पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र)
by पण्डित विष्णु शर्मा
Source: पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र) · श्रीवेङ्कटेश्वर स्टीम प्रेस, बम्बई · 1910 (origin)
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ऊपर शिर धरकर सो गया । उसके मुखसे सर्प फण निकालकर वायुभक्षण करता था । उसी बॉवईसे दूसरा सर्प निकल कर भी इसी प्रकार करता । तब उनके परस्पर दर्शनसे क्रोधसे लाल नेत्र कर वल्मीकमे स्थित सर्पने कहा- "भो भो दुरात्मन् ! किस प्रकार सर्वांगसुन्दर इस राजपुत्रको क्लेश देता है ?" मुखमें स्थित सर्प बोला,- "भो ! भो ! तुम दुरात्माने भी इस वल्मीकके मध्यमें किस प्रकार यह सुवर्णसे पूर्ण दो कलश दूषित किये हैं ?" इस प्रकार परस्पर दोनों भेद खोलते भये । फिर वल्मीकमे स्थित सर्प बोला,- "भो दुरात्मन् ! यह तेरी औषधी क्या कोई नहीं जानता है ? जो कि पुरानी आलोड़ित राजकां- जीके पानसे तू नाशको प्राप्त होगा" । तब वह मुखके भीतरका सर्प बोला- "क्या तेरी यह औषधी कोई नहीं जानता है ? जो गरम जल वा गरमतेलसे तेरा नाश होगा" । इस प्रकार वह राजकन्या वृक्षकी ओरसे उन दोनोंके पर- स्पर भेदके वचन सुनकर, वैसाही करती हुई अव्यंग और निरोग स्वामीको करके परम धनको प्राप्त हो अपने देशको चली । पिता माता सुजनोंसे पूजित हो यथेच्छ भोगोंको प्राप्त होकर सुखसे रही । इससे मैं कहता हू- परस्परस्य मर्माणि ये न रक्षन्ति जन्तवः । त एव निधनं यान्ति वल्मीकोदरसर्पवत् ॥ २०० ॥” जो प्राणी परस्परमर्मोकी रक्षा नहीं करते हैं वह वल्मीक और उदरके सर्पकी समान नष्ट होते हैं ॥ २०० ॥” तच्च श्रुत्वा स्वयमरिमर्दनोंऽपि एवं समर्थितवान् । तथाच अनुष्ठितं दृष्ट्वान्तर्लीनं विहस्य रक्ताक्षः पुनरब्रवीत्,- “कष्टम् ! विनाशितोऽयं भवद्भिः अन्यायेन स्वामी ! उक्तञ्च- यह सुनकर स्वयं अरिमर्दन भी इस बातको पुष्ट करता हुआ इस प्रकार ( शरणागत रक्षा ) के अनुष्ठानको देखकर अस्पष्ट स्वरसे हँसकर रक्ताक्ष फिर बोला, - "कष्ट है कि तुमने अन्यायसे स्वामीका नाश किया । कहा है- अपूज्या यत्र पूज्यन्ते पूज्यानान्तु विमानना । त्रीणि तत्र प्रवर्त्तन्ते दुर्भिक्षं मरणं भयम् ॥ २०१ ॥ जहा अपूज्य पूजे जाते हैं पूज्योंका निरादर होता है वहा तीन होते हैं दुर्भिक्ष, मरण और भय ॥ ३०१ ॥
( ३५८ ) पञ्चतन्त्रम् ।
( ३५८ ) पञ्चतन्त्रम् । तथाच- और देखो- प्रत्यक्षेऽपि कृते पापे मूर्खः साम्ना प्रशाम्यति । रथकारः स्वकां भार्या सजारां शिरसाऽऽवहत् ॥२०२॥” प्रत्यक्ष दोष होनेपर भी ( पापीकी ) विनयसे मूर्ख शान्त होता है रथकारने अपनी भार्याको जारसहित शिरपर उठाया ॥ २०२ ॥” मन्त्रिणः प्राहुः-“कथमेतत् ?” रक्ताक्षः कथयति- मंत्री बोले,-“यह कैसे ?” रक्ताक्ष कहता है- कथा ११. अस्ति कस्मिंश्चिदधिष्ठाने वीरधरो नाम रथकारः, तस्य भार्या कामदमनी । सा च पुंश्चली जनापवादसं- युक्ता । सोऽपि तस्याः परीक्षणार्थं व्यचिन्तयत् ।-“अथ मया अस्याः परीक्षणं कर्त्तव्यम् । उक्तञ्च यतः- किसी एक स्थानमें वीरधर नामवाला बढई रहता है । उसकी भार्या काम- दमनी । वह व्यभिचारिणी लोकापवादसे युक्तथी । वह भी उसकी परीक्षा कर- नेका विचार करताथा कि “किस प्रकारमें इसकी परीक्षा करूं । कहाहै- यदि स्यात्पावकः शीतः प्रोष्णो वा शशलाञ्छनः । स्त्रीणां तदा सतीत्वं स्याद्यदि स्याद्दुर्जनो हितः ॥२०३॥ यदि अग्नि शीतल होजाय वा चन्द्रमा गरम होजाय वा दुर्जन हित होजाय तो स्त्रियोंके सतीपनका विश्वास हो ॥ २०३ ॥ जानामि च एनां लोकवचनात् असतीम् । उक्तञ्च- लोकप्रवादसे मैं इसको असती जानता हूं । कहा है- यन्न वेदेषु शास्त्रेषु न दृष्टं न च संश्रुतम् । तत्सर्वं वेत्ति लोकोऽयं यत्स्याद्ब्रह्माण्डमध्यगम् ॥ २०४ ॥ जो वेदशास्त्रमें न देखा न सुना है और जो कुछ इस संसारके मध्यमें स्थित है उसको स्त्री लोक सब जानते हैं ॥ २०४ ॥ एवं सम्प्रधार्य भार्यामुवोचत्-“प्रिये ! प्रभातेऽहं ग्रामा- न्तरं यास्यामि । तत्र कतिचिद्दिनानि लगिष्यन्ति । तत
त्वया किमपि पाथेयं मम योग्यं विधेयम्” । सापि तद्वचनं श्रुत्वा हर्षितचित्ता औत्सुक्यात् सर्वकार्याणि सन्त्यज्य सिद्धमन्नं घृतशर्कराप्रायमकरोत् । अथवा साधु इदमुच्यते- ऐसा विचार कर भार्यामे बोला- "प्रिये ! प्रभात समयमें ग्रामान्तरको जाऊँ- गा वहा कुछ दिन लगेंगे सो तू कुछ भोजनादि बनादे”। वह भी यह वचन सुन बडे हर्षित चित्तसे उत्कण्ठासे सब कार्य त्याग कर सिद्ध अन्न ( पूरी आदि ) घृत शर्करासे युक्त बनाती हुई । अथवा यह अच्छा कहा है- दुर्दिवसे घनतिमिरे वर्षति जलदे महाटवीप्रभृतौ । पत्युर्विदेशगमने परमसुखं जघनचपलायाः ॥ २०५ ॥ दुर्दिन घने अन्धकारमें मेघके वर्षनेमें महाजगलमें पतिके विदेश जानेमें चपल जघावाली ( कामिनी ) परम सुख मानती है ॥ २०५ ॥ अथ असौ प्रत्यूषे उत्थाय स्वगृहात् निर्गतः । सापि तं प्रस्थितं विज्ञाय प्रहसितवदना अङ्गसंस्कारं कुर्वाणा कथञ्चित् तद्दिवसमत्यवाहयत् । अथ पूर्वपरिचितविटगृहे गत्वा तं प्रत्यु- क्तवती । स दुरात्मा मे पतिर्ग्रामान्तरं गतः । तत् त्वया अ- स्मद्गृहे प्रसुप्ते जने समागन्तव्यम् । तथा अनुष्ठिते स रथका- रोऽरण्ये दिनमतिवाह्य प्रदोषे स्वगृहेऽपरद्वारेण प्रविश्य शय्या- धस्तले निभृतो भूत्वा स्थितः । एतस्मिन्नन्तरे स देवदत्तः समागत्य तत्र शरणे उपविष्टः । तं दृष्ट्वा रोषाविष्टचित्तो रथ- कारो व्यचिन्तयत् “किमेनं उत्थाय हन्मि, अथवा हेलया एव प्रसुप्तौ द्वौ अपि एतौ व्यापादयामि । परं पश्यामि ताव- दस्याः चेष्टितम् । शृणोमि च अनेन सह आलापान्”। अत्रा- न्तरे सा गृहद्वारं निभृतं विधाय शयनतलमारूढा । अथ त- स्यास्तत्र आरोहन्त्या रथकारशरीरे पादो विलग्नः । ततः सा व्यचिन्तयत् । “नूनमेतेन दुरात्मना रथकारेण मत्परीक्ष- णार्थं भाव्यम् । ततः स्त्रीचरित्रविज्ञानं किमपि करोमि”। एवं तस्याः चिन्तयन्त्या स देवदत्तः स्पर्शोत्सुको बभूव । अथ तया कृताञ्जलिपुटया अभिहितं-“भो महानुभाव ! न मे शरीरं त्वया
( ३६० ) पञ्चतन्त्रम् ।
( ३६० ) पञ्चतन्त्रम् ।
स्पर्शनीयं यतोऽहं पतिव्रता महासती च। न चेत् शापं दत्त्वा त्वां भस्मसात करिष्यामि”। स आह- “यदि एवं तर्हि त्वया किमहमाहूतः?” सा अब्रवीत्- “भो ! शृणुष्व एकाग्रमनाः। अहमद्यप्रत्यूषे देवतादर्शनार्थं चण्डिकायतनं गता, तत्र अक- स्मात् खे वाणी सञ्जाता- “पुत्रि ! किं करोमि, भक्तासि मे त्वं, परं षण्मासाभ्यन्तरे विधिनियोगाद् विधवा भवि- ष्यसि”। ततो मया अभिहितं,- “भगवति ! यथा त्वम् आपदं वेत्सि, तथा तत्प्रतीकारमपि जानासि । तत् अस्ति कश्चिदुपायो येन मे पतिः शतसंवत्सरजीवी भवति ?” । ततः तया अभिहितम्- “वत्से ! सन्नपि नास्ति । यतः तव आयत्तः स प्रतीकारः” तच्छ्रुत्वा मया अभिहितम्,- “देवि! यदि तत् मम प्राणैर्भवति, तत् आदिशय येन करोमि”। अथ देव्या अभिहितम्,- “यदि अद्यदिने परपुरुषेण सह एकस्मिन् शयने समारुह्य आलिङ्गनं करोषि, तत् एव भर्तृ- सक्तोऽपमृत्युः तस्य सञ्चरति भर्त्तापि पुनः वर्षशतं जीवति”। तेन त्वं मया अभ्यर्थितः । तद्यत किञ्चित कर्तुमनाः तत् कुरुष्व । न हि देवतावचनमन्यथा भविष्यति । इति निश्चयः”। ततोऽन्तर्हासविकाशमुखः स तदुचितमाचचार । सोऽपि रथकारो मूर्खः तस्याः तद्वचनमाकर्ण्य पुलकाङ्किततनुः शय्याधस्तलात् निष्क्रम्य तामुवाच,- “साधु पतिव्रते ! साधु कुलन्दिनि अहं दुर्जनवचनशंकितहृदयः त्वत्परीक्षानिमित्तं ग्रामान्तरव्याजं कृत्वा अत्र खट्वाधस्तले निभृतं लीनः । तत् एहि आलिङ्गय मां, त्वं स्वभर्तृभक्तानां मुख्या नारीणां यत् एव ब्रह्मव्रतं परसङ्गेऽपि पालितवती । मदायुरवृद्धिकृतेऽपमृ- त्युविनाशार्थञ्च त्वमेवं कृतवती”। तामेवमुक्त्वा सस्नेहमालि- ङ्गितवान् । स्वस्कन्धे तां आरोप्य तमपि देवदत्तमुवाच,- “भो महानुभाव ! मत्पुण्यैः त्वमिह आगतः, त्वत्प्रसादात् मया प्राप्तं वर्षशतप्रमाणमायुः। तत् त्वमपि मामालिङ्ग्य मत-
भाषाटीकासमेतम् । ( ३६१ )
स्कन्धे समारोह" । इति जल्पन् अनिच्छन्तमपि देवदत्त- मलिंग्य बलात् स्वकीयस्कन्धे आरोपितवान् । ततश्च नृत्यं कृत्वा,-"हे ब्रह्मव्रतधराणां धुरीण ! त्वयापि मयि उपकृतं" इत्यादि उक्त्वा स्कन्धात् उत्तार्य्य, यत्र यत्र स्वजनगृहद्वारा- दिषु बभ्राम, तत्र तत्र तयोः उभयोरपि तद्गुणवर्णनमकरोत्। अतोऽहं ब्रवीमि- तब वह सबेरेही उठकर अपने घरसे निकला । वहभी उसको गया जान श्रृंगारकर किसी प्रकार दिन बिताती हुई और पूर्वपरिचित जारके घर जाकर उससे मिली ( बोली ) -"वह दुरात्मा मेरा पति ग्रामान्तरको गया है तू हमारे घर जनोंके सोजानेपर आजाना"। वैसाही हुआ । और वह रथकार वनमेंही दिन व्यतीतकर रात्रिको अपने घरमें दूसरे द्वारसे प्रवेश कर सेजके नीचे मौन होकर स्थित हुआ । इसी समय देवदत्त ( जार ) आकर उस सेजपर आया । उसको देख क्रोधपूर्णचित्त बढई विचारने लगा "क्या इसको उठकर मारू अथवा लीलासे सोते हुए दोनोंहीको मारू । अच्छा इनकी चेष्टा तो देखू । इनके साथकी बात सुनू"। इसी समय वह घरका दरवाजा मूदकर सेजपर आरूढ हुई । तब उसके उसपर चढनेमे रथकारके शरीरमें पाव लगा । तब वह विचारने लगी "अवश्य यह दुरात्मा रथकार मेरी परीक्षाके निमित्त स्थित है सो कोई स्त्रीचरित्रका कौशल करू"। इस प्रकार उसके विचारनेपर वह देवदत्त उसके स्पर्शमें उत्कंठित हुआ । तब उसने हाथ जोडकर कहा-"भो ! महानु- भाव ! तुम मेरा शरीर मत छुओ, जो कि मैं पतिव्रता महा सती हू । नहीं तो शाप देकर तुमको भस्म कर दूंगी"। वह बोला,-"जो ऐसा है तो तैने मुझे क्यों बुलाया ?" । वह बोली- "भो ! एकाग्र मनसे सुनो । मैं आज सबेरे देवता दर्शनको चण्डीके मन्दिरमें गई वहां अकस्मात् आकाशवाणी हुई-"पुत्री ! मैं क्या करू तू मेरी भक्त है परन्तु छः महीनेके बीचमें प्रारब्धके कारण तू विधवा होगी" तब मैंने कहा-"भगवति ! जो तू आपत्तिको जानती है, तो उसका निवारणभी जानती है क्या है ऐसा कोई उपाय है जिससे मेरा पति सौ वर्षतक जिये ?" । तब उसने कहा- "वत्से ! होता हुआभी नहीं है । क्यों कि उसका उपाय तेरे अधीन है"। यह सुनकर मैंने कहा,-"देवि ! यदि
