वेदान्तसार (सदानन्द योगीन्द्र - विद्वन्मनोरञ्जनी व हिन्दी व्याख्या सहित)
Vedantasara of Sadananda with Hindi Commentary
सदानन्द योगीन्द्र द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
प्राज्ञ-ईश्वर निरूपण १६५ अनुवाद-उससमय ईश्वर और जीव ये दोनों चैतन्य से प्रदीप्त अत्यन्त सूक्ष्म अज्ञानरूप वृत्तियों द्वारा आनन्द का अनुभव करते हैं। “चेतोमुखी प्राज्ञ आनन्द को भोगता है।” इत्यादि श्रुति का (वचन यहाँ प्रमाण है)। मैं सुखपूर्वक सोया, मुझे (इस बीच) कुछ भी पता नहीं लगा' इत्यादि वाक्यों से सोकर उठने के बाद अपने पूर्वानुभूत सुख को अभिव्यक्त करता है। वन एवं वृक्ष अथवा जलाशय और जल इन दोनों समष्टिव्यष्टि के समान इन दोनों (समष्टिव्यष्टिरूप अज्ञानोपाधियों) में भी अभेद विद्यमान है। वन एवं वृक्ष से अवच्छिन्न (ढका हुआ) आकाश के समान अथवा जलाशय एवं जल में प्रतिबिम्बित आकाश के समान ही इन (समष्टि व्यष्टिगत अज्ञान की उपाधियों से) उपहित ईश्वर एवं प्राज्ञ में भी अभेद विद्यमान है। “यह (आत्मा) सबका स्वामी है” इत्यादि श्रुति का (कथन भी यहाँ प्रमाण है)। ‘चन्द्रिका'–इससे पूर्व के खण्ड में ग्रन्थकार ने कहा कि प्रलयकाल एवं सुषुप्ति अवस्था में ईश्वर एवं प्राज्ञ दोनों ही आत्मानन्द का अनुभव करते हैं तथा आनन्द का प्राचुर्य होने के कारण इसे 'आनन्दमयकोश' भी कहा जाता है, किन्तु इस प्रसङ्ग में एक शङ्का होती है कि जब प्रलय एवं सुषुप्ति अवस्था में न तो अन्तःकरण का अस्तित्व रहता है और न ही उसकी कोई वृत्ति विद्यमान रहती है, जिसके द्वारा ईश्वर अथवा प्राज्ञ आत्मानन्द का अनुभव कर सकें तो फिर भला ये दोनों इस अवस्था में आनन्द का अनुभव किसप्रकार करते हैं? इसी शङ्का के समाधान के लिए ग्रन्थकार ने प्रस्तुत खण्ड के प्रारम्भ में कहा कि ये दोनों शुद्धचैतन्य द्वारा प्रकाशित अज्ञान की अत्यधिक सूक्ष्म वृत्तियों द्वारा, प्रलयकाल एवं सुषुप्ति अवस्था में भी स्वरूपानन्द का अनुभव करते हैं। अतः इस विषय में शङ्का किया जाना उचित नहीं है। अपने कथ्य की पुष्टि में ग्रन्थकार ने माण्डूक्योपनिषद् के आनन्दभुक् इत्यादि श्रुतिवचन एवं 'सुखमहम स्वाप्सं' इत्यादि अनुभववाक्य उद्धृत किए हैं। वस्तुतः सुषुप्तिदशा में अथवा प्रलयकाल में बाह्यसाधनों अन्तःकरण आदि का अभाव होने के कारण, यद्यपि आत्मा को बाह्यविषयों का ज्ञान नहीं होता है, किन्तु ज्ञान, जीवात्मा का स्वाभाविकगुण होने के कारण उसे आनन्द का अनुभवरूप आन्तरिकज्ञान इस अवस्था में भी रहता है, क्योंकि आत्मा से ज्ञान को कभी भी, किसी भी अवस्था में उसीप्रकार अलग नहीं किया जा सकता है, जिसप्रकार अग्नि से उसकी उष्णता को किसी भी प्रकार पृथक् नहीं किया जा सकता है, आत्मा तो वस्तुतः चित्स्वरूप है।
१६६ वेदान्तसार वेदान्त के अनुसार- अज्ञान से उत्पन्न अन्तःकरण की वृत्तियों द्वारा ही जीव स्वप्न एवं जाग्रत अवस्था में अनुभूति एवं भोग आदि क्रियाओं को सम्पादित करता है। यद्यपि सुषुप्ति अवस्था में यह अन्तःकरण विपरीत क्रम में अपने कारणरूप अज्ञान में ही विलीन हो जाता है तथापि इस अवस्था में भी चैतन्य द्वारा प्रकाशित अज्ञान की सूक्ष्मातिसूक्ष्म वृत्तियाँ विद्यमान रहती हैं, जिनके द्वारा ईश्वर एवं प्राज्ञ अर्थात् जीव स्वरूपानन्द का अनुभव करते हैं। अतः यहाँ किसीप्रकार की विसंगति की परिकल्पना नहीं करनी चाहिए। तत्पश्चात् श्रुतिवचन एवं अनुभववाक्य को स्पष्ट करते हैं। 'चेतोमुखप्राज्ञ आनन्द का भोग करता है' यह श्रुतिवचन माण्डूक्योपनिषद् में आया है। यहाँ प्रयुक्त 'चेतोमुख' का विद्वन्मनोरञ्जनीकार ने-'चैतन्य प्रदीप्त अज्ञान वृत्तियों को ही मुख्यरूप से अपनाने वाला' अर्थ किया है। अर्थात् शुद्धचैतन्यब्रह्म के प्रकाश से प्रकाशित अज्ञानवृत्तिप्रधान समष्टि एवं व्यष्टिरूप ईश्वर एवं जीव सुषुप्ति-अवस्था एवं प्रलयकाल में भी आनन्द का अनुभव करते हैं। यहाँ प्रयुक्त आनन्दभुक् से अभिप्राय है-आनन्द का अनुभव करने वाला। 'प्राज्ञ' शब्द यहाँ ईश्वर एवं जीव दोनों अर्थों में प्रयुक्त माना जा सकता है। 'प्रकृष्टेन जानाति इति प्राज्ञः' इस व्युत्पत्ति के अनुसार इसका सर्वज्ञरूप ईश्वर अर्थ कर सकते हैं तथा 'प्रकर्षेण अज्ञः' इति प्राज्ञः इत्यादि व्युत्पत्ति के अनुसार प्रकृष्ट अज्ञानी अर्थात् जीव अर्थ भी ग्रहण किया जा सकता है। अतः दोनों अर्थों की संगति उचित है। यों भी ईश्वर और जीव दोनों ही सुषुप्ति अवस्था में आनन्द का अनुभव करते ही हैं। 'मैं सुखपूर्वक सोया, इस बीच मैं कुछ भी नहीं जान सका' इत्यादि अनुभववाक्य सर्वसाधारण द्वारा प्रतिदिन अनुभव में आता ही है। उस गहन निद्रा में जीव को यद्यपि अन्य बातों का ज्ञान नहीं था, किन्तु उस स्थिति में भी उसे इस बात का भान अवश्य था कि मैं आनन्द में हूँ, जिसे उसने सोकर उठने के बाद अभिव्यक्त किया। इससे सिद्ध होता है कि आत्मा अन्तःकरण के अभाव में भी आनन्द का अनुभव कर सकता है। प्रस्तुत खण्ड के द्वितीय अंश में ग्रन्थकार ने समष्टिव्यष्टिरूप अज्ञान एवं ईश्वर तथा प्राज्ञ की एकता का सोदाहरण प्रतिपादन किया है। तदनुसार समष्टिरूप अज्ञान से उपहित चैतन्य की 'ईश्वर' तथा व्यष्टिरूप अज्ञानों से उपहित चैतन्य की जीव अथवा 'प्राज्ञ' संज्ञा है। यद्यपि स्थूलदृष्टि से देखने पर ईश्वरगत समष्टिरूप अज्ञान तथा जीवगत व्यष्टिमूलक अज्ञान में भेद प्रतीत होता है, किन्तु यह वास्तविकभेद नहीं है, क्योंकि समष्टि-व्यष्टिरूप
