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श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)

Sri Bhashya of Bhagavad Ramanujacharya with Commentary

भगवद् रामानुजाचार्य (सम्पादक: स्वामी वासुदेवाचार्य) द्वारा

DevanagariHindipublished696 पृष्ठ

( ४७९ ) इमे यद् भूतं च भवच्च भविष्यच्चेत्याचक्षते आकाश एव तदोतं च प्रोतं च'' इत्युक्ते त्रैकाल्यवर्त्तिनो विकारजातस्याधारतया निर्दिष्ट आकाशो न वायुमदाकाशो भवितुमर्हति, तस्यापि विकारान्तर्गत- त्वात् । अतोऽत्राकाशशब्दनिर्दिष्टं भूतसूक्ष्ममिति प्रतीयते । ततस्त- स्यापि भूतसूक्ष्मस्याधारभूतं किमिति पृच्छ्यते “कस्मिन्नुखल्वाकाश- ओतश्च प्रोतश्च” इति । अतस्तदाधारतया निर्दिश्यमानमक्षरं न प्रधानं भवितुमर्हति । यदि कहो कि—उक्त प्रकरण में आकाश शब्द से अभिहित, परम् पूरित भूताकाश नहीं है, यह कैसे जाना ? तो सुनो—'गार्गि ! जो द्युलोक से ऊपर तथा पृथिवी से नीचे है तथा द्युलोक और पृथिवी जिसके अभ्यन्तर में हैं, जिसे भूत, वर्त्तमान् और भविष्य कहा जाता है, वह आकाश ही ओत प्रोत है” इत्यादि में कहा गया, त्रैलोक्यवर्त्ती, वैकारिक पदार्थों का आधार. आकाश, वायुमान आकाश नहीं हो सकता, क्योंकि वायुमान आकाश तो, विकृत है । इसलिए यहाँ, आकाश शब्द से निर्दिष्ट, भूतसूक्ष्म ही प्रतीत होता है । “आकाश किससे ओत प्रोत है ?” यह प्रश्न भूतसूक्ष्म आकाश के लिए ही पूछा गया है । इन सबसे ज्ञात होता है कि-आधाररूप से निर्दिष्ट अक्षर तत्त्व, विकृत प्रधान नहीं हो सकता । यत्तु श्रुतिप्रसिद्धात् प्रमाणान्तर प्रसिद्धं प्रथमं प्रतीयेत इति तन्न, अक्षर शब्दस्यावयवशक्त्या स्वार्थ प्रतिपादने प्रमाणान्तरान- पेक्षणात् संबंधग्रहणदशायामर्थस्वरूपं येन प्रमाणेनावगम्यते, न तत्प्रतिपादनदशायामपेक्षणीयम् । जो यह कहा कि-श्रुति प्रसिद्ध से प्रमाणान्तर प्रसिद्ध अर्थ की प्रतीति प्रथम होती है, सो यह बात नहीं है, क्योंकि-अक्षर शब्द से सीधा सीधा जो अर्थ प्रतीत होता है, उसके प्रतिपादन के लिए, अन्य प्रमाणों की आवश्यकता ही नहीं है; शब्द और अर्थ के संबंध, में अर्थ के स्वरूप

बतलाने में जिन प्रमाणों की अपेक्षा होती है, वस्तु प्रतिपादन की स्थिति में उन प्रमाणों की अपेक्षा नहीं होती । एवं तर्ह्यक्षर शब्द निर्दिष्टो जीवोऽस्तु, तस्यभूतसूक्ष्मपर्यन्त- स्य कृत्स्नस्याचिद्वस्तुन आधारत्वोपपत्तेः, अस्थूलत्वादुच्यमान- विशेषणोपपत्तेश्च “अव्यक्तमक्षरेलीयते”—“यस्याव्यक्तं शरीरम्— यस्याक्षरं शरीरम्” “क्षरः सर्वाणि भूतानि कूटस्थोऽक्षर उच्यते” इत्यादिषु—प्रत्यगात्मन्यप्यक्षर शब्द प्रयोगदर्शनादित्यत्रोत्तरम्— यदि प्रधान को, अक्षर नहीं मानते तो, जीव तो अक्षर शब्द से अभिधेय है ही, उसे ही भूतसूक्ष्म पर्यन्त समस्त जड़ वस्तुओं का आधार तथा अस्थूलता आदि विशेषताओं वाला कहा गया है जैसा कि- “अव्यक्त जिसका शरीर है, अक्षर जिसका शरीर है;” ‘समस्त भूत क्षर हैं, अक्षर कूटस्थ है” इत्यादि वाक्यों में जीवात्मा के लिए किए गए, अक्षर शब्द के प्रयोग से ज्ञात होता है । इस मत का ही उत्तर देते हैं— सा च प्रशासनात् । १।३।१०॥ सा चाम्बरान्तधृतिरस्याक्षरस्य प्रशासनादेव भवतीत्युपदिश्यते “एतस्यवाऽक्षरस्य प्रशासने गार्गि, सूर्याचन्द्रमसौ विधृतौ तिष्ठतः, एतस्यवाऽक्षरस्य प्रशासने गार्गि, द्यावापृथिव्यौ विधृते तिष्ठतः, एतस्य वाऽक्षरस्य प्रशासने गार्गि, निमेषा मुहूर्ता अहोरात्राण्य- र्धमासा मासा ऋतवः संवत्सरा इति विधृतास्तिष्ठन्ति” इत्यादिना । प्रशासनंप्रकृष्टं शासनं, न चेदृशं स्वशासनाधीनसर्ववस्तु विधरणं बद्धमुक्तोभयावस्थस्यापि प्रत्यगात्मनः संभवति । अतः पुरुषोत्तम एव प्रशाशित्रक्षरम् । वह अम्ब पर्यन्त समस्त वस्तुओं का आधार अक्षर के प्रशासन से ही होता है, ऐसा उपदेश दिया गया है । जैसा कि—“हे गार्गि ! इस अक्षर के प्रशासन में ही सूर्य और चन्द्र स्थित हैं, गार्गि ! इसी अक्षर के

