योगतारावली (आदि शङ्कराचार्य - अमनस्क दशा, नादानुसन्धान एवं राजयोग रहस्य सटीक)
Yogataraavali of Adi Shankaracharya with Commentary
आदि शङ्कराचार्य (व्याख्याकार: डॉ. रामशङ्कर भट्टाचार्य) द्वारा
( ७ ) अनुवाद—(योगीगण) कहते हैं कि कण्ठ, उदर और पायुमूल में (यथाक्रम जालन्धरबन्ध, ओड्ड्यानबन्ध एवं मूलबन्ध का अभ्यास करना चाहिये । ये तीन बन्ध यदि भलीभाँति ज्ञात (अर्थात् अनुष्ठित हो तो दुःखदायी कालपाश के द्वारा बन्धन कैसे हो सकता है ? (अर्थात् बन्धन नहीं हो सकता) ? व्याख्या—श्लोकगत ओड्ड्यानक ( जालन्धर + ओड्ड्यानक ) शब्द जिस बन्ध को कहता है उसके नाम में एकरूपता नहीं मिलती । ह० यो० प्र० २।४५ में उड्डियानक शब्द है ('क' स्वार्थ में तद्धित प्रत्यय है ) । प्रस्तुत ग्रन्थ के श्लोक ६ में उड्डीन या ओड्ड्यान शब्द है। कहीं कहीं उड्डीयन और उड्डीयान' शब्द प्रयुक्त हुये हैं । यह निश्चित है कि यह शब्द 'उद् + डी (ङ्)' से निष्पन्न है; इसका 'उड्डियान' रूप ही संगत प्रतीत होता है । उड्डियान का नामान्तर 'आकर्षणबन्ध' है । उड्डीयान--तस्मादुड्डीनाख्योऽयम्-ह० यो० प्र० ३।५५—ज्योत्स्ना-- 'उत्पूर्वात् डीङ् विहायसा गतौ इत्यस्मात् करणे ल्युट्' । पर इस नियम से उद् + डी + अन ( ल्युट् ) = उड्डयन' होगा, उड्डीयन' ( ३।५५ में प्रयुक्त ) नहीं होगा । अतः उड्डीयन शब्द के लिए पृथक् प्रयत्न करना होगा । ह० यो० प्र० ३।५६-उड्डीनं कुरुते यस्मात्...उड्डीयानं तदेव स्यात् । उड्डीन शब्द कर्णपर्व ४१।२६ में प्रयुक्त है तथा व्याकरणग्रन्थ में भी है ( द्र० काश० धातु० १।५५९ ) । उड्डियान—इसके बहुत प्रयोग हैं । (ह० यो० प्र० ३।७४; २।४५ (उड्डियानक); २।४७ टीका ( उड्डियान ) । योगशास्त्र में नाना प्रकार के बन्ध कहे गये हैं, जिनमें जालन्धर ( नामान्तर कण्ठमुद्रा, ) उड्डियान तथा मूल प्रसिद्धतम हैं । इनके विवरण के लिए ह० यो० प्र०, घेरण्डसंहिता आदि द्रष्टव्य हैं । कालपाश--कालरूपी पाश; पाश वह जिससे किसको बाँधा जा सके । द्र० ह० यो० प्र० ३।२४ ( कालपाशमहाबन्ध.... ) ।
( ८ ) ओड्ड्यान¹-जालन्धर-मूलवन्धै रुन्निद्रितायामुरगाङ्गनायाम् । प्रत्यङ्मुखत्वात् प्रविशन् सुषुम्नां गमागमां मुञ्चति गन्धवाहः२ ॥६॥ [ १. उड्डीन० ( पाठ० ) । २. योगचिन्तामणि में यह श्लोक ( उड्डीन- जाल••••प्रत्यग् विमुञ्चन•••• ) नन्दिकेश्वरकृत-तारावली ग्रन्थ के नाम से उद्धृत किया गया है (पृ० १५) । ] अनुवाद—ओड्ड्यान (= उड़्डियान), जालन्धर तथा मूल नामक बन्धों के द्वारा भुजगी ( = सर्पाकृति कुलकुण्डली ) के जागरित होने पर गन्धवाहक अर्थात् वायु प्रत्यङ्मुख (= अधोमुख) होकर सुषुम्ना में प्रविष्ट होता है और गमन-आगमन-क्रिया को छोड़ देता दे (अर्थात् निश्चल हो जाता है) । व्याख्या—वायु की प्रत्यङ्मुखगति को कभी-कभी पराङ्मुख गति भी कहा जाता है ( ज्योत्स्नाटीका ३।३७ ) । मूलाधार को सुषुम्नामुख माना जाता है—सुषुम्नामुखं मूलाधार एवोक्तम ( योगचिन्ता०, पृ० १११ ) । चूंकि कुण्डली, कुण्डलिनी या कुलकुण्डलिनी सर्पाकृतिवाली मानी गई है अतः 'उरग-अङ्गना' ( सर्पस्त्री, सर्पकन्या ) शब्द प्रयुक्त हुआ है । प्राणवायु का अधोमुख गमन ह० यो० प्र० १।४८ में कथित हुआ है । ( पूरितं न्यञ्चन् प्राणम; द्र० टीका ) । इस ग्रन्थ में श्लोकोक्त मत का समर्थन मिलता है । ( ३।७४—प्राण का पश्चिमपथ = सुषुम्ना मार्ग में ले जाना ) । 'वायु का सुषुम्ना में प्रवेश' योगियों का अन्यतम महत्त्वपूर्ण अभ्यास है ( ह० यो० प्र० ४।१९ ) । प्राणवायु उपायविशेष से निश्चल होकर रह सकता है । शारीरकभाष्य में इस विषय में एक मार्मिक वाक्य मिलता है—यथा च लोके प्राणापानादिषु
