विष्णुधर्मोत्तर पुराण (तृतीय खण्ड - चित्रसूत्र, वास्तु, शिल्प व प्रतिमा लक्षण)
Vishnudharmottara Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास (सम्पादक: डॉ. प्रियबाला शाह) द्वारा
स्रोत: Sri Vishnu Dharmottara Mahapuranam 1000p Classic Edition (उद्गम)
| अध्यायाः | विषयाः | पत्राङ्काः | पृष्ठाङ्काः |
|---|---|---|---|
| ११९ | समुद्रयात्रानुष्ठानविचारम्भादिकामानुसारं मत्स्यवराहहयग्रीवादिपूजनम् | ३७५ | २ |
| १२० | हयग्रीवादिदेवानां पूजाकालनिर्णयः | " | " |
| १२१ | पुष्करप्रयागकालञ्जरादितीर्थेषु ब्रह्मयोगिशयिमहादेवशतकलादिव्रतपूजनानियमः | ३७६ | १ |
| १२२ | विष्णोर्वासुदेवादीनामेषु मोक्षादिद्वादशशक्तितर्पणम् | " | " |
| १२३ | पूर्वादिदिक्सरलेन क्षमादिकामपरत्वेन च विष्णोश्चक्रादीनामस्मरणकीर्तनादिनाभीष्टसिद्धिः | " | " |
| १२४ | चैत्रादिमासपरत्वेन कृत्तिकादिनक्षत्रपरत्वेन च विष्ण्वादीनामस्मरणफलानि | ३७७ | १ |
| १२५ | अर्जुनावर्तेन पुष्करादिक्षेत्रेषु पुण्डरीकाक्षादिपञ्चपञ्चाशन्नामकीर्तनादिना पापक्षयपुरस्सरं महत्फलम् | " | " |
| १२६ | अष्टपत्रकमलकर्णिकायां ब्रह्मपूजनं पूर्वादिपत्रेषु च ऋगादिपूजनविधानम् | ३७८ | १ |
| १२७ | चैत्रशुक्लप्रतिपदादौ ब्रह्मादित्रिदेवपूजनविधानम् | " | " |
| १२८ | चैत्रशुक्लप्रतिपदि स्थले जले वा विष्णुपूजनेन सर्वपापक्षयमोक्षप्राप्तिः | " | २ |
| १२९ | अशीतिभागात्मकप्रकृतिमण्डलनिर्माणवार्तासुष्ठुत्वं, चैत्रशुक्लप्रतिपदि वेधोलक्ष्म्याश्च पूजनादिनियमाः | ३७९ | २ |
| १३० | नामत्रयपूजाचक्रव्रतप्रतिपादनम् | ३७८ | २ |
| १३१ | चैत्रशुक्लद्वितीयायां बालेन्दुव्रतवर्णनम् | ३७९ | १ |
| १३२ | अङ्गन्यासनिहतिप्रान्तम् | " | " |
| १३३ | ज्येष्ठशुक्लतृतीयायां त्रिविक्रमव्रतम् | " | " |
| १३४ | अस्यामेव तिथौ द्वितीयं त्रिविक्रमव्रतम् | " | " |
| १३५ | अस्यामेव तिथौ तृतीयं त्रिविक्रमव्रतम् | ३८० | २ |
| १३६ | वार्षिकश्चन्द्रेन्द्रस्य विष्णोरुक्त- ज्येष्ठशुक्लतृतीयायां तिथौ व्रताचरणपूर्वकमुक्तेनारत्नलोके यथेष्टसुखप्राप्तिः | " | " |
| १३७ | वह्निसूर्यसोमवरुणारुणविष्ण्वेषु श्रुतरश्मिव्रतवर्णनम् | " | " |
| १३८ | इन्द्रयमवरुणकुबेरचतुःसीतावतवर्णनम् | ३८१ | १ |
| १३९ | विष्णुभूमिमनोबलचतुर्भूतव्रतप्रतिधानम् | " | " |
| १४० | बलज्ञानैश्वर्यशक्तिरुचिमूर्तित्रितयवर्णनम् | " | " |
| १४१ | पञ्चमचतुर्भूतकल्पे वेदव्रतकथनम् | " | २ |
| १४२ | चैत्रशुक्लचतुर्थ्या वासुदेवस्य वैशाखे सङ्कर्षणस्य ज्येष्ठे प्रद्युम्नस्याप- | " | २ |
वि० ध० | ॥ १६ ॥ | अनु०
[भाग १]
| अध्यायाः | विषयाः | पत्राङ्काः | पृष्ठाङ्काः |
|---|---|---|---|
| — | ठेऽनिरुद्धस्य चार्चनं विधाय योग्यब्राह्मणाय तत्तद्व्रतोक्तदक्षिणादिदानम् .... | ३८१ | २ |
| १४३ | सप्तमचतुर्मूर्त्तिकल्पेनेोद्विव्रतवर्णनम् .... | ३८२ | १ |
| १४४ | अष्टमचतुर्मूर्त्तिकल्पे चतुर्युगसूतवर्णनम् .... | ” | ” |
| १४५ | श्रावणादिचतुर्मासेषु विष्णुरूपिचतुःसागरोपचरणंकुम्भपूजनहवनादिविधानम् .... | ” | ” |
| १४६ | वासुदेवादिचतुर्मूर्त्तिण्डमकरादिरुचिसहितस्य पूजनम् .... | ” | २ |
| १४७ | ईशानाद्यैविश्वरूपश्चाक्षुषरूपाणि निर्माय चैत्रशुक्लादिप्रतिपदि भौमनादेयताम्रकाजलस्नानादिपद्मदित्यल्यवबूद्यहोमादिकमारेण व्रतवर्णनम् .... | ३८३ | १ |
| १४८ | शंखचक्रगदापद्मानां वासुदेवानिरुद्धादिचतुर्द्दण्डालमकानां श्रावणादिचतुर्मासेषु वह्निस्नानभक्तभोजनादिनियमपुरस्सरमर्चनम् .... | ” | ” |
| १४९ | वासन्तिकविषुवद्दिने त्रिरात्रोपवासपुरस्सरं यथाशक्ति वासुदेवाचंनं विधाय पुरो मासतूयं च नित्यार्चनफलाहारविधिं कृत्वा वामरोक्तविषुवद्दिने व्रतं समापयेत् .... | ” | ” |
| १५० | पूर्वोक्त ( १४९ अध्यायोक्त ) व्रते विष्णोः स्यागेऽनंतपूजनं विधाय द्वितीयादिषु महीगंगनेवद्यप्रामेकत्रवर्णनं व्रतमाचरेच्चंडनरूपपुष्पादिव्याभाः .... | ” | ” |
[भाग २]
| अध्यायाः | विषयाः | पत्राङ्काः | पृष्ठाङ्काः |
|---|---|---|---|
| १५१ | नरनारायणहंसादिरूपचतुर्मूर्त्तिव्रतवर्णनम्, समाप्तं चतुर्मूर्त्तितत्त्वम् ॥<br>अथ पंचमूर्त्तितत्त्वम् | ३८३ | २ |
| १५२ | चैत्रशुक्लपंचम्यां पृथिव्यादिपंचभूतात्मकस्य विष्णोः शुक्लादिवर्णमण्डलेषु तत्तद्वर्णगन्धपुष्पादिभिरर्चनम् .... | ” | ” |
| १५३ | बन्धूकोदधिषुपवित्रस्तरपरिवेस्तरनदीनां सफललतावाविधिवर्णनम् | ” | ” |
| १५४ | सावित्रीलक्ष्मीव्रतवर्णनम् .... | ” | ” |
| १५५ | पंचमूर्त्तिव्रते शंखचक्रगदापद्मपूजनहवनादि .... | ३८४ | १ |
| १५६ | वसतऋतुषु मधुमाधवादियुग्मनामकपण्मूर्त्तितत्त्ववर्णनम् .... | ” | २ |
| १५७ | सप्तमूर्त्तिव्रते सुभास्त्रादिदीप्तव्रतवर्णनम् .... | ” | ” |
| १५८ | चैत्रमासादारभ्य कृष्णपक्षे प्रतिदिनं रुक्मभौमादित्यालत्र नवव्रतन्म् | ३८५ | १ |
| १५९ | चैत्रशुक्लपक्षादारभ्य प्रत्यहं सप्ताहपर्यन्तं जम्बूद्वीपादिममद्वीपवर्णनम् | ” | ” |
| १६० | चैत्रशुक्लपक्षादारभ्य लवणादिसप्तसमुद्रतवर्णनम् .... | ” | ” |
| १६१ | महेंद्रादिसप्तकुलपर्वतपूजनविधिवानम् .... | ” | ” |
| १६२ | मन्वन्त्यादिसप्तमलोकव्रतवर्णनम् .... | ” | ” |
| १६३ | ह्रादिन्यादिनदीव्रतवर्णनम् .... | ” | ” |
| १६४ | नागसप्तव्रतवर्णनम् .... | ” | ” |
| १६५ | मोक्षप्राप्तिफलदं गताश्वव्रतकथनम् .... | ” | ३८६ |
