शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)
Shukra Niti of Shukracharya Hindi
महर्षि शुक्राचार्य द्वारा
स्रोत: Shukra Niti with Vidyodini Sanskrit-Hindi Commentary (उद्गम)
तृतीयोऽध्यायः १७१
तृतीयोऽध्यायः १७१
रक्षितारं मृगयते भीतश्छिद्रं तु दुर्जनः।
योग्य कुलवधू स्त्री पति को, कुलटा स्त्री-जार (परस्त्रीगामी उपपति) को, रोगी वैद्य को, दूकानदार-महंगाई को, याचक-दानशील को, भयभीत पुरुष रक्षा करनेवाले को और दुर्जन छिद्र (दोष या बुराई करने के अवसर) को सदा ढूँढ़ता रहता है।
चण्डायते विवदते स्वपित्यश्नाति मादकम् ॥ २७१ ॥ करोति निष्फलं कर्म मूर्खो वा स्वेष्टनाशनम् ।
**मूर्ख जनों के कृत्य—**मूर्खजन कभी अत्यन्त क्रोधी के समान आचरण करता है, कभी झगड़ा करता है, कभी अधिक सोता है, कभी मादक (भांग-शराब आदि) द्रव्य भक्षण करता है, कभी कार्य को निष्फल और कभी अपना इष्ट कार्य या वस्तु को नष्ट कर देता है।
तमोगुणाधिकं क्षात्रं ब्राह्मं सत्त्वगुणाधिकम् ॥ २७२ ॥ अन्यद्रजोधिकं तेजस्तेषु सत्त्वाधिकं वरम् ।
**सत्त्वगुणी तेज की सर्वाधिक श्रेष्ठता का निर्देश—**क्षत्रियोँ का तेज अधिक तमोगुणी, ब्राह्मणों का तेज अधिक सत्त्वगुणी, इससे अन्य वैश्यों का तेज अधिक रजोगुणी होता है। इन सबों में अधिक सत्त्वगुणी तेज ही श्रेष्ठ होता है।
सर्वाधिको ब्राह्मणस्तु जायते हि स्वकर्मणा ॥ २७३ ॥ तत्तेजसोऽनुतेजांसि सन्ति च क्षत्रियादिषु ।
**स्वकर्म से ब्राह्मण की सर्वाधिक महत्ता का निर्देश—**और इन सबों में ब्राह्मण ही अपने अध्ययन-अध्यापनादि ६ कर्मों के द्वारा सबसे अधिक श्रेष्ठ होता है। क्षत्रियादि अन्य वर्णों में जो तेज हैं वे ब्राह्मण के तेज से हीन (न्यून) हैं।
स्वधर्मस्थं ब्राह्मणं हि दृष्ट्वा बिभ्यति चेतरे ॥ २७४ ॥ क्षत्रियादिर्नान्यथा स्वधर्मं चातः समाचरेत् ।
**स्वधर्मस्थ ब्राह्मण से क्षत्रियादि के डरने का निर्देश—**ब्राह्मण को अपने धर्म में स्थित देखकर अन्य क्षत्रियादि जाति के लोग उससे डरते हैं अन्यथा (अपने धर्म से च्युत रहने पर) नहीं डरते हैं। अतः ब्राह्मण को अपने धर्म का आचरण करना चाहिये।
न स्यात् स्वधर्महानिस्तु यथा वृत्त्या च सा वरा ॥ २७५ ॥ स देशः प्रवरो यत्र कुटुम्बपरिपोषणम् ।
**धर्म को हानि न पहुँचानेवाली वृत्ति की श्रेष्ठता—**जिस आजीविका से अपने धर्म की हानि न हो वही आजीविका श्रेष्ठ है। जिस देश में अपने कुटुम्ब का भलीभांति पोषण हो वही देश सबसे उत्तम है।
१७२ | शुक्रनीतिः
कृषिस्तु चोत्तमा वृत्तिर्या सरिन्मातृका मता ॥ २७६ ॥
मध्यमा वैश्यवृत्तिश्च शूद्रवृत्तिस्तु चाधमा ।
कृषिवृत्ति की सर्वाधिक उत्तमता— नदी से सींची जानेवाली कृषि (खेती) उत्तम आजीविका है। वैश्यवृत्ति (व्यवसाय-गोरक्षा आदि) मध्यम आजीविका है। शूद्रवृत्ति (सेवा) अधम आजीविका है।
याच्ञाऽधमतरा वृत्तिर्ह्युत्तमा सा तपस्विषु ॥ २७० ॥
क्वचित्सेवोत्तमा वृत्तिर्धर्मशीलन्नृपस्य च ।
भिक्षा की अधमता तथा क्वचित् भिक्षा व सेवा की भी उत्तमवृत्तिता— भिक्षावृत्ति अत्यन्त अधम आजीविका है किन्तु वही तपस्वियों के लिये उत्तम है। कहीं पर धर्मशील राजा की सेवा भी उत्तम आजीविका मानी जाती है।
आध्वर्यवादिकं कर्म कृत्वा या गृह्यते भृतिः ॥ २७८ ॥
सा किं महाधनायैव वाणिज्यमल्पमेव किम् ।
आध्वर्यवादि कर्मों से महाधनी न बन सकने का निर्देश— यजुर्वेदोक्त अध्वर्यु-सम्बन्धी कर्म करके जो दक्षिणास्वरूप में वेतन लिया जाता है क्या वह महाधन की प्राप्ति के लिये पर्याप्त होता है ? अर्थात् कभी नहीं क्योंकि वह थोड़ा होता है। और वाणिज्य (व्यवसाय) भी क्या महाधन के लिये पर्याप्त होता है ? अर्थात् नहीं।
राजसेवां विना द्रव्यं विपुलं नैव जायते ॥ २७९ ॥
राजसेवाऽतिगहना बुद्धिमद्भिर्विना न सा ।
कर्तुं शक्या चेतरेण ह्यसिधारेव सा सदा ॥ २८० ॥
बिना राजसेवा के विपुल धन-प्राप्ति न होने एवं राजसेवा की अतिशय कठिनता का निर्देश— वस्तुतः बिना राजसेवा के विपुल धन की प्राप्ति नहीं होती है किन्तु राजसेवा अत्यन्त गहन (कठिन) है और बुद्धिमान को छोड़कर अन्य मूर्खजनों के द्वारा वह नहीं की जा सकती है क्योंकि वह तलवार की धार के समान तीक्ष्ण है उसपर मूर्ख लोग सदा नहीं चल सकते हैं।
व्यालग्राही यथा व्यालं मन्त्री मन्त्रबलान्नृपम् ।
करोत्यधीनं तु नृपे भयं बुद्धिमतां महत् ॥ २८१ ॥
राजाओं के साथ सर्प की भांति सतर्कता से व्यवहार करने का निर्देश— सर्प पकड़नेवाला जैसे मन्त्र के बल से सांप को अपने अधीन करता है वैसे ही मन्त्री को भी अपने मन्त्र अर्थात् मन्त्रणा (उचित सलाह) के बल से राजा को अधीन करना चाहिये इसीसे राजा को बुद्धिमानों से अधिक भय रखना चाहिये अर्थात् सतर्कता से व्यवहार करना चाहिये।
तृतीयोऽध्यायः । १७३
तृतीयोऽध्यायः । १७३
ब्राह्मं तेजो बुद्धिमत्सु क्षात्रं राज्ञि प्रतिष्ठितम् । आरादेव सदा चास्ति तिष्ठन् दूरेऽपि बुद्धिमान् ॥ २८२ ॥ बुद्धिपाशैर्बन्धयित्वा सन्ताडयति कर्षति । समीपस्थोऽपि दूरेऽस्ति ह्यप्रत्यक्षसहायवान् ॥ २८३ ॥
दूर रहते हुई भी समीपस्थ की भांति कार्य करनेवालों का निर्देश — बुद्धिमान व्यक्तियों में ब्राह्मण-सम्बन्धी तेज तथा राजा में क्षत्रिय-सम्बन्धी तेज स्थापित है। अतः बुद्धिमान लोग दूर रहते हुये भी सदा समीप में ही रहने के समान हैं। और वह बुद्धिरूपी रस्सी से राजा या शत्रु को बांधकर अच्छी तरह से उसको पीटता है और अपने पास खींच लेता है। एवं छिपकर अपने साथियों के साथ समीप में रहता हुआ दूर रहने के समान है।
नानुवाकहता बुद्धिर्व्यवहारक्षमा भवेत् । अनुवाकहता या तु न सा सर्वत्र गामिनी ॥ २८४ ॥
