यजुर्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Yajurveda Samhita with Hindi Translation
डा. रेखा व्यास द्वारा
स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)
पूर्वार्ध चौथा अध्याय उस्रावेतं धूर्षाहौ युज्येथामनश्रू अवीरहणौ ब्रह्मचोदनौ. स्वस्ति यजमानस्य गृहान् गच्छतम्.. ( ३३) हे देवताओ! आप यजमान का कल्याण करने के लिए उन के घरों की ओर जाने की कृपा कीजिए. आप भार वहन करने में समर्थ हैं. आप वीरों को सुख देते हैं. ब्रह्मज्ञान हेतु प्रेरक हैं. आप रथ में जुड़ने की कृपा कीजिए. ( ३३ ) भद्रो मेसि प्रच्यवस्व भुवस्पते विश्वान्यभि धामानि. मा त्वा परिपरिणो विदन् मा त्वा परिपन्थिनो विदन् मा त्वा वृका अघायवो विदन्. श्येनो भूत्वा परापत यजमानस्य गृहान् गच्छ तन्नौ स ष्कृतम्.. ( ३४) हे सोम! आप मेरा कल्याण कीजिए. आप भुवनपति हैं. आप विश्व के सभी धामों की ओर तेजी से प्रयाण ( यात्रा ) करते हैं. आप चोरों के ज्ञान का विषय मत होइए. यज्ञ के विरोधी लोग आप को न जान पाएं. सब ओर भ्रमण करने वाले आप को न जान पाएं. पापी भेड़िए आप को न जान सकें. आप बाज के समान जल्दी जाइए. आप यजमान के घरों की ओर प्रस्थान कीजिए. वहां भलीभांति सज्जित यज्ञशालाओं का प्रबंध है. ( ३४ ) नमो मित्रस्य वरुणस्य चक्षसे महो देवाय तदृत ष् सपर्यत. दूरेदृशे देवजाताय केतवे दिवस्पुत्राय सूर्याय श ष् सत.. ( ३५) मित्र देवता और वरुण देवता की आंखों से देखने वाले सूर्य को नमस्कार है. सूर्य प्रकाशमान, दूर दृष्टि वाले, देवता से उत्पन्न व स्वर्गलोक के पुत्र हैं. सूर्य के लिए नमन! यजमान को सूर्य के लिए यज्ञ करना चाहिए. यजमान को सूर्य के लिए स्तोत्र का पाठ करना चाहिए. ( ३५ ) वरुणस्योत्तम्भनमसि वरुणस्य स्कम्भसर्जनी स्थो वरुणस्यऋतसदन्यसि वरुणस्यऋ- तसदनमसि वरुणस्यऋतसदनमासीद.. ( ३६) हे शमी देव ( यज्ञ में काम आने वाली लकड़ी )! आप वरुण का उत्थान करने वाले हैं. आप वरुण की गति के सर्जक ( रचनाकार ) हैं. आप उन्हें स्थिर करने वाले हैं. आप वरुण के यज्ञ का सदन, यज्ञ का बैठने का स्थान हैं. आप वरुण के यज्ञ के सदन में सुख से विराजने की कृपा कीजिए. ( ३६ ) या ते धामानि हविषा यजन्ति ता ते विश्वा परिभूरस्तु यज्ञम्. गयस्फानः प्रतरणः सुवीरो ऽ वीरहा प्र चरा सोम दुर्यान्.. ( ३७) हे सोम! जो यजमान यज्ञ में आप के धाम का भजन करते हैं. वे सभी यज्ञ स्थान आप को प्राप्त हों. आप घरों को स्फारित ( विस्तृत ) करते हैं. आप पार लगाने वाले श्रेष्ठ वीर व कायरों के विनाशक हैं. आप हमारे यज्ञों में पहुंचने की कृपा कीजिए. ( ३७ ) यजुर्वेद - ६३
पांचवां अध्याय
पांचवां अध्याय अग्नेस्तनूरसि विष्णवे त्वा सोमस्य तनूरसि विष्णवे त्वातिथेरातिथ्यमसि विष्णवे त्वा श्येनाय त्वा सोमभृते विष्णवे त्वाग्नये त्वा रायस्पोषदे विष्णवे त्वा.. (१) हे अग्नि! आप धनदाता, समृद्धि देने वाले व संसार के पालक हैं. हम विष्णु व सोम के लिए आप को ग्रहण करते हैं. हे सोम! आप अग्नि जैसे और उन्हीं की तरह ऊर्जस्वी हैं. आप यज्ञ में आए मेहमानों का स्वागतसत्कार करते हैं. आप सोमरस को स्वर्ग से पृथ्वी पर लाने वाले श्येन पक्षी के समान हैं. ( १ ) अग्नेर्जनित्रमसि वृषणौ स्थ ऽ उर्वशीयस्यायुरसि पुरूरवा ऽ असि. गायत्रेण त्वा छन्दसा मन्थामि त्रैष्टुभेन त्वा छन्दसा मन्थामि जागतेन त्वा छन्दसा मन्थामि.. (२) हे शकल! आप अग्नि के जनिता ( जनने वाले ) हैं. आप वृषण ( वीर्यवान ) में स्थित हैं. आप उर्वशी ( के समान ) हैं. आप आयु ( के समान ) हैं. आप पुरूरवा ( के समान ) हैं. मैं गायत्री छंद के साथ आप का मंथन करता हूं. मैं त्रिष्टुप् छंद के साथ आप का मंथन करता हूं. मैं जगती छंद के साथ आप का मंथन करता हूं. ( २ ) भवतं नः समनसौ सचेतसावरेपसौ. मा यज्ञ ँ् हि ँ् सिष्टं मा यज्ञपतिं जातवेदसौ शिवौ भवतमद्य नः.. (३) हे अग्नि! आप आलस्यरहित, समान व सावधान चित्त वाले हैं. आप हमारे यज्ञों में यजमानों की भी हिंसा मत होने दीजिए. आप यज्ञ के स्वामी हैं. आप आज से ही हमारा कल्याण करने की कृपा कीजिए. ( ३ ) अग्नावग्निश्चरति प्रविष्ट ऽ ऋषीणां पुत्रो अभिशस्तिपावा. स नः स्योनः सुयजा यजेह देवेभ्यो हव्य ँ् सदमप्रयुच्छन्स्वाहा.. (४) हे यजमानो! आप ऋषियों के पुत्र जैसे हैं. अग्नि शाप से हमारी रक्षा करते हैं. अग्नि आह्वान के योग्य हैं. अग्नि यज्ञकुंड में प्रविष्ट हो चुके हैं. वे अग्नि हम पर कृपालु हों. हम देवताओं के लिए हवि प्रदान करते हैं. वे उस हवि को ग्रहण कर के उन देवताओं तक पहुंचाने की कृपा करें. ( ४ ) ६४ - यजुर्वेद 632/4
पूर्वार्ध पांचवां अध्याय आपतये त्वा परिपतये गृह्णामि तनूनेप्त्रे शाक्वराय शक्वन ऽ ओजिष्ठाय. अनाधृष्टमस्यनाधृष्यं देवानामोजो ऽ नभिशस्त्यभिशस्तिपा ऽ अनभिशस्तेन्यमञ्जसा सत्यमुपगेष १४ स्विते मा धाः.. (५) हे अग्नि! हम यज्ञ कार्य के लिए आप को ग्रहण करते हैं. आप सर्वव्यापक हैं और ओजस्वी, सर्वसमर्थ, प्रशंसनीय घृणित ( बुरे ) कामों से हमारी रक्षा करते हैं. आप किसी को शाप नहीं देते. आप स्वयं भी अभिशप्त नहीं हैं. आप हमें सत्यमार्ग पर ले चलिए. आप हमारी बुद्धि को श्रेष्ठ कामों में लगाने की कृपा कीजिए. आप हमारे आधार व रक्षक हैं. ( ५ ) अग्ने व्रतपास्त्वे व्रतपा या तव तनूरिय १४ सा मयि यो मम तनूरेषा सा त्वयि. सह नौ व्रतपते व्रतान्यनु मे दीक्षां दीक्षापतिर्मन्यतामनु तपस्तपस्पतिः.. (६) हे अग्नि! आप व्रत के पालनकर्ता हैं. आप का वह व्रत पालन करने वाला शरीर हमारे साथ एकाकार हो जाए. हे व्रतपति अग्नि! व्रतों का यजमान अनुकरण करने की कृपा करें. हम भी आप के साथ ( आप जैसे ) व्रतपति हो जाएं. सोम दीक्षापति हैं. सोम दीक्षा के पालनहार हैं. उन से हम