भारतकोश
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अभिज्ञानशाकुन्तलम् (सन्दर्भदीपिका टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)

Abhijnanashakuntalam of Kalidasa Hindi

महाकवि कालिदास द्वारा

स्रोत: Abhijnanashakuntalam with Sandarbhadipika Tika & Hindi Translation (उद्गम)

DevanagariHindipublished262 पृष्ठ

प्रारंभिक पृष्ठ व विषय-सूची

चन्द्रशेखरचक्रवर्तिकृतसन्दर्भदीपिकाटीकया समलङ्कृतम् अभिज्ञानशकुन्तलम्

Prakashika Series
No. 10

General Editor
Dipti S. Tripathi

चन्द्रशेखरचक्रवर्तिकृतसन्दर्भदीपिकाटीकया समलङ्कृतम्
अभिज्ञानशकुन्तलम्

<br/>

सम्पादकः
वसन्तकुमार म० भट्ट

<br/>

राष्ट्रीय पाण्डुलिपि मिशन
॥ विज्ञानमृग्यम् ॥
National Mission for Manuscripts

राष्ट्रीय पाण्डुलिपि मिशन
नयी दिल्ली

तथा

न्यू भारतीय बुक कॉरपोरेशन
नयी दिल्ली

प्रकाशक : राष्ट्रीय पाण्डुलिपि मिशन 11, मानसिंह रोड, नई दिल्ली-110 001 फोन : 2338 3894; फैक्स : 2307 3387 E-mail: director.namami@nic.in www.namami.org सह-प्रकाशक : न्यू भारतीय बुक कॉरपोरेशन 208, द्वितीय तल, प्रकाशदीप बिल्डिंग, 4735/22, अंसारी रोड, दरिया-गंज, नई दिल्ली-110002 फोन : 011-23280214, 011-23280209 E-mail : deepak.nbbc@yahoo.in प्रथम संस्करण : 2013 © राष्ट्रीय पाण्डुलिपि मिशन ISBN: 978-93-80829-02-9 (Series) ISBN: 978-93-80829-18-0 (Vol. X) मूल्य : Rs. 300.00

आमुख

संस्कृत साहित्य में ही नहीं विश्व साहित्य में भी अभिज्ञानशकुन्तलम् का स्थान अद्वितीय है। कालिदास का यह अद्भुत नाटक साहित्याकाश का वह जाज्वल्यमान प्रदीप है जिसने समालोचकों, साहित्यप्रेमियों एवं सामान्य पाठकों को भी रसाप्यायित किया है। लेकिन जिस प्रकार इसके रचयिता कालिदास के विषय में ऐतिहासिक प्रमाणों के भाव में मतमतान्तर प्रचलित हैं उसी प्रकार अभिज्ञानशकुन्तलम् को लेकर भी पाठों के विषय में अनेक भेद उपलब्ध होते हैं। सबसे पहले तो नाटक का नाम ही अभिज्ञानशकुन्तलम् एवं अभिज्ञानशाकुन्तलम् दोनों रूपों में उपलब्ध होता है। पुनः नाटक के आकार, विस्तार तथा उसमें उपलब्ध श्लोकों की संख्या को लेकर भी विद्वानों में मतैक्य नहीं है। इस नाट्यकृति की दो पाठ परम्पराएँ उपलब्ध होती हैं (1) लघुपाठ एवं (2) वृहत् पाठ। लघुपाठ परम्परा में, देवनागरी में लिखित एवं भारत के दाक्षिणात्य प्रान्तों में उपलब्ध पाठ प्रकाशित हो चुके हैं। वृहत् पाठ परम्परा में बंगाली, मैथिली, काश्मीरी एवं उत्कल प्रान्त में उपलब्ध पाठ-भेद विद्वानों के समक्ष मूल पाठ के निर्धारण में समस्याएँ उत्पन्न करते हैं। इतना ही नहीं इन पाठ-भेदों पर उपलब्ध टीकाओं की भी लम्बी सूची है। यह विपुल साहित्य कालिदास के मूल पाठ तक पहुँचने में अनेक रूपों में सहायक होता है तो उसके साथ ही अनेक समस्याएँ भी उत्पन्न करता है। यह खेद एवं चिन्ता का विषय है कि अद्यावधि शाकुन्तल की वैसी पाण्डुलिपि उपलब्ध नहीं हो सकी है जिसे कालिदास की मूलकृति के सर्वाधिक निकट माना जा सके। यह अनुपलब्धि जहाँ एक ओर सम्पादन का कार्य कठिन बना देता है वहीं दूसरी ओर इस बात का साक्षात् प्रमाण है कि काश्मीर से लेकर कन्याकुमारी तक एवं बंगाल से लेकर गुजरात तक इस नाटक को कितनी लोकप्रियता प्राप्त हुई थी। डॉ० रिचर्ड पिशेल ने सबसे पहले बंगाल में उपलब्ध पाठ के आधार पर समीक्षित पाठ का प्रकाशन किया था, उसके बाद से अनेक विद्वानों ने विभिन्न पाठों एवं टीकाओं की तुलना कर के मूल पाठ तक पहुँचने का प्रयत्न किया है।

कालिदास की कृतियों का कोई भी मूल पाठ उपलब्ध नहीं होने के कारण समालोचकों के लिए मूल पाठ के निर्धारण में टीकाएँ सहायक सामग्री सिद्ध होती हैं। केवल मूल ग्रन्थ के पाठों के आधार पर किया गया सम्पादन अनेक बार सर्वथा निर्दुष्ट पाठ का निर्धारण नहीं कर पाता क्योंकि मूल ग्रन्थ का पाठ-भेद लिपिकारों और नाटक के सन्दर्भ में मंचीय

(vi)

आवश्यकताओं के लिए निर्देशकों की दृष्टि और सुविधा से नियन्त्रित होता है। टीकाकार, रचना के साहित्यिक सन्दर्भों का, उसके गुण-दोषों का एवं पाठ की स्वीकार्यता का तार्किक विश्लेषण कर टीका में अपना मन्तव्य रखता है; इसीलिए शाकुन्तल जैसी प्रचलित एवं लोक प्रसिद्ध कृति के पाठ निर्धारण में टीकाओं का महत्वपूर्ण योगदान होता है।

