भारतकोश
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विष्णु पुराण

Vishnu Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished558 पृष्ठ

अ० २ ] * प्रथम अंश * १३


त्वक् चक्षुर्नासिका जिह्वा श्रोत्रमत्र च पञ्चमम्।
शब्दादीनामवाप्त्यर्थं बुद्धियुक्तानि वै द्विज ॥ ४८
पायूपस्थौ करौ पादौ वाक् च मैत्रेय पञ्चमी।
विसर्गाशिल्पगत्युक्ति कर्म तेषां च कथ्यते ॥ ४९
आकाशवायुतेजांसि सलिलं पृथिवी तथा।
शब्दादिभिर्गुणैर्ब्रह्मन्संयुक्तान्युत्तरोत्तरैः ॥ ५०
शान्ता घोराश्च मूढाश्च विशेषास्तेन ते स्मृताः ॥ ५१
नानावीर्याः पृथग्भूतास्ततस्ते संहतिं विना।
नाशक्नुवन्प्रजाः स्रष्टुमसमागम्य कृत्स्नशः ॥ ५२
समेत्यान्योन्यसंयोगं परस्परसमाश्रयाः।
एकसङ्घातलक्ष्याश्च सम्प्राप्यैक्यमशेषतः ॥ ५३
पुरुषाधिष्ठितत्वाच्च प्रधानानुग्रहेण च।
महदाद्या विशेषाsub:न्ता ह्यण्डमुत्पादयन्ति ते ॥ ५४
तत्क्रमेण विवृद्धं सज्जलबुद्बुदवत्समम्।
भूतेभ्योऽण्डं महाबुद्धे महत्तदुदकेशयम्।
प्राकृतं ब्रह्मरूपस्य विष्णोः स्थानमनुत्तमम् ॥ ५५
तत्राव्यक्तस्वरूपोऽसौ व्यक्तरूपो जगत्पतिः।
विष्णुर्ब्रह्मस्वरूपेण स्वयमेव व्यवस्थितः ॥ ५६
मेरुरुल्बमभूत्तस्य जरायुश्च महीधराः।
गर्भोदकं समुद्राश्च तस्यासन्सुमहात्मनः ॥ ५७
साद्रिद्वीपसमुद्राश्च सज्योतिर्लोकसंग्रहः।
तस्मिन्नण्डेऽभवद्विप्र सदेवासुरमानुषः ॥ ५८
वारिवह्न्यनिलाकाशैस्ततो भूतादिना बहिः।
वृतं दशगुणैरण्डं भूतादिर्महता तथा ॥ ५९
अव्यक्तेनावृतो ब्रह्मंस्तैः सर्वैः सहितो महान्।
एभिरावरणेरण्डं सप्तभिः प्राकृतैर्वृतम्।
नारिकेलफलस्यान्तर्बीजं बाह्यदलैरिव ॥ ६०
जुषन् रजो गुणं तत्र स्वयं विश्वेश्वरो हरिः।
ब्रह्मा भूत्वास्य जगतो विसृष्टौ सम्प्रवर्त्तते ॥ ६१


हे द्विज! त्वक्, चक्षु, नासिका, जिह्वा और श्रोत्र—ये पाँचों बुद्धिकी सहायतासे शब्दादि विषयोंको ग्रहण करनेवाली पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ हैं॥ ४८॥ हे मैत्रेय! पायु (गुदा), उपस्थ (लिंग), हस्त, पाद और वाक्—ये पाँच कर्मेन्द्रियाँ हैं। इनके कर्म [मल-मूत्रका] त्याग, शिल्प, गति और वचन बतलाये जाते हैं॥ ४९॥ आकाश, वायु, तेज, जल और पृथिवी—ये पाँचों भूत उत्तरोत्तर (क्रमशः) शब्द-स्पर्श आदि पाँच गुणोंसे युक्त हैं॥ ५०॥ ये पाँचों भूत शान्त घोर और मूढ हैं [अर्थात् सुख, दुःख और मोहयुक्त हैं] अतः ये विशेष कहलाते हैं* ॥ ५१ ॥

इन भूतोंमें पृथक्-पृथक् नाना शक्तियाँ हैं। अतः वे परस्पर पूर्णतया मिले बिना संसारकी रचना नहीं कर सके॥ ५२॥ इसलिये एक-दूसरेके आश्रय रहनेवाले और एक ही संघातकी उत्पत्तिके लक्ष्यवाले महत्तत्त्वसे लेकर विशेषपर्यन्त प्रकृतिके इन सभी विकारोंने पुरुषसे अधिष्ठित होनेके कारण परस्पर मिलकर सर्वथा एक होकर प्रधान-तत्त्वके अनुग्रहसे अण्डकी उत्पत्ति की॥ ५३-५४॥ हे महाबुद्धे! जलके बुलबुलेके समान क्रमशः भूतोंसे बढ़ा हुआ वह गोलाकार और जलपर स्थित महान् अण्ड ब्रह्म (हिरण्यगर्भ) रूप विष्णुका अति उत्तम प्राकृत आधार हुआ॥ ५५॥ उसमें वे अव्यक्त-स्वरूप जगत्पति विष्णु व्यक्त हिरण्यगर्भरूपसे स्वयं ही विराजमान हुए॥ ५६॥ उन महात्मा हिरण्यगर्भका सुमेरु उल्ब (गर्भको ढँकनेवाली झिल्ली), अन्य पर्वत, जरायु (गर्भशय) तथा समुद्र गर्भशयस्थ रस था॥ ५७॥ हे विप्र! उस अण्डमें ही पर्वत और द्वीपादिके सहित समुद्र, ग्रह-गणके सहित सम्पूर्ण लोक तथा देव, असुर और मनुष्य आदि विविध प्राणिवर्ग प्रकट हुए॥ ५८॥ वह अण्ड पूर्व-पूर्वकी अपेक्षा दस-दस-गुण अधिक जल, अग्नि, वायु, आकाश और भूतादि अर्थात् तामस-अहंकारसे आवृत है तथा भूतादि महत्तत्त्वसे घिरा हुआ है॥ ५९॥ और इन सबके सहित वह महत्तत्त्व भी अव्यक्त प्रधानसे आवृत है। इस प्रकार जैसे नारियलके फलका भीतरी बीज बाहरसे कितने ही छिलकोंसे ढँका रहता है वैसे ही यह अण्ड इन सात प्राकृत आवरणोंसे घिरा हुआ है॥ ६०॥

उसमें स्थित हुए स्वयं विश्वेश्वर भगवान् विष्णु ब्रह्मा होकर रजोगुणका आश्रय लेकर इस संसारकी रचनामें प्रवृत्त होते हैं॥ ६१॥


* परस्पर मिलनेसे सभी भूत शान्त, घोर और मूढ प्रतीत होते हैं, पृथक्-पृथक् तो पृथिवी और जल शान्त हैं, तेज और वायु घोर हैं तथा आकाश मूढ है।

१४* श्रीविष्णुपुराण *[ अ० ३
सृष्टं च पात्यनुयुगं यावत्कल्पविकल्पना।<br>सत्त्वभृद्भगवान् विष्णुरप्रमेयपराक्रमः ॥ ६२<br><br>तमोद्रेकी च कल्पान्ते रुद्ररूपी जनार्दनः।<br>मैत्रेयाखिलभूतानि भक्षयत्यतिदारुणः ॥ ६३<br><br>भक्षयित्वा च भूतानि जगत्येकार्णवीकृते।<br>नागपर्यङ्कशयने शेते च परमेश्वरः ॥ ६४<br><br>प्रबुद्धश्च पुनः सृष्टिं करोति ब्रह्मारूपधृक् ॥ ६५<br><br>सृष्टिस्थित्यन्तकरणीं ब्रह्मविष्णुशिवात्मिकाम्।<br>स संज्ञां याति भगवानेक एव जनार्दनः ॥ ६६<br><br>स्रष्टा सृजति चात्मानं विष्णुः पाल्यं च पाति च।<br>उपसंह्रियते चान्ते संहर्ता च स्वयं प्रभुः ॥ ६७<br><br>पृथिव्यापस्तथा तेजो वायुराकाश एव च।<br>सर्वेन्द्रियान्तःकरणं पुरुषाख्यं हि यज्जगत् ॥ ६८<br><br>स एव सर्वभूतात्मा विश्वरूपो यतोऽव्ययः।<br>सर्गादिकं तु तस्यैव भूतस्थमुपकारकम् ॥ ६९<br><br>स एव सृज्यः स च सर्गकर्ता<br>   स एव पात्यत्ति च पाल्यते च।<br>ब्रह्माद्यवस्थाभिरशेषमूर्ति-<br>   र्विष्णुर्वरिष्ठो वरदो वरेण्यः ॥ ७०तथा रचना हो जानेपर सत्त्वगुण-विशिष्ट अतुल पराक्रमी भगवान् विष्णु उसका कल्पान्तपर्यन्त युग-युगमें पालन करते हैं॥ ६२॥ हे मैत्रेय! फिर कल्पका अन्त होनेपर अति दारुण तमःप्रधान रुद्ररूप धारण कर वे जनार्दन विष्णु ही समस्त भूतोंका भक्षण कर लेते हैं॥ ६३॥ इस प्रकार समस्त भूतोंका भक्षण कर संसारको जलमय करके वे परमेश्वर शेषशय्यापर शयन करते हैं॥ ६४॥ जगनेपर ब्रह्मारूप होकर वे फिर जगत्‌की रचना करते हैं॥ ६५॥ वह एक ही भगवान् जनार्दन जगत्‌की सृष्टि, स्थिति और संहारके लिये ब्रह्मा, विष्णु और शिव—इन तीन संज्ञाओंको धारण करते हैं॥ ६६॥ वे प्रभु विष्णु स्रष्टा (ब्रह्मा) होकर अपनी ही सृष्टि करते हैं, पालक विष्णु होकर पाल्यरूप अपना ही पालन करते हैं और अन्तमें स्वयं ही संहारक (शिव) तथा स्वयं ही उपसंहृत (लीन) होते हैं॥ ६७॥ पृथिवी, जल, तेज, वायु और आकाश तथा समस्त इन्द्रियाँ और अन्तःकरण आदि जितना जगत् है सब पुरुषरूप है और क्योंकि वह अव्यय विष्णु ही विश्वरूप और सब भूतोंके अन्तरात्मा हैं, इसलिये ब्रह्मादि प्राणियोंमें स्थित सर्गादिक भी उन्हींके उपकारक हैं। [अर्थात् जिस प्रकार ऋत्विजोंद्वारा किया हुआ हवन यजमानका उपकारक होता है, उसी तरह परमात्माके रचे हुए समस्त प्राणियोंद्वारा होनेवाली सृष्टि भी उन्हींकी उपकारक है ]॥ ६८-६९॥ वे सर्वस्वरूप, श्रेष्ठ, वरदायक और वरेण्य (प्रार्थनाके योग्य) भगवान् विष्णु ही ब्रह्मा आदि अवस्थाओं‌द्वारा रचनेवाले हैं, वे ही रचे जाते हैं, वे ही पालते हैं, वे ही पालित होते हैं तथा वे ही संहार करते हैं [और स्वयं ही संहृत होते हैं ]॥ ७०॥

इति श्रीविष्णुपुराणे प्रथमेंऽशे द्वितीयोऽध्यायः ॥ २ ॥


तीसरा अध्याय

ब्रह्मादिकी आयु और कालका स्वरूप

श्रीमैत्रेय उवाच<br>निर्गुणस्याप्रमेयस्य शुद्धस्याप्यमलात्मनः।<br>कथं सर्गादिकर्तृत्वं ब्रह्मणोऽभ्युपगम्यते ॥ १**श्रीमैत्रेयजी बोले—**हे भगवन्! जो ब्रह्म निर्गुण, अप्रमेय, शुद्ध और निर्मलात्मा है उसका सर्गादिका कर्ता होना कैसे सिद्ध हो सकता है?॥ १॥

अ० ३ ] * प्रथम अंश * १५


श्रीपराशर उवाच**श्रीपराशरजी बोले—**हे तपस्वियोंमें श्रेष्ठ मैत्रेय!
शक्तयः सर्वभावानामचिन्त्यज्ञानगोचराः।<br>यतोऽतो ब्रह्मणस्तास्तु सर्गाद्या भावशक्तयः।<br>भवन्ति तपतां श्रेष्ठ पावकस्य यथोष्णता॥ २समस्त भाव-पदार्थोंकी शक्तियाँ अचिन्त्य-ज्ञानकी विषय होती हैं; [उनमें कोई युक्ति काम नहीं देती] अतः अग्निकी शक्ति उष्णताके समान ब्रह्मकी भी सर्गादि-रचनारूप शक्तियाँ स्वाभाविक हैं॥ २॥
तन्निबोध यथा सर्गे भगवान्सम्प्रवर्त्तते।<br>नारायणाख्यो भगवान्ब्रह्मा लोकपितामहः॥ ३<br>उत्पन्नः प्रोच्यते विद्वन्नित्यमेवोपचारतः॥ ४अब जिस प्रकार नारायण नामक लोक-पितामह भगवान् ब्रह्माजी सृष्टिकी रचनामें प्रवृत्त होते हैं सो सुनो। हे विद्वन्! वे सदा उपचारसे ही ‘उत्पन्न हुए’ कहलाते हैं॥ ३-४॥
निजेन तस्य मानेन आयुर्वर्षशतं स्मृतम्।<br>तत्पराख्यं तदर्द्धं च परार्द्धमभिधीयते॥ ५उनके अपने परिमाणसे उनकी आयु सौ वर्षकी कही जाती है। उस (सौ वर्ष)-का नाम पर है, उसका आधा परार्द्ध कहलाता है॥ ५॥
कालस्वरूपं विष्णोश्च यन्मयोक्तं तवानघ।<br>तेन तस्य निबोध त्वं परिमाणोपपादनम्॥ ६<br>अन्येषां चैव जन्तूनां चराणामचराश्च ये।<br>भूभूभृत्सागरादीनामशेषाणां च सत्तम॥ ७हे अनघ! मैंने जो तुमसे विष्णुभगवान्का कालस्वरूप कहा था उसीके द्वारा उस ब्रह्माकी तथा और भी जो पृथिवी, पर्वत, समुद्र आदि चराचर जीव हैं उनकी आयुका परिमाण किया जाता है॥ ६-७॥
काष्ठा पञ्चदशाख्याता निमेषा मुनिसत्तम।<br>काष्ठा त्रिंशत्कला त्रिंशत्कला मौहूर्तिको विधिः॥ ८हे मुनिश्रेष्ठ! पन्द्रह निमेषको काष्ठा कहते हैं, तीस काष्ठाकी एक कला तथा तीस कलाका एक मुहूर्त होता है॥ ८॥
तावत्संख्यैरहोरात्रं मुहूर्त्तैर्मानुषं स्मृतम्।<br>अहोरात्राणि तावन्ति मासः पक्षद्वयात्मकः॥ ९तीस मुहूर्तका मनुष्यका एक दिन-रात कहा जाता है और उतने ही दिन-रातका दो पक्षयुक्त एक मास होता है॥ ९॥
तैः षड्भिरयनं वर्षं द्वेऽयने दक्षिणोत्तरे।<br>अयनं दक्षिणं रात्रिर्देवानामुत्तरं दिनम्॥ १०छः महीनोंका एक अयन और दक्षिणायन तथा उत्तरायण दो अयन मिलकर एक वर्ष होता है। दक्षिणायन देवताओंकी रात्रि है और उत्तरायण दिन॥ १०॥
दिव्यैर्वर्षसहस्त्रैस्तु कृतत्रेतादिसंज्ञितम्।<br>चतुर्युगं द्वादशभिस्तद्विभागं निबोध मे॥ ११देवताओंके बारह हजार वर्षोंके सत्युग, त्रेता, द्वापर और कलियुग नामक चार युग होते हैं। उनका अलग-अलग परिमाण मैं तुम्हें सुनाता हूँ॥ ११॥
चत्वारि त्रीणि द्वे चैकं कृतादिषु यथाक्रमम्।<br>दिव्याब्दानां सहस्त्राणि युगेष्वाहुः पुराविदः॥ १२पुरातत्त्वके जाननेवाले सत्युग आदिका परिमाण क्रमशः चार, तीन, दो और एक हजार दिव्य वर्ष बतलाते हैं॥ १२॥
तत्प्रमाणैः शतैः सन्ध्या पूर्वा तत्राभिधीयते।<br>सन्ध्यांशश्चैव तत्तुल्यो युगस्यानन्तरो हि सः॥ १३प्रत्येक युगके पूर्व उतने ही सौ वर्षकी सन्ध्या बतायी जाती है और युगके पीछे उतने ही परिमाणवाले सन्ध्यांश होते हैं [अर्थात् सत्युग आदिके पूर्व क्रमशः चार, तीन, दो और एक सौ दिव्य वर्षकी सन्ध्याएँ और इतने ही वर्षके सन्ध्यांश होते हैं]॥ १३॥
सन्ध्यासन्ध्यांशयोरन्तर्यः कालो मुनिसत्तम।<br>युगाख्यः स तु विज्ञेयः कृतत्रेतादिसंज्ञितः॥ १४हे मुनिश्रेष्ठ! इन सन्ध्या और सन्ध्यांशोंके बीचका जितना काल होता है, उसे ही सत्युग आदि नामवाले युग जानना चाहिये॥ १४॥
कृतं त्रेता द्वापरश्च कलिश्चैव चतुर्युगम्।<br>प्रोच्यते तत्सहस्त्रं च ब्रह्मणो दिवसं मुने॥ १५हे मुने! सत्युग, त्रेता, द्वापर और कलि ये मिलकर चतुर्युग कहलाते हैं; ऐसे हजार चतुर्युगका ब्रह्माका एक दिन होता है॥ १५॥
ब्रह्मणो दिवसे ब्रह्मन्मनवस्तु चतुर्दश।<br>भवन्ति परिमाणं च तेषां कालकृतं शृणु॥ १६हे ब्रह्मन्! ब्रह्माके एक दिनमें चौदह मनु होते हैं। उनका कालकृत परिमाण सुनो॥ १६॥
सप्तर्षयः सुराः शक्रो मनुस्तत्सूनवो नृपाः।<br>एककाले हि सृज्यन्ते संह्रियन्ते च पूर्ववत्॥ १७सप्तर्षि, देवगण, इन्द्र, मनु और मनुके पुत्र राजालोग [पूर्वकल्पानुसार] एक ही कालमें रचे जाते हैं और एक ही कालमें उनका संहार किया जाता है॥ १७॥

