महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व
Mahabharata (Vol 3) - Virata, Udyoga and Bhishma Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
सौवीराः कितवाः प्राच्याः प्रतीच्योदीच्यमालवाः ॥ ७ ॥ अभीषाहाः शूरसेनाः शिवयोऽथ वसातयः । संग्रामे नाजहुर्भीष्मं वध्यमानाः शितैः शरैः ॥ ८ ॥ सौवीर, कितव, प्राच्य, प्रतीच्य, उदीच्य, मालव, अभीषाह, शूरसेन, शिबि और वसाति देशके योद्धा शत्रुओंके तीखे बाणोंसे पीड़ित होनेपर भी संग्रामभूमिमें भीष्मको छोड़कर नहीं भागे ॥ ७-८ ॥ तथैवान्ये महीपाला नानादेशसमागताः । पाण्डवानभ्यवर्तन्त विविधायुधपाणयः ॥ ९ ॥ इसी प्रकार विभिन्न देशोंसे आये हुए अन्य भूपाल भी हाथोंमें नाना प्रकारके अस्त्र-शस्त्र लिये पाण्डवोंपर आक्रमण करने लगे ॥ ९ ॥ तथैव पाण्डवा राजन् परिवव्रुः पितामहम् । स समन्तात् परिवृतो रथौघैरपराजितः ॥ १० ॥ गहनेऽग्निरिवोत्सृष्टः प्रजज्वाल दहन् परान् । राजन्! पाण्डवोंने भी पितामह भीष्मको घेर लिया। चारों ओरसे रथसमूहोंद्वारा घिरे हुए अपराजित वीर भीष्म गहन वनमें लगायी हुई आगके समान शत्रुओंको दग्ध करते हुए प्रज्वलित हो उठे ॥ १० १/२ ॥ रथाग्न्यगारश्चापार्चिरसिशक्तिगदेन्धनः ॥ ११ ॥ शरस्फुलिङ्गो भीष्माग्निर्ददाह क्षत्रियर्षभान् । रथ ही उनके लिये अग्निशालाके समान था, धनुष ज्वालाओंके समान प्रकाशित होता था, खड्ग, शक्ति और गदा आदि अस्त्र-शस्त्र समिधाका काम कर रहे थे। बाण चिनगारियोंके समान थे। इस प्रकार भीष्मरूपी अग्नि वहाँ क्षत्रियशिरोमणियोंको दग्ध करने लगी ॥ ११ १/२ ॥ सुवर्णपुङ्खैरिषुभिर्गार्ध्रपक्षैः सुतेजनैः ॥ १२ ॥ कर्णिनालीकनाराचैश्छादयामास तद् बलम् । अपातयद् ध्वजांश्चैव रथिनश्च शितैः शरैः ॥ १३ ॥ उन्होंने स्वर्णभूषित गृध्रपंखयुक्त तेज बाणों तथा कर्णी, नालीक और नाराचोंद्वारा पाण्डवोंकी सेनाको आच्छादित कर दिया। तीखे बाणोंसे ध्वजोंको काट डाला और रथियोंको भी मार गिराया ॥ १२-१३ ॥ मुण्डतालवनानीव चकार स रथव्रजान् । निर्मनुष्यान् रथान् राजन् गजानश्वांश्च संयुगे ॥ १४ ॥ अकरोत् स महाबाहुः सर्वशस्त्रभृतां वरः ।
ध्वजाएँ काटकर उन्होंने रथसमूहोंको मुण्डित ताल-वनोंके समान कर दिया। राजन्! युद्धस्थलमें समस्त शस्त्रधारियोंमें श्रेष्ठ महाबाहु भीष्मने बहुत-से रथों, हाथियों और घोड़ोंको मनुष्योंसे रहित कर दिया ॥ १४ १/२ ॥ तस्य ज्यातलनिर्घोषं विस्फूर्जितमिवाशनेः ॥ १५ ॥ निशम्य सर्वभूतानि समकम्पन्त भारत । अमोघा ह्यापतन् बाणाः पितुस्ते भरतर्षभ ॥ १६ ॥ उनके धनुषकी प्रत्यंचाकी टंकारध्वनि वज्रकी गड़गड़ाहटके समान जान पड़ती थी। भारत! उसे सुनकर समस्त प्राणी काँप उठते थे। भरतश्रेष्ठ! आपके ताऊ भीष्मके बाण कभी खाली नहीं जाते थे ॥ १५-१६ ॥ नासज्जन्त तनुत्रेषु भीष्मचापच्युताः शराः । हतवीरान् रथात् राजन् संयुक्ताञ्जवनैर्हयैः ॥ १७ ॥ अपश्याम महाराज ह्रियमाणान् रणाजिरे । राजन्! भीष्मके धनुषसे छूटे हुए बाण कवचोंमें नहीं अटकते थे (उन्हें छिन्न-भिन्न करके भीतर घुस जाते थे)। महाराज! हमने समरांगणमें ऐसे बहुत-से रथ देखे, जिनके रथी और सारथि तो मार दिये गये थे; परंतु वेगशाली घोड़ोंसे जुते हुए होनेके कारण वे इधर-उधर खींचकर ले जाये जा रहे थे ॥ १७ १/२ ॥ चेदिकाशिकरूषाणां सहस्राणि चतुर्दश ॥ १८ ॥ महारथाः समाख्याताः कुलपुत्रास्तनुत्यजः । अपरावर्तिनः सर्वे सुवर्णविकृतध्वजाः ॥ १९ ॥ संग्रामे भीष्ममासाद्य व्यादितास्यमिवान्तकम् । निमग्नाः परलोकाय सवाजिरथकुञ्जराः ॥ २० ॥ चेदि, काशि और करूष देशके चौदह हजार विख्यात महारथी थे। वे उच्चकुलमें उत्पन्न होकर पाण्डवोंके लिये अपना शरीर निछावर कर चुके थे। उनमेंसे कोई भी युद्धमें पीठ दिखानेवाला नहीं था। उन सबकी ध्वजाएँ सोनेकी बनी हुई थीं। मुँह बाये हुए कालके समान भीष्मजीके सामने पहुँचकर वे सब-के-सब महारथी युद्धरूपी समुद्रमें डूब गये। भीष्मजीने घोड़े, रथ और हाथियोंसहित उन सबको परलोकका पथिक बना दिया ॥ १८—२० ॥ भग्नाक्षोपस्करान् कांश्चिद् भग्नचक्रांश्च भारत । अपश्याम महाराज शतशोऽथ सहस्रशः ॥ २१ ॥ भरतनन्दन! महाराज! हमने वहाँ सैकड़ों और हजारों ऐसे रथ देखे, जिनके धुरे आदि सामान टूट गये थे और पहियोंके टुकड़े-टुकड़े हो गये थे ॥ २१ ॥ सवरूथै रथैर्भग्नै रथिभिश्च निपातितैः । शरैः सुकवचैश्छिन्नैः पट्टिशैश्च विशाम्पते ॥ २२ ॥
गदाभिर्भिन्दिपालैश्च निशितैश्च शिलीमुखैः । अनुकर्षैरूपासङ्गैश्चक्रैर्भग्नैश्च मारिष ॥ २३ ॥ बाहुभिः कार्मुकैः खड्गैः शिरोभिश्च सकुण्डलैः । तलत्रैरङ्गुलित्रैश्च ध्वजैश्च विनिपातितैः ॥ २४ ॥ चापैश्च बहुधा छिन्नैः समास्तीर्यत मेदिनी । माननीय प्रजानाथ! वरूथोंसहित टूटे हुए रथ, मारे गये रथी, कटे हुए बाण, कवच, पट्टिश, गदा, भिन्दिपाल, तीखे सायक, छिन्न-भिन्न हुए अनुकर्ष, उपासंग, पहिये, कटी हुई बाँह, धनुष, खड्ग, कुण्डलोंसहित मस्तक, तलत्राण, अंगुलित्राण, गिराये गये ध्वज और अनेक टुकड़ोंमें कटकर गिरे हुए चाप—इन सबके द्वारा वहाँकी पृथ्वी आच्छादित हो गयी थी॥ २२—२४ १/२ ॥
हतारोहा गजा राजन् हयाश्च हतसादिनः ॥ २५ ॥ न्यपतन्त गतप्राणाः शतशोऽथ सहस्रशः । राजन्! जिनके सवार मार दिये गये थे, ऐसे हाथी और घोड़े सैकड़ों और हजारोंकी संख्यामें निष्प्राण होकर पड़े थे॥ २५ १/२ ॥