प्रशासन में द्यु और भूलोक स्थित हैं, तथा गार्गि ! इसी अक्षर के प्रशासन में, निमेष-मुहूर्त्त-अहोरात्र-अर्द्धमास-मास-ऋतु-संवत्सर आदि भी स्थित हैं ' इत्यादि से ज्ञात होता है। प्रशासन का अर्थ है प्रकृष्ट रूप से शासन करना अर्थात् नियमित रखना । बद्ध या मुक्त जीव, इस प्रकार के प्रशासन से, समस्त पदार्थों को नियमित कर सकें, ऐसा संभव नहीं है । इससे निश्चित होता है कि प्रशासक रूप से पुरुषोत्तम ही अक्षर है । अन्यभावव्यावृत्तेश्च ॥१।३।१९॥ अन्य भावः अन्यत्वं प्रधानादिभावः । अस्याक्षरस्य परम् पुरुषादन्यत्वं, वाक्यशेषे व्यावर्त्यते "तद् वा एतदक्षरं गार्गि, अदृष्टं द्रष्टृ श्रुतं श्रोत्रमतम् मंतृविज्ञातं विज्ञातृ नान्यदस्तोऽस्ति द्रष्टृ, नान्यदस्तोऽस्ति श्रोतॄ, नान्यदस्तोऽस्ति मंतृ, नान्यदस्तोऽस्ति विज्ञातृ, एतस्मिन्नुखल्वक्षरे गार्गि, आकाश ओ

( ४८२ ) एवं वाऽन्यभावव्यावृत्तिः, अन्यस्य सद्भावव्यावृत्तिरन्यभाव- व्यावृत्तिः यथैतदक्षरमन्यैरदृष्टं सदन्येषां द्रष्टृ च सत् स्वव्यति- रिक्तस्य समस्तस्याधारभूतम्, एवमनेनादृष्टमेतस्य द्रष्टृ च सदेत- स्याधारभूतमन्यन्नास्तीति वदन् "नान्यदतोऽस्ति द्रष्ट" इत्यादि- वाक्यशेषो अन्यस्य सद्भावं व्यावर्त्तयन्नस्याक्षरस्य, प्रधानभावं, प्रत्यगात्मभावं च प्रतिषेधति । अन्य की सद्भावना की व्यावृत्ति भी, इस सूत्र का तात्पर्य हो सकता है। "इसके अतिरिक्त कोई अन्य द्रष्टा नहीं है" इस वाक्यांश में, अक्षर को अन्य से अदृष्ट तथा सभी का द्रष्टा बतलाकर, सभी का आश्रय सिद्ध किया गया है, इससे निश्चित होता है कि इसके दर्शन और आश्रय की, किसी भी अन्य से संभावना नहीं है। इस प्रकार, अन्यों की संभावना के प्रतिषिद्ध हो जाने पर अक्षर के प्रधान या जीवात्मभाव का स्वतः प्रतिषेध हो जाता है । किंच—"एतस्य वाऽक्षरस्य प्रशासने गार्गि, ददतो मनुष्याः प्रशंसंति यजमानो देवादर्वी पितरोऽन्वायत्ताः" इति श्रौतं स्मार्तं च यागदान होमादिकं सर्वकर्म यस्याज्ञया प्रवर्त्तते, तदक्षरं परब्रह्मभूतः पुरुषोत्तम एवेति विज्ञायते । तथा-"गार्गि ! इस अक्षर के प्रशासन में ही, मनुष्य दाता की, देवता यजमान की तथा पितर दर्वी ( चरुपात्र ) की प्रशंसा करते हैं ।" इत्यादि से भी ज्ञात होता है कि-श्रौत स्मार्त, याग-दान-होमादि सब कर्म जिनके प्रशासन में संपन्न होते हैं, वे अक्षर, परब्रह्म पुरुषोत्तम ही हो सकते हैं । अपि च—"यो वा एतदक्षरं गार्गि ! अविदित्वास्मिंल्लोके जुहोति यजते तपस्तप्यते बहूनि वर्षसहस्राणि अन्तवदेवास्य तद्- भवति, यो वा एतदक्षरंगार्गि । अविदित्वा अस्माल्लोकात् प्रैति ankurnagpal108@gmail.com

( ४८३ ) सकृपणः, अथ य एतदक्षरं गार्गि ! विदित्वाऽस्माल्लोकात् प्रैति स ब्राह्मणः ।” इति यदज्ञानात् संसार प्राप्ति यज्ज्ञानाच्चामृतत्व प्राप्ति स्तदक्षरं परं ब्रह्मैवेति सिद्धम् । तथा--'गार्गि ! जो लोग इस लोक में इस अक्षर को न जानकर होम यज्ञ करते हैं तथा हजारों वर्ष तपस्या करते हैं, उनका समस्त कर्म ( पुण्यभोग के बाद ) समाप्त हो जाता है, वे बेचारे दया के पात्र हैं । और जो अक्षर तत्त्व के ज्ञाता ( निष्काम भाव से उसका चिंतन करते हैं ) वे ही ब्रह्मवेत्ता ब्राह्मण हैं ।' इत्यादि में, अक्षर को न जानने से संसार प्राप्ति और अक्षर ज्ञान से मोक्ष प्राप्ति बतलाई गई है, जिससे सिद्ध होता है कि-अक्षर परब्रह्म ही है । ४ ईक्षतिकर्माधिकरणः— ईक्षतिकर्मव्यपदेशात्सः ।१।३।१२॥ आथर्वणिकास्सत्यकाम प्रश्नेऽधीयते-“यः पुनरेतं त्रिमात्रेणो- मित्यनेनैवाक्षरेण परं पुरुषमभिध्यायीत स तेजसि सूर्ये संपन्नः यथा पादोदरस्त्वचा विनिर्मुच्यते एवं ह वै स पाप्मना विनिर्मुक्तः ससा- मभिरुन्नीयते ब्रह्मलोकं स एतस्माज्जीवघनात्परात्परं पुरिशयं पुरुष- मीक्षते” इति अत्र ध्यायतीक्षतिशब्दावेकविषयौ, ध्यानफलत्वादीक्ष- णस्य, “यथाक्रतुरस्मिंल्लोके पुरुषः” इति न्यायेन ध्यान विषयस्यैव प्राप्यत्वात् “परं पुरुषं” इत्युभयत्र कर्मभूतस्यार्थस्य प्रत्यभिज्ञानाच्च । अथर्ववेदीय प्रश्नोपनिषद् के सत्यकाम के प्रश्न के प्रसंग में कहा गया कि-‘जो त्रिमात्रात्मक अक्षर रूप परंपुरुष का ध्यान करते हैं वह तेज में सूर्य के समान होते हैं; जैसे कि सर्प अपना केंचुल छोड़ देता है, वैसे ही वे भी पाप से छूट जाते हैं । वे सामगणों द्वारा, ब्रह्मलोक में ले जाए जाते हैं, वे इन जीवों से श्रेष्ठ परम पुरुष को हृदय में देखते हैं ।' यहाँ ध्यान और दर्शन दोनों को एक ही बतलाया गया है । वैसे दर्शन ankurnagpal108@gmail.com