शाकुन्तल की शंकरकृत रसचन्द्रिका एवं नरहरिकृत अभिज्ञानशकुन्तल टिप्पणी मिथिला विद्यापीठ में सन् 1957 में प्रकाशित हो चुकी है। उत्कलीय पाठ पर श्री नवकिशोरकर शास्त्री ने आधुनिक काल में एक टीका लिखी है। देवनागरी पाठ पर राघव भट्ट की टीका का नाम अर्थद्योतनिका है। शाकुन्तल की सर्वाधिक टीकाएँ दाक्षिणात्य पाठ पर उपलब्ध होती हैं। इनमें से 'चर्चा' टीका के लेखक का नाम अज्ञात है लेकिन अन्य टीकाओं में काटयवेम की कुमारगिरिराजीया एवं अभिराम की दिङ्मात्रदर्शना उल्लेखनीय हैं। शाकुन्तलव्याख्या श्रीनिवासाचार्य की कृति है। घनश्याम ने संजीवन टिप्पण की रचना की है एवं नारायण पण्डित की टीका का नाम प्राकृतविवृति है। इससे ऐसा प्रतीत होता है कि दक्षिण भारत में शाकुन्तल अत्यधिक लोकप्रिय था और लम्बे समय तक समालोचना का विषय बना रहा।

चन्द्रशेखर नामक टीकाकार ने अभिज्ञानशकुन्तल पर सन्दर्भदीपिका नामक टीका लिखी है। इसी लेखक की शिशुपालवध पर सन्दर्भ चिन्तनम् टीका उपलब्ध होती है। विभिन्न अंतः साक्ष्यों के आधार पर प्रो० वसन्त भट्ट ने लेखक का समय ईसवी सन् 1600-1650 के बीच अनुमान किया है। 17वीं शताब्दी की यह टीका तत्काल उपलब्ध पूर्व के टीकाकारों की टीकाओं से निश्चय ही समृद्ध हुई होगी।

प्रो० वसन्त भट्ट ने पूर्व में अप्रकाशित टीका के सम्पादन में दो पाण्डुलिपियों का उपयोग किया है। जिनमें से एक को वे मूल एवं दूसरी को इसकी अनुकृति मानते हैं। सिर्फ टीका का सम्पादन करना इस बात को स्पष्ट नहीं करता कि वह टीका किस पाठ पर आधारित है अतः प्रो० भट्ट ने रिचर्ड पिशेल द्वारा सम्पादित पाठ को मूल आधार बनाया है।

प्रो० भट्ट ने अत्यधिक श्रम एवं निष्ठा से पूर्वापर का सम्यक् विनियोग करते हुए यह श्रम साध्य सम्पादन किया है। उनके द्वारा प्रस्तुत प्रमाण आगे भी विद्वानों को अभिज्ञानशकुन्तल के कालिदासीय मूल पाठ तक पहुँचने में सहायता करेंगे, ऐसा विश्वास है। साहित्य के इस प्रामाणिक ग्रन्थ-सम्पादन के लिए मिशन प्रो० वसन्त भट्ट का आभारी है। न्यू भारतीय बुक कॉरपोरेशन ने इसके सुरुचिपूर्ण प्रकाशन में जो अभिनिवेश किया है उसके लिए मिशन की ओर से साधुवाद। विद्वज्जन की प्रतिक्रियाएँ मिशन के प्रकाशनों को सार्थकता एवं गति प्रदान करेंगी।

प्रथम आषाढ 1935
22 जून, 2013
नयी दिल्ली

दीप्ति त्रिपाठी

अस्मदीयम्

महाकवि कालिदास के अभिज्ञानशाकुन्तलम् की देवनागरी वाचना पर राघवभट्ट की “अर्थद्योतनिका” टीका प्रकाशित है तथा दाक्षिणात्य वाचना पर बहुत सारी टीकायें प्रकाशित हुई हैं। इनमें काटयवेम की कुमारगिरिराजीया, अभिराम की दिङ्मात्रदर्शिनी, श्रीनिवासाचार्य की व्याख्या, घनश्याम की सञ्जीवन-टिप्पण, अज्ञातकर्तृक चर्चा टीका गणमान्य हुई हैं। मैथिली वाचना पर शङ्कर एवं नरहरि की दो टीकायें भी प्रकाशित हुई हैं। लेकिन इस नाटक की बंगाली वाचना पर लिखी गयी एक भी टीका अद्यावधि प्रकाशित नहीं हुई थी। इस वाचना पर चन्द्रशेखर चक्रवर्ती ने टीका लिखी थी, किन्तु उसकी एक भी पाण्डुलिपि भारत में नहीं थी। आज यहाँ पर चन्द्रशेखर चक्रवर्ती की “सन्दर्भ-दीपिका” टीका का समीक्षित पाठसम्पादन प्रकाशित किया जाता है। यह क्षण एक अपूर्व उत्सव समान है। क्योंकि भारत में लिखी गयी, लेकिन आज इन्डिया ऑफिस लाईब्रेरी, लंदन के संग्रहालय की शोभा बढ़ा रही दो पाण्डुलिपियों के आधार पर उसीका प्रकाशन हो रहा है। ये दोनों पाण्डुलिपियाँ बंगलिपि में लिखी गयी हैं। उसका विनियोग डॉ. रिचार्ड पिशेल एवं डॉ. दिलीपकुमार काञ्जीलाल के द्वारा किया गया था। पिशेल ने इस टीका के कुछ अंश अपने प्रथम संस्करण में दिये थे। लेकिन अद्यावधि उसका साद्यन्त पाठ देवनागरी में लिप्यन्तरण करके समीक्षित संस्करण के रूप में प्रकाशित नहीं हुआ था। यह आज कालिदासानुरागियों के समक्ष प्रथम बार प्रकाशित हो रहा है।।

करीब एक सौ साल से ऐसा पूर्वाग्रह फैला हुआ है कि अभिज्ञानशकुन्तलम् का बंगाली वाचना में प्रवहमान पाठ प्रक्षेपों से भरा है और वह मौलिकता से बिछड़ा हुआ पाठ है। देवनागरी पाठ की ओर पक्षपात दिखानेवाले प्रॉफे. पी. एन. पाटणकर (1902), प्रॉफे. शारदारञ्जन राय (1908), और पण्डितप्रवर डॉ. रेवाप्रसाद द्विवेदीजी (1986) आदि विद्वानों ने बंगाली वाचना के पाठ की कड़ी आलोचना की है, और देवनागरी वाचना के पाठ को ही मूलभूत पाठ माना है। आज सारे भारतवर्ष में इस नाटक का पठन-पाठन देवनागरी वाचना के पाठ से ही चल रहा है।। लेकिन प्रॉफे. दिलीपकुमार काञ्जीलाल (1980)ने पहली बार बंगाली पाठ की आपेक्षिक प्राचीनता एवं मौलिकता का समर्थन अनेक प्रमाणों

(viii)

