उपदेशसाहस्री (श्रीमच्छङ्करभगवत्पाद विरचिता - 'हृदयस्पर्शिनी' हिन्दी टीका सहित)
Upadesha Sahasri with Hridayasparshini Hindi Commentary
आदि शङ्कराचार्य / पं. गजानन शास्त्री मुसलगांवकर द्वारा
स्रोत: महेश अनुसन्धान संस्थान माउंट आबू · महेश अनुसन्धान संस्थान (उद्गम)
पद्यभाग १६: पार्थिवप्रकरणम्
पार्थिवप्रकरणम् ११९ आत्मा के द्वारा ज्ञेय है, वैसे आत्मा भी किसी के द्वारा ज्ञेय होगा । उसका समाधान यह है कि प्रकाश, ज्ञान तो आत्मा का स्वरूप ही है। अतः वह किसी के द्वारा ज्ञेय नहीं है, वह तो स्वयंप्रकाश है। रूप और आलोक (प्रकाश) के समान भास्य और भासक का भेद रहने से भास्यरूप बुद्धि का भासक, उससे अन्य ही है, और वही आत्मा है ।। ४ ।। व्यञ्जकस्तु यथाऽऽलोको व्यङ्ग्यस्याकारतां गतः । व्यतिकीर्णोऽप्यसंकीर्णस्तद्वज्ज्ञः प्रत्ययैः सदा ॥५॥ व्यञ्जकस्त्विति-जैसे वस्तु (पदार्थ = विषय) के अभिव्यञ्जक (दीपक से होने वाला) प्रकाश, अपने व्यङ्ग्य विषय (वस्तु) के समान आकार वाला हो जाता है, किन्तु उसके साथ मिला हुआ प्रतीत होने पर भी वस्तुतः उससे मिलता नहीं है। उसी प्रकार चेतन आत्मा भी अपने प्रकाश्य प्रत्ययों से सर्वदा अलिप्त रहता है ॥ ५ ॥ हृदयस्पर्शिनो आत्मा को बुद्धि का प्रकाशक (भासक) मानने पर उस बुद्धि के संसर्ग से उसमें (आत्मा में) अशुद्धि आयेगी, किन्तु यह शंका ठीक नहीं है। जिस प्रकार विषय को प्रकाशित (अभिव्यक्त) करने वाला दीप का प्रकाश (दीपालोक) अपने घटादि व्यङ्ग्य विषय के समान आकार वाला हो जाता है, इस रीति से उसके साथ मिला हुआ (व्यतिकीर्ण, व्यामिश्र हुआ) प्रतीत होने पर भी वस्तुतः वह उससे मिला हुआ नहीं (असंकीर्ण, विविक्त-स्वभाव ही) रहता है, उसी तरह 'ज्ञ' (आत्मा, चेतन) भी अपने प्रकाश्य बुद्धिवृत्तियों (प्रत्ययों) से सर्वदा अलिप्त ही रहता है। अतः उसमें बुद्धिगत अशुद्धि के आने की कोई संभावना नहीं है। वह आत्मा नित्य शुद्ध ही है ॥ ५ ॥ स्थितो दीपो यथाऽयत्नतः प्राप्तं सर्वं प्रकाशयेत् । शब्दाद्याकारबुद्धीर्ज्ञः प्राप्तास्तद्वत्प्रपश्यति ॥६॥ स्थित इति - जिस प्रकार एक स्थान पर रखा हुआ दीपक अपने समीप स्थित सभी पदार्थों को बिना किसी प्रयत्न के ही प्रकाशित कर देता है, उसी प्रकार शब्द-स्पर्शादि के आकार में परिणत होकर प्राप्त हुई बुद्धिवृत्तियों को यह आत्मा साक्षी बना हुआ देखता रहता है ॥ ६ ॥ हृदयस्पर्शिनो यह आत्मा, बुद्धि आदि सभी पदार्थों से अत्यन्त विलक्षण और निर्व्यापार है, तो वह बुद्धि आदि का अवभासक कैसे होता है ? इस शंका का समाधान यह होगा कि जिस प्रकार एक स्थान पर स्थित हुआ दीपक, अपने समीप आये हुए सभी पदार्थों को बिना किसी प्रयत्न के प्रकाशित कर देता है, उसी प्रकार शब्दादि के आकार में परिणत होकर अपने समीप आयी हुई बुद्धिवृत्तियों का साक्षी मात्र रहने से उस आत्मा को उनका अवभासक कहा जाता है ॥ ६ ॥ शरीरेन्द्रियसंगात आत्मत्वेन गतां धियम् । नित्यात्मज्योतिषा दीप्तां विशिषन्ति सुखादयः ॥७॥ शरीरेन्द्रियेति - सुख-दुःखादि भी शरीर तथा इन्द्रियसंधात में आत्मत्व को प्राप्त हुई और नित्य आत्मज्योति से प्रकाशित होने वाली बुद्धि को ही विशेषित करते हैं, 'आत्मा' को नहीं। देहादि में आत्मत्व का अभिमान करने वाली बुद्धि है, उसी के ये सुख-दुःखादि धर्म हैं। अतः 'अहं सुखी' इत्यादि अनुभव के समय अहं-पदवाच्य बुद्धि ही सुख-दुःखादि से विशिष्ट होती है। आत्मा तो केवल उसका साक्षी मात्र है ॥ ७ ॥ हृदयस्पर्शिनो तथापि जिज्ञासा अभी शान्त नहीं हो पा रही है, क्योंकि 'अहं सुखी, अहं दुःखी' इस प्रकार से सुखित्वादि का स्फुरण होते रहने से उस आत्मा में शुद्धि कैसे रह सकती है? एवञ्च आत्मा की शुद्धता अभी सिद्ध नहीं हो पा रही
१२० उपदेशसाहस्री है। यह जिज्ञासा इस प्रकार समझने से शान्त हो जायेगी। सुख-दुःखादि भी आत्मा के धर्म नहीं हैं, वे भी देहादि में आत्मत्व का अभिमान करनेवाली बुद्धि के ही धर्म हैं। अतः जिस समय यह अनुभव होता है कि 'मैं सुखी या दुःखी हूँ', उस समय अहंपदवाच्य बुद्धि ही दुःखविशिष्ट होती है, आत्मा तो उसका केवल साक्षीमात्र है। वे सुखादि, आत्मा को विशेषित नहीं करते हैं। तथाच भास्य बुद्धि और भासक आत्मा इन दोनों का विवेक न हो पाने से 'आत्मा सुखादि- मान्' ऐसी भ्रान्ति होती है ॥ ७ ॥ शिरोदुःखादिनाऽऽत्मानं दुःख्यस्मीति हि पश्यति । द्रष्टान्यो दुःखिनो दृश्याद्द्रष्टृत्वाच्च न दुःख्यसौ ॥८॥ शिरोदुःखादिनेति—यह आत्मा शिर की वेदना से अपने को 'मैं दुःखी हूँ'—ऐसा देखता है (समझता है)। किन्तु वह अपने दृश्यभूत 'दुःखी' से वस्तुतः भिन्न है, क्योंकि वह तो उस दृश्य का द्रष्टा है। द्रष्टा होने के कारण वह दुःखी भी नहीं है ॥ ८ ॥ हृदयस्पर्शिनी ये सुखादिक, शरीरादि से सम्बन्धित बुद्धि को ही विशेषित करते हैं, आत्मा को नहीं—यह निश्चय कैसे किया गया ? इस प्रकार किया गया कि जिस समय यह अनुभव होता है कि 'मैं सुखी हूँ, या दुःखी हूँ', उस समय उस सुख या दुःख का कारण स्थूल देहगत कोई विकार या हर्ष, शोक, मोहादि लिङ्ग (सूक्ष्म) देहगत कोई विकार ही होता है। उस विकार का जो आधार है, वही उससे होनेवाले सुख-दुःख का भी आधार है। और आत्मा उसका साक्षी होने के कारण उससे सर्वथा असंग है। निष्कर्ष यह है कि आत्मा को जो विशेष ज्ञान होता है, वह बुद्धि के अध्यास के कारण होता है (बुद्धद्यध्यासनिबन्धन है)। तथाच शिरोदुःख से या उदरदुःख से मैं दुःखी हूँ, इस प्रकार अभिमान करनेवाले बुद्धद्यवस्थापन्न विशेष को ही वह ज्ञान होता है, क्योंकि वही दुःखी होता है। अतः बुद्धि ही सुख-दुःखादिकों से विशिष्ट होती है, यही कहना उचित है। दुःखी होनेवाले दृश्य से उसका द्रष्टा तो भिन्न ही है। अर्थात् देहादिकों में आत्मा के रूप में (आत्मत्वेन) समझी जानेवाली (अभिमन्यमान), देह के किसी अवयवादि के आहत हो जाने पर उत्पन्न होने वाले दुःख के आकार वाली, दृश्यसाभास बुद्धि का जो साक्षी है, वह उससे अन्य ही है। अतः वह केवल द्रष्टामात्र होने से उसे कोई दुःख-सुखादि नहीं होते। ये सुख-दुःखादि तो अहंपदवाच्य साभास बुद्धि को ही हुआ करते हैं, आत्मा को नहीं ॥ ८ ॥ दुःखी स्याद्दुःख्यहंमानाद्दुःखिनो दर्शनान्न वा । संहतेऽङ्गादिभिर्द्रष्टा दुःखी दुःखस्य नैव सः ॥९॥ दुःखीति—यह जीवात्मा जो अपने को दुःखी समझता है, उसका इस प्रकार समझना दुःखी अन्तःकरण (बुद्धि) में अभिमान करने के कारण ही है, दुःखविशिष्ट अन्तःकरण (बुद्धि) का साक्षी होने के कारण नहीं है ॥ ९ ॥ हृदयस्पर्शिनी 'आत्मा (में केवल द्रष्टृत्व) द्रष्टामात्र रहने से वह दुःखी नहीं होता'—इसी को स्पष्ट कर रहे हैं—यह आत्मा (जीव) जो दुःखी प्रतीत होता है, वह दुःखविशिष्ट अन्तःकरण (बुद्धि) में अर्थात् दुःखाकार से परिणत होनेवाले अन्तःकरण में 'अहम्'=मैं—ऐसा अभिमान करने के कारण वैसा प्रतीत होता है। दुःखविशिष्ट अन्तःकरण का साक्षी होने के कारण आत्मा दुःखी प्रतीत नहीं हो रहा है। यदि दुःखाकार से परिणत होनेवाले के देखनेमात्र से (साक्षी होने मात्र से) उसे दुःखी कहा जाय तो अन्य दुःखी जीवों को देखकर भी उसे दुःखी कहना होगा। अतः हस्त-पादादि अवयवों से संहत शरीर में जो दुःख है, उससे दुःखी बुद्धि ही है, उसका साक्षी आत्मा उसके दुःख से दुःखी नहीं है ॥९॥ चक्षुर्वत्कर्मकर्तृत्वं स्याच्चेज्ज्ञानेकमेव तत् । संहतं च ततो नात्मा द्रष्टृत्वात्कर्मतां व्रजेत् ॥१०॥
पार्थिवप्रकरणम् १२१ चक्षुर्वदिति - जीवात्मा का कर्मत्व और कर्तृत्व भी नेत्र के समान माना जा सकता है, किन्तु यह कहना उचित नहीं होगा। क्योंकि नेत्र तो अनेकरूप और संहत है। इसलिये उसमें तो उस प्रकार का भेद हो सकता है, किन्तु जीवात्मा तो साक्षीस्वरूप होने से उसे साक्ष्यस्वरूप नहीं कह सकते ॥ १०॥ हृदयस्पर्शिनो दुःखी होने वाले अन्तःकरण का द्रष्टा रहने पर भी आत्मा का दुःखी होना संभव क्यों नहीं है ? जैसे दर्पणस्थ चक्षु, गोलकस्थ चक्षु का दृश्य (कर्म) होता है। अर्थात् दर्पणस्थ होता हुआ चक्षु दृश्य होता है और मुख- देश में स्थित होता हुआ वह द्रष्टा भी होता है, उसी तरह जब वह आत्मा, दुःखसंभिन्न (दुःखसम्पृक्त) होता है, तब वह दृश्य रहता है, और जब वही आत्मा अपने स्वरूपभूत चैतन्य में अवस्थित रहता है, तब उसे द्रष्टा समझा जाता है। एवं च एक ही में अवस्थाभेद से कर्म-कर्तृभाव घट सकता है - इस प्रकार यदि कोई कहे तो उसका समाधान यह होगा-नेत्र तो अनेकरूप (अनेकाकार) और संहत है, अतः उसमें कर्म-कर्तृभाव (अंश भेद) उपपन्न हो सकता है। अर्थात् दर्पणस्थ गोलकांश में दृश्यत्व और उसी का मुखनिविष्ट शक्तिमत्त्वांश में द्रष्टृत्व, इस रीति से एक ही चक्षु (नेत्र) में उभयरूपत्व उपपन्न हो सकता है। किन्तु इस प्रकार का अंशभेद आत्मा में नहीं पाया जाता, क्योंकि वह (आत्मा) एकरूप है, असंहत है (संघातरूप, समूहरूप नहीं है)। अतः चित्प्रकाशैकस्वभाव आत्मा द्रष्टा ही है, वह दृश्यांश से युक्त नहीं है। क्योंकि दृश्यांश तो अनामरूप होता है। अतः द्रष्टा होने से वह कभी कर्म नहीं बन सकता। एवं च आत्मा साक्षीस्वरूप होने से वह कभी भी साक्ष्य रूप नहीं हो सकता ॥ १० ॥ ज्ञानयत्नाद्यनेकत्वमात्मनोऽपि मतं यदि । नैकज्ञानगुणत्वात्तु ज्योतिर्वत्तस्य कर्मता ॥