यतमानाश्च ते वीरा द्रवमाणान् महारथान् ॥ २६ ॥ नाशक्नुवन् वारयितुं भीष्मबाणप्रपीडितान् । पाण्डव वीर बहुत प्रयत्न करनेपर भी भीष्मके बाणोंसे पीड़ित होकर भागते हुए अपने महारथियोंको रोक नहीं पा रहे थे॥ २६ १/२ ॥
महेन्द्रसमवीर्येण वध्यमाना महाचमूः ॥ २७ ॥ अभज्यत महाराज न च द्वौ सह धावतः । महाराज! महेन्द्रके समान पराक्रमी भीष्मजीके द्वारा मारी जाती हुई उस विशाल सेनामें भगदड़ मच गयी थी। दो आदमी भी एक साथ नहीं भागते थे॥ २७ १/२ ॥
आविद्धरथनागाश्वं पतितध्वजसंकुलम् ॥ २८ ॥ अनीकं पाण्डुपुत्राणां हाहाभूतमचेतनम् । पाण्डवोंकी सेना अचेत-सी होकर हाहाकार कर रही थी। उसके रथ, हाथी और घोड़े बाणोंसे क्षत-विक्षत हो रहे थे। ध्वजाएँ कटकर धराशायी हो गयी थीं॥ २८ १/२ ॥
जघानात्र पिता पुत्रं पुत्रश्च पितरं तथा ॥ २९ ॥ प्रियं सखायं चाक्रन्दे सखा दैवबलात् कृतः । उस भीषण मार-काटमें दैवसे प्रेरित होकर पिताने पुत्रको, पुत्रने पिताको और मित्रने प्यारे मित्रको मार डाला॥ २९ १/२ ॥
विमुच्य कवचानन्ये पाण्डुपुत्रस्य सैनिकाः ॥ ३० ॥ प्रकीर्य केशान् धावन्तः प्रत्यदृश्यन्त सर्वशः ।
पाण्डुपुत्र युधिष्ठिरके दूसरे सैनिक कवच उतारकर केश बिखेरे हुए सब ओर भागते दिखायी देते थे॥ ३० १/२ ॥
तद् गोकुलमिवोद्भ्रान्तमुद्भ्रान्तरथकूबरम् ॥ ३१ ॥
ददृशे पाण्डुपुत्रस्य सैन्यमार्तस्वरं तदा।
उस समय पाण्डुनन्दन युधिष्ठिरकी सारी सेना (सिंहसे डरी हुई) गौओंके समुदायकी भाँति घबराहटमें पड़ गयी थी। रथके कूबर उलट-पलट हो गये थे और समस्त सैनिक आर्तनाद कर रहे थे॥ ३१ १/२ ॥
प्रभज्यमानं सैन्यं तु दृष्ट्वा यादवनन्दनः ॥ ३२ ॥
उवाच पार्थं बीभत्सुं निगृह्य रथमुत्तमम्।
उस सेनामें भगदड़ पड़ी देख यादवनन्दन भगवान् श्रीकृष्णने अपने उत्तम रथको रोककर कुन्तीकुमार अर्जुनसे कहा— ॥ ३२ १/२ ॥
अयं स कालः सम्प्राप्तः पार्थ यः काङ्क्षितस्तव ॥ ३३ ॥
प्रहरास्मिन् नरव्याघ्र न चेन्मोहाद् विमुह्यसे।
‘पार्थ! तुम्हें जिस अवसरकी अभिलाषा और प्रतीक्षा थी, वह आ पहुँचा। पुरुषसिंह! यदि तुम मोहसे मोहित नहीं हो रहे हो तो इन भीष्मपर प्रहार करो॥ ३३ १/२ ॥
यत् पुरा कथितं वीर राज्ञां तेषां समागमे ॥ ३४ ॥
विराटनगरे तात संजयस्य समीपतः।
भीष्मद्रोणमुखान् सर्वान् धार्तराष्ट्रस्य सैनिकान् ॥ ३५ ॥
सानुबन्धान् हनिष्यामि ये मां योत्स्यन्ति संगरे।
इति तत् कुरु कौन्तेय सत्यं वाक्यमरिंदम ॥ ३६ ॥
क्षत्रधर्ममनुस्मृत्य युध्यस्व विगतज्वरः।
‘वीर! तात! पूर्वकालमें विराटनगरके भीतर जब सम्पूर्ण राजा एकत्र हुए थे, उनके सामने और संजयके समीप जो तुमने यह कहा था कि ‘मैं युद्धमें, जो मेरा सामना करने आयेंगे, दुर्योधनके उन भीष्म, द्रोण आदि सम्पूर्ण सैनिकोंको सगे-सम्बन्धियोंसहित मार डालूँगा।’ शत्रुदमन कुन्तीनन्दन! अपने उस कथनको सत्य कर दिखाओ। तुम क्षत्रियधर्मका स्मरण करके सारी चिन्ताएँ छोड़कर युद्ध करो’॥ ३४—३६ १/२ ॥
इत्युक्तो वासुदेवेन तिर्यग्दृष्टिरधोमुखः ॥ ३७ ॥
अकाम इव बीभत्सुरिदं वचनमब्रवीत्।
भगवान् श्रीकृष्णके ऐसा कहनेपर अर्जुनने मुँह नीचे किये तिरछी दृष्टिसे देखते हुए अनिच्छुककी भाँति उनसे इस प्रकार कहा— ॥ ३७ १/२ ॥
अवध्यानां वधं कृत्वा राज्यं वा नरकोत्तरम् ॥ ३८ ॥
दुःखानि वनवासे वा किं नु मे सुकृतं भवेत्।
'प्रभो! अवध्य महापुरुषोंका वध करके नरकसे भी बढ़कर निन्दनीय राज्य प्राप्त करूँ अथवा वनवासमें रहकर कष्ट भोगूँ—इन दोनोंमें कौन मेरे लिये पुण्य-दायक होगा? ।। ३८ ½ ।।
चोदयाश्वान् यतो भीष्मः करिष्ये वचनं तव ।। ३९ ।। पातयिष्यामि दुर्धर्षं भीष्मं कुरुपितामहम् । 'अच्छा, जहाँ भीष्म हैं, उसी ओर घोड़ोंको बढ़ाइये। आज मैं आपकी आज्ञाका पालन करूँगा। कुरुकुलके वृद्ध पितामह दुर्धर्ष वीर भीष्मको मार गिराऊँगा' ।। ३९ ½ ।।
स चाश्वान् रजतप्रख्यांश्चोदयामास माधवः ।। ४० ।। यतो भीष्मस्ततो राजन् दुष्प्रेक्ष्यो रश्मिवानिव । राजन्! तब भगवान् श्रीकृष्णने चाँदीके समान श्वेत वर्णवाले घोड़ोंको उसी ओर हाँका, जहाँ अंशुमाली सूर्यके समान दुर्निरीक्ष्य भीष्म युद्ध कर रहे थे ।। ४० ½ ।।
ततस्तत् पुनरावृत्तं युधिष्ठिरबलं महत् ।। ४१ ।। दृष्ट्वा पार्थं महाबाहुं भीष्मायोद्यतमाहवे । महाबाहु कुन्तीकुमार अर्जुनको भीष्मके साथ युद्ध करनेके लिये उद्यत देख युधिष्ठिरकी वह भागती हुई विशाल सेना पुनः लौट आयी ।। ४१ ½ ।।
ततो भीष्मः कुरुश्रेष्ठः सिंहवद् विनदन् मुहुः ।। ४२ ।। धनंजयरथं शीघ्रं शरवर्षैरवाकिरत् । तब बारंबार सिंहनाद करते हुए कुरुश्रेष्ठ भीष्मने धनंजयके रथपर शीघ्र ही बाणोंकी वर्षा आरम्भ कर दी ।। ४२ ½ ।।
क्षणेन स रथस्तस्य सहयः सहसारथिः ।। ४३ ।। शरवर्षेण महता न प्राज्ञायत भारत । भारत! एक ही क्षणमें बाणोंकी उस भारी वर्षाके कारण सारथि और घोड़ोंसहित उनका वह रथ ऐसा अदृश्य हो गया कि उसका कुछ पता ही नहीं चलता था ।। ४३ ½ ।।
वासुदेवस्त्वसम्भ्रान्तो धैर्यमास्थाय सत्वरः ।। ४४ ।। चोदयामास तानश्वान् विनुन्नान् भीष्मसायकैः । भगवान् श्रीकृष्ण बिना किसी घबराहटके धैर्य धारणकर भीष्मके सायकोंसे क्षत-विक्षत हुए उन घोड़ोंको शीघ्रतापूर्वक हाँक रहे थे ।। ४४ ½ ।।
ततः पार्थो धनुर्गृह्य दिव्यं जलदनिःस्वनम् ।। ४५ ।। पातयामास भीष्मस्य धनुश्छित्त्वा शितैः शरैः । तब कुन्तीकुमारने मेघके समान गम्भीर घोष करनेवाले अपने दिव्य धनुषको हाथमें लेकर तीखे बाणोंद्वारा भीष्मके धनुषको काट गिराया ।। ४५ ½ ।।
