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कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

by कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास

Source: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (origin)

Devanagarihipublished2,136 pages
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ज्ञानमाहात्म्य

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मोहराजाका वर्णन (मोहकी स्थिति)

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मोहके मुसाहिब

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क्रोधप्रताप वर्णन

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लोभप्रताप वर्णन

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गर्वका कर्तृत्व वर्णन

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विवेकदत्त वर्णन

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विवेक और मोहकी छेड़छाड़

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( ८० )

विवेकसागर

नाम हेतु जो कीने कर्मा । कहै कबीर सोई निज धर्मा ॥ सांचो धर्म जानिये सोई । प्रगट स्नेह नाम सो होई ॥ तन मन धन जो नामे दैहैं । सोई भक्त कबीर कहै हैं ॥ अग्नि जायके शिर धरयी । तौहु न नाम महिमाते परयी ॥ कोटिक सुख कोटिन दुख पावैं । धीरजवंत नाम लौ लावैं ॥

विवेक और मोहकी छोड छाड

ऐसो ज्ञान प्रगट जब भयऊ । चिंता मोह सबै मिटि गयऊ ॥ उपज्यो काम क्रोध मोह दापू । निज धीरजके विश भय आपू ॥ लोभ मोहकी अग्नि अतिदहई । सन्तोष पोष प्रवृत्त होय रहई ॥ धीरज धर्म ज्ञान मन दियऊ । तबही मोह चकित होय रहऊ ॥

विवेक और मोहयुद्ध वर्णन

तबहि मोह मन्त्र उपजावा । पाखण्ड मित्र निकट बुलावा ॥ सकल सैन को बुलवायऊ । मित्र एक जोड़ि ठहरायऊ ॥ आये प्रबल विवेक नरेशा । लीन्हैं आइ हमारो देशा ॥ अब मति मन्त्र करो ठहरायी । देश आपनो लेहु छुड़ायी ॥ कहै पाखण्ड सुनो मम राजा । यह बड कौन अहै सो काजा ॥ राजा मन्त्र हमारो लीजै । प्रथम कामको आयसु दीजै ॥ आगे आगे काम रह भरपूरी । ज्ञान विवेक जाहि सब दूरी ॥ तबहि काम कहैं आयसु दियऊ । दल बादल सह रन सो गयऊ ॥

काम और ज्ञानयुद्ध

काम कुपित वचन सुनायो । हमरे देश ज्ञान कहैं आयो ॥ उतै भयो काम उतै भयो ज्ञाना । मानस भूमि रच्यो संग्रामा ॥ यहे कबीर यहै परमाना । काम ज्ञान युद्ध तब ठाना ॥ बहु रूप धरि काम तिवाना । तबही चलावै पांचो बाना ॥ निरफल कियो ताहि तब ज्ञाना । सुरति शब्द लै रहे निदाना ॥

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विवेकसागर

( ८१ )

काम कहै यह नीकि सुन्दरी । कहै ज्ञान यह विष की दहरी ॥ काम कहै याके ढिग जाई । ज्ञान कहै यह सांपिन अहई ॥ काम कहै कामिनि सम तूला । ज्ञान कहै यह विष कर मूला ॥ कामासक्त कुहछिसन राता । ज्ञानसक्ति करि बोलै माता ॥ यह सुनि बहुत अजब भौ कामा । सह्यो ज्ञान हमरो संग्रामा ॥ साखी-रच्यो कामछंद अनंगरती, त्रिविधि मद त्रियासंग ॥ कहै कबीर यह अति बढै, जब बढै काम रतिरंग ॥

चौपाई

शब्द विचारै बोलै ज्ञाना । जीत्यो तोहि विवेककी आना ॥ तबही विचारै ज्ञान सो कीया । बाका भेद सबै सो लीया ॥ ज्ञान विचार उठे गल गाजी । काम निलज्ज न काहे भाजी ॥ धिगतिया धिगधिग अस राजा । निरधिनरुधिरमांस को साजा ॥ हाड त्वचा मुख रोम पसारा । नव द्वार बहैं अति खारा ॥ रेंट नाक मख कफ लारा । कीचड आंखिन काने छारा ॥ नख शिख व्याधि सबै विस्तारा । विष्टा मूत्र तिया तन भारा ॥ वाहि रांचै सो पावैं दुक्ख । सपने नहिं तेहि होये सुक्ख ॥ दुख की राशि जो राजी कोई । साचो नर्क आहि पुनि सोई ॥ यह कहि ज्ञान रहा ठहराई । काम सैन डारै विचलाई ॥ विचल्यो काम गयो खिसियाई । उग्र ज्ञानते कछु न बसाई ॥

साखी-प्रेम भक्ति बल ज्ञानते, रूप रह्यो रन पाय ॥

मोहि काम का करि हैं, जो साहब होइ सहाय ॥

चौपाई

विचल्यो काम मोह पहुँ गयऊ । सबहि वृत्तान्त सुनावन लयऊ ॥ मनमें मोह बहुत पछितायी । बोलाइ क्रोधको बात सुनायी ॥ आइ क्रोध जब ठाढे रहेऊ । तबही मोह क्रोधसे कहेऊ ॥

