योगवाशिष्ठ महारामायण
Yog Vashishta Maha Ramayan
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)
उत्पत्ति प्रकरण । ۲७३
जब निकट होकर देखे तब सर्पभ्रम मिट जाता है रस्सी ही भासती है; तैसे ही आत्मा का निवृत्तरूप जगत् है; जब बहिर्मुख होकर देखता है तब जगत् ही भासता है जब अन्तर्मुख होकर देखता है तब जगत् श्रम मिटकर आत्मा ही भासता है। हे रामजी ! जिसमें अभिलाषा हो उसको त्याग दे। ऐसे निश्चय से मुक्ति प्राप्त होती है। त्याग का यत्न कुछ नहीं। महात्मा पुरुष प्राणों को तृण की नाईं त्याग देते हैं और बड़े दुःख को सह लेते हैं। तुमको अभिलाषा त्यागने में क्या कठिनता है? हे रामजी ! आत्मा के आगे अभिलाषा ही आवरण है। अभिलाषा के होते आत्मा नहीं भासता है। जैसे बादलों के आवरण से सूर्य नहीं भासता और जब बादलों का आवरण नष्ट होता है तब सूर्य भासता है; तैसे ही अभिलाषा के निवृत्त हुए आत्मा भासता है। इससे जो कुछ अभिलाषा उठे उसको त्यागो और निरभिलाषा होकर आत्मपद में स्थित हो। प्रकृत आचार देह और इन्द्रियों में ग्रहण करो और जो कुछ त्याग करना हो उसको त्याग करो; पर देह में ग्रहण और त्याग की बुद्धि न हो। हे रामजी ! जो तुम सम्पूर्ण दृश्य की इच्छा त्यागोगे तो जैसे हाथ में बेलफल प्रत्यक्ष होता है और जैसे नेत्रों के आगे प्रतिबिम्ब प्रत्यक्ष भासता है; तैसे ही अभिलाषा के त्याग से आत्मपद तुमको प्रत्यक्ष भासेगा और सब जगत् भी आत्मरूप ही भासेगा। जैसे महाप्रलय में सब जगत् जल में भासता है और कुछ दृष्टि ही नहीं आता तैसे ही आत्मपद से भिन्न तुमको कुछ न भासेगा। आत्मतत्त्व को न जानने का ही नाम बन्धन है और आत्मपद का जानना ही मोक्ष है और मोक्ष कोई नहीं।
इति श्रीयोगवाशिष्ठे उत्पत्तिप्रकरणे संश्रितउपशमयोगोनामकौन-पञ्चाशत्तमस्सर्गः ॥ ४९ ॥
रामजी ने पूछा, हे भगवन् ! मन क्योंकर उत्पन्न हुआ है? वशिष्ठजी बोले, हे रामजी ! ब्रह्म अनन्तशक्ति है और उसमें अनेक प्रकार का किचन होता है। जहाँ जहाँ जैसी जैसी शक्ति फुरती है वहाँ वहाँ वैसा ही रूप होकर भासता है। जब शुद्ध चिन्मात्रसत्ता चेतन में फुरती है कि 'अहं अस्मि' तब उस फुरने से जीव कहलाता है। वही चित्शक्तिसंकल्प का कारण भासती
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है । जब वह दृश्य की ओर फुरती है तब जगत् दृश्य होकर भासता है और नाना प्रकार के कार्य कारण हो भासते हैं । रामजी ने फिर पूछा कि हे मुनियों में श्रेष्ठ ! जो इस प्रकार है तो देव किसका नाम है, कर्म क्या है और कारण किसको कहते हैं ? वशिष्ठजी बोले, हे रामजी ! फुरना अफुरना दोनों चिन्मात्रसत्ता के स्वभाव हैं । जैसे फुरना अफुरना दोनों वायु के स्वभाव हैं परन्तु जब फुरता है तब आकाश में स्पर्श होकर भासता है और जब चलने से रहित होता है तब शान्त हो जाता है; तैसे ही शुद्ध चिन्मात्र में जब चैतन्यता का लक्षण, 'अहं अस्मि' अर्थात् 'मैं हूँ' होता है तब उसका नाम 'स्पन्द बुद्धीश्वर' कहते हैं । उसमें जगत् दृश्य रूप हो भासता है । उस जगत् दृश्य से रहित होने को निस्पन्दन कहते हैं । चित्त के फुरने से नाना प्रकार जगत् हो भासता है और चित्त के अफुर हुए जगद्भ्रम मिट जाता है और नित्य शान्त ब्रह्मपद की प्राप्ति होती है । हे रामजी ! जीव कर्म और कारण ये सब चित्तस्पन्दन के नाम हैं और चित्तस्पन्दन में भिन्न अनुभव नहीं, अनुभव ही चित्तस्पन्दन हुए की नाईं भासता है । जीव कर्म और कारण का बीजरूप चित्तस्पन्द ही है । चित्तस्पन्द से दृश्य होकर भासता है, फिर चिदाभास द्वारा देह में अहं प्रतीति होती है और उस देह में स्थित होकर चित्तसंवेदन दृश्य की ओर संसरता है । संसरना दो प्रकार का होता है-एक बड़ा और दूसरा अल्प । कितनों को संसरने में अनेक जन्म व्यतीत होते हैं और कितनों को एक जन्म होता है । आदि ही जो फुरकर स्वरूप में स्थित हैं उनको प्रथम जन्म होता है और जो आदि उपजकर प्रमादी हुए हैं सो फुरकर दृश्य की ओर चले जाते हैं और उनके बहुतेरे जन्म होते हैं । चित्त के फिरने से ऐसा अनुभव करते हैं । पुण्यक्रिया करके स्वर्ग में जाते हैं और पापक्रिया करके नरक में जाते हैं । इस प्रकार दृश्यभ्रम देखते हैं और अज्ञान से बन्धन में रहते हैं । जब ज्ञान की प्राप्ति होती तब मोक्ष का अनुभव करते हैं सो बड़ा संसरना है और जो एक ही जन्म पाकर आत्मा की ओर आते हैं वह अल्प संसरना है । हे रामजी ! जैसे स्वर्ण ही भूषणरूप धारण करता है तैसे ही संवेदन ही काष्ठलोष्ट आदिक रूप होकर भासता है । इस चित्त का संयोग
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से ही अज और अविनाशी पुरुष को नाना प्रकार के देह प्राप्त होते हैं और जानता है कि मैं अब उपजा, अब जीता हूँ फिर मर जाऊँगा । जैसे नौका में बैठे भ्रम से तट के वृक्ष भ्रमते दीखते हैं तैसे ही भ्रम से अपने में जन्मादि अवस्था भासती हैं । आत्मा के अज्ञान से जीव को 'अहं' आदि कल्पना फुरती हैं । जैसे मथुरा के राजा लवण को स्वप्न में चाण्डाल का भ्रम हुआ था तैसे ही चित्त के फुरने से जीव जगद्भ्रम देखते हैं । हे रामजी ! यह सब जगत् मन के भ्रम से भासता है । शिव जो परम तत्त्व है सो चिन्मात्र है; उसमें जब चैत्योन्मुखत्व होता है कि 'मैं हूँ' उसका ही नाम जीव है । जैसे सोमजल में द्रवता होती है, इससे उसमें चक्र फुरते हैं और तरङ्ग होते हैं; तैसे ही ब्रह्मरूपी सोमजल में जीवरूपी चक्र फुरते हैं और