( ९ ) प्राणभेदेषु प्राणायामेन निरुद्धेषु कारणमात्रेण रूपेण वर्तमानेषु जीवनमात्रं कार्यं निर्वर्त्यंते नाकुञ्चन-प्रसारणादिकं कार्यान्तरम् ( २।१।२० ) । उत्थापिताधारहुताशनोल्कैर् आकुञ्चनैः शश्वदपानवायोः¹ । सन्तापिताच्² चन्द्रमसः स्रवन्तीं पीयूषधारां पिबतीह धन्यः॥७॥ [ १. अपानवायौ ( पाठा० )--यह भ्रष्ट पाठ है। सन्तापिते; संप्रापिते ( पाठा० ) ] अनुवाद—अपान वायु का निरन्तर ( बारबार ) आकुञ्चन होने के कारण आधार ( मूलाधार चक्र ) से जो अग्नि की शिखा निर्गत होती है, उससे चन्द्र सन्तापित होता है । इस सन्तापित चन्द्र से क्षरित सुधा का पान जो साधक करता है, वह इस लोक में धन्य है । व्याख्या—मूलाधार-स्थित अग्नि--ह० यो० प्र० ३।६६ से इस अग्नि की सत्ता ज्ञात होती है । यह अग्नि जाठरअग्नि का ही विकसित रूप है (द्र० ज्योत्स्ना- टीका ) । जठराग्नि के इस विकास में समान वायु का पर्याप्त सहयोग रहता है । यही कारण है कि योगी का शरीर जलता हुआ-सा प्रतीत होता है; द्र० समानजयाज् ज्वलनम् ( योगसू० ३।४० ); प्रज्वलन्निव लक्ष्यते योगी ( भास्वती ) । मूलाधारस्थित अग्नि की उल्का ( = शिखा ) का स्पष्ट उल्लेख योगियाज्ञ० १२।१ में मिलता है ( शिखां समालोक्य पावकस्य ) । अपानवायु का जो आकुञ्चन है, वह वस्तुतः मूलाधार का आकुञ्चन है; द्र० अधस्तात् कुञ्चनेनाशु... ( ह० यो० प्र० २।४६ ) । अपानवायु का आकुञ्चन ह० यो० प्र० ३।६२-६३ में उक्त हुआ है ।
( १० ) 'सन्तापित चन्द्र' क्या है—यह श्लोक में नहीं कहा गया। चन्द्र या सोम ( शरीरस्थ ) का उल्लेख हठयोग-ग्रन्थों में स्पष्ट रूप से मिलता है। मुख्य चन्द्र सहस्रारपद्म में स्थित है। इसके अतिरिक्त अन्यत्र भी चन्द्रस्थिति का उल्लेख मिलता है—तालुमूलस्थ चन्द्र ( ह० यो० प्र० ३।७७; योगबीज ५७-५८ ); नासाग्रस्थ चन्द्र ( घेरण्ड० ५।४३ ), भ्रूमध्यस्थ चन्द्र ( ज्योत्स्नाटीका ४।६४ ); हृदयकमलस्थ चन्द्र ( योगियाज्ञ० ९।३५-३६ )। इन चन्द्रों से भी अमृत का क्षरण होता है ( ये सब गौण चन्द्र हैं )। सुधा अमृत या पीयूष के लिए कहीं कहीं 'सार' शब्द भी प्रयुक्त हुआ है ( ह० यो० प्र० ३।४६ )। यह सुधा अग्नि में गिर कर नष्ट हो जाती है। अभ्यास-विशेष से सुधा का पतन बन्द किया जा सकता है। यह सुधापान वस्तुतः पीना रूप क्रिया ( जो लोक में प्रसिद्ध है ) नहीं है--यह धारणा शेष-साध्य है। यही कारण है कि कहीं कहीं 'ध्यायन् चन्द्रमसम्' कहा गया है। इस अमृत का पान करने से कुछ अद्भुत शक्तियाँ प्राप्त होती हैं; इसी दृष्टि में 'धन्य' शब्द का प्रयोग किया गया है। उदाहरणार्थ लम्बिकोर्ध्वस्थितचन्द्ररस का पान करने वालों के प्रति तक्षकनाग का विष भी व्यर्थ हो जाता है ( ह० यो० प्र० ३।४५ )। बन्धत्रयाभ्यासविपाकजातां विवर्जितां रेचक-पूरकाभ्याम् । विशोषयन्तीं¹ विषयप्रवाहं विद्यां भजे केवलकुम्भरूपाम् ॥८॥ [ १. विशोधयन्तीं ( पाठ० ) = विषयप्रवाह की शुद्धिकारिणी ] अनुवाद--उपर्युक्त तीन बन्धों के अभ्यास से उत्पन्न होने वाली केवल कुम्भक रूप विद्या का भजन (=ऐकान्तिक अभ्यास ) मैं करता हूँ। यह केवल कुम्भक रूप विद्या रेचक-पूरक से वर्जित है तथा विषय-प्रवाह की शोषणकारिणी है।
( ११ ) व्याख्या - 'केवल' एक विशेष प्रकार के कुम्भक का नाम है। इस कुम्भक के विषय में यहाँ जो कहा गया है, वह सहेतुक है। वह हेतु है-मनोन्मनी अवस्था के साथ इस कुम्भक का निकटतम सम्बन्ध (द्र० घेरण्ड० ५।६१)। 'केवल' कुम्भक की महत्ता 'केवले कुम्भके सिद्धे किं न सिद्ध्यति भूतले' (घेरण्ड० ५।९६) वाक्य जानी जाती है। हठयोग में 'बन्धत्रय' से मूल-उड्डोयान-जालन्धर नामक तीन बन्ध गृहीत होते हैं (द्र० ह० यो० प्र० १।४२ टीका। यहाँ 'केवल' कुम्भक के विषय में विशिष्ट सूचना दी गई है। पहली बात यह है कि दीर्घकाल पर्यन्त बन्धत्रय का अभ्यास करने के बाद ही इस कुम्भक का अभ्यास करना चाहिये। दूसरी बात यह है कि प्रयत्नपूर्वक रेचक करने के बाद अथवा पूरक करने के बाद यह अनुष्ठेय नहीं-रेचक-पूरक पर ध्यान न देकर इस कुम्भक का अभ्यास किया जाता है - 'रेचकं पूरकं त्यक्त्वा सुखं यद् वायु- धारणम्' यह हठयोगीय वाक्य इस कुम्भक का परिचायक है। यह कुम्भक विषय- प्रवाह का शोषक है अर्थात् विषय-सम्पर्क से इन्द्रिय में जो चाञ्चल्य होता है, वह चाञ्चल्य इस कुम्भक की अवस्था में नहीं होता। 'केवल' कुम्भक के लिए द्र० ह० यो० प्र० २।७२-७४; १।४३। अनाहत चेतसि सावधानेर् अभ्यासशूरै¹रनुभूयमाना । संस्तम्भितश्वासमनःप्रचारा सा जृम्भते केवलकुम्भकश्रीः । ९॥ [१. सूरैः (पाठा०)--यह अपपाठ है] अनुवाद--जब चित्त अनाहत चक्र में स्थिर हो जाता है तब श्वास और मन की क्रियायें स्तम्भित हो जाती हैं। इस अवस्था में 'केवल कुम्भक' का उत्कर्ष प्रकटित होता है। इस उत्कर्ष का अनुभव सावधान अभ्यासदक्ष साधक कर सकते हैं।