एकाकार हो जाएं. आप तप के स्वामी हैं. हम तप करने वाले हैं. ( आप की कृपा से ) हम आप से एकाकार हो जाएं. ( ६ ) अ १४ शुर १४ शुष्टे देव सोमाप्यायतामिन्द्रायैकधनविदे. आ तुभ्यमिन्द्रः प्यायतामा त्वमिन्द्राय प्यायस्व. आप्याययास्मानत्सखीन्त्सन्या मेधया स्वस्ति ते देव सोम सुत्यामशीय. एष्टा रायः प्रेषे भगाय ऋतमृतवादिभ्यो नमो द्यावापृथिवीभ्याम्.. (७) हे सोम! आप की सोमबेल इंद्र के लिए बढ़ोतरी पाने की कृपा करे. इंद्र धन वेत्ता ( जानने वाले ) हैं. वे आप को पी कर तृप्त हों. आप उन के पीने ( सेवन ) के लिए बढ़ोतरी पाने की कृपा करें. आप अपने सखा यजमान को तृप्त करने की कृपा करें. सोम का कल्याण हो. हम अपनी मेधा ( बुद्धि ) से सोम हेतु किए जा रहे यज्ञ और इन स्तुतियों को शीघ्र पूरा करें. आप हमारे लिए इष्ट ( प्रिय ) धन भेजने की कृपा कीजिए. अग्नि की कृपा से हम सत्यवादी हों. इंद्र की कृपा से हम अमरता प्राप्त करें. हम स्वर्गलोक को नमन करते हैं. हम पृथ्वीलोक को नमन करते हैं. ( ७ ) या ते अग्ने ऽ यःशया तनूर्वर्षिष्ठा गह्वरेष्ठा. उग्रं वचो अपावधीत्तेषं वचो अपावधीत्स्वाहा. या ते अग्ने रजःशया तनूर्वर्षिष्ठा गह्वरेष्ठा. उग्रं वचो अपावधीत्तेषं वचो अपावधीत्स्वाहा. या ते अग्ने हरिशया तनूर्वर्षिष्ठा गह्वरेष्ठा. उग्रं वचो अपावधीत्तेषं वचो अपावधीत्स्वाहा.. (८) यजुर्वेद - ६५
पूर्वार्ध पांचवां अध्याय
पूर्वार्ध पांचवां अध्याय हे अग्नि! आप का शरीर लोहे व चांदी जैसा चमकीला है. आप का शरीर सोने जैसा सुनहरा है. आप के वचन उग्र हैं. आप मनोकामना पूरी करने वाले, गुफा व दुर्गम स्थान के वासी हैं. आप राक्षसों की कठोर आवाजों का नाश करने वाले एवं महिमावान हैं. आप गुफा हैं. आप के लिए आहुतियां भेंट करते हैं. (८) तप्तायनी मेसि वित्तायनी मे ऽ स्यवतान्मा नाथितादवतान्मा व्यथितात्. विदेदग्निर्नभो नामाग्ने अङ्गिर ऽ आयुना नाम्नेहि यो ऽ स्यां पृथिव्यामसि यत्ते ऽ नाधृष्टं नाम यज्ञियं तेन त्वा दधे विदेदग्निर्नभो नामाग्ने अङ्गिर ऽ आयुना नाम्नेहि यो द्वितीयस्यां पृथिव्यामसि यत्तेनाधृष्टं नाम यज्ञियं तेन त्वा दधे विदेदग्निर्नभो नामाग्ने अङ्गिर ऽ आयुना नाम्नेहि यस्तृतीयस्यां पृथिव्यामसि यत्तेनाधृष्टं नाम यज्ञियं तेन त्वा दधे. अनु त्वा देववीतये.. (९) हे पृथ्वि! आप ऊर्जा व धन देने वाली हैं. हे पृथ्वि! आप हमें धृष्टता से बचाने की कृपा कीजिए. हे पृथ्वि! आप यज्ञ के योग्य हैं. 'नभ' नामक अग्नि आप की ओर उन्मुख होने की कृपा करें. अंगिरस अग्नि आयु प्रदान करें. यहां पधारने की कृपा करें. पृथ्वी द्वितीय व तृतीय स्थान में अवस्थित है. हम पृथ्वी पर यज्ञ करते हैं. हम देवताओं के लिए आप को पृथ्वी पर स्थापित करते हैं. (९) सि ᳪ ह्यसि सपत्नसाही देवेभ्यः कल्पस्व सि ᳪ ह्यसि सपत्नसाही देवेभ्यः शुन्धस्व सि ᳪ ह्यसि सपत्नसाही देवेभ्यः शुम्भस्व.. (१०) हे उत्तरवेदिका! आप सिंहिनी की तरह शत्रुनाशी हैं. आप देवताओं के लिए भी कल्पित होने वाली हैं. आप देवताओं के लिए शुद्ध होने की कृपा कीजिए. आप सिंहिनी की तरह शत्रुनाशी हैं. आप देवताओं के लिए शुद्ध होने की कृपा कीजिए. (१०) इन्द्रघोषस्त्वा वसुभिः पुरस्तात्पातु प्रचेतास्त्वा रुद्रैः पश्चात्पातु मनोजवास्त्वा पितृभिर्दक्षिणतः पातु विश्वकर्मा त्वादित्यैरुत्तरतः पात्विदमहं तप्तं वार्बर्हिर्धा यज्ञाम्निः सृजामि.. (११) इंद्र वसुओं के साथ सब ओर से रक्षा करने की कृपा करें. वरुण रुद्रों के साथ पश्चिम से (आप की) रक्षा करने की कृपा करें. पितरों के साथ यम दक्षिण से रक्षा करने की कृपा करें. विश्वकर्मा आदित्यों के साथ उत्तर से रक्षा करने की कृपा करें. हम यज्ञ से आप को तृप्त करने वाला जल सिरजते हैं. (११) सि ᳪ ह्यसि स्वाहा सि ᳪ ह्यस्यादित्यवनिः स्वाहा सि ᳪ ह्यसि ब्रह्मवनिः क्षत्रवनिः स्वाहा सि ᳪ ह्यसि सुप्राजावनी रायस्पोषवनिः स्वाहा सि ᳪ ह्यस्या वह देवान् यजमानाय स्वाहा भूतेभ्यस्त्वा.. (१२) हे उत्तरवेदिके! आप सिंहिनी हैं. सिंहिनी के लिए स्वाहा. आप सिंहिनी हैं. आप ६६ - यजुर्वेद
पूर्वार्ध पांचवां अध्याय आदित्य को प्रसन्न करने वाली हैं. आप के लिए स्वाहा. आप सिंहिनी हैं. आप ब्राह्मणों को प्रसन्न करने वाली हैं. आप सिंहिनी हैं, आप क्षत्रियों को प्रसन्न करने वाली हैं. आप के लिए स्वाहा. आप सिंहिनी रूप हैं. आप अच्छी संतान देने व धन देने वाली हैं. आप के लिए स्वाहा. आप सिंहिनी हैं. आप यजमान के लिए देवताओं का आह्वान करने वाली हैं. प्राणियों के लिए आप को यह आहुति समर्पित है. ( १२ ) ध्रुवोसि पृथिवीं दृ ँह ह ध्रुवक्षिदस्यन्तरिक्षं दृ ँह हाच्युतक्षिदसि दिवं दृ ँह हाग्नेः पुरीषमसि.. (१३) हे मध्यम परिधि! आप पृथ्वी को स्थिर करने की कृपा करें. आप स्थिर व अंतरिक्षवासी हैं. आप अंतरिक्ष को स्थिर बनाने की कृपा कीजिए. उत्तरवेदिका स्वर्ग स्वरूप है. स्वर्गलोक को स्थिर बनाने की कृपा करें. हे अग्नि! आप सुगंधित वस्तुओं से स्वर्गलोक को सुगंधित करने की कृपा करें. ( १३ ) युञ्जते मन ऽ उत युञ्जते धियो विप्रा विप्रस्य बृहतो विपश्चितः. वि होत्रा दधे वयुनाविदेक ऽ इन्मही देवस्य सवितुः परिष्टुतिः स्वाहा.. (१४) ब्राह्मण यजमान अपना मन अपनी बुद्धि तथा सब कामों से अपने को हटा कर यज्ञ में लगाते हैं. होता यज्ञ को विशेष रूप से धारते हैं. सविता देव जाग्रत हैं. प्रशंसा प्राप्त हैं. सविता देव को सर्वविध अनुकूल करना चाहते हैं. सविता देव के लिए स्वाहा. ( १४ ) इदं विष्णुर्विचक्रमे त्रेधा नि दधे पदम्. समूढमस्य पा ँह सुरे स्वाहा.. (१५) यह विष्णु विशेष रूप से सर्वत्र भ्रमण करते हैं ( अर्थात् सर्वव्यापक हैं ). विष्णु तीन प्रकार से तीन पैर धारण करते हैं यानी सब लोक इन के तीन