प्राज्ञ-ईश्वर निरूपण १६७ उपर्युक्त दोनों प्रकार के अज्ञान वस्तुतः उसीप्रकार एक हैं, जिसप्रकार वनगत आकाश एवं वृक्षगत आकाश में भिन्नता प्रतीत होते हुए भी दोनों एक हैं। इन दोनों के ऐक्य को समझाने के लिए ग्रन्थकार अन्य उदाहरण देते हुए कहते हैं कि-जलाशय में प्रतिबिम्बित होने वाले आकाश एवं जल की एक बूँद में प्रतिबिम्बित होने वाले आकाश में तात्त्विकदृष्टि से कोई भेद नहीं है। ठीक उसीप्रकार ईश्वर स्थित समष्टिगत अज्ञान एवं जीवस्थित व्यष्टिगत अज्ञान में भी कोई वास्तविकभेद नहीं है। अतः इस दृष्टि से ईश्वर और प्राज्ञ में भी कोई भेद नहीं है। प्रतीत होने वाला भेद वस्तुतः वैसा ही है, जैसाकि स्वर्णपिण्ड एवं उससे बने कटक-कुण्डल आदि में होता है। जिसप्रकार स्वर्णरूप कारण तथा उससे बनाए गए कटककुण्डल आदि कार्य, दोनों में यद्यपि भिन्नता दिखायी देती है, किन्तु कार्यकारणरूप भेद को दूर करने पर यह भिन्नता समाप्त हो जाती है तथा दोनों स्थलों पर स्वर्णरूप ऐक्यभाव की प्रतीति होती है। ठीक उसीप्रकार समष्टिरूप ईश्वर में स्थित शुद्धसत्त्वप्रधान अज्ञान तथा व्यष्टिरूप जीव अथवा प्राज्ञ के मलिनसत्त्वप्रधान अज्ञान में से विशेषणरूप शुद्धसत्त्वप्रधान एवं मलिनसत्त्वप्रधान को हटा देने पर दोनों में शुद्धचैतन्यरूप परमब्रह्म ही विद्यमान रहता है। यही इन दोनों अर्थात् ईश्वर एवं जीव का ऐक्य है। जिसे ग्रन्थकार ने वनगत आकाश, वृक्षगत-आकाश तथा जलाशय में प्रतिबिम्ब आकाश तथा जल में प्रतिबिम्बित आकाश के ऐक्य द्वारा समझाने का प्रयास किया है। अपने इस कथन की पुष्टि में ग्रन्थकार माण्डूक्योपनिषद् के ‘एष सर्वेश्वर' इति वचन को प्रमाणरूप में उद्धृत करते हैं। जहाँ प्राज्ञ को ही सर्वेश्वर, सर्वज्ञ, अन्तर्यामी, सभी जीवों की उत्पत्ति एवं प्रलय का स्थान सभी का कारण बताया गया है- “एष सर्वेश्वरः एषः सर्वज्ञः एषः अन्तर्यामि, एष योनिः सर्वस्य प्रभवाप्ययौ हि भूतानाम्।” विशेष – (1) यहाँ प्रयुक्त ‘प्राज्ञ' शब्द चैतन्य की प्रधानता से ईश्वर एवं जीव दोनों अर्थों का वाचक है। शङ्कराचार्य ने ‘चेतोमुख' का ‘स्वप्न आदि अवस्था में अज्ञानरूप चेतना के प्रति द्वाररूप' अर्थ किया है। (2) वेदान्त ज्ञान को अन्तःकरण की स्थितिविशेष के रूप में मानता है। इनके अनुसार सांसारिक सुख एवं दुःख की अनुभूति भी एक मानसिक दशा ही है तथा अन्तःकरण की इस वृत्ति का उद्भव अज्ञान से होता है। सुषुप्ति की अवस्था में इन वृत्तियों का अज्ञान में विलय हो जाता है।
तुरीय निरूपण
१६८ वेदान्तसार (३) चैतन्य से प्रकाशित विलीन हुई ये अन्तःकरण की सूक्ष्मातिसूक्ष्म वृत्तियाँ ही कारणशरीर या सुषुप्ति अवस्था में ईश्वर एवं जीव को आनन्द का अनुभव कराने में सहायक होती हैं। (४) चैतन्य से आलोकित अज्ञान की ये वृत्तियाँ स्वप्न एवं जाग्रत अवस्था में अन्तःकरण के रूप में विकसित होती हैं, किन्तु सुषुप्ति अवस्था में इनका निर्माण नहीं होता, अपितु वहाँ ये बीज में वृक्ष के समान सूक्ष्मातिसूक्ष्मरूप में विद्यमान रहती हैं। (५) प्रस्तुत गद्यखण्ड के अभिप्राय को हम इसप्रकार भी प्रदर्शित कर सकते हैं- चित्र-३२ सुषुप्तिः अवस्थायाम् ↓ (क) एतौ ईश्वर-प्राज्ञौ चैतन्यदीप्ताभिः अतिसूक्ष्माभिः अज्ञान वृत्तिभिः आनन्दं अनुभवतः चित्र-३३ (ख) माया - समष्टिः व्यष्टिः -अविद्या ↓ ↓ वन वृक्ष ↓ ↓ वन से अवच्छिन्न आकाश अभेदः वृक्ष से अवच्छिन्न आकाश ↓ ↓ जलाशय जल ↓ ↓ जलाशय में प्रतिबिम्बित आकाश जल में प्रतिबिम्बित आकाश ↓ ↓ वत् (समान) वत् (समान) ↓ ↓ ईश्वरः प्राज्ञः विद्यते अवतरणिका- तदनन्तर ईश्वर एवं प्राज्ञ से भिन्न चतुर्थ शुद्धचैतन्य अथवा तुरीय के विषय में कहते हैं- वनवृक्षतदवच्छिन्नाकाशयोर्जलाशयजलतद्ग तप्रतिबिम्बाकाशयोर्वाधारभू तानुपहिताकाशवदनयोरज्ञानतदुपहितचैतन्ययोराधारभूतं यदनुपहितं चैतन्यं
तुरीय-निरूपण १६१ तत्तूरीयमित्युच्यते “शिवमद्वैतं चतुर्थं मन्यन्त” इत्यादिश्रुतेः। इदमेव तुरीयं शुद्धचैतन्यमज्ञानादितदुपहितचैतन्याभ्यां तप्तायः पिण्डवदविविक्तं सन्महावाक्यस्य वाच्यं विविक्तं सल्लक्ष्यमिति चोच्यते॥९॥ पदच्छेद-वन-वृक्ष-तद्-अवच्छिन्न-आकाशयोः जलाशय-जल- तद्गत- प्रतिबिम्ब- आकाशयोः वा आधारभूत-अनुपहित-आकाशवद् अनयोः अज्ञान तद् उपहित चैतन्ययोः आधारभूतम् यद् अनुपहितम् चैतन्यम्, तत् तुरीयम् इति उच्यते। “शिवम् अद्वैतम् चतुर्थम् मन्यते” इत्यादि श्रुतेः। इदम् एव तुरीयम् शुद्धचैतन्यम् अज्ञान-आदि, तद् उपहित चैतन्याभ्याम् तप्त-अयः पिण्डवद् अविविक्तम् सन् महावाक्यस्य वाच्यम्, विविक्तम् सत् लक्ष्यम् इति च उच्यते॥९॥ अनुवाद–वन में स्थित आकाश एवं वृक्ष में स्थित आकाश अथवा जलाशय एवं जल में प्रतिबिम्बित होने वाले दोनों आकाशों के आधार, उपाधिरहित महा आकाश के समान, समष्टिव्यष्टिगत इन दोनों अज्ञानों एवं इनकी उपाधियों से युक्त ईश्वर और प्राज्ञ दोनों चैतन्यों का आधार उपाधिरहित शुद्धचैतन्य है। वही 'तुरीय' इस नाम से भी कहा जाता है। 