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श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

Srimad Ananda Ramayana Hindi

महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा

स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)

DevanagariHindipublished811 पृष्ठ

सर्गः ८ ] विवाहकाण्डम् १७३

सर्गः ८ ] विवाहकाण्डम् १७३

चण्डिकासुमतिपाणिग्रहणार्थं पुरातनम् । ततस्ते पार्थिवाः सर्वे श्वशुरस्य जिघांसवः ॥ ८ ॥ सप्तदीपाधिपस्याथ ययुः कान्तिपुरीं प्रति । अथ तां कम्बुकण्ठस्य कन्यां मदनसुन्दरीम् ॥ ९ ॥ प्रासादसंस्थितां दृष्ट्वा नारदः खात्समेययौ । सखीभिः सा मुनिं पूज्य विनयात्पुरतः स्थिता ॥ १० ॥ पप्रच्छ नारदं भक्त्या विनयानम्रा शनैः । कुतः समागतः स्वामिन् गम्यते क्वाधुना वद ॥ ११ ॥ भवतां दर्शनेनाद्य पवित्राऽहं परं गता, इति तस्या वचः श्रुत्वा किञ्चित् स्मित्वा मुनिस्तदा ॥ १२ ॥ तामाह बाले स्वलोकादागतोऽस्म्यधुना त्वहम् । अयोध्यायां गतश्चाद्य पुत्राणां तु पृथक् पृथक् ॥ १३ ॥ गेहे संभोक्तुकामोऽद्य निमन्त्रोऽस्मि विहायसा । एतस्मिन्नन्तरे कान्तिपुर्याः सैन्यानि वै बहि ॥ १४ ॥ दृष्ट्वा केषां हि सैन्यानि सन्तीति हृदि चिन्तितम् । ततः पाथमुखाच्छ्रुत्वा तत्र चात्र स्वयम्बरम् ॥ १५ ॥ तदा विनिश्चितं चित्ते मया रामः स्वयंवरे । अत्रैवास्ति ह्यागतश्च तत् पश्याम सबालकम् ॥ १६ ॥ नैवास्ति ह्यागतश्चेत् तर्हि यास्याम्यतः परम् । स्वयंवरे विना रामं न भविष्यति सान्द्रजम् ॥ १७ ॥ पश्याम्यथैवं तं राम वृथाऽग्रे गमनं मम । निश्चित्येत्थं समायातस्ततोऽदृष्ट्वा रघूत्तमम् ॥ १८ ॥ कथं रामो नागतोऽत्र चेति पृष्टा नृपा मया । नृपाभिप्रायमाकर्ण्य तदा खिन्नं मनो मम ॥ १९ ॥ सप्तद्वीपाधिपतिं रामं वधूबालकसंयुतम् । स्वयम्बरमनाहूय त्वत्पित्रा निश्चितं नृपैः ॥ २० ॥ अधुनाऽहं प्रगच्छामि साकेतञ्च रघूत्तमम् । मन्दभाग्याऽसि बाले त्वं स्नुषा राघवभूपतेः ॥ २१ ॥ यतो जाताऽसि नैवात्र विचित्रा कर्मणो गतिः । इत्युक्त्वा बालिकां पृष्ट्वा नारदो गन्तुमुद्यतः ॥ २२ ॥ ततः संप्राथयामास नारदं बालिका मुहुः । खिन्नचित्ताऽश्रुपूर्णाक्षी म्लानस्या स्फुरिताधरा ॥ २३ ॥ रोमांचिततनूर्मुग्धा गतार्थागद्गदस्वरा । येनाहं मुनिवर्यात्र स्नुषा धीराघवस्य च ॥ २४ ॥ भविष्यामि तथा कार्यं न्यथा त्वां शरणं गता । इत्युक्त्वा मुनिवर्यस्य पादयोः स्थाप्य सा शिरः ॥ २५ ॥ चकार करुणं बाला तदा तां मुनिरब्रवीत् । मा चिन्तां कुरु रम्भारु समुत्तिष्ठस्व बालिके ॥ २६ ॥

सबस वैर कर लिया ॥ ५-७ ॥ इसके अनन्तर जब सब राजाओने यह सुन लिया कि राम नहीं आयेंगे, तब वे कम्बुकण्ठके यहाँ पहुंचे । उधर कम्बुकण्ठकी कन्या मदनसुन्दरीको अट्टारीपर देखकर नारदजी आकाश-मार्गसे उतर आये । मदनसुन्दरीने सखियों के साथ आकर नारदकी पूजा की और उन मुनिके सामने जा बैठी ॥ ८-१० ॥ फिर भक्तिपूर्वक नारदसे पूछने लगा—स्वामिन् ! आप इस समय कहाँसे आ रहे हैं और अब कहाँ जायेंगे सो बताइए ॥ ११ ॥ आपके दर्शनसे मैं आज परम पवित्र हो गयी । इस प्रकार उसकी बात सुनी तो थोड़ा मुसकराकर नारद कहने लगे—हे बाले ! इस समय मैं स्वर्गलोकसे आ रहा हूँ और रामके सब पुत्रांके यहाँ अलग-अलग भोजन करनेके लिए अयोध्या जा रहा हूँ। आते समय मैंने कान्तिपुरी नगर के बाहर सेना देखी उसे देखकर मुझे बड़ा कौतूहल हुआ। रास्तेमें एक पथिकसे पूछनेपर ज्ञात हुआ कि यहाँ तुम्हारा स्वयंम्बर है तो यह सोचा कि जहाँ तक है, रामचन्द्रजी अपने बालकों समेत यहाँ अवश्य आये होंगे । चलो, वहीं ही दर्शन कर लूं। यह निश्चय करके मै यहाँ आया, किन्तु रामचन्द्रजीको नहीं देखा तो राजाओंस पूछा कि राम क्यों नहीं आये ? उन लोगोंने जो कारण बतलाया, उससे मेरा मन बहुत खिन्न हुआ ॥ १२-१९ ॥ सप्तद्वीपके अधिपति राम तथा उनके लड़कोंका न बुला सकनेका निश्चय करके ही तुम्हारे पिताने और-और राजाओंको बुलाया है ॥ २० ॥ अच्छा, अब मैं अयोध्यामें रामचन्द्रजीके पास जा रहा हूँ। हे बाले ! तुम अभागी हो, जो रामचन्द्रजी जैसे राजाकी पतोहू नहीं बन रही हो। कर्मकी भी बड़ी विचित्र गति होती है। ऐसा कह और कन्यासे पूछकर नारदजी जाने लगे। तब वह कन्या मदनसुन्दरी खिन्न मन, अन्सु भरी आँखों, म्लानमुख, काँपते हुए अधरो तथा रोमाञ्चित शरीर होकर गद्गद बाणीसे इस प्रकार विनय करती हुई कहने लगी—आप कोई ऐसी युक्ति करिए कि जिससे मैं उनकी ही पतोहू बनू । मैं आपकी शरणमें हूँ। ऐसा कहकर उसने अपना मस्तक मुनिराजके चरणोंमें रख दिया और रोने लगा। तब नारद मुनिने कहा-

३७४ आनन्दरामायणे [ सर्गः ८

भविष्यसि त्वं रामस्य स्नुषा यत्नं करोम्यहम् । इत्युक्त्वा तां समाश्वास्य खमार्गेण मुनिर्ययौ ॥२७॥ एतस्मिन्नन्तरेऽथाऽऽयात्स्यन्दनं भूरिकेतनः । यूपकेतुर्नि... पश्यन्तमवतीर्याऽथायौ ॥२८॥ किञ्चित्सैन्ययुतो बालस्तमटव्यां दिदृक्षुः सः । यावन्सन्ध्याटिकं कर्तुमृषिविष्टस्तदा मुनिम् ॥२९॥ ददर्श नारदं नत्वा पूजयामास सादरम् । ततः पप्रच्छ मुनये यूपकेतुः पुरःस्थितः ॥३०॥ कुतः समागतं चेति सन्तुल्या नारदो मुनिः । सर्वं वृत्तं सविस्तारं कथयामास बालकम् ॥३१॥ तच्छ्रुत्वा सकलं वृत्तं नत्वा तं नारदं मुनिम् । अत्रायं क्रोलको वाक्यं सक्रोधः संभ्रमान्वितः ॥३२॥ मुने नृपाणां सर्वेषां द्वेषबुद्धिञ्च राघवे । वा अज्ञा माऽद्य सर्वेषां कुंभाण्डमयंकेणे जवात् ॥३३॥ कमुकटादिभूपानां सारं पश्याक्यहं रणे । मुने त्वत्कृपया सर्वान् जित्वानापामयाक्यहम् । ३४॥ इत्युच्यन्वा स ययौ कान्ति पञ्चमेऽहनि सेनया । नारदोऽपि ययौ रामं द्रष्टु प्रीतमनाम्तदा ॥३५॥ रामेण पूजितः प्रेम्णा भोजनार्थं निमन्त्रितः । अथ भोजनवेलायां यूपकेतुं रघूत्तमः ॥३६॥ अदृष्ट्वा लक्ष्मणं प्राह यूपकेतुर्न दृश्यते । बालेषु च भोजनार्थे लक्ष्मणात्र समाह्वय । ३७॥ तदा समालतीं गत्वा पप्रच्छ लक्ष्मणो जवात् । सा प्राह वनमध्येऽद्य किञ्चित्सैन्ययुतो गतः । ३८॥ श्रुत्वैतद्यथावत्स गत्वा रामं जगाद ह । अथ रामो भोजनादि सपाद्य मुनिना मुदा ॥३९॥ ययौ सभागयासीनस्तं मुनिं वाक्यमब्रवीत् । पञ्चप्रकृतिनान्यत्र स्थेयं मद्वचनान्मया ॥४०॥ तथेति नारदः प्राह सभायां संस्थितः सुखम् । अथ रात्रौ यूपकेतुमदृष्ट्वा रघुनन्दनः ॥४१॥ उपाहारं कृतुकामः पुनर्लक्ष्मणमब्रवीत् । आकारय यूपकेतुं मायं दृष्टो मया शिशुः ॥४२॥ तथेति रामवचनात्पुनर्गत्वा तु मालतीम् । पप्रच्छ यूपकेतुं म सा प्राह नागतस्त्विति ॥४३॥ स्वतः स विह्वलो भूत्वा रामं वृत्तं न्यवेदयत् । रामोऽपि नागतं श्रुत्वा बभूवार्त्ता विह्वलोऽभवत् ॥४४॥

हे ... ! तुम किसी प्रकार की चिन्ता न करो, उठो ॥ २१-२७ ॥ तुम अवश्य रामकी पतोहू बनोगी । मैं इसके लिए उद्योग करूँगा - ऐसा कह और उसे इस तरह बंधाकर नारदजी आकाशमार्गसे चल दिये ॥ २७ ॥ इसी समय यूपकेतु रथपर बैठकर अटवी में निन्द्रेय और राहुल के पत्तोंको देखते हुए तमसा नदीके किनारे पहुंचे । २८ ॥ उस समय यावत्-पो सन् उन्मत्त मद्य थे । उसके साथ भृत्योंने तालाबमे स्नान किया और सन्ध्यावन्दन करनेको बैठे थे कि वि. नारदजी को देखा । तब उनको प्रणाम करके सादर पूजन किया । इसके बाद नारद मुनिने विस्तारपूर्वक उस कन्या मदनमुग्धा का सारा वृत्तान्त कहा। उसे सुनकर क्रोध और घबराहटसे पूर्ण होकर यूपकेतुने कहा - "हे देवर्षि मुने ! इस समय जो सब राजे रामसे द्वेषबुद्धि रखते हैं, वह उनके लिए अगोचरिणी विड होगी । ३३ ॥ कम्बुकण्ठ आदि राजाओका बल में संग्रामभूमिम पहुँचकर देखता हूँ। हे मुनिवर ! मैं आपकी कृपासे उन सबको बांधकर मदोन्मत्तीको लिये आता हूँ । ३४ ॥ ऐसा कहकर यूपकेतु अपनी सेनाके साथ पांचवें दिन कान्तिपुरीमें पहुंचे और नारदजी प्रसन्नतापूर्वक रामका दर्शन करनेके लिए अयोध्या चले गये । ३५ ॥ वहाँ पहुँचनेपर रामने प्रेमसे नारदजीका पूजन करके भोजनका निमन्त्रण दिया । जब भोजनका समय हुआ, तब यूपकेतुको न देखकर रामने लक्ष्मणसे कहा कि इस समय यूपकेतु नहीं दिखायी देता । हे लक्ष्मण ! और-और बालकोंके साथ उसे भी भोजन करनेके लिए बुलाओ ॥ ३६ ॥ ३७ ॥ रामके आज्ञानुसार लक्ष्मण मालतीके पास पहुंचे और यूपकेतुको पूछा । उसने कहा कि वे अपने साथ थोड़ी-सी सेना लेकर वनको गये हैं ॥ ३८ ॥ यह वृत्तान्त लक्ष्मणने जाकर रामको सुना दिया । तत्पश्चात् मुनिके साथ राम भोजन आदि करके अपने सभाभवनमें गये और वहाँ बैठकर नारद मुनिसे कहने लगे कि आप मेरे कहनेसे पाँच-सात दिन यहीं ही ठहर जाइये । 'तथास्तु' कहकर नारदजी भी ठहर गये । तदनन्तर भोजनके समय रात्रिमें भी यूपकेतुको न देखकर रामने लक्ष्मणसे कहा- यूपकेतुको बुलाओ। आज मैंने दिनभर उस बच्चेको नहीं देख पाया है । ३६-४२ ॥ 'बहुत अच्छा' कहकर लक्ष्मण फिर मालतीके पास गये और यूपकेतुको पूछा उसने कहा कि वे अभी तक

सर्गः ८ ] विवाहकाण्डम् १७५


हतः सा जानकी श्रुत्वा विह्वला क्षिप्तमानसा । दुद्राव राघवप्रेग्ने मा मद्ये तूष्णीं कथं स्थिताः ॥४५॥
इति तान् प्राह वैदेही तदा सर्वेऽनितिष्ठिताः । त्यक्त्वोपादाशनं वेगेन मन्तोद्यर्थे ममूद्यताः । ४६।
तदा तान्विह्वलान्दृष्ट्वा नारदः प्राह राधवम् कांतिश्च यूपकेतोः प्रयाणादिप्रसादरात् ॥४७॥
हास्यं राघवः धृत्वा किञ्चित्प्रत्ययमाददा लक्ष्मणं प्राह वेगेन शत्रुघ्नोऽथैः मऋतु । ४८
सेनया चतुरङ्गिण्या उवन्कांतिं द्रुतादिभिः मथेति लक्ष्मणाथोत्क्त्वा याग्राहागनिपाय सः॥ ४९॥
सेनया बालकंवंगारुहलूनं प्रैषयन्निति । शर्म नन्त्राऽथ शत्रुघ्नः शीघ्रं स्यन्दनमस्थितः ॥५०।
ययौ कांतिसमीपं स षष्ठेऽहनि मुदान्वितः एतस्मिन्नन्तरे कांतिपुर्यां तत्र स्वयंवरे । ५१॥
सभायां राजशार्दूलाः मस्थितास्ते मुदान्विताः । अथ सा शिविकामारु ह्यययौ मदनसुन्दरी । ५२॥
किञ्चिन्म्लानमुखी दुःखामस्मरन्ती नारदेरितम् । वृद्धोघवाता तां सर्वान् दर्शयामास पार्थिवान् ॥५३॥
यूपकेतुस्तदा वेगाद्गत्वा तूणीं सभांगणम् । मोहन स्त्रं विमुच्याथ मोहयामास तां सभाम् ॥५४॥
मोहितैर्मोहनास्त्रेण न्यस्तां तद्वाहकैर्भुवि । रथेन शिविकां गत्वा धृत्वा मदनसुन्दरीम् ॥५५॥
निजाभिधानं मथाऽथ तां तुष्टासकंगमद । अथ सा त्रपयामास वीर मदनसुन्दरी । ५६।
सुमोच मालो तन्कण्ठे नवरत्नमयीं शुभाम् । ततः स यूपकेतुहि रथे मदनमन्दरीम् ५७॥
निवेश्य कांतिपुर्याः सच वेगेन्यो स्थितोऽभवत् । नापाह द्य.तंतं वीरसुन्दरीं त्वं भयं त्यज । ५८।
जित्वा सर्वान्नृपानद्य मया गच्छाम्यहं पुरि तत्तस्य वचनं श्रुत्वा सा प्राह वचनं तदा । ५९।
वहवः सन्ति राजानस्त्वमेकः स्वल्पसेनया । असंख्यव्रातानि सैन्यानि तेषां पश्य समन्ततः ॥६०॥
कथ युद्धं भवेत्तत्र मा कुरुष्वद्य मंगरम् शीघ्रं मां नय स.फेन ततो रामेण सेनया । ६१।