| अध्यायाः | विषयाः | पत्राङ्काः | पृष्ठाङ्काः | अध्यायाः | विषयाः | पत्राङ्काः | पृष्ठाङ्काः |
|---|---|---|---|---|---|---|---|
| १६६ | चैत्रशुक्लसप्तम्यां मरुत्प्लावितव्रतम् .... | ३८६ | १ | १८२ | मार्गशुक्लद्वादश्यां धातादित्यादिद्वादशादित्यव्रतवर्णनम् .... | ३८९ | २ |
| १६७ | ” मरुद्धूतेऽग्नौ गोपतिपूजनम्, तत्र चाष्टदलकमलकर्णिकायां विभावसुं संस्थाप्यर्तुकारिकादिगन्धवैिर्धूपजनैर्विधानम् .... | ” | २ | १८३ | वैशाखत्रयोदश्यां कामदेवव्रतम्.... | ” | ” |
| १६८ | वसन्ताद्यृतुनुसारं सर्षपार्चनार्चादिदेववर्णनम् .... | ३८७ | १ | १८४ | फाल्गुनशुक्लत्रयोदशीतो दम्पत्यर्च्चनं शुक्लत्रयोदश्यां धनव्रतम् .... | ” | २ |
| १६९ | अष्टदलकमले भास्करस्य तदंगदेवांनाञ्च पूजनम् .... | ” | २ | १८५ | ज्येष्ठशुक्लपक्षत्रयोदश्यां वायुलोंकप्रदं वापिकव्रतम् .... | ” | ” |
| १७० | रक्तसप्तमीव्रतवर्णनप्रसंगेन सांगदेवभास्करपूजनम् .... | ” | ” | १८६ | पौषमासिककृष्णचतुर्दशीषु वत्सरपर्यन्तं विरुपाक्षव्रतस्य कृष्णचतुर्दशीभ्यां यमव्रतम् .... | ” | ” |
| १७१ | संवत्सरपर्यन्तमुक्तविधिना सप्तमीव्रतकरणेन सूर्यप्रसादात्सतवार्थाभिष्टिसिद्धिः | ३८८ | १ | १८७ | फाल्गुनशुक्लपक्षचतुर्दश्यां शिवव्रतम् .... | ” | ” |
| १७२ | ब्रह्मसूर्यदिग्निभपालपुरस्सरस्याम्यश्वसुपूजामाहात्म्यम् .... | ” | ” | १८८ | चैत्रशुक्लपक्षादारभ्य वर्षपर्यन्तं प्रतिपञ्चदशीषु श्राद्धपापिनुव्रतम् | ३९० | १ |
| १७३ | सोमाष्टमी महेश्वरव्रतपूजोपवासस्नानप्रदानिकरणफलम् .... | ” | ” | १८९ | चैत्रकृष्णपञ्चदशीतो वर्षपर्यन्तं वह्निहुतदहनवानादिक्स .... | ” | ” |
| १७४ | हिमवदादिपर्वतेशशैलानां भद्रादिनववर्षाणां नवम्यां पूजनम् .... | ” | २ | १९० | अमावास्यायां चन्द्रसूर्यव्रतवर्णनम् .... | ” | ” |
| १७५ | भद्रकालीव्रतपूजाविधानम् .... | ” | ” | १९१ | कार्त्तिकरात्रौस्थितिप्रतिमासं कृत्तिकागोहिण्यादिनक्षत्रयुतचन्द्रमःपूजनाद्विवर्णनम् .... | ” | ” |
| १७६ | दशम्यां क्रत्यादिवेधदेवव्रतवर्णनं समाहात्म्यम् .... | ” | ” | १९२ | कात्तिकपूर्णिमायां षोडशदले पद्मे कर्णिकायां चन्द्रस्य केसरेष्वष्टाविंशतिनक्षत्राणां पत्रेषु च तिथिनिदेवतानां सचन्द्रिकाणां पूजनविधिः | ” | २ |
| १७७ | ” अङ्गिरोव्रतवर्णनम् .... | ” | ” | १९३ | प्रौष्ठपदपूर्णिमायां वरुणव्रतवर्णनम् .... | ” | ” |
| १७८ | धर्मव्रतवर्णनम् .... | ” | ” | १९४ | आश्वयुक्पूर्णिमायां शक्रव्रतवर्णनम् .... | ” | ” |
| १७९ | मार्गशीर्षमासमारभ्याऽसंवत्सरमेकादश्यां रुद्रमहद्रुद्रव्रतवर्णनम् .... | ३८९ | १ | १९५ | आश्वयुक्पूर्णिमायां शक्रव्रतम् .... | ” | ” |
| १८० | मार्गकृष्णद्वादशीषु संवत्सरपर्यन्तं शुचिव्रतवर्णनम् .... | ” | ” | ||||
| १८१ | मार्गशीर्षद्वादश्यां वत्सरपर्यन्तं साध्यव्रतवर्णनम् .... | ” | ” |
वि० ध० | अनु०
॥ १७ ॥
| अध्यायाः | विषयाः | पत्राङ्काः | पृष्ठाङ्काः |
|---|---|---|---|
| १९७ | ब्रह्मकूर्च-(पञ्चगव्य) वर्णनम् .... .... .... | ३९० | २ |
| १९८ | पौर्णमामावास्यासु द्वादशवर्षपर्यन्तं महाव्रतम् .... | ,, | ,, |
| १९९ | तिर्यग्योनिसंरूढदशजन्मनि निवारकं मेषादिसंक्रान्तिषु पशुरामकृष्णादिव्रतम् .... .... .... .... | ,, | ,, |
| २०० | इष्टप्राप्त्यादिव्रतवर्णनम् .... .... .... | ,, | २ |
| २०१ | सत्कुलादिमित्रव्रतवर्णनम् .... .... .... | ,, | ,, |
| २०२ | रूपावाप्तिव्रतवर्णनम् .... .... .... | ,, | ,, |
| २०३ | इह लावण्यमदभन्ते च स्वर्गाप्तिकरं व्रतम् .... .... | ३९२ | १ |
| २०४ | सौभाग्यविधायकव्रतम् .... .... .... | ,, | ,, |
| २०५ | आश्वयुजप्रतिपद्मारभ्यास्यपर्यन्तमारोग्यसम्पदादिषड्विधव्रतविधानम् | ,, | ,, |
| २०६ | ज्ञानबुद्धिविवर्द्धनं वैशाखमासवतम् .... .... | ,, | ,, |
| २०७ | विद्याप्राप्तिव्रतवर्णनम् .... .... .... | ,, | २ |
| २०८ | शीलप्राप्तिव्रतवर्णनम् .... .... .... | ,, | ,, |
| २०९ | धर्मप्राप्तिकरं श्रावणमासवतम् .... .... | ,, | ,, |
| २१० | धनप्राप्तिकरं सङ्कर्षणव्रतम् .... .... | ,, | ,, |
| २११ | लक्ष्मीप्राप्तिकरं ज्येष्ठमासवतम् .... .... | ,, | ,, |
| २१२ | भोगावाप्तिकमाघाद्यष्टमासवतम् .... .... | ३९३ | १ |
| अध्यायाः | विषयाः | पत्राङ्काः | पृष्ठाङ्काः |
|---|---|---|---|
| २१३ | जयप्राप्तिविधायकं कार्तिकमासवतम् .... .... | ३९३ | २ |
| २१४ | कार्तिकपौर्णमासीतः श्रावणीपर्यन्तं प्रतिपद्दिनेषुजननव्रतविधानम् .... | ,, | ,, |
| २१५ | फाल्गुन्याद्याश्चतस्रऋक्षैरेकादशीषु विविक्तकृष्णेकशयनादिव्रतकथनादिह लोके श्रेष्ठाप्तिमृतिकालसमये च श्रीकृष्णस्मरणमाप्नोति जनः .... | ||
| २१६ | फाल्गुनपूर्णिमायां लक्ष्मीनारायणाविन्दुगोरात्रिरूपिणावभ्यर्च्य चैत्रवैशा-खज्येष्ठमासेषु चैतेयथासंख्यं पारणमा आपाढाश्रावणाभाद्रपदाश्विन-मासेषु श्रिया सह श्रीधरं सम्पूज्य चन्द्रमसः पूजनेन द्वितीयं पारणम् । कार्तिकादिमासेषु केशवमर्चयित्वा मुक्तिचन्द्रमसः पूजनेन तृतीयं तुरीये पारणम् । एतत्पारणत्रये प्रथमपारण पञ्चगव्यप्राशनं, द्वितीये कुशौदकं, तृतीये सुवर्णोदकप्राशनेति नियमनं लक्ष्मीनारायणौ सम्पूज्य नरो नैविद्ययुक्तैऽन्नफलैर् लभते च द्रुमस्मृतिं मुक्तिञ्च तत इति .... | ३९४ | १ |