( ४७४ ) या साक्षात्कार ध्यान का ही फल है "पुरुष इस लोक में जैसा चिन्तन करता है' इत्यादि में ध्यान को ही, प्राप्य वस्तु का कारण बतलाया गया है। ध्यान और दर्शन दोनों में "परंपुरुष' की प्राप्ति की अभिलाषा रहती है इसीलिए उक्त वाक्य में दोनों को एक विषयक दिखलाया गया है । तत्र संशय्यते—किमिह "परं पुरुषम्" इति निर्दिष्टो जीव- समष्टिरूपोऽण्डाधिपतिश्चतुर्मुखः उत सर्वेश्वरः पुरुषोत्तमः इति कियुक्तम् ? समष्टि क्षेत्रज्ञ इति, कुतः ? "स यो ह वैतद् भगवन् मनुष्येषु प्रायणान्तमोंकारमभिध्यायीत कतमंवाव सतेन लोकं जयति" इति प्रक्रम्यैकमात्रं प्रणवमुपासीनस्य मनुष्यलोक प्राप्ति- मभिधाय, द्विमात्रमुपासीनस्य अंतरिक्ष लोक प्राप्तिमभिधाय, त्रिमात्रमुपासीनस्य प्राप्यतयाऽभिधीयमानो ब्रह्मलोकोऽन्तरिक्षात्परो जीवसमष्टि रूपस्य चतुर्मुखस्य लोक इति विज्ञायते तद्गतेन चेक्ष्यमाणः तल्लोकाधिपतिश्चतुर्मुख एव । "एतस्माज्जीव घनात्परा- त्परम्" इति च देहेन्द्रियादिभ्यः पराद् देहेन्द्रियादिभिः सह घनी- भूताज्जीवव्यष्टिपुरुषाद् ब्रह्मलोकवासिनः समष्टि पुरुषस्य चतु- र्मुखस्य परत्वेनोपपद्यते । अतोऽत्र निर्दिश्यमानः परः पुरुषः समष्टि- पुरुषः चतुर्मुख एव । एवं चतुर्मुखत्वे निश्चिते सति अजरात्वादयो यथाकथंचिन्नेतव्याः । अब संशय होता है कि-परं पुरुष पद से निर्दिष्ट, जीव समष्टि रूप ब्रह्माण्डपति चतुर्मुख हैं अथवा सर्वेश्वर पुरुषोत्तम ? कह सकते हैं कि समष्टि क्षेत्रज्ञ ब्रह्मा ही है-जैसा कि-‘हे भगवन् इस मनुष्य लोक में जो मनुष्य आजीवन ओंकार का चिंतन करते हैं वो कौन सा लोक जीत लेते हैं?’ ऐसा उपक्रम करके, एकमात्र का चिंतन मनुष्य लोक की प्राप्ति कराता है, दो मात्रा का चिन्तन अंतरिक्ष लोक की प्राप्ति कराता है तथा त्रिमात्रा का चिन्तन अंतरिक्ष से श्रेष्ठ ब्रह्मलोक की

( ४८५ ) प्राप्ति कराता है जो कि जीव समष्टि रूप चतुर्मुख ब्रह्मा का लोक है; इत्यादि बतलाया गया है । उस ब्रह्मलोक में प्राप्त जीवों का दृश्यमान पर पुरुष चतुर्मुख ही है । “श्रेष्ठ जीवों से भी श्रेष्ठ” इत्यादि में देह इन्द्रिय आदि से श्रेष्ठ देह इन्द्रिय आदि सहित घनीभूत जीव पुरुष से, ब्रह्मलोकवासी समष्टि पुरुष चतुर्मुख की श्रेष्ठता का प्रतिपादन किया गया है । इससे ज्ञात होता है कि-उक्त प्रसंग में जिस परंपुरुष का व्या- ख्यान किया गया है, वह समष्टि पुरुष चतुर्मुख ही है । इस प्रकार परं- पुरुष की चतुर्मुखता निश्चित हो जाने पर, अजरत्व आदि गुणों का प्रति- पादन भी उन्हीं के लिए किसी न किसी प्रकार करना होगा । सिद्धान्तः-इति प्राप्ते प्रचक्ष्महे-“ईक्षतिकर्मव्यपदेशात्तः” ईक्षति कर्म सः परमात्मा । कुतः ? व्यपदेशात्-व्यपदिश्यते हीक्षतिकर्म परमात्मत्वेन । तथाहि ईक्षतिकर्मविषयतोदाहृते श्लोके-“तमोङ्का- रेणैवायनेनान्