वेदादि के पण्डितों का विना नीतिशास्त्र के चतुर न बनने का निर्देश— अनुवाक (वेद का एक विभाग विशेष) की आलोचना करने से मारी गई बुद्धि लौकिक व्यवहार समझने में समर्थ नहीं होती है क्योंकि वह अनुवाक से मारी हुई होने से सर्वत्र घुसने वाली नहीं होती। अर्थात् वेदादि के पण्डित बिना नीतिशास्त्र के लोकव्यवहार में चतुर नहीं हो सकते हैं।
आदौ वरं निर्धनत्वं धनिकत्वमनन्तरम् । तथादौ पादगमनं यानगत्वमनन्तरम् ॥ २८५ ॥ सुखाय कल्पते नित्यं दुःखाय विपरीतकम् ।
प्रथम निर्धनतादि के बाद धनी आदि होने में सुख-प्राप्ति का निर्देश— पहले दरिद्र होना पीछे धनी होना एवं पहले पैदल चलना बाद में सवारी पर चढ़ना अच्छा होता है क्योंकि इससे सुख मिलता है और यदि इससे विपरीत हो तो दुःख होता है।
वरं हि त्वनपत्यत्वं मृतापत्यवतः सदा ॥ २८६ ॥ दुष्टयानात्पादगमो ह्यौदासीन्यं विरोधतः ।
**मृतापत्यता आदि से अनपत्यता आदि की श्रेष्ठता का निर्देश—**सन्तान होकर मर जाने की अपेक्षा निःसन्तान रहना, दुष्ट घोड़े आदि की सवारी से पैदल चलना और झगड़ा करने से तटस्थ (उदासीन) बना रहना अच्छा होता है।
वरं देशाच्छादनतश्चर्मणा पादगूहनम् ॥ २८७ ॥ ज्ञानलवदौर्विदग्ध्यादज्ञता प्रवरा मता ।
चलने-फिरने के प्रदेश को चमड़े से ढंक देने की अपेक्षा चमड़े का जूता
| .१७४ | शुक्रनीतिः |
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पावों में पहन लेना और थोड़े से ज्ञान से ही चतुर बनने से मूर्ख बनना अच्छा होता है।
परगृहनिवासाद्धरण्ये निवसनं वरम् ॥ २८८ ॥
प्रदुष्टभार्यागार्हस्थ्याद्वैद्यं वा मरणं वरम् ।
और दूसरे के गृह में निवास करने से जंगल में रहना और अत्यन्त दुष्टा स्त्री से गृहस्थी चलाने की अपेक्षा भीख मांगना यां मर जाना अच्छा है।
श्वमैथुनमृणं गर्भाधानं स्वामित्वमेव च ॥ २८९ ॥
खलसख्यमपथ्यं तु प्राक्सुखं दुःखनिर्गमम् ।
प्रथम सुखकर पश्चात् दुःखकर विषयों का निर्देश— कुत्तों का मैथुन करना, ऋण लेना, गर्भाधान होना, स्वामी बनना, दुष्टों के साथ मित्रता करना और कुपथ्य सेवन करना, ये सभी पहले सुखकर प्रतीत होते हैं पश्चात् दुःखदायी होते हैं।
कुमन्त्रिभिर्नृपो रोगी कुवैद्यैः कुनृपैः प्रजा ॥ २९० ॥
कुसन्तत्या कुलं चात्मा कुबुद्ध्या हीयतेऽनिशम् ।
कुमन्त्री आदिकों से राजादिकों के नाश का निर्देश— दुष्ट मन्त्रियों से राजा, अनाड़ी वैद्यों से रोगी, दुष्ट राजाओं से प्रजा, दुष्ट सन्तान से कुल, कुबुद्धि से आत्मा इन सबों की दिन पर दिन उत्तरोत्तर अवस्था बिगड़ती जाती है।
हस्त्यश्ववृषबालस्त्रीशुकानां शिक्षको यथा ॥ २९१ ॥
तथा भवन्ति ते नित्यं संसर्गगुणधारकाः ।
शिक्षकानुसार हस्त्यादि का सद्गुणादि के धारण करने का निर्देश— हाथी, घोड़ा, बैल, बालक, स्त्री तथा सुग्गा इन सबों के जैसे शिक्षक होते हैं उसके अनुसार ही वे संसर्गवश अच्छा या बुरा गुण धारण करनेवाले हो जाते हैं।
स्याज्ज्योऽवसरोक्त्या सद्वासनैः सुप्रसिद्धता ॥ २९२ ॥
सभायां विद्यया मानस्त्रितयं त्वधिकारतः ।
अधिकार प्राप्त होने पर स्वयं प्राप्त होनेवाली ३ बातें— उचित अवसर आने पर ही कहने या करने से किसी कार्य की सिद्धि होती है और अच्छे वस्त्रों के पहनने से लोगों के बीच में सुप्रसिद्धि एवं सभा में विद्या से मान (प्रतिष्ठा) प्राप्त होता है। किन्तु अधिकार प्राप्त होने पर (स्वामी बनने पर) उक्त ३ तीनों बातें स्वयं प्राप्त हो जाती हैं।
सुभार्या सुष्ठु चापत्यं सुविद्या सुधनं सुहृत् ॥ २९३ ॥
सुदासदास्यौ सद्देहः सद्देश्म सुन्नृपः सदा ।
गृहिणां हि सुखायालं दशैतानि न चान्यथा ॥ २९४ ॥
तृतीयोऽध्यायः
१७५
गृहस्थियों के सुखदायक विषयों का निर्देश— गुणवती सुशीला स्त्री, सुन्दर गुणवान् सन्तान, उत्तम विद्या, उत्तम धन, अच्छा मित्र, अच्छे नौकर, अच्छी नौकरानी, सुन्दर रोगरहित शरीर, सुन्दर गृह, अच्छा राजा ये १० बातें गृहस्थ पुरुषों के लिये सदा अत्यन्त सुखदायक होती हैं। इनसे विपरीत होने पर सुख के स्थान पर दुःख देनेवाली होती हैं।
वृद्धाः सुशीला विश्वस्ताः सदाचाराः स्त्रियो नराः ।
क्लीबा वाऽन्तःपुरे योग्या न युवा मित्रमप्युत ॥ २६५ ॥
अन्तःपुर में नियुक्त करने योग्य पुरुषों के लक्षण— जो स्त्री पुरुष या नपुंसक देखने में वृद्ध, सुशील, विश्वासी और सदाचारी हों उन्हीं को अन्तःपुर (रनिवास) में नियुक्त करना उचित होता है। किन्तु मित्र भी यदि युवा पुरुष हो तो उसकी नियुक्ति अन्तःपुर के लिये अनुचित होती है।
कालं नियम्य कार्याणि ह्याचरेन्नान्यथा क्वचित् ।
गवादिष्वात्मवज्ज्ञानमात्मानं चार्थधर्मयोः ॥ २६६ ॥
नियुञ्जीतान्नसंसिद्धयै मातरं शिक्षणे गुरुम् ।
समय बांधकर कार्य करने आदि का एवं अर्थ और धर्म में आत्मादि की नियुक्ति करने का निर्देश— समय बांध कर कार्य करना चाहिये, अन्यथा बिना समय बांधे कभी कार्य नहीं करना चाहिये । और गौ आदि पशुओं में भी अपने सदृश व्यवहार (पालन आदि) करना चाहिये, अर्थ और धर्म के उपार्जन में अपने को लगाना चाहिये एवं भोजन बनाने के लिये माता की तथा शिक्षा देने के लिये गुरु की नियुक्ति करनी चाहिये ।
गच्छेदनियमेनैव सदैवान्तःपुरं नरः ॥ २९७ ॥
मनुष्य को सदैव अन्तःपुर में बिना समय बांधे (एकाएक) पहुँच जाना चाहिये (ऐसा करने से दुराचार होने का भय नहीं रहता है)।
भार्याऽनपत्या सद्यानं भारवाही सुरक्षकः ।
परदुःखहरा विद्या सेवकश्च निरालसः ॥ २९८ ॥
षडेतानि सुखायालं प्रवासे तु नृणां सदा ।
