कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)
Kabir Sagar (11 Parts Complete)
कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
कबीर साहबका जालंधर देशमें राय भोपाल के घर जाना
( ६ )
भोपालबोध
लोभ मोह भ्रम फाँस अपारा । यह नहीं मर्म लखै संसारा ॥ यहि फन्दा जग सबहिं फन्दाओ । विरले हंस सुकृत बन्दाओ ॥ साखी-यहि विधि जगमें जाइके, जीव लाउ हम पास ॥ फन्दा डारहु जीव पै, होहु मीच दुख रास ॥
चौपाई
यहि विधि काल जब आज्ञादीना । चले यमदूत सब साज सजीना ॥ उत पुरुष आज्ञा मोहि दीन्हा । जीव सुक्तावन कहै पठावन लीन्हा कहे पुरुष सुनु ज्ञानी बाता । काल करे अब जीवन घाता ॥ घात करी सो भक्षण करिहै । बहुरि जीव भौसागर परि है ॥ काल दुष्ट बहु जीव सतावै । सारशब्द विनु मोहि न पावै ॥ याते जगमहँ अब तुम आओ । जीवहिं चिताय लोक कहँ लाओ ॥ आज्ञा मोरि लेहु सहिदाना । जाइ जगत जीव लाओ निदाना ॥ साखी-सुकृत जाहु संसार में, उल्टी राह चलाउ ॥ शब्दसार जीवन कहो, काल हंस सुक्ताउ ॥
चौपाई
पुरुष आज्ञा हम शिर मानी । करि प्रणाम तब जगत पयानी ॥ देश जलंधर राय भोपाला । गयउ तहां जिन्दाके हाला ॥ जाई पौरिमें ठाढ रहायी । कह्यो पौरिया बहुत चितायी ॥ राजहिं लाउ हमारे पास । दर्शन करै कर्म नृप नासा ॥ लागे कुंजी कुलुफ किवौरा । बहुत लोग बैठे शठिहारा ॥ कोइ कहै न्याय जिन्द चाहै । कोइ कहै बटपार यह आहै ॥ कोई कहै मारि यहि खेदो । निर्गुण भेद तिन्है नहिं भेदो ॥ चारि पहर तब रैन बितावा । भयो भिनसार भोर हो आवा ॥ तब हम चरित दिखावन लागे । फूटि कपाट भये दोह भागे ॥
राय भोपालका कबीर साहबको क्लेश करने की सलाह करना
बोधसागर
( ७ )
सबै कँगूरा भुइ खसि परेऊ । ज्ञानी चली राय पहुँ गयऊ ॥
साखी-चकित सकल पौरिय, पाछे लगि सब धाय ॥
जहाँ राय भोपाल हैं, तहाँ पोरिया जाय ॥
चौपाई
करत गोहार पौरिया जाई । मार मार बहुत हकराई ॥
राय भोपाल बैठि जहाँ राजे । गये पौरिया तहाँ सब भाजे ॥
कीन्ह सलाम दोई कर जोरी । यह जिन्दा बटपार बडचोरी ॥
कहैं पौरिया पौर उचारो । तुरत बुलाओ राय यहि बारो ॥
जिन्दा वचन नहीं हम माना । बीत रैन भये भोर सुजाना ॥
मंत्र एक जिन्दा तब करिया । फूट कपाट कँगूरा गिरिया ॥
तब जिन्दा आयो महाराजा । हम आये तेहि पीछे भाजा ॥
ना जानौ कौन यह आही । होय बटपार धसा घर माही ॥
साखी-हो राजा महाराज मम, कहचो सत्य हम बात ॥
तत्क्षण जिन्दा मारहु, नातौ सब पर घात ॥
चौपाई
सुनो पौरिया कहे अस राजा । सुनिये वेद करौ तव काजा ॥
विप्र बुलाय सुनो मतिमाना । करिये तबै विवेक सुजाना ॥
आज्ञा वेद होय तब मारा । नहिं तो जिन्दा कहा बिगारा ॥
एतिक वचन राय सुख बोला । साहब आसन तवहीं डोला ॥
तत्क्षण हम अस लीला कीन्हा । रायमहल सोने करि दीन्हा ॥