चित्तरूपी तरङ्ग उदय होते हैं और सृष्टिरूपी बुद्बुदे उपजकर लीन हो जाते हैं । हे रामजी ! चेतन स्फूर्ति द्वारा जीव की नाईं भासता है । जैसे समुद्र ही द्रवता से तरङ्गरूप हो भासता है; तैसे ही चित्त चैत्य के संयोग से जीव कहाता है । उस जीव में जब संकल्प का फुरना होता है तब मन कहाता है; जब संकल्प निश्चय रूप होता है तब बुद्धि होकर स्थित होता है और जब अहंभाव होता है तब अहं-प्रतिकार कहाता है । उस अहंभाव को पाकर तन्मात्रा की कल्पना होती है और पृथ्वी, जल, तेज, वायु और आकाश ये सूक्ष्म भूत होते हैं—उनके पीछे जगत् होता है । हे रामजी ! असतरूपी चित्त के संसरने से ही जगत्रूप हो भासता है । जैसे नेत्रदूषण से आकाश में मुक्तमाला; भ्रममात्र गन्धर्वनगर और स्वप्नभ्रम से स्वप्नजगत् भासते हैं तैसे ही चित्त के संसरने से जगद्भ्रम भासता है । हे रामजी ! शुद्ध आत्मा नित्य, तृप्त, शान्तरूप, सम और अपने आप ही में स्थित है । उसमें चित्तसंवेदन ने जगत् रचा है और उसको भ्रम से सत्य की नाईं देखता है । जैसे स्वप्न सृष्टि को मनुष्य भ्रम से देखता है; तैसे ही यह जगत् फुरने से सत्य भासता है । हे रामजी ! मन के संसरने का नाम जाग्रत् है; अहंकार का नाम स्वप्न है; चित्त जो सजातीयरूप चेतनेवाला है उसका नाम सुषुप्ति है और चिन्मात्र का नाम तुरीयपद है । जब शुद्ध चिन्मात्र में अत्यन्त
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परिणाम हो तब उसका नाम तुर्यातीत पद है । उसमें स्थित हुआ फिर शोकवान् कदाचित् नहीं होता । उसी ब्रह्मसत्ता से सब उदय होते हैं और उस ही में सब लीन होते हैं और वास्तव में न कोई उपजा है और न कोई लीन होता है; चित्त के फुरने से ही सब भ्रम भासता है । जैसे नेत्र-दूषण से आकाश में मुक्तमाला भासती है तैसे ही चित्त के फुरने से यह जगत् भासता है । हे रामजी ! जैसे वृक्ष के बढ़ने को आकाश ठौर देता है कि जितनी बीज की सत्ता हो उतना ही आकाश में बढ़ता जावे तैसे ही सबको आत्मा ठौर देता है । अकर्त्तारूप भी संवेदन से भासता है । हे रामजी ! जैसे निर्मल किया हुआ लोहा आरसी की नाईं प्रतिबिम्ब ग्रहण करता है तैसे ही आत्मा में संवेदन से जगत् का प्रतिबिम्ब होता है; पर वास्तव में जगत् भी कुछ दूसरी वस्तु नहीं है । जैसे एक ही बीज, पत्र, फूल, फल और टास हो भासता है तैसे ही आत्मा संवेदन से नानारूप जगत् हो भासता है । जैसे पत्र और फूल वृक्ष से भिन्न नहीं होते तैसे ही अबोधरूप जगत् भी बोधरूप आत्मा से भिन्न नहीं । जो ज्ञानवान् है उसको अखण्डसत्ता ही भासती है । जैसे समुद्र ही तरङ्ग और बुद्बुदे होकर और बीज ही पत्र, फूल, फल और टास होकर भासते हैं; तैसे ही अज्ञानी को भिन्न-भिन्न नामरूपसत्ता भासती है । 'मूर्ख' जो देखता है तो उनके नामरूप सत् मानता है ज्ञानवान् देखके एक रूप ही जानता है । ज्ञानवान् को एक ब्रह्मसत्ता ही अनन्त भासती है और जगद्भ्रम उनको कोई नहीं भासता है । इतना सुन रामजी ने कहा; बड़ा आश्चर्य है कि असतरूपी जगत् सत् होकर बड़े विस्तार से स्पष्ट भासता है । यह जगत् ब्रह्म का आभास है; अनेक तन्मात्रा उसके जल और बँदों की नाईं हे और अविद्या करके फुरती है । ऐसा भी मैंने सुना है । हे मुनीश्वर ! यह स्फूर्त्ति बहिर्मुख कैसे होती है और अन्तर्मुख कैसे होती है ? वशिष्ठजी बोले, हे रामजी ! इस प्रकार का दृश्य का अत्यन्त अभाव है । अनहोते दृश्य के फुरने से अनुभव होता है । शुद्ध चिन्मात्र ब्रह्मसत्ता में फुरने से जो जीवत्व हुआ है वह जीवत्व असत् है और सत् की नाईं होता है । जीव ब्रह्म से अभिन्न है पर फुरने से भिन्न की नाईं स्थित होता है । उस जीव में
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जब संकल्प कलना होती है तब मन रूप होके स्थित होता है; स्मरण करके चित्त होता है, निश्चय करके बुद्धि होती है और अहंभाव करके अहंकार होता है । फिर काकताला की नाईं चिद्अणु में तन्मात्रा फुर आती है । जब शब्द सुनने की इच्छा हुई तब श्रवण इन्द्रिय प्रकट हुई; जब देखने की इच्छा हुई तब नेत्र इन्द्रिय प्रकट हुई; गन्ध लेने की इच्छा से नासिका इन्द्रिय प्रकट हुई; स्पर्श की इच्छा से त्वचा इन्द्रिय प्रकट हुई और रस लेने की इच्छा से रसना इन्द्रिय प्रकट हुई । इस प्रकार पाँचों इन्द्रियाँ प्रकट हुई हैं और भावना से सत् ही असत् की नाईं भासने लगा । हे रामजी ! इस प्रकार आदि जीव हुए हैं और उनकी भावना से अन्तर्वाहक शरीर हो आये हैं । चलते भासते हैं पर अचलरूप हैं, इससे जो कुछ जगत् भासता है वह सब ब्रह्मस्वरूप है भिन्न कुछ नहीं । प्रमाता, प्रमाण और प्रमेय ब्रह्म है और संवेदन ब्रह्म से ही अनेकरूप नाना प्रकार के भासते हैं । जैसा जैसा संवेदन फुरता है तैसा तैसा रूप होकर भासता है । जब दृश्य को चेतता है तब नाना प्रकार का दृश्य भासता है और जब अन्तर्मुख ब्रह्म चेतता है तब ब्रह्मरूप होकर भासता है । हे रामजी ! दृश्य कुछ उपजा नहीं, आत्मा सदा अपने आप में स्थित है । जब दृश्य असंभव हुआ तब बन्धन और मोक्ष किसको कहिये और विचार किसका कीजिये ? सर्वकल्पना का अभाव है । यह जो तुम्हारा प्रश्न है उसका उत्तर सिद्धान्तकाल में होगा यहाँ न बनेगा । जैसे कमल के फूलों की माला अपने काल में बनती है और बिना समय शोभा नहीं देती तैसे ही तुम्हारा प्रश्न सिद्धान्तकाल में शोभा पावेगा; समय बिना सार्थक शब्द भी निरर्थक होता है । हे रामजी ! जो कुछ पदार्थ हैं उनका फल भी समय पाके होता है; समय बिना नहीं होता इससे अब पूर्व प्रसंग सुनो । हे रामजी ! ब्रह्म में चैत्योन्मुखत्व से आदि जीव ने आपको पिता, माता जाना । जैसे स्वप्न में आपको कोई देखे तैसे ही ब्रह्माजी ने आपको जाना । उन ब्रह्मा ने प्रथम "ॐ" शब्द उच्चारण किया; उस शब्द तन्मात्रा से चारों वेद देखे और उसके अनन्तर मनोराज से सृष्टि रची । तब असतरूप सृष्टि भावना से सत्य होकर भासने लगी । जैसे स्वप्न में सर्प और गन्धर्वनगर भासते हैं
