भारतकोश
संग्रह पर लौटें

वेदान्तसार (नृसिंहसरस्वती टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)

Vedantasara by Sadananda Yogindra

सदानन्द योगीन्द्र द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास · खेमराज श्रीकृष्णदास · 1940 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished145 पृष्ठ

( ६४ ) वेदान्तसार । श्रुतेः इन्द्रियाणामभावे शरीरचलनाभावात्काणो- हं बधिरोहं इत्याद्यनुभवाच्च इन्द्रियाण्यात्मेति वदति ॥ ६३ ॥ ( सं०टी० ) अध्यारोपप्रकरणमुपसंहरति । एवमिति । ईश्वरचैतन्ये सामान्यतो महाप्रपंचाध्यारोपप्रकारं सप्रपंच- मभिधायेदानीं प्रत्यगात्मनि विशेषाध्यारोपप्रकारं दर्शयितुमु- पक्रमते । इदानीमित्यादिना । अध्यारोपमेवाह । इदमिदमि- ति । प्रत्यक्षादिसंनिहितस्यापत्यादिधर्मिण इदमिदं विनिर्देशः क्रियते । इदमिदमित्यादेर्वीप्सा । तथा चातिस्थूलबुद्धिस्तु इद- मपत्यादिकमेवाहम् । अयं पुत्र एवाहमित्यत्यंतबाह्यधर्मवि- शेषेणात्मन्यध्यारोपयतीत्यर्थः । अत्र श्रुतिमाह । आत्मा वा इति । तत्र युक्तिमाह । स्वस्मिन्निति । यथा स्वशरीरे प्रेमदर्शनादात्मत्वभ्रमः एवं स्वपुत्रादिशरीरेपि प्रेमदर्शनादात्म- त्वभ्रम इत्यर्थः । अत्रानुरूपमनुभवमाचष्टे । पुत्र इति। एतदपेक्ष- या विशिष्टबुद्धिरन्यः कश्चिदधिकारी स्वदेहमेवात्मानं मन्य- त इत्याह । चार्वाकस्त्विति। अत्रापि श्रुतिमाहास वा इति। पु- त्रादिशरीरस्यात्मत्वाभावे युक्तिं दर्शयन् पूर्वोक्ताधिकारिणः सकाशात्स्वस्य वैलक्षण्यं दर्शयति । प्रदीप्तगृहादिति । देह- स्यात्मत्वेऽनुभवं च प्रमाणयति । स्थूलोहमिति । ततोप्युत्कृ- ष्टः कोप्यधिकारी श्रुतियुक्त्यनुवेधैः इंद्रियाण्यात्मेति व- दति इत्याह । अपर इति ॥ ६३ ॥ ( भा०टी० ) इसप्रकार संक्षेपसे वस्तुरूप ब्रह्मचैतन्यमें

संस्कृतटीका-भाषाटीकासमेत । (६५) अवस्तुका आरोपस्वरूप अध्यारोप दिखलाया । अब विशेष रूपसे जीवचैतन्यमें अध्यारोप अर्थात् कौन कौन मतावल- म्बी किस किस वस्तुको जीवात्मा कहते हैं सो दिखाते हैं। अति अज्ञानी पुरुष पुत्रको आत्मा कहते हैं और इस श्रुति का प्रमाण देते हैं-“आत्माही पुत्ररूप होकर जन्म लेता है”। परन्तु युक्तिभी आश्चर्य ढंगकी देते हैं-कहतेहैं “अपनेमें जि- सप्रकार प्रेम होता है पुत्रमेंभी तिसीप्रकार प्रेमका अनुभव होता है इसकारण पुत्रही आत्मा है इस विषयमें और अनु- भवभी है जैसे पुत्रके पुष्ट होनेपर मैं पुष्ट होगया और पुत्रके नष्ट होनेपर मैं नष्ट होगया इसप्रकार ज्ञान होता है इसकारण पुत्रही आत्मा है”। और चार्वाक मातावलम्बी तौस्थूलशरीरको आत्मा कहते हैं और इस श्रुतिका प्रमाणभी देते हैं-“अन्न- मय रसके विकारयुक्त यह पुरुषही आत्मा है”। और यह युक्ति देते हैं कि “सब पुरुष पुत्रकाभी परित्याग करके जलते हुए घरमेंसे अपने बचानेका उपाय करते हैं” और इस विषय में अनुभवभी है. ऐसा कहते हैं क्योंकि “मैं पुष्ट हूँ मैं दुर्बल हूँ” ऐसा ज्ञान सर्व साधारणको होता है इसकारण स्थूल शरीरही आत्मा है दूसरे चार्वाकमतावलम्बी तौ इन्द्रियोंके समूह- को आत्मा कहते हैं और इस श्रुतिका प्रमाण देते हैं- “इन्द्रियोंका समूह ब्रह्माके समीप जाता है तब इन्द्रियोंके न होनेसे शरीर कुछ व्यापार नहीं कर सक्ता है” इसकारण इ- न्द्रियसमूहही आत्मा है और यह युक्ति देते हैं “मैं अन्धा हूँ,