गङ्गीलौटे ॥ ४३ ॥ यह सुन लक्ष्मण हँसकर हाथ थामकर वचन कहा। जब रामने यह सुना तो ज्ञातानों के साथ-साथ वे भी विह्वल हो उठे ॥ ४४ ॥ जानकीने सुन सा०ह्रै भी विह्वल तथा क्षिप्त होकर दौड़ती हुई रामके पास पहुंची और कहा कि आप लोग यूपकेतुका अशुभिन्वत देखकर भी चुपचाप बैठे हैं ? ॥ ४५ ॥ यह सुनकर सब लोग घबड़ा उठे और भोजन त्यागकर तुरंत उसका तैयारी कर दिये ॥ ४६ ॥ इस प्रकार सबको व्याकुल देखकर नारदजन रदन सहितराक्षस वृत्त यंत बतलाया और यूपकेतुके प्रस्थानकी भी बात कह सुनाई ॥ ४७ ॥ यह हास्य सुना ता रामको थोरा सन्तान हुआ और तुरंत लक्ष्मणको आज्ञा दी कि सग चतुरङ्गिणी सेना लेकर शत्रुघ्न अभी कांतिपुरी जायं । "बहुत अच्छा' कहकर लक्ष्मणने भोजन आदि करवाकर राजन ह् सेना और कुछ अरि वीर बालकोंके साथ शत्रुघ्नको कांतिपुरी भेजा रामको प्रणाम करके शत्रुघ्न रथपर सवार हुए और प्रसन्नता पूर्वक प्रस्थान कर दिये ॥ ४८-५० ॥ इस तरह अयोध्यासे चलकर छठे दिन शत्रुघ्न कांतिपुरीके पास पहुंच गये उधर कांतिपुरीमें स्वयंवर हो रहा था ॥ ५१ ॥ सभा मण्डपमें बहुतस राज हर्षपूर्वक बठे हुए थे। इतनेम मदनसुन्दरी पालकीमं बैठी हुई सभामें आयी ॥ ५२ । उस समय वह दुःखस नारदका वानीका स्मरण कर रही थीं। इस कारण उसका मुख कुम्हलाया हुआ था। सभामें पहुंचकर वृद्धा वार्या न सब राजाओंको दिखलाया ॥ ५३ ॥ इसी समय वेगके साथ यूपकेतु सभाभवनमें पहुंचे और मोहनास्त्रका प्रयोग करके उन्होंने सारी सभाको मूच्छित कर दिया । ५४ ॥ महनास्त्रसे मोहित होकर शिविकावाहकोने भी शिविका जमीनपर रख दी । इतनेम रथपर बैठे हुए यूपकेतु शिविकाके पास पहुंचे और मदनसुन्दरीका हाथ पकड़कर अपना नाम बताया, जिससे वह बहुत प्रसन्न हुई और वीर यूपकेतु-के वरकर उसन उनके गलयं वह नवरत्नमयी वरमाळा डाल दी। सब प्रसन्न होकर यूपकेतुने मदनसुन्दरीको रथमें बिठा लिया ॥ ५५-५७ ॥ तब कान्तिपुरीसे बाहर निकलकर वे एक स्थानपर रुक गये । वहाँपर उन्होंने मदनसुन्दरीसे कहा कि अब तुम किसी प्रकारका भय न करो, ॥ ५८ ॥ मैं सब राजाओंको जीतकर तुम्हारे साथ अयोध्यापुरी चलूंगा । यूपकेतुकी बात सुनकर उसने कहा - ॥ ५९ ॥ ये राज बहुतसे हैं और युद्ध अकेले हें, तुम्हारे साथ सेना भी थोड़ी सी है और देखों न उनकी असंख्य सेना चारों ओर दबी हुई हैं ॥ ६० ॥

३७६आनन्दरामायणे[ सर्ग ८

युद्धं कुरु नृपैर्घोरैः शृणु मद्वचनं प्रभो । मा साहसं कुरुष्वात्रार्थये त्वां मुहुर्मुहुः ॥६२॥
इति तस्या वचः श्रुत्वा तामाश्वास्य पुनः पुनः । उपसंहारयामास मोहनास्त्रं स लीलया ॥६३॥
तदा ते पार्थिवाः सर्वे श्रुत्वान्योन्यं वधू छलन् । शत्रुघ्नतनयेनेति क्षोभात्स्वैः स्यन्दने स्थिताः ॥६४॥
निर्ययुः कोटिशो योद्धुं स्वस्वसेनायुता जवात् । चण्डिकायाः सुमन्त्राश्च पूर्ववैरेण दर्पिताः ॥६५॥
दृष्ट्वैनेमिमार्गेण ददृशुस्तं रथस्थितम् । युक्तं मदनसुन्दर्या बिभ्रतं मालिकां हृदि ॥६६॥
ततस्तं मुमुचुः सर्वे नानास्त्राणि सैनिकाः । यूपकेतुस्तदा वेगाद्गुणकृत्य महद्धनुः ॥६७॥
वायव्यास्त्रेण तत्सर्वानुद्धूय दशदिक्षु सः । प्रक्षिपत्पार्थिवान् सैन्यान्वाहनाग्र्यस्थितान् ॥६८॥
तदा स कंबुकण्ठोऽपि पूर्ववैरमनुस्मरन् । चण्डिकायाः सुमन्त्राश्च स्वयंवरसमुद्भवम् ॥६९॥
निमेषान्निजकन्याया वैभ्तो हरणं बलात् । महाक्रोधान्वितर्यद्यौ स स्वसैन्येन परिवेष्टितः ॥७०॥
कुर्वन् दुंदुभिनिर्घोषं युद्धार्थं यूपकेतुना । यूपकेतुरपि श्रुत्वा दुन्दुभीनां महन्स्वनम् ॥७१॥
कान्तिपुर्यूताद्द्वारपुरतः प्रस्थितो रथी । टङ्कृत्य महच्चापं सन्दधे शरमुत्तमम् ॥७२॥
ये ये वीराः पुरद्वारान्निर्गताश्च वहिः क्षणे । तान् जघान क्षणादेव प्रेतदुर्गं रुगोधमः ॥७३॥
तं दृष्ट्वा यूपकेतोश्च कंबुकण्ठः पराक्रमम् । ययौ स्वयं स्यन्दनेन प्रेतसंधं विदार्य च ॥७४॥
छेपसैन्येन संयुक्तो यूपकेतुं रुधा जगाद तदऽहं यूपकेतं म प्रथा म्वं मङ्गर कुरु ॥७५॥
किमेतान्मशकान् हत्वा पौरुषं मन्यसे जड । इत्युक्त्वा सप्तभिशार्यूपकेतुं जघान सः ॥७६॥
तान्बाणानागतान् दृष्ट्वा यूपकेतुर्निजैः शरैः । संछिन्त्वा नवबाणैस्तच्चापं सारथिनं ध्वजम् ॥७७॥
कवचं मुकुटं छित्वा जघान तुरगानपि पद्भ्यां तदा कंबुकण्ठो गदामादाय दुद्रुवे ॥७८॥

ऐसी अवस्था में युद्ध कैसे कराओगे ? आज तुम संग्राम न करो । मुझे शीघ्र अयोध्या पहुँचा दो और वहाँ से राम-चन्द्रजी की विशाल सेना लेकर आओ, तब युद्ध करो हे प्रभो ! ऐसा साहस इस समय करना ठीक नहीं है। मैं बार-बार यही विनती करती हूँ ॥६१। ६२। इस प्रकार मदनसुन्दरी का वचन सुनकर उन्होंने उसे आश्वासन दिया और मोहनास्त्र का संवरण कर लिया । ६३ ॥ जब उन राजाओं ने किसी के मुख से सुना कि शत्रुघ्न-के पुत्र यूपकेतुने मदनसुन्दरी का हरण किया है तो अपने-अपने रथों पर सवार हो-होकर बड़ी-बड़ी सेना लिये उसके साथ व लड़ने को निकल पड़े। एक तो चण्डेश और मन्त्रणाक्ष का ही वैर उन लोगों के मन में था, दूसरे अब मदनसुन्दरी के हरण से उनका क्रोध और भी अधिक हो गया ॥६४। ६५। फिर रथ या, शत्रु के रथके पहियाका रास्ता देखते हुए वे चले और थोड़ी ही दूर जाकर उन्होंने देखा कि यूपकेतु मदन-सुन्दरी के साथ बैठा है और उसके गले में वरमाला पड़ी हुई है ॥ ६६ ॥ देखते ही सब राजाओं ने एक साथ उस वीर बालक पर कितने ही शस्त्रोंका प्रहार कर दिया । तब यूपकेतु ने वेग के साथ अपने धनुष को टंकार किया । ६७ ॥ और वायव्य अस्त्र का प्रयोग करके इन सब राजाओं को रथ, वाहन तथा सेना समेत उठाकर दूर फेंक दिया ॥ ६८ । महाराज कम्बुकण्ठ भी पूर्वस्नेह को स्मरण करके विशेषकर उस समय चण्डिका अपनी कन्या का हरण देखकर अपनी सेना के साथ दुन्दुभिका युद्ध बजवाते हुए दुन्दुभी का घोष करते हुए निकले ॥६९। यूपकेतु ने भी जब दुंदुभीकी गर्जना सुनी तो कान्तीपुरके उनके द्वारपर पहुँचे और अपने धनुषका टंकार करके उसपर एक उत्तम बाणका संधान किया ॥ ६९-७२ । उस पुरद्वार से जो-जो योद्धा निकलते, उनको अपने बाणोंसे यूपकेतु बराबर मारते जाते थे । इतने थोड़े ही देर में वह द्वार मृतकों से भर गया । ७३ । इस तरह यूपकेतुका पराक्रम देखकर राजा कम्बुकण्ठ स्वयं अपने रथ पर सवार होकर उन शवों को चीरते हुए बड़ी वृद्ध सेना के साथ यूपकेतु के सामने जा पहुंचे और क्रोध में भरकर उन्होंने कहा-अब तू मेरे साथ संग्राम कर । ७४॥ ॥७५॥ अरे जड ! इन मच्छडोंको मारकर क्या तू अपने पौरुषको पौरुष मानता है ? ऐसा कहकर कम्बुकण्ठने सात बाणों से यूपकेतु पर प्रहार किया । ७६ ॥ उन बाणों को अपनी ओर आते देखकर यूपकेतुने अपने नौ बाणों से कम्बुकण्ठके बाणों, धनुष, सारथी, ध्वजा, कवच और मुकुट को काट डाला और घोड़ों को भी मार दिया । तब

सर्गः ८] विवाहकाण्डम् ३७७


तावन्महस्रधा बाणैर्यूपकेतुश्चकार ताम् । ततो बदध्वा दृढां मुष्टिं कम्बुकण्ठस्त्वरान्वितः ॥७९॥
हृदये यूपकेतोश्च जघानाचलसन्निभाम् । तदा स यूपकेतुस्त्वं श्वशुरं स्यन्दनोपरि । ८०।।
ध्वजे बबन्ध वेगेन खङ्गं जग्राह सम्भ्रमात् । कंबुकण्ठशिरश्छेदं कर्तुं तं समुपस्थितम् ॥ ८१॥
दृष्ट्वा धृत्वा करो तस्य सखड्गं सम्भ्रमान्विता । तमाह नत्वा माश्वश्रीमं तदा मदनसुन्दरी ॥८२॥
विह्वला विगतोत्साहा वेपती अश्रुलोचना । मम तातं कंबुकण्ठमंतं हंसि कथं प्रभो ॥८३॥
मक्षिकापतनं पूर्वं ग्रासे एतच्चया कृतम् । शुभारम्भे पूर्वमेव दुःस्वप्नंमिवलम्बिनम् ॥८४।
मद्वाक्याञ्चैव हंतव्यस्तन्ममत्वां प्रार्थयाम्यहम् । एवं मदनसुन्दर्या वचः श्रुत्वा विहस्य सः ॥८५॥
कराद्विमुच्य तं खङ्गं स्वसूतं चोदयन्मुदा । सेनया स ययौ यावत्त्वथाऽयोध्यां पुरीं प्रति ॥८६॥
तावद्दुन्दुभिनिर्घोषानग्रे शुश्राव सेनया । पुनश्चाथ दृढीकृप्य यूपकेतुस्तदा पथि ॥८७॥
कस्येयं वाहिनी चेति चिंतयामास चेतसि । ततः शरं सुमोचैकं निजनामांकितं वलात् ॥८८॥
योजनांतरसेनायां शरः शत्रुघ्नसन्निधौ । पपान तत्पदाग्रे तं दृष्ट्वा स चकितस्तदा ॥८९॥
शरपुच्छे यूपकेतोर्नाम दृष्ट्वाथ शत्रुहा । निश्चितवान्यूपकेतुर्मागेऽग्रे वर्तते ध्रुवम् ॥९०॥
ततश्चापे स शत्रुघ्नः स्वनाम कितमुत्तमम् शरं संधाय विमुञ्च यूपकेतुं सुमोच ह ॥९१॥
स शरो यूपकेतोश्च मम्नकादूर्ध्वतस्तदा । अपतत्पृष्ठभागे स तं ददर्श पितुः शरम् ॥९२॥
तदा हृष्टो यूपकेतुः कुर्वन्दुंदुभि निःस्वान् । गत्वा वेगेन शत्रुघ्नं दृष्ट्वोत्प्लुत्य रथादधः । ९३॥
ननाम पितरं पत्न्या कंबुकंठं प्रदर्शयन् । तदा तं सुहृद ज्ञात्वा मोचयामास शत्रुहा ॥९४॥
कंबुकंठमुखाच्छ्रुत्वा सर्वं वृत्तं सविस्तरम् । शत्रुघ्नः प्रापिनस्तेन सुहृदा तत्पुरो ययौ ॥९५॥


कम्बुकण्ठ पैदल ही गदा लेकर दौड़ पड़ा ॥ ७७ । ७८ ॥ यूपकेतुने अपने बाणोंसे उनकी गदाके भी हजार टुकड़े कर दिये । इसके बाद वह गदा फेंककर कटार घूंसा मारा । तब यूपकेतुने अपने ससुर कम्बुकण्ठको रथकी ध्वजामें बान्ध दिया और सिर काटनेके लिए वेगके साथ तलवार उठायी ॥ ७९-८१ ॥ इस तरह सिर काटना उद्यत एवं हाथमें खड्ग लिए यूपकेतुको देखकर मदनसुन्दरीने प्रणाम किया और आँखोंमें आँसू भरकर कहा - ॥ ८२ । हे प्रभो ! मेरे पिता कम्बुकण्ठको आप क्यों मारना चाहते हैं ? पहले ही ग्रासमें मक्खी गिर पड़नेके समान आपने शुभके स्थानमें इस दुःखदायी कर्मको क्यों अपनाया है ? ॥ ८३ ॥ ८४ । अतः मेरी बात मानकर इन्हें मत मारिए । मैं आपसे यही प्रार्थना करती हूँ। यह कहती हुई मदनसुन्दरी विह्वल हो गयी, उसका उन्माद नष्ट हो गया वा वह कांप रही थी और नेत्रोंमें आँसूकी धाराएँ बहाती जा रही थी । इस प्रकार मदनसुन्दरीकी बात सुनकर यूपकेतु मुसकराये और खड्ग फेंककर अपने सारथीको रथ चलानेका संकेत किया, वे अपनी सेनाके साथ अयोध्यापुरीकी ओर चले ही थे ॥ ८५ ॥ ८६ ॥ इतनेमें आगेसे दुन्दुभीका घोष सुनाई पड़ा । अब अपना धनुष सम्हालकर सोचने लगे कि आगेसे यह किसकी सेना आ रही है। यह सोचकर उन्होंने अपने नामसे अंकित एक बाण वेगपूर्वक छोड़ा ॥ ८७ ॥ ८८ ॥ वह बाण उड़ता हुआ एक योजन तक गया और जहाँ सेना पड़ी हुई थी, वहाँ पहुंचकर शत्रुघ्नके चरणोंके आगे गिरा । उस बाणको देखकर शत्रुघ्न चकित हो गये । ८९ ॥ फिर बाणके पुच्छमें यूपकेतुका नाम देखकर शत्रुघ्नने निश्चय किया कि यूपकेतु आगे रास्ते में ही हैं ॥ ९० ॥ तदनन्तर शत्रुघ्नने भी अपने नामसे अंकित एक बाण उठाकर यूपकेतुकी ओर छोड़ दिया ॥ ९१ ॥ वह बाण यूपकेतुके ऊपरसे होता हुआ पीछे जा गिरा । यूपकेतु-ने अपने पिताका बाण देखा ॥ ९२ । तब प्रसन्न होकर दुन्दुभि जैसा गर्जन करते हुए वेगके साथ शत्रुघ्न-के पास पहुंचे । वहाँ पिताको देखते ही वे रथसे कूद पड़े और अपनी स्त्री मदनसुन्दरीके साथ जाकर शत्रुघ्न-को प्रणाम किया और ध्वजामें बँधे हुए कम्बुकण्ठको दिखाया । शत्रुघ्नने उन्हें अपना सम्बन्धी समझकर छुड़ा दिया ॥९३॥९४। फिर शत्रुघ्नने कम्बुकण्ठके मुखसे ही विस्तारके साथ समस्त वृत्तान्त सुना । इसके बाद कम्बुकण्ठके

