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महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva

by महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास

DevanagariSanskritpublished2,450 pages
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हाथमें कुंडी है, कुंडीमें दूध है और दूधमें मक्खी पड़ी हुई है। ये तीनों परस्पर पृथक् होते हुए भी आधाराधेय-भाव सम्बन्धसे एक दूसरेके आश्रित हो एक साथ हो गये हैं॥ १८०॥

न तु कुण्डे पयोभावः पयश्चापि न मक्षिका। स्वयमेवाप्नुवन्त्येते भावा ननु पराश्रयम्॥ १८१॥ फिर भी कुंडीमें दुग्धत्व नहीं आया है और दूध भी मक्खी नहीं बन गया है। ये सारे आधेय पदार्थ स्वयं ही अपनेसे भिन्न आधारको प्राप्त होते हैं॥ १८१॥

पृथक्त्वादाश्रमाणां च वर्णान्यत्वे तथैव च। परस्परपृथक्त्वाच्च कथं ते वर्णसंकरः॥ १८२॥ सारे आश्रम पृथक्-पृथक् हैं तथा चारों वर्ण भी भिन्न हैं। जब इनमें परस्पर पार्थक्य बना हुआ है, तब पृथक्त्वको जाननेवाले आपके वर्णका संकर कैसे हो सकता है?॥ १८२॥

नास्मि वर्णोत्तमा जात्या न वैश्या नावरा तथा। तव राजन् सवर्णास्मि शुद्धयोनिरविप्लुता॥ १८३॥ राजन्! मैं जातिसे ब्राह्मणी नहीं हूँ और न वैश्या अथवा शूद्रा ही हूँ। मैं तो आपके समान वर्णवाली क्षत्रिया ही हूँ। मेरा जन्म शुद्ध वंशमें हुआ है और मैंने अखण्ड ब्रह्मचर्यका पालन किया है॥ १८३॥

प्रधानो नाम राजर्षिर्व्यक्तं ते श्रोत्रमागतः। कुले तस्य समुत्पन्नां सुलभां नाम विद्धि माम्॥ १८४॥ आपने प्रधान नामक राजर्षिका नाम अवश्य सुना होगा। मैं उन्हींके कुलमें उत्पन्न हुई हूँ। आपको मालूम होना चाहिये कि मेरा नाम सुलभा है॥ १८४॥

द्रोणश्च शतशृङ्गश्च चक्रद्वारश्च पर्वतः। मम सत्रेषु पूर्वेषां चिता मघवता सह॥ १८५॥ मेरे पूर्वजोंके यज्ञोंमें देवराज इन्द्रके सहयोगसे द्रोण, शतशृंग और चक्रद्वार नामक पर्वत यज्ञवेदीमें ईंटोंकी जगह चुने गये थे॥ १८५॥

साहं तस्मिन् कुले जाता भर्तर्यसति मद्विधे। विनीता मोक्षधर्मेषु चराम्येका मुनिव्रतम्॥ १८६॥ मेरा जन्म उसी महान् कुलमें हुआ है। मैंने अपने योग्य पतिके न मिलनेपर मोक्षधर्मकी शिक्षा ली तथा मुनिव्रत धारण करके मैं अकेली विचरती रहती हूँ॥

नास्मि सत्रप्रतिच्छन्ना न परस्वापहारिणी। न धर्मसंकरकरी स्वधर्मेऽस्मि धृतव्रता॥ १८७॥ मैंने संन्यासिनीका छद्मवेष नहीं धारण किया है। मैं पराये धनका अपहरण नहीं करती हूँ और न धर्मसंकरता ही फैलाती हूँ। मैं दृढ़तापूर्वक ब्रह्मचर्यव्रतका पालन करती हुई अपने

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धर्ममें स्थित रहती हूँ ॥ १८७ ॥ नास्थिरा स्वप्रतिज्ञायां नासमीक्ष्य प्रवादिनी । नासमीक्ष्यागता चेह त्वत्सकाशं जनाधिप ॥ १८८ ॥ जनेश्वर! मैं अपनी प्रतिज्ञासे कभी विचलित नहीं होती हूँ। बिना सोचे-समझे कोई बात नहीं बोलती हूँ और आपके पास भी यहाँ खूब सोच-विचारकर ही आयी हूँ ॥ १८८ ॥ मोक्षे ते भावितां बुद्धिं श्रुत्वाहं कुशलैषिणी । तव मोक्षस्य चाप्यस्य जिज्ञासार्थमिहागता ॥ १८९ ॥ मैंने सुना था कि आपकी बुद्धि मोक्षधर्ममें लगी हुई है, अतः आपकी मंगलाकांक्षिणी होकर आपके इस मोक्षज्ञानका मर्म जाननेके लिये मैं यहाँ आयी हूँ ॥ १८९ ॥ न वर्गस्था ब्रवीम्येतत् स्वपक्षपरपक्षयोः । मुक्तो व्यायच्छते यश्च शान्तौ यश्च न शाम्यति ॥ १९० ॥ मैं स्वपक्ष और परपक्षमेंसे अपने पक्षमें स्थित हो पक्षपातपूर्वक यह बात नहीं कह रही हूँ, आपके हितको दृष्टिमें रखकर बोलती हूँ; क्योंकि जो वाणीका व्यायाम नहीं करता और जो शान्त परब्रह्ममें निमग्न रहता है, वही मुक्त है ॥ १९० ॥ यथा शून्ये पुरागारे भिक्षुरेकां निशां वसेत् । तथाहं त्वच्छरीरेऽस्मिन्निमां वत्स्यामि शर्वरीम् ॥ १९१ ॥ जैसे नगरके किसी सूने घरमें संन्यासी एक रात निवास कर लेता है, इसी तरह आपके इस शरीरमें मैं आजकी रात रहूँगी ॥ १९१ ॥ साहं मानप्रदानेन वागातिथ्येन चार्चिता । सुप्ता सुशरणं प्रीता श्वो गमिष्यामि मैथिल ॥ १९२ ॥ आपने मुझे बड़ा सम्मान दिया। अपनी वाणीरूप आतिथ्यके द्वारा मेरा भलीभाँति सत्कार किया। मिथिलानरेश! अब मैं प्रसन्नतापूर्वक आपके शरीररूपी सुन्दर गृहमें सोकर कल सबेरे यहाँसे चली जाऊँगी ॥ १९२ ॥

भीष्म उवाच

इत्येतानि स वाक्यानि हेतुमन्त्यर्थवन्ति च । श्रुत्वा नाधिजगौ राजा किञ्चिदन्यदतः परम् ॥ १९३ ॥ भीष्मजी कहते हैं—राजन्! सुलभाके ये युक्तियुक्त और सार्थक वचन सुनकर राजा जनक इसके बाद और कोई बात नहीं बोले ॥ १९३ ॥

इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि मोक्षधर्मपर्वणि सुलभाजनकसंवादे विंशत्यधिकत्रिशततमोऽध्यायः ॥ ३२० ॥ इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत मोक्षधर्मपर्वमें सुलभा और जनकका संवादविषयक तीन सौ बीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ३२० ॥

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१. 'इह घटो अस्ति (यहाँ घड़ा है)'—इत्यादि रूपसे जो सत्तासूचक व्यवहार होता है, उसका नाम 'सद्भावयोग' है। २. 'इह घटो नास्ति (यहाँ घड़ा नहीं है)'—इत्यादि रूपसे जो असत्तासूचक व्यवहार होता है, वही 'असद्भावयोग' है। ३. यहाँ 'विधि' शब्दसे वासनाके बीजभूत धर्म और अधर्म समझने चाहिये। ४. वासनाका उद्बोधक संस्कार ही 'शुक्र' है। ५. वासनाके अनुसार विषयकी प्राप्तिके अनुकूल जो यत्न है, वही 'बल' है।