१६ * श्रीविष्णुपुराण * [ अ० ४


चतुर्युगाणां संख्याता साधिका ह्येकसप्ततिः।
मन्वन्तरं मनोः कालः सुरादीनां च सत्तम ॥ १८

अष्टौ शत सहस्त्राणि दिव्यया संख्यया स्मृतम्।
द्विपञ्चाशत्तथान्यनि सहस्त्राण्यधिकानि तु ॥ १९

त्रिंशत्कोट्यस्तु सम्पूर्णाः संख्याताः संख्यया द्विज।
सप्तषष्टिस्तथान्यनि नियुतानि महामुने ॥ २०

विंशतिस्तु सहस्राणि कालोऽयमधिकं विना।
मन्वन्तरस्य सङ्ख्येयं मानुषैर्वत्सरैर्द्विज ॥ २१

चतुर्दशगुणो ह्येष कालो ब्राह्ममहः स्मृतम्।
ब्राह्मो नैमित्तिको नाम तस्यान्ते प्रतिसञ्चरः ॥ २२

तदा हि दह्यते सर्वं त्रैलोक्यं भूर्भुवादिकम्।
जनं प्रयान्ति तापार्ता महर्लोकनिवासिनः ॥ २३

एकार्णवे तु त्रैलोक्ये ब्रह्मा नारायणात्मकः।
भोगिशय्यां गतः शेते त्रैलोक्यग्रासबृंहितः ॥ २४

जनस्थैर्योगिभिर्देवैश्चिन्त्यमानोऽब्जसम्भवः।
तत्प्रमाणां हि तां रात्रिं तदन्ते सृजते पुनः ॥ २५

एवं तु ब्रह्मणो वर्षमेवं वर्षशतं च यत्।
शतं हि तस्य वर्षाणां परमायुर्महात्मनः ॥ २६

एकमस्य व्यतीतं तु परार्द्धं ब्रह्मणोऽनघ।
तस्यान्तेऽभून्महाकल्पः पाद्म इत्यभिविश्रुतः ॥ २७

द्वितीयस्य परार्द्धस्य वर्तमानस्य वै द्विज।
वाराह इति कल्पोऽयं प्रथमः परिकीर्तितः ॥ २८

हे सत्तम! इकहत्तर चतुर्युगसे कुछ अधिक* कालका एक मन्वन्तर होता है। यही मनु और देवता आदिका काल है॥ १८॥ इस प्रकार दिव्य वर्ष-गणनासे एक मन्वन्तरमें आठ लाख बावन हजार वर्ष बताये जाते हैं॥ १९॥ तथा हे महामुने! मानवी वर्ष-गणनाके अनुसार मन्वन्तरका परिमाण पूरे तीस करोड़ सरसठ लाख बीस हजार वर्ष है, इससे अधिक नहीं॥ २०-२१॥ इस कालका चौदह गुना ब्रह्माका दिन होता है, इसके अनन्तर नैमित्तिक नामवाला ब्राह्म-प्रलय होता है॥ २२॥

उस समय भूर्लोक, भुवर्लोक और स्वर्लोक तीनों जलने लगते हैं और महर्लोकमें रहनेवाले सिद्धगण अति सन्तप्त होकर जनलोकको चले जाते हैं॥ २३॥ इस प्रकार त्रिलोकीके जलमय हो जानेपर जनलोकवासी योगियोंद्वारा ध्यान किये जाते हुए नारायणरूप कमलयोनि ब्रह्माजी त्रिलोकीके ग्राससे तृप्त होकर दिनके बराबर ही परिमाणवाली उस रात्रिमें शेषशय्यापर शयन करते हैं और उसके बीत जानेपर पुनः संसारकी सृष्टि करते हैं॥ २४-२५॥ इसी प्रकार (पक्ष, मास आदि) गणनासे ब्रह्माका एक वर्ष और फिर सौ वर्ष होते हैं। ब्रह्माके सौ वर्ष ही उस महात्मा (ब्रह्मा) की परमायु हैं॥ २६॥ हे अनघ! उन ब्रह्माजीका एक परार्द्ध बीत चुका है। उसके अन्तमें पाद्म नामसे विख्यात महाकल्प हुआ था॥ २७॥ हे द्विज! इस समय वर्तमान उनके दूसरे परार्द्धका यह वाराह नामक पहला कल्प कहा गया है॥ २८॥

इति श्रीविष्णुपुराणे प्रथमेंऽशे तृतीयोऽध्यायः ॥ ३ ॥


चौथा अध्याय

ब्रह्माजीकी उत्पत्ति वराहभगवान्द्वारा पृथिवीका उद्धार और ब्रह्माजीकी लोक-रचना

श्रीमैत्रेय उवाच
ब्रह्मा नारायणाख्योऽसौ कल्पादौ भगवान्यथा।
ससर्ज सर्वभूतानि तदाचक्ष्व महामुने ॥ १

श्रीमैत्रेय बोले— हे महामुने! कल्पके आदिमें नारायणाख्य भगवान् ब्रह्माजीने जिस प्रकार समस्त भूतोंकी रचना की वह आप वर्णन कीजिये॥ १॥


* इकहत्तर चतुर्युगके हिसाबसे चौदह मन्वन्तरोंमें ९९८ चतुर्युग होते हैं और ब्रह्माके एक दिनमें एक हजार चतुर्युग होते हैं, अतः छः चतुर्युग और बचे। छः चतुर्युगका चौदहवाँ भाग कुछ कम पाँच हजार एक सौ तीन दिव्य वर्ष होता है, इस प्रकार एक मन्वन्तरमें इकहत्तर चतुर्युगके अतिरिक्त इतने दिव्य वर्ष और अधिक होते हैं।


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अ० ४ ] * प्रथम अंश * १७

श्रीपराशर उवाचश्रीपराशरजी बोले—प्रजापतियोंके स्वामी नारायणस्वरूप भगवान् ब्रह्माजीने जिस प्रकार प्रजाकी सृष्टि की थी वह मुझसे सुनो॥ २॥ पिछले कल्पका अन्त होनेपर रात्रिमें सोकर उठनेपर सत्त्वगुणके उद्रेकसे युक्त भगवान् ब्रह्माजीने सम्पूर्ण लोकोंको शून्यमय देखा॥ ३॥ वे भगवान् नारायण पर हैं, अचिन्त्य हैं, ब्रह्मा, शिव आदि ईश्वरोंके भी ईश्वर हैं, ब्रह्मस्वरूप हैं, अनादि हैं और सबकी उत्पत्तिके स्थान हैं॥ ४॥ [मनु आदि स्मृतिकार] उन ब्रह्मस्वरूप श्रीनारायणदेवके विषयमें जो इस जगत्की उत्पत्ति और लयके स्थान हैं, यह श्लोक कहते हैं॥ ५॥ नर [अर्थात् पुरुष—भगवान् पुरुषोत्तम]—से उत्पन्न होनेके कारण जलको 'नार' कहते हैं; वह नार (जल) ही उनका प्रथम अयन (निवास-स्थान) है। इसलिये भगवान्‌को 'नारायण' कहा है॥ ६॥
प्रजाः ससर्ज भगवान्ब्रह्मा नारायणात्मकः।<br>प्रजापतिपतिर्देवो यथा तन्मे निशामय॥ २
अतीतकल्पावसाने निशासुप्तोत्थितः प्रभुः।<br>सत्त्वोद्रिक्तस्तथा ब्रह्मा शून्यं लोकमवैक्षत॥ ३
नारायणः परोऽचिन्त्यः परेषामपि स प्रभुः।<br>ब्रह्मस्वरूपी भगवाननादिः सर्वसम्भवः॥ ४
इमं चोदाहरन्त्यत्र श्लोकं नारायणं प्रति।<br>ब्रह्मस्वरूपिणं देवं जगतः प्रभवोप्ययम्॥ ५
आपो नारा इति प्रोक्ता आपो वै नरसूनवः।<br>अयनं तस्य ताः पूर्वं तेन नारायणः स्मृतः॥ ६
तोयान्तःस्थां महीं ज्ञात्वा जगत्येकार्णवीकृते।<br>अनुमानात्तदुद्धारं कर्तुकामः प्रजापतिः॥ ७सम्पूर्ण जगत् जलमय हो रहा था। इसलिये प्रजापति ब्रह्माजीने अनुमानसे पृथिवीको जलके भीतर जान उसे बाहर निकालनेकी इच्छासे एक दूसरा शरीर धारण किया। उन्होंने पूर्व-कल्पोंके आदिमें जैसे मत्स्य, कूर्म आदि रूप धारण किये थे वैसे ही इस वाराह कल्पके आरम्भमें वेदयज्ञमय वाराह शरीर ग्रहण किया और सम्पूर्ण जगत्की स्थितिमें तत्पर हो सबके अन्तरात्मा और अविचल रूप वे परमात्मा प्रजापति ब्रह्माजी, जो पृथिवीको धारण करनेवाले और अपने ही आश्रयसे स्थित हैं, जन-लोकस्थित सनकादि सिद्धेश्वरोंसे स्तुति किये जाते हुए जलमें प्रविष्ट हुए॥ ७–१०॥ तब उन्हें पाताललोकमें आये देख देवी वसुन्धरा अति भक्तिविनम्रा हो उनकी स्तुति करने लगी॥ ११॥
अकरोत्स्वतनुमन्यां कल्पादिषु यथा पुरा।<br>मत्स्यकूर्मादिकां तद्वद्वाराहं वपुरास्थितः॥ ८
वेदयज्ञमयं रूपमशेषजगतः स्थितौ।<br>स्थितः स्थिरात्मा सर्वात्मा परमात्मा प्रजापतिः॥ ९
जनलोकगतैस्सिद्धैस्सनकाद्यैरभिष्टुतः।<br>प्रविवेश तदा तोयमात्माधारो धराधरः॥ १०
निरीक्ष्य तं तदा देवी पातालतलमागतम्।<br>तुष्टाव प्रणता भूत्वा भक्तिनम्रा वसुन्धरा॥ ११
पृथिव्युवाचपृथिवी बोली—हे शंख, चक्र, गदा, पद्म धारण करनेवाले कमलनयन भगवन्! आपको नमस्कार है। आज आप इस पातालतलसे मेरा उद्धार कीजिये। पूर्वकालमें आपहीसे मैं उत्पन्न हुई थी॥ १२॥ हे जनार्दन! पहले भी आपहीने मेरा उद्धार किया था। और हे प्रभो! मेरे तथा आकाशादि अन्य सब भूतोंके भी आप ही उपादान-कारण हैं॥ १३॥ हे परमात्मस्वरूप! आपको नमस्कार है। हे पुरुषात्मन्! आपको नमस्कार है। हे प्रधान (कारण) और व्यक्त (कार्य) रूप! आपको नमस्कार है। हे कालस्वरूप! आपको बारम्बार नमस्कार है॥ १४॥ हे प्रभो! जगत्की सृष्टि आदिके लिये ब्रह्मा, विष्णु और रुद्ररूप धारण करनेवाले आप ही सम्पूर्ण भूतोंकी उत्पत्ति, पालन और नाश करनेवाले हैं॥ १५॥ और जगत्के एकार्णवरूप (जलमय) हो जानेपर, हे गोविन्द! सबको भक्षणकर अन्तमें आप ही मनीषिजनोंद्वारा चिन्तित होते हुए जलमें शयन करते हैं॥ १६॥
नमस्ते पुण्डरीकाक्ष शङ्खचक्रगदाधर।<br>मामुद्धरास्मादद्य त्वं त्वत्तोऽहं पूर्वमुत्थिता॥ १२
त्वयाहमुद्धृता पूर्वं तन्मयाहं जनार्दन।<br>तथान्यानि च भूतानि गगनादीन्यशेषतः॥ १३
नमस्ते परमात्मन्पुरुषात्मन्नमोऽस्तु ते।<br>प्रधानव्यक्तभूताय कालभूताय ते नमः॥ १४
त्वं कर्ता सर्वभूतानां त्वं पाता त्वं विनाशकृत्।<br>सर्गादिषु प्रभो ब्रह्मविष्णुरुद्रात्मरूपधृक्॥ १५
सम्भक्षयित्वा सकलं जगत्येकार्णवीकृते।<br>शेषे त्वमेव गोविन्द चिन्त्यमानो मनीषिभिः॥ १६

