महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
अध्याय (पृष्ठ 2655)
अष्टाविंशोऽध्यायः
सहदेवके द्वारा उलूक और शकुनिका वध एवं बची हुई सेनासहित दुर्योधनका पलायन
संजय उवाच
तस्मिन् प्रवृत्ते संग्रामे गजवाजिनरक्षये ।
शकुनिः सौबलो राजन् सहदेवं समभ्ययात् ॥ १ ॥
**संजय कहते हैं—**राजन्! हाथी-घोड़ों और मनुष्यों-का संहार करनेवाले उस युद्धका आरम्भ होनेपर सुबलपुत्र शकुनिने सहदेवपर धावा किया ॥ १ ॥
ततोऽस्यापततस्तूर्णं सहदेवः प्रतापवान् ।
शरौघान् प्रेषयामास पतङ्गानिव शीघ्रगान् ॥ २ ॥
तब प्रतापी सहदेवने भी अपने ऊपर आक्रमण करनेवाले शकुनिपर तुरंत ही बहुत-से शीघ्रगामी बाणसमूहोंकी वर्षा आरम्भ कर दी, जो आकाशमें टिड्डीदलोंके समान छा रहे थे ॥ २ ॥
उलूकश्च रणे भीमं विव्याध दशभिः शरैः ।
शकुनिश्च महाराज भीमं विद्ध्वा त्रिभिः शरैः ॥ ३ ॥
सायकानां नवत्या वै सहदेवमवाकिरत् ।
महाराज! शकुनिके साथ उलूक भी था, उसने भीमसेनको दस बाणोंसे बींध डाला। फिर शकुनिने भी तीन बाणोंसे भीमको घायल करके नब्बे बाणोंसे सहदेवको ढक दिया ॥ ३ १/२ ॥
ते शूराः समरे राजन् समासाद्य परस्परम् ॥ ४ ॥
विव्यधुर्निशितैर्बाणैः कङ्कबर्हिणवाजितैः ।
स्वर्णपुङ्खैः शिलाधौतैराकर्णप्रहितैः शरैः ॥ ५ ॥
राजन्! वे शूरवीर समरांगणमें एक-दूसरेसे टक्कर लेकर कंक और मोरके-से पंखवाले तीखे बाणोंद्वारा परस्पर आघात-प्रत्याघात करने लगे। उनके वे बाण सुनहरी पाँखोंसे सुशोभित, शिलापर साफ किये हुए और कानोंतक खींचकर छोड़े गये थे ॥ ४-५ ॥
तेषां चापभुजोत्सृष्टा शरवृष्टिर्विशाम्पते ।
आच्छादयद् दिशः सर्वा धारा इव पयोमुचः ॥ ६ ॥
प्रजानाथ! उन वीरोंके धनुष और बाहुबलसे छोड़े गये बाणोंकी उस वर्षाने सम्पूर्ण दिशाओंको उसी प्रकार आच्छादित कर दिया, जैसे मेघकी जलधारा सारी दिशाओंको ढक देती है ॥ ६ ॥
ततः क्रुद्धो रणे भीमः सहदेवश्च भारत । चेरतुः कदनं संख्ये कुर्वन्तौ सुमहाबलौ ॥ ७ ॥ भारत! तदनन्तर क्रोधमें भरे हुए भीमसेन और सहदेव दोनों महाबली वीर युद्धस्थलमें भीषण संहार मचाते हुए विचरने लगे ॥ ७ ॥
ताभ्यां शरशतैश्छन्नं तद् बलं तव भारत । सान्धकारमिवाकाशमभवत् तत्र तत्र ह ॥ ८ ॥ भरतनन्दन! उन दोनोंके सैकड़ों बाणोंसे ढकी हुई आपकी सेना जहाँ-तहाँ अन्धकारपूर्ण आकाशके समान प्रतीत होती थी ॥ ८ ॥
अश्वैर्विपरिधावद्भिः शरच्छन्नैर्विशाम्पते । तत्र तत्र वृतो मार्गो विकर्षद्भिर्हतान् बहून् ॥ ९ ॥ प्रजानाथ! बाणोंसे ढके हुए भागते घोड़ोंने, जो बहुत-से मरे हुए वीरोंको अपने साथ इधर-उधर खींचे लिये जाते थे, यत्र-तत्र जानेका मार्ग अवरुद्ध कर दिया ॥ ९ ॥
निहतानां हयानां च सहैव हयसादिभिः । वर्मभिर्विनिकृत्तैश्च प्रासैश्छिन्नैश्च मारिष ॥ १० ॥ ऋष्टिभिः शक्तिभिश्चैव सासिप्रासपरश्वधैः । संछन्ना पृथिवी जज्ञे कुसुमैः शबला इव ॥ ११ ॥ मान्यवर नरेश! घुड़सवारोंसहित मारे गये घोड़ोंके शरीरों, कटे हुए कवचों, टूक-टूक हुए प्रासों, ऋष्टियों, शक्तियों, खड्गों, भालों और फरसोंसे ढकी हुई पृथ्वी बहुरंगी फूलोंसे आच्छादित हो चितकबरी हुई-सी जान पड़ती थी ॥ १०-११ ॥
योधास्तत्र महाराज समासाद्य परस्परम् । व्यचरन्त रणे क्रुद्धा विनिघ्नन्तः परस्परम् ॥ १२ ॥ महाराज! वहाँ रणभूमिमें कुपित हुए योद्धा एक-दूसरेसे भिड़कर परस्पर चोट करते हुए घूम रहे थे ॥
उद्वृत्तनयनै रोषात् संदष्टौष्ठपुटैर्मुखैः । सकुण्डलैर्मही च्छन्ना पद्मकिञ्जल्कसंनिभैः ॥ १३ ॥ कमलकेसरकी-सी कान्तिवाले कुण्डलमण्डित कटे हुए मस्तकोंसे यह पृथ्वी ढक गयी थी। उनकी आँखें घूर रही थीं और उन्होंने रोषके कारण अपने ओठोंको दाँतोंसे दबा रखा था ॥ १३ ॥
भुजैश्छिन्नैर्महाराज नागराजकरोपमैः । साङ्गदैः सतनूत्रैश्च सासिप्रासपरश्वधैः ॥ १४ ॥ कबन्धरुत्थितैश्छिन्नैर्नृत्यद्भिश्चापरैर्युधि । क्रव्यादगणसंछन्ना घोराभूत् पृथिवी विभो ॥ १५ ॥
महाराज! अंगद, कवच, खड्ग, प्रास और फरसोंसहित कटी हुई हाथीकी सूड़के समान भुजाओं, छिन्न-भिन्न एवं खड़े होकर नाचते हुए कबन्धों तथा अन्य लोगोंसे भरी और मांसभक्षी जीव-जन्तुओंसे आच्छादित हुई यह पृथ्वी बड़ी भयंकर प्रतीत होती थी ॥
अल्पावशिष्टे सैन्ये तु कौरवेयान् महाहवे ।
प्रहृष्टाः पाण्डवा भूत्वा निन्यिरे यमसादनम् ॥ १६ ॥
इस प्रकार उस महासमरमें जब कौरवोंके पास बहुत थोड़ी सेना शेष रह गयी, तब हर्ष और उत्साहमें भरकर पाण्डव वीर उन सबको यमलोक पहुँचाने लगे ॥
एतस्मिन्नन्तरे शूरः सौवलेयः प्रतापवान् ।
प्रासेन सहदेवस्य शिरसि प्राहरद् भृशम् ॥ १७ ॥
इसी समय प्रतापी वीर सुबलपुत्र शकुनिने अपने प्राससे सहदेवके मस्तकपर गहरी चोट पहुँचायी ॥ १७ ॥
स विह्वलो महाराज रथोपस्थ उपाविशत् ।
सहदेवं तथा दृष्ट्वा भीमसेनः प्रतापवान् ॥ १८ ॥
सर्वसैन्यानि संक्रुद्धो वारयामास भारत ।
निर्बिभेद च नाराचैः शतशोऽथ सहस्रशः ॥ १९ ॥
