भक्तिरसामृतसिन्धु (श्रील रूप गोस्वामी - भक्ति रस शास्त्र सटीक)
Bhakti-Rasamrita-Sindhu with Hindi Commentary
श्रील रूप गोस्वामी / भक्तिवेदान्त व्याख्या द्वारा
श्रीराधाकृष्ण का प्रेमानन्दमय विहार (पृ. ३११)
भूमिका प्रस्तुत ग्रन्थ में श्रील रूपगोस्वामी प्रभुपाद की संस्कृत रचना 'भक्तिरसामृतसिन्धु' का सार संकलन है। श्रील रूप गोस्वामी उन छः गोस्वामियों में प्रधान हैं, जो भगवान् श्रीचैतन्य महाप्रभु के सीधे शिष्य हैं। जब वे श्रीचैतन्यदेव से पहली बार मिले, उस समय श्रील रूप गोस्वामी प्रभु- पाद बंगाल की मुस्लिम सरकार में मंत्री थे। वे और उनके भाई सनातन नवाब हुसैन शाह के साकरमलिक और दबीरखास नाम से प्रसिद्ध वरिष्ठ मंत्री थे। उस समय, आज से पाँच सौ वर्ष पहले, हिन्दू समाज बड़ा रूढ़ि- वादी था। यदि कोई ब्राह्मण जाति का व्यक्ति मुस्लिम शासक में सेवा कार्य स्वीकार कर लेता तो उसे ब्राह्मण समाज से निष्कासित कर दिया जाता। दबीरखास और साकरमलिक की ऐसी ही स्थिति थी। यद्यपि उनका जन्म उच्च सारस्वत ब्राह्मण जाति में हुआ था; पर वहाँ की सरकार में मंत्रीपद ग्रहण कर लेने से उन्हें समाज ने निष्कासित कर दिया था। भगवान् श्रीचैतन्य महाप्रभु ने कृपा करके दोनों महापुरुषों को अपना शिष्य बना लिया और उस गोस्वामी पद पर आरूढ़ कर दिया जो ब्राह्मण संस्कृति की सर्वोच्च अवस्था है। इसी प्रकार भगवान् चैतन्य ने जन्म से मुस्लिम होने पर भी हरिदास ठाकुर को अपना शिष्य स्वीकार किया और बाद में हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे महामन्त्र के कीर्तन का आचार्यपद प्रदान किया। भगवान् चैतन्य देव का सिद्धान्त सार्वभौम है। जो कोई श्रीकृष्ण के तत्त्व को जानता हो और उनकी सेवा के परायण हो, उसे ब्राह्मण वंश में जन्मे व्यक्ति से श्रेष्ठ समझा जाता है। सम्पूर्ण वैदिक शास्त्रों, विशेषतः भगवद्गीता, श्रीमद्भागवत का मूल सिद्धान्त यही है। भगवान् चैतन्य- महाप्रभु के आन्दोलन के इसी सिद्धान्त को 'भक्तिरसामृतसिन्धु' में दिखाया गया है। इसके द्वारा कोई भी व्यक्ति गोस्वामी पद पर आरूढ़ हो सकता है। भगवान् चैतन्य महाप्रभु की दबीरखास और साकरमलिक नामक इन दोनों भाइयों से भेंट मालदा जिले के रामकेलि ग्राम में हुई थी। उस
२ | भक्तिरसामृतसिन्धु भेंट के बाद दोनों ने सरकारी सेवा को त्याग कर भगवान् चैतन्यदेव के शरणागत हो जाने का निश्चय किया। यही दबीरखास परवर्ती काल में रूपगोस्वामी कहलाये। उन्होंने अपने पद से त्यागपत्र दे दिया और सेवाकाल में जितना धन संचित किया था उसे लेकर चल पड़े। चैतन्य- चरितामृत में वर्णन है कि स्वर्ण मुद्राओं के रूप में उनका संचित धन करोड़ों रुपयों तक का था और उससे एक बड़ी नाव भर गई। उन्होंने अपने इस धन का बड़े ही आदर्श रूप से विभाजन किया, जिसका भक्तों को विशेष रूप से और मानवता को सामान्य रूप से पालन करना चाहिये। संचित सम्पत्ति का आधा भाग कृष्णभावनाभावित पुरुषों अर्थात् ब्राह्मणों और वैष्णवों को दिया गया। पच्चीस प्रतिशत बन्धुबान्धवों में वितरित हुआ और शेष पच्चीस प्रतिशत आपत्काल और निजी कठिनाइयों के लिये रख छोड़ा। बाद में जब साकरमलिक ने भी त्यागपत्र देना चाहा तो नवाब बहुत उद्विग्न हुआ और उन्हें जेल में डाल दिया। साकरमलिक ने जो परवर्तीकाल में श्रील सनातन गोस्वामी नाम से ख्यात हुए अपने भाई के निजी धन का लाभ उठाया जो गाँव के एक धनी के यहाँ जमा था और उसके द्वारा वे शहनशाह के कारागार से भाग निकले। इस प्रकार वे दोनों भगवान् श्रीचैतन्य महाप्रभु के साथ सम्मिलित हो गये। श्रील रूप गोस्वामी सर्वप्रथम भगवान् चैतन्य से प्रयागराज में मिले और उस पावन नगरी के दशाश्वमेध घाट पर भगवान् ने उन्हें निरन्तर दस दिन तक सदुपदेश दिया। भगवान् चैतन्यदेव ने उन्हें विशेष रूप से कृष्णभावना-विज्ञान की शिक्षा दी। भगवान् चैतन्यदेव द्वारा श्रील रूप गोस्वामी प्रभुपाद को दी गई इस शिक्षा का वर्णन हमारे 'श्रीचैतन्यमहाप्रभु का शिक्षामृत' नामक ग्रन्थ में है। बाद में, श्रील रूपगोस्वामी ने भगवान् चैतन्यदेव की शिक्षा का विविध वैदिक शास्त्रों के ज्ञान और प्रमाण के आधार पर विस्तृत रूप से प्रतिपादन किया। छः स्वामियों के चरणों में श्रील श्रीनिवासाचार्य की प्रार्थना में उल्लेख है कि वे सब महापंडित थे। उन्हें केवल संस्कृत का ही ज्ञान नहीं था, वरन् वे फारसी और अरबी आदि विदेशी भाषाओं में भी पारंगत थे। श्रीचैतन्य महाप्रभु के मत को प्रामाणिक वैदिक ज्ञान के आधार पर स्थापित करने के लिये उन्होंने सम्पूर्ण वैदिक शास्त्रों का गम्भीर विचारपूर्वक अध्ययन किया था। वर्तमान कृष्णभावनामृत आन्दो- लन भी श्रील रूप गोस्वामी प्रभुपाद की प्रामाणिकता पर आधारित है। अतएव हमें प्रायः रूपानुग अर्थात् श्रील रूपगोस्वामी प्रभुपाद के चरणचिह्नों