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तेसे ही असत्यरूप सृष्टि सत्य भासने लगी । हे रामजी ! ब्रह्मसत्ता में जैसे ब्रह्मा आदिक उपजे हैं वैसे ही और जीव, कीट आदि भी उत्पन्न हुए । जगत् का कारण संवेदन है । संवेदन भ्रम से जीवों को जगत् भासता है । उनको भौतिक शरीर में जो अहं प्रतीति हुई है उससे अपने निश्चय के अनुसार शक्ति हुई । ब्रह्मा में ब्रह्मा की शक्ति का निश्चय हुआ और चींटी में चींटी की शक्ति का निश्चय हुआ । हे रामजी ! जैसी जैसी वासना संवित् में होती है उसके अनुसार ही अनुभव होता है । शुद्ध चिन्मात्र में जो चैत्योन्मुखत्व हुआ उसी का नाम जीव हुआ । उसमें जो ज्ञानरूप सत्ता है सोई पुरुष है और जो फुरना है सोई कर्म है । जैसे जैसे फुरता है तैसे ही तैसे भासता है । हे रामजी ! आत्मसत्ता में जो अहं हुआ है उसी का नाम चित्त है उससे जो जगत् रचा है वह भी अविचारसिद्ध है; विचार करने से नष्ट हो जाता है । जैसे अविचार से अपनी परछाहीं में भूत पिशाच कल्पता है और उससे भय उत्पन्न होता है पर विचार करने से पिशाच और भय दोनों नष्ट हो जाते हैं; तैसे ही हे रामजी ! आत्मविचार से चित्त और जगत् दोनों नष्ट हो जाते हैं । हे रामजी ! ब्रह्म सत्ता सदा अपने आपमें स्थित है; उसमें चित्त कल्पना कोई नहीं और प्रमाता, प्रमाण, प्रमेय भी ब्रह्म से भिन्न नहीं तो द्वैत की कल्पना कैसे हो ? जैसे शशे के शृङ्ग असत् हैं; तैसे आत्मा में द्वैतकल्पना असत्य है । हे रामजी ! यह ब्रह्माण्ड भावनामात्र है । जिसको सत्य भासता है उसको बन्धन का कारण है । जैसे घुरान अर्थात् कुशावारी अपना गृह अपने बन्धन का कारण बनाती है और उसमें फँस मरती है; तैसे ही जो जगत् को सत्य मानते हैं उनको अपना मानना ही बन्धन करता है और उससे जन्म मरण देखते हैं । जिसको जगत् का असत्य निश्चय हुआ है उसको बन्धन नहीं होता—उसको उल्लास है । हे रामजी ! अनुभवसत्ता सबका अपना आप है । उसमें जो जैसा निश्चय किया उसको अपने अनुभव के अनुसार पदार्थ भासते हैं । वास्तव में तो जगत् उपजा ही नहीं । जगत् का उपजना भी मिथ्या है; बढ़ना भी मिथ्या है; रस भी मिथ्या है और रस लेनेवाला भी मिथ्या है । शुद्धब्रह्म सर्वगत, नित्य और अद्वैत सदा
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अपने आपमें स्थित है, परन्तु अज्ञान से शुद्ध भी अशुद्ध भासता है; सर्व जगत् भी परिच्छिन्न भासता है, ब्रह्म भी अब्रह्म भासता है; नित्य भी अनित्य भासता है और अद्वैत भी द्वैतसहित भासता है। हे रामजी ! अज्ञान से ऐसा भासता है। जैसे जल और तरङ्ग में मूर्ख भेद मानते हैं परन्तु भेद नहीं; तैसे ही ब्रह्म और जगत् में भेद अज्ञानी देखते हैं। जैसे सुवर्ण में भूषण और रस्सी में सर्प मूर्ख देखते हैं; तैसे ही ब्रह्म में नानात्व मूर्ख देखते हैं; ज्ञानी को सब चिदाकाश है। हे रामजी ! जब आत्मसत्ता में अनात्मरूप दृश्य की चैतन्यता होती है तब कल्पना उत्पन्न होती है और मनरूप होके स्थित होती है उसके अनन्तर अहंभाव होता है और फिर तन्मात्र की कल्पना होकर शब्द अर्थ की कल्पना होती है। इसी प्रकार चित्तसत्ता में जैसी जैसी चैतन्यता फुरती है तैसा ही तैसा रूप भासने लगता है। सत् असत् पदार्थ वासना के वश फुर आते हैं। जैसे स्वप्नसृष्टि फुर आती है सो अनुभवरूप ही होती है वैसे यह जगत् फुर आया है सो अनुभवस्वरूप है। इससे सृष्टि में भी चिन्मात्र है और चिन्मात्र ही में सृष्टि है। सबको सत्तारूपी भीतर बाहर ऊर्ध्व अधः चिन्मात्र ही है। प्रमाता, प्रमाण और प्रमेय सब पद चिन्मात्र ही में धारे हैं, नित्य उपशान्तरूप है, समसत् जगत् की सत्ता उससे ही होती है सो एक ही सम है और तुरीया अतीतपद नितही स्थित है।
" इति श्रीयोगवाशिष्ठे उत्पत्तिप्रकरणे सत्योपदेशो नाम
पञ्चाशत्तमस्सर्गः ॥ ५० ॥
वशिष्ठजी बोले, हे रामजी ! इस प्रसङ्ग पर एक पुरातन इतिहास है और उसमें महा प्रश्नों का समूह है सो सुनो। काजल के पर्वत की नाईं कर्कटी नाम एक महाश्याम राक्षसी हिमालय पर्वत के शिखर पर हुई। विसूचिका भी उसका नाम था। अस्थिर बिजली की नाईं उसके नेत्र और अग्नि की नाईं बड़ी जिह्वा चमत्कार करती थी और उसके बड़े नख और ऊँचा शरीर था जैसे बड़वाग्नि तृप्त नहीं होता तैसे ही वह भी भोजन से तृप्त न होती थी। उसके मन में विचार उपजा कि जम्बूद्वीप के सम्पूर्ण जीवों को भोजन करूँ तो तृप्त होऊँ अन्यथा मेरी तृप्ति नहीं
