संक्षिप्त नारद पुराण
Sankshipt Narada Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
२५० * संक्षिप्त नारदपुराण *
प्रयोजकके व्यापारमें प्रत्येक धातुसे णिच् प्रत्यय होता है। 'च'कार और 'ण'कार इत्संज्ञक हैं। णिच् प्रत्यय परे रहनेपर स्वरान्त अङ्गकी वृद्धि होती है। भू से णिच् करनेपर भू+इ बना; फिर वृद्धि और आव् आदेश करनेपर भावि बना, उससे धातुसम्बन्धी अन्य कार्य करनेपर भावयति रूप बनता है। जो कर्ताको प्रेरणा दे, उसे प्रयोजक कहते हैं। जैसे—'चैत्रः पण्डितो भवति' (चैत्र पण्डित होता है), 'तं मैत्रः अध्यापनादिना प्रेरयति' (उसे मैत्र पढ़ाने आदिके द्वारा पण्डित होनेमें प्रेरणा देता है)। इस वाक्यमें चैत्र प्रयोज्य कर्ता है और मैत्र प्रयोजक कर्ता है। इस प्रयोजकके व्यापारमें ही णिच् प्रत्यय होता है; इसलिये उसीके अनुसार प्रथम, मध्यम आदि पुरुषकी व्यवस्था एवं क्रिया होती है। प्रयोज्य कर्ता प्रयोजकके व्यापारमें कर्म बन जाता है, इसलिये उसमें द्वितीया विभक्ति होती है और प्रयोजक कर्तामें प्रथमा विभक्ति। यथा—'मैत्रः चैत्रं पण्डितं भावयति' (मैत्र चैत्रको पण्डित बनानेमें योग देता है)। इसी प्रकार अन्य धातुओंसे भी प्रेरणार्थक प्रत्यय होता है। यथा—'छात्रः पठति, गुरुः प्रेरयति इति गुरुः छात्रं पाठयति' (छात्र पढ़ता है, गुरु उसे प्रेरित करता है; इसलिये गुरु छात्रको पढ़ाता है)।
इच्छा-अर्थमें 'सन्' प्रत्यय होता है 'भवितुम् इच्छति बुभूषति' (होनेकी इच्छा करता है)। इसी प्रकार पठ्, गम् आदि अन्य धातुओंसे भी इच्छा-अर्थमें पिपठिषति (पढ़नेकी इच्छा करता है), जिगमिषति (जाना चाहता है)—इत्यादि सन्नन्त रूप होते हैं। मुने! क्रिया-समभिहारमें एक स्वरवाले हलादि धातुसे 'यङ्' प्रत्यय होता है, इस नियमके अनुसार भू-धातुसे यङ्प्रत्यय होनेपर धातुका द्वित्व होता है; क्योंकि सन् और यङ् परे रहनेपर धातुके द्वित्व होने (एकसे दो हो जाने)-का नियम है। फिर धातु-प्रत्ययसम्बन्धी अन्य कार्य करनेपर बोभूयते रूप बनता है। यथा—'देवदत्तः पण्डितो बोभूयते' (देवदत्त बड़ा भारी पण्डित हो रहा है)। 'बार-बार' या 'अधिक' अर्थका बोध कराना ही क्रियासमभिहार कहलाता है। इस तरहके प्रयोगको यङन्त कहते हैं। पठ् और गम् आदि धातुओंसे यङ्-प्रत्यय करनेपर पापठ्यते, (बार-बार या बहुत पढ़ता है)। जङ्गम्यते (बार-बार या बहुत जाता है) इत्यादि रूप होते हैं॥७९॥
तथा यङ्लुकि विप्रेन्द्र बोभवीति च पठ्यते।
पुत्रीयतीत्यात्मनीच्छायां तथाचारेऽपि नारद।
अनुदात्तङितो धातोः क्रियाविनिमये तथा ॥८०॥
यङ्-प्रत्ययका लुक् (लोप होना) भी देखा जाता है। उस दशामें बोभवीति, बोभोति, पापठीति और जङ्घमीति इत्यादि रूप होते हैं। इन रूपोंको यङ्लुगन्त रूप कहते हैं। अर्थ यङन्तके ही समान होते हैं। 'आत्मनः पुत्रम् इच्छति' (अपने लिये पुत्र चाहता है)। इस वाक्यसे पुत्रकी इच्छा व्यक्त होती है। ऐसे स्थलोंमें इच्छा-क्रियाके कर्मभूत शब्दसे क्यच्-प्रत्यय होता है। ककार और चकारकी इत्संज्ञा होती है। उपर्युक्त उदाहरणमें पुत्र-शब्दसे क्यच्-प्रत्यय करनेपर पुत्र+य इस अवस्थामें पुत्रमें 'त्र'के अकारका इ हो जाता है, फिर 'पुत्रीय' की धातुसंज्ञा करके तिङन्तके समान रूप चलते हैं। इस प्रकार 'पुत्रीयति' इत्यादि रूप होते हैं। 'पुत्रीयति'का अर्थ है—अपने लिये पुत्र चाहता है। ऐसे प्रयोगको नामधातु कहते हैं। नारदजी! कर्मभूत उपमानवाचक शब्दसे आचार-अर्थमें भी क्यच् होता है। यथा—'पुत्रमिवाचरति पुत्रीयति छात्रम्' (गुरुजी छात्रके साथ पुत्रका-सा बर्ताव करते हैं)।
अब आत्मनेपदका प्रकरण आरम्भ करते हैं। जिस धातुमें अनुदात्त स्वर और ङकारकी इत्संज्ञा
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होती है, उससे आत्मनेपदके प्रत्यय होते हैं। यथा—एधते, वर्धते इत्यादि। ये अनुदात्तेत् हैं। त्रैङ् पालने—यह ङित् धातु है, इसके केवल आत्मनेपदमें 'त्रायते' इत्यादि रूप होते हैं। जहाँ क्रियाका विनिमय व्यक्त होता हो, वहाँ भी आत्मनेपद होता है। यथा—व्यतिलुनीते (दूसरेके योग्य लवनरूप कार्य दूसरा करता है) ॥८०॥
निविशादेस्तथा विप्र विजानीह्यात्मनेपदम्।
परस्मैपदमाख्यातं शेषात् कर्तरि शाब्दिकैः ॥८१॥
विप्रवर ! निपूर्वक 'विश्' एवं वि और परापूर्वक 'जि' इत्यादि धातुओंसे भी आत्मनेपद ही जानो। यथा—निविशते, विजयते, पराजयते इत्यादि। भाव और कर्ममें प्रत्यय होनेपर भी आत्मनेपद ही होता है। आत्मनेपदके जितने निमित्त हैं, उन्हें छोड़कर शेष धातुओंसे कर्तामें परस्मैपद होता है—ऐसा वैयाकरणोंका कथन है॥८१॥
ञित्स्वरितेतश्च उभे यक्च स्याद्भावकर्मणोः।
जिन धातुओंमें 'स्वरित' और 'ञ्' की इत्संज्ञा हुई हो, उनसे परस्मैपद और आत्मनेपद दोनों होते हैं। यथा—'खनति, खनते। श्रयति, श्रयते' इत्यादि।
(अब भाव-कर्म-प्रकरण आरम्भ करते हैं—) भाव और कर्ममें धातुसे यक् प्रत्यय होता है। भावमें प्रत्यय होनेपर क्रियामें केवल औत्सर्गिक एकवचन होता है और सदा प्रथम पुरुषके ही एकवचनका रूप लिया जाता है। उस दशामें कर्ता तृतीयान्त होता है। भू धातुसे भावमें प्रत्यय करनेपर 'भूयते' रूप होता है। वाक्यमें उसका प्रयोग इस प्रकार है—'त्वया मया अन्यैश्च भूयते।' सकर्मक धातुसे कर्ममें प्रत्यय होनेपर कर्म उक्त हो जाता है, अतः उसमें प्रथमा विभक्ति होती है और अनुक्त कर्तामें तृतीया विभक्तिका प्रयोग होता है। कर्ताके अनुसार ही क्रियामें पुरुष और वचनकी व्यवस्था होती है। यथा—'चैत्रः आनन्दमनुभवति इति कर्मणि प्रत्यये चैत्रेणानन्दोऽनुभूयते', (चैत्रसे आनन्दका अनुभव किया जाता या आनन्द भोगा जाता है) चैत्रस्त्वामनुभवति, चैत्रेण त्वमनुभूयसे, (चैत्रसे तुम अनुभव किये जाते हो) चैत्रो मामनुभवति, चैत्रेणाहमनुभूये' (चैत्रसे मैं अनुभव किया जाता हूँ) इत्यादि उदाहरण भाव-कर्मके हैं।
सौकर्यातिशयं चैव यदा द्योतयितुं मुने॥८२॥
विवक्ष्यते न व्यापारो लक्ष्ये कर्तुस्तदापरे।
लभन्ते कर्तृतां पश्य पच्यते ह्योदनः स्वयम्॥८३॥
साध्वसिश्छिनत्त्येवं स्थाली पचति वै मुने।
धातोः सकर्मकात् कर्तृकर्मणोरपि प्रत्ययाः ॥८४॥
मुने! जब अतिशय सौकर्य प्रकाशित करनेके लिये लक्ष्यमें कर्ताके व्यापारकी विवक्षा नहीं रह जाती, तब कर्म और करण आदि दूसरे कारक ही कर्तृभावको प्राप्त होते हैं। यथा—'चैत्रो वह्निना स्थाल्यामोदनं पचति' (चैत्र आगसे बटलोईमें भात पकाता है)—इस वाक्यमें जब चैत्रके कर्तृत्वकी विवक्षा न रहे और करण आदिके कर्तृत्वकी विवक्षा हो जाय तो वे ही कर्ता हो जाते हैं और तदनुकूल क्रिया होती है। यथा—'वह्निः पचति' (आग पकाती है)। यहाँ करण ही कर्तारूपमें प्रयुक्त हुआ है। 'स्थाली पचति' (बटलोई पकाती है)—यहाँ अधिकरण ही कर्ताके रूपमें प्रयुक्त हुआ है। 'ओदनः स्वयं पच्यते' (भात स्वयं पकता है)—यहाँ कर्म ही कर्तारूपमें प्रयुक्त हुआ है। जब कर्म ही कर्तारूपमें प्रयुक्त हो तो कर्तामें लकार होता है; परंतु कर्मवद्भाव होनेसे यक् और आत्मनेपद आदि ही होते हैं। अतः 'पचति' न होकर 'पच्यते' रूप होता है। ऐसे प्रयोगको कर्म-कर्तृप्रकरणके अन्तर्गत मानते हैं। दूसरा उदाहरण इस प्रकार है—'असिना साधु छिनत्ति' (तलवारसे अच्छी तरह काटता है)—इस वाक्यमें उपर्युक्त नियमानुसार करणमें कर्तृत्वकी विवक्षा होनेपर
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ऐसा वाक्य बनेगा—‘साधु असिश्छिनत्ति' (तलवार अच्छा काटती है)। मुने! सकर्मक धातु भी कर्मकर्तृमें अकर्मक हो जाता है, अतः उससे भाव तथा कर्तामें भी लकार होता है। यथा भावे—पच्यते ओदनेन। कर्तरि—पच्यते ओदनः। सम्प्रदान और अपादान कारकोंमें कर्तृत्वकी विवक्षा कभी नहीं की जाती, क्योंकि यह अनुभवके विरुद्ध है। सामान्य स्थितिमें सकर्मक धातुसे ‘कर्ता' और 'कर्म'में प्रत्यय होते हैं ॥ ८२—८४ ॥
तस्माद् वाकर्मकाद्विप्र भावे कर्तरि कीर्तिताः।
फलव्यापारयोरेकनिष्ठतायामकर्मकः ॥ ८५ ॥
धातुस्तयोर्धर्मभेदे सकर्मक उदाहृतः।
गौणे कर्मणि दुह्वादेः प्रधाने नीहृकृष्वहाम् ॥ ८६ ॥
बुद्धिभक्षार्थयोः शब्दकर्मकाणां निजेच्छया।
प्रयोज्यकर्मण्यन्येषां ण्यन्तानां लादयो मताः ॥ ८७ ॥
विप्रवर! वही धातु यदि अकर्मक हो तो उससे 'भाव' और 'कर्ता' में प्रत्यय कहे गये हैं।
सभी धातुओंके फल और व्यापार—ये दो अर्थ हैं। ये दोनों जहाँ एकमात्र कर्तामें ही मौजूद हों, उन धातुओंको अकर्मक कहते हैं। जैसे—भू-धातुका अर्थ सत्ता है। सत्ताका तात्पर्य है—आत्मधारणानुकूल व्यापार। इसमें आत्मधारणरूप फल और तदनुकूल व्यापार दोनों केवल कर्तामें ही स्थित हैं; अतः भू-धातु अकर्मक है।