स च्छिन्नधन्वा कौरव्यः पुनरन्यन्महद् धनुः ।। ४६ ।। निमेषान्तरमात्रेण सज्यं चक्रे पिता तव ।
धनुष कट जानेपर आपके ताऊ कुरुकुलरत्न भीष्मने पुनः दूसरा धनुष हाथमें ले पलक मारते-मारते उसके ऊपर प्रत्यंचा चढ़ा दी ॥ ४६ १/२ ॥ चकर्ष च ततो दोभ्यां धनुर्जलदनिःस्वनम् ॥ ४७ ॥ अथास्य तदपि क्रुद्धश्चिच्छेद धनुरर्जुनः । तदनन्तर मेघोंके समान गम्भीर नाद करनेवाले उस धनुषको उन्होंने दोनों हाथोंसे खींचा। इतनेहीमें कुपित हुए अर्जुनने उनके उस धनुषको भी काट दिया ॥ ४७ १/२ ॥ तस्य तत् पूजयामास लाघवं शान्तनोः सुतः ॥ ४८ ॥ गाङ्गेयस्त्वब्रवीत् पार्थं धन्विश्रेष्ठमरिंदम । शत्रुदमन नरेश! उस समय शान्तनुकुमार गंगानन्दन भीष्मने धनुर्धरोंमें श्रेष्ठ कुन्तीपुत्र अर्जुनकी उस फुर्तीके लिये उनकी भूरि-भूरि प्रशंसा की और इस प्रकार कहा— ॥ ४८ १/२ ॥ साधु साधु महाबाहो साधु कुन्तीसुतेति च ॥ ४९ ॥ समाभाष्यैवमपरं प्रगृह्य रुचिरं धनुः । मुमोच समरे भीष्मः शरान् पार्थरथं प्रति ॥ ५० ॥ ‘महाबाहो! कुन्तीकुमार! बहुत अच्छा, बहुत अच्छा, तुम्हें साधुवाद।’ ऐसा कहकर भीष्मने पुनः दूसरा सुन्दर धनुष लेकर समरांगणमें अर्जुनके रथकी ओर बाणोंकी वर्षा आरम्भ कर दी ॥ ४९-५० ॥ अदर्शयद् वासुदेवो हययाने परं बलम् । मोघान् कुर्वञ्शरांस्तस्य मण्डलानि निदर्शयन् ॥ ५१ ॥ भगवान् श्रीकृष्णने घोड़ोंके हाँकनेकी कलामें अपनी अद्भुत शक्ति दिखायी। वे भाँति-भाँतिके पैंतरे दिखाते हुए भीष्मके बाणोंको व्यर्थ करते जा रहे थे ॥ ५१ ॥ (सारथ्यं निपुणं कुर्वन् प्रत्यदृश्यत संयुगे । भीष्मस्तावत् सुसंक्रुद्धः पुनर्बाणान् मुमोच ह ॥ पार्थाय युधि राजेन्द्र तदद्भुतमिवाभवत् । अर्जुनस्तु सुसंक्रुद्धः पितामहमरिंदमः । अवर्षद् बाणवर्षेण योद्धुं ह्यभिमुखे स्थितम् ॥ तावुभौ युधि दुर्धर्षो युयुधाते परस्परम् ।) युद्धस्थलमें भगवान् श्रीकृष्ण कुशलतापूर्वक सारथ्य-कर्म करते दिखायी दिये। राजेन्द्र! भीष्म अत्यन्त क्रोधमें भरकर युद्धमें पार्थके ऊपर बारंबार बाणोंकी वर्षा करते रहे। वह अद्भुत-सी बात थी। फिर शत्रुदमन अर्जुनने भी क्रोधमें भरकर युद्धके लिये अपने सामने खड़े हुए भीष्मपर बाणोंकी वर्षा प्रारम्भ कर दी। वे दोनों रण-दुर्जय वीर एक-दूसरेसे युद्ध कर रहे थे। शुशुभाते नरव्याघ्रौ तौ भीष्मशरविक्षतौ ।
गोवृषाविव संरब्धौ विषाणोल्लिखिताङ्कितौ ॥ ५२ ॥
उस समय पुरुषसिंह श्रीकृष्ण और अर्जुन दोनों ही भीष्मके बाणोंसे क्षत-विक्षत हो सींगोंके आघातसे घायल हुए दो रोषभरे साँड़ोंके समान सुशोभित हो रहे थे ॥ ५२ ॥
(भीष्मोऽतीव सुसंक्रुद्धः पृषत्कैरर्जुनं बलात् ।
जघान समरे मूर्ध्नि सिंहवद् विनदन् मुहुः ॥)
तत्पश्चात् भीष्मने भी रणक्षेत्रमें अत्यन्त क्रुद्ध होकर अपने बाणोंद्वारा बलपूर्वक अर्जुनके मस्तकपर आघात किया। उसके बाद वे बारंबार सिंहके समान गर्जना करने लगे।
वासुदेवस्तु सम्प्रेक्ष्य पार्थस्य मृदुयुद्धताम् ।
भीष्मं च शरवर्षाणि सृजन्तमनिशं युधि ॥ ५३ ॥
प्रतपन्तमिवादित्यं मध्यमासाद्य सेनयोः ।
वरान् वरान् विनिघ्नन्तं पाण्डुपुत्रस्य सैनिकान् ॥ ५४ ॥
युगान्तमिव कुर्वाणं भीष्मं यौधिष्ठिरे बले ।
भगवान् श्रीकृष्णने देखा कि अर्जुन मन लगाकर युद्ध नहीं कर रहे हैं। वे भीष्मके प्रति कोमलता दिखा रहे हैं और उधर भीष्म युद्धमें सेनाके मध्यभागमें खड़े हो निरन्तर बाणोंकी वर्षा करते हुए दोपहरके सूर्यके समान तप रहे हैं। पाण्डवसेनाके चुने हुए उत्तमोत्तम वीरोंको मार रहे हैं और युधिष्ठिरसेनामें प्रलयकालका-सा दृश्य उपस्थित कर रहे हैं ॥ ५३-५४ १/२ ॥
नामृष्यत महाबाहुर्माधवः परवीरहा ॥ ५५ ॥
उत्सृज्य रजतप्रख्यान् हयान् पार्थस्य मारिष ।
वासुदेवस्ततो योगी प्रचस्कन्द महारथात् ॥ ५६ ॥
अभिदुद्राव भीष्मं स भुजप्रहरणो बली ।
प्रतोदपाणिस्तेजस्वी सिंहवद् विनदन् मुहुः ॥ ५७ ॥
तब शत्रुवीरोंका नाश करनेवाले महाबाहु माधवको यह सहन नहीं हुआ। आर्य! वे योगेश्वर भगवान् वासुदेव चाँदीके समान सफेद रंगवाले अर्जुनके घोड़ोंको छोड़कर उस विशाल रथसे कूद पड़े और केवल भुजाओंका ही आयुध लिये हाथोंमें चाबुक उठाये बारंबार सिंहनाद करते हुए बलवान् एवं तेजस्वी श्रीहरि भीष्मकी ओर बड़े वेगसे दौड़े ॥ ५५—५७ ॥
दारयन्निव पद्भ्यां स जगतीं जगदीश्वरः ।
क्रोधताम्रेक्षणः कृष्णो जिघांसुरमितद्युतिः ॥ ५८ ॥
सम्पूर्ण जगत्के स्वामी, अमित तेजस्वी भगवान् श्रीकृष्ण क्रोधसे लाल आँखें करके भीष्मको मार डालनेकी इच्छा लेकर पैरोंकी धमकसे वसुधाको विदीर्ण-सी कर रहे थे ॥ ५८ ॥
ग्रसन्तमिव चेतांसि तावकानां महाहवे ।
दृष्ट्वा माधवमाक्रन्दे भीष्मायोद्यतमन्तिके ॥ ५९ ॥ हतो भीष्मो हतो भीष्मस्तत्र तत्र वचो महत् । अश्रूयत महाराज वासुदेवभयात् तदा ॥ ६० ॥ भगवान् श्रीकृष्ण उस महायुद्धमें आपके पुत्रों और सैनिकोंकी चेतनाको मानो अपना ग्रास बनाये ले रहे थे। महाराज! उस मार-काटमें माधवको समीप आकर भीष्मके वधके लिये उद्यत हुआ देख उस समय उन वासुदेवके भयसे चारों ओर यह महान् कोलाहल सुनायी देने लगा कि ‘भीष्म मारे गये, भीष्म मारे गये’ ॥ ५९-६० ॥