से ही, शांत-अजर-अमर-अक्षय स्वरूप परमात्मा को प्राप्त करता है" इत्यादि । ऐसा शांत अजर अमर रूप परमात्मा का ही है, ऐसा “एतदमृत” इत्यादि श्रुति से ज्ञात होता है। 'एतज्जीवघनात् परात्पर" इत्यादि श्रुति में भी परमात्मा का ही निर्देश है, चतुर्मुख ब्रह्मा का नहीं । ब्रह्मा को भी जीवघन ही बतलाया गया है। कर्मों के फलस्वरूप देह प्राप्ति ही जीवघनत्व है। चतुर्मुख ब्रह्मा के जन्म की बात भी “जिन्होने प्रथम ब्रह्मा को उत्पन्न किया” इत्यादि में प्रसिद्ध है। जो यही कि—अंतरिक्ष लोक के ऊपर जो ब्रह्मलोक है, वह ब्रह्मा का ही लोक प्रतीत होता है, क्योंकि वहाँ के दर्शनीय पुरुष चतुर्मुख हैं; सो यह कथन भी असंगत है, क्योंकि—जब “यच्छान्तमजर" इत्यादि से परमात्मा का ईक्षण कर्म निश्चित हो चुका तब ब्रह्मलोक जो कि—ईक्षण कर्म वाले का ही स्थान है, वह क्षयशील ब्रह्मा का लोक, कैसे हो सकता है । किं च—“यथा पादोदरस्त्वचा विनिर्मुच्यते एवं ह वै स पाप्मना विनिर्मुक्तः स सामाभिरुन्नीयते ब्रह्मलोकम्” इति सर्वं पापविनिर्मुंक्त्य प्राप्यतयोच्यमानं न चतुर्मुखस्थानम् । अतएव चोदाहरणश्लोके इममेव ब्रह्मलोकमधिकृत्यश्रूयते—“यत्तत्कवयो वेदयन्ते” इति । कवयः सूरयः । सूरिभिर्दृश्यं च वैष्णवं पदमेव “तद्विष्णोः परमं पदं सदा पश्यंति सूरयः” इत्येवमादिभ्यः । न चान्तरिक्षात् परश्चतुर्मुखलोकः मध्ये स्वर्गलोकादीनां बहूनां सद्भावात् । तथा—“जैसे सर्प केचुल छोड़ देता है, वैसे ही वह साधक भी पापों को छोड़ देता है, सामगण उसे ब्रह्मलोक पहुँचाते हैं ।” इत्यादि में उदाहृत निष्पाप पुरुष के लिए जिस प्राप्य लोक का वर्णन किया गया है वह, चतुर्मुख का स्थान नहीं हो सकता । उदाहरणरूप से प्रस्तुत श्लोक में इस लोक को ब्रह्मलोक कहा गया है “जिसे कवि ही जानते हैं,” इत्यादि कवयः का अर्थ सूरयः (ज्ञानीभक्त) है। सूरियों के द्वारा दृष्ट वैष्णव पद "तद् विष्णोः परमं पदं सदा पश्यंति सूरयः” इत्यादि वाक्यों में बतलाया गया है। अंतरिक्ष के बाद चतुर्मुख का लोक ही नहीं है, मध्य में स्वर्ग आदि और भी बहुत से लोक हैं, इससे भी उक्त बात कट जाती है।

( ४८७ ) अतः "एतद् वै सत्यकाम परं चापरं ब्रह्म यदोंकारः तस्माद् विद्वानेतेनैवायनेनैकतरमन्वेति" इति प्रतिवचने यदपरं कार्यं ब्रह्म निर्दिष्टं तदैहिकामुष्मिकत्वेन द्विधा विभज्यैकमात्रं प्रणवमुपासीनाना मैहिकं मनुष्यलोकावाप्ति रूपं फलमभिधाय, द्विमात्रमुपासीनानामामु- ष्मिक अन्तरिक्ष शब्दोपलक्षितं फलं चाभिधाय, त्रिमात्रेण परब्रह्म वाचिना प्रणवेन परं पुरुषं ध्यायतां परमेव ब्रह्म प्राप्यतयोपदिशतीति सर्वं समंजसम् । अत ईक्षति कर्म परमात्मा । "सत्यकाम ! जो यह ओंकार है, यही पर और अपर ब्रह्म है, उपासक विद्वान् इसकी उपासना करके एक एक लोकों की प्राप्ति करते हैं।" इस आचार्य द्वारा दिए गए उत्तर में, जिस अपर कार्यब्रह्म का उल्लेख किया गया है, उसके ऐहिक और आमुष्मिक दो रूप दिखलाकर, एकमात्रा के प्रणव के उपासकों की मनुष्य लोक प्राप्ति द्विमात्रा के उपा- सकों की, अंतरिक्ष नाम वाली आमुष्मिक प्राप्ति बतलाकर, त्रिमात्रा वाले पर ब्रह्म वाची प्रणव से, परंपुरुष के ध्यान करने वालों परब्रह्म की ही प्राप्ति बतलाई है, इस प्रकार प्रासंगिक असंगति का सामंजस्य कर दिया गया है । इससे निश्चित हो गया कि-ईक्षति कर्म परमात्मा का ही है । ५ दहराधिकरण :- दहर उत्तरेभ्यः ।१।३।१३॥ इदमामनंति छंदोगाः "अथ यदिदमस्मिन् ब्रह्मपुरे दहरं पुण्डरीकं वेश्म दहरोऽस्मिन्नंतर आकाशः तस्मिन्यदंतस्तदन्वेष्टव्यं तद्वाव विजिज्ञासितव्यम्" इति । तत्र संदेहः-किमसौ हृदय पुण्डरीक मध्यवर्त्ती दहराकाशो महाभूत विशेषः उत प्रत्यगात्मा उत पर- मात्मा इति किं" तावद्युक्तम् ? महाभूत विशेष इति, कुतः ? आकाश शब्दस्य, भूताकाशे ब्रह्मणि च प्रसिद्धत्वेऽपि, भूताकाशे

( ४८८ ) प्रसिद्धि प्रकर्षात् । “तदस्मिन्यदंतः तदन्वेष्टव्यम्” इत्यन्वेष्टव्या- न्तरस्याधारतया प्रतीतेश्च । छांदोग्योपनिषद् में कहा गया कि-“इस ब्रह्मपुर में जो सूक्ष्म- पुण्डरीक गृह है जिसमे कि सूक्ष्म आकाश विद्यमान है, उसके भी अंदर जो विद्यमान है, उसी के अन्वेषण और जानने की चेष्टा करनी चाहिए” इस पर संशय होता है कि-उल्लेख्य हृदयपुण्डरीक मध्यवर्ती दहराकाश, महाभूत विशेष आकाश है, अथवा जीवात्मा है अथवा परमात्मा ? कह सकते है कि-महाभूतविशेष आकाश ही है; आकाश शब्द, भूताकाश और परमात्मा दोनो के लिए ही प्रयुक्त होता है, पर भूताकाशरूप मे अधिक प्रसिद्ध है तथा “तदस्मिन्” इत्यादि में अन्वेष्टव्य का आन्तरिक आधार के रूप में जो वर्णन किया गया है उससे भी, भूताकाश की ही प्रतीति होती है । सिद्धान्तः-इत्येवं प्राप्तेऽभिधीयते-दहरउत्तरेभ्यः दहराकाशः परं ब्रह्मः, कुतः ? उत्तरेभ्यो वाक्यगतेभ्यो हेतुभ्यः । “एष आत्माऽ- पहतपाप्मा विजरोविमृत्युर्विशोको विजिघित्सोऽपिपासः सत्यकामः सत्यसंकल्प” इति निरुपाधिकात्मत्वमपह पाप्मत्वादिकं सत्य कामत्वं सत्यसंकल्पत्वं चेति दहराकाशे श्रूयमाणा गुणाः, दहराकाशं परं ब्रह्मेति ज्ञापयंति । उक्त संशश की निवृत्ति के लिए सूत्रकार सिद्धान्त रूप से “दहर- उत्तरेभ्यः” सूत्र प्रस्तुत करते हैं । अर्थात् दहराकाश पर ब्रह्म है-क्योंकि- उक्त वाक्य के परवर्त्ती वाक्य में जो दहर संबंधी हेतु प्रस्तुत किये गए हैं उनसे यही निर्णय होता है । “यह आत्मा निष्पाप-अजर-अमर-; शोक- भूख-प्यास रहित, सत्यकाम और सत्य संकल्प है ।” इस परवर्त्ती वाक्य मे, दहराकाश के जो गुण कहे गए है, वे दहराकाश में स्थित, स्वाभाविक निष्पाप, सत्यकाम सत्यसंकल्प परब्रह्म की विशेषताओ के द्योतक है । “अथ ह इहात्मानमनुविद्य ब्रजंत्येतांश्च सत्यान् कामांस्तेषां सर्वेषुलोकेषु कामचारो भवति “इत्यादिना” यं कामं कामयते ankurnagpal108@gmail.com