का अनुगामी कहा जाता है। हमारे मार्गदर्शन के लिये ही श्रील रूप- गोस्वामी ने इस 'भक्तिरसामृतसिन्धु' नामक ग्रन्थ की रचना की। जो व्यक्ति कृष्णभावनामृत आन्दोलन में संलग्न हैं वे इस महान् ग्रन्थ का लाभ उठायें और बड़ी दृढ़ता के साथ कृष्णभावना में स्थिर हो जायें। भक्ति का अर्थ है सेवा करना। किसी भी सेवा में कुछ न कुछ आकर्षण रहता है, जिससे सेवक उसमें निरन्तर लगा रहता है। इस जगत् में हम निरन्तर किसी न किसी प्रकार की सेवा में लगे रहते हैं और इस सेवा का उद्दीपन है वह आनन्द, जो हमें उससे मिलता है। पत्नी और सन्तान के स्नेहवश गृहस्थ दिन-रात अथक परिश्रम करता है। परो- पकारी भी इसी प्रकार प्रेमवश बृहद परिवार के लिये कार्य करता है और जो राष्ट्रवादी है वह अपने देश और देशवासियों के लिये प्राणप्रण से प्रयास करता है। वह शक्ति जो परोपकारी, गृहस्थ और राष्ट्रवादी को अपने-अपने कार्य में लगाये रखती है, उसका नाम रस है जो अति मधुर है। भक्तिरस लौकिक कर्मियों के साधारण रस से भिन्न है। लौकिक कर्मी दिन-रात एक ऐसे रस को भोगने के लिये परिश्रम करते हैं जो वास्तव में इन्द्रियतृप्ति है। ऐसे रस का स्वाद अधिक देर नहीं रहता और इसीलिये लौकिक कर्मियों में अपने भोगने की अवस्था को निरन्तर बदलते रहने की प्रवृत्ति रहती है। व्यापारी पूरे सप्ताह कार्य करने में सन्तुष्ट नहीं होता। अतएव सप्ताहांत होने पर वह कुछ परिवर्तन चाहता है और इसलिये ऐसे स्थान पर चला जाता है जहाँ कम से कम एक दिन के लिये तो वह अपनी सारी व्यापार-क्रियाओं को भूल सके। सप्ताह का अन्त विस्मृति में खोकर वह फिर अपनी स्थिति को बदलकर व्यापार-क्रिया में संलग्न हो जाता है। किसी परिस्थिति अथवा स्थिति-विशेष को स्वीकार कर लेना और फिर कुछ समय बाद त्याग देना—लौकिक कार्यकलाप का यही स्वरूप है। इसी को भोग-त्याग कहते हैं। जीवात्मा निरन्तर न तो इन्द्रियतृप्ति में रह सकता है और न त्याग में । निरन्तर परिवर्तन चलता रहता है; हमें इनमें से किसी भी अवस्था में सुख नहीं मिलता क्योंकि हमारा शाश्वत् स्वरूप इन दोनों से भिन्न है। इन्द्रियतृप्ति अधिक समय तक नहीं रहती; अतएव उसे चपल सुख कहते हैं। उदाहरण के लिये—एक साधारण मनुष्य दिन-रात अथक परिश्रम करके अपने परिवार वालों को सुख देने में सफल होता है और इससे उसे एक प्रकार के रस की अनुभूति है। परन्तु जैसे ही उसका जीवन समाप्त हो जाता है, शरीर के साथ ही प्राकृत सुख में की हुई सब उन्नति भी समाप्त हो
[ ४ ] भक्तिरसामृतसिन्धु जाती है। अतएव नास्तिकों के लिये मृत्यु को भगवान् का रूप माना जाता है। भक्त भक्तियोग के द्वारा भगवान् के सान्निध्य का अनुभव करते हैं और नास्तिक उनका साक्षात्कार मृत्यु के रूप में करते हैं। मृत्यु होने पर सब कुछ समाप्त हो जाता है। एक नई अवस्था में जो पिछली अवस्था से श्रेष्ठ अथवा अधम हो सकती है, जीवन का एक नया अध्याय शुरू करना होता है। राजनीतिक, सामाजिक, राष्ट्रीय अथवा अन्तर्राष्ट्रीय —किसी भी क्रियाक्षेत्र में सारे कर्मों का फल जीवन के साथ ही समाप्त हो जायगा। यह बिलकुल निश्चित है। परन्तु भगवान् की दिव्य प्रेममयी सेवा में अनुभव में आने वाला भक्तिरस जीवन के अन्त के साथ समाप्त नहीं होता। वह निरन्तर बना रहता है और इसीलिये उसे अमृत कहते हैं। सम्पूर्ण वैदिक शास्त्रों में इसका प्रमाण है। भगवद्गीता कहती है—'भक्तिरस में थोड़ी भी उन्नति भक्त को परम भय से अर्थात् मानव-जीवन के अवसर को खो देने से होने वाले भय से बचा सकती है। सामाजिक जीवन, पारिवारिक जीवन अथवा परोपकार, मानवतावाद, राष्ट्रवाद, समाजवाद, साम्यवाद आदि बृहद् पारिवारिक जीवनों के भावों से होने वाले रस इस बात की गारण्टी नहीं दे सकते कि हमारा अगला जन्म भी मनुष्य के रूप में ही होगा। इस जीवन में अपनी वास्तविक क्रियाओं के द्वारा हम अपने अगले जीवन की रचना कर रहे हैं। जीवात्मा अपनी देह में जो काम करता है उसी के फलस्वरूप उसे अगले जन्म में देह की प्राप्ति होती है। इन सब क्रियाओं का लेखा-जोखा दैव के हाथ में है। भगवद्गीता में इस दैव को सबका प्रधान कारण बतलाया