कंचन कपाट रतनकी पांती । विपरीत बने खम्भ बहु भांती ॥
बने कँगूरा रतन रसाला । चकित राजा भये भोपाला ॥
साखी-भयो विवेक मन रायके, देखत मन पतियाय ॥
कौन पुरुष तुम समरथ, मोहैं कहैं दरश दिखाय ॥
राजाके अधीन होकर सद्गुरुका हास्य प्रकटना
( ८ )
भोपालबोध
ज्ञानीवचन चौपाई
सत्य पुरुषके हम शठिहारा । जीवन काज आये संसारा ॥ पुरुष लोक सत्य परवाना । ताका मरम कोई नहि जाना ॥
साखी-हो राजा भोपाल सुनु, चीन्हौं यमका जाल ॥
शब्द हमारा परखहु, नातो पैहो काल ॥
चौपाई
छोडहु राम नाम हित जाना । सद्गुरु बचन गहो मतिमाना ॥
अलख निरञ्जन छाडो देवा । भ्रम तजिकरु सतगुरुकी सेवा ॥
सुमता होय करो दृढ करनी । पहुँचो लोक पुरुषकी शरनी ॥
आवागमन रहित होय जाऊँ । जो प्राणी सत्यगुरु कहैं पाऊँ ॥
पुरुष अवाज जाव उबराई । ताते दर्शन दीन्ह तोहि भाई ॥
छन्द-करहु राजा भक्ति दृढ होय छोडु राजा गुमान रे ॥
नारि पुरुष पुत्र पुत्री लेहु हिलिमिलि पान रे ॥
पुरुष नाम ले करहु आरती जीव तृण तुराय के ॥
पुरुष अंक ले पाव वीरा काल गहे नहि आयके ॥
राजा भोपाल वचन चौपाई
तब राजा बन्दे दोनों पाई । करगहि महलन लैं जाई ॥
धन्य भाग मोहि दर्शन दीना । अधमजीव आपनकरि लीना ॥
कुटिल कठोर अधम अघपापी । दर्शन दीन छुटै त्रयतापी ॥
महामोह तम पुञ्ज अपारा । वचन तुम्हार कीन रविधारा ॥
उठो सुधर्मा मन चित लायी । साहब चरण पखारहु आयी ॥
छन्द-गुरु ब्रह्म रूप प्रकाश अघहर पुंज तमहिं विदारनं ॥
मुक्ति दाता अखिल ज्ञाता कोटरवि छवि वारणं ॥
सोई रूप धरि जगत प्रगट होय जिन दीन पतितन दुख हरे ॥
भवसिन्धु ताप बुझाय शीतल जीव गहि आपन करै ॥
रानीका सद्गुरुके अधीन होना
बोधसागर
( ९ )
सोरठा-निज मन सुकुर सुधार, गुरु पदपंकज उर धारिए ॥ मिटै सकल अँधियार, अस्थिर घर तब पाइए ॥
चोपाई
राजा आज्ञा रानी मानी । साहब चरण पखारे आनी ॥ कश्चन झारी ले जल धायी । साहब चरण पखारी आयी ॥ राजा रानी चरण धुवाये । अँचरन रानी तबहि पुछाये ॥ चरण हिये मन्थे पर लायी । चरणाभूत सबही मिलि पायी ॥ कीन्ह दण्डवत पलपल रानी । साहब दरस दीन्ह भल आनी ॥
रानी वचन
साखी-हमहिं जनि भार चढ़ावहु, हमरे नाम कबीर । अगम निगम वह पुरुष है, जे गहि लागो तीर ॥
रानी वचन-चोपाई
सुनिके रानी वचन पतियानी । तब साहब सों बिननी ठानी ॥ और पुरुष जानो नहिं नीका । तुम सतपुरुष आहु यहि जीका ॥ तुमहि पुरुष आहु दृढ़ जानी । और पुरुष नाहीं मन मानी ॥ रानी कहै सुनो महाराजा । साहिब आये तुमरे काजा ॥ रानी कहै बेगि गहु चरना । काल अजापी है निज मरना ॥ आये पुरुष हमारे पास । हमरे मनकी पूजी आसा ॥
रानी वचन
सुनहु राय रानी निज वचना । यह तो जाल कालकी रचना ॥ मेटहु काम कोध हंकारा । माया मोह तजौ संसारा ॥ ज्ञान हेतु दृढ़ करनी करई । आवागमन का पूग परई ॥ तजि संसार शब्द कहँ ध्याओ । गुरुगम पुरुष नाम चितलाओ ॥