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होती । आपदा उद्यम किये से दूर होती है, इससे मैं अखण्डचित्त होकर तप करूँ । हे रामजी ! ऐसा विचारकर वह एकान्त हिमालय पर्वत की कन्दरा में एक टाँग से स्थिर हुई और दोनों भुजाओं को उठाके नेत्र आकाश की ओर किये मानों मेघ को पकड़ती है । शरीर और प्राणों को स्थिर करके मूर्ति की नाईं हो गई शीत और उष्ण के क्षोभ से रहित हुई और पवन से शरीर जर्जरी भूत हुआ । जब इस प्रकार सहस्रवर्ष दारुण तप किया तब ब्रह्माजी आये और राक्षसी ने उन्हें देखके मद से नमस्कार किया और मन में विचारा कि मेरे वर देने के निमित्त यह आये हैं तब ब्रह्माजी ने कहा, हे पुत्री ! तूने बड़ा तप किया अब उठ खड़ी हो और जो कुछ चाहती है वर माँग । कर्कटी बोली, हे भगवन् ! मैं लोहे की नाईं वज्रसूचिका होऊँ जिससे जीवों के हृदय में प्रवेश कर जाऊँ । हे रामजी ! जब ऐसे उस मूर्ख राक्षसी ने वर माँगा तब ब्रह्माजी ने कहा ऐसे ही हो तेरा नाम भी प्रसिद्ध विसूचिका होगा । हे राक्षसी ! जो दुराचारी जीव होंगे उनके हृदय में तू प्राणवायु के मार्ग से प्रवेश करेगी और जो गुणवान् तेरे निवृत्त करने के निमित्त 'ॐ' मन्त्र पढ़ेंगे और यह पढ़ेंगे कि हिमालय के उत्तर शिखर में कर्कटी नाम राक्षसी विसूचिका है सो दूर हो और विसूचिका का दुःखी चन्द्रमा के मण्डल में चित्तवे कि अमृत के कुण्ड में बैठा है और राक्षसी हिमालय के शिखर को गई तब तू उनको त्याग जाना । उनमें तू प्रवेश न कर सकेगी । हे रामजी ! इस प्रकार कहके ब्रह्माजी आकाश को उड़े और इन्द्र और सिद्धों के मार्ग से गये और वही मन्त्र उनको भी सुनाया । जब उन्होंने उस मन्त्र को प्रसिद्ध किया तब कर्कटी का शरीर सूक्ष्म होने लगा । जैसे संकल्प का पहाड़ संकल्प के क्षीण होने से क्षीण हो जाता है तैसे ही क्रम से प्रथम जो उसका मेघवत् आकार था सो घटकर वृक्षवत् हो गया । फिर वह पुरुषरूप हो गई; फिर हस्तमात्र; फिर प्रदेशमात्र और फिर लोहे की सुई की नाईं सूक्ष्म हो गई । हे रामजी ! ऐसे रूप को कर्कटी ने धारा जिसको देख मूर्ख अविचारी पुरुष तृण की नाईं शरीर को त्यागते हैं । जो पुरुष परस्पर की विचारते हैं सो पीछे से कष्ट नहीं पाते और जो पूर्वापर विचार
उत्पत्ति प्रकरण । २८१
से रहित हैं सो पीछे कष्ट पाते हैं और अनर्थ करके औरों को कष्ट देते हैं। वे एक पदार्थ को केवल भला जानके उसके निमित्त यत्न करते हैं न धर्म की ओर देखते हैं और न सुख की ओर देखते हैं। इस प्रकार मूर्ख राक्षसी ने भोजन के निमित्त बड़े गम्भीर शरीर को त्याग कर तुच्छ शरीर को अंगीकार किया। उसका एक शरीर तो सूक्ष्म हुआ और दूसरा पुर्यष्टक हुआ। कहीं तो सूक्ष्म शरीर से, जिसको इन्द्रियाँ भी न ग्रहण कर सकें, प्रवेश करे और कहीं पुर्यष्टक से जा प्रवेश करे। कहीं प्राणवायु के साथ प्रवेश करके दुःख दे और कहीं प्राणी को विपर्यय करे तब प्राणी कष्ट पावें और कहीं रक्त आदिक रसों का पानकर एक बूंद से उदर पूर्ण हो जावे परन्तु तृष्णा निवृत्त न हो। जब शरीर से बाहर निकले तब भी कष्ट पावे और वायु चले उससे गढ़े और कीचड़ में गिरे और चरणों के तले आवे। निदान कभी देशों में रहे और कभी घास और तृणों में रहे जो नीच पापी जीव हैं उनको कष्ट दे और जो गुण-वान् हों उनको कष्ट न दे सके। मन्त्र पढ़ने से निवृत्त हो जावे। जो आप किसी छिद्र में भी गिरे तो जाने कि मैं बड़े कूप में गिरी। हे रामजी! मूर्खता से उसने इतने कष्ट पाये। इतना कहकर वाल्मीकिजी बोले कि इस प्रकार जब वशिष्ठजी ने कहा तब सूर्य अस्त होकर सायं-काल का समय हुआ तब सब सभा परस्पर नमस्कार करके स्नान को गई और विचारसंयुक्त रात्रि व्यतीत करके सूर्य की किरणों के निकलते ही फिर आ उपस्थित हुई।
इति श्रीयोगवाशिष्ठे उत्पत्तिप्रकरणे विसूचिकाव्यवहार-वर्णनन्नामेकपञ्चाशत्तमस्सर्गः॥ ५१ ॥
वशिष्ठजी बोले, हे रामजी! जब इस प्रकार प्राणियों को मारते उसे कुछ वर्ष बीते तब उसके मन में विचार उत्पन्न हुआ कि बड़ा कष्ट है! बड़ा कष्ट!! यह विसूचिका शरीर मुझको कैसे प्राप्त हुआ है !!! मैंने मूर्खता से यह वर ब्रह्माजी से माँगा था। मूर्खता बड़े दुःख को प्राप्त करती है। कैसा मेघ की नाईं मेरा शरीर था कि सूर्यादिक को ढाँक लेती थी। हाय, मन्दराचल पर्वत की नाईं मेरी उदर और बड़वाग्नि
२८२ योगवाशिष्ठ ।
की नाईं मेरी जीभ कहाँ गई ? जैसे कोई अभागी पुरुष चिन्तामणि को त्याग दे और काँच अङ्गीकार करे तैसे ही मैंने बड़े शरीर को त्याग के तुच्छ शरीर को अङ्गीकार किया जो एक बूँद से ही तृप्त हो जाता है परन्तु तृष्णा पूरी नहीं होती । उस शरीर से मैं निर्भय विचरती थी यह शरीर पृथ्वी के कण से भी दब जाता है । अब तो मैं बड़े कष्ट पाती हूँ यदि मैं मृतक हो जाऊँ तो छूटूँ, परन्तु माँगी हुई मृत्यु भी हाथ नहीं आती इससे मैं फिर शरीर के निमित्त तप करूँ । वह कौन पदार्थ है जो उद्यम करने से हाथ न आवे । हे रामजी ! ऐसे विचारकर वह फिर हिमालय पर्वत के निर्जनस्थान वन में जा एक टाँग से खड़ी हुई और ऊर्ध्वमुख करके तप करने लगी । हे रामजी ! जब पवन चले तो उसके मुख में फल, मांस और जल के कणके पड़ें परन्तु वह न खाय बल्कि मुख मूँद ले । पवन यह दशा देख के आश्चर्यवान् हुआ कि मैंने सुमेरु आदि को भी चलायमान किया है परन्तु इसका निश्चय चलायमान नहीं होता निदान मेघ की वर्षा से वह कीचड़ में दब गई परन्तु ज्यों की त्यों ही रही और मेघ के बड़े शब्द से भी चलायमान न हुई । हे रामजी ! इस प्रकार सहस्र वर्ष उसको तप करते बीते तब दृढ़ वैराग्य से उसका चित्त निर्मल हुआ और सब सङ्कल्पों के त्याग से उसको परमपद की प्राप्ति हुई; बड़े ज्ञान का प्रकाश उदय हुआ और परब्रह्म का उसको साक्षात्कार हुआ उससे परमपावनरूप होकर चित्तसूची हुई अर्थात् चेतन में एकत्वभाव हुआ । जब उसके तप से सातों लोक तपायमान हुए तब इन्द्र ने नारद से प्रश्न किया कि ऐसा तप किसने किया है जिससे लोक जलने लगे हैं? तब नारदजी ने कहा, हे इन्द्र ! कर्कटी नाम राक्षसी ने सात हजार वर्ष बड़ा कठिन तप किया । जिससे वह विसूचिका हुई । वह शरीर पा उसने बहुत कष्ट पाया और लोगों को भी कष्ट दिया । जैसे विराट् आत्मा और चित्ताशक्ति सबमें प्रवेश कर जाती है तैसे वह भी सबकी देह में प्रवेश कर जाती थी । जो मन्त्र जाप न करें उनके भीतर प्रवेश करके रक्त मांस भोजन करे परन्तु तृप्त न हो मन में तृष्णा रहे और सूक्ष्म शरीर थल में दब जावे । इस प्रकार उसने बहुत कष्ट पाके