३७८आनन्दरामायणे[ सर्गः ९

कांतिपुर्यां बहिः स्थित्वा कंबुकंठमतेन सः । आकारणार्थं रामाय रामं दूतान्प्रचोदयत् ॥५६॥
तदा ते कंबुकंठस्य शत्रुघ्नस्यापि वेगतः आकारणार्थं श्रीराम ययुर्द्ता मुदान्विताः ॥५७॥
इति श्रीशतकोटिरामचरितांतर्गते श्रीमदानन्दरामायणे विवाहकाण्डे मदनसुन्दरीहरणं नामाष्टमः सर्गः । ८ ॥


नवमः सर्गः

(रामका वंशविस्तार)

श्रीरामदास उवाच
गत्वाऽयोध्यापुरीं दूता रामं वृत्तं न्यवेदयन् । रामोऽपि श्रुत्वा तद्वृत्तं सीतायै संन्यवेदयत् ॥ १ ॥
ततो मुहूर्ते श्रीरामः सावरोधोऽनुजैः सह । पौरैर्जानपदैः सर्वैः सुहृद्भिः सेनया सह ॥ २ ॥
नारदेन ययौ कान्तिमार्यां मुक्तिपुरीं प्रति । ततः श्रुत्वा कंबुकंठः शीघ्रं गन्धर्वमागतम् ॥ ३ ॥
स प्रत्युद्गम्य विनयान्नत्वा संपूज्यत्समुदा । यूपकेतुं ततः पूज्य वरञ्चाध्वं पुरीं शनैः ॥ ४ ॥
वारस्त्रीनृत्यगीतैश्च तूर्यघोषैर्निनाय सः । ततः कान्तिपुरीस्थान्नाः स्त्रियः प्रासादमस्थिताः ॥ ५ ॥
दृष्ट्वा रामं यूपकेतुं ववर्षुः पुष्पवृष्टिभिः । ततो रामः शनैर्हस्त्युं कन्पिनं गृहमुत्तमम् ॥ ६ ॥
गत्वा दृष्ट्वा मुहूर्ते तु पूर्वोक्तकौतुकैः सुखम् । यूपकेतोर्विवाहं स चकार महोत्सवैः ॥ ७ ॥
ततो विवाहं निर्वर्त्य कंबुकंठन पूजिताः । हस्त्यश्वरथपादातदासदासीजनादिभिः ॥ ८ ॥
ययौ मदनसुन्दर्या रामोऽयोध्यापुरीं विजाप् । ततो विवेश नागरी नेदुर्वादित्राणि वै तदा ॥ ९ ॥
मङ्गलुवारनार्यश्च तुष्टुवुर्मागधादयः । प्रासादस्थाः स्त्रियो रामं ववर्षुः पुष्पवृष्टिभिः ॥ १० ॥
मार्गे नीराजितः स्त्रीभिर्विवेश निजमन्दिरम् । कारयित्वा रमापूजां ददौ दानान्यनेकशः ॥ ११ ॥
सुहृदः पूजयमास राघवो वस्त्रादिभिः । ततो विसर्जयामास सर्वान्वस्वस्थल प्रति ॥ १२ ॥


प्रार्थना करनेपर उनके साथ ही कांतिपुरी गये ॥ ५५ ॥ वहाँ कम्बुकण्ठकी सलाहसे शत्रुघ्न नगरके बाहर ही ठहरे और रामको बुलानेके लिए दूतोंको भेजा ॥ ५६ ॥ उसी समय शत्रुघ्न तथा कम्बुकण्ठके दूत श्रीरामको बुलानेके लिए प्रसन्नतापूर्वक चल पड़े ॥ ५७ ॥ इति श्रीशतकोटिरामचरितान्तर्गते श्रीमदानन्दरामायणे पं० रामतेजपाण्डेयविरचित'ज्योत्स्ना'भाषाटीकासहिते विवाहकाण्डे अष्टमः सर्गः ॥ ८ ॥

श्रीरामदास कहने लगे वे दूत अयोध्यापुरीमें पहुंचे और रामको कान्तिपुरीका सब हाल कह सुनाया। सो सुनकर रामने सीतासे कहा ॥ १ ॥ इसके पश्चात् अच्छे मुहूर्त्तमें राम अपने अन्तःपुरकी नारियों, पुरवासियों, जनपदवासियों, समस्त सम्बन्धियों, नारद तथा सेनाके साथ आदिकुन्तिपुरी अर्थात् कांतिपुरीको चल पड़े। जब कम्बुकण्ठने सुना कि रामचन्द्र पुरके निकट आ पहुंचे हैं, तब आदरपूर्वक स्वागत करने गये। यहाँ पहुंचकर सविनय प्रणाम किया। इसके अनन्तर राम तथा यूपकेतुका पूजन करके हाथीपर बिठाकर धीरे-धीरे पुरोको चले ॥ २-४ ॥ रास्तेमें वेश्याएँ नाचती गाती थीं और दुन्दुभी आदि विविध प्रकारके बाजे बज रहे थे। उधर जब नगरकी स्त्रियोंने आते देखा तो राम और यूपकेतुपर पुष्पवृष्टि करने लगीं। तत्पश्चात् राम जनवासेमें पहुंचे ॥ ५-६ ॥ वहाँ अच्छा मुहूर्त्त देखकर पूर्वोक्त कौतुकोंके साथ बड़े उत्साहसे यूपकेतुका विवाह किया ॥ ७ ॥ विवाहकी सब रीतियाँ पूरी हो जानेपर कम्बुकण्ठसे पूजित होकर कितने ही हाथी, घोड़े, रथ, पैदल सेना, दास-दासी आदिके साथ मदनसुन्दरीको लेकर अपनी अयोध्यापुरीको चल दिये। सन्तोषकाक पार पहुंचकर व अपनी नगरी में घुसे तो विविध प्रकारके बाजे बजने लगे ॥ ८ ॥ ९ ॥ वेश्याएँ नाचने लगीं और मागध बन्दीजन स्तुति करने लगे। नगरवासिनी महिलाएँ अट्टालिकाओंपर चढ़-चढ़कर रामपर फूल बरसाने लगीं और कुछ स्त्रियाँ मार्गमें आरती उतारने लगीं। इस उत्साहसे राम अपने महल गये। वहाँ उन्होंने लक्ष्मीकी पूजा की और अनेक प्रकारके दान दिये ॥ १० ॥ ११ ॥ इसके अनंतर निमंत्रणमें आये हुए

सर्गः ९ ] विवाहकाण्डम् १७९

सर्गः ९ ] विवाहकाण्डम् १७९

अथ सप्त कुमारांश्च लवाद्याः स्वस्ववेश्मनि । पत्न्यः क्रीडां पृथक् सौख्यां कुर्वन्प्रियाऽकरोत् ॥१३॥ चंपिकायां दुहितरः कुशजाताः शुभा नव । कुशस्याग्रे कुमुद्वत्यां भविष्यंस्त्वष्ट सूनवः ॥१४॥ भविष्यति नृपा कन्या ज्येष्ठा चंपकमालिनी । कुशेन्द्रः कुशलोचेति विश्रुतिं नाम्ना राज्यं करिष्यति ॥१५॥ चतुर्दश सुमात्याद्याः स्त्रियः सर्वाः क्रमेण हि । सुषुवुस्तनयानष्ट कन्येकाऽपि पृथक् पृथक् ॥१६॥ स द्वादशशतं पौत्रान्पौत्रीश्चैव मनोरमाः । त्रयस्त्रिंशद्रामचन्द्रो लालयामास सीतया ॥१७॥ कुमुद्वतीभाविसुपुत्रसहिताः शिशवः शुभाः । विंशच्छामावसने तथा षोडशचण्डिकास्तथाः ॥१८॥ बहूविद्यन्निताश्रासन समाश्लेषाद्विते नृपैः तथा श्भागम्पौत्रैश्च नृपकन्या अनेकशः ॥१९॥ काश्चित्स्वयंवरैरेव काश्चिद्राक्षसयोगतः । काश्चिद्गान्धर्वयोगेन काश्चिद्देवैस्तुकर्मणा ॥२०॥ परिणीताः पौरुषेण तासां संख्या न विद्यते । तासां हि संततिं वक्तुं कः समर्थो भवेदिह ॥२१॥ एवं स युपकेतोश्च विवाहश्चम. शुभः । सपद्य नारदः श्रीयामश्चभार्यां रघुनन्दनम् ॥२२॥ रामनामसहस्रेण संगीतैनानभालकृतः । मुक्त्वा अगत्य पृष्टा ययावाकाशवर्त्मना ॥२३॥ श्रीरामदास उवाच एवं रामण साकेतपुर्यां भोगाश्चिरं सुखम् । भुक्तास्तेषां वर्णनेऽद्य कः समर्थो भवेन्नरः ॥२४॥ एक एव समर्थोऽभूद्वाल्मीकिस्तपसां निधिः । शतकोटिमितं येन नानालीकादिभिर्युतम् ॥२५॥ वर्णितं रामचरितं महामंगलकारकम् । यत्स्मृत्याऽपि मया किंचिच्छ्रेयो वर्णितम् ॥२६॥ एव समस्त्र्यवस्थाया पुतैः पौत्रैः समन्त्रितः । प्रपौत्रै पौत्रपौत्रैश्च रञ्जयामास जानकीम् ॥२७॥ एवं विवाहकाण्डं च शिष्य मया परिवर्णितम् । समग्रं पवित्रं च श्रवणान्मंगलप्रदम् ॥२८॥ विवाहकाण्डं परमं ये शृण्वन्तीह मानवाः । न तेषांभः पुत्रपौत्रैश्च वियोग नाप्नुवंति हि ॥२९॥

सम्पादियोंका धन आदि देकर पूजा की और स्वेच्छा अपने घर जानेकी अनुमति दी ॥१२॥ इसके बाद लव आदि सातो भाई अपना-अपना स्त्रियोंके साथ अपने-अपने महलमें विहार करने लगे और कुश अपनी स्त्री चम्पिकाके साथ केलि करने लगे ॥१३॥ इस तरह कुश प्रिया चम्पाके द्वारा चम्पिकानाम नौ कन्यायें उत्पन्न कीं। कुमुद्वतीसे आठ पुत्र और चम्पकमालिनी नामक एक पुत्रीका सादृश्य उत्पन्न होगी। कुशका सबसे बड़ा पुत्र अतिथि अयोध्याका राज्य करेगा ॥१४।१५॥ इसके सिवाय सुमति आदि चौदह स्त्रियोंने क्रमशः आठ-आठ पुत्र और एक-एक कन्यायें उत्पन्न कीं ॥१६॥ इस तरह राम सीताके साथ बारह सौ पौत्रों तथा तैंतीस सुंदर पौत्रियोंका प्रतिपालन करने लगे ॥१७॥ इस प्रकार कुमुद्वतीके भावी पुत्रो पौत्रांको भी मिलाकर बीस सौ पौत्र और चौबीस पौत्रियां हुईं ॥१८॥ जिनको रामने अच्छे-अच्छे राजाओंके साथ विवाह कर दिया और रामके पौत्रोंका विवाह जनक राजकुमात्रियोंके साथ हुआ ॥१९॥ उससमय कुछ कुमारियां स्वयंवरसे आयीं, कुछ राक्षसविवाहसे, तथा कुछ गान्धर्वविवाहसे विवाहमें आयी और उनका शुभ विवाहसम्बन्ध हुआ ॥२०॥ इसके सिवाय पौत्रोंके गुणवान पुत्रादि मणिकूट नामक महलोंमें आयीं, जिनकी कोई संख्या ही नहीं है। ऐसी स्थितिमें उनका सन्तानोका कौन गिन सकता है ॥२१॥ इस प्रकार यूथकेतुका अन्तिम शुभ विवाह सम्पन्न हो जानेपर नारदने समाप्त सुनकर फिर रामचन्द्रनामसे युक्त प्रीतिपूर्वक रामकी स्तुति करके जानेकी आज्ञा मांग ली और आकाशमार्गसे चले गये ॥२२।२३॥ श्रीरामदासने कहा- इस तरह रामने बहुत समय तक सुख भोगा, उसका वर्णन करनेमें कोई भी प्राणी समर्थ नहीं हो सकता ॥२४॥ बस एकमात्र तपस्वी वाल्मीकिजी इसके वर्णनमें समर्थ हुए थे जिन्होंने सौ करोड़ श्लोकोंमें नाना प्रकारकी कथाओं सहित रामचरित्रका वर्णन किया। यह रामचरित परम मङ्गलात्मक है। इसका स्मरण करके ही मैं तुम्हारे समक्ष कुछ कहनेमें समर्थ हुआ हूँ ॥२५।२६॥ इस प्रकार राम अपनी वयोवृद्धावस्था में पुत्र, पौत्र, प्रपौत्र एवं प्रपौत्राके पुत्रोंके साथ रहते हुए सीताको आह्लादित करते रहे ॥२७॥ हे शिष्य ! इस तरह मैने नौ सर्गयुक्त पवित्र विवाहकाण्डका वर्णन किया, जो सुननेमें सर्वथा मङ्गलदायक है ॥२८॥

३८० आनन्दरामायणे [सर्गः ९

धर्मार्थी प्राप्नुयाद्धर्मं धनार्थी धनमाप्नुयात् । कामनार्थी लभेत् कामान् मोक्षार्थी मोक्षमाप्नुयात् ॥ ३०॥ स्त्रीकामुकैरयं नित्यं पठनार्थं प्रयत्नतः । विवाहकाण्डं परमं प्राप्नुयुश्चात्र ते वधूः ॥ ३१॥ पतिकाम्या कुमारी चेच्छृणुयाद्भक्तिभाविता । विवाहकाण्डमेतद्वै मनोज्ञं पतिमाप्नुयात् ॥ ३२॥ ममार्थं यः पठेदेतच्छृणुयाद्वाऽथ भक्तितः । इह स्त्रिया सुखं भुक्त्वाऽप्सरोगोष्ठ्या दिवि मोदते ॥ ३३॥ सधवा शृणुयादेतद्या नारी कांतमुत्तमम् । विवाहकाण्डं कुत्रचित्तं वियोगं नाप्नुयात्तु सा ॥ ३४॥ सप्तदशदिनैरस्य कार्यं स्त्रीकामुकैर्मुहुः । अनुष्ठानं वर्षमेकं शृण्वन्नपि स्त्रियमाप्नुयात् ॥ ३५॥ प्रथमे दिवसे सर्गं पठेद्द्वाँ च परschemaऽहनि । त्रयमेव दिने सर्गान्क्रमेण संपठेन्नव ॥ ३६॥ दशमे दिवसेऽष्टैव ह्येकमेकेन वै क्रमात् । एवं सप्तदशाद्दिनैरनुष्ठानं स्मृतं बुधैः ॥ ३७॥ अथवा सकलं काण्डं प्रथमे दिवसे पठेत् । परेऽह्नि द्विगुणं हि नवमे दिवसे क्रमात् ॥ ३८॥ नववारं पठेतच्चेद् दशमे दिवसे ततः । अष्टवारं पठेत्तावद् ह्ययमेकेन क्रमान्नृपः ॥ ३९॥ एवं नरो वर्षमेकमुणुनानांस्त्रियं लभेत् । विमलबक्त्रां च सुनासां दिव्यरूपों मनोहराम् ॥ ४०॥ विवाहकाण्डं परमं पवित्रमानन्ददं मङ्गलकारकं च । स्त्रीदं मनोज्ञं श्रुतिसौख्यदं वै नरैः सदा सश्रवणीयंमेतत् ॥ ४१॥ आनन्दरामायणमध्यसंस्थं विवाहकांडं परमं हि रम्यम् । शृण्वंति भक्त्या भुवि मानवास्ते लभन्ति कामानखिलान्मनोऽज्ञान् ॥ ४२॥ इति श्रीमत्परमहंसपरिव्राजकाचार्य श्रीमदानन्दरामायणे विवाहकाण्डे राज्यवर्णनो नाम नवमः सर्गः ॥ ९॥ विवाहकाण्डस्य सर्वानन्दरामायण सर्वज्ञ ज्ञायतय । पञ्चशताष्ट संख्या श्लोकाश्चाप्युत्थिनाः ॥ १ ॥