( ६६ ) वेदान्तसार । मैं बधिर हूँ' इसप्रकार ज्ञान सबको होता है इससे इन्द्रिय गणही आत्मा है” ॥ ६३ ॥ अपरश्चार्वाकः“अन्योऽन्तर आत्मा प्राणमयः” इ- त्यादिश्रुतेः प्राणाभावे इन्द्रियचलनायोगात् अह- मशनायावानहं पिपासावान् इत्याद्यनुभवाच्च प्राण आत्मेति वदति । अन्यस्तु चार्वाकः “अन्योन्तर आत्मा मनोमयः” इत्यादिश्रुतेः मनसि सुप्ते प्राणा- देरभावात् अहं सङ्कल्पवानहं विकल्पवानित्याद्य- नुभवाच्च मन आत्मेति वदति ॥ ६४ ॥ ( सं०टी० ) ततोप्युत्तमोऽधिकारी कश्चिच्छुतिप्रमाणा- नुभवयुक्तिबलात् प्राण एवात्मेत्याह । अपर इति । ततो विशिष्टोधिकारी कश्चित्स्वमताानुकूलश्रुत्यादिबलान्मन एवा- त्मेत्याह । अन्यस्त्विति ॥ ६४ ॥ ( भा०टी० ) कोई कोई चार्वाकमतावलम्बी प्राणको आत्मा कहते हैं और इस श्रुतिका प्रमाण देते हैं-“प्राणमय अन्तरात्मा शरीरादिसे भिन्न है।” और मतके स्थापनके अर्थ ऐसी युक्ति देते हैंकि-। “जिस समय शरीरमें प्राण नहीं रहता है तब इन्द्रियोंके समूहसे कोई क्रिया नहीं होसक्ति है । इससे प्राणही आत्मा है” और यह युक्ति दिखाते हैं- “मैं क्षुधार्त्त हूँ, पिपासातुर हूँ' इसप्रकार आपण्डितपामरपर्य्यन्तको अनुभव होता है इसकारण प्राणही आत्मा है”। कोई कोई चार्वाक मतावलम्बी मनको आत्मा कहते हैं और इस श्रुतिका प्रमाण

संस्कृतटीका-भाषाटीकासमेत । ( ६७ ) देते हैं-“मनोमय अन्तरात्मा शरीर, इन्द्रिय और प्राण इनसे भिन्न है” इसकारण मनही आत्मा है । और अपने मतकी प्राधान्यता और रक्षाके अर्थ यह युक्ति देते हैं-“जिस समय मन स्वभावस्था में होता है तब प्राणादिका अभाव होता है । और मुझको यह संकल्प है और यह विकल्प है इसप्रकार अ- भवभी सबहीको होता है”इसकारण मनही आत्मा है॥ ६४ ॥ बौद्धस्तु “अन्योऽन्तर आत्मा विज्ञानमयः” इत्यादिश्रुतेः कर्तुरभावे करणस्य शक्त्य- भावात् ‘अहं कर्त्ता अहं भोक्ता’ इत्याद्यनु- भवाच्च बुद्धिरात्मेति वदति ॥ ६५ ॥ ( सं० टी० ) उक्तेभ्यः पंचभ्यो विलक्षणः कश्चिद्विज्ञान- वादी श्रुत्यादिभिर्विज्ञानमात्मेत्याह । बौद्धस्त्विति ॥ ६५ ॥ ( भा०टी० ) बौद्धमतावलम्बी बुद्धिको आत्मा कहते हैं और इस श्रुतिका प्रमाण देते हैं-“विज्ञानमय अन्तरात्मा शरीर, प्राण और मन इनसे भिन्न है” और यह युक्ति देते हैं- “जिस समय कर्त्ताका अभाव होता है तबही करणकी श- क्तिका अभाव होता है । ऐसी प्रतीति है और बुद्धिके अभाव होनेपर इन्द्रियोंकी शक्तिका अभाव देखनेमें आता है । और ‘मैं कर्त्ता हूँ मैं भोक्ता हूँ’इसप्रकार अनुभवभी आपामर पण्डित साधारण सबहीको होता है इसकारण बुद्धिहीको आ- त्मत्वसिद्ध होता है” ॥ ६५ ॥ प्राभाकरतार्किकौ तु “अन्योऽन्तर आत्मा

( ६८ ) वेदान्तसार । आनन्दमयः” इत्यादिश्रुतेः सुषुप्तौ बुद्ध्या- दीनामज्ञाने लयदर्शनात् ‘अहमज्ञः’ इत्या- द्यनुभवाच्च अज्ञानमात्मेति वदतः ॥ ६६ ॥ ( सं०टी० ) उक्तेभ्योऽतिरिक्तो प्राभाकरतार्किकौ स्वमतो पयोगिश्रुत्यादिसद्भावादज्ञानमात्मेति वदत इत्याह। प्राभाक- रतार्किकाविति ॥ ६६ ॥ ( भा०टी० ) प्राभाकर ( मीमांसक ) और तार्किक ( नै- यायिक ) तो दोनों अज्ञानकोही आत्मा कहते हैं और इस श्रुतिका प्रमाण देते हैं-“अन्तरात्मा शरीरादिसे भिन्न और आनन्दमय है । ”और इसप्रकार युक्ति प्रमाण देते हैं कि- “सुषुप्ति अवस्थामें अज्ञानमें बुद्ध्यादिका लय होता है और ‘मैं मूर्ख हूँ मैं ज्ञानी हूँ’ इसप्रकार अनुभवभी यावन्मात्रको हो- ता है इसकारण अज्ञानही आत्मा है” ॥ ६६ ॥ भट्टस्तु “प्रज्ञानघनएवानन्दमयआत्मा” इत्यादिश्रुतेःसुषुप्तौप्रकाशाप्रकाशसद्भा- वात् मामहं जानामीत्याद्यनुभवाच्च अ- ज्ञानोपहितं चैतन्यमात्मेति वदति ॥ ६७ ॥ ( सं०टीका ) अन्यभट्टस्त्वज्ञानावच्छिन्नचैतन्यमात्मे- त्याह । भट्टस्त्विति ॥ ६७ ॥ ( भा०टी० ) भट्टमतावलम्बी कोई मीमांसक अज्ञान- समष्टिद्वारा उपहित चैतन्य अर्थात् ईश्वरचैतन्यकोही आत्मा कहते हैं और इस श्रुतिका प्रमण देते हैं-“आत्माही प्रज्ञान-

