तैत्तिरीयोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Taittiriya Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
नवम अनुवाक ब्रह्मानन्दका अनुभव करनेवाले विद्वान्की अभयप्राप्ति यतो वाचो निवर्तन्ते अप्राप्य मनसा सह । आनन्दं ब्रह्मणो विद्वान् न बिभेति कुतश्चनेति । एतँह वाव न तपति । किमहँसाधु नाकरवम् । किमहं पाप- मकरवमिति । स य एवं विद्वानेते आत्मानँ स्पृणुते । उभे ह्येवैष एते आत्मानँ स्पृणुते । य एवं वेद । इत्युप- निषत् ॥ १ ॥ जहाँसे मनके सहित वाणी उसे प्राप्त न करके लौट आती है उस ब्रह्मके आनन्दको जाननेवाला किसीसे भी भयभीत नहीं होता । उस विद्वान्को, मैंने शुभ क्यों नहीं किया, पापकर्म क्यों कर डाला—इस प्रकारकी चिन्ता सन्तप्त नहीं करती । उन्हें [ ये पाप और पुण्य ही तापके कारण हैं--] इस प्रकार जाननेवाला जो विद्वान् अपने आत्माको प्रसन्न अथवा सबल करता है उसे ये दोनों आत्मस्वरूप ही दिखायी देते हैं । [ वह कौन है ? ] जो इस प्रकार [ पूर्वोक्त अद्वैत आनन्दस्वरूप ब्रह्मको ] जानता है । ऐसी यह उपनिषद् ( रहस्यविद्या ) है ॥ १ ॥ यतो यस्मान्निर्विकल्पाद्यथोक्त- | जिस पूर्वोक्त लक्षणोंवाले | निर्विकल्प अद्वयानन्दरूप आत्माके लक्षणादद्वयानन्दादात्मनो वाचो- | पाससे द्रव्यादि सविकल्प वस्तुओंको | प्रकाशित करनेवाला वाक्य-- ऽभिधानानि द्रव्यादिसविकल्प- | अभिधान, जो वस्तुत्वमें [ ब्रह्मको CC-0 Pt. Chakradhar Joshi and Sons, Dev Prayag. Digitized by eGangotri
[अनु० ९ ] शाङ्करभाष्यार्थ २०९
[मूल संस्कृत (वाम भाग)]
वस्तुविषयाणि वस्तुसामान्या- न्निर्विकल्पेऽद्वयेऽपि ब्रह्मणि प्रयो- क्तृभिः प्रकाशनाय प्रयुज्यमाना- न्यप्राप्याप्रकाशयैव निवर्तन्ते स्वसामर्थ्याद्धीयन्ते— मन इति प्रत्ययो विज्ञानम् । तच्च यत्राभिधानं प्रवृत्तमतीन्द्रि- येऽप्यर्थे तदर्थे च प्रवर्तते प्रका- शनाय । यत्र च विज्ञानं तत्र वाचः प्रवृत्तिः । तस्मात्सहैव वाङ्मनसयोरभिधानप्रत्यययोः प्रवृत्तिः सर्वत्र । तस्माद्ब्रह्मप्रकाशनाय सर्वथा प्रयोक्तृभिः प्रयुज्यमाना अपि वाचो यस्मादप्रत्ययविषयादन- भिधेयाददृश्यादिविशेषणात्सहैव मनसा विज्ञानेन सर्वप्रकाशन- समर्थेन निवर्तन्ते तं ब्रह्मण आ- नन्दं श्रोत्रियस्यावृजिनस्याकामह- तै० उ० २७–२८--
[हिन्दी भाष्यार्थ (दक्षिण भाग)]
अन्य सविकल्प वस्तुओंके ] समान समझनेके कारण वक्ताओंद्वारा, ब्रह्म- के निर्विकल्प और अद्वैत होनेपर भी, उसका निर्देश करनेके लिये प्रयोग किया जाता है, उसे न पाकर अर्थात् उसे प्रकाशित किये बिना ही लौट आता है—अपनी सामर्थ्यसे च्युत हो जाता है— [ 'मनसा सह' ( मनके सहित ) इस पदसमूहमें ] 'मन' शब्द प्रत्यय अर्थात् विज्ञानका वाचक है । वह, जहाँ-कहीं अतीन्द्रिय पदार्थोंमें भी शब्दकी प्रवृत्ति होती है वहीं उसे प्रकाशित करनेके लिये प्रवृत्त हुआ करता है । जहाँ-कहीं भी विज्ञान है वहीं वाणीकी भी प्रवृत्ति है । अतः अभिधान और प्रत्ययरूप वाणी और मनकी सर्वत्र साथ-साथ ही प्रवृत्ति होती है । इसलिये वक्ताओंद्वारा सर्वथा ब्रह्मका प्रकाश करनेके लिये ही प्रयोग की हुई वाणी, जिस प्रतीतिके अविषयभूत, अकथनीय, अदृश्य और निर्विशेष ब्रह्मके पाससे मन अर्थात् सबको प्रकाशित करनेमें समर्थ विज्ञानके सहित लौट आती है उस ब्रह्मके आनन्दको—श्रोत्रिय निष्पाप
२१० तैत्तिरीयोपनिषद् [ वल्ली २
२१० तैत्तिरीयोपनिषद् [ वल्ली २ तस्य सर्वैषणाविनिर्मुक्तस्यात्मभूतं | अकामहत और सब प्रकारकी विषयविषयिसंबन्धविनिर्मुक्तं | एषणाओंसे मुक्त साधकके आत्मभूत, स्वाभाविकं नित्यमविभक्तं पर- | विषय-विषयी सम्बन्धसे रहित, स्वाभाविक, नित्य और अविभक्त मानन्दं ब्रह्मणो विद्वान्यथोक्तेन | ऐसे ब्रह्मके उत्कृष्ट आनन्दको पूर्वोक्त विधिसे जाननेवाला पुरुष कोई विधिना न बिभेति कुतश्चन | भयका निमित्त न रहनेके कारण निमित्ताभावात् । | किसीसे भयभीत नहीं होता । न हि तस्माद्विदुषोऽन्यद्वस्त्व- | उस विद्वान्से भिन्न कोई दूसरी न्तरमस्ति भिन्नं यतो बिभेति । | वस्तु ही नहीं है जिससे कि उसे भय अविद्यया यदोदरमन्तरं कुरुते, | हो । अविद्यावश जब थोड़ा-सा भी अन्तर करता है तभी जीवको भय अथ तस्य भयं भवतीति ह्युक्तम् । | होता है—ऐसा कहा ही गया है । विदुषश्चाविद्याकार्यस्य तैमिरिक- | अतः तिमिररोगीके देखे हुए द्वितीय चन्द्रमाके समान विद्वान्के अविद्या- दृष्टद्वितीयचन्द्रवन्नाशाद्भयनिमि- | के कार्यभूत भयके निमित्तका नाश त्तस्य न बिभेति कुतश्चनेति | हो जानेके कारण वह किसीसे नहीं युज्यते । | डरता—ऐसा कहना ठीक ही है । मनोमये चोदाहृतो मन्त्रो | मनोमय कोशके प्रकरणमें यह मन्त्र उदाहरणके लिये दिया गया मनसो ब्रह्मविज्ञानसाधनत्वात् । | था; क्योंकि मन ब्रह्मविज्ञानका तत्र ब्रह्मत्वमध्यारोप्य तत्स्तु- | साधन है । उसमें ब्रह्मत्वका आरोप त्यर्थं न बिभेति कदाचनेति | करके उसकी स्तुतिके लिये ही 'वह कभी नहीं डरता' इस वाक्यसे उसके भयमात्रं प्रतिषिद्धमिहाद्वैतविषये | भयमात्रका प्रतिषेध किया गया था । न बिभेति कुतश्चनेति भयनिमि- | यहाँ अद्वैतप्रकरणमें वह किसीसे नहीं डरता,—इस प्रकार भयके त्तमेव प्रतिषिध्यते । | निमित्तका ही प्रतिषेध किया जाता है। CC-0 Pt. Chakradhar Joshi and Sons, Dev Prayag. Digitized by eGangotri
अनु० ९ ] शाङ्करभाष्यार्थ २११ नन्वस्ति भयनिमित्तं साध्व- शङ्का—किन्तु शुभ कर्मका न करणं पापक्रिया च ? करना और पापकर्म करना यह तो भयका कारण है ही ? नैवम्; कथमित्युच्यते—एतं समाधान—ऐसी बात नहीं है । यथोक्तमेवंचिदम्, ह वावेत्यव- किस प्रकार नहीं है सो बतलाया जाता है—इस पूर्वोक्तको अर्थात् इस धारणार्थो, न तपति नोद्वेज- प्रकार जाननेवालेको वह तप्त—उद्विग्न यति न संतापयति । कथं पुनः अर्थात् सन्तप्त नहीं करता । मूलमें 'ह' और 'वाव' ये निश्चयार्थक साध्वकरणं पापक्रिया च न निपात हैं । वह पुण्यका न करना तपतीत्युच्यते । किं कस्मात्साधु और पापक्रिया उसे किस प्रकार शोभनं कर्म नाकरवं न कृतवा- ताप नहीं देते ? इसपर कहते हैं—'मैंने शुभ कर्म क्यों नहीं किया' नस्मीति पश्चात्संतापो भवत्या- ऐसा पश्चात्ताप मरणकाल समीप सन्ने मरणकाले । तथा किं आनेपर हुआ करता है तथा 'मैंने कस्मात्पापं प्रतिषिद्धं कर्माकरवं पाप यानी प्रतिषिद्ध कर्म क्यों किया' ऐसा दुःख नरकपात आदि- कृतवानस्मीति च नरकपतनादि- के भयसे होता है । ये पुण्यका न दुःखभयात्तापो भवति । ते एते करना और पापका करना इस साध्वकरणपापक्रिये एवमेनं न विद्वान्को इस प्रकार सन्तप्त नहीं करते जैसे कि वे अविद्वान्को किया तपतो यथाविद्वांसं तपतः । करते हैं । कस्मात्पुनर्विद्वांसं न तपत वे विद्वान्को क्यों सन्तप्त नहीं इत्युच्यते—स य एवंविद्वानेते करते ? सो बतलाया जाता है—ये साध्वसाधुनी तापहेतू इत्यात्मानं पाप-पुण्य ही तापके हेतु हैं—इस प्रकार जाननेवाला जो विद्वान् स्पृणुते प्रीणयति बलयति वा आत्माको प्रसन्न अथवा सबल करता CC-0 Pt. Chakradhar Joshi and Sons, Dev Prayag. Digitized by eGangotri
२१२ तैत्तिरीयोपनिषद् [ वल्ली २
यहाँ पृष्ठ का पूर्ण एवं यथावत पाठ प्रस्तुत है:
२१२ तैत्तिरीयोपनिषद् [ वल्ली २ परमात्मभावेनोभे पश्यतीत्यर्थः । | है अर्थात् इन दोनोंको परमात्मभाव- | से देखता है [ उसे ये पाप-पुण्य उभे पुण्यपापे हि यस्मादेवमेष | सन्तप्त नहीं करते ] । क्योंकि ये | पाप-पुण्य दोनों ऐसे हैं [ अर्थात् विद्वानेते आत्मानमात्मरूपेणैव | आत्मस्वरूप हैं ] अतः यह विद्वान् | इस पाप-पुण्यरूप आत्माको आत्म- पुण्यपापे स्वेन विशेषरूपेण | भावनासे ही अपने विशेषरूपसे | शून्य कर आत्माको ही तृप्त करता शून्ये कृत्वात्मानं स्पृणुत एव । | है । वह विद्वान् कौन है ? जो इस | प्रकार जानता है अर्थात् पूर्वोक्त को य एवं वेद यथोक्तमद्वैत- | अद्वैत एवं आनन्दस्वरूप ब्रह्मको | जानता है । उसके आत्मभावसे मानन्दं ब्रह्म वेद तस्यात्मभावेन | देखे हुए पुण्य-पाप निर्वीर्य और | ताप पहुँचानेवाले न होनेसे दृष्टे पुण्यपापे निर्वीर्ये अतापके | जन्मान्तरके आरम्भक नहीं होते । जन्मान्तरारम्भके न भवतः । | इतीयमेवं यथोक्तास्यां वल्लयां | इस प्रकार इस वल्लीमें, जैसी कि | ऊपर कही गयी है, यह ब्रह्मविद्या- ब्रह्मविद्योपनिषत्सर्वाभ्यो विद्या- | रूप उपनिषद् है । अर्थात् इसमें | अन्य सब विद्याओंकी अपेक्षा परम भ्यः परमरहस्यं दर्शितमित्यर्थः । | रहस्य प्रदर्शित किया गया है । इस परं श्रेयोऽस्यां निषण्णमिति ॥ १ ॥ | विद्यामें ही परम श्रेय निहित है ॥१॥ इति ब्रह्मानन्दवल्ल्यां नवमोऽनुवाकः ॥ ९ ॥ इति श्रीमत्परमहंसपरिव्राजकाचार्यगोविन्दभगवत्पूज्यपादशिष्य- श्रीमच्छङ्करभगवतः कृतौ तैत्तिरीयोपनिषद्भाष्ये ब्रह्मानन्दवल्ली समाप्ता । CC-0 Pt. Chakradhar Joshi and Sons, Dev Prayag. Digitized by eGangotri
