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कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)

महाकवि सोमदेव भट्ट द्वारा

स्रोत: कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1960 (उद्गम)

DevanagariHindipublished876 पृष्ठ

में १८ लम्बक हैं और उनके नाम भी सोमदेव के लम्बकों से मिलते हैं।

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रामायण और महाभारत का संक्षेप भी रामायणमंजरी और भारतमंजरी नामक ग्रंथों में किया। उनका अवदानकल्पलता ग्रंथ भी प्रसिद्ध है। कला-विलास देशोपदेश नर्ममाला और समय मातृका ग्रंथों में क्षेमेन्द्र की प्रतिभा का उत्कृष्ट रूप प्राप्त होता है। क्षेमेन्द्र-कृत बृहत्कथामंजरी में १८ लम्बक हैं और उनके नाम भी सोमदेव के लम्बकों से मिलते हैं। बृहत्कथा की अंतिम वाचना सोमदेव-कृत कथासरित्सागर है। सोमदेव ने अपनी प्रारंभिक प्रतिज्ञा में कहा है— 'मेरे सामने जैसा मूल था वैसा ही मैंने यह ग्रंथ रचा है। तनिक-सा फेर-फार भी नहीं किया। हाँ केवल औचित्य और एक दूसरे के साथ अन्वय या जोड़ मिलाने का ध्यान यथाशक्ति रक्खा गया है। इसमें काव्य का अंश मैंने इतना ही जोड़ा है जिससे कहानी के रस का विघात न हो। पांडित्य के यश के लोभ से मेरा यह प्रयत्न नहीं है। मेरा उद्देश्य यह है कि अनेक कथाओं का समूह सरलता से स्मृति में रक्खा जा सके।' कथा की उत्पत्ति के संबंध में सोमदेव ने लिखा है—'एक बार शिव ने पार्वती से सात विद्याधर चक्रवर्तियों की आश्चर्यमयी कथाओं का वर्णन किया। यद्यपि शिव की वार्ता एकान्त में हुई थी किन्तु उनके अनुचर पुष्पदन्त ने वे कहानियां सुन लीं और अपनी पत्नी जया को उन्हें सुना दिया। जया ने उन कहानियों को अपनी सहेलियों से कहा। जब यह बात पार्वतीजी के कान में पड़ी तो उन्होंने रुष्ट होकर पुष्पदन्त को मर्त्यलोक में जन्म लेने का शाप दिया। पुष्पदन्त के भाई माल्यवान् ने उसकी ओर से क्षमायाचना की तो उसे भी वैसा ही दंड मिला। पुष्पदन्त की पत्नी जया पार्वतीजी की परिचारिका थी। जब पार्वतीजी ने अपनी सखी को शोक से दुःखी देखा तो उन्हें करुणा आ गई और उन्होंने अपने शाप का परिहार करते हुए कहा कि पुष्पदन्त का विन्ध्य पर्वत में काणभूति नामक एक पिशाच से मिलना होगा। उसे अपने पूर्व जन्मों की स्मृति बनी रहेगी और जब वह काणभूति को ये कथाए सुनायेगा तब उसकी शाप-मुक्ति होगी। माल्यवान् भी जब काणभूति से इन बृहत्कथाओं को सुनकर लोक में इनका प्रचार कर चुकेगा तब वह पुनः स्वर्ग में लौट आएगा। इस विधान के अनुसार पुष्पदन्त ने कौशाम्बी में वररुचि-कात्यायन के रूप में जन्म लिया और वह महान् वैयाकरण एवं नन्द-वंश के अंतिम राजा योगानन्द का मंत्री हुआ। अंत में वह वनवासी हो गया और विन्ध्याचल की विन्ध्यवासिनी देवी की यात्रा में काणभूति से उसकी भेंट हुई। तब उसे अपने पूर्व जन्म की स्मृति हुई और उसने काणभूति को वे सात


१ यथामूलं तथैवैतन्न मनागप्यतिक्रमः। ग्रन्थविस्तरसंक्षेपमात्रं भाषा च भिद्यते॥ औचित्यान्वयरक्षा च यथाशक्ति विधीयते। कथारसाविघातेन काव्यांशस्य च योजना॥ वैदग्ध्यख्यातिलोभाय मम नैवायमुद्यमः। किन्तु नाना कथाजालस्मृतिसौकर्यसिद्धये॥ कथासरित्सागर १।१०-१२।

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बृहत्कथाएं सुनाई। इतना करने के बाद वह शापमुक्त होकर स्वर्ग चला गया। उसके भाई माल्य- वान् ने भी मृत्युलोक में प्रतिष्ठान पुरी में गुणाढ्य के रूप में जन्म लिया और वह वहाँ के राजा सातवाहन का मंत्री बना। गुणदेव और नन्दिदेव उसके दो शिष्य थे। उन्हें लेकर वह काणभूति के पास आया। वहाँ काणभूति से उसे पिशाच भाषा में सात बृहत्कथाएं प्राप्त हुईं और उसने प्रत्येक को एक-एक लाख श्लोकों में अपने रक्त से लिखा। अपने शिष्यों की सलाह से उसने उन्हें राज सातवाहन के पास इस विचार से भेजा कि राजा उनकी रक्षा करेगा। पर पिशाचों की भाषा में लिखी हुई कहानियों को राजा ने पसन्द नहीं किया। इस समाचार से गुणाढ्य को बहुत दुःख हुआ और उसने अपनी छः कहानियां जला डालीं। अपने शिष्यों का अनुरोध मानकर केवल सातवीं कहानी बची रहने दी। उस कथा को सुनकर जंगल के जीव भी मोहित हो गए। जब राजा सातवाहन को यह ज्ञात हुआ तब उसे पश्चात्ताप हुआ और उसने गुणाढ्य के स्थान पर जाकर बचे हुए कथाभाग को उससे ले लिया। उसने गुणदेव और नन्दिदेव की सहायता से उसका अध्ययन किया और कथा की उत्पत्ति का वर्णन करनेवाला अंश स्वयं उसमें जोड़ा।¹

नेपाल-माहात्म्य (अध्याय २७-२९) में इस कहानी का रूप थोड़ा भिन्न है। आरंभ में शिव-पार्वती के संवाद का उल्लेख है। पार्वती ने शिव से नई कहानी सुनाने की प्रार्थना की। शिव एकान्त में सब द्वार बन्द करके सुनाने लगे। पर उनके भुङ्गी नामक गण ने भौरे का रूप रखकर और भीतर जाकर वे कहानियां सुन लीं और अपनी पत्नी विजया को उन्हें सुना दिया। किसी दिन जब पार्वती ने कहानियां अपनी सखियों को सुनाने लगीं तो विजया को वे पहले से ज्ञात थीं। पार्वती ने यह जानना चाहा कि किसने यह अपराध किया था। शिव ने ध्यान धरकर देखा और भुङ्गी को शाप दिया। भुङ्गी ने क्षमा-याचना की। तब शिव ने क्षमा करते हुए कहा—इसे मर्त्यलोक में जन्म लेना होगा और सुनी हुई कथाओं को नौ लाख श्लोकों में लिखना होगा। फिर उसे एक लिंग की प्रतिष्ठा करनी होगी और तब वह कैलास को लौटने का अधिकारी होगा। इस उल्लेख से भी ज्ञात होता है कि बृहत्कथा मूल में एक शृंगार-कथा थी। पर नेपाल-माहात्म्य के इस उल्लेख में कथा का सुननेवाला भुङ्गी नामक गण था। भुङ्गी ने गुणाढ्य के रूप में मथुरा में जन्म लिया। वह बचपन में अनाथ हो गया और तब उज्जयिनी चला आया। उज्जयिनी में मदन नामक राजा राज्य करते थे उनकी रानी लीलावती गौड़देश के राजा की पुत्री थी। उज्जयिनी में सर्ववर्मन् नाम के महान् पण्डित राजसभा में थे। वे गुणाढ्य की प्रतिभा से प्रभावित हुए और उन्होंने उसे भी राजा की सभा का सदस्य बनवा दिया। एक दिन राजा अपनी रानियों के साथ जल-विहार कर रहा था। तब उसने 'मोदक' शब्द का अशुद्ध प्रयोग किया। गुणाढ्य ने १२ वर्ष में उसे व्याकरण की शिक्षा देने की बात कही। पर सर्ववर्मन ने केवल दो ही वर्षों में उसे व्याकरण में पण्डित बना देने को कहा। गुणाढ्य और सर्ववर्मन में इसके लिए स्पर्द्धा हुई, और सर्ववर्मन ने कलाप-व्याकरण की रचना करके दो ही वर्षों में राजा को व्याकरण का ज्ञान करा दिया। गुणाढ्य