पैरों में समाए हुए हैं. इन की चरणरज में लोक समाए हैं. विष्णु के लिए स्वाहा. ( १५ ) इरावती धेनुमती हि भूत ँह सुयवसिनी मनवे दशस्या. व्यस्कभ्ना रोदसी विष्णवेते दाधर्थ पृथिवीमभितो मयूखैः स्वाहा.. (१६) पृथ्वी धनवती व गोवती है. पृथ्वी यज्ञ साधन देने वाली है. विष्णु ने पृथ्वी को स्वर्गलोक से अलग कर के स्थिर बनाया है. उन्होंने किरणों से पृथ्वी को पूरी तरह व्याप्त किया है. पृथ्वी के लिए स्वाहा. ( १६ ) देवश्रुतौ देवेष्वा घोषतं प्राची प्रेतमध्वरं कल्पयन्ती ऊर्ध्वं यज्ञं नयतं मा जिह्वरतम्. स्वं गोष्ठमा वदतं देवा दुर्ये आयुर्मा निर्वादिष्टं प्रजां मा निर्वादिष्टमत्र रमेथां वर्ष्मन् पृथिव्याः.. (१७) हे देवो! आप दिव्य विधाओं में दक्ष हैं. आप देवताओं की सभा में यह घोषणा करने की कृपा करें कि देवगण यज्ञ को पूर्व दिशा में पहुंचाते हैं. वे यज्ञ को इष्ट यजुर्वेद - ६७
पूर्वार्ध पांचवां अध्याय दिशा में पहुंचाते हैं. देवगण यज्ञ को फलीभूत करते हैं. देवगण यज्ञ को ऊंचाई पर पहुंचाते हैं. आगे गायों के बाड़े में (गोशाला में) घोषणा करने की कृपा करें कि देवता यजमान को आयु प्रदान करने की कृपा करें. देवता यजमान को निंदित न होने दें. देवता यजमान को सुखपूर्वक रहने का आशीर्वाद प्रदान करते हैं. देवगण पृथ्वी के इन स्थानों पर सुख से वास करने की कृपा करें. (१७) विष्णोर्नुकं वीर्याणि प्रवोचं यः पार्थिवानि विममे रजा ᳪ सि. यो अस्कभायद॒त्तर ᳪ सधस्थं विचक्रमाणस्त्रेधोरुगायो विष्णवे त्वा.. (१८) हम यजमान विष्णु के अनुकरणीय कार्यों पराक्रमपूर्ण कार्यों का वर्णन करते हैं. उन की चरणरज में पृथ्वी आदि लोक वास करते हैं. वे हमें भयमुक्त करते हैं. वे लोकों को साधने वाले व सर्वव्यापक हैं. हम उन की प्रसन्नता के लिए हैं. काष्ठ देव आप की स्थापना करते हैं. (१८) दिवो वा विष्ण ऽ उत वा पृथिव्या महो वा विष्ण ऽ उरोरन्तरिक्षात्. उभा हि हस्ता वसुना पृणस्वा प्रयच्छ दक्षिणादोत सव्याद्विष्णवे त्वा.. (१९) हे विष्णु! आप स्वर्गलोक से हमें धन दें या हे विष्णु! आप पृथ्वीलोक से हमें धन से पूर्ण करें या हे विष्णु! आप विशाललोक से हमें धन दें या हे विष्णु! आप धन से पूर्ण करें या हे विष्णु! आप अपने दोनों हाथों से हमें धन से पूर्ण करें या हे विष्णु! आप दाएं या बाएं हाथ से हमें धन दे कर पूर्ण करें. विष्णु की प्रसन्नता के लिए हम काष्ठ देव को स्थापित करते हैं. (१९) प्र तद्विष्णुः स्तवते वीर्येण मृगो न भीमः कुचरो गिरिष्ठाः. यस्योरुषु त्रिषु विक्रमणेष्वधिक्षियन्ति भुवनानि विश्वा.. (२०) विष्णु अपनी सुंदरता के लिए प्रसिद्ध हैं. वे अपनी वीरता के कारण स्तुत्य हैं. वे सिंह व संवेग की तरह विचरण करते हैं वे पर्वत में वास करते हैं. इन के तीनों पैरों में सब आश्रय पाए हुए हैं. इन विष्णु के तीनों पैरों में सब लोक आश्रय पाए हुए हैं. (२०) विष्णो रराटमसि विष्णोः श्नप्त्रे स्थो विष्णोः स्यूरसि विष्णोध्रुवोसि. वैष्णवमसि विष्णवे त्वा.. (२१) हे विष्णु! आप ललाट हैं. आप ललाट के दोनों भाग हैं. विष्णु सभी लोकों को व्यापक बनाते हैं. आप स्थिर हैं. आप ध्रुव हैं. हम विष्णु की प्रसन्नता के लिए काष्ठ देव की स्थापना करते हैं. (२१) देवस्य त्वा सवितुः प्रसवे ऽ श्विनोर्बाहुभ्यां पूष्णो हस्ताभ्याम्. आ ददे नार्यसी दमह ᳪ रक्षसां ग्रीवा अपिकृन्तामि. बृहन्नसि बृहद्रवा बृहतीमिन्द्राय वाचं वद.. (२२) ६८ - यजुर्वेद
पूर्वार्ध पांचवां अध्याय सब देवताओं को सविता ने पैदा किया है. अश्विनी के बाहुओं से हम आप को स्वीकारते हैं. पूषा देव के हाथों हम आप को स्वीकारते हैं. आइए, आप हमें सहायता दीजिए. हम राक्षसों की गरदनें छेदते हैं, काटते हैं. आप विशाल व बहुत अधिक आवाज करने वाले हैं. आप इंद्र के लिए वाणी (मंत्र) दीजिए अर्थात् मंत्रपाठ कीजिए. (२२) रक्षोहणं वलगहनं वैष्णवीमिदमहं तं वलगमुत्किरामि यं मे निष्ट्यो यममात्यो निचखानेदमहं तं वलगमुत्किरामि यं मे समानो यमसमानो निचखानेदमहं तं वलगमुत्किरामि यं मे सबन्धुर्यमसबन्धुर्निचखानेदमहं तं वलगमुत्किरामि यं मे सजातो यमसजातो निचखानोत्कृत्यां किरामि.. (२३) राक्षसों का हनन करने वाले मंत्रपाठ कीजिए. अतिचार साधनों का नाश करने वाले मंत्रपाठ कीजिए. पोषणता देने वाले मंत्रपाठ कीजिए. अभिचार साधनों का नाश करने वाले मंत्रपाठ कीजिए. अनिष्ट निवारण हेतु मंत्रपाठ कीजिए. छिपा कर रखे हुए अनिष्टकर साधनों के नाश हेतु मंत्रपाठ कीजिए. छिपा कर रखे हुए अभिचार साधनों को हम खोद कर उखाड़ फेंकते हैं. हमारे सजातियों ने जो अनिष्टकारी प्रयोग किए हैं, हम उन्हें खोद कर उखाड़ फेंकते हैं. (२३) स्वराडसि सपत्नहा सत्रराडस्यभिमातिहा जनराडसि रक्षोहा सर्वराडस्यमित्रहा.. (२४) हे गर्त! स्वयं प्रकाशवान, शत्रुनाशी, यज्ञ सत्र तक रहने वाले, अभिमान नाशक, जनों के रक्षक व राक्षस हंता (मारने वाले) हैं. सभी के प्रकाशक और अमित्रों के नाशक हैं. (२४) रक्षोहणो वो वलगहनः प्रोक्षामि वैष्णवान् रक्षोहणो वो वलगहनोवनयामि वैष्णवान् रक्षोहणो वो वलगहनोवस्तृणामि वैष्णवान् रक्षोहणौ वां वलगहना ऽ उप दधामि वैष्णवी रक्षोहणौ वां वलगहनौ पर्यूहामि वैष्णवी वैष्णवमसि वैष्णवा स्थ.. (२५) राक्षस नाश हेतु हम गड्ढा खोदते हैं. अभिचार नाश हेतु हम गड्ढा खोदते हैं. विष्णु को इन गड्ढों में अधिष्ठित करते हैं. उन के हेतु हम गड्ढों में जल छिड़कते हैं. उन के हेतु हम गड्ढों में कुश का आसन बिछाते हैं. वे राक्षस व अभिचार नाशक हैं. उन के हेतु हम गड्ढों में फलक (पटरा) रखते हैं. वे राक्षस व अभिचार नाशक हैं. उन के हेतु हम गड्ढों में मिट्टी व पत्थर बिछाते हैं. आप पालक हैं. हे विष्णु! स्थिर होने की कृपा करें. (२५) देवस्य त्वा सवितुः प्रसवे ऽश्विनोर्बाहुभ्यां पूष्णो हस्ताभ्याम्. आददे नार्यसीदमह ष्षं रक्षांसां ग्रीवा ऽ अपिकृन्तामि. यवोसि यवयास्मद्द्वेषो यवयारातीर्दि वे त्वान्तरिक्षाय त्वा पृथिव्यै त्वा शुन्धन्ताँल्लोकाः पितृषदनाः पितृषदनमसि.. (२६) यजुर्वेद - ६९
