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कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

by कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास

Source: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (origin)

Devanagarihipublished2,136 pages

रतनाकी कथा

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अनुरागसागर

( १०९ )

छन्द

सुनहु वचन हमारे नीमा, तोहि कहहु समझायके ॥ प्रीत पिछली कारणे तुहि, दरस दीन्हो आयके ॥ आपने गृह मोहि लै चलु, चीन्हिके जो गुरु करो ॥ देऊँ नाम दृढाय तो कहै, फन्द यमके नापरो ॥७२॥ सो०-सुनत वचन अस नारि, नीरूत्रास न राखेउ ॥ लै गइ गेह मैझार, काशि नगर तब पहुँचेउ ॥७६॥ नारी न मान त्रास तेहि केरा । रंक धनद सम लै चलि डेरा ॥ जोलहा देखि नारि लौलीना । लेइ चलो अस आयसु दीना ॥ दिवस अनेक रहे तेहि ठाई । कैसहु तेहि परतीत न आई ॥ बहुत दिवस तेहि भवन रहावा । बालक जान न शब्द समावा ॥

सुपुत्र सुदर्शनके माता पिताका बोथे जन्ममें मथुरामें

प्रगट होकर सत्यलोक जाना

त्रिन परतीत काजा नहि होई । दृढ कै गहहु परतीत विलोई ॥ ताहि देह पुनि मोहि न चीन्हा । जानि पुत्र मोहि संग न कीन्हा ॥ तजि सो देह बहुरि जो भाई । देह धरी सो देहुँ चिन्हाई ॥ जुलहाकी तब अवधि सिरानी । मथुरा देह धरी तिन आनी ॥ हम तहैं जाय दरश तिन दीन्हा । शब्द हमारा मानसों लीन्हा ॥ रतना भक्ति करे चितलाई । नारि पुरुष परवाना पाई ॥ ता कहै दीन्हेउ लोक निवासा । अंकुरी पठये निज दासा ॥ पुरुष चरण भेटे उरलाई । शोभा देह हंसकर पाई ॥ देखत हंस पुरुष हरषाने । सुकृति अंश कही मन माने ॥ बहुत दिवस लगि लोक रहाये । तब लगि काल जीव संताये ॥ जीवनहुः स्वअतिशय भयो भाई । तबही पुरुष सुकृत हंकराई ॥

मुकुत अंशको पृथ्वीपर भेजनेका वृत्तांत

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( ११० )

अनुरागसागर

आज्ञा कीन्हा जाहु संसारा । काल अपार बल जीव दुखारा॥ लोक संदेशा ताहि सुनाओ । देह नाम जीवन मुकताओ॥ आज्ञा सुनत सुकृत हरषाये । तुरतहिं लोक पयाना आये॥ सुकृत देखि काल हरषाई । इन कहैं तो हम लेब फँसाई॥ करि उपाय बहुत तब काला । सुकृत फँसाय जलमहैं डाला॥ बहुत दिवस गयो जब बीता । एकहु जीव न कालहिं जीता॥ जीव पुकार सतलोक सुनाये । तबहीं पुरुष मोकहैं हँकराये॥

कबीरसाहबका धर्मदासजीको चितानके लिये लोकसे पृथ्वीपर

आना पुरुष वचन

पुरुष अवाज उठी तिहि बारा । ज्ञानी वेगि जाहु संसारा ॥ जीवन काज अंश पठवायी । सुकृत अंश जग प्रगटे जायी॥ दीन्ह आज्ञा तेहिको भाई । शब्द भेद वाही समझाई ॥ लावहु जीवन नाम अधारा । जीवन खेइ उतारो पारा ॥ सुनत आज्ञा वहि कीन पयाना । बहुरि न आये देश अमाना ॥ सुकृत भवसागर चलि गयऊ । काल जालते सुधि बिसरयऊ ॥ तिन कहैं जाय चितावहु ज्ञानी । जेहि ते पंथ चले निरवानी ॥ वंस व्यालिस अंस हमारा । सुकृत गृह लैहैं औतारा ॥ ज्ञानी वेगि जाहु तुम अंसा । अब सुकृत अंसकर मेटहु फँसा ॥