जहाँ फल और व्यापार दोनों भिन्न-भिन्न धर्मोंमें स्थित हों, वहाँ धातुको सकर्मक माना गया है। जैसे—'पच्' धातुका अर्थ है—विक्लेत्त्यनुकूल व्यापार (चावल आदिको गलानेके अनुरूप प्रयत्न)। इसमें विक्लेत्ति (गलना) यह फल है, जो चावलमें होता है और इसके अनुकूल जो चूल्हेमें आग जलाने आदिका व्यापार है, वह कर्तामें है; अतः 'पच्' धातु सकर्मक हुआ है। 'दुह' आदि* धातुओंके दो कर्म होते हैं। यथा—'गां दोग्धि पयः' (गायसे दूध दुहता है)—इसमें गाय गौण कर्म है और दूध प्रधान कर्म। दुह आदि धातुओंके गौण कर्ममें ही प्रत्यय होता है। यथा—'गौर्दुह्यते पयः, बलिर्याच्यते वसुधाम्' इत्यादि। नी, हृ, कृष् और वह्—इन चार धातुओंके प्रधान कर्ममें प्रत्यय होता है। यथा—'अजां ग्रामं नयति'—इस वाक्यमें अजा प्रधान कर्म और ग्राम गौण कर्म है। प्रधान कर्ममें प्रत्यय होनेपर वाक्यका स्वरूप इस प्रकार होगा—'अजा ग्रामं नीयते।' ज्ञानार्थक और भक्षणार्थक धातुओंके एवं शब्दकर्मक धातुओंके ण्यन्त होनेपर उनसे प्रधान या अप्रधान किसी भी कर्ममें अपनी इच्छाके अनुसार प्रत्यय कर सकते हैं। यथा—'बोध्यते माणवकं धर्मः, माणवको धर्मम् इति वा।' अन्य गत्यर्थक एवं अकर्मक धातुओंके ण्यन्त होनेपर उनके प्रयोज्य कर्ममें लकार आदि प्रत्यय माने गये हैं। यथा—'मासमास्यते माणवकः' ॥ ८५-८७ ॥
फलव्यापारयोर्धातुराश्रये तु तिङः स्मृताः।
फले प्रधानं व्यापारस्तिङर्थस्तु विशेषणम् ॥ ८८ ॥
धातु फल और व्यापाररूप अर्थोंका बोधक होता है। जैसे—भू-धातु आत्मधारणरूप फल और तदनुकूल व्यापारका बोधक है। फल और व्यापार दोनोंका जो आश्रय है, उसमें अर्थात् कर्ता एवं कर्ममें (तथा भावमें भी) तिङ्-प्रत्यय होते हैं, फलमें व्यापारकी ही प्रधानता है, तिङर्थरूप जो फल है वह उस व्यापारका विशेषण होता है। जैसे—'पचति'—इस क्रियाद्वारा चावल आदिके गलनेका प्रतिपादन होता है। यहाँ विक्लेत्तिरूप फलके अनुकूल जो अग्निप्रज्वालन और फूत्कारादि व्यापार हैं, उनके आश्रयभूत कर्तामें प्रत्यय हुआ है। 'ओदनः पच्यते' इत्यादिमें फलाश्रयभूत कर्ममें
*दुह्, याच्, पच्, दण्ड्, रुध्, प्रच्छ्, चि, ब्रू, शास्, जि, मथ्, मुष्—ये दुह् आदिके अन्तर्गत हैं, इनके दो कर्म होते हैं। इसी प्रकार नी, हृ, कृष् और वह्—इनके भी दो कर्म होते हैं।
पूर्वभाग-द्वितीय पाद २५३
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तिङ् प्रत्यय होनेके कारण ओदनमें प्रथमा विभक्ति है॥८८॥
एधितव्यमेधनीयमिति कृत्ये निदर्शनम्।
भावे कर्मणि कृत्याः स्युः कृतः कर्तरि कीर्तिताः॥८९॥
कर्ता कारक इत्याद्या भूते भूतादि कीर्तितम्।
गम्यादि गम्ये निर्दिष्टं शेषमद्यतने मतम्॥९०॥
(अब कृदन्त-प्रकरण प्रारम्भ करते हैं—कृत्-प्रत्यय जिसके अन्तमें हो, वह कृदन्त है। ण्वुल्, तृच्, अच् आदि प्रत्यय 'कृत्' कहलाते हैं। कृत्-प्रत्ययोंमेंसे जो कृत्य, क्त और खलर्थ प्रत्यय हैं, वे केवल भाव और कर्ममें ही होते हैं। तव्यत्, तव्य, अनीयर्, केलिमर् आदि प्रत्यय कृत्य कहलाते हैं। घञ् आदि प्रत्यय भाव, करण और अधिकरणमें होते हैं। सामान्यतः कृत्-प्रत्यय 'कर्ता' में प्रयुक्त होते हैं। यहाँ पहले कृत्य प्रत्ययोंके उदाहरण देते हैं—) एधितव्यम् और एधनीयम्—ये कृत्य प्रत्ययके उदाहरण हैं। 'कृत्य' भाव और कर्ममें तथा 'कृत्' कर्तामें बताये गये हैं। 'त्वया मया अन्यैश्च एधितव्यम्', यहाँ भावमें तव्य और अनीयर् प्रत्यय हुए हैं। कर्ममें प्रत्ययका उदाहरण इस प्रकार समझना चाहिये। 'छात्रेण पुस्तकं पठनीयम्' 'ग्रन्थः पठितव्यः' इत्यादि कर्ममें प्रत्यय होनेसे कर्तामें तृतीया विभक्ति और कर्ममें प्रथमा विभक्ति हुई है। कर्ता, कारकः इत्यादि 'कृत्' प्रत्ययके उदाहरण हैं। यथा— 'रामः कर्ता' 'ब्रह्मा कारकः' यहाँ कर्तामें 'तृच्' और 'ण्वुल्' प्रत्यय हुए हैं। 'वु'के स्थानमें अक् आदेश होता है। ण्, ल्, च् आदिकी इत्संज्ञा होती है। 'क्त' और 'क्तवतु' ये प्रत्यय भूतकालमें होते हैं। यथा—'भूतः भूतवान्' इत्यादि; और 'गम्य' आदि शब्द भविष्यत् अर्थमें निर्दिष्ट हुए हैं। शेष शब्द वर्तमान कालमें प्रयुक्त होने योग्य माने गये हैं ॥८९-९०॥
अधिस्त्रीत्यव्ययीभावे यथाशक्ति च कीर्तितम्।
रामाश्रितस्तत्पुरुषे धान्यार्थो यूपदारु च॥९१॥
व्याघ्रभी राजपुरुषोऽक्षशौण्डो द्विगुरुच्यते।
पञ्चगवं दशग्रामी त्रिफलेति तु रूढितः॥९२॥
(अब समासका प्रकरण आरम्भ करते हैं—) समास चार प्रकारके माने गये हैं—अव्ययीभाव, तत्पुरुष, बहुव्रीहि और द्वन्द्व। 'तत्पुरुष' का एक विशिष्ट भेद 'कर्मधारय' और कर्मधारयका एक विशिष्ट भेद 'द्विगु' है। भूतपूर्वः इत्यादि स्थलोंमें जो समास है, उसका कोई नाम नहीं निर्देश किया जा सकता। अतः उसे केवल समासमात्र जानना चाहिये। जिसमें प्रथम पद अव्यय हो, वह समास अव्ययीभाव होता है। अथवा अव्ययीभावके अधिकारमें जो समासविधायक वचन हैं, उनके अनुसार जहाँ समास हुआ है, वह अव्ययीभाव समास है। अव्ययीभाव अव्ययसंज्ञक होता है। अतः सभी विभक्तियोंमें उसका समान रूप है। अकारान्त अव्ययीभावमें विभक्तियोंका 'अम्' आदेश हो जाता है, परंतु पञ्चमी विभक्तिको छोड़कर ऐसा होता है। तृतीया और सप्तमीमें भी अम्भाव वैकल्पिक है। यथा अपदिशम्, अपदिशे इत्यादि। अधिस्त्रि और यथाशक्ति आदि पद अव्ययीभाव समासके अन्तर्गत बताये गये हैं। द्वितीयान्तसे लेकर सप्तम्यन्त तकके पद सुबन्तके साथ समस्त होते हैं और वह समास तत्पुरुष होता है। तत्पुरुषके उदाहरण इस प्रकार हैं—रामम्+आश्रितः=रामाश्रितः। धान्येन+अर्थः=धान्यार्थः यूपाय+दारु=यूपदारु। व्याघ्रात्+भीः= व्याघ्रभीः राज्ञः+पुरुषः=राजपुरुषः। अक्षेषु+शौण्डः=अक्षशौण्डः इत्यादि। जिसमें संख्यावाचक शब्द पूर्वमें हो, वह 'द्विगु' कहा गया है। 'पञ्चानां गवां समाहारः पञ्चगवम्।' 'दशानां ग्रामाणां समाहारः दशग्रामी (यहाँ स्त्रीलिङ्गसूचक 'ङीप्' प्रत्यय हुआ है)। 'त्रयाणां फलानां समाहारः त्रिफला' (इसमें स्त्रीत्वसूचक 'टाप्' प्रत्यय हुआ है)। त्रिफला-शब्द आँवले, हर्रे और बहेड़ेके लिये रूढ़ (प्रसिद्ध) है॥९१-९२॥
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नीलोत्पलं महाषष्ठी तुल्यार्थे कर्मधारयः। अब्राह्मणो नञि प्रोक्तः कुम्भकारादिकः कृतः ॥ ९३ ॥
समानाधिकरण तत्पुरुषकी 'कर्मधारय' संज्ञा होती है। उसके दोनों पद प्रायः विशेष्य-विशेषण होते हैं। विशेषणवाचक शब्दका प्रयोग प्रायः पहले होता है। 'नीलं च तत् उत्पलं च=नीलोत्पलम्, महती चासौ षष्ठी च=महाषष्ठी।' जहाँ 'न' शब्द किसी सुबन्तके साथ समस्त होता है, वह 'नञ् तत्पुरुष' कहलाता है। 'न ब्राह्मणः अब्राह्मणः' इत्यादि। कुम्भकार आदि पदोंमें 'उपपद तत्पुरुष' समास है ॥ ९३ ॥
अन्यार्थे तु बहुव्रीहौ ग्रामः प्राप्तोदको द्विज। पञ्चगू रूपवद्भार्यो मध्याह्नः ससुतादिकः ॥ ९४॥
विप्रवर! जहाँ अन्य अर्थकी प्रधानता हो, उस समासकी बहुव्रीहिमें गणना होती है। 'प्राप्तम् उदकं यं स प्राप्तोदको ग्रामः' (जहाँ जल पहुँचा हो, वह ग्राम 'प्राप्तोदक' है)। इसी तरह—'पञ्च गावो यस्य स पञ्चगुः। रूपवती भार्या यस्य स रूपवद्भार्यः।' मध्याह्नः-पद तत्पुरुष समास है। 'सुतेन सह आगतः ससुतः' आदि पद बहुव्रीहि समासके अन्तर्गत हैं ॥ ९४ ॥
समुच्चये गुरुं चेशं भजस्वान्वाचये त्वट। भिक्षामानय गां चापि वाक्यमेवानयोर्भवेत् ॥ ९५ ॥
चार्थमें द्वन्द्व समास होता है। 'च' के चार अर्थ हैं—समुच्चय, अन्वाचय, इतरेतरयोग और समाहार। परस्पर निरपेक्ष अनेक पदोंका एकमें अन्वय होना 'समुच्चय' कहलाता है। समुच्चयमें 'ईशं गुरुं च भजस्व' यह वाक्य है। इसमें ईश और गुरु दोनों स्वतन्तरूपसे 'भज' इस क्रियापदसे अन्वित होते हैं। ईश-पदका क्रियाके साथ अन्वय हो जानेपर पुनः क्रियापदकी आवृत्ति करके गुरुपदका भी उसमें अन्वय होता है। यही उन दोनोंकी निरपेक्षता है। समास साकाङ्क्ष पदोंमें होता है। अतः समुच्चय-वाक्यमें द्वन्द्व समास नहीं होता है। जहाँ एक प्रधान और दूसरा अप्रधानरूपसे अन्वित हो, वहाँ अन्वाचय होता है—जैसे 'भिक्षामट गाञ्चानय' इस वाक्यमें भिक्षाके लिये गमन प्रधान है और गौका लाना अप्रधान या आनुषङ्गिक कार्य है। अतः एकार्थीभावरूप सामर्थ्य न होनेसे अन्वाचयमें भी द्वन्द्व समास नहीं होता। समुच्चय और अन्वाचयमें वाक्यमात्रका ही प्रयोग होता है ॥ ९५ ॥
इतरेतरयोगे तु रामकृष्णौ समाहृतौ। रामकृष्णं द्विज द्वौ द्वौ ब्रह्म चैकमुपास्यते ॥ ९६ ॥
उद्भूत अवयव-भेद-समूहरूप परस्पर अपेक्षा रखनेवाले सम्मिलित पदोंका एकधर्मावच्छिन्नमें अन्वय होना इतरेतरयोग कहलाता है। अतः इसमें सामर्थ्य होनेके कारण समास होता है, यथा—'रामकृष्णौ भज' इस वाक्यमें 'रामश्च कृष्णश्च=रामकृष्णौ' इस प्रकार समास है। इतरेतरयोग द्वन्द्वमें समस्यमान पदार्थगत संख्याका समुदायमें आरोप होता है। इसलिये वहाँ द्विवचनान्त या बहुवचनान्तका प्रयोग देखा जाता है। समूहको समाहार कहते हैं। वहाँ अवयवगत भेद तिरोहित होता है। यथा—'रामश्च कृष्णश्चेत्यनयोः समाहारः रामकृष्णम्।' समाहार द्वन्द्वमें अवयवगत संख्या समुदायमें आरोपित नहीं होती। इसलिये एकत्व-बुद्धिसे एकवचनान्तका प्रयोग किया जाता है। समाहारमें नपुंसकलिङ्ग होता है। विप्रवर! इतरेतरयोगमें राम और कृष्ण दोनों दो हैं और समाहारमें उनकी एकता है, इसलिये कि ब्रह्मरूपसे उन्हें एक मानकर उनकी उपासना की जाती है ॥ ९६ ॥