से किया है। जिससे इस विवादग्रस्त प्रश्न में पुनरपि नवजागृति लायी गयी है। भूतकाल में कतिपय ऐसे भी विद्वान् आये हैं, जैसे कि - प्रो० श्री बलवन्तराय क. ठाकोर (गुजरात, 1922), जिन्होंने किसी एक वाचना के पाठ का आग्रह नहीं जताया था। किन्तु सभी वाचनाओं के पाठान्तरों का आलोडन करके, इकलेक्टीक प्रिन्सिपल्स का आश्रयण करते हुए, जहाँ से भी अधिक नाट्यक्षमता वाला पाठ मिले उसका चयन करके शाकुन्तल का पाठ पुनर्गठित करने का कहा था। (यह अभिगम ऑल इन्डिया ओरिएन्टल कॉन्फरेन्स के प्रथम अधिवेशन, पूणे, 1912 में “द टेक्स्ट ऑफ शकुन्तला” शीर्षकवाले शोध-आलेख से व्यक्त किया गया था।) तत्पश्चात् श्रद्धेय प्रो० एस. के. बेलवलकर जी (पूणे, 1923)ने अभिज्ञानशाकुन्तल के विभिन्न दृश्यों की उच्चतर समीक्षा करके, काश्मीरी पाठ की ओर अपना पक्षपात घोषित किया था। संक्षेप में कहें तो, विगत शताब्दी में केवल चार-पाँच विद्वानों ने ही इस नाटक की पाठालोचना की है। और अभी भी अभिज्ञानशाकुन्तल की सर्वसम्मत हो सके ऐसी समीक्षितावृत्ति बनाने का कार्य अवशिष्ट है। क्योंकि 1. काश्मीरी एवं दाक्षिणात्य वाचनाओं का सही समीक्षित पाठसम्पादन अभी तक अवशिष्ट है, तथा 2. बंगाली वाचना पर लिखी गयी चन्द्रशेखर चक्रवर्ती जैसे महत्त्वपूर्ण टीकाकार की टीका अद्यावधि अप्रकाशित रही थी। किसी भी कृति का समीक्षित पाठसम्पादन तैयार करने में प्राचीन टीकाएँ सहायक-सामग्री की भूमिका निभाती हैं। अतः उसका प्रकाशन परम उपकारक सिद्ध होगा।

अभिज्ञानशकुन्तल की उपलब्ध पाँचों वाचनाओं में से बंगाली वाचना का पाठ ही सब से प्राचीन है ऐसा डॉ. दिलीपकुमार काञ्जीलाल (1980) ने सिद्ध किया है। लेकिन बंगाली वाचना का पाठ ही सर्वांश में मौलिक भी होगा यह मानना मुश्किल है। अतः चन्द्रशेखर चक्रवर्ती की इस सन्दर्भदीपिका टीका का समीक्षित पाठसम्पादन करने के साथ साथ, बंगाली पाठ की उच्चतर समीक्षा करना भी अनिवार्य है ऐसा सोचा गया है। इस तरह की समीक्षा के लिए मौलिकता का दावा करनेवाली देवनागरी एवं बंगाली वाचनाओं का तुलनात्मक परीक्षण अधिक फलदायी होगा इस विचार से प्रेरित होकर यहाँ बंगाली एवं देवनागरी पाठ में प्रक्षेप एवं संक्षेप का तुलनात्मक विवरण भी प्रस्तुत किया गया है। बंगाली पाठ मौलिकता के नजदीक होते हुए भी उसमें कुछ ऐसे अंश दिखते हैं कि जो कृतिनिष्ठ आन्तरिक प्रमाणों से प्रक्षिप्त सिद्ध होते हैं। देवनागरी के पाठ में अनेक स्थानों पर कटौती करके पाठ को संक्षिप्त किया गया है यहाँ उस पर भी विस्तार से चर्चा की गयी है। इस चर्चा के दौरान, इस नाटक के पाठ का संचरण-इतिहास भी ध्यान में आया है। चतुर्थाङ्क के आरम्भिक चार श्लोकों के पाठभेद से ऐसा इङ्गित मिला है कि शाकुन्तल की विद्यमान पाण्डुलिपियों में शारदालिपि के पाठ से आरम्भ करके पहले मैथिली वाचना में पाठसंक्रमण हुआ है। तदनन्तर मैथिली से बंगाली वाचना का बृहत्पाठ आकारित हुआ होगा और चतुर्थ

(ix)

स्तर पर बृहत्पाठ में से संक्षिप्तीकरण की प्रक्रिया शुरू होकर देवनागरी एवं दाक्षिणात्य वाचनाओं का लघुपाठ सम्भूत हुआ है।। यदि इन दोनों पाठ-परम्पराओं की उच्चतर समीक्षा करके मौलिकता कहाँ पर संनिहित है यह निर्णीत नहीं किया जायेगा और दोनों पाठ-परम्पराओं के पक्षधर परस्पर विमुख या उदासीन ही रहेंगे तो अभिज्ञानशाकुन्तल के सही पाठ से और सही सौन्दर्य से हम अभी भी वञ्चित रहेंगे। आशा है कि प्रस्तुत प्रयास से इस दिशा में नया अरुणोदय होगा। इस कार्य में मेरे अनेक प्रिय छात्रों ने निरन्तर परिश्रम किया है। पाण्डुलिपियों का देवनागरी में लिप्यन्तरण करने में श्रीमती भारती पटेल, श्री धमेन्द्र भट्ट साधुवाद के पात्र हैं। श्री सञ्जय दमयन्ती एवं श्रीमती शिप्रा दत्त के प्रति भी सहायता के लिए आभार।

राष्ट्रीय पाण्डुलिपि मिशन की विदुषी निदेशिका प्रो० दीप्ति त्रिपाठी का सादर आभार जिन्होंने प्रकाशिका सिरीज़ में इस ग्रन्थ के प्रकाशन का प्रस्ताव स्वीकार ही नहीं किया, उसे तुरंत कार्यान्वित भी किया।