१८ * श्रीविष्णुपुराण * [ अ० ४

भवतो यत्परं तत्त्वं तन्न जानाति कश्चन। अवतारtargetेषु यद्रूपं तदर्चन्ति दिवौकसः ॥ १७ त्वामाराध्य परं ब्रह्म याता मुक्तिं मुमुक्षवः। वासुदेवमनाराध्य को मोक्षं समवाप्स्यति ॥ १८ यत्किञ्चिन्मनसा ग्राह्यं यद्ग्राह्यं चक्षुरादिभिः। बुद्ध्या च यत्परिच्छेद्यं तद्रूपमखिलं तव ॥ १९ तन्मयाहं त्वदाधारा त्वत्सृष्टा त्वत्समाश्रया। माधवीमिति लोकोऽयमभिधत्ते ततो हि माम् ॥ २० जयाखिलज्ञानमय जय स्थूलमयाव्यय। जयाऽनन्त जयाव्यक्त जय व्यक्तमय प्रभो ॥ २१ परापरात्मन्विश्वात्मञ्जय यज्ञपतेऽनघ। त्वं यज्ञस्त्वं वषट्कारस्त्वमोङ्कारस्त्वमग्नयः ॥ २२ त्वं वेदास्त्वं तदङ्गानि त्वं यज्ञपुरुषो हरे। सूर्यादयो ग्रहास्तारा नक्षत्राण्यखिलं जगत् ॥ २३ मूर्त्तामूर्त्तमदृश्यं च दृश्यं च पुरुषोत्तम। यच्चोक्तं यच्च नैवोक्तं मयात्र परमेश्वर। तत्सर्वं त्वं नमस्तुभ्यं भूयो भूयो नमो नमः ॥ २४

श्रीपराशर उवाच

एवं संस्तूयमानस्तु पृथिव्या धरणीधरः। सामस्वरध्वनिः श्रीमाञ्जगर्ज परिघर्घरम् ॥ २५ ततः समुत्क्षिप्य धरां स्वदंष्ट्रया महावराहः स्फुटपद्मलोचनः। रसातलादुत्पलपत्रसन्निभः समुत्थितो नील इवाचलो महान् ॥ २६ उत्तिष्ठता तेन मुखानिलाहतं तत्सम्भवाम्भो जनलोकसंश्रयान्। प्रक्षालयामास हि तान्महाद्युतीन् सनन्दनादीनपकल्मषान् मुनीन् ॥ २७ प्रयान्ति तोयानि खुराग्रविक्षत- रसातलेऽधः कृतशब्दसन्तति। श्वासानिलास्ताः परितः प्रयान्ति सिद्धा जने ये नियता वसन्ति ॥ २८

हे प्रभो! आपका जो परतत्त्व है उसे तो कोई भी नहीं जानता; अतः आपका जो रूप अवतारोंमें प्रकट होता है उसीकी देवगण पूजा करते हैं ॥ १७ ॥ आप परब्रह्मकी ही आराधना करके मुमुक्षुजन मुक्त होते हैं। भला वासुदेवकी आराधना किये बिना कौन मोक्ष प्राप्त कर सकता है? ॥ १८ ॥ मनसे जो कुछ ग्रहण (संकल्प) किया जाता है, चक्षु आदि इन्द्रियोंसे जो कुछ ग्रहण (विषय) करनेयोग्य है, बुद्धिद्वारा जो कुछ विचारणीय है वह सब आपहीका रूप है ॥ १९ ॥ हे प्रभो! मैं आपहीका रूप हूँ, आपहीके आश्रित हूँ और आपहीके द्वारा रची गयी हूँ तथा आपहीकी शरणमें हूँ। इसीलिये लोकमें मुझे 'माधवी' भी कहते हैं ॥ २० ॥ हे सम्पूर्ण ज्ञानमय! हे स्थूलमय! हे अव्यय! आपकी जय हो। हे अनन्त! हे अव्यक्त! हे व्यक्तमय प्रभो! आपकी जय हो ॥ २१ ॥ हे परापर-स्वरूप! हे विश्वात्मन्! हे यज्ञपते! हे अनघ! आपकी जय हो। हे प्रभो! आप ही यज्ञ हैं, आप ही वषट्कार हैं, आप ही ओंकार हैं और आप ही (आहवनीयादि) अग्नयाँ हैं ॥ २२ ॥ हे हरे! आप ही वेद, वेदांग और यज्ञपुरुष हैं तथा सूर्य आदि ग्रह, तारे, नक्षत्र और सम्पूर्ण जगत् भी आप ही हैं ॥ २३ ॥ हे पुरुषोत्तम! हे परमेश्वर! मूर्त्त-अमूर्त्त, दृश्य-अदृश्य तथा जो कुछ मैंने कहा है और जो नहीं कहा, वह सब आप ही हैं। अतः आपको नमस्कार है, बारम्बार नमस्कार है ॥ २४ ॥

श्रीपराशरजी बोले-पृथिवीद्वारा इस प्रकार स्तुति किये जानेपर सामस्वर ही जिनकी ध्वनि है उन भगवान् धरणीधरने घर्घर शब्दसे गर्जना की ॥ २५ ॥ फिर विकसित कमलके समान नेत्रोंवाले उन महावराहने अपनी डाढ़ोंसे पृथिवीको उठा लिया और वे कमल-दलके समान श्याम तथा नीलाचलके सदृश विशालकाय भगवान् रसातलसे बाहर निकले ॥ २६ ॥ निकलते समय उनके मुखके श्वाससे उछलते हुए जलने जनलोकमें रहनेवाले महातेजस्वी और निष्पाप सनन्दनादि मुनीश्वरोंको भिगो दिया ॥ २७ ॥ जल बड़ा शब्द करता हुआ उनके खुरोंसे विदीर्ण हुए रसातलमें नीचेकी ओर जाने लगा और जनलोकमें रहनेवाले सिद्धगण उनके श्वास-वायुसे विक्षिप्त होकर इधर-उधर भागने लगे ॥ २८ ॥

अ० ४ ] * प्रथम अंश * १९


उत्तिष्ठतस्तस्य जलार्द्रकुक्षे-
र्महावराहस्य महीं विगृह्य।
विधुन्वतो वेदमयं शरीरं
रोमान्तरस्था मुनयः स्तुवन्ति॥ २९

तं तुष्टुवुस्तोषपरीतचेतसो
लोके जने ये निवसन्ति योगिनः।
सनन्दनाद्या ह्यतिनम्रकन्धरा
धराधरं धीरतरोद्धवेक्षणम्॥ ३०

जयेश्वराणां परमेश केशव
प्रभो गदाशङ्खधरासिचक्रधृक्।
प्रसूतिनाशस्थितिहेतुरीश्वर-
स्त्वमेव नान्यत्परमं च यत्पदम्॥ ३१

पादेषु वेदास्तव यूपदंष्ट्र
दन्तेषु यज्ञाश्चितयश्च वक्त्रे।
हुताशजिह्वोऽसि तनूरुहाणि
दर्भाः प्रभो यज्ञपुमांस्त्वमेव॥ ३२

विलोचने रात्र्यहनी महात्म-
न्सर्वाश्रयं ब्रह्म परं शिरस्ते।
सूक्तान्यशेषाणि सटाकलापो
घ्राणं समस्तानि हवींषि देव॥ ३३

स्रुक्तुण्ड सामस्वरधीरनाद
प्राग्वंशकायाखिलसत्रसन्धे।
पूर्तेष्टधर्मश्रवणोऽसि देव
सनातनात्मन्भगवन्प्रसीद ॥ ३४

पदक्रमाक्रान्तभुवं भवन्त-
मादिस्थितं चाक्षर विश्वमूर्ते।
विश्वस्य विद्मः परमेश्वरोऽसि
प्रसीद नाथोऽसि परावरस्य॥ ३५

दंष्ट्राग्रविन्यस्तमशेषमेतद्-
भूमण्डलं नाथ विभाव्यते ते।
विगाहतः पद्मवनं विलग्नं
सरोजिनीपत्रमिवोढपङ्कम् ॥ ३६

द्यावापृथिव्योरतुलप्रभाव
यदन्तरं तद्वपुषा तवैव।
व्याप्तं जगद्व्याप्तिसमर्थदीप्ते
हिताय विश्वस्य विभो भव त्वम्॥ ३७


जिनकी कुक्षि जलमें भीगी हुई है वे महावराह जिस समय अपने वेदमय शरीरको कँपाते हुए पृथिवीको लेकर बाहर निकले उस समय उनकी रोमावलीमें स्थित मुनिजन स्तुति करने लगे॥ २९॥ उन निश्शंक और उन्नत दृष्टिवाले धराधर भगवान्‌की जनलोकमें रहनेवाले सनन्दनादि योगीश्वरोंने प्रसन्नचित्तसे अति नम्रतापूर्वक सिर झुकाकर इस प्रकार स्तुति की॥ ३०॥

'हे ब्रह्मादि ईश्वरोंके भी परम ईश्वर! हे केशव! हे शंख-गदाधर! हे खड्ग-चक्रधारी प्रभो! आपकी जय हो। आप ही संसारकी उत्पत्ति, स्थिति और नाशके कारण हैं, तथा आप ही ईश्वर हैं और जिसे परम पद कहते हैं वह भी आपसे अतिरिक्त और कुछ नहीं है॥ ३१॥ हे यूपरूपी दाढ़ोंवाले प्रभो! आप ही यज्ञपुरुष हैं। आपके चरणोंमें चारों वेद हैं, दाँतोंमें यज्ञ हैं, मुखमें [श्येन चित आदि] चितियाँ हैं। हुताशन (यज्ञाग्नि) आपकी जिह्वा है तथा कुशाएँ रोमावलि हैं॥ ३२॥ हे महात्मन्! रात और दिन आपके नेत्र हैं तथा सबका आधारभूत परब्रह्म आपका सिर है। हे देव! वैष्णव आदि समस्त सूक्त आपके सटाकलाप (स्कन्धके रोम-गुच्छ) हैं और समग्र हवि आपके प्राण हैं॥ ३३॥ हे प्रभो! स्रुक् आपका तुण्ड (थूथनी) है, सामस्वर धीर-गम्भीर शब्द है, प्राग्वंश (यजमानगृह) शरीर है तथा सत्र शरीरकी सन्धियाँ हैं। हे देव! इष्ट (श्रौत) और पूर्त (स्मार्त) धर्म आपके कान हैं। हे नित्यस्वरूप भगवन्! प्रसन्न होइये॥ ३४॥ हे अक्षर! हे विश्वमूर्ते! अपने पाद-प्रहारसे भूमण्डलको व्याप्त करनेवाले आपको हम विश्वके आदिकारण समझते हैं। आप सम्पूर्ण चराचर जगत्‌के परमेश्वर और नाथ हैं; अतः प्रसन्न होइये॥ ३५॥ हे नाथ! आपकी डाढ़ोंपर रखा हुआ यह सम्पूर्ण भूमण्डल ऐसा प्रतीत होता है मानो कमलवनको रौंदते हुए गजराजके दाँतोंसे कोई कीचड़में सना हुआ कमलका पत्ता लगा हो॥ ३६॥ हे अनुपम प्रभावशाली प्रभो! पृथिवी और आकाशके बीचमें जितना अन्तर है वह आपके शरीरसे ही व्याप्त है। हे विश्वको व्याप्त करनेमें समर्थ तेजयुक्त प्रभो! आप विश्वका कल्याण कीजिये॥ ३७॥

२०* श्रीविष्णुपुराण *[अ० ४

परमार्थस्त्वमेवैको नान्योऽस्ति जगतः पते।
तवैष महिमा येन व्याप्तमेतच्चराचरम्॥ ३८
यदेतद् दृश्यते मूर्त्तमेतज्ज्ञानात्मनस्तव।
भ्रान्तिज्ञानेन पश्यन्ति जगद्रूपमयोगिनः॥ ३९
ज्ञानस्वरूपमखिलं जगदेतदबुद्धयः।
अर्थस्वरूपं पश्यन्तो भ्राम्यन्ते मोहसम्प्लवे॥ ४०
ये तु ज्ञानविदः शुद्धचेतसस्तेऽखिलं जगत्।
ज्ञानात्मकं प्रपश्यन्ति त्वद्रूपं परमेश्वर॥ ४१
प्रसीद सर्व सर्वात्मन्वासाय जगतामिमाम्।
उद्धरोर्वीममेयात्मञ्छन्नो देह्यब्जलोचन॥ ४२
सत्त्वोद्रिक्तोऽसि भगवन् गोविन्द पृथिवीमिमाम्।
समुद्धर भवायेश शन्नो देह्यब्जलोचन॥ ४३
सर्गप्रवृत्तिर्भवतो जगतामुपकारिणी।
भवत्वेषा नमस्तेऽस्तु शन्नो देह्यब्जलोचन॥ ४४

श्रीपराशर उवाच
एवं संस्तूयमानस्तु परमात्मा महीधरः।
उज्जहार क्षितिं क्षिप्रं न्यस्तवांश्च महाम्भसि॥ ४५
तस्योपरि जलौघस्य महती नौरिव स्थिता।
विततत्वात्तु देहस्य न मही याति सम्प्लवम्॥ ४६
ततः क्षितिं समां कृत्वा पृथिव्यां सोऽचिनोद्गिरीन्।
यथाविभागं भगवाननादिः परमेश्वरः॥ ४७
प्राक्सर्गदग्धानखिलान्पर्वतान्पृथिवीतले।
अमोघेन प्रभावेण ससर्जामोघवाञ्छितः॥ ४८
भूविभागं ततः कृत्वा सप्तद्वीपान्थातथम्।
भूराद्यांश्चतुरो लोकान्पूर्ववत्समकल्पयत्॥ ४९
ब्रह्मरूपधरो देवस्ततोऽसौ रजसा वृतः।
चकार सृष्टिं भगवान्श्चतुर्वक्त्रधरो हरिः॥ ५०
निमित्तमात्रमेवाऽसौ सृज्यानां सर्गकर्मणि।
प्रधानकारणीभूता यतो वै सृज्यशक्तयः॥ ५१
निमित्तमात्रं मुक्त्वैवं नान्यत्किञ्चिदपेक्षते।
नीयते तपतां श्रेष्ठ स्वशक्त्या वस्तु वस्तुताम्॥ ५२

| हे जगत्पते ! परमार्थ (सत्य वस्तु) तो एकमात्र आप ही हैं, आपके अतिरिक्त और कोई भी नहीं है। यह आपकी ही महिमा (माया) है जिससे यह सम्पूर्ण चराचर जगत् व्याप्त है॥ ३८॥ यह जो कुछ भी मूर्त्तिमान् जगत् दिखायी देता है ज्ञानस्वरूप आपहीका रूप है। अजितेन्द्रिय लोग भ्रमसे इसे जगत्-रूप देखते हैं॥ ३९॥ इस सम्पूर्ण ज्ञान-स्वरूप जगत्को बुद्धिहीन लोग अर्थरूप देखते हैं, अतः वे निरन्तर मोहमय संसार-सागरमें भटका करते हैं॥ ४०॥ हे परमेश्वर! जो लोग शुद्धचित्त और विज्ञानवेत्ता हैं वे इस सम्पूर्ण संसारको आपका ज्ञानात्मक स्वरूप ही देखते हैं॥ ४१॥ हे सर्व! हे सर्वात्मन्! प्रसन्न होइये। हे अप्रमेयात्मन्! हे कमलनयन! संसारके निवासके लिये पृथिवीका उद्धार करके हमको शान्ति प्रदान कीजिये॥ ४२॥ हे भगवन्! हे गोविन्द! इस समय आप सत्त्वप्रधान हैं; अतः हे ईश! जगत्के उद्भवके लिये आप इस पृथिवीका उद्धार कीजिये और हे कमलनयन! हमको शान्ति प्रदान कीजिये॥ ४३॥ आपके द्वारा यह सर्गकी प्रवृत्ति संसारका उपकार करनेवाली हो। हे कमलनयन! आपको नमस्कार है, आप हमको शान्ति प्रदान कीजिये॥ ४४॥
श्रीपराशरजी बोले— इस प्रकार स्तुति किये जानेपर पृथिवीको धारण करनेवाले परमात्मा वराहजीने उसे शीघ्र ही उठाकर अपार जलके ऊपर स्थापित कर दिया॥ ४५॥ उस जलसमूहके ऊपर वह एक बहुत बड़ी नौकाके समान स्थित है और बहुत विस्तृत आकार होनेके कारण उसमें डूबती नहीं है॥ ४६॥ फिर उन अनादि परमेश्वरने पृथिवीको समतल कर उसपर जहाँ-तहाँ पर्वतोंको विभाग करके स्थापित कर दिया॥ ४७॥ सत्यसंकल्प भगवान्ने अपने अमोघ प्रभावसे पूर्वकल्पके अन्तमें दग्ध हुए समस्त पर्वतोंको पृथिवी-तलपर यथास्थान रच दिया॥ ४८॥ तदनन्तर उन्होंने सप्तद्वीपादि-क्रमसे पृथिवीका यथायोग्य विभाग कर भूर्लोकादि चारों लोकोंकी पूर्ववत् कल्पना कर दी॥ ४९॥ फिर उन भगवान् हरिने रजोगुणसे युक्त हो चतुर्मुखधारी ब्रह्मारूप धारण कर सृष्टिकी रचना की॥ ५०॥ सृष्टिकी रचनामें भगवान् तो केवल निमित्तमात्र ही हैं, क्योंकि उसकी प्रधान कारण तो सृज्य पदार्थोंकी शक्तियाँ ही हैं॥ ५१॥ हे तपस्वियोंमें श्रेष्ठ मैत्रेय! वस्तुओंकी रचनामें निमित्तमात्रको छोड़कर और किसी बातकी आवश्यकता भी नहीं है, क्योंकि वस्तु तो अपनी ही [परिणाम] शक्तिसे वस्तुता (स्थूलरूपता) को प्राप्त हो जाती है॥ ५२॥