भृगुवल्ली
भृगुवल्ली प्रथम अनुवाक भृगुका अपने पिता वरुणके पास जाकर ब्रह्मविद्याविषयक प्रश्न करना तथा वरुणका ब्रह्मोपदेश सत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्माकाशा- | क्योंकि सत्य, ज्ञान और अनन्त दिकार्यमन्नमयान्तं | ब्रह्म ही आकाशसे लेकर अन्नमय- उपक्रमः सृष्ट्वा तदेवानुप्रविष्टं | पर्यन्त कार्यवर्गको रचकर उसमें | अनुप्रविष्ट हो सविशेष-सा उपलब्ध विशेषवदिवोपलभ्यमानं यस्मा- | हो रहा है इसलिये वह सम्पूर्ण त्स्मात्सर्वकार्यविलक्षणमदृश्यादि- | कार्यवर्गसे विलक्षण अदृश्यादि धर्म- | वाला आनन्द ही है; और वही मैं धर्मकमेवानन्दं तदेवाहमिति | हूँ—ऐसा जानना चाहिये; क्योंकि विजानीयादनुप्रवेशस्य तदर्थत्वा- | उसके अनुप्रवेशका यही उद्देश्य | है । इस प्रकार जाननेवाले उस त्तस्यैवं विजानतः शुभाशुभे | साधकके शुभाशुभ कर्म जन्मान्तरका कर्मणी जन्मान्तरारम्भके न | आरम्भ करनेवाले नहीं होते । | आनन्दवल्लीमें यही विषय कहना भवत इत्येवमानन्दवल्ल्यां विव- | अभीष्ट था । अब ब्रह्मविद्या तो क्षितोऽर्थः परिसमाप्ता च ब्रह्म- | समाप्त हो चुकी । यहाँसे आगे | ब्रह्मविद्याके साधन तपका निरूपण विद्या । अतः परं ब्रह्मविद्या- | करना है तथा जिनका पहले | निरूपण नहीं किया गया है उन साधनं तपो वक्तव्यमन्नादिविष- | अन्नादिविषयक उपासनाओंका भी याणि चोपासनान्यनुक्तानीत्यत | वर्णन करना है; इसीलिये इस
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२१४ तैत्तिरीयोपनिषद् [ वल्ली ३
२१४ तैत्तिरीयोपनिषद् [ वल्ली ३ इदमारभ्यते— | प्रकरणका आरम्भ किया जाता है— भृगुर्वै वारुणिः वरुणं पितरमुपससार अधीहि भगवो ब्रह्मेति । तस्मा एतत्प्रोवाच । अन्नं प्राणं चक्षुः श्रोत्रं मनो वाचमिति । तँहोवाच । यतो वा इमानि भूतानि जायन्ते येन जातानि जीवन्ति । यत्प्रयन्त्य- भिसंविशन्ति । तद्विजिज्ञासस्व । तद् ब्रह्मेति । स तपो- ऽतप्यत । स तपस्तप्त्वा ॥ १ ॥ वरुणका सुप्रसिद्ध पुत्र भृगु अपने पिता वरुणके पास गया [ और बोला— ] 'भगवन् ! मुझे ब्रह्मका बोध कराइये ।' उससे वरुणने यह कहा—'अन्न, प्राण, नेत्र, श्रोत्र, मन और वाक् [ ये ब्रह्मकी उपलब्धिके द्वार हैं ] ।' फिर उससे कहा—'जिससे निश्चय ही ये सब भूत उत्पन्न होते हैं, उत्पन्न होनेपर जिसके आश्रयसे ये जीवित रहते हैं और अन्तमें विनाशोन्मुख होकर जिसमें ये लीन होते हैं उसे विशेषरूपसे जाननेकी इच्छा कर; वही ब्रह्म है ।' तब उस ( भृगु ) ने तप किया और उसने तप करके—॥ १ ॥ आख्यायिका विद्यास्तुतये, पिताने अपने प्रिय पुत्रको इस प्रियाय पुत्राय पित्रोक्तेति— (विद्या) का उपदेश किया था— इस दृष्टिसे यह आख्यायिका विद्याकी भृगुर्वै वारुणिः । वैशब्दः प्रसि- स्तुतिके लिये है । 'भृगुर्वै वारुणिः' इसमें 'वै' शब्द प्रसिद्धका स्मरण द्वानुस्मारको भृगुरित्येवंनामा करानेवाला है । इससे 'भृगु' इस नामसे प्रसिद्ध ऋषिका अनुस्मरण प्रसिद्धोऽनुस्मार्यते । वारुणिर्वरु- कराया जाता है जो वारुणि अर्थात् णस्यापत्यं वारुणिर्वरुणं पितरं वरुणका पुत्र था । वह ब्रह्मको
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नेन मन्त्रेण । अधीहि अध्यापय | 'हे भगवन् ! आप मुझे ब्रह्मका
अनु० १ ] शाङ्करभाष्यार्थ २१५