क्रोध और क्षमाका युद्ध

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(८२)

विवेकसागर

तामस तेज नाम तोहि कुद्धा । करु विवेक ज्ञानसो युद्धा ॥ कई अस प्रबल तोहि को सहै । तोरे तेज ज्ञान कई रहै ॥ वह सुनि कोध चला ससुहाई । करी गवन पहुँचा रन आई ॥ तनमें आइ कियो परवेशा । छाँडो ज्ञान हमारो देशा ॥ जो तुम निश्चय जीतो कामा । तो अब मोसों करो संग्रामा ॥ यह सुनि ज्ञान अचम्भित भयऊ । जाइ विवेक राइ सों कहेऊ ॥ राजा तब यक मंत्र विचारचो । जेहि विधि प्रबल क्रोध को मारचो ॥ साखी-यह अति क्रोध प्रचण्ड है, कोपि करै भयमंत ॥ सुधि बुधि धीरज ना रहै, जब यह कोपि चंढंत ॥

चौपाई

तब राजा मंत्रिन सो कहै । प्रबल क्रोध क्यहि कारण दहै ॥ तब सबहि मिलि मंत्र विचारा । यह तो जाय क्षमा ते मारा ॥ बोलि विवेक क्षमा सो कहै । तुम तो जाइ क्रोध रन बहै ॥ भक्ति ज्ञान तेहि देह सहाई । प्रबल क्रोध को मारो जाई ॥ यहि सुनि क्षमा रोपे रन आर्या । लीन्हो शील जो धनुष चढायी ॥

क्रोध और क्षमा का युद्ध

देखि क्षमा क्रोध चले धायी । मनसा भूमि रोप्यो रन आयी ॥ सुनो क्षमा क्रोध संग्रामा । लरही दोउ जुझै संग्रामा ॥ उतते क्रोध उठे रन कोपी । इतते क्षमा रहै रण रोपी ॥ मारन क्रोध उठे जब धायी । इतते क्षमा दीन्ह मुसकायी ॥ क्रोध आन तब गारी दयी । सुनि क्षमा अन बोली भयी ॥ मीठे वचन क्षमा अति बोलै । कोपै क्रोध पवन ज्यों डोलै ॥ क्षमा से अग्नि शितल है जाई । जैसे जलमें अग्नि बुझाई ॥ यहि विधि क्रोध क्षमा सो भिरई । मानहु अँगार पानिमहँ परई ॥

साखी-भलो भलो सब कोई कहै, रहि गइ क्षमा दुहाइ ॥

कहैं कबीर शीतल भये, गयी सो अग्नि बुझाइ ॥

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विवेकसागर

( ८३ )

चौपाई

क्रोध जरनते गयऊ बुझायी । राजा मोह समाचार तब पायी॥ बहुते मन मँहँ कीन्ह पछिताई । सकल सैन को लिये बुलाई ॥ हारचो क्रोध काम जब जाना । महा मोह राजा डर माना ॥ चकित मोह मन्त्री हँकरावा । सम्मुख मोह विवेक डरावा ॥ लोभ मन्त्री आय भये ठाढा । देखत राव छोभ अति बाढा ॥ तब लोभ मोहहि माथ नवाई । कहु राजा मोहि काहे बुलाई ॥ जबलगि अहै मोह रणधीरा । तब लग काहे होहु अधीरा ॥ जबलग प्रबल मोह है आगे । तब लग कहा ज्ञान कह जागे ॥ महा मोह राजा सुनु बैना । जबलगिहौं तबलगि सब सैना ॥ जबलगिहौं तब लगि आही । मोरे गये सबै मिटि जाही ॥ हौं निज सर्व पापका मूला । मोरे ते तुम रहत हो फूला ॥ जीतौं ज्ञान विवेक हि जायी । देश आपनो लेउ छुडायी ॥ तो कहँ फिर मैं दैहौं राजू । महामोह मोरे बल गाजू ॥ यह सुनि हर्ष मोह मन भयऊ । तत्क्षण लोभको आयसु दयऊ ॥ मोह कहै दैहौं सब राजू । तबही लोभ रणै मँहँ गाजू ॥ जबही मोह लोभहि कहेऊ । देई बीरा आयसु दयऊ ॥ बाचा बन्ध राजा जब भयऊ । तबही लोभ रण कहँ गयऊ ॥ जाई रण दियो लोभ हँकारा । ज्ञान तुम का करहु तक़रारा ॥ हम बन्दोबस्त कियो परवेशा । छोडहु ज्ञान हमारो देशा ॥ तजहु ज्ञान तुम हमरो ठाकं । मैं प्रचण्ड लोभ मोर नाकं ॥ अब मैं रनमहँ अग्नि परजारी । करि बल एक एक कै मारौं ॥ चिन्ता शक्ति पापको मूला । कोउ न जाने मम डर भूला ॥ आशा तृष्णा तहां अति बहे । सुनत ज्ञान तहां नहि रहै ॥ नहि जानो तुम क्रोध औ कामा । हौं अति प्रबल लोभ मोहि नामा ॥