| २१७ | चैत्रकृष्णाष्टम्यामुपवासपुरस्सरं कृष्णाष्टमीमर्च्य वशागव्यदुग्ध-योनिन्नमिश्रकपारणव्रतस्नानादिविधानेन सम्मस्तानायुरन्नदा स्यात् । | ,, | २ |
| २१८ | हरिशयनप्रबोधनयोर्मध्ये द्वादशव्रतविधानाव्रतनिर्देशनम् | ,, | ,, |
| २१९ | भाद्रशुक्लद्वादश्यां प्रारभ्य यावत्संवत्सरं द्वादशीव्रतव्रतवर्णनम् | ३९७ | ,, |
| २२० | पापशुद्धशर्वाणी दम्परत्नं प्रनहद्भावनेषु जगदर्चितनदानगोदत्र-प्राप्तानादिविधानम् .... .... .... | ,, | ,, |
॥ १७ ॥
| अध्यायाः | विषयाः | पत्राङ्काः | पृष्ठाङ्काः | अध्यायाः | विषयाः | पत्राङ्काः | पृष्ठाङ्काः |
|---|---|---|---|---|---|---|---|
| २२१ | चैत्रशुक्लप्रतिपदादौ ब्रह्मादिदेवानां सहेतुफलं पूजनम् | ३९६ | २ | र्जन्मादिनियमपुरस्सरमाचारगतिकथनम् | ४०१ | १ | |
| २२२ | रोचेषु मासोपवासफलानिरूपणम् | ३९७ | " | २३४ | महापातकोपपातकादिनिर्देशपूर्वकं प्रायश्चित्तवर्णनम् | ४०३ | २ |
| २२३ | तत्तन्नक्षत्रेषु तत्तद्देवादिपूजनवर्णनम् | ३९८ | " | २३५ | रहस्यप्रायश्चित्तनिर्देशः | ४१० | " |
| २२४ | अष्टावक्रादिक्संवादे तया स्त्रीस्वभावादिवर्णनं भार्गवेण मुनिनिष्ठावक्त्राय स्वसुताया दिशो दानञ्च | ३९९ | १ | २३६ | पापप्रशमनाश्राद्धजपादिच्छिद्रच्छद्मवर्णनम् | " | " |
| २२५ | पुरुषसूक्तविधानेन संवत्सरपर्यन्तं हंसस्वरूपजनार्दनपूजनव्रतम् | ४०० | " | २३७ | दानतपोवृद्धगवादिकर्मदानं भोगिनस्त्वग्ज्यामालादिकल्पकथनम् | ४११ | |
| २२६ | ऋतुतुगस्यान्ते दाम्पत्यव्यवहारप्रवृत्तैर्लोभदंभादिदोषमाकुले लोके हंस-रूपिनारायणेन मुन्यनुरोधेन ज्ञानोपदेशकथनमभिहितमासीत् | " | " | २३८ | निधनसूचकाङ्गारिष्टयोगवर्णनम् | ४१२ | |
| अथ हंसगीता। | २३९ | अज्ञानेनापाज्ञानफलानि | ४१३ | ||||
| २२७ | वर्णाश्रमधर्मवर्णनम् | " | २ | २४० | पापफलदुःखवर्णनम् | " | २ |
| २२८ | ब्रह्मचर्यपालनपुरःसरं वेदस्वीकरणादन्यमावण्याद्गुरुकुले वासो गृहाश्रमस्वीकृतिर्वा | " | " | २४१ | कामासक्तिनिन्दाथार्थ्यपूर्वकं कामसेवनेन सुखम् | " | " |
| २२९ | गृहस्थधर्मवर्णनम् | ४०१ | १ | २४२ | चञ्चलं लक्ष्मीरस्वभावं निश्चित्य तन्नाशे न हृष्येत् | ४१४ | " |
| २३० | भिक्षाभक्ष्यवर्णनम् | " | " | २४३ | मानदोषवर्णनम् | " | " |
| २३१ | द्रव्यशुद्धिनिरूपणप्रसङ्गे मलमूत्रादीनां परिगणनम् | " | २ | २४४ | मददोषवर्णनम् | " | " |
| २३२ | अशौचविधिवर्णनम् | " | " | २४५ | लोभदोषवर्णनम् | " | " |
| २३३ | हस्ते देवादितर्पणानि जपादिकोले मनःप्रणिधानमक्रोधकार्याद्यावन्त- | २४६ | क्रोधदोषवर्णनम् | " | " | ||
| २४७ | नास्तिक्यस्य गुरुतरपापवर्णनम् | " | " | ||||
| २४८ | अहङ्कारस्य सर्वनाशकत्वम् | ४१५ | |||||
| २४९ | शौचवर्णनम् | " | " |
वि० ध० ॥ १८ ॥ अनु० ॥ ३८ ॥
| अध्यायः | विषयाः | पत्राङ्काः | पृष्ठाङ्काः | अध्यायः | विषयाः | पत्राङ्काः | पृष्ठाङ्काः |
|---|---|---|---|---|---|---|---|
| २५० | अशौचदोषाः | ४१५ | १ | २६७ | शूरशौर्यवर्णनम् | ४२० | १ |
| २५१ | अनृतदोषवर्णनम् | ,, | २ | २६८ | अहिंसागुणहिंसादोषवर्णने | ४२१ | १ |
| २५२ | हिंसादोषकथनम् | ४१६ | १ | २६९ | क्षमागुणवर्णनम् | ,, | ,, |
| २५३ | कायवाङ्मनोजनितपापफलनिर्देशवर्णनम् | ,, | २ | २७० | कृतज्ञता (आनृशंस्य) गुणवर्णनम् | ४२२ | १ |
| २५४ | ज्ञानमहत्त्ववर्णनम् | ४१७ | १ | २७१ | आचारगुणवर्णनम् | ,, | ,, |
| २५५ | धर्मप्रशंसावर्णनम् | ,, | ,, | २७२ | शौचप्रशंसा | ,, | २ |
| २५६ | गृहस्थाश्रममाहात्म्यम् | ४१८ | १ | २७३ | तीर्थानुसरणप्रशंसनम् | ,, | ,, |
| २५७ | स्वाध्यायप्रशंसा | ,, | ,, | २७४ | उपवासप्रशंसावर्णनम् | ४२३ | १ |
| २५८ | ब्रह्मचर्यप्रशंसावर्णनम् | ,, | २ | २७५ | मनःशौचिनिरूपणम् | ,, | २ |
| २५९ | सन्तानप्रशंसा | ,, | ,, | २७६ | श्रद्धावर्णनम् | ,, | ,, |
| २६० | कीर्तिप्रशंसावर्णनम् | ,, | ,, | २७७ | ज्ञानमाहात्म्यवर्णनम् | ,, | ,, |
| २६१ | यशःप्रशंसावर्णनम् | ,, | ,, | २७८ | जपप्रशंसावर्णनम् | ४२४ | १ |
| २६२ | यज्ञप्रशंसावर्णनम् | ४१९ | १ | २७९ | जलान्तर्जपमाहात्म्यवर्णनम् | ,, | २ |
| २६३ | शीलप्रशंसावर्णनम् | ,, | ,, | २८० | प्राणायाममाहात्म्यवर्णनम् | ,, | ,, |
| २६४ | दम (जितेन्द्रियत्व) प्रशंसनम् | ,, | ,, | २८१ | प्रत्याहारवर्णनम् | ,, | ,, |
| २६५ | सत्यप्रशंसावर्णनम् | ,, | २ | २८२ | धारणातिरूपणम् | ४२५ | १ |
| २६६ | तपःप्रशंसावर्णनम् | ,, | ,, | २८३ | ध्यानवर्णनम् | ,, | ,, |
| अध्यायाः | विषयाः | पत्रांकाः | पृष्ठांकाः |
|---|---|---|---|
| २८४ | समाधिनिरूपणं सफलम् | ४२६ | २ |
| २८५ | व्यवसायाववर्णनम् | ४२६ | १ |
| २८६ | संकल्पवर्णनम् | ,, | ,, |
| २८७ | होमविधिवर्णनम् | ,, | ,, |
| २८८ | देवपितृपूजाफलवर्णनम् | ,, | २ |
| २८९ | आतिथ्यपूजामहत्त्वकथनम् | ४२७ | २ |
| २९० | ब्राह्मणमहत्त्ववर्णनपुरस्सरं तच्छुश्रूषाफलम् | ४२८ | १ |
| २९१ | गोमहत्त्वप्रदर्शनपुरस्सरं तच्छुश्रूषणम् | ,, | २ |
| २९२ | दयामहत्त्ववर्णनम् | ४२९ | १ |
| २९३ | दाक्षिण्यनिरूपणम् | ,, | २ |
| २९४ | प्रियंवदप्रशंसा | ,, | ,, |
| २९५ | आलस्यदोषप्रकटनपुरस्सरं यत्नस्य कार्यसाधकतावर्णनम् | ,, | ,, |
| २९६ | उदकमहत्त्वप्रदर्शनपुरस्सरं तडागादिनिर्माणफलम् | ,, | ,, |
| २९७ | वृक्षारोपणपुण्यफलारामदिनिर्माणकर्तृणां तत्तल्लोके सुखनिवास-निरूपणम् | ४३० | १ |