२. श्लोक ११-२०: अनहद नाद की चतुर्विध अवस्थाएँ एवं मनोनाश
( १२ ) व्याख्या--'सावधान' और 'अभ्यासशूर'--ये दो साभिप्राय विशेषण हैं । 'अव + धा' का अर्थ होता है--अन्तर्गमन; अतः अवधान का अर्थ होगा--एक- आलम्बन परायणता । 'स्तम्भित अवस्था' नाश की अवस्था नहीं है--यह अच्छी तरह से ज्ञातव्य है । 'प्रचार' का अर्थ है--भ्रमण, गमनागमन, प्रवृत्ति । यहाँ 'क्रिया' अर्थ करना उचित है । केवल कुम्भक में श्वासरोध के साथ-साथ मन का भी रोध होता है--यह ग्रन्थकार का कहना है । प्रकृत बात यह है कि श्वासरोध मनोरोध का अवश्य सहायक होता है--यदि वह रोध वैराग्यादिपूर्वक हो; अन्यथा केवल श्वासरोध पूर्वक मनोरोध योग की दृष्टि में विशेष लाभप्रद नहीं होता । सहस्रशः सन्तु हठेषु कुम्भाः संभाव्यते केवलकुम्भ एव । कुम्भोत्तमे यत्र तु रेचपूरौ प्राणस्य न प्राकृतवैकृताख्यौ ॥१०॥ अनुवाद-हठयोग के ग्रन्थों में यद्यपि सहस्र प्रकार के कुम्भकों का उल्लेख है, तथापि 'केवल' कुम्भक की श्रेष्ठता मानी गई है । कारण यह है कि इस श्रेष्ठ कुम्भक में प्राण ( बाह्य वायु ) के रेचक ( अपर नाम 'प्राकृत' तथा पूरक ( अपर नाम 'वैकृत' ) का अस्तित्व नहीं रहता । व्याख्या--'हठ' शब्द हठयोग को भी कहता है ( हठात् हठयोगात्, ज्योत्स्ना ३।५१ । हठयोग शब्द से हठयोग-ग्रन्थ या हठयोगसंप्रदाय रूप अर्थ लेना असंगत नहीं है । 'हठेषु' में जो बहुवचन है उसकी संगति इस दृष्टि से हो जाती है । 'संभाव्यते' में जो 'सम् + भू' धातु है उससे गौरव या समादर का अतिशय होना ज्ञापित होता है ।
( १३ ) चूंकि हठ का लक्षण है—प्राणापांनयोरैक्यलक्षणः प्राणायामो हठयोगः ( ह० यो० प्र० १।१ की टीका ), इसलिये हठशास्त्र में कुम्भक की नियत सत्ता स्वाभाविक रुप से स्वीकार्य होता है । प्राणायाम के भेद से कुम्भक के भेद होते हैं ( हठयोग में प्राणायाम के सूर्यभेद आदि आठ भेद इसी दृष्टि से होते हैं ); अतः आठ प्रकार के कुम्भक हुये (द्र० घेरण्ड० ५।१६ 'अष्ट कुम्भकाः' ) । प्रसंगतः यह ज्ञातव्य है कि देवल ने सात प्रकार का कुम्भक माना है ( द्र० योगचिन्ता० पृ० १८ ) । त्रिकूटनाम्नि स्तिमितेऽन्तरङ्गे खे स्तम्भिते केवलकुम्भकेन¹ । प्राणानिलो भानु-शशाङ्क नाड्यो विहाय सद्यो वलयं प्रयाति ॥११॥ [ १. त्रिकूटनाम्नि तिमिरेऽन्तरे खे स्तम्भं गते केवलकुम्भ एव (पाठा०) । इसका अर्थ है—आन्तर शून्य में स्थित त्रिकूट नामक तिमिर में वायु के स्तम्भित ( कुम्भक के द्वारा ) होने पर 'केवल' कुम्भक वर्तमान रहता है । यह अर्थ कुछ अस्पष्ट है । ] अनुवाद--त्रिकूट नामक अन्तःस्थित शून्य देश जब केवल कुम्भक के द्वारा स्तम्भित हो जाता है, तब प्राणवायु सूर्यनाडी ( पिङ्गला ) और चन्द्रनाडी (इडा) को छोड़कर तत्काल ही लीन हो जाता है । व्याख्या--त्रिकूट नामक आन्तर शून्य देश चक्रविशेष है, लयोपयोगी नौ चक्रों के विवरण में इसका उल्लेख मिलता है—ब्रह्मचक्र ( मूलाधार में ), स्वाधिष्ठानचक्र, नाभिचक्र, हृच्चक्र, कण्ठ-चक्र, तालुचक्र ( घण्टिकामूल ), भ्रूचक्र, निर्वाणचक्र ( ब्रह्मरन्ध्र में ), त्रिकूटचक्र ( यह ब्रह्मचक्र के ऊपर है; पूर्णगिरि के पृष्ठ में ) ( द्र० योगचिन्ता० पृ० १२०-१२१; सौभाग्यलक्ष्मी-