सहधर्मचारिणी श्रीमती वृन्दा भट्ट तथा सुपुत्री डॉ० कृष्णा एवं चि० विश्वेश मेरे कार्य में प्रेरणा स्रोत रहे हैं। उन्हें आभार व्यक्त कर उनके महत्त्व को कम नहीं करूँगा। इस कार्य की पूर्ति में विभिन्न प्रकार से सहायता प्रदान करने के लिए निम्नांकित विद्वानों का नाम स्मरण समीचीन होगा। सबसे पहले चन्द्रशेखर चक्रवर्ती की इस टीका की दो पाण्डुलिपियाँ उपलब्ध करवाने के लिए इण्डिया ऑफिस लाईब्रेरी, लंदन के प्रति मैं औपचारिकता निभाते हुए हृदय से आभार व्यक्त करता हूँ जिनके अभाव में यह सम्पादन सम्भव ही नहीं था। एक तीसरी प्रति के रूप में, डॉ० दिलीप कुमार काञ्जीलाल ने जो इस टीका की प्रति अपने हाथों से लंदन में लिखी थी, वह मुझे प्रदान की थी, उसके लिए भी मैं हार्दिक आभार व्यक्त करता हूँ और प्रणाम निवेदित करता हूँ। इस कार्य के प्रति शुभाशंसा प्रदान करने के लिए मैं पूज्यश्री डॉ० रेवाप्रसाद द्विवेदी जी, डॉ० राधावल्लभ त्रिपाठी, डॉ० जितेन्द्र शाह, डॉ० बालकृष्ण शर्मा, डॉ० प्रभुनाथ द्विवेदी को सादर प्रणामाञ्जलि निवेदन करता हूँ।

14 जनवरी, 2013
मकरसंक्रान्ति
वसन्तकुमार म० भट्ट
अहमदाबाद

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अनुक्रमणिका

विषयपृष्ठ
आमुखv
अस्मदीयम्vii
पाण्डुलिपियों के फोटोग्राफ्सxiii
1. प्रस्तावना1–94
(क) उपोद्घात, पाण्डुलिपियों का विवरणादि
(ख) अभिज्ञानशकुन्तल के बंगाली पाठ की मौलिकता के समर्थक कृतिनिष्ठ प्रमाण
(ग) अभिज्ञानशकुन्तल के बंगाली एवं देवनागरी पाठ में प्रक्षेप एवं संक्षेप
2. अभिज्ञानशकुन्तल एवं सन्दर्भदीपिका टीका—समीक्षित पाठसम्पादन95–236
प्रथमोऽङ्कः95
द्वितीयोऽङ्कः120
तृतीयोऽङ्कः134
चतुर्थोऽङ्कः155
पञ्चमोऽङ्कः175
षष्ठोऽङ्कः192
सप्तमोऽङ्कः220
3. परिशिष्ट-1:
चन्द्रशेखरेण निर्दिष्टांनां श्लोकानाम् अकारादिक्रमेण सूचिः237–244
4. परिशिष्ट-2:
चन्द्रशेखरेण निर्दिष्टानां ग्रन्थकाराणाम् अकारादिक्रमेण सूचिः245–246
5. सन्दर्भग्रन्थ-सूचिः247–248

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पाण्डुलिपियों के फोटोग्राफ्स


[पत्र १]

ॐ नमोगणेशाय ॥ श्रीजगद्वल्लभचरणसरोजद्वयं प्रणम्य । श्रीचन्द्रशेखररुचितिताम्बुजेरुः नमयन्नि
कविसकलप्रदायतामवदता कविप्रदम् कालिदासः सुकनावतउरयाश्चारत्कारणशरम्यत्वात्कवतेः शपथं वलिपदानाम् अनुवृत्तित्वात् निवृत्तिक-
मा: परदेव ककवान् महादेवस्तस्यि नूतिस्तुतिविद्येत्याम्मानं वरमभवतातिः कालिः मायुक्तिः प्रशुक्ताशवरदर्शनात्तसिकडतासिद्विषाउवा-
तैरर्जुनरूपा ॥ मायेति वदनीमद्रणः घुटार्किकं बरहितैर्विः कीदृशं वदिदानाम्पास्तेष्वित्यर्थः पास्तिएकणयायायेमधीयजसानदक-
त्वेवमृकच्छलागतो कायस्थकुलवरडमार्क जपादसमसङ्कलादशदनानासाकीदृशंश्वेतः कर्म्मविविधायोगात्ताबरोग्राः शब्दार्थयम्नाश्च
सर्वेषां विद्वानश्रीरासिनीनाप्रधडाठक्‌क पटिकुलमणिस्तितिडनसामात्यः पुराविदः पाण्डिताश्च पण्डितार्थेषु । साधार्यार्थविशेषाणि दानाक्ष्येषु
प्रणामतैः साधारूपां धात्पाणपानरमणः । उल्लुतिः कीदृशीतिः प्रभवतातिः बोधयथासिक्किनायश्चापतोतिकमयः रूपाः कीदृशः
महिम्नवन्तः शङ्किनः मर्कितुरूपं ब्रह्मणानिदान्पादकं सम्प्रुक्ति मूर्त्तिनिहापमादायदूपस्यायतीः । संद्रूपदर्शपतिः पादरथमण्डलेवति-

उल्लेखः १
77A/41


[पत्र २]

...तारादिवानावरोगातपामितिशेषः समुदायवचनानह्येकत्वम साधम्‌ मनुष्याणामितिव्यवहारो भवति महाभारतेपि; सप्तर्षीणाञ्च आश्रमेश्रेणीष्वेनलोम्नानिधानान् । आ-
म्नायीतिकि पाठः । यथाशीलिनामयमादेशिन अयुक्तं षाड्गुण्यादितिशब्दप्रयोगविरोधायोवृतङ्के ॥ * ॥ इति महामहोपाध्यायश्रीविश्वनाथतर्कपञ्चाननभट्टाचार्य्य-
विरचितकविताकल्पद्रुमतटीकायां काव्यसंस्कृतीविद्यायां महाकविविवरणंसमाप्तम् ॥० ॥ श्रीराधारमणाय नमः ॥ ० ॥ * ॥ शकाब्दाः १७२४ ॥ श्रीकृष्णायनमः ॥

इन्डिया ऑफिस लाईब्रेरी, लंदन के संग्रहालय में स्थित मेन्युस्क्रिप्ट, क्रमांक 4117 एवं 4118


(xiv)

[शीर्ष टिप्पणी]
1
अभिज्ञानरत्नाकर - टीका, धनुर्धरकृत, F.O 139e / 4118
रामः


[मूल हस्तलिखित पाठ]