| २९८ | प्रपानिर्माणतज्जलाभ्यां पथिकतृषितजनितानि प्रपाकर्तृपञ्चारकयोः फलानि | ४३१ | १ |
| २९९ | तामसादिविभेदेन पुण्यफलोपदेशः, शुक्लकृष्णशबलव्याप्तिभेदेन धर्मादि-चाराश्च | ४३१ | २ |
| ३०० | दानकालसम्पद्दानफलादिकथनम् | ४३२ | १ |
| ३०१ | प्रतिग्राह्यपदार्थमितमहत्त्वमयतद्देवतादिवर्णनम् | ,, | ,, |
| ३०२ | अभयप्रदानप्रशंसावर्णनम् | ,, | २ |
| ३०३ | वेदापवेदाङ्गधर्मशास्त्रार्थव्याख्यानस्य दुस्सङ्गिनिवारणस्य च फलम् | ४३४ | १ |
| ३०४ | कन्यादानफलम् | ,, | २ |
| ३०५ | आरामजलाशयदेवताया विधिविशिष्टोप्रकारकर्मोविविधान्नमलाक्तसु-वस्त्र दाने फलानि | ४३५ | १ |
| ३०६ | गोप्रदानशक्तपरमाह्लादिकफलानिरूपणम् | ,, | २ |
| ३०७ | घृतधेनुकल्पवर्णनम् | ४३७ | १ |
| ३०८ | तिलधेनुविविधदानवर्णनम् | ,, | २ |
| ३०९ | जलधेनुविविधदानवर्णनम् | ४३८ | १ |
| ३१० | सुवर्णतिलादिविधाननिरूपणम् | ,, | ,, |
| ३११ | आसनशय्यावितानच्छत्रोपानत्तथादिदानफलवर्णनम् | ,, | २ |
| ३१२ | नृवाहशिविकादासदास्यादिदानमाहात्म्यम् | ४३९ | १ |
| ३१३ | रूपलावण्यधनसौभाग्यादिमदशमकापरसेविकादिदानवर्णनम् | ,, | २ |
वि० ध० | अनु०
[भाग १]
| अध्यायाः | विषयाः | पत्राङ्काः | पृष्ठाङ्काः |
|---|---|---|---|
| ३१४ | सूर्य्याश्वदर्शकलैकादिमापकरफंशालियुगपञ्चकलामादिधान्यदानवर्णनम् .... | ४४० | १ |
| ३१५ | प्राणानामन्नमयत्वात्सर्वेषामपि जीवाना मन्नाधिकारित्वदाविर्विशेषेणान्नदानस्य माहात्म्यं तत्रापि भोजने ब्राह्मणानांगुणबाहुल्यम् .... | ” | ” |
| ३१६ | पात्रविशेषेण दानविशेषफलवर्णनम् .... | ” | २ |
| ३१७ | कालविशेषे दानविशेषफलवर्णनम् .... | ४४१ | १ |
| ३१८ | तद्दानफलं नक्षत्रव्रतवर्णनम् .... | ४४२ | १ |
| ३१९ | चैत्रादिपूर्णिमासु द्वादशीषु च व्रतोपवासदानादिफलवर्णनम् .... | ” | २ |
| ३२० | चैत्रपञ्चदश्यामुपवासादिचित्रवस्त्रादिपुरस्सरं नक्तैकभक्तादिनियमपालनपूर्वकं मासव्रतविधानम् .... | ४४३ | २ |
| ३२१ | गृहीतविष्णुपञ्जरश्रवणादिना यमकुवेरादित्याद्यष्टकेषु प्रतिद्यत्सुखादिप्राप्तितत्तल्लोकान्त्यानुभावविवर्णनम् .... | ४४४ | २ |
| ३२२ | पातिव्रत्यादिकर्म्मयनिरूपणम् .... | ४४५ | १ |
| ३२३ | वर्णानां स्वेस्वे धर्मे स्थापनान्निरोग्यधर्मनिरूपणम् .... | ” | २ |
| ३२४ | कुलश्रवणाद्याधिकृतगणानिर्याणपुरस्सरं वृद्धब्राह्मणैः सह गतो व्यवहारदर्शनवर्णनम् .... | ४४६ | २ |
| ३२५ | विशुद्धागमपूर्वकस्य भूम्यादिभागस्य प्रामाण्यवचनम् .... | ४४७ | १ |
[भाग २]
| अध्यायाः | विषयाः | पत्राङ्काः | पृष्ठाङ्काः |
|---|---|---|---|
| ३२६ | व्यवहारेषु पौरुषद्दिव्ययोर्निर्णयोधौर्लिखितसाक्षिभेदेन द्विविधपौरुषेऽपि राजसाक्षिकससाक्षिकस्वहस्तलिखितभेदेर्कोविध्यं तत्र स्थावराणां लेख्येनैव सिद्धिरलेख्यस्य सोपध्ये दिव्यधैर्व्यव्यवस्था .... | ” | ” |
| ३२७ | कृताकृतभेदेन साक्षिणामेकादशविधता, पूर्वपक्षीणां साक्षिषु पूर्वं प्रक्षा, साक्षिभेदवृत्तसाक्षिणोनिर्णयः, नृपतिशिल्पिश्रोत्रियादीनां साक्ष्यनिषेधः, आसानां सर्वेषांच साक्षित्वम् देवद्विजातिसन्निधावुदङ्मुखेन पूर्व्वाहे सशौचं साक्षिग्रहणम्, साक्ष्यारम्भे ब्राह्मणादीनां सत्यादिना शपनम् .... | ४४८ | १ |
| ३२८ | कोशाद्यादिभेदेन दिव्यानामष्टविधता, तत्र कोशस्याशिरस्कता, विप्रवर्ज्यं वर्णानां कोशादानम्, देशकालाबधुभयं दिव्यदानम्, गजाश्वदेशकाण्टककानां निस्सारणं कर्त्तव्यम्, दिव्याहिर्डनऋनयम्, तुलायोग्यशुस्तलक्षणनिर्माणिप्रकारातद्वेक्षणशान्तिपुरस्सरं तदुपविष्टस्य शुद्धिज्ञानम्, वह्निसाध्यादिव्यद्यानां विधानप्रकारः .... | ” | ” |
| ३२९ | ब्राह्मणादिवर्णानामष्टौ विवाहाः, कन्यादायोपच्छ्लोकांगपक्कोपदण्डा, ज्ञातिबलाद्विक्रयमंत्रिणोणिग्याः कटीरमाणदण्डः, भार्याया व्यभिचारे दण्डः, एकवगाय कन्यां दत्त्वाऽन्यस्मै क्षात्रे विनवृत्तयोंशाद्दण्डो राजा देयः। ऋतौ भार्यामगच्छतो भतृर्मातातथा अगच्छन्त्या भा- |
॥११॥
॥१२॥
| अध्यायाः | विषयाः | पत्राङ्काः | पृष्ठाङ्काः | अध्यायाः | दिनयाः | पत्राङ्काः | पृष्ठाङ्काः |
|---|---|---|---|---|---|---|---|
| योग्याश्च दण्डः। ऋतुसत्या भर्त्रऽप्रतिपादिताया वर्षत्रयात्सत्यं विवाहाधिकारः।.... .... .... | ४५० | २ | ३३७ | सीमाविवादे सामन्तस्थविरागोपकृषकादिद्वारा तन्निर्णयः, सस्यक्षेत्रेषु सस्यनाशकमाहिषादीनां स्वामिषु दण्डकल्पना .... | ... | ||
| ३३० | औरसादिद्वादशविधपुत्राणां पित्ररिक्थाधिकारः, प्रतिलोमजातानां जडादीनाञ्च भरणमात्रं, पतितानामनधिकारः, क्रमागतभूम्यादौ पितापुत्रयोस्तुल्याधिकारः, पित्यूर्ध्वं विभागे मातापि समांशभागिनी, ब्राह्मणादीनां क्षत्रियादिपुत्राणामंशविभागः, अपुत्रधनभाजां निर्देशः, स्त्रीधनन्तदधिकारिनिरूपणञ्च .... .... | ४५१ | १ | ३३८ | धर्माद्यर्थकमूलं हि धनं नृणां बहिश्चराः प्राणास्तद्धर्तॄन्प्रजा वातयेत, ब्राह्मणांस्तु स्वराष्ट्राद्दिवासयेत्, महापातकात्साहसिकादीनामवश्यं दण्डयत् .... .... ... | ... | ,, |