संस्कृतटीका-भाषाटीकासमेत । ( ६९ ) घन तथा आनन्दमय है”और इसप्रकार युक्ति प्रमाण देते हैं कि-“सुषुप्तिकालमें सबके लीन होनेपरभी अज्ञानोपहित चै- तन्यका प्रकाश रहता है और मैं अपनेको नहीं जानता हूँ ऐसा अनुभव होता है । इसकारण अज्ञानोपहितचै- तन्यही आत्मा है” ॥ ६७ ॥ अपरो बौद्धः“असदेवेदमग्र आसीदित्या- दिश्रुतेःसुषुप्तौ सर्वाभावादहं सुप्तःसुषुप्तौ नासमित्युत्थितस्य स्वभावपरावर्शविष- यानुभवाच्च शून्यमात्मेति वदति ॥ ६८॥ ( सं०टी० ) बौद्धैकदेशी कश्चिच्छ्रुत्यादिभिः शून्यमा- त्मेति वदतीत्याह । अपर इति ॥ ६८ ॥ ( भा ०टी० ) कोई बौद्धमतावलम्बी शून्यकोही आ- त्मा कहते हैं । और इस श्रुतिका प्रमाण देते हैं-“जगत् प- हले असत् था ” और यह युक्ति देते हैं कि-“सुषुप्तिकालमें बुद्ध्यादि सबका अभाव होता है और सुषुप्तिसे उठकर पुरुष को ऐसा ज्ञान होता है कि सुषुप्तिमें मेरा अभाव होगया था इस अनुभवके कारण शून्यही आत्मा है” ॥ ६८ ॥ एतेषां पुत्रादीनां शून्यपर्यन्तानामनात्मत्वमुच्य- ते। एतैरतिप्राकृतादिवादिभिरुक्तेषु श्रुतियुक्त्यनु- भवाभासेषु पूर्वपूर्वोक्तश्रुतियुक्त्यनुभवाभासाना- मुत्तरोत्तरश्रुति युक्त्यनुभवाभासैरात्मवाद्यदर्शना- त्पुत्रादीनामनात्मत्वं स्पष्टमेवेति ॥ ६९ ॥

( ७० ) वेदान्तसार । ( सं०टी० ) अधुना पुत्रादिशून्यपर्यन्तानामात्मत्वप्रतिपा- दकश्रुत्यादेराभासत्वात्पूर्वपूर्वमतस्योत्तरोत्तरमतबाध्यत्वाच्च दृ- श्यत्वजडत्वादिहेतुकदंबकैश्चानात्मत्वं प्रसिद्धमेवेति प्रति- पादयितुं प्रतिजानीते । एतेषामिति । पुत्राद्यात्मवादिना- मतिमंदाधिकारित्वात्तत्प्रतिपादितश्रुत्यादेरपि पूर्वपूर्वस्योत्त- रोत्तरबाध्यत्वात्पुत्रादिशून्यांतानामनात्मत्वं प्रसिद्धमेवेति प्रति- ज्ञातमेवार्थं प्रकटयति । एतैरिति ॥ ६९ ॥ ( भा०टी० ) ठीक तौ यह है । पुत्रको आदिले शून्य पर्य्यन्त किसीको आत्मा नहीं कहा जाता है क्योंकि पुत्रादि- कोंका अनात्मत्व स्पष्ट मालूम होता है जो पुत्रादिको आत्मा कहे हैं वे बड़े मूढ़ हैं उनका पहले दिखाया हुआ श्रुतिप्रमाण युक्तिप्रमाण और अनुभवप्रमाण ये सब उत्तरोत्तर दिखाये हुए प्रमाण युक्ति और अनुमानद्वारा सबका खण्डन होजाता है इसी कारण पूर्वोक्त मतावलम्बियोंने जो पुत्रादिको आत्मा कहा है सो ठीक नहीं है ॥ ६९ ॥ “किञ्च प्रत्यगस्थूलो अचक्षुरप्राणो अमना अक- र्त्ता चैतन्यं चिन्मात्रं सत्” इत्यादिप्रबलश्रुतिविरो- धात् अस्य पुत्रादिशून्यपर्य्यन्तस्य जड़स्य चैत- न्यभास्यत्वेन घटादिवदनित्यत्वात् अहं ब्रह्मेति विद्वदनुभवप्राबल्याच्च तत्तच्छ्रुतियुक्त्यनुभवाभा- सानां बाधितत्वादपि पुत्रादिशून्यपर्य्यन्तमखिल- मनात्मैव ॥ ७० ॥

संस्कृतटीका-भाषाटीकासमेत । ( ७१ ) (सं०टी०) ननु पुत्रादिशून्यपर्यन्तानामनात्मत्वे सिद्धे क- स्तर्ह्यहंप्रत्ययविषय आत्मेत्याशंक्य आस्थूलादिनिषेधवा- क्यजातबोधितं "सत्यंज्ञानमनंतंब्रह्म" इत्यादिविधिवाक्यकोटि- बोधितं यत्सत्यं ज्ञानानंताद्वयं ब्रह्म तदेवाहंप्रत्ययालंबनमिति प्रबलश्रुतियुक्त्यनुभवैः प्रतिपादयितुमाह। किंचेति। अस्थूलादि- प्रबलश्रुतिवाक्यैः पुत्रादिशून्यपर्यन्तात्मातिरिक्तात्मस्वरूपप्रति- पादनात् पुत्रादीनां जडत्वादिहेतुभिरनात्मत्वमित्यर्थः । अस्मि- न्नर्थे प्रबलविद्वदनुभवं प्रमाणयति । अहमिति । पुत्रादिश्रुत्या- दीनां दौर्बल्यं दर्शयति । तत्तदिति । यतः पुत्रादीनां जडत्वादि- हेतुभिरनात्मत्वमतः पुत्रादिभासकं नित्यशुद्धत्वादिस্বরূপमेवा- त्मवस्त्वित्यर्थः । नहीदं विरुद्धं यत्पुत्राणामात्मत्वप्रतिपादकश्रु- तीनामप्रामाण्यं अस्थूलादिश्रुतीनां प्रामाण्यमिति न हि वे- दवाक्येषु केषांचिदप्रामाण्यं केषांचित्प्रामाण्यमिति चाशक्यं प्रतिपादयितुम् । एवं चेत्पुत्रादिश्रुतीनां प्रामाण्यमस्थूलादिवा- क्यानामप्रामाण्यमिति वैपरीत्यं किं न स्यात् । वेदवाक्यत्वा- विशेषात् । किंच केषांचिद्वेदवाक्यानामप्रामाण्यं केषांचिद्वे- दवाक्यानां प्रामाण्यं प्रतिपादनार्थमिदं प्रकरणमारब्धं अतः कथं निर्णय इति चेत्, उच्यते । पुत्रादिश्रुतीनां सर्वथैव प्रामाण्यं नास्तीत्यस्माभिर्न निषिध्यते किंत्वस्थूलादिप्रबलश्रुतिस्मृति- न्यायविरोधात्स्वार्थे तात्पर्याभावात्तेषां स्थूलारुंधतीन्यायेन पूर्वपूर्वनिराकरणद्वारा सूक्ष्मसूक्ष्मवस्तूपदेशे तात्पर्यमिति एता- वदेव प्रतिपाद्यते । तथाहि ध्रुवमरुंधतीं च दर्शयतीति विधि-