जो मनुष्य विवाहकाण्डका श्रवण करते हैं, वे अपना गया हुआ पुत्र, धन व कार्य में निपुण नेहा ज्ञान ॥ २९ ॥ इसका सुननेसे धर्मार्थी धर्मको, धनार्थी धनको, काम कामको और मोक्षार्थी मोक्षको प्राप्त करता है ॥ ३० ॥ जो लोग स्त्रीकी इच्छा रखते हों, उन्हें चाहिये कि निरन्तर इस विवाहकाण्डका पाठ किया करें। इससे उन्हें स्त्री अवश्य प्राप्त होगी ॥ ३१ ॥ अच्छे पतिकी कामना इच्छा रखनेवाली कुमारी यदि भक्तिपूर्वक इस काण्डको सुने तो सुन्दर पति पावेगी ॥ ३२ ॥ जो सम्यक् रूप मनुष्य इस काण्डको पढ़ता या सुनता है सो वह इस जन्ममें स्त्रीके साथ सुख भोगकर स्वर्गमें अप्सराओके साथ विहार करता है ॥ जो सधवा नारी इस काण्डको सुनती है वह कभी पतिवियोगका दुःख नहीं पाती । जो लोग स्त्री चाहते हों वे सत्रह दिनमें इस आवृत्तिके क्रमसे एक वर्ष पर्य्यन्त अनुष्ठान करें ऐसा करनेसे मूढ मानव भी स्त्री प्राप्त कर सकता है ॥ ३३-३५ ॥ उसका क्रम इस तरह है- पहिले दिन एक सर्ग, दूसरे दिन दो सर्ग तीसरे दिन तीन सर्ग इस क्रमसे नवें दिन नौ सर्गोंका पाठ करे। फिर दसवें दिन आठ सर्ग और ग्यारहवें दिन सात सर्ग इस एक-एक घटाता हुआ सत्रह दिनमें पूर्ण करे। विद्वा- नोंने यही अनुष्ठानकी विधि बतलाई है ॥ ३६ ॥ ३७ ॥ अथवा बन पड़े तो पहिले रोज विवाहकाण्डका एक बार पाठ कर जाय, दूसरे रोज दो बार, तीसरे रोज तीन बार, इस रीतिसे बढ़ाता हुआ नवमें दिन नौ बार इस काण्डका पाठ करे और ग्यारहवें रोज सात बार इस विधानसे घटाता हुआ सत्रहवें दिन केवल एक बार पाठ करे ॥ ३८ ॥ ३९ ॥ इस तरह एक वर्ष तक अनुष्ठान करनेसे वह चन्द्रमाके मुखी, अच्छी नासिका और दिव्य रूपवाली मनोहर स्त्री पाते हैं ॥ ४० ॥ लोगोंको चाहिए कि इस परम पवित्र, आनन्ददायक, द्युतिसुखदायी तथा आनन्द देनेवाल विवाहकाण्डको नित्य पढ़कर ॥ ४१ ॥ आनन्दरामायणके अन्तर्गत इस छरे विवाहकाण्डको जो मनुष्य भक्तिपूर्वक सुनते हैं वे अपनी सब कामनाओंको प्राप्त कर लेते हैं ॥ ४२ ॥ इति श्रीम- त्काशिनाथचरणकमलार्त्त श्रीमदानन्दरामायण वाङ्मयकार्यं... रामतेजपाण्डेयविरचित ज्योत्स्ना भाषाटीका- सहिते विवाहकाण्डे नवमः सर्गः ॥ ९ ॥ इस विवाहकाण्डमें कुल नौ सर्ग हैं और उनमें पाँच सौ दस मा श्लोक कह गये हैं ॥ १ ॥ इति श्रीमदानन्दरामायणे विवाहकाण्डं समाप्तम् ।

श्रीसीतापतये नमः

श्रीवाल्मीकिमहामुनिकृतशतकोटिरामचरितान्तर्गत-

आनन्दरामायणम्

'ज्योत्स्ना'ऽभिधया भाषाटीकयाऽलंकृतम्

राज्यकाण्डम् (पूर्वार्द्धम्)

प्रथमः सर्गः

( रामसहस्रनाम )

विष्णुदास उवाच

रामदास गुरो प्रोक्तं त्वया पूर्वं ममांतिके । विवाहकाण्डचरमसर्गेऽत्र पातकापहे ॥ १ ॥
रामनामसहस्रेण नारदेन महात्मना । सूर्यलोके सभायां स रामचन्द्रः स्तुतस्त्विति ॥ २ ॥
तत्कीदृशं रामनामसहस्रं मां प्रकाशय । कथं सूतेन कथितं मुनीनामग्रतः पुरा ॥ ३ ॥

श्रीरामदास उवाच

सम्यक्पृष्टं त्वया शिष्य सावधानेमनाः शृणु । रामनामसहस्रं च सुश्लोकं प्रवदामि ते ॥ ४ ॥
यथा त्वया कृतः प्रश्नः शौनकेन तथा कृतः । सूतः प्राह तदाकर्ण्य शौनक नैमिषे वने ॥ ५ ॥

श्रीसूत उवाच

एकदा सुखमासीनौ पार्वतीपरमेश्वरौ । अन्योन्याश्लिष्टहृद्वाहू लोकरक्षणतत्परौ ॥ ६ ॥
इन्द्रादिलोकपालैश्च सेवितौ च परात्परौ । पार्वती परिपप्रच्छ तदा धर्माननुक्रमात् ॥ ७ ॥

पार्वत्युवाच

मन्नाथ जगतो नाथ सर्वज्ञ परमेश्वर । त्वत्प्रसादान्मया ज्ञातं धर्मशास्त्रमनुत्तमम् ॥ ८ ॥
प्रायश्चित्तं तु पापानां श्रुतं सर्वमशेषतः । ब्रह्महत्यादिपापानां निष्कृतिं वक्तुमर्हसि ॥ ९ ॥


विष्णुदासने कहा—हे गुरो रामदास अभी अभी आप मुझसे कह चुके हैं कि पातकोंको नष्ट करनेवाले विवाहकांडमें नारदने सुलोक रामसहस्रनामक सभायें रामचन्द्रजीकी स्तुति की थी ॥ १ ॥ २ ॥ वह रामसहस्रनाम कैसा है और किस प्रकार सूतजीने मुनियोंके समक्ष उसे प्रकट किया था। सो आप मुझसे कहें ॥ ३ ॥ श्रीरामदासने कहा—हे शिष्य ! तुमने बहुत उत्तम प्रश्न किया है, सावधान चित्त होकर सुनो ! मैं तुम्हे सूतका कहा हुआ रामसहस्रनाम सुनाता हूँ । आज जिस तरह तुम मुझसे पूछ रहे हो, उसी तरह शौनकन सूतजीसे पूछा था । उनका प्रश्न सुनकर नैमिषारण्यम सूतजीने शौनकसे कहा—एक समय कैलासमें तत्पर शिव और पार्वती गलबहियाँ डाले हुए आनन्दपूर्वक बैठे थे ॥ ४-६॥ सर्वश्रेष्ठ देवता शिव और पार्वतीकी सेवामें इन्द्रादि लोकपाल उपस्थित थे उस समय शिव-पार्वतीमें कोई धार्मिक चर्चा चल रही थी । समय पाकर पार्वती ने शिवजी से कहा-हे हमारे प्रभु जगत्के प्रभु, सर्वज्ञ एवं परमेश्वर ! आपकी कृपासे मैने समस्त धर्मशास्त्र जान लिया। पापोंका प्रायश्चित्त किस तरह हो सकता है, सो भी सुन चुकी ।

१८२ आनन्दरामायणे [ सर्गः १

श्रीमहादेव उवाच शृणु देवि प्रवक्ष्यामि गुह्याद्गुह्यतरं महत् । सनत्कुमारविघ्नेशसंवादं पापनाशनम् ॥१०॥ उपविष्टं गणाध्यक्षमेकान्ते प्रणिपत्य च । सनत्कुमारः पप्रच्छ सर्वधर्मविदां वरम् ॥११॥

सनत्कुमार उवाच भगवन् सर्वधर्मज्ञ सर्वविघ्नविनाशन । द्विजहत्याहरं धर्मं वक्तुमर्हसि मे प्रभो ॥१२॥ विना भवन्तं धर्मस्य वक्ता नास्ति जगत्त्रये ।

श्रीगणेश उवाच साधु पृष्टं त्वया ब्रह्मन्सर्वलोकोपकारकम् ॥१३॥ मया चिरं कृतं कर्म स्मारितं भवताऽनघ पुराऽहं गजरूपेण जातः पर्वतसन्निभः ॥१४॥ रुतो वृक्षान्समुत्पाट्य मुनिहिंसां समारभम् । तदा मया मुनिगणा निहता बहवो बलात् ॥१५॥ हाहाकारो महानासीद्ब्राह्मणानां समन्ततः । तदा ह्यत्याहृतेन चेष्टितः पतितोऽस्म्यहम् ॥१६॥ निःसंज्ञं मृततुल्यं मां पतितं वीक्ष्य मे पिता । अराधयज्जगतामीशं रामं सर्वहृदि स्थितम् ॥१७॥ प्रत्यक्षमकरोद्देवं मद्हेतो रघुनन्दनम् । तदा प्रोवाच भगवान् श्रीरामः पितरं मम ॥१८॥

श्रीराम उवाच प्रसन्नोऽस्मि महादेव किं मां प्रार्थयसे प्रभो दास्यामि यदभीष्टं ते त्रिषु लोकेषु दुर्लभम् ॥१९॥

श्रीमहादेव उवाच द्विजहत्यासमाविष्टं मम पुत्रमिमं प्रभो । निष्पापं कुरु देवेश यद्यस्ति मयि ते दया ॥२०॥

श्रीगणेश उवाच तथेत्युक्त्वा तदा तेन कृपादृष्ट्याऽहं निरीक्षितः । तत्क्षणाल्लब्धचैतन्यो निर्मलज्ञानबुद्धिदः ॥२१॥ बहुभिर्गद्यपद्यैश्च स्तुत्वा तं प्रणतोऽभवम् ।

अत आप मुझपर कृपा करके ब्रह्महत्यादि महापापोंके निष्कृतिका कोई उपाय बतलाइए। श्रीशिवजी बोले— हे देवि ! मैं तुम्हें अतिशय गुह्य तथा पापनाशक सनत्कुमार और गणपति का सम्वाद सुनाता हूँ ॥ ७-१० ॥ एक समय जब कि गणेशजी एकान्तमे बैठे हुए थे तब सनत्कुमारने जाकर उन्हें प्रणाम किया और कहा-हे भगवन् ! समस्त धर्मोंको जाननेवाले तथा विघ्नके विनाशक हे प्रभो मुझ ब्रह्महत्याका विनाश करनेवाला कोई कर्म बतलाइए ॥ ११ । १२ ॥ आपके सिवाय तथा लाख्या कोई सा धमका वक्ता मुझे नहीं दीखता । गणपतिने कहा-हे ब्रह्मन् ! तुमने मुझसे बहुत ठीक प्रश्न किया है। इससे सारे संसारका उपकार होगा ॥ १३ ॥ तुमने एक ही बातसे पूर्वमे किये हुए मेरे सब कर्मोका स्मरण दिला दिया है। पूर्वकालमे मैं गजरूपसे संसारमें जन्मा था और पर्वतकी भाँति लम्बा चौड़ा मेरा डील डौल था । १४ । उस समय मैने पहले तो बहुतसे वृक्ष उखाड़े । फिर मुनियोंकी हिंसा आरम्भ कर दी। मैने अपने अपरिमय बलसे कितन ही मुनियोंका बघ कर पापी बन बैठा ॥ १५ । १६ ॥ मेरे होश-हवास ठिकाने न रह तथा एक मृतककी नाईं मेरी आकृति हो गयी । मेरी दशा देखकर मेरे पिताने संसारके महाप्रभु रामकी आराधना की, इससे प्रसन्न होकर रामचन्द्रजी मेरे पिता- के सम्मुख आये और कहने लगे। रामचन्द्रजी बाले हे महादेव ! मै तुम्हारे ऊपर अति प्रसन्न हूँ । बतलाओ, तुम किसलिए इस प्रकार मेरी प्रार्थना कर रहे हो ? तुम्हारा कामना यदि तीन लोकमे दुर्लभ होगा तो भी मै उसे पूर्ण करूँगा ॥ १७-१९ ॥ श्रीशिवजीने कहा-हे प्रभो ! मेरे पुत्र गणेशको ब्रह्महत्या लग गयी है। हे देवेश ! यदि आपकी मुझपर दया हो तो उसे निष्पाप कर दीजिए ॥२०॥ श्रीगणेशजी सनत्कुमारसे कहने लगे-इसप्रकार मेरे पिताकी बात सुनकर रामचन्द्रने अपनी कृपाभरी दृष्टिसे एक बार मेरी ओर देखा। उनके देखते ही मैं चैतन्य हो गया। घेरेमें एक निर्मल ज्ञानका प्रकाश संचार हो गया ॥ २१ ॥ तब बहुतसे गद्य-पद्यों द्वारा मैने भगवान्की

सर्गः १ ] राज्यकाण्डम् ( पूर्वार्द्धम् ) ३८३

सर्गः १ ] राज्यकाण्डम् ( पूर्वार्द्धम् ) ३८३

श्रीरामचन्द्र उवाच द्विजहत्यामहंमस्य प्रायश्चित्तं वदामि ते ॥ २२ ॥ जप नामसहस्रं मे हत्याकोटिविनाशनम् । इति गुह्यं ददौ रामस्तत्त्वं नामसहस्रकम् ॥२३॥ तस्य त्वग्रहणादेव निष्पापोऽहं तदाभवम् । सदारभ्यास्मि देवानां पूज्योऽहं मुनिसत्तम ॥२४॥ त्वमप्येतदधीयानो राघवस्य महात्मना । नाम्नां सहस्रं लोकेषु प्रख्यापय महामते ॥२५॥

सनत्कुमार उवाच धन्योऽस्म्यनुगृहीतोऽस्मि कृतार्थोऽस्मि गणाधिप । त्वत्प्रसादान्मयाऽधीतं रामनामसहस्रकम् ॥२६॥

श्रीमहादेव उवाच इति विज्ञाप्य देवेशं परिक्रम्य प्रणम्य च । तदादि सततं जपन्वा स्तोत्रमेतद्वरानने ॥२७॥ अवाप परमां सिद्धिं पुण्यपापविवर्जितः ।

श्रीपार्वत्युवाच श्रोतुमिच्छामि देवेश तदहं सर्वकामदम् ॥ २८ ॥ नाम्नां सहस्रं तां ब्रूहि यद्यस्ति मयि ते दया ।

श्रीमहादेव उवाच अद्य वक्ष्यामि भो देवि रामनामसहस्रकम् । शृणुष्वैकमनाः स्तोत्रं गुह्याद्गुह्यतरं महत् ॥२९॥ ऋषिर्विनायकश्चास्य अनुष्टुप्छन्द उच्यते । परब्रह्मात्मको रामो देवता शुभदर्शने ॥३०॥