व्यासजीका अपने पुत्र शुकदेवको वैराग्य और धर्मपूर्ण उपदेश देते हुए सावधान करना

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एकविंशत्यधिकत्रिशततमोऽध्यायः

व्यासजीका अपने पुत्र शुकदेवको वैराग्य और धर्मपूर्ण उपदेश देते हुए सावधान करना

युधिष्ठिर उवाच

कथं निर्वेदमापन्नः शुको वैयासकिः पुरा ।
एतदिच्छाम्यहं श्रोतुं परं कौतूहलं हि मे ॥ १ ॥
युधिष्ठिरने पूछा— पितामह! पूर्वकालमें व्यासपुत्र शुकदेवको किस प्रकार वैराग्य प्राप्त हुआ था? मैं यह सुनना चाहता हूँ। इस विषयमें मुझे बड़ा कौतूहल हो रहा है ॥ १ ॥

अव्यक्तव्यक्ततत्त्वानां निश्चयं बुद्धिनिश्चयम् ।
वक्तुमर्हसि कौरव्य देवस्याजस्य या कृतिः ॥ २ ॥
कुरूनन्दन! इसके सिवा आप मुझे व्यक्त और अव्यक्त तत्त्वोंका बुद्धिद्वारा निश्चित किया हुआ स्वरूप बतलाइये तथा अजन्मा भगवान् नारायणका जो चरित्र है, उसे भी सुनानेकी कृपा करें ॥ २ ॥

भीष्म उवाच

प्राकृतेन सुवृत्तेन चरन्तमकुतोभयम् ।
अध्याप्य कृत्स्नं स्वाध्यायमन्वशाद् वै पिता सुतम् ॥ ३ ॥
भीष्मजी कहते हैं— राजन्! पुत्र शुकदेवको साधारण लोगोंकी भाँति आचरण करते और सर्वथा निर्भय विचरते देख पिता श्रीव्यासजीने उन्हें सम्पूर्ण वेदोंका अध्ययन कराया और फिर यह उपदेश दिया ॥ ३ ॥

व्यास उवाच

धर्मं पुत्र निषेवस्व सुतीक्ष्णौ च हिमातपौ ।
क्षुत्पिपासे च वायुं च जय नित्यं जितेन्द्रियः ॥ ४ ॥
व्यासजीने कहा— बेटा! तुम सदा धर्मका सेवन करते रहो और जितेन्द्रिय होकर कड़ीसे कड़ी सर्दी, गर्मी, भूख-प्यासको सहन करते हुए प्राणवायुपर विजय प्राप्त करो ॥ ४ ॥

सत्यमार्जवमक्रोधमनसूयां दमं तपः ।
अहिंसां चानृशंस्यं च विधिवत् परिपालय ॥ ५ ॥
सत्य, सरलता, अक्रोध, दोषदर्शनका अभाव, इन्द्रिय-संयम, तप, अहिंसा और दया आदि धर्मोंका विधिपूर्वक पालन करो ॥ ५ ॥

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सत्ये तिष्ठ रतो धर्मे हित्वा सर्वमनार्जवम् । देवतातिथिशेषेण मात्रां प्राणस्य संलिह ।। ६ ।। सत्यपर डटे रहो तथा सब प्रकारकी वक्रता छोड़कर धर्ममें अनुराग करो। देवताओं और अतिथियोंका सत्कार करके जो अन्न बचे, उसीका प्राणरक्षाके लिये आस्वादन करो ।। ६ ।।

फेनमात्रोपमे देहे जीवे शकुनिवत् स्थिते । अनित्ये प्रियससंवासे कथं स्वपिषि पुत्रक ।। ७ ।। बेटा! यह शरीर जलके फेनकी तरह क्षणभंगुर है। इसमें जीव पक्षीकी तरह बसा हुआ है और यह प्रियजनोंका सहवास भी सदा रहनेवाला नहीं है। फिर भी तुम क्यों सोये पड़े हो? ।। ७ ।।

अप्रमत्तेषु जाग्रत्सु नित्ययुक्तेषु शत्रुपु । अन्तरं लिप्समानेषु बालस्त्वं नावबुध्यसे ।। ८ ।। तुम्हारे शत्रु सर्वदा सावधान, जो हुए, सर्वथा उद्यत और तुम्हारे छिद्रोंको देखनेमें लगे हुए हैं; परंतु तुम अभी बालक हो, इसलिये समझ नहीं रहे हो ।। ८ ।।

अहःसु गण्यमानेषु क्षीयमाणे तथाऽऽयुषि । जीविते लिख्यमाने च किमुत्थाय न धावसि ।। ९ ।। तुम्हारी आयुके दिन गिने जा रहे हैं। आयु क्षीण होती जा रही है और जीवन मानो कहीं लिखा जा रहा है (समाप्त हो रहा है)। फिर तुम उठकर भागते क्यों नहीं हो? (शीघ्रतापूर्वक कर्तव्यपालनमें लग क्यों नहीं जाते हो?) ।। ९ ।।

ऐहलौकिकमीहन्ते मांसशोणितवर्धनम् । पारलौकिककार्येषु प्रसुप्ता भृशनास्तिकाः ।। १० ।। अत्यन्त नास्तिक मनुष्य केवल इस लोकके स्वार्थको चाहते हुए शरीरमें मांस और रक्तको बढ़ाने-वाली चेष्टा ही करते रहते हैं। पारलौकिक कार्योंकी ओरसे तो वे सदा सोये ही रहते हैं ।। १० ।।

धर्माय येऽभ्यसूयन्ति बुद्धिमोहान्विता नराः । अपथा गच्छतां तेषामनुयाताऽपि पीड्यते ।। ११ ।। जो बुद्धिके व्यामोहमें डूबे हुए मनुष्य धर्मसे द्वेष करते हैं, वे सदा कुमार्गसे ही चलते हैं। उनकी तो बात ही क्या है, उनके अनुयायियोंको भी कष्ट भोगना पड़ता है ।। ११ ।।

ये तु तुष्टाः श्रुतिपरा महात्मानो महाबलाः । धर्म्यं पन्थानमारूढास्तानुपास्स्व च पृच्छ च ।। १२ ।।

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इसलिए जो महान् धर्मबलसे सम्पन्न महात्मा पुरुष संतुष्ट और श्रुतिपरायण होकर सर्वदा धर्मपथपर ही आरूढ़ रहते हैं, तुम उन्हींकी सेवामें रहो और उन्हींसे अपना कर्तव्य पूछो ।। १२ ।।

उपधार्य मतं तेषां बुधानां धर्मदर्शिनाम् ।
नियच्छ परया बुद्ध्या चित्तमुत्पथगामि वै ।। १३ ।।
उन धर्मदर्शी विद्वानोंका मत जानकर तुम अपनी श्रेष्ठ बुद्धिके द्वारा अपने कुपथगामी मनको काबूमें करो ।। १३ ।।

आद्यकालिकया बुद्ध्या दूरे श्व इति निर्भयाः ।
सर्वभक्ष्या न पश्यन्ति कर्मभूमिमचेतसः ।। १४ ।।
जिसकी केवल वर्तमान सुखपर ही दृष्टि रहती है, उस बुद्धिके द्वारा भावी परिणामको बहुत दूर जानकर जो निर्भय रहते और सब प्रकारके अभक्ष्य पदार्थोंको खाते रहते हैं, वे बुद्धिहीन मनुष्य इस कर्मभूमिके महत्त्वको नहीं देख पाते हैं ।। १४ ।।