१ कृष्णमाचार्य संस्कृत-साहित्य का इतिहास पृष्ठ ४१४-४१५।

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को संस्कृत-भाषा में न बोलने का आदेश हुआ। वह एक ऋषि के आश्रम में जाकर रहने लगा। वहाँ उसे पुलस्त्य ऋषि ने पैशाची भाषा में अपनी कथाएँ लिख डालने का परामर्श दिया और यह भी कहा कि ग्रंथ-समाप्ति के बाद वह नेपाल में शिवलिंग की स्थापना करके शाप-विमुक्त होकर मर्त्य-योनि से छूटेगा। गुणाढ्य गेरू से पेड़ की पत्तियों पर कथा लिखने लगा। वह उन्हें उच्चस्वर में पढ़ता जाता था जिसे सुनकर जंगल के पशु-पक्षी मोहित हो गए। यह बात राजा ने सुनी और जंगल में जाकर सब कुछ अपनी आँखों से देखा। उसने गुणाढ्य से सभा में लौट जाने का अनुरोध किया पर गुणाढ्य ने उसे स्वीकार न किया और कहा—'मैंने सौ लाख श्लोकों में पैशाची भाषा में इस कथा की रचना की है। आप इसकी रचना संस्कृत में कराएँ। मैं तो अब नेपाल जाऊँगा। तब उसने नेपाल जाकर पशुपतिनाथ शिव के दर्शन किए। वहीं रहनेवाले मुनियों को एकत्र करके उसने भृङ्गीश्वर शिव की स्थापना की और वहाँ से वह कैलाश चला गया। कथासरित्सागर के आरंभ में सोमदेव ने उसके स्वरूप और वर्ण्य विषयों का अच्छा परिचय दिया है। मैं बृहत्कथा के सार का संग्रह कर रहा हूँ। इसमें पहला लम्बक कथापीठ है। उसके बाद दूसरा कथामुख है। तीसरे लम्बक का नाम लावानक है। चौथे लम्बक में नरवाहनदत्त का जन्म है। उसके बाद पाँचवें लम्बक का नाम चतुर्दारिका है। छठा लम्बक मदनमंचुका और सातवाँ रत्न प्रभा नाम का है। आठवें लम्बक का नाम सूर्यप्रभा है। नवाँ अलंकारवती लम्बक है। दसवाँ शक्तियशस् लम्बक और ग्यारहवाँ वेला लम्बक है। बारहवाँ शशांकवती और तेरहवाँ मदिरा वती लम्बक है। उसके बाद पंच नामक चौदहवाँ लम्बक और पन्द्रहवाँ महाभिषेक लम्बक है। उसके बाद १६वाँ सुरतमंजरी लम्बक सत्रहवाँ पद्मावती लम्बक और अट्ठारहवाँ विषमशील लम्बक है। कथाओं को कहने की दृष्टि से सोमदेव का अपना पद है। उसकी प्रवाहमयी शैली की रोचकता को दूसरा कोई नहीं पहुँच पाता। सी एच टॉनी (C. H. Tawney) कृत कथासरित्सागर के अंग्रेजी-अनुवाद की भूमिका में पेंजर ने सोमदेव के ग्रंथ की प्रशंसा में लिखा है— 'जब हम इस ग्रंथ को देखते हैं तब इसमें आई हुई हर प्रकार की कथाओं को देखकर मन आश्चर्य से भर जाता है। ईसवी-सन् से सैकड़ों वर्ष पहले की जीवजन्तु-कथाएं इसमें हैं। द्य लोक और पृथ्वी के निर्माण-संबंधी ऋग्वेदकालीन कथाएं भी यहाँ हैं। उसी प्रकार रक्तपान करने वाले बेतालों की कहानियां सुन्दर काव्यमयी प्रेम-कहानियां और देवता मनुष्य एवं असुरों के युद्ध की कहानियां भी इस संग्रह में हैं। यह न भूलना चाहिए कि भारतवर्ष कथा-साहित्य की सच्ची भूमि है जो इस विषय में ईरान और अरब से बढ़ चढ़कर है। भारत के इतिहास की कथा भी तो उसी प्रकार की एक कहानी है। इसका अतिशयोक्तिपूर्ण रूप इन आख्यानों से कम रोचक नहीं है। 'इन कहानियों का संग्रह करनेवाला लेखक सोमदेव विलक्षण प्रतिभाशाली पुरुष था।

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कवियों में उसकी प्रतिभा कालिदास से दूसरे स्थान पर आती है। स्पष्ट रोचक और मन को खींच लेनेवाले ढंग से कहानी कहने की उसमें वैसी ही अद्भुत शक्ति थी जैसी कहानियों के विषयों की व्यापकता और विविधता है। मानवी प्रकृति का परिचय भाषा-शैली की सरलता वर्णन का सौन्दर्य और शक्ति एवं चातुर्य-भरी उक्तियां इन सब की रचना अत्यन्त प्रभावपूर्ण है। दूसरी ओर जैसा कि प्रायः पूर्वी (विशेषतः भारतीय) कहानियों में मिलता है यहाँ एक विशेषता यह भी है कि नई-नई कहानियां पहली कहानियों के पेटे में समाई हुई हैं और आश्चर्य जनक वेग से एक के बाद दूसरी कहानी उभरती हुई सामने आती चली जाती है। तब पाठक अभिलाषा करता है कि कोई सूत्र सहायक बनकर उसे कथाओं के इस भूल-भुलैये से उसका उद्धार करे। इस संस्करण के सम्पादक ने इस प्रकार का एक सहायक सूत्र सावधानी के साथ तैयार किया है और कहानियों पर संख्याओं के अंक डाल दिए गए हैं। "कथासरित्सागर अलिफ लैला की कहानियों से प्राचीनतर ग्रंथ है और अलिफ लैला की अनेक कहानियों के मूल रूप इसमें हैं। इसके द्वारा न केवल ईरानी और तुर्की लेखकों को बल्कि बोकेशिओ चौसर एवं लां फौतिन एवं अन्य अनेक लेखकों के द्वारा पश्चिमी संसार को भी अनेक कल्पनाएं प्राप्त हुई हैं। सोमदेव ने सोचा कि जैसे हिमालय से आई हुई अनेक धाराएं आगे-पीछे बहती हुई समुद्र में ही पहुँच जाती हैं वैसे ही छोटी-बड़ी सभी कहानियां उनके इस महान् ग्रंथ में इकट्ठी हो जायें और वह सच्चे अर्थ में कहानी-रूपी नदियों का सागर बन जाय। कथासरित्सागर के रूप में कल्पना ने एक ऐसे महान् कथा-सागर की सृष्टि की है कि उसमें अद्भुत कन्याओं और उनके साहसी प्रेमियों राजाओं और नगरों राजतन्त्र एवं षड्यन्त्र जादू और टोने छल और कपट हत्या और युद्ध रक्तपायी बेताल पिशाच यक्ष और प्रेत पशु-पक्षियों की सच्ची और गढ़ी हुई कहानियां एवं भिखमंगि साधु, विदग्धक जुआरी वेश्या विट और कुट्टनी इन सभी की कहानियां एकत्र हो गई हैं। ऐसा यह कथासरित्सागर भारतीय कल्पना जगत् का दर्पण है जिसे सोमदेव भविष्य की पीढ़ियों के लिए छोड़ गए हैं।" कथासरित्सागर की वर्तमान संघटना और लम्बकों के क्रम की तात्विक आलोचना करते हुए श्रीकीय ने जो लिखा है वह भी ध्यान देने योग्य है— "कथासरित्सागर में मूल ग्रंथ के कथा-क्रम में परिवर्तन किया गया है और इस परिवर्तन का अभिप्राय कथा के रस की रक्षा करना है। यह बात ग्रंथ के क्रम की वस्तु-स्थिति के बिलकुल अनुकूल है। पहले पाँच लम्बकों में कोई परिवर्तन नहीं है। शेष लम्बकों में सोमदेव पर काव्य के प्रभाव की रक्षा करने की अभिलाषा की प्रधानता थी। स्पष्टतया इसी कारण ने सोमदेव को पंच और महाभिषेक नामक लम्बकों के मध्य की खाई को दूर करने के लिए विवश किया। उनके ग्रंथ में उक्त दोनों लम्बकों का संक्रमण निर्दोष है। पंच नामक लम्बक का अन्त राजकुमार के इस निर्णय से होता है कि उसे एक भावी सम्राट् के राज्याभिषेक के लिए आवश्यक रत्नों को प्राप्त करना है। अगले लम्बक में यह प्रस्ताव आगे बढ़ता है। यह कुछ ऐसे आकस्मिक ढंग से होता है जिसे सोमदेव बिलकुल मिटा नहीं सके हैं। परन्तु इससे सोमदेव रसमग्ना सर्वव्यापकी और