प्रवास के समय में सुखदायी अनपत्य भार्यादि ६ का निर्देश— प्रवास के समय मनुष्यों को अपने साथ में बिना सन्तान की स्त्री, अच्छी सवारी, ढोनेवाला कुली, रक्षा करनेवाला सिपाही, दूसरों के दुःख को दूर करनेवाली विद्या, आलस्यरहित (फुर्तीला) नौकर ये ६ सदा अत्यन्त सुखदायक होते हैं।
मार्गं निरुध्य न स्थेयं समर्थेनापि कर्हिचित् ॥ २९९ ॥
सद्यानेनापि गच्छेन्न हट्टमार्गे नृपोऽपि च ।
१७६ | शुक्रनीतिः
**राजा को भी शान्त घोड़े आदि से भी बाजार के अन्दर न जाने का निर्देश—**सामर्थ्यशाली होकर भी कभी मार्ग रोक कर नहीं खड़ा रहना चाहिये। राजा को भी शान्त घोड़े आदि की सवारी से भी बाजार के अन्दर भीड़ में नहीं जाना चाहिये।
ससहायः सदा च स्यादध्वगो नान्यथा क्वचित् ॥ ३०० ॥
समीपसन्मार्गजलाभयग्रामेऽध्वगो वसेत् ।
तथाविधे वा विरमेन्न मार्गे विपिनेऽपि न ॥ ३०१ ॥
**पथिकों को यात्रा के समय कर्त्तव्या-कर्त्तव्य विषयों का निर्देश—**पथिक को साथी से युक्त सदा यात्रा करनी चाहिये, इससे अन्यथा अर्थात् बिना साथी के कभी नहीं यात्रा में रहना चाहिये। और उसे मार्ग के समीप जल की सुविधा से युक्त तथा किसी प्रकार के भय से रहित ग्राम में यात्रा के समय ठहरना चाहिये। भयरहित, जलयुक्त जो मार्ग न हों वहां पर एवं जंगल में विश्राम नहीं करना चाहिये।
अत्यटनं चानशनमतिमैथुनमेव च ।
अत्यायासश्च सर्वेषां द्राग्जराकरणं महत् ॥ ३०२ ॥
अत्यायासो हि विद्यासु जराकारी कलासु च ।
**शीघ्र वृद्धता लानेवाले विषयों का निर्देश—**अत्यन्त भ्रमण, उपवास, अत्यन्त मैथुन, अत्यन्त परिश्रम इन सबों के करने से सभी को शीघ्र अत्यन्त वृद्धता आ जाती है। और विद्याध्ययन तथा कलाओं के सीखने में अत्यन्त परिश्रम करना भी वृद्धावस्था ला देता है।
दुर्गुणं तु गुणीकृत्य कीर्तयेत् स प्रियो भवेत् ॥ ३०३ ॥
गुणाधिक्यं कीर्तयति यः किं स्यान्न पुनः सखा ।
**प्रिय होने के उपाय—**जो दुर्गुण को गुण बतलाकर उसका बखान करता है वह संसार का प्रिय होता है। और जो गुण को बढ़ा-चढ़ा कर प्रशंसा करता है वह क्यों न मित्र हो जाय, अर्थात् वह अवश्य मित्र हो जाता है।
दुर्गुणं वक्ति सत्येन प्रियोऽपि सोऽप्रियो भवेत् ॥ ३०४ ॥
गुणं हि दुर्गुणीकृत्य वक्ति यः स्यात्कथं प्रियः ।
**अप्रिय होने के कारणों का निर्देश—**जो सचमुच विद्यमान दुर्गुण को कहता है वह प्रिय होकर भी सुननेवाले का अप्रिय हो जाता है। और जो गुण को दुर्गुण बताकर कहता है वह भला कैसे प्रिय हो सकता है।
स्तुत्या वशं यान्ति देवा ह्यञ्जसा किं पुनर्नराः ॥ ३०५ ॥
प्रत्यक्षं दुर्गुणान्नैव वक्तुं शक्नोति कोऽप्यतः ।
**स्तुति से देवता के वशवर्ती होने का निर्देश—**जब स्तुति करने से देवता
तृतीयोऽध्यायः
१७७
भी वस्तुतः वश में हो जाते हैं तब मनुष्यों की क्या बात है ? अर्थात् मनुष्य अवश्य वश में हो जाते हैं । इसीसे कोई भी किसी के सामने उसके दुर्गुणों को नहीं कह सकता है ( क्योंकि वह जानता है कि सुननेवाला क्रुद्ध हो जायगा ) ।
स्वदुर्गुणान् स्वयं चातो विमृशेल्लोकशास्त्रतः ॥ ३०६ ॥
स्वदुर्गुणों का स्वयं विचार करने का निर्देश— अतः स्वयं अपने दुर्गुणों को लोक तथा शास्त्र से विचार करना चाहिये अर्थात् मुझमें कौन-कौन दुर्गुण हैं।
स्वदुर्गुणश्रवणतो यस्तुष्यति न क्रुध्यति ।
स्वोपहासप्रविज्ञाने यतते त्यजति श्रुते ॥ ३०७ ॥
स्वगुणश्रवणान्नित्यं समस्तिष्ठति नाधिकः ।
दुर्गुणानां खनिरहं गुणाधानं कथं मयि ॥ ३०८ ॥
मय्येव चाज्ञताऽप्यस्ति मन्यते सोऽधिकोऽखिलात् ।
स साधुस्तस्य देवा हि कलालेशं लभन्ति न ॥ ३०९ ॥
महान् पुरुष के लक्षण— जो व्यक्ति अपने दुर्गुणों के सुनने से संतोष को प्राप्त होता है और क्रुद्ध नहीं होता है बल्कि अपने उपहासकर दोषों को विशेष रूप से जानने के लिये प्रयत्न करता है । और दोषों को सुनने पर छोड़ देता है । और अपने गुणों को सुनकर नित्य समभाव में रहता है । किसी प्रकार की स्फूत्ति नहीं रखता है अर्थात् खुशी से उछलता नहीं है एवं मैं तो दुर्गुणों का खान हूं अतः मेरे में गुण कैसे आगया, क्योंकि मूर्खता तो केवल मुझमें ही है । ऐसा जो समझता है वह संपूर्ण जगत् के लोगों की अपेक्षा महान् है और वह साधु पुरुष कहलाता है एवं देवता लोग उसकी कला के एक अंश को भी प्राप्त नहीं कर सकते हैं ( फिर मनुष्यों की बात क्या है ) ॥
सदाऽल्पमप्युपकृतं महत् साधुषु जायते ।
मन्यते सर्षपादल्पं महच्छोपकृतं खलः ॥ ३१० ॥
साधु पुरुष तथा खल पुरुष के लक्षण— सज्जन पुरुष लोग सदा थोड़े भी उपकार को बड़ा समझते हैं और खल लोग बहुत बड़े भारी उपकार को भी सरसो से भी छोटा ( अतितुच्छ ) समझते हैं ।
क्षमिणं बलिनं साधुर्मन्यते दुर्जनोऽन्यथा ।
दुरुक्तमप्यतः साधोः क्षमयेद् दुर्जनस्य न ॥ ३११ ॥
साधु पुरुष क्षमाशील व्यक्ति को बलवान् और दुर्जन पुरुष इससे विपरीत अर्थात् दुर्बल समझते हैं, अतः साधु पुरुष का दुर्वचन सहना उचित है किन्तु दुर्जन का सहना उचित नहीं है ।
१२ शु०
१०८ | शुक्रनीतिः
तथा न क्रीडयेत् कैश्चित् कलहाय भवेद्यथा ।
विनोदेऽपि शपेन्नैव ते भार्या कुलटाऽस्ति किम् ॥ ३१२ ॥
**कलहकारक क्रीडा आदि करने का निषेध—**ऐसी क्रीडा अर्थात् मनो-विनोद की बात नहीं करनी चाहिये जिससे झगड़ा खड़ा हो जाय। जैसे विनोद में भी ऐसा नहीं कहना चाहिये कि—क्या तुम्हारी स्त्री कुलटा (व्यभिचारिणी) है !।
अपशब्दांश्च नो वाच्या मित्रभावाच्च केष्वपि ।
गोप्यं न गोपयेन्मित्रे तद्गोप्यं न प्रकाशयेत् ॥ ३१३ ॥
**मित्र के प्रति कर्त्तव्याकर्त्तव्य विषयों का निर्देश—**किसी व्यक्ति के लिये मित्रभाव से भी अपशब्दों (कटुवचनों) का प्रयोग करना उचित नहीं है। मित्र से गोप्य विषय को न छिपाये और उसके गोप्य विषय को कहीं प्रकाशित न करे।
बैरीभूतोऽपि पश्चात् प्राक्कथितं वापि सर्वदा ।