ॐअस्य श्रीरामसहस्रनाममालामंत्रस्य विनायक ऋषिः अनुष्टुप् छन्दः श्रीरामो देवता महाविष्णुरिति बीजं गुणभृन्निर्गुणो महानिति शक्ति सच्चिदानन्दविग्रह इति कीलकं श्रीराम-प्रीत्यर्थे जपे विनियोगः

ॐश्रीरामचन्द्राय अंगुष्ठाभ्यां नमः । सीतापतये तर्जनीभ्यां नमः । रघुनाथाय मध्यमाभ्यां नमः । भरताग्रजाय अनामिकाभ्यां नमः । दशरथात्मजाय कनिष्ठिकाभ्यां नमः । हनुमत्प्रभवे करतलकर-पृष्ठाभ्यां नमः । श्रीरामचन्द्राय हृदयाय नमः सीतापतये शिरसे स्वाहा रघुनाथाय शिखायै वषट् । भरताग्रजाय कवचाय हुम् । दशरथात्मजाय नेत्रत्रयाय वौषट् । हनुमत्प्रभवे अस्त्राय फट् ।

स्तुति की और उनके चरणोमे लाट गया । फिर रामचन्द्रजी कहने लगे तुजारो द्विजहत्याके पापसे उद्धार पानेका उपाय मै तुम्हें बतलाता हूँ ॥ २२ ॥ मेरे रामसहस्रनाम का जप करो वह सहस्रों हत्याओंका नाशभी नष्ट कर देता है । ऐसा कहकर रामचन्द्रजीने अपना गुप्त सहस्रनाम मुझे बताया और उसके ग्रहणमात्रसे मेरे पाप नष्ट हो गये । तभीसे हे मुनिसत्तम ! मै देवताओंका भी पूज्य हो गया हूँ ॥ २३ ॥ २४ ॥ तुम भी इसी रामसहस्रनामका पाठ करते हुए संसारमे इसका प्रचार करो । सनत्कुमारने कहा-मैं धन्य हूँ । मुझपर आपकी बड़ी कृपा है । आपकीही दयासे मैने रामसहस्रनाम पा लिया । मै कृतार्थ हो गया । श्रीशिवजीने कहा-इस तरह उस सहस्र-नामको जानकर सनत्कुमारने गणेशजीकी परिक्रमा की, प्रणाम किया और तभीसे नित्य इसका जप करके पुण्य-पापसे विवर्जित होकर वे परम सिद्धिको प्राप्त हुए । पार्वतीजी बोलीं-हे देवेश ! सब कामनाओंको पूर्ण करनेवाले रामसहस्रनामको मैं भी जानना चाहती हूँ । यदि आपकी मुझपर दया रहती हो तो मुझे बताइए । शिवजी कहने लगे-हे देवि ! मै तुम्हें वह पुनीत सहस्रनाम बतलाता हूँ । तुम भी सावधान मन होकर उस गुह्यातिगुह्य स्तोत्रको सुनो ॥ २५-२९ ॥ इस रामसहस्रनाम मंत्रमय स्तोत्रके ऋषि विनायक हैं और साक्षात् परब्रह्म राम इसके देवता हैं ॥ ३० । 'ॐ अस्य श्रीराम' इस मंत्रसे विनियोग करके 'श्रीरामचन्द्राय' कहकर अंगुष्ठ, 'सीता-पतये' कहकर तर्जनी, 'रघुनाथाय' कहकर मध्यकी अंगुली, 'भरताग्रजाय' कहकर अनामिका, 'दशरथात्मजाय' कहकर कनिष्ठिका, 'हनुमत्प्रभवे' कहकर दोनों करपृष्ठोंका न्यास करे । फिर 'रामचन्द्राय' कहकर हृदय, 'सीतापतये' कहकर शिर, 'रघुनाथाय' कहकर शिखा, 'भरताग्रजाय' से दोनों बाहुमूल, 'दशरथात्मजाय'

३८२आनन्दरामायणे[ सर्गः १

अथ ध्यानम्

ध्यायेदाजानुबाहुं धृतशरधनुषं बद्धपद्मासनस्थं
पीतं वासो वसानं नवकमलस्पर्धि नेत्रं प्रसन्नम् ।
रामांकास्तूर्णताक्षमुखकमलमलम्प्रेक्ष्यनेत्रं नीलाभं
नानालङ्कारदीप्तं दधतमुरुजटामण्डलं रामचन्द्रम् ॥३१॥

वैदेहीसहितं सुरद्रुमतले हैमे महामण्डपे
मध्ये पुष्पकमासने मणिमये वीरासने संस्थितम् ।
अग्रे वाचयति प्रभञ्जनसुते तत्त्वं मुनिभ्यः परं
व्याख्यातं भरतादिभिः परिवृतं रामं भजेच्छ्याम लम् ॥३२॥

सौवर्णेमण्डपे दिव्ये पुष्पके सुविराजिते । मूले कल्पतरोः स्वर्णपीठे सिंहासनेयुते ॥३३॥
मृदुल्लक्ष्णीतरे तत्र जानक्या सह संस्थितम् । रामं नीलोत्पलश्यामं द्विभुजं पीतवाससम् ॥३४॥
स्मितवक्त्रं सुखासीनं पद्मपत्रनिभेक्षणम् । किरीटहारकेयूरकुण्डलैः कटकादिभिः ॥३५॥
आभ्रमानं ज्ञानमुद्राधरं वीरासनन्दितम् । स्पृशन्तं स्तनयोश्च जानक्याः सव्यपाणिना ॥३६॥
वसिष्ठवामदेवाद्यैः सेवितं लक्ष्मणादिभिः । अयोध्यानागरो रम्ये अभिषिक्तं रघूद्वहम् ॥३७॥
एवं ध्यात्वा जपेन्नित्यं रामनामसहस्रकम् । हत्याकोटियुतो वापि मुच्यते नात्र संशयः ॥३८॥
ॐरामः श्रीमान्महाविष्णुर्जिष्णुर्देवहितावहः । तत्त्वं चा तारक ब्रह्म शाश्वतः सर्वसिद्धिदः ॥३९॥
राजीवलोचनः श्रीमांल्लक्ष्मण्यो रघुपूंगवः । रामभद्रः सदाचारो राजेन्द्रो जानकीपतिः ॥४०॥
अग्रगण्यो वरेण्यश्च वरदः परमेश्वरः । जनार्दनो जितमित्रः परार्थैकप्रयोजनः ॥४१॥


से दोनों नेत्र छुए तथा 'हुंफट्स्वाहे' कहकर चुटकी बजाये । अथ ध्यानम् जिनका आजानु बाहु है, जो धनुष-बाण धारण किये हैं, पद्मासन मारकर बैठे हैं, पीत वस्त्र पहने हैं, नवीन कमलदलसे होड़ करनेवाले जिनकी दोनों आँखें हैं, जिनके वामभाग सीताजी बैठी हैं सीता तथा राम दोनों आपसमें एक दूसरेके मुखकी शोभा देखनेमें संलग्न हैं, नवीन मेघके सदृश जिनका रूप है, विविध प्रकारके अलङ्कारोंसे अलंकृत तथा लम्बो लम्बी जटा धारण करनेवाले रामचन्द्रका ध्यान करे ॥३१॥ कल्पवृक्षके नीचे सुवर्णके मध्य एक सुन्दर सुवर्णके मण्डपमें पूर्वनिर्मित महासन, जिसमें अनेक प्रकारकी मणियां जड़ी हैं, उसपर श्रीराम वीरासनसे बैठे हुए हैं। उनके सामने बैठे हनुमान्‌जी मुनियोंको परम सम्बन्ध व्याख्यान कर रहे हैं। भरतादि तीनों भ्राता जिनकी बगल-बगल खड़े हैं। ऐसे श्यामस्वरूप रामका भजन करे ॥३२॥ सुवर्णनिर्मित दिव्य पुष्पक विमान कल्पतरुके नीचे रक्खा है। जिसमे आठ सिंह लगे हैं। जो कोमल और चिकने हैं, ऐसी गद्दीपर सीताके साथ बैठे हुए हैं नीलोत्पल सरीखे जिनके नेत्र हैं दो भुजाएं हैं, पीत वस्त्र है, मुसकुराता हुआ मुख है और वे आनन्दसे बैठे हैं। किरीट, हार, केयूर कुण्डल और कटकादिसे सुशोभित हो रहे हैं। वे एक ओर ज्ञानमुद्रा धारण किये हैं। दूसरी तरफ बायें हाथसे सीताके स्तनोंको छूते हैं। ॥३३-३६॥ वसिष्ठ, वामदेव तथा लक्ष्मणादिक जिनकी सेवामें तत्पर हैं। अयोध्या नगरीमें जिनका राज्यभिषेक हो चुका है। ऐसे रघूद्वह रामचन्द्रजीका ध्यान करके सर्वदा इस रामसहस्रनामका पाठ करना चाहिए। ऐसा करनेसे यदि किसीको करोड़ों हत्यायें भी लगी हैं तो दूर हो जाती हैं इसमें किसी प्रकारका संशय नहीं करना चाहिए। ॥३७-३८॥ ॥३८॥ अब सहस्रनाम कहते हैं - राम, श्रीमान्, महाविष्णु, जिष्णु (सबको जीतनेवाले), देवहितावह (देवताओंका कल्याण करनेवाले), तत्त्वात्मकस्वरूप तारकब्रह्म, शाश्वत, सर्वसिद्धिद (सब प्रकारकी सिद्धियो-को देनेवाले) ॥३९॥ कमल सरीखे नेत्रवाले, श्रीमान्, रघुपूंगव, धनु, रामभद्र, सदाचार, (पुनीत आचारवाले) राजेन्द्र, जानकीके पति ॥४०॥ सबमें अग्रेसर, वरेण्य (सर्वश्रेष्ठ), वरद (वरदायक)

सर्गः १ ] राज्यकाण्डम् ( पूर्वार्द्धम् ) ३८५

सर्गः १ ] राज्यकाण्डम् ( पूर्वार्द्धम् ) ३८५


विश्वामित्रप्रियो दाता शत्रुजिच्छत्रुतापनः । सर्वज्ञः सर्ववेदादिः शरण्यो बलिमर्दनः ॥४२॥ ज्ञानमयोऽपरिच्छेद्यो वाग्मी सत्यव्रतः शुचिः । ज्ञानगम्यो दृढप्रज्ञः शरधन्वी प्रतापवान् ॥४३॥ द्युतिमानात्मवान् वीरो जितक्रोधोऽरिमर्दनः । विश्वरूपो विशालाक्षः प्रभुः परिदृढो दृढः ॥४४॥ ईशः खड्गधरः श्रीमान् कौसल्येयोऽनसूयकः । विपुलांसो महोरस्कः परमेष्ठी परायणः ॥४५॥ सत्यव्रतः सत्यसंधो गुरुः परमधार्मिकः । लोकज्ञो लोकवत्त्वा लोकात्मा लोककृद्विभुः ॥४६॥ अनादिर्भगवान् सेव्यो जितमायो रघूद्वहः । रामो दयाकरो दक्षः सर्वज्ञः सर्वपावनः ॥४७॥ ब्रह्मण्यो नीतिमान् गोप्ता सर्वदेवमयो हरिः । सुन्दरः पीतवासाश्च सूत्रकारः पुरातनः ॥४८॥ सौम्यो महर्षिः कोदण्डः सर्वज्ञः सर्वकोविदः । कविः सुग्रीववरदः सर्वपुण्याधिकप्रदः ॥४९॥ भव्यो जिताग्निरिष्वर्गो महोदारोऽघनाशनः । सुकीर्तिरादिपुरुषः कान्तः पुण्यकृतोत्तमः ॥५०॥ अकल्मषश्चतुर्बाहुः सर्वावासो दुरासदः १०० स्मितभाषी निवृत्तात्मा स्मृतिमान् वीर्यवान् प्रभुः ॥५१॥ धीरो दान्तो घनश्यामः सर्वायुधविशारदः । अध्यात्मशामानिलयः सुमना लक्ष्मणाग्रजः ॥५२॥ सर्वतीर्थमयः शूरः सर्वयज्ञफलप्रदः । यज्ञस्वरूपो यज्ञेशो जरामरणवर्जितः ॥५३॥


परमेश्वर, जनार्दन जितमित्र (शत्रुओं को पराजित करनेवाले), परार्थकप्रयातन (परोपकार करना ही जिनका एकमात्र प्रयोजन है)। विश्वामित्रप्रिय दाता शत्रुजिच्छत्रुतापन (शत्रुओं को सतानेवाले), सर्वज्ञ, सर्ववेदादि समस्त वेदोंके आदिकारण। शरण्य, बलिमर्दन बलिको परास्त करनेवाले, ज्ञानमय, परिच्छेद्य वाग्मी (कुशल वक्ता) सत्यव्रत, शुचि, पवित्र, ज्ञानगम्य (ज्ञानद्वारा जानने योग्य), दृढप्रज्ञ (स्थिर बुद्धिकाले), शरधन्वी, प्रतापवान्, आत्मवान् वीर, जितक्रोध (जिन्होंने क्रोधको जीत लिया है), अरिमर्दन (शत्रुओंको नीचा दिखानेवाले) विश्वरूप (संसार ही जिनका स्वरूप है), विशालाक्ष (बड़ी बड़ी आंखवाले), प्रभु समस्त जगत्के ईश्वर) परिदृढ (सतर्क)। ४१-४४ ॥ ईश (सब संसारके स्वामी), खड्गधर (तलवार धारण करनेवाले), श्रीमान् कौसल्येय (कौशल्याके पुत्र), अनसूयक (किसीसे ईर्ष्या न करनेवाले), विपुलांस (जिनके स्कंध चौड़े हैं) महोरस्क (जिनकी विशाल छाती है), परमेष्ठी (जो ब्रह्मस्वरूप हैं), सत्यव्रतपरायण (सत्यवादी), सत्यसंध (सत्यप्रतिज्ञ), गुरु (सबके पूज्य), परम धार्मिक, लोकज्ञ (सब लोकोंके ज्ञाता), लोकवत्ता (सब लोकोंमें वसनेवाले, लोकात्मा (सब लोकोंके आत्मा), लोककृत (लोकोंके रचयिता, विभु (सर्वव्यापी)। ४५ । ४६ । अनादि (जिनका आदि नहीं है), भगवान् (सर्वसम्पत्तिशाली), सेव्य (सेवा योग्य), जितमाय (मायाका जीतनेवाले), रघूद्वह (रघुवंशके उजागरकर्ता), राम दयाकर, दयाके खानिस्वरूप, दक्ष (सब कार्योंमे निपुण), सर्वज्ञ, सर्वपावन (सबको पुनीत करनेवाले), ब्रह्मण्य (ब्राह्मणभक्त) नीतिमान् गोप्ता (सबका रक्षक), सर्वदेवमय, हरि, सुन्दर, पीतवासा (पीले वस्त्र धारण करनेवाले), पुरातन सूत्रकार (सर्वप्राचीन सूत्रकार अर्थात् सूत्ररूपमें ग्रंथोंके रचयिता), पुरातन (सबमे प्राचीन) ॥ ४७ । ४८ । सौम्य (जिनका सरल स्वभाव है), महर्षि, कोदण्ड (धनुर्धर), सर्वज्ञ, सर्वकोविद (सब विषयोंमें पूर्ण पण्डित, कवि, सुग्रीववरद (सुग्रीवको अभयवर देनेवाले), सर्वपुण्याधिकप्रद (सब पुण्योंसे भी अधिक फल देनेवाले) ॥ ४९, भव्य जिताग्निरिष्वर्गो (जिन्होंने अपने बलसे शत्रुके संघ-उत्साहादि छः वर्गोंको जीत लिया है), महोदार (जो सबसे उदार हैं), अघनाशन (पापका नाश करनेवाले, सुकीर्ति (जिनकी सुन्दर कीर्ति है), आदिपुरुष (जो सबके आदि पुरुष हैं), कान्त (सर्वप्रिय), पुण्यकृतोत्तम (पवित्रविचारसम्पन्न) अकल्मष (पापरहित) चतुर्बाहु (चतुर्भुज), सर्वावास (सबके निवासस्थान, दुरासद (बड़ी कठिनाईसे प्राप्त १०० स्मितभाषी (मुसकुराते हुए बातें करनेवाले), निवृत्तात्मा, जिनकी आत्मा स्वतन्त्र है, वा स्मृतिमान, वीर्यवान् और सबके प्रभु हैं। धीर, दान्त (उदारप्रकृति), घनश्याम (मेघकी नई श्यामस्वरूप), सर्वायुधविशारद (सब शस्त्रास्त्रोंमे निपुण, अध्यात्मशामनिलय (अध्यात्मशास्त्रोंके निवास), सुमना (सुन्दर चित्तवाले), लक्ष्मणाग्रज (लक्ष्मणके बड़े भ्राता), ॥ ५०-५२ ॥ तीर्थमय, शूर (महासाहस योद्धा), सर्वयज्ञफलप्रद (सब यज्ञोंके फलदाता) यज्ञस्वरूप