पूर्वार्ध पांचवां अध्याय सविता देव सभी देवताओं को उत्पन्न करने वाले हैं. उन को अश्विनी देवताओं की बाहु से धारण करते हैं. उन को पूषा देवता के हाथों से धारण करते हैं. वे हमारे मन के अनुकूल होने की कृपा करें. हम राक्षसों की गर्दन काट कर अलग करते हैं. उन का नाश करते हैं. आप यव हैं. हमें शत्रुओं से अलग करने की कृपा कीजिए. हम स्वर्गलोक, अंतरिक्ष व पृथ्वी हेतु आप का प्रेक्षण करते हैं. हम पृथ्वी के लिए स्थान को शुद्ध करते हैं. यह पितरों का सदन है. यह पितरों का निवास स्थान है. ( २६ ) उद्विव ꣳ स्तभानान्तरिक्षं पृण दृ ꣳ हस्व पृथिव्यां द्युतानस्तवा मारुतो मिनोतु मित्रावरुणौ ध्रुवेण धर्मणा. ब्रह्मवनि त्वा क्षत्रवनि रायस्पोषवनि पर्य्यूहामि ब्रह्म दृ ꣳ ह क्षत्रं दृ ꣳ ह्यायुर्दृ ꣳ ह प्रजां दृ ꣳ ह.. ( २७) हे उदुंबर शाखे ( गूलर की लकड़ी )! स्वर्गलोक को ऊंचा उठाने, अंतरिक्षलोक को पूर्ण करने व पृथ्वीलोक को दृढ़ करने की कृपा कीजिए. मरुद्गण स्वर्गलोक का विस्तार करते हैं. ( २७ ) ध्रुवासि ध्रुवोयं यजमानोस्मिन्नायतने प्रजया पशुभिर्भूयात्. घृतेन द्यावापृथिवी पूर्येथामिन्द्रस्य छदिरसि विश्वजनस्य छाया.. ( २८) हे शाखा! आप ऊंचे आकाश तक जाइए. आप ध्रुव ( स्थिर ) होइए. यजमान इस घर में प्रजावान और पशु वाला हो. हम घी से स्वर्गलोक व पृथ्वी को पूरित कर दें. छप्पर से अनुरोध है कि वे हमें भी छत्रच्छाया प्रदान करने की कृपा करें. ( २८ ) परि त्वा गिर्वणो गिर ऽ इमा भवन्तु विश्वतः. वृद्धायुमनु वृद्धयो जुष्टा भवन्तु जुष्टयः.. ( २९) हे इंद्र! वाणीमय स्तुतियां आप को सब ओर से प्राप्त हों. वाणीमय स्तुतियां सब ओर से सब के लिए कल्याणमयी हों. हम आयु में बढ़ोतरी पाएं. आप की आयु का अनुकरण करें. आप हमारे यज्ञ से संतुष्ट एवं प्रसन्न होने की कृपा कीजिए. ( २९ ) इन्द्रस्य स्यूरसीन्द्रस्य ध्रुवोसि. ऐन्द्रमसि वैश्वदेवमसि.. ( ३०) हे रज्जु! आप इंद्र के लिए हो. उन के लिए स्थिर होने की कृपा कीजिए. आप उन से संबंधित हैं. आप सभी देवों से संबद्ध होने की कृपा कीजिए. ( ३० ) विभूरसि प्रवाहणो वह्निरसि हव्यवाहनः. श्वात्रोसि प्रचेतास्तुथोसि विश्ववेदाः.. ( ३१) हे अग्नि! आप व्यापक, प्रवाहक, विविध स्वरूप, हवि वाहक व रक्षक हैं. अत्यंत चेतना संपन्न हैं. आप स्तुत्य और सर्वज्ञाता हैं. ( ३१ ) ७० - यजुर्वेद
पूर्वार्ध पांचवां अध्याय उशिगसि कविरङ्घारिरसि बम्भारिरवस्यूरसि दुवस्वाञ्छुन्ध्यूरसि मार्जालीयः सम्राडसि कृशानुः परिषद्योसि पवमानो नभोसि प्रतकवा मृष्टोसि हव्यसूदन ऽ ऋतधामसि स्वर्ज्योतिः.. (३२) हे अग्नि! आप उशिक, कवि, शत्रुनाशक हैं. आप भरणपोषण कर्ता व अन्न की कामना करने वाले हैं. आप शुद्ध व पावक हैं. आप सम्राट् हैं, कृशानु हैं. आप सब ओर से यजमानों से घिरे हुए हैं. आप नभ व प्रदक्षिणा स्वरूप हैं. आप हवि को पकाने वाले, सत्य के धाम एवं स्वयं प्रकाशक हैं. (३२) समुद्रोसि विश्वव्यचा ऽ अजोस्येकपादहिरसि बुध्यो वागस्यैन्द्रमसि सदोस्युतस्य द्वारौ मा मा सन्ताप्तमध्वनामध्वपते प्र मा तिर स्वस्ति मेस्मिन्पथि देवयाने भूयात्.. (३३) आप समुद्र, सर्वज्ञाता व अजन्मा हैं. आप एक पैर वाले हैं. आप जागरूक हैं. आप इंद्र से संबंधित हैं. आप वाणी स्वरूप हैं. आप हमारे घर में उपस्थित रहते हैं. आप यज्ञ वेदी पर विराजमान हैं. आप यज्ञ द्वार पर स्थापित हैं. आप मार्ग पति हैं. आप हमारा पथ प्रशस्त करने की कृपा करें. देवताओं के मार्ग हमारे लिए कल्याणकारी होने की कृपा करें. (३३) मित्रस्य मा चक्षुषेक्षध्वमग्नयः सगराः सगरास्थ सगरेण नाम्ना रौद्रेणानीकेन पात माग्नयः पिपृत माग्नयो गोपायत मा नमो वोस्तु मा मा हि ꣳ षिष्ट.. (३४) हे यज्ञ! आप हमें मित्रता की दृष्टि से देखने की कृपा करें. हे अग्नि! आप हमारा पथ प्रदर्शन करने की कृपा करें. आप भयंकर से भयंकर शत्रुओं व भयंकर सेना से हमारी रक्षा करने की कृपा करें. आप हमारा भरणपोषण करने की कृपा करें. आप से हमारा कुछ भी छिपा हुआ नहीं है. आप को हमारा नमस्कार है. आप किसी भी प्रकार की हिंसा न करें. (३४) ज्योतिरसि विश्वरूपं विश्वेषां देवाना ꣳ समित्. त्व ꣳ सोम तनूकृद्भ्यो द्वेषोभ्योअन्यकृतेभ्य ऽ उरु यन्तासि वरूथ ꣳ स्वाहा जुषाणो अप्तुराज्यस्य वेतु स्वाहा.. (३५) हे अग्नि! आप ज्योति व विश्व स्वरूप हैं. आप सब देवताओं की समिधा हैं. आप सोम से शत्रुओं का नाश करते हैं. आप असत् कार्यों का नाश करते हैं. आप हमें सुरक्षित स्थान पर ले जाने की कृपा कीजिए. आप बल संपन्न के लिए स्वाहा. आप अनेक आहुतियों से संपन्न हैं. आप ज्ञाता हैं. आप के लिए स्वाहा. (३५) अग्ने नय सुपथा राये अस्मान्विश्वानि देव वयुनानि विद्वान्. युयोध्यस्मज्जुहुराणमेनो भूयिष्ठां ते नम उक्तिं विधेम.. (३६) हे अग्नि! आप हमें सुपथ व धनमार्ग पर ले जाने की कृपा कीजिए. आप विद्वान् यजुर्वेद - ७१