विज्ञातमपि यद्दौष्ट्यं दर्शयेत्तन्न कर्हिचित् ॥ ३१४ ॥
प्रतिकर्तुं यतेतैव गुप्तः कुर्यात् प्रतिक्रियाम् ।
कारणवश मित्र के बैरी बन जाने पर भी मित्रतावस्था में पहले कही हुई गुप्त बातों को एवं जाने हुये उसके दोषों को भी कहीं पर सदा प्रकाशित न करे और गुप्त होकर उसकी दुर्भावना को दूर करने का यत्न करे और दूर भी करे।
यथार्थमपि न ब्रूयाद् बलवद्विपरीतकम् ॥ ३१५ ॥
दृष्टं त्वदृष्टवत् कुर्याच्छ्रुतमप्यश्रुतं क्वचित् ।
**बलवान् के प्रति विपरीत बातें न करने का निर्देश—**बलवान् पुरुषों की विपरीत अर्थात् ग्लानिजनक कोई बातें यदि यथार्थ भी हों तो भी उन्हें उसके सामने न कहे, एवं जो देखी भी हों उन्हें अनदेखा कर दे और जो कहीं सुनी भी हों उन्हें अनसुनी कर दे।
मूकोऽन्धो बधिरः खञ्जः स्वापत्काले भवेन्नरः ॥ ३१६ ॥
अन्यथा दुःखमाप्नोति हीयते व्यवहारतः ।
**मनुष्य को आपत्ति पड़ने पर कर्त्तव्य कर्मों का निर्देश—**मनुष्य को अपने ऊपर आपत्ति आ जाने पर किसी प्रवल पुरुष की बुरी सत्य बात कहने के लिये मूक (गूंगा) बन जावे, बुराई देखने के लिये अन्धा, बुराई सुनने के लिये बहरा एवं बुराई करने के लिये दौड़-धूप करने में लंगड़ा बन जावे अर्थात् किसी भांति से बुरा लगनेवाला व्यवहार न करे, यदि ऐसा नहीं करेगा तो दुःख पायेगा और व्यवहार से गिर जायेगा।
तृतीयोऽध्यायः १७६
तृतीयोऽध्यायः १७६
वदेद् वृद्धानुकूलं यन्न बालसदृशं क्वचित् ॥ ३१७ ॥ परवेश्मगतस्तत्स्त्रीवीक्षणं न च कारयेत् ।
**वृद्धजनों के अनुकूल वचन-बोलने का एवं किसी की स्त्री को घूर कर न देखने का निर्देश—**वृद्धजनों के अनुकूल वचन बोलना चाहिये, कहीं पर बच्चों की-सी बातें नहीं करनी चाहिये । और किसी के घर में पहुँचने पर उसकी स्त्री की तरफ घूर कर नहीं देखना चाहिये (बल्कि देखकर नीची निगाह कर लेना चाहिये) ।
अधनादननुज्ञातान्न गृह्णीयात्तु स्वामिताम् ॥ ३१८ ॥ स्वशिशुं शिक्षयेदन्यशिशुं नाप्यपराधिनम् ।
**अन्य के अपराधी बालक को दण्ड न देने का निषेध—**किसी गरीब के अधीन किसी अधिकार को बिना उसकी अनुमति के प्रमुख न स्वीकार करे । अपने बच्चों का शासन करे किन्तु दूसरे के बच्चों को अपराध करने पर भी दण्ड न दे ।
अधर्मनिरतो यस्तु नीतिहीनश्चलान्तरः ॥ ३१९ ॥ संकर्षकोऽतिदण्डी तद्ग्रामं त्यक्त्वाऽन्यतो वसेत् ।
**ग्राम को छोड़कर अन्यत्र वास करने की अवस्थाओं का निर्देश—**यदि ग्राम का स्वामी अधर्म में निरत, नीति पर नहीं चलनेवाला, अव्यवस्थित चित्तवाला, धन का शोषण करनेवाला और अधिक तीक्ष्ण दण्ड देनेवाला हो तो उस (ग्राम) को छोड़कर अन्यत्र निवास करना चाहिये ।
यथार्थमपि विज्ञातमुभयोर्वादिनोर्मतम् ॥ ३२० ॥ अनियुक्तो न वै ब्रूयाद्धीनशत्रुर्भवेद्यतः ।
**बिना जज की आज्ञा के वादी-प्रतिवादी के विषय में सत्यासत्यादि बातें न कहने का निर्देश—**वादी और प्रतिवादी उन दोनों के मत को यथार्थ रूप से जान कर भी अर्थात् ‘किसका सत्य है और किसका झूठ है’ यह जानकर भी बिना राजा या जज के द्वारा नियुक्त किये स्वयं चलकर न कहे क्योंकि जो हारेगा वह शत्रु हो जायगा अतः न कहे । और इससे मनुष्य किसी का शत्रु नहीं हो सकता है ।
गृहीत्वाऽन्यविवादं तु विवदेन्नैव केनचित् ॥ ३२१ ॥ मिलित्वा सङ्घशो राजमन्त्रं नैव तु तर्कयेत् ।
**अन्य के विवाद को ग्रहण कर किसी के संग विवाद न करने का निर्देश—**दूसरे के झगड़े में पड़कर किसी के साथ झगड़ा न करे । और किसी के दल में मिलकर राजा के द्वारा की हुई किसी मन्त्रणा के विषय में तर्क-वितर्क नहीं करना चाहिये ।
१८० | शुक्रनीतिः
अज्ञातशास्त्रो न ब्रूयाज्ज्योतिषं धर्मनिर्णयम् ॥ ३२२ ॥
नीतिदण्डं चिकित्सां च प्रायश्चित्तं क्रियाफलम् ।
बिना शास्त्रज्ञान के न करने योग्य विषयों का निर्देश— बिना शास्त्र का ज्ञान प्राप्त किये हुये (मूर्ख) पुरुष को ज्योतिष, धर्म का निर्णय, दण्डनीति या नीति एवं दण्डविषयक विवरण, चिकित्सा, प्रायश्चित्त और किसी कार्य का परिणाम (नतीजा) के विषय में कुछ न करे या न कहे ।
पारतन्त्र्यात्परन्दुःखं न स्वातन्त्र्यात्परं सुखम् ॥ ३२३ ॥
अप्रवासी गृही नित्यं स्वतन्त्रः सुखमेधते ।
पारतन्त्र्य से बढ़कर दुःख और स्वतन्त्रता से बढ़कर सुख न होने का निर्देश— परतन्त्रता (पराधीनता) से बढ़कर दूसरा कोई दुःख और स्वाधीनता से बढ़कर दूसरा कोई सुख नहीं है। एवं प्रवास नहीं करनेवाला तथा स्वाधीन होकर अपने ही घर में रहनेवाला पुरुष सुख प्राप्त करता है।
नूतनप्राक्तनानां च व्यवहारविदां धिया ॥ ३२४ ॥
प्रतिक्षणं चाभिनवो व्यवहारो भवेद्यतः ।
वक्तुं न शक्यते प्रायः प्रत्यक्षादनुमानतः ॥ ३२५ ॥
उपमानेन तज्ज्ञानं भवेदाप्तोपदेशतः ।
प्रत्यक्षादि ४ प्रमाणों से व्यवहार-ज्ञान होने का निर्देश— नवीन तथा प्राचीन व्यवहार में चतुर लोगों की बुद्धि से प्रतिक्षण नये-नये व्यवहार होते रहते हैं अतः प्रायः करके उन सबों का कहना कठिन है इसीसे प्रत्यक्ष, अनुमान, उपमान तथा आप्त पुरुषों के उपदेश (शब्द प्रमाण) से उन सबों का ज्ञान प्राप्त करना चाहिये ।
कथितं तु समासेन सामान्यं नृपराष्ट्रयोः ॥ ३२६ ॥
नीतिशास्त्रं हितायालं यद्विशिष्टं नृपे स्मृतम् ।
इति शुक्रनीतौ नृपराष्ट्रसामान्यलक्षणं नाम तृतीयोऽध्यायः समाप्तः ।
इस प्रकार से संक्षेपरूप में सामान्यतः (साधारणतया) राजा तथा राष्ट्र (प्रजाजन) दोनों के सम्बन्ध में और विशेषतः केवल राजा के लिये जो नीतिशास्त्र पर्याप्त हितकारक है उसे कहा गया ।
इति शुक्रनीति में नृप-राष्ट्र-सामान्य-लक्षणनामक तृतीय अध्याय समाप्त हुआ ।