३८६ आनन्दरामायणे [ सर्गः १

वर्णाश्रमगुरुर्वर्णी शत्रुजिच्छत्रुतापनः । शिवलिङ्गप्रतिष्ठाता परमात्मा परात्परः ॥ ५५ ॥ प्रमाणभूतो दुर्ज्ञेयः पूर्णः परपुरंजयः । अनन्तरूपिरानन्दी धनुर्वेदी धनुर्धरः ॥ ५६ ॥ गुणकरो गुणश्रेष्ठः सच्चिदानन्दविग्रहः । आप्तवाद्यो महाकायो विश्वकर्मा विशारदः ५७॥ विनीतात्मा वीतरागस्तपस्वीशो जनेश्वरः । कल्याणः प्रकृतिः कल्पः सर्वज्ञः सर्वकामदः । ५७.। अक्षयः पुरुषः साक्षी केशवः पुरुषोत्तमः । लोकाध्यक्षो महाकार्यो विभीषणवरप्रदः ॥ ५८ । आनन्दविग्रहो ज्योतिर्हनुमत्प्रभुरव्ययः, भ्राजिष्णुः महनो भोक्ता मन्त्रवादी बहुश्रुतः । ५९ । सुप्रदः कारणं कर्ता भवबन्धनविमोचनः । देवचूड़ामणिर्नेता ब्राह्मण्यो ब्रह्मवर्धनः । ६० ॥ संसारतारको रामः सर्वदुःखविमोक्षकत् । विद्वत्तमो विश्वकर्ता विश्वकृद्विश्वकर्म च ॥ ६१ : नित्यो नियतकल्याणः सर्वोपद्रवनाशकत् । काकुत्स्थः पुण्डरीकाक्षो विश्वामित्रभयापहः । ६२ । मारीचमथनो रामो विराधवधपण्डितः । दुःस्वप्ननाशनो रम्य किरीटी त्रिदशाधिपः ॥ ६३ ॥ महाधनुर्महाकायो भीमो भीमपराक्रमः । तत्त्वस्वरूपस्तत्त्वज्ञस्तत्त्ववादी सुविक्रमः । ६४ भूतात्मा भूतकृत्स्वामी कालज्ञानी महाप्रभुः । अनिर्विष्णो गुणग्रामो निष्कलङ्कः कलङ्कहा । ६५ । स्वभावभद्रः शत्रुघ्नः केशवः स्थाणुरीश्वरः । भूतादिः शंभुरादित्यः सर्वविद्ः शाश्वतो ध्रुवः । ६६ । कवची कुण्डली चक्री खड्गी भक्तजनप्रियः । अमर्त्युर्धर्म्मगदितः सर्वजिन्मर्वगोचरः । ६७ । अनुत्तमोऽप्रमेयात्मा सर्वात्मा गुणसागरः २००, समः समात्मा समगो जटामुकुटमण्डितः । ६८ । अजेयः सर्वभूतात्मा विष्वक्सेनो महातपाः । लोकाध्यक्षो महाबाहुःस्मृतो वरदश्चितमः । ६९ ।

। यज्ञके मूर्ति रूप ), यज्ञेश ( यज्ञके स्वामी ), जरमरणवर्जित ( बुढ़ापा और मृत्यु दोनोंस रहित ), वर्णाश्रमगुरु ( वर्ण और आश्रमके गुरु ), शत्रुजित् ( शत्रुओंको जीतनेवाले), पुरुषोत्तम ( सब पुरुषोंमें श्रेष्ठ ), शिवलिङ्गप्रतिष्ठाता ( विविध शिवलिङ्गोंके संस्थापक ), परमात्मा, परात्पर प्रमाणभूत विश्वके प्रमाणस्वरूप ), दुर्ज्ञेय बड़े कठिनाईसे जानने योग्य ), पूर्ण, परपुरञ्जय ( शत्रुओका नगर जीतनेवा... अनन्तरूपि ( अपारदृष्टि ), आनन्द, धनुर्वेदके ज्ञाता, धन्धारि गुणकर, गुणाक भण्डार ), गुणश्रेष्ठ ( सब गुणोंमें श्रेष्ठ ), सच्चिदानन्दविग्रह ( सत चित् आनन्द इन तीनोंस जिनका शरीर बना है ), आप्तवाद्य ( सबोंके वन्दनीय ), महाकाय, विश्वकर्मा विशारद । ५३ ५६ ॥ विनीत आन्तरवाल, वीतराग ( रागद्वेषशून्य ), तपस्वीश ( तपस्वियोंके स्वामी ), जनेश्वर, कल्याण ( कल्याणस्वरूप ), प्रकृति सदा प्रसन्न ), कल्प, स्थिति तथा प्रलयकालके अधिपति ), सर्वज्ञ, सर्वकामद अक्षय, पुरुष, साक्षी केशव, पुरुषोत्तम, लोकाध्यक्ष, महाकार्य, विभीषणवरप्रद । ५७ । ५८ आनन्दविग्रह आनन्द रूप ही ), ज्योतिस्वरूप, हनुमान्के स्वामी, अविनाशी, भ्राजिष्णु ( दीप्तिसम्पन्न ), सहनशील, भोक्ता, मन्त्रके बहुश्रुत । ५९ ॥ सुखदाता, कारणस्वरूप, कर्ता, भवबन्धनसे छुड़ानेवाले, देवताओंके मुकुट, ब्राह्मणभक्त ब्राह्मणके बढ़ानेवाले ॥ ६० ॥ संसारसागरसे तारनेवाले, सब दुःखसे छुड़ानेवाले, अतिशय विद्वान्, विश्वरचयिता, विश्वकर्ता, विश्वके कत्तृत्व रूपस्वरूप ॥ ६१ , नित्य कल्याणतत्पर, सर्वबाधाविनाशक, काकुत्स्थ, कमलनयन, विश्वामित्रभयहारी । ६२ । मारीचहन्ता, राम, विराधवधमें निपुण, दुःस्वप्नविद्वारक, रमणीक, किरीटधारी, देवाधिपति ॥ ६३ ॥ विशाल धनुष धारण करनेवाले विशालकाय, भयानक भयानक पराक्रम-सम्पन्न, तत्त्वाक मूर्तरूप, तत्त्वोंके ज्ञाता तत्त्वविषयक वक्ता, असाधारण पराक्रमी ॥ ६४ ॥ प्राणमात्रके सखा सबके स्वामी, समयके पारखी, विशालभारोद्धारी, सदा प्रसन्न, गुणधाम निष्कलंक, कलंकनाशक ॥ ६५ ॥ स्वभावतः कल्याणकारी, शत्रुनाशक, केशव, चिरस्थायी, ईश्वर, प्राणियोंके आदि शम्भु अदिति-तनय स्वर्गी, नित्य, अटल ॥ ६६ ॥ कवचधारी, कुण्डलधारी चक्रधारी, खड्गधारी, भक्तजनके प्रिय, अमर, भक्तके सेवक विजेता, सर्वदर्शी ॥ ६७ ॥ सर्वोत्तम, अप्रमेयात्मा सर्वात्मा, गुणसागर २०० । सदा सम, प्रकृति, समात्मा, समगामी, जटामुकुटविमण्डित । ६८ ॥ अजय, सर्वभूतात्मा, विष्वक्सेन महातपा,

सर्गः १ ] राज्यकाण्डम् ( पूर्वार्द्धम् ) १८७

सर्गः १ ] राज्यकाण्डम् ( पूर्वार्द्धम् ) १८७


सहिष्णुः सद्गतिः शास्ता विश्वयोनिर्दिनद्युतिः । अनीशः अजितः प्रांशुरुपेन्द्रो वामनो बलिः ॥७०॥ धनुर्वेदो विधाता च ब्रह्मा विष्णुश्च शङ्करः । हंसो मरीचिर्गोविन्दो रत्नगर्भो महद्युतिः ॥ ७१ । व्यासो वाचस्पतिः सर्वदर्पिदानवमर्दनः । जानकाश्रयभः श्लाघ्यः प्रकटः प्रीतिवर्धनः ॥७२॥ सम्भवोऽतीन्द्रियो वेद्यो निर्देश्यो नग्नवान्प्रभुः । मदनो मन्मथो वश्या विश्वरूपो निरञ्जनः ॥७३॥ नारायणोऽग्रणी साधुर्जटायुप्राणिवर्द्धनः । नैकरूपो जगन्नाथः गुरुकार्यहरः प्रभुः ॥७४। जितक्रोधो जितारातिः प्लवगाधिपराज्यदः । वसुदः सुभुजो नैक्रमायो भव्यः प्रमोदनः ॥७५। चण्डांशुः सिद्धिदः कल्पः शरणागतवत्सलः । अगादो गगहर्त्ता च मन्त्रज्ञो मन्त्रभावनः ॥७६॥ सौमित्रिवत्सलो धूर्यो व्यक्तऽव्यक्तस्वरूपधृक् । वसिष्ठो ग्रामणीः श्रीमाननुकूलः प्रियरतः ॥७७॥ अनुत्कः मान्त्रिको धीरः शरासनविशारदः । ज्येष्ठः सर्वगुणोपेतः शक्तिमान्त्राटकांतकः ॥७८॥ वैकुण्ठः प्राणिनां प्राणः कमठः कमळाधिपः । गोवर्धनधरो मत्स्यरूपः कारुण्यसागरः ॥७९॥ कुम्भकर्णप्रभेत्ता च गोपिगोपालनन्दनः ३०० । मायावी व्यापको व्यापी रेणुकेयबलापहः ॥८०। पिनाकभञ्जनो वन्द्यः समर्थो गरुडध्वजः । लोकत्रयाश्रयः लोकभर्त्ताच भरताग्रज ॥८१॥ श्रीधरः संप्रतिर्लोकाध्यक्षो नारायणो विभुः । मनोरूपो मनोजेगी पूर्णः पुरुषपुंगवः । ८२॥ यदुश्रेष्ठो यदुपतिर्मुनामयः मुविक्रमः । तेजाधरो घराधरश्चतुर्मूर्तिर्महानिधिः । ८३ । बाणप्रमथनो वद्यः शांतो भरतवंदितः । शब्दातीतः समात्मा कमलाङ्गः प्रजागरः ।८४। लोकार्थगमः शशायी धीरः स्थितिलयात्मकः । आग्मज्योतिर्गदात्मा सहस्रार्च्चिः सहस्रपात् ॥८५। अमृतांशुर्महीगर्भो निर्व्वत्तिरप्यस्पृहः । त्रिकालज्ञो मुनिः साक्षी विहायसगतिः कृतः ॥८६। पर्जन्यः कुमुदो भूतावासः कमलासनः । आत्मप्रत्ययः श्रोवाशो वाग्मी लक्ष्मणग्रजः ॥८७॥ लोकाभिरामो लोकार्त्तिमर्त्तः सेवर्काप्रियः । मनातनतमा मध्व्यामलः राक्षसातकृ ॥८८।


स्माकक भावी, भगवान् अगम्य, वरदीय ने । ९६ ॥ सहिष्णु, सद्गति, शासक, विश्वयोनि परमकन्ति-सम्पन्न अनीश (इन्द्रसे भ्रष्ट), महाबली, उपेन्द्र, वामन, बलि, ॥ ७० ॥ धनुर्वेदविधाता, ब्रह्मा, विष्णु, शंकर हंस, मरीचि, गोविन्द रत्नगर्भ महा तेजस्वी ॥ ७१ ॥ व्यास, बृहस्पति, सभी अभिमानी असुरोंके घातक, जानक आश्रम, श्लाघ्य प्रकट, प्रीतिवर्धन ॥ ७२ ॥ संभव, अतीन्द्रिय, वेद्य, निर्देश, ज्ञानवान्‌के स्वाभा मदन मन्मथ, सर्वव्यापी विश्वरूप निरञ्जन ॥ ७३ ॥ नारायण, अग्रणी, साधु जटायुके प्रीतिवर्धन, अनेकरूप, जगन्नाथ देवकार्यसाधक, प्रभु ॥ ७४ ॥ जितक्रोध, शत्रुविजेता, सुग्रीवराज्यदायक, वसुदाता, बहुभुज विविधमायाधारी, भव्य प्रमादन ॥ ७५ । चण्डांशु, सिद्धिदायक, कल्प, शरणागत-वत्सल, अगाद रोगहर्त्ता मन्त्रज्ञ मंत्रभावन। ७६ । लक्ष्मणप्रिय, धुर व्यक्त-अव्यक्तस्वरूपधारी, वसिष्ठ, ग्रामीण, धीमान्, अनुकूल, प्रियरत । ७७ । अनुत्सुक मांत्रिक धीर, धनुर्विद्यामें निपुण, श्रेष्ठ, सर्वगुणसम्पन्न, शक्तिमान्, ताड़काके घातक। ७८ । वैकुण्ठ, प्राणियोंके प्राण, कमठ, कमलापति, गोवर्धनधारी, मत्स्य-रूपधारी, करुणासागर ॥ ७९ ॥ कुम्भकर्णके नाशक, गोपीगोपालनन्दन ३००, मायावी, व्यापक , व्यापी, रेणुकेय (परशुराम)के बलनाशक ॥ ८० धनुर्भञ्जक, वंद्य समर्थ, गरुडध्वज, तीनों लोकोंके आश्रय, लोकभर्त्ता भरतके बड़े भ्राता । ८१ ॥ श्रीधर, सद्गति, लोकाध्यक्ष नारायण, विभु, मनोरूपों, मनोवेगी, पूर्ण, पुरुष पुंगव । ८२ । यदुश्रेष्ठ यदुपति, मूनामय, मुविक्रम, तेजाधर, घराधर, चतुर्मूर्ति, महानिधि ॥ ८३ ॥ बाणप्रमथन वद्य अन्त, भरतवन्दित शब्दातीत, सर्वात्मा, कमलांग, प्रजागर ॥ ८४ । लोकौर्थगामी, शेषशायी धीर स्थितिलय, अमल, आत्मज्योति, अदीनात्मा, सहस्रार्चि, सहस्रचरण । ८५ । अमृतांशु, महीगर्भ, विप्रभक, स्पृहरहित, त्रिकालज्ञ मुनि साक्षी, विहायसगति, कृतः ॥ ८६ ॥ पर्जन्य, कुमुद भूतावास, कमलासन आत्मसंवद्या, आवास, बोरहा, लक्ष्मणाग्रज ॥ ८७ ॥ लोकाभिराम, लोका-