इति श्रीविष्णुपुराणे प्रथमऽंशे चतुर्थोऽध्यायः॥४॥

अ० ५ ] * प्रथम अंश * २१


पाँचवाँ अध्याय

अविद्यादि विविध सर्गोंका वर्णन

श्रीमैत्रेय उवाच**श्रीमैत्रेयजी बोले—**हे द्विजराज! सर्गके आदिमें भगवान् ब्रह्माजीने पृथिवी, आकाश और जल आदिमें रहनेवाले देव, ऋषि, पितृगण, दानव, मनुष्य, तिर्यक् और वृक्षादिको जिस प्रकार रचा तथा जैसे गुण, स्वभाव और रूपवाले जगत्की रचना की वह सब आप मुझसे कहिये ॥ १-२ ॥
यथा ससर्ज देवोऽसौ देवर्षिपितृदानवान्।<br>मनुष्यतिर्यग्वृक्षादीन्भूव्योमसलिलौकसः ॥ १
यदगुणं यत्स्वभावं च यद्रूपं च जगद्विज।<br>सर्गादौ सृष्टवान्ब्रह्मा तन्ममाचक्ष्व कृत्स्नशः ॥ २
श्रीपराशर उवाच**श्रीपराशरजी बोले—**हे मैत्रेय! भगवान् विभुने जिस प्रकार इस सर्गकी रचना की वह मैं तुमसे कहता हूँ; सावधान होकर सुनो ॥ ३ ॥ सर्गके आदिमें ब्रह्माजीके पूर्ववत् सृष्टिका चिन्तन करनेपर पहले अबुद्धिपूर्वक [अर्थात् पहले-पहल असावधानी हो जानेसे] तमोगुणी सृष्टिका आविर्भाव हुआ ॥ ४ ॥ उस महात्मासे प्रथम तम (अज्ञान), मोह, महामोह (भोगेच्छा), तामिस्र (क्रोध) और अन्धतामिस्र (अभिनिवेश) नामक पंचपर्वा (पाँच प्रकारकी) अविद्या उत्पन्न हुई ॥ ५ ॥ उसके ध्यान करनेपर ज्ञानशून्य, बाहर-भीतरसे तमोमय और जड नगादि (वृक्ष-गुल्म-लता-वीरुत्-तृण) रूप पाँच प्रकारका सर्ग हुआ ॥ ६ ॥ [वराहजीद्वारा सर्वप्रथम स्थापित होनेके कारण] नगादिको मुख्य कहा गया है, इसलिये यह सर्ग भी मुख्य सर्ग कहलाता है ॥ ७ ॥
मैत्रेय कथयाम्येतच्छृणुष्व सुसमाहितः।<br>यथा ससर्ज देवोऽसौ देवादीन्निखिलान्विभुः ॥ ३
सृष्टिं चिन्तयतस्तस्य कल्पादिषु यथा पुरा।<br>अबुद्धिपूर्वकः सर्गः प्रादुर्भूतस्तमोमयः ॥ ४
तमो मोहो महामोहस्तामिस्रो ह्यन्धसंज्ञितः।<br>अविद्या पञ्चपर्वैषा प्रादुर्भूता महात्मनः ॥ ५
पञ्चधाऽवस्थितः सर्गो ध्यायतोऽप्रतिबोधवान्।<br>बहिरन्तोऽप्रकाशश्च संवृतात्मा नगात्मकः ॥ ६
मुख्या नगा यतः प्रोक्ता मुख्यसर्गस्ततस्त्वयम् ॥ ७
तं दृष्ट्वाऽसाधकं सर्गममन्यदपरं पुनः ॥ ८उस सृष्टिको पुरुषार्थकी असाधिका देखकर उन्होंने फिर अन्य सर्गके लिये ध्यान किया तो तिर्यक्-स्रोत-सृष्टि उत्पन्न हुई। यह सर्ग [वायुके समान] तिरछा चलनेवाला है इसलिये तिर्यक्-स्रोत कहलाता है ॥ ८-९ ॥ ये पशु, पक्षी आदि नामसे प्रसिद्ध हैं—और प्रायः तमोमय (अज्ञानी), विवेकरहित अनुचित मार्गका अवलम्बन करनेवाले और विपरीत ज्ञानको ही यथार्थ ज्ञान माननेवाले होते हैं। ये सब अहंकारी, अभिमानी, अट्ठाईस वधोंसे युक्त* आन्तरिक सुख आदिको ही पूर्णतया समझनेवाले और परस्पर एक-दूसरेकी प्रवृत्तिको न जाननेवाले होते हैं ॥ १०-११ ॥
तस्याभिध्यायतः सर्गस्तिर्यक्स्रोताभ्यवर्त्तत।<br>यस्मात्तिर्यक्प्रवृत्तिस्स तिर्यक्स्रोतास्ततः स्मृतः ॥ ९
पश्वादयस्ते विख्यातास्तमः प्राया ह्यवेदिनः।<br>उत्पथग्राहिणश्चैव तेऽज्ञाने ज्ञानमानिनः ॥ १०
अहङ्कृता अहम्माना अष्टाविंशद्वधात्मकाः।<br>अन्तः प्रकाशास्ते सर्वे आवृताश्च परस्परम् ॥ ११

* सांख्य-कारिकामें अट्ठाईस वधोंका वर्णन इस प्रकार किया है—
एकादशेन्द्रियवधाः सह बुद्धिवधैरशक्तिरुद्दिष्टा। सप्तदश वधा बुद्धेर्विपर्ययात्तुष्टिसिद्धीनाम् ॥
आध्यात्मिक्यश्चतस्रः प्रकृत्युपादानकालभाग्याख्याः। बाह्या विषयोपरमात् पञ्च च नव तुष्टयोऽभिमताः ॥
ऊहः शब्दोऽध्ययनं दुःखविघातास्त्रयः सुहृत्प्राप्तिः। दानञ्च सिद्धयोऽष्टौ सिद्धेः पूर्वोऽङ्कुशस्त्रिविधा ॥
(४९-५१)
ग्यारह इन्द्रियवध और तुष्टि तथा सिद्धिके विपर्ययसे सत्रह बुद्धि-वध—ये कुल अट्ठाईस वध अशक्ति कहलाते हैं। प्रकृति, उपादान, काल और भाग्य नामक चार आध्यात्मिक और पाँचों ज्ञानेन्द्रियोंके बाह्य विषयोंके निवृत्त हो जानेसे पाँच बाह्य—इस प्रकार

२२ * श्रीविष्णुपुराण * [ अ० ५


तमप्यसाधकं मत्वा ध्यायतोऽन्यस्ततोऽभवत्।<br>ऊर्ध्वस्रोतास्तृतीयस्तु सात्त्विकोर्ध्वमवर्त्तत ॥ १२उस सर्गको भी पुरुषार्थका असाधक समझ पुनः चिन्तन करनेपर एक और सर्ग हुआ। वह ऊर्ध्व-स्रोतनामक तीसरा सात्त्विक सर्ग ऊपरके लोकोंमें रहने लगा॥ १२॥
ते सुखप्रीतिबहुला बहिरन्तस्तवावृताः।<br>प्रकाशा बहिरन्तश्च ऊर्ध्वस्रोतोद्भवाः स्मृताः ॥ १३वे ऊर्ध्व-स्रोत सृष्टिमें उत्पन्न हुए प्राणी विषय-सुखके प्रेमी, बाह्य और आन्तरिक दृष्टिसम्पन्न, तथा बाह्य और आन्तरिक ज्ञानयुक्त थे॥ १३॥
तुष्टात्मनस्तृतीयस्तु देवसर्गस्तु स स्मृतः।<br>तस्मिन्सर्गेऽभवत्प्रीतिर्निष्पन्ने ब्रह्मणस्तदा ॥ १४यह तीसरा देवसर्ग कहलाता है। इस सर्गके प्रादुर्भूत होनेसे सन्तुष्टचित्त ब्रह्माजीको अति प्रसन्नता हुई॥ १४॥
ततोऽन्यं स तदा दध्यौ साधकं सर्गमुत्तमम्।<br>असाधकांस्तु तान् ज्ञात्वा मुख्यसर्गादिसम्भवान् ॥ १५फिर, इन मुख्य सर्ग आदि तीनों प्रकारकी सृष्टियोंमें उत्पन्न हुए प्राणियोंको पुरुषार्थका असाधक जान उन्होंने एक और उत्तम साधक सर्गके लिये चिन्तन किया॥ १५॥
तथाभिध्याय तस्तस्य सत्याभिध्यायिनस्ततः।<br>प्रादुर्बभूव चाव्यक्तादर्वाक्स्रोतास्तु साधकः ॥ १६उन सत्यसंकल्प ब्रह्माजीके इस प्रकार चिन्तन करनेपर अव्यक्त (प्रकृति)-से पुरुषार्थका साधक अर्वाक्स्रोत नामक सर्ग प्रकट हुआ॥ १६॥
यस्मादर्वाग्व्यवर्त्तन्त ततोऽर्वाक्स्रोतसस्तु ते।<br>ते च प्रकाशबहुलास्तमोद्रिक्ता रजोऽधिकाः ॥ १७इस सर्गके प्राणी नीचे (पृथिवीपर) रहते हैं इसलिये वे 'अर्वाक्स्रोत' कहलाते हैं। उनमें सत्त्व, रज और तम तीनोंहीकी अधिकता होती है॥ १७॥
तस्मात्ते दुःखबहुला भूयोभूयश्च कारिणः।<br>प्रकाशा बहिरन्तश्च मनुष्याः साधकास्तु ते ॥ १८इसलिये वे दुःखबहुल, अत्यन्त क्रियाशील एवं बाह्या-आभ्यन्तर ज्ञानसे युक्त और साधक हैं। इस सर्गके प्राणी मनुष्य हैं॥ १८॥
इत्येते कथिताः सर्गाः षडत्र मुनिसत्तम।<br>प्रथमो महतः सर्गो विज्ञेयो ब्रह्मणस्तु सः ॥ १९हे मुनिश्रेष्ठ! इस प्रकार अबतक तुमसे छः सर्ग कहे। उनमें महत्तत्त्वको ब्रह्माका पहला सर्ग जानना चाहिये॥ १९॥
तन्मात्राणां द्वितीयश्च भूतसर्गो हि स स्मृतः।<br>वैकारिकस्तृतीयस्तु सर्ग ऐन्द्रियकः स्मृतः ॥ २०दूसरा सर्ग तन्मात्राओंका है, जिसे भूतसर्ग भी कहते हैं और तीसरा वैकारिक सर्ग है जो ऐन्द्रियक (इन्द्रिय-सम्बन्धी) कहलाता है॥ २०॥
इत्येष प्राकृतः सर्गः सम्भूतो बुद्धिपूर्वकः।<br>मुख्यसर्गश्चतुर्थस्तु मुख्या वै स्थावराः स्मृताः ॥ २१इस प्रकार बुद्धिपूर्वक उत्पन्न हुआ यह प्राकृत सर्ग हुआ। चौथा मुख्यसर्ग है। पर्वत-वृक्षादि स्थावर ही मुख्य सर्गके अन्तर्गत हैं॥ २१॥

कुल नौ तुष्टियाँ हैं तथा ऊहा, शब्द, अध्ययन, [आध्यात्मिक, आधिभौतिक और आधिदैविक] तीन दुःखविघात, सुहृत्प्राप्ति और दान—ये आठ सिद्धियाँ हैं। ये [इन्द्रियाशक्ति, तुष्टि, सिद्धिरूप] तीनों वध मुक्तिसे पूर्व विघ्नरूप हैं।

अन्धत्व-वधिरत्वादिसे लेकर पागलपनतक मनसहित ग्यारह इन्द्रियोंकी विपरीत अवस्थाएँ ग्यारह इन्द्रियवध हैं।

आठ प्रकारकी प्रकृतियोंमेंसे किसीमें चित्तका लय हो जानेसे अपनेको मुक्त मान लेना 'प्रकृति' नामवाली तुष्टि है। संन्याससे ही अपनेको कृतार्थ मान लेना 'उपादान' नामकी तुष्टि है। समय आनेपर स्वयं ही सिद्धि लाभ हो जायगी, ध्यानादि क्लेशकी क्या आवश्यकता है—ऐसा विचार करना 'काल' नामकी तुष्टि है और भाग्योदयसे सिद्धि हो जायगी—ऐसा विचार 'भाग्य' नामकी तुष्टि है। ये चारोंका आत्मासे सम्बन्ध है; अतः ये आध्यात्मिक तुष्टियाँ हैं। पदार्थके उपार्जन, रक्षण और व्यय आदिमें दोष देखकर उनसे उपराम हो जाना बाह्य तुष्टियाँ हैं। शब्दादि बाह्य विषय पाँच हैं, इसलिये बाह्य तुष्टियाँ भी पाँच ही हैं। इस प्रकार कुल नौ तुष्टियाँ हैं।

उपदेशकी अपेक्षा न करके स्वयं ही परमार्थका निश्चय कर लेना 'ऊहा' सिद्धि है। प्रसंगवश कहीं कुछ सुनकर उसीसे ज्ञानसिद्धि मान लेना 'शब्द' सिद्धि है। गुरुसे पढ़कर ही वस्तु प्राप्त हो गयी—ऐसा मान लेना 'अध्ययन' सिद्धि है। आध्यात्मिकादि त्रिविध दुःखोंका नाश हो जाना तीन प्रकारकी 'दुःखविघात' सिद्धि है। अभीष्ट पदार्थकी प्राप्ति हो जाना 'सुहृत्प्राप्ति' सिद्धि है। तथा विद्वान् या तपस्वियोंका संग प्राप्त हो जाना 'दान' नामिका सिद्धि है। इस प्रकार ये आठ सिद्धियाँ हैं।