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शक्तियशस् नामक तीन लम्बकों को यथास्थान रख सके। साथ ही इससे काव्य के प्रारम्भिक भाग में इस दृष्टि से कि वह अत्यधिक भारी न हो जाये पूर्णतः आमूल परिवर्तन भी स्पष्टतः आवश्यक हो गया। इसके लिए जिस समाधान का आश्रय लिया गया वह इन तीन लम्बकों को जिनका संबंध राजकुमार के सम्राट् होने से पहले के वृत्तान्तों से है पञ्च नामक लम्बक के प्रथम रखने में तथा पद्मावती और विषमशील नामक दो लम्बकों को जिनका संबंध नायक से न होकर केवल उन कथाओं से था जो उसको सुनाई गई थीं और इसी कारण जिनको औचित्य के साथ एक परिशिष्ट के रूप में रखा जा सकता था ग्रन्थ के प्रारम्भिक विषय से हटा देने में था। पञ्च नामक लम्बक के पहले आनेवाले विषय का क्रम कलापूर्ण ढंग से रक्खा गया है क्योंकि उसमें मुख्यतया प्रासंगिक उपकथाओं से संबंध रखनेवाले लम्बकों को नायक के आकस्मिक होते हुए भी महत्त्वयुक्त कार्यों को देनेवाले लम्बकों के बीच-बीच में रखने का प्रयत्न किया गया है। जैसा कि पाँचवें लम्बक के अनन्तर जिसका संबंध प्रासंगिक कथाओं से है मदनमंचुका (६) नामक महत्त्व का लम्बक दिया गया है। इसके अनन्तर रत्नप्रभा (७) है। अलंकारवती (९) से पहले आनेवाला लम्बक 'सूर्यप्रभ' (८) मूर्त्त केवल उपकथाओं से सम्बन्ध रखता है। आकस्मिक कथाओं से सम्बद्ध शक्तियशस् (१०) सहज ही अलंकारवती के अनन्तर आता है। तदनन्तर वेला (११) शशांकवती (१२) मदिरावती (१३) और पूर्णतः महत्त्वयुक्त पंच तथा महाभिषेक (१४ और १५) आते हैं। तदनन्तर, परिशिष्ट रूप में सुरतमंजरी पद्मावती और विषमशील (१६ १८) दिए हुए हैं। एक लम्बक के वास्तविक विषय में एक परिवर्तन आवश्यक था। क्षेमेन्द्र में और संभवतः मूल ग्रन्थ में भी वेला का संबंध केवल प्रासंगिक उपकथाओं से ही नहीं था उसके अंत में मदनमंचुका के तिरोहित होने का आवश्यक अंश सम्मिलित था। उसी के आधार पर हम अगले लम्बकों में सूचित राजा के शोक को समझ सकते हैं। परन्तु, इस प्रकार का वर्णन रत्नप्रभा अलंकारवती और शक्तियशस् इन लम्बकों के संबंध में सोमदेव की योजना से मेल नहीं खाता था इसी कारण उक्त आवश्यक अंश को हटा देना पड़ा तो भी सोमदेव के लिए अपने क्रम में पंच से पहले के लम्बकों में मदनमंचुका के पहले से ही तिरोहित हो जाने के यत्र-तत्र चिन्हों को हटा देना संभव नहीं था। ¹

जैसा कीथ ने लिखा है कि प्रयत्न करने पर भी सोमदेव एक सुसंघटित ग्रंथ की रचना में सफल नहीं हुए, परन्तु कथासरित्सागर के उत्कर्ष का आधार उसके वस्तु की संघटना पर नहीं है। उसका आधार इस ठोस वस्तुस्थिति पर है कि सोमदेव ने सरस और अकृत्रिम रहते हुए आकर्षक और सुन्दर रूप में ऐसी कथाओं की बड़ी भारी संख्या को प्रस्तुत किया है जो नितान्त विभिन्न रूपों में—मनोविनोदकारक अथवा भयानक अथवा प्रेम-संबंधी अथवा कष्ट और त्रास के अद्भुत दृश्यों के प्रति हममें अनुराग उत्पन्न करने के लिए आश्चर्यजनक अथवा हास्योत्पादक थी


१ कीथ, संस्कृत-साहित्य का इतिहास श्रीमन्मङ्गलदेव शास्त्री कृत हिन्दी-अनुवाद पृ ३१४-३१५।

यहाँ पृष्ठ का लिप्यंतरण प्रस्तुत है:

