णुने माला, शङ्करने पताका तथा इन्द्रने अपने हृदयका हार कार्तिकेयके कण्ठमें अर्पित कर दिया। गणोंसे युक्त, मातृकाओंसे अनुसरित, मयूरपर बैठे एवं श्रेष्ठ शक्तिको हाथमें लिये हुए महाशरीरधारी वे कुमार (कार्तिकेय) शङ्करके द्वारा सैन्याधिपतिके पदपर अभिषिक्त होकर (और उपहार पाकर) सूर्यके समान प्रकाशित होने लगे॥ १०१-१०४॥ |
॥ इस प्रकार श्रीवामनपुराणमें सत्तावनवाँ अध्याय समाप्त हुआ॥ ५७॥
अट्टावनवाँ अध्याय
सेनापतिपदपर नियुक्त कार्तिकेयके लिये ऋषियोंद्वारा स्वस्त्ययन, तारक-विजयके लिये प्रस्थान, पातालकेतुका वृत्तान्त, तारक महिषासुर-वध तथा सुचक्राक्षको वर
| पुलस्त्य उवाच<br>सेनापत्येऽभिषिक्तस्तु कुमारो दैवतैरथ।<br>प्रणिपत्य भवं भक्त्या गिरिजां पावकं शुचिम्॥ १<br><br>षट् कृत्तिकाश्च शिरसा प्रणम्य कुटिलामपि।<br>ब्रह्माणं च नमस्कृत्य इदं वचनमब्रवीत्॥ २ | पुलस्त्यजी बोले— जब शङ्कर एवं देवताओंने देवताओंके सेनापतिके पदपर कुमार कार्तिकेयका अभिषेक किया तब उक्त पदपर अभिषिक्त कुमारने भक्तिपूर्वक शङ्कर, पार्वती और पवित्र अग्निको प्रणाम किया। उसके बाद छः कृत्तिकाओं एवं कुटिलाको भी सिर झुकाकर प्रणाम करके ब्रह्माको नमस्कार कर यह वचन कहा॥ १-२॥ | | कुमार उवाच<br>नमोऽस्तु भवतां देवा ओं नमोऽस्तु तपोधनाः।<br>युष्मत्प्रसादाज्जेष्यामि शत्रू महिषतारकौ॥ ३ | कुमारने कहा— देवताओ! आपलोगोंको नमस्कार है। तपोधनो! आपलोगोंको ओंकारके साथ नमस्कार ('ॐ नमः') है। आपलोगोंकी अनुकम्पासे मैं महिष एवं तारक दोनों शत्रुओंपर विजय प्राप्त करूँगा। |
अध्याय ५८ ] सेनापतिपदपर नियुक्त कार्तिकेयके लिये ऋषियोंद्वारा स्वस्त्ययन, महिषासुर-वध [ २६३
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| शिशुरस्मि न जानामि वक्तुं किंचन देवताः।<br>दीयतां ब्रह्मणा सार्द्धमनुज्ञा मम साम्प्रतम्॥ ४<br>इत्येवमुक्ते वचने कुमारेण महात्मना।<br>मुखं निरीक्षन्ति सुराः सर्वे विगतसाध्वसाः॥ ५<br>शङ्करोऽपि सुतस्नेहात् समुत्थाय प्रजापतिम्।<br>आदाय दक्षिणे पाणौ स्कन्दान्तिकमुपागतम्॥ ६<br>अथोमा प्राह तनयं पुत्र एहोहि शत्रुहन्।<br>वन्दस्व चरणौ दिव्यौ विष्णोर्लोकनमस्कृतौ॥ ७ | देवताओ! मैं शिशु हूँ, मैं कुछ भी बोलना नहीं जानता। ब्रह्माके सहित आपलोग इस समय मुझे अनुमति दें। महात्मा कुमारके इस प्रकार कहनेपर सभी देवता निडर होकर उनका मुख देखने लगे। भगवान् शङ्कर पुत्रके स्नेहवश उठे और ब्रह्माको अपने दाहिने हाथसे पकड़कर स्कन्दके समीप ले आये। उसके बाद उमाने पुत्रसे कहा—शत्रुको मारनेवाले! आओ! आओ! संसारसे वन्दित विष्णुके दिव्य चरणोंको प्रणाम करो॥ ३-७॥ |