अ० ५ ] * प्रथम अंश * २३

तिर्यक्स्रोतास्तु यः प्रोक्तस्तैर्यग्योन्यः स उच्यते। तदूर्ध्वस्रोतसां षष्ठो देवसर्गस्तु संस्मृतः॥ २२ ततोऽर्वाक्स्रोतसां सर्गः सप्तमः स तु मानुषः॥ २३ अष्टमोऽनुग्रहः सर्गः सात्त्विकस्तामसश्च सः। पञ्चैते वैकृताः सर्गाः प्राकृतास्तु त्रयः स्मृताः॥ २४ प्राकृतो वैकृतश्चैव कौमारो नवमः स्मृतः। इत्येते वै समाख्याता नव सर्गाः प्रजापतेः॥ २५ प्राकृता वैकृताश्चैव जगतो मूलहेतवः। सृजतो जगदीशस्य किमन्यच्छ्रोतुमिच्छसि॥ २६

श्रीमैत्रेय उवाच सङ्क्षेपात्कथितः सर्गो देवादीनां मुने त्वया। विस्तराच्छ्रोतुमिच्छामि त्वत्तो मुनिवरोत्तम॥ २७

श्रीपराशर उवाच कर्मभिर्भाविताः पूर्वैः कुशलाकुशलैस्तु ताः। ख्यात्या तया ह्यनिर्मुक्ताः संहारे ह्युपसंहृताः॥ २८ स्थावरान्ताः सुराद्यास्तु प्रजा ब्रह्मंश्चतुर्विधाः। ब्रह्मणः कुर्वतः सृष्टिं जज्ञिरे मानसास्तु ताः॥ २९ ततो देवासुरपितृन्मनुष्यांश्च चतुष्टयम्। सिसृक्षुरम्भांस्येतानि स्वमात्मानमयूयुजत्॥ ३० युक्तात्मनस्तमोमात्रा ह्युद्रिक्ताऽभूत्प्रजापतेः। सिसृक्षोर्जघनात्पूर्वमसुरा जज्ञिरे ततः॥ ३१ उत्ससर्ज ततस्तां तु तमोमात्रात्मिकां तनुम्। सा तु त्यक्ता तनुस्तेन मैत्रेयाभूद्विभावरी॥ ३२ सिसृक्षुरन्यदेहस्थः प्रीतिमाप ततः सुराः। सत्त्वोद्रिक्ताः समुद्भूता मुखतो ब्रह्मणो द्विज॥ ३३ त्यक्ता सापि तनुस्तेन सत्त्वप्रायमभूद्दिनम्। ततो हि बलिनो रात्रावसुरा देवता दिवा॥ ३४ सत्त्वमात्रात्मिकामेव ततोऽन्यां जगृहे तनुम्। पितृवन्मन्यमानस्य पितरस्तस्य जज्ञिरे॥ ३५ उत्ससर्ज ततस्तां तु पितृन्सृष्ट्वापि स प्रभुः। सा चोत्सृष्टाभवत्सन्ध्या दिननक्तानन्तरस्थिता॥ ३६ रजोमात्रात्मिकामन्यां जगृहे स तनुं ततः। रजोमात्रोत्कटा जाता मनुष्या द्विजसत्तम॥ ३७


पाँचवाँ जो तिर्यक्स्रोत बतलाया उसे तिर्यक् (कीट-पतंगादि) योनि भी कहते हैं। फिर छठा सर्ग ऊर्ध्व-स्रोतोंका है जो 'देवसर्ग' कहलाता है। उसके पश्चात् सातवाँ सर्ग अर्वाक्-स्रोतोंका है, वह मनुष्य-सर्ग है॥ २२-२३॥ आठवाँ अनुग्रह सर्ग है। वह सात्त्विक और तामसिक है। ये पाँच वैकृत (विकारी) सर्ग हैं और पहले तीन 'प्राकृत सर्ग' कहलाते हैं॥ २४॥ नवाँ कौमार सर्ग है जो प्राकृत और वैकृत भी है। इस प्रकार सृष्टि-रचनामें प्रवृत्त हुए जगदीश्वर प्रजापतिके प्राकृत और वैकृत नामक ये जगत्के मूलभूत नौ सर्ग तुम्हें सुनाये। अब और क्या सुनना चाहते हो?॥ २५-२६॥

श्रीमैत्रेयजी बोले— हे मुने! आपने इन देवादिकोंके सर्गोंका संक्षेपसे वर्णन किया। अब, हे मुनिश्रेष्ठ! मैं इन्हें आपके मुखारविन्दसे विस्तारपूर्वक सुनना चाहता हूँ॥ २७॥

श्रीपराशरजी बोले— हे मैत्रेय! सम्पूर्ण प्रजा अपने पूर्व-शुभाशुभ कर्मोंसे युक्त हैं; अतः प्रलयकालमें सबका लय होनेपर भी वह उनके संस्कारोंसे मुक्त नहीं होती॥ २८॥ हे ब्रह्मन्! ब्रह्माजीके सृष्टि-कर्ममें प्रवृत्त होनेपर देवताओंसे लेकर स्थावरपर्यन्त चार प्रकारकी सृष्टि हुई। वह केवल मनोमयी थी॥ २९॥

फिर देवता, असुर, पितृगण और मनुष्य—इन चारोंकी तथा जलकी सृष्टि करनेकी इच्छासे उन्होंने अपने शरीरका उपयोग किया॥ ३०॥ सृष्टि-रचनाकी कामनासे प्रजापतिके युक्तचित्त होनेपर तमोगुणकी वृद्धि हुई। अतः सबसे पहले उनकी जंघासे असुर उत्पन्न हुए॥ ३१॥ तब, हे मैत्रेय! उन्होंने उस तमोमय शरीरको छोड़ दिया, वह छोड़ा हुआ तमोमय शरीर ही रात्रि हुआ॥ ३२॥ फिर अन्य देहमें स्थित होनेपर सृष्टिकी कामनावाले उन प्रजापतिको अति प्रसन्नता हुई, और हे द्विज! उनके मुखसे सत्त्वप्रधान देवगण उत्पन्न हुए॥ ३३॥ तदनन्तर उस शरीरको भी उन्होंने त्याग दिया। वह त्यागा हुआ शरीर ही सत्त्वस्वरूप दिन हुआ। इसीलिये रात्रिमें असुर बलवान् होते हैं और दिनमें देवगणोंका बल विशेष होता है॥ ३४॥ फिर उन्होंने आंशिक सत्त्वमय अन्य शरीर ग्रहण किया और अपनेको पितृवत् मानते हुए [अपने पार्श्व-भागसे] पितृगणकी रचना की॥ ३५॥ पितृगणकी रचना कर उन्होंने उस शरीरको भी छोड़ दिया। वह त्यागा हुआ शरीर ही दिन और रात्रिके बीचमें स्थित सन्ध्या हुई॥ ३६॥ तत्पश्चात् उन्होंने आंशिक रजोगमय अन्य शरीर धारण किया; हे द्विजश्रेष्ठ! उससे रजः-प्रधान मनुष्य उत्पन्न हुए॥ ३७॥

२४* श्रीविष्णुपुराण *[ अ० ५
संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
तामप्याशु स तत्याज तनुं सद्यः प्रजापतिः।<br>ज्योत्स्ना समभवत्सापि प्राक्सन्ध्या याऽभिधीयते॥ ३८फिर शीघ्र ही प्रजापतिने उस शरीरको भी त्याग दिया, वही ज्योत्स्ना हुआ, जिसे पूर्व-सन्ध्या अर्थात् प्रातःकाल कहते हैं॥ ३८॥
ज्योत्स्नागमे तु बलिनो मनुष्याः पितरस्तथा।<br>मैत्रेय सन्ध्यासमये तस्मादेते भवन्ति वै॥ ३९इसीलिये, हे मैत्रेय! प्रातःकाल होनेपर मनुष्य और सायंकालके समय पितर बलवान् होते हैं॥ ३९॥
ज्योत्स्ना रात्र्यहनी सन्ध्या चत्वार्येतानि वै प्रभोः।<br>ब्रह्मणस्तु शरीराणि त्रिगुणोपाश्रयाणि तु॥ ४०इस प्रकार रात्रि, दिन, प्रातःकाल और सायंकाल ये चारों प्रभु ब्रह्माजीके ही शरीर हैं और तीनों गुणोंके आश्रय हैं॥ ४०॥
रजोमात्रात्मिकामेव ततोऽन्यां जगृहे तनुम्।<br>ततः क्षुद् ब्रह्मणो जाता जज्ञे कामस्तया ततः॥ ४१फिर ब्रह्माजीने एक और रजोमात्रात्मक शरीर धारण किया। उसके द्वारा ब्रह्माजीसे क्षुधा उत्पन्न हुई और क्षुधासे कामकी उत्पत्ति हुई॥ ४१॥
क्षुत्क्षामानान्धकारेऽथ सोऽसृजद्भगवांस्ततः।<br>विरूपाः श्मश्रुला जातास्तेऽभ्यधावन्तस्तः प्रभुम्॥ ४२तब भगवान् प्रजापतिने अन्धकारमें स्थित होकर क्षुधाग्रस्त सृष्टिकी रचना की। उसमें बड़े कुरूप और दाढ़ी-मूँछवाले व्यक्ति उत्पन्न हुए। वे स्वयं ब्रह्माजीकी ओर ही [उन्हें भक्षण करनेके लिये] दौड़े॥ ४२॥
मैवं भो रक्ष्यतामेष यैरुक्तं राक्षसास्तु ते।<br>ऊचुः खादाम इत्यन्ये ये ते यक्षास्तु जक्षणात्॥ ४३उनमेंसे जिन्होंने यह कहा कि 'ऐसा मत करो, इनकी रक्षा करो' वे 'राक्षस' कहलाये और जिन्होंने कहा 'हम खायेंगे' वे खानेकी वासनावाले होनेसे 'यक्ष' कहे गये॥ ४३॥
अप्रियेण तु तान्दृष्ट्वा केशाः शीर्यन्त वेधसः।<br>हीनाश्च शिरसो भूयः समारोहन्त तच्छिरः॥ ४४<br>सर्पणात्तेऽभवन् सर्पा हीनत्वादहयः स्मृताः।<br>ततः क्रुद्धो जगत्स्रष्टा क्रोधात्मानो विनिर्ममे।<br>वर्णेन कपिशेनोग्रभूतास्ते पिशिताशनाः॥ ४५उनकी इस अनिष्ट प्रवृत्तिको देखकर ब्रह्माजीके केश सिरसे गिर गये और फिर पुनः उनके मस्तकपर आरूढ़ हुए। इस प्रकार ऊपर चढ़नेके कारण वे 'सर्प' कहलाये और नीचे गिरनेके कारण 'अहि' कहे गये। तदनन्तर जगत्-रचयिता ब्रह्माजीने क्रोधित होकर क्रोधयुक्त प्राणियोंकी रचना की; वे कपिश (कालापन लिये हुए पीले) वर्णके, अति उग्र स्वभाववाले तथा मांसाहारी हुए॥ ४४-४५॥
गायतोऽङ्गात्समुत्पन्ना गन्धर्वास्तस्य तत्क्षणात्।<br>पिबन्तो जज्ञिरे वाचं गन्धर्वास्तेन ते द्विज॥ ४६फिर गान करते समय उनके शरीरसे तुरन्त ही गन्धर्व उत्पन्न हुए। हे द्विज! वे वाणीका उच्चारण करते अर्थात् बोलते हुए उत्पन्न हुए थे, इसलिये 'गन्धर्व' कहलाये॥ ४६॥
एतानि सृष्ट्वा भगवान्ब्रह्मा तच्छक्तिचोदितः।<br>ततः स्वच्छन्दतोऽन्यानि वयांसि वयसोऽसृजत्॥ ४७इन सबकी रचना करके भगवान् ब्रह्माजीने पक्षियोंको, उनके पूर्व-कर्मोंसे प्रेरित होकर स्वच्छन्दतापूर्वक अपनी आयुसे रचा॥ ४७॥
अवयो वक्षसश्चक्रे मुखतोऽजाः स सृष्टवान्।<br>सृष्टवानुदराद्गाश्च पार्श्वाभ्यां च प्रजापतिः॥ ४८<br>पद्भ्यां चाश्वान्समातङ्गान्रासभानगवान्मृगान्।<br>उष्ट्रानश्वतरांश्चैव न्यङ्कूंननयाश्च जातयः॥ ४९तदनन्तर अपने वक्षःस्थलसे भेड़, मुखसे बकरी, उदर और पार्श्वभागसे गौ, पैरोंसे घोड़े, हाथी, गधे, वनगाय, मृग, ऊँट, खच्चर और न्यंकु आदि पशुओंकी रचना की॥ ४८-४९॥
ओषध्यः फलमूलिन्यो रोमभ्यस्तस्य जज्ञिरे।<br>त्रेतायुगमुखे ब्रह्मा कल्पस्यादौ द्विजोत्तम।<br>सृष्ट्वा पश्वोषधीः सम्यग्युयोज स तदाध्वरे॥ ५०उनके रोमोंसे फल-मूलरूप ओषधियाँ उत्पन्न हुईं। हे द्विजोत्तम! कल्पके आरम्भमें ही ब्रह्माजीने पशु और ओषधि आदिकी रचना करके फिर त्रेतायुगके आरम्भमें उन्हें यज्ञादि कर्मोंमें सम्मिलित किया॥ ५०॥
गौरजः पुरुषो मेषश्चाश्वाश्वतरगर्दभाः।<br>एतान्ग्राम्यान्पशूनाहुरारण्यांश्च निबोध मे॥ ५१गौ, बकरी, पुरुष, भेड़, घोड़े, खच्चर और गधे ये सब गाँवोंमें

अ० ५ ] * प्रथम अंश * २५


श्वापदा द्विखुरा हस्ती वानराः पक्षिपञ्चमाः ।
औदकाः पशवः षष्ठाः सप्तमास्तु सरीसृपाः ॥ ५२

गायत्रं च ऋचश्चैव त्रिवृत्सोमं रथन्तरम् ।
अग्निष्टोमं च यज्ञानां निर्ममे प्रथमान्मुखात् ॥ ५३

यजूंषि त्रैष्टुभं छन्दः स्तोमं पञ्चदशं तथा ।
बृहत्साम तथोक्थं च दक्षिणादसृजन्मुखात् ॥ ५४

सामानि जगतीछन्दः स्तोमं सप्तदशं तथा ।
वैरूपमतिरात्रं च पश्चिमादसृजन्मुखात् ॥ ५५

एकविंशमथर्वाणमाप्तोर्यामाणमेव च।
अनुष्टुभं च वैराजमुत्तरादसृजन्मुखात् ॥ ५६

उच्चावचानि भूतानि गात्रेभ्यस्तस्य जज्ञिरे ।
देवासुरपितॄन् सृष्ट्वा मनुष्यांश्च प्रजापतिः ॥ ५७

ततः पुनः ससर्जादौ सङ्कल्पस्य पितामहः ।
यक्षान् पिशाचान्गन्धर्वान् तथैवाप्सरसां गणान् ॥ ५८

नरकिन्नररक्षांसि वयः पशुमृगोरगान् ।
अव्ययं च व्ययं चैव यदिदं स्थाणुजङ्गमम् ॥ ५९

तत्ससर्ज तदा ब्रह्मा भगवानादिकृत्प्रभुः ।
तेषां ये यानि कर्माणि प्राक्सृष्ट्यां प्रतिपेदिरे ।
तान्येव ते प्रपद्यन्ते सृज्यमानाः पुनः पुनः ॥ ६०

हिंस्राहिंस्रे मृदुक्रूरे धर्माधर्मावृतानृते ।
तद्भाविताः प्रपद्यन्ते तस्मात्तत्तस्य रोचते ॥ ६१

इन्द्रियार्थेषु भूतेषु शरीरेषु च स प्रभुः ।
नानात्वं विनियोगं च धातैवं व्यसृजत्स्वयम् ॥ ६२

नाम रूपं च भूतानां कृत्यानां च प्रपञ्चनम् ।
वेदशब्देभ्य एवादौ देवादीनां चकार सः ॥ ६३