( ४८६ ) सोऽस्य संकल्पादेव समुत्तिष्ठंति तेन संपन्नो महीयते” इत्यंतेन दहरा- काशवेदिनः सत्यसंकल्पत्व प्राप्तिश्चोच्यमानं दहराकाशं परं ब्रह्मोत्य- वगमयति । तथा—“जो इस लोक में, परमात्मा और उनके संकल्पों को जान लेता है, वह देहांत के बाद सभी लोकों में स्वच्छंदतापूर्वक भ्रमण कर सकता है” इत्यादि से तथा “ऐसा व्यक्ति जो भी कामनायें करता है, वह तत्काल उसके समक्ष प्रस्तुत हो जाती हैं जिससे कि वह प्रफुल्ल हो जाता है” इस अंतिम वाक्य से, दहराकाश के ज्ञाताओं की सत्यसंकल्पता की जो प्राप्ति बतलाई गई है, वह दहराकाश की पर ब्रह्मता का द्योतन करती है । “यावान्वाऽयमाकाशस्तावन् एषोऽन्तर हृदय आकाशः” इत्यु- पमानोपमेयभावश्च दहराकाशस्य, भूताकाशत्वे नोपपद्यते । हृदया- वच्छेदनिबंधन उपमानोपमेय भाव इति चेत्-तथा सति, हृदया- वच्छिन्नस्य द्यावापृथिव्या

( ४६० ) यदि कहें कि-दहराकाश की परमात्मता मान लेने पर, ब्रह्माकाश की उपमेयता संभव नहीं है, "वह पृथिवी से श्रेष्ठ आकाश से श्रेष्ठ है" इत्यादि वाक्यों में अनुपम बतलाया है अतः वह कैसे उपमेय हो सकता है ? बात ऐसी नहीं है-दहराकाश के हृदयपुंडरीक की अल्पता का निवारण ही उक्त वाक्य का प्रयोजन है-जैसे कि-अधिक वेगवान सूर्य के होते हुए भी "सूर्य तीर की तरह जाता है ।" इत्यादि में उसकी मंदगति का निवारण किया गया है । अथस्यात्-"एष आत्माऽपहतपाप्मा" इत्यादिना दहराकाशो न निर्दिश्यते "दहरोऽस्मिन्नंतर आकाशस्तस्मिन्यदन्तस्तदन्वेष्टव्यम्" इति दहराकाशान्तर्वर्तिनस्ततोऽन्यस्यान्वेष्टव्यत्वेन प्रकृतत्त्वादिह 'एष आत्माऽपहतपाप्मा" इति तस्यैवान्वेष्टव्यस्य निर्देष्टुं युक्तत्वात् । आपत्ति की जाती है कि-"यह आत्मा निष्पाप है" इत्यादि में दहराकाश का निर्देश नहीं है "दहर आकाश में जो आकाश है उसके अन्तर्वर्त्ती का अन्वेषण करना चाहिए' इत्यादि में, दहराकाशान्तर्वर्त्ती किसी अन्य के अन्वेषण का उल्लेख मिलता है, इसलिए 'यह आत्मा निष्पाप है" इत्यादि में उसी के अन्बेषण का निर्देश मानना संगत है। [L1

स्वाभाविनवधिकातिशय कल्याणगुणजातं च ध्येयं “तदन्वष्टव्यम्” इत्युपदिश्यते । अत्र “तदन्वेष्टव्यम्” इति तच्छब्देन दहराकाशम्, तदन्तर्वर्तिगुणजातं च परामृश्य तदुभयमन्वेष्टव्यमित्युपदिश्यते, “तदिदमस्मिन्ब्रह्मपुरे दहरं पुण्डरीकं वेश्म” इत्यनूद्य तस्मिन् दहर- पुण्डरीकवेश्मनि यो दहराकाशः, यच्च तदंतर्वर्तिगुणजातम् तदुभय- मन्वेष्टव्यमिति विधीयत इत्यर्थः । आपत्ति उचित ही है क्योंकि उक्त श्रुति में दहराकाश और उसके मध्यवर्त्ती आकाश का भेद नहीं बतलाया गया है ऐसा प्रतीत होता है, पर उस श्रुति में भेद दिखलाया गया है, विश्लेषण करने पर ही ज्ञात हो सकता है—जैसे कि—“इस ब्रह्मपुर में दहर पुंडरीक कोष है, उसमें जो दहर आकाश है, उसके मध्यवर्त्ती का अन्वेषण करना चाहिए।” इस वाक्य में, ब्रह्मपुर शब्द से उपास्य परब्रह्म के स्थानीय उपासक के शरीर बतलाकर तथा, उस शरीर के मध्यवर्त्ती उसी के अवयव, कमल के आकार वाले सूक्ष्म हृदय को परब्रह्म का घर बतलाकर, सर्वज्ञ, सर्वशक्ति- मान, आश्रित, करुणा सागर, उपासक के अनुगृह के लिए उसी में स्थित, सूक्ष्मरूप से ध्येय को, दहराकाश शब्द से निर्देश करके, उसी के अन्तर्वर्त्ती, स्वभाव से निष्पाप, महान्, सत्यकाम सत्यसंकल्प आदि गुणों वाले ध्येय को अन्वेष्टव्य कहा गया है। ‘तदन्वेष्टव्यम्’ पद में “तद्” शब्द दहरा- काश और उसके अन्तवर्त्ती गुणों, दोनों का ही द्योतक है, इन दोनों को ही अन्वेषणीय कहा गया है। “इस ब्रह्मपुर में जो सूक्ष्म पुंडरीक गृह है” इस वाक्य में पुनरुल्लेख पूर्वक, उसी दहर पुंडरीक में स्थित दहराकाश और उनके अन्तवर्त्ती गुणों का अन्वेषण बतलाया गया है। दहराकाश शब्द निर्दिष्टस्य परब्रह्मत्वं “तस्मिन्यदन्तः” इति निर्दिष्टस्य च तद्गुणत्वम्, तच्छब्देनोभयं परामृश्योभयस्याप्यन्वेष्ट- व्यतया विधानं च कथमवगम्यत ? इति चेत्—तदवहितमनाश्शृणु— “यावान्वा अयमाकाशस्तावनेषोऽन्तहृदय आकाशः” इति दहराकाश- स्यातिमहत्तामभिधाय । “उभेऽस्मिन् द्यावापृथिवी अंतरेव समाहिते