| ततो विहस्याह गुहः कोऽयं मातर्वदस्व माम्।<br>यस्यादरात् प्रणामोऽयं क्रियते मद्विधैर्जनैः॥ ८<br><br>तं माता प्राह वचनं कृते कर्मणि पद्मभूः।<br>वक्ष्यते तव योऽयं हि महात्मा गरुडध्वजः॥ ९<br><br>केवलं त्विह मां देवस्त्वत्पिता प्राह शङ्करः।<br>नान्यः परतोऽस्माद्धि वयमन्ये च देहिनः॥ १०<br><br>पार्वत्या गदिते स्कन्दः प्रणिपत्य जनार्दनम्।<br>तस्थौ कृताञ्जलिपुटस्त्वाज्ञां प्रार्थयतेऽच्युतात्॥ ११<br><br>कृताञ्जलिपुटं स्कन्दं भगवान् भूतभावनः।<br>कृत्वा स्वस्त्ययनं देवो ह्यनुज्ञां प्रददौ ततः॥ १२ | उसके बाद कार्तिकेयने हँसकर कहा—हे माता! मुझे स्पष्ट बतलाओ कि ये कौन हैं, जिन्हें हमारे-जैसे (अन्य) व्यक्ति भी प्रेमपूर्वक प्रणाम करते हैं? माताने उनसे कहा—ये महात्मा गरुडध्वज कौन हैं, यह तुम्हें कार्य कर लेनेपर ब्रह्मा ही बतलायेंगे। तुम्हारे पिता शङ्करदेवने मुझसे केवल यही बतलाया कि इनसे बढ़कर हमलोग या अन्य कोई शरीरधारी नहीं है। पार्वतीके स्पष्टतः कहनेपर कार्तिकेयने जनार्दनको प्रणाम किया एवं दोनों हाथोंको जोड़कर वे खड़े हो गये और भगवान् अच्युतसे आज्ञा माँगने लगे। लोकस्रष्टा भगवान् विष्णुने हाथ जोड़े हुए स्कन्दका स्वस्त्ययन कर उन्हें आज्ञा दी॥ ८-१२॥ |
| नारद उवाच<br>यत्तत् स्वस्त्ययनं पुण्यं कृतवान् गरुडध्वजः।<br>शिखिध्वजाय विप्रर्षे तन्मे व्याख्यातुमर्हसि॥ १३ | नारदने कहा— विप्रर्षे! गरुडध्वज विष्णुने मयूरध्वज कार्तिकेयके लिये जिस पवित्र स्वस्त्ययनका पाठ किया, उसे आप मुझसे कहें॥ १३॥ |
| पुलस्त्य उवाच<br>शृणु स्वस्त्ययनं पुण्यं यत्प्राह भगवान् हरिः।<br>स्कन्दस्य विजयार्थाय महिषस्य वधाय च॥ १४<br><br>स्वस्ति ते कुरुतां ब्रह्मा पद्मयोनी रजोगुणः।<br>स्वस्ति चक्राङ्कितकरो विष्णुस्ते विदधात्वजः॥ १५<br><br>स्वस्ति ते शङ्करो भक्त्या सपत्नीको वृषध्वजः।<br>पावकः स्वस्ति तुभ्यं च करोतु शिखिवाहन॥ १६<br><br>दिवाकरः स्वस्ति करोतु तुभ्यं<br>सोमः सभौमः सबुधो गुरुश्च।<br>काव्यः सदा स्वस्ति करोतु तुभ्यं<br>शनैश्वरः स्वस्त्ययनं करोतु॥ १७ | पुलस्त्यजी बोले— (नारदजी!) स्कन्दकी विजय एवं महिषके वधके लिये भगवान् विष्णुद्वारा कहे गये मङ्गलमय स्वस्तिवाचन—स्वस्त्ययनको सुनिये। (विष्णुने जो स्वस्त्ययन-पाठ किया, वह इस प्रकार है—) रजोगुणसे सम्पन्न कमलयोनि ब्रह्मा तुम्हारा कल्याण करें। हाथमें चक्र धारण करनेवाले अजन्मा विष्णु तुम्हारा मङ्गल करें। पत्नीसहित वृषध्वज शङ्कर प्रेमपूर्वक तुम्हारा मङ्गल करें। मयूरवाहन! अग्निदेव तुम्हारा कल्याण करें। सूर्य तुम्हारा मङ्गल करें, भौमसहित सोम तथा बुधसहित बृहस्पति तुम्हारा मङ्गल करें। शुक्र सदैव तुम्हारा मङ्गल करें तथा शनैश्चर तुम्हारा मङ्गल करें॥ १४-१७॥ |
| २६४ | श्रीवामनपुराण | [ अध्याय ५८ | | :--- | :--- |
| मरीचिरत्रिः पुलहः पुलस्त्यः क्रतुर्वसिष्ठो भृगुरङ्गिराश्च।<br>मृकण्डुजस्ते कुरुतां हि स्वस्ति स्वस्ति सदा सप्त महर्षयश्च ॥ १८<br>विश्वेऽश्विनौ साध्यमरुद्गणाग्रयो दिवाकराः शूलधरा महेश्वराः।<br>यक्षाः पिशाचा वसवोऽथ किन्नरास्तेस्वस्ति कुर्वन्त सदोद्यतास्त्वमी ॥ १९<br>नागाः सुपर्णाः सरितः सरांसि तीर्थानि पुण्यायतनाः समुद्राः।<br>महाबला भूतगणा गणेन्द्रास्ते स्वस्ति कुर्वन्तु सदा समुद्यताः ॥ २०<br>स्वस्ति द्विपादिकेभ्यस्ते चतुष्पादेभ्य एव च।<br>स्वस्ति ते बहुपादेभ्यस्त्वपादेभ्योऽप्यनामयम् ॥ २१ | मरीचि, अत्रि, पुलह, पुलस्त्य, क्रतु, वसिष्ठ, भृगु, अङ्गिरा, मार्कण्डेय—ये ऋषि तुम्हारा मङ्गल करें। सप्तर्षिगण तुम्हारा सदा मङ्गल करें। विश्वेदेव, अश्विनीकुमार, साध्य, मरुद्गण, अग्नि, सूर्य, शूलधर, महेश्वर, यक्ष, पिशाच, वसु और किन्नर—ये सब तत्परतासे सदा तुम्हारा मङ्गल करें। नाग, पक्षी, नदियाँ, सरोवर, तीर्थ, पवित्र देवस्थान, समुद्र, महाबलशाली भूतगण तथा विनायकगण सदा तत्पर होकर तुम्हारा मङ्गल करें। दो पैरवालों एवं चार पैरवालोंसे तुम्हारा मङ्गल हो। बहुत पैरवालोंद्वारा तुम्हारा मङ्गल हो एवं बिना पैरवालोंसे तुम्हारी स्वस्थता बनी रहे—तुम नीरोग बने रहो॥ १८-२१॥ | | प्राचीं दिग् रक्षतां वज्री दक्षिणां दण्डनायकः।<br>पाशी प्रतीचीं रक्षतु लक्ष्मांशः पातु चोत्तराम् ॥ २२<br><br>वह्निर्दक्षिणपूर्वां च कुबेरो दक्षिणापराम्।<br>प्रतीचीमुत्तरां वायुः शिवः पूर्वोत्तराम्पि ॥ २३<br><br>उपरिष्टाद् ध्रुवः पातु अधस्ताच्च धराधरः।<br>मुसली लाङ्गली चक्री धनुष्मानन्तरेषु च ॥ २४<br><br>वाराहोऽम्बुनिधौ पातु दुर्गे पातु नृकेसरी।<br>सामवेदध्वनिः श्रीमान् सर्वतः पातु माधवः ॥ २५ | वज्र धारण करनेवाले (इन्द्र) पूर्व दिशाकी, दण्डनायक (यम) दक्षिण दिशाकी, पाशधारी (वरुण) पश्चिम दिशाकी तथा चन्द्रमा उत्तर दिशाकी रक्षा करें। अग्नि अग्नि (पूर्व-दक्षिण)-कोणकी, कुबेर नैर्ऋत्य (दक्षिण-पश्चिम)-कोणकी, वायुदेव वायव्य (पश्चिम-उत्तर)-कोणकी और शिव ईशान (उत्तर-पूर्व)-कोणकी (रक्षा करें)। ऊपरकी ओर ध्रुव, नीचेकी ओर पृथ्वीको धारण करनेवाले शेषनाग एवं बीचके स्थानोंमें मुसल, हल, चक्र तथा धनुष धारण करनेवाले भगवान् विष्णु रक्षा करें। समुद्रमें वाराह, दुर्गम स्थानमें नरसिंह तथा सभी ओरसे सामवेदके ध्वनि-रूप श्रीमान् श्रीलक्ष्मीकान्त माधव तुम्हारी रक्षा करें॥ २२-२५॥ | | पुलस्त्य उवाच<br>एवं कृतस्वस्त्ययनो गुहः शक्तिधरोऽग्रणीः।<br>प्रणिपत्य सुरान् सर्वान् समुत्पतत भूतलात् ॥ २६<br>तमन्वेव गणाः सर्वे दत्ता ये मुदितैः सुरैः।<br>अनुजग्मुः कुमारं ते कामरूपा विहङ्गमाः ॥ २७<br>मातरश्च तथा सर्वाः समुत्पेतुर्नभस्तलम्।<br>समं स्कन्देन बलिना हन्तुकामा महासुरान् ॥ २८<br>ततः सुदीर्घमध्वानं गत्वा स्कन्दोऽब्रवीद् गणान्।<br>भूम्यां तूर्णं महावीर्याः कुरुध्वमवतारणम् ॥ २९ | पुलस्त्यजी बोले— इस प्रकार स्वस्त्ययन सम्पन्न हो जानेपर शक्ति धारण करनेवाले सेनापति कार्तिकेयजी सभी देवताओंको प्रणामकर भूतलसे आकाशकी ओर उड़ चले। प्रसन्न होकर देवताओंने जिन गणोंको गुहके लिये दिया था, उन इच्छानुकूल रूप धारण करनेवाले सभी गणोंने पक्षीका रूप धारण कर कुमारका अनुगमन किया। सभी माताएँ भी पराक्रमी स्कन्दके साथ महान् असुरोंके वधके लिये आकाशमें उड़ चलीं। उसके बाद बहुत दूर जानेपर स्कन्दने गणोंसे कहा—महापराक्रमियो! तुमलोग शीघ्र ही पृथ्वीपर उतर जाओ॥ २६-२९॥ |
अध्याय ५८ ] सेनापतिपदपर नियुक्त कार्तिकेयके लिये ऋषियोंद्वारा स्वस्त्ययन, महिषासुर-वध २६५