साखी-ना फिर जन्मे जोइनि ना, स्वर्ग नर्क को जाय ॥ सो हंसा रहित भये, अजर अमर घर पाय ॥
( १० )
भोपालबोध
यह तो माया जाल है, कठिन बीर झतवाल ॥ जीव शब्द न मानई, यक दिन खेहे काल ॥ मोह नदी विकराल है, कोई न उतारे पार ॥ सतगुरु केवट साथ ले, हंस होय यम न्यार ॥
चौपाई
कोटि जुहार होत नित तोहीं । कैसे कै लौ लावहु मोहीं ॥ कैसे छोड़ो राज गुमाना । किमि छोड़ो पाखण्ड अभिमाना ॥ कैसे छाड़हु राज बड़ाई । कैसे छाड़हु सुख चतुराई ॥ बैठि सभा बोलहु हँसि बाता । कुँवर पचास संग निशि राता ॥ बैठि महल महाँ खेलहु सारी । कामिनि के संग सदा बहारी ॥ छुटे न नाति कुटुम्ब की आशा । छुटे न कश्चन भोग विलासा ॥ सारखी-यह सुख कैसे छोड़िहो, हम तो कथे निरास ॥ सैन चैन जब छोड़हु, चलहु पुरुषके पास ॥
राजा भोपाल वचन
कहै राय सुनिये गुरुदेवा । मोकहाँ राखु चरन की सेवा ॥ मस्तक मोर दीजिये हाथा । दम अघ करमी होयँ सनाथा ॥ छोड़ो सहस बीस मैं हाथी । अब मैं चलौं तुम्हारे साथी ॥ अब हम दौलत छोड़ैं तुर्गंगा । छोड़ों सकल कामिनी संगा ॥ देह गर्व औ राज गुमाना । छोड़ैँ सकल भक्ति मनमाना ॥ जब तुम अमृत वचन पुकारा । तेहि क्षण छूटा सकल विकारा ॥ छन्द-दया निधान करूणा विलोकहु महादारुण दुःख दहै ॥ मैं अधम जीव अघोर अकरमी पतित पावन पद गहै ॥ तुम ज्ञान घन विज्ञान आगर धर्म कंटक मर्दन ॥ तुव नाम अमोल समरथ करहु दया निर्धन ॥
राजाका आरती चौका करके नामका उपदेश लेना
बोधसागर
( ११ )
सोरठा-अविरल भक्ति तुम्हार, पूरे भागते पाइये । विनवों बारम्बार, पुरुष दरश करवावहू ॥
ज्ञानी वचन-चौपाई
नाम पदार्थ देउँ मैं तोहीं । तैं राजा चीन्हा दृढ मोहीं ॥ पुरुष नाम एक यज्ञ कराओं । जेहि नाम ते हंस बचाओं ॥ जरी केर एक चन्दोवा तानो । कञ्चन केर सिंहासन आनो ॥ दिवालगिरी लागे जरकेरा । मोतिन झालर लागु घनेरा ॥ मोतिन लै भर थार धराऊँ । तापर आरति जोति लसाऊँ ॥ कंचन कलसा पाँचो वाती । झारीजल हीर लै पाती ॥ पूंगी फल औ स्वेत मिठाई । चन्दन पान धरो तहैं लाई ॥ कदलीफल उत्तम तहैं जानो । मेवा अष्ट युक्त प्रमानो ॥ कदलीपत्र कपूर सुगन्धा । आमपत्र लै चहु दिशि बन्धा ॥ सात हाथ वस्तर ले स्वेता । पुष्प गुलाब कहौ मरु केता ॥ नौ रतन लै थार धरायी । मनि मानिकके मध्य रहायी ॥ यह सब विधि जब दीनबतायी । राजा सबही लीन सजारी ॥ चौका बैठे सतगुरु जबहीं । रानी गाय चरण गहे तबहीं ॥ सवा लाख दीपक तहैं बारी । बहु आनन्द शब्द विस्तारी ॥ सब मिलि हाथ नारियल लीन्हा । आगे धरा दण्डवत कीन्हा ॥ राजा तृण धरे मुख माँहीं । भये अधीन बांधि कर आहीं ॥
राजा भोपाल वचन
तुम दीननके आहु दयाला । कृपा कीन्ह मोहि प्रतिपाला ॥ अब जनि मोसन करहु दुराई । अपने कर लीजै सुकताई ॥ यहि संसार नाहिं मम काजा । दारुण महा काल है राजा ॥ अब तुम आपन लोकदिखाओ । महा पुरुष के दर्श कराओ ॥