नमोगणेशाय। श्रीलक्ष्मणचरणकमलयुगलमरविन्दलोचनं नमामि। भक्तकल्पवृक्षं। विज्ञानामृतसिन्धुं ज्ञानप्रदं विवस्वन्तं ॥१॥
हस्तिनिक्षयिनिर्णयप्रतिपादिकाग्रन्थः पण्डितपद्मसमरान वाग्देवता विज्ञाने ध्यावेनं ततः सङ्कलङ्का मोक्षमार्गकरणं मध्यमलोकः
व्यवहारेणानन्तरं विवदमाना नामार्थ ज्ञानं विना नकोऽप्यवगच्छति तात्कालिकेक्षण ब्रह्मश्रवज्ञान मथावधारणाय बुद्धिविशुद्धि
हेतुकारकपञ्चकः तदिः यद्यतः प्रथयः प्रथमतपञ्च महाविघ्ननाशाय नमस्कृतः यस्माज्ज्ञानात् सवि विक्षिप्तोऽज्ञानः मोक्षप्रसादन
ा या हरिरित्यनुवृतातिकृति हस्तः हस्तः संहत्यैः वीक्ष्यते (वेदविधाने गद्यपाठकः सामग्रीया यावती क्रमान्वया गत्या (वेदसूक्तम् नियमादि
कार्या समाधिवतः बृक्षकैः चक्रवर्तीरुपेण मायायाः सत्व रजस्तमः समावस्थतया क्रमतामवदिसंज्ञा कृतेः युक्तिसार्थक्या तस्या
प्राः वाक्यार्थ्याः संचिन्त्युक्तं दिक्कालानां चतुर्भिः समभवन्मध्यान्तः शेष्याः ज्ञानानाः पूर्त्तदीनां दृष्टान्तैरुपदिष्टामिति स्तुत्या
२: पुरारिनाम्नटोपेः साम्प्रतमीकरणा विना केन ज्ञप्तिः क्रिया चेदितिः प्रत्यक्षाख्यानो मन्त्रान्वयः प्रायश्चः सपाद कृत्या सा
मानं वृत्त्याः प्रकृतेः हेतु रिति १ परस्मैति २ वेद्यत्वम् आनन्दायति विवर्त्तते ३ काइण ४ प्रचीन ५ मूर्त्तत्वं ६ ज्ञानहेतुरिति नामा
न्तरक पार्थिव नानोदाह धीमन्तश्चकीर्त्तनः प्रकृतो निरूप्यो भूत्वा कृति मते मद्या चोवाम पृच्छाकृत २-१५६
श्रीर

प्रस्तावना

1. उपोद्घात

कवि कालिदास का अभिज्ञानशकुन्तल नाटक न केवल संस्कृत नाट्य-साहित्य में उत्तमोत्तम सर्जन है, किन्तु विश्वनाट्य साहित्य में भी वह प्रथम पङ्क्ति में विराजमान है। यह नाटक श्रेष्ठ एवं सर्वाधिक लोकप्रिय होने से रङ्गमञ्च पर भी उसकी प्रस्तुति बार बार होती रही है। किन्तु इसी कारण से उसके मूलपाठ में भी निरन्तर बहुविध परिवर्तन होते रहे हैं। परिणामतः आज भारत देश की विभिन्न लिपियों में लिखी गयी पाण्डुलिपियों में संचरित हुआ इस नाट्यकृति का पाठ दो पाठपरम्पराओं में प्रवाहित हुआ मिलता है। (1) बृहद् पाठ एवं (2) लघु पाठ। पहली, बृहद् पाठपरम्परा की तीन या चार वाचनायें मिलती हैं। जैसे- 1. बंगाली 2. मैथिली, 3. काश्मीरी और 4. उत्कलीय। दूसरी, लघु पाठपरम्परा की दो वाचनायें दिखती हैं-5. देवनागरी, एवं 6. दाक्षिणात्य। (इन पाँचों वाचनाओं को रंगावृत्तियों के रूप में भी देख सकते हैं। मंचन के दृष्टिकोण से देखा जाय तो बृहत्पाठवाला नाटक अभिज्ञानशकुन्तल नाम से प्रचलित हुआ है तथा लघुपाठवाला अभिज्ञान-शाकुन्तल नाम से प्रचलित हुआ है। इस नाटक की द्विविध पाठपरम्पराओं पर टीकाकारों ने जब टीका-टिप्पण लिखे तब उन्होंने अलग अलग प्रान्त में प्रचलित पाठपरम्परा को अपने सामने रखा। अतः इन टीका-टिप्पणादि का सम्बन्ध भी किन किन वाचनाओं के साथ है वह भी ज्ञातव्य है। प्राप्त सूचनाओं के आधार पर कहा जाता है कि (1) बंगाली वाचना पर दो टीकायें लिखी गयी हैं:-(क) चन्द्रशेखर चक्रवर्ती की “सन्दर्भदीपिका” टीका, जिसकी समीक्षितावृत्ति आपके हाथ में है। यह प्रथम बार प्रकाशित हो रही है। (ख) न्यायाचार्य की “रसिकमनोरमा” नामक टीका, जिसके सम्पादन का कार्य अभी चल रहा है। (2) मैथिली पाठ पर शङ्कर की “रसचन्द्रिका” एवं नरहरिकृत “अभिज्ञानशकुन्तलटिप्पणी”, जो मिथिला विद्यापीठ, (सन् 1957 में) दरभङ्गा से प्रकाशित हुई है। (3) काश्मीरी पाठ पर किसी ने टीका लिखी है या नहीं उसकी कोई सूचना नहीं है। (4) उत्कलीय पाठ (जिसको स्वतन्त्र पाठपरम्परा कहना मुश्किल है, उस) पर एक आधुनिक टीका मिलती है, जिसके रचयिता हैं श्रीनवकिशोरकर शास्त्री, वाराणसी। (5) देवनागरी पाठ पर राघवभट्ट ने एक टीका लिखी है, जिसका नाम “अर्थद्योतनिका” है और (6) जो दाक्षिणात्य पाठ है, उस पर अनेक

2 चन्द्रशेखरचक्रवर्तिकृतसन्दर्भदीपिकया समलङ्कृतम्

टीकाएँ उपलब्ध होती हैं। जैसे 1. काटयवेम की “कुमारगिरिराजीया” नामक टीका, 2. अभिराम की “दिङ्मात्रदर्शना” व्याख्या, 3. श्रीनिवासाचार्य की “शाकुन्तलव्याख्या”, 4. घनश्याम की “सञ्जीवन-टिप्पण”, 5. अज्ञातकर्तृक “चर्चा” टीका, 6. नीलकण्ठ दीक्षित की टीका, 7. नारायण पण्डित की “प्राकृत-विवृति” टीका इत्यादि।।