| संस्कृत | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| गणा गुहवचः श्रुत्वा अवतीर्य महीतलम्।<br>आरात् पतन्तस्तद्देशं नादं चक्रुर्भयंकरम्॥ ३०<br>तन्निनादो महीं सर्वामापूर्य च नभस्तलम्।<br>विवेशार्णवरन्ध्रेण पातालं दानवालयम्॥ ३१<br>श्रुतः स महिषेणाथ तारकेण च धीमता।<br>विरोचनेन जम्भेन कुजम्भेनासुरेण च॥ ३२<br>ते श्रुत्वा सहसा नादं वज्रपातोपमं दृढम्।<br>किमेतदिति संचिन्त्य तूर्णं जग्मुस्तदान्धकम्॥ ३३ | गुहकी बात सुनकर सभी गण पृथ्वीपर उतर आये। उतरकर उस स्थानपर उन गणोंने एकाएक भयंकर नाद किया। वह भयंकर नाद सारी पृथ्वी एवं गगनमण्डलमें गूँज गया। फिर तो वह समुद्री छिद्रसे दानवोंके निवासस्थान पाताललोक (-तक)-में पहुँच गया। उसके बाद मतिमान् महिष, तारक, विरोचन, जम्भ तथा कुजम्भ आदि असुरोंने उस ध्वनिको सुना। एकाएक वज्रपातके समान उस भयंकर ध्वनिको सुनकर यह क्या है—यह सोचकर वे सभी शीघ्रतासे अन्धकके पास चले गये॥ ३०—३३॥ |
| ते समेत्यान्धकेनैव समं दानवपुङ्गवाः।<br>मन्त्रयामासुरुद्विग्नास्तं शब्दं प्रति नारद॥ ३४<br>मन्त्रयत्सु च दैत्येषु भूतलात् सूकराननः।<br>पातालकेतुर्दैत्येन्द्रः सम्प्राप्तोऽथ रसातलम्॥ ३५<br>स बाणविद्धो व्यथितः कम्पमानो मुहुर्मुहुः।<br>अब्रवीद् वचनं दीनं समभ्येत्यान्धकासुरम्॥ ३६ | नारदजी! वे सभी असुरश्रेष्ठ व्याकुल होकर अन्धकके साथ ही एकत्र होकर उस शब्दके विषयमें परस्पर विचार-विमर्श करने लगे। उन दैत्योंके विचार करते समय सूकर-जैसे मुखवाला दैत्यश्रेष्ठ पातालकेतु धरातलसे रसातलमें आया। बाणसे विद्ध होनेके कारण व्यथित होकर वह बारम्बार काँपता हुआ अन्धकासुरके पास आकर दैन्य वचन बोला—॥ ३४—३६॥ |
| पातालकेतुरुवाच<br>गतोऽहमासं दैत्येन्द्र गालवस्याश्रमं प्रति।<br>तं विध्वंसयितुं यत्नं समारब्धं बलान्मया॥ ३७<br>यावत्सूकररूपेण प्रविशामि तमाश्रमम्।<br>न जाने तं नरं राजन् येन मे प्रहितः शरः॥ ३८<br>शरसंभिन्नजत्रुश्च भयात् तस्य महाजवः।<br>प्रणष्ट आश्रमात् तस्मात् स च मां पृष्ठतोऽन्वगात्॥ ३९<br>तुरङ्गखुरनिर्घोषः श्रूयते परमोऽसुर।<br>तिष्ठ तिष्ठेति वदतस्तस्य शूरस्य पृष्ठतः।<br>तद्भयादस्मि जलधिं सम्प्राप्तो दक्षिणार्णवम्॥ ४० | पातालकेतुने कहा— दैत्येश्वर! मैं गालवके आश्रममें गया था और उसको बलपूर्वक नष्ट करनेका उद्योग करने लगा। राजन्! मैंने सूकरके रूपमें जैसे ही उस आश्रममें प्रवेश किया, वैसे ही पता नहीं, किस मानवने मेरे ऊपर बाण छोड़ दिया। बाणसे हँसलीके टूट जानेपर मैं उसके भयके कारण आश्रमसे तुरंत भागा। पर उसने मेरा पीछा किया। असुर! मेरे पीठ-पीछे आ रहे 'रुको-रुको' कहनेवाले उस वीरके घोड़ेकी टापका महान् शब्द सुनायी पड़ रहा था। उसके भयसे मैं जलनिधि दक्षिण समुद्रमें आ गया॥ ३७—४०॥ |
| यावत्पश्यामि तत्रस्थान् नानावेषाकृतीन् नरान्।<br>केचिद् गर्जन्ति घनवत् प्रतिगर्जन्ति चापरे॥ ४१<br>अन्ये चोचुर्वयं नूनं निघ्नामो महिषासुरम्।<br>तारकं घातयामोऽद्य वदन्त्यन्ये सुतेजसः॥ ४२ | वहाँ मैंने अनेक प्रकारके पहनावे तथा आकृतिवाले मनुष्योंको देखा। उनमें कुछ तो बादलकी भाँति गर्जन कर रहे थे और कुछ दूसरे उसी प्रकारकी प्रतिध्वनि कर रहे थे। दूसरे कह रहे थे कि हम महिषासुरको निश्चय ही मार डालेंगे और अति तेजस्वी दूसरे लोग कह रहे थे कि आज हम तारकको मारेंगे। |