( ७२ ) वेदान्तसार । बलाद्वरवध्वोररुंधतीदर्शने प्राप्ते परमसूक्ष्मरूपाया अरुंधत्याः प्रथमकक्षायामेव प्रतिपत्तुमशक्यत्वात्प्रथमं चंद्रज्योतीरूपारुं- धतीत्युच्यते ततः चंद्रभिन्ना तारकारुंधतीत्युच्यते तत इतर- तारकाभिन्ना सप्ततारकात्मकारुंधतीत्युच्यते तदनंतरमितरता- रकाचतुष्टयभिन्ना तारकात्रितयात्मकेत्युच्यते ततः तन्मध्ये तारकेत्युच्यते ततस्तत्समीपवर्तिनी परमसूक्ष्मारुंधतीत्युच्यते न चैतावतैतेषां पंचानां वाक्यानां परस्परविरुद्धार्थप्रतिपादक- त्वेनाप्रामाण्यं शक्यं प्रतिपादयितुम्। किंतु प्रतिपत्तृबुद्ध्यनुसारेण सोपानक्रमवत्पूर्वपूर्वनिराकरणद्वारा सूक्ष्मारुंधतीप्रतिपादने ता- त्पर्यं तद्वदत्रापि अन्नमयः प्राणमयो मनोमयो विज्ञानमय आनं- दमय आत्मा ब्रह्मपुच्छं प्रतिष्ठेति पुच्छब्रह्मपर्यवसितानां पंच- कोशवाक्यानामपि परस्परविरुद्धार्थप्रतिपत्तृबुद्ध्यनुसारेण सो- पानक्रमवत्पूर्वपूर्वनिराकरणद्वारा परमसूक्ष्मपुच्छब्रह्मप्रतिपाद- ने तात्पर्यं तस्मात्सर्वेषां वेदवाक्यानां साक्षात्परंपरया वाऽद्विती- यवस्तुप्रतिपादने तात्पर्यात्प्रामाण्यरूपविरोध इति संक्षेपः ७०॥ ( भा०टी० ) यदि पुत्रादिको आत्मा कहेंगे तब श्रुति आदि प्रमाणोंको अत्यन्त विरोध पड़ेगा क्योंकि-“आत्मा स्थूल नहीं है, आत्मा इन्द्रियगण नहीं है, प्राण नहीं है, मन नहीं है, और कर्त्ता नहीं है, परन्तु केवल चैतन्यमय सत्य स्व- रूप है”। इत्यादि प्रबल श्रुतिद्वारा प्रमाण होता है। पुत्रादिसे शून्यपर्य्यन्त जड़के चैतन्यके भासक हेतु घटादिकी तरह अनित्य है अर्थात् हेत्वाभास है और ज्ञानियोंको मैंही ब्रह्म हूं

संस्कृतटीका-भाषाटीकासमेत । (७३) इसप्रकार दृढ़ अनुभव होता है इसकारण पुत्रको आदिले शून्यपर्य्यन्त कोई पदार्थ आत्मा नहीं कहाजासक्ता । पुत्रा- दिको आत्मा कहनेपर पूर्वोक्त श्रुति, युक्ति, अनुभव, प्रमा- णका विरोध होगा इसकारण पुत्रादिको अनात्मत्व स्पष्ट मालूम होता है ॥ ७० ॥ अतस्तत्तद्भासकं नित्यशुद्धबुद्धमुक्तसत्य स्वभावं प्रत्यक्चैतन्यमेवात्मतत्त्वमिति वेदान्तविदनुभवः । एवमध्यारोपः ॥ ७१ ॥ (सं०टी०) विशेषाध्यारोपप्रकरणमुपसंहरति।एवमिति७१ (भा०टी०) ठीक तौ जो पुत्रको आदिले शून्य प- र्य्यन्तका प्रकाशक है और जो नित्य, शुद्ध, सर्वज्ञ, मुक्त, स- त्यस्वरूप, प्रत्यक् चैतन्य है वही आत्मा है ऐसा वेदान्तशास्त्र के जाननेवालोंका अनुभव है । इसप्रकार वस्तुमें अवस्तुका अध्यारोपस्वरूप अध्यारोपन्यायविशेषरूपसे दिखाया।७१॥ अपवादोनाम रज्जुविवर्त्तस्य सर्पस्य रज्जुमात्रत्व- वत् वस्तुविवर्त्तस्यावस्तुनोऽज्ञानादेः प्रपञ्चस्य वस्तुमात्रत्वम् । तदुक्तम्“सतत्त्वतोऽन्यथाप्रथा विकारइत्युदीरितः । अतत्त्वतोऽन्यथाप्रथाविवर्त्त- इत्युदाहृतः” ॥ ७२ ॥ (सं०टी०) आत्मवस्तुनि मिथ्याप्रपंचस्य सामान्यतो विशेषतश्चाध्यारोपप्रकारं सप्रपंचमभिधायेदानीं तदपवादप्र-