इति श्रीबृहन्नारदीयपुराणे पूर्वभागे बृहदुपाख्याने द्वितीयपादे व्याकरणनिरूपणं नाम द्विपञ्चाशत्तमोऽध्यायः ॥ ५२ ॥
- पूर्वभाग-द्वितीय पाद * | २५५ ---|---
निरुक्त-वर्णन
सनन्दनजी कहते हैं—अब मैं निरुक्तका वर्णन करता हूँ, जो वेदका कर्णरूप उत्तम अङ्ग है। यह वैदिक धातुरूप है, इसे पाँच प्रकारका बताया गया है॥ १॥ उसमें कहीं वर्णका आगम होता है, कहीं वर्णका विपर्यय होता है, कहीं वर्णोंका विकार होता है और कहीं वर्णका नाश माना गया है॥ २॥ नारद ! जहाँ वर्णोंके विकार अथवा नाशद्वारा जो धातुके साथ विशेष अर्थका प्रकाशक संयोग होता है, वह पाँचवाँ उत्तम योग कहा गया है॥ ३॥ वर्णके आगमसे 'हंसः'१ पदकी सिद्धि होती है। वर्णोंके विपर्यय (अदल-बदल)—से 'सिंहः'२ पद सिद्ध होता है। वर्णविकारसे 'गूढोत्मा'३ की सिद्धि होती है। वर्णनाशसे 'पृषोदरः'४ सिद्ध होता है॥ ४॥ 'भ्रमर'५ आदि शब्दोंमें पाँचवाँ योग समझना चाहिये। वेदोंमें लौकिक नियमोंका विकल्प या विपर्यय कहा गया है। यहाँ 'पुनर्वसु'६ पदको उदाहरणके रूपमें रखना चाहिये॥ ५॥ 'नभस्वत्'-में 'वत्' प्रत्यय परे रहते भसंज्ञा हो जानेसे 'स'का रुत्व नहीं हुआ। (वार्तिक भी है—'नभोऽङ्गिरोमनुषां वत्युपसंख्यानम्') 'वृषन् अश्वो यस्य सः' इस विग्रहमें बहुव्रीहि समास होनेपर 'वृषन्+अश्वः' इस अवस्थामें अन्तर्वर्तिनी विभक्तिका आश्रय लेकर पदसंज्ञा करके नकारका लोप प्राप्त था, किंतु 'वृषण्वश्वयोः' इस वार्तिकके नियमानुसार भसंज्ञा हो जानेसे न लोप नहीं हुआ; अतः 'वृषणश्वः' यही वैदिक प्रयोग है। (लोकमें 'वृषाश्वः' होता है।) कहीं-कहीं आत्मनेपदके स्थानमें परस्मैपदका प्रयोग होता है। यथा—'प्रतीपमन्य ऊर्मिर्युध्यति' यहाँ 'युध्यते' होना चाहिये, किंतु परस्मैपदका प्रयोग किया गया है। 'प्र' आदि उपसर्ग यदि धातुके पहले हों तो उनकी उपसर्ग एवं गतिसंज्ञा होती है; किंतु वेदमें वे धातुके बादमें या व्यवधान देकर प्रयुक्त होनेपर भी 'उपसर्ग' एवं 'गति' कहलाते हैं—यथा 'हरिभ्यां याह्योक आ। आ मन्द्रैरिन्द्र हरिभिर्याहि।' यहाँ 'आयाहि' के अर्थमें 'याहि+आ' का व्यवहित तथा पर प्रयोग है। दूसरे उदाहरणमें आ+याहिके बीचमें बहुत-से पदोंका व्यवधान है॥ ६॥ वेदमें विभक्तियोंका विपर्यास देखा जाता है, जैसे—'दध्ना जुहोति'; यहाँ 'दधि' शब्द 'हु' धातुका कर्म है, उसमें द्वितीया होनी चाहिये, किंतु 'तृतीया च होश्छन्दसि' इस नियमके अनुसार कर्ममें तृतीया हो गयी है। 'अभ्युत्साद्यामकः' इसमें अभि+उत्पूर्वक 'सद्' धातुसे लुङ् लकारमें 'आम्' और 'अक'-का अनुप्रयोग हुआ है (लोकमें 'अभ्युदषीषदत्' रूप बनता है)। 'मा त्वाग्निर्ध्वनयीत्' इसमें 'नोनयति ध्वनय०' इत्यादि वैदिक सूत्रके द्वारा च्लिके चङ्भावका निषेध होता है। माङ्के योगमें 'अट्
१. 'हन्तीति हंसः' इस व्युत्पत्तिके अनुसार हन्-धातुके आगे ('वृत्तॄवदिहनि०' इत्यादि उणादि सूत्रसे) 'स'का आगम होनेसे 'हंस' शब्द बनता है। २. 'हिंसि हिंसायाम्' इस धातुसे 'हिनस्तीति' इस व्युत्पत्तिके अनुसार कर्त्रर्थमें अच् प्रत्यय करनेपर पहले 'हिंसः' बनता है, फिर 'पृषोदरादीनि यथोपदिष्टम्'के आदेशानुसार 'ह' के स्थानमें 'स' और 'स' के स्थानमें 'ह' आ जानेसे 'सिंहः' पद सिद्ध होता है। ३. 'गूढ+आत्मा' इस अवस्थामें 'आ' विकृत हो 'उ' के रूपमें परिणत हुआ और गुण होनेसे 'गूढोत्मा' बना। (एष सर्वेषु भूतेषु गूढोत्मा न प्रकाशते)। ४. 'पृषोदरः' में 'पृषद्+उदरः' यह पदच्छेद है। 'पृषोदरादीनि यथोपदिष्टम्'के आदेशानुसार यहाँ तकारका लोप (नाश) हुआ तथा गुण होनेसे 'पृषोदरः' सिद्ध हुआ है। ५. 'भ्रमतीति भ्रमरः' यहाँ 'भ्रमु अनवस्थाने'से 'अर्तिकमिश्रमिचमिदेविवाशिभ्यश्चित्' इस उणादि सूत्रके अनुसार 'अर' प्रत्यय होनेसे 'भ्रमर' शब्द सिद्ध होता है। किन्हीं विद्वानोंके मतमें 'भ्रमन् रौति' इस व्युत्पत्तिके अनुसार 'भ्रमर' शब्द बनता है। इसमें 'भ्रम्+अतृ+रु+अच्' इस अवस्थामें 'तृ'का लोप 'रु'में उका लोप करनेसे 'भ्रमर'की सिद्धि होती है। ६. लौकिक प्रयोगमें 'पुनर्वसु' शब्द नित्य द्विवचनान्त है, किंतु वेदमें 'छन्दसि पुनर्वस्वोरेकवचनम्'के नियमानुसार इसका एकवचनान्त प्रयोग भी होता है।
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आट्' न होनेसे 'ध्वनयीत्' रूप हुआ है (लोकमें घटादि ध्वन धातुका रूप 'अदिध्वनत्' होता है और चुरादिका रूप 'अदध्वनत्' होता है)। 'ध्वनयीत्' इत्यादि प्रमुख उदाहरण हैं। 'निष्टर्क्य०' इत्यादि प्रयोग वेदमें निपातनसे सिद्ध होते हैं। 'छन्दसि निष्टर्क्य' इत्यादि सूत्र इसमें प्रमाण हैं। यहाँ 'निस्पूर्वक कृत्' धातुसे 'ऋदुपधाच्च' सूत्रके अनुसार 'क्यप्' प्राप्त था; परंतु 'ण्यत्' प्रत्यय हुआ है; साथ ही 'कृत' में आदि-अन्तका विपर्यय होनेसे 'तृक' रूप बना। फिर गुण होनेसे तर्क्स हुआ। 'निस्'के 'स्' का षत्व हुआ और ष्टुत्व होकर 'निष्टर्क्य' सिद्ध हुआ। 'गृभाय' इत्यादि प्रयोग वैकल्पिक 'शायच्' होनेसे बनते हैं। हृ-धातुसे शायच् हुआ और 'हृग्रहोर्भश्छन्दसि' के आदेशानुसार 'ह' के स्थानमें 'भ' हो गया तो 'गृभाय' बना—'गृभाय जिह्वया मधु' ॥ ७ ॥ शास्त्रकार सुप्, तिङ्, उपग्रह (परस्मैपद-आत्मनेपद), लिङ्ग, पुरुष, काल, हल्, अच्, स्वर, कर्तृ, (कारक) और यङ्—इन सबका व्यत्यय (विपर्यय) चाहते हैं, वह भी बाहुलकसे सिद्ध होता है ॥८॥ 'रात्री' शब्दमें 'रात्रेश्चाजसौ' (पा० सू० ४। १। ३१) इस नियमके अनुसार रात्रि-शब्दसे ङीप्-प्रत्यय हुआ है। (लोकमें 'कृदिकारादक्तिनः 'से ङीष् होकर अन्तोदात्त होता है।) 'विभ्वी' में भी विभु-शब्दसे 'भुवश्च' के नियमानुसार ङीष् हुआ है। 'कद्रूः' पदमें 'कद्रुकमण्डल्वोश्छन्दसि' से ऊङ्-प्रत्यय हुआ है। 'आविष्ट्यो वर्धते' इत्यादि स्थलोंमें 'अविष्ट्यस्योपसंख्यानं छन्दसि' के नियमानुसार 'आविस्' अव्यय से 'त्यप्' यह तद्धित-प्रत्यय हुआ है। 'वाजसनेयिनः' में 'वाजसनेयेन प्रोक्तमधीयते' इस व्युत्पत्तिके अनुसार वाजसनेय-शब्दसे 'शौनकादिभ्यश्छन्दसि' सूत्रके द्वारा 'णिनि' प्रत्यय हुआ है ॥ ९ ॥ 'कर्णेभिः' में 'बहुलं छन्दसि' के नियमानुसार 'भिस्' के स्थानमें 'ऐस्' आदेश नहीं हुआ है। 'यशोभगयः' पदमें 'वेशोयश आदेर्भागाद् यल्' इस सूत्रसे 'यल्' प्रत्यय हुआ है। इत्यादि उदाहरण जानने चाहिये। 'चतुरक्षरम्' पदसे चार अक्षरवाले 'आश्रावय' 'अस्तु श्रौषट्' आदि पदोंकी ओर संकेत किया गया है। अक्षर-समूह वाच्य हो तो 'छन्दस्' शब्दसे 'यत्' प्रत्यय होता है—'छन्दस्यः' यह उदाहरण है। 'देवासः' में 'आज्जसेरसुकू' इस नियमके अनुसार 'असुक्' का आगम हुआ है। 'सर्वदेव' शब्दसे स्वार्थमें 'तातिल्' प्रत्यय होता है। 'सविता नः सुवतु सर्वदेवतातिम्' इस उदाहरणमें 'सर्वदेव' शब्दसे 'तातिल्' प्रत्यय होनेपर 'सर्वदेवताति' शब्दकी सिद्धि होती है। 'युष्मद्', 'अस्मद्' शब्दोंसे सादृश्य-अर्थमें 'वतुप्' प्रत्यय होता है। इस नियमसे 'त्वावतः' पदकी सिद्धि हुई है। 'त्वावतः' का पर्याय है 'त्वत्सदृशान्' (तुम्हारे सदृश) ॥ १० ॥ 'उभयाविनम्' इत्यादि पदोंमें 'बहुलं छन्दसि' के नियमसे मत्वर्थमें विनि प्रत्यय हुआ है। 'छन्दोविन्प्रकरणे०' इत्यादि नियमसे उभय शब्दके अकारका दीर्घ होनेसे 'उभयाविनम्' रूप बना है। प्रत्न, पूर्व आदि शब्दोंसे इवार्थमें 'थाल्' प्रत्यय होता है, इस नियमसे 'प्रत्नथा' बनता है। इसी प्रकार 'पूर्वथा' आदि भी हैं। वेदमें 'ऋच्' शब्द परे होनेपर त्रिका सम्प्रसारण होता है और उत्तरपदके आदिका लोप हो जाता है। 'तिस्र ऋचो यस्मिन्' तत् तृचं सूक्तम्। जिसमें तीन ऋचाएँ हों, उस सूक्तका नाम 'तृच्', है। 'त्रि+ऋच्' इस अवस्थामें 'त्रि'का सम्प्रसारण होनेपर 'तृ' बना और ऋच्के ऋका लोप हो गया तो 'तृचम्' सिद्ध हो गया। 'इन्द्रश्च विष्णो यदपस्पृधेथाम्' यहाँ 'अप' उपसर्गके साथ 'स्पृध' धातुके लङ् लकारमें प्रथम पुरुषके द्विवचनका रूप है। 'अपस्पृधेथाम्' यह निपातनसे सिद्ध होता है। रेफका सम्प्रसारण और अलोप निपातनसे ही होता है। माङ्का योग न होनेपर भी अडागमका अभाव हुआ है (लोकमें इसका रूप 'अपास्पर्धेथाम्' होता है)। 'वसुभिर्नो अव्यात्' इत्यादिमें