( ३६२ ) पञ्चतन्त्रम् ।
( ३६२ ) पञ्चतन्त्रम् । वह मेरे प्राणोंसेभी हो, तो आज्ञा दे जिससे मैं करूं”। तब देवीने कहा जो आजके दिन परपुरुषके साथ एक खाटपर आरूढ हो आलिंगन करे तो तेरे भर्त्ताकी अपमृत्यु उस परपुरुषमें चली जाय तेरा भर्त्ताभी फिर सौवर्षतक जिये”। इस कारण मैने तुमको बुलाया है। सो जो कुछ करनेकी इच्छा हो सो कर। देवताका वचन अन्यथा न होगा यह निश्चय है,” तब भीतर हँसीसे खिले मुखवाला यह उससे उचित आचरण करता हुआ। वह मूर्ख रथकारभी उसके वचन सुन पुलकित शरीर हो शय्याके नीचेसे निकल उससे बोला,–“धन्य पतिव्रते धन्य ! कुलकी आनन्द देनेवाली धन्य ! मैं दुर्जनोंके वचनोंसे शंकित हृदयहो तेरी परीक्षाके निमित्त ग्रामान्तर जानेका वहाना करके इस खाटके नीचे एकान्तमें छिपगया था। सो आ मुझे आलिंगन कर, तू अपने स्वामीकी भक्ति करनेवाली स्त्रियोंमें मुख्य है ऐसा तप- रूप व्रत परपुरुषके संग करती हुई। मेरी आयुके बढानेके निमित्त तथा अप- मृत्यु नाशके निमित्त तैने ऐसा किया”। उससे ऐसा कह स्नेहसे आलिंगन करता हुआ अपने कन्धेपर उसे चढाकर उस देवदत्तसे बोला-“भो महा- नुभाव ! मेरे पुण्यसे तुम यहां आये तुम्हारे प्रसादसे मैंने सौ वर्षकी आयु प्राप्त की। सो तू भी मुझे आलिंगन कर मेरे कन्धेपर चढ”। ऐसा कह नहीं इच्छा करनेपरभी देवदत्तको आलिंगन कर बलसे अपने कन्धेपर चढाता हुआ। फिर नृत्य करके हे ब्रह्मव्रत धारण करनेवालोंमें अग्रणी तुमनेभी मेरा उपकार किया ऐसा कह कर कन्धेसे उतार जहां तहां अपने स्वजनोंके गृहद्वारमें घूमने लगा। वहां वहां उन दोनोंके ही उन गुणोंका वर्णन करता भया। इससे मैं कहताहूं कि- प्रत्यक्षेऽपि कृते पापे मूर्खः साम्ना प्रशाम्यति । रथकारः स्वकां भार्य्यां सजारां शिरसावहत् ॥ २०६ ॥ कि पाप देखकर भी मूर्ख साम उपायसे शान्त हो जाता है रथकारने (इस प्रकार ) जारसहित अपनी भार्याको शिरपर उठाया ॥ २०६ ॥ तत सर्वथा मूलोत्खाता वयं विनष्टाः स्मः । सुष्ठु खलु इदमुच्यते-
भाषाटीकासमेतम् । ( ३६३ ) सो सर्वथा मूल उखडनेसेही हम नष्ट हुए । यह अच्छा कहा है- मित्ररूपा हि रिपवः सम्भाव्यन्ते विचक्षणैः । ये हितं वाक्यमुत्सृज्य विपरीतोपसेविनः ॥ २०७ ॥ जो मनुष्य हित वाक्य छोडकर विपरीत सेवन करते हैं चतुर पुरुषों द्वारा वे यथार्थमें बंधुरूपधारी शत्रु माने जाते हैं ॥ २०७ ॥ तथाच- और देखो- सन्तोऽप्यर्था विनश्यन्ति देशकालविरोधिनः । अप्राज्ञान्मन्त्रिणः प्राप्य तमः सूर्योदये यथा ॥२०८॥” देश कालके विरुद्ध आचरण करनेवालोंके प्रज्ञारहित मत्रियोंको प्राप्त होकर विद्यमान वस्तु भी ऐसे नष्ट होती हैं जैसे सूर्योदयमें अंधकार ॥२०८॥” ततः तद्वचोऽनादृत्य सर्वे ते स्थिरजीविनमुत्क्षिप्य स्वदुर्ग- मानेतुमारब्धाः । अथ आनीयमानः स्थिरजीवी आह- “देव ! अद्य अकिञ्चित्करेण एतदवस्थेन किं मया उपसंगृ- हीतेन यत्कारणमिच्छामि दीप्तं वह्निमनुवेष्टुं तत् अर्हसि मामग्निप्रदानेन समुद्धर्तुम्” । अथ रक्ताक्षः तस्य अन्तर्गत- भावं ज्ञात्वा अब्रवीत्- “किमर्थमग्निपतनमिच्छसि” । सोऽ- ब्रवीत्,- “अहं तावद् युष्मदर्थे इमामापदं मेघवर्णेन प्रापितः । तदिच्छामि तेषां वैरयातनाथमुलूकताम्” इति । तच्च श्रुत्वा राजनीतिकुशलो रक्ताक्षः प्राह- “भद्र ! कुटि- लस्त्वं कृतकवचनचतुरश्च । तत् त्वमुलूकयोनिगतोऽपि स्वकीयामेव वायसयोनिं बहुमन्यसे । श्रूयते च एतदा- ख्यानकम्- तब उसके वचनोंको अनादर करके सबही स्थिरजीवीको उठाकर अपने दुर्गमें लेजाने लगे । तब लेजाया हुआ स्थिरजीवी बोला-“देव ! अब कुछ भी करनेमें असमर्थ मेरे ग्रहण करनेसे क्या है । इस कारणसे अब मैं प्रदीप्त अग्निमें प्रवेशकी इच्छा करता हूं । सो मुझे अग्नि प्रदानसे उद्धार करनेको आप योग्य हो” । तब रक्ताक्ष उसके अन्तर्गत भावको जानकर बोला-“क्यों