( ७४ ) वेदान्तसार । कारं वक्तुमारभते । अपवादो नामेति । असंगोदासीने पर- मात्मवस्तुनि तद्विवर्त्तावस्तुभूताज्ञानादिमिथ्याप्रपंचस्य चिद्व- स्तुमात्रावशेषतयाऽवस्थानमेवापवाद इति वक्तुं प्रथमं लौ- किकदृष्टांतमाह।रज्जुइति।रज्जुस्वरूपापरित्यागेन सर्पाकारेण भासमानस्य रज्जुविवर्त्तस्यापवादो नाशो नामाधिष्ठानरज्जुमा- त्रतयाऽवस्थानवच्चिद्विवर्त्तस्याज्ञानादिप्रपंचस्य अपवादो ना- शो नामाचिन्मात्रत्वेनावस्थानमित्यर्थः।अत्र यथास्वरूपेणाव- स्थितस्य वस्तुनोऽन्यथाभावो द्विधाभवति परिणामभावो विव- र्त्तभावश्चेति तत्र परिणामभावो नाम वस्तुनो यथार्थतः स्वस्व- रूपं परित्यज्य स्वरूपांतरापत्तिः यथा दुग्धमेव स्वस्वरूपं परि- त्यज्य दध्याकारेण परिणमते । विवर्त्तभावस्तु वस्तुतः स्व- रूपापरित्यागेन स्वरूपांतरेण मिथ्याप्रतीतिः । यथा रज्जुः स्वरूपापरित्यागेन सर्पाकारेण मिथ्या प्रतिभासते । अत्र वेदां- ते ब्रह्मणि प्रपंचभानस्य परिणामभावो नांगीक्रियते दुग्धा- दिवद्ब्रह्मणो विकारित्वप्रसंगादनित्यत्वादिदोषापत्तेः । विवर्त्त- भावांगीकारे तु नायं दोषः, ब्रह्मणि प्रपंचभानस्य मिथ्यात्वेन विकारित्वाभावात्।तदुक्तम्"अधिष्ठानावशेषो हि नाशः कल्पि तवस्तुनः”इति। तस्माच्चिद्विवर्त्तस्य प्रपंचस्य चिन्मात्रावशेषत- यावस्थानमेवापवाद इति भावः । अस्मिन्नर्थे ग्रंथांतरसंवादं दर्शयति । तदुक्तमिति ॥ ७२ ॥ ( भा०टी० ) अब अपवादन्याय दिखाते हैं। रज्जुमें स- र्पका भ्रम होकर जिस समय वहभ्रम नष्ट होजाता है उस स-

संस्कृतटीका-भाषाटीकासमेत । (७५) मय जैसे सर्पज्ञान नष्ट होजाय है तब केवल रज्जुका ज्ञान रह जाय है । तिसीप्रकार सच्चिदानन्द ब्रह्ममें अवस्तुरूप अज्ञाना- दि जड पदार्थका भ्रम होकर जिस समय उस भ्रमका नाशहो जाता है तब केवल ब्रह्ममात्र अवस्थित रहता है क्योंकि यह रूप ज्ञानका विवर्त्त है जैसा ग्रन्थान्तरमें कहा है-“जो स्व- रूपको विकृत करके कार्य्यको उत्पादन करै वह विकारी वा परिणामी उपादान कारण कहाता है जैसे दूध दधिका विकारी वा परिणामी उपादानकारण है ” और जो कारणस्वरूपका विकार विनाही करे कार्य्यका उत्पादन करै है वह उसको विवर्त्त कारण कहते हैं जैसे रज्जु सर्पके ज्ञानके प्रति विवर्त्त कारण है ॥ ७२ ॥ तथाहि खलूच्यते यथा एतद्भ‍ोगायतनं चतुर्विधं स्थूलशरीरजातं एतद्भ‍ोग्यरूपान्नपानादिकं. एत- दाश्रयभूतभूरादिचतुर्दशभुवनानि एतदाश्रयभूतं ब्रह्माण्डञ्चैतत् सर्वं एतेषां कारणरूपपञ्चीकृतभूत- मात्रं भवति । एतानि शब्दादिविषयसहितानि प- ञ्चीकृतभूतजातानि सूक्ष्मशरीरजातञ्चैतत् सर्वमे- तेषां कारणरूपमपञ्चीकृतभूतमात्रं भवति एतद- ज्ञानं अज्ञानोपहितं चैतन्यं चेश्वरादिकं एतदाधा- रभूतानुपहितचैतन्यरूपं तुरीयब्रह्ममात्रं भवति आभ्यामध्यारोपापवादाभ्यां तत्त्वंपदार्थशोधनम- पि सिद्धं भवति । तथाहि । अज्ञानादिसमष्टिः ए-

( ७६ ) वेदान्तसार । तदुपहितं तं चैतन्यञ्चैतत्त्रयं तप्तायःपिण्डवदेकत्वेनावभा- समानं तत्पदवाच्यार्थो भवति एतदुपाध्युपहि- ताधारभूतमनुपहितं चैतन्यं तत्पदलक्ष्यार्थो भवति ॥ ७३ ॥ ( सं०टी० ) सामान्यतो दर्शितामपवादप्रक्रियां विस्त- रेण प्रतिपादयितुं प्रतिजानीते । तथाहीति । स्थूलसूक्ष्मका- रणप्रपंचानामुत्पत्तिवैपरीत्येन तत्तत्कारणरूपेणावस्थानमेवा- पवाद इत्याह । एतद्भोगायतनमिति । एतत्स्थूलशरीरं स्वा- श्रयब्रह्मांडसहितं स्वकारणभूतपंचीकृतेषु पंचमहाभूतेषु लीनं सन्मात्रतयावशिष्यते तानि च पंचीकृतानि भूतानि शब्दा- दिसहितानि सप्तदशावयवात्मकलिंगशरीराणि च स्वकारणे- ष्त्रपंचीकृतभूतेषु लीनानि भवंति तान्यपंचीकृतानि भूतानि सत्त्वादिगुणसहितानि स्वकारणज्ञानोपहितचैतन्ये लीनानि भवंति तच्चाज्ञानं तदुपहितचैतन्यं सर्वज्ञत्वादिविशिष्टंच स्वाधा- रभूतानुपहितचैतन्ये लीनं भवति चैतन्यमेवावशिष्यत इत्य- र्थः । फलितमाह । आभ्यामिति। तत्त्वंपदार्थशोधनप्रकारं प्र- तिजानीते । तथाहीति । अज्ञानं तदवच्छिन्नेश्वरचैतन्यं तद- नुपहितचैतन्यं चैतत्त्रयं तप्तायःपिंडवदन्योन्येन तादात्म्या- ध्यासेनेकत्वेन प्रतीयमानं सत् तत्पदवाच्यार्थो भवतीत्यर्थः । तत्पदलक्ष्यार्थमाह । एतदुपाधीति । अज्ञानावच्छिन्नेश्वर-