पीतकौशेयसंवीतो मणिश्यामो जनार्दनः । शुशुभे विद्रवन् भीष्मं विद्युन्माली यथाम्बुदः ॥ ६१ ॥ रेशमी पीताम्बर धारण किये इन्द्रनीलमणिके समान श्यामसुन्दर श्रीकृष्ण भीष्मकी ओर दौड़ते समय ऐसी शोभा पा रहे थे, मानो विद्युन्मालासे अलंकृत श्याममेघ जा रहा हो ॥ ६१ ॥
स सिंह इव मातङ्गं यूथर्षभ इवर्षभम् । अभिदुद्राव वेगेन विनदन् यादवर्षभः ॥ ६२ ॥ यादवशिरोमणि बारंबार गर्जना करते हुए भीष्मके ऊपर उसी प्रकार वेगसे धावा कर रहे थे, जैसे सिंह गजराजपर और गोयूथका स्वामी साँड़ दूसरे साँड़पर आक्रमण करता है ॥ ६२ ॥
तमापतन्तं सम्प्रेक्ष्य पुण्डरीकाक्षमाहवे । असम्भ्रमं रणे भीष्मो विचकर्ष महद् धनुः ॥ ६३ ॥ उस महासमरमें कमलनयन श्रीकृष्णको आते देख भीष्म उस रणक्षेत्रमें तनिक भी भयभीत न होकर अपने विशाल धनुषको खींचने लगे ॥ ६३ ॥
उवाच चैव गोविन्दमसम्भ्रान्तेन चेतसा । एह्येहि पुण्डरीकाक्ष देवदेव नमोऽस्तु ते ॥ ६४ ॥ साथ ही व्यग्रताशून्य मनसे भगवान् गोविन्दको सम्बोधित करके बोले—‘आइये, आइये, कमलनयन! देवदेव! आपको नमस्कार है ॥ ६४ ॥
मामद्य सात्वतश्रेष्ठ पातयस्व महाहवे । त्वया हि देव संग्रामे हतस्यापि ममानघ ॥ ६५ ॥ श्रेय एव परं कृष्ण लोके भवति सर्वतः । ‘सात्वतशिरोमणे! इस महासमरमें आज मुझे मार गिराइये। देव! निष्पाप श्रीकृष्ण! आपके द्वारा संग्राममें मारे जानेपर भी संसारमें सब ओर मेरा परम कल्याण ही होगा ॥ ६५ ½ ॥
सम्भावितोऽस्मि गोविन्द त्रैलोक्येनाद्य संयुगे ॥ ६६ ॥ प्रहरस्व यथेष्टं वै दासोऽस्मि तव चानघ ।
‘गोविन्द! आज इस युद्धमें मैं तीनों लोकोंद्वारा सम्मानित हो गया। अनघ! मैं आपका दास हूँ। आप अपनी इच्छाके अनुसार मुझपर प्रहार कीजिये’।। ६६ १/२ ।। अन्वगेव ततः पार्थः समभिद्रुत्य केशवम् ।। ६७ ।। निजग्राह महाबाहुर्बाहुभ्यां परिगृह्य वै । इधर महाबाहु अर्जुन श्रीकृष्णके पीछे-पीछे दौड़ रहे थे। उन्होंने अपनी दोनों भुजाओंसे उन्हें पकड़कर काबूमें कर लिया ।। ६७ १/२ ।। निगृह्यमाणः पार्थेन कृष्णो राजीवलोचनः ।। ६८ ।। जगामैवैनमादाय वेगेन पुरुषोत्तमः । अर्जुनके द्वारा पकड़े जानेपर भी कमलनयन पुरुषोत्तम भगवान् श्रीकृष्ण उन्हें लिये-दिये ही वेगपूर्वक आगे बढ़ने लगे ।। ६८ १/२ ।। पार्थस्तु विष्टभ्य बलाच्चरणौ परवीरहा ।। ६९ ।। निजग्राह हृषीकेशं कथंचिद् दशमे पदे । तब शत्रुवीरोंका संहार करनेवाले अर्जुनने बलपूर्वक भगवान्के चरणोंको पकड़ लिया और इस प्रकार दसवें कदमतक जाते-जाते वे किसी प्रकार हृषीकेशको रोकनेमें सफल हो सके ।। ६९ १/२ ।। तत एवमुवाचार्तः क्रोधपर्याकुलेक्षणम् ।। ७० ।। निःश्वसन्तं यथा नागमर्जुनः प्रणयात् सखा । निवर्तस्व महाबाहो नानृतं कर्तुमर्हसि ।। ७१ ।। उस समय श्रीकृष्णके नेत्र क्रोधसे व्याप्त हो रहे थे और वे फुफकारते हुए सर्पके समान लम्बी साँस खींच रहे थे। उनके सखा अर्जुन आर्तभावसे प्रेमपूर्वक बोले—‘महाबाहो! लौटिये, अपनी प्रतिज्ञाको झूठी न कीजिये ।। ७०-७१ ।। यत् त्वया कथितं पूर्वं न योत्स्यामीति केशव । मिथ्यावादीति लोकास्त्वां कथयिष्यन्ति माधव ।। ७२ ।। ‘केशव! आपने पहले जो यह कहा था कि ‘मैं युद्ध नहीं करूँगा’ उस वचनकी रक्षा कीजिये। अन्यथा माधव! लोग आपको मिथ्यावादी कहेंगे ।। ७२ ।। ममैष भारः सर्वो हि हनिष्यामि पितामहम् । शपे केशव शस्त्रेण सत्येन सुकृतेन च ।। ७३ ।। ‘केशव! यह सारा भार मुझपर है। मैं अपने अस्त्र-शस्त्र, सत्य और सुकृतकी शपथ खाकर कहता हूँ कि पितामह भीष्मका वध करूँगा ।। ७३ ।। अन्तं यथा गमिष्यामि शत्रूणां शत्रुसूदन । अद्यैव पश्य दुर्धर्षं पात्यमानं महारथम् ।। ७४ ।। तारापतिमिवापूर्णमन्तकाले यदृच्छया ।
'शत्रुसूदन! मैं सब शत्रुओंका अन्त कर डालूँगा। देखिये, आज ही मैं पूर्ण चन्द्रमाके समान दुर्जय वीर महारथी भीष्मको उनके अन्तिम समयमें इच्छानुसार मार गिराता हूँ' ॥ ७४ १/२ ॥
माधवस्तु वचः श्रुत्वा फाल्गुनस्य महात्मनः ॥ ७५ ॥
(अभवत् परमप्रीतो ज्ञात्वा पार्थस्य विक्रमम् ।)
न किंचिदुक्त्वा सक्रोध आरुरोह रथं पुनः ।
महामना अर्जुनका यह वचन सुनकर उनके पराक्रमको जानते हुए भगवान् श्रीकृष्ण मन-ही-मन अत्यन्त प्रसन्न हुए और ऊपरसे कुछ भी न बोलकर पुनः क्रोधपूर्वक ही रथपर जा बैठे ॥ ७४ १/२ ॥
तौ रथस्थौ नरव्याघ्रौ भीष्मः शान्तनवः पुनः ॥ ७६ ॥
ववर्ष शरवर्षेण मेघो वृष्ट्या यथाचलौ ।
पुरुषसिंह श्रीकृष्ण और अर्जुनको रथपर बैठे देख शान्तनुनन्दन भीष्मने पुनः उनपर बाणोंकी वर्षा आरम्भ कर दी, मानो मेघ दो पर्वतोंपर जलकी धारा गिरा रहा हो ॥ ७६ १/२ ॥
प्राणानादत्त योधानां पिता देवव्रतस्तव ॥ ७७ ॥
गभस्तिभिरिवाहित्यस्तेजांसि शिशिरात्यये ।
राजन्! आपके ताऊ देवव्रत उसी प्रकार पाण्डव योद्धाओंके प्राण लेने लगे, जैसे ग्रीष्म-ऋतुमें सूर्य अपनी किरणोंद्वारा सबके तेज हर लेते हैं ॥ ७७ १/२ ॥
यथा कुरूणां सैन्यानि बभञ्जुर्युधि पाण्डवाः ॥ ७८ ॥
तथा पाण्डवसैन्यानि बभञ्ज युधि ते पिता ।
महाराज! जैसे पाण्डवोंने युद्धमें कौरव-सेनाओंको खदेड़ा था, उसी प्रकार आपके ताऊ भीष्मने भी पाण्डव-सेनाओंको मार भगाया ॥ ७८ १/२ ॥
हतविद्रुतसैन्यास्तु निरुत्साहा विचेतसः ॥ ७९ ॥
निरीक्षितुं न शेकुस्ते भीष्ममप्रतिमं रणे ।
मध्यंगतमियादित्यं प्रतपन्तं स्वतेजसा ॥ ८० ॥
घायल होकर भागे हुए सैनिक उत्साहशून्य और अचेत हो रहे थे। वे रणक्षेत्रमें अनुपम वीर भीष्मजीकी ओर आँख उठाकर देख भी न सके, ठीक उसी तरह, जैसे दोपहरमें अपने तेजसे तपते हुए सूर्यकी ओर कोई भी देख नहीं पाता ॥ ७९-८० ॥