परिचित कहानियों का सादृश्य उपस्थित करनेवाले रूपों में—हमारे लिए अत्यंत रुचिकर हैं। क्षेमेन्द्र में कहीं अत्यधिक संक्षेप और कहीं अस्पष्टता के कारण कहानियों का सारा आकर्षण और रोचकता ही नष्ट हो जाती है। ठीक इसके विपरीत पंचतंत्र के लेखक की तरह सोमदेव प्रतिभा के धनी हैं। वे पाठक के मन को थकाए बिना सावधानी से अभीष्ट अर्थ का प्रकथन कर सकते हैं। उनकी कहानियों का रुचिकर रूप कभी नहीं छीजता। (कीथ वही पृष्ठ ३३५) कथासरित्सागर में कहानियों का एक बढ़िया गुच्छा बेतालपंचविंशति नामक पच्चीस कहानियों का है (कथासरित्सागर, तरंग ७५-९९)। क्षेमेन्द्र की बृहत्कथामंजरी में भी ये कहानियां हैं (९।२।११९-१२२१)। सोमदेव की अपेक्षा क्षेमेन्द्र का वर्णन संक्षिप्त और अलंकार- रहित है। क्षेमेन्द्र में जहाँ केवल १२१९ श्लोक हैं वहीं सोमदेव में २१९५।$^१$ प्रश्न होता है कि बेताल-विक्रम की ये कहानियां मूल बृहत्कथा में थीं या नहीं। इस विषय में हर्टेल और एजर्टन का मत है जो सम्भाव्य है कि मूल बृहत्कथा में बेतालपंचविंशति की कहानियां विद्यमान न थीं। नरवाहनदत्त के उपाख्यान से स्पष्टतः उनका कोई वास्तविक संबंध नहीं जान पड़ता। कीथ के अनुसार बेतालपंचविंशति के उपाख्यानों पर बौद्ध प्रभाव स्पष्ट है। पंचतंत्र की भी बहुत-सी कहानियां कथासरित्सागर में बिखरी हुई हैं। क्षेमेन्द्र ने उनको पंचतंत्र के अनुसार एक साथ ही कर दिया है। इनमें से कम-से-कम आधी कहानियां चार सौ पचास ईस्वी से पूर्व बने हुए एक ऐसे संग्रह में विद्यमान थीं जिसका उपयोग आर्यसेन संघ नाम के एक भिक्षु ने अपने ग्रंथ में किया था और जिसका चीनी भाषान्तर उसके शिष्य गुणवृद्धि ने ४९२ ई. में किया था। सोमदेव ने भूतों की कहानियां कहने में बड़ा रस लिया है। इसके अतिरिक्त चोर, जुआरी, धूर्त, वेश्यागामी, चालबाज़, हुँडोड़, कपटी, बदमाश, ठग, भण्डे, रंगीले भिक्षु आदि की कहानियों की तह जमाने में सोमदेव को अद्भुत सफलता मिली है। उनकी दृष्टि में समाज का अर्धांश चित्र नहीं, पूरा चित्र समाया हुआ है। भले और बुरे, ऊँच और नीच, धनी और कंगाल, धर्मात्मा और गुण्डे सभी के उभरे हुए चित्र उनके ग्रंथ में पाए जाते हैं। जैसे समुद्र सब नदियों का स्थान है, वैसे ही मानव-स्वभाव का जितना वैचित्र्य है, उसका पूरा अंकन सोमदेव ने अपने ग्रंथ में किया है। सोमदेव ने स्त्रियों के स्वभाव के विश्लेषण में बहुत रुचि ली है। स्त्री-चरित्र की अनन्त कहानियां उनके संग्रह में हैं। उनके स्वभाव के गुण-दोषों का चित्रण वे खुलकर करते हैं। ११वीं शती का काश्मीर स्त्रियों के विषय में कुछ अधिक सम्मानसूचक भाव से प्रभावित नहीं था। पतिप्रेममयी हींगला और अमर्यादित उच्छृंखलता प्रायः स्त्री-चरित्र के ऐसे पक्ष को सामने रखती हैं जो किसी प्रकार भव्य नहीं कहा जा सकता। सोमदेव का गुण इतना ही है कि वे कुछ भी कहने में संकोच का अनुभव नहीं करते। जैसे बरसाती नदियों की मटमैली धाराओं के ऊपर चारों ओर का चन्दनसार आकर बहने लगता है, वैसे ही सोमदेव की कथाओं की शैली बुराइयों को समेटकर सामने ले आती है। मानव-स्वभाव जैसा है, वैसा ही उसे दिखाना यह महान् लेखक


पाद-टिप्पणी: १. सुशील कुमार दे, संस्कृत-साहित्य का इतिहास, पृष्ठ ४२१ पाद टिप्पणी।

की विशेषता होती है और सोमदेव इसमें पिछड़े हुए नहीं हैं। सोमदेव की अनेक कहानियां मन पर एक बार छप जाने के बाद फिर नहीं भुलाई जा सकतीं। कहानी के विस्तार और संक्षेप की कला में सोमदेव सिद्धहस्त थे। वे उतने ही परिमित शब्दों का प्रयोग करते हैं जितनों से पाठकों की रुचि का विघात न हो और कहानी का रस भी अच्छी तरह अनुभव में आ सके। जब ११वीं शती में समासबहुला शैली का बोलबाला था उस समय सोमदेव ने जिस शैली का प्रयोग किया उसे देखकर आश्चर्य होता है। उन्होंने मानो बिना समासों के सरल वाक्यों का धड़ल्ले से निर्माण किया है, जैसे— बबन्ध मेखलां भूम्नि हारं च जग्रहस्तने । नूपुरौ करयोस्तस्याः कर्णयोरपि कङ्कणौ ॥ (६१।२६) कहानियों के सम्पुट को वे कितना छोटा बना सकते थे इसका एक नुकीला उदाहरण तूलिक या रूई बेचनेवाले मूर्ख की कहानी है— ध्वस्तोलूखलको देव श्रुणु वच्म्यथ तूलिकम् । मूर्खः कश्चित्पुमांस्तूलविक्रयायापणं ययौ ॥ अशुद्धमिति तत्सस्य न जग्राहार्य कश्चन । तावद्ददर्श तत्राग्नौ हेमविद्वत्प्रशोधितम् ॥ स्वर्णकारेण विक्रीतं गृहीतं ग्राहकेण च। तद् दृष्ट्वापि स तत्तूलमिद्धेऽग्न्योधमज्जडः । भस्मौ चिक्षेप दग्धे च तस्मिंल्लोको जहास्तम् । श्रुतोऽयं तूलिको देव खर्जूरीच्छेदकं शृणु ॥ ६१।२८-३१ ॥ 'हे देव ! पहलों के संबंध में मूर्ख की कहानी कह चुका अब रूईवाले की कहानी सुनिए। कोई मूर्ख रूई बेचने बाजार में गया पर साफ न होने से उसे किसी ने लिया नहीं। तब उसने देखा कि सुनार सोने को आग में तपाकर शुद्ध कर रहा है। उस सोने को सुनार ने बेचा और ग्राहक ने खरीद किया। यह देखकर उसने भी अपनी रूई को साफ करने के लिए आग में डाल दिया। इससे सब लोग उस उल्लू पर हँसने लगे। यह तूलिक की कहानी हुई, अब खजूर काटनेवाले मूर्ख की कहानी सुनें। इस प्रकार की तरंगित शैली में सोमदेव की छोटी कहानियां बड़ी कहानियों के सम्पुट में कटहल के कोयों की तरह भरी हुई हैं। इसी प्रकार गंवार गो-दोहक की कहानी है। उसकी गाय प्रति दिन पच्चीस सेर दूध देती थी। उसके यहां कोई उत्सव होने को हुआ। उसने सोचा कि एक ही बार में उत्सव के लिए सारा दूध दुह लूंगा और महीने भर तक गाय नहीं दुही। उत्सव आने पर जब दुहने बैठा तब उसे दूध की बूंद भी न मिली (६१।४४-४७)। पंचतंत्र के हिरण्यक चूहे, लघुपतनक कौए, चित्रग्रीव कबूतर, मंधरुक कछुए की कहानी भी इसमें लम्बक की ६१वीं तरंग में है जिसे सोमदेव ने प्रज्ञामिष्ठ या व्यावहारिक बुद्धिमानी की कहानी कहा है। ४