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'अव्यादवद्या०' इत्यादि सूत्रके अनुसार व्यपर 'अ' परे होनेपर एङ् (ओ)-का प्रकृतिभाव हुआ है। 'आपो अस्मान् मातरः' इत्यादि प्रयोग भी 'आपो जुषाणो०' आदि नियमके अनुसार प्रकृति-भावसे सिद्ध होते हैं। आकार परे रहनेपर 'आपो' आदिमें प्रकृतिभाव होता है॥ ११॥ 'समानो गर्भः सगर्भस्तत्र भवः सगर्भ्यः।' यहाँ 'समानस्य सः' इत्यादि सूत्रसे समानका 'स' आदेश हुआ है। 'सगर्भसयूथसनुताद् यत्' से यत्-प्रत्यय हुआ है। 'अष्टापदी' यहाँ 'छन्दसि च'-के नियमानुसार उत्तरपद परे रहते अष्टन्के 'न'का 'आ' आदेश हो गया है। 'ऋतौ भवम् ऋत्त्व्यम्'—जो ऋतुमें हो, उसे 'ऋत्त्व्य' कहते हैं। 'ऋत्त्व्यास्त्व्यः' इत्यादि सूत्रसे निपातन करनेपर 'ऋत्त्व्यम्' पदकी सिद्धि होती है। अतिशयेन 'ऋजु' इति 'रजिष्ठम्'—जो अत्यन्त ऋजु (कोमल या सरल) हो, उसे 'रजिष्ठ' कहा गया है। 'विभाषर्जोश्छन्दसि' के नियमानुसार इष्ठ, इमन् और ईयस् परे रहनेपर ऋजुके 'ऋ'के स्थानमें 'र' होता है। 'ऋजु+इष्ठ' इस अवस्थामें ऋके स्थानमें 'र' तथा उकार लोप होनेसे 'रजिष्ठ' शब्द बना है। 'त्रिपञ्चकम्'—त्रीणि पञ्चकानि यत्र तत् 'त्रिपञ्चकम्' इस विग्रहके अनुसार बहुव्रीहि समास करनेपर 'त्रिपञ्चकम्' की सिद्धि होती है। 'हिरण्ययेन सविता रथेन' इस मन्त्र-वाक्यमें 'ऋत्त्व्यास्त्व्य' आदि सूत्रके अनुसार हिरण्य-शब्दसे 'मयट्' प्रत्यय और उसके 'म'- का लोप निपातन किया जाता है। इससे 'हिरण्यय' शब्दकी सिद्धि होती है। 'इतरम्'—वेदमें इतर शब्दसे 'अड्ड' का निषेध है। अतः 'सु' का 'अम्' आदेश होनेसे 'इतरम्' पद सिद्ध होता है। यथा—'वार्त्रघ्नमिरतम्'। 'परमे व्योमन्' यहाँ 'व्योमनि' रूप प्राप्त था; किंतु 'सुपां सुलुक्' इत्यादि नियमसे ङि-विभक्तिका लुक् हो गया॥ १२॥ 'उर्विया' की जगह 'उरुणा' रूप प्राप्त था। 'टा' का 'इया' आदेश होनेसे 'उर्विया' रूप बना। 'इयाडियाजीकाराणामुपसंख्यानम्' इस वार्तिकसे यहाँ 'इयाज्' हुआ है। 'स्वप्रया'के स्थानमें 'स्वप्रेन' यह रूप प्राप्त था, किंतु 'सुपां सुलुक०' इत्यादि नियमके अनुसार 'टा' का 'अयाच्' हो गया; अतः 'स्वप्रया' रूप बना। 'वारयध्वम्' रूप प्राप्त था, किंतु 'ध्वमो ध्वात्' सूत्रसे 'ध्वम्' के स्थानमें 'ध्वात्' आदेश होनेसे 'वारयध्वात्' हो गया। 'अदुहत' के स्थानमें 'अदुह' यह वैदिक प्रयोग है। 'लोपस्त आत्मनेपदेषु' इस सूत्रसे तलोप और 'बहुलं छन्दसि' से रुटका आगम हुआ है। 'वै' पादपूर्तिके लिये है। 'अवधिषम्' यह रूप प्राप्त था, इसके स्थानमें 'वधीं' रूप हुआ है। यहाँ 'अम्'का 'म्' आदेश और अडागमका अभाव तथा 'ईट्' का आगम हुआ है—वधीं वृत्रम्। 'यजध्वैनं'—यहाँ 'यजध्वम्+एनम्' इस दशामें 'ध्वम्' के 'म्' का लोप होकर वृद्धि होनेसे उक्त रूपकी सिद्धि हुई है। 'तमो भरन्त एमसि'—यहाँ 'इमः'के स्थानमें 'इदन्तो मसि' इस सूत्रके अनुसार 'एमसि' रूप हुआ है। 'स्विन्नः स्नात्वी मलादिव'— इस मन्त्रमें 'स्नात्वा' रूप प्राप्त था; किंतु 'स्नात्यादयश्च'—इस सूत्रके अनुसार उसके स्थानमें 'स्नात्वी' निपातन हुआ। 'गत्वाय'—गत्वाके स्थानमें 'क्त्वो यक्' सूत्रके अनुसार 'यक्'का आगम होनेसे उक्त पद सिद्ध होता है। 'अस्थभिः' में अस्थि-शब्दके 'इ'को 'अनङ्' आदेश होकर नलोप हो गया है। 'छन्दस्यपि दृश्यते' इस नियमसे हलादि विभक्ति परे रहनेपर भी 'अनङ्' आदेश होता है॥ १३॥ 'गोनाम्' यहाँ आम्-विभक्ति परे रहते नुट्का आगम हुआ है। किसी छन्दके पादान्तमें गो-शब्द हो तो प्रायः षष्ठी-बहुवचनमें वहाँ नुट्का आगम हो जाता है। 'अपरिह्वुताः' यहाँ 'हु ह्वरेश्छन्दसि'से प्राप्त हुए ''हु' आदेशका अभाव निपातित हुआ है। 'ततुरिः', 'जगुरिः' इत्यादि पद भी 'बहुलं छन्दसि' के नियमसे निपातनद्वारा सिद्ध होते हैं। 'ग्रसिताम्' 'ग्रसु' अदनेका निष्ठान्त रूप है। यहाँ
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इट्का निषेध प्राप्त था, किंतु निपातनसे इट् हो गया है। इसी प्रकार 'स्कभित' आदिको भी समझना चाहिये। 'पश्वे' यहाँ 'जसादिषु छन्दसि वा वचनं०' इत्यादिसे वैकल्पिक घि-संज्ञा होनेके कारण घि-संज्ञाके अभावमें यण् होनेसे 'पश्वे' रूप बना है। इसी तरह 'दधद्' यह दधातिके स्थानमें निपातित हुआ है; लेट्का रूप है। 'दधद्रत्नानि दाशुषे' यह मन्त्र है। 'बभूथ' यह लिट् लकारके मध्यम पुरुषका एकवचन है। वेदमें इसके 'इट्' का अभाव निपातित हुआ है। 'प्रमिणन्ति'—यहाँ 'प्रमीणन्ति' रूप प्राप्त था। 'मीनातेर्निगमे' सूत्रसे ह्रस्व हो गया। 'अवीवृधत्'—'नित्यं छन्दसि' से चङ् परे रहते उपधा ऋवर्णका 'ऋ'-भाव नित्य होता है॥१४॥ 'मित्रयुः' यहाँ दीर्घका निषेध होता है। 'दुष्ट इवाचरति' इस अर्थमें क्यच् परे रहते दुष्ट शब्दका 'दुरस्' आदेश होता है। 'दुरस्युः' यह निपातनात् सिद्ध रूप है। इसी प्रकार 'द्रविणस्युः' इत्यादि भी है। वेदमें 'क्त्वा' परे रहते हा धातुका 'हि' आदेश विकल्पसे होता है। 'हि' आदेश न होनेपर 'घुमास्था०' इत्यादि सूत्रसे 'आ' के स्थानमें 'ई' हो जाता है; अतः 'हित्वा' और 'हीत्वा' दोनों रूप होते हैं। 'सु' पूर्वक धा-धातुसे 'क्त'प्रत्यय परे होनेपर 'इत्व' निपातन किया जाता है; इससे 'सुधितम्' रूप बनता है—यथा 'गर्भं माता सुधितं वक्षणासु।' 'दार्धर्ति', 'दर्दति' और 'दर्धर्षि' आदि रूप निपातनसे सिद्ध हैं। ये 'धृ'-धातुके यङ्लुगन्त रूप हैं। 'स्ववद्भिः' अव-धातुसे असुन् करनेपर 'अवस्' रूप होता है। 'शोभनमवो येषां ते स्ववसः, तैः स्ववद्भिः' यह उसकी व्युत्पत्ति है। 'स्ववःस्वतवसोरुषसश्चेष्यते' इस वार्तिकसे भकारादि प्रत्यय परे रहते 'स्ववस्' आदि शब्दोंके 'स्' का 'त्' हो जाता है। प्रसवार्थक 'सू' धातुके लिट्में 'ससूवेति निगमे' सूत्रसे 'ससूव' यह निपातसिद्ध रूप है। यथा—'गृष्टिः ससूव स्थविरम्'। 'सुधित' इत्यादि सूत्रसे 'धत्स्व' के स्थानमें 'धिश्व' निपातित होता है—'धिश्व वज्रं दक्षिण इन्द्रहस्ते' ॥१५॥ 'प्रप्रायमग्निः' यहाँ 'प्रसमुपोदः पादपूरणे' से पादपूर्तिके लिये 'प्र' उपसर्गका द्वित्व हो गया है। 'हरिवते हर्यश्वाय' यहाँ 'छन्दसीरः' से 'मतुप्' के 'म' का 'व' हुआ है। 'अक्षण्वन्तः' में अक्षि-शब्दसे मतुप्, 'छन्दस्यपि दृश्यते' से अनङ्-आदेश तथा 'अनो नुट्' से 'नुट्' का आगम हुआ है। 'सुपथिन्तरः' में 'नाद्घस्य' से 'नुट्' का आगम विशेष कार्य है। 'रथीतरः' में 'ईद्रथिनः' से 'ई' हुआ है। 'नसत्तम्' में नञ्पूर्वक सद्-धातुसे निष्ठामें नत्वका अभाव निपातित हुआ है। इसी प्रकार सूत्रोक्त 'निषत्त' आदि शब्दोंको जानना चाहिये। 'अम्रैव'—इसमें 'अम्रस्' शब्द ईषत् अर्थमें है। वेदमें सकारका वैकल्पिक रेफ निपातित हुआ है। 'भुवरथो इति' यहाँ 'भुवश्च महाव्याहृतेः' से भुवस्के 'स्'का 'र्' हुआ है॥१६॥ 'ब्रूहि' यहाँ 'ब्रूहि प्रेष्य०' इत्यादि सूत्रसे उकार प्लुत हुआ है। यथा—अग्नयेऽनुब्रू३हि। 'अद्यामावास्येत्या३त्थ' यहाँ 'निगृह्यानुयोगे च' इस सूत्रसे वाक्यके 'टि'का प्लुतभाव होता है। 'अग्नीत्प्रेषणे परस्य च' इस सूत्रसे आदि और परका भी प्लुत होता है। उदाहरणके लिये 'ओ३श्रा ३ वय' इत्यादि पद है। इन सबमें प्लुत हुआ है। 'दाश्वान्' आदि पद क्वसु-प्रत्ययान्त निपातित होते हैं। 'स्वतवान्' शब्दके नकारका विकल्पसे 'रु' होता है, पायु-शब्द परे रहनेपर—स्वतवाँः पायुरग्ने।' 'त्रिभिष्ट्वं देव सवितः।' यहाँ 'त्रिभिस्+त्वम्' इस दशामें 'युष्मत्तत्ततक्षुष्वन्तःपादम्' इस सूत्रमें 'स्' के स्थानमें 'ष्' होकर ष्टुत्व होनेसे 'त्रिभिष्ट्वम्' बनता है। 'नृभिष्टः' यहाँ 'स्तुतस्तोमयोश्छन्दसि' इस सूत्रसे 'नृभिस्' के 'स्' का 'ष्' होकर ष्टुत्व हुआ है॥१७॥ 'अभीषुणः' यहाँ 'सुञः' सूत्रसे 'स्' का 'ष्' हुआ है। 'ऋताषाहम्' में 'सहेः पृतनर्त्तीभ्यां च' इस सूत्रसे 'स्'का मूर्धन्य आदेश हुआ है। 'न्यषीदत्' यहाँ भी 'निव्यभिभ्योऽङ्ग्व्यवाये वा
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छन्दसि' इस सूत्रसे 'स' का मूर्धन्य हुआ है। 'नृमणाः' इस पदमें 'छन्दस्युदवग्रहात्' सूत्रसे 'न' का 'ण' हुआ है। बाहुलक चार प्रकारके होते हैं—कहीं प्रवृत्ति होती है, कहीं अप्रवृत्ति होती है, कहीं वैकल्पिक विधि है और कहीं अन्यथाभाव होता है। इस प्रकार सम्पूर्ण वैदिक पद-समुदाय सिद्ध है। क्रियावाची 'भू' 'वा' आदि शब्दोंकी 'धातु' संज्ञा जाननी चाहिये। 'भू' आदि धातु परस्मैपदी माने गये हैं॥ १८-१९॥ 'एध' आदि छत्तीस धातु उदात्त एवं आत्मनेपदी हैं (इन्हें 'अनुदात्तेत्' माना गया है)। मुने! 'अत' आदि सैंतीस धातु परस्मैपदी हैं॥ २०॥ शी-कृ आदि बयालीस धातु आत्मनेपदमें परिगणित हुए हैं। फक्क आदि पचास धातु उदात्तेत् (परस्मैपदी) कहे गये हैं॥ २१॥ वर्च आदि इक्कीस धातु अनुदात्तेत् (आत्मनेपदी) बताये गये हैं। 'गुप्' आदि बयालीस धातु 'उदात्तेत्' (परस्मैपदी) कहे गये हैं॥ २२॥ 'घिणि' आदि दस धातु शाब्दिकोंद्वारा 'अनुदात्तेत्' कहे गये हैं। 'अण्' आदि सत्ताईस धातु 'उदात्तेत्' बताये गये हैं॥ २३॥ 'अय' आदि चौंतीस धातु वैयाकरणोंद्वारा अनुदात्तेत् (आत्मनेपदी) माने गये हैं। 'मव्य' आदि बहत्तर धातु उदात्तानुबन्धी कहे गये हैं॥ २४॥ 'धावु' धातु अकेला ही 'स्वरितेत्' कहा गया है। 'क्षुध्' आदि बावन धातु 'अनुदात्तेत्' कहे गये हैं॥ २५॥ 'घुषिर्' आदि अठासी धातु 'उदात्तेत्' माने गये हैं। 