ते वध्यमाना भीष्मेण शतशोऽथ सहस्रशः ।
कुर्वाणं समरे कर्माण्यतिमानुषविक्रमम् ॥ ८१ ॥
वीक्षांचक्रुर्महाराज पाण्डवा भयपीडिताः ।
महाराज! भीष्मके द्वारा मारे जाते हुए सैकड़ों और हजारों पाण्डव सैनिक समरमें अलौकिक पराक्रम प्रकट करनेवाले भीष्मको भयसे पीड़ित होकर देख रहे थे ॥ ८१ १/२ ॥
तथा पाण्डवसैन्यानि द्राव्यमाणानि भारत ॥ ८२ ॥
त्रातारं नाध्यगच्छन्त गावः पङ्कगता इव ।
पिपीलिका इव क्षुण्णा दुर्बला बलिना रणे ।। ८३ ।।
भारत! भागती हुई पाण्डव-सेनाएँ कीचड़में फँसी हुई गायोंकी भाँति किसीको अपना रक्षक नहीं पाती थीं। समरभूमिमें बलवान् भीष्मने उन दुर्बल सैनिकोंको चींटियोंकी भाँति मसल डाला ।। ८२-८३ ।।
महारथं भारत दुष्प्रकम्पं
शरौघिणं प्रतपन्तं नरेन्द्रान् ।
भीष्मं न शेकुः प्रतिवीक्षितुं ते
शरार्चिषं सूर्यमिवातपन्तम् ।। ८४ ।।
भारत! महारथी भीष्म अविचलभावसे खड़े होकर बाणोंकी वर्षा करते और पाण्डव-पक्षीय नरेशोंको संताप देते थे। बाणरूपी किरणावलियोंसे सुशोभित और सूर्यकी भाँति तपते हुए भीष्मकी ओर वे देख भी नहीं पाते थे ।। ८४ ।।
विमृद्नतस्तस्य तु पाण्डुसेना-
मस्तं जगामाथ सहस्ररश्मिः ।
ततो बलानां श्रमकर्शितानां
मनोऽवहारं प्रति सम्बभूव ।। ८५ ।।
भीष्म पाण्डव-सेनाको जब इस प्रकार रौंद रहे थे, उसी समय सहस्रों किरणोंसे सुशोभित भगवान् सूर्य अस्ताचलको चले गये। उस समय परिश्रमसे थकी हुई समस्त सेनाओंके मनमें यही इच्छा हो रही थी कि अब युद्ध बंद हो जाय ।। ८५ ।।
इति श्रीमहाभारते भीष्मपर्वणि भीष्मवधपर्वणि नवमदिवसयुद्धसमाप्तौ
षडधिकशततमोऽध्यायः ।। १०६ ।।
इस प्रकार श्रीमहाभारत भीष्मपर्वके अन्तर्गत भीष्मवधपर्वमें नवें दिनके युद्धका
समाप्तिविषयक एक सौ छठा अध्याय पूरा हुआ ।। १०६ ।।
[दाक्षिणात्य अधिक पाठके ४ १/२ श्लोक मिलाकर कुल ८९ १/२ श्लोक हैं।]
१०७-
सप्ताधिकशततमोऽध्यायः
नवें दिनके युद्धकी समाप्ति, रातमें पाण्डवोंकी गुप्त मन्त्रणा तथा श्रीकृष्णसहित पाण्डवोंका भीष्मसे मिलकर उनके वधका उपाय जानना
संजय उवाच
युध्यतामेव तेषां तु भास्करेऽस्तमुपागते ।
संध्या समभवद् घोरा नापश्याम ततो रणम् ॥ १ ॥
संजय कहते हैं— राजन्! कौरवों और पाण्डवोंके युद्ध करते समय ही सूर्यदेव अस्ताचलको चले गये और भयंकर संध्याकाल आ गया। फिर हमलोगोंने युद्ध नहीं देखा ॥ १ ॥
ततो युधिष्ठिरो राजा संध्यां संदृश्य भारत ।
वध्यमानं च भीष्मेण त्यक्तास्त्रं भयविह्वलम् ॥ २ ॥
(निरुत्साहं बलं दृष्ट्वा पीडितं शरविक्षतम् ।)
स्वसैन्यं च परावृत्तं पलायनपरायणम् ।
भीष्मं च युधि संरब्धं पीडयन्तं महारथम् ॥ ३ ॥
सोमकांश्च जितान् दृष्ट्वा निरुत्साहान् महारथान् ।
(निशामुखं च सम्प्रेक्ष्य घोररूपं भयानकम् ।)
चिन्तयित्वा ततो राजा अवहारमरोचयत् ॥ ४ ॥
भरतनन्दन! तत्पश्चात् राजा युधिष्ठिरने देखा कि संध्या हो गयी। भीष्मके द्वारा गहरी चोट खाकर मेरी सेनाने भयसे व्याकुल हो हथियार डाल दिया है। किसीमें लड़नेका उत्साह नहीं रह गया है। सारी सेना बाणोंसे क्षत-विक्षत हो अत्यन्त पीड़ित हो गयी है। कितने ही सैनिक युद्धसे विमुख हो भागने लग गये हैं। उधर महारथी भीष्म क्रोधमें भरकर युद्धस्थलमें सबको पीड़ा दे रहे हैं। सोमवंशी महारथी पराजित होकर अपना उत्साह खो बैठे हैं और घोररूप भयानक प्रदोषकाल आ पहुँचा है। इन सब बातोंपर विचार करके राजा युधिष्ठिरने सेनाको युद्धसे लौटा लेना ही ठीक समझा ॥ २—४ ॥
(कथं जयेम भीष्मं वै महाबलपराक्रमम् ।
बुद्धिं स्वशिविरं गन्तुं चक्रे राजा युधिष्ठिरः ॥)
महान् बल और पराक्रमसे सम्पन्न भीष्मको हम किस प्रकार जीत सकेंगे, यही सोचते हुए राजा युधिष्ठिरने अपने शिविरमें जानेका विचार किया।
ततोऽवहारं सैन्यानां चक्रे राजा युधिष्ठिरः ।
तथैव तव सैन्यानामवहारो ह्यभूत् तदा ॥ ५ ॥
इसके बाद महाराज युधिष्ठिरने अपनी सेनाको पीछे लौटा लिया। इसी प्रकार आपकी सेना भी उस समय युद्धस्थलसे शिविरकी ओर लौट चली ॥ ५ ॥
ततोऽवहारं सैन्यानां कृत्वा तत्र महारथाः ।
न्यविशन्त कुरुश्रेष्ठ संग्रामे क्षतविक्षताः ॥ ६ ॥
कुरुश्रेष्ठ! इस प्रकार संग्राममें क्षत-विक्षत हुए वे सब महारथी सेनाको लौटाकर शिविरमें विश्राम करने लगे ॥ ६ ॥
भीष्मस्य समरे कर्म चिन्तयानास्तु पाण्डवाः ।
नालभन्त तदा शान्तिं भीष्मबाणप्रपीडिताः ॥ ७ ॥
पाण्डव भीष्मके बाणोंसे अत्यन्त पीड़ित हो रहे थे। उन्हें समरांगणमें भीष्मके पराक्रमका चिन्तन करके तनिक भी शान्ति नहीं मिलती थी ॥ ७ ॥
भीष्मोऽपि समरे जित्वा पाण्डवान् सहसृंजयान् ।
पूज्यमानस्तव सुतैर्वन्द्यमानश्च भारत ॥ ८ ॥
न्यविशत् कुरुभिः सार्धं हृष्टरूपैः समन्ततः ।
भारत! भीष्म भी समरभूमिमें सृंजयों तथा पाण्डवोंको जीतकर आपके पुत्रोंद्वारा प्रशंसित और अभिवन्दित हो अत्यन्त हर्षमें भरे हुए कौरवोंके साथ शिविरमें गये ॥
ततो रात्रिः समभवत् सर्वभूतप्रमोहिनी ॥ ९ ॥
तस्मिन् रात्रिमुखे घोरे पाण्डवा वृष्णिभिः सह ।
सृंजयाश्च दुराधर्षा मन्त्राय समुपाविशन् ॥ १० ॥
तत्पश्चात् सम्पूर्ण भूतोंको मोहमयी निद्रामें डालनेवाली रात्रि आ गयी। उस भयंकर रात्रिके आरम्भकालमें वृष्णिवंशियोंसहित दुर्धर्ष सृंजय और पाण्डव गुप्तमन्त्रणाके लिये एक साथ बैठे ॥ ९-१० ॥