उत्पत्ति प्रकरण ।
२८३
विचार किया कि उद्यम से सब कुछ प्राप्त होता है इससे पूर्व शरीर के निमित्त फिर एकान्त स्थान में जाकर तप करूँ । इतने में एक गीध पक्षी वहाँ आकर कुछ भोजन करने लगा कि उसके चोंच के मार्ग से विषूचिका भीतर चली गई । जब यह पक्षी कष्ट पाके उड़ा तो वह विषूचिका उसकी पुर्यष्टक से मिलके और उसको प्रेरके हिमालय पर्वत की ओर इस भाँति ले चली जैसे वायु मेघ को ले जाता है । उस गीध ने वहाँ पहुँचकर वमन करके विषूचिका को त्याग दिया है और आप सुखी होकर उड़ गया । तब उसी शरीर से विषूचिका वहाँ तप करने लगी । हे रामजी ! इस प्रकार इन्द्र ने सुनकर उसके देखने के निमित्त पवन चलाया । तब पवन आकाश छोड़के भूतल में उतरा और लोकालोक पर्वत स्वर्ण की पृथ्वी, समुद्रों और द्वीपों को लाँघके क्रम से हिमालय के वन में सूक्ष्म शरीर से आया और क्या देखा कि पवन चल रहा है और सूर्य तप रहे हैं परन्तु वह चलायमान नहीं होती और प्राणवायु का भी भोजन नहीं करती तब पवन ने भी आश्चर्यमान होके कहा, हे तपस्विनी ! तू किसलिए तप करती है ? पर विषूचिका तब भी न बोली । पवन ने फिर कहा, भगवती विषूचिका ने बड़ा तप किया है—अब इसको कोई कामना नहीं रही ऐसे पवन उड़ा और क्रम से इन्द्र के पास गया । इन्द्र विषूचिका के दर्शन के माहात्म्य से पवन को कण्ठ लगाय मिले और बड़ा आदर किया कि तू बड़े पुण्यवान् का दर्शन करके आया है । पवन ने भी सब वृत्तान्त कह सुनाया और कहा, हे राजन् ! उसके तप के तेज से हिमालय की शीतलता दब गई है । आप ब्रह्माजी के पास चलिये, नहीं तो उसके तप से सब जगत् जलेगा । तब इन्द्र पवन और देवतागणों सहित ब्रह्माजी के पास आये और प्रणाम करके बैठे । ब्रह्माजी ने कहा, तुम्हारी जो अभिलाषा है वह मैंने जानी । इस प्रकार इन्द्र से कहकर ब्रह्माजी विषूचिका के पास जिसका नाम सूची था आये और उसको देखके आश्चर्यमान हुए कि तृण की नाईं विषूचिका ने सुमेरु से भी अधिक धैर्य धारण किया है जैसे मध्याह्न का सूर्य तेजवान् होता है तैसे ही इसका तप से तेज हुआ है
२८४ योगवाशिष्ठ ।
और परब्रह्म में स्थित हुई है। अब इसका जगत्भ्रम शान्त हो गया है इस से वन्दना करने योग्य है। हे रामजी ! फिर आकाश में स्थित होकर ब्रह्माजी ने कहा, हे पुत्री ! तू अब वर ले, तब विसूचिका विचारकर कहने लगी कि जो कुछ जानने योग्य था सो मैंने जाना और शान्तरूप हुई हूँ, सम्पूर्ण संशय मेरे नष्ट हुए अब वर से मुझे क्या प्रयोजन है ? यह जगत् अपने संकल्प से उपजा है। जैसे बालक को अपनी परछाहीं में बैताल बुद्धि होती है और उससे भय पाता है तैसे ही मैं स्वरूप के प्रमाद से भटकती फिरी। अब इष्ट अनिष्ट जगत् की मुझको कुछ इच्छा नहीं। अब मैं निर्विकार शान्ति में स्थित हूँ। हे रामजी ! ऐसे कहकर जब सूची तूष्णीम् हो रही तब वीतराग और प्रसन्नबुद्धि ब्रह्माजी उसके भाव को देखके कहने लगे, हे कर्कटी ! तू कुछ वर ले, क्योंकि कुछ काल तुझे भूतल में विचरना है। भोगों को भोगके तू विदेहमुक्त होगी। अब तू जीवन्मुक्त होकर विचरेगी। नीति के निश्चय को कोई नहीं लाँघ सकता। जब तू तप करने लगी थी तब पूर्व देह के पाने का संकल्प किया था। तेरा वह संकल्प अब सफल हुआ है। जैसे बीज में वृक्ष का सद्भाव होता है सो काल पाकर होता है तैसे ही तेरे में पूर्व शरीर का जो संकल्प था सो अब प्राप्त होवेगा अर्थात् वैसा ही शरीर पाके तू हिमालय के वन में विचरेगी। हे पुत्री ! तुझे तो अनिच्छित योग हुआ है। जैसे कोई छाया के निमित्त आम के वृक्ष के निकट आन बैठे और उसे छाया और फल दोनों प्राप्त हों तैसे ही तूने शरीर की वृद्धि के लिये यत्न किया था वह तुझे तृप्ति करनेवाला हुआ है और ब्रह्मतत्त्व भी प्राप्त हुआ। हे पुत्री ! राक्षसी शरीर में जीवन्मुक्त होके तू विचरेगी और दूसरा जन्म तुझको न होगा। इस जन्म में तू परम शान्त रहेगी और शरत्काल के आकाश की नाईं निर्मल होगी। जब तेरी वृत्ति बहिर्मुख फुरेगी तब सब जगत् तुझको आत्मरूप भासेगा; व्यवहार में समाधि रहेगी और समाधि में भी समाधि रहेगी। पापी जीवों को तू भोजन करेगी; न्यायबान्धव तेरा नाम होगा और विवेकपालक तेरी देह होगी। इससे पूर्व के शरीर को अंगीकार कर। इतना कह फिर वशिष्ठजी बोले, हे
उत्पत्ति प्रकरण । २८५
रामजी ! ऐसे कहकर जब ब्रह्माजी अन्तर्धान हो गये तब सूची ने कहा ऐसे ही हमको दोनों तुल्य है। तब जैसे बीज से वृक्ष होता है तैसे ही क्रम से शरीर बढ़ गया। प्रथम प्रदेशमात्र हुआ, फिर हस्तमात्र हुआ फिर वृक्षमात्र हुआ और फिर योजनमात्र हो गया। जैसे संकल्प का वृक्ष एक क्षण में बढ़ जाता है तैसे उसका शरीर बढ़ गया।
इति श्रीयोगवाशिष्ठे उत्पत्तिप्रकरणे सूचीशरीरलाभो नाम द्विपञ्चाशत्तमस्सर्गः ॥ ५२ ॥