'द्युत' आदि बाईस धातु 'अनुदात्तेत्' स्वीकार किये गये हैं॥ २६॥ घटादिमें तेरह धातु 'षित्' और 'अनुदात्तेत्' कहे गये हैं। तदनन्तर 'ज्वर' आदि बावन धातु उदात्त बताये गये हैं॥ २७॥ 'राजू' धातु 'स्वरितेत्' है। उसके बाद 'भ्राजू' भ्राशू और भ्लाशू'—ये तीन धातु 'अनुदात्तेत्' कहे गये हैं। तदनन्तर 'स्यमु' धातुसे लेकरं आगे सभी आद्युदात्त एवं उदात्तेत् (परस्मैपदी) हैं॥ २८॥ फिर एकमात्र 'षह' धातु 'अनुदात्तेत्' तथा अकेला 'रम' धातु 'आत्मनेपदी' है। उसके बाद 'सद' आदि तीन धातु 'उदात्तेत्' हैं। फिर 'कुच' आदि चार धातु भी 'उदात्तेत्' (परस्मैपदी) ही हैं॥ २९॥ इसके बाद 'हिक्क' आदि पैंतीस धातु 'स्वरितेत्' हैं। 'श्रिय्' धातु स्वरितेत् है। 'भृञ्' आदि चार धातु भी स्वरितेत् ही हैं॥ ३०॥ 'धेट्' आदि छियालीस धातु परस्मैपदी कहे गये हैं। 'स्मिङ्' आदि अठारह धातु आत्मनेपदी माने गये हैं॥ ३१॥ फिर 'पूङ्' आदि तीन धातु अनुदात्तेत् कहे गये हैं। 'ह्व' धातु परस्मैपदी है। फिर 'गुप'से लेकर तीन धातु आत्मनेपदी हैं॥ ३२॥ 'रम' आदि धातु अनुदात्तेत् हैं और 'जिक्ष्विदा' उदात्तेत् है। स्कम्भु आदि पंद्रह धातु परस्मैपदी हैं॥ ३३॥ 'कित' धातु 'उदात्तेत्' है। 'दान' 'शान'—ये दो धातु उभयपदी हैं। 'पच' आदि नौ धातु स्वरितेत् (उभयपदी) हैं। वे परस्मैपदी (और आत्मनेपदी दोनों) माने गये हैं॥ ३४॥ फिर तीन स्वरितेत् धातु हैं। परिभाषणार्थक 'वद' और 'वच' धातु परस्मैपदी हैं। ये एक हजार छः धातु भ्वादि कहे गये हैं॥ ३५॥
'अद' और 'हन्' धातु परस्मैपदी कहे गये हैं। 'द्विष' आदि चार धातु स्वरितेत् माने गये हैं॥ ३६॥ यहाँ केवल 'चक्षिङ्' धातु आत्मनेपदी कहा गया है। फिर 'ईर' आदि तेरह धातु अनुदात्तेत् हैं॥ ३७॥ मुने! वैयाकरणोंने 'षूङ्' और 'शीङ्'—इन दो धातुओंको आत्मनेपदी कहा है। फिर 'षु' आदि सात धातु परस्मैपदी बताये गये हैं॥ ३८॥ मुनीश्वर! यहाँ एक 'ऊर्णुञ्' धातु स्वरितेत् कहा गया है। 'द्यु' आदि तीन धातु परस्मैपदी बताये गये हैं॥ ३९॥ नारद! केवल 'ष्टुञ्' धातुको शाब्दिकोंने उभयपदी कहा है॥ ४०॥ 'रा' आदि अठारह धातु परस्मैपदी माने गये हैं। नारद! फिर केवल 'इङ्' धातु आत्मनेपदी कहा गया है॥ ४१॥ उसके बाद 'विद' आदि चार धातु परस्मैपदी माने गये हैं। 'जिष्वप् शये' यह धातु परस्मैपदी कहा गया है॥ ४२॥ मुने! 'श्वस'
२६० * संक्षिप्त नारदपुराण *
आदि धातु मैंने तुम्हें परस्मैपदी कहे हैं। 'दीधीङ्' और 'वेवीङ्'—ये दो धातु आत्मनेपदी माने गये हैं॥ ४३॥ 'षस' आदि तीन धातु 'उदात्तेत्' हैं। मुनिश्रेष्ठ! 'चर्करीतं च' यह यङ्लुगन्तका प्रतीक है। यह अदादि माना गया है। 'हृङ्' धातु अनुदात्तेत् कहा गया है॥ ४४॥ इस प्रकार अदादि गणमें तिहत्तर धातु बताये गये हैं।
'हु' आदि चार धातु (हु, भी, ह्री और पृ) परस्मैपदी माने गये हैं॥ ४५॥ 'भृञ्' धातु स्वरितेत् और 'ओहाक्' धातु उदात्तेत् है। 'माङ्' और 'ओहाङ्'—ये दोनों धातु अनुदात्तेत् हैं। दानार्थक 'दा' और धारणार्थक 'धा'—इनमें स्वरितकी इत्संज्ञा हुई है॥ ४६॥ 'णिजिर्' आदि तीन धातु स्वरितेत् कहे गये हैं। 'घृ' आदि बारह धातु परस्मैपदी माने गये हैं॥ ४७॥ इस प्रकार ह्वादि (जुहोत्यादि) गणमें बाईस धातु कहे गये हैं।
'दिव्' आदि पचीस धातु परस्मैपदी कहे गये हैं॥ ४८॥ नारद! 'षूङ्' आदि 'दूङ्'—ये आत्मनेपदी हैं। 'षूङ्' आदि सात धातु ओदित् और आत्मनेपदी माने गये हैं॥ ४९॥ विप्रवर! 'लीङ्' आदि धातु यहाँ आत्मनेपदी बताये गये हैं। श्यति (शो) आदि चार धातु परस्मैपदी हैं॥ ५०॥ मुने! 'जनी' आदि पंद्रह धातु आत्मनेपदी हैं। 'मृष' आदि पाँच धातु 'स्वरितेत्' कहे गये हैं॥ ५१॥ 'पद' आदि ग्यारह धातु आत्मनेपदी हैं। यहाँ वृद्धि-अर्थमें ही अकर्मक 'राध' धातुका ग्रहण है। यह स्वादि और चुरादिगणमें भी पढ़ा गया है॥ ५२॥ राध आदि तेरह धातु उदात्तेत् कहे गये हैं। तत्पश्चात् रध आदि आठ धातु परस्मैपदी बताये गये हैं॥ ५३॥ शम आदि छियालीस धातु उदात्तेत् कहे गये हैं। इस प्रकार दिवादिमें एक सौ चालीस धातु माने गये हैं॥ ५४॥
'सु' आदि नौ धातु स्वरितेत् कहे गये हैं। मुने! 'दु' आदि सात धातु परस्मैपदी बताये गये हैं॥ ५५॥ 'अश' और 'ष्टिष' ये दो धातु अनुदात्तेत् कहे गये हैं। यहाँ 'तिक' आदि चौदह धातुओंको परस्मैपदी माना गया है॥ ५६॥ विप्रवर! स्वादिगणमें कुल बत्तीस धातु बताये गये हैं।
मुनिश्रेष्ठ! 'तुद' आदि छः स्वरितेत् हैं॥ ५७॥ 'ऋषी' धातु उदात्तेत् है और 'जुषी' आदि चार धातु आत्मनेपदी हैं। 'व्रश्च' आदि एक सौ पाँच धातु उदात्तेत् कहे गये हैं॥ ५८॥ मुनीश्वर! यहाँ केवल 'गुरी' धातु अनुदात्तेत् बताया गया है। 'णू' आदि चार धातु परस्मैपदी माने गये हैं॥ ५९॥ 'कुङ्' धातुको 'अनुदात्तेत्' कहा गया है। यहीं कुतादिगणकी पूर्ति हुई है। 'पृङ्' और 'मृङ्'—ये आत्मनेपदी धातु हैं। 'रि' और 'पि' से छः धातुतक परस्मैपदमें गिने गये हैं॥ ६०॥ 'दृङ्', 'धृङ्'—ये दो धातु आत्मनेपदी कहे गये हैं। मुने! 'प्रच्छ' आदि सोलह धातु परस्मैपदी बताये गये हैं॥ ६१॥ मुने! फिर 'मिल' आदि छः धातु स्वरितेत् कहे गये हैं। इसके बाद 'कृती' आदि तीन धातु परस्मैपदी हैं॥ ६२॥ इस प्रकार तुदादिमें एक सौ सत्तावन धातु हैं।
'रुध' आदि नौ धातु स्वरितेत् हैं। 'कृती' धातु परस्मैपदी है। 'जिइन्धी'से तीन धातुतक अनुदात्तेत् कहे गये हैं। तत्पश्चात् 'शिष पिष' आदि बारह धातु उदात्तेत् हैं। इस प्रकार रुधादि-गणमें कुल पचीस धातु हैं॥ ६३-६४॥
'तनु' धातुसे लेकर सात धातु 'स्वरितेत्' कहे गये हैं। 'मनु' और 'वनु'—ये दोनों आत्मनेपदी हैं। 'कृञ्' धातु स्वरितेत् कहा गया है॥ ६५॥ विप्रवर! इस प्रकार वैयाकरणोंने तनादिगणमें दस धातुओंकी गणना की है।
'क्री' आदि सात धातु उभयपदी हैं। मुनीश्वर! 'स्तम्भु' आदि चार सौत्र (सूत्रोक्त) धातु परस्मैपदी कहे गये हैं। 'क्रूञ्' आदि बाईस धातु उदात्तेत् कहे गये हैं॥ ६६-६७॥ 'वृङ्' धातु आत्मनेपदी है। 'श्रन्थ' आदि इक्कीस धातु परस्मैपदी हैं और 'ग्रह' धातु स्वरितेत् है॥ ६८॥ इस प्रकार विद्वानोंने क्र्यादिगणमें बावन धातु गिनाये हैं।
चुर आदि एक सौ छत्तीस धातु जित्
- पूर्वभाग-द्वितीय पाद * | २६१ ---|---
(उभयपदी) माने गये हैं॥ ६९॥ मुने! चित आदि अठारह (या अड़तीस?) आत्मनेपदी माने गये हैं। 'चर्च' से लेकर 'धृष' धातुतक 'जित्' (उभयपदी) कहे गये हैं॥ ७०॥ इसके बाद अड़तालीस अदन्त धातु भी उभयपदी ही हैं। 'पद' आदि दस धातु आत्मनेपदमें परिगणित हुए हैं॥ ७१॥ यहाँ सूत्र आदि आठ धातुओंको भी मनीषी पुरुषोंने उभयपदी कहा है। प्रातिपदिकसे धात्वर्थमें णिच् और प्रायः सब बातें इष्ठ प्रत्ययकी भाँति होती हैं। तात्पर्य यह कि 'इष्ठ' प्रत्यय परे रहते जैसे प्रातिपदिक, पुंवद्भाव, रभाव, टिलोप, विन्मतुब्लोप, यणादिलोप, प्र, स्थ, स्फ आदि आदेश और भसंज्ञा आदि कार्य होते हैं, उसी प्रकार 'णि' परे रहते भी सब कार्य होंगे॥ ७२॥ 'उसे करता है, अथवा उसे कहता है' इस अर्थमें भी प्रातिपदिकसे णिच् प्रत्यय होता है। प्रयोजक व्यापारमें प्रेषण आदि वाच्य हों तो धातुसे णिच् होता है। कर्तृ-व्यापारके लिये जो करण है, उससे धात्वर्थमें णिच् होता है। चित्र आदि आठ धातु उदात्तेत् हैं। किंतु 'संग्राम' धातुको शब्दशास्त्रके विद्वानोंने अनुदात्तेत् माना है। स्तोभ आदि सोलह धातु अदन्त धातुओंके निदर्शन हैं॥ ७३-७४॥ 'बहुलमेतन्निदर्शनम्'—इसमें जो बहुल शब्द आया है, उससे अन्य जो सूत्रोक्त लौकिक और वैदिक धातु हैं, उन सबका ग्रहण होता है। सभी धातु सब गणोंमें हैं और सबके अनेक अर्थ हैं॥ ७५॥ इन धातुओंके अतिरिक्त सनादि* प्रत्यय जिनके अन्तमें हों, उनकी भी धातु-संज्ञा होती है। नामधातु भी धातु ही हैं। नारद! इस प्रकार अनन्त धातुओंकी उद्भावना हो सकती है। यहाँ संक्षेपसे सब कुछ बताया गया है। इसका विस्तार तत्सम्बन्धी ग्रन्थोंमें है॥ ७६॥
(उपदेशावस्थामें एकाच् अनुदात्त धातुसे परे वलादि आर्धधातुकको इट्का आगम नहीं होता। जिनमें यह निषेध लागू होता है, उन धातुओंको 'अनिट्' कहते हैं। उन्हीं अनिट् या एकाच् अनुदात्त धातुओंका यहाँ संग्रह किया जाता है—) अजन्त धातुओंमें—ऊकारान्त, ऋकारान्त, यु, रु, क्ष्णु, शीङ्, स्रु, नु, क्षु, श्वि, डीङ्, श्रिञ्, वृङ्, वृञ्—इन सबको छोड़कर शेष सभी अनुदात्त (अर्थात् अनिट्) माने गये हैं॥ ७७॥ शक्ल्, पच्, मुच्, रिच्, वच्, विच्, सिच्, प्रच्छ्, त्यज्, निजिर्, भज्, भञ्ज्, भुज्, भ्रस्ज्, मस्ज्, यज्, युज्, रुज्, रञ्ज्, विजिर्, स्वञ्ज्, सञ्ज्, सृज्॥ ७८॥ अद्, क्षुद्, खिद्, छिद्, तुद्, नुद्, पद्, भिद्, विद् (सत्ता), विद् (विचारणे), शद्, सद्, स्विद्, स्कन्द्, हद्, क्रुध्, क्षुध्, बुध्॥ ७९॥ बन्ध्, युध्, रुध्, राध्, व्यध्, शुध्, साध्, सिध्, मन् (दिवादि), हन्, आप्, क्षिप्, क्षुप्, तप्, तिप्, स्तृप्, दृप्॥ ८०॥ लिप्, लुप्, वप्, शप्, स्वप्, सृप्, यभ्, रभ्, लभ्, गम्, नम्, यम्, रम्, क्रुश्, दंश्, दिश्, दृश्, मृश्, रिश्, रुश्, लिश, विश्, स्पृश्, कृष्॥ ८१॥ त्विष्, तुष्, द्विष्, दुष्, पुष्, पिष्, विष्, शिष्, शुष्, श्लिष्, घस्, वस्, दह, दिह, दुह, नह, मिह्, रुह्, लिह तथा वह॥ ८२॥ ये हलन्तोंमें एक सौ दो धातु अनुदात्त माने गये हैं। 'च' आदिकी निपात संज्ञा होती है। 'प्र' आदि उपसर्ग 'गति' कहलाते हैं। भिन्न-भिन्न दिशा, देश और कालमें प्रकट हुए शब्द अनेक अर्थोंके बोधक होते हैं। विप्रवर! वे देश-कालके भेदसे सभी लिङ्गोंमें प्रयुक्त होते हैं। यहाँ गणपाठ, सूत्रपाठ, धातुपाठ तथा अनुनासिकपाठ— 'पारायण' कहा गया है। नारद! वैदिक और लौकिक सभी शब्द नित्यसिद्ध हैं॥ ८३—८५॥ फिर वैयाकरणोंद्वारा जो शब्दोंका संग्रह किया जाता है, उसमें उन शब्दोंका पारायण ही मुख्य