िति तमेव दहराकाशं परामृश्य तस्मिन्नस्योपासक- Wait, in line 4: "पुनरप्यास्मिन्निति" or "पुनरप्यास्मिन्निति"? Let's check line 4: प ु न र प ्य ़ ा? No, प ु न र प ्य ा स् म ि न ् न ि त ि Yes: "पुनरप्यास्मिन्निति" (notice the ā-matra: प्यास्मिन्निति, even though in Sanskrit it's पुनरप्यस्मिन्निति, here it clearly has an 'ā' matra: "पुनरप्यास्मिन्निति"). Wait, look at line 3: "तदास्मिन्समाहितं" -> in shruti it is "तदस्मिन्समाहितम्", but printed as "तदास्मिन्समाहितं". And in line 4: "पुनरप्यास्मिन्निति"! It repeats the ā-kāra from the quote! Exactly as printed.

स्येहलोके यद्भोग्यजातमस्ति, यच्च मनोरथमात्र गोचरमिह नास्ति, Wait, in line 5: "मनोरथमात्र गोचरमिह" - space between मात्र and गोचर? Yes.

सर्व्वं तद्भोग्यजातं अस्मिन्दहराकाशे समाहितमिति निरतिशय भोग्य- Wait, space between

( ४६३ ) यदि कहो कि-दहराकाश शब्द का तात्पर्य परब्रह्म तथा-“तस्मिन् यदंतः” इत्यादि में उसके गुणों को उपास्य कहा गया है, यह कैसे जाना ? तो ध्यान देकर सुनो--“जितना यह भूताकाश है, उतना ही हृदयस्थ आकाश है” इसमें दहराकाश की महत्ता बतलाकर-“द्युलोक और भूलोक, अग्नि और वायु, सूर्य और चंद्र, विद्युत और नक्षत्र, ये सभी अभ्यंतर में हैं” इसमें अस्मिन् शब्द से दहराकाश को स्वभावतः संपूर्ण जगत का आधार बतलाकर--“जो कुछ भी यहाँ है, और जो नहीं है, वह सभी कुछ इस दहर में समाहित है” इसमें पुनः अस्मिन् शब्द से दहरा- काश का उल्लेख करके उपासक के शरीर में जो भोग्य हैं, जो कि एक- मात्र अभिलाषा के विषयीभूत हैं, वे सारे ही इस निरतिशय दहराकाश के निरतिशय भोग्य हैं, इत्यादि का प्रतिपादन करके देह के अवयव हृदय में होते हुए भी, देह के जराध्वंस आदि विकारों से रहित, परमकारण अतिसूक्ष्म दहराकाश की निर्विकारतमता का प्रतिपादन करते हुए, उसी दहराकाश को “यही सत्यस्वरूप ब्रह्मपुर है” समस्त जगत के आधार स्वरूप ब्रह्मपुर बतलाया गया है। “इसी मे कामनायें समाहित है” इत्यादि में अस्मिन् शब्दवाची दहराकाश के काम्यगुणों को काम शब्द से बतलाते हुए अंतर्वर्ती कहा गया है। उस दहराकाश के काम्यभूत कल्याण गुण विशिष्टों को “एष आत्माअपहतपाप्मा” से लेकर “सत्य- संकल्पः” तक बतलाकर “प्राणी इसी में अनुप्रविष्ट होते हैं” इत्यादि से “उनकी सभी लोकों में यथेच्छगति हो जाती है” इस अंतिम वाक्यतक यह बतलाया गया कि-आठ विशिष्ट गुणों से युक्त दहराकाश नामवाले आत्मा को न जानने से ही, जीव भोग्य पदार्थों की प्राप्ति के लिए कर्मा- सक्त रहता है, जिससे उसे ध्वंशशील संसार ही प्राप्त होता है, उसके विचार भी असत्य होते हैं। तथा--“जो इस आत्मा को जानकर सत्य संकल्प वाला होता है, उसकी सभी लोकों में अप्रतिहत गति होती है” इसमें निर्दिष्ट दहराकाश आत्मा और उसके अन्तरस्थ-काम्यभूत निष्पाप आदि गुणों के ज्ञाता की, उदारगुण सागर परमपुरुष की कृपा से, सभी कामनाओं की प्राप्ति और सत्यसंकल्पता होती है। उक्त विश्लेषण से ज्ञात होता है कि-दहराकाश परब्रह्म है, उसके अंदर स्थित निष्पापता आदि विशिष्ट गुणों सहित, उसका अनुसंधान करना चाहिए; उसे ही ज्ञातव्य बतलाया गया है। वाक्यकार ने भी ऐसा ही कहा है--“उसमें जो ankurnagpal108@gmail.com