अभिज्ञानशकुन्तल की पाँचों वाचनाओं में से बंगाली वाचना का पाठ ही डॉ० रिचार्ड पिशेल के द्वारा सर्व प्रथम “समीक्षित-पाठ” के रूप में प्रकाशित हुआ था। तथा डॉ० दिलीपकुमार काञ्जीलाल ने दुबारा इसी तरह का कार्य प्रस्तुत किया है। जिसमें उन्होंने तीन काश्मीरी पाण्डुलिपियों का भी विनियोग किया है। डॉ० काञ्जीलाल ने यह सयुक्तिक सिद्ध किया है कि अभिज्ञानशकुन्तल की सभी वाचनाओं में से बंगाली वाचना का पाठ ही प्राचीनतम है। तथापि इस वाचना के पाठ पर लिखी गयी दो टीकाओं में से एक भी टीका को प्रकाशित होने का सौभाग्य नहीं मिला था। अतः बंगाली पाण्डुलिपियों में प्रवाहित हुए इस नाटक के पाठ पर लिखी गयी चन्द्रशेखर चक्रवर्ती (ईसा की 16वीं शताब्दी) की इस “सन्दर्भदीपिका” टीका का प्रकाशन-कार्य चिरकाल से अभिलषित था। प्रस्तुत प्रकाशन से वह सम्पन्न हो रहा है।

2. टीका-ग्रन्थों के प्रकाशन की उपयोगिता

संस्कृत काव्य-साहित्य की विभिन्न कृतियों पर बहुत प्राचीन समय से टीका-टिप्पण-व्याख्यादि का प्रणयन होता रहा है। काव्य-सर्जन की प्रक्रिया के साथ साथ टीकाओं का प्रणयन होना भी स्वाभाविक ही है। क्योंकि सरस्वती का प्रथम उन्मेश कारयित्री प्रतिभा के रूप में प्रकट होता है, तथा दूसरा उन्मेश भावयित्री प्रतिभा के रूप में उदित होता है। जिसको आनन्दवर्धन ने “सरस्वत्यास्तत्त्वं कवि-सहृदयाख्यं विजयते।” इन शब्दों से कहा है। इस तरह साहित्य-जगत् में काव्यकृतियों के अनुज के रूप में टीका-ग्रन्थों का मूल्य भी महत्त्वपूर्ण है। इन टीका-ग्रन्थों के सहारे हम काव्यसौन्दर्य को पाने के लिए कदाचित् विशेष रूप से सक्षम हो सकते हैं। किन्तु आधुनिक युग में, काव्यकृतियों के रसास्वाद में सहायक ग्रन्थों के रूप में टीका-ग्रन्थों का मूल्य यथावत् रहते हुए भी क्योंकि हमारा एक दूसरे दृष्टिकोण से भी इनका महत्त्व बहुत अधिक प्रतीत होने लगा है। संस्कृत साहित्य ईसा पूर्व से चला आ रहा है और उसके पाठसंचरण का इतिहास अन्धेरे में होने से कवियों के द्वारा प्रणीत इन काव्यों के मूल पाठ का निर्धारण करना ही “इदं प्रथमतया” कर्तव्य बन गया है। पाण्डुलिपियों में सुरक्षित रहा पाठ तो दो सौ या तीन सौ साल से अधिक पुराना नहीं होता है क्योंकि पाण्डुलिपियाँ भूर्जपत्र या ताडपत्र, कागजादि जैसे अस्थाई फलक पर लिखी होने से उसके पुनर्लेखन/ प्रतिलिपिकरण की बार बार आवश्यकता रहती है। जिसके कारण आज उपलब्ध होनेवाली प्रायः सभी पाण्डुलिपियाँ दो सौ, तीन सौ साल से अधिक पुरानी नहीं होती हैं। अब पाठ-सम्पादक जब किसी भी एक-कर्तृक हो ऐसे काव्य के मूल पाठ

अभिज्ञानशकुन्तलम् प्रस्तावना 3

का सम्पादन करना चाहता है तब उसका अन्तिम लक्ष्य तो कवि-प्रणीत हो ऐसे मौलिक पाठ की गवेषणा करना, अथवा कवि-प्रणीत होने की जिस में सब से अधिक सम्भावना है ऐसे पाठ का निर्धारण करना होता है।¹ इस अन्तिम लक्ष्य को सिद्ध करने से पहले, पाठसम्पादक को प्राचीन काल से चली आ रही शताधिक पाण्डुलिपियों में से सब से पुराने समय में लिखी गयी हो ऐसी पाण्डुलिपि के सहारे “प्राचीनतर” काल के पाठ को ढूँढना है। और प्राचीनतर पाठ का निश्चय करने के बाद, उस काव्यकृति पर लिखी गयी टीकाओं में प्रतिबिम्बित हो रहे प्राचीनतम पाठ को भी ढूँढना आवश्यक होता है। क्योंकि काव्यकृति की पाण्डुलिपियाँ तो दो सौ, तीन सौ साल से अधिक पुरानी होती नहीं है, जब कि उनके टीकाकार तो इन पाण्डुलिपियों के रचना-काल से कहीं अधिक प्राचीनतर काल में बैठे होते हैं। अतः किसी भी एक-कर्तृक काव्य के प्राचीनतम पाठ को उजागर करने के लिए टीका-ग्रन्थों का मूल्य निर्विवाद रूप से बहुत अधिक है।। प्रस्तुत सन्दर्भ में बंगाली पाण्डुलिपियों के आधार पर प्रॉफे. रिचार्ड पिशेल (1876) तथा डॉ० दिलीपकुमार काञ्जीलाल (1980) ने अभिज्ञानशकुन्तल के बंगाली पाठ का समीक्षित पाठ-सम्पादन प्रकाशित किया है। लेकिन उसमें केवल नाटक के पाठ को संचरित करनेवाली बंगाली पाण्डुलिपियों का प्राधान्येन विनियोग हुआ है ऐसा दिखता है। यद्यपि उन दोनों महाशयों को चन्द्रशेखर की टीका का सुचारु परिचय है और उन्होंने उसका (प्राकृत उक्तियों के पाठ का निश्चय करने के लिए) बहुशः विनियोग भी किया है ऐसा कहा है। फिर भी चन्द्रशेखर चक्रवर्ती की टीका में प्रतिबिम्बित हो रहे पाठ के साथ बंगाली पाण्डुलिपियों में संचरित हुए पाठ का तौलनिक अभ्यास करके बंगाली पाठपरम्परा का प्राचीनतर पाठ कौन सा हो सकता है उसका निष्कर्ष शायद नहीं निकाला है ऐसा लगता है। कहने का तात्पर्य यही है कि केवल नाट्यकृति के पाठ की पाण्डुलिपियों के आधार पर समीक्षित पाठसम्पादन तैयार करने से पहले उस नाट्यकृति की जितनी भी टीकायें उपलब्ध हो सकती हैं उनका प्रकाशन होना चाहिए। टीकाकार अतिप्राचीन काल के होने से उनके समक्ष निश्चित रूप से अधिक पुरानी पाठपरम्परा हो सकती है। अतः ऐसी प्राचीन काल की टीकायें पाठसम्पादन के कार्य में अधिक श्रद्धेय “सहायक सामग्री” मानी जाती हैं, जिसमें काव्यकृतियों की पाण्डुलिपियों में संचरित हुए पाठ की अपेक्षा से अधिक प्राचीनतर पाठ सुरक्षित मिल सकता है। अतः प्रस्तुत टीका के सम्पादन से यह भी जानने को मिलेगा की बंगाली पाठ का प्राचीनतम स्वरूप कैसा रहा है।