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( ३६४ ) पञ्चतन्त्रम् । अग्निपतनकी इच्छा करता है ?" । वह बोला-“मेरी तो तुम्हारे निमित्त मेघ- वर्णने यह आपत्ति की । सो मैं उससे वैर निकालनेको उलूकत्वकी इच्छा करता हूं" । यह सुन राजनीतिमें चतुर रक्ताक्ष बोला,-"भद्र ! तुम कुटिल और बनावटी वचन कहनेमें चतुर हो । जो तू उलूक योनिमें प्राप्त हुआ भी अपनी वायस योनिकोही बहुत मानेगा । इसमें यह आख्यान सुना जाता है- सूर्य्यं भर्तारमुत्सृज्य पर्जन्यं मारुतं गिरिम् । स्वजातिं मूषिका प्राप्ता स्वजातिर्दुरतिक्रमा ॥ २०९ ॥” मूषिका सूर्य मेघ वायु पर्वत भर्ताको छोड़ त्यागनेके अयोग्य अपनी जाति- को प्राप्त हुई ( जातिक स्वभाव अतिक्रम नहीं हो सकता ) ॥ २०९ ॥ ” मन्त्रिणः प्रोचुः,-“कथमेतत् ?” रक्ताक्षः कथयति- मंत्री बोले-"यह कैसी कथा है ?" रक्ताक्ष कहने लगा- कथा १२. अस्ति विषमशिलातलस्खलिताम्बुनिर्घोषश्रवणसन्त्रस्त- मत्स्यपरिवर्तनसञ्जनितश्वेतफेनशबलतरङ्गाया गङ्गायाः तटे जपनियमतपःस्वाध्यायोपवासयोगक्रियानुष्ठानपरायणैः प- रिपूतपरिमितजलजिघृक्षुभिः कन्दमूलफलशैवलाभ्यवहार- कदर्थितशरीरैः वल्कलकृतकौपीनमात्रप्रच्छादनैः तपस्विभिः आकीर्णमाश्रमपदम् । तत्र याज्ञवल्क्यो नाम कुलपतिः आसीत् । तस्य जाह्नव्यां स्नात्वा उपस्प्रष्टुमारब्धस्य करतले श्येनमुखात् परिभ्रष्टा मूषिका पतिता । तां दृष्ट्वा न्यग्रोधपत्रे- ऽवस्थाप्य, पुनः स्नात्वा उपस्पृश्य च, प्रायश्चित्तादिक्रियां कृत्वा च, मूषिकां तां स्वतपोबलेन कन्यकां कृत्वा समादाय स्वाश्रमं आनिनाय । अनपत्याञ्च जायामाह,-“भद्रे ! गृह्य- तामियं तव दुहितोत्पन्ना प्रयत्नेन संवर्द्धनीया"इतिततः तया संवर्द्धिता लालिता पालिता च यावत् द्वादशवर्षा संजाता । अथ विवाहयोग्यां तां दृष्ट्वा भर्त्तारमेव जाया उवाच,-“भो भर्त्तः ! किमिदं न अवबुध्यसे यथा अस्याः स्वदुहितुर्विवाह- समयातिक्रमो भवति” असौ आह- । " साधु उक्तम् । उक्तञ्च-
भाषाटीकासमेतम् । ( ३६५ )
ऊंचे नीचे शिलातलमें गिरनेके जलसे शब्दायमान, उसके श्रवणमात्रसे व्याकुल मत्स्योंके कूदने आदिसे प्रगट श्वेतफेनसे मिश्रित तरंगवाली गंगाके तटमें जप नियम तप स्वाध्याय व्रत योग क्रिया अनुष्ठानमें परायण विशुद्ध अल्प जलोंके ग्रहणकी इच्छावाले कन्द मूल फल शैवल (सिवार) के भक्षण से क्लेशित शरीरवाले वल्कल (वृक्षकी छाल) की बनाई कौपीन मात्रसे शरीर ढकनेवाले तपस्वियोंसे युक्त आश्रम (तपोवन) स्थान है । वहां याज्ञवल्क्यनाम कुलपति (तपस्वियोंके स्वामी) रहते थे । उनके गंगाजीमें स्नानकर आचमन करनेको आरम्भ करते हुए हाथमें श्येनके मुखसे गिरी एक मूषिका आपडी । उसे देख वटपत्रमें रखकर फिर स्नान आचमन कर (अपवित्र स्पर्शसे उत्पन्न हुई) प्रायश्चित्त क्रियाको कर, उस मूषिकाको अपने तपोबलसे कन्या बनाय अपने आश्रममे लेआये । और सन्तान रहित अपनी स्त्रीसे बोले—"भद्रे ? ग्रहण करो यह तुम्हारी पुत्री उत्पन्न हुई है यत्नसे इसे बढाओ " । तब उससे बढाई लालन पालन की हुई वह जब बारह वर्षकी हुई तब विवाहके योग्य उसको देखकर वह जाया स्वामीसे बोली—"भो स्वामिन् ! आप क्या नहीं जानते ? कि यह इस कन्याके विवाहका समय बीतता है। यह (याज्ञवल्क्य) बोले—"तुमने सत्य कहा । काहाभी है— स्त्रियः पूर्वं सुरैर्भुक्ताः सोमगन्धर्ववह्निभिः । भुञ्जते मानुषाः पश्चात्तस्माद्दोषो न विद्यते ॥ २१० ॥ पहले स्त्रियें देवतोंसे भोगी जाती हैं, जो सोम गधर्व और अग्नि नामवाले देवता हैं, पीछे मनुष्य भोगते हैं इस कारण दोष नहीं है ( १ ) ॥ २१० ॥ सोमस्तासां ददौ शौचं गन्धर्वाः शिक्षितां गिरम् । पावकः सर्वमेध्यत्वं तस्मान्निष्कल्मषाः स्त्रियः ॥ २११ ॥ चन्द्रमाने उनको भोगमें पवित्रता, गन्धर्वोंने शिक्षित वाणी और अग्निने सर्वाङ्गमें उनको पवित्रता दीहै, इस कारण स्त्रियें पापरहित हैं ॥ २११ ॥ असम्प्राप्तरजा गौरी प्राप्ते रजसि रोहिणी । अव्यञ्जना भवेत्कन्या कुचहीना च नग्निका ॥ २१२ ॥ १ हमारा बनाया दयानन्द तिमिरभास्कर देखो ।
( ३६६ ) पञ्चतन्त्रम् ।
( ३६६ ) पञ्चतन्त्रम् । जिसके रज प्राप्त नहो वह गौरी, रज प्राप्त होनेमें रोहिणी जबतक चिन्ह प्रगट न हुएहों वह कन्या, कुच उदय न होनेतक नग्निका कहाती है ॥२१२॥ व्यञ्जनैस्तु समुत्पन्नैः सोमो भुंक्ते हि कन्यकाम् । पयोधराभ्यां गन्धर्वा रजस्याग्निः प्रतिष्ठितः ॥ २१३ ॥ चिन्होंके उत्पन्न होनेपर चन्द्रमा कन्याको भोगता है पयोधर होनेपर गंधर्व और रज उत्पन्न होने पर अग्नि उसको भोगता है ॥ २१३ ॥ तस्माद्विवाहयेत्कन्यां यावन्नर्तुमती भवेत् । विवाहश्चाष्टवर्षायाः कन्यायास्तु प्रशस्यते ॥ २१४ ॥ इस कारण जबतक ऋतुमती नहो तबतक कन्याको विवाह दे आठ वर्षकी कन्याका विवाह करना अच्छा है ॥ २१४ ॥ व्यञ्जनं हन्ति वै पूर्वं परं चैव पयोधरौ । रतिरिष्टांस्तथा लोकान्हन्याच्च पितरं रजः ॥ २१५ ॥ स्त्रीचिन्ह प्रगट होनेपर पूर्व पुण्यको नाशते हैं, स्तनप्राप्तिपरभी विवाह न होने पर परत्र लभ्य पुण्यका नाश होता है सुरत योग्य होनेसे स्वर्गादिलोंकोंको और रजोवती होनेसे पितरोंको नरकमे डालती है स्त्री व्यंजन (चिन्ह) से पह- लेही कन्यादान करना चाहिये ॥ २१५ ॥ ऋतुमत्यां तु तिष्ठन्त्यां स्वेच्छादानं विधीयते । तस्मादुद्वाहयेन्नग्नां मनुः स्वायम्भुवोऽब्रवीत् ॥ २१६ ॥ ऋतुमती कन्याके होनेमें कन्याकी अनुमतिसे दान करे इस कारण नग्ना (रजो- रहित) कन्याको विवाह करे ऐसा स्वायंभुमनुने कहा है ॥ २१६ ॥ पितृवेश्मनि या कन्या रजः पश्यत्यसंस्कृता । अविवाह्या तु सा कन्या जघन्या वृषली स्मृता ॥ २१७ ॥ जो कन्या पिताके घर बिनाविवाहित हुई रज दर्शन करती है वह कन्या विवाहके अयोग्य शूद्रावत् होती है ॥ २१७ ॥ श्रेष्ठेभ्यः सदृशेभ्यश्च जघन्येभ्यो रजस्वला । पित्रा देया विनिश्चित्य यतो दोषो न विद्यते ॥ २१८ ॥ रजस्वला कन्या जिस प्रकार दोष नहो सो विचार कर श्रेष्ठ सदृश और अध- मोंमें ( नहीं ) जो श्रेष्ठ हों उनको देनी चाहिये (१) ॥ २१८ ॥ १ एक नव युवकाभ्यासी वृथा उपाधि धारीने ऐसे श्लोकोंका आशय और तत्व न जानकर वृथाही जल्पना प्रकाशकी है सो त्याज्य है ।