विशिष्ट गुणों का निर्देश है, वह ज्ञातव्य है' इत्यादि से सिद्ध होता है कि-दहराकाश परब्रह्म है । गतिशब्दाभ्यां तथाहि दृष्टं लिंग च ।१।३।१४॥ इतश्च दहराक शः परंब्रह्म "तद्यथा हिरण्य निधिं निहितमक्षे त्रज्ञा उपर्युपरि संचरंतो न विन्देयुरेवमेवेमाः सर्वाः प्रजा अहरहर्ग- च्छन्त्य एतं ब्रह्मलोकं न विन्दत्यनृतेन हि प्रत्यूढाः” इति एतमिति प्रकृतं दहराकाशं निर्दिश्य तत्राहरहःसर्वेषां क्षेत्रज्ञानां गमनं, गंतव्यस्य तस्य दहराकाशस्य ब्रह्मलोकशब्द निर्देशश्च दहराकाशस्य परब्रह्मतां गमयतः । इसलिए भी दहराकाश परब्रह्म है कि-“जैसे भूविद्या को न जानने वाले, भूमि के ऊपर-ऊपर ही घूमते रहते हैं, भूमिस्थ सुवर्णराशि को प्राप्त नहीं करते, वैसे ही सांसारिक प्रवाह में बहते हुए प्राणी, ब्रह्मलोक की प्राप्ति नहीं कर पाते, क्योंकि वे अज्ञान से आवृत हैं” इस वाक्य में "एतं” पद से उल्लेख्य ब्रह्मलोक को बतलाकर-समस्त प्रजाओं के नित्य गमन की बात कही गई, तथा दहराकाश शब्द से ब्रह्मलोक का उल्लेख किया गया, इन दोनों से दहराकाश की परब्रह्मता ज्ञात होती है । कथमनयोरस्य परब्रह्मत्वसाधकत्वमित्यत आह-तथाहि दृष्टम् इति । परास्मिन् ब्रह्मणि सर्वेषां क्षेत्रज्ञानामहरहस्सुषुप्तिकाले गमन- मभ्यत्राभिधीयमानं दृष्टम् “एवमेव खलु सोम्येमास्सर्वाः प्रजाः सति संपद्य न विदुः सति संपत्स्यामहै” इति । “सत आगम्य न विदुः सत् आगच्छामह" इति च । तथा ब्रह्मलोक शब्दश्च परास्मिन् ब्रह्मणि दृष्टः 'एष ब्रह्मलोकः सम्राडिति होवाच” इति । माभूदन्यत्र ब्रह्मणि गमन दर्शनम्, एतदेव तु दहराकाशे सर्वेषा क्षेत्रज्ञानां प्रलयकाल एव निरस्तनिखिलदुःखानां सुषुप्तिकालेऽवस्थानं श्रूयमाणम- स्य परब्रह्मत्वे पर्याप्तं लिंगम् । तथा ब्रह्मलोक शब्दश्च समानाधि- करण वृत्त्याऽस्मिन्दहराकाशे प्रयुज्यमानोऽस्य ब्रह्मत्वे प्रयोगान्तर

( ४१५ ) निरपेक्षं पर्याप्तं लिंगमित्याह-लिंग च इति । निषादस्थपति न्याया- च्च षष्ठी समासात् समानाधिकरण समासो न्याय्यः । यदि कहो कि-ये दोनों ही दहराकाश की ब्रह्मात्मकता को सिद्ध करने वाले हैं, यह कैसे जाना ? सो इनका ऐसा ही वर्णन मिलता है । सभी जीव, सुषुप्ति अवस्था में परब्रह्म में प्रविष्ट होते हैं, ऐसा भी वर्णन मिलता है- 'हे सौम्य ! ठीक इसी प्रकार यह सारी प्रजा, नित्य, सद्ब्रह्म से संपन्न होकर, यह नहीं जान पाती कि-वह सद्ब्रह्म से संलग्न है तथा सद्ब्रह्म से लौटने पर भी यह नहीं जान पाती कि-सद्ब्रह्म के निकट से लौटे हैं" इस प्रकार ब्रह्मलोक शब्द परब्रह्म के लिए प्रयुक्त देखा जाता है।" उसने कहा हे सम्राट ! यही ब्रह्मलोक है" इत्यादि ही ब्रह्म दर्शन संबंधी पर्याप्त प्रमाण हैं। प्रलय काल की तरह सुषुप्ति अवस्था में भी, दहराकाश में अवस्थान करने पर, जीवों के आत्यंतिक दुःख का अभाव हो जाता है, ऐसा श्रुतियों का वचन है। इसी से दहराकाश की ब्रह्मरूपता

( ४६६ ) भूमि में गड़े हुए धन को, भूमि पर घूमते फिरते हुए भी न देख पाते हैं न जान पाते हैं, यह रहस्य भी वैसा ही है । सेयमेवमंतरात्मत्वेन स्थितस्य दहराकाशस्योपरि तन्नियमतानां सर्वासां प्रजानामजानतीनां सर्वदा गतिस्य दहराकाशस्य परब्रह्मतां गमयति । तथाहि अन्यत्र परस्यब्रह्मणोऽन्तरात्मतयाऽवस्थितस्य स्वनियम्याभिस्स्वस्मिन् वर्त्तमानाभिः प्रजाभिरवेदनं दृष्टम् । यथा अंतर्यामिब्राह्मणे “य आत्मनितिष्ठन् आत्मनोऽन्तरो यमात्मा न वेद, यस्यात्मा शरीरं, य आत्मानमंतरौ यमयति” इति “अदृष्टो द्रष्टा अश्रुतश्रोता” इति च । मामूदन्यत्र दर्शनम्, स्वयमेवत्वियं निधिदृष्टान्तावगत परमपुरुषार्थं भावस्यास्य हृदयस्थस्योपरितदाधा- रतऽहरहस्सर्वदा सर्वासांप्रजानामजानातोना गतिस्य परब्रह्मत्वे पर्याप्तं लिंगम् । अन्तरात्मा रूप से अवस्थित दहराकाश के ऊपर की जो स्थिति है वह भी, उसी के नियमन पर आधारित है, यही दहराकाश की पर- ब्रह्मता का प्रमाण है । अन्यान्य श्रुतिवाक्यों में भी, परब्रह्म की अन्तरात्मा रूप से स्थिति और नियामकता, तथा जीवात्मा की अल्पज्ञता का वर्णन किया गया है—जैसे कि—अन्तर्यामी ब्राह्मण में—‘जो आत्मा में ही सदा स्थित है, पर आत्मा जिसे नहीं जानता, आत्मा ही उसका शरीर है, वह अन्दर बैठा ही आत्मा का संयमन करता है,’’ वह अदृष्ट होकर भी द्रष्टा तथा अश्रुत होकर भी श्रोता है’’ इत्यादि । इससे अधिक अब और प्रमाणों की आवश्यकता नहीं है । निधि के दृष्टांत से जिसकी परपुरुषा- र्थता बतलाई गई, हृदयस्थ उस दहराकाश के ऊपर ही ऊपर सदा वर्त्तमान जीवात्माओं की, उसकी ओर होने वाली गति ही, दहराकाश की परब्रह्मता का पर्याप्त प्रमाण है । इतश्च दहराकाशः परब्रह्म—दहराकाश इसलिए भी परब्रह्म है कि— धृतेश्च महिम्नोऽस्यास्मिन्नुपलब्धेः ।१।३।१५॥ “अथ य आत्मा” इति प्रकृतं दहराकाशं निर्दिश्य “स सेतु- ankurnagpal108@gmail.com