'अद्वैतब्रह्म को ही चतुर्थ मानते हैं' इत्यादि श्रुतिवचन (इसमें प्रमाण है)। यही 'तुरीय' उपाधिरहित शुद्धचैतन्य (ब्रह्म), अज्ञान आदि एवं उनकी उपाधि से युक्त दो चैतन्यों (ईश्वर और जीव) के साथ 'तप्त लोहपिण्ड के समान' जो एकत्वसूचक व्यवहार होता है। वही महावाक्य (तत्त्वमसि) का वाच्यार्थ है। जो अनेकत्व की विवक्षा होने पर (महावाक्य) का लक्ष्यार्थ इसीरूप में कहा जाता है। 'चन्द्रिका'–यहाँ तक वर्णित समष्टिगत अज्ञान, व्यष्टिगत अज्ञान एवं इन दोनों की उपाधियों से युक्त ईश्वर एवं प्राज्ञरूप चैतन्य, इन सभी का मुख्य आधार उपाधिरहित शुद्धचैतन्यरूप ब्रह्म को बताते हुए उदाहरण देकर समझाते हैं कि जिसप्रकार समष्टिरूप वन में स्थित अनेकवृक्षों से आच्छादित आकाश तथा व्यष्टिरूप वृक्ष के द्वारा आच्छादित आकाश, इसीप्रकार समष्टिरूप जलाशय में प्रतिबिम्बित आकाश एवं जल की व्यष्टि, एक बूँद में प्रतिबिम्बित आकाश, इन सभी का आधार समस्तप्रकार की उपाधियों से रहित महा आकाश है। ठीक उसीप्रकार समष्टिव्यष्टिगत अज्ञान एवं इन दोनों उपाधियों से विशिष्ट ईश्वर एवं प्राज्ञरूप चैतन्यों का एकमात्र आधार
१७० वेदान्तसार विशुद्धचैतन्य परंब्रह्म ही है। इसीको वेदान्त ने 'तुरीय' अर्थात् चतुर्थ संज्ञा प्रदान की है। परमविशुद्धचैतन्य को 'तुरीय' कहने पर विभिन्न आचार्यों ने अलग-अलग मत प्रस्तुत किए हैं। जैसे (1) शङ्कराचार्य के अनुसार प्राज्ञ, तेजस् और विश्व की अपेक्षा चतुर्थ होने के कारण इसे 'तुरीय' कहा जाता है। (2) सुषुप्ति, स्वप्न और जाग्रत इन तीन अवस्थाओं से भिन्न अर्थात् चतुर्थ होने के कारण इसे 'तुरीय' कहते हैं। (3) आपदेव ने अविद्या, ईश्वर और प्राज्ञ की अपेक्षा चतुर्थ होने से इसे 'तुरीय' माना है। प्रस्तुत ग्रन्थ में उक्त सभी का प्रतिपादन किया गया है। अतः इन सभी दृष्टियों से शुद्ध चैतन्य का 'तुरीय' नाम उचित ही है। इसी क्रम में अपने कथन की पुष्टि में ग्रन्थकार 'शिवम्' इत्यादि श्रुतिवचन प्रमाणरूप में प्रस्तुत करते हैं। 'शिव' शब्द यहाँ परंब्रह्म शुद्ध चैतन्य के लिए प्रयुक्त हुआ है। सभी वेदान्तशास्त्रों ने प्रायः विशुद्ध ब्रह्म अथवा अद्वैत ब्रह्म को ही चतुर्थ माना है। प्रस्तुत अंश के अभिप्राय को चित्र के माध्यम से सरलतापूर्वक समझा जा सकता है- चित्र-३४ यथा वन से वृक्ष से अवच्छिन्न आकाश आधारभूत महाकाश जलाशय में प्रतिबिम्बित आकाश जल में तथैव समष्टि विषयक अज्ञान आधारभूत शुद्ध ब्रह्म व्यष्टि विषयक अज्ञान तदुपहित ईश्वर जीव तदुपहित चैतन्य चैतन्य चतुर्थ-तुरीय-चतुर्थ तत्पश्चात् प्रस्तुत खण्ड के द्वितीय अंश को स्पष्ट करते हैं-
तुरीय-निरूपण १७१ जैसाकि अनुबन्धचतुष्टय में विषय नामक अनुबन्ध का प्रतिपादन करते हुए ग्रन्थकार ने कहा कि जीव और ब्रह्म की एकता प्रतिपादित करना ही इस ग्रन्थ का विषय है-'विषयो जीवब्रह्मैक्यं शुद्धचैतन्यं प्रमेयं तत्रैव वेदान्तानां तात्पर्यात्।' किन्तु अज्ञान की समष्टिव्यष्टि के विवेचन में मुख्य प्रतिपाद्यविषय कहीं विस्मृत न हो जाए, इस दृष्टि से ग्रन्थकार प्रस्तुत गद्यखण्ड में विशुद्धसत्त्वप्रधान अज्ञान से आच्छादित समष्टिरूप ईश्वर एवं मलिनसत्त्वप्रधान अज्ञान से आच्छादित व्यष्टिरूप जीव या प्राज्ञरूप चैतन्य तथा तुरीयरूप विशुद्धचैतन्य, परमब्रह्म ये तीनों तात्त्विकदृष्टि से एक हैं, क्योंकि इन तीनों में चैतन्य समानरूप से विद्यमान है। ऐसा कहकर ब्रह्म और जीव की एकता प्रतिपादित करते हैं। इसी अभिप्राय को समझाने के लिए ग्रन्थकार 'तप्तायः पिण्ड' का उदाहरण प्रस्तुत करते हैं। किसी लोहे के टुकड़े को आग में गर्म करके पूरी तरह लाल कर लेते हैं। इस स्थिति में लोहे के भार आदि पार्थिव अंश के विद्यमान रहते हुए भी इसमें अग्नि के गुण दाहकता आदि से युक्त होने के कारण, इसे हम आग का गोला भी कहते हैं, किन्तु उससे जलने पर 'लोहे के टुकड़े से जल गया' इसप्रकार व्यवहार करते हैं। यहाँ अग्नि लोहे में व्याप्यव्यापकभाव से विद्यमान होने से दोनों की अभिन्नता का प्रतिपादन वाच्यार्थ होगा। प्रस्तुत अंश के अभिप्राय एवं ग्रन्थ के अन्त में प्रतिपादित महावाक्यों के आशय को समझने के लिए हमें पहले तीन शब्दशक्तियों को समझना होगा-(1) अभिधा (2) लक्षणा और (3) व्यञ्जना। इनमें अभिधा-शब्द के साक्षात् संकेतित अर्थ को कहती है। जैसे- गङ्गायां घोषः उदाहरण में इसका साक्षात् संकेतित अर्थ है-'जल प्रवाह में बस्ती' (घोष)। यह संकेतित अर्थ मुख्यार्थ या वाच्यार्थ कहलाएगा; जिसका प्रतिपादन अभिधा शब्दशक्ति के माध्यम से किया जाता है। मुख्य अर्थ का बाध होने पर रूढ़ि अथवा प्रयोजन द्वारा लक्षणा शब्द शक्ति अन्य अर्थ की प्रतीति कराती है, जिसे लक्ष्यार्थ कहा जाता है। जैसे-उपर्युक्त उदाहरण 'गङ्गायां घोषः' में बस्ती का जलप्रवाह में रहना असम्भव होने से मुख्यार्थबाध हुआ। अतः प्रयोजनवश लक्षणा शब्दशक्ति द्वारा हमें तत्सम्बद्ध अन्य 'तट' रूप अर्थ की प्रतीति होती है तथा यह तटरूप अर्थ ही लक्ष्यार्थ कहलाता है। तत्पश्चात् व्यञ्जना शब्दशक्ति द्वारा उस बस्ती में शीतत्व पावनत्व की प्रतीति करायी जाती है। यह शीतत्व पावनत्व रूप अर्थ व्यङ्ग्यार्थ कहलाएगा। 'तपे हुए लोहे के टुकड़े' (तप्तायः पिण्ड) रूप प्रस्तुत उदाहरण में दाहकता अग्नि का धर्म है जो लोहे के टुकड़े में समा गया है। इसलिए