धर्मं निःश्रेणिमास्थाय किंचित् किंचित् समारुह ।
कोषकारवदात्मानं वेष्टयन्नानुबुध्यसे ।। १५ ।।
तुम धर्मरूपी सीढ़ीको पाकर धीरे-धीरे उसपर चढ़ते जाओ। अभी तो तुम रेशमके कीड़ेकी तरह अपने-आपको वासनाओंके जालसे ही लपेटते जा रहे हो, तुम्हें चेत नहीं हो रहा है ।। १५ ।।

नास्तिकं भिन्नमर्यादं कूलपातमिव स्थितम् ।
वामतः कुरु विस्रब्धो नरं वेणुमिवोद्धृतम् ।। १६ ।।
जो नास्तिक हो, धर्मकी मर्यादा भंग कर रहा हो और किनारेको तोड़-फोड़कर गिरा देनेवाले नदीके महान् जल-प्रवाहकी भाँति स्थित हो, ऐसे मनुष्यको उखाड़े हुए बाँसकी तरह बिना किसी हिचकके त्याग दो ।। १६ ।।

कामं क्रोधं च मृत्युं च पञ्चेन्द्रियजलां नदीम् ।
नावं धृतिमयीं कृत्वा जन्मदुर्गाणि संतर ।। १७ ।।
काम, क्रोध, मृत्यु और जिसमें पाँच इन्द्रियरूपी जल भरा हुआ है, ऐसी विषयासक्तिरूपी नदीको तुम सात्त्विकी धृतिरूप नौकाका आश्रय ले पार कर लो और इस प्रकार जन्म-मृत्युरूपी दुर्गम संकटसे पार हो जाओ ।। १७ ।।

मृत्युनाभ्याहते लोके जरया परिपीडिते ।
अमोघासु पतन्तीषु धर्मपोतेन संतर ।। १८ ।।
सारा संसार मृत्युके थपेड़े खाता हुआ वृद्धावस्थासे पीड़ित हो रहा है। ये रातें प्राणियोंकी आयुका अपहरण करके अपनेको सफल बनाती हुई बीत रही हैं। तुम धर्मरूपी नौकापर चढ़कर भवसागरसे पार हो जाओ ।।

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तिष्ठन्तं च शयानं च मृत्युरन्वेषते यदा । निर्वृत्तिं लभते कस्मादकस्मान्मृत्युनाशितः ॥ १९ ॥ मनुष्य खड़ा हो या सो रहा हो, मृत्यु निरन्तर उसे खोजती फिरती है। जब इस प्रकार तुम अकस्मात् मृत्युके ग्रास बन जानेवाले हो, तब इस तरह निश्चिन्त एवं शान्त कैसे बैठे हो? ॥ १९ ॥

संचिन्वानकमेवैनं कामानामवितृप्तकम् । वृकीवोरणमासाद्य मृत्युरादाय गच्छति ॥ २० ॥ मनुष्य भोगसामग्रियोंके संचयमें लगा ही रहता है और उनसे तृप्त भी नहीं होने पाता है कि भेड़के बच्चेको उठा ले जानेवाली बाघिनकी भाँति मौत उसे अपनी दाढ़में दबाकर चल देती है ॥ २० ॥

क्रमशः संचितशिखो धर्मबुद्धिमयो महान् । अन्धकारे प्रवेष्टव्यं दीपो यत्नेन धार्यताम् ॥ २१ ॥ यदि तुम्हें इस संसाररूपी अन्धकारमें प्रवेश करना है तो हाथमें उस धर्म-बुद्धिमय महान् दीपकको यत्नपूर्वक धारण कर लो, जिसकी शिखा क्रमशः प्रज्वलित हो रही हो ॥ २१ ॥

सम्पतन् देहजालानि कदाचिदिह मानुषे । ब्राह्मण्यं लभते जन्तुस्तत् पुत्र परिपालय ॥ २२ ॥ बेटा! जीव अनेक प्रकारके शरीरोंमें जन्मता-मरता हुआ कभी इस मानव-योनिमें आकर ब्राह्मणका शरीर पाता है, अतः तुम ब्राह्मणोचित कर्तव्यका पालन करो ॥

ब्राह्मणस्य तु देहोऽयं न कामार्थाय जायते । इह क्लेशाय तपसे प्रेत्य त्वनुपमं सुखम् ॥ २३ ॥ ब्राह्मणका यह शरीर भोग भोगनेके लिये नहीं पैदा होता है। यह तो यहाँ क्लेश उठाकर तपस्या करने और मृत्युके पश्चात् अनुपम सुख भोगनेके लिये रचा गया है ॥ २३ ॥

ब्राह्मण्यं बहुभिरवाप्यते तपोभि- स्तल्लब्ध्वा न रतिपरेण हेलितव्यम् । स्वाध्याये तपसि दमे च नित्ययुक्तः क्षेमार्थी कुशलपरः सदा यतस्व ॥ २४ ॥ बहुत समयतक बड़ी भारी तपस्या करनेसे ब्राह्मणका शरीर मिलता है। उसे पाकर विषयानुरागमें फँसकर बरबाद नहीं करना चाहिये। अतः यदि तुम अपना कल्याण चाहते हो तो कुशलप्रद कर्ममें संलग्न हो सदा स्वाध्याय, तपस्या और इन्द्रियसंयममें पूर्णतः तत्पर रहनेका प्रयत्न करो ॥ २४ ॥