महाराज! उस चोटसे व्याकुल होकर सहदेव रथकी बैठकमें धम्मसे बैठ गये। उनकी वैसी अवस्था देख प्रतापी भीमसेन अत्यन्त कुपित हो उठे। भारत! उन्होंने आपकी सारी सेनाओंको आगे बढ़नेसे रोक दिया तथा सैकड़ों और हजारों नाराचोंकी वर्षा करके उन सबको विदीर्ण कर डाला ॥ १८-१९ ॥
विनिर्भिद्याकरोच्चैव सिंहनादमरिंदमः ।
तेन शब्देन वित्रस्ताः सर्वे सहयवारणाः ॥ २० ॥
प्राद्रवन् सहसा भीताः शकुनेश्च पदानुगाः ।
शत्रुदमन भीमसेनने शत्रुसेनाको विदीर्ण करके बड़े जोरसे सिंहनाद किया। उनकी उस गर्जनासे भयभीत हो शकुनिके पीछे चलनेवाले सारे सैनिक घोड़े और हाथियोंसहित सहसा भाग खड़े हुए ॥ २० १/२ ॥
प्रभग्नानथ तान् दृष्ट्वा राजा दुर्योधनोऽब्रवीत् ॥ २१ ॥
निवर्तध्वमधर्मज्ञा युध्यध्वं किं सृतेन वः ।
इह कीर्तिं समाधाय प्रेत्य लोकान् समश्रुते ॥ २२ ॥
प्राणान् जहाति यो धीरो युद्धे पृष्ठमदर्शयन् ।
उन सबको भागते देख राजा दुर्योधनने इस प्रकार कहा—'अरे पापियो! लौट आओ और युद्ध करो। भागनेसे तुम्हें क्या लाभ होगा? जो धीर वीर रणभूमिमें पीठ न दिखाकर प्राणोंका परित्याग करता है, वह इस लोकमें अपनी कीर्ति स्थापित करके मृत्युके पश्चात् उत्तम लोकोंमें सुख भोगता है' ॥ २१-२२ १/२ ॥
एवमुक्तास्तु ते राज्ञा सौबलस्य पदानुगाः ॥ २३ ॥ पाण्डवानभ्यवर्तन्त मृत्युं कृत्वा निवर्तनम् । राजा दुर्योधनके ऐसा कहनेपर सुबलपुत्र शकुनिके पीछे चलनेवाले सैनिक 'अब हमें मृत्यु ही युद्धसे लौटा सकती है' ऐसा संकल्प लेकर पुनः पाण्डवोंपर टूट पड़े ॥ २३ ॥ द्रवद्भिस्तत्र राजेन्द्र कृतः शब्दोऽतिदारुणः ॥ २४ ॥ क्षुब्धसागरसंकाशाः क्षुभिताः सर्वतोऽभवन् । राजेन्द्र! वहाँ धावा करते समय उन सैनिकोंने बड़ा भयंकर कोलाहल मचाया। वे विक्षुब्ध समुद्रके समान क्षोभमें भरकर सब ओर छा गये ॥ २४ १/२ ॥ तांस्तथा पुरतो दृष्ट्वा सौबलस्य पदानुगान् ॥ २५ ॥ प्रत्युद्ययुर्महाराज पाण्डवा विजयोद्यताः । महाराज! शकुनिके सेवकोंको इस प्रकार सामने आया देख विजयके लिये उद्यत हुए पाण्डव वीर आगे बढ़े ॥ २५ १/२ ॥ प्रत्याश्वस्य च दुर्धर्षः सहदेवो विशाम्पते ॥ २६ ॥ शकुनिं दशभिर्विद्ध्वा हयांश्चास्य त्रिभिः शरैः । धनुश्चिच्छेद च शरैः सौबलस्य हसन्निव ॥ २७ ॥ प्रजानाथ! इतनेहीमें स्वस्थ होकर दुर्धर्ष वीर सहदेवने हँसते हुए-से दस बाणोंसे शकुनिको बींध डाला और तीन बाणोंसे उसके घोड़ोंको मारकर हँसते हुए-से अनेक बाणोंद्वारा सुबलपुत्रके धनुषको भी टूक-टूक कर डाला ॥ २६-२७ ॥ अथान्यद् धनुरादाय शकुनिर्युद्धदुर्दमः । विव्याध नकुलं षष्ट्या भीमसेनं च सप्तभिः ॥ २८ ॥ तदनन्तर दूसरा धनुष हाथमें लेकर रणदुर्मद शकुनिने नकुलको साठ और भीमसेनको सात बाणोंसे घायल कर दिया ॥ २८ ॥ उलूकोऽपि महाराज भीमं विव्याध सप्तभिः । सहदेवं च सप्तत्या परीप्सन् पितरं रणे ॥ २९ ॥ महाराज! रणभूमिमें पिताकी रक्षा करते हुए उलूकने भीमसेनको सात और सहदेवको सत्तर बाणोंसे क्षत-विक्षत कर दिया ॥ २९ ॥ तं भीमसेनः समरे विव्याध नवभिः शरैः । शकुनिं च चतुःषष्ट्या पार्श्वस्थांश्च त्रिभिस्त्रिभिः ॥ ३० ॥ तब भीमसेनने समरांगणमें नौ बाणोंसे उलूकको, चौसठ बाणोंसे शकुनिको और तीन-तीन बाणोंसे उसके पाश्र्वरक्षकोंको भी घायल कर दिया ॥ ३० ॥ ते हन्यमाना भीमेन नाराचैस्तैलपायितैः । सहदेवं रणे क्रुद्धाश्छादयन् शरवृष्टिभिः ॥ ३१ ॥ पर्वतं वारिधाराभिः सविद्युत इवाम्बुदाः ।
भीमसेनके नाराचोंको तेल पिलाया गया था। उनके द्वारा भीमसेनके हाथसे मार खाये हुए शत्रु-सैनिकोंने रणभूमिमें कुपित होकर सहदेवको अपने बाणोंकी वर्षासे ढक दिया, मानो बिजलीसहित मेघोंने जलकी धाराओंसे पर्वतको आच्छादित कर दिया हो ॥
ततोऽस्यापततः शूरः सहदेवः प्रतापवान् ॥ ३२ ॥
उलूकस्य महाराज भल्लेनापाहरच्छिरः ।
महाराज! तब प्रतापी शूरवीर सहदेवने एक भल्ल मारकर अपने ऊपर आक्रमण करनेवाले उलूकका मस्तक काट डाला ॥ ३२ १/२ ॥
स जगाम रथाद् भूमिं सहदेवेन पातितः ॥ ३३ ॥
रुधिराप्लुतसर्वाङ्गो नन्दयन् पाण्डवान् युधि ।
सहदेवके हाथसे मारा गया उलूक युद्धमें पाण्डवोंको आनन्दित करता हुआ रथसे पृथ्वीपर गिर पड़ा। उस समय उसके सारे अंग खूनसे लथपथ हो गये थे ॥ ३३ १/२ ॥
पुत्रं तु निहतं दृष्ट्वा शकुनिस्तत्र भारत ॥ ३४ ॥
साश्रुकण्ठो विनिःश्वस्य क्षत्तृवाक्यमनुस्मरन् ।
चिन्तयित्वा मुहूर्तं स बाष्पपूर्णेक्षणः श्वसन् ॥ ३५ ॥
भारत! अपने पुत्रको मारा गया देख वहाँ शकुनिका गला भर आया। वह लंबी साँस खींचकर विदुरजीकी बातोंको याद करने लगा। अपनी आँखोंमें आँसू भरकर उच्छ्वास लेता हुआ दो घड़ीतक चिन्तामें डूबा रहा ॥ ३४-३५ ॥
सहदेवं समासाद्य त्रिभिर्विव्याध सायकैः ।
तानपास्य शरान् मुक्तान् शरसंघैः प्रतापवान् ॥ ३६ ॥
सहदेवो महाराज धनुश्चिच्छेद संयुगे ।