चतुर्थोऽध्यायः
चतुर्थाध्याये प्रथमं प्रकरणम् ।
अथ मिश्रप्रकरणं प्रवक्ष्यामि समासतः ।
लक्षणं सुहृदादीनां समासाच्छृणुताधुना ॥ १ ॥
अब मिश्रप्रकरण ( विविध विषयों का प्रकरण ) संक्षेप से कहता हूँ, उसमें प्रथम सुहृदादियों के लक्षण संक्षेप से इस समय तुम लोग सुनो ।
मित्रं शत्रुश्चतुर्धा स्यादुपकारापकारयोः ।
कर्ता कारयिता चानुमन्ता यश्च सहायकः ॥ २ ॥
**मित्र और शत्रु के प्रकारों का निर्देश—**मनुष्य किसी का उपकार या अपकार करने से क्रम से मित्र या शत्रु होता है जो प्रत्येक करनेवाला, करानेवाला, अनुमति देनेवाला और सहायता करनेवाला इन भेदों से ४ प्रकार का होता है ।
यस्य सुद्रवते चित्तं परदुःखेन सर्वदा ।
इष्टार्थे यततेऽन्यस्य प्रेरितः सत्करोति यः ॥ ३ ॥
आत्मस्त्रीधनगुह्यानां शरणं समये सुहृत् ।
प्रोक्तोत्तमोऽयमन्यश्च द्वित्र्येकपदमित्रकः ॥ ४ ॥
**४ पादों से युक्त उत्तम मित्र के लक्षण—**१. जिसका चित्त दूसरे (मित्र) के दुःख से सदा द्रवीभूत हो जाता है । २. और जो दूसरे (मित्र) के अभीष्ट कार्य की सिद्धि के लिये सदा यत्न करता है । ३. तथा बिना प्रेरणा किये ही स्वयं मित्र का सत्कार करता है । ४. एवं अपने ( मित्र की ) स्त्री, धन और गुह्य विषयों की समय पड़ने पर रक्षा करनेवाला होता है, इस प्रकार ४ पादों से युक्त वह मित्र 'उत्तम' कहलाता है । इससे अन्य अर्थात् योग्यतानुसार न्यून-पादवाला होने से तीन, दो तथा एक पादवाला मित्र कहलाता है । इसका भाव यह है कि—जिसका चित्त मित्र के दुःख से द्रवीभूत होता है, और जो मित्र की अभीष्ट-सिद्धि के लिये यत्न करता है एवं बिना प्रेरणा किये सत्कार करता है वह 'त्रिपदमित्रक' और जिसका चित्त मित्र के दुःख से द्रवीभूत होता है और जो अभीष्ट सिद्धि के लिये यत्न करता है वह 'द्विपदमित्रक' एवं जो केवल मित्र के दुःख से द्रवित चित्तवाला होता है वह 'एकपदमित्रक' कहलाता है ।
अनन्यस्वत्वकामत्वमेकस्मिन् विषये द्वयोः ।
वैरिलक्षणमेतद्वाऽन्येष्टनाशनकारिता ॥ ५ ॥
१८२ | शुक्रनीतिः
**बैरभाव रखनेवालों के दो लक्षणों का निर्देश—**एक वस्तु के विषय में दो व्यक्तियों का 'अपना १ स्वत्व जमाने की इच्छा रखना' अथवा 'एक दूसरे के अभीष्ट कार्य को नष्ट करना' ये दोनों लक्षण बैरभाव रखनेवालों के हैं।
भ्रातृभावेऽपि तु द्रव्यमखिलं मम वै भवेत् ।
न स्यादेतस्य वश्योऽयं ममैव स्यात् परस्परम् ॥ ६ ॥
भोक्ष्येऽखिलमहं चैतद्विनाऽन्यं स्तः सुवैरिणौ ।
द्वेष्टि द्विष्ट उभौ शत्रू स्तश्चैकतरसंज्ञकौ ॥ ७ ॥
**परम शत्रु और एकतरफा शत्रु भाइयों के लक्षण—**भाई के रहने पर भी 'पिता का सम्पूर्ण द्रव्य मेरा ही हो, इस दूसरे भाई का न हो, यह भाई मेरे ही अधीन रहे मैं इसके अधीन न रहूँ, और मैं इसको अलग रखकर अकेले समग्र वस्तु का उपभोग करूँगा' ऐसा जो परस्पर भाई लोग एक दूसरे के प्रति विचार रखते हैं, वे दोनों 'परमशत्रु' कहलाते हैं। जो केवल द्वेष करता है और जो किसी का द्वेषपात्र होता है वे दोनों 'एकतरफा शत्रु' कहलाते हैं।
शूरस्योत्थानशीलस्य बलनीतिमतः सदा ।
सर्वे मित्रा गूढवैरा नृपाः कालप्रतीक्षकाः ॥ ८ ॥
भवन्तीति किमाश्चर्यं राज्यलुब्धा न ते हि किम् ।
न राज्ञो विद्यते मित्रं राजा मित्रं न कस्य वै ॥ ९ ॥
प्रायः कृत्रिममित्रे ते भवतश्च परस्परम् ।
केचित् स्वभावतो मित्राः शत्रवः सन्ति सर्वदा ॥ १० ॥
राजाओं की परस्पर कृत्रिम-मित्रता का निर्देश—'जो राजा शूर, सदा उन्नति के लिये उद्योगशील एवं बल तथा नीति से युक्त होता है उसके सभी राजा लोग समय की प्रतीक्षा करनेवाले (मौका का इन्तजार करनेवाले) होकर गुप्त रूप से बैरभाव और ऊपर से मित्रभाव रखनेवाले होते हैं' इस पर आश्चर्य करना क्या उचित है ? अर्थात् कभी नहीं। क्योंकि क्या वे (राजा लोग) राज्य के लोभी नहीं हैं अर्थात् अवश्य हैं। इससे यह सिद्ध हुआ कि राजा का कोई मित्र नहीं होता है और राजा भी किसी के मित्र नहीं होते हैं किन्तु प्रायः वे (दोनों राजा) मतलब के लिये परस्पर कृत्रिम मित्र बने रहते हैं। और कोई स्वभावतः सदा मित्र या शत्रु ही होते हैं।
माता मातृकुलं चैव पिता तत्पितरौ तथा ।
पितृपितृव्यात्मकन्या पत्नी तत्कुलमेव च ॥ ११ ॥
पितृमात्रात्मभगिनीकन्यकासन्ततिश्च या ।
प्रजापालो गुरुश्चैव मित्राणि सहजानि हि ॥ १२ ॥
चतुर्थोऽध्याये मित्रप्रकरणम् १८३
चतुर्थोऽध्याये मित्रप्रकरणम् १८३
सहज मित्र कहलानेवालों का निर्देश—जैसे—माता, माता के कुल के लोग नाना आदि, पिता, पिता के माता-पिता (दादा-दादी), पिता के चाचा, अपनी लड़की, पत्नी, पत्नी के कुल के लोग (ससुरालवाले), पिता की बहिन (फूआ), माता की बहिन (मौसी), अपनी बहिन, कन्या की सन्तान अथवा फुआ और मौसी की लड़की-लड़के, राजा, गुरु ये सब सहज (स्वाभाविक) मित्र होते हैं।
विद्या शौर्यं च दाक्ष्यं च बलं धैर्यं च पञ्चमम्। मित्राणि सहजान्याहुर्वर्तयन्ति हि तैर्बुधाः॥१३॥
विद्यादि ५ की सहज मित्रता का निर्देश—विद्या, शूरता, चतुरता, बल तथा धीरता ये पांचों भी सहज मित्र कहलाते हैं क्योंकि पण्डित लोग इन्हीं से अपनी जीविका चलाते हैं।
पुत्रो निर्देशवर्त्ती यः स पुत्रोऽन्वर्थनामवान्। श्रेष्ठ एकस्तु गुणवान् किं शतैरपि निर्गुणैः॥१४॥
सार्थक पुत्र के लक्षण—माता-पिता के आज्ञावशवर्त्ती जो पुत्र होता है वही यथार्थ नामवाला (सार्थक) पुत्र कहलाता है। और एक गुणवान् पुत्र श्रेष्ठ होता है, सैकड़ों निर्गुण (मूर्ख) पुत्रों से क्या? अर्थात् पिता का इनसे कोई प्रयोजन सिद्ध नहीं होता है।