राजाको लेकर कबीर साहबका सत्यलोक को जाना
( १२ )
शोपालबोध
सत्गुरु वचन
नौ नारी मिलि विन्ती करई । कुवर पचास ठाढ़ तहँ रहई ॥ बेटी एक सुरजकी जोती । ताहि लिलार पुहे जनु मोती ॥ साहब चरण धरा तिन आई । अब हम चरणछोड़ि नहिं जायी ॥ कीन्ह आरती नरयर मोरा । सकल जीवके तिनुका तोरा ॥ सुकृत अंश बुलाये ज्ञानी । पुरुष दरश कर राजा आनी ॥ लै अमरावहु लोक द्वारा । पल महाँ लाय ठाढ़ बैठारा ॥ दिना चार लगी राख्यो काया । वेगी जाय पुरुष पहाँ आया ॥ लिखिलिखिपान सबन कहँदीना । सकलो जीव वन्दन कीना ॥ जेते जीव परवाना पावा । तेते हंसा लोक सिधावा ॥ काया छोड़ि हंस चले आगे । सत्य सुकृत के चरनन लागे ॥ लागी डोर पुरुषके पास । तवै दूत यक कियो तमाशा ॥ सुकृत संग हंस सब जेते । आये दूत कला धरि तेते ॥ छाप तिलक तब विरचि बनायी । मारगमाँहि ठाढ़ भय आयी ॥ आओ हंस पुरुषके पास । नातो होवै ठाट विनाशा ॥ बोले दूत हंस कहँ जायी । हम गुरुज्ञानी तोंहि सहायी ॥ हमरे संग चलो हो राजा । हमरे शरण काल उठि भाजा ॥ हंस रूप तुम धरि बटपारा । हम नहिं फन्दा परै तुम्हारा ॥ सुकृत कहै हंस चलि आज । हमरे संग काल नहिं पाऊ ॥ बाएँ अंग कालका धारा । दहिने पाँजी अहै हमारा ॥ ताहि द्वार होय सुरति लगाओ । बेगि दरश पुरुषके पाओ ॥ सुकृत सागर पहुँचे जायी । अहो हंस तुम लेहु नहायी ॥ सकल हंस मिलि पैठि नहावा । निरखै द्रौप द्रौपका भावा ॥
बोधसागर
( १३ )
देखहिं लोक लोककी रचना । तब टेके सुकृतके चरना ॥ बैठे लोकमहँ हंस निहारा । जहँवाँ पुरुष आप विस्तारा ॥ सकल हंस तहँ बैठे पांती । सोरह रवि हंसनकी कांती ॥ पुहुप सेज सब हंस विराजा । तहँवाँ बुझाय नहिं रंक औ राजा ॥ कंचन भूमि देख अति शोभा । बरनौ कहा हंस तहँ लोभा ॥ राजा कीन्ह दण्डवत जबहीं । रानी पुत्र कीन्ह पुनि तवहीं ॥ अब नहिं भवमहँ जाऊ लिवायी । अति आनन्द बहुत सुखपायी ॥
सुकृत बचन
सुकृत उत्तर कहै समझायी । चलू राय गहिर जनि लायी ॥ जो तुम गहर लगावहु राजा । विनशे ठाट तब होय अकाजा ॥ तब पछतैहो राय भुपाला । ततक्षण बेगि चलो यहि हाला ॥
राजा भोपाल बचन
विनशे ठाट होय जरि छारा । अब नहिं छोड़ब चरण तुम्हारा ॥ ऐसा लोक छोड़ि नहिं जायब । बार बार तुहि माथ नवायब ॥ छन्द-राजा करै बहु बीन्ती तुम दीन बन्धु दयाल हौ ॥ हंसन नायक परम लायक काटिया फन्दा काल हौ ॥ चरण शरण आधीन समरथ शरण राखो आपनो ॥ दास जानि बन्ध छोरो काल तेहि नहिं पावनो ॥
सोरठा-अब हम शरण तुम्हार, दास जानि दाया करो ॥ आयो पुरुष दरबार, आपन कै प्रतिपालिये ॥
बचन-चौपाई
एती विन्ती राजा ठानी । ज्ञानी देश जलन्धर जानी ॥ भवसागर सो ज्ञानी आये । पुरुष दरश कीन्हा तब जाये ॥ दिना चार ऐसेहि चलि गयऊ । राजा खबरि कोई नहिं दयऊ ॥