सोमदेव ने अपने वर्णन के बीच-बीच में नीति-संबंधी अनेक सूक्तियाँ डाल दी हैं। जैसे— अर्थो हि यौवनं पुंसां तदभावश्च वार्धकम्। तेनास्यौजौ बलं रूपमुत्साहश्चापि हीयते॥ (६।१।११६) भवन्तिके प्रभो भूत्वा नपूर्व्वं भ्रमरास्तदम्। मज्जन्तं च सरो हंसा मुञ्चन्त्यपि विरोदितम्॥ (६।१।११८) शुचिनो न बिभेत्योस्ति न सन्तुष्टस्य चाशुभम्। धीरस्य च विपन्नास्ति माहात्म्यं व्यवतामिव॥ ६।१।१२१ इस प्रकार नीति-संबंधी सूक्तियों की छौंक वर्णन के स्वाद को बढ़ा देती है और इस युक्ति से सोमदेव ने पूरा लाभ उठाया है। एक बार नरवाहनदत्त समुद्र के बीच में स्थित नारिकेलद्वीप से श्वेतद्वीप में आता है। यह श्वेतद्वीप क्षीरोद समुद्र के पास था जिसे आजकल कास्पियन सागर कहते हैं। इस श्वेतद्वीप का उल्लेख महाभारत के नारायणीय पर्व में हर्षचरित में तथा अन्य पुराणों में बहुधा आता है। सोमदेव ने यह संकेत वहीं से अपनाया। श्वेतद्वीप में निवास करनेवाले नारायण की जो स्तुति सोमदेव ने दी है वह स्तोत्र-विषय में भी उनकी सफलता की सूचक है (५।४२।९-१८)। स्तोत्र साहित्य का यह चमकता हुआ नग है। साहित्य की कितनी ही शैलियों और अभिप्रायों के बरतन में बढ़ी हुई निपुणता सोमदेव का गुण था। कथासरित्सागर अनेकविध कहानियों का महार्णव है। उसके पूरे स्वरूप की कल्पना कठिनाई से ही की जा सकती है। इस ग्रंथ का पठन और प्रचार अधिक होना चाहिए। भारतीयों का विश्वास था कि कहानी सुनने से पाप नष्ट होता है। इसका अभिप्राय यही है कि अच्छी कहानी मन के तनाव को दूर करती है और मनुष्य को फिर अपनी स्वाभाविक स्थिति में पहुँचा देती है। यह नमक की उस चुटकी के समान है जो क्षार भोजन को स्वादिष्ट बनाती है। ऐसे ही जीवन के अनेक व्यवहारों को करते हुए कहानी की उचित मात्रा से हम जीवन को अधिक रसपूर्ण बना सकते हैं। सोमदेव का ग्रंथ बहुमूल्य कोशों का समूह है अर्थात् उसमें रत्नों से परिपूर्ण अनेक डिब्बे भरे हुए हैं। चाहे वहाँ से अपनी रुचि के अनुसार हम उन्हें चुन सकते हैं। बिहार राष्ट्रभाषा-परिषद् का यह प्रयत्न अभिनन्दन के योग्य है। इसमें कथासरित्सागर का न केवल हिन्दी-अनुवाद बल्कि मूल संस्कृत-पाठ भी दिया गया है। इस अनुवाद का श्रेय पं केदारनाथजी सारस्वत को है। पहले भाग में दस लम्बकों का अनुवाद उनका किया हुआ है। अब वे नहीं रहे पर आशा है कि परिषद् इसी प्रकार से शेष लम्बकों को भी मूल और अनुवाद के साथ प्रकाशित करेगी। काशी-विश्वविद्यालय शनिवार, ज्येष्ठ कृष्ण ४ सं २०१७ १४-५ १९६० वासुदेवशरण अग्रवाल

कथापीठ नामक प्रथम लम्बक १-११७

विषयानुक्रमणी [प्रस्तुत विषयानुक्रमणी हिन्दी-अनुवाद के अनुसार है।] कथापीठ नामक प्रथम लम्बक १-११७ प्रथम तरंग १-११ मंगलाचरण ३ प्रस्तावना ३ शिव और पार्वती का संवाद ५ पार्वती के पूर्वजन्म की संक्षिप्त कथा ७ पार्वती का प्रणय-कोप ९ पुनः कथा का उपक्रम ९ पुष्पदन्त और माल्यवान को पार्वती का शाप ११ शापान्त की घोषणा ११। द्वितीय तरंग १२-२५ वररुचि (पुष्पदन्त) की कथा १३ वररुचि की जन्म कथा १७ व्याडि की कथा १९ वर्ष का चरित्र १९। तृतीय तरंग २५-३५ पाटलिपुत्र के निर्माण की कथा २५ राजा ब्रह्मदत्त की कथा २९। चतुर्थ तरंग ३७-५५ उपकोशा की कथा ३७ पाणिनि की कथा ३९ उपकोशा की कथा (चालू) ४१ वररुचि का प्रत्यागमन ४९। पंचम तरंग ५५-७३ वररुचि की कथा (चालू) वररुचि का वैराग्य ५५ राजा योगनन्द का अन्तःपुर : मरी मछली का हँसना ५७ सुन्दर कौन ? ६१ राजा आदित्यवर्मा और मंत्री शिववर्मा की कथा ६३ मित्रद्रोह का फल ६५ वररुचि का वैराग्य और महाप्रस्थान ६९ काणभूष की कथा ६९ शाकाहारी मुनि की कथा ७२। षष्ठ तरंग ७५-९७ गुणाढ्य की कथा ७५ चूहे से धनी बने सेठ की कथा ७७ मूर्ख सामवेदी ब्राह्मण की कथा ८१ देवी-उद्यान की कथा ८३ राजा सातवाहन की कथा ८७। सप्तम तरंग ९७-११३ शिवशर्मा की कथा ९७ पुष्पदन्त की पूर्वकथा १०३ राजा शिबिकी कथा १०९ माल्य वान की पूर्वकथा १११। अष्टम तरंग ११३-११७

कथामुख नामक द्वितीय लम्बक १११-२३७

  • २८ - कथामुख नामक द्वितीय लम्बक १११-२३७ प्रथम तरंग १११-१३१ राजा सहस्रानीक की कथा १११ रानी मृगावती के विवाह की कथा १२१ उदयन के जन्म की कथा १२७। द्वितीय तरंग १३१-१६१ धीवर और मृगांकवती की कथा १३३। तृतीय तरंग १६१-१७१ राजा उदयन की कथा १६१ राजा चण्ड महासेन की कथा १६५। चतुर्थ तरंग १७१-१९९ वत्सराज उदयन की कथा (क्रमशः) १७१ लोहजंघ की कथा १८४। पंचम तरंग १९९-२२५ उदयन की कथा वासवदत्ता हरण १९९ गुहसेन और देवस्मिता की कथा २०५ सिद्धि की कथा २११ सेठ समुद्रदत्त और शक्तिमती की कथा २२१ समुद्रदत्त की कथा (क्रमशः) २२१। षष्ठ तरंग २२५-२३७ वत्सराज की कथा २२५ याज्ञ विनष्टक की कथा २३१ वज्र और प्रभावती की कथा २३५। लावानक नामक तृतीय लम्बक २३९-४ ० प्रथम तरंग २३९-२६१ वत्सराज उदयन की कथा (क्रमशः) २३९ निपुण वैद्य की कथा २४१ मूर्ख साधु की कथा २४३ राजा देवसेन और उन्मादिनी की कथा २४७ यज्ञस्वक सेठ की कथा २५१ राजा पुण्यसेन की कथा २५३ सुन्द और उपसुन्द की कथा २५७। द्वितीय तरंग २६१-२७७ राजा उदयन और पद्मावती के विवाह की कथा २६१ वासवदत्ता के जलने की कथा २६१ कुन्ती और दुर्वासा की कथा २६५ पद्मावती का विवाह २६९। तृतीय तरंग २७७-३ १ वत्सराज की कथा (चालू) २७७ विहितसेन और तेजोवती की कथा २८१ सोमप्रभा और गुहसेन की कथा २८५ इन्द्र और अहल्या की कथा २९५। चतुर्थ तरंग ३ १-३५७ वत्सराज का कौशाम्बी में पुनरागमन ३ १ ग्वालों की कथा ३ ५ वत्सराज को खजाना और सिंहासन की प्राप्ति ३ ७ वत्सराज का दिग्विजय के लिए विचार ३ ९ वीर विदूषक ब्राह्मण की कथा ३११। पंचम तरंग ३५७-३७५ वत्सराज के द्वारा शिव की आराधना ३५७ देवदास वैश्य की कथा ३५९ वत्सराज का दिग्विजय के लिए प्रयाण ३६५ वत्सराज के दिग्विजय की कथा ३६९।