गया है। श्रीमद्भागवत में भी उल्लेख है कि पुनर्जन्म में नई देह की प्राप्ति 'दैवनेत्रेण' अर्थात् भगवान् के निर्देशानुसार होती है। साधारण अर्थ में दैव भाग्य को कहते हैं। दैव का विधान हमें चौरासी लाख योनियों में से उपयुक्त देह देता है। इसका चयन हमारी इच्छा के अनुसार नहीं, हमारे भाग्य के अनुसार होता है। यदि हमारी वर्तमान देह कृष्णभावनाभावित क्रियाओं में लगी हुई है तो इस बात की गारण्टी है कि अगले जन्म में हमें कम से कम मनुष्य की योनि तो अवश्य ही मिलेगी। यदि कोई कृष्णभावनाभावित क्रियाओं के परायण है तो यह निश्चित है कि भक्तियोग को पूर्ण न कर पाने की अवस्था में उसे मानव- समाज में उच्च वर्गों में जन्म की प्राप्ति होगी जिससे वह स्वतः कृष्ण- भावना में आगे उन्नति कर सके । अतएव कृष्णभावनाभावित सभी प्रामाणिक क्रियाएँ अमृत हैं। 'भक्तिरसामृतसिन्धु' का यही विषय है।
भूमिका [ ५ 'भक्तिरसामृतसिन्धु' के गम्भीर अध्ययन से भक्तिरस की इस शाश्वत् क्रिया को समझा जा सकता है। भक्तिरस अथवा कृष्णभावना को अंगीकार करना सब उपाधियों से मुक्त ऐसा सर्वमंगलमय दिव्य जीवन प्रदान करता है जिससे मुक्ति भी तुच्छ हो जाती है। भक्तिरस स्वयं मुक्ति देने में समर्थ है, क्योंकि यह साक्षात् भगवान् श्रीकृष्ण को भी आकृष्ट करने वाला है। सामान्यतः कनिष्ठ भक्त भगवान् अथवा श्रीकृष्ण को देखने को उत्कंठित रहते हैं; परन्तु वास्तव में हम उन्हें अपनी वर्तमान प्राकृत विकारमय कुण्ठित इन्द्रियों से नहीं देख सकते। 'भक्तिरसामृतसिन्धु' में वर्णित भक्तियोग की पद्धति साधक को शनै-शनैः देहात्मबुद्धि से मुक्त कर पराप्रकृति में स्थित कर देगी। इस अवस्था में भक्त सब उपाधियों से मुक्त हो जाता है। तब सब दोषों से मुक्त हुई इन्द्रियाँ निरन्तर भक्तिरस के संयोग से निर्दोष हो जाती हैं। जब शुद्ध इन्द्रियों के द्वारा भगवान् की सेवा की जाती है तो भक्तिरसमय जीवन में स्थिति हो जाती है। इस दिव्य जीवन में श्रीकृष्ण की सन्तुष्टि के लिये किये कार्यों का नित्य निरन्तर आस्वादन हो सकता है। भक्तियोग में नियोजित होने पर सब प्रकार के रस शाश्वत् हो जाते हैं। प्रारम्भ में आचार्य के आश्रय में विधिभक्ति में शिक्षा दी जाती है। शनैः-शनैः साधक के उन्नति करने पर उसकी भक्ति श्रीकृष्ण में रागानुगा हो उठती है। जैसा इस ग्रंथ में वर्णन किया जायगा-रस बारह प्रकार के हैं। इनमें से पाँच प्रधान रसों में श्रीकृष्ण से अपने सम्बन्ध को फिर से स्थापित करके हम सच्चिदानन्द- मय जीवन को प्राप्त हो सकते हैं। जीवनदशा का यह प्रधान सिद्धान्त है कि हममें किसी न किसी से प्यार करने की सामान्य प्रवृत्ति रहती है। कोई भी किसी दूसरे को प्यार किये बिना जीवित नहीं रह सकता। यह प्रवृत्ति जीवमात्र में विद्यमान है। बाघ जैसे पशु में भी यह प्रेम करने की प्रवृत्ति अवश्य है, चाहे सुप्त अवस्था में ही क्यों न हो; मनुष्यों में तो यह है ही। परन्तु खोयी कड़ी यह है कि अपने प्रेम को हम कहाँ लगायें जिससे सब सुखी हो सकें। आजकल मानव-समाज अपने देश, परिवार अथवा स्वयं अपने से प्रेम करने की शिक्षा देता है; परन्तु इसकी जानकारी किसी को नहीं है कि इस प्रेम की प्रवृत्ति को कहाँ समर्पित किया जाये जिससे सबको सुख मिले। वह केन्द्र कृष्ण हैं और 'भक्तिरसामृतसिन्धु' अपने स्वरूपभूत कृष्णप्रेम को जगा कर उस अवस्था को प्राप्त हो जाने की शिक्षा देती है जिसमें शाश्वत् जीवन का आस्वादन किया जा सकता है।
६ ] भक्तिरसामृतसिन्धु प्रारम्भ में जन्म होने पर एक बालक केवल अपने माता-पिता से प्यार करना जानता है; फिर भाई-बहन इत्यादि उसके प्रेम के पात्र बनते हैं और इस प्रकार दिन-प्रतिदिन जैसे-जैसे वह बढ़ता जाता है वैसे-वैसे ही अपने परिवार, समाज, जाति, राष्ट्र, यहाँ तक कि पूरे मानव-समाज से भी प्रेम करने लगता है। परन्तु सारी मानव- जाति को प्रेम करने से भी जीव की प्रेमप्रवृत्ति सन्तुष्ट नहीं होती। वह प्रेम की प्रवृत्ति तब तक अपूर्ण ही रहेगी जब तक हम यह न जान लें कि प्रेम का परम पात्र कौन है। हमारा प्रेम तभी पूर्ण रूप से सन्तुष्ट हो सकता है जब उसका समर्पण श्रीकृष्ण के चरणों में हो जाये। यह भाव 'भक्तिरसामृतसिन्धु' का सारसर्वस्व है। इसीलिये इस ग्रन्थ में पाँच दिव्य रसों, अर्थात् सम्बन्धों में श्रीकृष्ण से प्रेम करने की शिक्षा दी गई। हमारी प्रेम करने की प्रवृत्ति प्रकाश की किरण अथवा हवा के झकोरे के समान ही नित्य फैलती रहती है; परन्तु इसके अन्त को हम नहीं जानते। 