| ३३१ | ऋणादानप्रसङ्गे चोत्तमर्णोधमर्णान्न धनं संवृद्ध्यावृद्धिं वा यथानियमं देयं, देवराजदोषादहृते चाधिभोक्ता सवृद्धिकरादिदेयः, एकस्याविभक्तस्मै दातुः प्राणदण्डः, पश्चाद्विचैत्तनां वा नष्टेऽपि धतिनोऽक्षतिः, द्विरूप्यपक्षादिषु वृद्धिनियमः, त्रिपुरुषपर्यन्तमृणदानम्, प्रातिभाव्ये ऋणदानव्यवस्था, अशक्तौ कर्मकरणम्, .... | ४५२ | १ | ३३९ | आत्मनो वलीपलितमपश्यस्य चापत्यं वीक्ष्य गृहं वानप्रस्थमाश्रयेत, तत्र च सभायां निर्लोभो वः नियम्रनीतुपाचन्वयेन च कन्दमूलादिना वर्त्तन्देवपित्रातिथीनभ्यज्ययथावलम्पञ्चाश्रितपक्षशणादिनाकालं नयेत्प्रमाशाद्दष्टा प्रासानानायोषावलाभेन विशेद्धिहाभे च न हृष्येद्दिस्वादिवानामश्यमंयोग दुग्कन्तपः कुर्यात् .... | ... | ४६० २ |
| ३३२ | निक्षेपरक्षावर्णनेन याचित्तान्वाहितादीनामपि गतार्थता ... | ४५३ | १ | ३४० | आयुषश्चतुर्थस्त्ये भागे यातिधममाश्रयेत. तत्र चेद्विप्रगुरूसरप्रशोगात्मनि समारोप्य ब्रह्मास्रमो भवेत् । ग्सारस्वादल्पमटो न स्यात. कर्मवाङ्मनोदण्डवान्भवेत्, 'दृष्टिपूतं न्यस्तपादं वस्त्रपूतं जलं पिवेत, सत्य पूतां वदेद्वाणीं मनः पूतसमाचरेत !, शङ्गाभिन्नादिषु समानभावं कुर्यात् .... .... ... | ... | ,, ,, |
| ३३३ | सम्भूयसमुत्थाने क्षयव्ययवृद्ध्यनुसारमंशकल्पना ... | ,, | ,, | ||||
| ३३४ | कायदेशकर्मार्थाधिककर्मकरादिदत्तनादिनियमः ... | ,, | ,, | ||||
| ३३५ | क्रयविक्रयनियमनिर्णयः ... ... | ४५५ | १ | ३४१ | विष्णुमाश्रित्य कृतानां धर्माणां फलवत्त्वम्, तत्स्मरणकीर्तनादिभिस्तिर्योन्गम्य सवार्थलाभकत्वम्, दुर्वालबत्रिमाय तद्दत्तपरमाणुसंख्या- | ||
| ३३६ | पाषण्डनैगमादिविभागवर्णनम् ... ... | ,, | ,, |
| वि० धं० | अनु० | |||||||
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| ॥२०॥ | ॥२०॥ |
| अध्यायाः | विषयाः | पत्राङ्काः | पृष्ठाङ्काः | अध्यायाः | विषयाः | पत्राङ्काः | पृष्ठाङ्काः |
|---|---|---|---|---|---|---|---|
| वृक्षस्वरूपान्नं स्वर्गलोके पूज्यते देवालयेकृत । काष्ठामललोहताम्र-रौप्यरलनिर्मितप्रसादे विष्णुप्रतिमापूजनेऽनन्तपुण्यम् । देवप्रासादे सुधासंस्कार-चित्रकरण-गीतवाद्यनृत्यकरण-प्रक्षीणमद्यदानाभ्यर्थनामृक्षण-सम्मार्जनानुलेपन-पुष्पोपचय-जीर्णोद्धार-कीर्त्तन-सहस्रनामोच्चारणपूर्वकस्तवन-चतुर्वेदैस्तत्प्रकारामिभ्रुस्तवन-भक्तिभावूर्ध्वस्वरचित्तस्तवतवन-तन्माहात्म्यप्रतिपादकपुस्तकविवरण-तद्देहीभ्यस्तन्माहात्म्याश्रवण-तदालये शंखघण्टाकिंकिणीपताकादिप्रदान-विचित्रपुष्पसमलंकृतवाटिकानुकारिण्यादिनिर्माणरसङ्ख्यापुण्यफलभाक्त्वम् । एवंविधमहापूजया सकामस्यान्तकालपरिमितसुखभोगाभावापि न तादृग्भावतोपो यादृङ् निष्कामस्येति ... | ४५६ | १ | सुखस्यापात् । स्वामरात्भयदर्शानि हगे रुष्टेऽधोलितं च गरुत्मति हरिणाङ्गिके तत्पृष्ठेऽध्यापयतःद्वारक्रान्तस्य तादृशस्य पक्षशान्तं बलहानिश्च समजर्नि, हरिश्चार्यमेव महिमा कोऽहं वराक इति गतगर्वाय खगेश्वराय भगवता प्रसादपुरस्सरमपमितबलप्रदायि... | ” | २ | ||
| ३४४ | कश्यपकृतविष्णुस्तवः | ४६४ | १ | ||||
| ३४५ | भूविवरस्थराज्ञो ( उपरिचरवसोः ) रक्षणवर्णनम् | ” | २ | ||||
| ३४६ | वैष्णव्यपराजिताविद्यावर्णनपुरस्सरं वसुकृतगरुडस्तोत्रम् | ४६५ | १ | ||||
| ३४७ | वसुकृतं वासुदेवस्तोत्रम् | ४६६ | २ | ||||
| ३४८ | विष्णुना वसवे सत्यपालनपुरस्सरं ब्राह्मणापमानवर्जनेोपदेशकथनम् | ” | ” | ||||
| ३४९ | विश्वरूपदर्शनार्थं नारदस्य श्वेतद्वीपगमनम् | ४६७ | १ | ||||
| ३४२ | श्रीविष्णुतत्त्वान्ते मुनिदृष्टहंस ( विष्णु ) विश्वरूपदर्शनम् | ४६३ | २ | ३५० | विश्वरूपदिदृक्षया श्वेतद्वीपं नारदकृतं स्तोत्रम् | ४६८ | १ |
| ॥ इति हंसगीता ॥ | ३५१ | श्वेतद्वीपे नारदस्य विश्वरूपदर्शनं तत्रत्यमहान्तर्यामीपीडिताप्तिश्च.... | ” | २ | |||
| ३४३ | गुणकथासात्स्यशक्त्या वरमार्थणाय नारदसहायं मातली निर्गते मुहुर्वाक्यं तावपश्यताम्, तत्रैव शक्रदर्शनानन्तरं तौ तांस्तान्स्वसाम्यमयाचताम्. अमिति शक्रोक्तावपि विष्णुमर्चय्य मातलिर्वेततयाऽभयं | ३५२ | सरःसन्निहिताश्वत्थविधन्धन्यान्मस्वा हृदये प्रदर्य हसन्तमष्टमण्डलं निम्माय मध्योऽष्टपत्रपद्मं लिखेत. तत्कर्णिकामध्ये श्वेतकानपत्रकर्णिकापद्मकमण्डलं, तदुपरि चन्द्रमण्डलं. तदुपरिभीमण्डलं पद्मपुष्पमण्डलंगं विष्ण्यमंतृ. कमलपुर्वोद्दिष्टश्वश्वकारिषु वासुदेवसंकर्षणादीन्न्यनेन. प्रपूर्वोद्दिष्टेषु वेनतयादींश्च न्यनिस्या बाह्यमूर्ध्वा पद्मावादींश्चमोंकारा- |
| संख्याः | विषयाः | पत्राङ्काः | पृष्ठाङ्काः | संख्याः | विषयाः | पत्राङ्काः | पृष्ठाङ्काः |
|---|---|---|---|---|---|---|---|
| कारादिक्रान्तिक्षामिनष्टेति वरुणकुवेरनेत्राभ्यां न्यसेत, यथाक्तारूपं ध्यायेत् । "ॐनमो भगवते वासुदेवायत्यनेन" ॐनमो नागयणेत्यनेन वा संविधि पूजयंत .... .... | ४६१ | २ | ३०७ | नागमंत्रानपुरस्सरं नारगादिविषूचपमानशान्तये क्कते निदेशः .... | १७० | १ | |
| ३०८ | लिङ्गमोटननृसिंहवर्णनम् .... .... .... | २ | |||||
| ३५५ | श्रीमन्नृसिंहस्तोत्रवर्णनम् .... .... | १७१ | १ |
॥ इत्यनुक्रमणिका समाप्ता ॥
केके ह्यपूर्वविषयाः प्रतिपादिता न धर्मांतरेऽत्र महितै किल विष्णुपूर्व्वे ॥
तस्यातिसूक्ष्मविषयप्रतिपादकंच वोऽनुक्रमोऽकृत मया तनुबुद्धिभाजा ॥ १ ॥
सर्व्वांतरस्थितमहामहिमप्रतीतः सर्व्वेश्वरः सकलवाञ्छितसिद्धिदाता ॥
लक्ष्मीसहाय उरुगाययशाः प्रसीदेदित्यं प्रयाचति हृदा हरिदत्तशर्म्मा ॥ २ ॥
॥ इति श्रीविष्णुधर्मोत्तरमहापुराणविषयानुक्रमणिका समाप्ता ॥
॥ अथ श्रीविष्णुधर्मोत्तरप्रारम्भः ॥
The provided image is completely blank and contains no text to transcribe.