११॥ ज्ञानेति-आत्मा को इच्छादिगुणविशिष्ट और अनेक मानने वाले नैयायिकों के मतानुसार आत्मा का भी अनेकत्व (अंश-भेद से ग्राह्यत्व और ग्राहकत्व) कहना भी ठीक नहीं है। क्योंकि जीवात्मा, एकमात्र ज्ञानस्वभाव के कारण प्रकाश के समान वह अपना कर्म (दृश्य) नहीं बन सकता ॥ ११ ॥ हृदयस्पर्शिनो नैयायिक आत्मा को इच्छादिगुणविशिष्ट और अनेक मानते हैं, तदनुसार आत्मा में अनेकत्व अर्थात् अंशभेद से ग्राह्यत्व (भास्यत्व) और ग्राहकत्व (भासकत्व) क्यों न माना जाय ? निष्कर्ष यह है कि ज्ञान, प्रयत्न, इच्छा, द्वेषादि अनेक गुणों के कारण अनेकात्मकता होने से किसी अंश से विशिष्ट हुए आत्मा में ग्राह्यत्व और अन्य किसी अंश से विशिष्ट हुए उसी आत्मा में ग्राहकत्व भी हो सकता है। किन्तु इस तरह से उभयरूपता आत्मा में नहीं कह सकते, क्योंकि श्रुति ने आत्मा को ज्ञानैकस्वभाव, विज्ञानघन¹ कह कर उसे एकरूप ही बताया है, अनेकरूप नहीं। इस कारण प्रकाश के समान (ज्योतिर्वत्) वह (आत्मा) अपना कर्म (दृश्य) नहीं हो सकता । अतः आत्मा केवल ग्राहक ही है, वह कभी ग्राह्य नहीं है ॥ ११ ॥ ज्योतिषो द्योतकत्वेऽपि यद्वन्नात्मप्रकाशनम् । भेदेऽप्येवं समत्त्वाज्ज नात्मानं नैव पश्यति ॥१२॥ ज्योतिष इति--जिस प्रकार सूर्यादि ज्योतिर्मय पदार्थ प्रकाशक होने पर भी अपने को कर्मरूप में प्रकाशित नहीं करते, उसी प्रकार आत्मा में यदि अंशभेद भी मान लिया जाय तो भी चिन्मात्र रूप से उसमें समानता रहने से वह अपने को नहीं देख सकता। क्योंकि आत्मा में अंशभेद से ग्राह्य-ग्राहक भाव मानने पर ग्राह्य अंश को यदि चेतन कहें तो वह किसी का विषय नहीं हो सकता, क्योंकि चेतन तो सर्वदा प्रकाशक ही होता है, वह कभी भी प्रकाश्य नहीं होता। यदि ग्राह्य जड़ माने तो प्रकाश और अन्धकार के समान चेतन और जड़ दोनों परस्परविरुद्ध धर्म होने से एक जगह (एक आत्मा में) कभी नहीं रह सकते। दोनों का एक जगह रहना युक्तिविरुद्ध होगा ॥ १२ ॥ १. (मुं. उ. २।२।९) १६
१२२ उपदेशसाहस्री हृदयस्पर्शिनी दृष्टान्त को स्पष्ट कर रहे हैं—आत्मा में यदि अंशभेद को स्वीकार कर, उसके किसी अंश को गृहीता और किसी को ग्राह्य कहें तो वहाँ पर भी यह प्रश्न होगा कि उसका ग्राह्य अंश जड़ है या चेतन ? यदि चेतन है, तो वह किसी का विषय नहीं हो सकता, क्योंकि चेतन तो प्रकाशक ही होता है, वह किसी का प्रकाश्य नहीं हुआ करता। यदि जड़ कहें तो प्रकाश और अन्धकार के समान चेतन और जड़ ये दो अत्यन्त विरुद्ध धर्म एक ही आत्मा में नहीं रह सकते। जिस प्रकार सूर्यादि ज्योतिर्मय पदार्थ प्रकाशक होने पर भी अपने को प्रकाश्यरूप में प्रकाशित नहीं करते, उसी प्रकार आत्मा में अंशभेद के स्वीकार करने पर भी चिन्मात्र रूप से उसमें समानता होने से वह अपने को ही नहीं देख सकता। अतः उसमें अंशभेद की कल्पना करके स्वयं को ही ग्राह्य-ग्राहकरूप मानना सर्वथा युक्तिविरुद्ध है। अतः ग्राह्यांश को आत्मा नहीं कह सकते ॥ १२ ॥ यद्धर्मा यः पदार्थो न तस्यैवेयात्स कर्मताम् । न ह्यात्मानं दहत्यग्निस्तथा नैव प्रकाशयेत् ॥१३॥ यद्धर्मेति—जो पदार्थ जिस धर्म को धारण करता है, वह उसी धर्म का कर्म नहीं हुआ करता। जैसे अग्नि अपने को न तो जला ही सकता है और न प्रकाशित ही कर सकता है ॥ १३ ॥ हृदयस्पर्शिनी स्वरूप से अथवा अंश के द्वारा यद्यपि वह अपने आप को नहीं देख पाता, तथापि स्वगुण के ज्ञान का वह कर्म हो सकता है। किन्तु यह कथन उचित नहीं है, क्योंकि जो पदार्थ जिस धर्म से युक्त होता है, वह उसी धर्म का कर्म नहीं हुआ करता। तथाच जिस प्रकार अग्नि अपने को न तो दग्ध कर सकता है और न प्रकाशित ही कर सकता है, तद्वत् ज्ञानस्वभाव वाला आत्मा कभी भी ज्ञान का कर्म नहीं बन सकता। अनुमान-प्रयोग इस प्रकार कर सकते हैं— 'आत्मा न स्वीयधर्मव्याप्यः पदार्थत्वात् अग्निवत्।' अर्थात् आत्मा अपने प्रकाश का विषय नहीं बनता, वस्तु (पदार्थ) होने के कारण, वह्नि (अग्नि) की तरह। अतः आत्मा ग्राह्य (प्रकाश्य) नहीं है ॥ १३ ॥ एतेनैवात्मनाऽऽत्मानो* ग्रहो बुद्धेर्निराकृतः । †अंशोऽप्येवं समत्वाद्वि निर्भेदत्वान्न युज्यते ॥१४॥ एतेनेति—इस पूर्वोक्त युक्ति से बुद्धि को ही आत्मा मानने वाले बौद्धों के बुद्धि रूप आत्मा को अपने ही द्वारा ग्रहण किया जाना (ग्राह्य मानना) निरस्त हो जाता है। उसी तरह चिन्मात्र रूप से समान और भेदशून्य होने से आत्मा में अंशभेद की कल्पना करना भी युक्तिविरुद्ध है। क्योंकि आत्मा और उसकी दृश्यता का साजात्य चिन्मयता की दृष्टि से है। अर्थात् यह साजात्य परमार्थसत्ता की दृष्टि से है और प्रस्तुत कथन व्यावहारिक सत्ता की दृष्टि से है ॥ १४ ॥ हृदयस्पर्शिनी इस पूर्वोक्त युक्ति से ही विज्ञानवादी बौद्धों के मत का भी खण्डन हो जाता है। विज्ञानवादी बौद्ध बुद्धि (ज्ञान) रूप आत्मा का अपने ही द्वारा (बुद्धि = ज्ञान से) ग्रहण होना मानते हैं। अर्थात् ज्ञान अपने आप को ही ग्रहण करता है, यानी उनके मत में वही ग्राहक और वही ग्राह्य माना गया है। उसका खण्डन उपर्युक्त दृष्टान्त से हो जाता है। और चिन्मात्ररूप से समान और भेदरहित होने के कारण आत्मा में अंश मानना भी युक्तिसंगत नहीं है। अर्थात् स्वरूप का स्वरूप से ही ग्राह्यत्व न हो सकने पर भी बुद्धि के एक अंश से ग्राह्यत्व और अन्य अंश से ग्राहकत्व की कल्पना करना भी उचित नहीं है ॥ १४ ॥ शून्यतापि न युक्तैवं बुद्धेरन्येन दृश्यता । युक्ताऽतो घटवत्तस्याः प्राक्सिद्धेश्च विकल्पतः ॥१५॥
- आत्मनः—पाठान्तरम् । † अंशो०—पाठान्तरम् ।
शून्यतेति—शून्यवादी बौद्ध सभी पदार्थों का निराकरण करते हैं और वे एकमात्र शून्य को ही परम तत्त्व मानते हैं। किन्तु उनका यह शून्यवाद भी युक्तिविरुद्ध है। क्योंकि बुद्धि तो जड है, इसलिये वह परप्रकाश्य है। घट के समान बुद्धि का भी किसी दूसरे के द्वारा देखा जाना ही उचित है, उसी प्रकार शून्य पदार्थ भी जड़ होने के कारण उसे भी परप्रकाश्य ही कहना होगा। इसलिये उस शून्य को परम तत्त्व नहीं कहा जा सकेगा। उसे देखने वाला अन्य पदार्थ, शून्य या बुद्धि की कल्पना से पूर्व विद्यमान है। इस कारण बुद्धि का शून्यत्व कहना ठीक नहीं है। अतः बुद्धि का जो साक्षी है, वही आत्मतत्त्व है और वही परम तत्त्व है। बुद्धि उसी में अध्यस्त है ॥ १५ ॥ हृदयस्पर्शिनी इस प्रकार बुद्धि के स्वग्राह्यत्व का निराकरण करने से अन्यग्राह्यत्व अर्थात् प्राप्त हो जाता है, अन्यथा उसकी क्षणिकता सिद्ध नहीं हो पायेगी। अतः शून्यवादी बौद्धों का कहना है कि न बुद्धि का मानना आवश्यक है और न हीं उसके किसी अन्य ग्राहक को मानने की आवश्यकता है, 'शून्य' ही आत्मतत्त्व है। किन्तु शून्यवादी का यह शून्यता का सिद्धान्त भी ठीक नहीं है। जिस प्रकार युक्तिविरोध के कारण बुद्धि की स्वग्राह्यता उचित नहीं, उसी प्रकार बुद्धि और उसमें स्थित अवभास की शून्यता को मानना भी उचित नहीं। क्योंकि अपरोक्षतया उसकी प्रतीति होती है। उस कारण घट के समान बुद्धि का भी किसी अन्य के द्वारा देखा जाना ही युक्ति युक्तहै। साक्षी में पर्यवसान होने से उसकी शून्यता की शंका करना भी उचित नहीं है। बुद्धि की कल्पना करने के पूर्व से ही सुषुप्ति में भी आत्मप्रकाश की विद्य- मानता माननी ही होगी। इस प्रकार से साक्षी की सिद्धि होने से कभी भी शून्यता है ही नहीं। सुषुप्ति में साक्षी को न माना जाय तो, सुषुप्ति के अनन्तर प्रबोध में परामर्श न होने का ही प्रसंग प्राप्त होगा। शून्यवादी सब वस्तुओं का निराकरण कर एकमात्र शून्य को ही परमार्थतत्त्व मानते हैं। जैसे बुद्धि जड़ और परप्रकाशय है, उसी प्रकार शून्य भी जड़ और परप्रकाशय है, अतः उसे परमार्थतत्त्व नहीं कह सकते। अतः जो बुद्धि का साक्षी है, वही आत्मतत्त्व परमार्थतत्त्व है। उसी में बुद्धि अध्यस्त है। वह बुद्धि से पूर्व भी विद्यमान है। अतः शून्य को परमार्थतत्त्व के रूप में नहीं माना जा सकता है ॥ १५ ॥ अविकल्पं तदस्त्येव यत्पूर्वं स्याद्विकल्पतः । विकल्पोत्पत्तिहेतुत्वाद्यद्यस्यैव तु कारणम् ॥१६॥ अविकल्पमिति—जो पदार्थ विकल्प के पहिले स्थित रहता है, वह विकल्प की उत्पत्ति में कारण होता है। अतः वह स्वयं अविकल्परूप होता है। जो जिसका कारण रहता है, वह उससे पूर्व ही हुआ करता है ॥ १६ ॥ हृदयस्पर्शिनी किञ्च जो कार्य, जिससे अन्वित हुआ दिखाई देता है, वह उसका कारण होता है और कार्य की कल्पना के पूर्व भी वह रहता है। जैसे घटरूप कार्य मृत्तिका (मिट्टी) से अन्वित होने के कारण वह मृत्तिका घट का कारण कहलाती है, और घटरूप कार्य की उत्पत्ति के पूर्व भी वह रहती है। उसी तरह बुद्धि आदि विकल्प, 'सत्' रूप अर्थ से अन्वित हुआ उपलब्ध होता है, और वह बुद्धयादि विकल्प के पूर्व भी सिद्ध है। अतः बुद्धयादि विकल्प उसी सत् का कार्य है। उस बुद्धयादि विकल्प को सत्कारणक कहना ही उचित है। जो वस्तु विकल्प से पूर्व सिद्ध रहती है, वह विकल्प की उत्पत्ति में हेतु होती है। उस कारण वह स्वयं अविकल्पित हुआ करती है। अर्थात् यह सद्धस्तु सर्व- विकल्परहित कूटस्थ है। बिना कारण के कार्य की उत्पत्ति होना अनुपपन्न है। कार्य है तो कारण का होना नान्तरीयक ही है। अन्यथा कार्यविशेषाथियों की कारणविशेषोपादान में प्रवृत्ति का नियम उपपन्न नहीं हो सकेगा। क्योंकि शून्य तो सर्वत्र सुलभ रहता है ॥ १६ ॥ अज्ञानं कल्पनामूलं संसारस्य नियामकम् । हित्वाऽऽत्मानं परं ब्रह्म *विद्यान्मुक्तं सदाऽभयम् ॥१७॥ अज्ञानमिति—सभी विकल्पों (कल्पनाओं) के बीजभूत (मूलभूत), और संसार की स्थिति के कारणभूत अज्ञान का त्याग करके मुक्त स्वरूप एवं अभय (भयशून्य) ब्रह्मरूप आत्मा का ज्ञान प्राप्त करना चाहिये ॥ १७ ॥