पूर्वार्ध पांचवां अध्याय हैं. आप शत्रुओं से युद्ध करें. आप विद्वान् हैं. बारंबार आप को नमस्कार करते हैं. बारबार आप के लिए स्तोत्र उचारते हैं. हम आप से यज्ञ की रक्षा का निवेदन करते हैं. ( ३६ ) अयं नो अग्निर्वकिवृणोत्वयं मृधः पुर ऽ एतु प्रभिन्दन्. अयं वाजाञ्जयतु वाजसातावय ९४ शत्रूञ्जयतु जर्हषाणः स्वाहा.. ( ३७) यह अग्नि हमें वरण करने योग्य धन प्रदान करें. यह शत्रु नाश करते हुए हमारे सम्मुख पधारें. यह हमारे लिए अन्न जीतें. हमारे लिए बल जीतें. यह हमारे लिए शत्रुओं से जीतें. यह हमारी आहुति स्वीकारने की कृपा करें. ( ३७ ) उरु विष्णो विक्रमस्वोरु क्षयाय नस्कृधि. घृतं घृतयोने पिब प्रप्र यज्ञपतिं तिर स्वाहा.. ( ३८ ) अग्नि व्यापक, बलशाली व शत्रुनाशी हैं. वे मनुष्य को पराक्रमी बनाएं. वे घृत योनि हैं. वे घृत पीने व यजमान की बढ़ोत्तरी करने की कृपा करें. ( ३८ ) देव सवितरेष ते सोमस्त ९४ रक्षस्व मा त्वा दभन्. एतत्त्वं देव सोम देवो देवां २ उपागा ऽ इदमहं मनुष्यान्सह रायस्पोषेण स्वाहा निर्वरुणस्य पाशान्मुच्ये.. ( ३९) ये सविता हैं. यह सोम आप को भेंट किया जा रहा है. आप इस की रक्षा करने की कृपा कीजिए. आप को राक्षस कष्ट न पहुंचा पाएं. यह सोम दिव्यता को पा कर देवता से अधिष्ठित हैं. आप की कृपा से हम भी दिव्यता, धन व पशु प्राप्त करें. आप के लिए स्वाहा. आप को प्रदान की गई आहुति से हम वरुण के पाश से मुक्त हो चुके हैं. ( ३९ ) अग्ने व्रतपास्त्वे व्रतपा या तव तनूर्मय्यभूदेषा सा त्वयि यो मम तनूस्त्वय्यभूदिय ९४ सा मयि. यथायथं नौ व्रतपते व्रतान्यनु मे दीक्षां दीक्षापतिरम ९४ स्तानु तपस्तपस्पतिः.. (४०) हे अग्नि! आप व्रतपालक हैं. आप हमारे व्रत की रक्षा करने की कृपा करें. व्रत करने से हमारा शरीर आप के शरीर जैसा हो जाए. आप के शरीर से एकाकार हो जाए. आप जिस तरह यथायोग्य श्रेष्ठ कार्यों का संपादन करते हैं, उसी तरह हमारे श्रेष्ठ कार्यों का संपादन करने की कृपा करें. आप दीक्षापति हैं. आप हमें दीक्षित करने की कृपा कीजिए. आप तपपति हैं. आप हमारे तप को स्वीकार करने की कृपा कीजिए. ( ४० ) उरु विष्णो विक्रमस्वोरु क्षयाय नस्कृधि. घृतं घृतयोने पिब प्रप्र यज्ञपतिं तिर स्वाहा.. (४१) हे अग्नि! आप बहुत व्यापक हैं. आप अतीव पराक्रमी हैं. आप शत्रुनाश हेतु ७२ - यजुर्वेद
पूर्वार्ध पांचवां अध्याय हमें शक्तिशाली बनाइए. आप मनुष्यों को पराक्रमी बनाइए. अग्नि अतीव व्यापक, बलशाली व शत्रुनाशी हैं. वे मनुष्य को पराक्रमी बनाएं. अग्नि घृतयोनि हैं. अग्नि घृत को पीने यजमान की बढ़ोतरी करने की कृपा करें. ( ४१ ) अत्यन्याँ २ अगां नान्याँ २ उपागामर्वाक् त्वा परेभ्योविदं परोवरेभ्यः. तं त्वा जुषामहे देव वनस्पते देवयज्यायै देवास्त्वादेवयज्यायैजुषन्तां विष्णवे त्वा. ओषधे त्रायस्व स्वधिते मैन १४ हि १४ सीः.. (४२) हे यूपवृक्ष! आप की कृपा से हम उन वृक्षों को पाएं जिन से हम यज्ञ के खंभे बना सकें. जो वृक्ष यज्ञ ( अथवा यज्ञस्तंभ ) हेतु उपयोगी नहीं हैं, हम उन्हें न पाएं. दूर और पास के वृक्षों में हम ने आप को पास से पाया है. आप वन पालक व प्रकाशमान हैं. हम आप की सेवा करते हैं. ताकि हम देवताओं के लिए किए जाने वाले इस यज्ञ में आप का उपयोग कर सकें. हम आप को घी से सींचते हैं. हम ओषधि से आप की रक्षा का निवेदन करते हैं. कुल्हाड़ा आप की रक्षा करे. कोई भी इस यज्ञस्तंभ की हिंसा न करे. ( ४२ ) द्यां मा लेखीरन्तरिक्षं मा हि १४ सीः पृथिव्या सम्भव. अय १४ हि त्वा स्वधितिस्तेतिजानः प्रणिनाय महते सौभागाय. अतस्त्वं देव वनस्पते शतवल्शो वि रोह सहस्रवल्शा वि वय १४ रुहेम.. (४३) हे यूपवृक्ष! आप स्वर्गलोक को नुकसान न पहुंचाएं. हे यूपवृक्ष! आप अंतरिक्ष को नुकसान न पहुंचाएं. हे यूपवृक्ष! आप पृथ्वी पर उपजाइए. तीक्ष्ण कुल्हाड़ा आप के सौभाग्य हेतु है. प्राणियों के महान सौभाग्य के लिए आप का उपयोग किया जा रहा है. आप की सैकड़ों शाखाओं की तरह हमारे वंश वृक्ष की शाखाएं भी बढ़ जाएं. ( ४३ ) यजुर्वेद - ७३
छठा अध्याय
छठा अध्याय देवस्य त्वा सवितुः प्रसवेश्विनोर्बाहुभ्यां पूष्णो हस्ताभ्याम्. आ ददे नार्यसी दमह ६ह रक्षसां ग्रीवा ऽ अपि कृन्तामि. यवोसि यवयास्मद् द्वेषो यवयारातीर्दिवे त्वान्तरिक्षाय त्वा पृथिव्यै त्वा शुन्धन्ताँल्लोकाः पितृषदनाः पितृषदनमसि.. ( १ ) हे यज्ञ साधनो! आप देवताओं के नायक हैं. हम आप को सविता द्वारा प्रेरित अश्विनीकुमारों की बांहों से ग्रहण करते हैं. हम आप को पूषा देव के हाथों से ग्रहण करते हैं, जो आर्य नहीं हैं. ( आप आइए ) आप उन राक्षसों की गरदनों पर प्रहार कीजिए. आप हमारे मित्र हैं. आप हमारे द्वेषियों को हम से दूर करने की कृपा कीजिए. हम स्वर्गलोक, अंतरिक्ष व पृथ्वी के लिए आप को पवित्र करते हैं. आप हमारे लिए पिता की तरह हैं. आप का घर हमारे लिए पिता के घर की तरह है. ( १ ) अग्रेणीरसि स्वावेश ऽ उन्नेत्तृणामेतस्य वित्तादधि त्वा स्थास्यति देवस्त्वा सविता मध्वानक्तु सुपिप्पलाभ्यस्त्वौषधीभ्यः. द्यामग्रेणास्पृक्ष ऽ आन्तरिक्षं मध्येनाप्राः पृथिवीमुपरेणादृ ६ह हीः... ( २ ) हे यज्ञ साधनो! आप अग्रणी हैं. आप अपनी जिम्मेदारी मान कर सब को उन्नति की ओर अग्रसर कीजिए. सविता देव जगत् के स्वामी हैं. वे आप को सुफल ओषधियों से भूषित करने की कृपा करें. आप स्वर्गलोक की ऊंचाइयों को छुएं. श्रेष्ठ विचारों से अंतरिक्षलोक को पूर्ण कर दीजिए. आप श्रेष्ठ कर्मों से पृथ्वी को ओतप्रोत करने की कृपा कीजिए. ( २ ) या ते धामान्युश्मसि गमध्यै यत्र गावो भूरिश्रृङ्गा ऽ अयासः. अत्राह तदुरुगायस्य विष्णोः परमं पदमव भारि भूरि. ब्रह्मवनि त्वा क्षत्रवनि रायस्पोषवनि पर्यूहामि. ब्रह्म दृ ६ह ह क्षत्रं दृ ६ह ह्यायुर्दृ ६ह ह प्रजां दृ ६ह ह.. ( ३ ) विष्णु का जो धाम है, वह सूर्य की किरणों से प्रकाशित है. वह धाम सर्वव्यापक है. हम विष्णु के उस श्रेष्ठ धाम को पाने की इच्छा रखते हैं. आप ७४ - यजुर्वेद