( १४ )
भोपालबोध
तबै पौरिया रावपहँ जायी । महल देखि कोइ नाहिँ रहायी ॥ कहँवा राजा कहँवा रानी । कहँवा पुत्र कुवँर रजधानी ॥ कहँवा बेटी है चन्द्रावति । ताकर रूप बरनो कौनी गति ॥ कहँवा रानी कामसुंगगा । परिमल अंग बसत जेहि संगगा ॥ रोवत गयउ पौरिया द्वारा । जाय सबन सों कीन्ह पुकारा ॥ जाति कुटुम्ब सब देखन आये । जिन राजा ते बहु सुख पाये ॥
साखी-देखत अमिहत राजाकी, भयी अचम्भो बात ॥
रोवत कुटुम्ब दीवान मिलि, किन यह कीन निपात ॥
नगर लोग व्याकुल भये, घरघर रोवन लाग ॥
की यहि राजा मारिया, सबहिन केर अभाग ॥
चौपाई
कहै पौरिया सुनो दिवाना । तुम हम बूझो हम सब जाना ॥ जिन्दा एक नगरमें आया । तासों राजा कौन ऊँकाया ॥ कह्यो राय मैं बहुत चिताई । तुरतहिँ जिन्दा कहँ मरवायी ॥ राजा बात नहीं पतियावा । वच सुनि राजा मोहि रिसावा ॥ राजा कहै मुक्तिकरदाता । अस नहिँ जाने करै निपाता ॥ मोर कहा माना नहिँ भाई । जस कीन्हा तस फल नित पाई ॥
साखी-वचन पौरिया सुनतही, विकल भये सब कोय ॥
आज गरासे राय कहँ, काल आसै लोय ॥
चौपाई
नगर लोग तब कीन्ह विचारा । सब मिलि भागौ करौ सम्हारा ॥
भूलि अन्य शब्द नहिँ चीन्हा । मारन काल तिहुँ पुर दीन्हा ॥
साखी-सुकृत अंश न पाइया, अन्धा गये भुलाय ॥
धन्य राम भोपाल है, गहे शब्द चित लाय ॥
मंत्रि आदिका राजाको महलमें न देखकर पश्चात्ताप और शोक करके भयसे नगर छोड़कर भाग जाना
बोधसागर
( १५ )
छन्द-गये राजा लोक कहैं तजिया सब मान गुमान हो ॥ इमि हंस धर्मनि जो मिले तुम देहु ताको पान हो ॥ कहै कबीर जो शब्द मानै सकल तजि नामे गहै ॥ अपवर्ग निश्चय ताहि कहैं नहि पला पकडत काल है ॥ सोरठा-जो हंसा इमि होय, शब्द सार तासों कहो ॥ काग चाल तिन खोय, हंस चाल गहि लोक लो ॥
इति श्रीप्रबंधभोपालबोध समाप्त
इति श्रीबोधसागरे कबीरधर्मदाससम्वादे भोपालबोधवर्णनो नाम चतुर्थस्तरंगः
इति
श्रीबोधसागरान्तर्गत ग्रन्थभोपालबोध
समाप्त
भारतपथिक कबीरपंथी-
स्वामी श्रीगुगलानन्दद्वारा संशोधित
श्री-जगजीवनबोध
मुद्रक एवं प्रकाशकः
खेमराज श्रीकृष्णदासः,
अध्यक्ष : श्रीवेंकटेश्वर प्रेस,
खेमराज श्रीकृष्णदास मार्गः, बम्बई-४०० ००४
सर्वज्ञः सर्वशक्तिः
सर्वज्ञः सर्वशक्तिः
सर्वज्ञः सर्वशक्तिः
सर्वज्ञः सर्वशक्तिः
सर्वज्ञः सर्वशक्तिः
सर्वज्ञः सर्वशक्तिः
सर्वज्ञः सर्वशक्तिः
सत्यनाम
श्री कबीर साहिब
श्रीगणेशाय नमः
A faint, stylized illustration of Lord Ganesha seated on a lotus. He is depicted with four arms, holding a small object in his hands. Above him is a traditional umbrella (chhatra). The entire illustration is rendered in a light, monochromatic style, appearing as a watermark or a very faded print.