- विन्द्या०—पाठान्तरम् ।
१२४ उपदेशसाहस्री हृदयस्पर्शिनी समस्त विकल्परहित कूटस्थ ब्रह्म, विकल्प का कारण कैसे होगा ? क्योंकि कारण तो व्यापारवान् को कहते हैं। इस शंका का उत्तर यह है कि सर्प का कारण जैसे रज्जु होती है, वैसे ही विवर्त का अधिष्ठान होने के कारण उस कूटस्थ विकल्परहित ब्रह्म में कारणता होती है। कूटस्थ प्रत्यगात्मा ब्रह्म में संपूर्ण कल्पनाओं (अतद्रूप से प्रतिभास कराने) का मूल और संसार की स्थिति का हेतुभूत अज्ञान है। तथाच चिदविद्या के विवर्तरूप कार्यों में सत्ता के रूप में भासमान होने से कूटस्थ में भी कारणता संगत होती है। अज्ञान में ‘संसारस्य नियामकम्'—संसार का नियामक—इस विशेषण के देने से सम्पूर्ण विकल्पनाओं के मूल में अज्ञान है, यह बात अन्वय-व्यतिरेकसंज्ञक अनुमान प्रमाण को सूचित कर रही है। तो क्या अज्ञानविशिष्ट ब्रह्म का ही प्रत्यक्त्वेन रूपेण अनुसन्धान करना चाहिये ? इस शंका के समाधान में बताते हैं कि नहीं, कार्यसहित अज्ञान का त्याग कर तत्साक्षी आत्मा को 'तत्त्वमसि'—इस महावाक्य से ‘अहं ब्रह्मास्मि' इत्युक्तलक्षण ब्रह्म समझें। अर्थात् अपनी आत्मा का मुक्त (कार्य-कारणप्रपञ्चसंसर्गरहित), अभय, अद्वय ब्रह्मरूप में चिन्तन करें ॥ १७ ॥ जाग्रत्स्वप्नौ तयोर्बीजं सुषुप्ताख्यं तमोमयम् । अन्योन्यस्मिन्नसत्त्वाच्च नास्तीत्येतत्त्रयं त्यजेत् ॥१८॥ जाग्रदिति—'अज्ञान' का परित्याग करने की प्रक्रिया यह है कि 'जाग्रत्' और 'स्वप्न' (स्थूल-सूक्ष्म विषय भोगरूप संसार) तथा उन दोनों की बीजभूत (हेतुभूत) अज्ञानमयी 'सुषुप्ति' अवस्थाओं का परस्पर एक-दूसरे की अवस्था में अभाव रहता है। अतः वास्तव में ये हैं ही नहीं। इस लिये इन तीनों का त्याग करना चाहिये ॥ १८ ॥ हृदयस्पर्शिनी संसारनियामक अज्ञान का त्याग कर आत्मा को ब्रह्म समझे, यह बताया। किन्तु संसार क्या है? अज्ञान क्यों उसका कारण है? उस अज्ञान से आत्मा का विवेक कैसे हो सकेगा? इत्यादि प्रश्नों के उत्तर दिये जा रहे हैं— स्थूल-सूक्ष्म विषयभोगलक्षण जाग्रत्-स्वप्न यही संसार है। इन दोनों का कारणस्वरूप अज्ञानप्राय है, जिसे सुषुप्ति नाम से कहा जाता है। 'तमोमयम्' यहाँ 'मयट्' प्रत्यय के प्रयोग से अज्ञान की स्वतन्त्रता का वारण किया गया है। इस प्रकार कार्य-कारण का स्वरूप बताकर उन दोनों के त्याग का प्रकार बताते हैं—जाग्रत् और स्वप्न अर्थात् स्थूल- सूक्ष्म विषयभोगरूप संसार तथा उन दोनों की बीजभूत अज्ञानमयी सुषुप्ति अवस्था, इनका परस्पर एक-दूसरी अवस्था में अभाव होने के कारण वस्तुतः ये हैं ही नहीं। अतः इन तीनों को त्यागना चाहिये ॥ १८ ॥ आत्मबुद्धिमनेश्चक्षुरालोकार्थादिसङ्करात् । भ्रान्तिः स्यादात्मकर्मेति क्रियाणां सन्निपाततः ॥१९॥ आत्मेति—'त्याग करना चाहिये' इस विधि के सुनने से तो 'आत्मा' में कर्तृत्व की प्रतीति होती है, तब उसकी ब्रह्मरूपता कैसे सिद्ध हो सकेगी ? इस प्रश्न का उत्तर यह है कि देह (आत्मा), बुद्धि, मन, इन्द्रिय, प्रकाश, विषय और 'आदि' पद से देश-काल का परस्पर गुण-प्रधान भाव से अध्यास होने के कारण क्रियाओं का उद्भव (उत्पत्ति) होता है। इसी से आत्मा में कर्तृत्व की भ्रान्ति होती है। अर्थात् आत्मा कर्म (क्रिया) करता है—यह भ्रम होता है। आत्मा तो स्वतः निष्क्रिय है। अतः उसमें निष्क्रिय ब्रह्मरूपता के मानने में कोई विरोध नहीं है ॥ १९ ॥ हृदयस्पर्शिनी तीनों अवस्थाओं का त्याग करने पर भी आत्मा का ब्रह्मत्व सिद्ध नहीं हो पा रहा है, क्योंकि 'त्यजेत्'- त्यागना चाहिये—इस प्रकार विधि होने से तो उसका (आत्मा का) कर्तृत्व प्रतीत हो रहा है। इस शंका का समाधान इस प्रकार होगा कि देह, बुद्धि, मन, इन्द्रिय, प्रकाश, विषय, देश, काल आदि का गुण-प्रधान भाव से तादात्म्याध्यास होते रहने के कारण (संकर होने के कारण) क्रियाओं का उदय (उद्भव) होता है, उसी से ऐसी भ्रान्ति होती है कि यह
पार्थिवप्रकरणम् १२५ आत्मा का कर्म (क्रिया) है, और आत्मा उसका कर्ता है। अर्थात् इन सबके अधिष्ठानभूत कूटस्थ होते हुए भी आत्मा में भ्रमवशात् क्रिया-कर्तृत्व की प्रतीति हुआ करती है। तस्मात् आत्मा तो स्वतः निष्क्रिय है, उस कारण उसका निष्क्रिय ब्रह्मत्व सिद्ध हो जाता है ॥ १९॥ निमीलोन्मीलने स्थाने वायव्ये ते न चक्षुषः । प्रकाशात्वान्मनस्येवं बुद्धौ न स्तः प्रकाशतः ॥ २० ॥ निमीलेति—आत्मा में कर्तृत्व के आरोप में यह दृष्टान्त दिया जा सकता है—नेत्र के गोलकों में पलकों को जो खोलना-बन्द करना आदि क्रिया होती है, वह तो वस्तुतः 'वायु' का कार्य है, 'नेत्र' का नहीं, क्योंकि 'नेत्र' तो तेजोमय हैं। उसी प्रकार 'मन' और 'बुद्धि' में भी क्रिया नहीं है, क्योंकि वे 'ज्ञानस्वरूप हैं, उनमें जो क्रिया प्रतीत होती है, वह 'प्राण' का कार्य है ॥ २० ॥ हृदयस्पर्शिनी अब दृष्टान्त देकर आत्मा में कर्तृत्व के आरोप को समझाते हैं—नेत्रगोलकों के स्थान पर पक्ष्मों (पलकों) का बन्द करना और खोलना (निमीलन-उन्मीलन) हुआ करता है, वह वायु का कार्य है, क्योंकि क्रियात्मक वायु में तदाश्रयता है। वह निमीलन-उन्मीलन, चक्षुरिन्द्रिय का कार्य नहीं है, क्योंकि चक्षुरिन्द्रिय तो प्रकाशरूप है, उस कारण उसमें क्रियाश्रयत्व उपपन्न नहीं हो सकता। तथापि अध्यासवशात् उन्मीलन-निमीलन का चक्षु में ही व्यवहार किया जाता है। उसी प्रकार मन और बुद्धि में भी चलनाचलनादि क्रिया नहीं है, क्योंकि वे प्रकाश (ज्ञान) स्वरूप हैं, उनमें जो क्रिया प्रतीत होती है, वह प्राण का कार्य है। तथापि उसका मन-बुद्धि पर आरोप किया जाता है, और 'चञ्चल मन तथा स्थिर बुद्धि' इस प्रकार व्यवहार हुआ करता है ॥ २० ॥ सङ्कल्पाध्यवसायौ तु मनोबुद्ध्योर्यथा क्रमात् । नेतरेतरधर्मत्वं सर्वं चात्मनि कल्पितम् ॥ २१॥ संकल्पेति—'संकल्प' और 'निश्चय' क्रमशः 'मन' और 'बुद्धि' के धर्म हैं। उनका परस्पर सांकर्य नहीं होता। अतः 'आत्मा' में ये सब अध्यस्त ही हैं, वास्तविक नहीं हैं ॥ २१ ॥ हृदयस्पर्शिनी मन का धर्म सङ्कल्प करना है और बुद्धि का धर्म अध्यवसाय (निश्चय) करना है। इस प्रकार व्यवस्था रहने से उनका परस्पर सांकर्य नहीं होता। ये सब आत्मा में अध्यस्त (आरोपित) हैं, वास्तव में नहीं हैं। क्योंकि कूटस्थ आत्मा में स्वतः कर्तृत्व का होना असंभव है, अविद्यादि जो जड़ पदार्थ हैं, उनमें स्वतन्त्र प्रवृत्ति का रहना असंभव है, जड़ पदार्थ और अजड़ (चेतन) पदार्थ दोनों का वस्तुतः सम्बन्ध बताना संभव नहीं। सम्पूर्ण सहेतुक संसारबन्धन का आत्मा में अध्यास मात्र (कल्पना मात्र, आरोपमात्र) किया जाता है। वास्तव में बन्धन नहीं है। अतः सर्वदा ही आत्मा, अद्वय ब्रह्मरूप है, यह सिद्ध होता है ॥ २१ ॥ स्थानावच्छेददृष्टिः स्यादिन्द्रियाणां तदात्मताम् । गता धीस्तां हि पश्यन् ज्ञो देहमात्र इवेक्ष्यते ॥२२॥ स्थानेति—जैन दार्शनिक 'आत्मा' को देहपरिमाणवाला कहते हैं, तब उसमें ब्रह्मत्व (ब्रह्मरूपता) कैसे होगा ? इस प्रश्न का उत्तर यह है कि इन्द्रियों की दृष्टि अपने-अपने गोलकों से परिच्छिन्न है, और वह तदाकारता को प्राप्त हो जाती है, तथा 'बुद्धि' का देह और इन्द्रियों से तादात्म्य है। अतः बुद्धि का साक्षी होने से 'आत्मा', देहपरिमाणवाला प्रतीत होता है ॥ २२ ॥ हृदयस्पर्शिनी पहले बता चुके हैं कि देह, इन्द्रिय, मन, बुद्धि, और शून्य—इनमें से कोई भी आत्मा नहीं है, किन्तु इनसे विलक्षण ही कोई अन्य आत्मा है। अब देहादिकों से विलक्षण रहता हुआ भी वह आत्मा देहसमपरिमाण है,