आत्मनिःश्रेयसं सर्वे प्राप्तकालं महाबलाः ।
मन्त्रयामासुरव्यग्रा मन्त्रनिश्चयकोविदाः ॥ ११ ॥
उस समय वे समस्त महाबली वीर समयानुसार अपनी भलाईके प्रश्नपर स्वस्थचित्तसे विचार करने लगे। वे सभी लोग मन्त्रणा करके किसी निश्चयपर पहुँच जानेमें कुशल थे ॥ ११ ॥
(हनिष्याम यथा भीष्मं जयेम पृथिवीमिमाम् ॥)
ततो युधिष्ठिरो राजा मन्त्रयित्वा चिरं नृप ।
वासुदेवं समुद्वीक्ष्य वचनं चेदमाददे ॥ १२ ॥
उनमें यह विचार होने लगा कि हम भीष्मको कैसे मार सकेंगे और किस प्रकार इस पृथ्वीपर विजय प्राप्त करेंगे। नरेश्वर! उस समय राजा युधिष्ठिरने दीर्घकालतक गुप्तमन्त्रणा करनेके पश्चात् वसुदेवनन्दन भगवान् श्रीकृष्णकी ओर देखकर यह बात कही— ॥ १२ ॥
कृष्ण पश्य महात्मानं भीष्मं भीमपराक्रमम् ।
गजं नलवनानीव विमृद्नन्तं बलं मम ॥ १३ ॥
‘श्रीकृष्ण! देखिये, भयंकर पराक्रमी महात्मा भीष्म हमारी सेनाका उसी प्रकार विनाश कर रहे हैं, जैसे हाथी सरकंडोंके जंगलोंको रौंद डालते हैं ॥ १३ ॥
(मम माधव सैन्येषु वध्यमानेषु तेन वै ।
कथं योत्स्याम दुर्धर्ष श्रेयो मेऽत्र विधीयताम् ॥
त्वमेव गतिरस्माकं नान्यां गतिमुपास्महे ।
न युद्धं रोचते मह्यं भीष्मेण सह माधव ।
हन्ति भीष्मो महावीरो मम सैन्यं च संयुगे ॥)
‘माधव! इनके द्वारा जब हमारी सेनाएँ मारी जा रही हैं, उस अवस्थामें इन दुर्धर्ष वीर भीष्मके साथ हमलोग कैसे युद्ध करें? यहाँ जिस प्रकार हमारा भला हो, वह उपाय कीजिये। माधव! आप ही हमारे आश्रय हैं। हम दूसरे किसीका सहारा नहीं लेते। हमें भीष्मजीके साथ युद्ध करना अच्छा नहीं लगता है। इधर महावीर भीष्म युद्धस्थलमें हमारी सेनाका संहार करते चले जा रहे हैं।
न चैवैनं महात्मानमुत्सहामो निरीक्षितुम् ।
लेलिह्यमानं सैन्येषु प्रवृद्धमिव पावकम् ॥ १४ ॥
‘ये प्रज्वलित अग्निके समान बाणोंकी लपटोंसे हमारी सेनामें सबको चाटते (भस्म करते) जा रहे हैं, हमलोग इन महात्माकी ओर देख भी नहीं पा रहे हैं ॥ १४ ॥
यथा घोरो महानागस्तक्षको वै विषोल्बणः ।
तथा भीष्मो रणे क्रुद्धस्तीक्ष्णशस्त्रः प्रतापवान् ॥ १५ ॥
गृहीतचापः समरे प्रमुञ्चन् निशिताञ्छरान् ।
‘जैसे महानाग तक्षक अपने प्रचण्ड विषके कारण भयंकर प्रतीत होता है, उसी प्रकार क्रोधमें भरे हुए प्रतापी भीष्म युद्धस्थलमें जब हाथमें धनुष लेकर पैने बाणोंकी वर्षा करने लगते हैं, उस समय अपने तीखे अस्त्र-शस्त्रोंके कारण बड़े भयानक जान पड़ते हैं ॥ १५ १/२ ॥
शक्यो जेतुं यमः क्रुद्धो वज्रपाणिश्च देवराट् ॥ १६ ॥
वरुणः पाशभृच्चापि सगदो वा धनेश्वरः ।
न तु भीष्मः सुसंक्रुद्धः शक्यो जेतुं महाहवे ॥ १७ ॥
‘समरभूमिमें क्रोधमें भरे हुए यमराज, वज्रधारी इन्द्र, पाशधारी वरुण अथवा गदाधारी कुबेरको भी जीता जा सकता है; परंतु इस महासमरमें कुपित भीष्मको पराजित करना असम्भव है ॥ १६-१७ ॥
सोऽहमेवंगते कृष्ण निमग्नः शोकसागरे ।
आत्मनो बुद्धिदौर्बल्याद् भीष्ममासाद्य संयुगे ॥ १८ ॥
‘श्रीकृष्ण! ऐसी स्थितिमें मैं अपनी बुद्धिकी दुर्बलताके कारण युद्धस्थलमें भीष्मको सामने देखकर शोकके समुद्रमें डूबा जा रहा हूँ॥ १८॥ वनं यास्यामि दुर्धर्ष श्रेयो वै तत्र मे गतम् । न युद्धं रोचते कृष्ण हन्ति भीष्मो हि नः सदा ॥ १९ ॥ ‘दुर्धर्ष वीर श्रीकृष्ण! अब मैं वनको चला जाऊँगा। मेरे लिये वनमें जाना ही कल्याणकारी होगा। मुझे युद्ध अच्छा नहीं लग रहा है; क्योंकि उसमें भीष्म सदा ही हमारे सैनिकोंका विनाश करते आ रहे हैं॥ १९॥ यथा प्रज्वलितं वह्निं पतङ्गः समभिद्रवन् । एकतो मृत्युमभ्येति तथाहं भीष्ममीयिवान् ॥ २० ॥ ‘जैसे पतंग प्रज्वलित आगकी ओर दौड़ा जाकर एकमात्र मृत्युको ही प्राप्त होता है, उसी प्रकार हमने भी भीष्मपर आक्रमण करके मृत्युका ही वरण किया है॥ २०॥ क्षयं नीतोऽस्मि वार्ष्णेय राज्यहेतोः पराक्रमी । भ्रातरश्चैव मे शूराः सायकैर्भृशपीडिताः ॥ २१ ॥ ‘वार्ष्णेय! राज्यके लिये पराक्रम करके मैं क्षीण होता जा रहा हूँ। मेरे शूरवीर भाई बाणोंकी मारसे अत्यन्त पीड़ित हो रहे हैं॥ २१॥ मत्कृते भ्रातृसौहार्दाद् राज्यभ्रष्टा वनं गताः । परिक्लिष्टा तथा कृष्णा मत्कृते मधुसूदन ॥ २२ ॥ ‘मधुसूदन! मेरे लिये भ्रातृस्नेहवश ये भाई राज्यसे वंचित हुए और वनमें भी गये। मेरे ही कारण कृष्णाको भरी सभामें अपमानका कष्ट भोगना पड़ा॥ २२॥ जीवितं बहु मन्येऽहं जीवितं ह्यद्य दुर्लभम् । जीवितस्याद्य शेषेण चरिष्ये धर्ममुत्तमम् ॥ २३ ॥ ‘इस समय मैं जीवनको ही बहुत मानता हूँ। आज तो जीवन भी दुर्लभ हो रहा है। अबसे जीवनके जितने दिन शेष हैं, उनके द्वारा मैं उत्तम धर्मका ही आचरण करूँगा॥ २३॥ यदि तेऽहमनुग्राह्यो भ्रातृभिः सह केशव । स्वधर्मस्याविरोधेन हितं व्याहर केशव ॥ २४ ॥ ‘केशव! यदि भाइयोंसहित मुझपर आपका अनुग्रह है तो मुझे स्वधर्मके अनुकूल कोई हितकारक सलाह दीजिये’ ॥ २४ ॥ एवं श्रुत्वा वचस्तस्य कारुण्याद् बहुविस्तरम् । प्रत्युवाच ततः कृष्णः सान्त्वयानो युधिष्ठिरम् ॥ २५ ॥ करुणासे प्रेरित होकर कहे हुए युधिष्ठिरके ये विस्तृत वचन सुनकर श्रीकृष्णने युधिष्ठिरको सान्त्वना देते हुए कहा॥ २५॥ धर्मपुत्र विषादं त्वं मा कृथाः सत्यसङ्गर ।