महाराज! इसके बाद सहदेवके पास जाकर उसने तीन बाणोंद्वारा उनपर प्रहार किया। उसके छोड़े हुए उन बाणोंका अपने शरसमूहोंसे निवारण करके प्रतापी सहदेवने युद्धस्थलमें उसका धनुष काट डाला ॥ ३६ १/२ ॥
छिन्ने धनुषि राजेन्द्र शकुनिः सौबलस्तदा ॥ ३७ ॥
प्रगृह्य विपुलं खड्गं सहदेवाय प्राहिणोत् ।
राजेन्द्र! धनुष कट जानेपर उस समय सुबलपुत्र शकुनिने एक विशाल खड्ग लेकर उसे सहदेवपर दे मारा ॥
तमापतन्तं सहसा घोररूपं विशाम्पते ॥ ३८ ॥
द्विधा चिच्छेद समरे सौबलस्य हसन्निव ।
प्रजानाथ! शकुनिके उस घोर खड्गको सहसा आते देख समरांगणमें सहदेवने हँसते हुए-से उसके दो टुकड़े कर डाले ॥ ३८ १/२ ॥
असिं दृष्ट्वा तथा च्छिन्नं प्रगृह्य महतीं गदाम् ॥ ३९ ॥
प्राहिणोत् सहदेवाय सा मोघा न्यपतद् भुवि ।
उस खड्गको कटा हुआ देख शकुनिने सहदेवपर एक विशाल गदा चलायी; परंतु वह विफल होकर पृथ्वीपर गिर पड़ी ।। ३९ १/२ ।।
ततः शक्तिं महाघोरां कालरात्रिमि्वोद्यताम् ।। ४० ।।
प्रेषयामास संक्रुद्धः पाण्डवं प्रति सौबलः ।
यह देख सुबलपुत्र क्रोधसे जल उठा। अबकी बार उसने उठी हुई कालरात्रिके समान एक महाभयंकर शक्ति सहदेवको लक्ष्य करके चलायी ।। ४० १/२ ।।
तामापतन्तीं सहसा शरैः कनकभूषणैः ।। ४१ ।।
त्रिधा चिच्छेद समरे सहदेवो हसन्निव ।
अपने ऊपर आती हुई उस शक्तिको सुवर्णभूषित बाणोंद्वारा मारकर सहदेवने समरांगणमें हँसते हुए-से सहसा उसके तीन टुकड़े कर डाले ।। ४१ १/२ ।।
सा पपात त्रिधा छिन्ना भूमौ कनकभूषणा ।। ४२ ।।
शीर्यमाणा यथा दीप्ता गगनाद् वै शतह्रदा ।
तीन टुकड़ोंमें कटी हुई वह सुवर्णभूषित शक्ति आकाशसे गिरनेवाली चमकीली बिजलीके समान पृथ्वीपर बिखर गयी ।। ४२ १/२ ।।
शक्तिं विनिहतां दृष्ट्वा सौबलं च भयार्दितम् ।। ४३ ।।
दुद्रुवुस्तावकाः सर्वे भये जाते ससौबलाः ।
उस शक्तिको नष्ट हुई देख और सुबलपुत्र शकुनिको भी भयसे पीड़ित जान आपके सभी सैनिक भयभीत हो शकुनिसहित वहाँसे भाग खड़े हुए ।। ४३ १/२ ।।
अथोत्कृष्टं महच्चासीत् पाण्डवैर्जितकाशिभिः ।। ४४ ।।
धार्तराष्ट्रास्ततः सर्वे प्रायशो विमुखाभवन् ।
उस समय विजयसे उल्लसित होनेवाले पाण्डवोंने बड़े जोरसे सिंहनाद किया। इससे आपके सभी सैनिक प्रायः युद्धसे विमुख हो गये ।। ४४ १/२ ।।
तान् वै विमनसो दृष्ट्वा माद्रीपुत्रः प्रतापवान् ।। ४५ ।।
शरैरनेकसाहस्रैर्वारयामास संयुगे ।
उन सबको युद्धसे उदासीन देख प्रतापी माद्रीकुमार सहदेवने अनेक सहस्र बाणोंकी वर्षा करके उन्हें युद्धस्थलमें ही रोक दिया ।। ४५ १/२ ।।
ततो गान्धारकैर्गुप्तं पुष्टैरश्वैर्जये धृतम् ।। ४६ ।।
आससाद रणे यान्तं सहदेवोऽथ सौबलम् ।
इसके बाद गन्धारदेशके हृष्ट-पुष्ट घोड़ों और घुड़सवारोंसे सुरक्षित तथा विजयके लिये दृढ़संकल्प होकर रणभूमिमें जाते हुए सुबलपुत्र शकुनिपर सहदेवने आक्रमण किया ।। ४६ १/२ ।।
स्वमंशमवशिष्टं तं संस्मृत्य शकुनिं नृप ।। ४७ ।।
रथेन काञ्चनाङ्गेन सहदेवः समभ्ययात् । नरेश्वर! शकुनिको अपना अवशिष्ट भाग मानकर सहदेवने सुवर्णमय अंगोंवाले रथके द्वारा उसका पीछा किया ॥ ४७ १/२ ॥ अधिज्यं बलवत् कृत्वा व्याक्षिपन् सुमहद् धनुः ॥ ४८ ॥ स सौबलमभिद्रुत्य गार्ध्रपत्रैः शिलाशितैः । भृशमभ्यहनत् क्रुद्धस्तोत्रैरिव महाद्विपम् ॥ ४९ ॥ उन्होंने एक विशाल धनुषपर बलपूर्वक प्रत्यंचा चढ़ाकर शिलापर तेज किये हुए गीधके पंखोंवाले बाणोंद्वारा शकुनिपर आक्रमण किया और जैसे किसी विशाल गजराजको अंकुशोंसे मारा जाय, उसी प्रकार कुपित हो उसको गहरी चोट पहुँचायी ॥ ४८-४९ ॥ उवाच चैनं मेधावी विगृह्य स्मारयन्निव । क्षत्रधर्मे स्थिरो भूत्वा युध्यस्व पुरुषो भव ॥ ५० ॥ यत् तदा हृष्यसे मूढ ग्लहन्नक्षैः सभातले । फलमद्य प्रपश्यस्व कर्मणस्तस्य दुर्मते ॥ ५१ ॥ बुद्धिमान् सहदेवने उसपर आक्रमण करके कुछ याद दिलाते हुए-से इस प्रकार कहा—‘ओ मूढ़! क्षत्रियधर्ममें स्थित होकर युद्ध कर और पुरुष बन। खोटी बुद्धिवाले शकुनि! तू सभामें पासे फेंककर जूआ खेलते समय जो उस दिन बहुत खुश हो रहा था, आज उस दुष्कर्मका महान् फल प्राप्त कर ले ॥ ५०-५१ ॥ निहतास्ते दुरात्मानो येऽस्मानवहसन् पुरा । दुर्योधनः कुलाङ्गारः शिष्टस्त्वं चास्य मातुलः ॥ ५२ ॥ अद्य ते निहनिष्यामि क्षरेणोन्मथितं शिरः । वृक्षात् फलमिवाविद्धं लगुडेन प्रमाथिना ॥ ५३ ॥ ‘जिन दुरात्माओंने पूर्वकालमें हमलोगोंकी हँसी उड़ायी थी, वे सब मारे गये। अब केवल कुलांगार दुर्योधन और उसका मामा तू—ये दो ही बच गये हैं। जैसे मथ डालनेवाले डंडेसे मारकर पेड़से फल तोड़ लिया जाता है, उसी प्रकार आज मैं क्षुरके द्वारा तेरा मस्तक काटकर तुझे मौतके हवाले कर दूँगा’ ॥ ५२-५३ ॥ एवमुक्त्वा महाराज सहदेवो महाबलः । संक्रुद्धो रणशार्दूलो वेगेनाभिजगाम तम् ॥ ५४ ॥ महाराज! ऐसा कहकर रणक्षेत्रमें सिंहके समान पराक्रम दिखानेवाले महाबली सहदेवने अत्यन्त कुपित हो बड़े वेगसे उसपर आक्रमण किया ॥ ५४ ॥ अभिगम्य सुदुर्धर्षः सहदेवो युधां पतिः । विकृष्य बलवच्चापं क्रोधेन प्रज्वलन्निव ॥ ५५ ॥ शकुनिं दशभिर्विद्ध्वा चतुर्भिश्चास्य वाजिनः । छत्रं ध्वजं धनुश्चास्य च्छित्त्वा सिंह इवानदत् ॥ ५६ ॥