( १४ ) उप० ३।१-९) । नाथयोग में इन नौ चक्रों की विशेष चर्चा है ( सिद्ध- सिद्धान्त-पद्धति, द्वितीय उपदेश; शान्तिपर्व ३१६।११ टीका । १ ब्रह्मबिन्दु- उपनिषद् में भी त्रिकूट का उल्लेख है ( ७० ) । यह तीन नाडियों का संयोगस्थल भ्रूमध्य है । उपर्युक्त त्रिकूट इससे भिन्न है । प्राणालय = प्राणका स्थैर्य अर्थात् गति का अभाव । प्राण जब तक ब्रह्मरन्ध्र में नहीं पहुँचता है तब तक यह लय संभव नहीं होता ( द्र० ज्योत्स्नाटीका ३।७५ ) । प्रत्याहतः केवलकुम्भकेन प्रबुद्ध१कुण्डल्युपभुक्तशेषः । प्राणः प्रतीचीनपथेन मन्दं विलीयते विष्णुपदान्तराले २ ॥१२॥ [ १. प्रभुक्तकुण्डल्यु.... ( पाठा० ); कुण्डली के प्रभुक्त विशेषण का कोई सार्थक्य प्रतीत नहीं होता । २. विष्णुपदे मनो मे ( पाठा० ) — इस पाठ को मानने पर 'विलीयते' क्रिया के दो कर्ता ( प्राण तथा मन ) मानने होंगे, जो अनुचित है । ] अनुवाद—प्रबुद्ध ( = जागरित ) कुलकुण्डलिनी के द्वारा उपभोग के बाद प्राण का जो अंश अवशिष्ट रहता है, वह कुम्भक के द्वारा प्रत्याहृत १. यहाँ 'तदुक्तं शिवयोगे' कहकर नौ चक्रों के प्रतिपादक कुछ श्लोक उद्धृत किये गये हैं । शान्तिपर्व के श्लोक में 'द्वादशैव तु चोदनाः' कहा गया है । इन १२ चोदनाओं की व्याख्या नीलकण्ठ इस प्रकार करते हैं— ( नवचक्र विवरण के बाद ) "एता नव चोदना वायुनिग्रहगर्भाताः । ततः शून्यात् परं समष्टिकार्ये मनो धारयेत् ततः कारणे ततो निष्कले इति तिस्र इति द्वादश चोदनाः" ।
( १५ ) ( = संयत ) होकर प्रतीचीन मार्ग ( = अधोमार्ग ) से धीरे-धीरे विष्णु के दो पदों के अन्तराल में ( = विष्णुपद में ) लीन हो जाता है । व्याख्या--हठयोग के ग्रन्थों में 'प्राण का विष्णुपद में लय होना' कहा गया है--समीरणे विष्णुपदे निविष्टे (योगियाज्ञ० १२।२९ । इसी प्रकार मन का ( सप्राण मन का ) विष्णुपद में लय भी कहा गया है--मनस्तत्र लयं याति तद्विष्णोः परमं पदम् ( ह० यो० प्र० ४।१०० । परवैराग्य के द्वारा मन का वृत्तिशून्य होकर संस्कारशेष अवस्था में रहना ही मन का यह लय है । अनाहतध्वनि, ज्योतिर्धारणा मनोलय एवं विष्णु के परमपद के विषय में घेरण्डसंहिता का यह कथन साधकों के लिए परम उपादेय है--ध्वनेरन्तर्गत ज्योतिर् ज्योतिरन्तर्गतं मनः । तन्मनो विलयं याति तद् विष्णोः परमं पदम् ।। ( ५।८२ ) । निरङ्कुशानां श्वसनोद्गमानां निरोधनैः केवलकुम्भकाख्यैः । उदेति सर्वेन्द्रियवृत्तिशून्यो मरुल्लयः कोऽपि महामतीनाम् ॥१३॥ [ स्वप्नोद ( पाठ० )--यह भ्रष्ट पाठ है । ] अनुवाद- केवल कुम्भक के द्वारा श्वासवायु की अबाध ऊर्ध्वगति के जो बहुविध निरोध होते हैं, उनसे महामतियों ( = प्रज्ञावान् योगियों ) में जो अनिर्वचनीय वायुलय उद्भूत होता है, वह सभी इन्द्रियवृत्तियों से शून्य है । व्याख्या--'निरोधन' शब्द में जो बहुवचन है उससे ज्ञात होता है कि निरोध के अवान्तर भेद हैं ( ये भेद कुम्भक द्वारा कृत होते हैं ) । बाह्य दृष्टि से ( अर्थात् शारीरिक लक्षणों से ) ये भेद जाने नहीं जा सकते ।
( १६ ) श्वसन = वायु = श्वासक्रिया-संबद्ध वायु । साधारण लोगों में इस वायु पर कोई वशीकार देखा नहीं जाता; यही वायु की निरङ्कुशता है । इन्द्रियवृत्ति-शून्य मरुत् ( = प्राणवायु ) का लय अर्थात् पञ्च प्राणों की सर्वविध क्रियाओं का न होना । इस अवस्था में शरीर जीवित ही रहता है, यद्यपि बाह्यदृष्टि से ( अर्थात् चिकित्साशास्त्र की दृष्टि से ) मृत प्रतीत होता है । निरोध चूँकि सात्त्विकता, निरायास तथा सुखपूर्वक होता है, अतः रोधकाल में शरीर धातुयें विकृत नहीं हो जातीं; वे स्तम्भित अवस्था (suspended animation) की स्थिति में रहती हैं । न दृष्टिलक्ष्याणि न चित्तबन्धो न देशकालौ न च वातुरोधः । न धारणाध्यानपरिश्रमो वा समेधमाने सति राजयोगे ।। १४।। अनुवाद--राजयोग जब सम्यक् रूप से विकसित हो जाता है तब न लक्ष्यों पर दृष्टियों को स्थिर रखना पड़ता है ( अर्थात् स्थिर रखने की चेष्टा नहीं करनी पड़ती ), न चित्तबन्ध की आवश्यकता रहती है, न वायुरोध की आवश्यकता रहती है और न धारणा एवं ध्यान के लिए श्रम करना पड़ता है । व्याख्या--'दृष्टियों' का विवरण हठशास्त्र में मिलता है । न देशकालौ—देश और काल से इसका तात्पर्य नहीं है । योगसूत्र (२।५०) में जो देशकालपरिदृष्टि कही गई है, वही इसका लक्ष्य है । राजयोग—योगसूत्र (१।१८) का जो असंज्ञात योग है ( जिसमें वृत्तियां पूर्णतः नहीं रहतीं; केवल संस्कार रहता है ) वही राजयोग है—यह कई आचार्यों का कहना है—असंप्रज्ञातो निरालम्बो निर्बीजो राजयोगो निरोधश्चेते असंप्रज्ञातस्य प्रसिद्धाः पर्यायाः ( ज्योत्स्नाटीका ४।७) । 'निर्विकल्प' शब्द भी