षष्ठ तरंग ३७५-४०७

षष्ठ तरंग ३७५-४०७ वत्सराज की कथा (क्रमशः) ३७५ फठमृति की कथा ३७५ रानी कुवलयावली द्वारा कही गई कथा ३८१ मघपति की कथा ३८३ स्वामी कार्तिकेय की उत्पत्ति ३८५ कालरात्रि की कथा ३९१। नरवाहनदत्त जनन नामक चतुर्थ लम्बक ४ १-४७९ प्रथम तरंग ४ १-४२९ राजा उदयन की कथा (क्रमशः) ४ १ वत्सराज का मृगया-वर्णन ४११ वत्सराज को नारदजी का उपदेश ४११ राजा पाण्ड की कथा ४११ पिंगलिका ब्राह्मणी की कथा ४१५ राजा देवदत्त और उसकी वेश्या-पत्नी की कथा ४१७ पिंगलिका की आत्मकथा ४२३। द्वितीय तरंग ४२९-४६५ वत्सराज की कथा पुत्रजन्म ४२९ जीमूतवाहन की कथा ४३३ जीमूतवाहन के पूर्वजन्म की कथा ४३७ जीमूतवाहन और मलयवती का विवाह ४५३ कद्रू और विनता की कथा ४५५ नागों के लिए जीमूतवाहन का आत्मसमर्पण ४५७। तृतीय तरंग ४६५-४७९ वासवदत्ता का स्वप्न ४६५ सिंहविक्रम और उसकी कलहकारिणी भार्या की कथा ४६९ मन्त्रियों के पुत्रों की उत्पत्ति ४७३ नरवाहनदत्त का जन्म ४७३। चतुर्दारिका नामक पञ्चम लम्बक ४८१-५९७ प्रथम तरंग ४८१-५१५ वत्सराज की सभा में शक्तिवेग का आगमन ४८१ कनकपुरी और शक्तिवेग की कथा ४८१; शिव और माधव नामक द्यूतों की कथा ४९३ हरस्वामी की कथा ५११। द्वितीय तरंग ५१५-५५७ शक्तिदेव का कनकपुरी देखने के लिए जाना ५१५ असाध्यदत्त और राक्षसराज कपाल- स्फोट की कथा ५२५ अशोकदत्त और विद्युत्प्रभा की विवाह-कथा ५४१। तृतीय तरंग ५५७-५९७ शक्तिदेव का कनकपुरी के लिए प्रस्थान ५५७ शक्तिदेव का पुनः वर्द्धमान नगर में आगमन ५६९ बिन्दुमती की कथा ५७९ देवदत्त ब्राह्मण की कथा ५८१ शक्तिदेव द्वारा विद्याधरत्व की प्राप्ति ५९१ शक्तिदेव का विद्याधरियों के साथ विवाह ५९५। मदनमंचुका नामक षष्ठ लम्बक ५९९-८१५ प्रथम तरंग ५९९-६२९ नरवाहनदत्त की युवावस्था ५९९ राजा कलिगदत्त की कथा ६ १ सुरतमंजरी अप्सरा की कथा ६ ७ राजा धर्मदत्त की कथा ६११ सात ब्राह्मणों की कथा ६१५ एक ब्राह्मण और चाण्डाल की कथा ६१७ राजा विक्रमसिंह और दो ब्राह्मणों की कथा ६१९।

द्वितीय तरंग ६२९-६५७

द्वितीय तरंग ६२९-६५७ कलिंगसेना के जन्म की कथा ६२९ सात राजकुमारियों की कथा ६३१ एक विरक्त राजकुमार की कथा ६३१ एक तपस्वी और राजा की कथा ६३३ राजा सुप्रेष और मुखलोचना की कथा ६३७ कलिंगसेना के पास सोमप्रभा का आगमन ६४३ एक राजपूत और वैश्यपुत्र की कथा ६४५ पिशाच और ब्राह्मण की कथा ६५१। तृतीय तरंग ६५७-६८१ कलिंगसेना का वृत्तान्त (क्रमशः) ६५७ सोमप्रभा की कथा ६५९ कीर्तिसेना की कथा ६६७। चतुर्थ तरंग ६८५-७ ३ मदन वेग विद्याधर की कथा ६८५ कलिंगसेना के विवाह की कथा ६८७ वत्सराज की संक्षिप्त कथा ६८९ तेजस्वती की कथा ६९३ हरिधर्मा ब्राह्मण की कथा ६९७। पंचम तरंग ७ ५-७१७ कलिंगसेना और सोमप्रभा की कथा (चालू) ७ ५ उषा और अनिरुद्ध की कथा ७ ५ कलिंगसेना की कौशाम्बी-यात्रा ७ ९ यौगन्धरायण का राजनीतिक षड्यन्त्र ७१३। षष्ठ तरंग ७१७-७४५ कलिंगसेना की कथा (चालू) मंत्री यौगन्धरायण का कूटनीति-प्रपंच ७१७ विष्णुदत्त और उसके सात साथियों की कथा ७२३ ऋषिकन्या कदलीगर्भा की कथा ७३१ तार्थ और राजा की कथा ७३७। सप्तम तरंग ७४५-७७५ वत्सराज उदयन और कलिंगसेना की कथा (चालू) ७४५ राजा श्रुतसेन की कथा ७४९ विद्युत्प्रभा और राजा श्रुतसेन की कथा (चालू) ७५१ उन्मादिनी और राजा देवसेन की कथा ७५९ मंत्री यौगन्धरायण का राजनीतिक प्रपंच (चालू) ७५७ उल्लू नेवला बिल्ली और चूहे की कथा ७६१। अष्टम तरंग ७७७-८१५ वत्सराज की कथा (अनुक्रमशः) ७७७ पतिव्रता वैश्यपत्नी की कथा ७७७ मदनमंचुका के जन्म की कथा ७८१ नरवाहनदत्त और मदनमंचुका का बाल्य-विलास ७८९ नरवाहनदत्त का यौवराज्याभिषेक ७९१ शत्रुघ्न और उसकी दुष्टा स्त्री की कथा ८ १ राजनीति का सार ८ १ राजा शूरसेन और उसके मंत्रियों की कथा ८ ५ नरवाहनदत्त और मदनमंचुका का विवाह ८११।

कथासरित्सागर

कथासरित्सागर (प्रथम खण्ड)

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कथापोट नाम प्रथमो लम्बकः

श्री आचार्य जिनचन्द्र ज्ञान भण्डार लाल भवन घीड़ा रास्ता, जयपुर सिटी ( राजस्थान ) कथापोट नाम प्रथमो लम्बकः पद गुरुगिरीन्द्रजाप्रणयमन्दरालोलुभा— स्फुरा किर' कथामृत हरमुखाम्बुधेरुद्गतम् । प्रसङ्ग सरयन्ति ये विगतविघ्नलब्धश्रिया धुर दधति वधुधीं भुवि भवप्रसादन त ॥ कथापीठ नामक प्रथम लम्बक मगेन्द्र-नन्दिनी पार्वती के प्रबल प्रणय मन्दराचल के मन्थन द्वारा शिवजी के मुखरूपी समुद्र से निकले हुए इस कथारूपी अमृत का जो लोग आदर और आग्रहपूर्वक पान करते हैं वे शिवजी की कृपा से निर्विघ्न सिद्धियों को प्राप्त कर, दिव्यपद लाभ करते हैं। १ लम्बक शब्द का पैशाची भाषा में मूल रूप लम्भक है। यह विश्रामस्थान के लिए प्रयुक्त किया गया है। प्रथम लम्बक में बृहत्कथा के प्रसार के लिए, राजा सातवाहन ने कथापीठ की स्थापना की थी और गुणाढ्य के शिष्यों—गुणदेव और नन्दिदेव—द्वारा इसका व्याख्यान किया गया। इसलिए यह लम्बक कथापीठ है। कुछ लोगों का मत है कि यह लम्बक मूल लेखक गुणाढ्य द्वारा नहीं लिखा गया। इसकी रचना उनके शिष्यों या राजा सातवाहन ने की। विस्तृत विवरण भूमिका में देखिए।—अनु