वशिष्ठजी बोले, हे रामजी ! जैसे वर्षाकाल का बादल सूक्ष्म से स्थूल हो जाता है तैसे सूची सूक्ष्म शरीर से फिर कर्कटी राक्षसी हो गई। जैसे सर्प काञ्चली त्यागके फिर ग्रहण नहीं करता तैसे ही राक्षसी ने आत्मतत्त्व के कारण शरीर न ग्रहण किया। छः महीने तक पहाड़ के शिखर की नाईं खड़ी रही और फिर पद्मासन बाँध संवित् सत्ता और निर्विकल्प पद में स्थित हुई। जब प्रारब्ध के वेग से जागा तब वृत्ति बहिर्मुख हुई और क्षुधा लगी; क्योंकि शरीर का स्वभाव शरीर पर्यन्त रहता है। तब विचारने लगी कि जो विवेकी हैं उनका मैं भोजन न करूँगी; उनके भोजन से मेरा मरना श्रेष्ठ है पर जो न्याय से भोजन करने योग्य है उसको खाऊँगी और शरीर भी नष्ट हो तो भी न्याय बिना भोजन न करूँगी। देहादिक सब संकल्पमात्र हैं; मुझे न मरने की इच्छा है और न जीने की। हे रामजी ! जब ऐसे विचारकर सूची तूष्णीम् हो बैठी और राक्षसी स्वभाव का त्याग किया तब सूर्य भगवान् ने आकाशवाणी से कहा; हे कर्कटी ! तू जाके मूढ़ जीवों का भोजन कर। जब तू उनका भोजन करेगी तब उनका कल्याण होगा। मूढ़ों का उद्धार करना भी सन्तों का स्वभाव है। जो विवेकी पुरुष हैं उनको न खाना और जो तेरे उपदेश से ज्ञान पावें उनको भी न मारना, जो उपदेश से भी बोधात्मा न हों उनका भोजन करना—यह न्याय है ? तब राक्षसी ने कहा हे भगवन् ! तुमने अनुग्रह करके जो कहा है वही मुझसे ब्रह्माजी ने भी कहा था। ऐसे कहकर सूची हिमालय के शिखर से उतरी और जहाँ किरातदेश था और बहुत मृग और पशु रहते थे उनमें विचरने लगी।
२८६ योगवाशिष्ठ।
रात्रि में श्याम राक्षसी और श्याम ही तमाल वृक्ष भी महाअन्धकार भासते थे—मानों कज्जल का मेघ स्थित है। ऐसी श्यामता में किराती देश के राजा मन्त्री और वीरों सहित यात्रा को निकले तो उनको आते देख राक्षसी ने विचारा कि मुझे भोजन मिला। यह मूढ़ अज्ञानी है और इनको देहाभिमान है; इन मूर्खों के जीने से न यह लोक न परलोक कुछ अर्थ सिद्ध नहीं होता। ऐसे जीवों का जीना दुःख के निमित्त है इसलिये इनको यत्न करके भी मारना योग्य है और इनका पालन अनर्थ के निमित्त है, क्योंकि यह पाप को उदय करते हैं। ब्रह्मा की आनि नीति है कि पापी मारने योग्य हैं और गुणवान् मारने योग्य नहीं। कदाचित् ये गुणवान् हों तो मैं इन्हें न मारूँगी। गुणवान् भी दो प्रकार के होते हैं। जो अमानी, अदम्भी, अहिंसक, शान्तिमान और पुण्यकर्म करनेवाले हैं वे भी गुणवान् हैं पर महागुणवान् तो ब्रह्मवेत्ता हैं जिनके जीने से बहुतों के कार्य सिद्ध होते हैं, इसलिये जो मेरा शरीर भोजन बिना नष्ट भी हो जावे तो भी मैं गुणवान् को न मारूँगी। जो उदार पुरुष है वह पृथ्वी का चन्द्रमा है; उसकी संवित् से स्वर्ग और मोक्ष होता है। जैसे संजीवनी बूटी से मृतक भी जीता है तैसे ही सन्तों के संग से अमृत होता है। इससे मैं प्रश्न करके इनकी परीक्षा लूँ; कदाचित् यह भी गुणवान् हों। यह कमलनयन ज्ञानवान् भासते हैं; यदि यथार्थ ज्ञानवान् पुरुष हैं तो पूजने योग्य हैं और जो मूर्ख हैं तो दण्ड देने योग्य हैं और मैं उनको अवश्य भोजन करूँगी।
इति श्रीयोगवाशिष्ठे उत्पत्तिप्रकरणेराक्षसीविचारो नाम त्रिपञ्चाशत्तमस्सर्गः ॥ ५३ ॥
वशिष्ठजी बोले, हे रामजी! तब वह राक्षसी उनको देखके मेघ की नाईं गरजने लगी और कहा; अरे आकाश के चन्द्रमा और सूर्य! तुम कौन हो? बुद्धिमान् हो अथवा दुर्बुद्धि हो? कहाँ से आये हो और तुम्हारा क्या आचार है? तुम तो मुझको ग्रास की नाईं आन प्राप्त हुए हो इससे अब मैं तुमको भोजन करूँगी। राजा बोले; अरी! इस भौतिक तुच्छ शरीर को पाकर तू कहाँ रहती है? हमको देखके जो तू गरजती
उत्पत्ति प्रकरण । २८७
है सो तेरा शब्द हमको अमरी के शब्दवत् भासता है; हमको कुछ भय नहीं । हे राक्षसी ! यह तेरा शरीर मायामात्र है इसलिये इस तुच्छ स्वभाव को त्यागके जो कुछ तेरा अर्थ है वह कह हम पूर्ण कर देंगे । तब राक्षसी ने उनके डराने को ग्रीवा और भुजा को ऊँचे करके प्रलयकाल के मेघों की नाईं फिर शब्द किया कि जिसके नाद से पहाड़ भी चूर्ण हो जावें । निदान सब दिशाएँ शब्द से भर गई और वह बिजली की नाईं नेत्रों को चमकाने लगी । उसकी मूर्ति देख राक्षस और पिशाच भी शङ्कायमान हों पर ऐसे भयानक स्वरूप को देख के भी उन दोनों ने धीरज रखा । मन्त्री ने कहा, अरी राक्षसी ! ऐसे शब्द तू व्यर्थ करती है । इससे तो तेरा कुछ प्रयोजन न सिद्ध होगा इसलिये इस आरम्भ को त्यागके अपना अर्थ कह । बुद्धिमान् पुरुष उस अर्थ को ग्रहण करते हैं जो अपना विषयभूत होता है और जो अपना विषयभूत नहीं होता उसके निमित्त वे यत्न नहीं करते । हम तेरे विषयभूत नहीं तुझ ऐसे तो हजारों हमने मार डाले हैं । हे राक्षसी ! हमारे धैर्यरूपी पवन से तुझ ऐसी अनन्त मक्खियाँ तृणवत् उड़ती फिरती हैं । इससे अपने नीच स्वभाव को त्याग स्वस्थचित्त होके जो कुछ तेरा प्रयोजन हो सो कह । बुद्धिमान् स्वस्थचित्त होके व्यवहार करते हैं; स्वस्थ हुए बिना व्यवहार भी सिद्ध नहीं होता; यह आदि नीति है । हमारे पास से स्वप्न में भी कोई अर्थी व्यर्थ नहीं गया । हम सबका अर्थ पूर्ण करते हैं इसलिये तू भी हमसे अपना प्रयोजन कह दे । तब राक्षसी समझी कि यह कोई बड़े उदार आत्मा और उज्जवल आचारवान् हैं और जीवों के समान नहीं । यह बड़े प्रकाशमान और धैर्यवान् जान पड़ते हैं; उदारात्मा के से इनके वचन ज्ञानवानों से मिलते हैं अब मैंने इनको जाना है और इन्होंने मुझको जाना है इससे मुझसे इसका नाश भी न होगा । अविनाशी पुरुष ब्रह्मसत्ता में स्थित हैं इससे ज्ञानवान् हैं । ऐसा निश्चय ज्ञान बिना किसी को नहीं होता परन्तु कदाचित् अज्ञानी हो तो फिर सन्देह को अङ्गीकार करके पूछती हूँ। जो सन्देहवान् होकर बोधवान् से नहीं पूछते वे भी नीच बुद्धि हैं। हे रामजी ! ऐसे मन में विचार फिर उसने पूछा,