संस्कृतटीका-भाषाटीकासमेत । ( ७७ ) चैतन्ययोराधारभूतं यदनुपहितं चैतन्यं तत्ताभ्यां विविक्तं सद्भेदाविवक्षया तत्पदलक्ष्यार्थो भवतीत्यर्थः ॥ ७३ ॥ ( भा० टी० ) भ्रमके नष्ट होनेपर जिसप्रकार यह सम्पूर्ण प्रपञ्च अपने २ कारणमें लीन होकर ब्रह्मरूपमें अवस्थित होता है सो दिखाते हैं । - “स्थूलभोगका स्थानस्वरूप चार प्रकारका स्थूलशरीर और भोग्य अन्नपानादि इन सबके आ- धारस्वरूप भूलोकको आदिले चौदह लोक और इन्हीं सबके वर्त्तमान स्थानस्वरूप ब्रह्माण्ड यह सम्पूर्ण पञ्चीकृत पञ्चमहा- भूत मात्र है । शब्द स्पर्शादि विषयों सहित यह संपूर्ण पञ्ची- कृत पञ्चभूत और सूक्ष्मशरीर यह सब अपने अपने कारण रूप अपञ्चीकृत पञ्चमहाभूतमात्र हैं सत्त्व आदि गुणयुक्त यह सम्पूर्ण अपञ्चीकृत पञ्चमहाभूत उत्पत्तिके उलटे क्रमसे अर्था- त् पृथिवी जलसे जल अग्निसे अग्नि वायुसे वायु आकाशसे और आकाश अज्ञानसे इसप्रकार कारणरूप अज्ञानोपहित कारणरूप चैतन्य मात्र है । यही अज्ञान और अज्ञानोपहित चैतन्यरूप ईश्वरको आदिले सबही उसके आधारभूत अनु- पहित चैतन्यरूप तुरीय ब्रह्म है पूर्वोक्त अध्यारोप और अप- वादमें कहीहुई रीति के द्वारा “तत्” और “त्वम्” इन दोनों पदार्थोंका शोधन( सङ्गति ) ठीक होती है अज्ञानादिकी सम- ष्टि अर्थात् अज्ञान, सूक्ष्मशरीर और स्थूलशरीरकी समष्टि तदुपहित चैतन्य अर्थात् ईश्वर, हिरण्यगर्भ और विराट्र चै- तन्य, और अनुपहित चैतन्य, तुरीय ब्रह्म चैतन्य, यह तीन

( ७८ ) वेदान्तसार । प्रकारके पदार्थ दग्ध(तपेहुए)लोहकी तरह अतिरिक्तरूप“तत्” इस पदके वाच्य होते हैं और अज्ञानादिकी समष्टिरूप उपाधि और तदुपहित ईश्वरादि चैतन्यका आधारभूत तुरीयब्रह्मचै- तन्य “तत्” पदका लक्ष्यार्थ होता है ॥ ७३ ॥ अज्ञानादिव्यष्टिः तदुपहितालपज्ञत्वादिविशिष्ट- चैतन्यं एतदनुपहितं चैतन्यञ्चैतत्त्रयं तप्तायःपि- ण्डवदेकत्वेन भासमानं त्वंपदवाच्यो भवति। एत- दुपाध्युपहिताधारभूतमनुपहितं प्रत्यगानन्दं तुरी- यं चैतन्यं त्वंपदलक्ष्यार्थो भवति ॥ ७४ ॥ ( सं० टी० ) त्वंपदवाच्यार्थमाह। अज्ञानादीति। व्यष्टि- भूतपदज्ञानमंतःकरणं तदवच्छिन्नं जीवचैतन्यं तदनुपहितं चै तन्यं चैतत्त्रयं तप्तायःपिंडवत्परस्परतादात्म्याध्यासेनाभेदवि- वक्षया त्वंपदवाच्यार्थो भवतीत्यर्थः। लक्ष्यार्थमाह। एतदुपा- धीति। अंतःकरणोपहितचैतन्यस्याधारभूतंयदनुपहितं प्रत्यगा- त्मानंदं तुरीयं चैतन्यं त्वंपदलक्ष्यार्थो भवतीत्यर्थः ॥ ७४ ॥ ( भा० टी० ) अज्ञानादिकी व्यष्टि अर्थात् अज्ञान, सू- क्ष्मशरीर और स्थूलशरीर तदुपहितचैतन्य अर्थात् प्राज्ञ तैजस और विश्व तथा अनुपहित चैतन्य अर्थात् तुरीय ब्रह्म चैतन्य, ये तीनों तपेहुए लोहपिण्डकी तरह अभिन्नरूप “त्वम्” पदके वाच्य होते हैं तथा अज्ञानादिकी व्यष्टि और प्राज्ञ आदि चैतन्यका आधारस्वरूप अनुपहित आनन्दरूप तु- रीयब्रह्मचैतन्य “त्वम्” इस पदका लक्ष्यार्थ होता है ॥ ७४ ॥