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अव्यक्तप्रकृतिरयं कलाशरीरः

सूक्ष्मात्मा क्षणत्रुटिशो निमेषरोमा ।

ऋत्वास्यः समबलशुक्लकृष्णनेत्रो

मासाङ्गो द्रवति वयोहयो नराणाम् ।। २५ ।।

तं दृष्ट्वा प्रसृतमजस्रमुग्रवेगं

गच्छन्तं सततमिहाव्यपेक्षमाणम् ।

चक्षुस्ते यदि न परप्रणेतृनेयं

धर्मे ते भवतु मनः परं निशाम्य ।। २६ ।।

मनुष्योंका आयुरूप अश्व बड़े वेगसे दौड़ा जा रहा है। इसका स्वभाव

अव्यक्त है। कला-काष्ठा आदि इसके शरीर हैं। इसका स्वरूप अत्यन्त सूक्ष्म है।

क्षण, त्रुटि (चुटकी) और निमेष आदि इसके रोम हैं। ऋतुएँ मुख हैं। समान

बलवाले शुक्ल और कृष्णपक्ष नेत्र हैं तथा महीने इसके विभिन्न अंग हैं। वह

भयंकर वेगशाली अश्व यहाँकी किसी वस्तुकी अपेक्षा न रखकर निरन्तर

अविराम गतिसे वेगपूर्वक भागा जा रहा है। उसे देखकर यदि तुम्हारी ज्ञानदृष्टि

दूसरेके द्वारा चलानेपर चलनेवाली नहीं है; तो तुम्हारा मन धर्ममें ही लगना

चाहिये। तुम दूसरे धर्मात्माओंपर भी दृष्टि डालो ।। २५-२६ ।।

ये चात्र प्रचलितधर्मकामवृत्ताः

क्रोशन्तः सततमनिष्टसम्प्रयोगाः ।

क्लिश्यन्तः परिगतवेदनाशरीरा

बह्वीभिः सुभृशमधर्मकारणाभिः ।। २७ ।।

जो लोग यहाँ धर्मसे विचलित हो स्वेच्छाचारमें लगे हुए हैं, दूसरोंको बुरा-

भला कहते हुए सदा अनिष्टकारी अशुभ कर्मोंमें ही लगे हुए हैं, वे मरनेके बाद

यातनादेह पाकर अपने अनेक पापकर्मोंके कारण अत्यन्त क्लेश भोगते

हैं ।। २७ ।।

राजा सदा धर्मपरः शुभाशुभस्य गोप्ता

समीक्ष्य सुकृतिनां दधाति लोकान् ।

बहुविधमपि चरति प्रविशति

सुखमनुपगतं निरवद्यम् ।। २८ ।।

जो राजा सर्वदा धर्मपरायण रहकर उत्तम और अधम प्रजाका यथायोग्य

विचारपूर्वक पालन करता है, वह पुण्यात्माओंके लोकोंको प्राप्त होता है। यदि

वह स्वयं भी नाना प्रकारके शुभ कर्मोंका आचरण करता है तो उसके

फलस्वरूप उसे अप्राप्त एवं निर्दोष सुख प्राप्त होता है ।। २८ ।।

श्वानो भीषणकाया अयोमुखानि वयांसि

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बलगृध्रकुलपक्षिणां च संघाः । नरकदने रुधिरपा गुरुवचन- नुदमुपरतं विशसन्ति ॥ २९ ॥ परंतु जो गुरुजनोंकी आज्ञाका उल्लंघन करते हैं, उनके मरणके पश्चात् नरकमें स्थित भयानक शरीरवाले कुत्ते, लौहमुख पक्षी, कौए-गीध आदि पक्षियोंके समुदाय तथा रक्त पीनेवाले कीट उनके यातना-शरीरपर आक्रमण करके उसे नोचते और काटते हैं ॥ २९ ॥

मर्यादा नियताः स्वयम्भुवा य इहेमाः प्रभिनत्ति दशगुणा मनोऽनुगत्वात् । निवसति भृशमसुखं पितृविषय- विपिनमवगाह्य स पापः ॥ ३० ॥ जो मनुष्य मनचाही करनेके कारण स्वायम्भुवमनुकी बाँधी हुई धर्मकी दस* प्रकारकी मर्यादाओंको तोड़ता है, वह पापात्मा पितृलोकके असिपत्रवनमें जाकर वहाँ अत्यन्त दुःख भोगता रहता है ॥ ३० ॥

यो लुब्धः सुभृशं प्रयानृतश्च मनुष्यः सततनिकृतिवञ्चनाभिरतिः स्यात् । उपनिधिभिरसुखकृत्स परमनिरयगो भृशमसुखमनुभवति दुष्कृतकर्मा ॥ ३१ ॥ जो पुरुष अत्यन्त लोभी, असत्यसे प्रेम करनेवाला और सर्वदा कपटभरी बातें बनानेवाला और ठगाईमें रत है तथा जो तरह-तरहके साधनोंसे दूसरोंको दुःख देता है, वह पापात्मा घोर नरकमें पड़कर अत्यन्त दुःख भोगता है ॥ ३१ ॥

उष्णां वैतरणीं महानदी- मवगाढोऽसिपत्रवनभिन्नगात्रः । परशुवनशयो निपतितो वसति च महानिरये भृशार्तः ॥ ३२ ॥ उसे अत्यन्त उष्ण महानदी वैतरणीमें गोता लगाना पड़ता है। असिपत्रवनमें उसका अंग-अंग छिन्न-भिन्न हो जाता है और परशुवनमें उसे शयन करना पड़ता है। इस प्रकार महानरकमें पड़कर वह अत्यन्त आतुर हो उठता है और विवश होकर उसीमें निवास करता है ॥ ३२ ॥

महापदानि कत्थसे न चाप्यवेक्षसे परम् । चिरस्य मृत्युकारिकामनागतां न बुध्यसे ॥ ३३ ॥

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तुम ब्रह्मलोक आदि बड़े-बड़े स्थानोंकी बातें तो बनाते हो, परंतु परमपदपर तुम्हारी दृष्टि नहीं है। भविष्यमें जो मृत्युकी परिचारिका वृद्धावस्था आनेवाली है, उसका तुम्हें पता ही नहीं है ।। ३३ ।। प्रयायतां किमास्यते समुत्थितं महत् भयम् । अतिप्रमाथि दारुणं सुखस्य संविधीयताम् ।। ३४ ।। वत्स! चुपचाप क्यों बैठे हो? जल्दीसे आगे बढ़ो। तुम्हारे ऊपर हृदयको अत्यन्त मथ डालनेवाला, भयंकर एवं महान् भय उठ खड़ा हुआ है; अतः परमानन्दकी प्राप्तिके लिये प्रयत्न करो ।। ३४ ।। पुरा मृतः प्रणीयते यमस्य राजशासनात् । त्वमन्तकाय दारुणैः प्रयत्नमार्जवे कुरु ।। ३५ ।। तुम्हें मरनेपर यमराजकी आज्ञासे भयानक यमदूतोंद्वारा उनके सामने उपस्थित किया जाय, इसके पहले ही सरलतारूप धर्मके सम्पादनके लिये प्रयत्न करो ।। ३५ ।। पुरा समूलबान्धवं प्रभुर्हरत्यदुःखवित् । तवेह जीवितं यमो न चास्ति तस्य वारकः ।। ३६ ।। यमराज सबके स्वामी हैं। वे किसीका दुःख-दर्द नहीं समझते हैं। वे मूल और बन्धु-बान्धवोंसहित तुम्हारे प्राण हर लेंगे। उन्हें रोकनेवाला कोई नहीं है। वह समय आनेके पहले ही तुम अपनी रक्षाके लिये प्रबन्ध कर लो ।। ३६ ।। पुराऽभिवाति मारुतो यमस्य यः पुरःसरः । पुरैक एव नीयसे कुरुष्व साम्परायिकम् ।। ३७ ।। जिस समय यमराजके आगे-आगे चलनेवाला प्रचण्ड कालरूपी पवन चल पड़ेगा, उस समय वह अकेले तुम्हींको वहाँ ले जायगा; अतः तुम पहलेसे ही परलोकमें सुख देनेवाले धर्मका आचरण करो ।। ३७ ।। पुरा स हि क्व एव ते प्रवाति मारुतोऽन्तकः । पुरा च विभ्रमन्ति ते दिशो महाभयागमे ।। ३८ ।। पूर्वजन्ममें तुम्हारे सामने जो प्राणनाशक पवन चल रहा था, आज वह कहाँ है? अब भी जब मृत्युरूप महान् भय उपस्थित होगा, तब तुम्हें सम्पूर्ण दिशाएँ घूमती दिखायी देंगी; अतः पहलेसे ही सावधान हो जाओ ।। ३८ ।। श्रुतिश्च संनिरुध्यते पुरा तवेह पुत्रक । समाकुलस्य गच्छतः समाधिमुत्तमं कुरु ।। ३९ ।। बेटा! जब तुम इस शरीरको छोड़कर चलने लगोगे, उस समय व्याकुलताके कारण तुम्हारी श्रवणशक्ति भी नष्ट हो जायगी। इसलिये तुम सुदृढ़ समाधि प्राप्त कर लो ।। ३९ ।।

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शुभाशुभे पुरा कृते प्रमादकर्मविप्लुते । स्मरन् पुरा न तप्यसे निधत्स्व केवलं निधिम् ॥ ४० ॥ तुम पहले असावधानतावश जो अनुचितरूपसे शुभाशुभ कर्म कर चुके हो, उसे स्मरण करके उनके फलभोगसे संतप्त होनेके पहले ही अपने लिये केवल ज्ञानका भण्डार भर लो ॥ ४० ॥

पुरा जरा कलेवरं विजर्जरीकरोति ते । बलाङ्गरूपहारिणी निधत्स्व केवलं निधिम् ॥ ४१ ॥ देखो, बल, अंग और रूपका विनाश करनेवाली वृद्धावस्था एक दिन तुम्हारे शरीरको जर्जर कर डालेगी, उसके पहले ही तुम अपने लिये ज्ञानका भण्डार भर लो ॥ ४१ ॥