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तुम कौन हो और तुम्हारा आचार क्या है ? निष्पाप महापुरुषों को देखके मित्रभाव उपज आता है । मन्त्री बोला, किरातदेश का यह राजा है और मैं इनका मन्त्री हूँ। रात्रि में तुमसे दुष्टों के मारने के निमित्त उठे हैं। रात्रि दिन में हमारा यही आचार है कि जो जीव धर्म की मर्यादा त्यागनेवाले हैं उनका हम नाश करते हैं। जैसे अग्नि ईंधन का नाश करता है। राक्षसी बोली, हे राजन् ! यह तेरा दुष्ट मन्त्री है। जिस राजा का मन्त्री भला नहीं होता वह राजा भी भला नहीं होता और जिस राजा का मन्त्री भला होता है उसकी प्रजा भी शान्तिमान् होती है । भला मन्त्री वह कहाता है जो मन्त्री को न्याय और विवेक में लगावे। जो राजा विवेकी होता है वह शान्तात्मा होता है और जो राजा शान्तिमान् हुआ तब प्रजा भी शान्तिमान् होती है। सब गुणों से जो उत्तम गुण है वह आत्मज्ञान है। जो आत्मा को जानता है वही राजा और जिसमें प्रभुता और समदृष्टि हो वही मन्त्री है, जो प्रभुता और समदृष्टि से रहित है वह न राजा है न मन्त्री है। हे राजन् ! जो तुम आत्मज्ञानवान् पुरुष हो तो तुम कल्याणरूप हो। जो ज्ञान से रहित होता है उसको मैं भोजन करती हूँ। तुम्हारे छूटने का उपाय यही है कि जो मैं प्रश्नों का समूह पूछती हूँ उसका उत्तर दो। जो तुमने प्रश्नों का उत्तर दिया तो मेरे पूजने योग्य हो। और जो मेरा अर्थ होगा सो कहूँगी तुम पूर्ण करना और जो तुमने प्रश्नों का उत्तर न दिया तो तुम्हारा भोजन करूँगी ।
इति श्रीयोगवाशिष्ठे उत्पत्तिप्रकरणे राक्षसीविचारो नाम चतुःपञ्चाशत्तमसर्गः ॥ ५४ ॥
वशिष्ठजी बोले, हे रामजी ! जब इस प्रकार राक्षसी ने कहा तब राजा बोला, तू प्रश्न कर, हम तुमको उत्तर देंगे । राक्षसी बोली, हे राजन् ! वह एक कौन अणु है जिससे अनेक प्रकार हुए हैं और एक के अनेक नाम हैं और वह कौन अणु है जिसमें अनेक ब्रह्माण्ड होते हैं और लीन हो जाते हैं ? जैसे समुद्र में अनेक बुद्बुदे उपजकर लीन होते हैं। वह कौन आकाश है जो पोल से रहित है और कौन अणु है जो न किञ्चित
उत्पत्ति प्रकरण । २८६
है न अकिञ्चित् है ? वह कौन अणु है जिसमें तेरा और मेरा अहं फुरता है और वह कौन है जो अहं त्वं एक में जानता है ? वह कौन है जो चला जाता है और कदाचित् नहीं चलता और वह कौन है जो तिष्ठित भी है और अतिष्ठित भी है ? वह कौन है जो पाषाणवत् है और वह कौन है जिसने आकाश में चित्र किये हैं ? वह कौन अग्नि है जो दाहक शक्ति से रहित है और अग्निरूप है और वह अग्नि कौन है जिससे अग्नि उपजी है ? वह कौन अणु है जो सूर्य, अग्नि, चन्द्रमा और तारों के प्रकाश से रहित और अविनाशी है और वह कौन है जो नेत्रों से देखा नहीं जाता और सब प्रकाशों को उत्पन्न करता है ? वह कौन ज्योति है जो फूल, फल और बेल को प्रकाशती है और जन्मान्ध को भी प्रकाशती है ? वह कौन अणु है जो आकाशादिक भूतों को उपजाता है और वह कौन अणु है जो स्वाभाविक प्रकाशमान है ? वह भण्डार कौन है जिससे ब्रह्माण्डरूपी रत्न उपजते हैं ? वह कौन अणु है जिसमें प्रकाश और तम इकट्ठे रहते हैं ? और वह कौन अणु है जिससे सत् और असत् इकट्ठे रहते हैं ? वह कौन अणु है जो दूर है परन्तु दूर नहीं और वह कौन अणु है जिसमें सुमेरु आदिक पर्वत भी समाय रहे हैं ! वह कौन अणु है जिसमें निमेष में कल्प और कल्प में निमेष है और वह कौन है जो प्रत्यक्ष और असद्रूप है ? वह कौन है जो सत् और अप्रत्यक्षरूप है ? वह कौन चेतन है जो अचेतन है और वह कौन वायु है जो अवायु रूप है ? वह कौन है जो अशब्दरूप है और वह कौन है जो सर्व और निष्किञ्चित् है ? वह कौन अणु है जिसमें अहं नहीं है ? वह कौन है जिसको अनेक जन्मों के यत्न से पाता है और पाके कहता है कि कुछ नहीं पाया और सब कुछ पाया ? वह कौन अणु है जिसमें सुमेरु आदिक तीनों भुवन तृणसमान हैं और वह कौन अणु है जो अनेक योजनों को पूर्ण करता है ? वह कौन अणु है जिसके देखने से जगत् फुर आता है और वह कौन अणु है जो अणुता को त्यागे बिना सुमेरु आदिक स्थूल आकार को प्राप्त होता है ? वह कौन अणु है जो बाल का सौवाँ भाग और सुमेरु से भी ऊँचा हुआ है ? वह कौन अणु है जिसमें सब अनु-
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भव स्थित है और वह कौन अणु है जो अत्यन्त निस्स्वाद है और आप ही सब स्वाद होता है ? वह कौन अणु है जिसको अपने ढाँपने की सामर्थ्य नहीं और सबको ढाँप रहा है और वह कौन अणु है जिससे सब जीते हैं ? वह कौन अणु है जिसका अवयव कोई नहीं और सब अवयव को धारण कर रहा है ? वह कौन निमेष है जिसमें बहुतेरे कल्प स्थित हैं ? वह कौन अणु है जिसमें अनन्त जगत् स्थित है जैसे बीज में वृक्ष होता है ? वह कौन अणु है जिसमें बीज से आदि फल पर्यन्त अनउदय हुए भी भासते हैं ? वह कौन है जो प्रयोजन और कर्तृत्व से रहित है और प्रयोजनवान् और कर्तृत्ववान् की नाई स्थित है ? वह कौन द्रष्टा है जो दृश्य से मिलाकर दृश्य होता है और वह कौन है जो दृश्य के नष्ट हुए भी आपको अखण्ड देखता है ? वह कौन है जिसके जाने से द्रष्टा दर्शन-दृश्य तीनों लय हो जाते हैं, जैसे सोने के जाने से भूषणभाव लीन हो जाते हैं और वह कौन है जिससे भिन्न कुछ नहीं जैसे जल भिन्न