१७२ वेदान्तसार लोहपिण्ड और अग्नि इन दोनों की अभिन्नता यहाँ वाच्यार्थ मानी जाएगी, जिसकी प्रतीति में अभिधा शब्दशक्ति सहायक होती है। जबकि यहाँ ‘अयः पिण्ड’ द्वारा अपने से सम्बद्ध अग्नि का लक्षणा शब्दशक्ति द्वारा बोध कराया जाता है। अतः लोहपिण्ड एवं अग्नि में भिन्नता की प्रतीति का लक्षणा शब्दशक्ति द्वारा बोध कराया जाता है। अतः लोहपिण्ड और अग्नि में भिन्नता की प्रतीति लक्षणा शब्दशक्ति द्वारा होगी तथा इन दोनों की यह भिन्नता ही यहाँ लक्ष्यार्थ कहलाएगी। ठीक इसीप्रकार तत्त्वमसि इत्यादि महाकाव्य में अज्ञानोपहित चैतन्य एवं तुरीयरूप चैतन्य में अभिन्नता का प्रतिपादन वाच्यार्थ होगा तथा इन दोनों की भिन्नता की प्रतीति कराना ही यहाँ लक्ष्यार्थ कहलाएगा, जिसकी प्रतीति कराने में लक्षणा शब्दशक्ति सहायक होगी। ग्रन्थ के अन्त में प्रतिपादित महावाक्यों ‘तत्त्वमसि’ इत्यादि में इन तीनों की इस एकता का प्रतिपादन ही वाच्यार्थरूप में किया गया है। इसके अतिरिक्त ईश्वर एवं प्राज्ञरूप चैतन्य की अपेक्षा विशुद्धचैतन्य की भिन्नता का प्रतिपादन ही इस महावाक्य या महावाक्यों का लक्ष्यार्थ माना जाएगा। विशेष-(1) साहित्यदर्पणकार ने लक्षणा का लक्षण इसप्रकार किया है- “मुख्यार्थबाधे तद्युक्तो ययाऽन्योऽर्थः प्रतीयते। रूढेः प्रयोजनाद्वासौ लक्षणाशक्तिरर्पिता।।” (2) तुरीय-चतुर+छ (चतुरश्छयतावाद्याक्षर लोपश्च) वार्तिक से च लोप। (3) प्रस्तुत खण्ड के अभिप्राय को इसप्रकार भी प्रदर्शित किया जा सकता है-
चित्र-३५
विशुद्ध सत्त्वप्रधान अज्ञान शुद्ध चैतन्य मलिन सत्त्वप्रधान अज्ञान
से उपहित समष्टि से उपहित व्यष्टि
| |
ईश्वर ―――― तत् तुरीय त्वम् ―――― जीव
(चतुर्थ)
┌─────────────────┐ ┌─────────────────┐
│ अभिन्नता की प्रतीति │ तत्त्वमसि │ भिन्नता की प्रतीति │
└────────┬────────┘ ↓ └────────┬────────┘
(वाच्यार्थ) व्याप्यव्यापकभाव (लक्ष्यार्थ)
┌────────┴────────┐ ↓ ┌────────┴────────┐
│ अभिन्नता की प्रतीति │ (लोहपिण्ड) │ भिन्नता की प्रतीति │
└─────────────────┘ ↓ └─────────────────┘
(अग्नि)
शक्तिद्वय-निरूपण (आवरण व विक्षेप शक्ति)
शक्तिद्वय-निरूपण १७३ अवतरणिका-तुरीय अर्थात् शुद्धचैतन्य की विशेषताओं का कथन करने के पश्चात् ग्रन्थकार अज्ञान की आवरण एवं विक्षेप नामक दो शक्तियों का सोदाहरण उल्लेख करते हैं- अस्याज्ञानस्यावरणविक्षेपनामकमस्ति शक्तिद्वयम्। आवरण शक्तिस्तावदल्पोऽपि मेघोऽनेकयोजनायतमादित्यमण्डलमवलोकयितृनयन- पथपिधायकतया यथाच्छादयतीव तथाज्ञानं परिच्छिन्नमप्यात्मानम- परिच्छिन्नमसंसारिणमवलोकयितृबुद्धिपिधायकतयाच्छादयतीव तादृशं सामर्थ्यम्। तदुक्तम्- “घनच्छन्नदृष्टिर्घनच्छन्नमर्कं यथा मन्यते निष्प्रभं चातिमूढः। तथा बद्धवद्भाति यो मूढदृष्टेः स नित्योपलब्धिस्वरूपोऽहमात्मा” इति॥ पदच्छेद- अज्ञानस्य आवरण-विक्षेपनामकम् अस्ति शक्तिद्वयम्। आवरणशक्तिः तावत् अल्पः अपि मेघः अनेकयोजन-आयतम् आदित्यमण्डलम्-अवलोकयितृ-नयनपथ-पिधायकतया यथा आच्छादयति इव, तथा अज्ञानम् परिच्छिन्नाम् अपि आत्मानम् अपरिच्छिन्नम् असंसारिणम् अवलोकयितृ-बुद्धिपिधायकतया आच्छादयति इव, तादृशम् सामर्थ्यम्। तद् उक्तम्- अन्वय-यथा घनच्छन्नदृष्टिः अतिमूढः (जनः) घनच्छन्नम् अर्कम् निष्प्रभम् च मन्यते, तथा मूढदृष्टेः यः (आत्मा) बद्धवत् भाति, नित्योपलब्धिस्वरूपः सः आत्मा अहम् (इति कथ्यते) अनुवाद-आवरण और विक्षेप नामक अज्ञान की दो शक्तियाँ हैं। जिसप्रकार छोटा सा बादल का टुकड़ा भी दर्शन के दृष्टिपथ को ढककर अनेक योजन तक फैले हुए सूर्यमण्डल को आच्छादित-सा कर देता है, उसीप्रकार सीमित अज्ञान भी असीम और असांसारिक आत्मा को देखने वाले की बुद्धि को आच्छादित करके मानो ढक देता है। (यह) आवरण शक्ति तो उसप्रकार की सामर्थ्य से युक्त है। इसलिए कहा गया है- “जिसप्रकार मेघ से आच्छन्न दृष्टिवाला अत्यन्त मूर्ख व्यक्ति, बादल से ढके हुए सूर्य को प्रकाशरहित मानता है। उसीप्रकार मूढ़ सामान्यदृष्टि वालों को जो आत्मा (जन्म मरणादि बन्धनों से) बँधा हुआ-सा प्रतीत होता है, ऐसा नित्य एवं ज्ञानस्वरूप वह आत्मा अहम् (इसप्रकार कहा गया) है।
१७४ वेदान्तसार 'चन्द्रिका'- जिस अज्ञान के स्वरूप एवं समष्टिव्यष्टिविषयक दो भेदों का अभी तक उल्लेख किया गया है। उसकी आवरण एवं विक्षेप नामक दो शक्तियाँ होती हैं। इसमें आवरणशक्ति द्रष्टा की दृष्टि के आगे एक आवरण डाल देती है। इससे देखने वाला सामने स्थित वस्तु के स्वरूप को नहीं देख पाता है। इसे अत्यन्त सुन्दर उदाहरण द्वारा समझाते हैं- जैसे-आकाश में बादल का एक छोटा-सा टुकड़ा अनेक योजन विस्तार वाले सूर्य के सामने आकर उसे आच्छादित कर लेता है। जिसे देखकर सामान्यतया व्यक्ति यही अनुमान लगाता है कि बादल ने सूर्य को ढक लिया है, जबकि वास्तव में यह पूर्णतया असम्भव है, क्योंकि करोड़ों योजन विस्तार वाला सूर्य किसी भी स्थिति में बादल द्वारा आच्छादित नहीं किया जा सकता है। ठीक उसीप्रकार सीमित अज्ञान भी अपनी आवरण नामक शक्तिविशेष द्वारा जिसकी कोई सीमा नहीं है अर्थात् निस्सीम, जिसका कभी जन्म नहीं होता अर्थात् अजन्मा, सांसारिक समस्तवस्तुओं से भिन्न आत्मा को आवृत सा कर लेता है। इसकारण सामान्य बुद्धिवाला व्यक्ति आत्मा को देख नहीं पाता है। वास्तव में आत्मा नित्योपलब्धि स्वरूप वाला, सच्चिदानन्द है, देश, काल आदि की सीमाओं से परे है। अतः किसी भी वस्तु द्वारा उसे ढकना पूर्णरूप से असम्भव है। इसके अतिरिक्त उसे कभी भी संसार