१२६ उपदेशसाहस्री ऐसा जैनमतावलम्बी कहते हैं। देहपरिणाम मानने पर उसे परिच्छिन्न कहना होगा, तब उसका ब्रह्मत्व कैसे सिद्ध हो सकेगा ? तथा सब कुछ उस पर कल्पित है, यह कहना भी कल्पक के अभाव में संगत नहीं है। इसका खण्डन इस प्रकार करते हैं—इन्द्रियों की दृष्टि अपने-अपने गोलकों से परिछिन्न है, क्योंकि वे इन्द्रियाँ देह में ही होती हैं, देह के बाहर नहीं। अतः देह के अवयवभूत गोलकस्थान को ही उन दृष्टियों का परिच्छेदक मानना होगा। तथाच त्वगादि इन्द्रियाँ, यथायोग देहपरिमाण की होने से, और इन्द्रियों सहित देह के साथ तदाकारता (तादात्म्य) को प्राप्त हुई बुद्धि भी मध्यम परिमाण की (देहपरिमाण की) हो जाती है। उसे देखने वाला आत्मा, अपरिच्छिन्न रहने पर भी देहपरिमाण का-सा भ्रमवश दिखाई पड़ता है। वस्तुतः आत्मा देहपरिमाण नहीं है। उसे देहपरिमाण मानने पर घट-पटादि के समान सावयव और अनित्य कहना पड़ेगा, तथा पारलौकिक साधनों की ओर प्रवृत्ति नहीं हो पायेगी। उपर्युक्त उपाधियों के बिना आत्मा का स्वतः परिच्छेद उपलब्ध न होने से उसका ब्रह्मत्व (उसकी ब्रह्माकारता) उचित ही है। और जो निरवयव है, वस्तुतः उसके साथ किसी उपाधि का संसर्ग न हो पाने से उस पर सब कुछ कल्पित कहना भी उचित ही है। किञ्च देहपरिमाण मानने पर यदि उसे कर्मवशात् मनुष्य शरीर से कीट योनि प्राप्त हो जाय तो कीट शरीर में उसका प्रवेश होना संभव न हो सकेगा, और कीट योनि से हाथी आदि की योनि प्राप्त हो जाय तो हाथी के सर्व शरीर में व्याप्त न हो सकने से सम्पूर्ण शरीर के सुख-दुःखादि का वह अनुभव नहीं कर सकेगा। अतः आत्मा को विभुपरिमाण (सर्वव्यापक) ही मानना उचित है, वह स्वरूपतः अनन्त है। उसमें जो परिच्छिन्नता प्रतीत होती है, वह औपाधिक ही है॥ २२॥ क्षणिकं हि तदत्यर्थं धर्ममात्रं निरन्तरम्। सादृश्याद्दीपवत्तद्धीस्तच्छान्तिः पुरुषार्थता ॥२३॥ क्षणिकमिति—बौद्धों का सिद्धान्त है कि 'ज्ञान' और 'ज्ञेय' क्षणिक हैं, स्वभावतः नाशवान् हैं, वे धर्ममात्र (वस्तुमात्र) हैं अर्थात् निरधिष्ठान हैं तथा निरन्तर उत्पन्न होते रहते हैं। दीपक की शिखा के समान उनमें सादृश्य होने के कारण उनकी प्रत्यभिज्ञा होती है। अतः उनकी निवृत्ति ही परम पुरुषार्थ (निर्वाण) है। अभिप्राय यह है कि इनके मत में सभी पदार्थ क्षणिक विज्ञान मात्र हैं। विषयों के समान ही उनका ज्ञाता आत्मा भी क्षणिक है। जैसे दीप शिखा, या नदी का प्रवाह प्रतिक्षण नवीन उत्पन्न होता हुआ भी पूर्व सदृश होने के कारण उसकी प्रत्यभिज्ञा (वही यह है, इस प्रकार की प्रतीति) होती है, वैसे ही दृश्यमान वस्तु भी पूर्वसदृश होने के कारण स्थायी-सी प्रतीत होती है। उसमें स्थायित्वबुद्धि की निवृत्ति ही 'विवेक' है, और वही परम पुरुषार्थ है॥ २३॥ हृदयस्पर्शिनी दिगम्बर-जैन मत का खण्डन करके आत्मा की अनन्तता का जो प्रतिपादन किया, उसे शाक्य अर्थात् बौद्ध सहन नहीं कर पा रहे हैं, अतः उनका मत बता रहे हैं। बौद्धों का कहना है कि ज्ञान और ज्ञेय दोनों क्षणिक हैं, अर्थात् द्वि-त्रिक्षणावस्थायी भी नहीं हैं, अपितु वे स्वभावतः नाशशील (स्वरस-भङ्गुर) हैं, वे धर्ममात्र (वस्तुमात्र) हैं अर्थात् उस वस्तु का कोई स्थायी अधिष्ठान नहीं है। स्वरस-भङ्गुर रहने पर भी पूर्वोत्तर क्षणों में असद्बुद्धि नहीं होगी, क्योंकि वे धर्म (वस्तु) निरन्तर उत्पन्न होते रहते हैं। उनका कभी विच्छेद उपलब्ध नहीं होता। सभी वस्तु क्षणिक होने पर भी दीपशिखा के समान उनमें अत्यन्त सादृश्य होने के कारण 'तदेवेदम, सोऽहम्' इस प्रकार दृश्य-द्रष्टृ- विषयक उनकी प्रत्यभिज्ञा हुआ करती है। निष्कर्ष यह है कि बौद्धों के मत में यच्चयावत् पदार्थ क्षणिक हैं, विज्ञान मात्र हैं। जैसे विषय (पदार्थ, वस्तु, ज्ञेय) क्षणिक हैं, वैसे ही उनका ज्ञाता आत्मा भी क्षणिक है। जैसे दीपशिखा अथवा नदी का प्रवाह प्रतिक्षण नवीन उत्पन्न होता हुआ भी पूर्वसदृश होने के कारण पूर्व के-से (पहले के-से) ही प्रतीत होते हैं, उसी प्रकार दृश्यमान वस्तुएँ भी पूर्वसदृश होने के कारण स्थायी जान पड़ती हैं। उनमें स्थायित्व-बुद्धि की निवृत्ति ही विवेक है और वही मोक्षरूप परम पुरुषार्थ है॥ २३॥ स्वकारान्यावभास* च येषां रूपादि विद्यते। येषां नास्ति ततश्चान्यत्पूर्वासङ्गतिरुच्यते ॥२४॥ *भास्यं०—पाठान्तरम्।
पार्थिवप्रकरणम् १२७ स्वाकारेति—जिन बौद्धों के मत में रूपादि बाह्य पदार्थ, ज्ञानाकार से भिन्न किसी अन्य ज्ञान के द्वारा अव- भासित होते हैं, उसी तरह जिनके मत में उससे भिन्न उनकी सत्ता नहीं है, वे एक प्रकार से पूर्व मतावलम्बियों के मत की असंगति को बताते हैं। विज्ञान वादी बौद्धों के मत में रूपादि बाह्य पदार्थों की सत्ता नहीं है, बुद्धि में रूपादि बाह्य पदार्थों के संस्कार (वासना) रहते हैं, उस कारण विज्ञान का ही अवभास मात्र होता रहता है। तथा वे ज्ञान, ज्ञानान्तर से प्रकाशित होते हैं, यह भी मानते हैं। परन्तु शून्यवादी बौद्ध, ज्ञान और ज्ञेय दोनों की ही सत्ता नहीं मानते। ये, विज्ञानवादी के मत को असंगत बताते हैं। इनको इस पारस्परिक मतभेद को दिखाकर उनके मत का खण्डन ग्रन्थकार ने कर दिया ॥ २४ ॥ हृदयस्पर्शिनी भिन्न-भिन्न वादियों पर दिये गये भिन्न-भिन्न दूषणों के परिज्ञानार्थ बौद्धों के मतभेद को प्रदर्शित करते हैं—रूपादि बाह्य आकारों का ज्ञान से अवभास मानने वाले बाह्यार्थप्रत्यक्षवादी वैभाषिक हैं। किन्तु विज्ञानवादी योगाचार बौद्ध, नील-पीतरूपादि बाह्य पदार्थों का अस्तित्व नहीं मानते, अपितु बुद्धिगत रूपादि संस्कार के कारण उन्हें विज्ञान के ही अवभास मात्र मानते हैं। और एक ज्ञान का दूसरे ज्ञान से प्रकाशित होना स्वीकार करते हुए वैभाषिक बौद्धों के मत को असंगत बताते हैं। किन्तु जिन बौद्धों के मत में वह विज्ञान भी नहीं है अर्थात् ज्ञान और ज्ञेय दोनों की सत्ता जो स्वीकार नहीं करते, अपितु 'सर्वं शून्यम्' कहते हैं, वे माध्यमिक शून्यवादी बौद्ध विज्ञानवादियों के मत को असंगत बताते हैं ॥ २४ ॥ बाह्याकारतवतो ज्ञप्तेः स्मृत्यभावः सदा क्षणात् । क्षणिकत्वाच्च संस्कारं नैवाधत्ते क्वचित्तु धीः ॥२५॥ बाह्येति—विज्ञानवादी बौद्धों के अनुसार 'ज्ञान' ही बाह्यविषयस्वरूप होने से, और ज्ञाता भी क्षणिक होने से सर्वदा ही स्मृति का अभाव होता है, तथा बुद्धि भी क्षणिक होने से वह अपने संस्कारों को उत्तरकालीन बुद्धि में कभी भी स्थापित नहीं कर सकती ॥ २५ ॥ हृदयस्पर्शिनी अब उन असंगतियों को बताते हैं—यदि ज्ञान ही बाह्य वस्तु के आकार में परिणत होता है, तो विषय की उत्पत्ति से पूर्व ज्ञान के साथ उसका सम्बन्ध होना संभव ही नहीं, और उत्पन्न होने पर भी उस वस्तु के क्षणिक होने से ज्ञान के साथ उसका संबन्ध होना असंभव ही है, अतः उसका प्रत्यक्ष अनुभव होना भी उपपन्न नहीं है। उस कारण वैभाषिक का बाह्यार्थप्रत्यक्षवाद उचित नहीं है। अतएव सौत्रान्तिक का बाह्यार्थ-नित्यानुमेयवाद भी अनुपपन्न है। परिशेषात् प्रतीयमान बाह्य विषय, ज्ञान का ही आकार है, अतः एकमात्र विज्ञान का ही अस्तित्व मानना चाहिये। किञ्च ज्ञाता को भी क्षणिक मानने वाले विज्ञानवादी के अनुसार पूर्व क्षण में रहने वाली बुद्धि का उत्तर क्षण में होने वाली बुद्धि से संबन्ध न रहने के कारण अपने अनुभव किये हुए पदार्थ का संस्कार वह नहीं छोड़ सकती। उस कारण उसे पूर्वानुभूत पदार्थ की स्मृति भी नहीं होनी चाहिये। किन्तु स्मृति होती तो है। (अतः विज्ञानवादी का मत स्वीकारा नहीं है। उसी प्रकार शून्यवादी का मत युक्तिविरुद्ध होने से सर्वथैव अग्राह्य है) ॥ २५ ॥ आधारस्याप्यसत्त्वाच्च तुल्यतानिमित्ततः । स्थाने वा क्षणिकत्वस्य हानं स्यान्न तदिष्यते ॥२६॥ आधारस्येति—ये बौद्ध गण 'बुद्धि' का कोई आधार (साक्षी) भी नहीं स्वीकार करते, इसलिये पूर्ववर्ती और उत्तरवर्ती ज्ञानों की तुल्यता का भी कोई हेतु नहीं है। और यदि वे किसी को आधार मानते हैं, तो उनके क्षणिकत्व- सिद्धान्त का भंग होता है। सिद्धान्त का भंग होना तो उन्हें इष्ट नहीं है ॥ २६ ॥
१२८ -उपदेशसाहस्री हृदयस्पर्शिनी आत्मा या अन्तःकरण में संस्कार का आधान, बुद्धि (ज्ञान) करेगी कहें, तो संस्कारों के आधानकाल में बुद्धि के आधारभूत अन्तःकरण या आत्मा की स्थिति ही कहाँ है ? क्योंकि बौद्ध सिद्धान्त में तो सभी क्षणिक माने गये हैं। तस्मात् बौद्ध मत के अनुसार सदैव स्मृति का अभाव ही रहेगा। प्रत्यभिज्ञा को बौद्धों ने सादृश्यनिबन्धन भ्रम कहा है, किन्तु उनका यह कहना अनुचित है। इनके मत में बुद्धि का कोई आधार (साक्षी) न होने से पूर्ववर्ती और उत्तरवर्ती ज्ञान की तुल्यता का भी कोई हेतु नहीं है, अतः वह तुल्यता, निनिमित्त ही है; क्योंकि पूर्वक्षण और उत्तरक्षणवर्ती दोनों ज्ञानों में सादृश्यनिरूपक कोई नहीं है। सादृश्य के व्यवहार में निमित्त तो गुण या अवयव हुआ करते हैं, विज्ञान में उनका होना संभव नहीं, क्योंकि विज्ञान तो निर्गुण और निरवयव रहता है। तथा पूर्वोत्तर क्षणों में किसी एक द्रष्टा के विद्यमान न रहने से सादृश्य कैसे सिद्ध हो सकेगा ? अतः तुल्यता के सिद्ध न हो पाने से प्रत्यभिज्ञान को तन्निबन्धन अर्थात् सादृश्यनिबन्धन भी नहीं कह सकते। इन सब विपत्तियों से बचने के लिये यदि पूर्वापरक्षणसादृश्य के किसी स्थायी द्रष्टा का स्वीकार करोगे तो तुम्हारे क्षणिकत्व के सिद्धान्त की हानि होगी, जो तुम्हें इष्ट नहीं है ॥ २६ ॥ शान्तेश्चायतनसिद्धत्वात्साधनोक्तिरनर्थिका । एकैकस्मिन्समाप्तत्वाच्छान्तेरन्यानपेक्षता ॥२७॥ शान्तेश्चेति — बाह्य वस्तुओं के स्थायित्वादि भ्रम की निवृत्ति अनायास हो ही सकती है। अतः उसके लिये साधन (उपाय) बताना व्यर्थ ही है। विज्ञान की निवृत्ति एक-एक क्षण में (प्रतिक्षण) हो ही जाती है। अतः उसकी निवृत्ति के लिये किसी अन्य साधन की अपेक्षा नहीं है ॥ २७ ॥ हृदयस्पर्शिनी बौद्धों का जो यह कथन है कि 'सर्वं क्षणिकम् — इस प्रकार क्षणिकत्वादि भावना करते रहने से स्थायित्व- भ्रम की निवृत्ति (शान्ति) होना ही मुक्ति है', वह भी उचित नहीं है। विषयों (पदार्थों) के स्थायित्वादिभ्रम की निवृत्ति के लिये किसी प्रकार के प्रयत्न की तुम्हारे मत के अनुसार आवश्यकता नहीं होगी। क्योंकि तुम्हारे मत में प्रत्येक ज्ञान स्वभावतः ही क्षणिक है, अतः उसके स्थायित्वभ्रम को दूर करने के लिये किसी साधन (उपाय) की कौन-सी आवश्यकता है ? वह तो स्वयमेव दूसरे क्षण में शान्त (निवृत्त) हो जायेगा। सदृश ज्ञान-सन्तान के लिये यदि कहो तो 'सदृश ज्ञान-सन्तान' तो कोई वस्तु ही नहीं है। क्योंकि उस सन्तान का कोई स्थिर साक्षी नहीं है। और एक-एक क्षण में भ्रम का अभाव तो स्वाभाविक ही है, अतः शान्ति (निवृत्ति) रूप मुक्ति के लिये किसी साधन की अपेक्षा तुम्हारे मत में नहीं होनी चाहिये। अतः बौद्ध मत के अनुसार मुक्ति के लिये साधनानुष्ठान करना या साध- नोपदेश देना अनुचित ही सिद्ध हो रहा है ॥ २७ ॥ अपेक्षा यदि भिन्नेऽपि परसंतान इष्यताम् । सर्वार्थे क्षणिके कस्मिंस्तथाप्यन्यानपेक्षता ॥२८॥ अपेक्षेति — इसके अतिरिक्त बौद्ध मत के अनुसार पदार्थों का कार्य-कारण भाव भी नहीं बन सकता। यदि यह कहें कि कार्य और कारण में अत्यन्त भेद होने पर भी उनमें सन्तति-क्रम होने के कारण उन्हे एक-दूसरे की अपेक्षा हो सकती है, तब तो किसी अन्य कार्य-कारण सन्तति में भी अन्य वस्तु की अपेक्षा कहनी होगी। यदि यह कहें कि सब पदार्थ क्षणिक होने पर भी किसी-किसी में ही किसी विशेष पदार्थ की अपेक्षा होती है, तो यह कहना भी ठीक नहीं है, क्योंकि क्षणिक होने के कारण एक पदार्थ को दूसरे पदार्थ की अपेक्षा ही नहीं होगी ॥ २८ ॥ हृदयस्पर्शिनी किञ्च बौद्ध मत के अनुसार लौकिक साध्य-साधनभाव (कार्य-कारणभाव) भी संगत नहीं हो सकता, क्योंकि सम्पूर्ण पदार्थ क्षणिक ही हैं। लोकव्यवहार में हम देखते हैं कि दूध से दही हुआ करता है, अर्थात् दही का