* सन्, क्यच्, काम्यच्, क्यङ्, क्यष्, आचारक्विप्, णिच्, यङ्, यक्, आय, ईयङ्, णिङ्—ये बारह प्रत्यय सनादि कहलाते हैं।
(पूर्वभाग द्वितीयपाद अध्याय ५३)
| २६२ | * संक्षिप्त नारदपुराण * |
|---|
हेतु है (पारायण-जनित पुण्यलाभके लिये ही उनका संकलन होता है)। सिद्ध शब्दोंका ही प्रकृति, प्रत्यय, आदेश और आगम आदिके द्वारा लघुमार्गसे सम्यक् निरूपण किया जाता है। इस प्रकार तुमसे निरुक्तका यत्किंचित् ही वर्णन किया गया है। नारद! इसका पूर्णरूपसे वर्णन तो कोई भी कर ही नहीं सकता॥ ८६-८८॥
(पूर्वभाग द्वितीयपाद अध्याय ५३)
त्रिस्कन्ध ज्योतिषके वर्णन-प्रसङ्गमें गणितविषयका प्रतिपादन
सनन्दन उवाच
ज्यौतिषाङ्गं प्रवक्ष्यामि यदुक्तं ब्रह्मणा पुरा।
यस्य विज्ञानमात्रेण धर्मसिद्धिर्भवेन्नृणाम् ॥ १ ॥
त्रिस्कन्धं ज्यौतिषं शास्त्रं चतुर्लक्षमुदाहृतम्।
गणितं जातकं विप्र संहितास्कन्धसंज्ञितम् ॥ २ ॥
गणिते परिकर्माणि खगमध्यस्फुटक्रिये।
अनुयोगश्चन्द्रसूर्यग्रहणं चोदयास्तकम् ॥ ३ ॥
छाया शृङ्गोन्नतिर्युती पातसाधनमीरितम्।
निषेकजन्मारिष्टानि ह्यायुर्दायो दशाक्रमः।
कर्माजीवं चाष्टवर्गो राजयोगाश्च नाभसाः ॥ ५ ॥
चन्द्रयोगाः प्रव्रज्याख्या राशिशीलं च दृक्फलम्।
ग्रहभावफलं चैवाश्रययोगप्रकीर्णके ॥ ६ ॥
अनिष्टयोगाः स्त्रीजन्मफलं निर्याणमेव च।
नष्टजन्मविधानं च तथा द्रेष्काणलक्षणम् ॥ ७ ॥
श्रीसनन्दनजी कहते हैं—देवर्षे! अब मैं ज्योतिष नामक वेदाङ्गका वर्णन करूँगा, जिसका पूर्वकालमें साक्षात् ब्रह्माजीने उपदेश किया है तथा जिसके विज्ञानमात्रसे मनुष्योंके धर्मकी सिद्धि हो सकती है॥ १॥ ब्रह्मन्! ज्योतिषशास्त्र चार लाख श्लोकोंका बताया गया है। उसके तीन^१ स्कन्ध हैं, जिनके नाम ये हैं—गणित (सिद्धान्त), जातक (होरा) और संहिता॥ २॥ गणितमें परिकर्म^२, ग्रहोंके मध्यम एवं स्पष्ट करनेकी रीतियाँ बतायी गयी हैं। इसके सिवा अनुयोग (देश, दिशा और कालका ज्ञान), चन्द्रग्रहण, सूर्यग्रहण, उदय, अस्त, छायाधिकार, चन्द्र-शृङ्गोन्नति^३, ग्रहयुति (ग्रहोंका योग) तथा पात (महापात=सूर्य-चन्द्रमाके क्रान्तिसाम्य)-का साधन-प्रकार कहा गया है॥ ३\frac{१}{२}॥
जातकस्कन्धमें राशिभेद, ग्रहयोनि, (ग्रहोंकी जाति, रूप और गुण आदि) वियोनिज (मानवेतर-जन्मफल), गर्भाधान, जन्म, अरिष्ट, आयुर्दाय, दशाक्रम, कर्माजीव (आजीविका), अष्टकवर्ग, राजयोग, नाभसयोग, चन्द्रयोग, प्रव्रज्यायोग, राशिशील, ग्रहदृष्टिफल, ग्रहोंके भावफल, आश्रययोग, प्रकीर्ण, अनिष्टयोग, स्त्रीजातक-फल, निर्याण (मृत्युविषयक विचार), नष्ट-जन्म-विधान (अज्ञात जन्म-कालको जाननेका प्रकार) तथा द्रेष्काणों^४के स्वरूप—इन सब विषयोंका वर्णन है॥ ४—७॥
जातके राशिभेदाश्च ग्रहयोनिवियोनिजे ॥ ४ ॥
संहिताशास्त्ररूपं च ग्रहचारोऽब्दलक्षणम्।
तिथिवासरनक्षत्रयोगतिथ्यर्द्धसंज्ञकाः ॥ ८ ॥
मुहूर्तोपग्रहाः सूर्यसंक्रान्तिर्गोचरः क्रमात्।
चन्द्रताराबलं चैव सर्वलग्नार्तवाह्वयः ॥ ९ ॥
आधानपुंससीमन्तजातनामान्नभुक्तयः ।
चौल कर्णच्छिदा मौञ्जी क्षुरिकाबन्धनं तथा ॥ १० ॥
१. किसी-किसीके मतसे ज्योतिषके पाँच स्कन्ध हैं—सिद्धान्त, होरा, संहिता, स्वर और सामुद्रिक। सिद्धान्तको ही गणित कहते हैं। होराका ही दूसरा नाम जातक है।
२. योग, अन्तर, गुणन, भजन, वर्ग, वर्गमूल, घन और घनमूल—ये परिकर्म कहे गये हैं।
३. द्वितीयाको जो चन्द्रोदय होता है, उसमें कभी चन्द्रमाका दक्षिण सींग और कभी उत्तर सींग (नोक) ऊपरको उठा रहता है, उसीको 'चन्द्रशृङ्गोन्नति' कहा गया है। ज्योतिषमें उसके परिणामका विचार किया गया है।
४. राशिके तृतीय भाग (१० अंश)-की 'द्रेष्काण' संज्ञा है।
- पूर्वभाग-द्वितीय पाद * | २६३ ---|---
समावर्तनवैवाहप्रतिष्ठासद्मलक्षणम् ।
यात्रा प्रवेश नं सद्योवृष्टिः कर्मविलक्षणम् ॥ ११ ॥
उत्पत्तिलक्षणं चैव सर्वं संक्षेपतो ब्रुवे।
अब संहितास्कन्धके स्वरूपका परिचय दिया जाता है। उसमें ग्रहचार (ग्रहोंकी गति), वर्षलक्षण, तिथि, दिन, नक्षत्र, योग, करण, मुहूर्त, उपग्रह, सूर्य-संक्रान्ति, ग्रहगोचर, चन्द्रमा और ताराका बल, सम्पूर्ण लग्नों तथा ऋतुदर्शनका विचार, गर्भाधान, पुंसवन, सीमन्तोन्नयन, जातकर्म, नामकरण, अन्न-प्राशन, चूडाकरण, कर्णवेध, उपनयन, मौञ्जीबन्धन (वेदारम्भ), क्षुरिकाबन्धन, समावर्तन, विवाह, प्रतिष्ठा, गृहलक्षण, यात्रा, गृहप्रवेश, तत्काल वृष्टिज्ञान, कर्मवैलक्षण्य तथा उत्पत्तिका लक्षण—इन सब विषयोंका संक्षेपसे वर्णन करूँगा (८-११\frac{१}{२}॥
एकं दश शतं चैव सहस्रायुतलक्षकम् ॥ १२ ॥
प्रयुतं कोटिसंज्ञा चार्बुदमब्जं च खर्वकम् ।
निखर्वं च महापद्मं शङ्कुर्जलधिरेव च ॥ १३ ॥
अन्त्यं मध्यं परार्द्धं च संज्ञा दशगुणोत्तराः ।
क्रमादुत्क्रमतो वापि योगः कार्योंऽन्तरं तथा ॥ १४ ॥
हन्याद्गुणेन गुण्यं स्यात् तेनैवोपान्तिमादिकान् ।
शुद्ध्येद्बरो यद्गुणश्च भाज्यान्न्यात् तत्फलं मुने ॥ १५ ॥
| [ अब गणितका प्रकरण प्रारम्भ किया जाता है—] एक (इकाई), दश (दहाई), शत (सैकड़ा), सहस्र (हजार), अयुत (दस हजार), लक्ष (लाख), प्रयुत (दस लाख), कोटि (करोड़), अर्बुद (दस करोड़), अब्ज (अरब), खर्व (दस अरब), निखर्व (खर्व), महापद्म (दस खर्व), शङ्कु (नील), जलधि (दस नील), अन्त्य (पद्म), मध्य (दस पद्म), परार्ध (शङ्ख) इत्यादि संख्याबोधक संज्ञाएँ उत्तरोत्तर दसगुनी मानी गयी हैं। यथास्थानीय अङ्कोंका योग या अन्तर क्रम या व्युत्क्रमसे करना चाहिये¹ ॥ १२-१४ ॥
गुण्यके अन्तिम अङ्कको गुणकसे गुणना चाहिये। फिर उसके पार्श्ववर्ती अङ्कको भी उसी गुणकसे गुणना चाहिये। इस तरह आदि अङ्कतक गुणन करनेपर गुणनफल प्राप्त हो जाता है², मुने ! इसी प्रकार भागफल जाननेके लिये भी यत्न करे। जितने अङ्कसे भाजकके साथ गुणा करनेपर भाज्यमेंसे घट जाय, वही अङ्क लब्धि अथवा भागफल होता है³ ॥ १५ ॥
समाङ्कघातो वर्गः स्यात् तमेवाहुः कृतिं बुधाः ।
अन्त्यात्तु विषमात्त्यक्त्वा कृतिं मूलं न्यसेत्पृथक् ॥ १६ ॥
१. यथा—२+५+३२+१९३+१८+१०+१००—इन्हें क्रम या व्युत्क्रम (इकाई या सैकड़ाकी ओर)-से जोड़ा जाय, समान स्थानीय अङ्कोंका परस्पर योग किया जाय—अर्थात् इकाईको इकाईके साथ और दहाई आदिके दहाई आदिके साथ जोड़ा जाय तो सर्वथा योगफल ३६० ही होगा। इसी प्रकार १००००-३६० इसमें ३६० को १०००० के नीचे लिखकर पूर्ववत् समान स्थानीय अङ्कमेंसे उसी स्थानवाले अङ्कको क्रम या व्युत्क्रमसे भी घटाया जाय तो शेष सर्वथा ९६४० ही होगा।
२. यहाँपर 'अङ्कानां वामतो गतिः' इस उक्तिके अनुसार आदि-अन्त समझने चाहिये। जैसे—'१३५×१२' इसमें १३५ गुण्य है और १२ गुणक है। गुण्यका अन्तिम अङ्क हुआ १ उसमें १२ से गुणा पहले होगा, फिर उसके बादवाले ३ के साथ फिर ५ के साथ।
यथा— १३५
१६२० वास्तवमें यह गुणन-शैली उस समयकी है, जब लोग धूल बिछाकर उसपर अङ्गुलिसे गणित किया करते थे। आधुनिक शैली उससे भिन्न है। रूप-विभाग और स्थान-विभागसे इस गुणनके अनेक प्रकार हो जाते हैं; इसका विस्तार लीलावतीमें देखना चाहिये।
३. १६२०÷१२=१३५ भागफल हुआ। जैसे—
भाजक भाज्य भागफल
१२)१६२०(१३५
१२
---
४२
३६
---
६०
६०
---
×
२६४ * संक्षिप्त नारदपुराण *
द्विगुणेनामुना भक्ते फलं मूले न्यसेत् क्रमात्।
तत्कृतिं च त्यजेद्विप्र मूलेन विभजेत् पुनः॥ १७॥
एवं मुहुर्वर्गमूलं जायते च मुनीश्वर।
दो समान अङ्कोंके गुणनफलको वर्ग कहा गया है। विद्वान् पुरुष उसीको कृति कहते हैं। (जैसे ४ का वर्ग ४×४ = १६ और ९ का वर्ग ९×९=८१ होता है)¹ [वर्गमूल जाननेके लिये दाहिने अङ्कसे लेकर बायें अङ्कतक अर्थात् आदिसे अन्ततक विषम और समका चिह्न कर देना चाहिये। खड़ी लकीरको विषमका और पड़ीको समका चिह्न माना गया है]। अन्तिम विषममें जितने वर्ग घट सकें उतने घटा देना चाहिये। उस वर्गका मूल लेना और उसे पृथक् रख देना चाहिये॥ १६॥ फिर द्विगुणित मूलसे सम अङ्कमें भाग दे और जो लब्धि आवे उसका वर्ग विषममें घटा दे, फिर उसे दूना करके पङ्क्तिमें रख दे। मुनीश्वर! इस प्रकार बार-बार करनेसे पङ्क्तिका आधा वर्गमूल² होता है॥ १७\frac{१}{२}॥