योद्धाओंमें श्रेष्ठ सहदेव अत्यन्त दुर्जय वीर हैं। उन्होंने क्रोधसे चलते हुए-से पास जाकर अपने धनुषको बलपूर्वक खींचा और दस बाणोंसे शकुनिको घायल करके चार बाणोंसे उसके घोड़ोंको भी बींध डाला। तत्पश्चात् उसके छत्र, ध्वज और धनुषको भी काटकर सिंहके समान गर्जना की ॥ ५५-५६ ॥
छिन्नध्वजधनुश्छत्रः सहदेवेन सौबलः ।
कृतो विद्धश्च बहुभिः सर्वमर्मसु सायकैः ॥ ५७ ॥
सहदेवने शकुनिके ध्वज, छत्र और धनुषको काट देनेके पश्चात् उसके सम्पूर्ण मर्मस्थानोंमें बाणोंद्वारा गहरी चोट पहुँचायी ॥ ५७ ॥
ततो भूयो महाराज सहदेवः प्रतापवान् ।
शकुनेः प्रेषयामास शरवृष्टिं दुरासदाम् ॥ ५८ ॥
महाराज! तत्पश्चात् प्रतापी सहदेवने पुनः शकुनिपर दुर्जय बाणोंकी वर्षा प्रारम्भ कर दी ॥ ५८ ॥
ततस्तु क्रुद्धः सुबलस्य पुत्रो
माद्रीसुतं सहदेवं विमर्दे ।
प्रासेन जाम्बूनदभूषणेन
जिघांसुरेकोऽभिपपात शीघ्रम् ॥ ५९ ॥
इससे सुबलपुत्र शकुनिको बड़ा क्रोध हुआ। उसने उस संग्राममें माद्रीकुमार सहदेवको सुवर्णभूषित प्रासके द्वारा मार डालनेकी इच्छासे अकेले ही उनपर तीव्र गतिसे आक्रमण किया ॥ ५९ ॥
माद्रीसुतस्तस्य समुद्यतं तं
प्रासं सुवृत्तौ च भुजौ रणाग्रे ।
भल्लैस्त्रिभिर्युगपत् संचकर्त
ननाद चोच्चैस्तरसाऽऽजिमध्ये ॥ ६० ॥
माद्रीकुमारने शकुनिके उस उठे हुए प्रासको और उसकी दोनों सुन्दर गोल-गोल भुजाओंको भी युद्धके मुहानेपर तीन भल्लोंद्वारा एक साथ ही काट डाला और युद्धस्थलमें उच्चस्वरसे वेगपूर्वक गर्जना की ॥ ६० ॥
तस्याशुकारी सुसमाहितेन
सुवर्णपुङ्खेन दृढायसेन ।
भल्लेन सर्वावरणातिगेन
शिरः शरीरात् प्रममाथ भूयः ॥ ६१ ॥
तत्पश्चात् शीघ्रता करनेवाले सहदेवने अच्छी तरह संधान करके छोड़े गये सुवर्णमय पंखवाले लोहेके बने हुए सुदृढ़ भल्लके द्वारा, जो समस्त आवरणोंको छेद डालनेवाला था, शकुनिके मस्तकको पुनः धड़से काट गिराया ॥ ६१ ॥
शरेण कार्तस्वरभूषितेन दिवाकराभेण सुसंहितेन । हृतोत्तमाङ्गो युधि पाण्डवेन पपात भूमौ सुबलस्य पुत्रः ॥ ६२ ॥ वह सुवर्णभूषित बाण सूर्यके समान तेजस्वी तथा अच्छी तरह संधान करके चलाया गया था। उसके द्वारा पाण्डुकुमार सहदेवने युद्धस्थलमें जब सुबलपुत्र शकुनिका मस्तक काट डाला, तब वह प्राणशून्य होकर पृथ्वीपर गिर पड़ा ॥ ६२ ॥
स तच्छिरो वेगवता शरेण सुवर्णपुङ्खेन शिलाशितेन । प्रावेरयत् कुपितः पाण्डुपुत्रो यत्तत् कुरूणामनयस्य मूलम् ॥ ६३ ॥ क्रोधमें भरे हुए पाण्डुपुत्र सहदेवने शिलापर तेज किये हुए और सुवर्णमय पंखवाले वेगवान् बाणसे शकुनिके उस मस्तकको काट गिराया, जो कौरवोंके अन्यायका मूल कारण था ॥ ६३ ॥
भुजौ सुवृत्तौ प्रचकर्त वीरः पश्चात् कबन्धं रुधिरावसिक्तम् । विस्पन्दमानं निपपात घोरं रथोत्तमात् पार्थिव पार्थिवस्य ॥ ६४ ॥ राजन्! वीर सहदेवने जब उसकी गोल-गोल सुन्दर दोनों भुजाएँ काट दीं, उसके पश्चात् राजा शकुनिका भयंकर धड़ लहुलुहान होकर श्रेष्ठ रथसे नीचे गिर पड़ा और छटपटाने लगा ॥ ६४ ॥
हृतोत्तमाङ्गं शकुनिं समीक्ष्य भूमौ शयानं रुधिरार्द्रगात्रम् । योधास्त्वदीया भयनष्टसत्त्वा दिशः प्रजग्मुः प्रगृहीतशस्त्राः ॥ ६५ ॥ शकुनिको मस्तकसे रहित एवं खूनसे लथपथ होकर पृथ्वीपर पड़ा देख आपके योद्धा भयके कारण अपना धैर्य खो बैठे और हथियार लिये हुए सम्पूर्ण दिशाओंमें भाग गये ॥ ६५ ॥
प्रविद्रुताः शुष्कमुखा विसंज्ञा गाण्डीवघोषेण समाहताश्च । भयार्दिता भग्नरथाश्चनागाः पदातयश्चैव सधार्तराष्ट्राः ॥ ६६ ॥
उनके मुख सूख गये थे। उनकी चेतना लुप्त-सी हो रही थी। वे गाण्डीवकी टंकारसे मृतप्राय हो रहे थे; उनके रथ, घोड़े और हाथी नष्ट हो गये थे; अतः वे भयसे पीड़ित हो आपके पुत्र दुर्योधनसहित पैदल ही भाग चले ॥ ६६ ॥
ततो रथाच्छकुनिं पातयित्वा
मुदान्विता भारत पाण्डवेयाः ।
शङ्खान् प्रदध्मुः समरेऽतिहृष्टाः
सकेशवाः सैनिकान् हर्षयन्तः ॥ ६७ ॥
भरतनन्दन! रथसे शकुनिको गिराकर समरांगणमें श्रीकृष्णसहित समस्त पाण्डव अत्यन्त हर्षमें भरकर सैनिकोंका हर्ष बढ़ाते हुए प्रसन्नतापूर्वक शंखनाद करने लगे ॥
तं चापि सर्वे प्रतिपूजयन्तो
दृष्ट्वा ब्रुवाणाः सहदेवमाजौ ।
दिष्ट्या हतो नैकृतिको महात्मा
सहात्मजो वीर रणे त्वयेति ॥ ६८ ॥
सहदेवको देखकर युद्धक्षेत्रमें सब लोग उनकी पूजा (प्रशंसा) करते हुए इस प्रकार कहने लगे—‘वीर! बड़े सौभाग्यकी बात है कि तुमने रणभूमिमें कपटद्यूतके विधायक महामना शकुनिको पुत्रसहित मार डाला है’ ॥
इति श्रीमहाभारते शल्यपर्वणि शकुन्युलूकवधेऽष्टाविंशोऽध्यायः ॥ २८ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत शल्यपर्वमें शकुनि और उलूकका वधविषयक अट्ठाईसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ २८ ॥