पूर्वार्ध छठा अध्याय ब्राह्मणों व क्षत्रियों आदि को यथायोग्य धन और पोषण देते हैं. आप ब्राह्मणों, क्षत्रियों और वैश्यों को धन व संतान दीजिए. ( ३ ) विष्णोः कर्माणि पश्यत यतो व्रतानि पस्पशे. इन्द्रस्य युज्यः सखा.. (४) हे यजमानो! हम विष्णु से जुड़ें. हम उन के मित्र हो जाएं. उन के कामों को देखें. हम उन के व्रतों का पालन करें. ( ४ ) तद्विष्णोः परमं पद १४ सदा पश्यन्ति सूरयः. दिवीव चक्षुराततम्.. (५) शूरवीर सदैव विष्णु का परम पद स्वर्गलोक में छाए हुए प्रकाश के समान देखते हैं. ( ५ ) परिवीरसि परि त्वा दैवीर्विशो व्ययन्तां परीमं यजमान १४ रायो मनुष्याणाम्. दिवः सूनुरस्येष ते पृथिव्याँल्लोक ऽ आरण्यस्ते पशुः.. (६) हे यज्ञ देव! आप सर्वव्यापक हैं. यजमान आप को कणकण में देखते हैं. आप दिन के पुत्र की तरह व्याप्त हैं. पृथ्वीलोक, वन प्रदेश, व पशु भी आप का ही विस्तार है. आप मनुष्यों को धन प्रदान करने की कृपा कीजिए. ( ६ ) उपावीरस्युप देवान्दैवीर्विशः प्रागुरुशिजो वह्नितमान्. देव त्वष्टर्वसु रम हव्या ते स्वदन्ताम्.. (७) हे त्वष्टा देव! आप सर्जक हैं. आप समीप आए हुए की रक्षा करते हैं. आप की कृपा से प्रजा श्रेष्ठ गुणों से संपन्न हो जाए. आप दिव्य गुण संपन्न, तेजस्वी व समर्थ हैं. ये सभी गुण आप की कृपा से विद्वानों को प्राप्त हों. हम आप को रमणीय हवि प्रदान कर रहे हैं. आप उस का आस्वादन करने की कृपा कीजिए. ( ७ ) रेवती रमध्वं बृहस्पते धारया वसूनि. ऋतस्य त्वा देवहविः पाशेन प्रतिमुञ्चामि धर्षा मानुषः.. (८) यज्ञ के आचार्यों ने उत्तम कोटि की हवि के लिए विशाल धाराओं के रूप में धन देने वाले जिन पशुओं को बांधा, उन पशुओं को अब हम मुक्त करते हैं. वे पशु हमें और हमारे यज्ञ के लिए दूध आदि के रूप में धन धारण करते रहें. हम समर्थ बनें. ( ८ ) देवस्य त्वा सवितुः प्रसवेश्विनोर्बाहुभ्यां पूष्णो हस्ताभ्याम्. अग्नीषोमाभ्यां जुष्टं नियुनज्मि. अद्भ्यस्त्वौषधीभ्योनु त्वा माता मन्यतामनु पितानु भ्राता सगर्भ्योनु सखा सयूथ्यः. अग्नीषोमाभ्यां त्वा जुष्टं प्रोक्षामि.. (९) सविता देव की कृपा से हम अश्विनीकुमारों व पूषा देव को दोनों बाहुओं से यजुर्वेद - ७५
पूर्वार्ध छठा अध्याय ग्रहण करते हैं. अग्नि व सोम देव की संतुष्टि के लिए यज्ञ करते हैं. ओषधियां और जल शुद्धता का अनुकरण करें. ( यज्ञ कार्य हेतु ) माता अनुमति प्रदान करें. ( यज्ञ कार्य हेतु ) पिता अनुमति प्रदान करें. ( यज्ञ कार्य हेतु ) भाई अनुमति प्रदान करें. ( यज्ञ कार्य हेतु ) मित्र अनुमति प्रदान करें. हम अग्नि की संतुष्टि के लिए यज्ञ करते हैं. हम सोम की संतुष्टि के लिए यज्ञ करते हैं. ( ९ ) अपां पेरुरस्यापो देवीः स्वदन्तु स्वात्तं चित्सद्देवहविः. सन्ते प्राणो वातेन गच्छता १४ समङ्गानि यजत्रैः सं यज्ञपतिराशिषा.. (१०) हे यज्ञ से जुड़े पशु देव! आप जल के रक्षक व दिव्य गुणों वाले हैं. आप सदैव हविमय रहने की कृपा करें. देव कृपा से यज्ञपति को आशीर्वाद मिले. हमारे प्राण वायु से भरे रहें. हम यज्ञीय अनुशासन का पालन करें. ( १० ) घृतेनाक्तौ पशूँस्त्रायेथा १४ रेवति यजमाने प्रियं धा ऽ आ विश. उरोरन्तरिक्षात्सजूर्देवेन वातेनास्य हविषस्तमना यज समस्य तन्वा भव. वर्षो वर्षीयांसि यज्ञे यज्ञपतिं धाः स्वाहा देवेभ्यो देवेभ्यः स्वाहा.. (११) हे यज्ञ देव! आप घी आदि ( हवि हेतु उपयोगी ) देने वाले पशुओं की रक्षा करने की कृपा करें. यजमान के लिए ये पशु प्रिय हों. उन के प्रिय धाम में वास करें. ये पशु यजमान के अनुकूल हों. यजमान की रक्षा करने की कृपा कीजिए. इस यज्ञ में हवि से उस का विस्तार करने की कृपा करें. यज्ञपति बरसों तक जीएं. वे कल्याण करें. देवताओं के लिए स्वाहा. ( ११ ) माहिर्भूर्मा पृदाकुर्नमस्त ऽ आतानान्वर्वा प्रेहि. घृतस्य कुल्या ऽ उप ऋतस्य पथ्या ऽ अनु.. (१२) हे यज्ञ देव! आप महान् हैं. आप यजमानों के प्रति हिंसक मत होना. आप महान् हैं. आप यजमानों के प्रति निर्दय मत होना. आप महान् हैं. आप यजमानों के प्रति क्रोधित मत होना. आप की कृपा से घी जल की भांति बहे. हम सत्य के पथ का अनुसरण करें. ( १२ ) देवीरापः शुद्धा वोढ्व १४ सुपरिविष्टा देवेषु सुपरिविष्टा वयं परिवेष्टारो भूयास्म.. (१३) हे देवियो! आप शुद्ध हैं. आप प्राकृतिक रूप से शुद्ध हैं. आप देवताओं के लिए हवि वहन करने की कृपा करें. हवि उत्तम पात्र में है. आप उसे ग्रहण करने की कृपा कीजिए. इन की कृपा से हम भी कार्य करने वाले हों. ( १३ ) वाचं ते शुन्धामि प्राणं ते शुन्धामि चक्षुस्ते शुन्धामि श्रोत्रं ते शुन्धामि नाभिं ते शुन्धामि मेढ्रं ते शुन्धामि पायुं ते शुन्धामि चरित्राँस्ते शुन्धामि.. (१४) हे याजक! हम यजमान आप की वाणी को शुद्ध करते हैं. यजमान आप के ७६ - यजुर्वेद
पूर्वार्ध छठा अध्याय
पूर्वार्ध छठा अध्याय प्राण को शुद्ध करते हैं. हम यजमान आप के नेत्रों को शुद्ध करते हैं. हम यजमान आप के कानों को शुद्ध करते हैं. हम यजमान आप की नाभि को शुद्ध करते हैं. हम यजमान आप की जननेंद्रिय को शुद्ध करते हैं. हम यजमान आप की गुदा को शुद्ध करते हैं. हम यजमान आप के चरित्र को शुद्ध करते हैं. (१४) मनस्त ऽ आप्यायतां वाक्त ऽ आप्यायतां प्राणस्त ऽ आप्यायतां चक्षुस्त ऽ आप्यायता १४ श्रोत्रं त ऽ आप्यायताम्. यत्ते क्रूरं यदास्थितं तत्त ऽ आप्यायतां निष्प्यायतां तत्ते शुध्यतु शमहोभ्यः. ओषधे त्रायस्व स्वधिते मैन १४ हि १४ सी:... (१५) हे याजक! आप का मन प्रसन्न हो. आप की वाणी प्रसन्न हो. आप के प्राण प्रसन्न हों. आप के नेत्र प्रसन्न हों. आप के कान प्रसन्न हों. हे यजमान! आप की क्रूरता समाप्त हो. आप का स्वभाव स्थिर हो. हे याजक! आप का स्वभाव दृढ़ हो. आप का आचरण शुद्ध हो, हमें भी शुद्ध करे. ओषधियां रक्षा करें. आप इन्हें नष्ट होने से बचाइए. (१५) रक्षासां भागोसि निरस्त १४ रक्ष ऽ इदमह १४ रक्षोभि तिष्ठामीदमह १४ रक्षोव बाध इदमह १४ रक्षोधमं तमो नयामि. घृतेन द्यावापृथिवी प्रोर्णुवाथां वायो वे स्तोकानाम्नग्निरराज्यस्य वेतु स्वाहा स्वाहाकृते ऊर्ध्वनभसं