२ ( १७ ) इस प्रसंग में प्रयुक्त होता है—वृत्त्यन्तर-निरोधपूर्वक--आत्मगोचरधारावाहिक- निर्विकल्पकवृत्ती राजयोगः (ज्योत्स्ना ३।१२६); अयं निर्बीज इति, निर्विकल्प इति, निरालम्ब इति, राजयोग इति चोच्यते (योगचिन्ता०, पृ० ६) । चूँकि इस अवस्था में आत्मगोचर धारावाहिक निर्विकल्पक वृत्ति रहती है, अतः 'चित्तस्य एकाग्रतैव राजयोगः' कहा गया है (ज्योत्स्नाटीका ४।७७) । यह तुर्यावस्था- नामक है (ज्योत्स्ना ४।८०) । राजयोग की सिद्धि के लिए हठ-लय-मन्त्र रूप तीन योग हैं—यह योगियों का कहना है (ह० यो० प्र० ४।१०३) । अशेष¹दृश्योज्झितदृङ्मयानाम् अवस्थितानामिह राजयोगे । न जागरो नापि सुषुप्तिभावो न जीवितं नो मरणं विचित्रम्² ॥१५॥ [ १. अशेषदृश्योर्जितदृग्जयानां ( पाठ० )--'अशेषदृश्योर्जितदृग्जय = अशेषदृश्य के द्वारा ऊर्जित जो दृक् (= आत्मा, द्रष्टा), उसकी जय'--इस अर्थ की कोई भी संगति नहीं है। ऊर्जित = शक्तिशाली, प्रबल, प्रशस्यतर, विशिष्ट । 'अशेषदृश्योर्जित दृग्जय है जिनकी वे—यह अर्थ भी संगत प्रतीत नहीं होता । २. मरणं न चित्तम् (पाठ०)--न मरण और न चित्त ही रहता है । ] अनुवाद--जो राजयोग में अवस्थित होते हैं वे अशेष दृश्य के परिहार होने के कारण ब्रह्ममय हो जाते हैं। इनमें न जाग्रत अवस्था और न सुषुप्ति अवस्था होती है; न जीवन होता है और न मरण । यह एक विचित्र स्थिति है । अहं-ममत्वादि विधाय सर्वं श्रीराजयोगे स्थिरमानसानाम् ।
( १८ ) न द्रष्टा¹नास्ति च दृश्यभावः सा जृम्भते केवलसंविदेव ॥१६॥ [ १. दृश्यता (पाठा०)--यह पाठ असंगत है क्योंकि दृश्यता और दृश्य-भाव ( जो शब्द यहाँ प्रयुक्त हुआ है ) एक ही पदार्थ है । ] अनुवाद--जो अहंकार और ममत्व की बुद्धि का त्याग करके महान् राजयोग में स्थिरचित्त हो चुके हैं, ऐसे लोगों में दर्शक-भाव तथा दृश्य- भाव नहीं रहते; ( उस अवस्था में ) केवल संविद् ( ज्ञानमात्र ) प्रकाशित होती है । व्याख्या--श्रीयुक्तराजयोग = श्रीराजयोग । 'श्री' का प्रयोग करके राज- योग की गौरवित-महिमान्वित स्थिति दिखाई गई है । 'श्री' का ऐसा प्रयोग शाम्भवी मुद्रा के साथ भी देखा जाता है ( श्री शाम्भव्या, ह० यो० प्र० ४।३८ ) । ममत्व--'ममता' शब्द पर भास्कर कहते हैं--ममशब्दो विभक्ति- प्रतिरूपकमव्ययं ममेदमित्याकारकबुद्धिपरम् । सा च भेदघटितसंबन्धं स्वःसतो विषयी करोति ( ललितासहस्रनामभाष्य, पृ० ६४ ) । नेत्रे ययो¹न्मेषनिमेषशून्ये वायुर्यया²वर्जितरेच-पूरः । मनश्च संकल्पविकल्पशून्यं मनोन्मनी सा मयि सन्निधत्ताम्³ ॥१७॥ [ १. यथोन्मेष (पाठा०)--यह पाठ असंगत है क्योंकि 'तया' शब्द का प्रयोग नहीं किया गया है । २. यथा (पाठा०) पूर्ववत् असंगत । श्लोक में उपमा देने का कोई आग्रह नहीं है--यह द्रष्टव्य है ।
( १९ ) ३. शाक्त भास्कर ने इस श्लोक को ‘योगशास्त्रे मुद्राविशेषस्य संज्ञा’ कहकर उद्धृत किया है ( निमेषमुक्ते-पाठ है; पृ० ६८ ) । ] अनुवाद--जिस मनोन्मनी अवस्था ( मन का उन्मनीभाव ) के द्वारा ( अर्थात् जिसका अधिगम होने के कारण ) दोनो नेत्र उन्मेष-निमेष-हीन हो जाते हैं, रेचक और पूरक रूप वायु ( वायुक्रिया ) स्तब्ध हो जाता है तथा मन भी संकल्प एवं विकल्प से रहित हो जाता है वह ( उन्मनी भाव ) मुझमें आविर्भूत हो । व्याख्या-‘यया’ का संबन्ध ‘मनोन्मन्या’ से है ( चतुर्थ चरण में मनोन्मनी शब्द है । ) मनोन्मनी की स्थिति का आविर्भाव होने पर योगी के नेत्र, प्राणवायु और मन किस स्थिति में रहते हैं - यह यहाँ दिखाया गया है । उन्मेष = पक्ष्मसंयोग का विश्लेष--आँख का खोलना । निमेष = अक्षि- पक्ष्म का संयोग ( आँख का मूँदना ) ( ज्योत्स्नाटीका ४।