पुरा शरीरमन्तको भिनत्ति रोगसारथिः । प्रसह्य जीवितक्षये तपो महत् समाचर ॥ ४२ ॥ रोग जिसका सारथि है, वह काल हठात् तुम्हारे शरीरको विदीर्ण कर डालेगा, इसलिये इस जीवनका नाश होनेसे पूर्व ही तुम महान् तपका अनुष्ठान कर लो ॥ ४२ ॥

पुरा वृका भयंकरा मनुष्यदेहगोचराः । अभिद्रवन्ति सर्वतो यतस्व पुण्यशीलने ॥ ४३ ॥ इस मानव-शरीरमें रहनेवाले काम-क्रोध आदि भयंकर व्याघ्र तुमपर चारों ओरसे आक्रमण कर रहे हैं, इसलिये पहलेसे ही तुम पुण्यसंचयके लिये प्रयत्न करो ॥

पुरान्धकारमेककोऽनुपश्यसि त्वरस्व वै । पुरा हिरण्मयान् नगान् निरीक्षसेऽद्रिमूर्धनि ॥ ४४ ॥ मरनेके समय तुम्हें पहले घोर अन्धकार दिखलायी देगा। फिर पर्वतके शिखरपर सुनहरे वृक्ष दृष्टिगोचर होंगे। वह समय आनेसे पहले ही अपने कल्याणके लिये तुम शीघ्र प्रयत्न करो ॥ ४४ ॥

पुरा कुसङ्गतानि ते सुहृन्मुखाश्च शत्रवः । विचालयन्ति दर्शनाद् घटस्व पुत्र यत्परम् ॥ ४५ ॥ इस संसारमें दुष्ट पुरुषोंके संग तथा ऊपरसे मित्रभाव एवं भीतरसे शत्रुता रखनेवाले लोग दर्शनमात्रसे तुम्हें कर्तव्यपथसे विचलित कर देंगे, इसलिये तुम पहलेसे ही परम उत्तम पुण्यसंचयके लिये प्रयत्न करो ॥

धनस्य यस्य राजतो भयं न चास्ति चोरतः । मृतं च यन्न मुञ्चति समर्जयस्व तद् धनम् ॥ ४६ ॥

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जिस धनको न तो राजासे भय है और न चोरसे ही तथा जो मर जानेपर भी जीवका साथ नहीं छोड़ता है, उस धर्मरूपी धनका उपार्जन करो ॥ ४६ ॥

न तत्र संवियुज्यते स्वकर्मभिः परस्परम् । यदेव यस्य यौतकं तदेव तत्र सोऽश्नुते ॥ ४७ ॥ अपने कर्मोंके अनुसार प्राप्त हुए उस धनको परलोकमें परस्पर बाँटना नहीं पड़ता है। वहाँ तो जो जिसकी निजी सम्पत्ति है, उसे ही वह भोगता है ॥ ४७ ॥

परत्र येन जीव्यते तदेव पुत्र दीयताम् । धनं यदक्षरं ध्रुवं समर्जयस्व तत् स्वयम् ॥ ४८ ॥ बेटा! जिससे परलोकमें भी जीवन-निर्वाह हो सकता है तथा जो अविनाशी और अटल धन है, उसीका दान करो एवं उसीका स्वयं भी उपार्जन करते रहो ॥ ४८ ॥

न यावदेव पच्यते महाजनस्य यावकम् । अपक्व एव यावके पुरा प्रलीयसे त्वर ॥ ४९ ॥ बेटा! घरपर आये हुए किसी समादरणीय अतिथिके लिये जितनी देरमें यावक (घृत और खाँड़ मिलाकर तैयार किया हुआ जौके आटेका पूआ) पकाया जाता है, उसके पकनेसे भी पहले तुम्हारी मृत्यु हो सकती है; अतः तुम ज्ञानरूपी धनके उपार्जनके लिये शीघ्रता करो ॥ ४९ ॥

न मातृपुत्रबान्धवा न संस्तुतः प्रियो जनः । अनुव्रजन्ति संकटे व्रजन्तमेकपातिनम् ॥ ५० ॥ जीव जब अकेला ही परलोकके पथपर प्रस्थान करता है, उस संकटके समय माता, पुत्र, भाई-बन्धु तथा अन्यान्य प्रशंसित प्रियजन भी उसके साथ नहीं जाते हैं ॥ ५० ॥

यदेव कर्म केवलं पुरा कृतं शुभाशुभम् । तदेव पुत्र सार्थिकं भवत्यमुत्र गच्छतः ॥ ५१ ॥ पुत्र! परलोकमें जाते समय अपना पहलेका किया हुआ जो शुभाशुभ कर्म होता है, केवल वही साथ रहता है ॥ ५१ ॥

हिरण्यरत्नसंचयाः शुभाशुभेन संचिताः । न तस्य देहसंक्षये भवन्ति कार्यसाधकाः ॥ ५२ ॥ मनुष्यके द्वारा अच्छे-बुरे सभी तरहके कर्म करके जो सुवर्ण और रत्नोंके ढेर इकट्ठे किये जाते हैं, वे भी उस मनुष्यके शरीरका नाश होनेपर उसके किसी काम नहीं आते हैं (क्योंकि वे सब यहीं रह जाते हैं) ॥ ५२ ॥

परत्रगामिकस्य ते कृताकृतस्य कर्मणः । न साक्षि आत्मना समो नृणामिहास्ति कश्चन ॥ ५३ ॥

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परलोककी यात्रा करते समय तुम्हारे किये और न किये हुए कर्मका साक्षी आत्माके समान मनुष्योंमें दूसरा कोई नहीं है ।। ५३ ।।

मनुष्यदेहशून्यकं भवत्यमुत्र गच्छतः ।
प्रविश्य बुद्धिचक्षुषा प्रदृश्यते हि सर्वशः ।। ५४ ।।
परलोकमें जाते समय इस मनुष्य-शरीरका अभाव हो जाता है अर्थात् यह यहीं छूट जाता है। जीव सूक्ष्म शरीरसे लोकान्तरमें प्रवेश करके अपने बुद्धिरूपी नेत्रसे वहाँ सब कुछ देखता है ।। ५४ ।।

इहाग्निसूर्यवायवः शरीरमाश्रितास्त्रयः ।
त एव तस्य साक्षिणो भवन्ति धर्मदर्शिनः ।। ५५ ।।
इस लोकमें अग्नि, वायु और सूर्य—ये तीन देवता जीवके शरीरका आश्रय करके रहते हैं। वे ही उसके धर्माचरणको देखनेवाले हैं और वे ही परलोकमें उसके साक्षी होते हैं ।। ५५ ।।

अहर्निशेषु सर्वतः स्पृशत्सु सर्वचारिषु ।
प्रकाशगूढवृत्तिषु स्वधर्ममेव पालय ।। ५६ ।।
दिन सब पदार्थोंको प्रकाशित करता है और रात्रि उन्हें छिपा लेती है। ये सर्वत्र व्याप्त हैं और सभी वस्तुओंका स्पर्श करते हैं, अतः तुम इनकी वेलामें सर्वदा अपने धर्मका ही पालन करो ।। ५६ ।।

अनेकपारिपन्थिके विरूपरौद्रमक्षिके ।
स्वमेव कर्म रक्ष्यतां स्वकर्म तत्र गच्छति ।। ५७ ।।
परलोकके मार्गपर बहुत-से लुटेरे और बटमार रहते हैं तथा विकराल एवं भयंकर डाँस एवं मक्खियाँ होती हैं। वहाँ केवल अपना किया हुआ कर्म ही साथ जाता है; अतः तुम्हें अपने सत्कर्मकी ही रक्षा करनी चाहिये ।। ५७ ।।