स्वभावतो भवन्त्येते हिंस्रो दुर्वृत्त एव च। ऋणकारी पिता शत्रुर्माता स्त्री व्यभिचारिणी॥१५॥ आत्मपितृभ्रातरश्च तत्स्त्रीपुत्राश्च शत्रवः।
स्वाभाविक शत्रु के लक्षण—स्वभावतः निम्नलिखित ये सब शत्रु होते हैं, जैसे, हिंसाशील, दुराचारी (दुष्ट), ऋण करनेवाला पिता, व्यभिचारिणी माता तथा स्त्री, अपने तथा पिता के भाई लोग (भाई-चाचा) और भाई तथा चाचा के स्त्री-और पुत्र,।
स्नुषा श्वश्रूः सपत्नी च ननान्दा यातरस्तथा॥१६॥
परस्पर शत्रु कहलानेवालों का निर्देश—पतोहू और सास, सौत-सौत, ननद-भौजाई, देवरानी-जेठानी ये सब प्रायः परस्पर शत्रु होती हैं।
मूर्खः पुत्रः कुवैद्यश्चारक्षकस्तु पतिः प्रभुः। चण्डश्चण्डा प्रजा शत्रुरदाता धनिकश्च यः॥१७॥
मूर्ख पुत्रादिकों की शत्रु संज्ञा का निर्देश—मूर्ख पुत्र, दुष्ट चिकित्सक (प' अर्थ वैद्य), नहीं रक्षा करनेवाला पति (स्वामी), अत्यन्त क्रोधी प्रभु (राजा), अत्यन्त क्रोध करनेवाली प्रजा या सन्तान, नहीं देनेवाला (कंजूस) धनी जो होता है वह शत्रु है।
१८४ | शुक्रनीतिः
दुष्टानां नृपतिः शत्रुः कुलटानां पतिव्रता ।
साधुः खलानां शत्रुः स्यान्मूर्खाणां बोधको रिपुः ॥ १८ ॥
दुष्टों के लिये राजा, कुलटाओं के लिये पतिव्रता स्त्री, दुर्जनों के लिये सज्जन और मूर्खों के लिये उपदेश देनेवाला शत्रु होता है ।
उपदेशो हि मूर्खाणां क्रोधायैव शमाय न ।
पयः पानं भुजङ्गानां विषायैवामृताय न ॥ १९ ॥
मूर्खों के लिए उपदेश देने का निषेध—क्योंकि—मूर्खों के लिये उपदेश देना केवल क्रोधजनक होता है उससे उसे शान्ति नहीं मिलती है । और सर्पों के लिये दूध पिलाना केवल विषवर्द्धक होता है उससे अमृत नहीं होता है अर्थात् विष के बदले अमृत नहीं निकलता ।
आसमन्ताच्चतुर्दिक्षु सन्निकृष्टाश्च ये नृपाः ।
तत्परास्तत्परा येऽन्ये क्रमाद्धीनबलारयः ॥ २० ॥
शत्रूदासीनमित्राणि क्रमात्ते स्युस्तु प्राकृताः ।
अरिर्मित्रमुदासीनोऽनन्तरस्तत्परः परः ॥ २१ ॥
क्रमशो वा नृपा ज्ञेयाश्चतुर्दिक्षु तथाऽरयः ।
स्वसमीपतरा भृत्या ह्यमात्याद्याश्च कीर्तिताः ॥ २२ ॥
राजाओं के स्वाभाविक शत्रु-उदासीन-मित्र राजाओं के लक्षण—राजा के राज्य के सब तरफ चारों दिशाओं में समीपवर्त्ती एवं उनके बाद पुनः उनके बाद के जो अन्य राजा लोग हैं वे क्रम से स्वाभाविक पास के शत्रु, उसके बाद के उदासीन और पुनः उसके बाद के मित्र होते हैं । और हीन बलवाले शत्रु भी पास के, उसके बाद के पुनः उसके बाद के इस क्रम से शत्रु, उदासीन तथा मित्र होते हैं । और अरि, मित्र और उदासीन राजाओं के भी चारों दिशाओं में पास के, उसके बाद के पुनः उसके बाद के इस क्रम से उनके भी शत्रु, मित्र और उदासीन होते हैं । और अपने अत्यन्त समीपवर्त्ती भृत्य तथा अमात्य (मन्त्री) आदि भी राजा के द्वारा कष्ट दिये जाने पर शत्रु हो जाते हैं ।
बृंहयेत् कर्षयेन्मित्रं हीनाधिकबलं क्रमात् ।
भेदनीयाः कर्षणीयाः पीडनीयाश्च शत्रवः ॥ २३ ॥
विनाशनीयास्ते सर्वे सामादिभिरुपक्रमैः ।
मित्र और शत्रु राजाओं के प्रति राजाओं के आचरण का निर्देश—हीनबल और अधिक बलवाले मित्र राजाओं की भी क्रम से वृद्धि तथा क्षीणता करे। और जो शत्रु राजा लोग हैं उनमें सामादि उपायों से भेद डालना तथा उन्हें क्षीण, पीडित एवं नष्ट करना चाहिये ।
मित्रं शत्रुं यथायोग्यैः कुर्यात् स्ववशवर्तिनम् ॥ २४ ॥
उपायेन यथा व्यालो गजः सिंहोऽपि साध्यते ।
चतुर्थाध्याये मिश्रप्रकरणम्
१८४
जिस प्रकार से उपाय द्वारा सर्प, हाथी तथा सिंह को अपने वश में किया जाता है उसी प्रकार से यथायोग्य उपायों से मित्र तथा शत्रु को अपना वशवर्ती बनाना चाहिये ।
भूमिष्ठाः स्वर्गमायान्ति वज्रं भिन्दन्त्युपायतः ॥ २५ ॥
क्योंकि उपाय से मनुष्य भूमि में रहकर स्वर्ग पहुँच जाता है और वज्र को भी विदीर्ण कर देता है ।
सुहृत्संबन्धिस्त्रीपुत्रप्रजाशत्रुषु ते पृथक् ।
सामदानभेददण्डाश्चिन्तनीयाः स्वयुक्तितः ॥ २६ ॥
मित्रादि के प्रति सामादिकों का विचार स्वयुक्तियों से करने का निर्देश—
मित्र, संबन्धी, पुत्र, प्रजा और शत्रु इन सबों के विषय में उक्त साम, दान, तथा दण्ड का अपनी युक्ति से पृथक् २ विचार करना चाहिये ।
एकशीलवयोविद्याजातिव्यसनवृत्तयः ।
साहचर्ये भवेन्मित्रमेभिर्यदि तु सार्जवैः ॥ २७ ॥
मित्रता होने के कारणों का निर्देश— जिनके परस्पर स्वभाव, अवस्था, विद्या ( ज्ञान ), जाति, व्यसन ( आदत ), आजीविका ये सब समान हैं वे यदि निष्कपट भाववाले सरल होकर एक जगह मिलते हैं तो मित्र हो जाते हैं ।
त्वत्समस्तु सखा नास्ति मित्रे साम इदं स्मृतम् ।
मम सर्वं तवैवास्ति दानं मित्रे सजीवितम् ॥ २८ ॥
मित्र के लिये साम तथा दान वाक्यों के लक्षण— तुम्हारे समान मेरा दूसरा कोई मित्र नहीं है' ऐसा मित्र के लिये कहना 'साम वाक्य' कहलाता है । और 'जीवन के सहित मेरी सभी वस्तुयें तुम्हारी ही हैं' यह मित्र के लिये कहना 'दान वाक्य' कहलाता है ।
मित्रेऽन्यमित्रसुगुणान् कीर्तयेद् भेदनं हि तत् ।
मित्रे दण्डो न करिष्ये मैत्रीमेवंविधोऽसि चेत् ॥ २६ ॥
भेद तथा दण्ड-वाक्यों के लक्षण— 'मित्र के सामने अन्य मित्र के सुन्दर गुणों की प्रशंसा करना' यह मित्र के लिये 'भेद-वाक्य' और 'तुम यदि ऐसे हो तो मैं तुम्हारे साथ मित्रता नहीं रक्खूंगा' यह कहना मित्र के लिये 'दण्ड-वाक्य' कहलाता है ।
यो न संयोजयेदिष्टमन्यानिष्टमुपेक्षते ।
उदासीनः स न कथं भवेच्छत्रुः सुसान्ध्विकः ॥ ३० ॥
उदासीन के शत्रु बनने का निर्देश— जो स्वयं अभीष्ट कार्य की सिद्धि
१८६ | शुक्रनीतिः
न करे और दूसरे के किये हुये अनिष्ट की उपेक्षा करे, वह उदासीन भलीभांति सन्धि करने पर भी क्यों न शत्रु हो अर्थात् सन्धि करने पर भी वह शत्रु ही हो जाता है ।