(ह्रदप्रवेशपर्व)
(ह्रदप्रवेशपर्व)
एकोनत्रिंशोऽध्यायः
बची हुई समस्त कौरव-सेनाका वध, संजयका कैदसे छूटना, दुर्योधनका सरोवरमें प्रवेश तथा युयुत्सुका राजमहिलाओंके साथ हस्तिनापुरमें जाना
संजय उवाच
ततः क्रुद्धा महाराज सौबलस्य पदानुगाः ।
त्यक्त्वा जीवितमाक्रन्दे पाण्डवान् पर्यवारयन् ॥ १ ॥
**संजय कहते हैं—**महाराज! तदनन्तर शकुनिके अनुचर क्रोधमें भर गये और प्राणोंका मोह छोड़कर उन्होंने उस महासमरमें पाण्डवोंको चारों ओरसे घेर लिया ॥ १ ॥
तानर्जुनः प्रत्यगृह्णात् सहदेवजये धृतः ।
भीमसेनश्च तेजस्वी क्रुद्धाशीविषदर्शनः ॥ २ ॥
उस समय सहदेवकी विजयको सुरक्षित रखनेका दृढ़ निश्चय लेकर अर्जुनने उन समस्त सैनिकोंको आगे बढ़नेसे रोका। उनके साथ तेजस्वी भीमसेन भी थे, जो कुपित हुए विषधर सर्पके समान दिखायी देते थे ॥ २ ॥
शक्त्यृष्टिप्रासहस्तानां सहदेवं जिघांसताम् ।
संकल्पमकरोन्मोघं गाण्डीवेन धनंजयः ॥ ३ ॥
सहदेवको मारनेकी इच्छासे शक्ति, ऋष्टि और प्रास हाथमें लेकर आक्रमण करनेवाले उन समस्त योद्धाओंका संकल्प अर्जुनने गाण्डीव धनुषके द्वारा व्यर्थ कर दिया ॥ ३ ॥
संगृहीतायुधान् बाहून् योधानामभिधावताम् ।
भल्लैश्चिच्छेद बीभत्सुः शिरांस्यपि हयानपि ॥ ४ ॥
सहदेवपर धावा करनेवाले उन योद्धाओंकी अस्त्र-शस्त्रयुक्त भुजाओं, मस्तकों और उनके घोड़ोंको भी अर्जुनने भल्लोंसे काट गिराया ॥ ४ ॥
ते हयाः प्रत्यपद्यन्त वसुधां विगतासवः ।
चरता लोकवीरेण प्रहताः सव्यसाचिना ॥ ५ ॥
रणभूमिमें विचरते हुए विश्वविख्यात वीर सव्यसाची अर्जुनके द्वारा मारे गये वे घोड़े और घुड़सवार प्राणहीन होकर पृथ्वीपर गिर पड़े ॥ ५ ॥
ततो दुर्योधनो राजा दृष्ट्वा स्वबलसंक्षयम् ।
हतशेषान् समानीय क्रुद्धो रथगणान् बहून् ॥ ६ ॥
कुञ्जरांश्च हयांश्चैव पादातांश्च समन्ततः ।
उवाच सहितान् सर्वान् धार्तराष्ट्र इदं वचः ॥ ७ ॥
अपनी सेनाका इस प्रकार संहार होता देख राजा दुर्योधनको बड़ा क्रोध हुआ। उसने मरनेसे बचे हुए बहुत-से रथियों, हाथीसवारों, घुड़सवारों और पैदलोंको सब ओरसे एकत्र करके उन सबसे इस प्रकार कहा— ॥
समासाद्य रणे सर्वान् पाण्डवान् ससुहृद्गणान् ।
पाञ्चाल्यं चापि सबलं हत्वा शीघ्रं न्यवर्तत ॥ ८ ॥
‘वीरो! तुम सब लोग रणभूमिमें समस्त पाण्डवों तथा उनके मित्रोंसे भिड़कर उन्हें मार डालो और पांचालराज धृष्टद्युम्नका भी सेनासहित संहार करके शीघ्र लौट आओ’ ॥ ८ ॥
तस्य ते शिरसा गृह्य वचनं युद्धदुर्मदाः ।
अभ्युद्ययु रणे पार्थांस्तव पुत्रस्य शासनात् ॥ ९ ॥
राजन्! आपके पुत्रकी आज्ञासे उसके उस वचनको शिरोधार्य करके वे रणदुर्मद योद्धा युद्धके लिये आगे बढ़े ॥
तानभ्यापततः शीघ्रं हतशेषान् महारण ।
शरैराशीविषाकारैः पाण्डवाः समवाकिरन् ॥ १० ॥
उस महासमरमें शीघ्रतापूर्वक आक्रमण करनेवाले मरनेसे बचे हुए उन सैनिकोंपर समस्त पाण्डवोंने विषधर सर्पके समान आकारवाले बाणोंकी वर्षा आरम्भ कर दी ॥
तत् सैन्यं भरतश्रेष्ठ मुहूर्तेन महात्मभिः ।
अवध्यत रणं प्राप्य त्रातारं नाभ्यविन्दत ॥ ११ ॥
प्रतिष्ठमानं तु भयान्नावतिष्ठति दंशितम् ।
भरतश्रेष्ठ! वह सेना युद्धस्थलमें आकर महात्मा पाण्डवोंद्वारा दो ही घड़ीमें मार डाली गयी। उस समय उसे कोई भी अपना रक्षक नहीं मिला। वह युद्धके लिये कवच बाँधकर प्रस्थित तो हुई, किंतु भयके मारे वहाँ टिक न सकी ॥ ११ १/२ ॥
अश्वैर्विपरिधावद्भिः सैन्येन रजसा वृते ॥ १२ ॥
न प्राज्ञायन्त समरे दिशः सप्रदिशस्तथा ।
चारों ओर दौड़ते हुए घोड़ों तथा सेनाके द्वारा उड़ायी हुई धूलसे वहाँका सारा प्रदेश छा गया था। अतः समरभूमिमें दिशाओं तथा विदिशाओंका कुछ पता नहीं चलता था ॥ १२ १/२ ॥
ततस्तु पाण्डवानीकान्निःसृत्य बहवो जनाः ॥ १३ ॥
अभ्यघ्नंस्तावकान् युद्धे मुहूर्तादिव भारत ।
ततो निःशेषमभवत् तत् सैन्यं तव भारत ॥ १४ ॥
भारत! पाण्डव-सेनासे बहुत-से सैनिकोंने निकलकर युद्धमें एक ही मुहूर्तके भीतर आपके सम्पूर्ण योद्धाओंका संहार कर डाला। भरतनन्दन! उस समय आपकी वह सेना सर्वथा नष्ट हो गयी। उसमेंसे एक भी योद्धा बच न सका॥ १३-१४॥
अक्षौहिण्यः समेतास्तु तव पुत्रस्य भारत।
एकादश हता युद्धे ताः प्रभो पाण्डुसृञ्जयैः॥ १५॥
प्रभो! भारतवंशी नरेश! आपके पुत्रके पास ग्यारह अक्षौहिणी सेनाएँ थीं; परन्तु युद्धमें पाण्डवों और सृंजयोंने उन सबका विनाश कर डाला॥ १५॥
तेषु राजसहस्रेषु तावकेषु महात्मसु।
एको दुर्योधनो राजन्नदृश्यत भृशं क्षतः॥ १६॥
राजन्! आपके दलके उन सहस्रों महामनस्वी राजाओंमें एकमात्र दुर्योधन ही उस समय दिखायी देता था; परंतु वह भी बहुत घायल हो चुका था॥ १६॥
ततो वीक्ष्य दिशः सर्वा दृष्ट्वा शून्यां च मेदिनीम्।
विहीनः सर्वयोधैश्च पाण्डवान् वीक्ष्य संयुगे॥ १७॥