न तत्र संविभज्यते स्वकर्मणा परस्परम् ।
तथा कृतं स्वकर्मजं तदेव भुज्यते फलम् ।। ५८ ।।
वहाँ अपने कर्मके अनुसार जो फल प्राप्त होता है, उसका किसीके साथ बँटवारा नहीं होता। वहाँ तो अपने किये हुए कर्मोंका ही फल भोगना होता है ।। ५८ ।।

यथाप्सरोगणाः फलं सुखं महर्षिभिः सह ।
तथाऽऽप्नुवन्ति कर्मजं विमानकामगामिनः ।। ५९ ।।
जैसे महर्षियोंके साथ झुंड-करी-झुंड अप्सराएँ होती हैं और वे सब पुण्यके फलस्वरूप सुख भोगते हैं, उसी प्रकार वहाँ पुण्यात्मा लोग विमानोंपर चढ़कर इच्छानुसार विचरते और पुण्यकर्मजनित सुख भोगते हैं ।। ५९ ।।

यथेह यत् कृतं शुभं विपाप्मभिः कृतात्मभिः ।

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तदाप्नुवन्ति मानवास्तथा विशुद्धयोनयः ॥ ६० ॥ निष्पाप पुण्यात्मा पुरुषोंद्वारा इस लोकमें जो शुभ कर्म सम्पादित होता है, जन्मान्तरमें विशुद्ध योनिमें जन्म लेकर उसका वैसा ही फल पाते हैं ॥ ६० ॥

प्रजापतेः सलोकतां बृहस्पतेः शतक्रतोः । व्रजन्ति ते परां गतिं गृहस्थधर्मसेतुभिः ॥ ६१ ॥ गृहस्थ-धर्मकी मर्यादाका पालन करनेवाले लोग प्रजापति, बृहस्पति अथवा इन्द्रके लोकमें उत्तम गतिको प्राप्त होते हैं ॥ ६१ ॥

सहस्रशोऽप्यनेकशः प्रवक्तुमुत्सहाम ते । अबुद्धिमोहनं पुनः प्रभुर्निनाय पावकः ॥ ६२ ॥ वत्स! मैं तुम्हारे सामने हजारों तथा उससे भी अधिक बार यह बात जोर देकर कह सकता हूँ कि सर्वशक्तिमान् तथा सबको पवित्र करनेवाले धर्मने, जिसकी बुद्धिपर मोह नहीं छा गया है, उस धर्मात्मा पुरुषको सदा ही पुण्यलोकमें पहुँचाया है ॥ ६२ ॥

गता त्रिषड्वर्षता ध्रुवोऽसि पञ्चविंशकः । कुरुष्व धर्मसंचयं वयो हि तेऽतिवर्तते ॥ ६३ ॥ बेटा! तुम्हारी आयुके चौबीस वर्ष बीत गये। अब निश्चय ही तुम पचीस सालके हो गये; अतः धर्मका संचय करो। तुम्हारी सारी आयु यों ही बीती जा रही है ॥ ६३ ॥

पुरा करोति सोऽन्तकः प्रमादगोमुखां चमूम् । यथागृहीतमुत्थितस्त्वरस्व धर्मपालने ॥ ६४ ॥ देखो, तुम्हारा जो प्रमाद है, उसमें निवास करनेवाला काल तुम्हारी इन्द्रियोंके समुदायको मुखरहित (भोगशक्तिसे हीन) कर रहा है। इनके असमर्थ हो जानेके पहले ही तुम खड़े हो जाओ और अपने शरीरसे धर्मका पालन करनेके लिये जल्दी करो ॥ ६४ ॥

यथा त्वमेव पृष्ठतस्त्वमग्रतो गमिष्यसि । तथा गतिं गमिष्यतः किमात्मना परेण वा ॥ ६५ ॥ जिस समय तुम शरीर छोड़कर परलोककी राह लोगे, उस समय तुम्हीं पीछे रहोगे और तुम्हीं आगे चलोगे—तुम्हारे सिवा दूसरा कोई वहाँ आगे-पीछे चलनेवाला न होगा। ऐसी दशामें किसी अपने या पराये व्यक्तिसे तुम्हारा क्या प्रयोजन है? ॥ ६५ ॥

यदेकपातिनां सतां भवत्यमुत्र गच्छताम् । भयेषु साम्परायिकं निधत्स्व केवलं निधिम् ॥ ६६ ॥

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भय उपस्थित होनेपर अकेले यात्रा करनेवाले सत्पुरुषोंके लिये परलोकमें जो हितकर होता है, उस धर्म या ज्ञानकी निधिको शुद्धभावसे संचित करो ॥ ६६ ॥

सकूलमूलबान्धवं प्रभुर्हरत्यसङ्गवान् ।
न सन्ति यस्य वारकाः कुरुष्व धर्मसंनिधिम् ॥ ६७ ॥
सर्वसमर्थ काल किसीके प्रति भी स्नेह नहीं करता। वह कूल और मूल अर्थात् आदि-अन्तसहित समस्त बन्धु-बान्धवोंको हर ले जाता है। उसको रोकनेवाले कोई नहीं हैं; इसलिये तुम धर्मका संचय करो ॥ ६७ ॥

इदं निदर्शनं मया तवेह पुत्र साम्प्रतम् ।
स्वदर्शनानुमानतः प्रवर्णितं कुरुष्व तत् ॥ ६८ ॥
बेटा! मैंने अपने शास्त्रज्ञान और अनुमानके द्वारा इस समय तुम्हें जिस ज्ञानका उपदेश किया है, तुम उसीके अनुसार आचरण करो ॥ ६८ ॥

दधाति यः स्वकर्मणा ददाति यस्य कस्यचित् ।
अबुद्धिमोहजैर्गुणैः स एक एव युज्यते ॥ ६९ ॥
जो पुरुष अपने सत्कर्मोंद्वारा धर्मको धारण करता है और जिस किसीको भी निष्कामभावसे दान देता है, वह अकेला ही मोहरहित बुद्धिसे प्राप्त होनेवाले गुणोंसे संयुक्त होता है ॥ ६९ ॥

श्रुतं समस्तमश्नुते प्रकुर्वतः शुभाः क्रियाः ।
तदेतदर्थदर्शनं कृतज्ञमर्थसंहितम् ॥ ७० ॥
जो समस्त शास्त्रोंका ज्ञान प्राप्त करता और तदनुसार शुभ कर्मोंके अनुष्ठानमें लगा रहता है, उसीके लिये इस ज्ञानका उपदेश किया गया है; क्योंकि कृतज्ञ पुरुषको जो भी उपदेश दिया जाता है, वही सफल होता है ॥ ७० ॥

निबन्धनी रज्जुरेषा या ग्रामे वसतो रतिः ।
छित्त्वैतां सुकृतो यान्ति नैनां छिन्दन्ति दुष्कृतः ॥ ७१ ॥
मनुष्य जब गाँवमें रहकर वहींके पदार्थोंसे प्रेम करने लगता है, वह उसे बाँधनेवाली रस्सी ही है। पुण्यात्मा लोग इसे काटकर उत्तम लोकोंमें चले जाते हैं, परंतु पापात्मा पुरुष इसे नहीं काट पाते हैं ॥ ७१ ॥

किं ते धनेन किं बन्धुभिस्ते
किं ते पुत्रैः पुत्रक यो मरिष्यसि ।
आत्मानमन्विच्छ गुहां प्रविष्टं
पितामहास्ते क्व गताश्च सर्वे ॥ ७२ ॥
बेटा! जब तुम्हें एक दिन मरना ही है, तब धन, बन्धु और पुत्र आदिसे तुम्हें क्या लेना है; अतः तुम हृदयरूपी गुफामें छिपे हुए आत्मतत्त्वका अनुसंधान