·संस्कृतटीका-भाषाटीकासमेत । ( ७९ ) अथ महावाक्यार्थो वर्ण्यते । इदं तत्त्वमसि वाक्यं सम्बन्धत्रयेण अखण्डार्थबोधकं भवति । सम्बन्ध- त्रयं नाम पदयोः सामानाधिकरण्यं पदार्थयोर्वि- शेषणविशेष्यभावः प्रत्यगात्मपदार्थयोर्लक्ष्यलक्ष- णभावश्चेति । यदुक्तम्-“सामानाधिकरण्यं च वि- शेषणविशेष्यता। लक्ष्यलक्षणसम्बन्धः पदार्थप्रत्य- गात्मनाम्”इति ॥ ७५ ॥ ( सं०टी० ) पदार्थमभिधाय वाक्यार्थमाह। अथेति। ननु जीवेश्वरयोः किंचिज्ज्ञत्वसर्वज्ञत्वादिविशिष्टयोरत्यंतविलक्षण- योः तत्त्वमस्यादिमहावाक्यानि परस्परविरुद्धार्थप्रतिपादकानि कथमखंडैकरसं ब्रह्म प्रतिपादयंतीत्याशंक्य साक्षादैक्यप्रतिपा- दकत्वाभावेपि लक्षणया संबंधत्रयेणाखंडैकार्थ प्रतिपादयंती- त्याह । इदमिति । संबंधत्रयस्वरूपमाह । संबंधत्रयमिति । पद- पदार्थप्रत्यगात्मनांसंबंधत्रयसद्भावे वृद्धसंमतिमाह। यदुक्तमिति। ( भा०टी० ) अब महावाक्यके अर्थका विचार कर- ते हैं—“तत्त्वमसि” यह वाक्य तीन प्रकारके सम्बन्धोंके द्वा- रा अखंड ब्रह्म चैतन्यका बोधक होता है सम्बन्ध त्रय कहाते हैं—पहला सामानाधिकरण्य,दूसरा विशेष्यविशेषणभाव, ती- सरा लक्ष्यलक्षणभाव, “तत्” और “त्वम्” इनदोनों पदों- की एक अधिकरणमें अवस्थिति होनेपर सामानाधिकरण्य सम्बन्ध होता है दोनों पदोंका परस्पर विशेष्यविशेषण रूप सम्बन्धको विशेष्यविशेषणभाव कहतेहैं । और प्रत्यगा-

(८०) वेदान्तसार । त्मा लक्ष्य और दोनों पद लक्षण इस प्रकारके सम्बन्धको लक्ष्यलक्षणभाव सम्बन्ध कहते हैं ग्रन्थान्तरमें कहा भी है-“सामानाधिकरण्य, विशेष्यविशेषणभाव, और लक्ष्यल- क्षण भाव, यह तीन प्रकारका सम्बन्ध है” ॥ ७५ ॥ सामानाधिकरण्यसम्बन्धस्तावत् यथा सोऽयं देव- दत्त इति वाक्ये तत्कालविशिष्टदेवदत्तवाचकश- ब्दस्य एतत्कालविशिष्टवाचकायंशब्दस्य च एक- स्मिन्देवदत्तपिण्डे तात्पर्यसम्बन्धः । तथा च “तत्त्वमसि” वाक्येऽपि परोक्षत्वादिविशिष्टचै- तन्यवाचकतच्छब्दस्या-परोक्षत्वादि विशिष्ट-चै- तन्यवाचक-त्वंपदस्य चैकस्मिन् चैतन्ये तात्प- र्य्यसम्बन्धः ॥ ७६ ॥ (सं०टी०) पदयोः सामानाधिकरण्यं उदाहरणनिष्ठं कृ- त्वा प्रदर्शयति । सामानाधिकरण्यमिति । भिन्नप्रवृत्तिनि- मित्तयोः शब्दयोरेकस्मिन्नर्थे प्रवृत्तिः सामानाधिरण्यं तत्र सोयं देवदत्त इति वाक्ये स इति तत्कालतद्देशवैशिष्ट्यं स श- ब्दस्य प्रवृत्तिनिमितं अयमिति एतत्कालैतद्देशवैशिष्ट्यमयंश- ब्दस्य प्रवृत्तिनिमित्तं यथा च भिन्नप्रवृत्तिनिमित्तयोः सोयं शब्दयोरेकस्मिन् देवदत्तपिंडे तात्पर्य संबंधःसामानाधिकरण्य- मित्यर्थः।उक्तमर्थं दाष्टांतिके योजयति।तथाचेति। तथा तत्त्व- मसीति वाक्येपि परोक्षत्वसर्वज्ञत्वादिवैशिष्ट्यं तत्पदप्रवृत्तिनि- मित्तं अपरोक्षत्वकिंचिज्ज्ञत्वादिवैशिष्ट्यं त्वंपदप्रवृत्तिनिमित्तं

संस्कृतटीका-भाषाटीकासमेत । ( ८१ ) तथा च भिन्नप्रवृत्तिनिमित्तयोः तत्त्वंपदयोरेकस्मिंश्चैतन्ये ता- त्पर्य्यं संबंधः सामानाधिकरण्यमित्यर्थः ॥ ७६ ॥ ( भा०टी० )अब सामानाधिकरण्य सम्बन्ध दिखला- ते हैं। जैसे “सोऽयं देवदत्तः” इसवाक्यमें “सः” शब्दसे पहले देखीहुई वस्तुका बोध होताहै और “अयम्”शब्दसे वर्त्तमान दृष्ट वस्तुका बोध होता है और दोनों शब्दार्थोंका एक देवदत्त व्यक्तिमें बोध होता है। इसी प्रकार “तत्त्वमसि” इस वाक्यमें भी अप्रत्यक्ष चैतन्यका बोधक “तत्” शब्द है और प्रत्यक्ष चैतन्यका बोधक“त्वम् ”शब्द है इनदोनों शब्दार्थोंका एक चैतन्यमय ब्रह्ममें तात्पर्य है। यही सामानाधिकरण्य सम्बधहै। विशेषणविशेष्यभावसम्बन्धस्तु यथा तत्रैव वाक्ये सशब्दार्थतत्कालविशिष्टदेवदत्तस्यायं--शब्दार्थै- तत्कालविशिष्टदेवदत्तस्य चान्योन्यभेदव्यावर्त्त- कतया विशेषणविशेष्यभावः । तथात्रापि वाक्ये तत्पदार्थपरोक्षत्वादिविशिष्टचैतन्यस्य त्वंपदार्था परोक्षत्वादिविशिष्टचैतन्यस्य चान्योन्यभेदव्या- वर्त्तकतया विशेषणविशेष्यभावः ॥ ७७ ॥ ( सं०टी० ) विशेषणविशेष्यभावसंबधस्वरूपमाह । वि- शेषणेति । व्यावर्तकं विशेषणं व्यावत्र्त्यं विशेष्यम् । तथा च “सोयं देवदत्तः”इति वाक्ये एवायंशब्दवाच्यो योसावेतत्काले तद्देशसंबंधविशिष्टो देवदत्तपिंडः अयं स इति तच्छब्दवाच्या- त्कालतद्देशविशिष्टदेवदत्तपिंडाद्भिन्नो नेति यदा प्रतीयते त-