| तच्छ्रुत्वा सुतरां त्रासो मम जातोऽसुरेश्वर।<br>महार्णवं परित्यज्य पतितोऽस्मि भयातुरः॥ ४३<br>धरण्यां विवृतं गर्तं स मामन्वपतद् बली।<br>तद्भयात् सम्परित्यज्य हिरण्यपुरमात्मनः॥ ४४ | असुरेश्वर! उसे सुनकर मुझे बहुत डर हो गया और मैं विशाल समुद्रको छोड़कर भयभीत हो पृथ्वीके नीचे विस्तृत गड्ढे (सुरंग)-के रूपमें बने हुए गुप्त मार्गसे भागा। तब भी उस बलशालीने मेरा पीछा किया। उसके डरसे मैं अपना हिरण्यपुर त्यागकर |
६०- पुनः तेजःप्राप्तिके लिये शिवकी तपश्चर्या, केदारतीर्थ-की उपलब्धि, शिवका सरस्वतीमें निमग्न होना, मुरासुरका प्रसङ्ग और सनत्कुमारका प्रसङ्ग
| २६६ | श्रीवामनपुराण | [ अध्याय ५८ |
|---|
| तवान्तिकमनुप्राप्तः प्रसादं कर्तुमर्हसि।<br>तच्छ्रुत्वा चान्धको वाक्यं प्राह मेघस्वनं वचः॥ ४५ | आपके पास आ गया हूँ। आप मेरे ऊपर अनुग्रह कीजिये। यह बात सुनकर अन्धकने बादलकी गर्जनध्वनिमें यह वचन कहा—॥ ४१–४५॥ | | न भेतव्यं त्वया तस्मात् सत्यं गोप्ताऽस्मि दानव।<br>महिषस्तारकश्चोभौ बाणश्च बलिनां वरः॥ ४६<br>अनाख्यायैव ते वीरास्त्वन्धकं महिषादयः।<br>स्वपरिग्रहसंयुक्ता भूमिं युद्धाय निर्ययुः॥ ४७<br>यत्र ते दारुणाकारा गणाश्चक्रुर्महास्वनम्।<br>तत्र दैत्याः समाजग्मुः सायुधाः सबला मुने॥ ४८<br>दैत्यानापततो दृष्ट्वा कार्तिकेयगणास्ततः।<br>अभ्यद्रवन्त सहसा स चोग्रो मातृमण्डलः॥ ४९ | दानव! तुम्हें उससे डरना नहीं चाहिये। मैं तुम्हारा सच्चा रक्षक हूँ। उसके बाद महिष और तारक—ये दोनों तथा बलवानोंमें श्रेष्ठ बाण—ये सभी अन्धकसे बिना पूछे ही अपने अनुगामियोंके साथ युद्ध करनेके लिये पृथ्वीपर निकल आये। मुने! जिस स्थानपर भयंकर आकारवाले गण गर्जन कर रहे थे, उसी स्थानपर हथियारोंसे सजे-धजे दल-बलके साथ दैत्य भी आ गये। इसके बाद दैत्योंको आक्रमण करते हुए देखकर कार्तिकेयके गण तथा उग्र मातृकाएँ (उनपर) सहसा टूट पड़ीं॥ ४६–४९॥ | | तेषां पुरस्सरः स्थाणुः प्रगृह्य परिघं बली।<br>निषूदयत् परबलं क्रुद्धो रुद्रः पशूनिव॥ ५०<br>तं निघ्नन्तं महादेवं निरीक्ष्य कलशोदरः।<br>कुठारं पाणिनादाय हन्ति सर्वान् महासुरान्॥ ५१<br>ज्वालामुखो भयंकरः करेणादाय चासुरम्।<br>सरथं सगजं साश्वं विस्तृते वदनेऽक्षिपत्॥ ५२<br>दण्डकश्चापि संक्रुद्धः प्रासपाणिर्महासुरम्।<br>सवाहनं प्रक्षिपति समुत्पाट्य महार्णवे॥ ५३ | उन सबमें सबसे आगे बलशाली स्थाणु भगवान् लोहेकी बनी गदा लेकर क्रोधसे भरकर पशुओंके तुल्य शत्रुओंके सैन्य-बलका संहार करने लगे। असुरोंको मारते हुए महादेवजीको देखकर कलशोदर (भी) हाथमें कुल्हाड़ा लेकर सभी बड़े असुरोंका विनाश करने लगा। भय उत्पन्न कर देनेवाला ज्वालामुख रथ, हाथी और घोड़ोंके साथ असुरोंको हाथसे पकड़-पकड़कर अपने फैलाये हुए मुखमें झोंकने लगा। हाथमें बर्छी लिये हुए दण्डक भी क्रुद्ध होकर महासुरोंको उनके वाहनोंसहित उठाकर समुद्रमें फेंकने लगा॥ ५०–५३॥ | | शङ्कुकर्णश्च मुसली हलेनाकृष्य दानवान्।<br>संचूर्णयति मन्त्रीव राजानं प्रासभृद् वशी॥ ५४<br>खड्गचर्मधरो वीरः पुष्पदन्तो गणेश्वरः।<br>द्विधा त्रिधा च बहुधा चक्रे दैतेयदानवान्॥ ५५<br>पिङ्गलो दण्डमुद्यम्य यत्र यत्र प्रधावति।<br>तत्र तत्र प्रदृश्यन्ते राशयः शावदानवैः॥ ५६<br>सहस्रनयनः शूलं भ्रामयन् वै गणाग्रणीः।<br>निजघानासुरान् वीरः सवाजिसथकुञ्जरान्॥ ५७ | मुसल एवं प्रास लिये हुए जितेन्द्रिय शङ्कुकर्ण दानवोंको हलसे खींच-खींचकर इस प्रकार मटियामेट करने लगा, जैसे मन्त्री (अनाचारी-अविचारी) राजाको नष्ट करता जाता है। तलवार और ढाल धारण करनेवाला गणोंका स्वामी वीर पुष्पदन्त भी दैत्यों एवं दानवोंमें किसीको दो-दो, किसीको तीन-तीन टुकड़ोंमें काट डालता तथा किसी-किसीको तो अनेक खण्डोंमें कर डालता था। पिङ्गल दण्डको उठाकर जहाँ-जहाँ दौड़ता, वहाँ-वहाँ दैत्योंके शवका ढेर दिखलायी पड़ने लगता। गणोंमें श्रेष्ठ वीर सहस्रनयन शूल घुमाते हुए घोड़े, रथ और हाथियोंसहित असुरोंको मार रहा था॥ ५४–५७॥ | | भीमो भीमशिलावर्षैः स पुरस्सरतोऽसुरान्।<br>निजघान यथैवेन्द्रो वज्रवृष्ट्या नगोत्तमान्॥ ५८ | भीम भयङ्कर शिलाओंकी वर्षासे सामने आ रहे असुरोंको इस भाँति मार रहा था, जिस प्रकार इन्द्र वज्रकी वृष्टिसे उत्तम पर्वतोंको ध्वस्त करते हैं। |
अध्याय ५८ ] सेनापतिपदपर नियुक्त कार्तिकेयके लिये ऋषियोंद्वारा स्वस्त्ययन, महिषासुर-वध २६७
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| रौद्रः शकटचक्राक्षो गणः पञ्चशिखो बली।<br>भ्रामयन् मुद्गरं वेगान्निजघ्नान् बलाद् रिपून्॥ ५९<br><br>गिरिभेदी तलेनैव सारोहं कुञ्जरं रणे।<br>भस्म चक्रे महावेगो रथं च रथिना सह॥ ६०<br><br>नाडीजङ्घोऽङ्घ्रिपातैश्च मुष्टिभिर्जानुनाऽसुरान्।<br>कीलाभिर्वज्रतुल्याभिर्जघान बलवान् मुने॥ ६१ | भयङ्कर शकटचक्राक्ष और बलवान् पञ्चशिख नामक गण तेजीसे मुद्गर घुमाते हुए बलपूर्वक शत्रुओंका संहार कर रहे थे। प्रबल वेगवान् गिरिभेदी युद्धमें थप्पड़ोंके भीषण आघातसे ही सवारके साथ हाथीको एवं रथीके सहित रथको चूर्ण-विचूर्ण करने लगा। मुने! बलवान् नाडीजङ्घ पैरों, मुक्कों, घुटनों एवं वज्रके समान कोहनियोंके प्रहारसे असुरोंको मारने लगा॥ ५८—६१॥ |
| कूर्मग्रीवो ग्रीवयैव शिरसा चरणेन च।<br>लुण्ठनेन तथा दैत्यान् निजघान सवाहनान्॥ ६२<br><br>पिण्डारकस्तु तुण्डेन शृङ्गाभ्यां च कलिप्रिय।<br>विदारयति संग्रामे दानवान् समरोद्धतान्॥ ६३<br><br>ततस्तत्सैन्यमतुलं वध्यमानं गणेश्वरैः।<br>प्रदुद्रावाथ महिषस्तारकश्च गणाग्रणीः॥ ६४<br><br>ते हन्यमानाः प्रमथा दानवाभ्यां वरायुधैः।<br>परिवार्य समन्तात् ते युयुधुः कुपितास्तदा॥ ६५ | कूर्मग्रीव ग्रीवा, सिर एवं पैरोंके प्रहारोंसे तथा धक्का देकर वाहनोंके साथ दैत्योंको मारने लगा। नारदजी! पिण्डारक अपने मुख तथा दोनों सींगोंसे गर्वीले दानवोंको छिन्न-भिन्न करने लगा। इसके बाद गणेश्वरोंद्वारा उस असीम सेनाके दलोंको मारा जाता देख गणनायक महिष एवं तारक दौड़े। उन दोनों दानवोंद्वारा उत्तम-से-उत्तम आयुधोंसे संहारे जा रहे वे सभी प्रमथगण अधिक क्रुद्ध होकर चारों ओरसे घेरकर युद्ध करने लगे॥ ६२—६५॥ |