  1. प्राच्यविद्या से सम्बद्ध साहित्य की कृतियों का पाठ पञ्चविध है। 1. अकर्तृक वेदसाहित्य (मन्त्रसंहितायें), 2. श्रुतसाहित्य (बुद्ध एवं महावीर की वाणी), 3. अनेककर्तृक रचनायें (सूत्र, रामायण-महाभारतादि), 4. एककर्तृक रचनायें (काव्य, शास्त्रग्रन्थ, भाष्यादि) एवं 5. उत्कीर्ण शिलालेखादि। द्वितीय-तृतीय प्रकार के पाठ के संशोधन में केवल प्राचीनतम पाठ का निर्धारण ही इष्ट माना जाता है।

4 चंद्रशेखरचक्रवर्तिकृतसन्दर्भदीपिकया समलङ्कृतम्

3. समीक्षणीय सामग्री के रूप में उपयुक्त पाण्डुलिपिओं का विवरण

टीकाकार चन्द्रशेखर चक्रवर्ती के द्वारा प्रणीत “अभिज्ञान-शकुन्तल-सन्दर्भदीपिका” (अपर नाम “अभिज्ञानशकुन्तल-विवरण”) नामक टीका की दो पाण्डुलिपियाँ दि इण्डिया ऑफिस लाईब्रेरी, लन्दन के डीस्क्रिप्टिव केटलॉग में, (1) san, ms, i.o. 77-a : Keith, 4117 एवं (2) san, ms, i-o-1398e : Keith, 4118 क्रमाङ्क से निर्दिष्ट हैं।।

(क) प्रथम मातृका (क्रमांक-77-अ.) 4117, जिसके फलक का आकार 12×08 इंच है और पीले कागज पर पुरानी बंगलिपि में लिखी गयी है। यह कुल मिला कर 38 फोलियो में परिसीमित है। प्रत्येक पृष्ठ पर 8 पङ्क्तियाँ लिखी हैं, तथा प्रत्येक पङ्क्त में प्रायः 76 अक्षर अंकित हैं। इस मातृका का लेखन-काल 1728 शकाब्द है, अर्थात् 1806 ई.स. में लिखी गयी है।।

(ख) द्वितीय मातृका (कोलंब्रुक कलेक्शन, क्रमांक-1398,) 4118 है, जिसमें 12×06 इंच का फलक है और पुराने पीले कागज पर लिखी गयी है। प्रत्येक पृष्ठ पर 10 पङ्क्तयाँ लिखी गयी हैं तथा प्रत्येक पङ्क्त में करीब 60 अक्षर अंकित हैं। यह पाण्डुलिपि 18वीं शताब्दी के प्रारम्भिक समय में बंगलिपि में लिखी गयी है। यह पाण्डुलिपि कुल मिला के 40 फोलियो में परिसीमित है। 22 से 36 क्रमाङ्क के फोलियो लिखनेवाला लिपिकार कोई अन्य व्यक्ति हो सकता है। पुष्पिका भी किसी दूसरे व्यक्ति के द्वारा लिखी गयी दिखती है। यह मातृका पहलीवाली से अधिक सुवाच्य है।

(ग) डॉ० श्रीदिलीपकुमार काञ्जीलाल ने (लन्दन में) ऊपर वर्णित दोनों पाण्डुलिपियों की एक प्रतिलिपि अपने हाथों से लिखी थी। उन्होंने वह कॉपी उनकी ओर से मुझे सहर्ष भेंट की है। मूल मातृकायें जहाँ भी अवाच्य या सन्देहास्पद थीं वहाँ पर उनकी लिखी हुई प्रतिलिपि का विनियोग किया गया है जिसके लिये मैं डॉ० काञ्जीलालजी के प्रति आभारी हूँ और प्रणामाञ्जलि के साथ उनके प्रति कृतज्ञता ज्ञापित करता हूँ।।

(घ) ऐसा संकेत मिलता है कि एक और पाण्डुलिपि भी बांग्ला देश की राजशाही लाईब्रेरी में सुरक्षित है, जिसका क्रमांक-4336 है। परन्तु वहाँ पर किये गये पत्राचार का कोई प्रत्युत्तर मिला नहीं है।

4. प्रस्तुत पाठसम्पादन का परिचय एवं स्वीकृत नियम

भूमिका:- पूर्व-निर्दिष्ट दोनों बंगीय लिपि में लिखी हुई पाण्डुलिपिओं में संचरित पाठ का सर्व प्रथम देवनागरी-लिप्यन्तरण किया जाना चाहिए। इस टीका का पाठ देवनागरी में उपलब्ध होने पर ही इसका विनियोग व्यापक फलक पर हो सकता है। तदनन्तर, द्वितीय सोपान पर पाण्डुलिपिओं में पढ़े गये पाठ का व्याकरणानुसारी शुद्धिकरण करना परम

अभिज्ञानशकुन्तलम् प्रस्तावना 5

आवश्यक है। इसके लिये लिपिकार के प्रमादजन्य-स्खलनों को दूर करना तथा जहाँ भी कोई अवाच्यांश हो तो उस अंश का दूसरी पाण्डुलिपि के आधार पर विशदीकरण करना जरूरी है। दूसरी पाण्डुलिपि के पाठ से साथ पहली पाण्डुलिपि के पाठ का मिलान करते समय जो जो पाठभेद मिलते हैं उसका पादटीप में निर्देश किया गया है। दोनों प्रतियों का तुलनात्मक अभ्यास करके व्याकरण-शुद्ध एवं पूर्वापर सन्दर्भ में सुसंगत हो ऐसे पाठ का चयन करके, उसे आधुनिक विरामचिह्नादि के साथ, एक सुगम एवं परिष्कृत संस्करण तैयार करने का लक्ष्य रखा है।