'भक्तिरसामृतसिन्धु' उस विज्ञान का नाम है जो हमें यह दिखाता है कि श्रीकृष्ण को प्रेम करने की सुगम विधि से जीवमात्र से पूर्ण रूप में प्रेम किया जा सकता है। संयुक्त राष्ट्र जैसे महान् प्रयत्नों के द्वारा भी हम मानव-समाज में शान्ति और सद्भावना उत्पन्न करने में असफल रहे हैं क्योंकि हमें ठीक विधि का ज्ञान नहीं है। विधि बड़ी सरल है; परन्तु इसे ठण्डे मस्तिष्क से समझने की आवश्यकता है। 'भक्ति- रसामृतसिन्धु' सब मनुष्यों को भगवान् श्रीकृष्ण से प्रेम करने की सुगम और स्वाभाविक विधि की शिक्षा देती है। यदि हम कृष्ण से प्रेम करना सीख लें तो फिर इसके साथ ही बिना किसी कठिनाई के तुरन्त जीव- मात्र से भी प्रेम करने लगेंगे। यह पेड़ की जड़ को जल से सींचने अथवा उदर में भोजन पहुँचाने जैसा है। पेड़ की जड़ में जल डालना अथवा उदर को भोजन पहुँचाना सार्वभौम रूप से युक्तिसंगत और व्यावहारिक है। ऐसा हम सबका अनुभव है। हम भली प्रकार जानते हैं कि जब हम कुछ खाते हैं अथवा जब हम कोई पदार्थ उदर को देते हैं तो इस क्रिया से उत्पन्न शक्ति तुरन्त सम्पूर्ण देह में वितरित हो जाती है। उसी प्रकार जड़ में जल देने से बड़े से बड़े वृक्ष के अंग-प्रत्यंग को लाभ पहुँचता है। यदि हम चाहें कि वृक्ष के एक-एक अंग को जल दें तो यह सम्भव न होगा और न ही देह के अलग-अलग अंग भोजन कर ही सकते हैं। 'भक्तिरसामृतसिन्धु' ग्रन्थ उस एक दीपक को जलाने की शिक्षा देगा जिससे तुरन्त सब ओर सब
भूमिका [ ७
कुछ प्रकाशित हो जाता है। जो इस विधि को नहीं जानता वह जीवन के सार से वंचित है। जहाँ तक लौकिक पदार्थों का सम्बन्ध है, मानव सभ्यता सुखमय जीवन की ओर बहुत अधिक प्रगति कर चुकी है। परन्तु फिर भी हम सुखी नहीं हैं, क्योंकि हम सारतत्त्व को भुला बैठे हैं। यह प्राकृत आराम हमें सुखी करने को पर्याप्त नहीं है। इसका उज्ज्वल उदाहरण है— अमरीका। विश्व का सबसे धनी देश, जो सब प्रकार की प्राकृत सुविधाओं के होते हुए भी मनुष्यों के एक ऐसे वर्ग को जन्म दे रहा है जो जीवन के प्रति बिलकुल भ्रमित और निराश है। मैं इन शब्दों से उन सब भ्रमित मनुष्यों का आह्वान करता हूँ कि वे 'भक्तिरसामृतसिन्धु' में निर्दिष्ट भक्तियोग की विद्या को सीखें। मुझे विश्वास है कि ऐसा करने पर उनके हृदयों में लगी हुई संसार-अग्नि तुरन्त बुझ जायगी। विषयपरायण जीवन की विधि में महान् उन्नति कर लेने पर भो हमारी सुप्त प्रेम प्रवृत्ति पूर्ण नहीं हो पाई है। यही हमारे असन्तोष का मूल कारण है। 'भक्तिरसामृतसिन्धु' ग्रन्थ हमें ऐसे आचरणीय अथवा व्यावहारिक निर्देश देगा जिनके द्वारा इस प्राकृत-जगत् में भक्तिपरायण जीवन व्यतीत कर हम इस जन्म में और अगले में भी अपनी सम्पूर्ण अभिलाषाओं को प्राप्त कर सकते हैं। 'भक्तिरसामृतसिन्धु' का उद्देश्य संसार की किसी विधि को धिक्कारना नहीं है; अपितु, इस प्रयास का उद्देश्य धार्मिकों, दार्शनिकों और सामान्य लोगों को श्रीकृष्ण से प्रेम करना सिखाना है। लौकिक असुविधाओं से बचना बुरा नहीं है; परन्तु साथ ही श्रीकृष्ण से प्रेम करने की कला सीख लेनी चाहिये। इस समय हम अपनी प्रेम करने की प्रवृत्ति को कितने ही प्रकार से इधर-उधर लगाने का प्रयास कर रहे हैं; परन्तु वास्तव में देखें तो पायेंगे कि यथार्थ सार अर्थात् श्रीकृष्ण हमसे दूर हैं। पेड़ की जड़ को छोड़कर हम उसके तनों और पत्तों पर जल दे रहे हैं। अपनी देह को नाना प्रकार से सुख देने के प्रयास कर रहे हैं; परन्तु उदर में भोजन पहुँचाना भूल गये हैं। जो श्रीकृष्ण को भुला बैठा है उसको अपने स्वरूप की भी विस्मृति है। असली स्वरूप का साक्षात्कार और श्रीकृष्ण का साक्षात्कार एक साथ हैं। प्रातः काल अपने को देखने का अर्थ यह है कि सूर्योदय को भी देख लिया है। सूर्य के प्रकाश के बिना कोई अपने को नहीं देख सकता। इसी प्रकार श्रीकृष्ण के साक्षात्कार के बिना स्वरूप-साक्षात्कार नहीं हो सकता। 'भक्तिरसामृतसिन्धु' विशेष रूप से उनके लिये है जो कृष्णभावनामृत
[ ८ ] भक्तिरसामृतसिन्धु आन्दोलन में संलग्न हैं। मैं अपने सब मित्रों और शिष्यों को सविनय धन्यवाद देता हूँ जो सम्पूर्ण जगत् में कृष्णभावनामृत आन्दोलन को फैलाने में मुझसे सहयोग कर रहे हैं। मेरे प्रिय शिष्य श्रीमद् जयानन्द ब्रह्मचारी को साधुवाद है। उनके उदार अनुदान से इस ग्रन्थ का प्रकाशन हुआ है। अन्त में इस महान् ग्रन्थ का ध्यानपूर्वक प्रकाशन करने के लिये हरेकृष्ण प्रेस के निर्देशक धन्यवाद के पात्र हैं। हरे कृष्ण ! १३ अप्रैल, १६७० ए० सी० भक्तिवेदान्त स्वामी