ऋषीणां नामधेयानि यथा वेदश्रुतानि वै ।
तथा नियोगयोग्यानि ह्यान्येषामपि सोऽकरोत् ॥ ६४

यथर्तुष्वृतुलिङ्गानि नानारूपाणि पर्यये ।
दृश्यन्ते तानि तान्येव तथा भावा युगादिषु ॥ ६५

करोत्येवंविधां सृष्टिं कल्पादौ स पुनः पुनः ।
सिसृक्षाशक्तियुक्तोऽसौ सृज्यशक्तिप्रचोदितः ॥ ६६


रहनेवाले पशु हैं। जंगली पशु ये हैं—श्वापद (व्याघ्र आदि), दो खुरवाले (वनगाय आदि), हाथी, बन्दर और पाँचवें पक्षी, छठे जलके जीव तथा सातवें सरीसृप आदि ॥ ५१-५२ ॥ फिर अपने प्रथम (पूर्व) मुखसे ब्रह्माजीने गायत्री, ऋक्, त्रिवृत्सोम रथन्तर और अग्निष्टोम यज्ञोंको निर्मित किया ॥ ५३ ॥ दक्षिण-मुखसे यजु, त्रैष्टुप्छन्द, पंचदशस्तोम, बृहत्साम तथा उक्थकी रचना की ॥ ५४ ॥ पश्चिम-मुखसे साम, जगतीछन्द, सप्तदशस्तोम, वैरूप और अतिरात्रको उत्पन्न किया ॥ ५५ ॥ तथा उत्तर-मुखसे उन्होंने एकविंशतिस्तोम, अथर्ववेद, आप्तोर्यामाण, अनुष्टुप्छन्द और वैराजकी सृष्टि की ॥ ५६ ॥

इस प्रकार उनके शरीरसे समस्त ऊँच-नीच प्राणी उत्पन्न हुए। उन आदिकर्ता प्रजापति भगवान् ब्रह्माजीने देव, असुर, पितृगण और मनुष्योंकी सृष्टि कर तदनन्तर कल्पका आरम्भ होनेपर फिर यक्ष, पिशाच, गन्धर्व, अप्सरागण, मनुष्य, किन्नर, राक्षस, पशु, पक्षी, मृग और सर्प आदि सम्पूर्ण नित्य एवं अनित्य स्थावर-जंगम जगत्की रचना की। उनमेंसे जिनके जैसे-जैसे कर्म पूर्वकल्पोंमें थे पुनः-पुनः सृष्टि होनेपर उनकी उन्हींमें फिर प्रवृत्ति हो जाती है ॥ ५७–६० ॥ उस समय हिंसा-अहिंसा, मृदुता-कठोरता, धर्म-अधर्म, सत्य-मिथ्या—ये सब अपनी पूर्व-भावनाके अनुसार उन्हें प्राप्त हो जाते हैं, इसीसे ये उन्हें अच्छे लगने लगते हैं ॥ ६१ ॥

इस प्रकार प्रभु विधाताने ही स्वयं इन्द्रियोंके विषय भूत और शरीर आदिमें विभिन्नता और व्यवहारको उत्पन्न किया है ॥ ६२ ॥ उन्होंने कल्पके आरम्भमें देवता आदि प्राणियोंके वेदानुसार नाम और रूप तथा कार्य-विभागको निश्चित किया है ॥ ६३ ॥ ऋषियों तथा अन्य प्राणियोंके भी वेदानुकूल नाम और यथायोग्य कर्मोंको उन्होंने निर्दिष्ट किया है ॥ ६४ ॥ जिस प्रकार भिन्न-भिन्न ऋतुओंके पुनः-पुनः आनेपर उनके चिह्न और नाम-रूप आदि पूर्ववत् रहते हैं उसी प्रकार युगादिमें भी उनके पूर्व-भाव ही देखे जाते हैं ॥ ६५ ॥ सिसृक्षा-शक्ति (सृष्टि-रचनाकी इच्छारूप शक्ति)-से युक्त वे ब्रह्माजी सृज्य-शक्ति (सृष्टिके प्रारब्ध)-की प्रेरणासे कल्पोंके आरम्भमें बारम्बार इसी प्रकार सृष्टिकी रचना किया करते हैं ॥ ६६ ॥


इति श्रीविष्णुपुराणे प्रथमेशे पञ्चमोऽध्यायः ॥ ५ ॥

२६ * श्रीविष्णुपुराण * [ अ० ६


छठा अध्याय

चातुर्वर्ण्य-व्यवस्था, पृथिवी-विभाग और अन्नादिकी उत्पत्तिका वर्णन

श्रीमैत्रेय उवाच अर्वाक्स्रोतास्तु कथितो भवता यस्तु मानुषः। ब्रह्मन्विस्तरतो ब्रूहि ब्रह्मा तमस्सृजद्यथा ॥ १ यथा च वर्णानसृजद्यद्गुणांश्च प्रजापतिः। यच्च तेषां स्मृतं कर्म विप्रादीनां तदुच्यताम् ॥ २

श्रीपराशर उवाच सत्याभिध्यायिनः पूर्वं सिसृक्षोर्ब्रह्मणो जगत्। अजायन्त द्विजश्रेष्ठ सत्त्वोद्रिक्ता मुखात्प्रजाः ॥ ३ वक्षसो रजसोद्रिक्तास्तथा वै ब्रह्मणोऽभवन्। रजसा तमसा चैव समुद्रिक्तास्तथोरुतः ॥ ४ पद्भ्यामन्याः प्रजा ब्रह्मा ससर्ज द्विजसत्तम। तमः प्रधानास्ताः सर्वाश्चातुर्वर्ण्यमिदं तत ॥ ५ ब्राह्मणाः क्षत्रिया वैश्याः शूद्राश्च द्विजसत्तम। पादोरुवक्षःस्थलतो मुखतश्च समुद्गताः ॥ ६ यज्ञनिष्पत्तये सर्वमेतद् ब्रह्मा चकार वै। चातुर्वर्ण्यं महाभाग यज्ञसाधनमुत्तमम् ॥ ७ यज्ञैराप्यायिता देवा वृष्ट्युत्सर्गेण वै प्रजाः। आप्याययन्ते धर्मज्ञ यज्ञाः कल्याणहेतवः ॥ ८ निष्पाद्यन्ते नरैस्तैस्तु स्वधर्माभिरतैस्सदा। विशुद्धाचरणोपेतैः सद्भिः सन्मार्गगामिभिः ॥ ९ स्वर्गापवर्गौ मानुष्यात्प्राप्नुवन्ति नरा मुने। यच्चाभिरुचितं स्थानं तद्यान्ति मनुजा द्विज ॥ १० प्रजास्ता ब्रह्मणा सृष्टाश्चातुर्वर्ण्यव्यवस्थिताः। सम्यक्श्रद्धासमाचारप्रवणा मुनिसत्तम ॥ ११ यथेच्छावासनिरताः सर्वबाधाविवर्जिताः। शुद्धान्तःकरणाः शुद्धाः कर्मानुष्ठाननिर्मलाः ॥ १२ शुद्धे च तासां मनसि शुद्धेऽन्तः संस्थिते हरौ। शुद्धज्ञानं प्रपश्यन्ति विष्ण्वाख्यं येन तत्पदम् ॥ १३ ततः कालात्मको योऽसौ स चांशः कथितो हरेः। स पातयत्यघं घोरमल्पमल्पाल्यसारवत् ॥ १४


श्रीमैत्रेयजी बोले— हे भगवन्! आपने जो अर्वाक्स्रोता मनुष्योंके विषयमें कहा उनकी सृष्टि ब्रह्माजीने किस प्रकार की—यह विस्तारपूर्वक कहिये ॥ १ ॥ श्रीप्रजापतिने ब्राह्मणादि वर्णोंको जिन-जिन गुणोंसे युक्त और जिस प्रकार रचा तथा उनके जो-जो कर्तव्य-कर्म निर्धारित किये वह सब वर्णन कीजिये ॥ २ ॥

श्रीपराशरजी बोले— हे द्विजश्रेष्ठ! जगत्-रचनाकी इच्छासे युक्त सत्यसंकल्प श्रीब्रह्माजीके मुखसे पहले सत्त्वप्रधान प्रजा उत्पन्न हुई ॥ ३ ॥ तदनन्तर उनके वक्षःस्थलसे रजःप्रधान तथा जंघाओंसे रज और तमविशिष्ट सृष्टि हुई ॥ ४ ॥ हे द्विजोत्तम! चरणोंसे ब्रह्माजीने एक और प्रकारकी प्रजा उत्पन्न की, वह तमःप्रधान थी। ये ही सब चारों वर्ण हुए ॥ ५ ॥ इस प्रकार हे द्विजसत्तम! ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र ये चारों क्रमशः ब्रह्माजीके मुख, वक्षःस्थल, जानु और चरणोंसे उत्पन्न हुए ॥ ६ ॥

हे महाभाग! ब्रह्माजीने यज्ञानुष्ठानके लिये ही यज्ञके उत्तम साधनरूप इस सम्पूर्ण चातुर्वर्ण्यकी रचना की थी ॥ ७ ॥ हे धर्मज्ञ! यज्ञसे तृप्त होकर देवगण जल बरसाकर प्रजाको तृप्त करते हैं; अतः यज्ञ सर्वथा कल्याणका हेतु है ॥ ८ ॥ जो मनुष्य सदा स्वधर्मपरायण, सदाचारी, सज्जन और सुमार्गगामी होते हैं उन्हींसे यज्ञका यथावत् अनुष्ठान हो सकता है ॥ ९ ॥ हे मुने! [यज्ञके द्वारा] मनुष्य इस मनुष्य-शरीरसे ही स्वर्ग और अपवर्ग प्राप्त कर सकते हैं; तथा और भी जिस स्थानकी उन्हें इच्छा हो उसीको जा सकते हैं ॥ १० ॥

हे मुनिसत्तम! ब्रह्माजीद्वारा रची हुई वह चातुर्वर्ण्य-विभागमें स्थित प्रजा अति श्रद्धायुक्त आचरणवाली, स्वेच्छानुसार रहनेवाली, सम्पूर्ण बाधाओंसे रहित, शुद्ध अन्तःकरणवाली, सत्कुलोत्पन्न और पुण्य कर्मोंके अनुष्ठानसे परम पवित्र थी ॥ ११-१२ ॥ उसका चित्त शुद्ध होनेके कारण उसमें निरन्तर शुद्धस्वरूप श्रीहरिके विराजमान रहनेसे उन्हें शुद्ध ज्ञान प्राप्त होता था जिससे वे भगवान्‌के उस 'विष्णु' नामक परम पदको देख पाते थे ॥ १३ ॥ फिर (त्रेतायुगके आरम्भमें), हमने तुमसे भगवान्‌के जिस काल नामक अंशका पहले वर्णन किया है, वह अति अल्प सारवाले (सुखवाले) तुच्छ और घोर (दुःखमय) पापोंको प्रजामें प्रवृत्त कर देता है ॥ १४ ॥

अ० ६ ] * प्रथम अंश * २७


अधर्मबीजसमुद्भूतं तमोलोभसमुद्भवम्।
प्रजासु तासु मैत्रेय रागादिकमसाधकम्॥ १५

ततः सा सहजा सिद्धिस्तासां नातीव जायते।
रसोल्लासादयश्चान्याः सिद्धयोऽष्टौ भवन्ति याः॥ १६

तासु क्षीणास्वशेषासु वर्द्धमाने च पातके।
द्वन्द्वाभिभवदुःखार्त्तास्ता भवन्ति ततः प्रजाः॥ १७

ततो दुर्गाणि ताश्चक्रुर्धान्वं पार्वतमौदकम्।
कृत्रिमं च तथा दुर्गं पुरखर्वटकादिकम्॥ १८

गृहाणि च यथान्यायं तेषु चक्रुः पुरादिषु।
शीतातपादिबाधानां प्रशमाय महामते॥ १९

प्रतीकारमिमं कृत्वा शीतादेस्ताः प्रजाः पुनः।
वार्त्तोपायं ततश्चक्रुर्हस्तसिद्धिं च कर्मजाम्॥ २०

व्रीहयश्च यवाश्चैव गोधूमाश्चाणवस्तिलाः।
प्रियङ्गवो ह्युदाराश्च कोरदूषाः सतीनकाः॥ २१

माषा मुद्गा मसूराश्च निष्पावाः सकुल्त्थकाः।
आढक्यश्चणकाश्चैव शणाः सप्तदश स्मृताः॥ २२

इत्येता ओषधीनां तु ग्राम्याणां जातयो मुने।
ओषध्यो यज्ञियाश्चैव ग्राम्यारण्याश्चतुर्दश॥ २३

हिन्दी अनुवाद:

हे मैत्रेय! उससे प्रजामें पुरुषार्थका विघातक तथा अज्ञान और लोभको उत्पन्न करनेवाला रागादिरूप अधर्मका बीज उत्पन्न हो जाता है॥ १५॥ तभीसे उसे वह विष्णु-पद-प्राप्ति-रूप स्वाभाविक सिद्धि और रसोल्लास आदि अन्य अष्ट सिद्धियाँ १ नहीं मिलतीं॥ १६॥

उन समस्त सिद्धियोंके क्षीण हो जाने और पापके बढ़ जानेसे फिर सम्पूर्ण प्रजा द्वन्द्व, ह्रास और दुःखसे आतुर हो गयी॥ १७॥ तब उसने मरुभूमि, पर्वत और जल आदिके स्वाभाविक तथा कृत्रिम दुर्ग और पुर तथा खर्वट२ आदि स्थापित किये॥ १८॥ हे महामते! उन पुर आदिकोंमें शीत और घाम आदि बाधाओंसे बचनेके लिये उसने यथायोग्य घर बनाये॥ १९॥

इस प्रकार शीतोष्णादिसे बचनेका उपाय करके उस प्रजाने जीविकाके साधनरूप कृषि तथा कला-कौशल आदिकी रचना की॥ २०॥ हे मुने! धान, जौ, गेहूँ, छोटे धान्य, तिल, काँगनी, ज्वार, कोदो, छोटी मटर, उड़द, मूँग, मसूर, बड़ी मटर, कुलथी, राई, चना और सन—ये सत्रह ग्राम्य ओषधियोंकी जातियाँ हैं। ग्राम्य और वन्य दोनों प्रकारकी मिलाकर कुल चौदह ओषधियाँ याज्ञिक हैं।


१- रसोल्लासादि अष्ट-सिद्धियोंका वर्णन स्कन्दपुराणमें इस प्रकार किया है—
रसस्य स्वत एवान्तरुल्लासः स्यात्कृते युगे। रसोल्लासाख्यिका सिद्धिस्तया हन्ति क्षुधं नरः॥
स्त्र्यादीनां नैरपेक्ष्येण सदा तृप्ता प्रजास्तथा। द्वितीया सिद्धिरुद्दिष्टा सा तृप्तिर्मु निसत्तमैः॥
धर्मोत्तमश्च योऽस्त्यासां सा तृतीयाऽभिधीयते। चतुर्थी तुल्यता तासामायुषः सुखरूपयोः॥
ऐकान्त्यबलबाहुल्यं विशोका नाम पञ्चमी। परमात्मपरत्वेन तपोध्यानादिनिष्ठिता॥
षष्ठी च कामचारित्वं सप्तमी सिद्धिरुच्यते। अष्टमी च तथा प्रोक्ता यत्रक्वचनशायिता॥