३८८आनन्दरामायणे[ सर्गः १

दिव्यायोधधरः श्रीमानप्रमेयो जितेन्द्रियः । भूदेववंद्यो जनकप्रियकृत्प्रपितामहः ॥ ८९ ॥
उत्तमः सात्विकः सत्यः सत्यसन्धस्त्रिविक्रमः । सुवृत्तः सुगमः सूक्ष्मः सुघोषः सुहृदः सुहृत् ॥ ९० ॥
दामोदरोऽच्युतः शार्ङ्गी वामनो मधुराधिपः । देवकीनन्दनः शौरि शूरः कैटभमर्दनः ॥ ९१ ॥
सप्ततालप्रभेत्ता च मित्रवंशप्रवर्धनः । कालस्वरूपी कालात्मा कालः कल्याणदः ४०० कलिः ॥ ९२ ॥
संवत्सरो ऋतुः पक्षो ह्ययनं दिवमो युगः । स्तव्यो विविक्तो निर्लेपः सर्वव्यापी निराकुलः ॥ ९३ ॥
अनादिनिधनः सर्वलोकपूज्यो निरामयः रसो रसज्ञः सारज्ञो लोकसारो रसात्मकः ॥ ९४ ॥
सर्वदुःखातिगो विद्याराशिः परमगोचरः शेषो विशेषो विगतकल्मषो रघुपूङ्गवः ॥ ९५ ॥
वर्णश्रेष्ठो वर्णभाव्यो वर्णो वर्णगुणोज्ज्वलः कर्मसाक्षी गुणश्रेष्ठो देवः सुरवरप्रदः ॥ ९६ ॥
देवाधिदेवो देवर्षिदेवतासुरनमस्कृतः । सर्वदेवमयश्चक्री शार्ङ्गपाणी रघूत्तमः ॥ ९७ ॥
मनोबुद्धिग्हंकारः प्रकृतिः पुरुषोऽव्ययः । न्यायो न्यायी नयी श्रीमान् नयो नभश्चरो ध्रुव ॥ ९८ ।
लक्ष्मीविश्वम्भरो भर्ता देवेन्द्रो बलिमर्दनः । बाणारिमर्दनो यज्वाऽनुत्तमो मुनिसेवितः ॥ ९९ ॥
देवाग्रणीः शिवध्यानतत्परः परमः परः सामगेयः प्रियः शूरः पूर्णकीर्तिः सुलोचनः ॥ १०० ॥
अव्यक्तलक्षणो व्यक्तो दशस्याद्रिपकेसरी कलानिधिः कलानाथः कमलानन्दवर्धनः ॥ १०१ ॥
पुण्यः पुण्याधिकः पूर्णः पूर्वः पूरयिता रविः जटिल कल्मषघ्नोऽप्रभजनोऽविभावसुः ॥ १०२ ॥
जयी जितारिः सर्वादिः शमगो भवभञ्जनः । अलङ्करिष्णुरचलो रोचिष्णुर्विक्रमोत्तमः ॥ १०३ ॥
आशुः शब्दपतिः शब्दगोचरो रजनो लघुः । निःशब्दपुरुषो माया स्थूलः सूक्ष्मो ५०० विलक्षणः ॥
आत्मयोनिरयोनिञ्च सप्तजिह्वः सहस्रपात् । सनातनतमः साध्वी पेशलो विजितांबरः ॥ १०५ ॥
शक्तिमान् शस्त्रभृन्नाधो गदाधररथांगभृत् । निरीहो निर्विकल्पश्च चिद्रूपो वीतसाध्वसः । १०६ ॥
सनातनः सहस्राक्षः शतसूर्यनभप्रभः इक्ष्वाकुवंशवर्धनः कठिनो द्रुम एव च ॥ १०७ ॥
सूर्य्यो ग्रहपतिः श्रीमान् समर्थोऽनर्थनाशनः अधर्मशत्रु रोधनः पुरुहूतः पुरस्तुतः ॥ १०८ ॥


रिमर्दन, सर्वप्रिय, सनातनतम, मेघश्यामल, राक्षसार्थक ॥ ८८ ।, दिव्यायुधधर, श्रीमान्, अप्रमेय, जितेन्द्रिय, विप्रवंद्य, पिताके प्रियकर्ता, प्रपितामह ॥ ८९ । उत्तम सात्त्विक सत्य, सत्यसन्ध, त्रिविक्रम, सुवृत्त, सुगम, सूक्ष्म सुघोष, सुहृद, सुहृत् ॥ ९० ॥ दामोदर, अच्युत शार्ङ्गी, वामन मधुराधिपति, देवकीनन्दन, वासुदेव, शूर, कटभमदन ॥ ९१ ॥ सप्ततालप्रभेत्ता, मित्रवंशवर्धन, कालस्वरूपी, कालात्मा, काल, कल्याणद ४०० कलि, ॥ ९२ । संवत्सर, ऋतु, पक्ष, अयन, युग, स्तव्य विविक्त, निर्लेप, सर्वव्यापी, निराकुल ॥ ९३ ॥ अनादिनिधन, सर्वलोकपूज्य, निरामय, रस, रसज्ञ, सारज्ञ, लोकसार, रसात्मक ॥ ९४ ॥ सर्वदुःखातिग, विद्याराशि, परमगोचर, शेष, विशेष, विगतकल्मष, रघुपूङ्गव, ॥ ९५ ॥ वर्णश्रेष्ठ, वर्णभाव्य, वर्ण, वर्णगुणोज्ज्वल कर्मसाक्षी, गुणश्रेष्ठ, देव, सुरवरप्रद । ९६ ॥ देवाधिदेव देवर्षि देवामुरनमस्कृत सर्वदेवमय, चक्री, शार्ङ्गपाणि, रघूत्तम ॥ ९७ । मन बुद्धि अहंकार प्रकृति, पुरुष अव्यय, न्याय न्यायी नयी, श्रीमान्, नय, नभश्चर, ध्रुव, ॥ ९८ । लक्ष्मी-विश्वम्भर, भर्ता, देवेन्द्र, बलिमर्दन बाणारिमर्दन, यज्वा उत्तम मुनिसेवित ॥ ९९ ॥ देवाग्रणी, शिवध्यानतत्पर, दग्म, पर, सामगेय प्रिय, शूर पूर्णकीर्ति, सुलोचन । १०० ॥ अव्यक्तलक्षण, व्यक्त, दशश्याद्रिपकेसरी, कलानिधि कलानाथ कमलानन्दवर्धन । १०१ ॥ पुण्याधिक पूर्ण पूरयिता, रवि, जटिल, कल्मषोंको ध्वंस करनेवाले, अग्नि ॥ १०२ ॥ जयी, जितारि, सर्वादि, शमन भवभञ्जन, अलङ्करिष्णु अचल, रोचिष्णु विक्रमोत्तम ॥ १०३ ॥ आशु शब्दपति, शब्दगोचर, रजन, लघु, निःशब्द, पुरुष, मायो, स्थूल, सूक्ष्म ५०० विलक्षण ,१०४॥ आत्मयोनि, अयोनि, सप्तजिह्व, सहस्रपात् सनातनतम, साध्वी, पेशल, विजिताम्बर । १०५ । शक्तिमान् शस्त्रभृत्, नाथ, गदाधर, रथाङ्गभृत्, निरीह, निर्विकल्प, चिद्रूप, वीतसाध्वस ॥ १०६ ॥ सनातन

सर्गः १ ] गायत्रीकाण्डम् ( पूर्वार्द्धम् ) ३८९


अन्नमयो बृहद्धर्मा धर्मधेनुर्धनेन्दगमः । हिरण्यगर्भाऽपरोविद्वान सुकलाव सुविक्रमः ॥ १०९ ॥
त्रिवृज्जातः श्रीमान् भवानीपितृकृद्वशी । नरो नारायणः श्यामः कपर्दी नीललोहितः ॥ ११०॥
रुद्रः पशुपति स्थाणुर्विश्वामित्रो दिनेश्वरः । मातामहो मातरिश्वा विरिश्चिविश्रवश्रवा ॥ १११॥
अक्षोभ्यः सर्वभूतानां चण्डः मन्थरगक्षकः । बालिखिल्यो महाकल्पः कल्पवृक्षः कलाधरः ॥ ११२॥
निदाघस्तपनो मेघः शुकः पत्रवलापहः । वसुश्रवाः कृकवाकुः प्रसन्नो विश्वभोजनः ॥ ११३॥
रामो नीलोत्पलश्यामो ज्ञानस्कन्दो महाद्युतिः । कवन्ध्यमथनो दिव्यः कम्बुग्रीवः शिवप्रियः ॥ ११४॥
सुखो नीलः मुनिष्पन्नः मूलमः शिशिरात्मकः । अमसृष्टीऽतिथिः शूरः प्रमाथा पापनाशकः ॥ ११५॥
पवित्रपादः पार्वार्णिमणिपूरो नभोगतिः । उत्तार्णो दुर्लभोदुष्टा दुर्धर्षो दुःसहो बलः ६००॥११६॥
अमृतेशोऽमृतवपुर्धर्मी धर्मः कृपाकरः । भगो विश्वस्त्वानादित्ये योगाचार्यो दिवसपतिः॥११७॥
उदारकीर्तिरुद्योगी वाङ्मयः सदनन्वयः । नक्षत्रमत्री नाकेशः स्वाधिष्ठानः षडाश्रयः ॥११८॥
चतुर्वर्गफलं वर्णेशस्त्रितयफलं निधिः । निधानगर्भो निर्व्याजो निरीशो व्यक्त्तवर्द्धनः ॥११९॥
श्रावलम्बः शिवारम्भः शान्तो भद्रः समंत्रमः । भूताराः भृकुटनिर्भीषणो भूतवाहनः ॥१२०॥
अकायो भक्तकायस्थः कलन्नानी महापटुः । परार्द्धवृत्तिरखलो विविक्तः श्रुतिसागरः ॥१२१॥
स्वभावभद्रो मध्यस्थः समाशय्यननाशनः । वेद्यो वैद्यो वियद्धोता सर्वावगुणनाशकः ।१२२॥
सुरेन्द्रः कारणं कर्मकरः कर्मी ह्यरीक्षजः । धैर्याज्यश्रुर्यो धात्रात्मा मकल्पः क्षत्रेशपतिः ॥१२३॥
परमार्थगुहर्तृष्टिः सुविश्राभ्रितवरबलः । विष्णुर्जिष्णुर्विधुर्यज्ञो यज्ञेशो यज्ञपालकः ॥१२४॥
प्रभुविष्णुर्यज्ञिष्ठश्च लोकान्मा लोकपालकः । केशवः केशिहा काव्यः कविः कारणकारणम् । १२५॥
कालकर्ता कालशयो वासुदेवः पुरूहुतः । आदिकर्ता वराहश्च वामनो मधुसूदनः ॥ १२६॥
नारायणो नरो हंसो विष्पक्येनो जनार्दनः । विश्वकर्ता महायज्ञा ज्योतिष्मान्पुरुषोत्तमः ७००॥१२७


सप्तमाक्ष, शतमूर्ति, धनप्रद, दृष्टादृष्टोपशयनात, कठिन द्वय ॥ १०७ ॥ सूर्य, हंसपति श्रीमान् अभयं, अनर्थ-
नाशन अधर्मशत्रु, रहोरत्न, गुह्यरत्न गच्छत। १०८ । ब्रह्मधर्म, बृहद्धर्म, धर्मधेनु, धनेन्द्रगम, हिरण्यगर्भ,
अपरोविद्वान, सुकलाव, सुविक्रम ॥ १०९ । त्रिपुज्जातः, श्रीमान्, भवानीपितृकृत, वशी, नर, नारायण, श्याम,
कपर्दी, नीललोहित, ॥ ११० । रुद्र, पशुपति, स्थाणु, विश्वामित्र, दिनेश्वर मातामह, मातरिश्वा, विरिश्चि,
विश्रवश्रवा ॥ १११ । अक्षोभ्य, चण्ड, मन्थरगक्षक, बालखिल्य, महाकल्प, कल्पवृक्ष, कलाधर ॥ ११२ ॥
निदाघ, तपन, मेघ, शुक, पत्रवलापहारी, वसुश्रवा, कृकवाकु, प्रसन्न, विश्वभोजन । ११३ ॥ राम, नीलो-
त्पलश्याम, ज्ञानस्कन्द, महाद्युति, कवन्धमथन, दिव्य, कम्बुग्रीव, शिवप्रिय, ॥ ११४ ॥ मुखा, नील, मुनिष्पन्न,
मूलभ, शिशिरात्मक, अमसृष्ट, अतिथि, शूर प्रमाथी पापनाशकारी । ११५ ॥ पवित्रपाद पार्वारि, मणि-
पूर, नभोगति, उत्तारण, दुर्लभो, दुष्टह, दुःसह, बल ६००... ११६ ॥ अमृतेश, अमृतवपु, धर्मी, कृपाकर, भग,
विश्वस्वान्, आदित्य, योगाचार्य, दिवसपति । ११७ ॥ उदारकीर्ति, उद्योगी, वाङ्मय, सदनन्वय, नक्षत्र-
माला, नाकेश, स्वाधिष्ठान, षडाश्रय ॥ ११८ ॥ चतुर्वर्गफल, वर्णेशत्रितयफल, निधि, निधानगर्भ निर्व्याज,
निरीश व्यक्तवर्द्धन । ११९ ॥ श्रीलम्ब, शिवारम्भ, शान्त, भद्र, समंत्रम, भूतारी भूरि, भूतवाहन । १२०॥
अकाय, भक्तकायस्थ, कलन्तानी, महापटु, परार्द्धवृत्ति, अखल, विविक्त, श्रुतिसागर । १२१ स्वभावभद्र,
मध्यस्थ, समाशय्यनाशन, वेद्य वैद्य, वियद्धोता, सर्वावगुणनाशक ॥ १२२ । सुरेन्द्र, कारण, कर्मकर,
कर्मी, अरीक्षज, धैर्य, धैयार्जु धात्रात्म संकल्प, क्षत्रेशपति । १२३ ॥ परमार्थगुह, दृष्टि, सुविश्राभ्रितवरबल,
विष्णु जिष्णु विधु, यज्ञ यज्ञेश यज्ञपालक ॥ १२४ प्रभु विष्णु प्रसिद्ध लोकान्मा, लोकपालक, केशव,
केशिहा काव्य, कवि, कारणकारण । १२५॥ कालकर्ता कालशय, वासुदेव, पुरुहूत, आदिकर्ता, वराह,
वामन, मधुसूदन ॥ १२६ ॥ नारायण, नर, हंस, विष्यक्सेन जनार्दन विश्वकर्ता, महायज्ञ, ज्योतिष्मान्,

३९० आनन्दरामायणं [ सर्गः १

वैकुण्ठः पुण्डरीकाक्षः कृष्णः सूर्यः सुरार्चितः । नारसिंहो महाभीमो वज्रदंष्ट्रो नखायुधः ॥१२८॥ आदिदेवो जगत्कर्ता योगीशो गरुड़ध्वजः । गोविन्दो गोपतिर्गोप्ता भूपतिर्भुवनेश्वरः ॥१२९॥ पद्मनाभो हृषीकेशो धाता दामोदरः प्रभुः । त्रिविक्रमस्त्रिलोकेशो महेशः प्रीतिवर्धनः ॥१३०॥ संन्यासी शास्त्रशास्त्रज्ञो मन्दरो गिरिशो नतः । वासनो दुष्टदमनो गोविन्दो गोपवल्लभः ॥१३१॥ भक्तप्रियोऽच्युतः सत्यः सत्यकीर्तिधृतिःस्मृतिः। कारुण्यः करणो व्यासः पापहा शुचिवर्द्धनः ॥१३२॥ बदरीनिलयः शान्तस्तपस्वी वैद्युतः प्रभुः । भूतवासो महावासा श्रीनिवासः श्रियः पतिः ॥१३३॥ तपोवासो मुदावासः सत्यवासः सनातनः । पुरुषः पुष्करः पुण्यः पुष्कराक्षो महेश्वरः ॥१३४॥ पूर्णमूर्त्तिः पुगणज्ञः पुण्यदः प्रीतिवर्धनः पूर्णरूपः कालचक्रप्रवर्तनसमाहितः ॥१३५॥ नारायणः परं ज्योतिः परमात्मा सदाशिवः । शङ्खी चक्री गदी शार्ङ्गी लाङ्गली मुसली हली ॥१३६॥ किरीटी कुण्डली हारी मेखली कवची ध्वजी । योद्धा जेता महावीर्यः शत्रुघ्नः शत्रुतापनः ॥१३७॥ शास्ता शास्त्रकरः शास्त्रं शङ्करः शङ्करस्मृतः । सख्या सात्त्विकः स्वामी सामवेदप्रियः समः ८००॥ पवनः सहितः शक्तिः सम्पूर्णाङ्गः समृद्धिमान् । स्वर्गदः कामदः श्रीदः कीर्तिदः कीर्तिदायकः ॥१३९॥ मोक्षदः पुण्डरीकाक्षः क्षीराब्धिकृतकेतनः । सर्वात्मा सर्वलोकेशः प्रेरकः पापनाशनः ॥१४०॥ वैकुण्ठः पुण्डरीकाक्षः सर्वदेवनमस्कृतः । सर्वव्यापी जगन्नाथः सर्वलोकमहेश्वरः ॥१४१॥ सर्गस्थित्यन्तकृद्देवः सर्वलोकसुखावहः । अक्षयः शाश्वतोऽनन्तः क्षयवृद्धिविवर्जितः ॥१४२॥ निर्लेपो निर्गुणः सूक्ष्मो निर्विकारो निरञ्जनः । सर्वोपाधिविनिर्मुक्तः सत्तामात्रव्यवस्थितः ॥१४३॥ अविकारी विभुर्नित्यः परमात्मा सनातनः । अचलो निश्चलो व्यापी नित्यतृप्तो निराश्रयः ॥१४४॥ श्यामो युवा लोहिताक्षो दीप्त्या शोभितभाषणः । आजानुबाहुः सुमुखः सिंहस्कन्धो महाभुजः ॥१४५॥ सत्त्ववान् गुणसंपन्नो दीप्यमानः स्वतेजसा । कालात्मा भगवान् कालः कालचक्रप्रवर्तकः ॥१४६॥