प्रस्तावना मंगलाचरण : भगवान् श्रीकृष्ण आदिपुरुष, सम्पूर्ण कारणों के परम कारण तथा अखिलरसामृतमूर्ति रसराज — शांत, दास्य, सख्य, वात्सल्य, माधुर्य, हास्य, कारुण्य, भयानक, वीर, रौद्र, अद्भुत और वीभत्स रस रूपी सम्बन्धों के परम आश्रय हैं । वे परम आकर्षक श्रीविग्रह हैं और अपनी त्रिभुवन-विमोहिनी दिव्य रूप, गुण, लीला आदि की माधुरी से उन्होंने तारका, पालिका, श्यामा, ललिता और साक्षात् राधारानी को भी वशीभूत कर लिया है । वे प्रभु कृपा करें, जिससे कृष्णकृपाविग्रह श्रीमद्भक्तिसिद्धान्त सरस्वती गोस्वामी प्रभुपाद द्वारा प्रेरित 'भक्तिरसामृतसिन्धु' के लेखन का कार्य निर्विघ्न रूप से संपन्न हो । सर्वप्रथम श्रील रूप गोस्वामी प्रभुपाद और श्रील भक्तिसिद्धान्त सरस्वती गोस्वामी प्रभुपाद के चरणारविन्दों में सविनय प्रणाम करता हूँ, जिनकी प्रेरणा से मैं 'भक्तिरसामृतसिन्धु' ग्रन्थ के सार-संकलन के कार्य में प्रवृत्त हुआ हूँ । इस 'भक्तियोग के दिव्य विज्ञान का प्रतिपादन भगवान् श्रीचैतन्य महाप्रभु ने किया है । भगवान् चैतन्य का आविर्भाव बंगाल में आज से पांच सौ वर्ष पूर्व कृष्णभावना आंदोलन का प्रवर्तन् करने के लिए हुआ था । श्रील रूप गोस्वामीचरण इस महान् ग्रन्थ का आरम्भ करते हुए अपने अग्रज और गुरुदेव श्रील सनातन गोस्वामी की सादर वन्दना करते हैं । उनकी प्रार्थना है कि 'भक्तिरसामृतसिन्धु' उन्हें प्रिय हो, भक्तिरसरूप अमृत के सागर में निवास करते हुए श्रीसनातन गोस्वामी श्रीश्रीराधाकृष्ण की सेवा में सदा दिव्य आनन्द का आस्वादन किया करें । भक्तिरसरूप अमृत के सागर में विहरण करने वाले उन सभी महाभागवत और आचार्यरूप मकरों की हम सादर वन्दना करते हैं, जिन्होंने नाना प्रकार की मुक्तिरूप-नदियों का तिरस्कार कर दिया है । निर्विशेष- वादियों को परतत्त्व में लीन होना बड़ा रुचिकर होता है, जैसे नदियां सागर में आकर समा जाती हैं । सागर मानो मुक्ति है और उसमें मिलने वाली नदियां नाना मुक्तिपथ जैसी हैं । निर्विशेषवादियों का निवास नदीजल में है, जो अन्त में सागर में मिल कर लीन हो जाता है । परन्तु वे यह नहीं
२ ] भक्तिरसामृतसिन्धु जानते कि नदी के समान हो, सागर में भी असंख्य जलचर प्राणी हैं। सागर के निवासी मकर उन नदियों की अपेक्षा नहीं रखते, जो सागर में गिरती रहती हैं। ऐसे ही, जिनका निरन्तर भक्तियोगरूप सागर में निवास है, वे भक्त मुक्तिरूप नदियों की उपेक्षा कर देते हैं। भाव यह है कि जो शुद्धभक्त हैं, वे सदा भगवद्भक्तियोग के सागर में स्थित रहते हैं। अन्य पद्धतियाँ उन नदियों जैसी हैं, जो शनैः शनैः ही सागर तक पहुँचती हैं; शुद्धभक्त को इनसे कोई प्रयोजन नहीं होता। श्रील रूप गोस्वामी अपने गुरुदेव सनातन गोस्वामी से प्रार्थना करते हैं कि वे उन मीमांसकों के तर्कों से भक्तिरसामृतसिन्धु की रक्षा करें, जो भगवद्भक्ति में व्यर्थ हस्तक्षेप करते हैं। उनके अनुसार तर्क-वितर्क सागर में होने वाले बड़बालन जैसे हैं। सागर के मध्य में बड़वाग्नि से कुछ भी हानि नहीं होती। इसी प्रकार, भगवद्भक्ति के विरोधी अपने ब्रह्मानुभूति- विषयक नाना प्रकार के दार्शनिक तर्कों से इस महान् भक्तिसागर में उत्पात नहीं कर सकते। 'भक्तिरसामृतसिन्धु' ग्रन्थ के प्रणेता श्रील रूप गोस्वामी की दैन्योक्ति है कि सर्वथा दीन-हीन होते हुए भी सम्पूर्ण विश्व में कृष्णभावना का प्रसार करने के लिए वे इस प्रयास में प्रवृत्त हो रहे हैं। श्रील रूप गोस्वामी के चरणचिन्हों का अनुसरण करते हुए कृष्णभावनामृत आन्दोलन के सभी प्रचारकों को इस भाव से भावित रहना चाहिए। हम अपने को कभी महान् उपदेशक न समझें। सदा यही माने कि वह तो केवल पूर्ववर्ती आचार्यों के कार्य का निमित्तमात्र है और उन्हीं के चरणचिन्हों का अनुसरण करने से दुःखी मानवता का कुछ मंगल कर सकता है। भक्तिरसामृतसिन्धु के पूर्व, पश्चिम, उत्तर और दक्षिण—ये चार भाग हैं। इनमें से प्रत्येक भाग में चार लहरी हैं। जैसे सागर में पूर्वादि चारों दिशाओं में भिन्न-भिन्न लहरें उठती हैं, वैसे ही 'भक्तिरसामृतसिन्धु' में नाना लहरें कल्लोलित हो रही हैं। प्रथम विभाग की चार लहरों में से पहली लहरी में सामान्य भक्ति का निरूपण है। द्वितीय लहरी में भक्तियोग के साधन का अंकन है तथा तीसरी भावाश्रिता है। चौथी लहरी में भगवत्प्रेम का वर्णन है, जो जीवन का परम लक्ष्य है। इन सब का अपने-अपने विशेष लक्षणों सहित विस्तार से वर्णन किया जाएगा। श्रील रूप गोस्वामी ने पूर्ववर्ती आचार्यों का अनुगमन करते हुए भक्ति का प्रामाणिक विवरण इस प्रकार समाहृत किया है—"अनुकूल भाव से श्रीकृष्ण का सेवन करते हुए पूर्ण रूप से कृष्णभावना में तत्पर हो जाना