समत्र्यङ्कहतिः प्रोक्तो घनस्तत्र विधिः पदे॥ १८॥
प्रोच्यते विषमं त्वाद्यं समे द्वे च ततः परम्।
विशोध्यं विषमादन्त्याद्घनं तन्मूलमुच्यते॥ १९॥
त्रिन्घ्न्याप्तं मूलकृत्या समं मूले न्यसेत् फलम्।
तत्कृतिघ्नान्त्यनिहतान्त्रिघ्नीं चापि विशोधयेत्॥ २०॥
घनं च विषमादेवं घनमूलं मुहुर्भवेत्।
समान तीन अङ्कोंके गुणनफलको 'घन'³ कहा गया है। अब घनमूल निकालनेकी विधि बतायी जाती है—दाहिनेके प्रथम अङ्कपर घन या विषमका चिह्न (खड़ी लकीरके रूपमें) लगावे, उसके वामभागमें पार्श्ववर्ती दो अङ्कोंपर (पड़ी लकीरके रूपमें) अघन या समका चिह्न लगावे। इसी प्रकार अन्तिम अङ्कतक एक घन (विषम) और दो अघन (सम)-के चिह्न लगाने चाहिये। अन्तिम या विषम घनमें जितने घन घट सकें उतने घटा दे। उस घनको अलग रखें। उसका घनमूल ले और उस घनमूलका वर्ग करे, फिर उसमें तीनसे गुणा करे। उससे आदि अङ्कमें भाग दे, लब्धिको अलग लिख ले, उस लब्धिका वर्ग करे और उसमें अन्त्य (प्रथम मूलाङ्क) एवं तीनसे गुणा करे, फिर उसके बादके अङ्कमें उसे घटा दे तथा अलग रखी हुई लब्धिके घनको
१. वर्ग या कृति निकालनेके और भी बहुत-से प्रकार लीलावतीमें दिये गये हैं।
२. जैसे १६३८४ का वर्गमूल उपर्युक्त विधिसे निकालनेपर १२८ आता है—
| _ |
१६३ ८४
१ १२८
--- ----
×६ २५६ पंक्ति
४
---
२३ अङ्कोंको स्थापनकर दायेंसे बायें
४ तरफ खड़ी-पड़ी रेखा देकर विषम-
--- सम अङ्क समझना चाहिये।
१९८
१९२
---
६४
६४
---
×
३. जैसे ३ का घन हुआ ३×३×३=२७।
पूर्वभाग-द्वितीय पाद २६५
- पूर्वभाग-द्वितीय पाद * २६५
अगले घन अङ्कमें घटा दे, इस प्रकार बार-बार करनेसे घनमूल¹ सिद्ध होता है॥१८–२० ॥
अन्योन्यहारनिहतौ हरांशौ तु समच्छिदा॥२१॥ लवा लवघ्नाश्च हरा हरघ्ना हि सवर्णनम्। भागप्रभागे विज्ञेयं मुने शास्त्रार्थचिन्तकैः॥२२॥ अनुबन्धेऽपवाहे चैकस्य चेदधिकोनकः। भागास्तलस्थहारेण हारं स्वांशाधिकेन तान्॥२३॥ ऊनेन चापि गुणयेद्धनर्णं चिन्तयेत् तथा। कार्यस्तुल्यहरांशानां योगश्चाप्यन्तरो मुने॥२४॥ अहारराशौ रूपं तु कल्पयेद्धरमप्यथ। अंशाहतिश्छेदघातहृद्भिन्नांगुणने फलम्॥२५॥ छेदं चापि लवं विद्वन् परिवर्त्य हरस्य च। शेषः कार्यो भागहारे कर्तव्यो गुणनाविधिः॥२६॥
भिन्न अङ्कोंके परस्पर हरसे हर (भाजक) और अंश (भाज्य) दोनोंको गुण देनेसे सबके नीचे बराबर हर² हो जाता है। भागप्रभागमें अंशको अंशसे और हरको हरसे गुणा करना चाहिये। भागानुबन्ध एवं भागापवाहमें³ यदि एक अङ्क अपने अंशसे अधिक या ऊन होवे तो तलस्थ हरसे ऊपरवाले हरको गुण देना चाहिये। उसके बाद अपने अंशसे अधिक ऊन किये हुए हरसे (अर्थात् भागानुबन्धमें हर अंशका योग करके और भागापवाहमें हर अंशका अन्तर करके) अंशको गुण देना चाहिये। ऐसा करनेसे भागानुबन्ध और भागापवाहका फल सिद्ध होगा⁴। जिसके नीचे हर न हो उसके नीचे एक हरकी कल्पना करनी चाहिये। भिन्न गुणन-साधनमें अंश-अंशका गुणन करना और हर-हरके गुणनसे भाग देना चाहिये। इससे भिन्न गुणनमें फलकी सिद्धि होगी। (यथा २/७×३/८ यहाँ २ और ३ अंश हैं और ७, ८ हर हैं, इनमें अंश-अंशसे गुणा करनेपर २×३=६ हुआ और हर-हरके गुणनसे ७×८=५६ हुआ।
१. उदाहरण इस प्रकार है—
१९६८३ का घनमूल निकालना है। मूलोक्त विधिके अनुसार इसकी क्रिया इस प्रकार होगी—
$\begin{array}{rll} & १'९६'८'३' & \ & \underline{\phantom{१'}८\phantom{'८'३'}} & ) ८ घन, उसका मूल २ ( \ २\times २\times ३= & १२) ११६ (२७ = घनमूल & २ का वर्ग = ४ \ & \phantom{१२)}\underline{\phantom{१}८४} & ४ \times ३ = १२ \ & \phantom{१२)}३२८ & ७ का वर्ग ४९ \ ७\times ७\times २\times ३ & \phantom{१२)}\underline{२९४} & ४९ \times २ = ९८ \ & \phantom{१२)}३४३ & ९८ \times ३ = २९४ \ ७\times ७\times ७= & \phantom{१२)}\underline{३४३} & \ & \phantom{१२)}००० & \end{array}
२. यथा— \frac{१}{२}, \frac{१}{३}, \frac{१}{४} यहाँ परस्पर हरसे हर और अंश दोनोंको गुणित किया जाता है। जिस हरसे गुणा करते हैं, वह अपने सिवा दूसरे हर और अंशको ही गुणित करता है। जैसे—
| \frac{१}{२}, | \frac{१}{३}, | \frac{१}{४} |
|---|---|---|
| \frac{३}{६}, | \frac{२}{६}, | |
| \frac{१२}{२४} | \frac{८}{२४} | \frac{६}{२४} |
इस प्रकार यहाँ सबका हर समान हो गया। ऐसा करके ही भिन्नाङ्कोंका योग या अन्तर किया जाता है। यथा—
\frac{१}{२}+\frac{१}{३}+\frac{१}{४} = \frac{१२+८+६}{२४} = \frac{२६}{२४} \ \frac{१३}{१२}
३. किसी भागको जोड़नेको भागानुबन्ध और घटानेको भागापवाह कहते हैं।
४. उदाहरणके लिये यह प्रश्न है—१/८ का १/३ उसमेंसे घटाओ और शेषका १/२ उसी शेषमें जोड़ो, इसकी न्यास-विधि (लिखनेकी रीति) इस प्रकार होगी—
\begin{array}{l} \phantom{+} १/८ \ \phantom{+} १/३ \
- १/२ \end{array}
\frac{१\times ३\times २}{८\times २\times ३} = \frac{१}{८} उत्तर हुआ।$
२६६ * संक्षिप्त नारदपुराण *
फिर ६ ५६ करनेसे ६/५६ जिसे दोसे काटनेपर ३/२८ उत्तर हुआ) ॥ २१-२५॥ विद्वन्! भिन्न संख्याके भागमें भाजकके हर और अंशको परिवर्तित कर (हरको अंश और अंशको हर बनाकर) फिर भाज्यके हर-अंशके साथ गुणन-क्रिया करनी चाहिये, इससे भागफल सिद्ध होता है। (यथा ३/८ ४/५ में हर और अंशके परिवर्तनसे ३/८x५/४=१५/३२ यही भागफल हुआ) ॥ २६ ॥
हरांशयोः कृती वर्गे घनौ घनविधौ मुने।
पदसिद्धौ पदे कुर्यात्तथो खं सर्वतश्च खम्॥ २७॥
भिन्नाङ्कके वर्गादि-साधनमें यदि वर्ग करना हो तो हर और अंश दोनोंका वर्ग करे तथा घन करना हो तो दोनोंका घन करे। इसी प्रकार वर्गमूल निकालना हो तो दोनोंका वर्गमूल और घनमूल निकालना हो तो भी दोनोंका घनमूल निकालना चाहिये। (यथा-३/७ का वर्ग हुआ ९/४९ और मूल हुआ ३/७, इसी प्रकार ३/७ का घन हुआ २७/३४३ और मूल हुआ ३/७) ॥ २७ ॥
छेदं गुणं गुं छेदं वर्गं मूलं पदं कृतिम्।
ऋणं स्वं स्वमृणं कुर्याद्दृश्ये राशिप्रसिद्धये ॥ २८ ॥
अथ स्वांशाधिकोने तु लवाढ्योनेो हरो हर।
अंशस्त्वविकृतस्तत्र विलोमे शेषमुक्तवत् ॥ २९ ॥
विलोमविधिसे राशि जाननेके लिये दृश्यमें हरको गुणक, गुणकको हर, वर्गको मूल, मूलको वर्ग, ऋणको धन और धनको ऋण बनाकर अन्तमें उलटी क्रिया करनेसे राशि (इष्ट संख्या) सिद्ध होती है। विशेषता यह है कि जहाँ अपना अंश जोड़ा गया हो वहाँ हरमें अंशको जोड़कर और जहाँ अपना अंश घटाया गया हो, वहाँ हरमें अंशको घटाकर हर कल्पना करे और अंश ज्यों-का-त्यों रहे। फिर दृश्य राशिमें विलोम क्रिया उक्त रीतिसे करे तो राशि सिद्ध होती है¹ ॥ २८-२९ ॥
उद्दिष्टराशिः संक्षुण्णो हतोऽंशै रहितो युतः।
इष्टघ्नदृष्टमेतेन भक्तं राशिरितीरितम् ॥ ३० ॥
अभीष्ट संख्या जाननेके लिये इष्ट राशिकी कल्पना करनी चाहिये। फिर प्रश्नकर्ताके कथनानुसार उस राशिको गुणा करे या भाग दे। कोई अंश घटानेको कहा गया हो तो घटावे और जोड़नेको कहा गया हो तो जोड़ दे अर्थात् प्रश्नमें जो-जो क्रियाएँ कही गयी हों, वे इष्टराशिमें करके फिर जो राशि निष्पन्न हो, उससे कल्पित इष्ट-गुणित दृष्टमें भाग दे, उसमें जो लब्धि हो, वही इष्ट राशि है² ॥ ३० ॥
१. उदाहरणके लिये यह प्रश्न लीजिये—वह कौन-सी संख्या है, जिसको तीनसे गुणा करके उसमें अपना ३/४ जोड़ देते हैं, फिर सातका भाग देते हैं, पुनः अपना १/३ घटा देते हैं, फिर उसका वर्ग करते हैं, पुनः उसमें ५२ घटाकर उसका मूल लेते हैं, उसमें ८ जोड़कर १० का भाग देते हैं तो २ लब्धि होती है। उस संख्या अथवा राशिको निकालना है। इसमें मूलोक्त नियमके अनुसार इस प्रकार क्रिया की जायगी—
| गुणक | ३ | हर | ८४÷३=२८ राशि |
|---|---|---|---|
| धन | ३/४ | अपना ३/७ ऋण | १४७-६३=८४ |
| हर | ७ | गुणक | २१×७=१४७ |
| ऋण | १/३ | अपना १/२ धन | १४+७=२१ |
| वर्ग | = | मूल | १९६=१४ |
| ऋण | ५२ | धन | १४४+५२=१९६ |
| मूल | = | वर्ग | १२=१४४ |
| धन | ८ | ऋण | २०-८=१२ |
| हर | १० | गुणक | २×१०=२० |
| दृश्य | २ |
अतः विलोम गणितकी विधिसे वह संख्या २८ निश्चित हुई।
२. इसको स्पष्टरूपसे जाननेके लिये यह उदाहरणात्मक प्रश्न प्रस्तुत किया जाता है—वह कौन-सी संख्या है, जिसे ५ से गुणा करके उसमें उसीका तृतीयांश घटाकर दससे भाग देनेपर जो लब्धि हो उसमें राशिके १/३, १/२, १/४ भाग
\ पूर्वभाग-द्वितीय पाद २६७
* पूर्वभाग-द्वितीय पाद * २६७
योगोऽन्तरेणोनयुतोऽर्धितो राशी तु संक्रमे।
राश्यन्तरहृतं वर्गान्तरं योगस्ततश्च तौ ॥ ३१ ॥
इष्टवर्गकृतिश्चेष्टघनोऽष्टघ्नौ च सैककः।
आद्यः स्यातामुभे व्यक्ते गणितेऽव्यक्त एव च ॥ ३४ ॥
संक्रमण-गणितमें (यदि दो संख्याओंका योग और अन्तर ज्ञात हो तो) योगको दो जगह लिखकर एक जगह अन्तरको जोड़कर आधा करे तो एक संख्याका ज्ञान होगा और दूसरी जगह अन्तरको घटाकर आधा करे तो दूसरी संख्या ज्ञात होगी—इस प्रकार दोनों राशियाँ (संख्याएँ) ज्ञात हो जाती हैं२। वर्गसंक्रमणमें (यदि दो संख्याओंका वर्गान्तर तथा अन्तर ज्ञात हो तो) वर्गान्तरमें अन्तरसे भाग देनेपर जो लब्धि आती है, वही उनका योग है; योगका ज्ञान हो जानेपर फिर पूर्वोक्त प्रकारसे दोनों संख्याओंका ज्ञान प्राप्त करना चाहिये३ ॥ ३१ ॥