कथासरित्सागर

कथासरित्सागर प्रथमस्तरङ्गः मङ्गलाचरणम्

धियं दिशतु वः शम्भोः श्यामः कण्ठो मनोभुवः। अङ्कस्थपार्वतीदृष्टिपाशैरिव विवेष्टितः ॥ १ ॥ सन्ध्यानृत्तोत्सवे तारा करेणोद्धूय बिम्बजित्। सीत्कारसीकरैरन्यां कल्पयन्निव पातु वः ॥ २ ॥ प्रणम्य वाचं निश्शेषपदार्थोद्योतदीपिकाम्। बृहत्कथायाः सारस्य सङ्ग्रहं रचयाम्यहम् ॥ ३ ॥

प्रस्तावना

आद्यमत्र कथापीठं कथामुखमतः परम्। ततो लावानको नाम तृतीयो लम्बको भवेत् ॥ ४ ॥ नरवाहनदत्तस्य जननं च ततः परम्। स्याच्चतुर्दारिकाख्यश्च ततो मदनमञ्चुका ॥ ५ ॥ ततो रत्नप्रभा नाम लम्बकः सप्तमो भवेत्। सूर्यप्रभाभिधानश्च लम्बकः स्यादथाष्टमः ॥ ६ ॥ अलङ्कारवती चाथ ततः शक्तियशा भवेत्। वेलालम्बकसञ्ज्ञश्च भवेदेकादशस्ततः ॥ ७ ॥ शशाङ्कवत्यपि तथा ततः स्यान्मदिरावती। महाभिषेकानुगतस्ततः स्यात्पञ्चलम्बकः ॥ ८ ॥ ततः सुरतमञ्जर्य्यथ पद्मावती भवेत्। ततो विषमशीलस्य लम्बकोऽष्टादशो भवेत् ॥ ९ ॥ यथामूलं तथैवैतन्न मनागप्यतिक्रमः। ग्रन्थविस्तरसङ्क्षेपमात्रं भाषा च भिद्यते ॥ १० ॥ औचित्यान्वयरक्षा च यथाशक्ति विधीयते। कथारसाविघातेन काव्यांशस्य च योजना ॥ ११ ॥ वैदग्ध्यख्यातिलोभाय मम नैवायमुद्यमः। किन्तु नानाकथा-जाल-स्मृति-सौकर्यं सिद्ध्ये ॥ १२ ॥

प्रथम लम्बक ३

प्रथम लम्बक ३ प्रथम तरङ्ग¹ मंगलाचरण शिवजी की गोद में बैठी हुई पार्वती के दृष्टिपातों से मानो कामदेव द्वारा वेष्टित शिवजी का श्यामलवर्ण कंठ आपको सम्पत्ति प्रदान करे ॥१॥ सन्ध्याकालीन नृत्य के समय आकाश में बिखरी हुई प्राचीन तारिकाओं को फूँक से हटाकर, सीत्कार के बिन्दुओं से मानो नवीन तारिकाओं की सृष्टि करते हुए गणेशजी आपकी रक्षा करें ॥२॥ मैं समस्त पदार्थों को प्रकाशित करने के लिए दीपशिखा (लौ) के समान सरस्वती भगवती को प्रणाम करके बृहत्कथा के सार का संग्रह करता हूँ ॥३॥ प्रस्तावना इस संग्रह में प्रथम लम्बक का नाम कथापीठ, उसके अनन्तर दूसरे का नाम कथामुख लम्बक और तीसरे का नाम लावान(ण)क लम्बक³ है ॥४॥ इसके अनन्तर नरवाहनदत्त नामक चतुर्थ लम्बक है। चतुर्दारिका लम्बक पाँचवाँ और मदनमञ्चुका लम्बक छठा है ॥५॥ इसके बाद रत्नप्रभा लम्बक सातवाँ और सूर्यप्रभ लम्बक आठवाँ है ॥६॥ इसके बाद नवाँ अलङ्कारवती लम्बक दसवाँ सम्बक शक्तियशा और इसके अनन्तर ग्यारहवाँ वेला नामक लम्बक है ॥७॥ इसके पश्चात् बारहवाँ शशांकवती लम्बक तेरहवाँ मदिरावती लम्बक चौदहवाँ महा- भिषेकवती लम्बक और पन्द्रहवाँ पंच लम्बक है ॥८॥ इसके अनन्तर सोलहवाँ सुरतमंजरी लम्बक सत्रहवाँ पद्मावती लम्बक तथा अठारहवाँ विषमशील नामक लम्बक है ॥९॥ मूल बृहत्कथा में जो कुछ है उसी का इस ग्रंथ में संग्रह किया गया है। मूलग्रन्थ से इसमें तनिक भी अन्तर नहीं है। हाँ विस्तृत कथाओं का संक्षिप्तमात्र किया गया है और भाषा का भेद है (उसकी भाषा पैशाची थी और इसकी संस्कृत है) । १० ।। मैंने यथासम्भव मूलग्रन्थ की औचित्य-परम्परा की रक्षा की है और कुछ नवीन काव्यांगों की योजना करते हुए भी मूलकथा के रस का विघात नहीं होने दिया है ॥११॥ मुझसे यह ग्रन्थ-निर्माण-प्रयत्न पाण्डित्य-प्रसिद्धि के लोभ से नहीं किया गया है किन्तु अनेक लम्बी कथाओं के जाल को स्मरण रखने की सुविधा से किया गया है ॥१२॥ १ तरङ्गों की रचना कथासरित्सागर के रचयिता श्रीसोमदेवभट्ट ने अवान्तर कथाओं के विभाग के लिए की है। मूल कथा में तरङ्ग नाम का विभाग नहीं था क्योंकि तरङ्ग शब्द का सम्बन्ध सागर के साथ उपयुक्त होता है। २ कथासरित्सागर में कामदेव के अवतार नरवाहनदत्त का चरित्र और उसका विजय वर्णित है। अतः कवि ने मंगलाचरण में ही काम की विजय की सूचना दी है। ३ सोमदेव ने लम्बकों का जो क्रम प्रदर्शित किया है, वह मूल बृहत्कथा के ही अनु- सार है, या स्वतन्त्र इसका निश्चय नहीं है। इससे पूर्व महाकवि क्षेमेन्द्र ने 'वृहत्कथामंजरी' के नाम से बृहत्कथा का जो भाषान्तर किया है उसमें लम्बकों का क्रम सागर से भिन्न है। इसका विवरण भूमिका में देखिए ।—अनु.