उत्तम भक्ति का स्वरूप है।" भाव यह है कि कृष्णभावनाभावित प्रतिकूल- भाव से भी हुआ जा सकता है; परन्तु यह शुद्ध भक्तियोग नहीं कहला सकता। शुद्ध भक्तियोग के लिए इन्द्रियतृप्ति की प्राकृत अभिलाषा से मुक्त होना आवश्यक है, क्योंकि ऐसी इच्छाओं के उठने में सकाम कर्म और मनोधर्ममय ज्ञान ही कारण होते हैं। सामान्यतः लोग किसी न किसी प्राकृत लाभ की इच्छा से नाना क्रियाओं में प्रवृत्त रहते हैं, जबकि अधिकांश दार्शनिक वाग्चातुर्य और मनोधर्म के आधार से ब्रह्मानुभूति का प्रस्थापन करना चाहते हैं। शुद्ध भक्तियोग ऐसे सब कर्म-ज्ञान से मुक्त होता है। उस कृष्णभावना अथवा शुद्धभक्ति की शिक्षा रागानुगा सेवा के द्वारा आचार्यों से ग्रहण करनी चाहिए। यह भक्ति एक प्रकार का अनुशीलन, अर्थात् सेवन है। यह निष्क्रियता नहीं है, जो आलसी मनुष्यों अथवा चुपचाप ध्यान में समय बिताने वालों को प्रिय होती है। इस स्वभाव के मनुष्यों के लिए अन्य बहुत से मार्ग हैं; परन्तु कृष्णभावना का अनुशीलन इन सब से भिन्न है। इस संदर्भ में श्रील रूप गोस्वामी ने 'अनुशीलन' शब्द का प्रयोग किया है। इसका अर्थ पूर्ववर्ती आचार्यों के चरणचिन्हों का अनुगमन करते हुए सेवन करना है। जब हम 'अनुशीलन' शब्द का प्रयोग करते हैं तो हमारा अभिप्राय क्रिया से होता है। क्रिया के बिना केवल भावना (चेतना) से लाभ नहीं हो सकता। सब प्रकार की क्रियाओं के दो वर्ग किये जा सकते हैं। एक वे जिनका कुछ निश्चित लक्ष्य है और दूसरी वे जो किसी प्रतिकूलता के निवारण के लिए की जाती हैं। इन्हें क्रमशः 'प्रवृत्ति' और 'निवृत्ति' कहा जाता हैं। द्वितीय श्रेणी की क्रियाओं के अनेक उदाहरण हैं। जैसे रोगी को सावधान रहकर कुछ औषधि का सेवन करना होता है, जिससे रोगरूपी प्रतिकूलता दूर हो जाय। जो परमार्थ के सेवन और भक्तियोग के आचरण में संलग्न हैं, वे सदा क्रियाशील रहते हैं। ऐसी क्रिया शरीर से अथवा मन से की जा सकती है। विचार, संवेदन और संकल्प—ये सब मन की क्रियायें हैं। संकल्प होने पर ही स्थूल शारीरिक अंगों से क्रिया प्रत्यक्ष बनती है। अतएव पूर्ववर्ती आचार्यों और गुरुदेव का अनुगमन करते हुए मन को नित्य-निरन्तर श्रीकृष्ण के चिन्तन और उनकी प्रसन्नता के साधन की चेष्टा में लगाए रखना चाहिए। मन के अतिरिक्त देह, इन्द्रियों और वाणी की अपनी-अपनी क्रियायें हैं। कृष्णभावनाभावित पुरुष वाणी को भगवत्-कीर्ति प्रचार में नियुक्त रखता है। इसी का नाम 'कीर्तन' है। मन के द्वारा वह सदा
४ ] भक्तिरसामृतसिन्धु भगवान् की लीला के चिन्तन में डूबा रहता है—किस प्रकार वे कुरुक्षेत्र में गीता का गान कर रहे हैं अथवा भक्तों सहित वृन्दावन धाम में लीलामग्न हैं। इस विधि से सदा-सर्वदा भगवान् की लीला का स्मरण किया जा सकता है। यह कृष्णभावना की मानस-सेवा है। इसी प्रकार, शारीरिक क्रियाओं से भी अनेक प्रकार से सेवा की जा सकती है। परन्तु ऐसा सम्पूर्ण सेवा-कार्य श्रीकृष्ण से सम्बन्धित होना चाहिए। श्रीकृष्ण के परम्परागत साक्षात प्रतिनिधि—गुरुदेव के चरणारविन्द का आश्रय लेने से यह सम्बन्ध स्थापित हो जाता है। अतः शरीर द्वारा कृष्णभावनाभावित क्रियाओं का आचरण गुरुदेव की आज्ञा के अनुसार श्रद्धापूर्वक करना कर्तव्य है। गुरु-पादाश्रय का नाम दीक्षा है। गुरुदीक्षा के दिन से श्रीकृष्ण और कृष्ण- भावना के सेवक में एक सम्बन्ध स्थापित हो जाता है। सद्गुरु से दीक्षित हुए बिना कृष्णभावना से यथार्थ सम्बन्ध होता ही नहीं। कृष्णभावना का यह सेवन प्राकृत नहीं है। सामान्यतः श्री भगवान् की तीन शक्तियाँ हैं—बहिरंगा, अन्तरंगा और तटस्था। जीव तटस्था शक्ति कहलाते हैं, जबकि प्राकृत सृष्टि बहिरंगा शक्ति अथवा अपरा प्रकृति का कार्य है। फिर, एक वैकुण्ठ-जगत् है, जो अन्तरंगा शक्ति का प्रकाश है। जीव तटस्था शक्ति इसलिए कहलाते हैं, क्योंकि अपरा बहिरंगा शक्ति के अधीन कार्य करते समय वे प्राकृत कर्म करते हैं और जब अन्तरंगा परा शक्ति के अन्तर्गत क्रियाशील रहते हैं, तो उनके कर्म कृष्णभावनाभावित हो जाते हैं। भाव यह है कि महात्मा महाभागवत पुरुषों का कार्य माया