३६ ) । ‘रेचक-पूरकहीन वायु’ का तात्पर्य उस अवस्था से है जिसमें श्वासक्रिया पूर्णतः अवरुद्ध हो जाती है, पर प्राणी जीवित रहता है क्योंकि निरोधबल का क्षय होने पर प्राणी व्युत्थित होता है । विकल्प को प्रायः संशय कहा जाता है ( प्रश्नोप० ६।६ भा० ) । मनोन्मनी--प्राणवायु का सुषुम्नामध्य में संचार होने पर मन का सम्यक् स्थैर्य ( = अभीष्ट ध्येयाकारवृत्तिमात्र का प्रवाह ) होता है । मन का यह स्थिरीभवन ही ‘मनोन्मनी’ कहलाता है ( ह० यो० प्र० २।४२; ४।२०) । मन का उन्मन होना = मन के द्वारा विषयमनन न होना । मनोन्मनी के लिए कभी कभी उन्मनी शब्द भी प्रयुक्त होता है । इसको ‘तुर्यावस्था’ भी कहा जाता है ( ज्योत्स्नाटीका ४।६४ ) । समल शरीर में यह अवस्था होती नहीं है । उन्मनी के लिए ह० यो० प्र० ४।८०, १०४, १०६; ब्रह्मबिन्दु ४; उत्तरगीता २।४९ द्र० । चित्तेन्द्रियाणां चिरनिग्रहेण श्वासप्रचारे शमिते यमीन्द्राः’ :
( २० ) निवात²दीपा इव निश्चलाङ्गा³ मनोन्मनी-मग्नधियो भवन्ति⁴॥१७॥ [ १. समस्ते (पाठ०) अर्थात् समस्ते श्वासप्रचारे। इस पाठ में 'भवन्ति' क्रिया का कोई विशेष्य-कर्ता-नहीं रह जाता तथा 'निश्चलाङ्गाः' विशेषण के साथ 'योगिनः' का अध्याहार करना पड़ता है। २. निर्वाति (पाठ०)। ३. निवातदीपैरिव निश्चलाङ्गैः (पाठ०)—निवात दीपों की तरह निश्चलअङ्गों के द्वारा। यह अर्थ हो सकता है, पर बहुत संगत नहीं जंचता। ४. मनोन्मनी सा मयि सन्निधत्ताम् (पाठ०)। इस पाठ में अर्थ संगत नहीं होता। यह वाक्य १७ वें श्लोक का चतुर्थ चरण है। लिपिकर के अनवधान से यह अंश यहाँ पुनः लिखित हो गया है—ऐसा प्रतीत होता है।] अनुवाद -चित्त और इन्द्रिय के दीर्घकालीन निग्रह के कारण श्वास- क्रिया निरुद्ध हो जाती है। ऐसी स्थिति में श्रेष्ठ योगी निवातस्थ दीपों की तरह निश्चलाङ्ग हो जाते हैं तथा उनकी बुद्धि मनोन्मनी-नामक अवस्था में मग्न हो जाती है। व्याख्या—'चिरनिग्रह' अर्थात् दीर्घकालव्यापी निरोध। निरोध में क्रम- विकास देखा जाता है (तुल० योगो हि प्रभवाप्ययौ, कठ० २।३।११)। निरोध संस्कार की वृद्धि (जो निरोधजनक क्रिया बार-बार करने से होता है) से निरोध-अवस्था की वृद्धि होती है। चित्त का निरोध होने पर श्वास-प्रश्वास स्वतः अवरुद्ध हो जाते हैं—यह जानना चाहिये। यहाँ 'श्वास-प्रचार' से वायु का नासिका द्वारा ग्रहण-त्याग (अर्थात् श्वास-निश्वास) विवक्षित है। श्वास = नासा में बाह्य वायु का प्रवेश; निश्वास = अन्तःस्थित वायु का बहिः निःसारण (ज्योत्स्ना ४।३१; निश्वास
( २१ ) के लिए प्रश्वास शब्द बहुत प्रयुक्त हुआ है) । तुल० अजस्रनिश्वासो रेचनम् ( देवल का वाक्य, मोक्षकाण्ड पृ० १७ में उद्धृत ) । यद्यपि सभी संस्करणों में निर्वात शब्द दृष्ट होता है, पर प्रकृत शब्द निवात है; द्र० गीता ६।१९ 'यथा दीपो निवातस्थो नेङ्गते सोपमा स्मृता' । किसी स्थान में आँधी आने से पहले वायु की अल्पता के कारण वायु का जो स्थिर भाव लक्षित होता है, अथवा अन्य कारणों से भी जो ऐसा स्थिर भाव होता है, वह निवात है । निवात वायु का सर्वथा अभाव नहीं है क्योंकि वायु न रहने पर दीप जल ही नहीं सकता—यह ज्ञातव्य है । उन्मन्यवस्थाधिगमाय¹ विद्व न्तुपायमेकं तव निर्दिशामि । पश्यन्नुदासीनदृशा प्रपञ्चं संकल्पमुन्मूलय सावधानः ॥१९॥ [ १. उन्मन्यवस्थामधिगम्य (पाठा०)--यह भ्रष्ट पाठ है । 'अधिगम्य' के साथ 'निर्दिशामि' का अन्वय नहीं हो सकता । दोनों क्रियाओं के कर्ता भिन्न हैं, अतः ल्यबन्त 'अधिगम्य' का प्रयोग असंगत ही है । ] अनुवाद--हे विद्वान ( =अध्यात्मविद्या के ज्ञाता ), उन्मनी-नामक अवस्था की प्राप्ति के लिए आपको एक उपाय का निर्देश करता हूँ; आप उदासीन दृष्टि से इस प्रपञ्च को देखते हुये सावधान होकर इस प्रपञ्च का उन्मूलन करें । व्याख्या--उन्मनी-अवस्था का अधिगम प्राणवायु के सुषुम्ना-वाहिनी होने पर होता है ( ज्योत्स्नाटीका ४।२० ); इस अवस्था में योगी स्वरूप-स्थित होता है ( ज्योत्स्नाटीका ४।२१ ) । उन्मनी-अवस्था को मन का लय भी कहा जाता है । मन का लय = मन का आत्माकार होना ( ज्योत्स्नाटीका ४।५९ ) ।