गजघ्नीष्टकृतिर्व्यैका दलिता चेष्टभाजिता।
एकोऽस्य वर्गो दलितः सैको राशिः परो मतः ॥ ३२ ॥
द्विगुणेष्टहृतं रूपं सेष्टं प्राग्रूपकं परम्।
वर्गयोगान्तरे व्येके राश्योर्वर्गौ स्त एतयोः ॥ ३३ ॥
वर्गकर्मगणितमें४ इष्टका वर्ग करके उसमें आठसे गुणा करे, फिर एक घटा दे, उसका आधा करे। तत्पश्चात्—उसमें इष्टसे भाग दे तो एक राशि ज्ञात होगी। फिर उसका वर्ग करके आधा करे और उसमें एक जोड़ दे तो दूसरी संख्या ज्ञात होगी५ ॥ ३२ ॥ अथवा कोई इष्ट-कल्पना करके उस द्विगुणित इष्टसे १ में भाग देकर लब्धिमें इष्टको जोड़े तो प्रथम संख्या होगी और दूसरी संख्या १ होगी। ये दोनों संख्याएँ वे ही होंगी, जिनके वर्गोंके योग और अन्तरमें एक घटानेपर भी वर्गाङ्क ही शेष रहता है६ ॥ ३३ ॥ किसी इष्टके वर्गका वर्ग तथा पृथक् उसीका घन करके दोनोंको पृथक्-पृथक् आठसे गुणा करे। फिर पहलेमें एक जोड़े तो दोनों संख्याएँ ज्ञात होंगी। यह विधि व्यक्त और अव्यक्त दोनों गणितोंमें उपयुक्त है७ ॥ ३४ ॥
जोड़नेसे ६८ होता है। इसमें गुणक ५। ऊन १/३। हर १०। युक्त होनेवाले राश्यंश १/३, १/२, १/४ और दृश्य संख्या ६८ है। कल्पना कीजिये कि इष्ट राशि ३ है। इसमें प्रश्नकर्ताके कथनानुसार ५ से गुणा किया तो १५, इसमें अपना १/३ अर्थात् ५ घटा दिया तो १० हुआ। इसमें दससे भाग दिया तो १ लब्धि अङ्क हुआ, उसमें कल्पित राशि ३ के १/३, १/२, १/४ जोड़नेसे १/१+३/३+३/२+३/४=१२+१२+१८+९=५१/१२=१७/४ हुआ। फिर दृश्य ६८ में कल्पित इष्ट ३ से गुणा किया और १७/४ से भाग दिया तो (६८×३×४)/१७ = ४८ यही इष्ट संख्या हुई।
२. जैसे किसीने पूछा—वे दोनों कौन-सी संख्याएँ हैं, जिनका योग १०१ और अन्तर २५ है? यहाँ योगको दो जगह लिखा—
| १०१ | १०१ |
|---|---|
| २५ जोड़ा | २५ घटाया |
| १२६÷२=६३ | ७६÷२=३८ उत्तर—वे दोनों संख्याएँ ६३ एवं ३८ हैं। |
३. उदाहरणके लिये यह प्रश्न है—जिन दो संख्याओंका अन्तर ८ और वर्गान्तर ४०० है, उन्हें बताओ। ४००÷८=५० यह योग हुआ ५०+८÷२=२९ एक संख्या। ५०-८÷२=२१ दूसरी संख्या हुई। अथवा वर्गान्तरमें राशियोंका भाग देनेसे अन्तर ज्ञात होगा। यथा—४००÷५०=८ यह राश्यन्तर है। फिर पूर्वोक्त प्रक्रियासे दोनों राशियाँ ज्ञात होंगी।
४. जहाँ किन्हीं दो संख्याओंका वर्गयोग और वर्गान्तर करके दोनोंमें पृथक्-पृथक् १ घटानेपर भी वर्गाङ्क ही शेष रहता है उसको 'वर्गकर्म' कहते हैं।
५. कल्पना कीजिये कि इष्ट १/२ है, उसका वर्ग हुआ १/४ उसको आठसे गुणा किया तो २ हुआ। उसमें १ घटाकर आधा किया तो १/२ हुआ, उसमें इष्ट १/२ से भाग दिया तो १ हुआ—यह प्रथम संख्या है। उसका वर्ग किया तो एक ही हुआ। इसका आधा करनेसे १/२ हुआ। इसमें एक जोड़नेसे ३/२ हुआ यह दूसरी संख्या हुई।
६. कल्पना कीजिये कि इष्ट १ है, उसको दोसे गुणा किया तो २ हुआ, उससे १ में भाग दिया तो १÷२/१=१×१/२=१/२ हुआ। उसमें इष्ट १ जोड़ दिया तो १ १/२=३/२ प्रथम संख्या निकल आयी और दूसरी संख्या १ है ही।
७. कल्पना कीजिये कि इष्ट २ है। इसके वर्गका वर्ग हुआ १६ और उसका घन हुआ ८। दोनोंको अलग-अलग
| २६८ | * संक्षिप्त नारदपुराण * |
|---|
गुणघ्नमूलोनयुते सगुणार्धकृतेः पदम्।
दृष्टस्य च गुणार्धोनयुतं वर्गीकृतं गुणः ॥ ३५ ॥
यदा लवोनयुगराशिर्दृश्यं भागोनयुग्भुवा।
भक्तं तथा मूलगुणं ताभ्यां साध्योऽथ व्यक्तवत् ॥ ३६ ॥
गुणकर्म अपने इष्टाङ्गगुणित मूलसे ऊन या युक्त होकर यदि कोई संख्या दृश्य हुई हो तो मूल गुणकके आधेका वर्ग दृश्य-संख्यामें जोड़कर मूल लेना चाहिये। उसमें क्रमसे मूल गुणकके आधा जोड़ना और घटाना चाहिये। (अर्थात् जहाँ इष्टगुणितमूलसे ऊन होकर दृश्य हो वहाँ गुणकार्धको जोड़ना तथा यदि इष्टगुणितमूलयुक्त होकर दृश्य हो तो उक्त मूलमें गुणकार्ध घटाना चाहिये) फिर उसका वर्ग कर लेनेसे प्रश्नकर्ताकी अभीष्ट राशि (संख्या) सिद्ध होती है¹। यदि राशि मूलोन या मूलयुक्त होकर पुनः अपने किसी भागसे भी ऊन या युत होकर दृश्य होती हो तो उस भागको १ में ऊन या युत कर (यदि भाग ऊन हुआ हो तो घटा करके और यदि युत हुआ हो तो जोड़ करके) उसके द्वारा पृथक्-पृथक् दृश्य और मूल गुणकमें भाग दे; फिर इस नूतन दृश्य और मूलगुणकसे पूर्ववत् राशिका साधन करना चाहिये ॥ ३५-३६ ॥
प्रमाणेच्छे सजातीये आद्यन्ते मध्यगं फलम्।
इच्छाघ्नमाद्यहृत्वेष्टं फलं व्यस्ते विपर्ययात् ॥ ३७॥
(त्रैराशिकमें) प्रमाण और इच्छा ये समान जातिके होते हैं, इन्हें आदि और अन्तमें रखे, फल भिन्न जातिका है, अतः उसे मध्यमें स्थापित करे। फलको इच्छासे गुणा करके प्रमाणके द्वारा भाग देनेसे लब्धि इष्टफल होती है। (यह क्रम त्रैराशिक बताया गया है।) व्यस्त त्रैराशिकमें इससे विपरीत क्रिया करनी चाहिये। अर्थात् प्रमाण-फलको प्रमाणसे गुणा करके इच्छासे भाग देनेपर लब्धि इष्टफल होती है। (प्रमाण, प्रमाण-फल और इच्छा—इन तीन राशियोंको जानकर इच्छाफल जाननेकी क्रियाको त्रैराशिक कहते हैं।)² ॥३७॥
८ से गुणा करनेपर एक हुआ १२८ और दूसरा हुआ ६४। यहाँ पहलेमें १ जोड़नेसे १२९ हुआ, यह पहली संख्या है और ६४ दूसरी संख्या हुई।
१. यदि कोई पूछे—किसी हंस-समूहके मूलका सप्तगुणित आधा (७/२) भाग सरोवरके तटपर चला गया और बचे हुए २ हंस जलमें ही क्रीड़ा करते देखे गये तो उन हंसोंकी कुल संख्या कितनी थी? यहाँ मूल गुणक ७/२ है। दृष्ट संख्या २ है। गुणार्ध हुआ ७/४ उसका वर्ग हुआ ४९/१६ उससे दृष्ट २ का योग करनेपर ८१/१६ हुआ। इसका मूल हुआ ९/४ फिर इसे गुणार्ध ७/४ से युक्त किया तो १६/४=४ हुआ, इसका वर्ग किया तो १६ हुआ, यही हंसकुलका मान है। (यह मूलोन दृष्टका उदाहरण है।)
भागोन दृष्टका उदाहरण इस प्रकार है—किसी व्यक्तिने अपने धनका आधा १/२ अपने पुत्रको दिया और धन-संख्याके मूलका १२ गुना भाग अपनी स्त्रीको दे दिया। इसके बाद उसके पास १०८०) बच गये तो बताओ उसके सम्पूर्ण धनकी संख्या क्या है?
उत्तर—इस प्रश्नमें मूलगुणक १२ है और १/२ भागसे ऊन दृष्ट १०८० है। अतः मूल श्लोकमें वर्णित रीतिसे अनुसार भागको एकमें घटानेसे १-१/२=१/२ हुआ। इससे मूल गुणक १२ और दृश्य १०८० में भाग देनेसे क्रमशः नवीन मूलगुणक २४ और नवीन दृश्य २१६० हुआ। पुनः उपर्युक्त रीतिसे इस मूलगुणकके आधे १२ के वर्ग १४४ को दृश्यमें जोड़नेसे २३०४ हुआ। इसके मूल ४८ में गुणक २४ के आधे १२ को जोड़नेसे ६० हुआ और उसका वर्ग ३६०० हुआ; यही उत्तर है।
भागयुत दृष्टका उदाहरण—एक भगवद्भक्त प्रातःकाल जितनी संख्यामें हरिनामका जप करते हैं; उस संख्याके पञ्चमांशमें उसी जपसंख्याके मूलका १२ गुना जोड़नेसे जो संख्या हो, उतना जप सायंकालमें करते हैं, यदि दोनों समयकी जपसंख्या मिलकर १३२०० है तो प्रातःकाल और सायंकालकी पृथक्-पृथक् जपसंख्या बताइये।
उत्तर—यहाँ मूलगुणक १२ और भाग १/५ से युत दृष्ट १३२०० है। अतः उक्त रीतिके अनुसार भागको १ में जोड़ा गया तो ६/५ हुआ। इससे मूलगुणक १२ और दृश्य १३२०० में भाग देनेपर नवीन मूलगुणक १० और नवीन दृश्य ११००० हुआ। उपर्युक्त रीतिके अनुसार गुणकके आधे ५ के वर्ग २५ को नवीन दृश्यमें जोड़नेपर ११०२५ हुआ। इसका मूल १०५ हुआ। इसमें नवीन गुणकके आधे ५ को घटानेसे १०० हुआ। इसका वर्ग १०००० है। यही प्रातःकालकी जपसंख्या हुई। शेष ३२०० सायंकालकी जपसंख्या हुई।
२. उदाहरणके लिये यह प्रश्न है—यदि पाँच रुपयेमें १०० आम मिलते हैं तो सात रुपयेमें कितने मिलेंगे? इस प्रश्नमें ५ प्रमाण है, १०० प्रमाण-फल है और ७ इच्छा है। प्रमाण और इच्छा एक जाति (रुपया) तथा प्रमाण-फल भिन्न जाति (आम) है। आदिमें प्रमाण, मध्यमें फल और अन्तमें इच्छाकी स्थापना की गयी—५) में १०० आम तो ७) में कितने? यहाँ प्रमाण-
पूर्वभाग-द्वितीय पाद २६१
- पूर्वभाग-द्वितीय पाद * २६१
| पञ्चराश्यादिकेऽन्योन्यपक्षं कृत्वा फलच्छिदाम्।<br>बहुराशिवधे भक्ते फलं स्वल्पवधेन च ॥ ३८ ॥<br>इष्टकर्मविधेर्मूलं च्युतं मिश्रात् कलान्तरम्।<br>मानघ्नकालश्रातीतकालघ्नफलसंहताः ॥ ३९ ॥<br>स्वयोगभक्ता मिश्रघ्नाः सम्प्रयुक्तदलानि च।<br>पञ्चराशिक, सप्तराशिक (नवराशिक, एकादशराशिक) आदिमें फल और हरोंको परस्पर | पक्षमें परिवर्तन करके (प्रमाण-पक्षवालेको इच्छा-पक्षमें और इच्छा-पक्षवालेको प्रमाण-पक्षमें रखकर) अधिक राशियोंके घातमें अल्पराशिके घातसे भाग देनेपर जो लब्धि आवे, वही इच्छाफल है॥ ३८॥ मिश्रधनको इष्ट मानकर इष्टकर्मसे मूलधनका ज्ञान करे, उसको मिश्रधनमें घटानेसे कलान्तर (सूद) समझना चाहिये।^१ अपने-अपने |
फल १०० को इच्छासे गुणा करके प्रमाणसे भाग दिया जायगा तो \frac{१००\times७}{५} = १४० यह इच्छाफल हुआ (अर्थात् सात रुपयेके १४० आम हुए)।
जहाँ इच्छाकी वृद्धिमें फलकी वृद्धि और