| हंसास्यः पट्टिशेनाथ जघान महिषासुरम्।<br>षोडशाक्षस्त्रिशूलेन शतशीर्षो वरासिना॥ ६६<br><br>श्रुतायुधस्तु गदया विशोको मुसलेन तु।<br>बन्धुदत्तस्तु शूलेन मूर्ध्नि दैत्यमताडयत्॥ ६७<br><br>तथान्यैः पार्षदैर्युद्धे शूलशक्त्युष्टिपट्टिशैः।<br>नाकम्पत् ताड्यमानोऽपि मैनाक इव पर्वतः॥ ६८<br><br>तारको भद्रकाल्या च तथोलूखलया रणे।<br>वध्यते चैकचूड़ाया दार्यते परमायुधैः॥ ६९ | हंसास्य पट्टिशसे, षोडशाक्ष त्रिशूलसे और शतशीर्ष श्रेष्ठ तलवारसे महिषासुरको मारने लगा। श्रुतायुधने गदासे, विशोकने मुसलसे तथा बन्धुदत्तने शूलसे उस दैत्यके मस्तकपर मारा। वैसे ही अन्य पार्षदोंद्वारा शूल, शक्ति, ऋष्टि एवं पट्टिशोंसे मार खाते रहनेपर भी वह मैनाकपर्वतके समान तनिक भी विकम्पित नहीं हुआ। रणमें भद्रकाली, उलूखला एवं एकचूड़ाने श्रेष्ठ आयुधोंसे तारकके ऊपर प्रहार किया॥ ६६—६९॥ |
| तौ ताड्यमानौ प्रमथैर्मातृभिश्च महासुरौ।<br>न क्षोभं जग्मतुर्वीरौ क्षोभयन्तौ गणानपि॥ ७०<br><br>महिषो गदया तूर्णं प्रहारैः प्रमथानथ।<br>पराजित्य पराधावत् कुमारं प्रति सायुधः॥ ७१<br><br>तमापतन्तं महिषं सुचक्राक्षो निरीक्ष्य हि।<br>चक्रमुद्यम्य संक्रुद्धो रुरोध दनुनन्दनम्॥ ७२<br><br>गदाचक्राङ्कितकरौ गणासुरमहारथौ।<br>अयुध्येतां तदा ब्रह्मन् लघु चित्रं च सुष्ठु च॥ ७३ | वे दोनों महान् असुर प्रमथों और मातृशक्तियोंसे मारे जाते हुए होनेपर भी (स्वयं) अक्षुब्ध रहकर गणोंको क्षुब्ध कर रहे थे। उसके बाद आयुधसहित महिषासुर गदाकी बार-बार मारसे प्रमथोंको शीघ्र पराजितकर कुमारकी ओर झपटा। उस महिषको झपटते देखकर अत्यन्त क्रुद्ध हुए सुचक्राक्षने चक्र उठाकर (उस) दनुनन्दनको (बीचमें ही) रोक दिया। ब्रह्मन्! हाथोंमें गदा और चक्र धारण किये हुए असुर और गण दोनों महारथी उस समय आपसमें कभी तेज, कभी अद्भुत, कभी निपुण (इस प्रकार विविध प्रकारकी) लड़ाई करने लगे॥ ७०—७३॥ |
| गदां मुमोच महिषः समाविध्य गणाय तु।<br>सुचक्राक्षो निजं चक्रममुत्ससर्जासुरं प्रति॥ ७४ | महिषने गदा घुमाकर सुचक्राक्षके ऊपर मारा और सुचक्राक्षने अपने चक्रको उस असुरकी ओर चलाया। |
| २६८ | श्रीवामनपुराण | [ अध्याय ५८ |
|---|
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| गदां छित्त्वा सुतीक्ष्णारं चक्रं महिषमाद्रवत् ।<br>तत उच्चुक्रुशुर्दैत्या हा हतो महिषस्त्विति ॥ ७५<br><br>तच्छ्रुत्वाऽभ्यद्रवद् बाणः प्रासमाविध्य वेगवान् ।<br>जघान चक्रं रक्ताक्षः पञ्चमुष्टिशतेन हि ॥ ७६<br><br>पञ्चबाहुशतेनापि सुचक्राक्षं बबन्ध सः।<br>बलवानपि बाणेन निष्प्रयत्नगतिः कृतः ॥ ७७ | अत्यन्त तीक्ष्ण अरोंसे युक्त वह चक्र गदाको टूक-टूक काट कर महिषके ऊपर चल पड़ा। उसके बाद दैत्यलोग यह कहते हुए जोरसे चिल्ला उठे कि हाय ! महिष मारा गया। उसे सुननेके बाद लाल-लाल आँखोंवाला बाणासुर प्रास लेकर वेगपूर्वक दौड़ा और पाँच सौ मुष्टियोंसे चक्रपर प्रहार किया तथा पाँच सौ बाहुओंसे सुचक्राक्षको बाँध लिया। बलवान् होते हुए भी सुचक्राक्ष बाणासुरके द्वारा प्रयत्नशून्य कर दिया गया॥ ७४-७७॥ |