परस्परमनिष्टं न चिन्तनीयं त्वया मया ।
सुसाहाय्यं हि कर्तव्यं शत्रौ साम प्रकीर्तितम् ॥ ३१ ॥
शत्रु के प्रति सामवाक्य के लक्षण—'तुम्हें और हमें परस्पर एक दूसरे के अनिष्ट का विचार नहीं रखना चाहिये, बल्कि सहायता ही करनी चाहिये' ऐसा शत्रु के लिये कहना 'सामवाक्य' कहलाता है ।
करैर्वा प्रमितैर्ग्रामैर्वत्सरे प्रबलं रिपुम् ।
तोषयेत्तद्धि दानं स्याद्यथायोग्येषु शत्रुशु ॥ ३२ ॥
शत्रु के लिए दान का स्वरूप-निर्देश—'प्रबल शत्रु को वर्ष में थोड़ा सा कर ( मालगुजारी ) या छोटा सा कोई ग्राम देकर या योग्यतानुसार कुछ देकर संतुष्ट करना' शत्रु के लिये 'दान' कहलाता है ।
शत्रुसाधकहीनत्वकरणात् प्रबलाश्रयात् ।
तद्धीनतोज्जीवनाच्च शत्रुभेदनमुच्यते ॥ ३३ ॥
शत्रु के प्रति भेद का स्वरूप-निर्देश—'शत्रु के सम्पूर्ण साधनों को हीन बना देना, शत्रु से अधिक बलशाली का आश्रय लेना एवं शत्रु से हीन बलवालों को प्रबल बना देना' इन सबों से 'शत्रु का भेद' होना कहा है ।
दस्युभिः पीडनं शत्रोः कर्षणं धनधान्यतः ।
तच्छिद्रदर्शनादुग्रबलैर्नीत्या प्रभीषणम् ॥ ३४ ॥
प्राप्तयुद्धानिवृत्तित्वैस्त्रासनं दण्ड उच्यते ।
शत्रु के प्रति दण्ड का स्वरूप-निर्देश—'डाकुओं से शत्रु को पीड़ा पहुँचाना ( लुटवाना ), धन-धान्य को क्षीण कर देना, दोष देखना, उग्र सेना तथा नीति से अत्यन्त डराना, यदि युद्ध हो रहा हो तो उस पर डटे रहने से त्रास पहुँचाना' ये सब शत्रु के लिये 'दण्ड' कहलाता है ।
क्रियाभेदादुपाया हि भिद्यन्ते च यथार्हतः ॥ ३५ ॥
योग्यतानुसार क्रिया में भिन्नता होने से सामादिक उपायों में भी भिन्नता होती है ।
सर्वोपायैस्तथा कुर्यान्नीतिज्ञः पृथिवीपतिः ।
यथा स्वाभ्यधिका न स्युर्मित्रोदासीनशत्रवः ॥ ३६ ॥
**मित्र, शत्रु तथा उदासीन राजाओं को बलवान् न होने देने का निषेध—**नीति के जाननेवाले राजा को हर एक उपायों से यही करना चाहिये कि उसके मित्र, उदासीन तथा शत्रु राजा लोग अपने से अधिक बलवान न होने पावें ।
चतुर्थाध्याये भिन्नप्रकरणम् १८७
चतुर्थाध्याये भिन्नप्रकरणम् १८७
सामैव प्रथमं श्रेष्ठं दानं तु तदनन्तरम् ।
सर्वदा भेदनं शत्रोर्दण्डनं प्राणसंशये ॥ ३७ ॥
सामादिकों को करने में क्रम का निर्देश— शत्रु के लिये सर्वप्रथम साम-नीति का व्यवहार करना ही श्रेष्ठ होता है, इससे भी कार्य न होने पर उसके बाद दाननीति का प्रयोग उचित होता है, यदि इससे भी कार्यसिद्धि न हो तो सभी प्रकारों से भेदनीति करनी चाहिये और इसके भी विफल होने पर यदि प्राण-संकट उपस्थित हो जाय तो अन्त में शत्रु के लिये दण्डनीति का प्रयोग उचित होता है।
प्रबलेऽरौ सामदाने साम भेदोऽधिके स्मृतौ ।
भेददण्डौ समे कार्यों दण्डः पूज्यः प्रहीनके ॥ ३८ ॥
शत्रुभेद से सामादिकों की व्यवस्था का निर्देश— अत्यन्त प्रबल शत्रु के लिये साम और दान का, अपने से अधिक बलवान् के लिये साम और भेद का, अपने बराबर के लिये भेद तथा दण्ड का एवं अपने से हीन शत्रु के लिये केवल दण्ड का प्रयोग करना श्रेष्ठ होता है।
मित्रे च सामदाने स्तो न कदा भेददण्डने ।
मित्र के लिये केवल साम-दान के प्रयोग का निर्देश— मित्र के लिये साम तथा दान का ही प्रयोग उचित होता है और कभी भी उसके लिये भेद तथा दण्ड का प्रयोग उचित नहीं होता।
रिपोः प्रजानां संभेदः पीडनं स्वजयाय वै ॥ ३९ ॥
रिपुप्रपीडितानां च साम्ना दानेन संग्रहः ।
गुणवतां च दुष्टानां हितं निर्वासनं सदा ॥ ४० ॥
रिपु-पीडित प्रजाओं का साम-दान से संग्रह करने का निर्देश— शत्रु की प्रजाओं के साथ मेल करके शत्रु को पीड़ा पहुंचाना अपनी विजय का कारण होता है। और शत्रु से पीड़ित लोगों को साम तथा दान से अपने पास संग्रह करना चाहिये। और दुष्ट गुणवानों को भी देश से निकाल देना सदा उचित होता है।
स्वप्रजानां न भेदेन नैव दण्डेन पालनम् ।
कुर्वीत सामदानाभ्यां सर्वदा यत्नमास्थितः ॥ ४१
स्वप्रजाओं का साम-दान से पालन का निर्देश— अपनी प्रजाओं का भेद तथा दंड से नहीं किन्तु यत्नपूर्वक सर्वदा साम तथा दान से ही पालन करना उचित है।
स्वप्रजादण्डभेदैश्च भवेद्राष्ट्रविनाशनम् ।
हीनाधिका यथा न स्युः सदा रक्ष्यास्तथा प्रजाः ॥ ४२ ॥
१८८ | शुक्रनीतिः
**प्रजाओं के साथ दण्ड तथा भेद के प्रयोग से राज्य-नाशका निर्देश—**अपनो प्रजाओं का दण्ड तथा भेद से पालन करने से राज्य का विनाश हो जाता है। अतः जिस प्रकार से प्रजायें क्षीण-बल और प्रबल न हों किन्तु समबल में रहें उसी प्रकार से उनका पालन करना चाहिये।
निवृत्तिरसदाचाराद्दमनं दण्डतश्च तत् ।
येन संदम्यते जन्तुरुपायो दण्ड एव सः ॥ ४३ ॥
**दण्ड के लक्षण—**दण्ड के द्वारा असत् ( बुरे ) आचरण से निवृत्ति और दमन होता है अतः जिस उपाय से मनुष्य का अच्छी तरह से दमन होता है उसे ‘दण्ड’ कहते हैं।
स उपायो नृपाधीनः स सर्वस्य प्रभूर्यतः ।
वह दण्ड नामक उपाय राजा के अधीन रहता है क्योंकि वही सर्वो का स्वामी है ( अतः दण्ड वही दे सकता है ) ।
निर्भर्त्सनं चापमानोऽनशनं बन्धनं तथा ॥ ४४ ॥
ताडनं द्रव्यहरणं पुरान्निर्वासनाङ्कने ।
व्यस्तक्षौरमसस्थानमङ्गच्छेदो वधस्तथा ॥ ४५ ॥
युद्धमेते ह्युपायाश्च दण्डस्यैव प्रभेदकाः ।
**दण्ड के भेद का निर्देश—**झिड़कना, अपमान ( सम्मान पद से अलग कर देना ), उपवास कराना, बांधना, मारना, धन हर लेना, शहर या राज्य से निकाल देना, दाग देना, बुरे ढङ्ग से सिर मुड़वा देना, गदहे आदि पर चढ़ा देना, किसी अङ्ग ( नाक-कान आदि ) को कटवा देना, प्राणदण्ड देना, युद्ध करना, ये सभी उपाय दण्ड के ही भेद माने जाते हैं।
जायते धर्मनिरताः प्रजा दण्डभयेन च ॥ ४६ ॥