भाषाटीकासमेतम् । ( ३६७ ) अतोऽहमेनां सदृशाय प्रयच्छामि न अन्यस्मै । उक्तञ्च- सो मैं इसको समानके लिये दूंगा न और किसीको । कहा है- ययोरेव समं वित्तं ययोरेव समं कुलम् । तयोर्विवाहः सख्यं च न तु पुष्टविपुष्टयोः ॥ २१९ ॥ जिन दोनोंका समान धन और जिन दोनोंका समान कुलहो उन्हींका विवाह और मित्रभाव होना चाहिये धनी निर्धनीका नहीं ॥ २१९ ॥ तथाच- और देखो- कुलञ्च शीलञ्च सनाथता च विद्या च वित्तञ्च वपुर्वयश्च । एतान्गुणान्सप्त विचिन्त्य देया कन्या बुधैः शेषमचिन्तनीयम् ॥ २२० ॥ कुल, शील ( चरित्र ), सनाथता ( सहाय ), विद्या, धन, शरीर, अवस्था यह सात गुण विचार कर बुद्धिमान्को कन्या देनी चाहिये इसके उपरान्त भवि- तव्यका विचार न करे ॥ २२० ॥ तत् यदि अस्या रोचते तदा भगवन्तमादित्यमाहूय तस्मै प्रयच्छामि" । सा प्राह,-"इह को दोषः ? क्रियतामे- तत्" । अथ मुनिना रविराहूतः । वेदमन्त्रामन्त्रणप्रभावात् तत्क्षणादेवाभ्युपगम्यादित्यः प्रोवाच,-"भगवन् ! किमहमा- हूतः ?" सोऽब्रवीत्,-" एषा मदीया कन्यका तिष्ठति । यदि एषा त्वां वृणोति तर्हि उद्वहस्व" इति । एवमुक्ता स्वदुहितर- मुवाच,-"पुत्रि ! किं तव रोचते एष भगवान् त्रैलोक्यदीपको भानुः ?" पुत्रिका अब्रवीत्,-"तात ! अतिदहनात्माकोऽयं न अहमेनमभिलषामि । तस्मात् अन्यः प्रकृष्टतरः कश्चित आहूयताम्" । अथ तस्याः तद्वचनं श्रुत्वा मुनिः भास्कर- मुवाच,-"भगवन् ! त्वत्तोऽधिकोऽस्ति कश्चित् ?" भास्करः प्राह,-"अस्ति मत्तोऽपि अधिको मेघो येन आच्छादितोऽ-
( ३६८ ) पञ्चतन्त्रम् ।
( ३६८ ) पञ्चतन्त्रम् । हमदृश्यो भवामि" । अथ मुनिना मेघमपि आहूय कन्या अभिहिता,-"पुत्रिके ! अस्मै त्वां प्रयच्छामि?"। सा प्राह,- "कृष्णवर्णोऽयं जड़ात्मा च । तदस्मात् अन्यस्य प्रधानस्य कस्यचित् मां प्रयच्छ" । अथ मुनिना मेघोऽपि पृष्टः-"भो भो मेघ ! त्वत्तोऽपि अधिकोऽस्ति कश्चित् ?" मेघेनोक्तं, "मत्तो- ऽपि अधिकोऽस्ति वायुः । वायुना हतोऽहं सहस्रधा यामि" । तच्छ्रुत्वा मुनिना वायुराहूतः । आह च,-"पुत्रिके ! किमेष वायुस्ते विवाहाय उत्तमः प्रतिभाति ?" सा अब्र- वीत्-"तात ! अतिचपलोऽयं तदस्मादपि अधिकः कश्चित् आनीयताम्" । मुनिराह,-"वायो ! त्वत्तोऽपि अधिकोऽ- स्ति कश्चित् ?" पवनेन उक्तं,-"मत्तोऽपि अधिकोऽस्ति पर्वतो येन संस्तभ्य बलवानपि अहं ध्रिये" । अथ मुनिः पर्वतमाहूय कन्यामुवाच-"पुत्रिके ! त्वामस्मै प्रयच्छामि?"। सा प्राह,-"तात ! कठिनात्मकोऽयं स्तब्धश्च । तत् अन्यस्मै देहि मां"। मुनिना पर्वतः पृष्टः-"भोः पर्वतराज ! त्वत्तोऽपि अधिकोऽस्ति कश्चित् " । गिरिणा उक्तम्-"मत्तोऽपि अधिकाः सन्ति मूषिका ये मच्छरीरं बलात् विदारयन्ति"। ततो मुनिः मूषिकमाहूय तस्या अदर्शयत् । आह च-- "पुत्रिके ! त्वामस्मै प्रयच्छामि किमेष प्रतिभाति ते मूषिक- राजः ?" । सापि तं दृष्ट्वा स्वजातीय एष इति मन्यमाना पुलकोद्भूषितशरीरोवाच-"तात ! मां मूषिकां कृत्वा अस्मै प्रयच्छ । येन स्वजातिविहितं गृहधर्मम् अनुतिष्ठामि" । ततः सोऽपि स्वतपोबलेन तां मूषिकां कृत्वा तस्मै प्रादात् । अतोऽहं ब्रवीमि-- सो यदि इसको अच्छा लगे तो भगवान् सूर्यको बुलाकर उन्हें प्रदान करूं" । वह बोली- "इसमें क्या दोष है। यही करो" तब मुनिराजने सूर्यको बुलाया । वेदमंत्रके उच्चारणप्रभावसे उसी क्षणमें सूर्य आकर बोले- "भगवन्, मुझे क्यों बुलाया है ?" । वह बोले-"यह मेरी कन्या है । जो यह तुमको वरण करे तो
[Header] भाषाटीकासमेतम् । ( ३६९ )