के आधीन नहीं होता; वे परा प्रकृति के आश्रय में कर्म करते हैं। भक्तियोग अथवा कृष्णभावना में जो कुछ किया जाता है, वह सब प्रत्यक्ष रूप से परा प्रकृति के नियन्त्रण में है। कहने का तात्पर्य यह है कि प्रकृति एक प्रकार की शक्ति है जिसे योग्यगुरु और श्रीकृष्ण दोनों की कृपा से दिव्य बनाया जा सकता है। कृष्णदास कविराज द्वारा विरचित 'चैतन्यचरितामृत' में श्रीचैतन्य महाप्रभु कहते हैं कि किसी दुर्लभ भाग्यवान् पुरुष को ही श्रीकृष्ण की कृपा से सद्गुरु का संग प्राप्त होता है। परमार्थ के यथार्थ जिज्ञासु को श्रीकृष्ण ऐसा बुद्धियोग देते हैं, जिससे वह सद्गुरु की शरण में चला जाता है और फिर, गुरुकृपा से कृष्णभावना में उन्नति करता है। इस प्रकार कृष्णभावना का सम्पूर्ण परिमण्डल साक्षात् परा प्रकृति—गुरु और श्रीकृष्ण के आधीन है। प्राकृत-जगत् से इसका कुछ भी सम्बन्ध नहीं है। 'कृष्ण' नाम अंशों सहित साक्षात् श्रीभगवान् का वाचक है। श्रीकृष्ण के असंख्य स्वांश,
प्रस्तावना [ ५ भिन्न-अंश और भिन्न-भिन्न शक्ति-प्रकाश हैं। दूसरे शब्दों में, 'कृष्ण' सब कुछ है; 'कृष्ण' में सम्पूर्ण तत्त्व का समावेश है। परन्तु सामान्यतः हमें कृष्णनाम से श्रीकृष्ण और उनके अंशों को ही समझना चाहिए। श्रीकृष्ण बलदेव, संकर्षण, वासुदेव, अनिरुद्ध, प्रद्युम्न, राम, नृसिंह, वराह, आदि अंशों और विष्णुमूर्तियों में प्रकाशित हैं। श्रीमद्भागवत के अनुसार, ये सब अंश और अवतार सागर की लहरों के समान ही असंख्य हैं। अस्तु, श्रीकृष्ण के तत्त्व में इन सभी अंशों और शुद्धभक्तों का समावेश है। ब्रह्मसंहिता के अनुसार श्रीकृष्ण के अंश पूर्ण आनन्दमय, चिन्मय और नित्य हैं। भक्तियोग का तात्पर्य उन कृष्णभावनाभावित क्रियाओं का आचरण करना है, जो भगवान् श्रीकृष्ण के दिव्य आनन्द के अनुकूल हों, उसका वर्धन करें। इसके विपरीत, जो क्रिया श्रीभगवान् के दिव्य आनन्द के प्रतिकूल है, वह भक्ति नहीं हो सकती। उदाहरणार्थ, रावण, कंस, हिरण्यकशिपु जैसे महादानव निरन्तर श्रीकृष्ण का स्मरण किया करते थे; परन्तु वे ऐसा उन्हें अपना शत्रु समझ कर करते थे। इसप्रकार के चिन्तन को भक्तियोग अथवा कृष्णभावना नहीं कहा जा सकता। निर्विशेषवादी कभी-कभी भक्तियोग को ऐसे भ्रान्त रूप में समझते हैं कि श्रीकृष्ण को उनके लीलापरिकर और उपकरणों से अलग कर बैठते हैं। जैसे, सब जानते हैं कि श्रीकृष्ण ने भगवद्गीता का प्रवचन कुरुक्षेत्र में किया। परन्तु निर्विशेषवादियों का कहना है कि श्रीकृष्ण का महत्त्व तो है, पर कुरुक्षेत्र का नहीं है। भक्त भलीभांति समझते हैं कि श्रीकृष्ण से सम्बन्ध के बिना कुरुक्षेत्र से उनका कोई प्रयोजन नहीं होता। इसके अति- रिक्त, कृष्णनाम का अभिप्राय केवल श्रीकृष्ण तक सीमित नहीं है। श्रीकृष्ण सदा अपनी लीला के परिकरों और उपकरणों से युक्त रहते हैं। जैसे कोई कहे, "शस्त्रधारी को भोजन कराओ।" भोजन शस्त्रधारी मनुष्य ही करता है, शस्त्र नहीं; शस्त्र उसकी पहचान का साधन अवश्य है। ऐसे ही, कृष्णभावना में कुरुक्षेत्र की युद्धभूमि आदि उन सभी उपकरणों और स्थलों में भक्त की रुचि रहती है, जिनका श्रीकृष्ण से कुछ भी सम्बन्ध हो। वे किसी साधारण युद्धभूमि में रुचि नहीं लेते। उनकी रुचि श्रीकृष्ण में, उनकी वाणी में, उनके उपदेश आदि में है। श्रीकृष्ण वहाँ हैं, इसीलिए कुरुक्षेत्र की युद्धभूमि का इतना महत्त्व है। कृष्णभावना क्या है—उपरोक्त वर्णन में यह सार रूप में निभृत है। इस बोध के बिना यह समझने में अवश्य भूल होगी कि भक्त कुरुक्षेत्र
६ ] भक्तिरसामृतसिन्धु की युद्धभूमि में क्यों रुचि रखते हैं। जिसकी श्रीकृष्ण में रुचि है, वह उनकी विविध लीलाओं और क्रियाओं में भी रुचि लेता है। 'भक्तिरसामृतसिन्धु' में श्रील रूप गोस्वामी द्वारा वर्णित लक्षणों के अनुसार शुद्धभक्त के स्वरूप का संक्षिप्त निरूपण इस प्रकार है : वह सदा अनुकूल भाव से श्रीकृष्ण की सेवा के परायण रहता है। ऐसी कृष्ण- भावनाभावित क्रियाओं की शुद्धता को बनाए रखने के लिए आवश्यक है कि वह सब प्रकार की प्राकृत इच्छाओं और मनोधर्म से मुक्त हो। भगवत्- सेवा करने की इच्छा के अतिरिक्त अन्य सभी इच्छायें प्राकृत हैं। साथ ही, उस मनोधर्मी का भी निषेध है, जिससे अन्त में शून्यवाद अथवा निर्वि- शेषवाद का निष्कर्ष निकले। कृष्णभावनाभावित पुरुष के लिए ऐसा निष्कर्ष निरर्थक है। यह बड़ा दुर्लभ है कि कोई दार्शनिक मनोधर्म के द्वारा वासुदेव (भगवान् श्रीकृष्ण) की