करोत्याधर्षणं नैव तथा चासत्यभाषणम् ।
क्रूराश्च मार्दवं यान्ति दुष्टा दौष्ट्यं त्यजन्ति च ॥ ४७ ॥
पशवोऽपि वशं यान्ति विद्रवन्ति च दस्यवः ।
पिशुना मूकतां यान्ति भयं यान्त्याततायिनः ॥ ४८ ॥
करदाश्च भवन्त्यन्ये वित्रासं यान्ति चापरे ।
अतो दण्डधरो नित्यं स्यान्नृपो धर्मरक्षणे ॥ ४९ ॥
**दण्ड के प्रभाव एवं राजा को धर्मरक्षार्थ दण्डधर होने का निर्देश—**दण्ड के भय से प्रजा अपने २ धर्मों में रत रहती है । और वह किसी दुर्बल पर आक्रमण तथा असत्य-भाषण नहीं करती है। क्रूर लोग कोमलता को धारण कर लेते हैं, दुष्ट लोग दुष्टता को छोड़ देते हैं, पशु भी वश में हो जाते हैं, डाकू लोग भाग जाते हैं, चुगलखोर जबान बन्द कर लेते हैं, आततायी लोग डर
चतुर्थाध्याये मिश्रप्रकरणम् १८६
चतुर्थाध्याये मिश्रप्रकरणम् १८६
जाते हैं, जो कोई कर नहीं देते हैं वे कर देने लग जाते हैं, और जो कोई नहीं डरने वाले होते हैं वे विशेषतः डरने लगते हैं। अतः राजा को नित्य धर्मरक्षार्थ दण्डधर ( दण्ड देनेवाला ) होना चाहिये।
गुरोरप्यवलिप्तस्य कार्याकार्यमजानतः ।
उत्पथं प्रतिपन्नस्य कार्यं भवति शासनम् ॥ ५० ॥
घमण्डी आदि गुरुजनों को भी दण्ड देने का निर्देश— घमण्डी, कर्त्तव्य और अकर्त्तव्य कर्म को नहीं जाननेवाला, और कुमार्ग पर चलनेवाले गुरुजन को भी दण्ड देना राजा का कर्त्तव्य होता है।
राज्ञां सदण्डनीत्या हि सर्वे सिध्यन्त्युपक्रमाः ।
दण्ड एव हि धर्माणां शरणं परमं स्मृतम् ॥ ५१ ॥
दण्ड-सहित नीति का व्यवहार करने से राजा के सभी कार्य सिद्ध होते हैं, क्योंकि धर्मों का परम रक्षक दण्ड ही माना गया है।
अहिंसैवासाधुहिंसा पशुवच्छ्रुतिचोदनात् ।
दुष्टों की हिंसा को अहिंसा मानने का निर्देश— और जैसे वेद की आज्ञा होने से यज्ञ में पशु की हिंसा अहिंसा मानी जाती है वैसे ही दुष्ट पुरुषों की हिंसा भी अहिंसा होती है।
दण्ड्यस्यादण्डनान्नित्यमदण्ड्यस्य च दण्डनात् ॥ ५२ ॥
अतिदण्डाच्च गुणिभिस्त्यज्यते पातकी भवेत् ।
उचितानुचित दण्ड देने से राजा के इष्टानिष्ट-फलकथन का निर्देश— नित्य दण्ड देने योग्य व्यक्ति को दण्ड न देने से, नहीं दण्ड देने योग्य को दण्ड देने से एवं अपराध से अधिक दण्ड देने से विद्वान् लोग ऐसे अनुचित दण्ड देनेवाले राजा का परित्याग कर देते हैं और वह राजा उक्त कर्म से पातकी होता है।
अल्पदानान्महत् पुण्यं दण्डप्रणयनात् फलम् ॥ ५३ ॥
शास्त्रेषूक्तं मुनिवरैः प्रवृत्त्यर्थं भयाय च ।
'अल्प ( थोड़ा जो कुछ ) दान करने से भी बहुत बड़ा पुण्य होता है एवं शास्त्रानुसार दण्ड देने से बहुत बड़ा फल होता है' यह जो शास्त्रों में मुनिवरों ने कहा है, वह क्रम से लोगों को दान में प्रवृत्ति कराने एवं पाप से भयभीत होने के लिये ही कहा है।
अश्वमेधादिभिः पुण्यं तत् किं स्यात् स्तोत्रपाठतः ॥ ५४ ॥
क्षमया यत्तु पुण्यं स्यात्तत्किं दण्डनिपातनात् ।
स्वप्रजादण्डनाच्छ्रेयः कथं राज्ञो भविष्यति ॥ ५५ ॥
तद्दण्डाज्जायते कीर्तिर्धनपुण्यविनाशनम् ।
अश्वमेधादि यज्ञों से जो पुण्य होता है वह क्या केवल स्तोत्रों के पाठमात्र
| १६० | शुक्रनीतिः |
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से होगा ? अर्थात् कभी नहीं। क्षमा करने से जो पुण्य होता है वह क्या दण्ड देने से होगा ? अर्थात् कभी नहीं। अतः अपनी प्रजाओं को दण्ड देने से राजाओं का कैसे कल्याण होगा अर्थात् कभी नहीं, बल्कि उन सर्वो को दण्ड देने से उल्टे राजा की कीर्त्ति, धन तथा पुण्य का नाश ही होगा।
नृपस्य धर्मपूर्णत्वादण्डः कृतयुगे न हि ॥ ५६ ॥
त्रेतायुगे पूर्णदण्डः पादाधर्माः प्रजा यतः ।
द्वापरे चार्धधर्मत्वात् त्रिपादण्डो विधीयते ॥ ५७ ॥
प्रजा निःस्वा राजदौष्ट्याद् दण्डार्धं तु कलौ यथा।
सत्ययुगादि में दण्ड का अभाव एवं त्रेतादियुगों में क्रम से पूर्ण, पौन एवं अर्ध दण्ड देने का सकारण निर्देश— सत्ययुग में धर्म चारों पादों से परिपूर्ण था, अतः उस समय किसी के लिये भी दण्ड नहीं दिया जाता था, त्रेतायुग में प्रजाओं में तीन पाव ( १२ आने ) धर्म के साथ २ एक पाद ( ४ आने ) अधर्म भी रहता था, अतः उस समय पूर्ण दण्ड दिया जाता था, द्वापरयुग में आधा अंश धर्म और आधा अंश अधर्म अर्थात् दोनों समान भाव से थे, अतः तीन पादों के साथ ( १२ आने ) दण्ड का विधान था तथा कलियुग में राजाओं की दुष्टता से प्रजायें कर अधिक बढ़ जाने से एवं राजा द्वारा धन हरण करने से अत्यन्त निर्धन होती हैं अतः आधा अंश दंड देने का विधान है।
युगप्रर्वतको राजा धर्माधर्मप्रशिक्षणात् ॥ ५८ ॥
युगानां न प्रजानां न दोषः किन्तु नृपस्य हि ।
राजा को युगप्रवर्तक होने का निर्देश— प्रजाओं को धर्म तथा अधर्म की शिक्षा देनेवाला राजा के होने से वही सत्ययुग आदि ४ युगों का प्रवर्तक होता है, अतः अधर्म की प्रवृत्ति में युगों का या प्रजाओं का दोष नहीं है अर्थात् युग या प्रजाओं के ऊपर अधर्म भावना नहीं अवलम्बित है प्रत्युत राजा के ऊपर अवलम्बित है अर्थात् राजा के अधार्मिक होने से प्रजाओं में या युग में अधर्म फैलता है।
प्रसन्नो येनं नृपतिस्तदाचरति वै जनः ॥ ५६ ॥
लोभाद्भयाच्च किं तेन शिक्षितं नाचरेत् कथम् ।
धार्मिक तथा अधार्मिक प्रजाओं के होने के कारणों का निर्देश— जब कि लोभ से प्रजायें जिससे राजा प्रसन्न हो वैसा आचरण करने लगती हैं तब भला राजा के भय से उसके द्वारा सिखाये जाने पर तदनुसार कैसे नहीं वे चलेंगी -अर्थात् अवश्य चलेंगी।
सुपुण्यो यत्र नृपतिर्धर्मिष्ठास्तत्र हि प्रजाः ॥ ६० ॥
महापापी यत्र राजा तत्राधर्मपरो जनः ।