का कोई बन्धन बांधने में समर्थ नहीं है, किन्तु अज्ञानी व्यक्ति उसे बंधा हुआ सा मानता है। वस्तुतः आत्मा के वास्तविक स्वरूप को ढकने में अज्ञान की आवरण शक्ति ही महत्त्वपूर्ण भूमिका निर्वाह करती है। अपने कथन की पुष्टि में ग्रन्थकार 'घनच्छन्नदृष्टि' इत्यादि कारिका को उद्धृत करते हैं। इस कारिका का भी यही अभिप्राय है जो उक्त गद्यखण्ड में प्रतिपादित किया गया है- जिसप्रकार किसी छोटे से बादल के टुकड़े से आच्छन्नदृष्टि वाला मूर्खबुद्धि व्यक्ति यह समझता है कि बादल ने सूर्य को ढक लिया इस कारण सूर्य प्रकाशरहित हो गया। इसलिए सर्वत्र अंधकार का साम्राज्य हो गया। ठीक उसीप्रकार मूढ़बुद्धि अज्ञानीजन नित्य, सच्चिदानन्दस्वरूप आत्मा को जन्म-मरण आदि अनेक बन्धनों में आबद्ध मान लेते हैं। जबकि वास्तविकता यह है कि यह आत्मा नित्य, शुद्धबुद्ध एवं प्रकाशक है। इसकी कोई सीमा नहीं है। यह स्थान एवं समय की सीमाओं से परे है। इसे दैनिक व्यवहार में लोग 'अहम्' इस शब्द द्वारा प्रयोग करते हैं।
शक्तिद्वय-निरूपण १७५ विशेष-(1) अज्ञान की दो शक्तियों का उल्लेख किया गया- आवरण एवं विक्षेप। (2) प्रस्तुत गद्यखण्ड में केवल 'आवरण' शक्ति को उदाहरण देकर समझाया गया है। (3) यहाँ प्रदत्त उदाहरण अत्यन्त सटीक है। मेघखण्ड अज्ञान का प्रतीक है तथा तेजस्वी सूर्य तेजोरूपं आत्मा को संकेतित करता है। (4) प्रस्तुत गद्यखण्ड में प्रयुक्त 'इव' आभासरूप अर्थ की अभिव्यक्ति के लिए प्रयुक्त हुआ है। अभिप्राय यह है कि सूर्य वस्तुतः ढकता नहीं है, अपितु ढका हुआ सा प्रतीत होता है। वैसा ही आत्मा के विषय में भी मानना चाहिए। (5) हस्तामलक नामक ग्रन्थ में आई हुई प्रस्तुत कारिका में प्रयुक्त 'बद्धवत् भाति' पद भी इसी अभिप्राय को अभिव्यक्त करता है, क्योंकि वेदान्त की दृष्टि में आत्मा का बन्धन अथवा मोक्ष सम्भव नहीं है। यह तो केवल आभासमात्र है, रस्सी में सर्प के समान अथवा सीप में चांदी के समान। (6) अज्ञान की आवरणशक्ति को समझाने के लिए मेघखण्ड एवं सूर्य का प्रस्तुत उदाहरण सम्पूर्ण दार्शनिकजगत् में अत्यन्त लोकप्रिय हुआ है। (7) प्रस्तुत अंश के अभिप्राय को इसप्रकार भी प्रदर्शित कर सकते हैं- चित्र-३६ अज्ञान/माया की शक्ति द्वय आवरण (आच्छादन) विक्षेप (उद्भावन) (सत्य को आवृत करना) (सत् में असत् की उद्भावना) ↓ ↓ (आत्मतत्त्व/ब्रह्म को आवृत करना) यथा ↓ ↓ (रज्जु में सर्पप्रतीति) (मेघखण्ड द्वारा सूर्य को ── उदाहरण ढकने के समान (सीप में चाँदी का आभास) (रज्जु एवं सीप के एतद्विषयक चित्र-३७ (ब्रह्म में सम्पूर्ण नाम रूपात्मक ज्ञान को आच्छादित करना जगत् की प्रतीति सूर्य ← मेघखण्ड द्रष्टा ──रस्सी (सर्पोऽयम्)
१७६ वेदान्तसार अवतरणिका-इसी प्रसङ्ग को आगे स्पष्ट करते हुए विक्षेप शक्ति के कार्य को प्रदर्शित करते हैं- अनयैवावरणशक्त्यावच्छिन्नस्यात्मनः कर्तृत्वभोक्तृत्वसुखदुःख- मोहात्मकतुच्छसंसारभावनापि सम्भाव्यते यथा स्वाज्ञानेनावृतायां रज्ज्वां सर्पत्वसम्भावना। विक्षेपशक्तिस्तु यथा रज्जुज्ञानं स्वावृतरज्जौ स्वशक्त्या सर्पादिकमुद्भावयत्येवमज्ञानमपि स्वावृतात्मनि विक्षेपशक्त्याकाशादि- प्रपञ्चमुद्भावयति तादृशं सामर्थ्यम्। तदुक्तम्- "विक्षेपशक्तिर्लिङ्गादि ब्रह्माण्डान्तं जगत्सृजेद्” त्ति॥१०॥ पदच्छेद- अनया एव आवरणशक्त्या अवच्छिन्नस्य आत्मनः कर्तृत्व भोक्तृत्व सुख-दुःख-मोहात्मक-तुच्छसंसारभावना अपि सम्भाव्यते, यथा-स्व अज्ञानेन आवृतायाम् रज्ज्वाम् सर्पत्व सम्भावना। विक्षेपशक्तिः तु यथा रज्जु-अज्ञानम् स्व-आवृतारज्जौ स्वशक्त्या सर्पादिकम् उद्भावयति। एवम् अज्ञानम् अपि स्व-आवृत-आत्मनि-विक्षेप शक्त्या आकाशादि-प्रपञ्चम् उद्भावयति, तादृशम् सामर्थ्यम्। तद् उक्तम्- "विक्षेपशक्तिः लिङ्गादि ब्रह्माण्ड-अन्तम् जगत् सृजेद् इति ।।10।। अनुवाद-इसी आवरणशक्ति द्वारा आच्छादित आत्मा की कर्तृत्व, भोक्तृत्व, सांसारिक सुख-दुःख-मोहात्मकता-विषयक तुच्छभावना भी अपने अज्ञान से आच्छादित रस्सी में सर्पत्व की सम्भावना के समान आरोपित होती है। विक्षेपशक्ति तो वैसी ही सामर्थ्यसम्पन्न है, जिसप्रकार रस्सी विषयक अज्ञान अपनी शक्ति द्वारा आवृत रस्सी में सर्प आदि की उद्भावना करता है। उसीप्रकार (आत्मविषयक) अज्ञान भी अपनी विक्षेपशक्ति द्वारा आवृत आत्मा में (सूक्ष्मशरीर से लेकर ब्रह्माण्डपर्यन्त) आकाश आदि प्रपञ्च को उद्भावित कर देता है। इसीलिए कहा गया है-"विक्षेपशक्ति ही सूक्ष्मशरीर आदि सृष्टि से लेकर ब्रह्माण्डपर्यन्त संसार का सृजन करती है।" 'चन्द्रिका'-तत्पश्चात् अज्ञान की प्रथम 'आवरण' नामक शक्ति के अन्य कार्य को कहते हैं-अज्ञान की इसी आवरणशक्ति से युक्त शुद्ध चैतन्यरूप आत्मा अपने आपको नामरूपात्मक संसार के भोगादिविषयों का कर्ता, भोक्ता तथा उनसे प्राप्त होने वाले सुख एवं दुःख आदि को अनुभव करके स्वयं को भी सुखी दुःखी आदि मानने लगता है। जबकि वास्तविक-