ब्रह्म विजिज्ञासुरुपससारोपगत- | जाननेकी इच्छावाला होकर अपने वान्, अधीहि भगवो ब्रह्मेत्य- | पिता वरुणके पास गया। अर्थात् नेन मन्त्रेण । अधीहि अध्यापय | 'हे भगवन् ! आप मुझे ब्रह्मका कथय । स च पिता विधिवदुप- | उपदेश कीजिये' इस मन्त्रके द्वारा सन्नाय तस्मै पुत्रायैतद्वचनं | [ उसने गुरूपसदन किया ] । प्रोवाच । अन्नं प्राणं चक्षुः श्रोत्रं | 'अधीहि' शब्दका अर्थ अध्यापन मनो वाचमिति । | ( उपदेश ) कीजिये—कहिये ऐसा अन्नं शरीरं तदभ्यन्तरं च | समझना चाहिये । उस पिताने [वरुणोपदिष्ट-ब्रह्मप्राप्तिद्वाराणि] प्राणमत्तारमुपल- | अपने पास विधिपूर्वक आये हुए ब्धिसाधनानि चक्षुः | उस पुत्रसे यह वाक्य कहा—'अन्नं श्रोत्रं मनो वाचमित्येतानि ब्रह्मो- | प्राणं चक्षुः श्रोत्रं मनः वाचम् ।' पलब्धौ द्वाराण्युक्तवान् । उक्त्वा | 'अन्न अर्थात् शरीर उसके भीतर च द्वारभूतान्येतान्यन्नादीनि तं | अन्न भक्षण करनेवाला प्राण, भृगुं होवाच ब्रह्मणो लक्षणम् । | तदनन्तर विषयोंकी उपलब्धिके किं तत् ? | साधनभूत चक्षु, श्रोत्र, मन और यतो यस्माद्वा इमानि ब्रह्मा- | वाक् ये ब्रह्मकी उपलब्धिमें द्वाररूप [ब्रह्मलक्षणम्] दीनि स्तम्बपर्यन्तानि | हैं'—ऐसा उसने कहा । इस भूतानि जायन्ते । | प्रकार इन द्वारभूत अन्नादिको येन जातानि जीवन्ति प्राणा- | बतलाकर उसने उस भृगुको ब्रह्मका न्धारयन्ति वर्धन्ते । विनाशकाले | लक्षण बतलाया। वह क्या है ? | [ सो बतलाते हैं— ] | जिससे ब्रह्मासे लेकर स्तम्बपर्यन्त | ये सम्पूर्ण प्राणी उत्पन्न होते हैं, | जिसके आश्रयसे ये जन्म लेनेके | अनन्तर जीवित रहते—प्राण धारण | करते अर्थात् वृद्धिको प्राप्त होते हैं | तथा विनाशकाल उपस्थित होनेपर
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२१६ तैत्तिरीयोपनिषद् [ वल्ली ३
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[बायाँ स्तम्भ / Sanskrit Text]
च यत्प्रयन्ति यद्ब्रह्म प्रतिगच्छ- न्ति, अभिसंविशन्ति तादात्म्य- मेव प्रतिपद्यन्ते । उत्पत्तिस्थिति- लयकालेषु यदात्मतां न जहति भूतानि तदेतद्ब्रह्मणो लक्षणम् । तद्ब्रह्म विजिज्ञासस्व विशेषेण ज्ञातुमिच्छस्व । यदेवंलक्षणं ब्रह्म तदन्नादिद्वारेण प्रतिपद्यस्वे- त्यर्थः । श्रुत्यन्तरं च—"प्राण- स्य प्राणमुत चक्षुषश्चक्षुरुत श्रोत्रस्य श्रोत्रमन्नस्यान्नं मनसो ये मनो विदुस्ते निचिक्युर्ब्रह्म पुराण- मग्य्रम्” ( बृ० उ० ४ । ४ । १८ ) इति ब्रह्मोपलब्धौ द्वारा- ण्येतानीति दर्शयति । स भृगुर्ब्रह्मोपलब्धिद्वाराणि [पार्श्व टिप्पणी: ब्रह्मोपलब्धये भृगोस्तपः] ब्रह्मलक्षणं च श्रुत्वा पितुस्तपो ब्रह्मोप- लब्धिसाधनत्वेनातप्यत तप्त- वान् । कुतः पुनरनुपदिष्टस्यैव तपसः साधनत्वप्रतिपत्तिर्भृगोः ?
[दायाँ स्तम्भ / Hindi Translation]
जिसके प्रति प्रयाण करनेवाले अर्थात् जिस ब्रह्मके प्रति गमन करनेवाले वे जीव उसमें प्रवेश करते—उसके तादात्म्यभावको प्राप्त हो जाते हैं। तात्पर्य यह है कि उत्पत्ति, स्थिति और लयकालमें प्राणी जिसकी तद्रूपताका त्याग नहीं करते यही उस ब्रह्मका लक्षण है। तू उस ब्रह्मको विशेषरूपसे जाननेकी इच्छा कर; अर्थात् जो ऐसे लक्षणों- वाला ब्रह्म है उसे अन्नादिके द्वारा प्राप्त कर। "ब्रह्म प्राणका प्राण, चक्षुका चक्षु, श्रोत्रका श्रोत्र, अन्नका अन्न और मनका मन है—ऐसा जो जानते हैं वे उस पुरातन और श्रेष्ठ ब्रह्मको साक्षात् जान सकते हैं" ऐसी एक दूसरी श्रुति भी इस बातको प्रदर्शित करती है कि ये प्राणादि ब्रह्मकी उपलब्धिमें द्वारस्वरूप हैं। उस भृगुने अपने पितासे ब्रह्मकी उपलब्धिके द्वार और ब्रह्मका लक्षण सुनकर ब्रह्मसाक्षात्कारके साधन- रूपसे तप किया । [ यहाँ प्रश्न होता है कि ] जिसका उपदेश ही नहीं दिया गया था उस तपके [ ब्रह्मप्राप्तिका ] साधन होनेका ज्ञान भृगुको कैसे हुआ ? [ उत्तर—]
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[शीर्षक] अनु० १ ] शाङ्करभाष्यार्थ २१७
[मूल संस्कृत - शाङ्करभाष्यम्]