कबीर वचन

चलेहु हम तव सीस नवाई । धर्मदास अब तुम लग आई॥ धर्मदास तुम नीरु औतारा । आमिन नीम प्रगट बिचारा ॥ तुम तो आहू प्रिय मम अंसा । जाकारन हम कीन्हा बहुसंसा ॥ पुरुषहि आज्ञा तुमरे ढिग आये । पिछली हेतु पुनि याद कराये ॥ यहि संयोग हम दर्शन दीन्हा । धर्मनि अबकी तुम मोहि चीन्हा ॥ पुरुष अवाज कहू तुम पासा । चीन्हेहु शब्द गहो विश्वासा ॥ धाय परे चरणन धर्मदासा । नैन बारि भर प्रगट प्रगासा ॥

मुकुत अंश (धर्मदास) को चितानेके लिये कबीरसाहबका पृथ्वीपर आना

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अनुरागसागर

( १११ )

धरहि न धीरज बहुत संतोषा । तुम साहिब मेढहु जिवधोखा॥ धरे न धीरज बहुत प्रबोधे । बिछुरिजननिजिमिमिल्यो अबोधे युग पग गहे सीस भुई लाये । निपट अधीरन उठत उठाये ॥ बिलखत बदन वचन नहीं बोले । सुरति चरणते नेक न डोले ॥ निरखत बदन बहुरोपदगहहीं । गदगद हृदय गिरा नहिं कहहीं॥ बिलखत बदन स्वास नहिं डोले । उनसुनिदशा पलक नहिं खोले॥

धर्मराज वचन

बहुरि चरण गहि रोवहिं भारी । धन्य प्रभु मोहितारनतनधारी॥ धरि धीरज तब बोले सम्हारी । मोकहैं प्रभु तारन पगधारी ॥ अब प्रभु दया करहु यहि मोही । एकौ पल ना विसरों तोही ॥ निशिदिन रहों चरण तुम साथ । यह बर दीजै करहु सनाथा ॥

कबीर वचन

धर्मदास निह संशय रहहु । प्रेम प्रतीति नाम दिढ़ गहहु ॥ चीन्हेउ मोहि तोर भ्रम भागा । रहै सदा तुम दृढ़ अनुरागा॥ मन बचकर्म जाहि जो गहई । सो तेहि तज अंत कस रहई॥ आपन चाल बिना दुख पावे । मिथ्या दोष गुरु कहैं लावे॥ पंथ सुपंथ गुरु समझावे । शिष्य अचेतन हृदय समावे॥ तुम तो अंश हमारे आहु । बहुतक जीव लोक ले जाहु ॥ चार माहि तुम अधिक पियारे । किहि कारण तुम शोचविचारे॥ हम तुमसों कछु अन्तर नाही । परक शब्द देखो हियमाहीं ॥ मन बच कर्म मोहि लौ लावे । हृदये बुतिया भाव न आवे॥ तुम्हरे घट हम वासा कीन्हा । निश्चय हम आपन कर लीन्हा ॥

छन्द

आपनो कर लीन्ह धर्मनि, रहो निःसंशय हिये ॥ करहु जीव उबार दृढ़ है, नाम अविचल तुहि दिये ॥

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( ११२ )

अनुरागसागर

मुक्ति कारण शब्द धारण पुरुष सुमिरण सारहो ॥ सुरति बीरा अंकधीरा जीविका निस्तार हो ॥७६॥ सो०-तुमतौ हौ धर्मदास, जंबुदीप कड़िहार जिव ॥ पावे लोक निवास, तुहि समेत सुमिरे मुझे ॥७७॥

धर्मदास वचन

धन सतगुरु धन तुम्हरी वानी। मुहि अपनाय दीन्ह गनि आनी ॥ मोहि आय तुम लीन्ह जगायी । धन्य भाग्य हम दर्शन पायी ॥ धन साहब मुनि शाप न कीन्हा । मम शिर चरण सरोरुह दीन्हा ॥ मैं आपन दिन शुभ करि जाना । तुम्हरे दरश मोक्ष परमाना ॥ अब अस दया करहु दुख भंजन । कबहुँ मोहि न धरे निरंजन ॥ काल जाल जौनी बिधि छूटे । यमबंधन जौनी बिधि टूटे ॥ सोई उपाय प्रभु अब कीजे । सार शब्द बताय मोहि दीजे ॥