( २२ ) प्रपञ्च शब्द का अर्थ है--विस्तृत दृश्य । इस शब्द से 'प्रतिक्षण-परिणामी अनित्य, सीमाहीन विचित्र विषय' समझा जाता है । उदासीन दृष्टि का अभिप्राय है--आसक्तिहीन अर्थात् राग द्वेष-हीन दृष्टि । 'उद्'-उपसर्ग से ऊर्ध्वभाव द्योतित होता है; यह ऊर्ध्वस्थता तभी सम्भव है जब विषयज्ञाता जीव अपनी सत्ता को विषयसत्ता से पृथक् समझे । इस प्रकार समझना तभी सम्भव होता है जब राग-द्वेष से प्रभावित न होकर प्रपञ्च को देखने की शक्ति हो, प्रपञ्च का ज्ञानपूर्वक व्यवहार करने की सामर्थ्य हो । भ्रू मध्य दृष्टि का अभ्यास इस उदासीन भाव का सहायक है । संकल्प का मूल स्वरूप है--चित्त में कल्पित या स्मृत किसी क्रिया में अस्मिता का प्रयोग । यह सभी कामों( = कामनाओं) का मूल है कामों का उच्छेद संकल्पवर्जन से ही सम्भव है—'संकल्पप्रभवान् कामान् त्यक्त्वा सर्वा- नशेषतः' ( गीता ६।२४ ); 'संकल्पात् कामः संभवति' ( मोक्षकाण्ड पृ. ८१ में उद्धृत हारीत-वाक्य ), 'काम जानामि ते मूलं संकल्पात् किल जायसे'; 'कामं संकल्पवर्जनात्' ( शान्तिपर्व ३०१।५६ ) आदि वाक्य इस प्रसंग में स्मरणीय हैं । रागादि संकल्पनिमित्तक हैं—यह न्यायसूत्र (३।१।२६) में कहा गया है । सूत्र-व्याख्याकारों के अनुसार 'संकल्प' आकाङ्क्षाविशेष, मिथ्याज्ञानविशेष, अशोभन को शोभन समझना रूप कल्पना (जो भ्रम ही है ) है । सावधान = अवधान के साथ । आत्म-विस्मृति न होना, दूसरे शब्दों में 'अपने द्रष्टृ-भाव को लक्ष्य करते रहना' अवधान है। प्रसङ्ग संकल्पपरम्पराणां संछेदने¹ सन्ततसावधानम्² । आलम्बनाशादपचीयमानं³ शनैः शनै शान्तिमुपैति चेतः ॥२०॥ १. संभेदने (पाठ०)--यह पाठ भी संगत है । २. सावधानः ( पाठ० ) । 'सावधानः' पाठ करने पर इस श्लोक के
( २३ ) उत्तरार्ध के साथ इसका अन्वय नहीं हो सकता और पूर्वार्ध का वाक्य असंपूर्ण रह जाता है। 'सावधान:' का अन्वय १९ वें श्लोक के उत्तरार्ध के साथ हो सकता है; पर क्या ऐसा करना उचित होगा ? ३. अपनीयमानम् (पाठा०) । 'अपनीयमानं चेतः' कहने का कोई सार्थक्य नहीं है, अतः यह पाठ असंगत है। आलम्बनादावपचीयमाने (पाठा०)— आलम्बनादि के ह्रास या क्षय होने पर। आलम्बन का ग्रहण और त्याग होते हैं; यह त्याग वस्तुतः ह्रास नहीं है, अतः यह पाठ भी संगत नहीं प्रतीत होता । ] अनुवाद-जो चित्त संकल्पों की धारा का बलपूर्वक छेदन करने में निरन्तर सावधान (स्मृतियुक्त) है तथा आलम्बन के नाश के कारण अपचययुक्त क्षयशील (अर्थात् विक्षेपहीन, विषय-लोलताशून्य) है, वह धीरे-धीरे शान्ति को प्राप्त होता है। व्याख्या-शान्त चित्त के विषय में निम्नोक्त श्रौत उपमा द्रष्टव्य है- यथा निरिन्धनो वह्निः स्वयोनावुपशाम्यति । तथा वृत्तिक्षयाच् चित्तं स्वयोनावु- पशाम्यति ॥ (मैत्रायणी आर० ६।३४)। संकल्प-छेदन = संकल्प न करना । निःश्वासलोपैनिभृतैः १ शरीरैर् नेत्राम्बुजैरर्धनिमीलितैश्च २ । आविर्भवन्तीममनस्कमुद्राम् ३ आलोकायामो मुनिपुङ्गवानाम् ॥२१॥ [ १. विधूतैः (पाठा०) । ऐसा प्रतीत होता है कि जब 'निभृतैः' पाठ का सार्थक्य अज्ञात-सा हो गया तब यह पाठ कल्पित किया गया । २. नेत्राञ्जनैरर्धनिमीलितैश्च (पाठा०)। यह पाठ भ्रष्ट है क्योंकि नेत्र का अञ्जन अर्धनिमीलित नहीं हो सकता । ३. आविर्भवन्तीह मनस्कमुद्राम् (पाठा०) । इसका पदच्छेद 'आविर्भवन्ति इह' करने पर कोई संगति नहीं होती । 'आविर्भवन्ती इह' करके पद
( २४ ) ‘आविर्भवन्ती’ विशेषण का कोई विशेष्य नहीं मिलता । ‘मनस्क’ नामक कोई मुद्रा भी नहीं है । अतः यह पाठ शुद्ध नहीं है । ] अनुवाद--निश्वास का लोप, शरीर की विस्पन्दता तथा नेत्रपद्मों का अर्धनिमीलन होने पर श्रेष्ठ मुनियों में जो अमनस्क मुद्रा का आविर्भाव होता है, हम उसका दर्शन करते हैं । व्याख्या--अमनस्क भाव में स्थित व्यक्ति के स्वरूप के विषय में अमनस्क- योग २।८१-९१ विशेषतः द्रष्टव्य है । ‘निश्वास का लोप’ से पूर्ण श्वासक्रिया का लोप समझना चाहिये । वायु- ग्रहण रूप निश्वास (ज्योत्स्नाटीका ४।