| सुचक्राक्षं सचक्रं हि बद्धं बाणासुरेण हि ।<br>दृष्ट्वाद्रवद्गदापाणिर्मकराक्षो महाबलः ॥ ७८<br><br>गदया मूर्ध्नि बाणं हि निजघान महाबलः।<br>वेदनार्त्तो मुमोचाथ सुचक्राक्षं महासुरः।<br>स चापि तेन संयुक्तो व्रीडायुक्तो महामनाः ॥ ७९<br><br>स संग्रामं परित्यज्य सालिग्राममुपाययौ ।<br>बाणोऽपि मकराक्षेण ताडितोऽभूत्पराङ्मुखः ॥ ८०<br><br>प्रभज्यत बलं सर्वं दैत्यानां सुरतापस ।<br>ततः स्वबलमीक्ष्यैव प्रभग्नं तारको बली।<br>खड्गोद्यतकरो दैत्यः प्रदुद्राव गणेश्वरान् ॥ ८१ | फिर, बाणासुरके द्वारा सुचक्राक्षको चक्रसहित बँधा हुआ देखकर महाबली मकराक्ष हाथमें गदा लेकर दौड़ा। महाबली मकराक्षने गदासे बाणके मस्तकपर प्रहार किया। उसके बाद कष्टसे दुःखी बाणने सुचक्राक्षको छोड़ दिया और वह मनस्वी उससे छूटकर लज्जित होता हुआ युद्ध छोड़कर सालिग्रामके समीप चला गया। बाण भी मकराक्षसे चोट खाकर युद्धसे मुख मोड़ लिया। नारदजी! दैत्योंकी सारी सेना छिन्न-भिन्न हो गयी। उसके बाद अपनी सेनाको नष्ट हुआ देख बलवान् दैत्य तारक हाथमें तलवार लेकर गणेश्वरोंकी ओर दौड़ा॥ ७८-८१॥ |
| ततस्तु तेनाप्रतिमेन सासिना<br>ते हंसवक्त्रप्रमुखा गणेश्वराः।<br>समातरश्चापि पराजिता रणे<br>स्कन्दं भयार्त्ताः शरणं प्रपेदिरे ॥ ८२<br><br>भग्नान् गणान् वीक्ष्य महेश्वरात्मज-<br>स्तं तारकं सासिनमापतन्तम्।<br>दृष्ट्वैव शक्त्या हृदये बिभेद<br>स भिन्नमर्मा न्यपतत् पृथिव्याम् ॥ ८३<br><br>तस्मिन्हते भ्रातरि भग्नदर्पो<br>भयातुरोऽभून्महिषो महर्षे ।<br>संत्यज्य संग्रामशिरो दुरात्मा<br>जगाम शैलं स हिमाचलाख्यम् ॥ ८४<br><br>बाणेऽपि वीरे निहतेऽथ तारके<br>गते हिमाद्रिं महिषे भयार्त्ते ।<br>भयाद् विवेशोग्रमपां निधानं<br>गणैर्बले वध्यति सापराध ॥ ८५ | उसके बाद खड्ग धारण करनेवाले उस बेजोड़ वीरने उन मातृकाओंसहित हंसवक्त्र आदि गणेश्वरोंको हरा दिया। वे सभी डरकर स्कन्दकी शरणमें गये। महेश्वरके पुत्र कुमारने अपने गणोंको निरुत्साह तथा खड्गधारी तारकासुरको आते हुए देखकर शक्तिके प्रहारसे उसका हृदय विदीर्ण कर डाला। हृदय फट जानेके कारण वह पृथ्वीपर गिर पड़ा। महर्षे! उस भाईके मर जानेपर महिषासुरका अभिमान चूर हो गया। वह दुष्टात्मा डरसे व्याकुल होकर युद्धभूमिसे भागकर हिमालय पर्वतपर चला गया। वीर तारकके मारे जाने, डरकर महिषके हिमालयपर भाग जाने एवं गणोंद्वारा अपराधी सेनाका संहार किये जानेपर बाण भी डरके कारण अगाध समुद्रमें प्रवेश कर गया॥ ८२-८५॥ |
| हत्वा कुमारो रणमूर्ध्नि तारकं<br>प्रगृह्य शक्तिं महता जवेन।<br>मयूरमारुह्य शिखण्डमण्डितं<br>ययौ निहन्तुं महिषासुरस्य ॥ ८६ | युद्धभूमिमें तारकका संहार कर कुमारने शक्ति उठा ली और वे शिखण्डयुक्त मोरपर चढ़ गये। फिर अत्यन्त शीघ्रतासे महिषासुरको मारने चले। हाथमें श्रेष्ठ शक्ति लिये हुए मयूरध्वज (मोरछापकी पताकावाले) कार्तिकेयको |