इसके संग विवाह करो”। ऐसा कह अपनी कन्यासे बोले-“पुत्रि ! क्या यह त्रिलोकीके प्रकाशक भगवान् सूर्य तुमको रुचते हैं?” । पुत्रिका बोली-“पित.! यह अधिक प्रज्वलित है। मैं इनकी अभिलाषा नहीं करती । सो इनसे अधिक उत्कृष्ट कोई बुलाओ” तब उसके यह वचन सुन मुनि सूर्यसे बोले-“भगवन् ! कोई तुमसे भी अधिक शक्तिमान् है ?” सूर्य बोले-“मुझसे भी अधिक मेघ है जिससे ढक कर मैं अदृश्य होता हूं ” । तब मुनिने मेघदेवताको बुलाकर कन्यासे कहा-“पुत्रिके ! इसके निमित्त तुझे दू ?” । वह बोली । “-यह कृष्णवर्ण जडात्मा है । सो इससे अधिक किसी प्रधानके निमित्त मुझे दो” । -तब मुनिने मेघसे पूछा-“भो मेघ ! तुझसे भी अधिक कोई है ?”। मेघने कहा मुझसे भी अधिक वायुहै वायुसे हत हुआ मैं सहस्रधा हो जाता हूं”। यह सुनकर मुनिने वायुको बुलाया । बोले भी-“पुत्रिके ! क्या यह वायु विवाहके निमित्त तुझे अच्छा लगता है ?” वह बोली-“तात ! यह अधिक चपल है । सो इससे अधिक कोई और बुलाओ”। मुनिने कहा-“वायो ! क्या कोई तुमसे भी अधिक है ?”। वायुने कहा-“मुझसे अधिक पर्वत है जिससे निश्चल होकर बल- वान् भी मैं धारित होता हूं” । तब मुनि पर्वतको बुलाकर कन्यासे बोले- “पुत्रिके ! तुमको इसके निमित्त दू ?” । वह बोली-“तात ! यह कठिनात्मा और निश्चल है, सो और किसीके निमित्त मुझे दो” । मुनिने पर्वतसे पूछा,- “भो पर्वतराज ! कोई तुमसे भी अधिक है ?”। पर्वतने कहा-“मुझसे अधिक मूषे हैं जो मेरे शरीरको बलसे विदीर्ण करते हैं”। तब मुनिने मुषकराजको बुलाय उसे दिखाया और बोले-“पुत्रिके ! क्या इसके निमित्त तुझे दू यह- मूषिकराज तुझको अच्छा लगता है ?” वह भी उसको देख यह स्वजातीय है ऐसा मानकर पुलकावलीसे अलंकृत शरीरवाली उससे बोली,-“तात ! मुझे मूषिका करके इसके निमित्त दो । जिससे अपनी जातिके योग्य गृहधर्मका अनु- ष्ठान करूं” । तब वह भी अपने तपोबलसे उसे मूषिका करके उस ( मूषक- राज ) को देते भये । इससे मैं कहता हू- सूर्य्यं भर्तारमुत्सृज्य पर्जन्यं मारुतं गिरिम् । स्वजातिं मूषिका प्राप्ता स्वजातिर्दुरतिक्रमा ॥ २२१ ॥” [Footer] २४
( ३७० ) पञ्चतन्त्रम् ।
( ३७० ) पञ्चतन्त्रम् । सूर्य, मेघ, पवन, पर्वतको ( इस प्रकार ) भर्त्ता बनाना छोड़कर मूषिका अपनी जातिको प्राप्त हुई जाति अपनी नहीं छोडी जाती ॥ २२१ ॥” अथ रक्ताक्षवचनमनादृत्य तैः स्ववंशविनाशाय स स्वदु- र्गमुपनीतः । नीयमानश्च अन्तर्लीनमवहस्य स्थिरजीवी व्यचिन्तयत्- तब रक्ताक्षके वचनको अनादरकर उन्होंने अपने वंशको नाश निमित्त ही उस ( वायस मंत्री ) को अपने दुर्गमें प्राप्त किया । लेजाया हुआ भीतर बैठ हँसकर स्थिरजीवी मनमें सोचने लगा-- “हन्यतामिति येनोक्तं स्वामिनो हितवादिना । स एवैकोऽत्र सर्वेषां नीतिशास्त्रार्थतत्त्ववित् ॥ २२२ ॥ स्वामीका हित करनेवाले जिसने कहाथा कि इसे मारडालो वही एक इन सबमें नीतिशास्त्रके तत्त्वका जाननेवाला है॥ २२२ ॥ तद्यदि तस्य वचनमकरिष्यन् एते, ततो न स्वल्पोऽपि अनर्थोऽभविष्यत् एतेषाम्” । अथ दुर्गद्वारं प्राप्य अरिम- र्दनोऽब्रवीत्,-“भो ! भोः! हितैषिणोऽस्य स्थिरजीविनो यथा समीहितं स्थानं प्रयच्छत” । तच्च श्रुत्वा स्थिरजीवी व्यचि- न्तयत्, “मया तावत एतेषां वधोपायः चिन्तनीयः, स मया मध्यस्थेन न साध्यते । यतो मदीयमिङ्गितादिकं विचार- यन्तः तेऽपि सावधाना भविष्यन्ति, तद्दुर्गद्वारमधिश्रितो- ऽभिप्रेतं साधयामि” इति निश्चित्य उलूकपतिमाह,-“देव ! युक्तमिदं यत् स्वामिना प्रोक्तं परमपि नीतिज्ञस्ते अहितश्च । यद्यपि अनुरक्तः शुचिस्तथापि दुर्गमध्ये आवासो न अर्हः । तत् अहमत्र एव दुर्गद्वारस्थः प्रत्यहं भवत्पादपङ्कजरजःपवित्री- कृततनुः सेवां करिष्यामि” । तथेति प्रतिपन्ने प्रतिदिनमुलूक- पतिसेवकास्ते प्रकाममाहारं कृत्वा उलूकराजादेशात् प्रकृष्ट- मांसाहारं स्थिरजीविने प्रयच्छन्ति । अथ कतिपयैः एव अहोभिः मयूर इव स बलवान् संवृत्तः । अथ रक्ताक्षः स्थिर- जीविनं पोष्यमाणं दृष्ट्वा सविस्मयो मन्त्रिजनं राजानञ्च
भाषाटीकासमेतम् । ( ३७१) प्रत्याह-“अहो ! मूर्खोऽयं मन्त्रिजनो भवांश्च इति एवमहमव- गच्छामि । उक्तञ्च- सो यदि यह उनका वचन करते तो थोडासा भी अनर्थ इनका न होता”। तब दुर्गद्वारको प्राप्त होकर अरिमर्दन बोला-“भो ! हितकारी इस स्थिरजी- वीको जहा चाहे वहा स्थान दो”। यह सुनकर स्थिरजीवी विचारने लगा । “मुझे तो इनके वधका उपाय करना है । सो मध्यमें रहनेसे वह मुझसे सिद्ध न होगा, कारण कि यह मेरी चेष्टादिकका विचार कर सावधान हो जायगे । सो दुर्गद्वारमें स्थित होकर आपना अभिप्राय सिद्ध करू”। ऐसा विचार उलूक- पतिसे बोला-“देव युक्त ही है यह जो स्वामीने कहा है । परन्तु मैंभी नीति- शास्त्रका ज्ञाता तुम्हारा अहित हू । यद्यपि तुममे प्रीतिमान् और पवित्र हू तथापि दुर्गके मध्यमें रहना उचित नहीं । सो मैं यहा दुर्गके द्वारमें स्थित हुआही प्रतिदिन स्वामीके चरणकमलकी रजसे पवित्र शरीरवाला सेवा करूंगा”। बहुत अच्छा ऐसा कहने पर प्रतिदिन उलूकपतिके सेवक के सम्यक् आहार करके उलूक राजकी आज्ञासे प्रचुर मास भोजन स्थिरजीवीको देते । तब कितने एक दिनोंमें मयूरकी समान बलवान् हुआ । तब रक्ताक्ष स्थिरजीवीको पुष्ट देखकर विस्मयपूर्वक मन्त्रिजन और राजासे बोला-“अहो ! मन्त्रिजन और तुम सब मूर्ख हो ऐसा मैं जानता हू । कहा है- पूर्वं तावदहं मूर्खो द्वितीयः पाशबन्धकः । ततो राजा च मन्त्री च सर्वं वै मूर्खमण्डलम् ॥ २२३ ॥ पहले तो मैं मूर्ख, दूसरे पाशबंधक, फिर राजा और मंत्री सबही मूर्ख मडल है ॥ २२३ ॥” ते प्राहुः,-“कथमेतत् ?” रक्ताक्षः कथयति- वे बोले-“यह कैसी कथा ?” । रक्ताक्ष कहने लगा- कथा १३. अस्ति कस्मिंश्चित् पर्वतैकदेशे महान् वृक्षः । तत्र च सि- म्भुकनामा कोऽपि पक्षी प्रतिवसति स्म । तस्य पुरीषे सुव- र्णमुत्पद्यते । अथ कदाचित् तमुद्दिश्य व्याधः कोऽपि समा- ययौ । स च पक्षी तदग्रत एव पुरीषमुत्ससर्ज । अथ पातस-