११२) नहीं होगा तो वायु का बहिः निःसारणरूप उच्छ्वास (या प्रश्वास) भी नहीं होगा । (निःश्वास शब्द भी क्वचित् प्रयुक्त होता है निश्वास के लिए; निःश्वासो निःसारणम्, योगचिन्ता० पृ० १७६) । ‘निश्वासलोपैः’ आदि शब्दों में जो तृतीया है वह ‘इत्थम्भूतलक्षणे’ (अष्टा० २।३।२१) सूत्र से है । निश्वासलोप आदि ज्ञापक हेतु हैं । शरीर का विशेषण ‘निभृत’ दिया गया है । निश्चल, निष्कम्प, स्थिर अर्थों में निभृत शब्द का प्रयोग प्राचीन ग्रन्थों में मिलता है (कुमारसंभव ३।४२; शाकुन्तल १।८) । प्राणस्थैर्य से शारीरिक स्थैर्य भी होता है; मन की स्थिरता प्राण की स्थिरता का हेतु है । आत्मस्थ होने पर नेत्र की अर्धनिमीलित स्थिति होती है (ह० यो० प्र० ४।४१) । प्रयत्नशून्यता(=निरायाम)-पूर्वक स्थैर्य होने पर ऐसा ही होता है—यह ज्ञातव्य है । अमी यमीन्द्राः¹ सहजामनस्का² देहे ममत्वे³ शिथिलायमाने । मनोऽतिगं मारुतवृत्तिशून्यं गच्छन्ति भावं गगनावशेषम्⁴ ॥२२॥
३. श्लोक २१-२९: अमनस्क भाव, विदेह-मुक्ति एवं योगतारावली उपसंहार
( २५ ) । १. अमी हि चेन्द्राः ( पाठ० ) इन्द्राः शब्द का कोई स्वारस्य नहीं है; यह भ्रष्ट पाठ है । २ सहजामनस्कात् ( पाठ० ) — सहज-अमनस्क के कारण । पर तब भाव- प्रधान निर्देश मानकर अमनस्क से अमनस्कत्व रूप अर्थ लेना होगा । ३. ममत्वम् (पाठ०) — यह लिपिकर-प्रमादजनित पाठ है । अहंममत्वे (पाठ०) — इस पाठ में जो एकवचन है वह सुसंगत नहीं है । ४. मनोगर्ति मारुतवृत्तिशून्यां गच्छन्त्यगम्यां गमनावशेषाम् (पाठ०) — जो वायुवृत्तिहीन गमनावशेष अगम्य मनोगतिःहै, उसको प्राप्त करते हैं । मनोगति का 'मन का चरम लक्ष्य' अर्थ करके तथा 'अगम्या' का 'दुष्प्रापा' अर्थ करके इस पाठ को भी संगत माना जा सकता है । पर 'गमनावशेषा' का तात्पर्य क्या होगा ? । अनुवाद — सहज ( = स्वाभाविक ) अमनस्क अवस्था प्राप्त होने के कारण देह में ममत्व जिनका शिथिल हो गया है, ऐसे श्रेष्ठ योगी मन का अगोचर तथा वायुवृत्ति ( = प्राण ) से शून्य आकाशमात्ररूप ( असीम ) भाव को प्राप्त करते हैं । व्याख्या -- अमनस्क का विशेषण सहज ( सह + ज ) है । यह विशेषण बहुत ही प्रसिद्ध है । इसका तात्पर्य निरायासता से है — प्रयत्न के बिना उदित होना — स्वयमेव उत्पद्यते -- 'उत्पद्यते निरायासात् स्वयमेवोन्मनी ( ह० यो० प्र० १।४१ ) । भाव के तीन विशेषण हैं (१) मनोतिग, (२) मारुतवृत्तिशून्य तथा (३) गगनावशेष । मनोऽतिग = मन की वृत्ति का अतिक्रमण करने वाला अर्थात मन का अगोचर । मारुतवृत्ति-शून्य = प्राणवायु की वृत्तियों ( = क्रियायों ) से विरहित । प्राण की क्रियायें प्रसिद्ध हैं । प्राण पांच रूपों में अपने को विभक्त करके शरीर
( २६ ) का विधारण ( = निर्माण वर्धन, पोषण ) करता है। ये पाँच रूप हैं--प्राण, उदान, व्यान, समान तथा अपान । हठयोग के ग्रन्थों मे इन पांचों की क्रियाओं का विशद विवरण मिलता है। गगनावशेष--गगन=आकाश । आकाश जिस प्रकार अमूर्त तथा बाधाहीन है, यह भाव उसी प्रकार का है--यह अभिप्राय है¹; तुल० शून्य, अतिशून्य, महाशून्य ( ह० यो० प्र० ४।७१-७४ ) । निवर्तयन्तीं निखिलेन्द्रियाणि¹ प्रवर्तयन्तीं परमात्मयोगम् । संविन्मयीं तां सहजामवस्थां कदा गमिष्यामि गतान्यभावः² । २३॥ [ १. निभृतेन्द्रियाणां (पाठ०)--भ्रष्ट पाठ है, क्योंकि षष्ठीविभक्ति का का कोई स्वारस्य नहीं है । २. गतान्यभागः (पाठ०) = गत हुआ है अन्य भाग जिसका, वह ( बहु- व्रीहि) । यह मैं ( अहम् ) का विशेषण है । इस विशेषण की संगति नहीं है । ] अनुवाद—सभी इन्द्रियों को निवृत्त करने वाली, परमात्मयोग की प्रवर्त्तिका तथा संविन्मयी उस सहज अवस्था को कब मैं अन्य भावों को छोड़ कर प्राप्त करूँगा । १. 'आकाश-सदृश' होने पर भी वस्तुतः आकाश की तरह बहुयोजनव्यापी नहीं है। उपमा जिसकी विवक्षा के लिए दी जाती है, उसका ही ग्रहण करना चाहिए द्र०-'आकाशवत् सर्वगतश्च नित्य इत्यपि प्रसिद्धमहत्त्वेन आकाशेन उपमानं क्रियते निरतिशयमहत्त्वाय, नाकाशसमत्वाय । यथेषुरिव सविता धावति इति क्षिप्रगतित्वाय उच्यते, नेषुतुल्यगतित्वाय तद्वत्' ( शारीरकभाष्य २।३।७ ) ।