सावशेषोक्तेः । अन्नादि ब्रह्मणः प्रतिपत्तौ द्वारं लक्षणं च यतो वा इमानीत्याद्युक्तवान् । सावशेषं हि तत्साक्षाद्ब्रह्मणोऽनिर्देशात् । अन्यथा हि स्वरूपेणैव ब्रह्म निर्देष्टव्यं जिज्ञासवे पुत्रायेद- मित्थंरूपं ब्रह्मेति । न चैवं निर- दिशत्किं तर्हि ? सावशेषमेवोक्त- वान् । अतोऽवगम्यते नूनं साध- नान्तरमप्यपेक्षते पिता ब्रह्म- विज्ञानं प्रतीति । तपोविशेषप्रति- पत्तिस्तु सर्वसाधकतमत्वात् । सर्वेषां हि नियतसाध्यविषयाणां साधनानां तप एव साधकतमं साधनमिति हि प्रसिद्धं लोके । तस्मात्पित्रानुपदिष्टमपि ब्रह्म- विज्ञानसाधनत्वेन तपः प्रतिपेदे भृगुः । तच्च तपो बाह्यान्तः- करणसमाधानं तद्द्वारकत्वाद्ब्रह्म-
[हिन्दी भाष्यार्थ]
क्योंकि [ उसके पिताका ] कथन सावशेष ( जिसमें कुछ कहना शेष रह गया हो—ऐसा ) था । वरुणने 'यतो वा इमानि भूतानि' इत्यादि रूपसे अन्नादि ब्रह्मकी प्राप्तिका द्वार और लक्षण कहा था । वह सावशेष ( असम्पूर्ण ) था; क्योंकि उससे ब्रह्मका साक्षात् निर्देश नहीं होता । नहीं तो, उसे अपने जिज्ञासु पुत्रके प्रति 'वह ब्रह्म ऐसा है' इस प्रकार उसका स्वरूपसे ही निर्देश करना चाहिये था । किन्तु इस प्रकार उसने निर्देश किया नहीं है । तो किस प्रकार किया है ? उसने उसे सावशेष ही उपदेश किया है । इससे जाना जाता है कि उसके पिताको अवश्य ही ब्रह्मज्ञानके प्रति किसी अन्य साधनकी भी अपेक्षा है । सबसे बड़ा साधन होनेके कारण भृगुने तपको ही विशेष रूपसे ग्रहण किया । जिनके साध्य विषय नियत हैं उन साधनोंमें तप ही सबसे अधिक सिद्धि प्राप्त कराने- वाला साधन है—यह बात लोकमें प्रसिद्ध ही है । इसलिये पिताके उपदेश न देनेपर भी भृगुने ब्रह्म- विज्ञानके साधनरूपसे तपको स्वीकार किया । वह तप बाह्य इन्द्रिय और अन्तःकरणका समाहित करना
[पाद-टिप्पणी / फुटर]: CC-0 Pt. Chakradhar Joshi and Sons, Dev Prayag. Digitized by eGangotri
२१८ तैत्तिरीयोपनिषद् [ वल्ली ३
२१८ तैत्तिरीयोपनिषद् [ वल्ली ३ प्रतिपत्तेः । “मनसश्चेन्द्रियाणां | ही है; क्योंकि ब्रह्मप्राप्ति उसीके च ह्येकाग्र्यं परमं तपः। | द्वारा होनेवाली है । “मन और तज्ज्यायः सर्वधर्मेभ्यः स धर्मः | इन्द्रियोंकी एकाग्रता ही परम तप | है । वह सब धर्मोंसे उत्कृष्ट है और पर उच्यते” (महा० शा० २५०। | वही परम धर्म कहा जाता है”—इस ४) इति स्मृतेः । स च तपस्त- | स्मृतिसे यही बात सिद्ध होती है । प्त्वा ॥ १ ॥ | उस भृगुने तप करके—॥ १ ॥ इति भृगुवल्ल्यां प्रथमोऽनुवाकः ॥ १ ॥ द्वितीय अनुवाक अन्न ही ब्रह्म है—ऐसा जानकर और उसमें ब्रह्मके लक्षण घटाकर भृगुका पुनः वरुणके पास आना और उसके उपदेशसे पुनः तप करना अन्नं ब्रह्मेति व्यजानात् । अन्नाद्ध्येव खल्विमानि भूतानि जायन्ते । अन्नेन जातानि जीवन्ति । अन्नं प्रयन्त्यभिसंविशन्तीति । तद्विज्ञाय पुनरेव वरुणं पितर- मुपससार । अधीहि भगवो ब्रह्मेति । तꣳ होवाच । तपसा ब्रह्म विजिज्ञासस्व । तपो ब्रह्मेति । स तपोऽतप्यत । स तपस्तप्त्वा ॥ १ ॥ अन्न ब्रह्म है—ऐसा जाना । क्योंकि निश्चय अन्नसे ही ये सब प्राणी उत्पन्न होते हैं, उत्पन्न होनेपर अन्नसे ही जीवित रहते हैं तथा प्रयाण करते समय अन्नमें ही लीन होते हैं । ऐसा जानकर वह फिर अपने पिता वरुणके पास आया [ और कहा— ] ‘भगवन् ! मुझे ब्रह्मका उपदेश कीजिये ।’ वरुणने उससे कहा—‘ब्रह्मको तपके द्वारा जाननेकी CC-0 Pt. Chakradhar Joshi and Sons, Dev Prayag. Digitized by eGangotri
अनु० २ ] शाङ्करभाष्यार्थ २१९ इच्छा कर, तप ही ब्रह्म है।' तब उसने तप किया और उसने तप करके—॥ १ ॥
[मूल संस्कृत (शाङ्करभाष्यम्) एवं हिन्दी अनुवाद]
संस्कृत भाष्य: अन्नं ब्रह्मेति व्यजानाद्वि- | हिन्दी अनुवाद: अन्न ब्रह्म है—ऐसा जाना । वही ज्ञातवान् तद्धि यथोक्तलक्षणो- | उपर्युक्त लक्षणसे युक्त है। सो कैसे ? पेतम् । कथम् ? अन्नाद्ध्येव | क्योंकि निश्चय अन्नसे ही ये सब खल्विमानि भूतानि जायन्ते; | प्राणी उत्पन्न होते हैं, उत्पन्न होनेपर अन्नेन जातानि जीवन्ति अन्नं | अन्नसे ही जीवित रहते हैं तथा प्रयन्त्यभिसंविशन्तीति तस्मा- | मरणोन्मुख होनेपर अन्नमें ही लीन द्युक्तमन्नस्य ब्रह्मत्वमित्यभि- | हो जाते हैं। अतः तात्पर्य यह है प्रायः । स एवं तपस्तप्त्वाऽन्नं | कि अन्नका ब्रह्मरूप होना ठीक ही ब्रह्मेति विज्ञायान्नलक्षणेनोप- | है। वह इस प्रकार तप करके तथा पत्त्या च पुनरेव संशयमापन्नो | अन्नके लक्षण और युक्तिके