( ३७२ ) पञ्चतन्त्रम् ।
( ३७२ ) पञ्चतन्त्रम् ।
मकालमेव तत् सुवर्णीभूतं दृष्ट्वा व्याधो विस्मयमगमत् । “अहो ! मम शिशुकालात आरभ्य शकुनिबन्धव्यसनिनः अशीतिवर्षाणि समभूवन् । न च कदाचित् अपि पक्षिपुरीषे सुवर्णं दृष्टम्” । इति विचिन्त्य तत्र वृक्षे पाशं बबन्ध । अथ असौ अपि पक्षी मूर्खस्तत्रैव विश्वस्तचित्तो यथापूर्वमुपविष्टः। तत् कालमेव पाशेन बद्धः । व्याधस्तु तं पाशादुन्मुच्य पञ्जरके संस्थाप्य निजावासं नीतवान् । अथ चिन्तयामास । “किमनेन सापायेन पक्षिणा अहं करिष्यामि, यदि कदा- चित्कोऽपि अमुमीदृशं ज्ञात्वा राज्ञे निवेदयिष्यति, तत् नूनं प्राणसंशयो मे भवेत्, अतः स्वयमेव पक्षिणं राज्ञे निवेदया- मि” । इति विचार्य तथैव अनुष्ठितवान् । अथ राजापि तं पक्षिणं दृष्ट्वा विकसितनयनवदनकमलः परां तुष्टिमुपागतः, प्राह च एवं-“हंहो ! रक्षापुरुषाः ! एनं पक्षिणं यत्नेन रक्षत अशनपानादिकं च अस्य यथेच्छं प्रयच्छत” । अथ मन्त्रिणा अभिहितम्,-“किमनेन अश्रद्धेयव्याधवचनप्रत्ययमात्रपरि- गृहीतेन अण्डजेन । किं कदाचित् पक्षिपुरीषे सुवर्णं सम्भ- वति ? तन्मुच्यतां पञ्जरबन्धनादयं पक्षी” । इति मन्त्रिवच- नात् राज्ञा मोचितोऽसौ पक्षी उन्नतद्वारतोरणे समुपविश्य सुवर्णमयीं विष्ठां विधाय, 'पूर्वं तावत् अहं मूर्ख' इति श्लोकं पठित्वा यथासुखमाकाशमार्गेण प्रायात् । अतोऽहं ब्रवीमि- किसी एक पर्वतके एक देशमें महान् वृक्ष है । वहां सिम्भुक नामक कोई पक्षी रहता था । उसकी बीटमें सुवर्ण उत्पन्न होता था । एक समय उसके उद्देश्यसे कोई व्याधा वहां आया वह पक्षी उसके सम्मुख ही पुरीष करता भया उसे सोना हुआ देख व्याधा विस्मयको प्राप्त हुआ । “अहो ! मुझे बालकपनसे लेकर पक्षि पकड़नेका कार्य करते अस्सी वर्ष बीतगये । परन्तु कभी पक्षीके पुरीषमें सुवर्ण न देखा” ऐसा विचार उस वृक्षमें पाशको बांधता हुआ । तब यह मूर्ख पक्षी विश्वस्त चित्तसे वहां पूर्वकी समान बैठा रहा । और उसी समय पाशमें बंधगया। व्याधाभी उसको पाशसे खोलकर पाँजरेमें डाल अपने घर लाया और
भाषाटीकासमेतम् । ( ३७३ ) विचार करने लगा इस विपतयुक्त पक्षीको लेकर मैं क्या करू । जो कदाचित् कोई इसको ऐसा जानकर राजासे निवेदन करे तो अवश्यही मेरा प्राण सदेह उप- स्थित होगा । इससे स्वयही पक्षीको राजाके पास लेजाकर निवेदन करू" । ऐसा विचार कर वही करता हुआ । राजाभी उस पक्षीको देख खिले नयन- कमल मुखवाला परमसतोषको प्राप्त हुआ बोला, भी- "अहो रक्षा पुरुषो ! इस पक्षीको यत्नसे रक्षा करो भोजनपानादिक इसको यथेच्छ दो" । तब मंत्रीने कहा- "यह विश्वासके अयोग्य व्याधके वचनसे इस पक्षीको ग्रहण करनेसे क्या है । क्या कहीं पक्षीके पुरीषमें सुवर्ण हो सक्ता है? सो पंजरके बधनसे इस पक्षीको छोडदे" । इस प्रकार मंत्रीके वचनसे छोडा हुआ यह पक्षी ऊंची द्वारकी तोरण पर बैठकर सुवर्णमयी बीट करके " पहले मैं मूर्ख " इस श्लोकको पढता हुआ यथासुख आकाशमें चलागया । इससे मैं कहताहू कि- पूर्वं तावदहं मूर्खो द्वितीयः पाशबन्धकः । ततो राजा च मन्त्री च सर्वं वै मूर्खमण्डलम् ॥ २२४ ॥ ' पहले मैं मूर्ख दूसरा पाशबंधक फिर राजा और मन्त्री सबही मूर्खका मंडल है ॥ २२४॥ " अथ ते पुनरपि प्रतिकूलदैवतया हितमपि रक्ताक्षवचन- मनादृत्य भूयस्तं प्रभूतमांसादि विविधाहारेण पोषयामासुः। अथ रक्ताक्षः स्ववर्गमाहूय रहः प्रोवाच,-"अहो ! एतावदेव अस्मद् भूपतेः कुशलं दुर्गञ्च । तदुपदिष्टं मया यत् कुलक्रमा- गतः सचिवोऽभिधत्ते । तद्द्यमन्यत् पर्वतदुर्गं सम्प्रति समाश्र- यामः । उक्तञ्च यतः- वे फिरभी प्रतिकूल दैवत होनेसे रक्ताक्षके वचन अनादर करके फिर भी उसको अनेक मासके आहारसे पुष्ट करते हुए । तब रक्ताक्ष अपने ओरके (उल्लूकों) को बुलाकर एकान्तमें बोला,- "अहो ! यहींतक हमारे राजाकी कुशल और दुर्गकी स्थितिहै । वह उपदेश दिया जो कुल क्रमसे आय हुआ मत्री उपदेश करता है । सो इस समय हम दूसरे पर्वत दुर्ग का आश्रय करेंगे कहा है कि-
( ३७४ ) पञ्चतन्त्रम् ।