**अर्थ—**सत्ययुगमें रसका स्वयं ही उल्लास होता था। यही रसोल्लास नामकी सिद्धि है, उसके प्रभावसे मनुष्य भूखको नष्ट कर देता है। उस समय प्रजा स्त्री आदि भोगोंकी अपेक्षाके बिना ही सदा तृप्त रहती थी; इसीको मुनिश्रेष्ठोंने 'तृप्ति' नामक दूसरी सिद्धि कहा है। उनका जो उत्तम धर्म था वही उनकी तीसरी सिद्धि कही जाती है। उस समय सम्पूर्ण प्रजाके रूप और आयु एक-से थे, यही उनकी चौथी सिद्धि थी। बलकी ऐकान्तिकी अधिकता—यह 'विशोका' नामकी पाँचवीं सिद्धि है। परमात्मपरायण रहते हुए तप-ध्यानादिमें तत्पर रहना छठी सिद्धि है। स्वेच्छानुसार विचरना सातवीं सिद्धि कही जाती है तथा जहाँ-तहाँ मनकी मौज पड़े रहना आठवीं सिद्धि कही गयी है।

२- पहाड़ या नदीके तटपर बसे हुए छोटे-छोटे टोलोंको 'खर्वट' कहते हैं।

२८ । श्रीविष्णुपुराण । [ अ० ६


व्रीहयस्सयवा माषा गोधूमाश्चाणवस्तिलाः।<br>प्रियङ्गुसप्तमा ह्येते अष्टमास्तु कुलत्थकाः ॥ २४<br>श्यामाकास्त्वथ नीवारा जर्तिलाः सगवेधुकाः।<br>तथा वेणुयवाः प्रोक्तास्तथा मर्कटका मुने ॥ २५<br>ग्राम्यारण्याः स्मृता ह्येता ओषध्यस्तु चतुर्दश।<br>यज्ञनिष्पत्तये यज्ञस्तथासां हेतुरुत्तमः ॥ २६<br>एताश्च सह यज्ञेन प्रजानां कारणं परम्।<br>परावरविदः प्राज्ञास्ततो यज्ञान्वितन्वते ॥ २७<br>अहन्यहन्यनुष्ठानं यज्ञानां मुनिसत्तम।<br>उपकारकं पुंसां क्रियमाणाघशान्तिदम् ॥ २८<br>येषां तु कालसृष्टोऽसौ पापबिन्दुर्महामुने।<br>चेतःसु ववृधे चक्रुस्ते न यज्ञेषु मानसम् ॥ २९<br>वेदवादांस्तथा वेदान्यज्ञकर्मादिकं च यत्।<br>तत्सर्वं निन्दयामासुर्यज्ञव्यासेधकारिणः ॥ ३०<br>प्रवृत्तिमार्गव्युच्छित्तिकारिणो वेदनिन्दकाः।<br>दुरात्मानो दुराचारा बभूवुः कुटिलाशयाः ॥ ३१<br>संसिद्धायां तु वार्तायां प्रजाः सृष्टा प्रजापतिः।<br>मर्यादां स्थापयामास यथास्थानं यथागुणम् ॥ ३२<br>वर्णानामाश्रमाणां च धर्मान्धर्मभृतां वर।<br>लोकांश्च सर्ववर्णानां सम्यग्धर्मानुपालिनाम् ॥ ३३<br>प्राजापत्यं ब्राह्मणानां स्मृतं स्थानं क्रियावताम्।<br>स्थानमैन्द्रं क्षत्रियाणां संग्रामेष्वनिवर्तिनाम् ॥ ३४<br>वैश्यानां मारुतं स्थानं स्वधर्ममनुवर्तिनाम्।<br>गान्धर्वं शूद्रजातीनां परिचर्यानुवर्तिनाम् ॥ ३५<br>अष्टाशीतिसहस्राणि मुनीनामूर्ध्वरेतसाम्।<br>स्मृतं तेषां तु यत्स्थानं तदेव गुरुवासिनाम् ॥ ३६<br>सप्तर्षीणां तु यत्स्थानं स्मृतं तद्वै वनौकसाम्।<br>प्राजापत्यं गृहस्थानां न्यासिनां ब्रह्मसंज्ञितम् ॥ ३७<br>योगिनाममृतं स्थानं स्वात्मसन्तोषकारिणाम् ॥ ३८<br>एकान्तिनः सदा ब्रह्मध्यायिनो योगिनश्च ये।<br>तेषां तु परमं स्थानं यत्तत्पश्यन्ति सूरयः ॥ ३९उनके नाम ये हैं—धान, जौ, उड़द, गेहूँ, छोटे धान्य, तिल, काँगनी और कुलथी—ये आठ तथा श्यामाक (समाँ), नीबार, वनतिल, गवेधु, वेणुयव और मर्कट (मक्का) ॥ २१–२५ ॥ ये चौदह ग्राम्य और वन्य ओषधियाँ यज्ञानुष्ठानकी सामग्री हैं और यज्ञ इनकी उत्पत्तिका प्रधान हेतु है॥ २६॥ यज्ञोंके सहित ये ओषधियाँ प्रजाकी वृद्धिका परम कारण हैं इसलिये इहलोक-परलोकके ज्ञाता पुरुष यज्ञोंका अनुष्ठान किया करते हैं॥ २७ ॥ हे मुनिश्रेष्ठ ! नित्यप्रति किया जानेवाला यज्ञानुष्ठान मनुष्योंका परम उपकारक और उनके किये हुए पापोंको शान्त करनेवाला है॥ २८ ॥<br><br>हे महामुने ! जिनके चित्तमें कालकी गतिसे पापका बीज बढ़ता है उन्हीं लोगोंका चित्त यज्ञमें प्रवृत्त नहीं होता ॥ २९ ॥ उन यज्ञके विरोधियोंने वैदिक मत, वेद और यज्ञादि कर्म—सभीकी निन्दा की है॥ ३०॥ वे लोग दुरात्मा, दुराचारी, कुटिलमति, वेद-निन्दक और प्रवृत्तिमार्गका उच्छेद करनेवाले ही थे ॥ ३१॥<br><br>हे धर्मवानोंमें श्रेष्ठ मैत्रेय ! इस प्रकार कृषि आदि जीविकाके साधनोंके निश्चित हो जानेपर प्रजापति ब्रह्माजीने प्रजाकी रचना कर उनके स्थान और गुणोंके अनुसार मर्यादा, वर्ण और आश्रमोंके धर्म तथा अपने धर्मका भली प्रकार पालन करनेवाले समस्त वर्णोंके लोक आदिकी स्थापना की ॥ ३२-३३॥ कर्मनिष्ठ ब्राह्मणोंका स्थान पितृलोक है, युद्ध-क्षेत्रसे कभी न हटनेवाले क्षत्रियोंका इन्द्रलोक है॥ ३४॥ तथा अपने धर्मका पालन करनेवाले वैश्योंका वायुलोक और सेवाधर्मपरायण शूद्रोंका गन्धर्वलोक है ॥ ३५ ॥ अट्ठासी हजार ऊर्ध्वरेता मुनि हैं; उनका जो स्थान बताया गया है वही गुरुकुलवासी ब्रह्मचारियोंका स्थान है॥ ३६ ॥ इसी प्रकार वनवासी वानप्रस्थोंका स्थान सप्तर्षिलोक, गृहस्थोंका पितृलोक और संन्यासियोंका ब्रह्मलोक है तथा आत्मानुभवसे तृप्त योगियोंका स्थान अमरपद (मोक्ष) है॥ ३७-३८ ॥ जो निरन्तर एकान्तसेवी और ब्रह्मचिन्तनमें मग्न रहनेवाले योगिजन हैं उनका जो परमस्थान है उसे पण्डितजन ही देख पाते हैं ॥ ३९ ॥

अ० ७ ] * प्रथम अंश * २९


गत्वा गत्वा निवर्त्तन्ते चन्द्रसूर्यादयो ग्रहाः।<br>अद्यापि न निवर्त्तन्ते द्वादशाक्षरचिन्तकाः॥ ४०<br>तामिस्रमन्धतामिस्रं महारौरवरौरवौ।<br>असिपत्रवनं घोरं कालसूत्रमवीचिकम्॥ ४१<br>विनिन्दकानां वेदस्य यज्ञव्याघातकारिणाम्।<br>स्थानमेतत्समाख्यातं स्वधर्मत्यागिनश्च ये॥ ४२चन्द्र और सूर्य आदि ग्रह भी अपने-अपने लोकोंमें जाकर फिर लौट आते हैं, किन्तु द्वादशाक्षर मन्त्र (ॐ नमो भगवते वासुदेवाय) का चिन्तन करनेवाले अभीतक मोक्षपदसे नहीं लौटे॥ ४०॥ तामिस्र, अन्धतामिस्र, महारौरव, रौरव, असिपत्रवन, घोर, कालसूत्र और अवीचिक आदि जो नरक हैं, वे वेदोंकी निन्दा और यज्ञोंका उच्छेद करनेवाले तथा स्वधर्म-विमुख पुरुषोंके स्थान कहे गये हैं॥ ४१-४२॥

इति श्रीविष्णुपुराणे प्रथमेंऽशे षष्ठोऽध्यायः॥ ६॥


सातवाँ अध्याय

मरीचि आदि प्रजापतिगण, तामसिक सर्ग, स्वायम्भुवमनु और शतरूपा तथा उनकी सन्तानका वर्णन

श्रीपराशर उवाच<br>ततोऽभिध्यायंतस्तस्य जज्ञिरे मानसाः प्रजाः।<br>तच्छरीरसमुत्पन्नैः कार्यैस्तैः करणैः सह।<br>क्षेत्रज्ञाः समवर्त्तन्त गात्रेभ्यस्तस्य धीमतः॥ १<br>ते सर्वे समवर्त्तन्त ये मया प्रागुदाहृताः।<br>देवाद्याः स्थावरान्ताश्च त्रैगुण्यविषये स्थिताः॥ २<br>एवंभूतानि सृष्टानि चराणि स्थावराणि च॥ ३श्रीपराशरजी बोले— फिर उन प्रजापतिके ध्यान करनेपर उनके देहस्वरूप भूतोंसे उत्पन्न हुए शरीर और इन्द्रियोंके सहित मानस प्रजा उत्पन्न हुई। उस समय मतिमान् ब्रह्माजीके जड शरीरसे ही चेतन जीवोंका प्रादुर्भाव हुआ॥ १॥ मैंने पहले जिनका वर्णन किया है, देवताओंसे लेकर स्थावरपर्यन्त वे सभी त्रिगुणात्मक चर और अचर जीव इसी प्रकार उत्पन्न हुए॥ २-३॥
यदास्य ताः प्रजाः सर्वा न व्यवर्धन्त धीमतः।<br>अथान्यान्मानसान्पुत्रान्सदृशानात्मनोऽसृजत्॥ ४<br>भृगुं पुलस्त्यं पुलहं क्रतुमङ्गिरसं तथा।<br>मरीचिं दक्षमत्रिं च वसिष्ठं चैव मानसान्॥ ५<br>नव ब्रह्माण इत्येते पुराणे निश्चयं गताः॥ ६जब महाबुद्धिमान् प्रजापतिकी वह प्रजा पुत्र-पौत्रादि-क्रमसे और न बढ़ी तब उन्होंने भृगु, पुलस्त्य, पुलह, क्रतु, अंगिरा, मरीचि, दक्ष, अत्रि और वसिष्ठ—इन अपने ही सदृश अन्य मानस-पुत्रोंकी सृष्टि की। पुराणोंमें ये नौ ब्रह्मा माने गये हैं॥ ४—६॥
ख्यातिं भूतिं च सम्भूतिं क्षमां प्रीतिं तथैव च।<br>सन्नतिं च तथैवोर्ज्रामनसूयां तथैव च॥ ७<br>प्रसूतिं च ततः सृष्ट्वा ददौ तेषां महात्मनाम्।<br>पत्न्यो भवध्वमित्युक्त्वा तेषामेव तु दत्तवान्॥ ८फिर ख्याति, भूति, सम्भूति, क्षमा, प्रीति, सन्नति, ऊर्ज्जा, अनसूया तथा प्रसूति इन नौ कन्याओंको उत्पन्न कर, इन्हें उन महात्माओंको 'तुम इनकी पत्नी हो' ऐसा कहकर सौंप दिया॥ ७-८॥
सनन्दनादयो ये च पूर्वसृष्टास्तु वेधसा।<br>न ते लोकेष्वसज्जन्त निरपेक्षाः प्रजासु ते॥ ९<br>सर्वे तेऽभ्यागतज्ञाना वीतरागा विमत्सराः।<br>तेष्वेवं निरपेक्षेषु लोकसृष्टौ महात्मनः॥ १०ब्रह्माजीने पहले जिन सनन्दनादिको उत्पन्न किया था वे निरपेक्ष होनेके कारण सन्तान और संसार आदिमें प्रवृत्त नहीं हुए॥ ९॥ वे सभी ज्ञानसम्पन्न, विरक्त और मत्सरादि दोषोंसे रहित थे। उन महात्माओंको संसार-रचनासे
३०* श्रीविष्णुपुराण *[ अ० ७
संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
ब्रह्मणोऽभून्महान् क्रोधस्त्रैलोक्यदहनक्षमः।<br>तस्य क्रोधात्समुद्भूतज्वालामालातिदीपितम्।<br>ब्रह्मणोऽभूत्तदा सर्वं त्रैलोक्यमखिलं मुने॥ ११ब्रह्माजीको त्रिलोकीको भस्म कर देनेवाला महान् क्रोध उत्पन्न हुआ। हे मुने! उन ब्रह्माजीके क्रोधके कारण सम्पूर्ण त्रिलोकी ज्वाला-मालाओंसे अत्यन्त देदीप्यमान हो गयी॥ १०-११॥
भ्रुकुटीकुटिलात्तस्य ललाटात्क्रोधदीपितात्।<br>समुत्पन्नस्तदा रुद्रो मध्याह्नार्कसमप्रभः॥ १२उस समय उनकी टेढ़ी भृकुटि और क्रोध-सन्तप्त ललाटसे दोपहरके सूर्यके समान प्रकाशमान रुद्रकी उत्पत्ति हुई॥ १२॥
अर्धनारीनरवपुः प्रचण्डोऽतिशरीरवान्।<br>विभजात्मानमित्युक्त्वा तं ब्रह्मान्तर्दधे ततः॥ १३उसका अति प्रचण्ड शरीर आधा नर और आधा नारीरूप था। तब ब्रह्माजी 'अपने शरीरका विभाग कर' ऐसा कहकर अन्तर्धान हो गये॥ १३॥
तथोक्तोऽसौ द्विधा स्त्रीत्वं पुरुषत्वं तथाऽकरोत्।<br>विभेदपुरुषत्वं च दशधा चैकधा पुनः॥ १४ऐसा कहे जानेपर उस रुद्रने अपने शरीरस्थ स्त्री और पुरुष दोनों भागोंको अलग-अलग कर दिया और फिर पुरुष-भागको ग्यारह भागोंमें विभक्त किया॥ १४॥
सौम्यासौम्यैस्तदा शान्ताऽशान्तैः स्त्रीत्वं च स प्रभुः।<br>विभेद बहुधा देवः स्वरूपैरसितैः सितैः॥ १५तथा स्त्री-भागको भी सौम्य, क्रूर, शान्त-अशान्त और श्याम-गौर आदि कई रूपोंमें विभक्त कर दिया॥ १५॥
ततो ब्रह्माऽऽत्मसम्भूतं पूर्वं स्वायम्भुवं प्रभुः।<br>आत्मानमेव कृतवान्प्रजापाल्ये मनुं द्विज॥ १६तदनन्तर, हे द्विज! अपनेसे उत्पन्न अपने ही स्वरूप स्वायम्भुवको ब्रह्माजीने प्रजा-पालनके लिये प्रथम मनु बनाया॥ १६॥
शतरूपां च तां नारीं तपोनिर्धूतकल्मषाम्।<br>स्वायम्भुवो मनुर्देवः पत्नीत्वे जगृहे प्रभुः॥ १७उन स्वायम्भुव मनुने [अपने ही साथ उत्पन्न हुई] तपके कारण निष्पाप शतरूपा नामकी स्त्रीको अपनी पत्नीरूपसे ग्रहण किया॥ १७॥
तस्मात्तु पुरुषाद्देवी शतरूपा व्यजायत।<br>प्रियव्रतोत्तानपादौ प्रसूत्याकृतिसंज्ञितम्॥ १८हे धर्मज्ञ! उन स्वायम्भुव मनुसे शतरूपा देवीने प्रियव्रत और उत्तानपादनामक दो पुत्र
कन्याद्वयं च धर्मज्ञ रूपौदार्यगुणान्वितम्।<br>ददौ प्रसूतिं दक्षाय आकूतिं रुचये पुरा॥ १९तथा उदार, रूप और गुणोंसे सम्पन्न प्रसूति और आकूति नामकी दो कन्याएँ उत्पन्न कीं। उनमेंसे प्रसूतिको दक्षके साथ तथा आकूतिको रुचि प्रजापतिके साथ विवाह दिया॥ १८-१९॥
प्रजापतिः स जग्राह तयोर्जज्ञे सदक्षिणः।<br>पुत्रो यज्ञो महाभाग दम्पत्योर्मिथुनं ततः॥ २०हे महाभाग! रुचि प्रजापतिने उसे ग्रहण कर लिया। तब उन दम्पतीके यज्ञ और दक्षिणा—ये युगल (जुड़वाँ) सन्तान उत्पन्न हुईं॥ २०॥
यज्ञस्य दक्षिणायां तु पुत्रा द्वादश जज्ञिरे।<br>यामा इति समाख्याता देवाः स्वायम्भुवे मनौ॥ २१यज्ञके दक्षिणासे बारह पुत्र हुए, जो स्वायम्भुव मन्वन्तरमें याम नामके देवता कहलाये॥ २१॥
प्रसूत्यां च तथा दक्षश्चतस्रो विंशतिस्तथा।<br>ससर्ज कन्यास्तासां च सम्यङ् नामानि मे शृणु॥ २२तथा दक्षने प्रसूतिसे चौबीस कन्याएँ उत्पन्न कीं। मुझसे उनके शुभ नाम सुनो॥ २२॥
श्रद्धा लक्ष्मीर्धृतिस्तुष्टिर्मेधा पुष्टिस्तथा क्रिया।<br>बुद्धिर्लज्जा वपुः शान्तिः सिद्धिः कीर्तिस्त्रयोदशी॥ २३श्रद्धा, लक्ष्मी, धृति, तुष्टि, मेधा, पुष्टि, क्रिया, बुद्धि, लज्जा, वपु, शान्ति, सिद्धि और तेरहवीं कीर्ति—इन दक्ष-कन्याओंको धर्मने पत्नीरूपसे ग्रहण किया।
पत्‍न्यर्थं प्रतिजग्राह धर्मो दाक्षायणीः प्रभुः।<br>ताभ्यः शिष्टाः यवीयस्य एकादश सुलोचनाः॥ २४इनसे छोटी शेष ग्यारह कन्याएँ
ख्यातिः सत्यथ सम्भूतिः स्मृतिः प्रीतिः क्षमा तथा।<br>सन्ततिश्चानसूया च ऊर्ज्जा स्वाहा स्वधा तथा॥ २५ख्याति, सती, सम्भूति, स्मृति, प्रीति, क्षमा, सन्तति, अनसूया, ऊर्जा, स्वाहा और स्वधा थीं॥ २३—२५॥
भृगुर्भवो मरीचिश्च तथा चैवाङ्गिरा मुनिः।<br>पुलस्त्यः पुलहश्चैव क्रतुश्चर्षिवरस्तथा॥ २६हे मुनिसत्तम! इन ख्याति आदि कन्याओंको क्रमशः भृगु, शिव, मरीचि, अंगिरा, पुलस्त्य,