मारुतं गच्छतम्.. (१६) यज्ञ में त्यागा हुआ तिनका राक्षसों का भाग है. इसलिए हे परित्यक्त तृण! हम आप को दूर करते हैं. आप राक्षसी वृत्ति (स्वभाव) वाले हैं. आप पतन के गड्ढे में ही बैठे रहिए. आप बाधक व अधम हैं. हम आप को अंधकार में ले जाते हैं. यजमान द्वारा दी गई हवि से स्वर्गलोक व पृथ्वीलोक परिपूर्ण हों. यजमान द्वारा दी गई हवि अग्निग्रहण करने की कृपा करें. अग्नि के लिए स्वाहा. नभ देव के लिए स्वाहा. वह हवि ऊंचे नभलोक तक पहुंचे. हवा के रूप में पूरे आकाशलोक में चली जाए. (१६) इदमपः प्र वहतावद्यं च मलं च यत्. यच्चाभिदुद्रोहानृतं यच्च शेपे अभीरुणम्. आपो मा तस्मादेनसः पवमानश्च मुञ्चतु.. (१७) हे जल देव! आप जिस तरह हमारे मल आदि को दूर करते हैं, उसी तरह यजमान के ईर्ष्या, झूठ, दोष आदि को दूर करें. जल तथा वायु हम को इन पापों से मुक्त करें. जल हम को पवित्र बनाने की कृपा करे. (१७) सन्ते मनो मनसा सं प्राणः प्राणेन गच्छताम्. रेडस्यग्निष्ट्वा श्रीणात्वापस्त्वा समरिणन्वातस्य त्वा ध्राज्यै पूष्णो र १४ ह्मा ऊष्मणो व्यथिषत् प्रयुतं द्वेषः... (१८) यजुर्वेद - ७७
पूर्वार्ध छठा अध्याय याजक उन यजमानों के मन से युक्त हो. वह उन यजमानों के मन प्राण से युक्त हो. वह उन यजमानों के दिव्य प्राण से युक्त हो. अग्नि व जल देव आप को शोभा युक्त बनाने की कृपा करें. वायु देव की गति एवं सूर्य की ऊर्जा परिपक्व हो. सब के विकार व द्वेष नष्ट हों. ( १८ ) घृतं घृतपावानः पिबत वसां वसापावानः पिबतान्तरिक्षस्य हविरसि स्वाहा. दिशः प्रदिश ऽ आदिशो विदिश ऽ उद्दिशो दिग्भ्यः स्वाहाः.. (१९) घी पीने वाले घी पीएं. वसा पीने वाले वसा पीएं. घी और वसा अंतरिक्ष के लिए हवि हों. घी और वसा दोनों के लिए स्वाहा. दिशा के लिए स्वाहा. प्रदिशा के लिए स्वाहा. शत्रु के लिए स्वाहा. अमर के लिए स्वाहा. सब के लिए स्वाहा. ( १९ ) ऐन्द्रः प्राणो अङ्गे अङ्गे निदीध्यदैन्द्र ऽ उदानो अङ्गे अङ्गे निधीतः. देव त्वष्टर्भूरि ते स ᳪ समेतु सलक्ष्मा यद्विषुरूपं भवाति. देवत्रा यन्तमवसे सखायोनु त्वा माता पितरो मदन्तु.. (२०) अंगअंग, प्राणप्राण व उदान में इंद्र विराजमान हैं. त्वष्टा इन सब की सुरक्षा करने की कृपा करें. इंद्र की शक्ति इन सब की सुरक्षा करने की कृपा करे. देव की शक्ति इन सब की रक्षा करने की कृपा करें. देव हमारे सखाओं का कल्याण करने की कृपा करें. देव हमारे मातापिता को आनंदित करने की कृपा करें. ( २० ) समुद्रं गच्छ स्वाहान्तरिक्षं गच्छ स्वाहा देव ᳪ सवितारं गच्छ स्वाहा मित्रावरुणौ गच्छ स्वाहाहोरात्रे गच्छ स्वाहा छन्दा ᳪ सि गच्छ स्वाहा द्यावापृथिवी गच्छ स्वाहा यज्ञं गच्छ स्वाहा सोमं गच्छ स्वाहा दिव्यं नभो गच्छ स्वाहाग्निं वैश्वानरं गच्छ स्वाहा मनो मे हार्दि यच्छ दिवं ते धूमो गच्छतु स्वर्ज्योतिः पृथिवीं भस्मनापृण स्वाहा.. (२१) यजमान द्वारा दी गई हवि समुद्र तक जाए, कल्याणकारी हो. यजमान द्वारा दी गई हवि अंतरिक्ष तक जाए, कल्याणकारी हो. यजमान द्वारा दी गई हवि सविता देव तक जाए, कल्याणकारी हो. यजमान द्वारा दी गई हवि मित्र देव तक जाए, कल्याणकारी हो. यजमान द्वारा दी गई हवि वरुण देव तक जाए, कल्याणकारी हो. यजमान द्वारा दी गई हवि दिन देव तक जाए, कल्याणकारी हो. यजमान द्वारा दी गई हवि रात्रि देव तक जाए, कल्याणकारी हो. यजमान द्वारा दी गई हवि छंद तक जाए, कल्याणकारी हो. यजमान द्वारा दी गई हवि स्वर्गलोक तक जाए, कल्याणकारी हो. यजमान द्वारा दी गई हवि पृथ्वी लोक तक जाए, कल्याणकारी हो. यजमान द्वारा दी गई हवि यज्ञ देव तक जाए, कल्याणकारी हो. यजमान द्वारा दी गई हवि सोम तक जाए, कल्याणकारी हो. यजमान द्वारा दी गई हवि नभ देव तक जाए, कल्याणकारी हो. यजमान द्वारा दी गई हवि अग्नि तक जाए, कल्याणकारी हो. यजमान द्वारा दी गई हवि वैश्वानर तक जाए, कल्याणकारी हो. देवगण हमारे मन को हार्दिक दिव्यता प्रदान करें. अग्नि का धुआं सर्वत्र जाए. अग्नि की ज्योति और भस्म पृथ्वीलोक को ७८ - यजुर्वेद
पूर्वार्ध छठा अध्याय पूर्ण करें. अग्नि की ज्योति और भस्म अंतरिक्षलोक को परिपूर्ण करें. इन अग्नि के लिए स्वाहा. (२१) मा ऽ पो मौषधीर्हि ᳵषी र्धाम्नो धाम्नो राजँस्ततो वरुण नो मुञ्च. यदाहुरघ्न्या ऽ इति वरुणेति शपामहे ततो वरुण नो मुञ्च. सुमित्रिया न ऽ आप ऽ ओषधयः सन्तु दुर्मित्रियास्तस्मै सन्तु यो ऽ स्मान् द्वेष्टि यं च वयं द्विष्मः.. (२२) यज्ञ में स्थित जल व ओषधि को अपनी जगह से मत हटाइए. यज्ञ में स्थित आप ओषधि को अपने स्थान पर रहने दीजिए. इन दोनों को वहीं सुशोभित होने दीजिए. वरुण देव हमें न छोड़ें. जो न मारने योग्य हैं, हम उन का वध न करें. हम वरुण देव की कृपा से शाप और पाप से मुक्त रहें. वे हमें न छोड़ें. जल और ओषधियां हमारी अच्छी मित्र हों. जिन से हम द्वेष रखते हैं, उन का नाश हो. जो हम से द्वेष रखते हैं, उन का नाश हो. (२२) हविष्मतीरिमा ऽ आपोहविष्माँ २ आ विवासति. हविष्मान् देवो अध्वरो हविष्माँ २ अस्तु सूर्यः.. (२३) जल वाली नदियां हविष्मती हों. जल हविष्मान हो. देव हविष्मान हों. यज्ञ हविष्मान हो. सूर्य हविष्मान हो. (२३) अग्नेर्वोपन्नगृहस्य सदसि सादयामीन्द्राग्न्योर्भागधेयी स्थ मित्रावरुणयोर्भागधेयी स्थ विश्वेषां देवानां भागधेयी स्थ. अमूर्या ऽ उप सूर्ये याभिर्वा सूर्यः सह. ता नो हिन्वन्त्वध्वरम्.. (२४) अग्नि देवताओं तक हवि भाग पहुंचाते हैं. वे इंद्र देव तक हवि भाग पहुंचाते हैं. वे मित्र देव तक हवि भाग पहुंचाते हैं. वे वरुण देव तक हवि भाग पहुंचाते हैं. वे सभी देवों तक हवि भाग पहुंचाते हैं. भाप बना कर जो जल सूर्य ऊपर बहुत समय तक साथ रखते हैं, उस जल से हमारे यज्ञ को सफल बनाने की कृपा करें. (२४) हृदे त्वा मनसे त्वा दिवे त्वा सूर्याय त्वा. ऊर्ध्वमिममध्वरं दिवि देवेषु होत्रा यच्छ.. (२५) हे देवगण! आप हृदय, मन, स्वर्ग और सूर्य में हैं. आप यज्ञ को ऊंचा उठाएं. यजमान को दिव्यता दें. यजमान को स्वर्ग दें.(२५) सोम राजन् विश्वास्त्वं प्रजा ऽ उपावरोह विश्वास्तवां प्रजा ऽ उपावरोहन्तु. शृणोत्वग्निः समिधा हवं मे शृण्वन्त्वापो धिषणाश्च देवीः. श्रोता ग्रावाणो विदुषो न यज्ञ ᳵँ शृणोतु देवः सविता हवं मे स्वाहा.. (२६) हे सोम! आप सब के राजा हैं. आप प्रजा पर अनुग्रह करने की कृपा करें. अग्नि यजुर्वेद - ७९