द्वारा 'अन्न वरुणं पितरमुपससार अधीहि | ही ब्रह्म है' ऐसा जानकर फिर भी भगवो ब्रह्मेति । | संशयग्रस्त हो पिता वरुणके पास आया [ और बोला— ] 'भगवन् ! मुझे ब्रह्मका उपदेश कीजिये' । कः पुनः संशयहेतुरस्येत्यु- | परन्तु इसमें उसके संशयका च्यते-अन्नस्योत्पत्तिदर्शनात् । | कारण क्या था ? सो बतलाया जाता है। अन्नकी उत्पत्ति देखनेसे [ उसे ऐसा सन्देह हुआ ] । यहाँ तपसः पुनः पुनरुपदेशः साधना- | तपका जो बारम्बार उपदेश किया तिशयत्वावधारणार्थः । यावद्ब्र- | गया है वह उसका प्रधान साधनत्व प्रदर्शित करनेके लिये है। अर्थात् ह्मणो लक्षणं निरतिशयं न भवति | जबतक ब्रह्मका लक्षण निरतिशय यावच्च जिज्ञासा न निवर्तते | न हो जाय और जबतक तेरी जिज्ञासा शान्त न हो तबतक तप तावत्तप एव ते साधनम् । तप- | ही तेरे लिये साधन है । तात्पर्य यह
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२२० तैत्तिरीयोपनिषद् [ वल्ली ३
२२० तैत्तिरीयोपनिषद् [ वल्ली ३ सैव ब्रह्म विजिज्ञासस्वेत्यर्थः । | है कि तू तपसे ही ब्रह्मको जाननेकी ऋज्वन्यत् ॥ १ ॥ | इच्छा कर । शेष अर्थ सरल है ॥१॥ इति भृगुवल्ल्यां द्वितीयोऽनुवाकः ॥ २ ॥ तृतीय अनुवाक प्राण ही ब्रह्म है—ऐसा जानकर और उसीमें ब्रह्मके लक्षण घटाकर भृगुका पुनः वरुणके पास आना और उसके उपदेशसे पुनः तप करना प्राणो ब्रह्मेति व्यजानात् । प्राणाद्ध्येव खल्विमानि भूतानि जायन्ते । प्राणेन जातानि जीवन्ति । प्राणं प्रयन्त्यभिसंविशन्तीति । तद्विज्ञाय पुनरेव वरुणं पितरमुपससार । अधीहि भगवो ब्रह्मेति । तꣳ होवाच । तपसा ब्रह्म विजिज्ञासस्व । तपो ब्रह्मेति । स तपो- ऽतप्यत । स तपस्तप्त्वा ॥ १ ॥ प्राण ब्रह्म है—ऐसा जाना । क्योंकि निश्चय प्राणसे ही ये प्राणी उत्पन्न होते हैं, उत्पन्न होनेपर प्राणसे ही जीवित रहते हैं और मरणोन्मुख होनेपर प्राणमें ही लीन हो जाते हैं । ऐसा जानकर वह फिर अपने पिता वरुणके पास आया [ और बोला— ] 'भगवन् ! मुझे ब्रह्मका उपदेश कीजिये ।' उससे वरुणने कहा—'तू तपसे ब्रह्मको जाननेकी इच्छा कर । तप ही ब्रह्म है ।' तब उसने तप किया और उसने तप करके—॥ १ ॥ CC-0 Pt. Chakradhar Joshi and Sons, Dev Prayag. Digitized by eGangotri
चतुर्थ अनुवाक मन ही ब्रह्म है—ऐसा जानकर और उसमें ब्रह्मके लक्षण घटाकर भृगुका पुनः वरुणके पास आना और उसके उपदेशसे पुनः तप करना मनो ब्रह्मेति व्यजानात् । मनसो ह्येव खल्विमानि भूतानि जायन्ते । मनसा जातानि जीवन्ति । मनः प्रयन्त्यभिसंविशन्तीति । तद्विज्ञाय पुनरेव वरुणं पितरमुपससार । अधीहि भगवो ब्रह्मेति । तꣳ होवाच । तपसा ब्रह्म विजिज्ञासस्व । तपो ब्रह्मेति । स तपोऽतप्यत । स तपस्तप्त्वा ॥ १ ॥ मन ब्रह्म है—ऐसा जाना; क्योंकि निश्चय मनसे ही ये जीव उत्पन्न होते हैं, उत्पन्न होनेपर मनके द्वारा ही जीवित रहते हैं और अन्तमें प्रयाण करते हुए मनमें ही लीन हो जाते हैं। ऐसा जानकर वह फिर पिता वरुणके पास गया [ और बोला—] 'भगवन् ! मुझे ब्रह्मका उपदेश कीजिये।' वरुणने उससे कहा—'तू तपसे ब्रह्मको जाननेकी इच्छा कर, तप ही ब्रह्म है।' तब उसने तप किया और उसने तप करके—॥ १ ॥ इति भृगुवल्ल्यां चतुर्थोऽनुवाकः ॥ ४ ॥ CC-0 Pt. Chakradhar Joshi and Sons, Dev Prayag. Digitized by eGangotri
पञ्चम अनुवाक विज्ञान ही ब्रह्म है—ऐसा जानकर और उसमें ब्रह्मके लक्षण घटाकर भृगुका पुनः वरुणके पास आना और उसके उपदेशसे पुनः तप करना विज्ञानं ब्रह्मेति व्यजानात् । विज्ञानाद्ध्येव खल्विमानि भूतानि जायन्ते । विज्ञानेन जातानि जीवन्ति । विज्ञानं प्रयन्त्यभिसंविशन्तीति । तद्विज्ञाय पुनरेव वरुणं पितरमुपससार । अधीहि भगवो ब्रह्मेति । तꣳहोवाच । तपसा ब्रह्म विजिज्ञासस्व । तपो ब्रह्मेति । स तपोऽतप्यत । स तपस्तप्त्वा ॥ १ ॥ विज्ञान ब्रह्म है—ऐसा जाना। क्योंकि निश्चय विज्ञानसे ही ये सब जीव उत्पन्न होते हैं, उत्पन्न होनेपर विज्ञानसे ही जीवित रहते हैं और फिर मरणोन्मुख होकर विज्ञानमें ही प्रविष्ट हो जाते हैं। ऐसा जानकर वह फिर पिता वरुणके समीप आया [और बोला—] 'भगवन् ! मुझे ब्रह्मका उपदेश कीजिये ।' वरुणने उससे कहा—'तू तपके द्वारा ब्रह्मको जाननेकी इच्छा कर । तप ही ब्रह्म है ।' तब उसने तप किया और तप करके—॥ १ ॥ इति भृगुवल्ल्यां पञ्चमोऽनुवाकः ॥ ५ ॥ CC-0 Pt. Chakradhar Joshi and Sons, Dev Prayag. Digitized by eGangotri