श्रीगणेशाय नमः
धर्मदास साहबका गर्भविषय प्रश्न और सद्गुरुका उत्तर
सत्यकबीराय नमः
सत्यं शुद्धं गुणातीतं कंजपर्णसमुद्भवम् । सर्वशास्त्रार्थतत्त्वज्ञं सद्गुरुं प्रणतोऽभ्यहम् ॥
अथ श्रीबोधसागरे
पंचमस्तत्रंगः
ग्रन्थ जगजीवन बोध
( गर्भ चिंतावनी )
धर्मदास वचन-चौपाई
धर्मदास कह सुनहु स्वामी । कहो गरभकी अन्तर्यामी ॥ कैसे जीव गरभ में आवे । कैसे जीव जठर दुख पावे ॥ कैसे जीव परवशै भयऊ । कैसे इन्द्री देह बनयऊ ॥ कैसे जीव अपने पद परसे । कैसे जीव समरथ पद परसे ॥ कैसे जीव कौल बँधावे । कैसे साहब दर्शन पावे ॥ सो सब भेद कहो गुरु ज्ञानी । घट भीतरका भेद बखानी ॥
सतगुरु-वचन
कहैं कबीर सुनो धर्मदासा । तुम घट भली बुद्धि परकासा ॥ प्रथमें सत्य नाम गुण गाऊँ । घट भीतर का भेद बताऊँ ॥ सबही जीव गर्भ में जावैं । कौल बान्ध कै बाहर धावैं ॥ चूके कौल गरभ का भाई । बारम्बार गरभ में जाई ॥ नौ नाथ सिद्धि चौरासी भारी । उनहुँ देह गरभमें धारी ॥
गर्भोत्पत्ति वर्णन
( २२ )
जगजीवनबोध
नौ अवतार विष्णु जो लीन्हा । उनहूँ गरभ वसेरा कीन्हा ॥ तेतिस कोटी देव कहाये । गरभ वास महाँ देह बनाये ॥ जोगी जंगम औ तप धारी । गर्भवास में देह सवारी ॥ गर्भ वास तब छूटे भाई । जब समरथ गुरु बाहँ गहाई ॥
गर्भोत्पत्ति वर्णन
नारि पुरुष बांधे संयोगा । कामबाण लगि देहसुख भोगा ॥ सप्त धातुका अंग बनाया । जिह्वा दांत सुख कान उपाया ॥ हाथ पावैं रु शीस निर्माया । सुन्दर रूप बनी बहु काया ॥ नख शिख काहू नर बहु कीन्हा । दशही द्वार युक्ति करि लीन्हा ॥ दश द्वार नौ नाडि बनायी । ऐसे सबतर बन्ध लगायी ॥ दीन्हा ठेक बहतर भारी । नाडी बन्धन बहुत अपारी ॥ नाद विन्दुसों काथ निरमायी । तामैं प्रकृती आन समायी ॥ हृद कारिगर हुन्नर कीन्हा । जैसे दूधमें जामन दीन्हा ॥ तीनसों साठ चार बन्ध लायी । सोलह खाईं तहां बनायी ॥ सोलह खाईं चौदह दर्वाजा । अठहूँ हाथ गढ़ खूब विराजा ॥ छाजे महल अधिकही छाजा । तामैं जीव जो आनि विराजा ॥ अजब महल बहु खूब बनाया । छठे महल हंस चितवन लाया ॥ छठे मांस में सुरती आयी । दुख सुखकी तब पारख पायी ॥ छै मासको भयो जब प्रानी । दुख सुखकी मति सबै पहिचानी ॥ ओंघे सुख झूले लटकंता । मैल बहुत तहाँ कीच रहता ॥ जठर अग्नि तहाँ बहुत सतावै । संकट गर्भ तहाँ अन्त न आवै ॥ बहुत सांकीरी पिंजार पोई । तडफटै बहुत निकसे नहिं जोई ॥ सुखसों बोल निकसि नहिं आवै । करुना करि मन में पछितावै ॥ अरुझे श्वास रोवै मन माहीं । कौन करमगति लागी आहीं ॥ करुणा करि मन में पछितावै । ज्यों करीब कंठ करद बैठावै ॥