कबीर वचन

धर्मदास तुम सुकृत अंशा । लेह पान अब मेटहु संशा ॥ धर्मदास आपन करि लेऊँ । चौका करि परवाना देखै ॥ तिनका तुडाय लेहु परवाना । कालदशा छुटे अभिमाना ॥ शालिग्रामको छाड़हु आसा । गहि सत शब्द होहु तुम दासा ॥ दश औतार ईश्वरी माया । यह सब देखु कालकी छाया ॥ तुम जग जीव चितावन आये । काल फंद तुम आय फसाये ॥ अबहुँ चेत करो धर्मदासा । पुरुषहि शब्द करो परकासा ॥ ले परवाना जीव चिताओ । काल जालते हंस मुक्ताओ ॥ यहि कारज तुम जगमें आये । अबन करहु दोसर मन भाये ॥

१ कर्णधार मल्लाह नाव खेकर पार उतारनेवाला भवसागर से गुरु पार उतारते हैं इस कारण उन्हें कड़िहार कहते हैं।

कबीरसाहबका चौका करके धर्मदासजीको परवाना देना आरती विधि

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अनुरागसागर

( ११३ )

छन्द

चतुर्भुज बंकेज सहतेज, और चौथे तुम अहौ ॥ चार गुरुकडिहार जगके वचन यह निश्चय गहौ ॥ यही चार अंश संसारमें, जीव काज प्रगटाइया ॥ स्वसंवेदसोइनसंग दियो, जेहि सुनि काल भगाइया ॥७४॥

सोरठा-चरोंमें धर्मदास, जम्बुदीपके गुरु साहि ॥ व्यालिस वंश विलास तैं जीव तेहि शरणगहि ॥७८॥

आरतीविधिवर्णन

कबीर साहबका चौका करके धर्मदासको परवाना देना धर्मदास वचन

धर्मदास पद गहि अनुरागा । हो प्रभु मोहि कीन्ह सुभागा ॥ हे प्रभु ! नहि रसना प्रभुताई । अमित रसन गुण वरनिन जाई ॥ महिमा अमित अहै तुम स्वामी । केहि विधि बरनों अंतरयामी ॥ मैं सब विधि अयोग्य अविचारी । मुझ अधमहिं तुम लीन उबारी ॥ अब चौका भेद कहो मुहि स्वामी । काहि कहहु तिनका सुखभामी ॥ जो तुम कहो करौ मैं सोई । तामहैं फेर न परि हैं कोई ॥

कबीर वचन चौकाका साज

धर्मदास सुनु आरति साजा । जाते भागि चले यमराजा ॥ सात हाथको बस्तर लाओ । श्वेत चँदोबा छत्र तनाओ ॥ घर आंगन सब शुद्ध कराओ । चौका करि चन्दन छिड़काओ ॥ तापर आँटा चौक पुराओ । सवासेर तंदुल ले आओ ॥ स्वेत सिंहासन तहाँ बिछाई । नाना सुगंध धरु तहाँ लगाई ॥ स्वेत मिठाई स्वेतै पाना । पुंगीफल स्वेतहि परमाना ॥ लौंग इलायची कपुर सँवारो । मेवा अष्ट केरा पनवारो ॥

कबीरसाहबका धर्मदासको उपदेश देना

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नारायणदासजीका कबीरसाहबकी अवज्ञा करना

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द्वादश पन्थका वर्णन

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अनमङ्ग वृत्तका पन्थ ४

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अखिलभङ्ग दूतका पंथ ८

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धर्मदास साहबको आत्म अंशका दर्शन होना

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चूड़ामणिकी उत्पत्तिकी कथा

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ब्यालीस वंशके राज्यकी स्थापना

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चूड़ामणिको कबीरसाहबका उपदेश देना

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वंश का माहात्म्य

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