शक्तिद्वय-निरूपण १७७ रूप में ये सुख-दुःख आदि आत्मा के धर्म होते ही नहीं हैं। ये तो वस्तुतः शरीर के धर्म हैं। आत्मा इनसे लिप्त नहीं होता है। अज्ञान की आवरणशक्ति आत्मा से इसी वस्तुस्थिति को छिपा लेती है। वेदान्त की दृष्टि में एकमात्र ब्रह्म अथवा आत्मसत्त्व ही सत् है, सम्पूर्ण नामरूपात्मक जगत् मिथ्या है, फिर भी वास्तविकता का ज्ञान न होने से अज्ञानी लोगों की सांसारिकबुद्धि बनी रहती है। इस बुद्धि का एकमात्र कारण यहाँ अज्ञान को बताया गया है, क्योंकि इसकी 'आवरण' नामक शक्ति वस्तुतः वस्तुस्थिति को आच्छादित कर लेती है। तत्पश्चात् अज्ञान की दूसरी शक्ति 'विक्षेप' के विषय में कहते हैं। जब हम अपने सामने पड़ी हुई रस्सी को अन्धकार आदि के कारण सर्प समझ बैठते हैं, तब रस्सीविषयक अज्ञान पहले अपनी 'आवरण' नामक शक्ति से रस्सी के रस्सी होना रूप ज्ञान को आवृत करता है। तत्पश्चात् वही अज्ञान 'विक्षेप' नामक अपनी दूसरी शक्ति से उसी रस्सी में सर्पत्व की उद्भावना कर देता है और वही रस्सी हमें रस्सी होते हुए भी सर्प प्रतीत होने लगती है। यही अज्ञान की विक्षेपशक्ति का विक्षेपत्व है। ठीक उसीप्रकार आत्मविषयक अज्ञान पहले अपनी आवरण नामक शक्ति के सामर्थ्य से नित्य, शुद्ध, बुद्ध, सच्चिदानन्दस्वरूप आत्मा के वास्तविकस्वरूप को ढक देता है। पुनः वही अज्ञान अपनी दूसरी शक्ति 'विक्षेप' का प्रयोग करके सूक्ष्मशरीर से लेकर ब्रह्माण्डपर्यन्त आकाश आदि सम्पूर्णप्रपञ्चरूप तुच्छ स्थूलसृष्टि की उद्भावना कर देता है। इसप्रकार उद्भावित यह स्थावरपर्यन्त सम्पूर्ण नामरूपात्मकसंसार वस्तुतः अज्ञान की विक्षेपशक्ति का ही प्रभाव है, जो वस्तुतः विनाशशील है। सीप में चांदी की प्रतीति तथा रज्जु में सर्प की भ्रान्ति के समान जो वस्तुतः मिथ्या है। अपने कथन की पुष्टि में ग्रन्थकार श्रुतिवचन उद्धृत करते हुए कहते हैं कि प्राचीन शास्त्रों में भी आत्मज्ञानी आचार्यों ने कहा है-कि अज्ञान की द्वितीय विक्षेपशक्ति ही लिङ्गशरीर (जिसे वेदान्त सूक्ष्मशरीर भी कहता है) सहित सम्पूर्णसृष्टि से लेकर ब्रह्माण्डपर्यन्त स्थूलसृष्टिरूप दृश्यमान सम्पूर्ण संसार की संरचना करती है। विशेष-(1) ग्रन्थकार की शैली की विशेषता है कि वह अपने कथन की पुष्टि में श्रुति, स्मृति अथवा प्राचीन आचार्य आदि द्वारा कहे गये वचनों
कारण-निरूपण
१७८ वेदान्तसार को प्रमाणरूप में प्रस्तुत करते हैं। उपर्युक्त गद्यखण्ड के अन्त में उन्होंने दृग्दृश्यविवेक के वचनों को अपने कथन की पुष्टि के लिए प्रयुक्त किया है। (2) ग्रन्थकार ने प्रस्तुत खण्ड के पूर्व अंश में सांसारिकभावना को तुच्छ बताया है। वेदान्त वस्तुतः दृश्यमान सम्पूर्णजगत् को यों भी मिथ्या कहकर उसकी तुच्छता का प्रतिपादन करता ही है। उसकी दृष्टि में ब्रह्म ही एकमात्र सत् (एवं उत्कृष्ट वस्तु है)। (3) अज्ञान की आवरण एवं विक्षेप नामक दो महत्त्वपूर्ण शक्तियों का अत्यन्त सुन्दर एवं सरलशैली में विवेचन किया गया है। अवतरणिका-यहाँ तक अज्ञान एवं उसकी शक्तिद्वय का विवेचन करने के पश्चात् सोदाहरण अज्ञानोपहितचैतन्य को ही सूक्ष्म एवं स्थूलसृष्टि का उपादान एवं निमित्त दोनों कारण बताते हैं- शक्तिद्वयवदज्ञानोपहितं चैतन्यं स्वप्रधानतया निमित्तं स्वोपाधिप्रधानतयोपादानं च भवति। यथा लूता तन्तुकार्यं प्रति स्वप्रधानतया निमित्तं स्वशरीरप्रधानतयोपादानं च भवति॥१९॥ पदच्छेद-शक्तिद्वयवद् अज्ञान-उपहितम् चैतन्यम् स्वप्रधानतया निमित्तम्, स्व-उपाधिप्रधानतया उपादानम् च भवति। यथा लूता तन्तुकार्यम् प्रति स्वप्रधानतया निमित्तम्, स्वशरीरप्रधानतया उपादानम् च भवति॥11॥ अनुवाद-दो शक्तियों से युक्त अज्ञान से उपहित चैतन्य (सम्पूर्ण जगत् प्रपञ्च का) अपनी प्रधानता के कारण निमित्तकारण एवं अपनी उपाधि की प्रधानता से उपादानकारण होता है। जिसप्रकार मकड़ी (अपने) तन्तुरूप कार्य के प्रति अपने (चैतन्य की) प्रधानता के कारण निमित्तकारण तथा अपने शरीर की प्रधानता से उपादानकारण होती है। 'चन्द्रिका'-प्रस्तुत गद्यखण्ड आकार में छोटा होते हुए भी जहाँ एक ओर अपने में गम्भीर अर्थ को संजोए हुए है, वहीं 'आवरण' एवं 'विक्षेप' नामक दो महत्त्वपूर्ण शक्तियों से युक्त अज्ञान से उपहित चैतन्य सूक्ष्मशरीर से लेकर ब्रह्माण्डपर्यन्त दृश्यमान सम्पूर्ण जगत्प्रपञ्च का उपादान और निमित्तकारण दोनो है' इत्यादि वेदान्त के महत्त्वपूर्ण सिद्धान्त का प्रतिपादन करता है। वस्तुतः प्रस्तुत खण्ड के अभिप्राय को समझने से पूर्व हमें उपादान और निमित्तकारण इन दोनों को समझना होगा। किसी भी वस्तु के निर्माण में इन
कारण-निरूपण १७९ दो कारणों की महत्त्वपूर्ण भूमिका होती है। इनमें से एक के भी अभाव में किसी भी वस्तु का निर्माण असम्भव है। उपादान एवं निमित्तकारण इन दोनों को हम घड़े के उदाहरण द्वारा भलीप्रकार समझ सकते हैं। घड़े के निर्माण में हमें मिट्टी की आवश्यकता होती है, जो उसके निर्माण की स्थूल एवं अनिवार्य सामग्री है। अतः मिट्टी घड़े का उपादानकारण कहलाएगी। न्याय की दृष्टि में यही समवायीकारण भी कहलाता है, क्योंकि मिट्टी घड़े के साथ समवायसम्बन्ध से विद्यमान रहती है। दूसरा, निमित्तकारण है जो वस्तु की संरचना में महत्त्वपूर्ण भूमिका निर्वाह करता है। घड़े के निर्माण में दण्ड, चक्र, चीवर और कुम्हार ये सभी निमित्तकारण कहलाएंगे, क्योंकि इनमें से एक के भी अभाव में घटनिर्माण असम्भव है। सामान्यरूप से ये दोनों कारण अलग-अलग स्थानों पर विद्यमान रहते हैं अर्थात् इनकी पृथक् सत्ता रहती है, किन्तु वेदान्त सृष्टि- प्रक्रिया में इन दोनों की स्थिति एक ही स्थान पर मानते हुए कहता है कि- जिसप्रकार एक मकड़ी अपने जालानिर्माणरूप कार्य के