पार्थिवप्रकरणम् १२९ कारण दूध है। किन्तु बौद्ध मत के अनुसार यदि सभी पदार्थ क्षणिक माने जाते हैं तो कार्य के नियत पूर्ववर्तीरूप से कारण के रहने की कोई आवश्यकता नहीं होनी चाहिये। यदि कहो कि पदार्थों को क्षणिक मानने पर भी उनका सन्ततिक्रम तो चलता ही रहता है। अर्थात् कदाचित् बौद्ध यह कहें कि कार्य-कारण में अत्यन्त भिन्नता रहने पर भी, उनमें सन्ततिक्रम (धाराप्रवाह) चलते रहने के कारण एक-दूसरे की अपेक्षा हो सकती है, तो यह बात अनुचित है। जैसे दही से पहले कारणरूप से दूध का होना आवश्यक है, तथापि दुग्धसन्ततिक्रम से दधिसन्ततिक्रम सर्वथा भिन्न है, इसलिये जिस प्रकार दधिसन्ततिक्रम के कारणरूप से दुग्धसन्ततिक्रम की अपेक्षा होती है, वैसे ही वालुकादि अन्य सन्ततिक्रम से भी दधि की उत्पत्ति क्यों नहीं होती ? न हो सकने में कोई बाधा नहीं होनी चाहिये। यदि दूध और दही का वास्तव में कोई सम्बन्ध नहीं है, तो बालू से भी दही बनाया जाना चाहिये। यदि कहो कि पदार्थों के क्षणिक होने पर भी किसी-किसी कार्य में ही किसी विशेष पदार्थ की आवश्यकता होती है, किन्तु यह कहना भी उचित न होगा, क्योंकि क्षणिक होने के कारण किसी को भी किसी अन्य की अपेक्षा नहीं रहती ॥ २८ ॥ तुल्यकालसमुद्भूतावितेरेतरयोगिनौ । योगाच्च संस्कृतो यस्तु सोऽन्यं होक्षितुमर्हति ॥२९॥ तुल्यकालेति-एक साथ उत्पन्न होने वाले दो पदार्थ जब परस्पर एक-दूसरे से सम्बन्धित होते हैं, तब उन दोनों का सम्बन्ध होने पर जो जिससे संस्कार प्राप्त करता है, वही दूसरे की अपेक्षा किया करता है ॥ २९ ॥ हृदयस्पर्शिनी जैसे अंकुर और पर्जन्य तुल्यकालसमुद्भूत हैं, अर्थात् एक साथ उत्पन्न होते हैं, और उनका परस्पर सम्बन्ध भी है। उन दोनों में से जो अंकुर पदार्थ है, वही पर्जन्य के सम्बन्ध से अतिशयित होता है। अतिशय को प्राप्त (संस्कृत) हुआ वह अंकुर पदार्थ, अन्य पर्जन्य की अपेक्षा करता है। किन्तु क्षणभङ्गुरवाद में दोनों भिन्नकालिक होने के कारण परस्पर उन दोनों में सम्बन्ध न होने से उपकार्योपकारक-भाव अनुपपन्न है, अतः अंकुर को पर्जन्य की अपेक्षा नहीं होनी चाहिये। किन्तु हमारे मत में पर्जन्य और अंकुर में उपकार्योपकारक-भाव है। पर्जन्य, अंकुर का उपकारक है और अंकुर उसका उपकार्य है। अतः अंकुर को पर्जन्य की अपेक्षा हो सकती है और यह बात स्थायित्व होने पर ही संभव है। जो जिससे उपकृत (संस्कृत) होता है, वह उस संस्कारकर्त्ता की अपेक्षा करता है ॥ २९ ॥ मृषाध्यासस्तु यत्र स्यात्तन्नाशस्तत्र नो मतः । सर्वनाशो भवेद्यस्य मोक्षः कस्य फलं वद ॥३०॥ मृषेति-अभी तक बौद्धों के मत का खण्डन किया गया, अब अपने मत को बता रहे हैं- हमारे वेदान्त-सिद्धान्त में जहाँ (कर्तृत्व-भोक्तृत्वादिहीन्य ब्रह्म में) कर्तृत्व-भोक्तृत्वादि का मिथ्या अध्यास होता है, वहीं 'मैं ब्रह्म हूँ' इस बोध से उस अध्यास का नाश होता है, अधिष्ठानभूत ब्रह्म का कभी नाश नहीं होता। किन्तु जिसके मत में सर्वनाश (सभी का नाश) हो जाता है, तब मोक्षरूप फल की प्राप्ति किसे होगी ? तुम ही बताओ ॥ ३० ॥ हृदयस्पर्शिनी इस प्रकार क्षणिकमत का निराकरण कर अब शून्यमत का भी निराकरण करेंगे, किन्तु उससे पूर्व अपने मत का सामञ्जस्य बता रहे हैं। वेदान्तमत के अनुसार ब्रह्मरूप आत्मा में किसी प्रकार का कोई अतिशायाधान न होने से क्षणिकमत के समान वेदान्त में भी मोक्ष की अनुपपत्ति माननी पड़ेगी। इस आशंका का उत्तर यह है कि ब्रह्मरूप आत्मा में किसी अतिशय का आधान न होने पर भी उसके (ब्रह्मरूप आत्मा के) स्थायी रहने से मोक्षरूप फल की उपपत्ति हो जाती है। अतः उक्त आशंका उपस्थित करना उचित नहीं है। वेदान्तसिद्धान्त में जहाँ कर्तृत्व-भोक्तृत्वादि- शून्य अधिष्ठानरूप ब्रह्म में कर्तृत्वादिरूप संसार का मिथ्या अध्यास होता है, अथवा अविद्यानिबन्धन मृषाध्यासरूप भ्रम (कर्तृत्वादिसंसार का प्रतिभास) जहाँ होता है, वहीं पर 'अहं ब्रह्मास्मि' - मैं ब्रह्म हूँ - इस ज्ञान (विद्या) से अध्यस्त का विनाश हुआ करता है। तथाच अज्ञान के वश होने से जो बन्ध का अनुभव कर रहा हो, उसी को ज्ञान होने पर बन्ध १७
१३० उपदेशसाहस्री की निवृत्ति होने से शुद्धस्वरूपानुभवरूप पुरुषार्थ का लाभ होता है। अर्थात् 'अहं ब्रह्मास्मि' इस ज्ञान से अज्ञाननिवृत्ति के माध्यम से यथोक्त अध्यासत्तिवृत्तिरूप मोक्ष ही हमें विवक्षित है, हेयोपादेयरूप नहीं। तस्मात् हमारे पक्ष में वस्तुतः अतिशयाधान न होनेपर भी मोक्ष की अनुपपत्ति नहीं है। अतः वेदान्तियों का मत सामञ्जस्यपूर्ण है। अब शून्य- वादी के मत में दोष बताते हैं—जिस शून्यवादी के मत में अधिष्ठान, आरोप्य आदि सभी का नाश होने से न फल रहा और न फलभोक्ता रहा, तब मोक्षरूप फल का अधिकारी ही कौन रहा ? अतः मोक्षरूप फल के अधिकारी के रूप में किसी स्थिर (स्थायी) तत्त्व को अवश्य ही स्वीकार करना चाहिये । एवंच शून्यवादी के मत में 'मोक्ष' सिद्ध ही नहीं हो पाता है ॥ ३० ॥ अस्ति तावत्स्वयं नाम ज्ञानं वात्माऽन्यदेव वा । भावाभावज्ञतस्तस्य नाभावस्त्वधिगम्यते ॥३१॥ अस्तीति—सभी के सिद्धान्तों के अनुसार 'आत्मा' तो है ही। किन्तु विचारणीय प्रश्न इतना ही है कि वह (आत्मा) ज्ञानस्वरूप है या शून्य है ? हमारे वेदान्त सिद्धान्त के अनुसार तो वह (आत्मा) भाव और अभाव दोनों का साक्षी होने से उसे शून्यरूप नहीं कह सकते ॥ ३१ ॥ हृदयस्पर्शिनी शून्यवादी के अनुसार 'सर्वनाश' को ही मोक्ष कहना होगा। क्योंकि शून्य के परमार्थस्वभाव होने में इनके पास कोई प्रमाण नहीं है । 'स्वयं' तो सभी मानते हैं, उसे स्वयंप्रकाश ज्ञान, आत्मा, कहें या शून्य कहें ? कहने का तात्पर्य यह है कि कोई एक परमार्थवस्तु (परमार्थस्वभाव वस्तु ) अवश्य है। वह क्या है ? यही विचारणीय प्रश्न है। वह परमार्थवस्तु, लौकिक भाव-अभाव की अभिज्ञ (साक्षी) अर्थात् लोकव्यवहारसिद्ध भाव-अभाव पदार्थों को जाननेवाली है। अतः परमार्थवस्तु का अभाव नहीं कह सकते । तस्मात् 'शून्य' को परमार्थ वस्तु समझना उचित नहीं है। भाव-अभाव के अभिज्ञ किसी स्थिर साक्षी के अभाव में अर्थात् न मानने पर समस्त व्यवहार के लोप होने का प्रसंग प्राप्त होगा ॥ ३१ ॥ येनाधिगम्यतेऽभावस्तत्सत्स्यात्तन्न चेद्भवेत् । भावाभावानभिज्ञत्वं लोकस्य स्यान्न चेष्यते ॥३२॥ येनेति—जो अभाव को जानता है, वह जानने वाला कोई सत् ही होना चाहिये । अन्यथा लोगों को भाव और अभाव का ज्ञान ही नहीं होगा, जो किसी को भी अभीष्ट नहीं है ॥ ३२ ॥ हृदयस्पर्शिनी अपने शून्यवाद को सिद्ध करने के लिए यदि बौद्ध कहें कि उस परमार्थवस्तु के अभाव का भी ज्ञान यदि किसी को हो जाय ? तो जिसे वह ज्ञान होगा उसी का सत्त्व (सत्ता) होगा, शून्यत्व की शंका करने का अवसर ही कहाँ रहेगा ? अथवा पूर्वोक्त अर्थ को ही स्पष्ट कर रहे हैं—जो सभी के अभाव को जानता है, उसे सत् ही कहना होगा । अन्यथा लोगों को भाव और अभाव का ज्ञान ही नहीं हो पायगा। उसे इष्ट कहें तो स्वानुभवविरोध होगा, क्योंकि सभी को भाव और अभाव का ज्ञान रहता है। उसका अपलाप नहीं कर सकते । अतः भाव-अभाव का जो अभिज्ञ है, वही सत् आत्मा है । शून्य नहीं है ॥ ३२ ॥ सदसत्सदसच्चेति विकल्पात्प्राग्यदिष्यते । तदद्वैतं समत्वात्तु नित्यं चान्यद्विकल्पितात् ॥३३॥ सदिति—सत्-असत् और सदसत्—इस विकल्प से पूर्व जो वस्तु अभीष्ट है, वह समानरूप होने के कारण अद्वितीय और नित्य है एवं विकल्पित पदार्थों से भिन्न है ॥ ३३ ॥