( ८२ ) वेदान्तसार । दा तच्छब्दार्थस्यायंशब्दवाच्यार्थनिष्ठभेदव्यावर्तकतया विशे- षणत्वं अयंशब्दार्थस्य व्यावर्त्यत्वाद्दिशेष्यत्वं यदा च स इ- ति तच्छब्दवाच्यः तत्कालतेद्देशविशिष्टो देवदत्तपिंडः स अय- मितीदंशब्दवाच्यादेतत्कार्लैतद्देशसंबंधविशिष्टादस्माद्देवदत्तपिं- डान्न भिद्यत इति यदा प्रतिपद्यते तदायंशब्दवाच्यस्य तच्छ- ब्दार्थनिष्ठभेदव्यावर्तकतया विशेषणत्वं तच्छब्दार्थस्य व्याव- र्तकत्वाद्दिशेष्यत्वं तथा चायमेव सः स एवायमिति अन्योन्य- भेदव्यावर्तकतया सोऽयंशब्दार्थयोः परस्परविशेषणविशेष्य- भाव इत्यर्थः।उक्तं विशेषणविशेष्यभावं दार्ष्टांतिके योजयति। तथात्रापीति । इहापि तत्त्वमसीति वाक्येपि त्वंपदवाच्यं यदप- रोक्षत्वं किंचिज्ज्ञत्वादिविशिष्टं तत्पदवाच्यात्सर्वज्ञत्वादिवि- शिष्टचैतन्यान्न भिद्यते इति यदा प्रतीयते तदा तच्छब्दार्थस्य त्वंपदार्थनिष्ठभेदव्यावर्तकतया विशेषणत्वं त्वंपदार्थस्य व्या- वृत्यत्वात् विशेष्यत्वं यदा च तत्पदवाच्ययत्तसर्वज्ञत्वादिवि- शिष्टचैतन्यं त्वंपदवाच्यात्किंचिज्ज्ञत्वादिविशिष्टचैतन्यान्न भिद्यत इति यदा प्रतीयते तदा त्वंपदार्थस्य तत्पदार्थनिष्ठभेद- व्यावर्तकत्वेन विशेषणत्वं तत्पदार्थस्य व्यावृत्यत्वात् विशे- ष्यत्वं तथा च त्वं तदसि तत्त्वमसीति तत्त्वंपदार्थयोः परस्परं भेदव्यावर्तकत्वेन परस्परं विशेषणविशेष्यभाव इत्यर्थः ॥ ७७ ॥ ( भा०टी० ) अब विशेष्यविशेषणभाव सम्बन्ध दिख- लाते हैं। जैसे-पहले कहे हुए “ सोऽयं देवदत्तः” इस वा- क्यमें “ सः” पदका अर्थ पहले देखी हुई व्यक्तिका बो-

संस्कृतटीका-भाषाटीकासमेत । ( ८३ ) धक होताहै और “अयम्” पद का अर्थ वर्त्तमान काल में दृ- ष्टिगोचर वस्तुका बोधक होता है और इन दोनोंपदोंके अ- र्थोंका परस्पर विशेष्यविशेषणरूप सम्बन्ध है क्योंकि ए- कही व्यक्तिमें दोनों पदोंके अर्थोंका तात्पर्य्य अभिन्नरूपसे मालूम होता है । तिसी प्रकार “तत्त्वमसि” इस वाक्यमें भी “तत्” पदका अर्थ अप्रत्यक्ष चैतन्य और “त्वम्” पदका अ- र्थ प्रत्यक्ष चैतन्य है इन दोनों पदोंके अर्थोंका परस्पर वि- शेष्यविशेषणभाव सम्बन्ध है क्योंकि दोनों पदोंके अर्थों का एक वस्तु में अभिन्न रूप से तात्पर्य्य मालूम होता है ॥ ७७ ॥ लक्ष्यलक्षणभावसम्बन्धस्तु यथा तत्रैव सशब्दायं- शब्दयोस्तदर्थयोर्वा विरुद्धतत्कालैतत्कालविशिष्ट- त्वपरित्यागेन अविरुद्धदेवदत्तेन सह लक्ष्यलक्षण- भावः । तथात्रापि वाक्ये तत्त्वंपदयोस्तदर्थयोर्वा विरुद्धपरोक्षत्वापरोक्षत्वादिविशिष्टत्वपरित्यागेन विरुद्धचैतन्येन सह लक्ष्यलक्षणभावः । इयमेव भागलक्षणेत्युच्यते ॥ ७८ ॥ ( सं०टी० ) क्रमप्राप्तं लक्ष्यलक्षणभावसंबंधस्वरूपं निरू- पयितुमाह । लक्ष्यलक्षणेति । असाधारणधर्मप्रतिपादकं वा- क्यं लक्षणवाक्यं तत्प्रतिपाद्यमवशिष्टं वस्तु लक्ष्यं तथाच सोयं देवदत्त इत्यस्मिन्नेव वाक्ये सोऽयंशब्दयोः तदर्थयोर्वा वि- रुद्धतत्कालतद्देशएतत्कालैतद्देशविशिष्टत्वपरिहारेणाविरुद्धदे- वदत्तपिंडेन सह लक्ष्यलक्षणभावसंबंध इत्यर्थः । उक्तमर्थं दा-