श्रीगणेशाय नमः ॥ ॐ श्रीनारायणाय नमः ॥ अथ श्रीविष्णुधर्मोत्तरप्रारम्भः ॥ नारायणं नमस्कृत्य नरं चैव नरोत्तमम् ॥ देवीं सरस्वतीं व्यासं ततो जयमुदीरयेत् ॥ १ ॥ कृतवर्मा तथा भोजः श्वेतो माहिष्मतीपतिः ॥ कुलिन्दः सर्वदमनो मालवेन्द्रस्त्वधूर्द्धनः ॥ २ ॥ वत्सनामश्च बाणश्च नन्दीशो दरसत्पतिः ॥ प्रतिसारश्वित्रधनुस्सवौं वायुरथस्तथा ॥ ३ ॥ द्रविडः कुसुमापीड ओड्रश्च समरप्रियः ॥ शम्भुः किरातराजश्च ओरसो नन्दिवर्द्धनः ॥ ४ ॥ वटुमुलश्च तूनेशः शाल्वश्च जनमेजयः ॥ सुभ्राजो दीर्घकर्णो बाह्रीको दमनस्तथा ॥ ५ ॥ हिरण्यनामः कौसल्यो दशार्हो विजयस्तथा ॥ एते चान्ये च राजानः शतशो बहुदक्षिणाः ॥ ६ ॥ सम्पूर्र्णचन्द्रवदना गजराजकरोरवः ॥ उपासांचक्रिरे वज्रं सिंहासनगता नृपाः ॥ ७ ॥ बहुभिर्भूमिपालैश्च तथा वज्रेण धीमतां ॥ युधिष्ठिरण च सदा शोभिता शुशुभे सभा ॥ ८ ॥ राजानस्ते ततो दृष्ट्वा ऋषीन्दुंल्लभदर्शनान्॥ ब्रह्मलोकस्थमात्मानममन्यन्त यशोभृतः ॥ ९ ॥ ऊचुस्ते प्रणयाद्वाक्यं वज्रं भूरिसहस्रदम् ॥ यथा त्रेतायुगे राजन् द्वापरे च यथा नृपाः ॥ १० ॥ ब्राह्मणा ब्रह्मकल्पाश्च तथैव सुसमागताः ॥ १० ॥ अस्मिंस्तिष्ये च संप्रति तव राजन् प्रसादतः ॥ राजन् कृष्णसगोत्रोऽसि तेनेयन्ते सभा नृप ! ॥ ११ ॥ उपास्यते महाभागैर्ब्रह्मकल्पैस्तपोधनैः ॥......................न तथा वीर्यनिर्जिता ॥ १२॥ भक्त्या यथा तु तत्त्वेन कृष्णस्यामिततेजसः ॥ तेन कृष्णेन ये चक्रुर्व्यतीताः पूर्वपार्थिवाः ॥ १३ ॥ वर्त्तता तेन कृष्णेन ते राजन् मोक्षमाप्नुयुः ॥ अथ तिष्ययुगः प्राप्तो घोरः परमदारुणः ॥ १४॥ दुर्लभं दर्शनं यत्र नृपसवै महात्मनाम् ॥ १५ ॥ तत्सारवं राजशार्दूल प्रष्टुमहौ द्विजोत्तमान् ॥ वैष्णवान्विविधान्धर्मान्सरहस्यान्ससंग्रहान् ॥ १६॥ इत्येवमुक्तो वज्रस्तैस्त्यक्त्वा सिंहासनं तदा ॥ वज्र तु प्राञ्जलिं दृष्ट्वा सर्व एव नराधिपाः ॥ १७ ॥ वरासनान्युत्थायोशु तस्थुः प्राञ्जलयस्तदा ॥ वज्र उवाच ॥ भवद्भिर्नृपशार्दूलाः प्रार्थिता ये द्विजाः स्थिताः ॥ १८ ॥ अनुग्रहार्थं भूपानां जगतो हितकाम्यया ॥ भवन्तो वक्तुमर्हन्ति विष्णुधर्मान्सना तनान् ॥ १९ ॥ तस्मात्तिष्ययुगे नास्ति भवतो दर्शनं नृपैः ॥ ऋषय ऊचुः ॥ उत्तिष्ठ त्वं महीपाल अलङ्कुरु स्वमांसनम् ॥ २० ॥ श्रवणेपि वयं तस्य विशेषेणार्थिता नृप ॥ वज्र ते संशयान्सर्व्वाञ्छेत्स्यत्येष महामुनिः ॥ २१ ॥ इत्येवमुक्ता वज्रं ते ऋषयस्तपसि स्थिताः ॥ मार्कण्डेयमथोचुस्ते ब्रूहि धर्मान्महीपते ॥ २२ ॥ वैष्णवान्विविधान्धर्मान्मोक्षोकानांमघहारिणः ॥ तथा पार्थिवसंशस्य संशयान् मनसि स्थितान् ॥ २३ ॥ मार्कण्डेय उवाच ॥ ब्रह्मण्यः सत्यवान् धन्यः सर्वयज्ञनिबर्हणः ॥ यद्गत्पृच्छसि मां वज्र तत्तद्वक्ष्याम्यसंशयम् ॥ २४ ॥ सिंहासनस्थो भव भूमिपाल
१ ‘वरगो वत्सनामश्च’ इति बहुपुस्तके। २ ‘बालक्ष’ इति क०। ३—‘मूब्जा’ इति ख०। ४ ‘ऋषिंस्तेव महोद्धतान्’ इति ख०। ५ ‘तदासनम्’ इति ख०।
वि० ध० ॥ २ ॥ प्र० खं० अ० २
भवन्तु सर्वेऽपि तथा महीपाः ॥ सुखोपविष्टोऽसि महीपालैः स्वसंशयान् ब्रूहि यथाप्रकामम् ॥ २५ ॥ इत्येवमुक्तः स यदुप्रधाने भृगुप्रवरेण महर्षिमुख्ये ॥ प्रणम्य विप्रांस्तु जगाम राजा सिंहासनं रत्नसहस्रचित्रम् ॥ २६ ॥ सिंहासनस्थे नृपवर्यमुख्ये सिंहासनस्थाः क्षितिपा प्रधानाः ॥ सर्वे बभूवुः प्रणतास्तथा च शुश्रूषवो ब्राह्मणमुख्यवाक्यम् ॥ २७ ॥ वज्र उवाच ॥ आचक्ष्व मह्यं भृगुवंशचन्द्र समुद्भवं त्वं जगतो यथावत् ॥ शृण्वंति मे ब्राह्मणसंघमुख्या नरेंद्रमुख्याश्च वचस्त्वदीयम् ॥ २८ ॥ इति श्रीविष्णुधर्मोत्तरे प्रथमखण्डे मार्कण्डेयवज्रसंवादे कथाप्रस्तावने नाम प्रथमोऽध्यायः ॥ १ ॥
॥ मार्कण्डेय उवाच ॥
॥ नारायणं नमस्कृत्य सर्वभूतपरायणम् ॥ लक्ष्मीसहायं वरदं शेषपर्यङ्कशायिनम् ॥ १ ॥ जगतोऽस्य समुत्पत्तिस्थितिनाशनैककारणम् ॥ ज्ञानज्ञेयं ज्ञानगम्यं हृदि सर्वस्य संस्थितम् ॥ २ ॥ वक्ष्यामि जगतां राजन् समुत्पत्तिं निबोध ताम् ॥ सर्वपापप्रशमनीमायुष्यां स्वर्गदां शिवाम् ॥ ३ ॥ नारायणोऽस्य जगतः सृष्टिंसंहारपालनम् ॥ करोति जगतांपाल यस्य सर्वमिदं महत् ॥ ४ ॥ वेदेषु गीयते योऽसौ पुरुषः पञ्चविंशकः ॥ अनादिनिधनो धाता त्वनन्तः पुरुषोत्तमः ॥ ५ ॥ यस्योन्मेषस्तु दिवसो ब्रह्मणः परमेष्ठिनः ॥ निमेषस्तु तथा रात्रिरितस्य कल्पं प्रकीर्तितम् ॥ ६ ॥ पुरुषत्वे त्वनन्तस्य न रूपं नृप विद्यते ॥ न च शब्दो न च घ्राणः स्पर्शो वा पृथिवीपते ॥ ७ ॥ न तस्य परिमाणं वा नचादिर्निधनं कुतः ॥ सर्वतः पाणिपादान्तः सर्वतोऽक्षिशिरोमुखः ॥ ८ ॥ सर्वतः श्रुतिमाँल्लोके सर्वमावृत्य तिष्ठति ॥ सर्वेन्द्रियगुणाभासं सर्वेन्द्रियविवर्जितम् ॥ ९ ॥ असक्तं सर्वभृच्चैव निर्गुणं गुणभोक्तृ च ॥ तं च प्राप्य भवन्तीह युक्ताः पुरुषोत्तमाः ॥ १० ॥ सुरातिर्यङ्नृसिद्धानां तत्सात्म्यस्य सम्भवः ॥ तस्माद्भवति चाव्यक्तस्तस्मादात्मापि जायते ॥ ११ ॥ तस्माद्बुद्धिर्मनस्तस्मात्ततः खं पवनस्ततः ॥ तस्मात्तेजस्ततश्चापस्तेभ्योऽण्डमभवत्किल ॥ १२ ॥ अण्डो हिरण्मयो राजंस्तस्यान्तः स्वयमेव हि ॥ अङ्गग्रहणं पूर्वं सृष्ट्यर्थं कुरुते प्रभुः ॥ १३ ॥ ब्रह्मा चतुर्मुखो देवो रजोमात्राधिकः सदा ॥ शरीरग्रहणं कृत्वा सृजतीदं चराचरम् ॥ १४ ॥ अण्डस्यान्तर्जगत्सर्वं सदेवासुरमानुषम् ॥ सप्तलोकान् सप्तपातालान् सप्तद्वीपार्णवां महीम् ॥ १५ ॥ सृष्टिं कृत्वा स भगवान् सात्त्विकीमाश्रितस्तनुम् ॥ अङ्गेऽङ्गे कृशता भूत्वा शेषभोगमयः प्रभुः ॥ १६ ॥ लक्ष्मीसहायो लोकांस्तु सदा पालयते सदा ॥ योगनिद्रां समास्थाय सर्वमन्वन्तराणि सः ॥ १७ ॥ शुभाशुभानि कर्माणि सर्वेषां स हि पश्यति ॥ अन्तकाले हरो भूत्वा जगत्संहरते पुनः ॥ १८ ॥ तामसीं तनुमास्थाय लीलयैव महायशाः ॥ रात्रिकाले तु जलमध्यगतां महीम् ॥ १९ ॥ दृष्ट्वोद्धरति यज्ञात्मा वाराहीमाश्रितां तनुम् ॥ ब्राह्मस्य मानं परिपाल्यं च विष्णोर्महात्मनो भवतीह नित्यम् ॥