पार्थिवप्रकरणम् १३१ हृदयस्पर्शिनी इसपर भी बौद्ध पुनः शंका करता है कि भाव-अभाव के विभाग को जाननेवाली यद्यपि कोई वस्तु है, यह स्वीकार कर भी लिया जाय, तथापि वह अभिज्ञातृ वस्तु इसी प्रकार की (अर्थात् सत्) है, इस विशेषता के साथ उसका निर्धारण कर पाने में कोई कारण नहीं है। इस शंका के निराकरणार्थ उसके स्वरूप को बता रहे हैं-भावाभाव को जाननेवाला जो साक्षीस्वरूप है, वह सत्, असत् और सदसत् के विकल्प (विवाद) स्वरूप जगत् के पूर्व से ही सिद्ध है। क्योंकि विकल्प (विवाद) किसी आधार (आलम्बन) पर हुआ करता है, निराधार (निरालम्बन) विकल्प नहीं हुआ करता। अतः विकल्परूप दृश्य जगत् के पूर्व जो है, वह अद्वैत ही है। क्योंकि विकल्प (जगत्) के पूर्व विषमता रहने का कोई कारण ही नहीं है। विकल्प से पूर्व वही अद्वैत वस्तु समानरूप से है। उस अद्वैत वस्तु का स्वरूप द्वैत जड़ से विलक्षण है और वह अविनाशी होने से नित्य है। तथा अनृत (असत्य) से विलक्षण (भिन्न) रहने से वह सत्य है। पूर्वार्ध में 'विकल्पात् प्राग् यदिष्यते' के द्वारा उसका स्वतःसिद्धत्व बताने से उसकी ज्ञानस्वरूपता बताई गई है। 'अद्वैतम्' से उसकी अनन्तता बताई गई है। 'नित्यम्' के द्वारा कूटस्थत्व बताने से दुःखाभाव को सूचित किया गया है और उससे अभिन्न रहनेवाली (अर्थात् दुःखाभाव से सम्बद्ध) आनन्दरूपता को ध्वनित किया गया है। तथाच यह आत्मतत्त्व सत्य-ज्ञान-अनन्त-आनन्दरूप है, यह अनुभव से ही सिद्ध होता है, किसी अन्य कारण के अन्वेषण की आवश्यकता नहीं है ॥ ३३ ॥ विकल्पोद्भवतोऽसत्त्वं स्वप्नदृश्यवदिष्यताम् । द्वैतस्य प्रागसत्त्वाच्च सदसत्त्वादिकल्पनात् ॥३४॥ विकल्पेति-द्वैत (असत्त्व) का आविर्भाव विकल्प से हुआ है और सत्त्व (सत्ता) और असत्त्व (असत्ता) आदि की कल्पना होने से पूर्व उसका (द्वैत का) अभाव है। अतः स्वप्न के दृश्य के समान उसका (द्वैत का) अभाव ही मानना चाहिये ॥ ३४ ॥ हृदयस्पर्शिनी नानाविध द्वैत के प्रतीयमान रहते हुए अद्वैत आत्मतत्त्व का अनुभव हो रहा है, यह कैसे कह सकते हैं ? अथवा द्रष्टा की सत्यता को बताकर दृश्य के विकल्पात्मक रहने से उसकी असत्यता को बता रहे हैं। द्वैत का आविर्भाव विकल्प से हुआ है। वस्तु के न रहने पर भी (अस्तित्व-सत्ता-न रहने पर भी) शब्द मात्र से जिसका बोध होता हो, उसे विकल्प कहते हैं- 'शब्दज्ञानानुपाती वस्तुशून्यो विकल्पः'। यह प्रतिभासमान संसार अविद्या (माया) के कारण अध्यस्त होने से विकल्परूप ही है। वास्तव में वह है नहीं, केवल भ्रम से उसकी प्रतीति हो रही है, उस कारण इसे विकल्प से आविर्भूत हुआ कहते हैं; जैसे स्वप्नदृश्य वस्तुतः नहीं रहता, फिर भी उसकी प्रतीति होती है। अनुमान प्रयोग इस प्रकार होगा- 'द्वैतं न परमार्थसत् दृश्यत्वात् स्वप्नदृश्यवत्'। उसके मिथ्यात्व में एक अन्य हेतु भी है- 'सदसत्त्वादिविकल्पनात् प्राक् असत्त्वात्' - अर्थात् सत्ता और असत्ता आदि की कल्पना करने से पूर्व इसका स्वप्नदृश्य के समान अभाव था। द्वैतरूप प्रपञ्च की अज्ञातसत्ता में कोई प्रमाण नहीं है। अतः द्वैतात्मक प्रपञ्च (संसार) को मिथ्या ही समझना चाहिए ॥ ३४ ॥ वाचारम्भणशास्त्राच्च विकाराणां ह्यभावता । मृत्योः स मृत्युमित्यादेर्मम मायेति च स्मृतेः ॥३५॥ वाचारम्भणेति- 'ये सब घट-पटादि विकार वाणी से आरम्भ होने वाले हैं'- इस शास्त्रवाक्य से, और 'वह मृत्यु से मृत्यु को प्राप्त होता है' - इस श्रुति से तथा 'मेरी माया का पार पाना कठिन है'- इस स्मृति से विकारों का अभाव ही सिद्ध होता है ॥ ३५ ॥
१३२ उपदेशसाहस्री हृदयस्पर्शिनी न्याय (तर्क) से द्वैत का मिथ्यात्व बताकर अब शास्त्र से भी उसके मिथ्यात्व को बताते हैं— 'घटादि विकार वाणी से आरम्भ हुआ करते हैं'¹ इस श्रुत्यात्मक शास्त्र से विकारों का अभाव स्पष्ट है। 'वाचारम्भण' शब्द अनृतत्व (मिथ्यात्व) का वाचक है, यह प्रतीत हो रहा है, क्योंकि उसके आगे ही कारण की सत्यता का निश्चय किया गया है। 'वह मृत्यु से मृत्यु को प्राप्त होता है'² इस श्रुत्यात्मक शास्त्र से द्वैतदर्शन (भेददृष्टि) की निन्दा की गई है। यदि द्वैत सत्य होता तो उसकी निन्दा न की गई होती। अर्थात् उसकी (द्वैत की) अनृतता (असत्यता) प्रतिपादित हो जाती है। मूलस्थित 'आदि' शब्द से साक्षात् द्वैतापवादक (द्वैत का बाधक) शास्त्र 'नेह नानास्ति किञ्चन'³ को भी समझना चाहिए। तथा 'मेरी माया का पार पाना कठिन है'⁴ यहाँ पर 'जो मेरे ही शरण आते हैं, वे इस माया का पार हो पाते हैं'—इस प्रकार परमात्मज्ञान से ही इस गुणमयी कार्यसहित माया की निवृत्ति की जा सकती है, —यह भगवान् स्वयं अपने श्रीमुख से बता रहे हैं। यदि द्वैत सृष्टि सत्य होती तो उनका यह कथन कैसे उपपन्न होगा ? अतः द्वैत मायिक है, यह सिद्ध हो जाता है ॥ ३५ ॥ विशुद्धिश्चात एवास्य विकल्पाच्च विलक्षणः । उपादेयो न हेयोऽत आत्मा नान्यैःप्रकल्पितः ॥३६॥ विशुद्धिरिति—अतएव 'आत्मा' शुद्ध स्वभाववाला और द्वैत से विलक्षण है। वह न ग्राह्य है, और न त्याज्य है और न किसी अन्य तत्त्व के द्वारा कल्पित ही है ॥ ३६ ॥ हृदयस्पर्शिनी इस प्रकार श्रुति तथा युक्ति से द्वैत का मिथ्यात्व बताया गया, उस कारण आत्मा का अद्वितीयत्व सुदृढ़ सिद्ध हुआ। अब अशुद्धि का कोई कारण न होने से उसकी विशुद्धि भी बतायी जा रही है— द्वैत के मिथ्या होने से ही आत्मा की धर्माधर्मतत्फलसंसपर्गरूप विशुद्धि भी स्पष्ट है। और विकल्पात्मक द्वैत से विलक्षण (विपरीत) स्वभाव का रहने से वह (आत्मा) न ग्राह्य (उपादेय) है, न त्याज्य (हेय) है। क्योंकि हानोपादान (त्याग और ग्रहण) तो मूर्त पदार्थ का होता है। अमूर्त प्रत्यगात्मा में उनका होना संभव नहीं है। किंच—किसी अन्य तत्त्व के द्वारा उसकी कल्पना करना शक्य न होने से भी वह विशुद्ध है। समस्त कल्पनाओं के अधिष्ठान की किसी के द्वारा कल्पना नहीं की जा सकती। अतः आत्मा नित्य शुद्ध है, यह सिद्ध होता है ॥ ३६ ॥ अप्रकाशो यथाऽऽदित्ये नास्ति ज्योतिःस्वभावतः । नित्यबोधस्वरूपत्वान्नाज्ञानं तद्वदात्मनि ॥३७॥ अप्रकाश इति—प्रकाशस्वरूप (ज्योतिःस्वभाव) होने के कारण जिस प्रकार सूर्य में अप्रकाश (अन्धकार) नहीं है, उसी प्रकार नित्यज्ञानस्वरूप [नित्यबोधस्वरूप] होने से आत्मा में अज्ञान नहीं है ॥ ३७ ॥ हृदयस्पर्शिनी आत्मा की कल्पना क्यों नहीं की जा सकती ? ऐसी शंका यदि कोई करे तो उसका उत्तर स्पष्ट ही है कि कल्पना का हेतुभूत अज्ञान, वस्तुतः आत्मा में नहीं है। अज्ञान से कल्पित तो अनात्म पदार्थ हैं। अतएव आत्मा में उसका अभाव है। आत्मा तो प्रकाशस्वरूप है। जिस प्रकार सूर्य में अन्धकार नहीं होता, उसी प्रकार आत्मा नित्यज्ञानस्वरूप होने से उसमें अज्ञान नहीं है ॥ ३७ ॥
१. (छां. उ. ६।१।४) २. (बृ. उ. ४।४।१९) ३. (बृ. उ. ४।४।१९) ४. (भ. गी. ७।१४)
पार्थिवप्रकरणम् १३३ तथाऽविक्रियरूपत्वान्नावस्थान्तरमात्मनः । अवस्थान्तरवत्त्वे हि नाशोऽस्य स्यान्न संशयः ॥३८॥ तथेति—उसी प्रकार आत्मा निर्विकार रहने से उसमें [आत्मा में] कभी कोई अवस्थान्तर भी नहीं होता। यदि उसमें अवस्थान्तर हो तो निश्चय ही उसका विनाश होने का प्रसंग प्राप्त होगा ॥ ३८ ॥ हृदयस्पर्शिनी जैसे आत्मा, नित्यबोधस्वरूप होने से उसमें वस्तुतः अज्ञान नहीं रहता, उसी तरह वह (आत्मा) सर्व- विक्रियारहितस्वभाव (निर्विकार) रहने से उसमें कूटस्थताप्रच्युतिरूप अवस्थान्तर भी नहीं होता। यदि उसमें अवस्थान्तर हो तो निश्चय ही उसका नाश हो जायगा ॥ ३८ ॥ मोक्षोऽवस्थान्तरं यस्य कृतकः सं चलो ह्यतः । न संयोगो वियोगो वा मोक्षो युक्तः कथंचन ॥३९॥ मोक्ष इति—जिसके मत में मोक्ष को आत्मा का अवस्थान्तर कहा गया है, उसके सिद्धान्त के अनुसार वह कृतक होने से अनित्य है, क्योंकि ब्रह्म के साथ आत्मा के संयोग अथवा वियोग को मोक्ष मानना किसी प्रकार उचित नहीं है ॥ ३९ ॥ हृदयस्पर्शिनी जैसे आत्मा में कल्पितत्व नहीं, वैसे ही उसमें अवस्थान्तर भी नहीं—यह पूर्व श्लोक में बताया, किन्तु आत्मा का मोक्षावस्था को प्राप्त होना ही उसका अवस्थान्तर को प्राप्त होना स्पष्ट है। तब उससे अवस्थान्तर का अभाव कैसे माना जाय ? इस पर कहते हैं कि जिस वादी के मत में मोक्ष, आत्मा का अवस्थान्तर है, उसके मत के अनुसार मोक्ष अनित्य (कृतक) होने से उसे चल, विनाशी मानना होगा, तब वह मोक्ष ही नहीं कहलायेगा। उसे अपुरुषार्थ कहना पड़ेगा। मोक्ष को अवस्थान्तर जैसे नहीं माना जाता, उस तरह ब्रह्म के साथ आत्मा के संयोग को अथवा प्रकृति के वियोग को भी मोक्ष नहीं माना जा सकता ॥ ३९ ॥ संयोगस्याप्यनित्यत्वाद्वियोगस्य तथैव च। गमनागमने चैव स्वरूपं तु न हीयते ॥४०॥ संयोगस्येति—ब्रह्म के साथ संयोग और वियोग दोनों ही अनित्य होने के कारण उन्हें मोक्ष नहीं कहा जा सकता। उसी तरह दिव्य लोकों में जीव के गमनागमन को भी मोक्ष नहीं कह सकते, क्योंकि आत्मा अपने स्वरूप से कभी च्युत नहीं होता है, यानी आत्मस्वरूप में कभी च्युति नहीं हुआ करती ॥ ४० ॥ हृदयस्पर्शिनी ब्रह्मात्मसंयोग या प्रकृति से वियोग रूप मोक्ष के अनौचित्य में हेतु दे रहे हैं—'जो कृतक होता है, वह अनित्य होता है'—यह नियम है, तदनुसार संयोग या वियोग को मोक्ष नहीं माना जा सकता। उसी तरह जीव का संसार देश से परमात्मा के देश में गमन अथवा अपने उपासक भक्तों पर अनुग्रह करने के लिये परमात्मा के उनके प्रति आगमन को ही मोक्ष यदि कहें, तो वह भी उचित न होगा। क्योंकि जीव और परमात्मा दोनों ही निर्विकार (विकाररहित) होने से उनका गमनागमन होना संभव नहीं। इस प्रकार दूसरों के मतों में दोष दिखलाकर अपना निर्दुष्ट मत बताते हैं—'स्वरूपं तु न हीयते'—आत्मस्वरूप में कभी च्युति नहीं हुआ करती। अतः 'आत्मस्वरूप ही मोक्ष है' एवञ्च हमारे पक्ष में मोक्ष नित्य है ॥ ४० ॥ स्वरूपस्यानिमित्तत्वात्तन्निमित्तं हि चापरे । अनुपात्तं स्वरूपं हि स्वेनात्यक्तं तथैव च ॥४१॥