पुरुषोत्तम ७०० । १२० । वैकुण्ठ, पुण्डरीकाक्ष, कृष्ण, सूर्य, सुरार्चित, नारसिंह, महाभीम, वज्रदंष्ट्र, नखायुध ॥ १२८ ॥ आदिदेव, जगत्कर्ता, योगीश, गरुड़ध्वज, गोविन्द, गोपति, गोप्ता, भूपति, भुवनेश्वर ॥ १२९ ॥ पद्मनाभ, हृषीकेश, धाता, दामोदर, प्रभु, त्रिविक्रम, त्रिलोकेश, महेश, प्रीतिवर्धन ॥ १३० ॥ संन्यासी, शास्त्रशास्त्रज्ञ, मन्दर, गिरिश, नत, वासन, दुष्टदमन, गोविन्द, गोपवल्लभ, ॥ १३१ ॥ भक्तप्रिय, अच्युत, सत्य, सत्यकीर्ति, धृति, स्मृति, कारुण्य, करण, व्यास, पापहा, शुचिवर्द्धन ॥ १३२ ॥ बदरीनिलय, शान्त, तपस्वी, वैद्युत, प्रभु, भूतवास, महावास, श्रीनिवास, श्रीपति । १३३। तपोवास, मुदावास, सत्यवास, सनातन, पुष्कर, पुण्य, पुष्कराक्ष, महेश्वर ॥ १३४। पूर्णमूर्त्ति, पुराणज्ञ, पुण्यद, प्रीतिवर्द्धन, पूर्णरूप, कालचक्रप्रवर्त्तन, समाहित । १३५। नारायण, परंज्योति, परमात्मा, सदाशिव, शंखी, चक्री, गदी, शार्ङ्गी, लांगली, मुसली, हली ॥ १३६ ॥ किरीटी, कुण्डली, हारी, मेखली, कवची, ध्वजी, योद्धा, जेता, महावीर्य, शत्रुघ्न, शत्रुतापन । १३७॥ शास्ता, शास्त्रकर, शास्त्र, शङ्कर, शङ्करस्मृत, साख्या, सात्त्विक, स्वामी, सामवेदप्रिय, सम = ८०० ॥ १३८ ॥ पवन, सहित, शक्ति, सम्पूर्णाङ्ग, समृद्धिमान्, स्वर्गद, कामद, श्रीद, कीर्तिद, कीर्तिदायक । १३९ ॥ मोक्षद, पुण्डरीकाक्ष, क्षीराब्धिकृतकेतन, सर्वात्मा, सर्वलोकेश, प्रेरक, पापनाशन । १४०। वैकुण्ठ, पुण्डरीकाक्ष, सर्वदेवनमस्कृत, सर्वव्यापी, जगन्नाथ, सर्वलोकमहेश्वर ॥ १४१ ॥ सर्गस्थित्यन्तकृद् देव, सर्वलोकसुखावह, अक्षय, शाश्वत, अनन्त, क्षयवृद्धिविवर्जित ॥ १४२ ॥ निर्लेप, निर्गुण, सूक्ष्म, निर्विकार, निरञ्जन, सर्वोपाधिविनिर्मुक्त, सत्तामात्रव्यवस्थित । १४३॥ अविकारी, विभु, नित्य, परमात्मा, सनातन, अचल, निश्चल, व्यापी, नित्यतृप्त, निराश्रय ॥ १४४ ॥ श्याम, युवा, लोहिताक्ष, शोभितभाषण, आजानुबाहु, सुमुख, सिंहस्कन्ध, महाभुज ॥ १४५ ॥ सत्त्ववान्, गुणसम्पन्न, अपने तेजसे दीप्यमान, कालात्मा, भगवान्, काल,

सर्गः १ ] राज्यकाण्डम् ( पूर्वार्द्धम् ) ३९१

सर्गः १ ] राज्यकाण्डम् ( पूर्वार्द्धम् ) ३९१


नारायणः परं ज्योतिः परमात्मा सनातनः । विश्वकृद्विश्वभोक्ता च विश्वगोप्ता च शाश्वतः ॥ ५७ । विश्वेश्वरो विश्वमूर्तिर्विश्वात्मा विश्वभावनः । सर्वभूतमहृच्छान्तः सर्वभूतानुकम्पनः ॥ १५८॥ सर्वेश्वरः सर्वशर्वः सर्वदाऽभिनवन्मलः । सर्वगः सर्वभूतशः सर्वभूताशयस्थितः । १४९॥ अभ्यन्तरस्थस्तमसश्छेत्ता नारायणः परः । अनादिनिधनः स्रष्टा प्रजापतिपतिर्हरिः ॥ १६०॥ नरसिंहो हृषीकेशः सर्वात्मा सर्वदृग्वशी । जरास्मन्मध्यधैर्यं च सुनेता सनातनः ९०० ॥ १६१॥ कर्ता धाता विधाता च सर्वेषां पतिरीश्वरः । महत्समूह्यो विश्वात्मा विष्णुविश्वहृदव्ययः । १६२॥ पुराणपुरुषः श्रेष्ठः सहस्राक्षः सहस्रपात् । तत्त्वं नारायणो विष्णुर्वासुदेवः सनातनः । १६३॥ परमात्मा परं ब्रह्म सच्चिदानन्दविग्रहः । परं ज्योतिः परं धाम पराकाशः परात्परः ॥ १६४॥ अच्युतः पुरुषः कृष्णः शाश्वतः शिव ईश्वरः । नित्यः सर्वगतः स्थाणु रुद्रः साक्षी प्रजापतिः १६५॥ हिरण्यगर्भः सविता लोककृल्लोकपूजितः ॐकारवाच्यो भगवान् श्रीभूनीलापतिः प्रभुः । १५६॥ सर्वलोकेश्वरः श्रीमान् सर्वज्ञः सर्वतोमुखः । स्वामी सुशीलः सुलभः सर्वगः सर्वशक्तिमान् ॥ १६७॥ नित्यः संप्रसन्नकामश्च नैसर्गिक्सुहृत्सुखी । कृपापीयूषजलधिः शरण्यः सर्वशक्तिमान् ॥ १६८ । श्रीमान्नारायणः स्वामी जगतां प्रभुुरीश्वरः । मत्स्यः कूर्मो वराहश्च नारसिंहोऽथ वामनः ॥ १६९ । रामो रामश्च कृष्णश्च बौद्धः कल्की परात्परः । अयोध्मेशो नृपश्रेष्ठः कुशबालः परन्तपः ॥ १७०॥ लवबालः कञ्जनेत्रः कञ्जाङ्घिः पङ्कजाननः । सीताकान्तः सौम्यरूपः शिशुजीवनतत्परः ॥ १७१॥ सेतुकृच्चित्रकूटस्थः शबरीसंस्तुतः प्रभुः । योगिध्येयः शिवध्येयः शान्ता रावणदर्पहा ॥ १७२॥ श्रीदः शरण्यो भूतानां संश्रिताभीष्टदायकः । अनन्तः श्रीपती रामो गुणभृन्निर्गुणो महान् १००० ॥ एवमादीनि नामानि ह्यामख्यान्यपराणि च । एकैकं नाम रामस्य सर्वपापप्रणाशनम् ॥ १७४॥ सहस्रनामफलदं सर्वैश्वर्यप्रदायकम् । सर्वसिद्धिप्रदं पुण्यं भुक्तिमुक्तिफलप्रदम् ॥ १७५॥


कालत्रयवर्त्तक । १४६ । नारायण, परंज्योति परमात्मा सनातन, विश्वकृत, विश्वभोक्ता, विश्वगोप्ता, शाश्वत ॥ १४७ ॥ विश्वेश्वर विश्वमूर्ति विश्वात्मा, विश्वभावन सर्वभूतमहृत्, शान्त सर्वभूतानुकम्पन ॥१४८॥ सर्वेश्वर सर्वशर्व, सर्वदा आभिनवयन्मलः, सर्वग सर्वभूतश सर्वभूताशयस्थित । १४९ ॥ अभ्यन्तरस्थ, अन्धकारनाशक, नारायण, पर, अनादिनिधन, स्रष्टा प्रजापति हरि ॥ १५० । नरसिंह, हृषीकेश, सर्वात्मा, सर्वदृक, वशी, स्थावर तथा जंगम विश्वके प्रभु, नेता, सनातन ९०० ॥ १५१ ॥ कर्ता, धाता, विधाता, सबके पति ईश्वर, महत्समूह्य, विश्वात्मा विष्णु, विश्वहृत्, अव्यय ॥ १५२ ॥ पुराणपुरुष श्रेष्ठ, सहस्राक्ष, सहस्रपात्, तत्त्व, विष्णु, नारायण वासुदेव, सनातन । १५३ ॥ परमात्मा परब्रह्म, सच्चिदानन्दविग्रह, परंज्योति, पर धाम, पराकाश, परात्पर । १५४ । अच्युत पुरुष शाश्वत, शिव, ईश्वर, नित्य सर्वगत, स्थाणु, रुद्र साक्षी, प्रजापति । १५५ ॥ हिरण्यगर्भ, सविता लोककृत, विश्व ॐकारवाच्य, भगवान्, श्रीभूनीलापति, प्रभु ॥ १५६ । सर्वलोकेश्वर श्रीमान् सर्वज्ञ, सर्वतोमुख, स्वामी, सुशील सर्वग, सर्व-शक्तिमान्, प्रभु ॥ १५७ ॥ सन्तुष्टकाम नैसर्गिक्सुहृत् सुखी, कृपापीयूषजलधि सबके शरण ॥ १५८ ॥ श्रीमान् नारायण, स्वामी, सब भुवनोंके प्रभु, ईश्वर मत्स्य कूर्म वराह, नृसिंह, वामन ॥ १५९ ॥ राम, कृष्ण, बौद्ध, कल्की, परात्पर अयोध्या, नृपश्रेष्ठ कुशके पिता, परन्तप ॥ १६० ॥ लवके पिता, सेतुकृत्, चित्रकूटस्थ कमलनेयन, कमलचरण, कमलमुख, सीताकान्त सौम्यरूप, शिशुजीवनतत्पर ॥ १६१ ॥ शबरीसंस्तुत, प्रभु योगिध्येय, शिवध्येय, शान्ति, रावणदर्पहा ॥ १६२ ॥ श्रीज्ञ शरण्य, आश्रितोंके अभीष्टदायक अनन्त श्रीपति राम गुणभृत् निर्गुण महान् १००० ॥ १६३ । यहां रामसहस्रनाम पूर्ण हुआ। इसी तरह और भी भगवान्के बहुतसे नाम हैं, जिनकी गणना हो नहीं की जा सकती । रामका एक-एक नाम सब प्रकारके पापोंको हरने तथा सहस्रनामका फल देनेवाला है । यह रामनाम सब प्रकारकी समृद्धियों एवं

३९२आनन्दरामायणे[ सर्गः २

मन्त्रात्मकमिदं सर्वं व्याख्यातं सर्वमंगलम् । उक्तानि तव पुत्रेण विघ्नराजेन धीमता ॥१६६॥ सनत्कुमाराय पुरा तान्युक्तानि मया तव । यः पठेच्छृणुयाद्वापि स तु ब्रह्मपदं लभेत् ॥१६७॥ तावदेव बलं तेषां महापातकदन्तिनाम् । यावन्न श्रूयते रामनामरूपंचाननध्वनिः ॥१६८॥ ब्रह्मघ्नश्च सुरापश्च स्तेयी च गुरुतल्पगः । शरणागतघाती च मित्रविश्वासघातकः ॥१६९॥ मातृहा पितृहा चैव भ्रूणहा वीरहा तथा । कोटिकोटिमहत्पापि क्षुद्रपापानि यान्यपि १७०॥ संवत्सरं क्रमाज्जप्त्वा प्रत्यहं रामसन्निधौ निष्कण्टकं सुखं भुक्त्वा ततो मोक्षमवाप्नुयात् ॥१७१॥

सूत उवाच

एवं शौनक पार्वत्यै रामनामसहस्रकम् यथा शिवेन कथितं मया तेऽद्य निवेदितम् ॥१७२॥

श्रीरामदास उवाच

यथा शिष्य त्वया पृष्टं रामनामसहस्रकम् तन्मयोक्तं सविस्तरं मया तेऽद्य निवेदितम् । १७३॥ अनेन गर्म सदसि नारदः स्तुतवान्मुनिः । रामनामसहस्रेण भुक्तिमुक्तिप्रदेन च ॥१७४। श्रीरामनाम्नां परमं सहस्रकं पापापहं सौख्यविवृद्धिकारकम् भवापहं भक्तजनैकपालकं स्त्रीपुत्रपौत्रप्रदमृद्धिदायकम् ॥१७५।

इति श्रीशतकोटिरामचरितान्तर्गते श्रीमदानन्दरामायणे वाल्मीकीये राज्यकाण्डे पूर्वार्द्धे रामसहस्रनामकथनं नाम प्रथमः सर्गः ॥ १ ॥


द्वितीयः सर्गः

( कल्पवृक्ष और पारिजातके पृथ्वीपर आनेका कारण )

विष्णुदास उवाच

गुरो त्वया रामनामसहस्रं राघवस्य च ध्यानं कल्पतरोर्मूले कथितं स्वर्णपीठके ॥ १ ॥

सिद्धिर्योंका करनेवाला और मुक्ति-मुक्तिका दाता है। हे पार्वति ! मैंने अभी जो सहस्रनाम तुम्हें बतलाया है, यह मन्त्रात्मक और सर्वमंगलकारक है। इसे तुम्हारे पुत्र गणेशजीने स्वयं सनत्कुमारको बतलाया था उसे मैंने आज तुमसे कहा है। जो कोई इस सहस्रनामको पढ़ता और सुनता है, उसे ब्रह्मपद प्राप्त होता है॥ १६४-१६७ ॥ महापातकरूपी मत्तवाले हाथियोंका बल तभी तक रहता है, जब तक रामनामरूपी पंचानन (सिंह) की गर्जना नहीं सुनायी देती । १६८ ॥ जो मनुष्य ब्रह्महत्यारा, मद्यप गुरुकी शय्यापर शयन करनेवाला तथा चोर हो। जो शरणागतको मारनेवाला, मित्रके साथ विश्वासघात करनेवाला, माता पिता, भ्रूण (गर्भस्थ संतान) तथा वीर मनुष्यकी हत्या करनेवाला हो तथा जिसने संसारमें करोड़ों पाप किये हों, वह भी यदि श्रीरामके पास बैठकर एक संवत्सर पर्यन्त प्रतिदिन इस स्तोत्रका पाठ करे तो संसारम निष्कंटक सुख भोगकर अन्तमे मोक्ष पाता है । १६९ ॥ १७० सूतजी बोले हे शौनक ! शिवजीने पार्वतीको जिस प्रकार रामका सहस्रनाम सुनाया था वही मैंने आज तुम्हे बताया है । १७१ । श्रीरामदासने कहा - हे शिष्य ! जैसे तुमने हमसे रामका सहस्रनाम पूछा वैसे मैंने तुम्हे बतलाया। उसी सहस्रनामसे नारदने सभामे रामजीकी स्तुति की थी। क्योंकि यह स्तोत्र भुक्ति-मुक्ति सब कुछ देनेवाला है। १७२-१७४। यह रामका सहस्रनाम पापोंका नाशक, सौख्यवर्द्धक, सांसारिक पापोंका नाशक भक्तजनोंका पालक और स्त्री-पुत्र-पौत्र तथा सम्पत्तिका देनेवाला है। १७५॥ इति श्रीशतकोटिरामचरितान्तर्गते श्रीमदानन्दरामायणे पं० रामतेज-पाण्डेयविरचित 'ज्योत्स्ना' भाषाटीकासहिते राज्यकाण्डे पूर्वार्द्धे प्रथमः सर्ग ॥ १ ॥

श्रीविष्णुदासने कहा- हे गुरो ! आपने रामका सहस्रनाम बताते समय कहा था कि कल्पवृक्षके नीचे