तरंगों का अभाव है ? वह एक ही कौन है जो देश काल, वस्तु के परिच्छेद से रहित सत् असत् की नाईं स्थित है और वह कौन अद्वैत है जिससे द्वैत भी भिन्न नहीं—जैसे समुद्र से तरंग भिन्न नहीं ? वह कौन है जिसके देखे सत्ता असत्ता सब लीन होती है और वह कौन है जिसमें अभ्ररूपी अनन्त जगत् स्थित है—जैसे बीज में वृक्ष होता है ? वह कौन है जो सबके भीतर है—जैसे वृक्ष में बीज होते हैं और वह कौन है जो सच्चा असत्तारूपी आप ही हुआ है—जैसे बीज वृक्षरूप है और वृक्ष बीजरूप है ? वह अणु कौन है जिसमें ताँत भी सुमेरु की नाईं स्थूल है और जिसके भीतर कोटि ब्रह्माण्ड हैं ? हे राजन् ! उस अणु को देखा हो तो कहो । यही मुझको संशय है इसको तुम अपने मुख से दूर करो । जिससे संशय निवृत्त न हो उसको पण्डित न कहना चाहिए । जो ज्ञानवान् हैं उनको इन प्रश्नों का उत्तर कहना सुगम है । इन संशयों को वह शीघ्र ही निवृत्त कर देते हैं । जो अज्ञानी हैं उनको उत्तर देना कठिन है । हे राजन् ! जो तुमने मेरे प्रश्नों का उत्तर दिया तो तुम मेरे पूजने योग्य हो और जो मूर्खता से प्रश्नों का
उत्पत्ति प्रकरण । २६१
उत्तर न दोगे और प्रश्नों के विपर्यय जानोगे जो तुम दोनों को भोजन कर जाऊँगी और फिर तुम्हारी सब प्रजा को ग्रास कर लूँगी, क्योंकि मूर्ख पापियों का मारना श्रेष्ठ है कि आगे को पाप करने से छूटेंगे। इतना कहकर वशिष्ठजी बोले, हे रामजी ! इस प्रकार राक्षसी कहकर और शुद्ध आशय को लेकर तूष्णीम हुई और जैसे शरत्काल में मेघ-मण्डल निर्मल होता है तैसे निर्मल हुई ।
इति श्रीयोगवाशिष्टे उत्पत्तिप्रकरणे राक्षसीप्रश्नवर्णनन्नाम-पञ्चपञ्चाशत्तमस्सर्गः ॥ ५५ ॥
वशिष्ठजी बोले, हे रामजी ! अर्धरात्रि के समय महाशून्य वन में जब उस राक्षसी ने महाप्रश्न किये तब महामन्त्री ने उससे कहा, हे राक्षसी ! ये जो तुमने संशयप्रश्न किये हैं उनका मैं क्रम से उत्तर देता हूँ। जैसे उन्मत्त हाथी को केसरी सिंह नष्ट करता है तैसे मैं तेरे संशयों को निवृत्त करता हूँ। तूने सब प्रश्न परमात्मा ही के विषय किये हैं इससे तेरे सब प्रश्नों का एक ही प्रश्न है, परन्तु तूने अनेक प्रकार से किये हैं सो ब्रह्मवेत्ता के योग्य हैं। हे राक्षसी ! जो अनामारूप है अर्थात् सर्व इन्द्रियों का विषय नहीं और अगम है और मन की चिन्तना से रहित है ऐसी सत्ता चिन्मात्र है और उसका आकार भी सूक्ष्म है इस कारण सूक्ष्म कहाता है। सूक्ष्मता से ही उसकी अणु संज्ञा है। उस अणु में सब असत् की नाईं जगत् स्थित है और उसही चिद्अणु में जब कुछ संवेदन फुरता है वही संवेदन सत्य असत्य जगत् की नाईं भासता है इससे उसे चित्त कहते हैं। सृष्टि से पूर्व उसमें कुछ न था इससे निष्किञ्चन कहाता है। और इन्द्रियों का विषय नहीं इससे न किञ्चित् है। उसी चिद्अणु में सब का आत्मा है इससे वह अनन्त भोक्ता पुरुष किञ्चन है और उससे कुछ भिन्न नहीं, इससे किञ्चन नहीं। वही चिद्अणु सबका आत्मा है और एक ही आभास से अनेकरूप भासता है—जैसे सुवर्ण में नाना प्रकार के भूषण भासते हैं। वही चिद्अणु परमाकाशरूप है जो आकाश से भी सूक्ष्म और मन वाणी से अतीत है। सर्वात्मा है; शून्य कैसे हो ? सत् को जो शून्य कहते हैं वह उन्मत्त हैं, क्योंकि असत् भी सत् बिना सिद्ध नहीं
२६२ योगवाशिष्ठ ।
होता । जिसके आश्रय असत् भी सिद्ध होता है सो सत् है । वह चिद्- अणु पञ्चकोशों में नहीं छिपता । जैसे कपूर की गन्ध नहीं छिपती तैसे ही पञ्चकोश में आत्मा नहीं छिपती । अनुभवरूप है । वही चिन्मात्र सर्व- रूप से किञ्चित् है और अचेतन चिन्मात्र है, इससे अकिञ्चित् इन्द्रियों से रहित और निर्मल है । उस ही चिद्अणु में फुरने से अनेक जगत् स्थित हैं। जैसे समुद्र में फुरने से तरङ्ग उपजते हैं और फिर लीन होते हैं तैसे ही चिद्अणु में फुरने से अनेक जगत् उपज के लीन होते हैं वह मन और इन्द्रियों से अतीत है इससे शून्य कहाता है और अपने आपही प्रकाशता है इससे अशून्य है । हे राक्षसी ! मेरा और तेरा अहं एक ही आत्मा है । अहं की अपेक्षा से त्वं है और त्वं की अपेक्षा से मैं परिच्छिन्न हूँ, परन्तु दोनों का उत्थान एक आत्मतत्त्व में ही है । उसही चिद्अणु के बोध से ब्रह्मरूप होता है और उसही बोध में अहं त्वं सब लीन होते हैं, अथवा सर्व आपही होता है । त्रिपुटीरूप भी वही है । वहाँ चिद्अणु अनेक योजनों पर्यन्त जाता है कदाचित् चलायमान नहीं होता, क्योंकि संवित् अनन्तरूप है । योजनों के समूह उसके भीतर हैं वास्तव में न कोई आता है और न जाता है, अपने आकाश- कोश में सब देश काल स्थित है । जिसमें सब कुछ हो उसकी प्राप्ति वास्तव में क्या हो ? यह जितना जगत् है वह तो आत्मा में है फिर आत्मा कहाँ जावे ? जैसे माता की गोद में पुत्र हो तो फिर वह उस निमित्त कहाँ जावे तैसे ही आत्मा में यह जगत् स्थित है फिर आत्मा कहाँ जाय; देह की अपेक्षा से चलता है भासता है वह कदाचित् चला नहीं । जैसे आकाश में घटादिक स्थित हैं तैसे ही चिद्अणु में देशकाल स्थित है । जैसे घट एकदेश से देशान्तर को जावे तो घट जाता है आकाश नहीं जाता, पर घट की अपेक्षा से आकाश जाता भासता है । वास्तव में घटाकाश कहीं नहीं गया, क्योंकि आकाश में सब देश स्थित हैं यह कहाँ जावे; तैसे ही आत्मा भी जाता है और नहीं जाता । उसही चिन्मात्र परमात्मा में संवेदन आकार रचे हैं और आदि अन्त से रहित विचित्र- रूपी जगत् रचा है । वही चिद्अणु अग्नि की नाई प्रकाशरूप है और