( ३७४ ) पञ्चतन्त्रम् । अनागतं यः कुरुते स शोभते स शोच्यते यो न करोत्यनागतम् । वनेऽत्र संस्थस्य समागता जरा बिलस्य वाणी न कदापि मे श्रुता ॥ २२५ ॥ " नहीं उपस्थित हुई ( भावि ) विपदका प्रतिकार जो करता है वह शोभित होता है और जो न आई विपतका प्रतिकार नहीं करता वह कष्ट पाता है इस वनमें रहते २ मैं बूढा होगया परन्तु बिलकी वाणी कभी मैंने न सुनी ॥ २२५ ॥" ते प्रोचुः-,"कथमेतत् ?" रक्ताक्षः कथयति- वे बोले- "यह कैसे ?" रक्ताक्ष कहने लगा- कथा १४. कस्मिंश्चित् वनोद्देशे खरनखरो नाम सिंहः प्रतिवसति स्म। स कदाचित् इतश्चतश्च परिभ्रमन् क्षुत्क्षामकण्ठो न किञ्चिदपि सत्त्वं आससाद । ततश्च अस्तमनसमये महतीं गिरिगुहां आसाद्य प्रविष्टः चिन्तयामास । "नूनं एतस्यां गुहायां रात्रौ केनापि सत्त्वेन आगन्तव्यम् । तत् निभृतो भूत्वा तिष्ठामि" । एतस्मिन्नन्तरे तत्स्वामी दधिपुच्छो नाम शृगालः समायातः, स च यावत् पश्यति, तावत् सिंहपदप- द्धतिर्गुहायां प्रविष्टा न च निष्क्रमणं गता । ततश्च अचिन्त- यत्, "अहो ! विनष्टोऽस्मि । नूनमस्यामन्तर्गतेन सिंहेन भाव्यम् । तत् किं करोमि ? कथं ज्ञास्यामि ?" एवं विचिन्त्य द्वारस्थः फूत्कर्तुमारब्धः- "अहो बिल ! अहो बिल !" इत्युक्त्वा तूष्णीम्भूय भूयोऽपि तथा एव प्रत्यभाषत, - "भोः ! किं न स्मरसि यत् मया त्वया सह समयः कृतोऽस्ति । यत् मया बाह्यात् समागतेन त्वं वक्तव्यः। त्वया च अहमाकार- णीय इति । तद् यदि मां न आह्वयसि ततोऽहं द्वितीयं बिलं यास्यामि"। अथ तच्छ्रुत्वा सिंहः चिन्तितवान् "नूनं एषा
भाषाटीकासमेतम् । ( ३७५ ) गुहा अस्य समागतस्य सदा समाह्वानं करोति । परं अद्य मद्भयात् न किञ्चिद् ब्रूते । अथवा साधु इदमुच्यते- किसी एक वनके निकट तीक्ष्ण नखवाला सिंह रहताथा । वह कदाचित् इधर उधर घूमता क्षुधासे शुष्ककंठ किसी जीवको भी प्राप्त न करता हुआ । तब सूर्यास्तके समयमें बडी गिरिगुहाको प्राप्त हो उसमें प्रवेश कर विचारने लगा । “अवश्य इस गुहामें रात्रीके समय कोई जीव आवेगा । सो निस्तब्ध होकर बैठू” । इसी समय उसका स्वामी दधिपुच्छ (दहीकी समान श्वेत पूंछ- वाला) नामक शृगाल आया, वह ज्योंही देखता है त्योंही सिंहके पगचिन्ह गुहामें प्रवेश कर गये हैं नकि निकलेके । तब विचारने लगा । “अहो मैं नष्ट हुआ । अवश्यही इसके भीतर सिंह है । मो क्या करूं ? कैसे जानू ?” ऐसा विचार कर द्वारैसे पुकारने लगा “अहो बिल ! अहो बिल !” ऐसा कह मौन हो फिर भी उसी प्रकार बोला-“भो ! क्या भूलगई जो मेरे साथ तैने प्रतिज्ञा की थी । जो कि मैं बाहरसे आकर तुझको पुकारा करूंगा । तब तू मुझे बुलाया करना । सो यदि मुझको नहीं बुलाती है तो मैं दूसरे बिलको जाताहू” । यह सुनकर सिंह विचारने लगा “अवश्य यह गुहा इसके आनेपर सदा बुलाया करती है परन्तु आज मेरे भयसे कुछ नहीं बोलती । अथवा अच्छा कहा है- भयसन्त्रस्तमनसां हस्तपादादिकाः क्रियाः । प्रवर्त्तन्ते न वाणी च वेपथुश्चाधिको भवेत् ॥ २२६ ॥ भयसे व्याकुल मनवालोंकी हस्त पादादिक क्रिया तथा वाणी प्रवृत्त नहीं होती और कंप अधिक होता है ॥ २२६ ॥ तत् अहमस्य आह्वानं करोमि येन तदनुसारेण प्रविष्टोऽयं मे भोज्यतां यास्यति । एवं सम्प्रधार्य्य सिंहः तस्याह्वानम- करोत् । अत्र सिंहशब्देन सा गुहा प्रतिरवसम्पूर्णा अन्यान् अपि दूरस्थान् अरण्यजीवान् त्रासयामास । शृगालोऽपि पलायमान इमं श्लोकमपठत्- सो मैं इसको पुकारूं । जिससे यह उसका-अनुसरण कर इसमें प्रवेश कर मेरे भोजनको प्राप्त होगा । सो ऐसा विचार कर सिंहने उसका आह्वान किया ।
( ३७६ ) पञ्चतन्त्रम् ।
( ३७६ ) पञ्चतन्त्रम् । तब सिंहके शब्द और उसकी प्रतिध्वनिसे वह गुहा पूर्ण होकर अन्य भी वनके स्थित जीवोको त्रास देती हुई। शृगाल भी यह श्लोक पढता भागा- अनागतं यः कुरुते स शोभते स शोच्यते यो न करोत्यनागतम्। वनेऽत्र संस्थस्य समागता जरा बिलस्य वाणी न कदापि मे श्रुता ॥ २२७ ॥" कि जो अनागत विपत्तिका उपाय करता है वह सुखी होता है जो अना- गतका विचारही नहीं करता वह कष्ट पाता है, इसी वनमें रहते मैं बूढा होगया परन्तु बिलकी वाणी मैंने कभी नहीं सुनी ॥ २२७ ॥” तदेवं मत्वा युष्माभिर्मया सह गन्तव्यम्"इति। एवमभि- धाय आत्मानुयायिपरिवारानुगतो दूरदेशान्तरं रक्ताक्षो जगाम । सो ऐसा विचार कर तुमको मेरे साथ चलना चाहिये" ऐसा कह अपने अनुगामी परिवारके साथ रक्ताक्ष दूर देशको चलगया । अथ रक्ताक्षे गते स्थिरजीवी अतिहृष्टमनाः व्यचिन्तयत, "अहो ! कल्याणमस्माकमुपस्थितं यत् रक्ताक्षो गतः। यतः स दीर्घदर्शी, एते च मूढमनसः ततो मम सुखघातयाः सञ्जा- ताः। उक्तञ्च यतः- रक्ताक्षके जानेपर स्थिरजीवी प्रसन्न हो विचारने लगा "अहो ! कल्याण उपस्थित हुआ है जो रक्ताक्ष गया । जो कि वह दीर्घदर्शी है और यह मूढ मनवाले हैं सो मेरे सुखसे घातके निमित्त हुए हैं। कहाहै कि- न दीर्घदर्शिनो यस्य मन्त्रिणः स्युर्महीपतेः । क्रमायाता ध्रुवं तस्य न चिरात्स्यात्परिक्षयः ॥ २२८ ॥ जिस राजाके यहां दीर्घदर्शी मंत्री नहीं होते हैं और वंशक्रमके नहीं हैं उसका शीघ्रही विनाश हो जाता है ॥ २२८ ॥ अथवा साधु इदमुच्यते- अथवा यह अच्छा कहा है-