कथासरित्सागर

कथासरित्सागर शिवपार्वतीसंवादः अस्ति किन्नर-गन्धर्व-विद्याधर-निषेवितः। चक्रवर्ती गिरीन्द्राणां हिमवानिति विश्रुतः ॥१३॥ माहात्म्यमियतीं भूमिमारूढं मन्ये भूभृताम्। यद्भवानी सुताभावं त्रिजगज्जननी गता ॥१४॥ उत्तरं यस्य शिखरं कैलासाख्यो महागिरिः। योजनानां सहस्राणि बहून्याक्रम्य तिष्ठति ॥१५॥ मन्दरो मथितेऽप्यम्भौ न सुधा-सिततां गतः। अहं त्वमलादिति या हसतीव स्वकान्तिभिः ॥१६॥ धराधरगुरुस्तत्र निवसन्त्यम्बिकासखः। गजैर्विद्याधरैः सिद्धैः सेव्यमानो महेश्वरः ॥१७॥ पिङ्गोत्तुङ्ग-जटाजूट-गतो यस्याश्नुते नवः। सन्ध्यापिञ्जर-पूर्वाद्रि शृङ्ग-सङ्ग-सुखं शशी ॥१८॥ येनान्धकासुरपतेरेकस्यार्पयता हृदि। शूलं त्रिजगतोऽप्यस्य हृद्व्यथैचित्रमुद्धतम् ॥१९॥ चूडामणिषु यत्पादनखाग्रप्रतिबिम्बिताः। प्रसादप्राप्तचन्द्राली इव भान्ति सुरासुराः ॥२०॥ स कदाचित्समुत्पन्न-विश्रम्भा रहसि प्रिया। स्तुतिभिस्तोषयामास भवानीपतिमीश्वरम् ॥२१॥ तस्याः स्तुतिवशात्तुष्टस्तामङ्कमधिरोप्य सः। किं ते प्रियं करोमीति बभाषे शशिशेखरः ॥२२॥ ततः प्रोवाच गिरिजा प्रसन्नोऽसि यदि प्रभो। रम्यां काञ्चित्कथां ब्रूहि देवाद्य मम नूतनाम् ॥२३॥ भूतं भवद् भविष्यद् वा किं तत्स्याज्जगति प्रिये। भवती यन्न जानीयादिति शर्वोऽप्युवाच ताम् ॥२४॥ ततः सा वल्लभा तस्य निर्बन्धमकरोत्प्रभोः। प्रियप्रणयहुंकारि यतो मानवतीमनः ॥२५॥ ततस्तच्चाटुमुग्धैश्च तत्प्रभावानियम्यनाम्। तस्याः स्वस्यां कथा मेव शिवः सम्प्रत्यवर्णयत् ॥२६॥ अस्ति मामीशितुं पूर्वं ब्रह्मा नारायणस्तथा। महीं भ्रमन्तो हिमवत्पादमूलमथापतुः ॥२७॥

प्रथम लम्बक ५

प्रथम लम्बक ५ शिव और पार्वती का संवाद किन्नर, गन्धर्व और विद्याधरों की निवासभूमि तथा समस्त कुलपर्वतों का सम्राट् हिमालय पर्वत प्रसिद्ध है॥१३॥ पर्वतों में इस हिमालय का माहात्म्य इतना बड़ा-चढ़ा है कि साक्षात् त्रिजगज्जननी पार्वती उसकी पुत्री बनीं ॥१४॥ इस हिमालय का उत्तर शिखर कैलास नाम से प्रसिद्ध है, जो सहस्रों योजन के भू-भाग को आक्रान्त करके फैला है॥१५॥ यह कैलास-शिखर, अपनी धवल-धवल कान्ति से मन्दराचल को हँसता है कि उसके द्वारा क्षीर-समुद्र का मन्थन होने पर भी वह मेरे समान सुधा-धवल न हो सका और मैं बिना प्रयत्न के ही शुभ्र हूँ ॥१६॥ उस कैलास शिखर पर, स्थावर-जंगम सृष्टि के स्वामी विद्याधरों और सिद्धों से सेवित महेश्वर नित्य पार्वती के साथ निवास करते हैं॥१७॥ जिस शिवजी के पीतवर्ण एवं ऊँचे जटामूट पर स्थित अभिनव चन्द्रमा उदयाचल के सन्ध्याकालीन पीतवर्ण की शोभा धारण करता है॥१८॥ जिस शिवजी ने अन्धकासुर के हृदय में शूल भौंकते हुए एक साथ ही तीनों लोकों के हृदय से शूल को सदा के लिए निकाल दिया ॥१९॥ जिस शिव के चरणों में प्रणाम करने के कारण मुकुटमणियाें में नख के अग्रभाग के प्रतिबिम्बित होने के कारण सुर और असुर-राज ऐसे मालूम होते हैं कि उन्हें प्रसाद-रूप में अर्धचन्द्र प्राप्त हुआ हो॥२० ॥ किसी समय लोकनाथ स्वामी को एकान्त में बैठे देखकर उनकी प्राणवल्लभा पार्वती ने उन्हें स्तुतियों से प्रसन्न किया॥२१॥ पार्वती के स्तुति-वचनों से प्रसन्न होकर, अतः उन्हें गोद में बैठाकर चन्द्रशेखर शिवजी ने पूछा 'कहो मैं तुम्हारे लिए कौन-सा प्रिय कार्य करूँ' ॥२२॥ तब पार्वती ने कहा—'स्वामिन् हे देव यदि तुम मुझ पर प्रसन्न हो तो कोई नवीन कथा सुनाओ' ॥२३॥ यह सुनकर शिवजी ने कहा—'प्रिये संसार में भूत वर्तमान और भविष्य की कौन-सी ऐसी बात है जिसे तुम न जानती हो' ॥२४॥ इतना कहने पर भी शिववल्लभा पार्वती ने स्वामी से पुनः कथा सुनाने का आग्रह किया क्योंकि मानिनी स्त्रियों का मन सदा ही प्रियपति के प्रणय की अभिलाषा रखता है॥२५॥ शिवजी ने पार्वती का आग्रह देखकर उसे प्रसन्न करने की दृष्टि से उसी (पार्वती) के सम्बन्ध की स्वस्य कथा का वर्णन किया॥२६॥ एक बार ब्रह्मा और नारायण मेरे दर्शन के लिए निकले और सारी पृथ्वी पर भ्रमण हुए हिमालय की उपत्यका में आये॥२७॥

ततो ददृशतुस्तञ्च ज्वलल्लिङ्गं महत्पुरः। तस्यान्तमीक्षितुं प्रायादेक ऊर्ध्वमथोऽपरः॥२८॥ अलभ्यन्तो सपोभिर्मां तोषयामासतुश्च तौ। आविर्भूय मया चोक्तौ वरः कोऽप्यर्थ्यतामिति॥२९॥ तच्छ्रुत्वाब्रवीद् ब्रह्मा पुत्रो मेऽस्तु भवानिति। अपूज्यस्तेन जातोऽसावत्यारोहेण निन्दितः॥३०॥ ततो नारायणो देवः स वरं मामयाचत। भूयासं तव शुश्रूषापरोऽहं भगवन्निति॥३१॥ अतः शरीरीभूतोऽसौ मम जातस्त्वदात्मना। यो हि नारायणः सा त्वं शक्तिः शक्तिमतो मम॥३२॥ किं च मे पूर्वजायात्वमित्युक्तवसि शङ्करे। कथं ते पूर्वजायाऽहमिति बव्रे स्म पार्वती॥३३॥

पार्वत्याः पूर्वजन्मकथा

प्रत्युवाच ततो भर्गः पुरा दक्षप्रजापतेः। देवि! त्वं च तथान्याश्च बह्व्योऽजायन्त कन्यकाः॥३४॥ स मह्यं भवतीं प्रादाद्धर्मादिभ्यो पराश्च ताः। यज्ञे कदाचिदाहूतास्तेन जामातरोऽखिलाः॥३५॥ वर्जितस्त्वहमन्वंकस्ततोऽपृच्छ्यत स त्वया। किं न भर्त्ता ममाहूतस्त्वया तातोच्यतामिति॥३६॥ कपालमाली भर्त्ता ते कथमाहूयतां मखे। इत्युवाच गिरं सोऽथ त्वत्कर्ण-विष-सूचिकाम्॥३७॥ पापाद्यमस्माज्जातेन किं देहेन मयामुना। इति कोपात्परित्यक्तं शरीरं तत्प्रिये! त्वया॥३८॥ स च दक्षमरूस्तेन मन्युना नाशितो मया। ततो जाता हिमाद्रेस्त्वमम्बेक्ष्वङ्कुररूपा यथा॥३९॥ अथ स्मर तुषाराद्रिं तपोऽर्थेमहमागतः। पिता त्वा च नियुङ्क्ते स्म शुश्रूषायै ममातिथेः॥४०॥ तारकान्तक-सत्पुत्र-प्राप्तये प्रहितः सुरैः। सम्ध्याशङ्काशोऽविध्यन्मां तत्र दग्धो मनोभवः॥४१॥