अ० ७] * प्रथम अंश * ३१

अत्रिर्वसिष्ठो वह्निश्च पितरश्च यथाक्रमम्।<br>ख्यात्याद्या जगृहुः कन्या मुनयो मुनिसत्तम ॥ २७<br>श्रद्धा कामं चला दर्पं नियमं धृतिरात्मजम्।<br>सन्तोषं च तथा तुष्टिर्लोभं पुष्टिरसूत ॥ २८<br>मेधा श्रुतं क्रिया दण्डं नयं विनयमेव च ॥ २९<br>बोधं बुद्धिस्तथा लज्जा विनयं वपुरात्मजम्।<br>व्यवसायं प्रजज्ञे वै क्षेमं शान्तिरसूयत ॥ ३०<br>सुखं सिद्धिर्र्यशः कीर्त्तिरित्येते धर्मसूनवः।<br>कामाद्रतिः सुतं हर्षं धर्मपौत्रमसूत ॥ ३१<br>हिंसा भार्या त्वधर्मस्य ततो जज्ञे तथानृतम्।<br>कन्या च निकृतिस्ताभ्यां भयं नरकमेव च ॥ ३२<br>माया च वेदना चैव मिथुनं त्विदमेतयोः।<br>तयोर्जज्ञेऽथ वै माया मृत्युं भूतापहारिणम् ॥ ३३<br>वेदना स्वसुतं चापि दुःखं जज्ञेऽथ रौरवात्।<br>मृत्योर्व्याधिजराशोक तृष्णाक्रोधाश्च जज्ञिरे ॥ ३४<br>दुःखोत्तराः स्मृता ह्येते सर्वे चाधर्मलक्षणाः।<br>नैषां पुत्रोऽस्ति वै भार्या ते सर्वे ह्यूर्ध्वरेतसः॥ ३५<br>रौद्राण्येतानि रूपाणि विष्णोर्मुनिवरात्मज।<br>नित्यप्रलयहेतुत्वं जगतोऽस्य प्रयान्ति वै॥ ३६<br>दक्षो मरीचिरत्रिश्च भृग्वाद्याश्च प्रजेश्वराः।<br>जगत्यत्र महाभाग नित्यसर्गस्य हेतवः ॥ ३७<br>मनवो मनुपुत्राश्च भूपा वीर्यधराश्च ये।<br>सन्मार्गनिरताः शूरास्ते सर्वे स्थितिकारिणः ॥ ३८<br>श्रीमैत्रेय उवाच<br>येयं नित्या स्थितिर्ब्रह्मन्नित्यसर्गस्तथेरितः।<br>नित्याभावश्च तेषां वै स्वरूपं मम कथ्यताम् ॥ ३९<br>श्रीपराशर उवाच<br>सर्गस्थितिविनाशांश्च भगवान्मधुसूदनः।<br>तैस्तै रूपैरचिन्त्यात्मा करोत्यव्याहतो विभुः ॥ ४०<br>नैमित्तिकः प्राकृतिकस्तथैवात्यन्तिको द्विज।<br>नित्यश्च सर्वभूतानां प्रलयोऽयं चतुर्विधः ॥ ४१पुलह, क्रतु, अत्रि, वसिष्ठ—इन मुनियों तथा अग्नि और पितरोंने ग्रहण किया॥ २६-२७॥<br>श्रद्धासे काम, चला (लक्ष्मी) से दर्प, धृतिसे नियम, तुष्टिसे सन्तोष और पुष्टिसे लोभकी उत्पत्ति हुई॥ २८॥ तथा मेधासे श्रुत, क्रियासे दण्ड, नय और विनय, बुद्धिसे बोध, लज्जासे विनय, वपुसे उसका पुत्र व्यवसाय, शान्तिसे क्षेम, सिद्धिसे सुख और कीर्तिसे यशका जन्म हुआ; ये ही धर्मके पुत्र हैं। रतिने कामसे धर्मके पौत्र हर्षको उत्पन्न किया॥ २९—३१॥<br>अधर्मकी स्त्री हिंसा थी, उससे अनृत नामक पुत्र और निकृति नामकी कन्या उत्पन्न हुई। उन दोनोंसे भय और नरक नामके पुत्र तथा उनकी पत्नियां माया और वेदना नामकी कन्याएँ हुईं। उनमेंसे मायाने समस्त प्राणियोंका संहारकर्ता मृत्यु नामक पुत्र उत्पन्न किया ॥ ३२-३३॥ वेदनाने भी रौरव (नरक)-के द्वारा अपने पुत्र दुःखको जन्म दिया और मृत्युसे व्याधि, जरा, शोक, तृष्णा और क्रोधकी उत्पत्ति हुई ॥ ३४॥ ये सब अधर्मरूप हैं और 'दुःखोत्तर' नामसे प्रसिद्ध हैं, [क्योंकि इनसे परिणाममें दुःख ही प्राप्त होता है] इनके न कोई स्त्री है और न सन्तान। ये सब ऊर्ध्वरेता हैं॥ ३५॥ हे मुनिकुमार! ये भगवान् विष्णुके बड़े भयंकर रूप हैं और ये ही संसारके नित्य-प्रलयके कारण होते हैं॥ ३६॥ हे महाभाग! दक्ष, मरीचि, अत्रि और भृगु आदि प्रजापतिगण इस जगत्के नित्य-सर्गके कारण हैं॥ ३७॥ तथा मनु और मनुके पराक्रमी, सन्मार्गपरायण और शूर-वीर पुत्र राजागण इस संसारकी नित्य-स्थितिके कारण हैं॥ ३८॥<br>श्रीमैत्रेयजी बोले—हे ब्रह्मन्! आपने जो नित्य-स्थिति, नित्य-सर्ग और नित्य-प्रलयका उल्लेख किया सो कृपा करके मुझसे इनका स्वरूप वर्णन कीजिये॥ ३९॥<br>श्रीपराशरजी बोले—जिनकी गति कहीं नहीं रुकती वे अचिन्त्यात्मा सर्वव्यापक भगवान् मधुसूदन निरन्तर इन मनु आदि रूपोंसे संसारकी उत्पत्ति, स्थिति और नाश करते रहते हैं॥४०॥ हे द्विज! समस्त भूतोंका चार प्रकारका प्रलय है—नैमित्तिक, प्राकृतिक, आत्यन्तिक और नित्य॥ ४१ ॥

३२ * श्रीविष्णुपुराण * [ अ० ८


ब्राह्मो नैमित्तिकस्तत्र शेतेऽयं जगतीपतिः।
प्रयाति प्राकृते चैव ब्रह्माण्डं प्रकृतौ लयम्॥ ४२
ज्ञानादात्यन्तिकः प्रोक्तो योगिनः परमात्मनि।
नित्यः सदैव भूतानां यो विनाशो दिवानिशम्॥ ४३
प्रसूतिः प्रकृतेर्या तु सा सृष्टिः प्राकृता स्मृता।
दैनन्दिनी तथा प्रोक्ता यान्तरप्रलयादनु॥ ४४
भूतान्यनुदिनं यत्र जायन्ते मुनिसत्तम।
नित्यसर्गो हि स प्रोक्तः पुराणार्थविचक्षणैः॥ ४५
एवं सर्वशरीरेषु भगवान्भूतभावनः।
संस्थितः कुरुते विष्णुरुत्पत्तिस्थितिसंयमान्॥ ४६
सृष्टिस्थितिविनाशानां शक्तयः सर्वदेहिषु।
वैष्णव्यः परिवर्त्तन्ते मैत्रेयाहर्निशं समाः॥ ४७
गुणत्रयमयं ह्येतद्ब्रह्मन् शक्तित्रयं महत्।
योऽतियाति स यात्येव परं नावत्तंते पुनः॥ ४८

इति श्रीविष्णुपुराणे प्रथमंशे सप्तमोऽध्यायः॥ ७॥


उनमेंसे नैमित्तिक प्रलय ही ब्राह्म-प्रलय है, जिसमें जगत्पति ब्रह्माजी कल्पान्तमें शयन करते हैं; तथा प्राकृतिक प्रलयमें ब्रह्माण्ड प्रकृतिमें लीन हो जाता है॥ ४२॥ ज्ञानके द्वारा योगीका परमात्मामें लीन हो जाना आत्यन्तिक प्रलय है और रात-दिन जो भूतोंका क्षय होता है वही नित्य-प्रलय है॥ ४३॥ प्रकृतिसे महत्तत्वादिक्रमसे जो सृष्टि होती है वह प्राकृतिक सृष्टि कहलाती है और अवान्तर-प्रलयके अनन्तर जो [ब्रह्माके द्वारा] चराचर जगत्की उत्पत्ति होती है वह दैनन्दिनी सृष्टि कही जाती है॥ ४४॥ और हे मुनिश्रेष्ठ! जिसमें प्रतिदिन प्राणियोंकी उत्पत्ति होती रहती है उसे पुराणार्थमें कुशल महानुभावोंने नित्य-सृष्टि कहा है॥ ४५॥

इस प्रकार समस्त शरीरमें स्थित भूतभावन भगवान् विष्णु जगत्की उत्पत्ति, स्थिति और प्रलय करते रहते हैं॥ ४६॥ हे मैत्रेय! सृष्टि, स्थिति और विनाशकी इन वैष्णवी शक्तियोंका समस्त शरीरोंमें समान भावसे अहर्निश संचार होता रहता है॥ ४७॥ हे ब्रह्मन्! ये तीनों महती शक्तियाँ त्रिगुणमयी हैं; अतः जो उन तीनों गुणोंका अतिक्रमण कर जाता है वह परमपदको ही प्राप्त कर लेता है, फिर जन्म-मरणादिके चक्रमें नहीं पड़ता॥ ४८॥

इति श्रीविष्णुपुराणे प्रथमेंऽशे सप्तमोऽध्यायः॥ ७॥


आठवाँ अध्याय

रौद्र-सृष्टि और भगवान् तथा लक्ष्मीजीकी सर्वव्यापकताका वर्णन

श्रीपराशर उवाच

कथितस्तामसः सर्गो ब्रह्मणस्ते महामुने।
रुद्रसर्गं प्रवक्ष्यामि तन्मे निगदतः शृणु॥ १
श्रीपराशरजी बोले— हे महामुने! मैंने तुमसे ब्रह्माजीके तामस-सर्गका वर्णन किया, अब मैं रुद्र-सर्गका वर्णन करता हूँ, सो सुनो॥ १॥

कल्पादावात्मनस्तुल्यं सुतं प्रध्यायतःस्ततः।
प्रादुरासीत्प्रभोरङ्के कुमारो नीललोहितः॥ २
कल्पके आदिमें अपने समान पुत्र उत्पन्न होनेके लिये चिन्तन करते हुए ब्रह्माजीकी गोदमें नीललोहित वर्णके एक कुमारका प्रादुर्भाव हुआ॥ २॥

रुरोद सुस्वरं सोऽथ प्राद्रवद्विजसत्तम।
किं त्वं रोदिषि तं ब्रह्मा रुदन्तं प्रत्युवाच ह॥ ३
हे द्विजोत्तम! जन्मके अनन्तर ही वह जोर-जोरसे रोने और इधर-उधर दौड़ने लगा। उसे रोता देख ब्रह्माजीने उससे पूछा—"तू क्यों रोता है?"॥ ३॥

नाम देहीति तं सोऽथ प्रत्युवाच प्रजापतिः।
रुद्रस्त्वं देव नाम्नासि मा रोदीर्धैर्यमावह।
एवमुक्तः पुनः सोऽथ सप्तकृत्वो रुरोद वै॥ ४
उसने कहा—"मेरा नाम रखो।" तब ब्रह्माजी बोले—'हे देव! तेरा नाम रुद्र है, अब तू मत रो, धैर्य धारण कर।' ऐसा कहनेपर भी वह सात बार और रोया॥ ४॥