१३४ उपदेशसाहस्री स्वरूपस्येति—स्वरूप का कोई कारण नहीं है, किन्तु अन्य [अवस्थान्तरादि] सकारण हैं। निष्कर्ष यह है कि 'स्वरूप' में अकार्यता है, किन्तु अन्य अवस्थान्तर आदि में कार्यता है, क्योंकि वे सकारण हैं। स्वरूप उसी को कहते है, जिसका ग्रहण [उपार्जन] अथवा त्याग किसी के द्वारा भी अर्थात् न अपने द्वारा और न किसी अन्य के द्वारा ही किया जा सकता है ॥ ४१ ॥ हृदयस्पर्शिनी आत्मस्वरूपात्मक मोक्ष के नित्य और अकार्य होने में हेतु बता रहे हैं—स्वरूप अनिमित्त है, अर्थात् स्वरूप का कोई कारण नहीं है, इसलिये वह अकार्य है। अन्य अवस्थान्तर आदि सकारण हैं (सनिमित्त हैं) इसलिए वे अनित्य हैं अर्थात् कार्य हैं। स्वरूप की अनिमित्तता उसके लक्षण से ही सिद्ध होती है। स्वरूप उसे कहते हैं, जो अपने द्वारा या दूसरे के द्वारा उपार्जन नहीं किया जाता और न त्यागा ही जाता है। उपार्जन (उपादान) इसलिए नहीं किया जा सकता कि वह स्वरूपत्वेन नित्य है, और त्यागा इसलिये नहीं जा सकता कि वह स्वरूप होने के कारण ही त्यागने के योग्य नहीं है। तस्मात् अनिमित्त (निमित्तशून्य) होने से स्वरूप को नित्य ही कहना पड़ता है। लोकव्यवहार में भी देखा गया है कि वस्त्रादि का स्वरूप न उपादेय होता है और न हेय ही होता है। अतः वस्तुस्वरूप आगन्तुक नहीं है, अपितु नित्य है ॥ ४१ ॥ स्वरूपत्वान्न सर्वस्य त्यक्तुं शक्यो ह्यनन्यतः । ग्रहीतुं वा ततो नित्योऽविषयत्वापृथक्त्वतः ॥४२॥ स्वरूपत्वादिति—सबका स्वरूप सब से अभिन्न रहता है, अतः आत्मा का ग्रहण या त्याग नहीं हो सकता। तथा किसी का विषय न होने के कारण भी उसका पृथक् रूप से त्याग या ग्रहण करना संभव नहीं है ॥ ४२ ॥ हृदयस्पर्शिनी पूर्व श्लोक से उक्त स्वरूपलक्षण को लक्ष्य (आत्मा) में संघटित कर रहे हैं—आकाशादि सबका स्वरूप होने से और आरोपित सर्प आदि के रज्जु की तरह आत्मभूत (अभिन्न) होने के कारण आत्मा का त्याग या ग्रहण करना संभव नहीं। अभिप्राय यह है कि अध्यस्त पदार्थ की सत्ता अपने अधिष्ठान से भिन्न नहीं होती, जिस प्रकार रज्जु में प्रतीयमान सर्प, रज्जु से भिन्न नहीं, उसी तरह सबका अधिष्ठानभूत आत्मा सबसे भिन्न नहीं, किन्तु अभिन्न ही है। तथा किसी का विषय न होने के कारण भी आत्मा पृथक् रूप से ग्राह्य या त्याज्य नहीं है। अविषय का उपादान या स्वरूप का त्याग नहीं किया जाता ॥ ४२ ॥ आत्मार्थत्वाच्च सर्वस्य नित्य आत्मैव केवलः । त्यजेत्तस्मात्क्रियाः सर्वाः साधनैः सह मोक्षवित् ॥४३॥ आत्मेति—सभी पदार्थ 'आत्मा' के ही लिये हैं। इसलिये 'आत्मा' ही नित्य और निरुपाधिक [केवल] है। अतः मुमुक्षु पुरुष साधनों के सहित समस्त कर्मों को त्याग दे ॥ ४३ ॥ हृदयस्पर्शिनी आत्मा की नित्यता में हेत्वन्तर दे रहे हैं—समस्त आगमापायी (उत्पाद-विनाशशील) पदार्थ (वस्तुएँ) आत्मा के लिए ही होती हैं। अर्थात् आत्मा की भोग्य होती हैं, अतः जो स्वयं अनागमापायी (उत्पत्तिरहित-विनाशरहित) और उनका भोक्ता होगा वही आत्मा है, वही नित्य है। वही केवल अर्थात् निरुपाधिक है। उपाधि से भी उसमें कोई विशेष नहीं हो पाता। जबकि आत्मा नित्य है, उसके अतिरिक्त सभी अनित्य हैं और आत्मार्थ हैं, तथा आत्मस्वरूप में स्थिति ही मोक्ष है, इतना स्पष्ट हो गया है। अतः मुमुक्षु को साधनों सहित समस्त कर्मों का त्याग कर देना चाहिए ॥ ४३ ॥
- त्वादपृथक् कृतः—पाठान्तरम् ।
पार्थिवप्रकरणम् १३५ आत्मलाभः परो लाभ इति शास्त्रोपपत्तयः । अलाभोऽ*न्यात्मलाभस्तु त्यजेत्तस्मादनात्मताम् ।।४४।। आत्मलाभ इति—आत्मलाभ ही परमलाभ है, ऐसा शास्त्र का सिद्धान्त है तथा तर्कसंगत भी है। अन्य अनात्म पदार्थों का लाभ तो अलाभ ही है, यानी उसे 'लाभ' शब्द से कहना उचित नहीं है। इसलिये अनात्मता का त्याग करना चाहिये ।। ४४ ।। हृदयस्पर्शिनी मुमुक्षु को कर्म (क्रिया) का त्याग इसलिए भी करना चाहिए कि 'आत्मलाभान्न परं विद्यते'१—आत्मलाभ ही परमलाभ है—यह स्मृतिशास्त्र का सिद्धान्त है। इस प्रकार के अनेक शास्त्रवचन और उपपत्तियाँ हैं। 'सर्वस्व- त्यागेनापि आत्मसंरक्षणप्रवृत्तिदर्शनमुपपत्तिः'—सर्वस्व का त्याग करके भी आत्मरक्षण की प्रवृत्ति होती दिखाई देती है—यह उपपत्ति अर्थात् तर्क, युक्ति है। आत्मलाभ तो नित्यसिद्ध है, तब यह कौन-सी नवीन (अपूर्व) बात बताई जा- रही है ? नवीन बात यह कही जा रही है कि अन्यात्मलाभ जो है, वह वास्तव में अलाभ ही है। अर्थात् अपने आत्मा के अज्ञान से निष्पन्न अहंकारादि में अभेदेन जो आत्मस्फुरण होता है, उसे अन्यात्मलाभ कहते हैं। उससे संसारदुःख प्राप्त होता है, इस कारण वह वास्तविक लाभ नहीं है। और वह स्वतःसिद्ध परमानन्दाविर्भाव के होने में प्रतिबन्धक बनता है, उस कारण भी उसे वास्तविक लाभ नहीं कह सकते। वह अन्यात्मलाभ, लाभ न होकर प्रत्युत क्षतिरूप ही है। इसलिए प्रमाणजनित ब्रह्मात्मज्ञान से अज्ञातबाध द्वारा अहंकारादिकों में अविद्या से अध्यारोपित आत्माभिमा- नतारूप अनात्मताबुद्धि का त्याग करना चाहिए ।। ४४ ।। गुणानां साम्यभावस्य भ्रंशो न ह्युपपद्यते । अविद्यादेः प्रसुप्तत्वान्न चान्यो हेतुरुच्यते ॥४५॥ गुणानामिति—सृष्टि के सम्बन्ध में सांख्यदार्शनिकों के विचार का खण्डन कर रहे हैं—गुणों की साम्यावस्था का नाश [भ्रंश] होना संभव नहीं है, और वे सृष्टि के आरंभ से पूर्व अविद्या आदि अपने कारण में लीन रहते हैं, और उनसे भिन्न जो पुरुष है, उसे सृष्टि की उत्पत्ति का कारण नहीं माना गया है। अतः सृष्टि के सम्बन्ध में सांख्य के विचार उचित नहीं हैं ॥ ४५ ॥ हृदयस्पर्शिनी अभी तक यह बताया गया कि आत्मतत्त्व को ब्रह्मरूप समझना ही आत्मलाभ कर लेना है, और वही परमलाभ है, परमपुरुषार्थ है—इस प्रकार का ब्रह्मात्मैक्यज्ञान मोक्ष का साधन है। आत्मा अद्वयानन्दरूप है, उसमें संसार की जो प्रतीति होती है, वह अज्ञान के कारण होती है, वास्तविक प्रतीति नहीं है। इस प्रकार अपना मत बता- कर, उसी में मुमुक्षुओं की बुद्धि को स्थिर करने के लिये अन्यान्य मतों के निराकरण का आरंभ करते हुए भगवान् भाष्यकार सृष्टि के विषय में सांख्यपक्ष का निराकरण अब कर रहे हैं—सांख्य का कहना है कि स्वतन्त्र, अचेतन, त्रिगुणात्मक जो प्रधान (प्रकृति) है, वह पुरुष (आत्मा) के भोगापवर्गार्थ महदादि (महत्तत्त्व आदि) के रूप में परिणत होता है। किन्तु उनका यह कथन संभव नहीं हो सकता। क्योंकि गुणों की साम्यावस्था का नाम प्रकृति है। उस प्रकृति (सत्त्व-रजस्-तमोगुणों) के सृष्टिपूर्वकालीन मेलनरूप समभाव का (साम्यावस्था का) ध्वंस (भ्रंश, प्रच्युति) अर्थात् पूर्वावस्था (साम्यावस्था) का त्याग कर अवस्थान्तरापत्ति (वैषम्यावस्था) रूप परिणाम होना संभव नहीं है। यदि ऐसा माना जाय कि प्रकृति के सर्गोन्मुख होनेपर उसके गुणसाम्य में विषमता हो जाती है। किन्तु यह कहना ठीक न होगा, क्योंकि प्रश्न यह उपस्थित होगा कि गुणसाम्य में होनेवाला विषमतारूप परिणाम निर्हेतुक होगा या सहेतुक होगा ? यदि विषमतारूप परिणाम को निर्हेतुक अर्थात् बिना किसी कारण के ही माना जाय तो सर्वदा ही वह परिणाम होता रहेगा। और यदि अविद्या तथा अदृष्ट को उसका कारण कहें तो प्रकृति १. (आप. ध. १।२२।२)
- ऽनात्म-पाठान्तरम् ।
१३६ उपदेशसाहस्री के परिणाम से पूर्व वे उसी में लीन रहते हैं, इसलिए वे उस परिणाम के कारण नहीं बन सकते। पुरुष को कारण कहें तो वह उदासीन है। ईश्वर को कारण कहें तो सांख्य सिद्धान्त का ही भंग होगा, क्योंकि वह जगत् के उपादानरूप में ईश्वर को नहीं बताता, जगत् का उपादान तो प्रकृति को बताता है। अतः प्रकृति का महदादिरूप में परिणाम होना संभव ही नहीं हो रहा है। अतः सांख्यमत अनुपपन्न है ॥ ४५ ॥ इतरेतरहेतुत्वे प्रवृत्तिः स्यात्सदा न वा। नियमो न प्रवृत्तीनां गुणेष्वात्मनि वा भवेत् ॥४६॥ इतरेति—परस्पर एक दूसरे की प्रवृत्ति में गुणों को कारण कहा जाय तो सर्वदा ही प्रवृत्ति होती रहेगी अथवा प्रवृत्ति ही नहीं होगी। क्योंकि आत्मा अथवा गुणों में उनकी प्रवृत्ति का नियामक बन पाने का कोई हेतु उपलब्ध नहीं हो रहा है ॥ ४६ ॥ हृदयस्पर्शिनी यदि सत्त्वादि गुणों को परस्पर एक दूसरे की प्रवृत्ति का कारण माना जाय तो किसी अन्य प्रयोजक (कारण) की प्रतीक्षा की अपेक्षा न रहने से सर्वदा ही प्रवृत्तिरूप परिणाम होता रहेगा, क्योंकि प्रवृत्ति का हेतु सर्वदैव विद्यमान है। या किसी विशेष के न होने से प्रवृत्ति ही नहीं होगी। अर्थात् आत्मा में या गुणों में उनकी प्रवृत्ति का नियामक कोई हेतु नहीं है। इसलिये सदा प्रवृत्ति या अप्रवृत्ति होगी—यह अभिप्राय है। सांख्य ने गुण और पुरुष के अतिरिक्त अन्य किसी तत्त्व को स्वीकार नहीं किया है, जो गुणों में या पुरुषों में स्थित रहकर प्रवृत्ति आदि का नियामक बन सके ॥ ४६ ॥ विशेषो मुक्तबद्धानां तादर्थ्यं न च युज्यते । अर्थार्थिनोस्त्वसम्बन्धो नार्थी ज्ञो नेतरोज्ञपि वा ॥४७॥ विशेष इति—यदि 'पुरुष' के भोगापवर्ग के लिये 'प्रधान' की प्रवृत्ति कहें तो बद्ध और मुक्त जीवों में कोई भेद ही नहीं हो सकेगा। इस सांख्यमत में 'अर्थार्थी' [शेष-शेषी] रूप सम्बन्ध ही नहीं बन सकता, क्योंकि 'जीव' भी अर्थी नहीं है, और 'प्रधान' भी अर्थी नहीं है ॥ ४७ ॥ हृदयस्पर्शिनी यथाकथञ्चित् प्रधान की प्रवृत्ति मानी भी जाय, तो भी दोष प्रसक्ति का परिहार नहीं हो सकेगा। प्रधान को पुरुषार्थ के लिये (पुरुष के भोग-मोक्ष के लिए) यदि स्वीकार करें तो बद्ध और मुक्त जीवों का भेद (विशेष) उपपन्न न हो सकेगा। क्योंकि एक ही प्रधान सभी पुरुषों के लिये समान होनेपर उस एक (प्रधान) के व्यापार से किसी का बन्ध और किसी का मोक्ष ऐसा विभिन्न परिणाम (विभिन्न व्यवस्था) उपपन्न नहीं हो सकता। तथाच सभी लोग सर्वदा बद्ध या मुक्त ही रहेंगे। इस मत में अर्थ-अर्थी (शेष-शेषी) का सम्बन्ध ही नहीं बन सकता। क्योंकि जो चाहा जाता है, उसे 'अर्थ' अर्थात् सुख या तत्साधनरूप पदार्थ (वस्तु) कहते हैं, और उसके चाहने वाले को 'अर्थी' कहते हैं। उनका उपकार्योपकारक—भावसम्बन्ध हुआ करता है। वह सम्बन्ध प्रधानवाद में (सांख्य के मत में) घटित (संगत) नहीं हो सकता। क्योंकि न तो 'जीव' ही अर्थी है और न प्रधान ही। क्योंकि जीव (पुरुष) ज्ञानैकस्वभाव (ज्ञ) है, अतः उसे अर्थी मानना उचित न होगा। उसे तो असंग और निर्विशेष माना गया है। उससे भिन्न जो प्रधान है, उसे भी अर्थी नहीं कह सकते, क्योंकि वह तो जड़ है। तस्मात् प्रधान में परार्थत्व की कल्पना करना अनुचित है। उस कारण अर्थ-अर्थी में शेष-शेषिसंबंध नहीं हो पा रहा है ॥ ४७ ॥ प्रधानस्य च पारार्थ्यं पुरुषस्याविकारतः । न युक्तं सांख्यशास्त्रेऽपि विकारेऽपि न युज्यते ॥४८॥
पार्थिवप्रकरणम् १३७ प्रधानस्येति—सांख्यशास्त्र में भी 'पुरुष' को निर्विकार कहा गया है, उस कारण 'प्रधान' का परार्थ्य बताना उचित नहीं है। यदि 'पुरुष' को यथाकथञ्चित् सविकार भी कहा जाय तो भी प्रधान का पारार्थ्य [परार्थ होना] सिद्ध नहीं किया जा सकेगा ॥ ४८ ॥ हृदयस्पर्शिनी सांख्यशास्त्र ने भी प्रधान की जो परार्थता स्वीकार की है, वह भी पुरुष के निर्विकार होने के कारण युक्तियुक्त नहीं है। यदि प्रधान को पुरुष के भोग ओर अपवर्ग (मोक्ष) के लिये स्वीकार किया जाय तो पुरुष को विकारी मानना पड़ेगा, क्योंकि यदि प्रधान के व्यापार से उसमें कोई फल ही न हुआ तो प्रधान की पुरुषार्थता ही क्या हुई ? और पुरुष का स्वामित्व ही क्या रहा ? किन्तु सांख्यमत में पुरुष को निर्विकार माना गया है। इसलिये प्रधान उसका उपकारक नहीं हो सकता। यदि प्रधान के प्रति पुरुष का स्वामित्व सिद्ध करने के लिये पुरुष में यथा- कथञ्चित् विकार को स्वीकार कर लिया जाय, तो भी प्रधान की परार्थता नहीं बन पा रही है। क्योंकि 'जो विकारवान् होता है, वह अनित्य होता है' इस नियम के अनुसार पुरुष को अनित्य मानना होगा, तब अनित्य पुरुष, नित्य प्रधान का उपकार्य नहीं हो सकेगा। अतः प्रधान, पुरुष के लिये है—यह नहीं कहा जा सकता ॥ ४८ ॥ सम्बन्धानुपपत्तेश्च प्रकृतेः पुरुषस्य च । मिथोऽयुक्तं तदर्थत्वं प्रधानस्याचितस्त्वतः ॥४९॥ सम्बन्धेति—प्रकृति और पुरुष दोनों का परस्पर सम्बन्ध न हो सकने से और प्रकृति के जड़ होने से उसका पुरुष के लिये होना [परार्थ होना] कभी सम्भव नहीं है ॥ ४९ ॥ हृदयस्पर्शिनी प्रधान और पुरुष के सम्बन्ध का जो अभाव बताया गया है, उसी को पुनः स्पष्ट कर रहे हैं—पुरुष, असंग और उदासीन है और प्रकृति जड़ है, उस कारण उसकी (प्रकृति की) स्वतः प्रवृत्ति हो नहीं सकती। इसलिये उन दोनों का उपकार्योपकारक-भावसम्बन्ध होना असंभव है। एवं च सांख्य में प्रतिपादित प्रधान की परार्थता युक्ति-युक्त नहीं कही जा सकती। तात्पर्य यह है कि प्रकृति-पुरुष का परस्पर सम्बन्ध न हो सकने के कारण और प्रकृति के जड़ होने के कारण प्रधान (प्रकृति) का पुरुष के लिये होना कदापि संभव नहीं है ॥ ४९ ॥ क्रियोत्पत्तौ विनाशित्वं ज्ञानमात्रे च पूर्ववत् । निर्निमित्ते त्वनिर्मोक्षः प्रधानस्य प्रसज्यते ॥५०॥ क्रियेति—पुरुष में क्रिया की उत्पत्ति यदि मानते हैं, तो पुरुष में विनाशित्व प्राप्त होता है और यदि उसमें केवल ज्ञानमात्र क्रिया का होना स्वीकार करते हैं तो पूर्वोक्त दोष प्राप्त होता है। अर्थात् पुरुष तो कूटस्थ है, उस कारण प्रधान के व्यापार से पुरुष का कोई उपकार नहीं हो सकता। यदि प्रधान की प्रवृत्ति निर्निमित्त ही माने तो पुरुष का कभी मोक्ष ही नहीं हो सकेगा ॥५०॥ हृदयस्पर्शिनी पुरुष में यत्किञ्चित् क्रिया की उत्पत्ति मानने पर उसका विनाशित्व सिद्ध होता है। क्योंकि ऐसी व्याप्ति (नियम) देखी जाती है—'यत् क्रियावत् तदनित्यम् यथा घटादि'। और सांख्य ने तो पुरुष को नित्य माना है। इस पर यदि कोई कहे कि पुरुष में परिस्पन्द या परिमाणरूप क्रिया मानने पर अनित्यत्व प्रसंग हो सकता है, किन्तु हम (सांख्य) परिस्पन्द या परिमाणरूप क्रिया का होना पुरुष में नहीं मानते। हम तो उसमें ज्ञानक्रिया को ही मानते हैं। तथापि पुनः यह प्रश्न होगा कि उस ज्ञान को जन्य मानते हो या अजन्य ? यदि जन्य ज्ञान का उससे सम्बन्ध कहो तो विकारित्व प्राप्त होने से अनित्यत्वापत्ति होगी। यदि अजन्य ज्ञान (नित्य ज्ञान) का उससे सम्बन्ध कहो तो प्रधान के व्यापार से पुरुष पर कोई उपकार नहीं हुआ। अर्थात् प्रधान के प्रति उसकी (पुरुष की) स्वामिता १८
१३८ उपदेशसाहस्री सिद्ध नहीं हो पाई । एवञ्च उक्त दोष तदवस्थ ही रहा । तस्मात् पुरुष के असंग, उदासीन, अतिशयशून्य होने से उसमें प्रवर्त्तकत्व उपपन्न नहीं होता, और प्रधान के विकारों के अतिरिक्त अन्य किसी कारण को स्वीकार न करने से तथा प्रलय-काल में प्रधान के विकारों का स्वरूप न रहने से कोई प्रवर्त्तक दिखलाई नहीं पड़ता । अतः प्रधान की प्रवृत्ति को निर्निमित्त ही कहना होगा । निर्निमित्त मानने पर पूर्वोक्त अव्यवस्था ज्यों-की-त्यों ही बनी रही । प्रधान की निमित्तरहित प्रवृत्ति मानने पर पुरुष का मोक्ष कभी भी नहीं हो सकेगा ॥ ५० ॥ न प्रकाश्यं यथोष्णत्वं ज्ञानेनैवं सुखादयः । एकनीडत्वतोऽग्राह्याः स्युः कणादादिवर्त्मनाम् ॥५१॥ नेति—जिस प्रकार अग्नि का उष्णत्व उसके प्रकाश से प्रकाशित नहीं होता, उसी प्रकार वैशेषिक दार्शनिकों के अनुसार एक ही आश्रय में स्थित रहने के कारण आत्मगत ज्ञान से उसके आनन्दादि गुणों का ग्रहण नहीं किया जा सकता ॥ ५१ ॥ हृदयस्पशिनी यहाँ तक निर्गुण पुरुषवादी सांख्य के मत का निराकरण किया गया । अब सगुण पुरुषवादी वैशेषिकों के मत का निराकरण कर रहे हैं—सगुण पुरुषवादी वैशेषिक लोग आत्मा को सुख, दुःख, ज्ञान आदि गुणों से विशिष्ट मानते हैं । और आत्मगत सुखादि गुणों को आत्मगत (आत्मनिष्ठ) ज्ञान से ग्राह्य (प्रकाशित) मानते हैं । किन्तु यह संगत नहीं हो रहा है । तथापि अग्निनिष्ठ (अग्नि का, अग्निगत) उष्णत्व उसके प्रकाश से (अग्निनिष्ठ, अग्निगत प्रकाश से) प्रकाशित नहीं होता (प्रकाश्य, प्रकाशार्ह नहीं होता), उसी प्रकार वैशेषिक सिद्धान्त के अनुसार एक ही आश्रय में स्थित होने के कारण आत्मगत ज्ञान से उसके (आत्मा के) सुखादि गुण ग्राह्य नहीं हो सकते । विषय- विषयी की समानदेशता रहने पर यह ग्राह्य है, इस प्रकार भेद-नियम नहीं बन सकता ॥ ५१ ॥ युगपत्समवेतत्वं सुखविज्ञानयोरपि । मनोयोगैकहेतुत्वादग्राह्यत्वं सुखस्य च ॥५२॥ युगपदिति—किञ्च आत्मा के साथ सुख और ज्ञान का समवायसम्बन्ध होना शक्य नहीं है । तथा सुख का ग्रहण आत्म-मनःसंयोग से होता है । अतः किसी भी प्रकार से सुख का ग्राह्यत्व नहीं बन पाता है ॥ ५२ ॥ हृदयस्पशिनी केवल एकाश्रय होने से ही ज्ञान-सुखादिकों में भास्य-भासकता की अनुपपत्ति नहीं है, अपितु यौगपद्य के संभव न होने से भी है । सुख और ज्ञान का आत्मा के साथ एक ही समवाय सम्बन्ध का होना भी संभव नहीं है । अर्थात् सुख और विज्ञान में युगपत् समवेतत्व संभव नहीं है । क्योंकि वैशेषिकों के सिद्धान्त के अनुसार ज्ञान और सुखादि का असमवायिकारण आत्म-मनःसंयोग है, और वह आत्म-मनःसंयोग रूप असमवायिकारण आत्मा के केवल एक ही गुण के प्रति कारण होता है । अतः जिस समय सुखनिमित्तक आत्म-मनःसंयोग होगा, उस समय ज्ञाननिमित्तक संयोग न होने के कारण सुख का ज्ञान नहीं हो सकता और सुख के असमवायिकारणरूप उस मनः- संयोग का नाश होने पर सुख का भी नाश हो जायगा । इस प्रकार किसी भी तरह सुख की ग्राह्यता नहीं बताई जा सकती । संयोगान्तररूप असमवायिकारण के ज्ञान से सुख की ग्राह्यता प्रत्यक्षतः उपपन्न नहीं है । ‘अपि’ शब्द से समवाय की कल्पना भी प्रामाणिक नहीं है । ‘च’ शब्द से निरवयव आत्मा और मन का कोई प्रदेश न रहने से दो आत्माओं की तरह संयोग भी अनुपपन्न है । यदि दो विभु आत्माओं का संयोग मान भी लिया जाय तो उनका विभाग अनुपपन्न है । विभाग के न हो पाने पर संयोगान्तर (अन्य संयोग) की अनुपपत्ति होगी, तब ज्ञानादि कार्यों के क्रम की उपपत्ति नहीं हो सकेगी । ‘कोई भी कार्य, अपने असमवायिकारण के देश का अतिक्रमण (उल्लङ्घन) नहीं किया करता’ इस नियम के अनुसार यहाँ भी अणुपरिमाण मनःसंयोग अणुप्रदेशमात्रवर्ती रहने से उस का कार्य भी तन्मात्रवर्ती ही रहेगा, तब सकल शरीरगत आत्मवेदना के अप्रत्यक्ष होने का प्रसङ्ग प्राप्त होगा, इत्यादि अनेक दोषों के होने की संभावना होगी ॥ ५२ ॥