प्रति अपने शरीर के चैतन्य की प्रधानता के कारण निमित्तकारण है तथा अपने शरीर से निकलने वाले लारवे की प्रधानता की दृष्टि से उपादानकारण भी होती है। ठीक उसीप्रकार अज्ञान से उपहित आत्मा अपने चैतन्य की प्रधानता होने से दृश्यमान सांसारिकप्रपञ्च का निमित्तकारण तथा अज्ञान की प्रधानता के समय उपादानकारण होता है। क्योंकि मकड़ी का शरीर चैतन्य के अभाव में जाल बनाने में असमर्थ होता है। साथ ही केवल चैतन्य होने पर शरीर के न होने पर भी जाल नहीं बनाया जा सकता है। इस दृष्टि से एक ही मकड़ी शरीर की प्रधानता होने पर जालेरूप कार्य के लिए उपादानकारण तथा चैतन्य की प्रधानता होने पर निमित्तकारण हो जाती है। ठीक उसीप्रकार सृष्टिरूपकार्य के प्रति आवरण एवं विक्षेप दो शक्तियों से युक्त अज्ञान से उपहित चैतन्यरूप आत्मा अज्ञानरूप उपाधि की प्रधानता होने से उपादानकारण तथा चैतन्य की प्रधानता से निमित्तकारण भी होता है। इसमें किसीप्रकार की कोई विसंगति नहीं है, क्योंकि यह संसार अज्ञानजन्य है और वह अज्ञान आत्मनिष्ठ है। इसलिए माया से युक्त ईश्वर को जगत् का उपादानकारण कहने में कोई बाधा नहीं है। जिसप्रकार मकड़ी को
१८० वेदान्तसार तन्तुरूप कार्य के लिए तुरी, वेमा, कपास आदि बाह्यसाधनों की आवश्यकता नहीं पड़ती है, उनके बिना ही उसके शरीर की सहायता से वह अपने जाले का निर्माण कर लेती है। ठीक उसीप्रकार एकमात्र ईश्वर भी बिना किसी बाह्यसाधन एवं सहयोग से अपनी माया नामक शक्ति द्वारा सूक्ष्मशरीर से लेकर ब्रह्माण्डपर्यन्त सम्पूर्ण स्थूलसंसार की रचना कर डालता है। इसी बात को मुण्डकोपनिषद् इसप्रकार कहता है- यथोर्णनाभिः सृजते गृह्यते च यथा पृथिव्यामोषधयः सम्भवन्ति। यथा सतः पुरुषात् केशलोमानि, तथाऽक्षरात्सम्भवतीह विश्वम्।। (1.7) इस प्रसङ्ग में प्रतिपक्षी द्वारा यह शङ्का की जा सकती है कि यदि ईश्वर सृष्टि का उपादानकारण है तो यह चराचरसंसार जड़ एवं नश्वर नहीं हो सकता है, क्योंकि इसका उपादान चेतन एवं अविनाशी है। इसका समाधान यह है कि यह चराचरसंसार वस्तुतः ब्रह्म का विवर्त है, परिणाम नहीं। अपने रूप का परित्याग न करके दूसरे रूप को प्रदर्शित करना ही विवर्त है। जिसप्रकार रस्सीविषयक अज्ञान रस्सी के रूप का परित्याग न करता हुआ भी सर्परूप अन्यरूप को प्रदर्शित करता है, ठीक उसीप्रकार ईश्वर चैतन्यनिष्ठ अज्ञानशक्ति भी अपने चैतन्यरूप का परित्याग न करती हुई, आकाश आदि अन्य रूपों को भी प्रदर्शित करती है। इसलिए आकाशादि प्रपञ्च, ईश्वर के उपादानकारण होने पर भी नित्य नहीं होते हैं। विशेष-(1) प्रस्तुत गद्यखण्ड में अज्ञानोपहितचैतन्य को चराचरसृष्टि का उपादान और निमित्तकारण बताया गया है। (2) अज्ञानोपहितचैतन्य के लिए वेदान्त में ईश्वर, चैतन्य एवं आत्मा आदि अनेक शब्दों का प्रयोग मिलता है। (3) लूता यहाँ मकड़ी के लिए प्रयुक्त हुआ है। मकड़ी की विशेषता है कि वह अपने द्वारा निर्मित जाले में अन्य किसी बाह्य उपादान का सहयोग नहीं लेती है। (4) अज्ञान अथवा माया को जड़ात्मक माना गया है, इसमें ब्रह्म अथवा आत्मा के कारण चैतन्य ठीक उसीप्रकार आ जाता है। जैसे-चुम्बक के समीप होने से लौहकणगति करने लगते हैं। (5) प्रस्तुत अंश के अभिप्राय को इसप्रकार भी प्रदर्शित कर सकते हैं-
कारण-निरूपण १८१ चित्र-३८ आत्मा। ईश्वर अज्ञान ब्रह्म अविद्या माया चैतन्य की प्रधानता से सूक्ष्मशरीर से लेकर ब्रह्माण्ड शरीर की पर्यन्त संसार के प्रधानता से निमित्तकारण उपादानकारण प्रति लूता (मकड़ी) वत् चैतन्य की प्रधानता से निमित्तकारण तन्तु (जाला) रूप शरीर की प्रधानता से कार्य के प्रति उपादानकारण अवतरणिका-आवरण एवं विक्षेपशक्ति से युक्त अज्ञान से उपहित चैतन्य अर्थात् ईश्वर को सम्पूर्णसृष्टि का उपादान एवं निमित्तकारण बताने के पश्चात् उसकी विक्षेपशक्ति द्वारा सर्वप्रथम जगत् की सूक्ष्मसृष्टि का कथन करते हैं- तमःप्रधानविक्षेपशक्तिमदज्ञानोपहितचैतन्यादाकाश आकाशा- द्वायुर्वायोरग्निरग्नेरापोऽद्भ्यः पृथिवी चोत्पद्यते "तस्माद्वा एतस्मादात्मन आकाशः सम्भूत" इत्यादिश्रुतेः। तेषु जाड्याधिक्यदर्शनात्तमःप्राधान्यं तत्कारणस्य। तदानीं सत्त्वरजस्तमांसि कारणगुणप्रक्रमेण तेष्वाकाशादि- षूत्पद्यन्ते। एतान्येव सूक्ष्मभूतानि तन्मात्राण्यपञ्चीकृतानि चोच्यन्ते। एतेभ्यः सूक्ष्मशरीराणि स्थूलभूतानि चोत्पद्यन्ते॥१२॥ पदच्छेद-तमः प्रधानविक्षेपशक्तिमद् अज्ञानोपहित-चैतन्याद् आकाशः, आकाशाद् वायुः, वायोः अग्निः, अग्नेः आपः, अद्भ्यः पृथिवी च उत्पद्यते। “तस्माद् वा एतस्माद् आत्मनः आकाशः सम्भूतः” इत्यादि श्रुतेः। तेषु जाड्याधिक्य-दर्शनात् तमः प्राधान्यम् तत्कारणस्य।