मुदितान् सर्वतः सिद्धान् नर्दमानान् समन्ततः।
बाणशब्दरवांश्चैव श्रुत्वा तेषां महात्मनाम्॥ १८॥
दुर्योधनो महाराज कश्मलेनाभिसंवृतः।
अपयाने मनश्चक्रे विहीनबलवाहनः॥ १९॥
उस समय उसे सम्पूर्ण दिशाएँ और सारी पृथ्वी सूनी दिखायी दी। वह अपने समस्त योद्धाओंसे हीन हो चुका था। महाराज! दुर्योधनने युद्धस्थलमें पाण्डवोंको सर्वथा प्रसन्न, सफलमनोरथ और सब ओरसे सिंहनाद करते देख तथा उन महामनस्वी वीरोंके बाणोंकी सनसनाहट सुनकर शोकसे संतप्त हो वहाँसे भाग जानेका विचार किया। उसके पास न तो सेना थी और न कोई सवारी ही॥ १७—१९॥
धृतराष्ट्र उवाच
निहते मामके सैन्ये निःशेषे शिबिरे कृते।
पाण्डवानां बले सूत किं नु शेषमभूत् तदा॥ २०॥
**धृतराष्ट्रने पूछा—**सूत! जब मेरी सेना मार डाली गयी और सारी छावनी सूनी कर दी गयी, उस समय पाण्डवोंकी सेनामें कितने सैनिक शेष रह गये थे?॥
एतन्मे पृच्छतो ब्रूहि कुशलो ह्यसि संजय।
यच्च दुर्योधनो मन्दः कृतवांस्तनयो मम॥ २१॥
बलक्षयं तथा दृष्ट्वा स एकः पृथिवीपतिः।
संजय! मैं यह बात पूछ रहा हूँ, तुम मुझे बताओ; क्योंकि यह सब बतानेमें तुम कुशल हो। अपनी सेनाका संहार हुआ देखकर अकेले बचे हुए मेरे मूर्ख पुत्र राजा दुर्योधनने क्या किया? ।। २१ १/२ ।।
संजय उवाच
रथानां द्वे सहस्रे तु सप्त नागशतानि च ।। २२ ।।
पञ्च चाश्वसहस्राणि पत्तीनां च शतं शताः ।
एतच्छेषमभूद् राजन् पाण्डवानां महद् बलम् ।। २३ ।।
**संजयने कहा—**राजन्! पाण्डवोंकी विशाल सेनामें-से केवल दो हजार रथ, सात सौ हाथी, पाँच हजार घोड़े और दस हजार पैदल बच गये थे ।। २२-२३ ।।
परिगृह्य हि यद् युद्धे धृष्टद्युम्नो व्यवस्थितः ।
एकाकी भरतश्रेष्ठ ततो दुर्योधनो नृपः ।। २४ ।।
इन सबको साथ लेकर सेनापति धृष्टद्युम्न युद्धभूमिमें खड़े थे। उधर राजा दुर्योधन अकेला हो गया था ।। २४ ।।
नापश्यत् समरे कंचित् सहायं रथिनां वरः ।
नर्दमानान् परान् दृष्ट्वा स्वबलस्य च संक्षयम् ।। २५ ।।
तथा दृष्ट्वा महाराज एकः स पृथिवीपतिः ।
हतं स्वहयमुत्सृज्य प्राङ्मुखः प्राद्रवद् भयात् ।। २६ ।।
महाराज! रथियोंमें श्रेष्ठ दुर्योधनने जब समरभूमिमें अपने किसी सहायकको न देखकर शत्रुओंको गर्जते देखा और अपनी सेनाके विनाशपर दृष्टिपात किया, तब वह अकेला भूपाल अपने मरे हुए घोड़ेको वहीं छोड़कर भयके मारे पूर्व दिशाकी ओर भाग चला ।। २५-२६ ।।
एकादशचमूर्भर्ता पुत्रो दुर्योधनस्तव ।
गदामादाय तेजस्वी पदातिः प्रस्थितो ह्रदम् ।। २७ ।।
जो किसी समय ग्यारह अक्षौहिणी सेनाका सेनापति था, वही आपका तेजस्वी पुत्र दुर्योधन अब गदा लेकर पैदल ही सरोवरकी ओर भागा जा रहा था ।। २७ ।।
नातिदूरं ततो गत्वा पद्भ्यामेव नराधिपः ।
सस्मार वचनं क्षत्तुर्धर्मशीलस्य धीमतः ।। २८ ।।
अपने पैरोंसे ही थोड़ी ही दूर जानेके पश्चात् राजा दुर्योधनको धर्मशील बुद्धिमान् विदुरजीकी कही हुई बातें याद आने लगीं ।। २८ ।।
इदं नूनं महाप्राज्ञो विदुरो दृष्टवान् पुरा ।
महद् वैशसमस्माकं क्षत्रियाणां च संयुगे ।। २९ ।।
वह मन-ही-मन सोचने लगा कि हमारा और इन क्षत्रियोंका जो महान् संहार हुआ है, इसे महाज्ञानी विदुरजीने अवश्य पहले ही देख और समझ लिया था॥ एवं विचिन्तयानस्तु प्रविविक्षुर्ह्रदं नृपः। दुःखसंतप्तहृदयो दृष्ट्वा राजन् बलक्षयम् ॥ ३० ॥ राजन्! अपनी सेनाका संहार देखकर इस प्रकार चिन्ता करते हुए राजा दुर्योधनका हृदय दुःख और शोकसे संतप्त हो उठा था। उसने सरोवरमें प्रवेश करनेका विचार किया ॥ ३० ॥ पाण्डवास्तु महाराज धृष्टद्युम्नपुरोगमाः। अभ्यद्रवन्त संक्रुद्धास्तव राजन् बलं प्रति ॥ ३१ ॥ शक्त्यृष्टिप्रासहस्तानां बलानामभिगर्जताम्। संकल्पमकरोन्मोघं गाण्डीवेन धनंजयः ॥ ३२ ॥ महाराज! धृष्टद्युम्न आदि पाण्डवोंने अत्यन्त कुपित होकर आपकी सेनापर धावा किया था तथा शक्ति, ऋष्टि और प्रास हाथमें लेकर गर्जना करनेवाले आपके योद्धाओंका सारा संकल्प अर्जुनने अपने गाण्डीव धनुषसे व्यर्थ कर दिया था॥ ३१-३२॥ तान् हत्वा निशितैर्बाणैः सामात्यान् सह बन्धुभिः। रथे श्वेतहये तिष्ठन्नर्जुनो बह्वशोभत ॥ ३३ ॥ अपने पैने बाणोंसे बन्धुओं और मन्त्रियोंसहित उन योद्धाओंका संहार करके श्वेत घोड़ोंवाले रथपर स्थित हुए अर्जुनकी बड़ी शोभा हो रही थी ॥ ३३ ॥ सुबलस्य हते पुत्रे सवाजिरथकुञ्जरे। महावनमिव च्छिन्नमभवत् तावकं बलम् ॥ ३४ ॥ घोड़े, रथ और हाथियोंसहित सुबलपुत्रके मारे जानेपर आपकी सेना कटे हुए विशाल वनके समान प्रतीत होती थी ॥ ३४ ॥ अनेकशतसाहस्रे बले दुर्योधनस्य ह। नान्यो महारथो राजन् जीवमानो व्यदृश्यत ॥ ३५ ॥ द्रोणपुत्रादृते वीरात् तथैव कृतवर्मणः। कृपाच्च गौतमाद् राजन् पार्थिवाच्च तवात्मजात् ॥ ३६ ॥ राजन्! दुर्योधनकी कई लाख सेनामेंसे द्रोणपुत्र वीर अश्वत्थामा, कृतवर्मा, गौतमवंशी कृपाचार्य तथा आपके पुत्र राजा दुर्योधनके अतिरिक्त दूसरा कोई महारथी जीवित नहीं दिखायी देता था ॥ ३५-३६ ॥ धृष्टद्युम्नस्तु मां दृष्ट्वा हसन् सात्यकिमब्रवीत्। किमनेन गृहीतेन नानेनार्थोऽस्ति जीवता ॥ ३७ ॥ उस समय मुझे कैदमें पड़ा हुआ देखकर हँसते हुए धृष्टद्युम्नने सात्यकिसे कहा—'इसको कैद करके क्या करना है? इसके जीवित रहनेसे अपना कोई लाभ नहीं