जगजीवनका गर्भके कष्टसे व्याकुल होकर साहबकी स्तुति और कौल करना
बोधसागर
( २३ )
ता दुःखकी गति कासु कहीजै । करम उनमानतहैं दुःख सहीजै॥ यदि आलोच करै मनमाही । संगी मित्र कोइ दीखत नाही ॥ पिछला जनम जब सूझा भाई । तब जिव दिलमा चिता आई ॥ स्त्री मित्र कुटुम्ब परिवारा । सुत नाती औ सैन पियारा ॥ संगी सुजन बन्धु औ भाई । गरभ कि चीन्ह परी नहिं ताई ॥ महा दुःख सो गरभ में पावे । बहुत वैराग हियामें आवे ॥ सूझी सकल बाहरकी बाती । जो जिव पिछली होती जाती ॥ जब जिव गरभमें ज्ञान विचारा । अब मैं सुमरूं सिरजन हारा ॥ सोच मोह जिव कछू न कीजै । अब सदगुरु का शरणा लीजै ॥ जिव अपने दिल माहि विचारे । तब समरथ को कीन पुकारे ॥ सुनु धर्मदास यक कथा सुनाऊँ । यक राजाको जस बने बनाऊँ ॥ राय जगजीवन ताहिकर नामा । जब वह पहुँच्यो एही ठामा ॥ करन विन्ती लागु अधीरू । सतगुरु कहैं तब कीन्ही टेरू ॥
जगजीवन वचन
साहिब संकट दूर निवारो । मैं निज खानाजाद तुम्हारो ॥ दिल मैं करूणा करै अतिभारी । अब मोहि साहब लेहु उबारी ॥ करै अस्तुति बहुते सुधिलावै । तुम वितु खाविन्द कौन छुडावै ॥ अब दुःख दूर निवारो स्वामी । कौल कहूँ प्रभु अन्तरयामी ॥ बाहर निकारो आदि सनेही । बहु दुःख पावै मेरी देही ॥ मैं जन प्रभुको दास कहाऊँ । आन देव के निकट न जाऊँ ॥ सतगुरुका होय रहों चेरा । दम दम नाम उचारूँ तेरा ॥ नित उठि गुरु चरणामृत लेऊँ । तन मन धने निछावर देऊँ ॥ जो मैं तन सों कहूँ कमाई । अर्थमाल मैं गुरुहि चढाई ॥ कुबुद्धि सीख काहु नहिं मानूं । हराम माल जहर करिजानूं ॥ कुलकी त्यागूं मान बढाई । निर्मल ज्ञान एक संत सगाई ॥
( २४ )
जगजीवनबोध
रात दिवस ऐसे लव लाऊँ । करत फुरत भक्ति गुरु कराऊँ ॥ दुःख सुख परे सो तनसे सहूँ । भक्ति दृढ़े गुरु चरणै रहूँ ॥ परत्रिया ताकूँ नहिं कोई । जननी बहन करि देखूँ सोई ॥ दुष्ट बैन कबहुँ नहिं खोलूँ । शीतल बैन सदा सुख बोलूँ ॥ स्वास उस्वासमों रटना लाऊँ । आन उपाय एको नहिं चाऊँ ॥ तन मन धन निछावर देखूँ । सतगुरु का चरणामृत लेऊँ ॥ सतगुरु कहैं सोई अब करिहौँ । आज्ञा लोप पाओं नहिं धरिहौँ ॥ और सकल बैरी कर जानूँ । सद्गुरु कहैं मित्र कर मानूँ ॥ ज्ञान बतावै सोई गुरुदाता । तन मन धन अरपूँ उन ताता ॥ तन मन धन मैं उनको देखूँ । नित उठि गुरुचरणामृत लेऊँ ॥ यहि गर्भवासमें कौल बधाऊँ । बाहर निकारो धुर निबाऊँ ॥ जो मैं छूटूँ गरभ सबेही । तन मन अरपूँ औ गुरु देही ॥ एक नाम सांचा कर मानूँ । और सबै मिथ्या कर जानूँ ॥ कहा अस्तुति करें गुसाई । बहुत दुःख पावत हूँ या ठाई ॥ यहां कोई मित्र नहिं भाई । मातु पिता नहिं लोग लुगाई ॥ देवी देवका कछु न चालै । गुरु विन कौन करै प्रतिपालै ॥ अब तो खबर परी यहि ठाहीं । और कोईका चालै नाहीं ॥ पिछली बात मैं हृदय जानी । कोई काहूँका नहीं रे प्राणी ॥ अपने साथ चलेगा सोई । जो कछु सुकृत करे सो होई ॥ मद माया में जीव भरमाया । सो तो कोई काम न आया ॥ बहुत विचार किया मैं सोई । अन्तकाल अपनो नहिं कोई ॥ ऐसी करुणा करै विचारा । दया करो दुःख भंजन हारा ॥
साहिब वचन
तब साहिब यों कहै पुकारा । कहि समझाया तोहि बारम्बारा ॥ अनेक बार गरभमें आया । तैं रतीकर्म भरम नहिं पाया ॥
साहबका दया करके जगजीवनसे कौल लेकर गर्भसे मुक्त करना
बोधसागर
( २५ )
कई बेर तैं कौल बँधावा । कई बार तैं गर्भ में आवा ॥ गर्भ में ज्ञान उपजा है तोही । संकटमें सुमिरे सब कोही ॥ बाहर निकसि नहिं उपजे ज्ञाना । अंधकार अहंकार समाना ॥ बार अनेक भुलाना भाई । नहिं सतगुरु की दीक्षा पाई ॥ गरभ त्रास तब छूटै भाई । जब सतगुरु कहैं बाँह समार्ई ॥
जगजीवन वचन
बोलत वचन कहो गुरु देवा । जीवकी अवधि बताओ भेवा ॥ दीन दयाल दया गुरु कीजै । बूडत जीव आपन करि लीजै ॥ दयावंत गुरु दीन दयाला । मुक्तिरूप जीवन प्रतिपाला ॥ मोको अभय दान गुरु दीजै । अन्दर ज्ञान उजालो कीजै ॥
सतगुरु वचन
गरभ बासमें कौल बन्धावा । सो कैसे तैं न बाहर निर्वावा ॥ बडु संकट तोहि उपजे ज्ञाना । बाहर निकसत सब विसराना ॥ जोई जीव कौल निर्वाहै । सोई नहिं गरभवास मईं आहै ॥
जगजीवन वचन
अब नाहीं भूलें गुरु देवा । तन मन लाय कहूं गुरु सेवा ॥ मोकैं बाहिर काढो स्वामी । कौल न चूकैं अन्तर्यामी ॥
सतगुरु वचन
कौल बोल सब चौकस कीना । तबहीं गर्भ सों बाहर लीना ॥ नौवे मास जो बाहर आया । लोग कुटुम्ब सबही सुख पाया ॥ सबही हरष करें मन माई । पुत्र हेतु सब करें बधाई ॥ बाजा बाजे करै उछावा । गीत नाद आधिके चितआवा ॥ सबै सजन मिलि गूड़ बँटावा । रैन समय तिय मंगल गावा ॥ नगरलोक सब करें बधाई । घर घर साजे देह लुगाई ॥ घर राजाके जनम सो पढ़या । कौल किया सो सब विसरैया ॥ पीसुन मिले सबहिं धुतारा । सबहीं ज्ञान भुलावन हारा ॥