१८२ वेदान्तसार तदानीम् सत्त्व-रजस्-तमांसि कारणगुणप्रक्रमेण तेषु आकाश-आदिषु उत्पद्यन्ते। एतानि एव सूक्ष्मभूतानि तन्मात्राणि अपञ्चीकृतानि च उच्यन्ते। एतेभ्यः सूक्ष्मशरीराणि स्थूलभूतानि च उत्पद्यन्ते।।12।। अनुवाद-तमोगुण की प्रधानता वाली विक्षेपशक्ति से युक्त अज्ञान से उपहित चैतन्य से (सर्वप्रथम) आकाश, आकाश से वायु, वायु से अग्नि, अग्नि से जल और जल से पृथिवी उत्पन्न होती है। “उसप्रकार के (अज्ञान से आच्छादित) इस आत्मा से आकाश उत्पन्न हुआ” इत्यादि श्रुतिवचन (इसमें प्रमाण है।) उन सबमें जड़ता की अधिकता दिखायी देने के कारण, उनके कारण (अज्ञानोपहितचैतन्य) का तमोगुणप्रधान होना (सिद्ध होता है।) उन आकाश आदि पञ्चभूतों में अपने-अपने (साक्षात्) कारणों के गुणों के आधार पर ही उससमय सत्त्व, रजस् और तमस् गुण (प्रधानरूप से) उत्पन्न होते हैं। (वेदान्त में) ये ही सूक्ष्मभूत, तन्मात्र और अपञ्चीकृत कहलाते हैं। इन्हीं (अपञ्चीकृतभूतों) से सूक्ष्मशरीर एवं स्थूलभूत उत्पन्न होते हैं। ‘चन्द्रिका’-वेदान्त के अनुसार अज्ञानोपहित चैतन्य अर्थात् ईश्वर से होने वाली सृष्टि के विषय में आचार्य सदानन्द कहते हैं कि यद्यपि प्रलयकाल में माया अथवा अज्ञान में सत्त्व, रजस् एवं तमोगुण की स्थित समानरूप से विद्यमान रहती है तथापि सृष्टि का प्रारम्भ होने की स्थिति में इन गुणों में गुणविशेष का न्यूनाधिक्य भी देखा जाता है। इसलिए तमोगुणप्रधान, किन्तु सत्त्व एवं रजस् गुणों की भी थोड़ी-बहुत सत्ता से युक्त विक्षेपशक्ति से सम्पन्न अज्ञान से आवृत चैतन्य, जिसे वेदान्त में ‘ईश्वर’ संज्ञा प्रदान की गई है, से सर्वप्रथम सूक्ष्मतन्मात्रारूप आकाश की सृष्टि होती है। पुनः उसी तन्मात्रारूप आकाश से वायु, वायु से अग्नि, अग्नि से जल तथा जल से सूक्ष्मतन्मात्रारूप पृथिवी की उत्पत्ति होती है। इसप्रकार पञ्चभूतों के इन सूक्ष्मतन्मात्राओं की उत्पत्ति के कथन की पुष्टि में अपनी शैली के अनुसार ग्रन्थकार ‘तस्माद्वा’ इत्यादि श्रुतिवचन को प्रमाणरूप में प्रस्तुत करते हुए कहते हैं कि श्रुतियों में भी इस बात का उल्लेख हुआ है कि उसप्रकार की विशेषताओं से सम्पन्न अज्ञान से आच्छादित इस शुद्धचैतन्यरूप आत्मा से ही आकाश की उत्पत्ति हुई है।
कारण-निरूपण १८३ इस प्रसङ्ग में प्रतिपक्षी द्वारा यह शङ्का किए जाने पर कि अज्ञान में तो सत्त्व, रजस् एवं तमस् तीनों गुण विद्यमान हैं, फिर आपने यह कैसे कहा कि आकाशादि की उत्पत्ति तमोगुणप्रधान अज्ञान से आवृत चैतन्य से ही हुई? स्वयं ही इसप्रकार की शङ्का को मन में धारणकर अग्रिमपंक्ति में इसका समाधान प्रस्तुत करते हैं- कारण-कार्यसिद्धान्त के आधार पर कार्य के गुणों से कारण के गुणों का अनुमान सहज ही किया जा सकता है, क्योंकि आकाश, वायु, अग्नि, जल एवं पृथ्वी इन सभी में जड़भाग् की अधिकता के कारण ये जडरूप हैं। अतः इनमें तमोगुण की प्रधानता की परिकल्पना का औचित्य प्रतीत होता है। इस दृष्टि से यही कहना अधिक संगत होगा कि तमोगुणप्रधान विक्षेपशक्ति युक्त चैतन्य ही आकाशादिप्रपञ्च का कारण है। इस प्रसङ्ग में यह विशेषरूप से उल्लेखनीय है कि इनकी उत्पत्ति के समय तमोगुण का आधिक्य रहता है, किन्तु सत्त्व एवं रजस् का पूर्णतया अभाव नहीं रहता, क्योंकि उनके अभाव में तो तमोगुण में क्रियाशीलता का अभाव ही हो जाएगा, जो उचित नहीं है। अतः इस अवस्था में सत्त्वगुण एवं रजोगुण, तमोगुण की तुलना में अत्यल्प मात्रा में विद्यमान रहते हैं। इसका यही अभिप्राय ग्रहण करना चाहिए। इसप्रकार आकाश आदि की उत्पत्ति होने पर अपने-अपने कारण के गुण के अनुरूप ही उत्तरोत्तर उत्पन्न होने वाले उन आकाश आदि में सत्त्व, रजस् एवं तमस् तीनों ही गुणों की विद्यमानता देखी जाती है। उत्पन्न हुए इन आकाश, वायु, अग्नि, जल एवं पृथिवी को अपञ्चीकृत, सूक्ष्मभूत एवं तन्मात्र इत्यादि नामों से जाना जाता है। इन पांचों में क्रमशः शब्द, स्पर्श, रूप, रस एवं गन्धरूप गुण अत्यन्तसूक्ष्म अर्थात् तन्मात्ररूप में ही विद्यमान रहते हैं। जो क्रमशः शब्दतन्मात्र, स्पर्शतन्मात्र, रूपतन्मात्र, रसतन्मात्र एवं गन्धतन्मात्र कहलाते हैं। इन्हीं सूक्ष्मभूत अपञ्चीकृत आकाशादि से सूक्ष्मशरीर, पञ्चीकृतमहाभूत आदि की उत्पत्ति होती है तथा पञ्चीकृत महाभूतों से स्थूलशरीर उत्पन्न होते हैं। इसप्रकार वेदान्त के अनुसार सृष्टि का क्रम प्रारम्भ होता है। विशेष-(1) प्रस्तुत गद्यखण्ड में वेदान्त की सृष्टिप्रक्रिया की ओर संकेत किया गया है।
१८४ वेदान्तसार (२) गद्यखण्ड के आरम्भ में उल्लिखित अज्ञान की विक्षेपशक्ति के साथ-साथ आवरणशक्ति का भी अध्याहार करना चाहिए, क्योंकि यही आवरण नामक शक्ति शुद्धचैतन्यरूप तत्त्व के वास्तविकरूप को आवृत करती है। (३) सृष्टिक्रम में यहाँ सर्वप्रथम सूक्ष्म आकाश की उत्पत्ति को मान्यता प्रदान की गई है। (४) अपञ्चीकृत सूक्ष्मभूतों को इस अवस्था में स्थूल इन्द्रियों द्वारा देखा नहीं जा सकता है। (५) इस अवस्था में इन सूक्ष्मभूतों में रूप, रस, गन्धादि गुण सूक्ष्मरूप में एवं स्वतन्त्ररूप में विद्यमान रहते हैं। (६) प्रस्तुत अंश के भाव को इसप्रकार भी प्रदर्शित कर सकते हैं-
चित्र-३९ विक्षेपशक्तिसम्पन्न तमोगुणप्रधान
┌─────────────────┐ │ अज्ञान से उपहित │ └────────┬────────┘ │ ( चैतन्य ) │ सूक्ष्मशरीराणि ── आकाश │ │ ┌───────────────────────┐ │ ├───> │ जाड्याधिक्या दर्शनात् │ ──> ( तमः प्राधान्यम् ) │ │ └───────────────────────┘ │ │ ▲ ▲ ▲ │ वायु ──────┘ │ │ │ │ │ │ │ अग्नि ──────────┘ │ │ │ │ उत्पद्यन्ते │ जल ─────────────────┘ ▲ │ │ पृथिवी ──────┬───────────────┐ सूक्ष्म महाभूतानि ◄────┘ │ │ सूक्ष्मभूत तन्मात्र अपञ्चीकृत └───────────┼──────────┘ कथ्यते
अवतरणिका—आकाशादि सूक्ष्मपञ्चतन्मात्राओं की उत्पत्ति के पश्चात् इनमें भी सत्त्वादिगुणों की प्रधानता से सत्रह अवयवों से युक्त सूक्ष्मशरीर की सृष्टि का कथन करते हैं-