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करो। सोचो तो सही; आज तुम्हारे सारे पूर्वज—पितामह कहाँ चले गये? ।। ७२ ।।

श्वः कार्यमद्य कुर्वीत पूर्वाह्ने चापराह्निकम् ।
न हि प्रतीक्षते मृत्युः कृतं वास्य न वाकृतम् ।। ७३ ।।
जो काम कल करना हो, उसे आज ही कर लेना चाहिये और जो दोपहर-बाद करना हो, उसे पहले ही पहरमें पूरा कर डालना चाहिये; क्योंकि मौत यह नहीं देखती कि इसका काम पूरा हुआ है या नहीं ।। ७३ ।।

अनुगम्य विनाशान्ते निवर्तन्ते ह बान्धवाः ।
अग्नौ प्रक्षिप्य पुरुषं ज्ञातयः सुहृदस्तथा ।। ७४ ।।
मृत्युके बाद भाई-बन्धु, कुटुम्बी और सुहृद् श्मशान-भूमितक पीछे-पीछे जाते हैं और मृत पुरुषके शरीरको चिताकी आगमें डालकर लौट आते हैं ।। ७४ ।।

नास्तिकान् निरनुक्रोशान् नरान् पापमते स्थितान् ।
वामतः कुरु विस्रब्धं परं प्रेप्सुरतन्द्रितः ।। ७५ ।।
अतः तुम परमात्मतत्त्वकी प्राप्तिके इच्छुक हो आलस्य छोड़कर नास्तिक, निर्दय तथा पापबुद्धि मनुष्योंको बिना किसी हिचकके बायें कर दो—कभी भूलकर भी उनका साथ न दो ।। ७५ ।।

एवमभ्याहते लोके कालेनोपनिपीडिते ।
सुमहद् धैर्यमालम्ब्य धर्मं सर्वात्मना कुरु ।। ७६ ।।
इस प्रकार जब सारा संसार कालसे आहत और पीड़ित हो रहा है, तब तुम महान् धैर्यका आश्रय ले सम्पूर्ण हृदयसे धर्मका आचरण करो ।। ७६ ।।

अथेमं दर्शनोपायं सम्यग् यो वेत्ति मानवः ।
सम्यक् स्वधर्मं कृत्वेह परत्र सुखमश्नुते ।। ७७ ।।
जो मनुष्य परमात्माके साक्षात्कारके इस साधनको भलीभाँति जानता है, वह इस लोकमें स्वधर्मका ठीक-ठीक पालन करके परलोकमें सुख भोगता है ।। ७७ ।।

न देहभेदे मरणं विजानतां
न च प्रणाशः स्वनुपालिते पथि ।
धर्मं हि यो वर्धयते स पण्डितो
य एव धर्माच्च्यवते स मुह्यति ।। ७८ ।।
जो ऐसा जानते हैं कि शरीरका नाश हो जानेपर भी अपनी मृत्यु नहीं होती है और शिष्ट पुरुषोंद्वारा पालित धर्म-मार्गपर चलनेवालोंका कभी नाश नहीं होता

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है, वे ही बुद्धिमान् हैं। जो इन सब बातोंको सोच-विचारकर धर्मको बढ़ाता रहता है, वह विद्वान् है। जो धर्मसे गिर जाता है, वही मोहग्रस्त अथवा मूढ़ है ॥ प्रयुक्तयोः कर्मपथि स्वकर्मणोः फलं प्रयोक्ता लभते यथाकृतम् । निहीनकर्मा निरयं प्रपद्यते त्रिविष्टपं गच्छति धर्मपारगः ॥ ७९ ॥ कर्मके मार्गपर प्रयोग (आचरण) में लाये गये जो अपने शुभाशुभ कर्म हैं, उनका फल कर्ताको उस कर्मके अनुसार प्राप्त होता है। नीच कर्म करनेवाला नरकमें पड़ता है और धर्माचरणमें पारङ्गत पुरुष स्वर्गलोकको जाता है ॥ ७९ ॥ सोपानभूतं स्वर्गस्य मानुष्यं प्राप्य दुर्लभम् । तथाऽऽत्मानं समादध्याद् भ्रश्यते न पुनर्यथा ॥ ८० ॥ यह दुर्लभ मानव-शरीर स्वर्गलोकमें पहुँचनेके लिये सीढ़ीके समान है। इसे पाकर अपने-आपको इस प्रकार धर्ममें एकाग्र करे, जिससे फिर उसे स्वर्गसे नीचे न गिरना पड़े ॥ ८० ॥ यस्य नोत्क्रामति मतिः स्वर्गमार्गानुसारिणी । तमाहुः पुण्यकर्माणमशोच्यं पुत्रबान्धवैः ॥ ८१ ॥ स्वर्गलोकके मार्गका अनुसरण करनेवाली जिसकी बुद्धि धर्मका कभी उल्लंघन नहीं करती, उसको पुण्यात्मा कहते हैं। वह पुत्रों और बन्धु-बान्धवोंके लिये कदापि शोचनीय नहीं है ॥ ८१ ॥ यस्य नोपहता बुद्धिर्निश्चये ह्यवलम्बते । स्वर्गे कृतावकाशस्य नास्ति तस्य महद् भयम् ॥ ८२ ॥ जिसकी बुद्धि दूषित न होकर दृढ़ निश्चयका सहारा लेती है, उसने स्वर्गमें अपने लिये स्थान बना लिया है। उसे नरकका महान् भय नहीं प्राप्त होता ॥ ८२ ॥ तपोवनेषु ये जातास्तत्रैव निधनं गताः । तेषामल्पतरो धर्मः कामभोगानजानताम् ॥ ८३ ॥ जो लोग तपोवनोंमें पैदा हुए और वहीं मृत्युको प्राप्त हो गये, उन्हें थोड़े-से ही धर्मकी प्राप्ति होती है; क्योंकि वे काम-भोगोंको जानते ही नहीं थे (अतः उन्हें त्यागनेके लिये उनको कष्ट सहन नहीं करना पड़ता) ॥ यस्तु भोगान् परित्यज्य शरीरेण तपश्चरेत् । न तेन किंचिन्न प्राप्तं तन्मे बहु मतं फलम् ॥ ८४ ॥ जो भोगोंका परित्याग करके तपोवनमें जाकर शरीरसे तपस्या करता है, उसके लिये कोई ऐसी वस्तु नहीं, जो प्राप्त न हो। वही फल मुझे अधिक जान