आराधना के निष्कर्ष पर पहुँच जाय। स्वयं भगवद्- गीता इस कथन की पुष्टि है। अस्तु, दार्शनिक मनोधर्म का अन्तिम लक्ष्य भी यह जान लेना है कि श्रीकृष्ण साक्षात् भगवान् हैं; वे सर्वव्यापक और सब कारणों के परम कारण हैं, इसलिए उन्हीं के शरणागत हो जाना चाहिए। यदि यह अन्तिम लक्ष्य उपलब्ध हो जाय, तो दार्शनिक उन्नति अनुकूल है; परन्तु यदि उससे शून्यवाद अथवा निर्विशेषवाद सिद्ध होता है, तो उसे भक्ति नहीं कहा जा सकता। कर्म से प्रायः सकाम कर्मकाण्ड का अर्थ किया जाता है। ऐसे बहुत से मनुष्य हैं, जिनकी वैदिक कर्मकाण्ड में प्रगाढ आसक्ति है। परन्तु यदि कोई श्रीकृष्ण के बोध के बिना कर्मकाण्ड में आसक्त हो, तो उसके कर्म कृष्णभावना के प्रतिकूल समझे जायेंगे। वास्तव में कृष्णभावना के लिए श्रवण, कीर्तन, स्मरण आदि साधन पर्याप्त हैं। श्रीमद्भागवत में भक्ति के नौ साधनों का उल्लेख है। इनके अतिरिक्त अन्य जो कुछ भी किया जायगा, वह कृष्णभावना के प्रतिकूल होगा। अतः इन पतनों से अपने को बचाना चाहिए। श्रील रूप गोस्वामी ने भक्ति के निरूपण में 'ज्ञानकर्मादि' शब्द का प्रयोग किया है। 'कर्म' शब्द से उन क्रियाओं की ओर संकेत है, जो शुद्ध भक्तियोग के अनुकूल नहीं हैं। वैराग्य के बहुत से मिथ्या रूप भी कृष्ण- भावनाभावित भक्तियोग के अनुकूल नहीं होते। भक्ति के लक्षणों का प्रतिपादन करने के लिए श्रील रूप गोस्वामी ने 'नारदपंचरात्र' से एक श्लोक उद्धृत किया है—'कृष्णभावनाभावित होकर सब प्रकार की उपाधियों और दोषों से मुक्त हो जाना चाहिए। ऐसी
१. पूर्व विभाग: साधन, भाव व प्रेमाभक्ति लहरी
प्रस्तावना [ ७ अवस्था में अपने यथार्थ स्वरूप को फिर प्राप्त करे। इस प्रकार स्वरूप को प्राप्त हुआ पुरुष अपनी इन्द्रियों से इन्द्रियों के स्वामी, भगवान् श्रीकृष्ण की सेवा के परायण रहता है।' अतएव इन्द्रियों का अपने यथार्थ स्वामी की सेवा में तत्पर रहने का नाम ही भक्तियोग है। बद्ध अवस्था में इन्द्रियाँ शरीर की माँगों की पूर्ति में लगी रहती हैं। जब वही इन्द्रियाँ श्रीकृष्ण के आज्ञापालन में लग जाती हैं, तो उसे भक्ति कहते हैं। जब तक मनुष्य समझता है कि वह किसी परिवार का अथवा समाज का है और शरीर में आत्मबुद्धि रखता है, तब तक वह उपाधि- बद्ध है। जब इस बात का पूरा बोध होता है कि वह किसी परिवार, समाज अथवा देश का नहीं है, वरन् श्रीकृष्ण से उसका शाश्वत् सम्बन्ध है, उस समय वह अनुभव करता है कि उसे अपनी शक्ति का उपयोग तथाकथित परिवार, समाज और राष्ट्र के स्वार्थ के लिए न करके श्रीकृष्ण की सेवा में करना चाहिए। यही जीवन का शुद्ध प्रयोजन और कृष्णभावनाभावित शुद्ध भक्तियोग है।
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अथ पूर्व विभागः रसोपयोगीस्थायिभाव
नामावली हेतु पाठ रामलीलाप्रकाशन
अध्याय १ शुद्ध भक्तियोग के लक्षण श्रीमद्भागवत (३.२६.१२-१३) में माता देवहूति को उपदेश करते हुए भगवान् कपिल ने शुद्ध भक्तियोग के ये लक्षण बताए हैं, "हे जननि ! जो मेरे शुद्धभक्त हैं, जिन्हें सकाम कर्म अथवा ज्ञान से कोई प्रयोजन नहीं, उनका चित्त मेरी सेवा में इतना तन्मय रहता है कि वे मुझसे उस सेवा के अतिरिक्त कभी और कुछ अभिलाषा नहीं करते । यहाँ तक कि मेरे धाम में रहने की इच्छा भी वे नहीं करते ।" मुक्ति के पाँच भेद हैं : सायुज्य (भगवान् से एक हो जाना); सालोक्य (भगवान् के लोक में वास); सारूप्य (भगवान् के समान रूप की प्राप्ति); साष्टि (भगवान् के समान ऐश्वर्य की प्राप्ति); और सामीप्य (भगवान् के संग में रहना) । प्राकृत इन्द्रियतृप्ति की तो बात ही क्या, भक्त तो किसी प्रकार मुक्ति भी नहीं चाहता । वह तो बस प्रेममयी भगवत्सेवा में ही संतुष्ट रहता है । यह शुद्ध भक्तियोग का लक्षण है । श्रीमद्भागवत से उद्धृत कपिलदेव के उपरोक्त वाक्य में शुद्धभक्त की यथार्थ स्थिति के साथ ही भक्तियोग के सामान्य लक्षणों का भी विवेचन है । श्रील रूप गोस्वामी ने शास्त्र-प्रमाण के आधार पर भक्ति के लक्षणों का आगे वर्णन किया है । वे कहते हैं कि शुद्ध भक्तियोग के छः लक्षण हैं : १. शुद्धभक्ति क्लेशघ्नी है, अर्थात् सब प्रकार के प्राकृत क्लेशों को तत्काल शान्त कर देती है । २. शुद्धभक्ति शुभदा है, अर्थात् सब प्रकार से कल्याण करने वाली है । ३. शुद्धभक्ति अपने-आप अपरिमेय दिव्य आनन्द में स्थित कर देती है । ४. शुद्धभक्ति परम दुर्लभ है । ५. शुद्धभक्ति मोक्ष को भी तुच्छ बना देने वाली है ।