षष्ठ अनुवाक आनन्द ही ब्रह्म है—ऐसा भृगुका निश्चय करना तथा इस भार्गवी वारुणी विद्याका महत्त्व और फल आनन्दो ब्रह्मेति व्यजानात् । आनन्दाद्धयेव खल्विमानि भूतानि जायन्ते । आनन्देन जातानि जीवन्ति । आनन्दं प्रयन्त्यभिसंविशन्तीति । सैषा भार्गवी वारुणी विद्या परमे व्योमन् प्रतिष्ठिता । स य एवं वेद प्रतितिष्ठति । अन्नवानन्नादो भवति । महान् भवति, प्रजया पशुभिर्ब्रह्मवर्चसेन । महान् कीर्त्या ॥१॥ आनन्द ब्रह्म है—ऐसा जाना; क्योंकि आनन्दसे ही ये सब प्राणी उत्पन्न होते हैं, उत्पन्न होनेपर आनन्दके द्वारा ही जीवित रहते हैं और प्रयाण करते समय आनन्दमें ही समा जाते हैं। वह यह भृगुकी जानी हुई और वरुणकी उपदेश की हुई विद्या परमाकाशमें स्थित है। जो ऐसा जानता है वह ब्रह्ममें स्थित होता है; वह अन्नवान् और अन्नका भोक्ता होता है; प्रजा, पशु और ब्रह्मतेजके कारण महान् होता है तथा कीर्तिके कारण भी महान् होता है ॥ १ ॥ एवं तपसा विशुद्धात्मा | इस प्रकार तपसे शुद्धचित्त हुए प्राणादिषु साकल्येन ब्रह्मलक्षण- | भृगुने प्राणादिमें पूर्णतया ब्रह्मका मपश्यञ्शनैः शनैरन्तरनुप्रविश्या- | लक्षण न देखकर धीरे-धीरे भीतरकी ओर प्रवेश कर तपरूप साधनके CC-0 Pt. Chakradhar Joshi and Sons, Dev Prayag. Digitized by eGangotri
२२४ तैत्तिरीयोपनिषद् [ वल्ली ३
२२४ तैत्तिरीयोपनिषद् [ वल्ली ३
[बायाँ स्तम्भ - संस्कृत मूल एवं भाष्य]
न्तरतममानन्दं ब्रह्म विज्ञातवां- स्तपसैव साधनेन भृगुः । तस्माद्ब्र- ह्मविजिज्ञासुना बाह्यान्तःकरण- समाधानलक्षणं परमं तपःसाधन- मनुष्ठेयमिति प्रकरणार्थः ।
अधुनाख्यायिकातोऽपसृत्य श्रुतिः स्वेन वचनेनाख्यायिका- निर्वर्त्यमर्थमाचष्टे—सैषा भार्गवी भृगुणा विदिता वरुणेन प्रोक्ता वारुणी विद्या परमे व्योमन्हृदया- काशगुहायां परम आनन्देऽद्वैते प्रतिष्ठिता परिसमाप्तान्नमयादात्म- नोऽधिप्रवृत्ता । य एवमन्योऽपि तपसैव साधनेनानेनैव क्रमेणा- नुप्रविश्यानन्दं ब्रह्म वेद स एवं विद्याप्रतिष्ठानात्प्रतितिष्ठत्यानन्दे परमे ब्रह्मणि ब्रह्मैव भवतीत्यर्थः ।
दृष्टं च फलं तस्योच्यते— अन्नवान्प्रभूतमन्नमस्य विद्यत
[दायाँ स्तम्भ - हिन्दी अनुवाद]
द्वारा ही सबकी अपेक्षा अन्तरतम आनन्दको ब्रह्म जाना । अतः जो ब्रह्मको जाननेकी इच्छावाला हो उसे साधनरूपसे बाह्य इन्द्रिय और अन्तःकरणका समाधानरूप परम तप ही करना चाहिये—यह इस प्रकरणका तात्पर्य है ।
अब आख्यायिकासे निवृत्त होकर श्रुति अपने ही वाक्यसे आख्यायिका- से निष्पन्न होनेवाला अर्थ बतलाती है—अन्नमय आत्मासे प्रारम्भ हुई यह भार्गवी—भृगुकी जानी हुई और वारुणी—वरुणकी कही हुई विद्या परमाकाशमें—हृदयाकाशस्थित गुहा- के भीतर अद्वैत परमानन्दमें प्रतिष्ठित है अर्थात् वहीं इसका पर्यवसान होता है । इसी प्रकार जो कोई दूसरा पुरुष भी इसी क्रमसे तपरूप साधनके द्वारा क्रमशः अनुप्रवेश करके आनन्दको ब्रह्मरूपसे जानता है वह इस प्रकार विद्यामें स्थिति लाभ करनेसे आनन्द अर्थात् परब्रह्ममें स्थिति प्राप्त करता है, यानी ब्रह्म ही हो जाता है ।
अब उसका दृष्ट ( इस लोकमें प्राप्त होनेवाला ) फल बतलाया जाता है—अन्नवान्—जिसके पास
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अनु० ६ ] | शाङ्करभाष्यार्थ | २२५
इत्यन्नवान् । सत्तामात्रेण तु | बहुत-सा अन्न हो उसे अन्नवान् | कहते हैं।* अन्नकी सत्तामात्रसे तो सर्वो ह्यन्नवानिति विद्याया | सभी अन्नवान् हैं, अतः [यदि उस | प्रकार अर्थ किया जाय तो] विशेषो न स्यात् । एवमन्नमत्ती- | विद्याकी कोई विशेषता नहीं रहती। | इसी प्रकार वह अन्नाद-जो अन्नभक्षण त्यन्नादो दीप्ताग्निर्भवतीत्यर्थः । | करे यानी दीप्ताग्नि हो जाता है। वह महान्भवति । केन महत्त्वमित्यत | महान् हो जाता है। उसका महत्त्व | किस कारणसे होता है ? इसपर आह--प्रजया पुत्रादिना पशु- | कहते हैं-पुत्रादि प्रजा, गौ, अश्व | आदि पशु तथा ब्रह्मतेज यानी शम, भिर्गवाश्वादिभिर्ब्रह्मवर्चसेन शम- | दम एवं ज्ञानादिके कारण होनेवाले दमज्ञानादिनिमित्तेन तेजसा । | तेजसे तथा कीर्ति यानी शुभाचरणके | कारण होनेवाली ख्यातिसे वह महान्भवति कीर्त्या ख्यात्या | महान् हो जाता है ॥ १ ॥ शुभप्रचारनिमित्तया ॥१॥ इति भृगुवल्ल्यां षष्ठोऽनुवाकः ॥६॥