है' ॥ ३७ ॥ धृष्टद्युम्नवचः श्रुत्वा शिनेर्नप्ता महारथः । उद्यम्य निशितं खड्गं हन्तुं मामुद्यतस्तदा ॥ ३८ ॥ धृष्टद्युम्नकी बात सुनकर शिनिपौत्र महारथी सात्यकि तीखी तलवार उठाकर उसी क्षण मुझे मार डालनेके लिये उद्यत हो गये ॥ ३८ ॥ तमागम्य महाप्राज्ञः कृष्णद्वैपायनोऽब्रवीत् । मुच्यतां संजयो जीवन्न हन्तव्यः कथंचन ॥ ३९ ॥ उस समय महाज्ञानी श्रीकृष्णद्वैपायन व्यासजी सहसा आकर बोले—'संजयको जीवित छोड़ दो। यह किसी प्रकार वधके योग्य नहीं है' ॥ ३९ ॥ द्वैपायनवचः श्रुत्वा शिनेर्नप्ता कृताञ्जलिः । ततो मामब्रवीन्मुक्त्वा स्वस्ति संजय साधय ॥ ४० ॥ हाथ जोड़े हुए शिनिपौत्र सात्यकिने व्यासजीकी वह बात सुनकर मुझे कैदसे मुक्त करके कहा—'संजय! तुम्हारा कल्याण हो। जाओ, अपना अभीष्ट साधन करो' ॥ ४० ॥ अनुज्ञातस्त्वहं तेन न्यस्तवर्मा निरायुधः । प्रातिष्ठं येन नगरं सायाह्ने रुधिरोक्षितः ॥ ४१ ॥ उनके इस प्रकार आज्ञा देनेपर मैंने कवच उतार दिया और अस्त्र-शस्त्रोंसे रहित हो सायंकालके समय नगरकी ओर प्रस्थित हुआ। उस समय मेरा सारा शरीर रक्तसे भीगा हुआ था ॥ ४१ ॥ क्रोशमात्रमपक्रान्तं गदापाणिमवस्थितम् । एकं दुर्योधनं राजन्नपश्यं भृशविक्षतम् ॥ ४२ ॥ राजन्! एक कोस आनेपर मैंने भागे हुए दुर्योधनको गदा हाथमें लिये अकेला खड़ा देखा। उसके शरीरपर बहुत-से घाव हो गये थे ॥ ४२ ॥ स तु मामश्रुपूर्णाक्षो नाशक्नोदभिवीक्षितुम् । उपप्रैक्षत मां दृष्ट्वा तथा दीनमवस्थितम् ॥ ४३ ॥ मुझपर दृष्टि पड़ते ही उसके नेत्रोंमें आँसू भर आये। वह अच्छी तरह मेरी ओर देख न सका। मैं उस समय दीनभावसे खड़ा था। वह मेरी उस अवस्थापर दृष्टिपात करता रहा ॥ ४३ ॥ तं चाहमपि शोचन्तं दृष्ट्वैकाकिनमाहवे । मुहूर्तं नाशकं वक्तुमतिदुःखपरिप्लुतः ॥ ४४ ॥ मैं भी युद्धक्षेत्रमें अकेले शोकमग्न हुए दुर्योधनको देखकर अत्यन्त दुःखशोकमें डूब गया और दो घड़ीतक कोई बात मुँहसे न निकाल सका ॥ ४४ ॥ (यस्य मूर्धाभिषिक्तानां सहस्रं मणिमौलिनाम् । आहृत्य च करं सर्वं स्वस्य वै वशमागतम् ॥
चतुःसागरपर्यन्ता पृथिवी रत्नभूषिता । कर्णेनैकेन यस्यार्थे करमाहारिता पुरा ॥ यस्याज्ञा परराष्ट्रेषु कर्णेनैव प्रसारिता । नाभवद् यस्य शस्त्रेषु खेदो राज्ञः प्रशासतः ॥ आसीनो हास्तिनपुरे क्षेमं राज्यमकण्टकम् । अन्वपालयदैश्वर्यात् कुबेरमपि नास्मरत् ॥ भवनाद् भवनं राजन् प्रयातुः पृथिवीपते । देवालयप्रवेशे च पन्था यस्य हिरण्मयः ॥ आरुह्यैरावतप्रख्यं नागमिन्द्रसमो बली । विभूत्या सुमहत्या यः प्रयाति पृथिवीपतिः ॥ तं भृशक्षतमिन्द्राभं पद्भ्यामेव धरातले । तिष्ठन्तमेकं दृष्ट्वा तु ममाभूत् क्लेश उत्तमः ॥ तस्य चैवंविधस्यास्य जगन्नाथस्य भूपतेः । विपदप्रतिमाभूद् या बलीयान् विधिरेव हि ॥)
मस्तकपर मुकुट धारण करनेवाले सहस्रों मूर्धाभिषिक्त नरेश जिसके लिये भेंट लाकर देते थे और वे सब-के-सब जिसकी अधीनता स्वीकार कर चुके थे, पूर्वकालमें एकमात्र वीर कर्णने जिसके लिये चारों समुद्रोंतक फैली हुई इस रत्नभूषित पृथ्वीसे कर वसूल किया था, कर्णने ही दूसरे राष्ट्रोंमें जिसकी आज्ञाका प्रसार किया था, जिस राजाको राज्य-शासन करते समय कभी हथियार उठानेका कष्ट नहीं सहन करना पड़ा था, जो हस्तिनापुरमें ही रहकर अपने कल्याणमय निष्कण्टक राज्यका निरन्तर पालन करता था, जिसने अपने ऐश्वर्यसे कुबेरको भी भुला दिया था, राजन्! पृथ्विीनाथ! एक घरसे दूसरे घरमें जाने अथवा देवालयमें प्रवेश करनेके हेतु जिसके लिये सुवर्णमय मार्ग बनाया गया था, जो इन्द्रके समान बलवान् भूपाल ऐरावतके समान कान्तिमान् गजराजपर आरूढ़ हो महान् ऐश्वर्यके साथ यात्रा करता था, उसी इन्द्र-तुल्य तेजस्वी राजा दुर्योधनको अत्यन्त घायल हो पाँव-पयादे ही पृथ्वीपर अकेला खड़ा देख मुझे महान् क्लेश हुआ। ऐसे प्रतापी और सम्पूर्ण जगत्के स्वामी इस भूपालको जो अनुपम विपत्ति प्राप्त हुई, उसे देखकर कहना पड़ता है कि ‘विधाता ही सबसे बड़ा बलवान् है’।
ततोऽस्मै तदहं सर्वमुक्तवान् ग्रहणं तदा । द्वैपायनप्रसादाच्च जीवतो मोक्षमाहवे ॥ ४५ ॥
तत्पश्चात् मैंने युद्धमें अपने पकड़े जाने और व्यासजीकी कृपासे जीवित छूटनेका सारा समाचार उससे कह सुनाया ॥ ४५ ॥
स मुहूर्तंमिव ध्यात्वा प्रतिलभ्य च चेतनाम् । भ्रातॄंश्च सर्वसैन्यानि पर्यपृच्छत मां ततः ॥ ४६ ॥
उसने दो घड़ीतक कुछ सोच-विचारकर सचेत होनेपर मुझसे अपने भाइयों तथा सम्पूर्ण सेनाओंका समाचार पूछा ॥ ४६ ॥