लोभ और संतोषका युद्ध

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( ८४ )

विवेकसागर

छांडहु ज्ञान हमारो ठाऊं । नहिं तो तोहि धरि धरि खाऊं ॥ यह सुनिज्ञान मन्त्रयक ठयऊं । फिर विवेक राजा पहुँ गयऊं ॥ राजा मन्त्र करो ठहराई । लोभ न मोपै जीतो जायी ॥ जो तुम लोभ जीतौ आजू । तौ तुम करो निकंटक राजू ॥ तब बोले मन्त्री प्रकाशा । यहि बिधि होई लोभको नाशा ॥ राजा मन्त्र कियो मन चाही । पुत्र तुम्हारो जीते याही ॥ सो सन्तोष कुवरकर नामा । सो निश्चय जीते संग्रामा ॥ तब राजा बोले सन्तोखा । लोभै जीतौ मिटै सब धोखा ॥ भक्ति ज्ञान तोहि देहुँ सहाई । प्रबल लोभ कहँ जीतहु जाई ॥

लोभ और सन्तोषका युद्ध

इत भौ लोभ उत भौ सन्तोषा । मनसा भूमि उठचो रन रोषा ॥ लालच बाण लोभ संचारा । क्षमा बाण सन्तोष तेहि मारा ॥ लोभ चलावै धनुष कहँ खैंची । सन्तोष लीन्ह सुमिरनकी ऐंची ॥ चिता शक्ति लोभ पठायी । ज्ञान शक्तिसो निष्फल जायी ॥ अतिदुखफांसीलोभ कर लयऊ । उग्र ज्ञान सन्तोष मिटैऊ ॥ परम सन्ताप लोभ कर लयऊ । सोदया खङ्ग ते निष्फलगयऊ ॥ अचेत शक्ति लोभ चलाई । जागृत शक्ति सन्तोष पठाई ॥ लोभ कहै पैसा तुम लहिये । सन्तोष कहै कहु नहिं चहिये ॥ लोभ कहे नीको है रूपा । सन्तोष कहै छाडि गय भूपा ॥ लोभ कहे लेव कंचन मोरा । सन्तोष कहे जीवन है थोरा ॥ लोभ कहे घोडा जोडा नीका । सन्तोष कहै कारज नहिं जीका ॥ लोभ कहै हीरा ल्यो लालू । सन्तोष कहे संग नहीं चालू ॥ सांच धनुष कर महि धयऊ । चपल लोभ चापि दल गयऊ ॥ उदासी शक्ति उरमैं उपजायी । कंध्यो लोभ ज्यों विष खायी ॥ धीरज खङ्ग गह्यो सन्तोखा । बिचल्यो लोभ मिटचो सब धोखा ॥

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विवेकसागर

(८५)

सारखी-काम क्रोध विचले, विचले लोभ अकाज ॥ महामोह मनमहँ झखे, गयो हमारो राज ॥ काम क्रोध दोऊ गये, गये लोभ दल भाज ॥ दया क्षमा सन्तोष बल, रहै विवेक सो गाज ॥

चौपाई

मोह बुलायि गर्ब सन कहेऊ । विचलो सबै एक तुम रहेऊ ॥ अब मेरो तुम करो सहाऊ । मोरे संग गर्ब उठि धाऊ ॥ ज्ञान विवेकको मारि भगावें । जप तप साधन मारि सब लावें ॥ बोले गर्ब मोह ते तबहों । का बिसात विवेक की अहहों ॥ मेरो हँकार फिरे जेहि देशा । रहै न ज्ञान विचारको लेशा ॥ बाकी सैन रहे सब जोही । लीन्ह बुलाय मोह तब ओही ॥ लीन्ह सजाय सैन बहु रंगी । मोह गर्ब चढे एकसंगी ॥ मोह दल जब पहुँचे रणमाहीं । खबर भयो विवेक पहुँ ताहीं ॥ सज्यो सेन तब बहु समुदाई । होय निशंक चले रण भाई ॥ उतते मोह रण रंग मचावा । इत विवेक राजा चढि आवा ॥

सारखी-दोउ दल चढि ठाढे भये, मनमें भये निर्वित ॥ कहे कबीर विचारिकै, डरे मोह मदमन्द ॥

चौपाई

देख्यो गर्ब मोह सकाना । करी क्रोध बाण संधाना ॥ बहु बडाइ सो बोलन लाग्यो । ज्ञान विवेक कहाँ अब भाग्यो ॥ आवे सन्मुख मोसे सब काहू । सुनत वचन माह उत्साहू ॥ बेसुध बाण गर्ब तब धारा । उतते चैतन बाण सम्भारा ॥ बल करि गर्ब उठे समुदाई । तबहिँ खवास गयो ठहराई ॥ उग्रज्ञान राजा पहुँ गयऊ । गर्ब गँवार हठ अति भयऊ ॥ राजा मोकहँ आयसु देहू । कौन बाण ते मारी एहू ॥

न. ३ कबीरसागर - ५