- मूलमें केवल 'अन्नवान्' है, भाष्यमें उसका अर्थ 'प्रभूत (बहुतसे) अन्नवाला' किया गया है। इससे यह शंका होती है कि 'प्रभूत' विशेषणका प्रयोग क्यों किया गया। इसीका समाधान करनेके लिये आगेका वाक्य है। तै० उ० २९-३०- CC-0 Pt. Chakradhar Joshi and Sons, Dev Prayag. Digitized by eGangotri
सप्तम अनुवाक अन्नकी निन्दा न करनारूप व्रत तथा शरीर और प्राणरूप अन्न- ब्रह्मके उपासकको प्राप्त होनेवाले फलका वर्णन अन्नं न निन्द्यात् । तद्व्रतम् । प्राणो वा अन्नम् । शरीरमन्नादम् । प्राणे शरीरं प्रतिष्ठितम् । शरीरे प्राणः प्रतिष्ठितः । तदेतदन्नमन्ने प्रतिष्ठितम् । स य एतदन्नमन्ने प्रतिष्ठितं वेद प्रतितिष्ठति । अन्नवानन्नादो भवति । महान् भवति प्रजया पशुभिर्ब्रह्मवर्चसेन । महान् कीर्त्या ॥१॥ अन्नकी निन्दा न करे। यह ब्रह्मज्ञका व्रत है। प्राण ही अन्न है और शरीर अन्नाद है। प्राणमें शरीर स्थित है और शरीरमें प्राण स्थित है। इस प्रकार [ एक दूसरेके आश्रित होनेसे वे एक दूसरेके अन्न हैं; अतः ] ये दोनों अन्न ही अन्नमें प्रतिष्ठित हैं। जो इस प्रकार अन्नको अन्नमें स्थित जानता है वह प्रतिष्ठित ( प्रख्यात ) होता है, अन्नवान् और अन्नभोक्ता होता है। प्रजा, पशु और ब्रह्मतेजके कारण महान् होता है तथा कीर्तिके कारण भी महान् होता है ॥ १ ॥
| किं चान्नेन द्वारभूतेन ब्रह्म | इसके सिवा क्योंकि द्वारभूत |
| विज्ञातं यस्मात्तस्माद्गुरुमिव | अन्नके द्वारा ही ब्रह्मको जाना है इसलिये गुरुके समान अन्नकी भी |
| अन्नं न निन्द्यात्तदस्यैवं ब्रह्म- | निन्दा न करे। इस प्रकार ब्रह्म-वेत्ताके लिये यह व्रत उपदेश किया |
| विदो व्रतमुपदिश्यते । व्रतोप- | जाता है। यह व्रतका उपदेश |
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अनु० ७ ] शाङ्करभाष्यार्थ २२७ देशोऽन्नस्तुतये, स्तुतिभाक्त्वं | अन्नकी स्तुतिके लिये है और अन्नकी | स्तुतिपात्रता ब्रह्मोपलब्धिका साधन चान्नस्य ब्रह्मोपलब्ध्युपायत्वात् । | होनेके कारण है । प्राणो वा अन्नम्, शरीरान्त- | प्राण ही अन्न है; क्योंकि प्राण र्भावात्प्राणस्य । यद्यस्यान्तः- | शरीरके भीतर रहनेवाला है । जो प्रतिष्ठितं भवति तत्तस्यान्नं भव- | जिसके भीतर स्थित रहता है वह तीति । शरीरे च प्राणः प्रति- | उसका अन्न हुआ करता है । प्राण ष्ठितस्तस्मात्प्राणोऽन्नं शरीरमन्ना- | शरीरमें स्थित है, इसलिये प्राण दम् । तथा शरीरमप्यन्नं प्राणो- | अन्न है और शरीर अन्नाद है । ऽन्नादः । कस्मात् ? प्राणे शरीरं | इसी प्रकार शरीर भी अन्न है और प्रतिष्ठितम्; तन्निमित्तत्वाच्छरी- | प्राण अन्नाद है; कैसे ?—प्राणमें रस्थितेः । तस्मात्तदेतदुभयं शरीरं | शरीर स्थित है; क्योंकि शरीरकी प्राणश्चान्न मन्नादश्च । येनान्योन्य- | स्थिति प्राणके ही कारण है अतः स्मिन्प्रतिष्ठितं तेनान्नम् । येना- | ये दोनों शरीर और प्राण अन्न और न्योन्यस्य प्रतिष्ठा तेनान्नादः । | अन्नाद हैं; क्योंकि वे एक दूसरेमें तस्मात्प्राणः शरीरं चोभयमन्न- | स्थित हैं इसलिये अन्न हैं और मन्नादं च । | क्योंकि एक दूसरेके आधार हैं | इसलिये अन्नाद हैं । अतएव प्राण | और शरीर दोनों ही अन्न और | अन्नाद हैं । स य एवमेतदन्नमन्ने प्रति- | वह जो इस प्रकार अन्नको अन्नमें ष्ठितं वेद प्रतितिष्ठत्यन्नादा- | स्थित जानता है, अन्न और अन्नाद- त्मनैव । किं चान्नवानन्नादो भव- | रूपसे ही स्थित होता है तथा अन्न- तीत्यादि पूर्ववत् ॥१॥ | वान् और अन्नाद होता है—इत्यादि | शेष अर्थ पूर्ववत् है ॥ १ ॥ इति भृगुवल्ल्यां सप्तमोऽनुवाकः ॥७॥ CC-0 Pt. Chakradhar Joshi and Sons, Dev Prayag. Digitized by eGangotri