पूर्वार्ध छठा अध्याय समिधा से प्रज्वलित हैं. अग्नि हमारी स्तुतियां सुनने की कृपा करें. हम उन के लिए हवि समर्पित करते हैं. जल देव हमारी स्तुतियां सुनने की कृपा करें. हम उन के लिए हवि समर्पित करते हैं. बुद्धि की देवी हमारी स्तुतियां सुनने की कृपा करें. हम उन के लिए हवि समर्पित करते हैं. विद्वान् यज्ञ में स्तुतियां पढ़ते हैं. सविता देव उन्हें सुनने की कृपा करें. उन के लिए यह आहुति समर्पित हैं. ( २६ ) देवीरापो अपां नपाद्यो व ऽ ऊर्मिर्हविष्य ऽ इन्द्रियावान् मदिन्तमः. तं देवेभ्यो देवत्रा दत्त शुक्रपेभ्यो येषां भाग स्थ स्वाहा.. (२७) दिव्य जल! आप के लहरदार प्रवाह इंद्रियों की शक्ति बढ़ाने वाले हैं. आप के लहरदार प्रवाह आनंददायी हैं. उस जल को देवों व रक्षक के लिए समर्पित कीजिए. उसे वीर्य बढ़ाने के लिए समर्पित कीजिए. इस में आप का भी एक भाग है. इन सब के लिए स्वाहा. ( २७ ) कार्षिरसि समुद्रस्य त्वा क्षित्या ऽ उन्नयामि. समापो अद्भिर्गमत समोषधीभिरोषधीः.. ( २८) समुद्र तक पृथ्वी की उर्वरता के लिए आप को ऊपर की ओर उठाते हैं. इस जल के साथ जलों को मिला कर ओषधियां उत्पन्न होती हैं. ओषधियों को भी ओषधि के साथ मिलाया जाता है. ( २८ ) यमग्ने पृत्सु मर्त्यमवा वाजेषु यं जुनाः. स यन्ता शश्वतीरिषः स्वाहा.. (२९) हे अग्नि! आप जिन यजमानों के पास से देवताओं तक हवि पहुंचाते हैं, वे लोग आप की कृपा से यज्ञ करते हैं. वे यजमान शाश्वत (स्थायी) और इष्ट धन को प्राप्त करते हैं. अग्नि के लिए स्वाहा. ( २९ ) देवस्य त्वा सवितुः प्रसवेश्विनोर्बाहुभ्यां पूष्णो हस्ताभ्याम्. आ ददे रावासि गभीरमिममध्वरं कृधीन्द्राय सुषूतमम्. उत्तमेन पविनोर्जस्वन्तं मधुमन्तं पयस्वन्तं निग्राभ्या स्थ देवश्रुतस्तर्पयत मा मनो मे.. (३०) हम यजमान सूर्योदय के समय यज्ञ के साधन को अश्विनीकुमारों के हाथों में ग्रहण कराते हैं. अग्नि के लिए स्वाहा. पूषा देव के लिए स्वाहा. आप इच्छापूरक हैं. हम इंद्र देव के लिए यज्ञ करना चाहते हैं. हम उन के लिए यज्ञ को ऊर्जस्वी पदार्थों से पवित्र करते हैं. हम उन के लिए यज्ञ को रसीले और पवित्र पदार्थों से पवित्र करते हैं. वे हवि को भलीभांति ग्रहण करने की कृपा करें. आप हमें तृप्ति प्रदान करने की कृपा करें. ( ३० ) मनो मे तर्पयत वाचं मे तर्पयत प्राणं मे तर्पयत चक्षुर्मे तर्पयत श्रोत्रं मे तर्पयतात्मानं मे तर्पयत प्रजां मे तर्पयत पशून्मे तर्पयत गणान्मे तर्पयत गणा मे मा वितृषन्.. (३१) ८० - यजुर्वेद 632/5
पूर्वार्ध छठा अध्याय
पूर्वार्ध छठा अध्याय हे जल समूह! आप हमारे मन, वचन, प्राण को तृप्त कीजिए. आप हमारे नेत्रों व कानों को तृप्त कीजिए. आप हमारी आत्मा, प्रजा को तृप्त कीजिए. आप हमारे पशुओं व हमारे सेवकों को तृप्त कीजिए. हम आप के बिना कभी भी प्यासे न हों. ( ३१ ) इन्द्राय त्वा वसुमते रुद्रवत ऽ इन्द्राय त्वादित्यवत ऽ इन्द्राय त्वाभिमातिघ्ने. श्येनाय त्वा सोमभृतेग्नये त्वा रायस्पोषदे.. ( ३२) हे सोम! हम इंद्र देव के लिए आप को ग्रहण करते हैं. हम वसुमान के लिए आप को ग्रहण करते हैं. हम रुद्र समान के लिए आप को ग्रहण करते हैं. हम आदित्य के समान के लिए आप को ग्रहण करते हैं. हम शत्रुनाशक के लिए आप को ग्रहण करते हैं. हे सोम! हम आप को पीने के लिए बाज की तरह झपटने वाले इंद्र देव के लिए ग्रहण करते हैं.हम भरणपोषण कर्ता के लिए बाज की तरह ग्रहण करते हैं. हम धनदाता, पोषणदाता अग्नि के लिए ग्रहण करते हैं. ( ३२ ) यत्ते सोम दिवि ज्योतिर्यत्पृथिव्यां यदुरावन्तरिक्षे. तेनास्मै यजमानायोरु राये कृध्यधि दात्रे वोचः.. ( ३३) हे सोम! आप स्वर्गलोक व अंतरिक्षलोक तक फैले हुए हैं. आप दिव्य व प्रकाशमान हैं. आप यजमान के लिए धन धारिए, धन दीजिए, आप यजमान की सहायता कीजिए. ( ३३ ) श्वात्रा स्थ वृत्रतुरो राधोगूर्ता ऽ अमृतस्य पत्नीः. ता देवीर्देवत्रेमं यज्ञं नयतोपहूताः सोमस्य पिबत.. ( ३४) देवियां (सोम रूपी) अमृत की पत्नी हैं वे कल्याणकारी वृत्र नाशक व धनदायक हैं. आप इस यज्ञ की रक्षा करें. आप इस यज्ञ का मार्ग निर्देशन करें. आप इस यज्ञ में सोमरस का पान करने की कृपा करें. ( ३४ ) मा भेर्मा सं विक्था ऽ ऊर्जं धत्स्व धिषणे वीड्वी सती वीडयेथामूर्जं दधाथाम्. पाप्मा हतो न सोमः.. ( ३५) हे सोम! आप का रस निकालते समय आप को पत्थरों से कूटा जाता है. आप उस से भयभीत मत होइए. आप चंद्रमा जैसे शीतल और समर्थ हैं. आप सब के पाप और कपट दूर करने की कृपा कीजिए. ( ३५ ) प्रागपागुदगधराक्सर्वतस्त्वा दिश ऽ आधावन्तु. अम्ब निष्पर समरीर्विदाम्.. (३६) हे सोम! आप पूर्व, पश्चिम, उत्तर एवं दक्षिण दिशा में अपने भाग को ग्रहण कर के दौड़ते हुए यज्ञ में आइए. आप इस तरह यज्ञ को भलीभांति जानने की कृपा कीजिए. ( ३६ ) यजुर्वेद - ८१
पूर्वार्ध छठा अध्याय त्वमङ्ग प्रशं १४ सिषो देवः शविष्ठ मर्त्यम्. न त्वदन्यो मघवन्नस्ति मर्डितेन्द्र ब्रवीमि ते वचः.. (३७) हे इंद्र! आप प्रशंसित, शक्तिमान, दिव्य हैं व सुखदायी हैं. आप जैसा धनदायी कोई और देव नहीं है. हम आप के कृपा वचनों के आधार पर ही ऐसा कहते हैं. ( ३७ ) ८२ - यजुर्वेद