( ४६७ ) विधृतिरेषां लोकानामसंभेदाय” इत्यस्मिञ्जगद्विधरणं श्रूयमाणं दहराकाशस्य परब्रह्मतां गमयति । जगद् विधरणं हि परस्यब्रह्मणो महिमा “एष सर्वेश्वर एष सर्वभूताधिपतिरेष भूतपाल एष सेतुर्वि- धरण एषां लोकानमसंभेदाय” इति “एतस्य वाऽक्षरस्य प्रशासने गार्गि सूर्याचन्द्रमसौ विधृतौ तिष्ठतः” इत्यादिभ्यः । स चायं तस्य परस्य ब्रह्मणो धृत्याख्यो महिमाऽस्मिन् दहराकाश उपलभ्यते; अतो दहराकाश परब्रह्म । “जो आत्मा में” इत्यादि में दहराकाश के वास्तविक स्वरूप का वर्णन करके—‘इस समस्त जगत के संभेद अर्थात् सांकर्य का निवारण करने वाला वह सेतु है” इत्यादि में जो जगद् धारकता बतलाई गई है, उससे दहराकाश की, परब्रह्मता ज्ञात होती है । परब्रह्म की महिमा की बतलाने वाली जगद्धारकता “यही सर्वेश्वर-भूताधिपति-भूतपालक और जगत् की मर्यादा की रक्षा करने वाले सेतु हैं, “हे गार्गि ! इस अक्षर के प्रशासन में ही सूर्य और चंद्र स्थित रहते हैं” इत्यादि वाक्यों से भी ज्ञात होती है । जगद्धारकता रूप परब्रह्म की महिमा, दहराकाश में भी उपलब्ध है, इसलिए भी दहराकाश, परब्रह्म है । प्रसिद्धेश्च ।१।३।१६॥ आकाशशब्दश्च परस्मिन् ब्रह्मणि प्रसिद्धः “को वा ह्येवान्यात् कः प्राण्यात्, यदेष आकाश आनंदो न स्यात्”—“सर्वाणि ह वा इमानि भूतान्याकाशादेव समुत्पद्यंते” इत्यादिषु; अपहतपाप्मत्वादि- गुण सनाथा प्रसिद्धिर्भूताकाश प्रसिद्धेर्बलीयसी इत्यभिप्रायः । “यह आकाश यदि आनंद स्वरूप न होता तो, आनंद की चेष्टायें कौन कर सकता ?” सारे ही प्राणी आकाश से उत्पन्न होते हैं” इत्यादि वाक्यों में प्रयुक्त आकाश शब्द, परब्रह्म के लिए प्रसिद्ध है । निष्पापता आदि गुणों से युक्त जो प्रसिद्धि है, वही भूताकाश से, दहराकाश की श्रेष्ठता की द्योतिका है । ankurnagpal108@gmail.com

( ४६८ ) ‥ एवं तावद्दहराकाशस्य भूताकाशत्वं प्रतिक्षिप्तम् । अथेदानीं दहराकाशस्य प्रत्यगात्मत्वमाशंक्य, निराकर्तुमुपक्रमते । अब तक दहराकाश की, भूताकाशता का निराकरण किया गया । अब आगे दहराकाश की जीवात्मकता की आशंका करके, उसका निरा- करण करते हैं— इतरपरामर्शात्स इति चेन्नासंभवात् ।१।३।१७॥ यदुक्तं वाक्य शेषवशाद् दहराकाशः परंब्रह्मेति, तदयुक्तम्; वाक्यशेषे परमादितरस्य जीवस्यैव साक्षात् परामर्शात् “अथ य एष संप्रसादोऽस्माच्छरीरात्समुत्थाय परंज्योतिरूपसंपद्य स्वेन रूपेणा- भिनिष्पद्यते एष आत्मेति होवाच एतदमृतमभयमेतद् ब्रह्म” इति । यद्यपि “दहरोऽस्मिन्नंतर आकाशः” इति हृदयपुंडरीक मध्यव- र्त्तितयोपदिष्टस्याकाशस्योपमानोपमेयभावाद्यसंभवाद् भूताकाशत्वं न संभवति, तथापि वाक्यशेषवशात् प्रत्यगात्मत्वं युक्तमाश्रयितुम् । आकाशशब्दोऽपि प्रकाशादियोगाज्जीव एव वर्त्तिष्यत इति चेत्— अत्रोत्तरं नासम्भवात्–इति । नायं जीवः, न हि अपहतपाप्मत्वादयो गुणाः जीवे संभवंति । जो यह कहा कि—अंतिमवाक्य से ज्ञात होता है कि-दहराकाश परब्रह्म है, सो कथन ठीक नहीं, उसमें तो परमात्मा से भिन्न जीवात्मा का ही स्पष्ट उल्लेख प्रतीत होता है-जैसे कि-“यह संप्रसाद इस शरीर से उठकर, परंज्योति को प्राप्त कर अपने वास्तविक रूप को प्राप्त करता है यही अमृत-अभय-और ब्रह्मस्वरूप है ।” इत्यादि यद्यपि-“दहर के अंदर का आकाश” इत्यादि में उल्लेख्य आकाश का वाह्याकाश के साथ उपमानोपमेय भाव संभव नहीं है, फिर भी हृदय पुंडरीक के मध्यवर्ती दहरकाश की भूताकाशता हो सकती है यह ठीक है, किंतु वाक्य शेष के अनुसार उसे जीवात्मा मानना उचित है । प्रकाश- मयता आदि गुणों से संबद्ध होने से आकाश शब्द जीव वाची ही हो सकता है । ankurnagpal108@gmail.com