॥ २ ॥
१ 'यतः' इति क० ख० ।
संहारकाले च हरत्येति त्रैधं विभ्रते स त्रिकालयोगात् ॥ २० ॥ ॥ इति श्रीविष्णुधर्मोत्तरे प्रथमखण्डे मार्कण्डेयवज्रसंवादे हिरण्यगर्भोत्पत्ति कथनो नाम द्वितीयोऽध्यायः ॥ २ ॥ मार्कण्डेय उवाच ॥ ब्रह्मरात्र्यां व्यतीतायां विबुद्धे पद्मसंभवे ॥ विष्णुः सिसृक्षुर्भूतानां ज्ञात्वा भूमिं जला- न्तगाम् ॥ १ ॥ जलक्रीडारुचिं शुभं कल्पादिषु यथा पुरा ॥ वाराहमस्थतो रूपमुज्जहार वसुन्धराम् ॥ २ ॥ वेदपाद्यूपदंष्ट्रश्च चतुर्वक्त्रश्चतुर्मुखः ॥ अग्निजिह्वो दर्भरोमा ब्रह्मशीर्षो महातपाः ॥ ३ ॥ अहोरात्रेक्षणो दिव्यो वेदाङ्गः श्रुतिभूषणः ॥ आज्यनासः स्रुवतुण्डः सामघोषस्वनो महान् ॥ ॥ ४॥ धर्मः सत्यमहाः श्रीमान्कर्मविक्रमसत्कृतः ॥ प्रायश्चित्तमयो धीरः प्रांशुजानुर्महाशयः ॥ उद्गात्रंत्रो होमलिङ्गः फलबीजमहौषधिः ॥ ५ ॥ वाय्वन्तरात्मा मन्त्रास्थिर्विकृतः सोमशोणितः ॥ वेदस्कन्धो हविर्गन्धो हव्यकव्यातिवेगवान् ॥ ६ ॥ प्राग्वंशकायो द्युतिमानानादीक्षाभिरन्वितः ॥ दक्षिणाहृदयो योगी महाक्रतुमयो महान् ॥ ७ ॥ उपाकर्मरुचिरः प्रवर्ग्यावर्त्तभूषणः॥ नानापत्निसहायो वै महाशृङ्ग इवोदितम् ॥८॥ महीं सागर- पर्यन्तां सशैलवनकाननाम् ॥ एकाणर्वजलभ्रष्टामेकापर्णकवार्णवतः प्रभुः ॥ ९ ॥ दंष्ट्राग्रेण समुद्धृत्य लोकानां हितकाम्यया ॥ आदिदेवो महायोगी चकार जगतीं पुनः ॥ १० ॥ एवं ज्ञात्वा वराहेण भूत्वा भूतहितार्थिना ॥ उद्धृता पृथिवी देवी जलमध्यगता पुरा ॥ ११ ॥ उद्धृत्य भूमिं सविभुर्म- हात्मा वाराहरूपेण जलान्तरस्थाम् ॥ चक्रे विभागं जगतस्तदानीं यथातथा तच्छृणु राजनृसिंह ॥ १२ ॥ इति श्रीविष्णुधर्मोत्तरे प्रथमखण्डे मार्कण्डेयवज्रसंवादे वराहप्रादुर्भावो नाम तृतीयोऽध्यायः ॥ ३ ॥ मार्कण्डेय उवाच ॥ जालान्तरगते भानौ यत्सूक्ष्मं दृश्यते रजः ॥ प्रथमं तत्प्र- माणानां त्रसरेणुं प्रचक्षते ॥ १ ॥ त्रसरेणवोऽष्टौ विज्ञेया लिक्षैका परिमाणतः ॥ ता राजसर्षपास्तिस्रस्तावत्यो गौरसर्षपाः ॥ २ ॥ सर्षपाः पञ्च वो मध्ये अङ्गुलं च तदष्टकम् ॥ द्वादशाङ्गुलिकः शङ्कुस्तद्वयं हस्त उच्यते ॥३॥ तच्चतुष्कं धनुः प्रोक्तं क्रोशो धनुःसहस्रिका ॥ क्रोशद्वयं च गव्युतिः योजनं तच्चतुष्टयम् ॥ ४ ॥ योजनानां प्रमाणेन वायुतानां शतत्रयम् ॥ अयुतानां च पञ्चाशच्छ्रेष्ठस्थानं मनोहरम् ॥ ५ ॥ स एव लोके वाराहः कथितश्च स्वयं प्रभुः ॥ वाराहरूपी भगवाञ्छत्रहस्त्यधरस्तथा ॥६॥ तत्रास्ते भगवान्विष्णुर्ऋषिभिः सह महात्मभिः ॥ लोकोऽयमुण्डसंलग्नश्छत्राकारः प्रकीर्तितः ॥ ७ ॥ स्वयं प्रसुर्विताजाः सर्वदुःखविवर्जितः ॥ एकान्तभावोपगतास्तं प्रयान्ति हरिं जनाः ॥ ८ ॥ सर्वावस्थादयं लोकः कथितस्ते मनोहरः ॥ तत्योपरिष्टादपरस्तावदेव प्रभाणतः ॥ ९ ॥ कालानिश्रृङ्गोलोकस्तु कथ्यतेऽग्निसमन्वितः ॥ एक एव स तत्रास्ते स्वप्रभाभास्वरा
१ 'पङ्गुजानुः' इति ख० । २ 'प्राग्वंशवर्त्ती' इति ख० । ३ 'तद्देशो' इति ख० ।
वि० ध० प्र० खं० अ० ४
त्मकः ॥ १० ॥ तस्मात्समुत्थितो वह्निर्जगत्प्राप्ते दिनक्षये ॥ भस्मसात्कुरुते सर्वं यच्चाङ्गं यच्च नेङ्गते ॥ ११ ॥ तस्योपरिधदधस्ताद्वैव प्रमाणतः ॥ पातालनामा पातालः प्रथमः परिकीर्तितः ॥ १२ ॥ योगमायां समास्थाय द्वितीयामास्थितस्तलम् ॥ सर्वतो भगवानास्ते शेषमूर्तिर्जनार्दनः ॥ ॥ १३ ॥ रुक्मभौमः स पातालो धृतो रुद्रस्य तेजसा ॥ तस्मिन्त्स भगवानास्ते शेषपर्यङ्कमाश्रितः ॥ १४ ॥ नित्यं तालध्वजो वाग्मी वनमालाविभू- षितः ॥ धारयञ्छिरसा नित्यं रत्नांश्चित्रां फणावलीम् ॥ १५ ॥ लाङ्गली मुसली खङ्गी नीलाम्बरविभूषितः ॥ स्तूयमानः स गन्धर्वैर्नागैश्चापि वरेस्तथा ॥ १६ ॥ तातस्योपरिधदधस्ताद्वैव प्रमाणतः ॥ सुतलसंज्ञः पातालः शिलाभासः समन्ततः ॥ १७ ॥ बलिरुतु भगवांस्तत्र बहिस्तिष्ठति संयतः ॥ रम्यं पुरवरं तस्य विष्णुना निर्मितं स्वयम् ॥ १८ ॥ निवासं देवराजस्य विशिष्टं तत्पुरोत्तमम् ॥ सा वैष्णवी कला प्रोक्ता ययेदं धार्यते जगत् ॥ १९ ॥ (फणेषु तस्य विश्रान्ता मिलिता च शुभाशुभा ॥ तत्रास्ते स महाभागः श्रिया परमया युतः॥२०॥ तमुपासन्ति सततं गन्धर्वाप्सरसां गणाः ॥) तत्रास्ते देवदेवस्य मूर्तिः कृष्णस्य चापरा ॥ २१ ॥ तस्योपरिधदधस्ताद्वैव प्रमाणतः ॥ आभासतल इत्येव पातालो नीलवृत्तिकः ॥ २२ ॥ तृतीयः स तु विख्यातः सुरम्यैश्च तिष्ठति ॥ द्विपञ्चवत्तथा तत्र चतस्रश्च तथा स्थिताः ॥ २३ ॥ सुभद्रा बहिरूपा च विश्वरूपा तथैव च ॥ रोहिणी च महाभागा याभिर्धृतमिदं जगत् ॥ २४ ॥ तासां क्षीरेण सर्वासां कृतः क्षीरार्णवः प्रभो ॥ पातालमध्ये तस्मिंस्तु पुरं विष्णोर्मनोहरम् ॥ ॥ २५ ॥ यत्रास्ते भगवान्विष्णुः शेषपर्यङ्कगास्तथा ॥ अग्निज्वालापरिक्षिप्तः सह लक्ष्म्या परन्तप ॥ २६ ॥ तस्योपरिधदधस्ताद्वैव प्रमाणतः ॥ पीतभौमश्चतुर्थस्तु गभस्तिमत्तलसंज्ञितः ॥ २७ ॥ तत्रास्ते भगवान्विष्णुर्देवो हयशिरोधरः ॥ शशांकशतसंकाशः शातकौंभविभूषणः ॥ २८ ॥ पुरं तत्रैव विख्यातं गरुडस्य महात्मनः ॥ (प्रह्लादस्यासुरेन्द्रस्य वाष्फलेश्च महात्मनः) ॥ २९ ॥ तस्योपरिधदधस्ताद्वैव प्रमाणतः ॥ महा- तलेति विख्यातो रक्तभौमस्तु पञ्चमः ॥ ३० ॥ सरोवरं तस्य मध्ये योजनानां दशाश्रुतम् ॥ जंगमाजंगमैः सर्वैर्जलजैश्च विवर्जितम् ॥ ३१ ॥ तत्राङ्गेण वसति कूर्मरूपधरो हरिः ॥ तस्योपरिधदधस्ताद्वैव प्रमाणतः ॥ ३२ ॥ षष्ठश्चैव महाराज नाम्ना भीमबलस्तु सः ॥ तत्रापि सरसी दिव्या योजनानां शतं गता ॥ तस्यां च वसते देवो मत्स्यरूपधरो हरिः ॥ ३३ ॥ सप्तमः कृष्णभौमस्तु नाम्ना भीमबलस्तु सः ॥ तत्रास्ते कपिलो देवो वासुदेवः स्वयं प्रभुः ॥ ३४ ॥ तत्राश्मनगरं नाम वरुणस्य पुरं स्मृतम् ॥ तथा दानववीराणां नगराणि पृथक्पृथक् ॥३५ ॥