भाष्य, वृत्ति, टीकादि रूप कृतियाँ अनेक-कर्तृक नहीं होने से (अर्थात् एक-कर्तृक होने के कारण ऐसे) टीका-ग्रन्थों के पाठ-सम्पादन में वाचनाभेद की प्रायः² समस्या नहीं होती है। अतः टीका-ग्रन्थ की दो प्रतियाँ जब समान काल में लिखी गयी हों तब उन दोनों में से किसी एक प्रति का पाठ, जो अधिक शुद्ध प्रतीत होता हो, उसको मुख्य आधार के रूप में स्वीकारना चाहिए। यदि उस आधारभूत प्रति में भी कुत्रचित् अवाच्यांश, अशुद्ध पाठ्यांश दिखायी दे तो वहाँ पर दूसरी प्रति का सहारा लेकर मूल पाठ का परिष्कृत स्वरूप तैयार किया जा सकता है। अतः प्रस्तुत टीका का देवनागरी लिप्यन्तरण और उसका एक परिशुद्ध संस्करण तैयार करना सम्पादक का प्रमुख कर्तव्य रहा है।

यहाँ जिन दो पाण्डुलिपियों का उपयोग किया गया है वह किसी एक पूर्वज पाण्डुलिपि से प्रतिलिपि करके तैयार की गयी प्रतीत होती हैं क्योंकि दोनों पाण्डुलिपियों के पाठ में प्रायः सर्वत्र समानता है। पाण्डुलिपि क्रमांक-4118 में कुत्रचित् एक या दो वाक्य अधिक हैं। अन्यथा समान पाठ्यांश मिलता है। अतः इन दोनों को हम समान वंशज प्रतियाँ कहेंगे। इन पाण्डुलिपिओं में संचरित हुए पाठ्यांश का पूर्व इतिहास प्रतिलिपि-कर्ताओं ने कहीं पर भी लिखा नहीं है, किन्तु उसका अनुमान किया जा सकता है:-

“क्ष” (चन्द्रशेखर का अप्राप्य स्वहस्तलेख)

“ज्ञ” (अज्ञात पूर्वज प्रति)

4117 क्रमांक की वंशज पाण्डुलिपि ............ 4118 क्रमांक की वंशज पाण्डुलिपि

इस तरह से उपलब्ध की गयी दोनों पाण्डुलिपियों का सम्बन्ध अनुमित किया जा सकता है। (बांग्लादेश में इसी टीका की जो तीसरी पाण्डुलिपि होने की जानकारी मिलती है, वह अनुपलब्ध होने से उसका सम्बन्ध अभी नहीं सोचा जा सकता है।)


  1. कालिदास के पद्यकाव्यों के प्रथम टीकाकार कश्मीर के वल्लभदेव की टीका में ऐसी समस्या निश्चित रूप से है कि उसका शारदा लिपिवाली पाण्डुलिपियों का पाठ और देवनागरी पाण्डुलिपियों में मिलने वाला पाठ बहुशः भिन्न दिखायी देता है। अतः वहाँ वाचनाभेद की समस्या हो सकती है।

6 चन्द्रशेखरचक्रवर्तिकृतसन्दर्भदीपिकया समलङ्कृतम्

इस सम्पादन में उपर्युक्त दोनों पाण्डुलिपियाँ एक समान पूर्वज से बनी हैं ऐसा दिखता है, इसलिए किसी एक पाण्डुलिपि का पाठ मुख्य रूप से स्वीकारा हो और दूसरी प्रति का पाठ गौण माना हो, ऐसा नहीं है। दोनों प्रतियों में मिल रहे समान पाठ्यांश में से जिसका पाठ कुत्रचित् अशुद्ध मालूम हुआ है, उसको पादटीप में रखा गया है। जहाँ दोनों में एक समान अशुद्धि दिख रही हो वहाँ पर पाठ की संशुद्धि प्रदर्शित करने के लिए निम्नोक्त कोष्ठकों का विनियोग किया गया है।।

(क) जहाँ किसी खण्डित या लुप्तांशवाले शब्द में किसी एक या दो वर्ण की पूर्ति करनी आवश्यक लगती है वहाँ [ ] इस तरह के कोष्ठक से क्षतिपूर्ति की गयी है।। उदाहरण के रूप में-[न] कदाचित् स[त्]पुरुषाः शोकपरवशा भवन्ति। (पृ. 203)

(ख) जहाँ पर लिपिकार के प्रमाद या अनवधान से किसी अनर्थक वर्ण का लेखन (=पुनर्लेखन) दिख रहा हो और उसे हटाना आवश्यक लगता है, उस निष्कास्य अंश को { } इस कोष्ठक में रखा गया है। उदाहरण रूप में-सखि, चपलः खल्वेष नूनम्। निवारयितुमेकाकिनी न पारयि{ष}ष्यसि। (पृ. 146)

(ग) किसी अशुद्ध पाठ्यांश के स्थान में सूचित शुद्ध पाठ को प्रदर्शित करने के लिए इस सामान्य ( ) कोष्ठक का विनियोग किया है।। (यहाँ पाण्डुलिपि में जो अशुद्ध मिलता है उसको पहले यथावत् रखते हुए सूचितांश को ही कोष्ठक में दिया गया है।) उदाहरण के रूप में-अत्र तावद् दुःस्व(ष)प्तम् स्मर। यतो राजरक्षितानि तपोवनानि। (पृ. 111)

(घ) किसी शुद्ध पाठ्यांश के स्थान में शुद्ध पाठ की कल्पना करना मुश्किल था उसको इस (?) तरह के निशान से अंकित किया है। उदाहरण रूप में-सोमवन्मनपत्यषे (?)। (पृ. 164)

(ङ) और जब पाण्डुलिपियों में कुछ अंश लुप्त या खण्डित मिलता है (और उसका पुनर्गठन सम्भव नहीं है) तो उसे ........ बिन्दुओं की लकीर से व्यक्त किया गया है।

सारांश यही है कि दोनों पाण्डुलिपियों का विवेक पुरस्सर विनियोग करते हुए प्रस्तुत टीका का पाठ परिष्कृत रूप में सम्पादित करने का उपक्रम रखा गया है। तथा उपर्युक्त विविध प्रकोष्ठों का विनियोग करने के साथ साथ अल्पविराम, पूर्णविरामादि का भी विनिवेश करके मूल पाठ्यांश को सुगम बनाने का भी लक्ष्य रखा है।

दूसरी महत्त्वपूर्ण स्पष्टता यह करनी है कि अकेले चन्द्रशेखर की टीका का पाठ प्रस्तुत करने से नाटक के किस पाठ पर टीका लिखी जा रही है वह तुरन्त नहीं मालूम होता है। अतः पहले नाट्यकृति का मूल पाठ देकर चन्द्रशेखर की तत्सम्बद्ध टीका उसके नीचे ही दी गयी है। यहाँ नाट्यकृति का जो पाठ दिया है वह प्रायः डॉ० रिचार्ड पिशेल की आवृत्ति का अनुसरण करते हुए रखा है। एवं जहाँ पर भी डॉ० रिचार्ड पिशेल ने किसी श्लोक को