यस्य ते भ्रातरः शूरा दुर्जयाः शत्रुसूदनाः ॥ २६ ॥ ‘धर्मपुत्र! सत्यप्रतिज्ञ कुन्तीकुमार! विषाद न कीजिये, आपके भाई बड़े ही शूरवीर, दुर्जय तथा शत्रुओंका संहार करनेमें समर्थ हैं॥ २६॥ अर्जुनो भीमसेनश्च वाय्वग्निसमतेजसौ । माद्रीपुत्रौ च विक्रान्तौ त्रिदशानामिवेश्वरौ ॥ २७ ॥ ‘अर्जुन और भीमसेन वायु तथा अग्निके समान तेजस्वी हैं। माद्रीकुमार नकुल और सहदेव भी पराक्रममें दो इन्द्रोंके समान हैं॥ २७॥ मां वा नियुङ्क्ष्व सौहार्दाद् योत्स्ये भीष्मेण पाण्डव । त्वत्प्रयुक्तो महाराज किं न कुर्यां महाहवे ॥ २८ ॥ ‘पाण्डुनन्दन! महाराज! आप सौहार्दवश मुझे भी आज्ञा दीजिये। मैं भीष्मके साथ युद्ध करूँगा। भला आपकी आज्ञा मिल जानेपर मैं इस महासमरमें क्या नहीं कर सकता ॥ २८॥ हनिष्यामि रणे भीष्ममाहूय पुरुषर्षभम् । पश्यतां धार्तराष्ट्राणां यदि नेच्छति फाल्गुनः ॥ २९ ॥ ‘यदि अर्जुन भीष्मको मारना नहीं चाहते हैं तो मैं युद्धमें पुरुषप्रवर भीष्मको ललकारकर धृतराष्ट्रपुत्रोंके देखते-देखते मार डालूँगा ॥ २९॥ यदि भीष्मे हते वीरे जयं पश्यसि पाण्डव । हन्तास्म्येकरथेनाद्य कुरुवृद्धं पितामहम् ॥ ३० ॥ ‘पाण्डुनन्दन! यदि भीष्मके मारे जानेपर ही आपको अपनी विजय दिखायी दे रही है तो मैं एकमात्र रथकी सहायतासे आज कुरुकुलवृद्ध पितामह भीष्मको मार डालूँगा ॥ ३०॥ पश्य मे विक्रमं राजन् महेन्द्रस्येव संयुगे । विमुञ्चन्तं महास्त्राणि पातयिष्यामि तं रथात् ॥ ३१ ॥ ‘राजन्! कल युद्धमें इन्द्रके समान मेरा पराक्रम देखियेगा। मैं बड़े-बड़े अस्त्रोंका प्रहार करनेवाले भीष्मको रथसे मार गिराऊँगा ॥ ३१॥ यः शत्रुः पाण्डुपुत्राणां मच्छत्रुः स न संशयः । मदर्था भवदीया ये ये मदीयास्तवैव ते ॥ ३२ ॥ ‘जो पाण्डवोंका शत्रु है, वह मेरा भी शत्रु है, इसमें संदेह नहीं है। जो आपके सुहृद् हैं, वे मेरे हैं और जो मेरे सुहृद् हैं, वे आपके ही हैं॥ ३२॥ तव भ्राता मम सखा सम्बन्धी शिष्य एव च । मांसान्युत्कृत्य दास्यामि फाल्गुनार्थे महीपते ॥ ३३ ॥ ‘राजन्! आपके भाई अर्जुन मेरे सखा, सम्बन्धी और शिष्य हैं। मैं अर्जुनके लिये अपना मांस भी काटकर दे दूँगा॥ ३३॥
एष चापि नरव्याघ्रो मत्कृते जीवितं त्यजेत् । एष नः समयस्तात तारयेम परस्परम् ॥ ३४ ॥ 'ये पुरुषसिंह अर्जुन भी मेरे लिये अपने प्राणोंतकका परित्याग कर सकते हैं। तात! हमलोगोंमें यह प्रतिज्ञा हो चुकी है कि हम एक-दूसरेको संकटसे उबारेंगे ॥ ३४ ॥ स मां नियुङ्क्ष्व राजेन्द्र यथा योद्धा भवाम्यहम् । प्रतिज्ञातमुपप्लव्ये यत् तत् पार्थेन पूर्वतः ॥ ३५ ॥ घातयिष्यामि गाङ्गेयमिति लोकस्य संनिधौ । परिरक्ष्यमिदं तावद् वचः पार्थस्य धीमतः ॥ ३६ ॥ 'राजेन्द्र! आप मुझे युद्धके काममें नियुक्त कीजिये। मैं आपका योद्धा बनूँगा। युद्धके पहले उपप्लव्यनगरमें सब लोगोंके सामने अर्जुनने जो यह प्रतिज्ञा की थी कि मैं गंगानन्दन भीष्मका वध करूँगा, बुद्धिमान् पार्थके उस वचनका पालन करना मेरे लिये आवश्यक है ॥ ३५-३६ ॥ अनुज्ञातं तु पार्थेन मया कार्यं न संशयः । अथवा फाल्गुनस्यैष भारः परिमितो रणे ॥ ३७ ॥ 'अर्जुनने जिस बातके लिये प्रतिज्ञा की हो, उसकी पूर्ति करना मेरा कर्तव्य है, इसमें संशय नहीं है अथवा रणक्षेत्रमें अर्जुनके लिये यह बहुत थोड़ा भार है ॥ ३७ ॥ स हनिष्यति संग्रामे भीष्मं परपुरञ्जयम् । अशक्यमपि कुर्याद्धि रणे पार्थः समुद्यतः ॥ ३८ ॥ 'वे शत्रुनगरीपर विजय पानेवाले भीष्मको युद्धमें अवश्य मार डालेंगे। कुन्तीपुत्र अर्जुन उद्यत हो जायँ तो युद्धमें असम्भवको भी सम्भव कर सकते हैं ॥ ३८ ॥ त्रिदशान् वा समुद्युक्तान् सहितान् दैत्यदानवैः । निहन्यादर्जुनः संख्ये किमु भीष्मं नराधिप ॥ ३९ ॥ 'नरेश्वर! दैत्यों और दानवोंसहित सम्पूर्ण देवताओंको भी अर्जुन युद्धमें मार सकते हैं; फिर भीष्मको मारना कौन बड़ी बात है ॥ ३९ ॥ विपरीतो महावीर्यो गतसत्त्वोऽल्पजीवनः । भीष्मः शान्तनवो नूनं कर्तव्यं नावबुध्यते ॥ ४० ॥ 'महापराक्रमी शान्तनुनन्दन भीष्म तो हमारे विपरीत पक्षका आश्रय लेनेवाले और बलहीन हैं। इनके जीवनके दिन अब बहुत थोड़े रह गये हैं, तथापि यह निश्चितरूपसे कहा जा सकता है कि वे अपने कर्तव्यको नहीं समझ रहे हैं' ॥ ४० ॥
युधिष्ठिर उवाच एवमेतन्महाबाहो यथा वदसि माधव । सर्वे ह्येते न पर्याप्तास्तव वेगविधारणे ॥ ४१ ॥
युधिष्ठिरने कहा—महाबाहो! माधव! आप जैसा कहते हैं, ठीक ऐसी ही बात है। ये समस्त कौरव आपका वेग धारण करनेमें समर्थ नहीं हैं ॥ ४१ ॥ नियतं समवाप्स्यामि सर्वमेतद् यथेप्सितम् । यस्य मे पुरुषव्याघ्र भवान् पक्षे व्यवस्थितः ॥ ४२ ॥ पुरुषसिंह! जिसके पक्षमें आप खड़े हैं, वह मैं यह सब अभीष्ट मनोरथ अवश्य पूर्ण कर लूँगा ॥ ४२ ॥ सेन्द्रानपि रणे देवाञ्जयेयं जयतां वर । त्वया नाथेन गोविन्द किमु भीष्मं महारथम् ॥ ४३ ॥ विजयी वीरोंमें श्रेष्ठ गोविन्द! आपको अपना रक्षक पाकर मैं युद्धमें इन्द्रसहित सम्पूर्ण देवताओंको भी जीत सकता हूँ; फिर महारथी भीष्मपर विजय पाना कौन बड़ी बात है ॥ ४३ ॥ न तु त्वामनृतं कर्तुमुत्सहे स्वात्मगौरवात् । अयुध्यमानः साहाय्यं यथोक्तं कुरु माधव ॥ ४४ ॥ माधव! परंतु मैं अपनी गुरुताका प्रभाव डालकर आपको असत्यवादी नहीं बना सकता। आप युद्ध किये बिना ही पूर्वोक्त सहायता करते रहिये ॥ ४४ ॥ समयस्तु कृतः कश्चिन्मम भीष्मेण संयुगे । मन्त्रयिष्ये तवार्थाय न तु योत्स्ये कथञ्चन ॥ ४५ ॥ दुर्योधनार्थं योत्स्यामि सत्यमेतदिति प्रभो । मेरी भीष्मजीके साथ एक शर्त हो चुकी है। उन्होंने कहा है कि 'मैं युद्धमें तुम्हारे हितके लिये सलाह दे सकता हूँ, परंतु तुम्हारी ओरसे किसी प्रकार युद्ध नहीं करूँगा। युद्ध तो मैं केवल दुर्योधनके लिये ही करूँगा।' प्रभो! यह बिलकुल सच्ची बात है ॥ ४५ १/२ ॥ स हि राज्यस्य मे दाता मन्त्रस्यैव च माधव ॥ ४६ ॥ तस्माद् देवव्रतं भूयो वधोपायार्थमात्मनः । भवता सहिताः सर्वे प्रयाम मधुसूदन ॥ ४७ ॥ अतः माधव! भीष्मजी मुझे राज्य और मन्त्र (हितकर सलाह) दोनों देंगे। इसलिये मधुसूदन! हम सब लोग पुनः आपके साथ देवव्रत भीष्मके पास उन्हींसे उनके वधका उपाय पूछने चलें ॥ ४६-४७ ॥ तद् वयं सहिता गत्वा भीष्ममाशु नरोत्तमम् । नचिरात् सर्वे वार्ष्णेय मन्त्रं पृच्छाम कौरवम् ॥ ४८ ॥ वृष्णिनन्दन! हम सब लोग शीघ्र ही एक साथ कुरुवंशी नरश्रेष्ठ भीष्मके पास चलें और उनसे सलाह लें ॥ ४८ ॥ स वक्ष्यति हितं वाक्यं सत्यमस्माज्जर्नादन । यथा च वक्ष्यते कृष्ण तथा कर्तास्मि संयुगे ॥ ४९ ॥
जनार्दन! पूछनेपर वे हमें सत्य और हितकर बात बतायेंगे। श्रीकृष्ण! वे जैसा कहेंगे, युद्धमें वैसा ही करूँगा।।
स नो जयस्य दाता स्यान्मन्त्रस्य च दृढव्रतः।
बालाः पित्रा विहीनाश्च तेन संवर्धिता वयम् ।। ५० ।।
दृढ़तापूर्वक व्रतका पालन करनेवाले भीष्मजी हमारे लिये विजय और सलाहके भी दाता हो सकते हैं। बाल्यावस्थामें जब हम पितृहीन हो गये थे, उस समय उन्होंने ही हमारा पालन-पोषण किया था।। ५० ।।
तं चेत् पितामहं वृद्धं हन्तुमिच्छामि माधव ।
पितुः पितरमिष्टं च धिगस्तु क्षत्रजीविकाम् ।। ५१ ।।
माधव! यद्यपि वे हमारे पिताके भी पिता और प्रिय हैं, तो भी उन बूढ़े पितामह भीष्मको भी मैं मारना चाहता हूँ। क्षत्रियकी इस जीविकाको धिक्कार है! ।। ५१ ।।
संजय उवाच
ततोऽब्रवीन्महाराज वार्ष्णेयः कुरुनन्दनम् ।
रोचते मे महाप्राज्ञ राजेन्द्र तव भाषितम् ।। ५२ ।।
**संजय कहते हैं—**महाराज! तब भगवान् श्रीकृष्णने कुरुनन्दन युधिष्ठिरसे कहा—'महामते राजेन्द्र! आपका कथन मुझे ठीक जान पड़ता है ।। ५२ ।।
देवव्रतः कृती भीष्मः प्रेक्षितेनापि निर्दहेत् ।
गम्यतां स वधोपायं प्रष्टुं सागरगासुतः ।। ५३ ।।
'देवव्रत भीष्म पुण्यात्मा पुरुष हैं। वे दृष्टिपातमात्रसे सबको दग्ध कर सकते हैं; अतः गङ्गानन्दन भीष्मसे उनके वधका उपाय पूछनेके लिये आप अवश्य उनके पास चलें ।। ५३ ।।
वक्तुमर्हति सत्यं स त्वया पृष्टो विशेषतः ।
ते वयं तत्र गच्छामः प्रष्टुं कुरुपितामहम् ।। ५४ ।।
गत्वा शान्तनवं वृद्धं मन्त्रं पृच्छाम भारत ।
स वो दास्यति मन्त्रं यं तेन योत्स्यामहे परान् ।। ५५ ।।
'विशेषतः आपके पूछनेपर वे अवश्य सच्ची बात बतायेंगे। अतः हम सब लोग मिलकर कुरुकुलके वृद्ध पितामह शान्तनुनन्दन भीष्मसे अभीष्ट प्रश्न पूछनेके लिये साथ-साथ वहाँ चलें और भारत! चलकर उनसे हितकारक मन्त्रणा पूछें। वे आपको ऐसी मन्त्रणा देंगे, जिससे हमलोग शत्रुओंके साथ युद्ध करेंगे ।। ५४-५५ ।।
एवमामन्त्र्य ते वीराः पाण्डवाः पाण्डुपूर्वजम् ।
जग्मुस्ते सहिताः सर्वे वासुदेवश्च वीर्यवान् ।। ५६ ।।
वे वीर पाण्डव इस प्रकार सलाह करके सब एक साथ मिलकर अपने पिता पाण्डुके भी पितृतुल्य भीष्मपितामहके पास गये; उनके साथ पराक्रमी भगवान् वासुदेव भी थे॥ ५६॥
विमुक्तशस्त्रकवचा भीष्मस्य सदनं प्रति।
प्रविश्य च तदा भीष्मं शिरोभिः प्रणिपेदिरे॥ ५७॥
उन सबने अस्त्र-शस्त्र और कवच रख दिये थे। वे भीष्मके शिविरकी ओर गये और उसके भीतर प्रवेश करके उन्होंने भीष्मको मस्तक झुकाकर प्रणाम किया॥ ५७॥
पूजयन्तो महाराज पाण्डवा भरतर्षभम्।
प्रणम्य शिरसा चैनं भीष्मं शरणमभ्ययुः॥ ५८॥
महाराज! पाण्डवोंने भरतश्रेष्ठ भीष्मकी पूजा करते हुए उनके चरणोंमें मस्तक रखकर प्रणाम किया और उन्हींकी शरण ली॥ ५८॥
तानुवाच महाबाहुर्भीष्मः कुरुपितामहः।
स्वागतं तव वार्ष्णेय स्वागतं ते धनंजय॥ ५९॥
स्वागतं धर्मपुत्राय भीमाय यमयोस्तथा।
किं वा कार्यं करोम्यद्य युष्माकं प्रीतिवर्धनम्॥ ६०॥
(युद्धादन्यत्र हे वत्साः व्रियन्तां मा विशङ्कथ।)
सर्वात्मनापि कर्तास्मि यदपि स्यात् सुदुष्करम्।
उस समय कुरुकुलके पितामह महाबाहु भीष्मने उन सब लोगोंसे कहा—'वृष्णिनन्दन! आपका स्वागत है। धनंजय! तुम्हारा भी स्वागत है। धर्मपुत्र युधिष्ठिर, भीमसेन और नकुल-सहदेव सबका स्वागत है। आज मैं तुम सब लोगोंकी प्रसन्नताको बढ़ानेवाला कौन-सा कार्य करूँ। पुत्रो! युद्धके अतिरिक्त जो चाहो, माँग लो, संकोच न करो। तुम्हारी माँग अत्यन्त दुष्कर हो तो भी मैं उसे सब प्रकारसे पूर्ण करूँगा'॥ ५९-६० १/२॥
तथा ब्रुवाणं गाङ्गेयं प्रीतियुक्तं पुनः पुनः॥ ६१॥
उवाच राजा दीनात्मा प्रीतियुक्तमिदं वचः।
गंगानन्दन भीष्म जब बारंबार इस प्रकार प्रसन्नता-पूर्वक कह रहे थे, उस समय राजा युधिष्ठिरने दीन हृदयसे प्रेमपूर्वक यह बात कही—॥ ६१ १/२॥
कथं जयेम सर्वज्ञ कथं राज्यं लभेमहि॥ ६२॥
'सर्वज्ञ! युद्धमें हमारी जीत कैसे हो? हम किस प्रकार राज्य प्राप्त करें?॥ ६२॥
प्रजानां संशयो न स्यात् कथं तन्मे वद प्रभो।
भवान् हि नो वधोपायं ब्रवीतु स्वयमात्मनः॥ ६३॥
प्रभो! हमारी प्रजाका जीवन संकटमें न पड़े, यह कैसे सम्भव हो सकता है? कृपया यह सब मुझे बताइये। आप स्वयं ही हमें अपने वधका उपाय बताइये॥ ६३॥
भवन्तं समरे वीर विषहेम कथं वयम्।