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पड़ता है ।। ८४ ।। मातापितृसहस्राणि पुत्रदारशतानि च ।
अनागतान्यतीतानि कस्य ते कस्य वा वयम् ।। ८५ ।।
हजारों माता-पिता और सैकड़ों स्त्री-पुत्र पहले जन्मोंमें हो चुके हैं और भविष्यमें होंगे। वे हममेंसे किसके हैं और हम उनमेंसे किसके हैं? ।। ८५ ।।
अहमेको न मे कश्चिन्नाहमन्यस्य कस्यचित् ।
न तं पश्यामि यस्याहं तन्न पश्यामि यो मम ।। ८६ ।।
मैं अकेला हूँ। न तो दूसरा कोई मेरा है और न मैं दूसरे किसीका हूँ। मैं ऐसे किसी पुरुषको नहीं देखता, जिसका मैं होऊँ तथा ऐसा भी कोई नहीं दिखायी देता, जो मेरा हो ।। ८६ ।।
न तेषां भवता कार्यं न कार्यं तव तैरपि ।
स्वकृतैस्तानि यातानि भवांश्चैव गमिष्यति ।। ८७ ।।
न उनका तुम कुछ कर सकते हो और न वे तुम्हारे किसी काम आ सकते हैं। वे अपने कर्मोंके साथ चले गये और तुम भी चले जाओगे ।। ८७ ।।
इह लोके हि धनिनां स्वजनः स्वजनायते ।
स्वजनस्तु दरिद्राणां जीवतामपि नश्यति ।। ८८ ।।
इस संसारमें जो धनवान् हैं, उन्हींके स्वजन उनके साथ स्वजनोचित बर्ताव करते हैं; दरिद्रोंके स्वजन तो उनके जीते-जी ही उन्हें छोड़कर उनकी आँखसे ओझल हो जाते हैं ।। ८८ ।।
संचिनोत्यशुभं कर्म कलत्रापेक्षया नरः ।
ततः क्लेशमवाप्नोति परत्रेह तथैव च ।। ८९ ।।
मनुष्य अपनी स्त्रीके लिये अशुभ कर्मका संचय करता है, फिर उसके फलस्वरूपमें इहलोक और परलोकमें भी कष्ट उठाता है ।। ८९ ।।
पश्यति च्छिन्नभूतं हि जीवलोकं स्वकर्मणा ।
तत् कुरुष्व तथा पुत्र कृत्स्नं यत् समुदाहृतम् ।। ९० ।।
मनुष्य अपने-अपने कर्मोंके अनुसार ही इस जीव-जगत्को छिन्न-भिन्न हुआ देखता है, अतः बेटा! मैंने जो कुछ कहा है, वह सब काममें लाओ ।। ९० ।।
तदेतत् सम्प्रदृश्यैव कर्मभूमिं प्रपश्यतः ।
शुभान्याचरितव्यानि परलोकमभीप्सता ।। ९१ ।।
इहलोक कर्मभूमि है—ऐसा समझकर इसकी ओर देखते हुए दिव्य लोकोंकी इच्छा रखनेवाले पुरुषको शुभ कर्मोंका ही आचरण करना चाहिये ।। ९१ ।।
मासर्तुसंज्ञापरिवर्तकेण

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सूर्याग्निना रात्रिदिवेन्धनेन । स्वकर्मनिष्ठाफलसाक्षिकेन भूतानि कालः पचति प्रसह्य ॥ ९२ ॥ यह कालरूपी रसोइया बलपूर्वक सब जीवोंको पका रहा है। मास और ऋतु नामक करछुलसे वह जीवोंको उलटता-पलटता रहता है। सूर्य उसके लिये आगका काम देते हैं और कर्मफलके साक्षी रात और दिन उसके लिये ईंधन बने हुए हैं ॥ ९२ ॥

धनेन किं यन्न ददाति नाश्नुते बलेन किं येन रिपुं न बाधते । श्रुतेन किं येन न धर्ममाचरेत् किमात्मना यो न जितेन्द्रियो वशी ॥ ९३ ॥ उस धनसे क्या लाभ, जिसे मनुष्य न तो किसीको दे सकता और न अपने उपभोगमें ही ला सकता है? उस बलसे क्या लाभ, जिससे शत्रुओंको बाधित न किया जा सके? उस शास्त्रज्ञानसे क्या लाभ, जिसके द्वारा मनुष्य धर्माचरण न कर सके? और उस जीवात्मासे क्या लाभ, जो न तो जितेन्द्रिय है और न मनको ही वशमें रख सकता है? ॥

भीष्म उवाच

इदं द्वैपायनवचो हितमुक्तं निशम्य तु । शुको गतः परित्यज्य पितरं मोक्षदैशिकम् ॥ ९४ ॥ **भीष्मजी कहते हैं—**राजन्! व्यासजीके कहे हुए ये हितकर वचन सुनकर शुकदेवजी अपने पिताको छोड़कर मोक्षतत्त्वके उपदेशक गुरुके पास चले गये ॥ ९४ ॥

इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि मोक्षधर्मपर्वणि पावकाध्ययनं नामैकविंशत्यधिकत्रिशततमोऽध्यायः ॥ ३२१ ॥ इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत मोक्षधर्मपर्वमें पावकाध्ययन नामक तीन सौ इक्कीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ३२१ ॥


* मनुजीने धर्मके दस भेद ये बताये हैं—
धृतिः क्षमा दमोऽस्तेयं शौचमिन्द्रियनिग्रहः । धीर्विद्या सत्यमक्रोधो दशकं धर्मलक्षणम् ॥
‘धृति, क्षमा, मनोनिग्रह, पवित्रता, इन्द्रियसंयम, बुद्धि, विद्या, सत्य और अक्रोध—ये धर्मके दस लक्षण हैं।

३२२-

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⬅ विषय-सूची (TOC)

द्वाविंशत्यधिकत्रिशततमोऽध्यायः

शुभाशुभ कर्मोंका परिणाम कर्ताको अवश्य भोगना पड़ता है, इसका प्रतिपादन

युधिष्ठिर उवाच

यद्यस्ति दत्तमिष्टं वा तपस्तप्तं तथैव च ।
गुरूणां वापि शुश्रूषा तन्मे ब्रूहि पितामह ॥ १ ॥
**युधिष्ठिरने कहा—**पितामह! यदि दान, यज्ञ, तप अथवा गुरु-शुश्रूषा करनेसे कोई फल मिलता है तो वह मुझे बताइये ॥ १ ॥

भीष्म उवाच

आत्मनानर्थयुक्तेन पापे निविशते मनः ।
स कर्म कलुषं कृत्वा क्लेशे महति धीयते ॥ २ ॥
**भीष्मजीने कहा—**राजन्! जब बुद्धि काम-क्रोध आदि अनर्थोंसे युक्त हो जाती है, तब उससे प्रेरित हुए मनुष्यका मन पापमें प्रवृत्त होने लगता है। फिर वह मनुष्य दोषयुक्त कर्म करके महान् क्लेशमें पड़ जाता है ॥ २ ॥

दुर्भिक्षादेव दुर्भिक्षं क्लेशात् क्लेशं भयाद् भयम् ।
मृतेभ्यः प्रमृता यान्ति दरिद्राः पापकर्मिणः ॥ ३ ॥
पापकर्म करनेवाले दरिद्र मानव दुर्भिक्षसे दुर्भिक्षको, क्लेशसे क्लेशको तथा भयसे भयको पाते हुए मरे हुओंसे भी अधिक मृतकतुल्‍य हो जाते हैं ॥ ३ ॥

उत्सवादुत्सवं यान्ति स्वर्गात् स्वर्गं सुखात् सुखम् ।
श्रद्दधानाश्च दान्ताश्च धनस्थाः शुभकारिणः ॥ ४ ॥
जो श्रद्धालु, जितेन्द्रिय, धनसम्पन्न तथा शुभकर्म-परायण होते हैं, वे उत्सवसे अधिक उत्सवको, स्वर्गसे अधिक स्वर्गको तथा सुखसे अधिक सुखको पाते हैं ॥

व्यालकुञ्जरदुर्गेषु सर्पचौरभयेषु च ।
हस्तावापेन गच्छन्ति नास्तिकाः किमतः परम् ॥ ५ ॥
नास्तिक मनुष्योंके हाथमें हथकड़ी डालकर राजा उन्हें राज्यसे दूर निकाल देता है और वे उन जंगलोंमें चले जाते हैं, जो मतवाले हाथियोंके कारण दुर्गम तथा सर्प और चोर आदिके भयसे भरे हुए होते हैं। इससे बढ़कर उन्हें और क्या दण्ड मिल सकता है? ॥ ५ ॥

प्रियदेवातिथेयाश्च वदान्याः प्रियसाधवः ।
क्षेम्यमात्मवतां मार्गमास्थिता हस्तदक्षिणम् ॥ ६ ॥