॥ ३ ॥
१ कोष्ठकान्तर्गतः पाठः ख पुस्तके नास्ति । २ कोष्ठान्तर्गतः पाठो नास्ति ख पुस्तके । ३ 'महातेजेति' इति ख० । ४ 'योजनं दशसंख्यया' इति ख० ।
विरोचनस्य कुम्भस्य निकुम्भस्य हरस्य च ॥ शम्बरस्य करालस्य हयस्य च ॥ ३६ ॥ हयग्रीवस्य सुन्दस्य घस्रस्य प्रथसस्य च ॥ बलेः पुरवरं चात्र योगीशस्त्य तथापरम् ॥ ३७॥ यत्रस्थमेनं दृष्ट्वानं रावणो लोकरावणः ॥ तथा पुरवरं तत्र विष्णोरमिततेजसः ॥३८॥ लक्ष्मीसहाया यत्रास्ते चांग्राम्बरसंवृतः ॥ तिस्रः कोट्यस्तु यत्रास्य भक्तानां सुमहात्मनाम् ॥ ३९ ॥ शङ्खचक्रगदापद्मधारिणां पीतवाससाम् ॥४०॥ नीलोत्पल सवर्णानां विष्णोः सदृशतेजसाम् ॥ विष्णोः सुतानां हृद्यानां सततं भूरिवर्चसाम् ॥ ४१ ॥ तत्रस्थो दृष्टवान् देवो पौलस्त्यो रावणः पुरा ॥ पुरीं भोगवतीं तत्र तथा वासुकिकालिता ॥ ४२ ॥ नागानां च पुराण्यत्र तथैव च पृथक्पृथक् ॥ पद्मस्य धृतराष्ट्रस्य विरक्तस्य कुरोस्तथा ॥ ४३ ॥ तक्षकस्यैलपत्रस्य तथा कर्कोटकस्य च ॥ धनञ्जयस्य शङ्खस्य तथैवाश्वतरस्य च ॥ ४४ ॥ कण्डलस्य मुरालस्य सुमुखस्य गयस्य च ॥ दिशां गजानां च तथा तत्र स्थानं पृथक्पृथक् ॥ ४५ ॥ येषां स्कंधगता भूमिः सशैलवनकानना ॥ विरूपाक्षस्य नागस्य महापद्मस्य चाप्यथ ॥ ४६ ॥ तथा सुमनसश्चात्र रुद्रस्य च महात्मनः ॥ पञ्चायुतपरीमाणा भूमिः सर्वेषु पार्थिव ॥ ४७ ॥ पातालेषु विनिर्दिष्टा पठितान्तरवर्तिनी ॥ अण्डस्यार्द्धमिदं प्रोक्तमधस्तात्तु प्रमाणतः ॥ ४८ ॥ तिस्रः कोट्यस्तु राजेन्द्र नियुतानि तथा दश ॥ पञ्चान्यानि महीपाल भूमि पृष्ट्या महानच ॥ ४९ ॥ पञ्चायुतपरीमाणाः पृथिव्यैः प्रकीर्तिता ॥ भूमेरथोपरिष्टाच्च अण्डस्यार्धमथापरम् ॥ एतावदेव निर्दिष्टा भूमिपाल प्रमाणतः ॥ ५० ॥ चन्द्रार्कभासा रहितं नूवारं स्वयं प्रभेदं कथितं मयैतत् ॥ पातालपूर्वं विविधं सुगम्यं शृणुष्व लोकान् गदतोममान्या न् ॥ ५१ ॥ इति श्रीविष्णुधर्मोत्तरे प्रथमखण्डे मार्कण्डेयवज्रसंवादे पातालवर्णनो नाम चतुर्थोऽध्यायः ॥ ४ ॥ ॥ मार्कण्डेय उवाच ॥ भूर्लोकः प्रथमो राजञ्शृणुष्व गदतो मम ॥ पातालेन तु तुल्यमूर्ध्वतः परिकीर्तितः ॥ १ ॥ वायुकक्षा विनिर्दिष्टास्ते तु सप्त महात्मभिः ॥ एकैकं नियुताः पंच योजनानां प्रकीर्तितम् ॥ २ ॥ पशवः पक्षिणः कीटा मनुष्याः किन्नरास्तथा ॥ यक्षराक्षसगन्धर्वाः पिशाचा भूमिगोचराः ॥३॥ सर्वे एते विनिर्दिष्टा अन्नादा भूमिगोचराः ॥ विद्याधराणां प्रथमं वायुमार्गः प्रकीर्तितः ॥ ४ ॥ द्वितीयः सिद्धविद्यानां तृतीयस्तु गरुत्मताम् ॥ चतुर्थो वायुमार्गेस्तु गन्धर्वाणां प्रकीर्तितः ॥ ५ ॥ विनायकाः पञ्चमगा षष्ठे च करिणी गणाः ॥ येषां शिकिरतोयेन चावस्थायः प्रकीर्तितः ॥ ६ ॥ सप्तमे च महाभाग सिद्धास्तिष्ठंति यादव ॥ तस्योपरिष्टादपरस्तावदेव प्रमाणतः॥७॥ भुवर्लोक इति ख्यातो यत्र तिष्ठंति देवताः ॥ मन्वन्तराधिका
१--'स्तोत्रं' इति ख० ।
वि० भू० ॥ ४ ॥ प्र० सं० अ० ५
रेषु ये भविष्या महीपते ॥ ८ ॥ तस्योपरिधिरप्यस्तावदेव प्रमाणतः ॥ स्वर्लोके वसतिस्तत्र प्रायशः पुण्यकर्मणाम् ॥ ९ ॥ सोमपानां च देवानां
शक्रादीनां महीपते ॥ महर्लोकस्थितिस्त्वियं देवतानां महात्मनाम् ॥ १० ॥ विनिवृत्ताधिकाराणां सिद्धानां नृपसत्तम ॥ तस्योपरिधिरप्यस्तावदेव
प्रमाणतः ॥ ११ ॥ जनलोकः स्थितिश्चियं गवां पार्थिवसत्तम ॥ तिष्ठन्ति ब्रह्मणो रात्र्यां यत्र जीवाः समन्ततः ॥ १२ ॥ तस्योपरिधिरप्यस्तावदेव
प्रमाणतः ॥ तपोलोकः स्थितिश्चियं प्राणेशानां महात्मनाम् ॥ १३ ॥ तस्योपरिधिरप्यस्तावदेव प्रमाणतः ॥ सत्यलोकः स्थितिरियं ब्रह्मणः
परमेष्ठिनः ॥ १४ ॥ इत्येते कथिताः सप्त तव लोका महात्मनाम् ॥ एतावानेव सवितुर्विवरन्ति मरीचयः ॥ १५ ॥ एतेषु लोकसंज्ञाक्ता
तस्मादेव मनीषिभिः ॥ तस्योपरिधिरप्यस्तावदेव प्रमाणतः ॥ १६ ॥ स्थानं रुद्रस्य कथितं रुद्रतेजोविराजितम् ॥ ब्रह्मलोकोपरिह्याशु
रुद्रलोको महत्तमः ॥ १७ ॥ योजनानां सहस्राणि पञ्चभिश्चिनिर्बिडं मतम् ॥ आदित्यमन्दिरं प्रोक्तं यदेतद्दिवि दृश्यते ॥ १८ ॥ यदेतद्दृश्यते नीलं
तमस्तत्पृथिवीपते ॥ तमसस्तु परं पारे रुद्रलोकः स्वयं प्रभो ॥ १९ ॥ रुद्रत्वं समनुप्राप्तस्तत्र भक्तैर्महानहम् ॥ क्रीडन्नास्ते महादेवः सपत्नीको
वृषध्वजः ॥ २० ॥ तस्योपरिधिरप्यस्तावदेव प्रमाणतः ॥ अगम्यस्सर्वदेवानां विष्णुलोकः प्रकीर्त्तितः ॥ २१ ॥ तस्योपरिगदाह्लाण्डः
काञ्चनो दीप्तिसंयुतः ॥ भुवर्लोके तु वसतिर्वामनस्य महात्मनः ॥ २२ ॥ स्वर्लोके वसतिर्विष्णोर्वैकुण्ठस्य महात्मनः ॥ नृवराहस्य वसतिर्मह
र्लोके प्रकीर्त्तिता ॥ २३ ॥ नृसिंहस्य तथा प्रोक्ता जनलोके महात्मनः ॥ त्रिविक्रमस्य वसतिस्तपोलोके प्रकीर्त्तिता ॥ २४ ॥ लोकाः सन्तानका
नाम सत्यलोके प्रकीर्त्तिताः ॥ एतेषु देवं पश्यन्ति देवाः सेन्द्रपुरोगमाः ॥ २५ ॥ तपसा महता राजन भक्ताश्च मततं प्रभुम् ॥ रुद्रस्थानोपारिह्याद्यु
विष्णोः स्थानं मयोदितम् ॥ २६ ॥ न कश्चिद्देवं शक्नोति द्रष्टुं देववरं हरिम् ॥ न तत्र सूर्यस्तपति चन्द्रमा न विराजते ॥ २७ ॥ तेजसा तस्य
देवस्य स तु देशो विराजते ॥ तस्योपरिह्याण्डामध्य यावदन्तं महीपते ॥ २८ ॥ प्रोक्तं वाङ्मनसान्यत्य तत्र मानं निबोध मे ॥ योजनानां च
षट्कोट्यास्त्रिंशच्च नियुतान्यथ ॥ २९ ॥ एतावच्चैवं भूतानां वसतिः परिकीर्त्तिता ॥ एतावदेव चन्द्रम्य तलमुक्तं ममंत्रतः ॥ ३० ॥ एतुषु देवं
पश्यन्ति देवाः सेन्द्रपुरोगमाः ॥ तपसा महता राजन भक्ताश्च मततं प्रभुम् ॥ ३१ ॥ बाह्येतोऽण्डं दशगुणं त्विद्भिन्नु परिवाग्निम् ॥ आपो
दशगुणेनैव बाह्यतस्तेजसा वृताः ॥ ३२ ॥ तेजोगुणेनैव वायुतः पवेनंतं च ॥ वायुर्दशगुणेनैव गगनंत तथायुतः ॥ ३३ ॥ आकाशं च दशग्रनं
१- 'एतावदेव' इति ख० ।
॥ ४ ॥