तस्मै तदहमाचक्षे सर्वं प्रत्यक्षदर्शिवान् ।
भ्रातॄंश्च निहतान् सर्वान् सैन्यं च विनिपातितम् ॥ ४७ ॥
त्रयः किल रथाः शिष्टास्तावकानां नराधिप ।
इति प्रस्थानकाले मां कृष्णद्वैपायनोऽब्रवीत् ॥ ४८ ॥
मैंने भी जो कुछ आँखों देखा था, वह सब कुछ उसे इस प्रकार बताया—‘नरेश्वर! तुम्हारे सारे भाई मार डाले गये और समस्त सेनाका भी संहार हो गया। रणभूमिसे प्रस्थान करते समय व्यासजीने मुझसे कहा था कि 'तुम्हारे पक्षमें तीन ही महारथी बच गये हैं' ॥ ४७-४८ ॥
स दीर्घमिव निःश्वस्य प्रत्यवेक्ष्य पुनः पुनः ।
असौ मां पाणिना स्पृष्ट्वा पुत्रस्ते पर्यभाषत ॥ ४९ ॥
त्वदन्यो नेह संग्रामे कश्चिज्जीवति संजय ।
द्वितीयं नेह पश्यामि ससहायाश्च पाण्डवाः ॥ ५० ॥
यह सुनकर आपके पुत्रने लंबी साँस खींचकर बारंबार मेरी ओर देखा और हाथसे मेरा स्पर्श करके इस प्रकार कहा—‘संजय! इस संग्राममें तुम्हारे सिवा दूसरा कोई मेरा आत्मीय जन सम्भवतः जीवित नहीं है; क्योंकि मैं यहाँ दूसरे किसी स्वजनको देख नहीं रहा हूँ। उधर पाण्डव अपने सहायकोंसे सम्पन्न हैं ॥ ४९-५० ॥
ब्रूयाः संजय राजानं प्रज्ञाचक्षुषमीश्वरम् ।
दुर्योधनस्तव सुतः प्रविष्टो ह्रदमित्युत ॥ ५१ ॥
सुहृद्भिस्तादृशैर्हीनः पुत्रैर्भ्रातृभिरेव च ।
पाण्डवैश्च हृते राज्ये को नु जीवेत मादृशः ॥ ५२ ॥
आचक्षीथाः सर्वमिदं मां च मुक्तं महाहवात् ।
अस्मिंस्तोयह्रदे गुप्तं जीवन्तं भृशविक्षतम् ॥ ५३ ॥
‘संजय! तुम प्रज्ञाचक्षु ऐश्वर्यशाली महाराजसे कहना कि 'आपका पुत्र दुर्योधन वैसे पराक्रमी सुहृदों, पुत्रों और भ्राताओंसे हीन होकर सरोवरमें प्रवेश कर गया है। जब पाण्डवोंने मेरा राज्य हर लिया, तब इस दयनीय दशामें मेरे-जैसा कौन पुरुष जीवन धारण कर सकता है?' संजय! तुम ये सारी बातें कहना और यह भी बताना कि 'दुर्योधन उस महासंग्रामसे जीवित बचकर पानीसे भरे हुए इस सरोवरमें छिपा है और उसका सारा शरीर अत्यन्त घायल हो गया है' ॥ ५१—५३ ॥
अध्याय (पृष्ठ 2673)
विश्रामके लिये सरोवरमें छिपे हुए दुर्योधन
एवमुक्त्वा महाराज प्राविशत् तं महाह्रदम् ।
अस्तम्भयत तोयं च मायया मनुजाधिपः ॥ ५४ ॥
महाराज! ऐसा कहकर राजा दुर्योधनने उस महान् सरोवरमें प्रवेश किया और मायासे उसका पानी बाँध दिया ॥ ५४ ॥
तस्मिन् ह्रदं प्रविष्टे तु त्रीन् रथान् श्रान्तवाहनान् ।
अपश्यं सहितानेकस्तं देशं समुपेयुषः ॥ ५५ ॥
जब दुर्योधन सरोवरमें समा गया, उसके बाद अकेले खड़े हुए मैंने अपने पक्षके तीन महारथियोंको वहाँ उपस्थित देखा, जो एक साथ उस स्थानपर आ पहुँचे थे। उन तीनोंके घोड़े थक गये थे ॥ ५५ ॥
कृपं शारद्वतं वीरं द्रौणिं च रथिनां वरम् ।
भोजं च कृतवर्माणं सहितान् शरविक्षतान् ॥ ५६ ॥
उनके नाम इस प्रकार हैं—शरद्वान्के पुत्र वीर कृपाचार्य, रथियोंमें श्रेष्ठ द्रोणकुमार अश्वत्थामा तथा भोजवंशी कृतवर्मा। ये सब लोग एक साथ थे और बाणोंसे क्षत-विक्षत हो
रहे थे॥ ५६॥ ते सर्वे मामभिप्रेक्ष्य तूर्णमश्वाननोदयन्। उपायाय तु मामूचुर्दिष्ट्या जीवसि संजय॥ ५७॥ मुझे देखते ही उन तीनोंने शीघ्रतापूर्वक अपने घोड़े बढ़ाये और निकट आकर मुझसे कहा—'संजय! सौभाग्यकी बात है कि तुम जीवित हो'॥ ५७॥ अपृच्छंश्चैव मां सर्वे पुत्रं तव जनाधिपम्। कच्चिद् दुर्योधनो राजा स नो जीवति संजय॥ ५८॥ फिर उन सबने आपके पुत्र राजा दुर्योधनका समाचार पूछा—'संजय! क्या हमारे राजा दुर्योधन जीवित हैं?'॥ ५८॥ आख्यातवानहं तेभ्यस्तदा कुशलिनं नृपम्। तच्चैव सर्वमाचक्षं यन्मां दुर्योधनोऽब्रवीत्॥ ५९॥ ह्रदं चैवाहमाचक्षं यं प्रविष्टो नराधिपः। तब मैंने उन लोगोंसे दुर्योधनका कुशल-समाचार बताया तथा दुर्योधनने मुझे जो संदेश दिया था, वह भी सब उनसे कह सुनाया और जिस सरोवरमें वह घुसा था, उसका भी पता बता दिया॥ ५९ १/२॥ अश्वत्थामा तु तद् राजन् निशम्य वचनं मम॥ ६०॥ तं ह्रदं विपुलं प्रेक्ष्य करुणं पर्यदेवयत्। अहोधिङ् स न जानाति जीवतोऽस्मान् नराधिपः॥ ६१॥ पर्याप्ता हि वयं तेन सह योधयितुं परान्। राजन्! मेरी बात सुनकर अश्वत्थामाने उस विशाल सरोवरकी ओर देखा और करुण विलाप करते हुए कहा—'अहो! धिक्कार है, राजा दुर्योधन नहीं जानते हैं कि हम सब जीवित हैं। उनके साथ रहकर हमलोग शत्रुओंसे जूझनेके लिये पर्याप्त हैं'॥ ६०-६१ १/२॥ ते तु तत्र चिरं कालं विलप्य च महारथाः॥ ६२॥ प्राद्रवन् रथिनां श्रेष्ठा दृष्ट्वा पाण्डुसुतान् रणे। तत्पश्चात् वे महारथी दीर्घकालतक वहाँ विलाप करते रहे। फिर रणभूमिमें पाण्डवोंको आते देख वे रथियोंमें श्रेष्ठ तीनों वीर वहाँसे भाग निकले॥ ६२ १/२॥ ते तु मां रथमारोप्य कृपस्य सुपरिष्कृतम्॥ ६३॥ सेनानिवेशमाजग्मुर्हतशेषास्त्रयो रथाः। तत्र गुल्माः परित्रस्ताः सूर्ये चास्तमिते सति॥ ६४॥ सर्वे विचुक्रुशुः श्रुत्वा पुत्राणां तव संक्षयम्।